Adultery thriller खून की होली - Page 2 - SexBaba
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Adultery thriller खून की होली

मैडम रुखसाना के वासना से भरे चक्रव्यूह से बाहर निकलकर राज जब अपने अपार्टमेंट पहुँचा, तो सुबह के चार बज रहे थे। उसका जिस्म बुरी तरह से थका हुआ था, लेकिन उसका दिमाग़ किसी रेस के घोड़े की तरह दौड़ रहा था।

रुखसाना के साथ जो हुआ, वह एक सौदा था, एक ज़रूरी गंदगी जिसमें उसे उतरना पड़ा। लेकिन उस सौदे ने उसे उसके शिकार के और क़रीब पहुँचा दिया था - विक्रम सिंह राठौड़।

राज ने दरवाज़ा खोला और सीधा शॉवर के नीचे जाकर खड़ा हो गया। वह गर्म पानी को अपने जिस्म पर बहने देता रहा, जैसे वह सिर्फ़ रुखसाना के इत्र की महक को ही नहीं, बल्कि उस पूरी रात के एहसास को भी अपने ऊपर से धो डालना चाहता हो। रुखसाना एक ज़हरीले फूल की तरह थी, खूबसूरत, नशीली, लेकिन जानलेवा। राज जानता था कि वह इस खेल में सिर्फ़ एक प्यादा था, असली खिलाड़ी तो राठौड़ था।

शॉवर से निकलकर उसने कॉफ़ी का एक बड़ा मग बनाया और अपने लैपटॉप पर बैठ गया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसने विक्रम सिंह राठौड़ का नाम इंटरनेट पर खोजना शुरू किया।

कुछ फ़िल्मी पार्टियों की तस्वीरें और दो-चार बिज़नेस आर्टिकल के अलावा कुछ ख़ास नहीं मिला। पब्लिक में उसकी छवि एक अमीर और सफल फ़िल्म फाइनेंसर की थी। लेकिन राज जानता था कि असली कहानी इन चमकते हुए पन्नों के पीछे छिपी थी।

उसने अपने कुछ पुराने संपर्कों को फ़ोन लगाना शुरू किया। पहला फ़ोन उसने 'नक़वी' को किया, जो एक क्राइम रिपोर्टर था और अंडरवर्ल्ड की हर छोटी-बड़ी ख़बर रखता था।

"नक़वी, राज बोल रहा हूँ।"

"हाँ, जासूस, बोल। इतनी सुबह कैसे याद किया? कोई नई लाश मिली है क्या?" नक़वी की आवाज़ में हमेशा एक तरह की सनसनी रहती थी।

"लाश तो नहीं, लेकिन एक ज़िंदा शैतान के बारे में जानना है। विक्रम सिंह राठौड़।"

फ़ोन पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। "राज, किस पचड़े में पड़ गया है तू? उस आदमी का नाम लेना भी ख़तरनाक है। उसके हाथ बहुत ऊपर तक हैं... पॉलिटिक्स, पुलिस, अंडरवर्ल्ड... हर जगह। उसे कोई छू नहीं सकता।"

"उसका पनवेल वाला फार्महाउस... उसके बारे में क्या जानते हो?"

"उसे राठौड़ का 'किला' कहते हैं," नक़वी ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।

"परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुना है, उसके सारे काले धंधे वहीं से चलते हैं। नई लड़कियाँ, ड्रग्स, सब कुछ। लेकिन आज तक कोई सबूत नहीं मिला। जो भी ज़्यादा जानने की कोशिश करता है, वह... गायब हो जाता है।"

नक़वी से बात करके यह तो साफ़ हो गया था कि फार्महाउस पर सीधे हमला करना बेवकूफ़ी होगी। राज को और जानकारी चाहिए थी।

वह अभी अपनी अगली चाल सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी सुबह कौन हो सकता था? उसने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी पुरानी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ा।

"कौन है?"

