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- Dec 5, 2013
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" हे देगी, बुच्ची ?"
स्साला इत्ता टाइम लगाया, बुच्ची ने मन में सोचा और फिर चिढ़ाया,
" हे क्या चाहिए, चुनिया से मांग न। मेरी पक्की सहेली है, बोल दूंगी,... दे देगी, मना नहीं करेगी तुझे। "
और कस के खूंटे को दबा दिया,
पल भर के लिए बुच्ची के दिमाग में सूरजु भैया का मोटा मूसल कौंध गया।
, वैसा नहीं है, लेकिन उसके भैया ऐसा किसी का नहीं है न हो सकता है, गदहा घोड़ा मात लेकिन गप्पू का है प्यारा।
बाकी लड़को का भी उसने देखा है, पिछले साल सावन में आयी थी, तब तक गप्पू वाला चक्कर चालू हो गया था, तो शीलवा के साथ मेला देखने गयी, मेला तो बहाना था। मेले के पहले ही निहोरा करके पहरेदारी के लिए शीलवा ने बुच्ची को खड़ा किया, गन्ने का खेत और मुश्किल से दस हाथ दूर, सव साफ़ साफ़ दिख रहा था।
और गाँव से ही जो शीलवा का यार पीछे लगा था, उसके साथ वहीँ खेत में टांग उठा के गप्पगप्प घोंट रही था, अंदर बाहर जाता सब साफ़ दिख रहा था।
महीने भर बुच्ची थी और महीने में कम से कम बीस दिन बुच्चिया ने चौकीदारी की, और कई बार तो बस दो चार हाथ दूर, दर्जन भर से ज्यादा तो इस गाँव में ही शीलवा के यार थे और सब का, खूब अच्छी तरह से,…
एक बार तो शीलवा के साथ मेला जा रही थी, एक पतली गली से, दो दो लौंडे बुच्ची के चोली में हाथ डाले, कस कस के मसल रहे थे और एक ने तो बुच्ची के हाथ में एकदम पकड़ा दिया, एकदम टनटनाया, उसे बड़ा गिचपिच लगा लेकिन शीलवा की हंसी सुन के ही वो समझ गयी की उसकी पक्की सहेली की ही बदमाशी है , फिर तो उसने भी खुल के मजा लिया, दबाया मुठियाया। और कम से कम दो चार बार हाथ में , एक बार मेले में झूला झूल रहे थे, दो की सीट पर तीन, शीलवा वैसे ही अपने यार की गोद में बैठी थी, बस जैसे ही झूला ऊपर गया, मारे डर के बुच्चिया की चीख निकल गयी और शीलवा ने अपने यार का उसकी मुट्ठी में पकड़ा दिया " ले यार तू भी तो मजा ले "/
तो उन सब से गप्पू का उन्नीस नहीं था, बीस ही होगा और जिस तरह से बेचारा इतने दिनों से पीछे पड़ा था, उसके सवाल का एक ही जवाब हो सकता था वो उसने दे दिया, लेकिन पहले चिढ़ाया
" का चाही एक बार खुल के तो बोलो "
अब बहुत हो गया।
गप्पू से रहा नहीं गया , उसने झटके से बुच्ची से अपने को छुड़ाया, उसको झटक के पुवाल के बंडल पे और पीछे से दबोच लिया और जिन कच्ची अमियों के लिए इतने दिन से तरस रहा था वो अब उसकी दोनों मुट्ठी में।
पहले तो बच्ची उस दर्जा नौ वाली के कच्चे टिकोरों के छुअन के अहसास का ही मजा लेता रहा, एकदम रुई के फाहे ऐसे मुलायम, फिर हलके हलके मसलना शुरू किया,
" ओह्ह्ह नहीं, अहहा, हाँ छोड़ न, नहीं नहीं इत्ते जोर से नहीं लगता है, हाँ उफ्फ्फ : बुच्ची सिसक रही थी, पिघल रही थी,
