Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 112 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

" हे देगी, बुच्ची ?"



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स्साला इत्ता टाइम लगाया, बुच्ची ने मन में सोचा और फिर चिढ़ाया,

" हे क्या चाहिए, चुनिया से मांग न। मेरी पक्की सहेली है, बोल दूंगी,... दे देगी, मना नहीं करेगी तुझे। "

और कस के खूंटे को दबा दिया,

पल भर के लिए बुच्ची के दिमाग में सूरजु भैया का मोटा मूसल कौंध गया।

, वैसा नहीं है, लेकिन उसके भैया ऐसा किसी का नहीं है न हो सकता है, गदहा घोड़ा मात लेकिन गप्पू का है प्यारा।

बाकी लड़को का भी उसने देखा है, पिछले साल सावन में आयी थी, तब तक गप्पू वाला चक्कर चालू हो गया था, तो शीलवा के साथ मेला देखने गयी, मेला तो बहाना था। मेले के पहले ही निहोरा करके पहरेदारी के लिए शीलवा ने बुच्ची को खड़ा किया, गन्ने का खेत और मुश्किल से दस हाथ दूर, सव साफ़ साफ़ दिख रहा था।

और गाँव से ही जो शीलवा का यार पीछे लगा था, उसके साथ वहीँ खेत में टांग उठा के गप्पगप्प घोंट रही था, अंदर बाहर जाता सब साफ़ दिख रहा था।

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महीने भर बुच्ची थी और महीने में कम से कम बीस दिन बुच्चिया ने चौकीदारी की, और कई बार तो बस दो चार हाथ दूर, दर्जन भर से ज्यादा तो इस गाँव में ही शीलवा के यार थे और सब का, खूब अच्छी तरह से,…

एक बार तो शीलवा के साथ मेला जा रही थी, एक पतली गली से, दो दो लौंडे बुच्ची के चोली में हाथ डाले, कस कस के मसल रहे थे और एक ने तो बुच्ची के हाथ में एकदम पकड़ा दिया, एकदम टनटनाया, उसे बड़ा गिचपिच लगा लेकिन शीलवा की हंसी सुन के ही वो समझ गयी की उसकी पक्की सहेली की ही बदमाशी है , फिर तो उसने भी खुल के मजा लिया, दबाया मुठियाया। और कम से कम दो चार बार हाथ में , एक बार मेले में झूला झूल रहे थे, दो की सीट पर तीन, शीलवा वैसे ही अपने यार की गोद में बैठी थी, बस जैसे ही झूला ऊपर गया, मारे डर के बुच्चिया की चीख निकल गयी और शीलवा ने अपने यार का उसकी मुट्ठी में पकड़ा दिया " ले यार तू भी तो मजा ले "/

तो उन सब से गप्पू का उन्नीस नहीं था, बीस ही होगा और जिस तरह से बेचारा इतने दिनों से पीछे पड़ा था, उसके सवाल का एक ही जवाब हो सकता था वो उसने दे दिया, लेकिन पहले चिढ़ाया

" का चाही एक बार खुल के तो बोलो "

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अब बहुत हो गया।

गप्पू से रहा नहीं गया , उसने झटके से बुच्ची से अपने को छुड़ाया, उसको झटक के पुवाल के बंडल पे और पीछे से दबोच लिया और जिन कच्ची अमियों के लिए इतने दिन से तरस रहा था वो अब उसकी दोनों मुट्ठी में।

पहले तो बच्ची उस दर्जा नौ वाली के कच्चे टिकोरों के छुअन के अहसास का ही मजा लेता रहा, एकदम रुई के फाहे ऐसे मुलायम, फिर हलके हलके मसलना शुरू किया,

" ओह्ह्ह नहीं, अहहा, हाँ छोड़ न, नहीं नहीं इत्ते जोर से नहीं लगता है, हाँ उफ्फ्फ : बुच्ची सिसक रही थी, पिघल रही थी,

ऐसा नहीं की उसके जोबना पर पहली बार किसी मरद का हाथ पड़ा हो, शीलवा के साथ तो मेले आते जाते, न जाने कितनी बार कितने लौंडो ने कस कस के दबा दबा के उभारों की ऐसी की तैसी कर दी थी, उसके बाद भी शीलवा ने अपनी दोस्ती की कसम दिलवा के कभी झूले पे तो कभी अमराई में

" यार अपनी सोनचिरैया अपने भैया के लिए बचा राखी है तो ये दोनों अपने लड्डू तो खिला दे मेरे यारों को। ' और शीलवा खुद बुच्चिया की चोली खोलकर अपने यारों को सहेली के जोबना परस देती।

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शीलवा के खाली बबुआने में ही दर्जन भर यार होंगे, और उतने ही अहिराने, भरौटी,कहरौटी में, बाइस पुरवा का कोई पुरवा नहीं बचा था, जिसके दो चार लौंडो के आगे उसने टांग नहीं फैलाई हो। और शीलवा के सब यार बुच्चिया के भी जोबना देख के ललचाते।

लेकिन आज तो कुछ और ही लग रहा था, गप्पू कस कस के जोबन मसल रहा था, पीछे से उसकी देह रगड़ रही थी, खूंटा एकदम खड़ा धक्का मार रहा था। इमरतिया और मुन्ना बहू के संगत में बुच्ची समझ गई थी कितनी बार लड़की को ही पहल करनी पड़ती है और उसने अपनी स्कर्ट उठा के कमर पे लपेट ली और हाथ बढ़ा के पजामा का नाड़ा,

पजामा सरसरा के नीचे

बुच्ची की मांसल किशोर जाँघे फ़ैल गयीं और खूंटा सीधे चुनमुनिया का चुम्मा लेने लगा, दरवाजे की सांकल खड़काने लगा, तितली पंख फड़फड़ा रही थी और गप्पू एक हाथ सरक के मक्खन ऐसी जाँघों के बीच, और सीधे से हथेली फैला के उसने खजाने पर कब्ज़ा कर लिया।

बुच्ची के तन-बदन में आग लग गई, अगर गप्पू उसे वहीं निहुरा के चोद देता तो वो चुदवा लेती। मुड़ के खुद उसने गप्पू का चुम्मा ले लिया, गप्पू भी करीब करीब उसका हम उम्र, किशोर, सालों से लाइन मार रहा था, और गप्पू ने मौका जान के जो बात सालो से कहना चाह रहा था कह दिया,

" हे बुच्ची दोगी न "

और अब बुच्ची ने बिना उसे चिढ़ाए, छेड़े मान लिया,

" हाँ गप्पू हाँ, जब कहो तब, जितनी बार कहो उतनी बार, जैसे कहो वैसे "

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और शब्दों से ज्यादा बुच्ची की देह हाँ कह रही थी, वह पहले तो अपनी देह से गप्पू की देह रगड़ रही थी, फिर खुद पुआल के ऊँचे गट्ठर पर निहुर गयी और बुच्ची के चूतड़ अब गप्पू के तन्नाए डंडे से रगड़ रहे थे ,

गप्पू बुच्ची की अनचुदी कच्ची गीली चूत की दोनों फांको को एक ऊँगली से फैला रहा था,

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बुच्ची ने खुद अपने किशोर हाथों से उसका सुपाड़ा खोल दिया था, और व्ही सुपाड़ा अब चूत के मुहाने पे अपना मालिकाना हक जता रहा था।

गप्पू कस कस के जिन गालों को देख के ललचाता था, जिसे दिखा दिखा के उसकी बहन चुनिया चिढ़ाती थी, अब उसे कस कस के चूम रहा था,चूस रहा था, कचकचा के काट रहा था।

लेकिन जानते दोनों थे, इससे ज्यादा मुश्किल था ,

जैसे सूरजु चाह के भी नहीं अपनी बहिनिया को पेल पाए, तेल नहीं था और छेद भी ढूंढ पा रहे थे तो उसी तरह फिर दर्जा नौ वाली कच्ची चूत को खाली थूक लगा के, …. नहीं हो सकता था

लेकिन उससे बड़ी बात थी शोर-गुल और आसपास के लोग। आंगन बगल में ही था, और वहां से आवाजें आ रही

कोई कौन.