कोई जवाब नहीं आया। बस दोबारा दस्तक हुई, इस बार और ज़ोर से।

राज ने एक गहरा साँस लिया और एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया।

सामने दो भीमकाय आदमी खड़े थे। दोनों ने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट पहनी हुई थी। उनके चेहरे भावहीन थे और आँखें किसी मुर्दे की तरह ठंडी।

"राज शर्मा?" एक ने पूछा। उसकी आवाज़ पत्थर जैसी थी।

"हाँ, कहिए।"

"तुम्हारे लिए एक पैग़ाम है," दूसरे ने कहा और बिना किसी चेतावनी के एक ज़ोरदार घूँसा राज के पेट में मारा।

राज दर्द से दोहरा हो गया। इससे पहले कि वह सँभल पाता, दोनों उस पर टूट पड़े। राज ने अपनी फ़ौजी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए जवाबी हमला किया। उसने एक को लात मारकर गिरा दिया, लेकिन दूसरा ज़्यादा ताक़तवर था। उसने राज को पकड़ लिया और पहले वाले ने उसके चेहरे पर कई घूँसे मारे।

यह लड़ाई ज़्यादा देर नहीं चली। उनका मक़सद राज को मारना नहीं, सिर्फ़ डराना था। उन्होंने राज को ज़मीन पर गिरा दिया।

"राठौड़ साहब के मामलों से दूर रहो," पहले वाले ने ज़मीन पर पड़े राज के ऊपर झुककर कहा। "यह पहली और आख़िरी चेतावनी है। अगली बार बात करने के लिए तुम्हारी ज़ुबान नहीं होगी।"

यह कहकर वे दोनों ऐसे चले गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

राज ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। उसके होंठ से ख़ून बह रहा था और उसके पेट और पसलियों में तेज़ दर्द हो रहा था। उसका छोटा सा अपार्टमेंट तहस-नहस हो चुका था। ख़तरा अब सिर्फ़ एक आहट नहीं था, वह उसके दरवाज़े पर दस्तक देकर, उसे ज़ख़्मी करके जा चुका था।

अपमान और ग़ुस्से की एक लहर उसके जिस्म में दौड़ गई। दर्द से ज़्यादा उसे इस बात का गुस्सा था कि कोई उसके घर में घुसकर उसे इस तरह पीट गया। उसे इस दर्द, इस ग़ुस्से को बाहर निकालने के लिए एक ज़रिया चाहिए था।

उसने काँपते हाथों से अपना फ़ोन उठाया और एक नंबर मिलाया।

"हैलो?" दूसरी तरफ़ से एक नींद भरी, मीठी आवाज़ आई।

"कामिनी," राज की आवाज़ दर्द से कराह रही थी। "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"

घंटे भर के अंदर कामिनी राज के अपार्टमेंट में थी। दरवाज़ा खुला पाकर और अंदर की हालत देखकर वह एक पल के लिए सहम गई। फिर उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे राज पर पड़ी। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँख के पास नीला पड़ गया था और वह अपनी पसलियों को पकड़कर बैठा था।

"हे भगवान, राज! यह सब क्या है?" वह भागकर उसके पास आई।

"कुछ नहीं। बिज़नेस का एक छोटा सा साइड इफ़ेक्ट," राज ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन दर्द से उसके चेहरे पर शिकन आ गई।

कामिनी का चेहरा चिंता और एक अजीब से उत्साह के मिले-जुले भाव से भर गया। उसे राज की यह ख़तरनाक दुनिया एक तरफ़ तो डराती थी, लेकिन दूसरी तरफ़ उसे अपनी ओर खींचती भी थी।

"रुको, मैं फर्स्ट-एड बॉक्स लाती हूँ," यह कहकर वह अंदर भागी।

वह वापस आई तो उसके हाथ में डिटॉल, रुई और मरहम की ट्यूब थी। वह किसी नर्स की तरह उसके सामने बैठ गई।

"शर्ट उतारो," उसने आदेश दिया।

राज ने दर्द से कराहते हुए अपनी शर्ट उतारी। उसकी छाती और पसलियों पर नीले-काले निशान पड़ गए थे।

"उफ़... इन लोगों ने तुम्हें बहुत बुरी तरह पीटा है," कामिनी ने धीरे से एक निशान पर अपनी उँगली फिराते हुए कहा।

