हां रानी पर पहले एक और ऑमलेट बना दे
जी कहके पलट के 2 अंडे फोड़ के तवे पाई दाल देती है ..नवाज़ आरती के बिलकुल पीछे खड़ा हो गया और उसकी गर्दन पर के बालो को अपने हाथों से पकड़ कर हटाने लगा ..

दोनों इतने करीब थे की आरती को नवाज़ की गरम सांसें अपनी गर्दन पर महसूस हो रही थी.
आरती की सांसें अटक गयी. उसने कोशिश की की वो अपना ध्यान स्टोव और मसलों पर लगाए, पर नवाज़ उसके बिलकुल पीछे चिपक कर खड़ा था. उसका एक हाथ आरती की कमर पर था और दूसरा हाथ आरती के हाथ के ऊपर, ताकि वो स्पून चला सके.
"नवाज़ जी... ऐसे कैसे बनेगा? आप हत्तीए न,"
आरती ने नखरे से कहा, पर वो खुद भी नवाज़ की मरदाना खुशबु और गर्मी में पिघल रही थी.
"नहीं हटूंगा. मैंने कहा न, गाइड मैं करूँगा. अब ज़रा ये मसाला भुनने दे, और देख कैसे इसकी खुशबु पूरे किचन में फैलती है... बिलकुल तेरी बदन की खुशबु की तरह,"
नवाज़ ने उसके कान के पास अपनी गरम सांसें चूमने लगा .

आरती ने शर्मा कर अपनी आँखें मूँद ली. किचन की गर्मी और नवाज़ का ये बेबाक रोमांस उसे पागल कर रहा था. उसने धीरे से पूछा,
"कल खेत में भी आप ऐसे hi तंग करोगे?"
नवाज़ ने उसकी गर्दन पर एक हलकी सी चुटकी काटी और बोलै,

"वहां तंग नहीं करूँगा रानी... वहां तोह मैं तुझे पूरी तरह निचोड़ लूँगा. अभी तोह बस स्टार्टर है , असली 'मैं कोर्स' तोह वहां मिलेगा."
उसकी 'निचोड़ लूँगा' वाली बात ने आरती के दिमाग में एक ऐसी तस्वीर बनायीं की उसके घुटने जवाब देने लगे. उसने समझ लिया था की नवाज़ अब सिर्फ उसका प्रेमी नहीं, बल्कि उसका 'मालिक' बन चूका है.
आरती ने नवाज़ के सीने पर पीछे की तरफ अपना सर टिका दिया और मुस्कुराते हुए ऑमलेट बनाने लगी. उसे एहसास हो गया था की नवाज़ के बिना अब उसका एक पल भी रहना मुश्किल है.
यह किचन का माहौल अब किसी तंदूर से काम नहीं लग रहा था, जहाँ आमलेट के saath-saath आरती का घमंड और उसकी शर्म भी dheere-dheere पिघल रही थी. नवाज़ ने उसे पीछे से जिस तरह जकड़ा था, आरती को अपनी 'खुली' हालत (बिना पंतय के) का एहसास हर पल हो रहा था, जो उसकी बेचैनी को और बढ़ा रहा था.
एक और बना दे
आरती नवाज़ की और पलट के देखते हुई कहते है
कितने खाओगे
जितना तू बनाएगी
आरती ने कांपते हाथों से फिर से स्टोव पर तवा रखा और दो अंडे फोड़ कर दाल दिए. पर नवाज़ की पकड़ इतनी मज़बूत थी की आरती को अण्डों की महक से ज़्यादा नवाज़ की मरदाना खुशबु और उसके जिस्म की गर्मी महसूस हो रही थी. नवाज़ का एक हाथ आरती की कमर पर उसकी नंगी चमड़ी को सेहला रहा था, और दूसरा हाथ उसके हाथ के ऊपर था, जैसे वही आरती की हर हरकत को कण्ट्रोल कर रहा हो.
जब नवाज़ ने उसके कान के पास झुक कर उसके कान को आपने मू मई लेके एक बार चूसा तो तोह आरती के पूरे जिस्म में एक सिहरन दौड़ गयी.
