Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 21 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

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अब जबकि कैमरा मेरे हाथ में था तो कहीं न कहीं मुझे बताई गयी बातो में से कुछ तो सच होंगी ही.जिस तरह से इसे छुपाया गया था ये तो पक्का था की कुछ तो बताने वाला था ये मुझे बक्से में कुछ नेगेटिव भी थे जिनमे से जायदा तर की हालत ठीक नहीं लगती थी पर गनीमत थी की कैमरा में रील थी. मैं तुरंत शहर में पहुच गया एक बार फिर मैं राज बुक स्टोर पर खड़ा था .

दूकान वाले ने पहली नजर में ही कैमरा को पहचान लिया , उसकी दूकान से ही ख़रीदा था . ये पक्का होने में देर नहीं लगी की ये महावीर की ही अमानत थी. दुकानदार ने मुझे मदद की , उसके बताये बन्दे के पास मैं नेगेटिव और वो रील लेकर गया. जल्दी से जल्दी मैं उन आने वाली तस्वीरों को देखना चाहता था .

शहर से वापिस आते हुए बार बार मेरे हाथ उस लिफाफे पर जा रहे थे जिसमे वो तस्वीरे थी, कायदे से मुझे शहर में ही खोल कर देख लेना चाहिए था पर मैं चाहता था की कुवे पर ही खोला जाये. जो खेल कुवे पर शुरू हुआ , उस अतीत को वहीँ पर देखने की अजीब इच्छा थी वो. तस्वीरे थी जवान तीन दोस्तों की , खेत में कीचड़ में खेलते हुए. जंगल में पेड़ो पर चढ़े हुए.अटखेलियो की. मैंने उन्हें साइड में रखा दुसरे लाट में महावीर की तस्वीरे थी , लम्बा-तगड़ा मूंछ रखने वाला गबरू. विलायती कपड़ो में खूब जंचता था वो.

मैंने नंदिनी भाभी की तस्वीरे देखि, अंजू की तस्वीरे देखि जंगल के किसी कोने में टहलते हुए. अब तक कुछ ख़ास नहीं था , पर तीसरी रील ने कहानी के असली पन्ने पलटने शुरू किये. मैंने चाचा की तस्वीरे देखि रमा के साथ आपतिजनक अवस्था, में आगे वो कविता के साथ था . पर सरला के साथ उसकी कोई तस्वीर नहीं थी . एक दो तस्वीरों के बाद वो फोटो आई जिसने मुझे हिला कर रख दिया. वो थी चाची की तस्वीरे, चाची की नहाते हुए तस्वीरे. कुछ में उनकी चुचियो को केन्द्रित किया था तो कुछ में पूरी नंगी पर ताजुब ये था की चाची की इन तस्वीरों में से एक भी हमारे घर की नहीं थी सारी तस्वीरे यही इसी कुवे की थी.

मतलब साफ़ था , फोटो खींचने वाले को मालूम था की चाची यहाँ भी नहाती है .अपने हाथो में चाची की नंगी तस्वीरे लिए मैं गहरी सोच में डूबा हुआ था . हो सकता था की महावीर ये कर्म कर रहा हो. जैसा की मुझ को बताया गया था महावीर ही लग रहा था इन सब के पीछे. पर अगली कुछ तस्वीरों ने फिर से मुझे उलझा दिया. कुछ तस्वीरे अंजू की थी , अंजू की नंगी तस्वीरे देखना अजीब , दरसल तस्वीरे अजीब नहीं थी बल्कि ऐसा लगता था की जैसे अंजू जानती हो की कोई उसकी तस्वीरे ले रहा हो.

फिर बारी आई उनकी जो अस्पष्ट थी . जिनके नेगेटिव समय के साथ नहीं चल पाए थे. उन तस्वीरों में भी कोई औरत थी , ये चुदाई की तस्वीरे थी इतना तो समझा जा सकता था पर कौन ये समझना मुश्किल था . साफ़ नहीं थी ऐसे ही उन तस्वीरों को एक के बाद एक देखते हुए एक तस्वीर पर मेरी नजर ठहर गयी . उस कड़े को मैं पहचान गया था ये चांदी का कड़ा मेरे बाप का था . पर औरत कौन थी ये साला मगजमारी का विषय हो गया था .

चंपा ने कहा था की प्रकाश ने उसे चाचा की तस्वीर दिखाई थी माँ को धक्का देते हुए . पर इनमे से वैसी कोई तस्वीर नहीं निकली. मतलब साफ़ था ये कैमरा से वो तस्वीर नहीं ली गयी या फिर उसे हटा दिया गया होगा. अब सवाल ये था की क्या महावीर को बाप की अय्याशी का मालूम था या फिर इसी तस्वीर की वजह से प्रकाश बाप पर दबाव बनाये हुए हो .

शाम ढलने लगी थी , घर जाने से पहले मैंने उन तस्वीरों को छिपाने का सोचा उन्हें रख ही रहा था की कुछ फोटो मेरे हाथ से गिर गयी उन्हें फिर से उठाया ही था की एक तस्वीर पर मेरी नजर पड़ी. ये कैसे अनदेखी रह गयी . घर वापिस लौटते हुए मेरे सर में बहुत तेज दर्द हो रहा था . मैं जाते ही रजाई में घुस गया .

