Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 23 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#154



कुछ चीजे साफ़ हो गयी थी . जंगल में जो भी क़त्ल हुए थे वो रक्त के लिए हुए थे कातिल जो भी रहा हो . पहले मैंने सोचा था की सोने की खान का राज खुल ना जाये पर सच तो ये था की रक्त की तृष्णा , रक्त चाहिए था चाचा की प्यास के लिए. खंडहर खामोश था कुछ लकडियो में जान बाकी थी जो चटक रही थी . एक बार फिर हम तहखाने में गए पर जैसा हमने छोड़ा था सब वैसा ही था .

मैं- हो न हो निशा सुनैना ने सोना खोजने की योजना को यही मूर्त रूप दिया होगा या फिर यही से उसने अपने टोने किये होंगे. और यही पर उसने सोने की कीमत चुकाई होगी.

निशा- कैसे मालूम हो की वो कीमत क्या थी .

मैं- वो कीमत श्राप थी . आदमखोर का श्राप . सोने की कीमत थी जिदंगी . अब ये श्राप किसका था क्यों था और ये सोना जो सुनैना ने चुराया, मेरी बात समझना चुराया उसका मालिक कौन था .

निशा- तुम किवंदितियो की बात कर रहे हो .

मैं- नहीं, मैं कहानी के उस पन्ने को तलाश रहा हूँ जो छिपा है . कहानी निशा, पुराने समय में मानो किसी ने भी ये सोना यहाँ पर छुपाया होगा. हो सकता है ये किसी लूट का हिस्सा हो. कोई भी रहा हो उसने अगर ये सोना छिपाया तो उसने कोई इंतजाम भी किया होगा उसकी सुरक्षा का .

निशा- कोई टोटका

मैं- ऐसा ही समझ लो और जब सोना सुनैना ने उठाया तो उसकी सुरक्षा जाग्रत हुई होगी.

निशा-कैसे मालुम हो ये सुनैना से जुड़ा कोई भी तो नहीं

मैं- है कोई ,

निशा- राय साहब

मैं- उसके आलावा भी कोई एक .

निशा- तो फिर देर किस बात की

मैं- अब कोई देर नहीं . अब तक इन लोगो ने हमसे खेला है अब हम खेलेंगे .

घर आने के बाद निशा भाभी के पास गयी . मैंने मौका देख कर चाची को पकड़ लिया और उसके होंठ चूसने लगा.

चाची- बहु आ गयी अब भी चाची ही चाहिए तुझे

मैं- तेरे जैसी कहाँ है वो मेरी जान . आज रात को आऊंगा तेरे पास

चाची- पागल है क्या निशा जाग गयी तो .

मैं- नहीं जागेगी पर तेरी जरुर लूँगा.

मैंने चाची की चूत को अपनी मुट्ठी में भर लिया . चाची कसमसाने लगी .

चाची अभी जा तू

मैं- नहीं रहने दे तेरे पास

चाची- तेरे पास ही तो हूँ , पर तुझे सब्र रखना होगा कभी मौका हुआ तो मना नहीं करुँगी.

तभी कुछ आहट हुई तो हम अलग हो गए. भाभी थी .

भाभी- पूरा दिन ही घूमते रहे आज

मैं- बस यूँ ही

भाभी- हाँ ठीक है न . ये ही तो दिन है

मैंने भाभी को साइड में आने का इशारा किया

भाभी- अरे कबीर, ऊपर से कुछ सामान लाना है जरा आओ

हम दोनों चोबारे की तरफ चल दिए.

भाभी- क्या बात है .

मैं- आपने एक बार कहा था की अंजू परिवार की सबसे बिगडैल लड़की है .

भाभी- अब क्यों पूछना है तुमको

मैं- आपने ऐसा क्यों कहा था .

भाभी- मैंने अंजू को किसी ऐसे के साथ देखा था जो कोई नहीं सोच सकता था .

मैं- महावीर , आपने उसके साथ देखा था न अंजू को आपतिजनक अवस्था में

भाभी- नहीं ,

मैं- तो फिर कौन

भाभी- रमा का पति . कैसे क्यों ये मैं नहीं जानती पर मैने दोनों को देखा था . अंजू को कच्ची उम्र से ही ये चस्का लग गया था पर जैसे जैसे उसको समझ आई अब वो बदल गयी है.

मैं- पक्का बदल गयी है न

भाभी- देख वो सदा से स्वछन्द रही है उसके साथ हुए हादसे के बाद तो वो बहुत बदली है

मैं- रमा के पति के अलावा कोई और

भाभी- एक दो नौकर थे जिनको फूफा ने मरवा दिया था .

मैं- क्या इसी बात का बदला लेने के लिए रमा की बेटी के साथ ज्यादती हुई .

भाभी- मैं नहीं जानती उस बारे में .

मैं- ब्याह वाली रात मैंने असली आदमखोर की गंध महसूस की थी टेंट में . अगर वो आप नहीं थी तो फिर कौन था .

भाभी- नहीं जानती मैंने बताया तो था

मैं- एक बार मुझे आपको उस रूप में देखना है

भाभी- तुझे मेरी बात का यकीन नहीं

मैं- मैंने आज तक खूबसूरत आदमखोर नहीं देखा .

भाभी- उस रूप में आई तो मुझे रक्त की तलब होगी तुंरत

मैंने अपनी कलाई आगे की .

भाभी- नहीं मानेगा

मैंने ना में गर्दन हिलाई . भाभी दो कदम रख कर कमरे में थोड़ी सी अन्दर हुई और पलक झपकते ही मेरे सामने वो सच था . मैंने अपनी कलाई भाभी के नुकीले दांतों पर लगाई पर अगले ही पल मेरे सामने फिर से नंदिनी खड़ी थी

भाभी- मेरा खुद पर काबू है कबीर . और तेरा रक्त पीना पड़े वो दिन आएगा तो मैं उस से पहले ही मरना पसंद करुँगी.