लीला थी, कच्ची कली और अहिराने की दो करेर दो दो बच्ची की महतारी भौजाइयों के चंगुल में फंस गयी थी, मुन्ना बहू भी पीछे से ललकार रही थी, और रामपुर वाली के साथ सूरजु के ननिहाल की दो भौजाइयां भी मैदान में आ गयी थी, और अहिरानेवालियों को चढ़ा रही थी

" अरे ननदों का कपड़ा उतारा नहीं जाता, फाड़ दिया जाता है "

" पहले कपडा फाड़ो, फिर कपडे के भीतर वाला " हंस के एक अहिराने वाली बोली

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तो सूरजु के ननिहाल की किसी भौजाई ने मिर्ची लगाई

" कपडे के भीतर वाला तो इसका भाई फाड़ेगा, " और तब तक कपडे लगता है उतर चुके थे, क्योंकि एक अहिराने वाली बोली

" अरे छिनार झांट आने लगी लेकिन अभी तक कोर बची है, तोहरे भाई लोगन क न खड़ा होत हो तो हमें बतावा, अपने मायके से बुलवाय के अगवाड़ पिछवाड़ा दुनो फाड़ दिया जाए "

" अरे हमार भाई लोग तो चढ़ेंगे ही इसपर, हमार सास लोग गोर गोर चिक्क्न चिक्क्न बिटिया एही लिए तो पैदा करती हैं की उनके बहुओं के मायके वालों का भला हो लेकिन चल एक दिन क मोहलत, कल रतजगा में अगर झिल्ली टाइट मिली तो हम सब का मायका दूर नहीं है , एक साथ दो दो तीन चढ़ेंगे " अहिराने वाली दूसरी बोली लेकिन शर्त लगा दी,

"लेकिन चल पहले चूस चाट के हमार झाड़।"

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बुच्ची सोच रही थी, की अगर लीला की जगह वो पकड़ी जाती तो और दुरगत होती

पर गप्पू घुसाने के फिराक में था, बिना तेल के घुसने का चांस नहीं लग रहा था, चूत में आग लगी थी, लंड भी एकदम खड़ा पागल हो रहा था , लेकिन गप्पू का सारा जोश एक मिनट में ठंडा हो गया। खड़ा लंड बैठ गया।

मंझले मामा की आवाज सुनाई दी , बड़ी हलकी सी लेकिन उनकी आवाज तो कोई भी पहचान लेता, उसकी बहन के गाँव के रिश्ते से ससुर लगते थे, एकदम लहीम सहीम, ५०० डंड बैठक रोज पेलने वाले, कसरती देह,

बुच्ची ने भी उनकी सुनी, टॉप नीचे हो गया, पाजामा ऊपर और दबे पाँव बाहर निकलते गप्पू बोला,

" सुन पांच मिनट बाद निकलना तुम "

और गलियारे में इधर उधर देख कर तीर की तरह गायब

बुच्ची ने अपना हुलिया थोड़ा ठीक किया, मुस्करायी, लेकिन तब तक कांती बुआ की आवाज सुनाई दी, उसी तरह हलकी फुसफुसाती पर एकदम साफ़।

कांती बुआ, सूरजु की तो बुआ लगती थीं लेकिन बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।

और बुच्ची ठिठक गई। चुपके से उसने दरवाजा बंद किया और दबे पाँव कमरे के एक कोने में पुवाल के गट्ठरों के पीछे दुबक गई।

लेकिन एक बार फिर से मंझले मामा की आवाज आयी, खूब धीमी सी, बगल वाले कमरे में। उस कमरे में तो रजाई गद्दे रखे रहते थे, वहीँ से बुच्ची और शीलवा लाद के गद्दे और रजाई ऊपर कोहबर वाले कमरे के लिए ले गयी थीं, तो वहां उस समय मंझले मामा क्या कर रहे थे ?

दर्जा नौ वाली लौंडिया, बदन में फुर्ती देह में ताजगी, मन हरदम कुलबुलाता, पुवाल के गठ्ठरों पर एक के बाद कर के ऊपर चढ़ गयी वो। दोनों कमरों के बीच में एक ईंट की पतली दीवार और ऊपर कुछ ईंटें निकालकर बनाए गए रोशनदान थे।
 
मंझले मामा

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मंझले मामा ही थे।

लेकिन सिर्फ बनियान पहने, और उस धुंधली रौशनी में भी उनका कसरती देह साफ़ दिख रहा था, और फिर जब उसकी निगाह नीचे गई तो ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे, कोई औरत थी, सिर्फ पिछला हिस्सा दिख रहा था, हाँ फर्श पर पड़ा साडी और ब्लाउज दिख रहा था, पेटीकोट कमर तक।

खेल बस अभी शुरू हुआ था, मंझले मामा ने कस के दोनों हाथ से कमर पकड़ रखी थी, कोई उम्र वाली थी, चौड़े चौड़े नितम्ब, चिकनी मांसल जाँघे, रजाई के ढेर रखे थे उसे पकड़ के झुकी, निहुरी। रौशनी एक दुसरे रोशनदान से उस कमरे में आ रही थी और नितम्ब और कमर के आसपास तो साफ़ दिख रहा था लेकिन चेहरा रजाई में दुबका था,

मामा ने मुंह से ढेर सारा थूक निकाला, और अपने सुपाड़े में लगाया, और वो देख के बुच्ची कुछ हदस गयी कुछ मुस्कराने लगी,

मुन्ना बहू और मंजू भाभी ने कोहबर में उसकी जो क्लास ली थी, उसमे ये साफ़ साफ़ समझाया था, अगर सुपाड़ा धूसर, खूब बदरंग हो तो मरद खूब चोद चूका होगा, नम्बरी चुदक्कड़ और मूड आ गया तो अपनी सगी महतारी को नहीं छोड़ेगा, खड़े लौंड़े के बाद कुछ नहीं सूझेगा उसको, और दूसरी बात झड़ेगा खूब देर में, और भूत की तरह रगड़ रगड़ के पेलेगा, औरत लाख चूतड़ पटके अपनी मन मर्जी किये बिना मानेगा नहीं।

और मुन्ना बहू ने जोड़ा और अगर किसी औरत का भोसंडा खूब काला है तो उसका मतलब खूब चुदी है वो,

मंझले मामा तो एकदम गोरे थे, लेकिन सुपाड़ा जैसा मंजू भाभी ने बोला था एकदम वैसा धूसर खूब बदरंग, जब की डंडा एकदम गोरा, और जहाँ वो डाल रहे हैं वो भी काली एकदम, तवे के पिछवाड़े जैसी, जबकि जाँघे गोरी,

मतलब खूब चुदी है वो,

थूक लगा के भी वो घुसेड़ नहीं पाए और जोर से गरियाया,

" स्साली रंडी की जनी झांट आने के पहले से चुदवा रही है,, हजारो बार चुदी होगी, दो दो अपनी ऐसी छिनार बिटिया इस भोंसडे से निकाल चुकी, बीसो बार तो मैंने पेला है लेकिन अभी भी वैसे ही टाइट, "

