Adultery thriller खून की होली - Page 3 - SexBaba
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Adultery thriller खून की होली

"ठीक है, अब काम की बात सुनो," गीता ने कुछ देर बाद उसकी नंगी छाती पर अपना सिर रखते हुए कहा। माहौल अब भी कामुक था, लेकिन उसमें अब एक गंभीरता भी आ गई थी।

"मैंने रमेश कैटरर से बात कर ली है। वो कल शाम तुम्हें अपनी टीम में शामिल कर लेगा। तुम्हें बस वेटर की यूनिफार्म पहनकर अंधेरी में उसके ऑफिस पहुँचना है। वहाँ से उनकी बस सभी को लेकर फार्महाउस जाएगी।"

राज उसकी हर बात को ध्यान से सुन रहा था, उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही गीता की पीठ को सहला रही थीं।

"लेकिन एक बात अपनी गाँठ बाँध लो, राज," गीता ने अपना सिर उठाकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब एक सख़्ती थी। "वहाँ तुम राज शर्मा, जासूस, नहीं होगे। तुम रामू या श्यामू, एक वेटर होगे। किसी की आँखों में आँखें डालकर मत देखना। किसी से फालतू बात मत करना। सिर झुकाकर अपना काम करना और कानों को खुला रखना। राठौड़ के गार्ड्स की नज़र हर किसी पर रहती है। एक ग़लती, और तुम ज़िंदा वापस नहीं आओगे।"

उसकी बातों में एक माँ जैसी चिंता और एक दोस्त जैसी सलाह थी।

"मैं अपना ख्याल रखूँगा," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी।

"तुम्हें रखना ही होगा," गीता ने कहा और फिर से उसके होंठों पर झुक गई।

"क्योंकि तुम्हें मेरे पास वापस भी तो आना है।"

यह चुंबन पहले वालों से अलग था। इसमें वासना थी, लेकिन उसके साथ एक दुआ भी थी, एक हक़ भी था।

इस चुंबन ने उनके अंदर की आग को फिर से भड़का दिया।

"जाने से पहले," राज फुसफुसाया, "मैं एक और याद अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।"

गीता मुस्कुराई। "तुम्हें पूछने की ज़रूरत नहीं है।"

उन्होंने एक बार फिर प्यार किया। इस बार यह और भी धीमा और गहरा था। यह एक विदाई थी, एक वादा था। यह एक ऐसा कवच था जिसे गीता अपने जिस्म की गर्मी और अपने प्यार की नमी से बनाकर राज को पहना रही थी, ताकि वह राठौड़ के किले में सुरक्षित रह सके।

वह अपने हर स्पर्श से, हर चुंबन से, और अपनी योनि के हर संकुचन से जैसे कह रही थी - 'तुम मेरे हो, और तुम्हें मेरे लिए वापस आना ही होगा।'

जब राज सुबह होने से पहले उसके कमरे से निकला, तो उसका शरीर पूरी तरह से तृप्त और शांत था। उसका मन मिशन के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार था।

गीता के साथ गुज़री रात ने उसे सिर्फ़ जिस्मानी सुख नहीं दिया था, बल्कि एक ऐसा सुकून और आत्मविश्वास दिया था जो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीतने के लिए ज़रूरी होता है।

वह अब तैयार था, उस शैतान के किले में क़दम रखने के लिए, जिसके हाथ में न जाने कितनी कविता जैसी लड़कियों के सपनों का ख़ून लगा था।

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अगले दिन की दोपहर। राज अपने अपार्टमेंट में बैठा था, जो अब भी उस हमले के बाद पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं हो पाया था। उसका शरीर अभी भी दुख रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ आने वाली रात के मिशन पर केंद्रित था। उसे राठौड़ के किले में घुसना था।

यह एक ऐसा दाँव था जिसमें उसकी जान भी जा सकती थी। मिशन पर जाने से पहले, उसने अपनी क्लाइंट, अमृता सिन्हा, को आख़िरी बार अपडेट देना ज़रूरी समझा।