भाभी ने मेरे सर पर हाथ फेरा .



“सच खूबसूरत होता है सच घिनोना होता है ” रुडा के शब्द मेरे मन में गूंजने लगे. एक संक्रमण ने भाभी के अस्तित्व को बदल कर रख दिया था . मैं इतना तो समझ गया था की महावीर इस बीमारी को बाहर से नहीं लाया था . कुछ भी करके मुझे सुनैना का इतिहास जानना था और उसके लिए अब मुझे अपने मोहरे का इस्तेमाल करना था . अगले दिन गाँव भर मे ये चर्चा फ़ैल गयी की छोटे ठाकुर लौट आये है . उनको इलाके में देखा गया. अफवाह में बड़ी शक्ति होती है . हमारे घर तक भी बात पहुंचनी ही थी . जीवन में पहली बार मैंने चाची के चेहरे पर पीलापन देखा , चिंता की लकीरे देखि . पूरा दिन उधेड़बुन में बीता और रात को जब हम कुवे पर घात लगाये हुए थे हमने पायल की झंकार सुनी ..........................
 
रात को एक प्रोग्राम मे चला गया जहां अब घर बनाया है वहाँ पास मे ही एक बस्ती है छोटे गांव जैसी कल उनके शादी थी वो आए थे निमंत्रण के लिए मैंने भी सोचा पड़ोसी तो होने ही चाहिए फिर ध्यान ही ना रहा अपडेट का
 
#155



इंतज़ार कितना लम्बा हो सकता है मैंने उस रात जाना . मेरे दिल में निशा की चिंता भी थी उसे अकेले कुवे पर छोड़ना ठीक था या नहीं दिल में थोड़ी घबराहट भी थी . एक एक पल मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा था पर खंडहर खामोश था इतना खामोश की मैं अपनी सांसो की आवाज भी सुन सकता था . रात बहुत बीत गयी थी पर साला कोई भी नहीं आया . मैंने जेब से वो तस्वीर निकाली और उसे गौर से देखने लगा. उसे उस पेंटर के बनाए अनुमान से मिलाने की कोशिश करने लगा पर साला दिमाग काम नहीं कर रहा था . मुझसे कुछ तो छूट रहा था .

मैंने खंडहर के उस तहखाने को समझने की कोशिश की , न जाने क्यों मुझे लग रहा था की ये तस्वीर कुछ तो छिपाए हुए है .

“तो यहाँ तक पहुँच ही गए तुम कुंवर ” आवाज मेरे पीछे से आई थी . मैंने पलट कर देखा रमा खड़ी थी .

मैं- शुक्र है कोई तो आया . वर्ना इस तन्हाई ने जीना मुश्किल किया हुआ था मेरा

रमा- जीना तो मुश्किल ही होता है कुंवर

मैं- इतना मुश्किल भी नहीं था पर तुम सब ने इतना चुतियापा फैलाया हुआ है की मेरा जीना मुश्किल ही हुआ है .

रमा- तुमने वो कहावत तो सुनी होगी न कुंवर की जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए पर तुम, तुमने तो शामियाना ही बना लिया . क्या नहीं था , क्या नहीं है तुम्हारे पास जो चाहा तुमने पाया सुख किस्मत वालो को मिलता है तुमने सुख की जगह अपने नसीब में दर्द चुना.तुम समझ ही नहीं पाए की कब अतीत की तलाश करते करते तुम खुद अतीत का हिस्सा बन गए हो.

मैं- वापिस लौटने के लिए ही मैंने वो अफवाह फैलाई थी .

रमा- खुद को जासूस समझते हो क्या तुम . तुमने क्या सोचा था तुम जाल फेंक दोगे और कबूतर फंस जायेगा. जो जिन्दगी तुम जी रहे हो न वो जिन्दगी वो दौर मेरी जुती की नोक पर है. बहुत विचार किया फिर सोचा चलो बच्चे की उत्सुकता मिटा ही देती हूँ . वर्ना चाल बड़ी बचकानी थी तुम्हारी . तुम को क्या लागत है . छोटे ठाकुर इतने साल गायब रहे और तुम कल के लौंडे तुम , तुम बीते हुए कल को एक झटके में सामने लाकर खड़ा कर दोगे .

रमा ने दो मशाल और जलाई . तहखाने का हरा फर्श सुनहरी लौ में चमकने लगा.

मैं- तुम शुरू से जानती थी की चाचा के गायब होने की क्या वजह थी . तुम भी शामिल थी उस राज को छिपाने में .

रमा- अब हर कोई तुम्हारे जैसा चुतिया तो नहीं होता न कुंवर. तुम्हे क्या लगता है किसमे इतनी हिम्मत थी जो राय साहब के भाई को गायब कर देता.

मैं- तो शुरू करते है फिर. बताओ शुरू से ये कहानी कैसे शुरू हुई.

रमा---- क्या करेगा कुंवर तू जान कर

मैं-अब तुम भी यहाँ हो हम भी यहाँ है और ये रात बाकी है .

रमा- चलो अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो .

मैं- जंगल में तीन नहीं चार लोग थे . इस कहानी में हमेशा से चार लोग थे न

रमा- जान गए तुम

मैंने वो श्वेत श्याम तस्वीर रमा के हाथ में रख दी. रमा ने उस पर हलके से हाथ फेरा .

