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मैडम रुखसाना के वासना से भरे चक्रव्यूह से बाहर निकलकर राज जब अपने अपार्टमेंट पहुँचा, तो सुबह के चार बज रहे थे। उसका जिस्म बुरी तरह से थका हुआ था, लेकिन उसका दिमाग़ किसी रेस के घोड़े की तरह दौड़ रहा था।
रुखसाना के साथ जो हुआ, वह एक सौदा था, एक ज़रूरी गंदगी जिसमें उसे उतरना पड़ा। लेकिन उस सौदे ने उसे उसके शिकार के और क़रीब पहुँचा दिया था - विक्रम सिंह राठौड़।
राज ने दरवाज़ा खोला और सीधा शॉवर के नीचे जाकर खड़ा हो गया। वह गर्म पानी को अपने जिस्म पर बहने देता रहा, जैसे वह सिर्फ़ रुखसाना के इत्र की महक को ही नहीं, बल्कि उस पूरी रात के एहसास को भी अपने ऊपर से धो डालना चाहता हो। रुखसाना एक ज़हरीले फूल की तरह थी, खूबसूरत, नशीली, लेकिन जानलेवा। राज जानता था कि वह इस खेल में सिर्फ़ एक प्यादा था, असली खिलाड़ी तो राठौड़ था।
शॉवर से निकलकर उसने कॉफ़ी का एक बड़ा मग बनाया और अपने लैपटॉप पर बैठ गया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसने विक्रम सिंह राठौड़ का नाम इंटरनेट पर खोजना शुरू किया।
कुछ फ़िल्मी पार्टियों की तस्वीरें और दो-चार बिज़नेस आर्टिकल के अलावा कुछ ख़ास नहीं मिला। पब्लिक में उसकी छवि एक अमीर और सफल फ़िल्म फाइनेंसर की थी। लेकिन राज जानता था कि असली कहानी इन चमकते हुए पन्नों के पीछे छिपी थी।
उसने अपने कुछ पुराने संपर्कों को फ़ोन लगाना शुरू किया। पहला फ़ोन उसने 'नक़वी' को किया, जो एक क्राइम रिपोर्टर था और अंडरवर्ल्ड की हर छोटी-बड़ी ख़बर रखता था।
"नक़वी, राज बोल रहा हूँ।"
"हाँ, जासूस, बोल। इतनी सुबह कैसे याद किया? कोई नई लाश मिली है क्या?" नक़वी की आवाज़ में हमेशा एक तरह की सनसनी रहती थी।
"लाश तो नहीं, लेकिन एक ज़िंदा शैतान के बारे में जानना है। विक्रम सिंह राठौड़।"
फ़ोन पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। "राज, किस पचड़े में पड़ गया है तू? उस आदमी का नाम लेना भी ख़तरनाक है। उसके हाथ बहुत ऊपर तक हैं... पॉलिटिक्स, पुलिस, अंडरवर्ल्ड... हर जगह। उसे कोई छू नहीं सकता।"
"उसका पनवेल वाला फार्महाउस... उसके बारे में क्या जानते हो?"
"उसे राठौड़ का 'किला' कहते हैं," नक़वी ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।
"परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुना है, उसके सारे काले धंधे वहीं से चलते हैं। नई लड़कियाँ, ड्रग्स, सब कुछ। लेकिन आज तक कोई सबूत नहीं मिला। जो भी ज़्यादा जानने की कोशिश करता है, वह... गायब हो जाता है।"
नक़वी से बात करके यह तो साफ़ हो गया था कि फार्महाउस पर सीधे हमला करना बेवकूफ़ी होगी। राज को और जानकारी चाहिए थी।
वह अभी अपनी अगली चाल सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी सुबह कौन हो सकता था? उसने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी पुरानी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ा।
"कौन है?"