उसने अमृता को फ़ोन करके अपने "ऑफ़िस" बुलाया। जब अमृता दरवाज़े पर पहुँची, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी उम्मीद और डर का मिला-जुला भाव था। पिछले कुछ दिनों की भाग-दौड़ ने उसे और थका दिया था, लेकिन एक ठोस सुराग की ख़बर ने उसे एक नई ऊर्जा भी दी थी।

"बैठिए," राज ने उसे सोफ़े पर बैठने का इशारा किया, जो अब भी थोड़ा अस्त-व्यस्त था।

"यह सब क्या है?" अमृता ने कमरे की हालत और राज के चेहरे पर बचे हल्के निशानों को देखते हुए पूछा।

"बस कुछ बिन बुलाए मेहमान आ गए थे," राज ने बात को टाल दिया। "ख़ैर, ख़बर है। और यह पक्की है।"

राज ने उसे सब कुछ बता दिया। रिदम डांस अकादमी, मैडम रुखसाना, और आख़िरकार विक्रम सिंह राठौड़ का नाम। उसने बताया कि कैसे उसे पता चला है कि कविता को पनवेल वाले फार्महाउस में रखा गया है।

"क्या... क्या वह ठीक है?" अमृता की आवाज़ काँप रही थी।

"मैं यह नहीं कह सकता," राज ने ईमानदारी से कहा। "लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि मैं आज रात उसके बहुत क़रीब पहुँच जाऊँगा। मैंने फार्महाउस की एक पार्टी में वेटर बनकर घुसने का इंतज़ाम कर लिया है।"

यह सुनना था कि अमृता का संयम, जो उसने इतने महीनों से एक पतले धागे से बाँध रखा था, टूट गया। उम्मीद और ख़ौफ़ के इस मिले-जुले बोझ को वह और बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई, और फिर उसकी आँखों से आँसुओं का एक सैलाब फूट पड़ा।

वह किसी बच्ची की तरह, बिलख-बिलख कर रोने लगी। यह सिर्फ़ आँसू नहीं थे, यह महीनों का दबा हुआ दर्द, अकेलापन, और एक माँ का अपनी बेटी के लिए बेबसी का चीत्कार था।

राज एक पल के लिए अपनी जगह पर जम गया। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे। वह हत्यारों और गुंडों से लड़ना जानता था, लेकिन एक टूट चुकी औरत के आँसुओं का सामना कैसे करे, यह उसे नहीं पता था।

उसने बस वही किया जो उस पल में एक इंसान कर सकता था। वह उसके पास गया और उसके काँपते हुए कंधों पर अपना हाथ रख दिया। इस स्पर्श ने जैसे आख़िरी बाँध भी तोड़ दिया। अमृता उसकी ओर घूमी और उसके सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।

राज उसे पकड़े हुए खड़ा रहा। वह उसके बालों को सहला रहा था, उसे शांत करने की कोशिश कर रहा था। वह अमृता के शरीर के हर कंपन को, उसकी हर सिसकी को अपने सीने में महसूस कर रहा था।

काफ़ी देर बाद, जब उसके आँसू कुछ थमे, तो उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। वह बहुत कमज़ोर और बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही थी।

"मुझे माफ़ करना," वह फुसफुसाई।

"माफ़ी की कोई बात नहीं है," राज ने कहा।

वह पीछे नहीं हटी। वह अब भी उसकी बाँहों में थी, उसके सीने से लगी हुई।

"मुझे बस एक पल के लिए यह सब भूलना है, राज," उसने एक ऐसी आवाज़ में कहा जो किसी प्रार्थना जैसी थी। "मुझे बस यह महसूस करना है कि मैं मर नहीं गई हूँ... कि मैं अभी भी ज़िंदा हूँ। प्लीज़..."