रमा- अक्सर आसमान में उड़ते परिंदों को ये गुमान हो जाता है की धरती पर खड़े लोग तो कीड़े-मकोड़े है . पर वो ये नहीं जानते कुंवर, की शिकारी का एक वार परिंदे की उड़ान खत्म कर देता है. एक पल में अर्श से फर्श पर आ गिरते है गुरुर की उड़ान वाले.

मैं-क्यों किया ये सब तुमने

रमा- मैंने क्या किया कुछ भी नहीं . मैं तो जी ही रही थी न . क्या चाहती थी मैं कुछ भी तो नहीं . कुछ भी नहीं कुंवर. पर मुझे क्या मिला तिरस्कार, घर्णा और उपहास उड़ाती वो नजरे.

मैं- तुम जलती थी उस से

रमा- मैं जलती थी उस से. मैं. मैं उसकी छाया थी पर गुरुर के नशे में डूबी उसकी आँखे कभी मुझे समझ ही नहीं पायी. उसे बहुत घमंड था रुडा और राय साहब के साथ त्रिकोण बनाया उसने. डेरे की सबसे काबिल थी वो . उसने वो कर दिखाया जो किसी ने सोचा भी नहीं था . उसने कहानी, किवंदिती को सच करके दिखा दिया पर वो ये नहीं जानती थी की लोभ, लालच का मोल चुकाने की औकात नहीं थी उसकी.

रमा ने एक मशाल ली और दिवार पर जमी लताओं में आग लगा दी. जब लपटे थमी तो मैंने वो देखा , जो समझना बहुत मुश्किल था राख से बनी वो तस्वीर मेरे सीने में आग सी लग गयी . लगा की मैं आदमखोर बनने वाला ही हूँ पर मैंने रोका खुद को

रमा- बड़े बुजुर्गो ने हमेशा चेतावनी दी कुंवर की चाहे कुछ भी हो जाये उस स्वर्ण का लालच कभी न करना जो तुम्हारा ना हो . सोना इस दुनिया की सबसे अभिशप्त धातु. इसका मोह , इन्सान को फिर इन्सान नहीं रहने देता उसे जानवर बना देता है .

सुनैना राय साहब और रुडा ने इसी तहखाने में बैठ कर वादा किया था की अगर किवंदिती सच हुई तो वो सोने का कभी लालच नहीं करेंगे . उसे देखेंगे और वापिस कर देंगे. पर मोह कुंवर मोह. सोने की आभा ने उनके मन में लालच का बीज सींच दिया. सुनैना ने वो ही गलती की जो अभिमानु ने की थी , चक्रव्यूह के अंतिम चरण को वो नहीं भेद पाया था सुनैना भी नहीं भेद पायी तब सामने आया इस सोने का मालिक . इन्सान बड़ा नीच किस्म का जानवर है , तब सुनैना ने एक सौदा किया

मैं- कैसा सौदा



रमा- उसने अपनी आत्मा का टुकड़ा गिरवी रख दिया
 
#156



कुछ देर तहखाने में ख़ामोशी छाई रही और मैं समझने की कोशिश करने लगा की आत्मा के टुकड़े को कोई कैसे गिरवी रख सकता है.

मैं- क्या ये मुमकिन है

रमा-निर्भर करता है की तुम इसे कैसे समझते हो

मैं- तुम इसे कैसे समझती हो रमा और यदि आत्मा का टुकड़ा गिरवी था तो फिर टूटी आत्मा से सुनैना ने शरीर कैसे त्याग दिया.

रमा- मैं इसे कैसे समझती हूँ . मैं नहीं समझ पायी. राय साहब नहीं समझ पाए रुडा नहीं समझ पाया. अगर हम में से कोई भी इसे समझ पाता तो आज वो सोना यूँ नहीं पड़ा होता लावारिस हालत में

मैं- लालच , क्या मिला तुम सब को ये लालच करके रमा . तुमने अपनी ही बहन से धोखा दिया . मैं हमेशा सोचता था की तुम , तुम इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो इस पूरी कहानी में . ऐसा क्या छिपा था जो सामने होकर भी नहीं दिख रहा था , वो तुम थी रमा. वो तुम्हारा रिश्ता था सुनैना से. वो जानती थी तुम सब के मन के लालच को . तुम सबकी ये हवस पूरी न हो जाये इसलिए उसने अपनी आत्मा के टुकड़े को गिरवी रखा या फिर मैं कहूँ उसने उसे कहीं छुपा दिया .

तुम , तुम कभी भी उस जैसी नहीं बन पायी क्योंकि तुम्हारे मन में द्वेष था , घृणा थी . तुम हमेशा सुनैना बनना चाहती थी .

रमा- तुमको सच में ऐसा लगता है . मैं बहुत बेहतर थी उस से .

मैं- पर तुम उस चीज को नहीं समझ पायी . तुमने पूरी उम्र लगा दी ये खोजने में की इस सोने को कैसे हासिल किया जाये. पर तुम कामयाब नहीं रही जानती हो क्यों .

रमा के चेहरे पर अस्मंस्ज देख कर न जाने क्यों मुझे बड़ी ख़ुशी हुई.

मैं- जिस दिन मैंने राय साहब के बाद मंगू को तुझ पर चढ़ते देखा था न मैं उसी दिन जान गया था की तू, तू इस जिस्म का उपयोग किस हद तक कर सकती है . चूत , चूत का नशा इन्सान की सबसे बड़ी कमजोरी जो काम कोई नहीं कर पाए इस छोटे से छेद में वो ताकत होती है . तुम लोगो ने हमेशा मुझे झूठी कहानी सुनाई, मुझे हर बार भटकाया की मैं अतीत की उस डोर को ना तलाश कर सकू. पर तुम्हारी ये बात ही की तुम्हे कोई नहीं पकड़ पायेगा तुम पर भारी पड़ गयी . तुमने सोचा होगा की हम इस चूतिये को भटका रहे थे पर तुम नहीं जानती थी की मैं क्या तलाश कर रहा था .