ऐसा नहीं की उसके जोबना पर पहली बार किसी मरद का हाथ पड़ा हो, शीलवा के साथ तो मेले आते जाते, न जाने कितनी बार कितने लौंडो ने कस कस के दबा दबा के उभारों की ऐसी की तैसी कर दी थी, उसके बाद भी शीलवा ने अपनी दोस्ती की कसम दिलवा के कभी झूले पे तो कभी अमराई में
" यार अपनी सोनचिरैया अपने भैया के लिए बचा राखी है तो ये दोनों अपने लड्डू तो खिला दे मेरे यारों को। ' और शीलवा खुद बुच्चिया की चोली खोलकर अपने यारों को सहेली के जोबना परस देती।
शीलवा के खाली बबुआने में ही दर्जन भर यार होंगे, और उतने ही अहिराने, भरौटी,कहरौटी में, बाइस पुरवा का कोई पुरवा नहीं बचा था, जिसके दो चार लौंडो के आगे उसने टांग नहीं फैलाई हो। और शीलवा के सब यार बुच्चिया के भी जोबना देख के ललचाते।
लेकिन आज तो कुछ और ही लग रहा था, गप्पू कस कस के जोबन मसल रहा था, पीछे से उसकी देह रगड़ रही थी, खूंटा एकदम खड़ा धक्का मार रहा था। इमरतिया और मुन्ना बहू के संगत में बुच्ची समझ गई थी कितनी बार लड़की को ही पहल करनी पड़ती है और उसने अपनी स्कर्ट उठा के कमर पे लपेट ली और हाथ बढ़ा के पजामा का नाड़ा,
पजामा सरसरा के नीचे
बुच्ची की मांसल किशोर जाँघे फ़ैल गयीं और खूंटा सीधे चुनमुनिया का चुम्मा लेने लगा, दरवाजे की सांकल खड़काने लगा, तितली पंख फड़फड़ा रही थी और गप्पू एक हाथ सरक के मक्खन ऐसी जाँघों के बीच, और सीधे से हथेली फैला के उसने खजाने पर कब्ज़ा कर लिया।
बुच्ची के तन-बदन में आग लग गई, अगर गप्पू उसे वहीं निहुरा के चोद देता तो वो चुदवा लेती। मुड़ के खुद उसने गप्पू का चुम्मा ले लिया, गप्पू भी करीब करीब उसका हम उम्र, किशोर, सालों से लाइन मार रहा था, और गप्पू ने मौका जान के जो बात सालो से कहना चाह रहा था कह दिया,
" हे बुच्ची दोगी न "
और अब बुच्ची ने बिना उसे चिढ़ाए, छेड़े मान लिया,
" हाँ गप्पू हाँ, जब कहो तब, जितनी बार कहो उतनी बार, जैसे कहो वैसे "
और शब्दों से ज्यादा बुच्ची की देह हाँ कह रही थी, वह पहले तो अपनी देह से गप्पू की देह रगड़ रही थी, फिर खुद पुआल के ऊँचे गट्ठर पर निहुर गयी और बुच्ची के चूतड़ अब गप्पू के तन्नाए डंडे से रगड़ रहे थे ,
गप्पू बुच्ची की अनचुदी कच्ची गीली चूत की दोनों फांको को एक ऊँगली से फैला रहा था,
बुच्ची ने खुद अपने किशोर हाथों से उसका सुपाड़ा खोल दिया था, और व्ही सुपाड़ा अब चूत के मुहाने पे अपना मालिकाना हक जता रहा था।
गप्पू कस कस के जिन गालों को देख के ललचाता था, जिसे दिखा दिखा के उसकी बहन चुनिया चिढ़ाती थी, अब उसे कस कस के चूम रहा था,चूस रहा था, कचकचा के काट रहा था।
लेकिन जानते दोनों थे, इससे ज्यादा मुश्किल था ,
जैसे सूरजु चाह के भी नहीं अपनी बहिनिया को पेल पाए, तेल नहीं था और छेद भी ढूंढ पा रहे थे तो उसी तरह फिर दर्जा नौ वाली कच्ची चूत को खाली थूक लगा के, …. नहीं हो सकता था
लेकिन उससे बड़ी बात थी शोर-गुल और आसपास के लोग। आंगन बगल में ही था, और वहां से आवाजें आ रही
कोई कौन.