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उधर से हंसी की आवाज आयी, खुली खिलखिलाती और वैसे भी बुच्ची जैसे खड़ी थी, सिर्फ कमर के ऊपर तक दिख रहा था। वो बेचैन थी, ….कौन है जो मामा से चुद रही है, सूरजु भैया के ननिहाल वाली, या कोई काम वाली या कोई जिसे बुच्ची जानती है।

बुच्ची देखने के लिए थोड़ा उचकी और अबकी थोड़ा आगे तक दिखा, जैसे गाय के दूध दुहने के पहले थन, खूब बड़ी बड़ी गोरी गोरी गदरायी चूँचियाँ, मामा ने एक हाथ से कस के लटके हुए जोबन पकड़ा दूसरे से कमर दबोची और जैसे सांड बछिया पर चढ़ता है, पूरी ताकत से पेल दिया।

आगे से हलकी सी चीख निकल गयी, और मंझले मामा बोले,

" स्साली काहें को चीख रही है, अभी तो ठीक से सुपाड़ा भी नहीं गया है , पूरा मूसल बाकी है। इतने दिन बाद मिली हो, रगड़ रगड़ के पेलूँगा । "

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और सच में अगला धक्का उन्होंने कस के मार दिया, और गचाक से सुपाड़ा अंदर बुर में घुस गया जैसे मक्खन में चाक़ू। चीख अबकी थोड़ी और कस के निकली, और उस के बाद तो धक्के पे धक्के,

ये नहीं कि इसके पहले बुच्ची ने चुदाई नहीं देखी थी।

कितनी बार, अभी चार महीने पहले इसी गाँव में अपनी पक्की सहेली शीलवा को चुदते कितनी बार देखा होगा, करीब करीब रोज ही। और उस के पहले अपने गाँव में भी, घर में भी, लेकिन इस तरह दिन दहाड़े, मंझले मामा किसी औरत को रगड़ रगड़ के पेल रहे हैं। उनका मोटा सुपाड़ा उस बुर वाली की बिल में धंसा, बुच्ची का भी मन गिनिगिना रहा था, कोई उसके साथ भी ऐसे ही, बुच्ची की आँखे एकदम वही चिपकी थीं, गले में थूक अटक गया था, साँसे ऊपर की ऊपर नीचे, की नीचे,

लेकिन आज उसे लगा की लड़के लड़कियों की चुदाई और मर्द औरत की चुदाई में बहुत फरक होता है और आज वो जिसका खेला देख रही थी, दोनों ही साफ़ लग रहा था इस खेल के जबरदस्त खिलाड़ी हैं।

धक्को की रफतार बढ़ गयी थी, मामा हर धक्के के साथ बोल भी रहे थे और अब दोनों हाथ से कस कस के लटके हुए जोबन दबा रहे मसल रहे थे।

बुच्ची को बिलिया के अंदर आता जाता मोटा खूंटा जाता साफ़ साफ़ दिख रहा था और बुच्ची की बुरिया भी लसलसा रही थी। वो अपने दोनों जाँघों को कस कस के रगड़ रही थी, जिस तरह से मंझले मामा का खूंटा अंदर बाहर हो रहा था, उसका मन कर रहा था उस औरत को हटा के वो खुद उसकी जगह निहुर जाए और मामा का खूंटा, सच में मामा नंबरी चोदू लग रहे थे। क्या जोर जोर से धक्के मार रहे थे, एकदम हथोड़ा, और उस को भरौटी वाली भौजी की बात याद आ रही थी,

" अरे जउने दिन किसी मरद के, खेले खाये चोदे मर्द के नीचे आओगी न बबुनी, तो लौंडन को भूल जाओगी, जैसे रुई धुनते हैं न वैसे धुन के रख देगा "

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सच में जैसे रुई धुनते हैं न उसी तरह मंझले मामा पेल रहे थे, पूरी ताकत से।

वो औरत कौन थी, जानने का उसका मन हो रहा था। फर्श पर गिरी रेशम की साडी बलाउज कुछ देखी लग रही थी, लेकिन जबतक चेहरा न साफ़ दिखाए तब तक मुश्किल था और एक तो जहां से वो पुवाल के गट्ठर पर खड़ी थी वहां से ज्यादा दिखना मुश्किल था।

लेकिन बुच्ची को एक रास्ता दिखा, जो ईंटे बीच बीच में से निकाल के दोनों कमरों के बीच रोशनदान सा बना था, हाथ बढ़ा के उसे पकड़ किया और उचक के दीवाल से चिपक के ऊँचे पुवाल के गट्ठर पे खड़ी हो गयी और अब साफ़ साफ़ दिख रहा था और उसी समय उस औरत ने करवट बदली, और अब चेहरा साफ़ दिख रहा था,

मारे झटके के बुच्ची गिरते गिरते बची, किसी तरह एक हाथ से मुंह पे रख के चीख रोकी और हाथ से वो रोशनदान की ईंट छूट गयी, लेकिन अगले ही पल उसने दूसरे हाथ से रोशनदान को पकड़ा, किसी तरह

बंदरिया की बच्ची की तरह, किसी तरह लटकी रही, लेकिन आँखे उसकी फैली, मुंह खुला

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कांती बुआ,



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कांती बुआ, ( असल में सूरजु की बूआ) बुच्ची की सगी बड़ी मौसी, बुच्ची की माँ की सगी बड़ी बहन, तर ऊपरी मतलब साल भर का मुश्किल से अंतर और सूरजु भैया के मामा से, …

और मामा ने निकाल के अपना लम्बा भाला पूरा बाहर तक, कस के पूरी ताकत से एक धक्के में अंदर तक जड़ तक भोंक दिया और कांती बूआ ने कस के रजाई को पकड़ लिया। लगता है धक्का सीधे बच्चेदानी पे लगा था और साथ में बूआ ने एक जबरदस्त गन्दी गाली मामा को दी,

" तोहार बेटा चोद बहिनिया अस पोखरा तालाब नहीं है, जिसमे गदहे घोड़े गोता खाते हैं. ज़रा आराम आराम से करो न, कहाँ भागी जा रही हूँ, "

कांती बुआ ने सूरजु की माई, अपनी भाभी और मंझले मामा की बहन को जबरदस्त गाली दी वो भी उनके बेटे दूल्हे सुरजू से जोड़ के।

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" अरे नहीं है तो हम कर देंगे न बुच्ची क मौसी काहें घबड़ात हो, हमारे बहिनिया क मुट्ठी तो आराम से घोंट लेबू " हँसते हुए सूरजु के मामा ने चिढ़ाया और फिर दोनों जोबना पकड़ के वो धक्का मारा की बुच्ची की मौसी, कांती बूआ को जो कुछ हुआ लेकिन देख के बुच्ची हिल उठी, और लुढ़कते लुढ़कते बची।

पर मान गयी वो भी,

उसकी मौसी को छेड़ते हुए, दस बीस करारे धक्को के बाद खूंटा बाहर निकाला तो अंदर नहीं ठेला,

सूरजु की बूआ निहोरा करती रहीं, लेकिन वो छेड़ते रहे और अंत मेंबुच्ची मान गयी अपनी मौसी को, क्या ताकत से चूतड़ उन्होंने पीछे ठेला और इंच इंच कर के सूरजु की बुआ ने सूरजु के मामा को मोटा खूंटा करीब करीब पूरा अंदर।