रमा की आँखों को मैंने फैलते हुए देखा .

मैं- रमा मैं उस कड़ी को तलाश रहा था जो मुझे इस कहानी से जोडती है . जानती है तु कभी भी सुनैना की आत्मा के टुकड़े को क्यों नहीं ढूंढ पायी . क्योंकि तू जानती ही नहीं थी वो क्या है .

रमा - क्या था वो

मैं- बताऊंगा पर उस से पहले और थोड़ी बाते करनी है . वैसे कुंवे पर तूने चाल सही चली थी पर तोड़ करके बैठा था मैं. तेरा दांव इस लिए फेल हुआ रमा क्योंकि तू ये तो जानती थी की चाचा की कहानी क्या है पर तू इस कहानी का एक माहत्वपूर्ण भाग नहीं जानती थी . तू ये नहीं जानती थी उस रात चाचा पर किसी ने हमला करके लगभग उसकी जान ही ले ली थी . उसने चाचा को मरा समझ कर दफना दिया था पर जीने की लालसा बहुत जिद्दी होती है रमा. वो बेचारा कच्ची मिटटी को हटा कर बाहर निकल आया पर उसे क्या मालुम था की काश उस रात वो मर जाता तो कितना सही रहता . कल जब मैंने चाचा को संक्रमित रूप में देखा तो मैं सोचने पर मजबूर हो गया की अगर ये यहाँ था तो किसने किसने वहां पर कंकाल छुपाया होगा. किस्मत बहुत कुत्ती चीज होती है रमा. देख तूने कंकाल को ठीक उसी गड्ढे में छिपाया जहाँ पर कोई तुझसे पहले चाचा को दफना गया .

चूत के जोर के दम पर तूने दुनिया ही झुका ली थी . पर तू समझ नहीं पायी की हवस के परे इस शक्ति और होती है . तूने चढ़ती जवानी की दहलीज को पार करते तीन दोस्तों को अपने हुस्न के जाल में फंसा लिया .तूने तीनो को वो ही कहानी सुनाई जो मुझे सुनाई थी वो तेरे जाल में फंस भी गए पर महावीर के पास एक चीज थी जिसने मुझे वो सच दिखाया जो वक्त की धुल में ढका हुआ था . महावीर के पास एक कैमरा था रमा जिस से वो चोरी छिपे तस्वीरे खींचता था . मुझे वो तस्वीरे मिली जो छिपा दी गयी थी उन्ही तस्वीरों में मुझे वो मिला जिसकी तलाश थी मुझे. मुझे सच मिला वो सच जो महावीर ने ढूंढा था .

रमा- तेरे जैसा था वो , उसको भी इतनी ही चुल थी अतीत को तलाश करने की एक वो ही था जिसने वो तरीका तलाश लिया था जिस से की सोने के मालिक को काबू कर सकते थे . उसने ही सबसे पहले जाना था की वो कौन था . और यही बात उसके मरने की वजह बन गयी .

मैं- पर तू उसके बारे में एक चीज नहीं जानती थी रमा की वो आदमखोर था . और अगर वो आदमखोर बना तो ये रास्ता उसने खुद ही चुना होगा क्योंकि वो भी मेरी तरह इस कहानी के मूल की तलाश में था . वो सोना नहीं चाहता था . महावीर को जहाँ तक मैंने समझा है वो खुद को सुनैना की आत्मा का टुकड़ा समझता था .

मेरी बात सुन कर रमा की आँखे हैरत से भर गयी .

मैं- पर नहीं , वो नहीं था . वो कभी भी नहीं था

रमा- तो फिर कौन था .



मैं- तूने कभी समझा ही नहीं रमा ,की हवस के आगे एक शक्ति और होती है और वो होती है प्रेम . बेशक सुनैना के गर्भ में पल रही संतान को अपनाने की हिम्मत रुडा में नहीं थी पर सुनैना ने प्रेम के उस रूप को चुना जिसे मात्रत्व कहते है . माँ, दुनिया की सबसे शक्तिशाली योद्धा होती है . मैं हमेशा सोचता था की इस जंगल से मुझे इतना लगाव क्यों है . क्यों, क्योंकि मैं इस जंगल का अंश हूँ . मैं हूँ सुनैना की आत्मा का वो टुकड़ा . मैं हूँ वो सच जिसे कोई नहीं जानता .
 
#157



रमा की आँखों में इतनी हैरत थी की वो अगर फट भी जाती तो कोई बात नहीं थी.

रमा- नहीं ये नहीं हो सकता . असंभव है. तू सुनैना का बेटा नहीं हो सकता ये मुमकिन नहीं

मैं- तेरी सदा ये ही तो दिक्कत रही तू कभी समझ ही नहीं पायी . मैंने कहा मैं हु उसकी आत्मा का अंश, उसका वारिस . वारिस जिसे नियति ने चुना है . खुद सुनैना ने चुना है . जानती है रमा हक क्या होता है . हक़ कभी किसी को खुद से नहीं मिलता. उसके लिए काबिल होना पड़ता है . मैं आज तक हैरान परेशान था क्योंकि मैं आदमखोर के बारे में सोचत था पर आदमखोर तो बस एक पड़ाव था , ताकि सच को छिपाया जा सके. पर तुम लोगो का क्या ही कहना आदमखोर की आड़ में तुम लोगो ने अपना खेल खेला. प्र अब ये खेल बंद होगा . मैं करूँगा इसे बंद .

रमा- कोशिश करके देख लो.इतना आगे निकल आई हूँ की अपना हक़ लिए बिना पीछे लौटने का सवाल ही नहीं है .