लीला थी, कच्ची कली और अहिराने की दो करेर दो दो बच्ची की महतारी भौजाइयों के चंगुल में फंस गयी थी, मुन्ना बहू भी पीछे से ललकार रही थी, और रामपुर वाली के साथ सूरजु के ननिहाल की दो भौजाइयां भी मैदान में आ गयी थी, और अहिरानेवालियों को चढ़ा रही थी
" अरे ननदों का कपड़ा उतारा नहीं जाता, फाड़ दिया जाता है "
" पहले कपडा फाड़ो, फिर कपडे के भीतर वाला " हंस के एक अहिराने वाली बोली
तो सूरजु के ननिहाल की किसी भौजाई ने मिर्ची लगाई
" कपडे के भीतर वाला तो इसका भाई फाड़ेगा, " और तब तक कपडे लगता है उतर चुके थे, क्योंकि एक अहिराने वाली बोली
" अरे छिनार झांट आने लगी लेकिन अभी तक कोर बची है, तोहरे भाई लोगन क न खड़ा होत हो तो हमें बतावा, अपने मायके से बुलवाय के अगवाड़ पिछवाड़ा दुनो फाड़ दिया जाए "
" अरे हमार भाई लोग तो चढ़ेंगे ही इसपर, हमार सास लोग गोर गोर चिक्क्न चिक्क्न बिटिया एही लिए तो पैदा करती हैं की उनके बहुओं के मायके वालों का भला हो लेकिन चल एक दिन क मोहलत, कल रतजगा में अगर झिल्ली टाइट मिली तो हम सब का मायका दूर नहीं है , एक साथ दो दो तीन चढ़ेंगे " अहिराने वाली दूसरी बोली लेकिन शर्त लगा दी,
"लेकिन चल पहले चूस चाट के हमार झाड़।"
बुच्ची सोच रही थी, की अगर लीला की जगह वो पकड़ी जाती तो और दुरगत होती
पर गप्पू घुसाने के फिराक में था, बिना तेल के घुसने का चांस नहीं लग रहा था, चूत में आग लगी थी, लंड भी एकदम खड़ा पागल हो रहा था , लेकिन गप्पू का सारा जोश एक मिनट में ठंडा हो गया। खड़ा लंड बैठ गया।
मंझले मामा की आवाज सुनाई दी , बड़ी हलकी सी लेकिन उनकी आवाज तो कोई भी पहचान लेता, उसकी बहन के गाँव के रिश्ते से ससुर लगते थे, एकदम लहीम सहीम, ५०० डंड बैठक रोज पेलने वाले, कसरती देह,
बुच्ची ने भी उनकी सुनी, टॉप नीचे हो गया, पाजामा ऊपर और दबे पाँव बाहर निकलते गप्पू बोला,
" सुन पांच मिनट बाद निकलना तुम "
और गलियारे में इधर उधर देख कर तीर की तरह गायब
बुच्ची ने अपना हुलिया थोड़ा ठीक किया, मुस्करायी, लेकिन तब तक कांती बुआ की आवाज सुनाई दी, उसी तरह हलकी फुसफुसाती पर एकदम साफ़।
कांती बुआ, सूरजु की तो बुआ लगती थीं लेकिन बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।
और बुच्ची ठिठक गई। चुपके से उसने दरवाजा बंद किया और दबे पाँव कमरे के एक कोने में पुवाल के गट्ठरों के पीछे दुबक गई।
लेकिन एक बार फिर से मंझले मामा की आवाज आयी, खूब धीमी सी, बगल वाले कमरे में। उस कमरे में तो रजाई गद्दे रखे रहते थे, वहीँ से बुच्ची और शीलवा लाद के गद्दे और रजाई ऊपर कोहबर वाले कमरे के लिए ले गयी थीं, तो वहां उस समय मंझले मामा क्या कर रहे थे ?