“एक तो सारा दिन गायब थे, और अब आते ही रजाई ओढ़ ली ” ये निशा थी जो मेरे लिए चाय ले आई थी .

मैं- चाय रहने दे, बाम लगा दे सरमे दर्द हुए जा रहा है

निशा- अभी लाती हु.

रजाई ओढ़े ओढ़े ही मैं बैठ गया और निशा मेरे सर पर बाम लगाने लगी.

निशा- देख रही हूँ कुछ परेशान हो ,

मैं- ऐसी कोई बात नहीं

निशा- मुझसे झूठ बोल रहे हो , जानती हूँ की नाराज हो तुम

मैं- तुमसे क्यों नाराज होने लगा भला

निशा- मैंने तुमसे झूठ जो बोला

मैं- मुझे मालूम था की तुम्हे पता थी वो बात .

निशा- ये सच है कबीर की मैं महावीर के कातिल को तलाशती हु. ये भी सच है कबीर की महावीर आदमखोर था ये मालूम था मुझे. मुझे बिलकुल समझ नहीं आया की तुम्हे बताऊ या नहीं क्योंकि अतीत मेरे इस आज को कहीं ख़राब न कर दे. मैं डरती हूँ कबीर अब डरती हूँ .

मैं- मुझे हमेशा से पता था की तुझे मालूम था महावीर ही आदमखोर था , क्योंकि तूने मेरे साथ साथ उसके जख्मो का भी इलाज किया था . तेरा ये विश्वास , ये बता गया था.

निशा- तूने मुझे अपनाया . इतना मान दिया इस दामन को खुशियों से भर दिया . मैं नहीं चाहती थी की अतीत की किसी भी बात से तुझे दुःख हो. ये जानते हुए की मैं पहले किसी और की थी फिर भी तूने इतना इश्क किया मुझसे. मुझे लगा की छिपाना ही ठीक होगा.

मैं- तेरी मेरी डोर इतनी भी कमजोर नहीं मेरी जान . मैं महावीर को जानना चाहता हूँ , बता मुझे वो क्या था कैसा था .

निशा इस से पहले की कुछ कहती , कमरे में किसी के आने की आहट हुई और वो मुझसे अलग हो गयी...................

“ओह, मुझे दरवाजा खड़का कर आना चाहिए था पर क्या करे तुमने कुण्डी भी तो नहीं लगाईं ” अंजू ने अन्दर आते हुए कहा.

हम दोनों मुस्कुरा पड़े.

अंजू- वापिस जा रही थी सोची तुमसे मिलती हुई चलू इसी बहाने तुमको न्योता भी दे दूंगी मेरे घर खाने पर आने का .

निशा- ऐसे कैसे जा रही हो

अंजू- काम भी तो करना है न भाभी, वैसे भी कितने दिन हो गए यहाँ पड़े हुए.

मैं- निशा अब ले आओ चाय

निशा के बाहर जाते ही मैं अंजू से बोला-तुमसे एक जरुरी बात करनी थी

अंजू-किस बारे में

मैंने जेब से अंजू की वो तस्वीरे निकाली और उसके हाथ में दे दी. उसके चेहरे का रंग बदलने लगा.
 
#145



अंजू ने वो तस्वीरे अपने पास छिपा ली और बोली- कहाँ से मिली तुझे ये

मैं- सवाल मेरा होना चाहिए, और वो सवाल है की जब ये तस्वीरे खिंची गयी क्या तुम खींचने वाले को जानती थी . मेरा मतलब है की जाहिर से बात है तुम जानती हो .

अंजू- मैंने पूछा कहाँ से मिली तस्वीरे तुमको

मैं- कुंवे से क्या ताल्लुक है तुम्हारा.

इस से पहले की अंजू कुछ भी कहती निशा चाय लेकर आ गयी. चाय की चुस्कियो के बीच मैं और अंजू जानते थे की मामला इतना भी सीधा नहीं है .इन्सान के लिए सबसे कमजोर लम्हे होते है जब उसे अपने परिवार की बेहयाई का बोझ उठाना पड़ता है , कहने को हसियत बहुत बड़ी थी पर हकीकत में बाप और चाचा ऐसे न लायक लोग थे जिनका बहिष्कार बरसो पहले हो जाना चाहिए था.

छत पर खड़ा मैं इसी उधेड़बुन में था की निशा पीछे से आकर मुझ से लिपट गयी . ठंडी रात में उसकी गर्माहट ने बड़ा सकूं दिया. उसकी गर्म सांसे मेरे कान तपाने लगी.

निशा- क्या परेशानी है सरकार. किस सोच में गुम हो .

मैं- तुमसे क्या ही छिपा है जाना.

निशा- मैं साथ हूँ न तुम्हारे

मैं- एक तेरा ही तो साथ है मेरी जाना.

निशा- एक रात तनहा और हम बेखबर.

निशा की ये बात सुनकर मैं पलटा ,

निशा- क्या हुआ

मैं- क्या कहा तूने जरा फिर से कह

निशा- क्या कहा मैंने

मैं- वो लाइन जो अभी गुनगुनाई तूने

निशा- एक रात तनहा और हम बेखबर.