मैं- हक़, उसके लिए काबिल होना पड़ता है मैंने तुझे अभी अभी बताया न, और तू तो इतनी काबिल है की तुने अपनी हवस और लालच में अपनी ही बहन की बलि चढ़ा दी.

रमा- रिश्तो की डोर बड़ी नाजुक होती है कुंवर , रिश्तो को खून से सींचा जाता पर खून ही जब खून को पहचानने से मना कर दे तो उस खून को ही साफ़ कर देना चाहिए मैंने बस वही किया.

मैं- उस डोर को तू कभी थाम ही न सकी मुर्ख औरत तू अब भी नहीं समझ पायी. मरते समय सुनैना भरोसा टूटने से इतना आहत थी की उसकी वेदना , उसकी करुना श्राप में बदल गयी . जिस सोने के लिए उसके अपनों ने उसके साथ धोखा किया , वो सोना तुम्हारी असीम चाहत बन कर रह गया. महावीर और अंजू को जन्म देते समय भी वो जानती थी की तुम उसकी औलादों का इस्तेमाल करोगे इस सोने को पाने के लिए इसलिए ही शायद राय साहब ने उन दोनों की परिवरिश की व्यवस्था की .

रमा- इतना सब कैसे जाना , जो कोई भी नहीं जान पाया .

मैं- बताऊंगा तुझे पर मेरे एक सवाल का जवाब दे तू आदमखोर का क्या रोल है इस कहानी में .

रमा- श्राप है वो , सुनैना ने चूँकि अपना वचन नहीं निभाया था वो सोने के अंतिम पथ को पार नहीं कर पाई थी . जब तक सोना अपने वारिस को पहचान नहीं लेता ये व्यवस्था टूट नहीं जाती रक्त से सींचा जाता रहेगा उस स्वर्ण आभा को . कोई ना कोई आदमखोर बन कर ये करता रहेगा पर यहाँ भी एक झोल हो गया .

मैं- आदमखोर खुद पर काबू नहीं रख पाया. तुम अपने हुस्न के जाल में फंसा कर शिकार ला रही थी . इस खेल में तुमने अपनी दो सहेलियों की और मदद ली पर फिर मामला बिगड़ गया. महावीर तुम्हारे लिए अड़चन बन गया और फिर शुरू हुई जंग . हक़ की जंग वो खुद को वारिस समझने लगा . सुनैना का बेटा होने की वजह से उसका ऐसा सोचना ठीक ही था . समस्या तब शुरू हुई जब आदमखोर का राज खुलता ही चला गया . माहवीर जब इस संक्रमण से ग्रस्त हुआ तब दो अलग कहानिया चल रही थी एक तुम्हारी और दूसरी छोटे ठाकुर की . महावीर दोनों कहानियो में शरीक था . उसकी और चाचा की दुश्मनी , चूत के चक्कर में साले सब बर्बाद हुए . उसने शायद गुस्से में चाचा को काट लिया हो . इसीलिए चाचा मर नहीं पाया था पर तुम लोगो ने उसका भी फायदा उठाया.

रमा- तुम्हारा बाप बहुत चाहता था अपने भाई को .

मैं- इस कहानी में साले सब एक दुसरे को चाह ही तो रहे है . किस किस्म की चाहत है ये जो सबको बर्बाद कर गयी. बाप चुतिया ने चाचा को कैदी बना कर रखा , उसका इस्तेमाल किया चंपा के ब्याह को बर्बाद करने में. समझ नही आता जब ब्याह को बर्बाद करना ही था तो ब्याह करवाने की क्या जरुरत थी .

रमा- राय साहब का उस घटना से कुछ लेना देना नहीं है.

मैं- तो किसका है .

रमा- नहीं जानती , अब ये खेल उस मुकाम पर पहुँच चूका है जहाँ पर कौन किस पर वार करे कौन जाने. पर अब जब तुम सब जानते हो मैं सब कुछ जानती हूँ तो फिर इस खेल को आज ही खत्म करना चाहिए. काश मैं पहले जान जाती .

मैं- समय बलवान............

आगे के शब्द चीख में बदल गए किसी ने पीछे से सर पर वार किया . सर्दी की रात में वैसे ही सब कुछ जमा हुआ था सर पर हुए वार ने एक झटके में ही पस्त कर दिया मुझे . मैं जमीं पर गिर गया. मैंने देखा पीछे हाथ में लोहे की छड लिए मेरा बाप खड़ा था .

“”बहुत देर से बक बक सुन रहा था इसकी “ पिताजी ने रमा से कहा.

बाप ने एक बार फिर से मुझ पर वार किया .

पिताजी- न जाने क्या दिक्कत थी इस न लायक की. इसके ब्याह को भी मान्यता दी सोचा की लुगाई के घाघरे में घुसा रहेगा पर इसकी गांड में कीड़े कुल्बुला रहे थे . मैंने सोचा था की किसानी में लगा रहेगा पर इसको तो जासूस बनना है . कदम कदम पर हमारे गुरुर को चुनोती देने लगा ये. हमारे टुकडो पर पलने वाला हमारे सामने सर उठा कर खड़ा होने की सोच रहा था ये .

इस बार का वार बहुत जोर से मेरे घुटने की हड्डी पर लगा.

मैं - तो ये है राय साहब के नकाब की सच्चाई.

पिताजी- दुनिया में सच और झूठ जैसा कुछ भी नहीं होता चुतिया नंदन

मैं- चंपा को क्यों फंसाया फिर

पिताजी- वो साली खुद आई थी मेरे पास. उसकी गांड में आग लगी थी . उसे बिस्तर पर कोई ऐसा चाहिए था जो उसे रौंद सके उसकी इच्छा हमने पूरी की .