दर्जा नौ वाली लौंडिया, बदन में फुर्ती देह में ताजगी, मन हरदम कुलबुलाता, पुवाल के गठ्ठरों पर एक के बाद कर के ऊपर चढ़ गयी वो। दोनों कमरों के बीच में एक ईंट की पतली दीवार और ऊपर कुछ ईंटें निकालकर बनाए गए रोशनदान थे।
स्साला इत्ता टाइम लगाया, बुच्ची ने मन में सोचा और फिर चिढ़ाया,
" हे क्या चाहिए, चुनिया से मांग न। मेरी पक्की सहेली है, बोल दूंगी,... दे देगी, मना नहीं करेगी तुझे। "
और कस के खूंटे को दबा दिया,
पल भर के लिए बुच्ची के दिमाग में सूरजु भैया का मोटा मूसल कौंध गया।
, वैसा नहीं है, लेकिन उसके भैया ऐसा किसी का नहीं है न हो सकता है, गदहा घोड़ा मात लेकिन गप्पू का है प्यारा।
बाकी लड़को का भी उसने देखा है, पिछले साल सावन में आयी थी, तब तक गप्पू वाला चक्कर चालू हो गया था, तो शीलवा के साथ मेला देखने गयी, मेला तो बहाना था। मेले के पहले ही निहोरा करके पहरेदारी के लिए शीलवा ने बुच्ची को खड़ा किया, गन्ने का खेत और मुश्किल से दस हाथ दूर, सव साफ़ साफ़ दिख रहा था।
और गाँव से ही जो शीलवा का यार पीछे लगा था, उसके साथ वहीँ खेत में टांग उठा के गप्पगप्प घोंट रही था, अंदर बाहर जाता सब साफ़ दिख रहा था।
महीने भर बुच्ची थी और महीने में कम से कम बीस दिन बुच्चिया ने चौकीदारी की, और कई बार तो बस दो चार हाथ दूर, दर्जन भर से ज्यादा तो इस गाँव में ही शीलवा के यार थे और सब का, खूब अच्छी तरह से,…
एक बार तो शीलवा के साथ मेला जा रही थी, एक पतली गली से, दो दो लौंडे बुच्ची के चोली में हाथ डाले, कस कस के मसल रहे थे और एक ने तो बुच्ची के हाथ में एकदम पकड़ा दिया, एकदम टनटनाया, उसे बड़ा गिचपिच लगा लेकिन शीलवा की हंसी सुन के ही वो समझ गयी की उसकी पक्की सहेली की ही बदमाशी है , फिर तो उसने भी खुल के मजा लिया, दबाया मुठियाया। और कम से कम दो चार बार हाथ में , एक बार मेले में झूला झूल रहे थे, दो की सीट पर तीन, शीलवा वैसे ही अपने यार की गोद में बैठी थी, बस जैसे ही झूला ऊपर गया, मारे डर के बुच्चिया की चीख निकल गयी और शीलवा ने अपने यार का उसकी मुट्ठी में पकड़ा दिया " ले यार तू भी तो मजा ले "/
तो उन सब से गप्पू का उन्नीस नहीं था, बीस ही होगा और जिस तरह से बेचारा इतने दिनों से पीछे पड़ा था, उसके सवाल का एक ही जवाब हो सकता था वो उसने दे दिया, लेकिन पहले चिढ़ाया
" का चाही एक बार खुल के तो बोलो "
अब बहुत हो गया।
गप्पू से रहा नहीं गया , उसने झटके से बुच्ची से अपने को छुड़ाया, उसको झटक के पुवाल के बंडल पे और पीछे से दबोच लिया और जिन कच्ची अमियों के लिए इतने दिन से तरस रहा था वो अब उसकी दोनों मुट्ठी में।
पहले तो बच्ची उस दर्जा नौ वाली के कच्चे टिकोरों के छुअन के अहसास का ही मजा लेता रहा, एकदम रुई के फाहे ऐसे मुलायम, फिर हलके हलके मसलना शुरू किया,
" ओह्ह्ह नहीं, अहहा, हाँ छोड़ न, नहीं नहीं इत्ते जोर से नहीं लगता है, हाँ उफ्फ्फ : बुच्ची सिसक रही थी, पिघल रही थी,