ये लाइन मैंने कही तो सुनी थी , कहाँ पर मैं सोचने लगा.

निशा- कुछ ओढा भी नहीं तुमने आओ निचे चलते है .

मैं उसके साथ आ तो गया था पर दिमाग में ये लाइन ही घूम रही थी , कहाँ सुनी थी मैंने ये . कहाँ , कहाँ याद क्यों नहीं आ रही . कभी कभी मुझे खुद से कोफ़्त सी होने लगती थी . खैर मैं भैया को खाने के लिए बुलाने गया तो पाया की वो बोतल खोले बैठे थे .

भैया- लेगा क्या थोड़ी .

मैं- हाँ.

मैंने भैया के हाथ से पेग लिया और निचे कालीन पर ही बैठ गया .

भैया- ये मंगू न जाने कहाँ गायब है, कभी कभी तो मुझे समझ ही नहीं आता इस लड़के का . अभी आएगा न तो दो चार लगा ही दूंगा उसे. काम का तो ध्यान ही नहीं है उसको.

कडवा घूँट मेरी हलक में ही अटक गया. मैं कैसे बताता भैया को की वो अब कभी नहीं आएगा.

भैया- कुछ बोल तो सही

मैं- महावीर के जाने के बाद आपकी और प्रकाश की दोस्ती भी टूट सी ही गयी थी क्या कारण था भाई.

भैया- वो महावीर के कातिल को ढूँढना चाहता था , मैं कातिल को छुपाना चाहता था . कई बार वो कहता था की मुझे फ़िक्र ही नहीं की किसने हमारे दोस्त को मार दिया. और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था .

मैं- अंजू प्रेम करती थी उस से .

भैया- प्रेम बड़ा विचित्र शब्द है कबीर. इसे समझना कहाँ आसान है . हर व्यक्ति के लिए इसके अलग मायने होते है .

मैं- फिर भी आपने भाभी से प्रेम किया ये जानते हुए भी की वो किस बीमारी से जूझ रही है .

भैया- प्रेम का शर्ते नहीं होती छोटे, तू भी जानता है इस बात को .

मैंने गिलास खाली किया और निचे आया देखा की सियार आँगन में बैठा है. जैसे ही उसने मुझे देखा मेरे पास आया थोडा लाड करवाने के बाद वापिस से कम्बल पर जाके बैठ गया . एक जानवर भी प्रेम को समझता था फिर ये इन्सान क्यों इतनी बेगैरत फितरत का था. रात को जब मुझे लगा की निशा गहरी नींद के आगोश में है. मैंने कम्बल ओढा और मैं घर से बाहर निकल गया.

मेरे थके हुए कदम मुझे एक बार फिर जंगल की तरफ ले जा रहे थे . एक बार फिर से मेरे सामने दो रस्ते थे एक कुवे पर जाता था एक उस तरफ जहां मुझे मेरी तक़दीर मिली थी . तालाब के पानी को हथेली में भर कर जो होंठो से लगाया मैंने, ऐसा लगा की बर्फ उतर गयी हो मेरे सीने में . खंडहर हमेशा की तरह ख़ामोशी से खड़ा था .

“बता क्यों नहीं देते तुम क्या दास्ताँ है तुम्हारी ” मैंने उस इमारत से पूछा.

एक बार फिर मैं उन अजीब से निशानों को देख रहा था जिन्होंने मुझे उन दो कमरों को दिखाया था . अंजू ने पहली ही मुलाकात में मुझे वो लाकेट दिया था जिसे वो बरसो से पहनती थी .उसी लाकेट से मैंने वो छिपे हुए कमरे ढूंढे. क्या अंजू भी जानती होगी उन कमरों के बारे में. क्या अंजू की पहले से ही नजर थी मुझ पर. हो सकता है की वो जानती हो मेरी और निशा की गुमनाम मुलाकातों के बारे में. इस जंगल में मैं अकेला भटकता था ये वहम तो मेरा कब का मिट गया था .

मुझे याद आया की कैसे मेरे सीने पर हाथ फिराते हुए उस लाकेट को देख कर निशा चौंक गयी थी . इसका मतलब साफ़ था की अंजू जानती थी मेरे और निशा के बीच बढ़ रही नजदीकियों को . निशा के आलावा अंजू ही वो सख्शियत थी जो खंडहर में आती-जाती थी तो फिर निशा को उसकी आमद क्यों महसूस नहीं हुई. अगर अंजू मुझे वो कमरे दिखाना चाहती थी तो क्या मकसद था उसका.

कभी लगता था की इस खेल की डोर पास ही है मेरे अगले पल लगता था की कोई डोर है ही नहीं. महावीर को तीन लोग सबसे ज्यादा जानते थे, निशा-अंजू -भैया. दो की राय में वो बुरा बन गया था तीसरी उसे आज भी मानती थी . इस चुतियापे में एक चीज पर मैंने बिलकुल ध्यान नहीं दिया था वो था रुडा और राय साहब का रिश्ता. क्या थी सुनैना. दो चौधरियो से उसका इतना नाता तो फिर क्यों उसे सम्मानजनक समाधी नसीब हुई. कच्चे पत्थर ही थे क्या उसका नसीब.