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लेकिन अब मामा का नंबर था बदला लेने का और कचकचा के सीधे झुक के उन्होंने बूआ की चूँची पे काट लिया लंड के बेस से उनकी क्लीट को रगड़ते, तड़पाते पूछा

" तोहार छोटकी बहिनिया, बुच्ची का माई नहीं आयी ? "

" अरे उनके घर में खुदे बियाह पड़ा है, उनके देवरानी क बेटवा क लगन है लेकिन घबड़ा जिन बरात जाने के दो दिन पहले आ जाएंगी और बरात बिदा करके तब जाएंगी, ले लिहा उनका भी मजा, बहुत याद आती है का, बुच्ची क महतारी क "

हँसते हुए बुच्ची की मौसी, कांती बूआ बोलीं

" याद आने की बात ही है, चौथी में हम और बड़े भैया आये थे, और उस समय तो वो बुच्चिया से भी,… "

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हँसते हुए सूरजु के मंझले मामा बोले लेकिन उनकी बात काटते हए बूआ ने एक धक्का कस के पीछे की ओर मारा, पूरा खूंटा घोंटा और बोलीं

" हमसे बोलरहे हो , तुम दोनों भाई उस की कच्ची अमिया देख के कितना ललचा रहे थे, अरे अभी बुच्ची जिस उमर की है उससे पूरी चौदह महीने छोटी थी, इतना हमसे निहोरा किये तुम दोनों,.... तो हमही बहाना बना के, 'खाली दूध देना है, कुछ नहीं करना है अरे हम तो रहेंगे ही, 'और मुश्किल से आयी और पहली बार केतना चिचियाई, "

हँसते हुए बुच्ची की मौसी, कांती बूआ ने, बुच्ची की माई की रगड़ाई का किस्सा सुनाया।

बुच्ची कान पारे सुन रही थी, सूरजु के मंझले मामा ने सूरजु की बूआ के बिल में कस कस के दस धक्के पूरी ताकत से मारे जैसे बुच्ची की बड़ी मौसी को नहीं बुच्ची की माई को चोद रहे हों, और फिर कचकचा के उनकी चूँची दबाते बोले,

" सच में बुच्चिया क माई के साथ बहुत मजा किये थे, दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिल के पेले थे उसको "

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" और गांड भी तो मारे थे " पीछे धक्का लगाते सूरजु की बूआ बोलीं,

" तीन बार, दो बार हम एक बार बड़के भैया " सूरजु के मामा ने जुगलबंदी पूरी की

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साफ़ लग रहा था वो सब बातें सोच के बुच्ची की मौसी को बड़ा मजा रहा था, हर धक्के के जवाब में दूने जोर से वो धक्का मारतीं, बुर निचोड़ के लंड भींच लेतीं, चेहरे पे ख़ुशी, मस्ती साफ़ दिख रही थी।

बुच्ची जबरदस्त चुदाई देख रही थी, और अपनी माई के बारे में सोच रही थी,

कैसे अपनी भौजाई के भाई के साथ दो दिन में छह बार और वो भी उमर में उससे चौदह महीने छोटी थीं तब से चुद रही है। इधर उसकी भाभी, रामपुर वाली भौजी का भाई साल भर से निहोरा कर रहा है, चलो अब एकदम खुल के देगी और सबको देगी,

उधर लगता है सूरजु के मामा और बूआ दोनों झड़ने के कगार पे धक्के तेज हो गए थे और पोज भी बदल गया था।

बजाय निहुरे होने के अब सूरजु की बूआ, कांती बूआ जमीन पर पड़े किसी गद्दे पर लेटी थी और सूरजु के मामा उनकी ले रहे थे, हचक के

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और कुछ सोच के बुच्ची की मौसी की बड़ी बड़ी चूँची चूसते, निपल मुंह से निकाल के हँसते बोले,

" बुच्ची एकदम अपनी माई पे गयी है वैसे ही जबरदंग जोबन आये हैं उसके "

" उसका भी लेने का मन है क्या? वैसे सब लोग कहते हैं बुच्चिया तोहरे बीज से जामल हो, बुच्चिया क माई को बियाहे के दिन, सिन्दूर दान के बाद, बिदाई के पहले दो बार मलाई खिलाये के बिदा किये थे, और ठीक नौ महीना में बुच्चिया निकल आयी थी। "

नीचे से कसकर चूतड़ उछालते हुए, बूआ, बुच्ची की मौसी, बुच्ची की महतारी की सगी बड़ी बहन बोलीं।

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वो अब झड़ रही थीं,

मंझले मामा भी लम्बी साँसे भर रहे थे और खूंटा उनका बिल में एकदम जड़ तक, धक्के रुक चुके थे और बुच्ची ने देखा की कांती बूआ, बुच्ची की बड़ी मौसी की बिल से बूँद बूँद करके सफ़ेद खूब गाढ़ी मलाई बह रही थी, फिर उनकी जांघों के आसपास भी मलाई लथपथ हो गयी।

बुच्चिया की बुर भी लासा हो गयी थी।

बुच्ची की मौसी की बुर से खूंटा निकालते मामा हंस के बुच्ची की मौसी, कांती बूआ से बोले,

" अरे तो जो बीज लगाया हो,... उसको पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "

मंझले मामा की बात बुच्ची ने सुनी तो लेकिन उसका पूरा ध्यान दीवाल से चिपके रहने और किसी तरह पुवाल के गट्ठर पे ठीके रहने पे थी, जरा भी खड़बड़ हुयी तो पकड़ी जायेगी।

कांती बूआ ने अपनी रेशम की साड़ी ब्लाउज जो उन्होंने बहुत सम्हाल के एक गद्दे के ढेर पर रखी थी, उठा के झाड़ के पहन लिया ,सूरजु के मामा ने जरा सा दरवाजा खोल के झाँका। कोई नहीं था। पहले कांती बूआ और फिर वो निकल गए।

बुच्ची भी सम्हल-सम्हल कर पुआल पर से उतरी और उस कुठरिया से निकल कर बाहर।

उसके आँखों के सामने बार बार अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की चुदाई घूम रही थी, कैसे हचक के वो पेल रहे थे, क्या ताकत थी, हाथों में धक्को में, और आधे घंटे तो कम से कम चली होगी।

मंझले मामा की देह कितनी तगड़ी, और खूंटा भी एकदम तना था, कड़ा कितना होगा, बुच्ची की मौसी के चीथड़े कर दिए, मर्द हो तो ऐसा, और फिर हथौड़े की तरह मंझले मामा की बात दिमाग में घूम रही थी,

" अरे तो जो बीज लगाया हो उसको,... पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "

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एक बार नहीं बार बार और जैसे बुच्ची ने खुद से जवाब दे दिया,

" काहे नहीं है , ….एकदम है "
 
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११४ हल्दी- बुच्ची और गप्पू पृष्ठ ११७८

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बुच्ची और चुनिया

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बुच्ची और लीला
 
फागुन के दिन चार भाग ५१ - पृष्ठ ४९१

२६ नवम्बर २००८ - जुबेदा - सी एसटी

अपडेट पोस्ट हो गया है, और यह अपडेट कुछ अलग है, और इससे ज्यादा कहना शायद बहुत सी स्मृतियों के साथ अन्याय होगा।

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग -११५ बुच्ची, नेछु की रस्म और, किस्से बुच्ची की माई के

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३९,९५,६०९

पूनम, मंझली मामी और, …

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सूरजु के मामा ने ज़रा-सा दरवाजा खोलकर झाँका।