कोई जवाब नहीं आया। बस दोबारा दस्तक हुई, इस बार और ज़ोर से।
राज ने एक गहरा साँस लिया और एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया।
सामने दो भीमकाय आदमी खड़े थे। दोनों ने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट पहनी हुई थी। उनके चेहरे भावहीन थे और आँखें किसी मुर्दे की तरह ठंडी।
"राज शर्मा?" एक ने पूछा। उसकी आवाज़ पत्थर जैसी थी।
"हाँ, कहिए।"
"तुम्हारे लिए एक पैग़ाम है," दूसरे ने कहा और बिना किसी चेतावनी के एक ज़ोरदार घूँसा राज के पेट में मारा।
राज दर्द से दोहरा हो गया। इससे पहले कि वह सँभल पाता, दोनों उस पर टूट पड़े। राज ने अपनी फ़ौजी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए जवाबी हमला किया। उसने एक को लात मारकर गिरा दिया, लेकिन दूसरा ज़्यादा ताक़तवर था। उसने राज को पकड़ लिया और पहले वाले ने उसके चेहरे पर कई घूँसे मारे।
यह लड़ाई ज़्यादा देर नहीं चली। उनका मक़सद राज को मारना नहीं, सिर्फ़ डराना था। उन्होंने राज को ज़मीन पर गिरा दिया।
"राठौड़ साहब के मामलों से दूर रहो," पहले वाले ने ज़मीन पर पड़े राज के ऊपर झुककर कहा। "यह पहली और आख़िरी चेतावनी है। अगली बार बात करने के लिए तुम्हारी ज़ुबान नहीं होगी।"
यह कहकर वे दोनों ऐसे चले गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।
राज ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। उसके होंठ से ख़ून बह रहा था और उसके पेट और पसलियों में तेज़ दर्द हो रहा था। उसका छोटा सा अपार्टमेंट तहस-नहस हो चुका था। ख़तरा अब सिर्फ़ एक आहट नहीं था, वह उसके दरवाज़े पर दस्तक देकर, उसे ज़ख़्मी करके जा चुका था।
अपमान और ग़ुस्से की एक लहर उसके जिस्म में दौड़ गई। दर्द से ज़्यादा उसे इस बात का गुस्सा था कि कोई उसके घर में घुसकर उसे इस तरह पीट गया। उसे इस दर्द, इस ग़ुस्से को बाहर निकालने के लिए एक ज़रिया चाहिए था।
उसने काँपते हाथों से अपना फ़ोन उठाया और एक नंबर मिलाया।
"हैलो?" दूसरी तरफ़ से एक नींद भरी, मीठी आवाज़ आई।
"कामिनी," राज की आवाज़ दर्द से कराह रही थी। "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"
घंटे भर के अंदर कामिनी राज के अपार्टमेंट में थी। दरवाज़ा खुला पाकर और अंदर की हालत देखकर वह एक पल के लिए सहम गई। फिर उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे राज पर पड़ी। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँख के पास नीला पड़ गया था और वह अपनी पसलियों को पकड़कर बैठा था।
"हे भगवान, राज! यह सब क्या है?" वह भागकर उसके पास आई।
"कुछ नहीं। बिज़नेस का एक छोटा सा साइड इफ़ेक्ट," राज ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन दर्द से उसके चेहरे पर शिकन आ गई।
कामिनी का चेहरा चिंता और एक अजीब से उत्साह के मिले-जुले भाव से भर गया। उसे राज की यह ख़तरनाक दुनिया एक तरफ़ तो डराती थी, लेकिन दूसरी तरफ़ उसे अपनी ओर खींचती भी थी।
"रुको, मैं फर्स्ट-एड बॉक्स लाती हूँ," यह कहकर वह अंदर भागी।
वह वापस आई तो उसके हाथ में डिटॉल, रुई और मरहम की ट्यूब थी। वह किसी नर्स की तरह उसके सामने बैठ गई।
"शर्ट उतारो," उसने आदेश दिया।
राज ने दर्द से कराहते हुए अपनी शर्ट उतारी। उसकी छाती और पसलियों पर नीले-काले निशान पड़ गए थे।