पिताजी ने एक बार फिर मुझ पर वार किया , इस बार मैंने छड़ी को पकड़ लिया और पिताजी को धक्का दिया . रमा बीच में आई मैंने खींच कर एक लात मारी उसके पेट में वो सिरोखे के टूटे टुकडो पर जाकर गिरी. पिताजी ने मेरी गर्दन को पकड़ लिया और मारने लगे मुझ को.

मैं- इतना भी मत गिरो राय साहब , की बची कुची शर्म भी खत्म हो जाये.

पिताजी- अब हम तुम जिस मुकाम पर आ गए है कुछ बचा ही नहीं है .रिश्तो की डोर न हमारे लिए कभी थी ना आगे होगी.

मैं- अपने सर पर बाप की हत्या का पाप नहीं लेना चाहता मैं

पिताजी- पर मुझे कोई गम नहीं तुझे मारने में .

पिताजी ने मुझे उठा कर पटका, झटका इतनी जोर का था की हड्डिया कडक ही उठी मेरी.

मैं- एक बार फिर कहता हूँ मैं पिताजी



पिताजी ने पास पड़ा एक पत्थर उठा कर मेरी तरफ फेंका.
 
#158



“मैंने सुना था की बाप जो बेटे के कंधो पर जाते है वो स्वर्ग जाते है पर मेरा बाप स्वर्ग नहीं जाएगा , जो पाप किये है तुमने उसका फल यही भुगतना होगा,तुम्हारे पापो को मिटाने के लिए नियति ने शायद मुझे ही चुना है ” मैंने उस पत्थर से बचते हुए कहा.

कहने को कुछ नहीं था इस खंडहर ने इस जंगल ने इतना कुछ देखा था आज थोडा और देख लेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा. रमा ने लोहे की बड़ी सी चेन मेरे गले में फंसा दी और मुझे खींचने लगी. उसकी आँखों में ज़माने भर की क्रूरता थी. आंखे चमक रही थी लालच की रौशनी में ये जानते हुए भी की अँधेरा बाहें फैलाये हुए उनका इंतज़ार कर रहा था . मैं बेडियो से खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था , जबकि पिताजी के पास पूरा मौका था मुझे काबू करने का.

“इसका ताजा खून ही वो चाबी है ” रमा बोली

मैं- इतना सस्ता नहीं मेरा खून की दो कौड़ी की रंडी उसे छीन लेगी.

मैंने पूरा जोर लगाते हुए बेडि को आगे की तरफ खींचा और साथ ही रमा को भी उठा लिया . हवा में घुमते हुए मैंने वही बेल रमा की पीठ पर खींच कर दे मारी. अब मुकाबला था दो का एक से. राय साहब भी ताकत में किसी तरह से कम नहीं था . उनकी फड़कती भुजाये मुझे पीस देना चाहती थी .

पिताजी के उस जोरदार मुक्के ने मुझे तारे ही दिखा दिए थे , सँभालने से पहले ही पिताजी ने मुझे कंधे से उठाया और सीढियों पर दे मारा. कड़क की आवाज से पुराने पत्थरों को तिड़कते हुए देखा मैंने. अगले ही पल रमा ने उछल कर मेरे सीने पर अपना घुटना दे मारा. वार इतना गहरा था की मेरे अन्दर सोये जानवर तक को धक्का लगा. वो गुर्रा उठा. उन्माद में मैंने रमा को बाजुओ से पकड़ा और उसके कंधे को उखाड़ दिया .

“aaahhhhhhhhhh ”

“राम्म्म्मम्म्म्म ” रमा और पिताजी दोनों ही चीख उठे. रमा फर्श पर गिर गयी उसका खून लबालब बहने लगा. उसका हाथ मेरे हाथ में थरथरा रहा था . ताजा रक्त की गंध जैसे ही मेरे नथुनों से टकराई मेरे अन्दर का वो आदमखोर बेकाबू होने लगा. रमा के खून में कोई तो बात थी , शायद सुनैना की बहन होने के नाते वो जानवर उस खास गंध को पहचान रहा था . मेरे घुटने कांप रहे थे. सीने में आग लग गयी थी . मैंने अपनी जैकेट उतार फेंकी. सीने को मसलने लगा. प्यास के मारे हाल बुरा था मुझे पानी चाहिए था पानी की जरुँर्ट थी मुझे. सब कुछ छोड़ कर मैं बहार भागा पर राय साहब ने मेरा पैर पकड़ लिया और मुझे वापिस से फर्श पर पटक दिया.

“तू नहीं बनेगा वो ” निशा के कहे शब्द मेरे कानो में गूंजने लगे.

“भागने की क्या जल्दी है तुझे , तेरा अंत इसी तहखाने में लिखा है ” राय साहब ने लोहे की छड का नुकीला हिस्सा मेरे पैर में घुसा दिया.

“जाने दो मुझे ” अपने आप से जूझते हुए मैंने कहा .

“मार डालो इसे ”दर्द से तड़पती रमा ने चिल्ला कर कहा.

मैं- भोसड़ी की , मैं यहाँ रहा तो वो अनर्थ हो जायेगा जो तू सोच भी नहीं सकती .

पिताजी का अगला वार पैर के आर पार हो गया. और मेरा सब्र टूट गया . एक झटके से मैंने वो छड अपने पैर से निकाली और रमा की तरफ दे मारी. पलक झपकते ही रमा के बदन के आर पार निकल गयी वो . रमा की आँखे फटी की फटी रह गयी .