उसने थोड़ा नखरे से कहा,
"नवाज़ जी... ऐसे कैसे बनेगा? आप हत्तीए न,"
पर उसकी आवाज़ में कोई सख्ती नहीं थी, सिर्फ एक मीठा सरेंडर था.
तब नवाज़ ने बड़े हक़ से उसकी गर्दन पर हलकी सी चुटकी काटी तो आरती ने अपना सर नवाज़ के चौड़े सीने पर टिका दिया. आमलेट की खुशबु अब उसे बुरी नहीं लग रही थी, क्यूंकि उसमे नवाज़ का इश्क़ और उसकी शैतानी घुली हुई थी. वह मुस्कुरा रही थी, क्यूंकि उसे पता था की अरविन्द अग्रवाल की बीवी अब पूरी तरह इस नौकर की 'बेगम' बन चुकी है.
नवाज़ ने उसके कान के पास फुसफुसाया,
"रानी, जल्दी बना... क्यूंकि ये स्टार्टर ख़तम होते hi, मुझे तुझे खेत की उन गहरी रातों का नशा चखना है."
आरती ने पलट कर एक ऐसी नज़र दी जो कह रही थी की वह अब पूरी तरह तैयार है.
नवाज़ के इरादे अब और भी खतरनाक और शैतानी होते जा रहे थे. जब उसने देखा की आरती आमलेट बनाने में मसरूफ है और उसकी पीठ नवाज़ के सीने से चिपकी हुई है, तोह उसने मौके का फायदा उठाया.
नवाज़ ने अपना गरम हाथ आरती की नंगी कमर पर rakha—wahan जहाँ कोई पर्दा नहीं tha—aur dheere-dheere उसकी उँगलियाँ ऊपर की तरफ सरकने लगीं. आरती की सांसें तेज़ हो गयी और उसने हलकी सी सिसकी ली. नवाज़ ने अपना चेहरा आरती की नंगी पीठ के पास लाया और बड़े जूनून से उसकी पीठ को चाटने लगा.

आरती का पूरा जिस्म झटके से अकड़ गया.
"नवाज़ जी... यह क्या... उफ़,"
उसने हम्पते हुए कहा, पर नवाज़ रुकने वाला नहीं था. उसका कमर वाला हाथ अब dheere-dheere ब्लाउज के नीचे से ऊपर की तरफ, उसके नरम उभारों की तरफ बढ़ने लगा.
आरती ने घबरा कर दबी आवाज़ में कहा
"No... प्लीज नवाज़ जी, अभी नहीं,"
पर उसकी 'न' में कोई दम नहीं था.
तभी नवाज़ ने एक और शैतानी चाल चली. उसने टेबल से दारू का गिलास उठाया और थोड़ी सी स्कॉच आरती की गर्दन के पीछे पर गिरा दी. ठंडी दारू जब आरती की गरम चमड़ी पर गिरी, तोह वह काँप उठी.
नवाज़ ने तुरंत अपनी ज़बान से उस दारू को आरती की गर्दन से चाटना शुरू कर दिया. स्कॉच का तीखा नशा और नवाज़ का गरम sparsh—Aarti का दिमाग सुन्न हो गया. उसके हाथ से स्पून छूटने वाला था.
"यह नशा... खेत तक का इंतज़ार नहीं कर सकता रानी,"
नवाज़ ने उसके कान में बिलकुल बेहोशी वाली आवाज़ में फुसफुसाया.
आरती ने अपनी आँखें ज़ोर से बंद कर ली और नवाज़ के चौड़े कंधे पर पीछे की तरफ सर टिका दिया. वह अब सिर्फ आमलेट नहीं बना रही थी, वह खुद नवाज़ के इश्क़ की आग में पाक रही थी..
नवाज़ का जूनून अब आग की तरह भड़क रहा था. उसने आरती को किचन प्लेटफार्म से और ज़ोर से सत्ता दिया, इतना की आरती के नरम बदन और नवाज़ के सख्त जिस्म के बीच हवा की भी जगह नहीं बची.
आरती की सांसें उखाड़ने लगी थीं. एक तरफ नवाज़ का मज़बूत हाथ उसके ब्रैस्ट को ब्लाउज के उप्पर से मसल रहा था, और दूसरी तरफ उसकी जीभ आरती की नंगी पीठ पर किसी सांप की तरह रेंग रही थी. स्कॉच की ठंडक और नवाज़ की ज़बान की गर्मी का वह संगम आरती को पागल कर रहा था.