कोई नहीं था। पहले कांती बूआ और फिर वो निकल गए।

बुच्ची भी सम्हल-सम्हल कर पुआल पर से उतरी और उस कुठरिया से निकल कर बाहर।

उसके आँखों के सामने बार बार अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की चुदाई घूम रही थी, कैसे हचक के वो पेल रहे थे, क्या ताकत थी, हाथों में… धक्को में, और आधे घंटे तो कम से कम चली होगी। मंझले मामा की देह कितनी तगड़ी, और खूंटा भी एकदम तना था, कड़ा कितना होगा, बुच्ची की मौसी के चीथड़े कर दिए, मर्द हो तो ऐसा, और फिर हथौड़े की तरह मंझले मामा की बात दिमाग में घूम रही थी,


" अरे तो जो बीज लगाया हो ,...उसको पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "

एक बार नहीं बार बार और जैसे बुच्ची ने खुद से जवाब दे दिया,


" काहे नहीं है, …. एकदम है "

लेकिन बुच्ची गलियारे से आँगन में नहीं घुसी।

सूरजू भैया अभी भी आँगन के बीचों-बीच पीढ़े पर अकड़कर बैठे थे। हल्दी की रस्म का पीला हंगामा अभी-अभी थमा था—मिट्टी के फर्श पर हल्दी के छींटे ऐसे चमक रहे थे जैसे सरसों का खेत घर में ही उग आया हो। औरतों की खिलखिलाहट की गूँज अब भी हवा में तैर रही थी, कहीं कोई ढोलक की थाप पर उँगलियाँ आज़मा रहा था, तो कहीं बड़की चाची पान लगाते-लागाते अगली रस्म की खबर ले रही थीं।

पर बुच्ची समझदार थी। उसे मालूम था—भौजाइयाँ अभी थकी नहीं होंगी। हल्दी का बदला अभी पूरा कहाँ हुआ! कोई न कोई उसे पकड़ कर फिर से पीला कर देगी, या चुटकी काट-काट कर छेड़ेगी— “अरे, अगली बारी तेरी है रे!”

सो बुच्ची ने दाँव बदला।

गलियारे से फुर्र होकर वह दालान में पहुंची—सीधे मर्दों के इलाके में। वहाँ खटियों पर गाँव के बूढ़े-बाबा गमछा डाले बतिया रहे थे—किसान-सभा से लेकर बैलों की जोड़ी तक सब पर चर्चा। हुक्का गुड़गुड़ा रहा था।

घर की बेटी थी, उसका न कोई परदा था न घूंघट। वह हवा की तरह पूरे घर में घूम सकती थी।

दालान से वह आहिस्ता-आहिस्ता कुएँ की ओर खिसकी। कुएँ के पास रस्सी की चर्र-चर्र, पानी खींचती औरतों की बातों में घुली हँसी, और भीगी मिट्टी की सोंधी गंध—सब कुछ मिलकर जैसे कोई अलग ही दुनिया रच रहे थे। वहीं से घर की दीवार से सटी पतली गली निकलती थी, जो पीछे वाले दरवाज़े तक जाती। उसी दरवाज़े से काम करने वाली या पड़ोस की औरतें आया-जाया करती थीं।

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बुच्ची उसी गली में बिल्ली-सी सरकती हुई पहुंची। उसका इरादा साफ था—भीतर भी रहना है, पर पकड़ में नहीं आना है। मौका देखकर किसी टोली में घुस जाएगी और ऐसे मासूम चेहरा बना लेगी जैसे अभी-अभी आई हो।

वह कभी कुछ सोचकर मुस्कुराती तो कभी कुछ इरादे करने लगती है।

बुच्ची को अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की बातें याद आ रही थी की कैसे बुच्ची की माई ने जब बुच्ची से साल भर से भी ज्यादा छोटी थीं तो अपने भौजी के भाई के साथ, ….और दो दिन में छह बार और चार बार पिछवाड़े भी, …और बुच्ची का अभी खाता भी नहीं खुला,

उसने इरादा कर लिया, सूरजु भैया के बाद गप्पू को पक्का,

वो स्साला डरेगा तो खुद चढ़ के और उसके बाद जो जो उसके पीछे पड़े हैं न सबको, बेचारे पिछले सावन से ललचा रहे हैं, शीलवा उसकी पक्की सहेली ने बीसो बार कहा, और एक बार अपने गाँव लौट गयी तो वहां तो बीसो मुश्किल

उधर सूरजू भैया की माई—यानी उसकी मामी—ने उसे दस बार समझाया था,

“अरे, खाली भौजाई उतार कर भाग जाने से काम ना चलेगा। रुको महीना-बीस दिन। गाँव का मजा लो। खेलो, कूदो, आम का बाग़ीचा घूमो, पोखरे पर जाओ। ननिहाल में ही तो असली मज़ा है! जो मन करे सो करो। न कोई मना करेगा, न रोके-टोकेगा। यही तो उम्र है जी भर के जीने की!”

अब इससे ज़्यादा खुली छूट कोई क्या देता! पर बुच्ची का मन भी बड़ा अलबेला था।

ननिहाल की आज़ादी उसे ऐसे भाती थी जैसे आम के पेड़ पर पहली बौर।

ऐसे माहौल में बुच्ची की खिलखिलाहट भी किसी चिड़िया की तरह पूरे आँगन में फुदकती फिरती—पकड़ी जाए तो हँस दे, बच निकले तो और हँसे। और आज तो घर में शादी थी—सो हर कोना कहानी बन जाने को तैयार था

लेकिन उसको सूरजु के मामा की बात याद आ गयी और वो धीमे धीमे मुस्कराने लगी,

" जो बीज लगाया है,... उसको तो फल खाने का हक सबसे पहले है",

तो क्या सूरजु के मामा भी नजर लगाए हैं उसपे?

अरे लगाए हैं तो लगाए रहे अब उन्हें और लचायेगी वो और पूनम दीदी ने तो बोला था की

" जिसे हम बड़े उमर वाला समझते हैं न वो और छिनरा होते हैं, ख़ास तौर से कच्ची उमर वालियों को देख के,... और मजा भी लेकिन उनके साथ आता है।"

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सही बात है जिस तरह से रगड़ रगड़ के वो कांती बूआ को, …बुच्ची की मौसी को पेल रहे थे, बुच्ची एकदम गीली हो गयी थी।

उसने तय कर लिया, बहुत हो गया, अब ताला नहीं लगाएगी… खुला दरवाजा। आजाये जिस स्साले को आना है, उसके भैया, भौजी लोगों के भैया, और गाँव के यार। बहुत दिन उपवास हो गया, अब एक दिन भी नागा नहीं होगा और दोनों जून दावत होगी।

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जैसे ही बुच्ची कुएँ से मुड़ी, उसकी नजर अहिराने वाली पूनम दीदी पर पड़ी।

दीवार से सटी खड़ी थीं—ईंटों के एक ढेर पर चढ़ी हुईं—और सामने वाले कमरे की खुली खिड़की से भीतर झाँक रही थीं। उनकी चोटी हवा में हल्की-हल्की हिल रही थी और पाँव की पायल ईंट से टकराकर छन-छन कर रही थी।

बुच्ची को देखते ही उन्होंने आँख दबाई, उँगली से इशारा किया— “ए इधर आ, चुपचाप!”

बुच्ची बिल्ली की तरह दबे पाँव पहुँची।

पूनम दीदी फुसफुसाईं—

“चल, तुझे खेल दिखाएँ। सूरज भैया की मंझली मामी, बहुत हम सबको गरिया रहीं थीं न! ज़रा उनकी हालत देख!”