रमा ” पिताजी चीख पड़े और इस बार ये चीख को मामूली नहीं थी . मैंने वो देखा जो देखने के लिए मजबूत कलेजा चाहिए था . पिताजी एक पल को झुके और अगले ही पल उस तहखाने में तूफ़ान आ गया . जो वार मुझ पर हुआ था वो किसी इन्सान का नहीं था बल्कि उस जानवर का था जिसने गाँव की माँ चोद रखी थी . दिवार के सहारे वाले खम्बे पर गिरने से पहले मैंने देखा की वो आदमखोर दौड़ कर रमा के पास गया और उसे अपनी गोद में उठा लिया. रमा का बेजान शरीर झूल गया आदमखोर की बाहों में .

कुछ पल आदमखोर रमा को देखता रहा और फिर उसने अपने होंठ रमा के ताजे रक्त पर अलग दिए और उसे पीने लगा. फिर उसने झटके से रमा की लाश को फेंक दिया जैसे परवाह ही नहीं हो और मेरी तरफ लपका. मैंने भरकस कोशिश की पर आदमखोर की शक्ति बहुत ज्यादा थी . और उसका उन्माद मेरी जान लेने को आतुर. बदन तार तार ही हो गया था उम्मीद टूटने लगी थी और फिर वो हुआ जो मैं कभी नहीं चाहता था , कभी नहीं.

मेरी आत्मा पर बोझ गिर गया . बदन के हर हिस्से को टूटते हुए मैंने महसूस किया . मेरा परिवर्तन हो रहा था . मैंने बहुत रोकने की कोशिश की पर शायद वो जानवर जान गया था की अब नहीं तो फिर कभी नहीं, क्योंकि फिर कुछ बचना ही नहीं था . अपने अंतर्मन से जूझते हुए मैं पूरी कोसिस कर रहा था की मैं वो ना बनू पर इस बार , इस बार नियति मेरे साथ नहीं थी.

चीखते हुए मैं वो बन गया जो मैं नहीं था , कभी नहीं था . राय साहब बने आदमखोर की उन आंखो में मैंने चमक सी देखि और फिर मामला आरपार का हो गया . लम्बे नुकीले नाखून एक दुसरे के बदन को चीर रहे थे , नुकीले दांत एक दुसरे के मांस को फाड़ देना चाहते थे. कभी वो हावी कभी मैं . इस रात ने इतना तो तय कर दिया था की इस तहखाने से अगली सुबह हम में से कोई एक ही देखेगा. ये ऐसी जंग थी जिसमे क्रूरता ही जितने वाली थी मेरे अन्दर का जानवर ये बात बहुत अच्छे से जानता था . उसने राय साहब के पैरो को पकड़ा और एक झटके में मोड़ दिया. गुर्राहट भरी चीख खंडहर में गूँज उठी . राय साहब पीछे जाकर गिरे. मैं उनकी छाती के ऊपर खड़ा था मेरी उंगलिया उस गर्दन को उखाड़ ही फेंकने वाली थी की मैंने अपनी पकड़ ढीली कर दी . अपने अन्दर के जानवर को काबू कर लिया मैंने.

कबीर के रूप में आते ही मैंने वो लोहे की बेल उठाई और राय साहब के गले में लपेट दी

मैं- इतनी आसान मौत कैसे होगी राय साहब , इतनी सस्ती जान तो नहीं न . याद करो वो दिन जब आपने लाली को फांसी का फरमान का समर्थन किया था . कहते है की कर्मो का फल यही इसी धरा पर चुकाना पड़ता है , समय आ गया है . मैंने बेल को ऊपर फंसे हुक में फेंका और अपने बाप को लटका दिया. पर मेरे हाथ जरा भी नहीं कांपे. . पर वो राय साहब था इतनी आसानी से कैसे मर जाता . तब मैंने गले से वो लाकेट उतारा और उसे चाकू बनाते हुए राय साहब के सीने के आर पार कर दिया . उन्होंने डकार सी ली और फिर सब शांत हो गया .



पर अभी भी कुछ करना बाकि था . मैंने वो लाकेट लिया उसे उस राख की बनी तस्वीर में घुसा दिया . और जैसे भूकम्प सा ही आ गया खंडहर कांपने लगा भरभरा कर गिरने लगा. मैं बहार की तरफ दौड़ा. जंगल की ताजा हवा ने जैसे नया जीवन दिया मुझे. पल भर में ही सब कुछ तबाह हो गया रह गया तो मैं और वो मलबा जिसमे मेरी यादे भी दफन हो गयी थी .
 
#159



एक कहानी का अंत हो गया था जिसमे राय साहब थे रमा थी और उनकी हवस थी . सोने को या तो उसका वारिस ही ले सकता था . वारिस के अलावा जो भी उसे लेगा दुर्भाग्य जकड लेगा उसे अपने पाश में . राय साहब ने श्राप चुना . आदमखोर बन कर वो रक्त से सींच कर उस सोने का उपयोग करते रहे. इसी सोने के लिए उन्होंने रुडा से दोस्ती तोड़ी. चाचा ने जब सोना इस्तेमाल किया तो वो भी बर्बाद हो गए. रमा वैसे तो बर्बाद ही थी पर राय साहब के संरक्षण की वजह से सुरक्षित रही . मंगू खान में गया और मारा गया. परकाश मारा गया . अब मुझे भी कुछ राज मरते दम तक सीने में दफ़न करके रखने थे.

“निशा, ” कुवे पर जाकर मैंने उसे पुकारा पर कोई जवाब नहीं आया .

मैंने फिर पुकारा बार बार पुकारा पर कोई जवाब नहीं मिला . दिल किसी अनहोनी की आशंका से धडक उठा . अगर वो यहाँ नहीं तो फिर कहा. क्यों मैंने उसे अकेला छोड़ा क्यों. बदहवासी में मैं घर पहुंचा तो गली

सुनसान पड़ी थी . हमेशा की तरह घर का गेट खुला पड़ा था . घर में अँधेरा था मैंने बत्तिया जलाई . सब शांत था . मेरी धड़कने बढ़ी थी .