"नवाज़ जी... अब और नहीं... मेरा दम निकल जायेगा,"
आरती ने हम्पते हुए फुसफुसाया, पर उसके हाथ khud-ba-khud नवाज़ के बालों को और कसने लगे थे.
नवाज़ ने उसकी पीठ को chaat-te हुए धीरे से उसके कान के निचे love-bite दिया. आरती के मुंह से एक तीखी सिसकी निकली और उसके घुटने जवाब देने लगे. उसने महसूस किया की नवाज़ का दूसरा हाथ अब उसकी कमर से निचे सरक रहा hai—wahan जहाँ उसने कुछ नहीं पहना था.
नवाज़ ने उसके कान के पास बेहद भरी और नशीली आवाज़ में कहा,
"अभी तोह नशा शुरू हुआ है रानी... अभी तोह इस जिस्म के हर कोने को अपना बनाना बाकी है. बता, अब भी तुझे उस पुराणी मालकिन की याद आती है?"
आरती ने सिर्फ अपना सर न में हिलाया. उसका गजरा अब पूरी तरह टूट कर ज़मीन पर बिखर चूका था. वह बिना चड्डी के, सिर्फ एक पतली साड़ी में, नवाज़ के इस मरदाना हमले के आगे पूरी तरह ढेर हो गयी थी.
नवाज़ का नशा अब चरम पर था. एक हाथ में दारू का गिलास और दुसरे से वह आरती की कमर पर बंधी साड़ी की गाँठ तक पहुँच गया. आरती प्लेटफार्म पर बैठी thart-thara रही थी, उसकी टांगें तहत था रही thi..aur उसे हर पल अपनी 'खुली' हालत का एहसास तड़पा रहा था.
जैसे hi नवाज़ ने उसकी साड़ी की गाँठ को ढीला करना शुरू किया, आरती ने घबरा कर उसके मज़बूत हाथ को पकड़ लिया.
उसके चेहरे पर शर्म और एक अजीब सी कश्मकश थी.
"नवाज़ जी... ये... ये ज़रूरी है क्या जी?"
आरती ने बेहद दबी और कांपती हुई आवाज़ में पूछा, उसकी आँखों में नवाज़ के लिए पूरा समर्पण था.
नवाज़ ने अचानक आरती को घुमा कर अपनी तरफ मोड़ा.. नवाज़ ने आमलेट का एक और निवाला लिया, उसे बड़े मज़े से चबाया और फिर दारू का एक घूँट भरके आरती की आँखों में आँखें दाल कर बोलै,
"हाँ रानी... बहुत ज़रूरी है. आज मेरे बर्थडे पर, मुझे अपनी रानी को हर परदे से आज़ाद देखना है. जब अंदर कुछ नहीं है, तोह ये ऊपर का पर्दा क्यों?"
आरती ने शर्मा कर अपनी पलके झुका ली. नवाज़ ने बड़े आराम से, एक हाथ से आमलेट कहते हुए, दुसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू और फिर कमर से साड़ी खोलना शुरू किया. साड़ी dheere-dheere सरक कर निचे गिरने लगी, और आरती का गोरा बदन किचन की मद्धम रौशनी में चमकने लगा.
"देखो रानी... तुम्हारी ये खूबसूरती इस साड़ी में क़ैद थी,"
नवाज़ ने उसकी नंगी कमर पर अपना गरम हाथ फेरते हुए फुसफुसाया.
"अब बोलो, क्या अब भी तुम्हे उस पुराणी 'मालकिन' वाली इज़्ज़त की परवाह है? या अब तुम सिर्फ मेरी हो?"
आरती ने हम्पते हुए नवाज़ के गले में अपने हाथ दाल दिए और अपना सर उसके कंधे पर छुपा लिया. उसका जिस्म अब नवाज़ की हर शैतानी और हर लुत्फ़ के लिए पूरी तरह खुल चूका था.
नवाज़ ने अचानक आरती को उठा कर किचन प्लेटफार्म पर बिठा दिया. आरती अब ब्लाउज और पेटीकोट मई उसके सामने उस किचन प्लेटफार्म पाई बैठी थी ..