"उफ़... इन लोगों ने तुम्हें बहुत बुरी तरह पीटा है," कामिनी ने धीरे से एक निशान पर अपनी उँगली फिराते हुए कहा।
उसका स्पर्श रुई से भी ज़्यादा मुलायम था।
उसने रुई को डिटॉल में डुबोया और बहुत धीरे-धीरे उसके होंठ के घाव को साफ़ करने लगी। डिटॉल की जलन से राज की आँखों में पानी आ गया, लेकिन कामिनी का चेहरा इतना क़रीब था कि उसे जलन से ज़्यादा एक अलग तरह का नशा महसूस हो रहा था। कामिनी की गर्म साँसें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं और उसकी आँखों में राज के लिए एक गहरी हमदर्दी और चाहत थी।
रुखसाना के साथ जो हुआ, वह एक सौदा था, एक ज़रूरी गंदगी जिसमें उसे उतरना पड़ा। लेकिन उस सौदे ने उसे उसके शिकार के और क़रीब पहुँचा दिया था - विक्रम सिंह राठौड़।
राज ने दरवाज़ा खोला और सीधा शॉवर के नीचे जाकर खड़ा हो गया। वह गर्म पानी को अपने जिस्म पर बहने देता रहा, जैसे वह सिर्फ़ रुखसाना के इत्र की महक को ही नहीं, बल्कि उस पूरी रात के एहसास को भी अपने ऊपर से धो डालना चाहता हो। रुखसाना एक ज़हरीले फूल की तरह थी, खूबसूरत, नशीली, लेकिन जानलेवा। राज जानता था कि वह इस खेल में सिर्फ़ एक प्यादा था, असली खिलाड़ी तो राठौड़ था।
शॉवर से निकलकर उसने कॉफ़ी का एक बड़ा मग बनाया और अपने लैपटॉप पर बैठ गया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसने विक्रम सिंह राठौड़ का नाम इंटरनेट पर खोजना शुरू किया।
कुछ फ़िल्मी पार्टियों की तस्वीरें और दो-चार बिज़नेस आर्टिकल के अलावा कुछ ख़ास नहीं मिला। पब्लिक में उसकी छवि एक अमीर और सफल फ़िल्म फाइनेंसर की थी। लेकिन राज जानता था कि असली कहानी इन चमकते हुए पन्नों के पीछे छिपी थी।
उसने अपने कुछ पुराने संपर्कों को फ़ोन लगाना शुरू किया। पहला फ़ोन उसने 'नक़वी' को किया, जो एक क्राइम रिपोर्टर था और अंडरवर्ल्ड की हर छोटी-बड़ी ख़बर रखता था।
"नक़वी, राज बोल रहा हूँ।"
"हाँ, जासूस, बोल। इतनी सुबह कैसे याद किया? कोई नई लाश मिली है क्या?" नक़वी की आवाज़ में हमेशा एक तरह की सनसनी रहती थी।
"लाश तो नहीं, लेकिन एक ज़िंदा शैतान के बारे में जानना है। विक्रम सिंह राठौड़।"
फ़ोन पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। "राज, किस पचड़े में पड़ गया है तू? उस आदमी का नाम लेना भी ख़तरनाक है। उसके हाथ बहुत ऊपर तक हैं... पॉलिटिक्स, पुलिस, अंडरवर्ल्ड... हर जगह। उसे कोई छू नहीं सकता।"
"उसका पनवेल वाला फार्महाउस... उसके बारे में क्या जानते हो?"
"उसे राठौड़ का 'किला' कहते हैं," नक़वी ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।
"परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुना है, उसके सारे काले धंधे वहीं से चलते हैं। नई लड़कियाँ, ड्रग्स, सब कुछ। लेकिन आज तक कोई सबूत नहीं मिला। जो भी ज़्यादा जानने की कोशिश करता है, वह... गायब हो जाता है।"
नक़वी से बात करके यह तो साफ़ हो गया था कि फार्महाउस पर सीधे हमला करना बेवकूफ़ी होगी। राज को और जानकारी चाहिए थी।
वह अभी अपनी अगली चाल सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी सुबह कौन हो सकता था? उसने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी पुरानी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ा।
"कौन है?"