जंगल में चलते हुए मैं सुनैना की समाधी से थोडा ही दूर था की उस तरफ जलती एक लौ ने मुझे इशारा कर दिया की मैं अकेला नहीं हूँ . दबे पाँव मैं जब वहां पहुंचा , पेड़ो की ओट से मैंने देखा की वहां पर उन पत्थरों के पास कोई बैठा है .
 
# 146



आंच की तपत को ना जाने क्यों मैंने उस दुरी से भी महसूस कर लिया. आगे बढ़ते हुए मैं समाधी के पास गया और उस शख्श के पास जाकर बैठ गया .

“ठण्ड कुछ ज्यादा ही है न आज ” मैंने आंच की तरफ अपने हाथ किये.

“इतनी भी नहीं की बर्फ पिघल जाये ” चौधरी रुडा ने कहा.

मैं-कब तक आपके सीने में जमी रहेगी ये बर्फ, माना की जख्म पुराना है पर मरहम की कोशिश तो कर ही सकते है न . ये दर्द ही तो है जो मुझे आपसे जोड़ता है . ये दर्द ही तो है जो उस दिन पुराणी रीत तोड़ते हुए आपने निशा का हाथ मेरे हाथ में दिया.

रुडा- क्योंकि तुम लायक थे उसके. क्योंकि उस दिन मैंने तुमको नहीं पैंतीस साल पहले के रुडा को देखा , जवानी मे मैंने कोशिश की थी रीत बदलने की . समाज कोई बहुत बढ़िया चीज नहीं होती कबीर, समाज बेडियो के सिवा कुछ नहीं, जो हमें कभी आगे नहीं बढ़ने देती.

चौधरी रुडा ने समाधी के पत्थरों पर हाथ फेरा और बोला- इस से बेहतर हक़ था उसका .

मैं- आप बहुत चाहते थे न सुनैना को

रुडा- मैं आज भी चाहता हूँ उसे. मरते दम तक चाहता रहूँगा उसे.

मैंने आंच को अपने सीने में उतरते हुए महसूस किया.

मैं- कैसी थी वो

रुडा- अलबेली, अनोखी. ये जंगल न जाने अपने अन्दर क्या क्या छिपाए हुए है उसी कुछ में कुछ लम्हे हमारे भी है .जब वो हंसती थी जंगल मुस्कुराता था . जब वो गाती थी आसमान तक झूम जाता था . सबसे अलग. सबसे बेगानी. बहुत कहती थी वो मुझसे, रुडा मत चल इस पथ पर , प्रेम का पथ बड़ा मुश्किल

मैं- और आप क्या कहते थे .

रुडा-बस इतना की तु जो नहीं तो फिर कुछ भी नहीं .

मैं- इस जंगल ने दो लोगो की दोस्ती भी देखि है ऐसा सुना मैंने.

रुडा- दोस्ती , क्या बताऊ तुमको कबीर की क्या होती है दोस्ती.

मैं- फिर भी मैं उस दोस्ती की कहानी सुनना चाहता हूँ जो खो सी गयी है इस जंगल में . मैं आपसे त्रिदेव की असली कहानी सुनना चाहता हूँ.

रुडा- तो तुमने मालूम कर लिया

मैं- नहीं, बस अंदाजा लगाया.

रुडा- जैसा की तुम जानते हो मैं और बिशम्भर बचपन के दोस्त थे. एक थाली में खाना, उसके बिना मैं नहीं मेरे बिना वो नहीं. जवानी के जोश से भरपूर दो नो जवान जिन्होंने वो करने का सोचा जिसके बारे में कोई भी नहीं सोच सकता था .पढाई की किसे फ़िक्र थी . दिन रात हम जंगल में भटकते. न जाने क्यों हमें इतना लगाव था इस जंगल से मैं आज भी नहीं जानता. फिर हमें मिली सुनैना , तालाब किनारे पशुओ को पानी पिलाते हुए देखा जो उस को बस देखता ही रह गया. डेरे की लड़की थी वो .

तुमने दोस्ती की बात की , दोस्ती . दोस्ती ही तो थी जो डेरे की लड़की बिना किसी भय के हमारे साथ दिन रात रहती थी . मैं रोज जाता उसे देखने के लिए. वो रोज आती बकरियों को पानी पिलाने के लिए . हथेली में भर कर पानी को होंठो से लगाती, उसे रोज मालुम होता की मैं उसे देखता हूँ , पर ना वो कुछ कहती न मैं कुछ कहता. ऐसी ही दोपहर थी जब मैं उसे देखने में इतना खो गया था की कुछ ख्याल ही नहीं रहा , पर उसकी नजरबराबर थी मुझ पर , घात लगाये तेंदुए के हमले से बचाया उसने मुझे. वो पहली बार था जब हमने उस से बात की. एक बार जो सिलसिला शुरू हुआ फिर रुका ही नहीं .

हम तीनो हमउम्र ही थे,नए नए विचार हमें बहुत आंदोलित करते. बिशम्भर किताबे बहुत पढता था . उसे हमेशा लगता था की प्राचीन जगहों के अपने राज होते है .इतिहास का शोकीन मेरा दोस्त, उसका ये विश्वास की हर जगह की अपनी कोई कहानी होती है उसे बल दिया सुनैना ने डेरे में टोने का काम बहुत होता था . डेरे का मान भी बहुत था .लोगो की बहुत सी बिमारी डेरे की भभूत से ठीक हो जाती. हम मगन थे , अपनी बातो में अपनी हरकतों में पर कब तक रहता ये दिल के किसी कोने से बार बार आवाज आती की सुनैना भाने लगी है. साथ होते हुए भी मैं बेगाना होने लगा था . महकने लगी थी इस जंगल की फिजाए उस अहसास से.