उसने कुछ और नहीं कहा। बस अपनी आँखें बंद कीं और अपने होंठों को ऊपर उठाकर राज के होंठों से मिला दिया।

यह एक ऐसा चुंबन था जिसमें वासना नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द था। यह आँसुओं के खारे स्वाद से भरा हुआ था, और इसमें एक ऐसी बेबसी थी जिसने राज के दिल को चीर कर रख दिया। यह एक डूबते हुए इंसान की आख़िरी पुकार थी, और राज जानता था कि आज रात उसे सिर्फ़ एक जासूस नहीं, बल्कि एक सहारा बनना होगा।

राज उस चुंबन का जवाब दे सकता था, या अमृता को पीछे धकेल सकता था। उसने पहला रास्ता चुना। यह कोई सोचा-समझा फ़ैसला नहीं था। यह एक सहज क्रिया थी। उसने एक ऐसी आत्मा की पुकार सुनी थी जो दर्द के समंदर में डूब रही थी, और वह उसे बचाने के लिए उस समंदर में कूद गया था।

उसने अमृता के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया और उसके आँसू भरे चुंबन का जवाब दिया। यह कोई रोमांटिक या कामुक चुंबन नहीं था। यह दो टूटे हुए इंसानों का एक-दूसरे के दर्द को चखना था।

"अमृता..." राज ने एक पल के लिए खुद को अलग करते हुए कहा, जैसे वह उसे एक और मौका देना चाहता हो।

"नहीं, कुछ मत कहो, राज," अमृता ने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखते हुए कहा। "आज मुझसे कोई सवाल मत पूछो। आज रात मुझे सिर्फ़ महसूस करने दो।"

उसने राज का हाथ पकड़ा और उसे बेडरूम की ओर खींच लिया। राज बिना किसी प्रतिरोध के उसके साथ चल दिया। वह जानता था कि यह ग़लत है। अमृता उसकी क्लाइंट थी। लेकिन वह यह भी जानता था कि इस पल में वह सिर्फ़ एक क्लाइंट नहीं थी, वह एक ऐसी औरत थी जिसे इंसानियत की सख़्त ज़रूरत थी।

बेडरूम में पहुँचकर अमृता उसके सामने खड़ी हो गई और धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं जब वह अपने ब्लाउज़ के हुक खोल रही थी। राज ने आगे बढ़कर उसके काँपते हुए हाथों को रोका और खुद उसके हुक खोल दिए।

उसने अमृता के कपड़े उतारे, बहुत धीरे-धीरे, बहुत सम्मान के साथ। अमृता का शरीर चालीस पार कर चुका था, लेकिन उसमें एक ठहराव था। यह एक ऐसा शरीर था जिसने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिसने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देखे थे।

जब वे दोनों नग्न थे, तो अमृता बिस्तर पर लेट गई और अपनी बाँहें फैला दीं। उसकी आँखों से अब भी चुपचाप आँसू बह रहे थे।

राज उसके ऊपर आया, अपने वज़न को अपनी कोहनियों पर संतुलित करते हुए। उसने नीचे झुककर उसके आँसुओं को अपनी जीभ से चाट लिया।

"मैं यहाँ हूँ," वह फुसफुसाया।

फिर उसने धीरे धीरे से उसके योनि को चूमना चालू किया, उसके दाने को सहलाया, उसे छाता और अपनी जीभ को उसके योनि में डाल दिया। उसके यह काम से अमृता एकदम से पागल हो रही थी। उसने अपने लिंग से उसके दाने को घिसना चालू किया, अमृता तड़पने लगी। कई सालों बाद उसे यह आनंद मिल रहा था। राज के बड़े लिंग को देखकर वह मन ही मन में ख़ुश हो रही थी।

और फिर राज ने बहुत धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाज़ी के, अपने लिंग को उसके अंदर धकेल दिया। अमृता की योनि सूखी और ठंडी थी, जैसे उसके शरीर ने सुख की अनुभूति करना ही छोड़ दिया हो। राज को एक पल के लिए दर्द हुआ, लेकिन वह रुका नहीं।

वह बहुत धीरे-धीरे उसके अंदर-बाहर होने लगा। अमृता का शरीर किसी लाश की तरह पड़ा था, कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। वह बस छत को घूर रही थी, और उसके आँसू बहते जा रहे थे।
 
यह संभोग नहीं था। यह एक अजीब सा अनुष्ठान था। राज अपने जिस्म से अमृता की आत्मा के ठंडेपन को दूर करने की कोशिश कर रहा था। उसके हर धक्के में एक सवाल था - 'क्या तुम अभी भी वहाँ हो?' और अमृता की खामोशी उसका जवाब थी।