“चाची, भाभी , निशा ” मैंने आवाज लगाई पर कोई जवाब नहीं आया . ऐसा बार बार हुआ . घर पर कोई भी नहीं था . कहाँ गए सब लोग मैंने खुद से सवाल किया. मैं सीढिया चढ़ते हुए भाभी के चोबारे की तरफ गया और दरवाजे पर ही मेरे कम ठिठक गए. कमरे का नजारा देख कर मेरा कलेजा मुह को आ गया . अन्दर चंपा की लाश पड़ी थी . रक्त की धारा मैं जंगल में बहा कर आया था , रक्त की धारा मेरे साथ घर तक आ गयी थी . मैंने हाथ लगा कर देखा बदन में गर्मी थी, मतलब ज्यादा समय नहीं हुआ था चंपा को मरे हुए.

“कोई है क्या ” जोर ही चिल्लाया मैं .

“कबीर ” एक घुटी सी आवाज मेरे कानो में पड़ी . ये आवाज रसोई की तरफ से आई थी . मैं वहां गया तो मेरा दिल ही टूट गया . आँखों से आंसू बह चले , कभी सोचा नहीं था की ये देखूंगा मैं . रसोई के फर्श पर भाभी पड़ी थी . बहुत हलके से आँखे खुली थी उनकी. हलके से गर्दन हिला कर उन्होंने मुझे पास बुलाया. दौड़ते हुए मैं लिपट गया भाभी से .

मै- कैसे हुआ ये किसने किया भाभी ये सब . मैं आ गया हूँ कुछ नहीं होगा आपको कुछ नहीं होगा. मैं इलाज के लिए अभी ले चलूँगा आपको . मैंने भाभी को उठाया पर उन्होंने कस कर मेरा हाथ थाम लिया.

भाभी- देर हो गयी है कबीर . वो ले गए उसे .

मैं- कौन भाभी

भाभी- नहीं बचा पाई उसे, धोखा हुआ .देर हो गयी कबीर

मैं- कुछ देर नहीं हुई भाभी मैं आ गया हूँ सब ठीक कर दूंगा

भाभी- निशा को ले गए वो .

भाभी के शब्दों ने मेरे डर को हकीकत में बदल दिया .

मैं- कौन थे वो भाभी

भाभी ने अपने कांपते हाथो से अपने गले में पड़े मंगलसूत्र को तोडा और मुझे दे दिया. मैंने अपनी आँखे मींच ली भाभी ने हिचकी ली और मेरी बाँहों में दम तोड़ दिया. कयामत ही गुजर गयी थी मुझ पर . प्रेम वफ़ा, रिश्ते-नाते सब कुछ बेमानी थे इस परिवार के आगे. मैंने कदम घर से आगे बढाए मैं जानता था की मंजिल कहाँ पर होगी. लाशो के बोझ से मेरे कदम बोझिल जरुर थे पर डगमगा नहीं रहे थे . निशा और भाभी पर हुआ ये वार मेरे दिल में इतनी आग भर गया था की अगर मैं दुनिया भी जला देता तो गम नहीं था.

मैं सोने की खान में पहुंचा मशालो की रौशनी में चमकती उस आभा से मुझे कितनी नफरत थी ये बस मैं ही जानता था . मैंने रक्त से सनी निशा को देखा को तडप रही थी , लटके हुए . उसके बदन से टपकता लहू निचे एक सरोखे में इकट्ठा हो रहा था .

“कबीर ” बोझिल आँखों से मुझे देखते हुए वो बस इतना ही बोली

मैं- कुछ मत बोल मेरी सरकार . मैं आ गया हूँ जिसने भी ये किया है मुझे कसम है तेरे बदन से गिरी एक एक बूंद की, सूद समेत हिसाब लूँगा.

मैं निशा के पास गया और उसे कैद से आजाद किया . अपनी बाँहों में जो लिया उसे दुनिया भर का करार आ गया मुझे .

“सब कुछ योजना के मुताबिक ही हुआ था कबीर , मैंने अंजू को धर भी लिया था पर फिर किसी ने मुझ पर वार किया और होश आया तो मैं यहाँ पर कैद में थी ” निशा बोली

मैं- कुछ मत बोल मेरी जान . मैं आ गया हूँ न सबका हिसाब हो गा . भाभी और चंपा को भी मार दिया गया है . चाची न जाने कहाँ है . और मैं जान गया हूँ की अंजू के साथ इस काण्ड में कौन शामिल है .

निशा- अभिमानु

मैं- हाँ निशा वो अभिमानु जिसकी मिसाले दी जाती है . भाभी को मार कर जो पाप किया है मैंने बरसो पहले अपनी माँ को खोया था आज फिर से मैंने अपनी माँ को खोया है मुझे कसम है निशा रहम नहीं होगा . तुझे छूने की हिम्मत कैसे हुई उनकी .



मैं निशा को वहां से बाहर लेकर गया . कुवे के कमरे में रखी मरहम पट्टी से उसके जख्मो को थोडा बहुत ढका. आसमान में तारो को देखते हुए मैं सोच रहा था की ये रात साली आती ही नहीं तो ठीक रहता पर जैसा मैंने पहले कहा आज की रात क़यामत की रात थी , मैं निशा के जख्मो को देख ही रहा था की एक चीख ने मेरी आत्मा को हिला दिया .
 
मित्रों यदि नींद ना आयी तो आज की रात ठीक होगी. साथ बने रहिए
 
Back
Top