नवाज़ ने आमलेट का आखरी निवाला चबाया और दारू का गिलास टेबल पर टिकाया. उसका पूरा ध्यान अब सिर्फ उस नज़ारे पर था जो उसके सामने किचन प्लेटफार्म पर बैठा था. आरती, जो थोड़ी देर पहले तक 'मालकिन' बानी घूमती थी, अब सिर्फ एक ब्लाउज और पेटीकोट में नवाज़ के सामे निढाल बैठी थी.
आरती ने पेटीकोट तोह पहना हुआ है, पर उसकी 'खुली' हालत (बिना पंतय के) और नवाज़ की शैतानी ने माहौल को कुछ अलग hi बना दिया था नवाज़ ने जब आरती को उठा कर किचन प्लेटफार्म पर बिठाया, तोह उसका पेटीकोट कुछ हद तक उप्पर चला गया ..प्लेटफार्म पर बैठे होने की वजह से पेटीकोट थोड़ा खिंच गया था, आरती को हर पल यह डर और नशा सताए जा रहा था की निचे कुछ नहीं है.
बचा हुआ काम नवाज़ ने खुद करने का सोचा ..नवाज़ की उँगलियाँ अब उसके पेटीकोट के घेरे को छूटे हुए ऊपर की तरफ सरक रही थीं, सीधा उसकी नंगी चमड़ी पर.
आरती ने हम्पते हुए अपनी पलके झुका ली, उसके झुमके उसकी थरथराती गर्दन से टकरा रहे थे.
क्यों दर रही है .. पेटीकोट तो है न
"नवाज़ जी... पेटीकोट तोह है... पर आपकी नज़रें... उफ़,"
आरती ने दबी आवाज़ में कहा, क्यूंकि उसे महसूस हो रहा था की नवाज़ की नज़रें उस पेटीकोट के पार उसकी नंगी हालत को भांप चुकी हैं.
नवाज़ ने आमलेट का आखरी टुकड़ा ख़तम किया और दारू का गिलास एक तरफ रख दिया. उसका पूरा ध्यान अब आरती की कमर पर बंधी उस रेशमी पेटीकोट की डोरी पर था. आरती किचन प्लेटफार्म पर बैठी थरथरा रही थी, उसकी गोरी टांगें पेटीकोट से थोड़ा बाहर झांक रही थीं और उसे हर पल अपनी 'खुली' हालत (बिना पंतय के) का एहसास पागल कर रहा था.
नवाज़ ने आमलेट का मज़ा लेते हुए एक शैतानी हंसी हंसी और फुसफुसाया,
"पेटीकोट तोह सिर्फ एक पर्दा है रानी... असली खज़ाना तोह इसके अंदर छुपा है, जिसे आज मुझे बिना किसी रुकावट के देखना है."
अब उसका पेटीकोट घुटनो से काफी ऊपर सरक गया था. आरती की गोरी और नरम जाएंगें अब नवाज़ की नज़रों के बिलकुल सामने थीं. आरती ने शर्म के मारे अपनी टांगें ek-dusre में भींची हुई थीं, पर नवाज़ ने बड़े हक़ से अपने दोनों हाथ उसके घुटनो पर रखे और उन्हें dheere-dheere अलग करने लगा.
आरती ने शर्म के मारे अपनी नंगी टांगें ek-dusre में फसा ली थीं. उसे हर पल एहसास हो रहा था की उसने पंतय नहीं पहनी है, और नवाज़ की नज़रें वही थमी हुई थीं.
आरती की सांसें सीने में अटक गयी.
नवाज़ जी... अब और नहीं... कोई आ जायेगा
आरती ने कांपते हुए मिन्नत की, पर उसकी आँखों में नवाज़ के लिए नशा साफ़ दिख रहा था.
नवाज़ ने एक शैतानी हंसी हंसी और उसके और करीब आकर फुसफुसाया,
"कौन देखेगा रानी? इस वक़्त यहाँ सिर्फ मैं हूँ, मेरा ये नशा है, और मेरी ये 'खुली' हुई रानी.
वो लोग .. घर का मालिक और उसकी बीवी .. अचानक आ जायेगे तो बड़ी दिक्कत होगी..