राज ने हार नहीं मानी। वह जानता था कि दर्द के इस अँधेरे को चीरने के लिए उसे और गहराई में उतरना होगा। वह उसके शरीर पर नहीं, उसकी आत्मा पर दस्तक दे रहा था।

राज ने अपनी गति को बनाए रखा - धीमी, गहरी, और लयबद्ध। उसने अपना एक हाथ बढ़ाकर अमृता के एक स्तन को सहलाना शुरू किया। उसका स्तन ठंडा और बेजान सा लगा। उसने उसे अपनी हथेली में भरकर धीरे-धीरे दबाया, उसे अपनी गर्मी देने की कोशिश की।

वह नीचे झुका और उसके स्तन को अपने मुँह में ले लिया। वह उसकी निपल को अपनी जीभ से सहलाने लगा, उसे जगाने की कोशिश करने लगा। वह जानता था कि एक औरत का शरीर एक संगीत के साज़ की तरह होता है; अगर सही तार को छेड़ा जाए, तो वह ज़रूर गूंजेगा।

और फिर, बहुत देर बाद, एक चमत्कार हुआ।

जब राज उसके दूसरे स्तन के साथ भी यही कर रहा था, तो अमृता के मुँह से एक हल्की सी, दबी हुई सिसकी निकली। यह दर्द की नहीं, बल्कि किसी भूली हुई अनुभूति के वापस आने की सिसकी थी।

राज रुक गया। उसने अपना चेहरा ऊपर उठाकर उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ ख़ालीपन नहीं था, एक हल्की सी हैरानी थी, जैसे वह खुद अपने जिस्म की इस प्रतिक्रिया पर चौंक गई हो।

राज मुस्कुराया। उसे पहला सुराग मिल गया था।

उसने फिर से वही किया, इस बार और ज़्यादा ध्यान से। और इस बार, अमृता की सिसकी थोड़ी और ऊँची थी। उसके शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई।

राज ने अब अपना पूरा ध्यान उसके जिस्म को जगाने पर लगा दिया। वह एक मूर्तिकार की तरह काम कर रहा था, जो पत्थर की मूर्ति में जान फूँकने की कोशिश कर रहा हो। उसके होंठ और हाथ अमृता के पूरे शरीर पर घूमने लगे। वह उसके पेट को चूम रहा था, उसकी जाँघों को सहला रहा था।

और धीरे-धीरे, अमृता का शरीर जवाब देने लगा। उसकी त्वचा गर्म होने लगी, उसकी साँसें तेज़ होने लगीं। उसकी योनि अब सूखी नहीं थी; वह राज के लिंग को अपने अंदर महसूस करने लगी थी, उसे भींचने लगी थी।

दर्द का अँधेरा छँट रहा था, और उसकी जगह एक नई, अनजानी वासना की सुबह हो रही थी।

"राज..." उसने पहली बार उसका नाम लिया, और उसकी आवाज़ किसी और ही दुनिया से आती हुई लग रही थी।

"हाँ, अमृता," राज ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा। "खुद को महसूस करो। तुम ज़िंदा हो।"

और इन शब्दों ने जैसे आख़िरी दीवार भी गिरा दी।

अमृता ने अपनी टाँगों को राज की कमर में कस लिया और अपनी कमर को ऊपर की ओर उठाया, अब वह राज के हर धक्के का जवाब दे रही थी। वह अब एक बेजान शरीर नहीं थी। वह एक भूखी औरत बन चुकी थी, एक ऐसी औरत जिसके जिस्म को सालों से किसी ने छुआ नहीं था, जिसकी आत्मा को किसी ने समझा नहीं था।

"रुको मत," वह हाँफते हुए बोली। "मुझे महसूस कराओ... मुझे सब कुछ महसूस कराओ!"