दोनों खिड़की से सटकर झाँकने लगीं।

अंदर का नज़ारा देख बुच्ची की आँखें गोल।

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मंझली मामी सचमुच गाँव की चर्चा थीं। लंबी, गोरी, गठीली देह—कमर ऐसी कि सच में मुट्ठी में आ जाए। चाल में लचक, बात में मिठास, और हँसी में ऐसी खनक कि सामने वाला अपना नाम भूल जाए। और दो दो मुट्ठी में भी न आएं ऐसे बड़े बड़े डबल डबल साइज के कड़े कड़े गदराये जोबन और उनसे भी जानमारु चूतड़। आगे कोई पड़ जाए तो जोबन जान मार लें उसकी, और पीछे से चूतड़ होश उड़ा दें।

माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, बालों में चमेली का गजरा, और कलाई भर-भर के कड़े।उनकी चाल जब आँगन पार करती तो लगता है जैसे कोई नाचती हुई बेल लहराकर निकल गई। और बोल? अरे, जैसे शहद घोलकर रखती हों ज़ुबान पर। मज़ाक भी खुलकर, ठहाका भी खुलकर। मायके में भी वही रानी, ससुराल में भी वही शान। यहाँ तक कि उनकी ननद की ससुराल तक में उनके किस्से पहुँचते थे।

और हाँ—उनकी रसमलाई!

जिसने एक बार चख ली, बस उसी का मुरीद।वो सिर्फ दीवाना ही नहीं करती थीं, दीवानों का मन भी रखती

जोबन लुटाने में न उन्हें उमर का लिहाज था न रिश्तों का, और उमर अभी उनकी ज्यादा थी भी नहीं, बड़की ठकुराइन से पांच छह साल छोटी ही थीं,

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तो वही और पश्चिम पट्टी वाले चन्नर चाचा, एकदम कसरती, तगड़े और नंबरी छिनरा,

पहली चीज बुच्ची ने नोटिस की, सूरजु की मामी के जाँघों के बीच मलाई पूरी तरह लिपटी थी, और अभी भी चुनमुनिया से चू रही थी बूँद बूँद,

साफ़ था दूसरे राउंड की तैयारी थी,

कमरे के एक कोने में चारा काटने की मशीन रखी थी, और आधे कमरे में चारे के बंडल बंधा रखा था, एक बांस चारपाई रखी थी, जो काम वालों के बैठने, सोने के काम में आती थी , फर्श कच्चा था और एक खिड़की थी काफी ऊपर थी और ठीक से बंद नहीं होती थी जहाँ से पूनम और बुच्ची सिनेमा देख रही थीं।

चन्नर चचा के सिर्फ सीने के नीचे का दिख रहा था, वो खड़े थे, ...उनका खड़ा था और मंझली मामी, घुटनो के बल बैठीं थी, साड़ी उन्होंने चरी के बंडल पे रख दी थी,

ब्लाउज सिर्फ खुला हुआ था, पेटीकोट कमर तक उठा और कमर में लिपटा, और अपने मेंहदी लगे हाथों से उन्होंने खड़े खड़कते खूंटे को पकड़ रखा था, और खुला मुंह एकदम पास, उनके लिपस्टिक लगे रसीले होंठ मोटे सुपाड़े से बस थोड़े दूर,

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" काहें तड़पा रही है , चूस न "

चाचा तड़पते हुए बोले, और मुस्कराके मामी ने बस अपनी लपलपाती जीभ से सुपाड़ा छू भर दिया और खिलखिलाने लगीं। जैसे खील बताशा,

और चाचा तड़प के रह गए, बोले, " ले लो न मुंह में, बस थोड़ा सा,

और मामी ने अपना चेहरा उठाकर बड़ी बड़ी काली काली कजरारी आँखों से उन्हें देखा जैसे पूछ रही हों " सिर्फ थोड़ा सा क्यों, इतना मस्त खड़ा है "

और गप्प से पूरा सुपाड़ा गप्प, एकदम लीची ऐसा

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और वैसे ही वो चूस रही थीं धीरे धीरे रस लेकर,

लेकिन अब चन्नर चाचा से नहीं रहा गया, कस के मामी का सर पकड़ के उन्होंने ठेलना शुरू कर दिया, और मामी भी कम छिनार नहीं थी। होंठों से उसे चिपका कर, रगड़ते हुए, नीचे से जीभ से सहलाते हुए, धीरे धीरे, तिल तिल कर चूसते हुए घोंट रही थी, जैसे किसी कुँवारी कच्ची चूत में मोटा लंड दरेरते हुए जा रहा हो,

चाचा का भी कसरती बदन, अपनी भौजाई की भौजाई, डबल भौजाई के मुंह में डबल ताकत से वो पेल रहे थे,

और आधा घुसने के बाद मामी गों गों करने लगी, लेकिन चच्चा नहीं रुके

चुसाई ख़तम हो गयी, चुदाई चालु हो गयी और मामी का मुंह चोदा जा रहा था,चाचा कस कस के पेल रहे थे और मामी भी अपने मायके की खिलाडी, हलक तक चला गया उनके होंठ लटके हुए दोनों रसगुल्लों से चिपक गए, गाल एकदम फूल गया, आँखे बाहर को निकल रही थी, होंठों के किनारे से लार टपक रही थी, फिर भी वो पीछे नहीं हटी।

जीभ उनकी उसी तरह मुंह के अंदर जहां सुपाड़ा लंड के डंडे से मिलता है उस जगह पे रगड़ रही थी, होंठ चाट रहे थे और वो पूरी ताकत से चूस रही थीं।

चचा ने भाला बाहर निकला करीब करीब पूरा फिर धीरे करके ८ इंच का मोटा अपना गन्ना, रस से भरा मीठा मीठा, मामी को खिला दिया। एक बार फिर जड़ तक, हलक तक ठूस दिया,

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दो चार बार तो धीरे धीरे लेकिन फिर वो ये भूल गए की चूत नहीं मुंह है, ...और क्या हचक के चुदाई की मामी की मुंह की,

देखने वाली पूनम और बुच्ची दोनों गरमा गयी थीं,

बुच्ची चुदी भले न हो लेकिन इमरतिया ने उसे अपने सूरजु भैया के गन्ने का स्वाद मुंह में तो दिलवा दी दिया था, और पूनम तो घाट घाट का पानी पी, ब्याहता, दीवानी दोनों हो रही थीं मोटे लंड के लिए।

पहल पूनम ने की, बुच्ची की स्कर्ट के अंदर हाथ डाल के उसकी चिड़िया पकड़ ली और लगी कस कस के भींचने,

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उधर मामी की हालत खराब थी,

मायके ससुराल में उन्होंने बहुत गन्ने घोंटे थे लेकिन चन्नर चाचा के गन्ने की बात ही कुछ और थी, जितना सख्त उतना ही मीठा। और इसलिए भी अपनी ननद के ससुराल में आने का उनका बहुत मन करता था, और सूरजु तो एकदम घर के लड़के से भी बढ़कर,.... इसलिए पूरे १२ दिन के लिए आयी थीं, लिपस्टिक का सब रस उतर गया, आँख में लगा काजल गाल पे आ गया, पर न चुसाई कम हुयी न मुंह की चुदाई,

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और दस मिनट की जबरदस्त मुंह चुदाई के बाद जब चच्चा ने निकाला तो चाची को कुछ इशारा नहीं करना पड़ा,