एक शाम हम तीनो ऐसे ही तालाब के पास खंडहर में बैठे थे तो सुनैना ने कहा की उसे मालूम हुआ की जंगल में कुछ छिपा है . कुछ ऐसा जो जिन्दगी बदल सकता है . बिशम्भर ने पूछा तो सुनैना के बताया की पक्के तौर पर तो नहीं पर उसने इतना ही सुना की कुछ छिपा है जंगल में .

रुडा- क्या तुम भी सुनैना , बिशम्भर की बातो को जायदा पक्का ही समझ लिया है तुमने.

सुनैना- नहीं रुडा, डेरे में बड़े लोगो की बाते सुनी मैंने, वो कभी झूठ नहीं बोलते

बिशाभर- क्या हो सकता है वो

सुनैना- तुम यकीन नहीं करोगे

रुडा- ऐसा भला या हो सकता है

सुनैना- सोना

सुनैना ने अपने चुन्नी का कोना खोला और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा हमारे सामने रख दिया. खालिस सोने का टुकड़ा. मेरी और बिशम्भर की आँखे बाहर ही आ गिरी थी. पर सवाल ये था की सोना कहाँ पर छिपा है और उसे कैसे बहार निकाला जा सकता है.

सुनैना- मैं लाऊंगी उस सोने को बाहर और अगर हम इसमें कामयाब हुए तो हम उस सोने को इस्तेमाल नहीं करेंगे. बस देखेंगे और वापिस रख देंगे.

हम दोनों ने उसकी हाँ में हां मिलाई वैसे भी हमें कोई कमी तो थी नहीं . और लालच का तो सवाल ही नहीं था . ढाई साल तक हम लोग दिन रात एक कर इस जंगल में भटकते रहे. इस बीच प्रेम का अंकुर फूट पड़ा . मैंने सुनैना से वादा किया की उसे अपनी बना कर ले जाऊंगा. एक रात घनघोर ठण्ड में ओस से भीगे हम लोग बस उसे ही देख रहे थे जो अपने टोने में खो सी गयी थी . और फिर हमने करिश्मा होते देखा. सुनैना ने एक गड्ढा खोदा. गड्ढा सुरंग में बदलता गया और जब वो सुरंग खत्म हुई तो आँखों ने सामने जो देखा , मानने से इनकार कर दिया. सोने का विशाल भंडार हमारी आंखो के ठीक सामने थे .

पर कहते है न की उस चीज का ख्याल नहीं करना चाहिए जो आपकी न हो. इतना सोना देख कर हम तीनो अपनी खाई उस कसम को भूल गए . हमने उस सोने के तीन हिस्से करके उस पर अपना अधिकार करना चाहा और जिन्दगी बदल गयी .................
 
इस कहानी की लोकेशन मैंने अपनी बाड़मेर वाली जमीन से ली, हवेली खेती की जमीन कुवां और कुछ एकड़ मे फैला जंगल. उम्मीद है कि अब जिंदगी किसानी करते हुए ठीक से कटेगी
 
अपडेट में देरी के लिए माफी चाहूँगा कुछ तो पहुंचने मे देर हुई कुछ साफ़ सफाई मे समय लग गया. उम्मीद है कि आज शाम महफिल लगे
 
अपडेट मे देरी के लिए माफी चाहूँगा कुछ तो लेट पहुंचा कुछ समय साफ़ सफाई मे बीत गया. रिमोट एरिया की अपनी परेशानियां अलग से. उम्मीद है कि आज शाम से अपडेट नियमित हो जाएंगे. बिजली चालू और तार बंदी ये काम भी जल्दी ही ही जाए तो चैन मिले
 
#147



“फिर क्या हुआ ” मैंने थोड़ी अधीरता से पूछा

रुडा- तुम्हे क्या लगता है वो सोना कहा होगा

रुडा मेरे मन की थाह लेना चाहता था .

मैंने ख़ामोशी से समाधी के पत्थर हटाये और वो मिटटी का कलश निकाल लिया

रुडा ने उसे देखा लौ की रौशनी में टिमटिमाती पीली चमक क्या ही कहने .

रुडा- ये कलश चेतावनी थी , पर किसे समझ थी चढ़ती उम्र बड़ी दुस्सहासी होती है . नियति की चेतावनी की इस पर ही मान जाओ आगे का पथ बड़ा कठिन होगा. पर किस को परवाह थी . कीमत, किसने सोचा होगा की क्या कीमत होगी उस चीज को लेने की जो तुम्हारी नहीं है .