ऐसा नहीं की उसके जोबना पर पहली बार किसी मरद का हाथ पड़ा हो, शीलवा के साथ तो मेले आते जाते, न जाने कितनी बार कितने लौंडो ने कस कस के दबा दबा के उभारों की ऐसी की तैसी कर दी थी, उसके बाद भी शीलवा ने अपनी दोस्ती की कसम दिलवा के कभी झूले पे तो कभी अमराई में
" यार अपनी सोनचिरैया अपने भैया के लिए बचा राखी है तो ये दोनों अपने लड्डू तो खिला दे मेरे यारों को। ' और शीलवा खुद बुच्चिया की चोली खोलकर अपने यारों को सहेली के जोबना परस देती।
शीलवा के खाली बबुआने में ही दर्जन भर यार होंगे, और उतने ही अहिराने, भरौटी,कहरौटी में, बाइस पुरवा का कोई पुरवा नहीं बचा था, जिसके दो चार लौंडो के आगे उसने टांग नहीं फैलाई हो। और शीलवा के सब यार बुच्चिया के भी जोबना देख के ललचाते।
लेकिन आज तो कुछ और ही लग रहा था, गप्पू कस कस के जोबन मसल रहा था, पीछे से उसकी देह रगड़ रही थी, खूंटा एकदम खड़ा धक्का मार रहा था। इमरतिया और मुन्ना बहू के संगत में बुच्ची समझ गई थी कितनी बार लड़की को ही पहल करनी पड़ती है और उसने अपनी स्कर्ट उठा के कमर पे लपेट ली और हाथ बढ़ा के पजामा का नाड़ा,
पजामा सरसरा के नीचे
बुच्ची की मांसल किशोर जाँघे फ़ैल गयीं और खूंटा सीधे चुनमुनिया का चुम्मा लेने लगा, दरवाजे की सांकल खड़काने लगा, तितली पंख फड़फड़ा रही थी और गप्पू एक हाथ सरक के मक्खन ऐसी जाँघों के बीच, और सीधे से हथेली फैला के उसने खजाने पर कब्ज़ा कर लिया।
बुच्ची के तन-बदन में आग लग गई, अगर गप्पू उसे वहीं निहुरा के चोद देता तो वो चुदवा लेती। मुड़ के खुद उसने गप्पू का चुम्मा ले लिया, गप्पू भी करीब करीब उसका हम उम्र, किशोर, सालों से लाइन मार रहा था, और गप्पू ने मौका जान के जो बात सालो से कहना चाह रहा था कह दिया,
" हे बुच्ची दोगी न "
और अब बुच्ची ने बिना उसे चिढ़ाए, छेड़े मान लिया,
" हाँ गप्पू हाँ, जब कहो तब, जितनी बार कहो उतनी बार, जैसे कहो वैसे "
और शब्दों से ज्यादा बुच्ची की देह हाँ कह रही थी, वह पहले तो अपनी देह से गप्पू की देह रगड़ रही थी, फिर खुद पुआल के ऊँचे गट्ठर पर निहुर गयी और बुच्ची के चूतड़ अब गप्पू के तन्नाए डंडे से रगड़ रहे थे ,
गप्पू बुच्ची की अनचुदी कच्ची गीली चूत की दोनों फांको को एक ऊँगली से फैला रहा था,
बुच्ची ने खुद अपने किशोर हाथों से उसका सुपाड़ा खोल दिया था, और व्ही सुपाड़ा अब चूत के मुहाने पे अपना मालिकाना हक जता रहा था।
गप्पू कस कस के जिन गालों को देख के ललचाता था, जिसे दिखा दिखा के उसकी बहन चुनिया चिढ़ाती थी, अब उसे कस कस के चूम रहा था,चूस रहा था, कचकचा के काट रहा था।
लेकिन जानते दोनों थे, इससे ज्यादा मुश्किल था ,
जैसे सूरजु चाह के भी नहीं अपनी बहिनिया को पेल पाए, तेल नहीं था और छेद भी ढूंढ पा रहे थे तो उसी तरह फिर दर्जा नौ वाली कच्ची चूत को खाली थूक लगा के, …. नहीं हो सकता था
लेकिन उससे बड़ी बात थी शोर-गुल और आसपास के लोग। आंगन बगल में ही था, और वहां से आवाजें आ रही
कोई कौन.