वो खुद उसी बांस खटिया को पकड़ के निहुर गयीं, बुरिया में पहली चुदाई की मलाई थी,

और चन्नर चाचा ने ठीक दिया, कुछ मुंह चुसाई से थूक से लग के लंड चिकना हो गया था, कुछ गीली बुर और बुर में पहली चुदाई की मलाई लेकिन इन सबसे ज्यादा चाचा के कमर की ताकत, जैसे किसी ने तान के पूरे जोर से मुक्का मारा हो।

मामी ने पूरी ताकत से बँसखटिया पकड़ रखी थी फिर भी हिल गयीं,

लेकिन धक्के पर धक्के लगते गए, इंच इंच कर के करीब करीब मोटा खूंटा अंदर था,

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मामी कभी दर्द के मारे कहरती, कभी मजे से सिसकती, कभी पीछे मुड़ के चच्चा को चिढ़ाते हुए मुस्करा के कह देती और चच्चा अगला धक्का और कस के मार देते। जब एक दो इंच बाहर रह गया तो धक्के रुक गए और एक हाथ से चच्चा ने मामी का ब्लाउज अब पूरी तरह उतार के दूर फेंक दिया।

सीधे चारे की मशीन पर जा के गिरा।

और अब दोनों जोबन चाचा की मुट्ठी में ,

जिन उभारों को देख के जिस का कब से खड़ा होना बंद हो गया हो,बैद हकीम हार मान गए हों, उसका भी फड़फड़ाने लगे, वो दोनों जोबन अब कस कस के रगड़े मसले जा रहे थे।

कभी लगता है दबा दबा के चच्चा बुरी हाल करेंगे तो वो को चूँची छोड़ के निपल पकड़ लेते और कस के उस घुंडी को नोच लेते

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कभी झुक के कचकचा के चूँची का ऊपरी हिस्सा काट लेते, जोर से पूरी ताकत से दांत गड़ा देते, जैसे कच्ची अमिया कुतर रहे हों। सबको मालूम था की मंझली मामी एकदम ही लो कट ब्लाउज पहनती हैं, जरा सा झुकीं तो निपल तक साफ़ दिखता है और गाँव में ब्रा का ढक्क्न तो चलता नहीं और सादी बियाह के घर में तो एकदम नहीं। और ऊपर से मामी बात बात में आँचल ढलकाती हैं

साफ़ था ये दांत के निशान तो ब्लाउज के बाहर ही रहेंगे और जरा सा आँचल मामी ने ढलकाया तो चाचा के निशान दिख जाएंगे।

" क्या कर रहे हो, काटो नहीं," मामी ने मीठी मीठी शिकायत की और जवाब में सूरजु भैया के चाचा ने सूरजु भैया के मामी का मीठा मीठा गाल कचकचा के कस के काट लिया।
 
मामी, चन्नर चाचा,

और जिक्र बुच्ची की माई का

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साफ़ था ये दांत के निशान तो ब्लाउज के बाहर ही रहेंगे और जरा सा आँचल मामी ने ढलकाया तो चाचा के निशान दिख जाएंगे।

" क्या कर रहे हो, काटो नहीं ," मामी ने मीठी मीठी शिकायत की और जवाब में चाचा ने मामी के रसीले गाल फिर से काट लिए।

" काटना हो तो हमारी ननद की ननदिया की काट लो , और कोई नहीं तो बुच्चिया की माई आने वाली हैं पांच सात दिन में, उनसे तो बहुत याराना था तुम्हारा "

गाँव के रिश्ते से तो बुच्ची की माई, चन्नर चाचा की बहन लगती हैं, लेकिन उसी पट्टी की हैं और सीधे रिश्ते में भी बुच्ची की माई उनकी चचेरी बहन ही लगती हैं, एकदम सगी जैसी।

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मामी ने चिढ़ाया तो चाचू ने जवाब में दूसरी चूँची पे और कस के काटा और पूरा लंड निकाल के जोर का धक्का मारा।

अबकी मामी चीख न रोक पायीं,

पर ननद की ननद की बात अपने को रोक नहीं पायीं और चिढ़ाते बोलीं,

" बहन का नाम सुन के लगता है ज्यादा जोश में आ गए हो, अरे तोहार बहिनिया, बुच्ची की माई आयी होतीं सामने तो बिना निहुरा के पेले छोड़ते नहीं। अरे बहिन, नहीं, उसकी बिटिया तो आई है, बुच्ची,... उसके जोबन भी आग लगा रहे हैं।

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लेकिन पता नहीं बुच्ची की बात सुन कर या बुच्ची की माई की बात सुन कर,

कुछ हुआ की चच्चू ने गियर बढ़ा दिया और एक जोबन छोड़ के, क्या करारा चांटा मामी के दाएं चूतड़ पे मारा,

झन्नाटेदार, लाल रंग का फूल खुल गिया,

मामी के चेहरे का दर्द साफ़ दिख रहा था लेकिन अबकी वो दर्द पी गयीं, चीखी नहीं,

दूसरा चांटा बाएं चूतड़ पे पड़ा, पहले से भी तगड़ा

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पूनम और बुच्ची सांस थामे देख रही थीं,

गिन के पांच चांटे और हर चांटे के साथ लंड का भी करारा धक्का, दोनों चूतड़ एकदम लाल हो गए थे जैसे कोयला दहक रहा हो, और जैसे ही चीखने के लिए मामी ने मुंह खोला तो चच्चू जैसे तैयार थे, जिस मुंह में थोड़ी देर पहले उनका लंड था, अब उन्होंने पूरे हलक तक तीन ऊँगली जड़ तक ठूंस दी थी।

चूतड़ परपरा रहा था, गले में एक दो नहीं पूरी तीन उँगलियाँ ठुंसी हुयी थीं, गों गों कर रही थी, लेकिन देह से लग रहा था मामी कितनी गर्मायी हैं। चूँचिया एकदम पत्थर हो गयीं थी, रोयें खड़े थे, और कस के दोनों हाथों से उन्होंने बँसखटिया के बांस को पकड़ रखा था,

चच्चू ने उँगलियाँ निकाली, सीधे पूरी ताकत से दो ऊँगली मामी के पिछवाड़े ठूंस दी,

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वो चीखती उसके पहले दूसरे हाथ से उन्होंने मामी के मुंह को भींच लिया और गोल गोल घुमाते दोनों उँगलियों को एक एक ऊपर एक चढ़ा के दो पोर तक ठेल दिया,

पूनम और बुच्ची दोनों सांस रोके ये खेला देख रहे थे,

और मुंह छोड़ने के बाद फिर उस हाथ से चाचू ने मामी की पतली कटीली कमरिया पकड़ ली और लगे धक्के पर धक्के मारने, उस जबरदस्त चुदाई से मामी गांड में घुसी ऊँगली भूल गयीं, वो बोलने लगीं

" हाँ राजा, हाँ ऐसे,… अरे का चोदते हो, जो जो तोहसे चुदाई है वो आज तक नहीं भूल पायी, ओह्ह उह्ह्ह"

बिना धक्को को रोके गोल गोल घुमाते अब उन्होंने मामी की गांड में घुसी उँगलियों को और अंदर धकेलना शुरू किया और थोड़ी देर में जड़ तक दो उँगलियाँ गांड में थीं।

" हे इधर नहीं " मामी चीखीं और चन्नर चाचा को छेड़ा,

" तोहरी बहिनिया का, बुच्ची क माई क पिछवाड़ा नहीं है, …जो न उसके मायके वाले भी डुबकी मारते थे और उनकी भौजाई के मायके वाले भी, पिछवाड़े गोता मारते थे, तुंहु तो जरूर पिछवाड़े का मजा लिए होंगे, "