मैं- और क्या थी वो कीमत

रुडा- बड़े बेसब्रे हो तुम कबीर. अभी तो बात बाकि है ये रात बाकी है . कौन समझ सकता है की कर्मो के लेख कैसे चुकाए जाते है . कीमत जरुरी नहीं थी की रूपये-पैसो में ही चुकाई जाये, हमारे मामले में वो कीमत थी रिश्ते जो टूटते गए. बिशम्भर को जैसे जूनून हो गया था . सुनैना और वो दोनों बहुत वक्त साथ बिताने लगे थे. उनके साथ दिन रात होकर भी उनके साथ बेगाना होने लगा था मैं. उन दोनों का जूनून हमारी दोस्ती की नींव कमजोर कर रहा था .

साथ होकर भी साथ नहीं रहना इस से बड़ा दर्द कोई नहीं . बेशक मैं और सुनैना प्रेम पथ पर चल रहे थे , पर इस सोने ने उस पथ को तहस नहस करना शुरू कर दिया था . एक दिन अचानक बिशम्भर गायब हो गया .

मेरे लिए ये नयी जानकारी थी .

मैं- गायब मतलब

रुडा- गायब , कोई खबर नहीं उसकी , मैंने और सुनैना ने दिन रात एक कर दिया कोई कोना नहीं , कोई दिशा नहीं जहाँ पर उसकी तलाश नहीं की . मेरे प्यार की जानकारी डेरे में हो गयी थी . और मेरे घर पर भी . दोनों तरफ के लोग गुस्सा थे. लोग कहा समझते उस समय की प्रेम क्या होता है . एक बिशम्भर की चिंता दूसरी फ़िक्र अपनी मोहब्बत को पाने की . पर ये तो शरूआत थी कहानी तो बहुत बाकि थी .

मैं- कैसी शुरुआत.

रुडा- सुनैना पेट से हो गयी . ख़ुशी तो बहुत थी की हमारे प्यार की निशानी इस दुनिया में आने वाली थी . पर परेशानी ये थी की उस प्यार को कोई भी नहीं समझ पा रहा था . मेरे बाप की झूठी शान मेरे पैरो का बंधन बन् रही थी पर मैंने वादा किया था सुनैना से की हाथ कभी नहीं छुटेगा उसके हाथ से. दिन बीत रहे थे . सबको मालूम हो गया था की सुनैना के पेट में मेरी औलाद पल रही है. डेरे वाले हमारे घर आये और इंसाफ की मांग करने लगे. कुंवारी लड़की का गर्भवती होना ऐसा पाप था जिसका कोई प्रयाश्चित नहीं था . लगा की जब सारे रास्ते बंद हो गए तब उम्मीद की लौ फूटी बिशम्भर लौट आया. हमारी ढाल बन कर खड़ा हुआ वो .

मैंने बाप की हवेली छोड़ दी. मामला बहुत गर्म था पर हम दिन काट रहे थे . एक रोज़ मेरा बाप आया और बोला की उसे मेरा और सुनैना का रिश्ता मंजूर है , मेरे लिए इस से बड़ी ख़ुशी और क्या होती. बाप ने मुझे किसी काम से बाहर भेजा. मैने मेरे लौटने तक सुनैना की जिम्मेदारी बिशम्भर को दी. पर जब मैं लौट कर आया तो ............

कुछ पलो के लिए गहरा सन्नाटा छा गया .

मैं- और जब आप लौट कर आये तो .

रुडा- दुनिया बिखर चुकी थी . सुनैना पर हमला हुआ था समाज के ठेकेदारों ने उसे मार डाला.

रुडा के कहे ये शब्द , इन शब्दों में इतनी वेदना थी की मैंने अपने कलेजे को जलते हुए महसूस किया.

मैं- राय साहब ने अपना वचन नहीं निभाया सुनैना की रक्षा करने का.

रुडा- उसे जो ठीक लगा उसने वो किया

मैं- ऐसा क्या किया था पिताजी ने .

रुडा- जब सुनैना पर हमला हुआ तो उसे प्रसव वेदना शुरू हो गयी . बिशम्भर बहुत घबरा गया था . उसे हमला भी रोकना था और सुनैना को बचाना भी था . वो घायल थी और प्रसव की तकलीफ में भी . जब तक बिशम्भर उसके पास पहुंचा हालात और बिगड़ गए थे . उसने सुनैना का प्रसव करवाया , जरुरी इंतजाम नहीं थे, खून ज्यादा बह गया . सुनैना की मौत हो गयी . वो तो चली गयी पर अपनी निशानी छोड़ गयी .

मैं- अंजू

रुडा- अंजू . जो कभी नहीं समझ पायी की बाप होना क्या होता है .

मैं - फिर क्या हुआ

रुडा- एक रात डेरा तबाह हो गया. कैसे, किसने किया आज तक कोई नहीं जान पाया. एक रात क़यामत आई और अपने साथ डेरे को ले गयी.

मैं- उसी दौरान आपके पिता की भी मृत्यु हो गयी.

रुडा- कोई नहीं जान पाया वो कैसे मरे, इसी जंगल में लाश पायी गयी उनकी .

मैं-दो दोस्तों में दुरी आने की असली वजह क्या थी .