लीला थी, कच्ची कली और अहिराने की दो करेर दो दो बच्ची की महतारी भौजाइयों के चंगुल में फंस गयी थी, मुन्ना बहू भी पीछे से ललकार रही थी, और रामपुर वाली के साथ सूरजु के ननिहाल की दो भौजाइयां भी मैदान में आ गयी थी, और अहिरानेवालियों को चढ़ा रही थी
" अरे ननदों का कपड़ा उतारा नहीं जाता, फाड़ दिया जाता है "
" पहले कपडा फाड़ो, फिर कपडे के भीतर वाला " हंस के एक अहिराने वाली बोली
तो सूरजु के ननिहाल की किसी भौजाई ने मिर्ची लगाई
" कपडे के भीतर वाला तो इसका भाई फाड़ेगा, " और तब तक कपडे लगता है उतर चुके थे, क्योंकि एक अहिराने वाली बोली
" अरे छिनार झांट आने लगी लेकिन अभी तक कोर बची है, तोहरे भाई लोगन क न खड़ा होत हो तो हमें बतावा, अपने मायके से बुलवाय के अगवाड़ पिछवाड़ा दुनो फाड़ दिया जाए "
" अरे हमार भाई लोग तो चढ़ेंगे ही इसपर, हमार सास लोग गोर गोर चिक्क्न चिक्क्न बिटिया एही लिए तो पैदा करती हैं की उनके बहुओं के मायके वालों का भला हो लेकिन चल एक दिन क मोहलत, कल रतजगा में अगर झिल्ली टाइट मिली तो हम सब का मायका दूर नहीं है , एक साथ दो दो तीन चढ़ेंगे " अहिराने वाली दूसरी बोली लेकिन शर्त लगा दी,
"लेकिन चल पहले चूस चाट के हमार झाड़।"
बुच्ची सोच रही थी, की अगर लीला की जगह वो पकड़ी जाती तो और दुरगत होती
पर गप्पू घुसाने के फिराक में था, बिना तेल के घुसने का चांस नहीं लग रहा था, चूत में आग लगी थी, लंड भी एकदम खड़ा पागल हो रहा था , लेकिन गप्पू का सारा जोश एक मिनट में ठंडा हो गया। खड़ा लंड बैठ गया।
मंझले मामा की आवाज सुनाई दी , बड़ी हलकी सी लेकिन उनकी आवाज तो कोई भी पहचान लेता, उसकी बहन के गाँव के रिश्ते से ससुर लगते थे, एकदम लहीम सहीम, ५०० डंड बैठक रोज पेलने वाले, कसरती देह,
बुच्ची ने भी उनकी सुनी, टॉप नीचे हो गया, पाजामा ऊपर और दबे पाँव बाहर निकलते गप्पू बोला,
" सुन पांच मिनट बाद निकलना तुम "
और गलियारे में इधर उधर देख कर तीर की तरह गायब
बुच्ची ने अपना हुलिया थोड़ा ठीक किया, मुस्करायी, लेकिन तब तक कांती बुआ की आवाज सुनाई दी, उसी तरह हलकी फुसफुसाती पर एकदम साफ़।
कांती बुआ, सूरजु की तो बुआ लगती थीं लेकिन बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।
और बुच्ची ठिठक गई। चुपके से उसने दरवाजा बंद किया और दबे पाँव कमरे के एक कोने में पुवाल के गट्ठरों के पीछे दुबक गई।
लेकिन एक बार फिर से मंझले मामा की आवाज आयी, खूब धीमी सी, बगल वाले कमरे में। उस कमरे में तो रजाई गद्दे रखे रहते थे, वहीँ से बुच्ची और शीलवा लाद के गद्दे और रजाई ऊपर कोहबर वाले कमरे के लिए ले गयी थीं, तो वहां उस समय मंझले मामा क्या कर रहे थे ?
दर्जा नौ वाली लौंडिया, बदन में फुर्ती देह में ताजगी, मन हरदम कुलबुलाता, पुवाल के गठ्ठरों पर एक के बाद कर के ऊपर चढ़ गयी वो। दोनों कमरों के बीच में एक ईंट की पतली दीवार और ऊपर कुछ ईंटें निकालकर बनाए गए रोशनदान थे।