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करीब करीब सुपाड़े तक खूंटा पूरा निकाल के, चन्नर चाचा ने पूरी ताकत से पेला, और बोले,

" अरे अइसन गोल गोल चूतड़, कौन मज़ा नहीं लेगा। गोल गोल चूतड़ हो तो गाँड़ न मारने से पाप लगता है। "

पीछे से धक्के का जवाब धक्के से देते हुए मामी बोलीं " अरे गोल गोल चूतड़ तो उनकी बिटिया का, बुच्ची का भी है, खूब कसमसा कसमसा के चलती है , एकदम मारने लायक हो गयी है।"

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लग रहा था चन्नर चाचा को बुच्ची की माई याद आ गयी

" सही कह रही हो , अरे हम बुच्ची को देखे तो लगा की उसकी माई आ गयीं हैं, अच्छी खासी जवान हो गयी है, जोबन तो अपनी समौरियों से दूने, यही हालत इसकी माई का भी था, इस उम्र में तो कोई हफ्ता नहीं बचता था जब मैंने उसके पिछवाड़े,… कभी गन्ने के खेत में, कभी अमराई में कभी आते जाते ऐसी ही खींच के सरपत के पीछे, और अगवाड़े की तो गिनती नहीं …. कभी वो मना नहीं करती थीं, बल्कि अपने हाथ से अपना नाड़ा खोलती थीं। “

बुच्ची ने भी मन में गाँठ बाँध ली।

वो भी किसी को मना नहीं करेगी, और अपना नाड़ा खुद खोल देगी, बस कोई इशारा कर दे।

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पिछवाड़ा -मामी

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चच्चू ने सुपाड़े तक लंड बाहर निकाला एक पल के लिए रुके, कमर को फिर एक हाथ से कस के पकड़ा और पूरी ताकत से धक्का और धक्का सीधे बच्चेदानी पर लगा।

मामी कांप गई, मजे से भी, दर्द से भी और उस हथौड़े के झटके से भी।

पूनम ने अब कस-कस के बुच्ची की सुरमेदानी को रगड़ना शुरू कर दिया था।

दोनों लड़कियां खूब गरमाई थीं। एक-एक चोट साफ़ दिख रही थी।

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लेकिन एक चीज जो दोनों नहीं देख पा रही थी लेकिन मामी महसूस कर रही थी, चच्चू जान रहे थे,

उन्होंने अंदर तक घुसी दोनों उँगलियों को चम्मच की तरह मोड़ कर अंदर की दीवालों को करोचना शुरू कर दिया, एक एक इंच अंदर का हिस्सा उनकी उँगलियों से रगड़ रहा था, दरेरा जा रहा था, कम से कम दस बार दाएं से बाएं और बाएं से दाएं

और दूसरा हाथ भी कमर छोड़ के जाँघों के बीच, घुस के अब कस कस के क्लिट को रगड़ रहा था, लंड भी अपने बेस से बुर के मुहाने पे रगड़ घिस कर रहा था।

मस्ती से मामी की आँखे मुंदी जा रही थीं। और उसी समय,....

पूनम और बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं,

चच्चू ने पिछवाड़े जड़ तक घुसी दोनों उँगलियाँ निकाल के मंझली मामी के मुंह में ठेल दीं, जो हाथ क्लिट को तंग कर रहा था, उसे चाचू ने मम्मी के मालपुआ ऐसे गालों पर रख के बेरहमी से दबा दिया और चिरैया की चोंच की तरह मामी ने मुंह खोल दिया, और मामी की गांड से निकली ऊँगली मामी के मुंह में,....

और जब तक मामी समझे की ये उँगलियाँ कहाँ से निकल के आयी है वो हलक में, मामी के बालों की चोटी चाचू के हाथ में और उसे जोर से खींचते हुए, हड़काने लगे, मामी से कबूलवाने लगे,

" चूस स्साली छिनार कस के, लगा जोर, खूब थूक लगा ले, चूस और एक बात कान खोल के सुन लो, जबतक हो, रोज दोनों टाइम, बिना नागा, अगर एक बार भी नागा हुआ न तो ऐसी सजा मिलेगी, मेरा जहाँ मन करेगा वहां लूंगा, जैसे मन करेगा वैसे लूंगा, बोल हाँ "

मामी कैसे बोलती उनके मुंह में तो ऊँगली धंसी थी, पर सर हिला के उन्होंने हाँ में इशारा किया और जैसे ऊँगली बाहर निकली, हँसते हुए चाचू से बोलीं,

" स्साले अपनी बहिन महतारी के भंडुए, ...मेरी ननद की ननद के यार, तू क्या कहेगा, मैं खुद दोनों टाइम…"

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और एक बात साफ़ करती हूँ, मेरी माहवारी परसो ही ख़तम हुयी है तो अब उसका भी डर नहीं है, अगले बीस दिन के लिए, जैसे मन करे वैसे लेना, जितना मन करे उतना लेना, जहाँ बुलाओगे तो आउंगी, नहीं बुलाओगे तो भी आउंगी और तेरे ऊपर चढ़ के चोद दूंगी "

मुंह से निकली उँगलियाँ फिर पिछवाड़े लेकिन अबकी दो नहीं तीन और कैंची की तरह फैला के और वहां से निकल के थोड़ी देर बाद मुंह में, चार पांच बार ये हुआ

और पांचवी बार जब उँगलियाँ मुंह में थीं, चच्चू ने खूंटा अपना मामी की बिल से बाहर निकला और पिछवाड़े के छेद के मुहाने लगा दिया। एक हाथ जो खाली था, उससे गाँड़ का छेद थोड़ा फैलाया और लंड का सुपाड़ा उसमें सेट कर दिया।

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मामी जोर जोर से सर नहीं नहीं में हिला रही थीं।

पूनम और बुच्ची सांस थामे देख रही थीं। लेकिन चच्चू पूरी ताकत से ठेल रहे थे। और थोड़ी देर में जब सुपाड़ा पूरा अंदर पैबस्त हो गया तो उन्होंने मुंह से उँगलियाँ निकालीं।

वो समझ रहे थे और देखने वाली, पूनम और बुच्ची भी, की अब मामी लाख गाँड़ पटकें बिना गाँड़ मरवाये बचत नहीं है। जान तो मामी भी रही थीं, पर जैसे मुंह से ऊँगली निकली उंहोने चाचू की ओर सर घुमाके शिकायत की,

" हे उधर नहीं, बहुत दर्द होता है, ....एक तोहार महतारी गदहे से चुदवाय के गाभिन हुयी थी,.... और फिर पिछवाड़े,"

एक चांटा कस के लगा चूतड़ पे मामी के और चच्चू ने हँसते हुए चिढ़ाया,

" क्यों पिछवाड़ा, अपने किसी भाई के लिए रख छोड़ा है , हमरे स्साले के साले के लिए, लेकिन उस स्साले से बोल देना की अगर गाँड़ मरवाने का इतना ही शौक है न तो आ जाए, इस गाँव में लौण्डेबाज भी बहुत हैं, एक निकालेगा और दूसरा जाएगा और हम भी नहीं छोड़ेंगे "

और साथ ही दोनों चूँची पकड़ के इतना करारा धक्का मारा, की अबकी अंदर वाला छल्ला भी पार हो गया, मामी जोर से चीखीं, तड़पी, पूरी देह दर्द से दुहरी हो गयी। लेकिन मामी को गारी पड़ी थी तो वो बिना उन्हें गरियाये कैसे छोड़ देतीं,

तो उन्होंने भी नाप लिया,

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