रुडा- लालच और हवस. विशम्भर जब से लौटा था वो पहले जैसा नहीं रहा था , वो मेरा दोस्त नहीं रहा था . रिश्ते-नाते उसके लिए बेगाने हो गए थे .उसे न जाने किस चीज की तलाश थी . अकेले रहने का कैसा जूनून था उसे. और फिर वो दौर आया जब आसपास के इलाके में लोग गायब हो ने लगे. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था . जंगल पहली बार सुरक्षित नहीं था . कुछ दिन गुजरते फिर कुछ दिन रक्त का तांडव मच जाता. मुझ पर गाँव की जिमेदारी थी , मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की . पर जिस बात ने मुझे सबसे जायदा परेशान किया हुआ था वो थी की जब जब मैं जंगल में घुमती मौत के पास पहुंचे को होता ही था तब तब बिशम्भर मिल जाता मुझे . एक समय के बाद मुझे भी लगने लगा था की बिशम्भर जानता था उस आफत के बारे में . वो कुछ तो मुझसे छिपा रहा था . हमारा झगडा इसी बात को लेकर हुआ था . ऐसा क्या था जो वो मुझसे छिपा रहा था . बताना नहीं चाहता था वो मुझसे.

मैं- क्या छिपा रहे थे वो आपसे .

रुडा- पता नहीं , पर उस झगडे के बाद जंगल शांत हो गया . बहुत साल वो शांत रहा पर इस साल से वो सब दुबारा होने लगा.

मैं- क्या आपको मालूम है की सोना कहा है.

रुडा-वो सोना नहीं श्राप है किसी को भी नहीं जानना चाहिए वो कहा है .

मै समझ गया रुडा जानता था उस जगह के बारे में .

मैं- आप तीनो की आलावा भी उस सोने की उपस्तिथि को कोई और भी जान गया था .

रुडा- जिसने भी वो सोना चुराया चैन नहीं पाया. कबीर, मैं तुमसे भी यही अपेक्षा करूँगा की तुम चाहे जो करना उस सोने का लालच मत करना.

मैं- बस दो सवाल और . पहला डेरा कहाँ था मुझे वो जगह देखनी है दूसरा सवाल रमा क पति को क्यों मारा आपने...................
 
#148



“इस तरह देखने की जरुरत नहीं है चौधरी साहब , जब सबके नकाब उतर रहे है तो आपका चेहरा कैसे बच जायेगा. माना की रात बहुत लम्बी हुई पर सुबह की एक किरण बहुत होती है रात के अँधेरे को चीरने के लिए. रमा के पति को क्यों मारा ” मैंने सवाल किया.

रुडा- मैं, भला मैं क्यों मारूंगा उसे.

मैं- ये तो आप जानते है . मुझे तो बस इतना मालुम है की उसको आपने मारा क्यों मारा ये बता कर आप मेरी उत्सुकता खत्म कर सकते है .

रुडा- उसे एक बिमारी थी , वही बीमारी जो तुमको है . जरुरत से ज्यादा जानने की बिमारी. उसकी गांड में एक कीड़ा कुलबुला रहा था . ये जंगल इसमें कुछ भी छिपाना ना मुमकिन है उस चूतिये का लालच . क्या ही कहे . रमा की कीमत चाहिए थी उसे और कीमत क्या मांगी उसने हिस्सेदारी हम से हिस्सेदारी. हम से कबीर. हमारे टुकडो पर पलने वाले हमारे बराबर बैठने की बात करे लगे थे . सोना चाहिए था उसको , सोना . साला दो कौड़ी का नौकर हमने उसे सोना दिया. सदा के लिए सुला दिया उसे.

मैं-पर कोई था जिसने उस क़त्ल को होते हुए देखा.

रुडा- आंह ,जैसा हमने कहा ये दुनिया चुतियो से भरी है . महावीर . उसको भी यही बीमारी थी जो तुमको है दुसरो के मामलो में नाक घुसना , क्या कमी थी उसको . जवान था मौज करता. पर उसे जंगल का सच जानना था वो सच जिसे छुपाते छुपाते हमारी जुती घिस गयी . न जाने लोग क्यों नहीं समझते की जिन्दगी कोआज में जीना चाहिए . जब मैं तुमको देखता हूँ न तो मुझे कभी भी तुम नहीं दिखे कबीर, मैंने हमेशा महावीर को देखा. किसी ने तुम्हे नहीं बताया होगा पर मैं तुम्हे बताता हूँ वो तुम सा ही था . उसके सीने में दिल था जो धडकता था अपने लोगो के लिए.

सवाल बहुत करता था वो . मैंने क्या नहीं दिया उसे पर उस चूतिये को शौक था ऊँगली करने का . न जाने कैसे उसने सोने के राज को मालूम कर लिया था . चलो ठीक था इतना भी हमारे बाद हमारी औलादों को ही काम आता वो .

मैं ख़ामोशी से रुडा को देख रहा था कुछ पल पहले वो मुझे दर्द भरी कहानी सूना रहा था और मेरे एक सवाल ने उसके चेहरे पर पुते रंग को बहाना शुरू कर दिया था

मैं- महावीर को सोना नहीं चाहिए था कभी भी .

रुडा- सही समझे तुम . जानता था की तुम समझोगे इस बात को

मैं- महावीर की दिलचस्पी कभी नहीं थी सोने में. उसे तलाश थी किसी की

रुडा- उसे तलाश थी कातिल की

मैं- सुनैना के कातिल की . मुझे लगा ही था . मैंने सोचा था इस बारे में पर कड़ी अब जाकर जुडी है . कड़ी थी सुनैना और उसके बच्चे उस रात सुनैना को एक नहीं दो औलाद पैदा हुई थी . महावीर सुनैना का बेटा था .