कोई जवाब नहीं आया। बस दोबारा दस्तक हुई, इस बार और ज़ोर से।
राज ने एक गहरा साँस लिया और एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया।
सामने दो भीमकाय आदमी खड़े थे। दोनों ने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट पहनी हुई थी। उनके चेहरे भावहीन थे और आँखें किसी मुर्दे की तरह ठंडी।
"राज शर्मा?" एक ने पूछा। उसकी आवाज़ पत्थर जैसी थी।
"हाँ, कहिए।"
"तुम्हारे लिए एक पैग़ाम है," दूसरे ने कहा और बिना किसी चेतावनी के एक ज़ोरदार घूँसा राज के पेट में मारा।
राज दर्द से दोहरा हो गया। इससे पहले कि वह सँभल पाता, दोनों उस पर टूट पड़े। राज ने अपनी फ़ौजी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए जवाबी हमला किया। उसने एक को लात मारकर गिरा दिया, लेकिन दूसरा ज़्यादा ताक़तवर था। उसने राज को पकड़ लिया और पहले वाले ने उसके चेहरे पर कई घूँसे मारे।
यह लड़ाई ज़्यादा देर नहीं चली। उनका मक़सद राज को मारना नहीं, सिर्फ़ डराना था। उन्होंने राज को ज़मीन पर गिरा दिया।
"राठौड़ साहब के मामलों से दूर रहो," पहले वाले ने ज़मीन पर पड़े राज के ऊपर झुककर कहा। "यह पहली और आख़िरी चेतावनी है। अगली बार बात करने के लिए तुम्हारी ज़ुबान नहीं होगी।"
यह कहकर वे दोनों ऐसे चले गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।
राज ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। उसके होंठ से ख़ून बह रहा था और उसके पेट और पसलियों में तेज़ दर्द हो रहा था। उसका छोटा सा अपार्टमेंट तहस-नहस हो चुका था। ख़तरा अब सिर्फ़ एक आहट नहीं था, वह उसके दरवाज़े पर दस्तक देकर, उसे ज़ख़्मी करके जा चुका था।
अपमान और ग़ुस्से की एक लहर उसके जिस्म में दौड़ गई। दर्द से ज़्यादा उसे इस बात का गुस्सा था कि कोई उसके घर में घुसकर उसे इस तरह पीट गया। उसे इस दर्द, इस ग़ुस्से को बाहर निकालने के लिए एक ज़रिया चाहिए था।
उसने काँपते हाथों से अपना फ़ोन उठाया और एक नंबर मिलाया।
"हैलो?" दूसरी तरफ़ से एक नींद भरी, मीठी आवाज़ आई।
"कामिनी," राज की आवाज़ दर्द से कराह रही थी। "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"
घंटे भर के अंदर कामिनी राज के अपार्टमेंट में थी। दरवाज़ा खुला पाकर और अंदर की हालत देखकर वह एक पल के लिए सहम गई। फिर उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे राज पर पड़ी। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँख के पास नीला पड़ गया था और वह अपनी पसलियों को पकड़कर बैठा था।
"हे भगवान, राज! यह सब क्या है?" वह भागकर उसके पास आई।
"कुछ नहीं। बिज़नेस का एक छोटा सा साइड इफ़ेक्ट," राज ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन दर्द से उसके चेहरे पर शिकन आ गई।
कामिनी का चेहरा चिंता और एक अजीब से उत्साह के मिले-जुले भाव से भर गया। उसे राज की यह ख़तरनाक दुनिया एक तरफ़ तो डराती थी, लेकिन दूसरी तरफ़ उसे अपनी ओर खींचती भी थी।
"रुको, मैं फर्स्ट-एड बॉक्स लाती हूँ," यह कहकर वह अंदर भागी।
वह वापस आई तो उसके हाथ में डिटॉल, रुई और मरहम की ट्यूब थी। वह किसी नर्स की तरह उसके सामने बैठ गई।
"शर्ट उतारो," उसने आदेश दिया।
राज ने दर्द से कराहते हुए अपनी शर्ट उतारी। उसकी छाती और पसलियों पर नीले-काले निशान पड़ गए थे।
"उफ़... इन लोगों ने तुम्हें बहुत बुरी तरह पीटा है," कामिनी ने धीरे से एक निशान पर अपनी उँगली फिराते हुए कहा।
उसका स्पर्श रुई से भी ज़्यादा मुलायम था।
उसने रुई को डिटॉल में डुबोया और बहुत धीरे-धीरे उसके होंठ के घाव को साफ़ करने लगी। डिटॉल की जलन से राज की आँखों में पानी आ गया, लेकिन कामिनी का चेहरा इतना क़रीब था कि उसे जलन से ज़्यादा एक अलग तरह का नशा महसूस हो रहा था। कामिनी की गर्म साँसें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं और उसकी आँखों में राज के लिए एक गहरी हमदर्दी और चाहत थी।