उनका संभोग अब एक अनुष्ठान नहीं रहा, यह एक जंगली, उन्मादी नृत्य बन गया था। अमृता की हर आह में महीनों का दबा हुआ दर्द, गुस्सा और अकेलापन बाहर निकल रहा था। वह राज के जिस्म पर अपने नाखून गड़ा रही थी, उसकी पीठ को नोंच रही थी। वह सिर्फ़ सुख नहीं पा रही थी, वह अपनी आत्मा को शुद्ध कर रही थी।

वे दोनों एक ऐसे बवंडर में फँस गए थे जहाँ दर्द और सुख की सीमाएँ मिट चुकी थीं। राज अब सिर्फ़ एक सहारा नहीं था, वह भी इस बवंडर का हिस्सा बन चुका था। अमृता की बेकाबू वासना ने उसके अंदर के जानवर को भी जगा दिया था। वह उसे किसी जंगली जानवर की तरह पेल रहा था, उसके शरीर के हर हिस्से पर अपना हक़ जता रहा था।

कमरे में अब सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़, उनकी हाँफती हुई साँसें और अमृता की बेबाक चीखें थीं। वह हर शर्म, हर बंधन को तोड़ चुकी थी। वह आज़ाद थी।

और फिर, वह क्षण आया।

जब राज अपने आख़िरी धक्के लगा रहा था, तो अमृता का शरीर कमान की तरह अकड़ गया। उसके मुँह से एक लंबी, गगनभेदी चीख निकली, और वह चरमसुख के एक ऐसे गहरे समंदर में डूब गई जिसे उसने कभी महसूस नहीं किया था।

उसका पूरा शरीर काँप रहा था, और उसकी योनि राज के लिंग को ऐसे निचोड़ रही थी जैसे वह उसकी ज़िंदगी का आख़िरी कतरा भी अपने अंदर सोख लेना चाहती हो।

अमृता के इस शक्तिशाली चरमसुख ने राज को भी उसकी बर्दाश्त की हद से आगे धकेल दिया। वह एक गहरी दहाड़ के साथ उसके अंदर स्खलित हो गया।

सब कुछ शांत हो गया।

वे दोनों एक-दूसरे पर बेजान से पड़े थे, पसीने में लथपथ। कमरे में एक गहरी खामोशी थी। लेकिन यह पहले वाली खामोशी नहीं थी। यह एक तूफ़ान के बाद की शांति थी।

अमृता का शरीर अब भी हल्के-हल्के काँप रहा था। वह रो रही थी। लेकिन यह पहले वाले आँसू नहीं थे। यह दर्द के नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के आँसू थे। यह उस राख के आँसू थे जो एक ज्वालामुखी के फटने के बाद बच जाती है।

राज धीरे से उसके बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

"शुक्रिया, राज," वह बहुत देर बाद फुसफुसाई। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी। "तुमने मुझे आज टूटने से बचा लिया। तुमने मुझे याद दिलाया कि मैं सिर्फ़ एक माँ नहीं, एक औरत भी हूँ।"

राज ने कुछ नहीं कहा, बस उसके माथे को चूम लिया।

उस दिन, वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सोए। यह कोई आम दिन नहीं थी। यह एक ऐसा दिन था जिसमें एक औरत ने अपने दर्द को वासना की आग में जलाकर एक नई ज़िंदगी पाई थी, और एक जासूस ने यह सीखा था कि कभी-कभी सबसे बड़े ज़ख़्मों को भरने के लिए जिस्म का मरहम ही काम आता है।

श्याम में जब राज उठा, तो अमृता जा चुकी थी। मेज़ पर उसके लिए मिल्टन में एक कप चाय और एक छोटा सा नोट रखा था।

"मेरी बेटी को वापस ले आओ, राज। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।"

राज ने चाय का घूँट भरा। उसका शरीर थका हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा को एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। यह केस अब उसके लिए सिर्फ़ एक केस नहीं था। यह अब एक वादा था, जो उसने एक ऐसी औरत से किया था जिसने अपनी आत्मा उसके सामने खोलकर रख दी थी।

वह अब राठौड़ के किले में सिर्फ़ एक लड़की को बचाने नहीं, बल्कि एक माँ की उम्मीद को ज़िंदा रखने जा रहा था। और इस बार, वह हार नहीं सकता था।

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