न जाने क्यों मेरे पैरो तले जमीं खिसकने लगी थी . क्योंकि इस सच ने तमाम लोगो को कटघरे में खड़ा कर दिया था . महावीर को साजिश के तहत मारा गया था तो उस साजिश में भैया, भाभी और अंजू भी शामिल थे. इतना कमजोर मैंने पहले कभी नहीं महसूस किया था खुद को. सच के आखिर कितने रूप हो सकते है

रुडा- सच , कबीर, सच , अपने आप में अनोखा अप्रतिम . सच से खूबसूरत कुछ नहीं सच से घिनोना कुछ नहीं. महावीर को मालूम हो गया था की उसकी माँ का कातिल कौन है . रिश्तो के बोझ से दबा वो बदहवास भटक रहा था और फिर उसने मुझे रमा के पति को मारते हुए देखा, उसका सब्र टूट गया. और ना चाहते हुए भी मुझे वो फैसला लेना पड़ा जिसकी वजह से आज हम दोनों यहाँ पर है .

मैं- महावीर के क़त्ल का फैसला

रुडा- क्या करे, दुनियादारी असी ही चीज है

मैं- पर कैसे. उसे तो ...

“उसे तो किसी और ने घायल किया था . जंगल में घायल पड़ा था वो . कमजोर सांसे लड़ रही थी जिन्दगी से . गोलियों के घाव गहरे थे . उसी दोपहर उसकी और मेरी लड़ाई हुई थी . बदहवासी , बेखुदी में बस वो निशा को पुकारे जा रहा था . वो उसे बताना चाहता था कुछ

मैं- क्या बताना चाहता था .

रुडा- डायन , महावीर के अंतिम शब्द डायन थे.जानता है कबीर कोई भी आज तक उसके कातिल को क्यों नहीं तलाश कर पाया.

मैं- क्योंकि कोई नही जानता की उसका कातिल उसका बाप है.

मेरे ये शब्द मेरे गले की फांस बन गए, मेरी आँखों से आंसू बह चले. बेशक महावीर मेरा कुछ नहीं लगता था पर फिर भी मेरे मन में संवेदना थी उसके लिए. एक पल के लिए मेरे और रुडा के दरमियान बर्फ सी जम गयी . इन्सान से घटिया और कोई जानवर नहीं . मैं दो पल के लिए अपने ख्यालो में खो गया और जब होश आया तो मेरे बदन में कुछ नुकीला सा घुस चूका था . दर्द को मैंने बस महसूस किया . कुछ बोल नहीं पाया.

“जानता है महावीर के कातिल को कोई भी नहीं तलाश कर पाया क्योंकि कोई जान ही नहीं पाया . तूने जाना अब तू भी नहीं रहेगा. ये राज तेरे साथ ही दफन हो जायेगा ” रुडा ने चाकू को दुबारा से मेरे पेट में घुसेदा.

मैं कुछ भी नहीं बोल पाया अचानक से हुए हमले ने मुझे स्तब्ध कर दिया था . मैं समाधी के पत्थरों पर गिर गया .

रुडा- जैसा मैंने कहा दुनिया चुतियो से भरी है , तू उन चुतियो का सरदार है . क्या नहीं मिल रहा था तुझे. यहाँ तक निशा भी दी तुझे सोचा की उसके साथ जी लेगा तू पर तुझे तो सच जानना था , देख सच , सच ये है की तू मरने वाला है तेरी लाश कहाँ गायब हो गयी कोई नहीं जान पायेगा.

रुडा ने अबकी बार मेरे सीने पर धार लगाई चाक़ू की . और मेरी आवाज गले से बाहर निकली.

“निशा ” मेरे होंठो से ये ही पुकार निकली.

रुडा- कैसा अजीब इतीफाक है न ये, तू भी निशा को ही पुकार रहा है . मोहब्बत भी साली क्या ही होती है हम तो कभी समझ ही नहीं पाए इस बला को . हमें तो चुदाई से ही फुर्सत ना मिली और तुम हो के साले मरने को मर रहे हो फिर भी इश्क का भूत नहीं उतर रहा.

“मैं नहीं मरूँगा रुडा , मुझे जीना है मेरी जान के साथ मुझे जीना है निशा के साथ . ” मैंने पूरी ताकत लगाई और रुडा को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश करने लगा. पर कामयाब नहीं हो पाया.

रुडा ने दो थप्पड़ मारे मुझे और बोला-बस जल्दी ही तू इस दर्द से आजाद होकर हमेशा के लिए सो जाएगा.



रुडा के मजबूत हाथ मेरा गला दबाने लगे . मैं हाथ पाँव तो पटक रहा था पर जोर नहीं चल रहा था और जब लगा की सांसो की डोर अब टूट ही गयी . मेरे मन के अन्दर सोया जानवर जाग ही गया था की तभी मैंने रुडा पर अपने सियार को छलांग लगाते हुए देखा. और अगले ही पल रुडा की पीठ पर एक जोर का लट्ठ पड़ा . रुडा जमीं पर गिर गया .
 
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