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"ठीक है, अब काम की बात सुनो," गीता ने कुछ देर बाद उसकी नंगी छाती पर अपना सिर रखते हुए कहा। माहौल अब भी कामुक था, लेकिन उसमें अब एक गंभीरता भी आ गई थी।
"मैंने रमेश कैटरर से बात कर ली है। वो कल शाम तुम्हें अपनी टीम में शामिल कर लेगा। तुम्हें बस वेटर की यूनिफार्म पहनकर अंधेरी में उसके ऑफिस पहुँचना है। वहाँ से उनकी बस सभी को लेकर फार्महाउस जाएगी।"
राज उसकी हर बात को ध्यान से सुन रहा था, उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही गीता की पीठ को सहला रही थीं।
"लेकिन एक बात अपनी गाँठ बाँध लो, राज," गीता ने अपना सिर उठाकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब एक सख़्ती थी। "वहाँ तुम राज शर्मा, जासूस, नहीं होगे। तुम रामू या श्यामू, एक वेटर होगे। किसी की आँखों में आँखें डालकर मत देखना। किसी से फालतू बात मत करना। सिर झुकाकर अपना काम करना और कानों को खुला रखना। राठौड़ के गार्ड्स की नज़र हर किसी पर रहती है। एक ग़लती, और तुम ज़िंदा वापस नहीं आओगे।"
उसकी बातों में एक माँ जैसी चिंता और एक दोस्त जैसी सलाह थी।
"मैं अपना ख्याल रखूँगा," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी।
"तुम्हें रखना ही होगा," गीता ने कहा और फिर से उसके होंठों पर झुक गई।
"क्योंकि तुम्हें मेरे पास वापस भी तो आना है।"
यह चुंबन पहले वालों से अलग था। इसमें वासना थी, लेकिन उसके साथ एक दुआ भी थी, एक हक़ भी था।
इस चुंबन ने उनके अंदर की आग को फिर से भड़का दिया।
"जाने से पहले," राज फुसफुसाया, "मैं एक और याद अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।"
गीता मुस्कुराई। "तुम्हें पूछने की ज़रूरत नहीं है।"
उन्होंने एक बार फिर प्यार किया। इस बार यह और भी धीमा और गहरा था। यह एक विदाई थी, एक वादा था। यह एक ऐसा कवच था जिसे गीता अपने जिस्म की गर्मी और अपने प्यार की नमी से बनाकर राज को पहना रही थी, ताकि वह राठौड़ के किले में सुरक्षित रह सके।
वह अपने हर स्पर्श से, हर चुंबन से, और अपनी योनि के हर संकुचन से जैसे कह रही थी - 'तुम मेरे हो, और तुम्हें मेरे लिए वापस आना ही होगा।'
जब राज सुबह होने से पहले उसके कमरे से निकला, तो उसका शरीर पूरी तरह से तृप्त और शांत था। उसका मन मिशन के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार था।
गीता के साथ गुज़री रात ने उसे सिर्फ़ जिस्मानी सुख नहीं दिया था, बल्कि एक ऐसा सुकून और आत्मविश्वास दिया था जो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीतने के लिए ज़रूरी होता है।
वह अब तैयार था, उस शैतान के किले में क़दम रखने के लिए, जिसके हाथ में न जाने कितनी कविता जैसी लड़कियों के सपनों का ख़ून लगा था।
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"मैंने रमेश कैटरर से बात कर ली है। वो कल शाम तुम्हें अपनी टीम में शामिल कर लेगा। तुम्हें बस वेटर की यूनिफार्म पहनकर अंधेरी में उसके ऑफिस पहुँचना है। वहाँ से उनकी बस सभी को लेकर फार्महाउस जाएगी।"
राज उसकी हर बात को ध्यान से सुन रहा था, उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही गीता की पीठ को सहला रही थीं।
"लेकिन एक बात अपनी गाँठ बाँध लो, राज," गीता ने अपना सिर उठाकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब एक सख़्ती थी। "वहाँ तुम राज शर्मा, जासूस, नहीं होगे। तुम रामू या श्यामू, एक वेटर होगे। किसी की आँखों में आँखें डालकर मत देखना। किसी से फालतू बात मत करना। सिर झुकाकर अपना काम करना और कानों को खुला रखना। राठौड़ के गार्ड्स की नज़र हर किसी पर रहती है। एक ग़लती, और तुम ज़िंदा वापस नहीं आओगे।"
उसकी बातों में एक माँ जैसी चिंता और एक दोस्त जैसी सलाह थी।
"मैं अपना ख्याल रखूँगा," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी।
"तुम्हें रखना ही होगा," गीता ने कहा और फिर से उसके होंठों पर झुक गई।
"क्योंकि तुम्हें मेरे पास वापस भी तो आना है।"
यह चुंबन पहले वालों से अलग था। इसमें वासना थी, लेकिन उसके साथ एक दुआ भी थी, एक हक़ भी था।
इस चुंबन ने उनके अंदर की आग को फिर से भड़का दिया।
"जाने से पहले," राज फुसफुसाया, "मैं एक और याद अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।"
गीता मुस्कुराई। "तुम्हें पूछने की ज़रूरत नहीं है।"
उन्होंने एक बार फिर प्यार किया। इस बार यह और भी धीमा और गहरा था। यह एक विदाई थी, एक वादा था। यह एक ऐसा कवच था जिसे गीता अपने जिस्म की गर्मी और अपने प्यार की नमी से बनाकर राज को पहना रही थी, ताकि वह राठौड़ के किले में सुरक्षित रह सके।
वह अपने हर स्पर्श से, हर चुंबन से, और अपनी योनि के हर संकुचन से जैसे कह रही थी - 'तुम मेरे हो, और तुम्हें मेरे लिए वापस आना ही होगा।'
जब राज सुबह होने से पहले उसके कमरे से निकला, तो उसका शरीर पूरी तरह से तृप्त और शांत था। उसका मन मिशन के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार था।
गीता के साथ गुज़री रात ने उसे सिर्फ़ जिस्मानी सुख नहीं दिया था, बल्कि एक ऐसा सुकून और आत्मविश्वास दिया था जो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीतने के लिए ज़रूरी होता है।
वह अब तैयार था, उस शैतान के किले में क़दम रखने के लिए, जिसके हाथ में न जाने कितनी कविता जैसी लड़कियों के सपनों का ख़ून लगा था।
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