उसका स्पर्श रुई से भी ज़्यादा मुलायम था।

उसने रुई को डिटॉल में डुबोया और बहुत धीरे-धीरे उसके होंठ के घाव को साफ़ करने लगी। डिटॉल की जलन से राज की आँखों में पानी आ गया, लेकिन कामिनी का चेहरा इतना क़रीब था कि उसे जलन से ज़्यादा एक अलग तरह का नशा महसूस हो रहा था। कामिनी की गर्म साँसें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं और उसकी आँखों में राज के लिए एक गहरी हमदर्दी और चाहत थी।
 
जब उसने घाव साफ़ कर दिया, तो वह नीचे की ओर झुकी और बहुत धीरे से उस घाव पर फूँक मारी। फिर उसने अपनी जीभ निकालकर उस घाव को हल्के से चाट लिया।

"यह सबसे अच्छा एंटीसेप्टिक है," वह शरारत से मुस्कुराई।

राज का जिस्म तन गया। दर्द और वासना का यह कॉकटेल उसके ख़ून में आग लगा रहा था।

कामिनी अब उसकी पसलियों पर मरहम लगा रही थी। उसकी उँगलियाँ राज के जिस्म पर ऐसे फिसल रही थीं जैसे वे किसी वाद्य यंत्र के तार छेड़ रही हों। वह जानबूझकर हर निशान पर थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगा रही थी, उसे अपनी छुअन से तड़पा रही थी।

"लगता है तुम्हें फिर से मेरे ख़ास 'इलाज' की ज़रूरत पड़ गई," वह फुसफुसाई, और उसका चेहरा राज के चेहरे के और क़रीब आ गया। "तुम्हारे जिस्म में बहुत दर्द और तनाव भर गया है। मुझे उसे बाहर निकालना होगा।"

राज ने अपना एक हाथ बढ़ाकर उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। "तो इंतज़ार किसका कर रही हो, डॉक्टर?"

कामिनी हँसी, और उसकी हँसी किसी संगीत की तरह थी। "मरीज़ इतना बेताब हो रहा है।"

यह कहकर वह नीचे झुकी और जहाँ उसने अपनी जीभ से चाटा था, उसी जगह पर अपने होंठ रख दिए। यह चुंबन गहरा, भूखा और उन्मादी था। यह सिर्फ़ एक चुंबन नहीं था, यह एक वादा था - एक ऐसी रात का वादा जो दर्द को मिटाकर जिस्म में सिर्फ़ और सिर्फ़ जुनून भर देगी।

वह चुंबन किसी बाँध के टूटने जैसा था। राज का सारा ग़ुस्सा, सारा अपमान और दर्द उस एक चुंबन में पिघलकर वासना बन गया। उसने कामिनी को अपनी गोद में खींच लिया और उसे ऐसे चूमने लगा जैसे वह सदियों का प्यासा हो। कामिनी भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी, उसकी जीभ राज की जीभ से लड़ रही थी, एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश कर रही थी।

"बेडरूम में," राज ने हाँफते हुए कहा और उसे अपनी गोद में उठाए हुए ही बेडरूम की तरफ़ बढ़ गया। हर क़दम पर उसकी पसलियों में दर्द की एक लहर उठती, लेकिन कामिनी के जिस्म का भार और उसके होंठों का स्वाद उस दर्द पर हावी हो रहा था।

उसने कामिनी को बिस्तर पर फेंका और उसके ऊपर आ गया। उनके कपड़े कैसे उतरे, उन्हें पता ही नहीं चला। वे एक-दूसरे के जिस्म पर भूखे जानवरों की तरह टूट पड़े थे। राज कामिनी के हर इंच को चूम रहा था, काट रहा था, उस पर अपने अधिकार के निशान छोड़ रहा था। वह उन गुंडों से मिले ज़ख़्मों का बदला कामिनी के जिस्म से ले रहा था।

"आराम से, मेरे शेर," कामिनी ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाते हुए कहा।

"तुम्हें चोट लगी है।"

"तुम मेरा इलाज हो," राज ने उसकी गर्दन और स्तनों के बीच की घाटी में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा। उसने कामिनी के एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे किसी बच्चे की तरह चूसने लगा।

कामिनी की आहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। उसे राज का यह जंगली रूप पसंद था। वह जानती थी कि वह ज़ख़्मी है, और ज़ख़्मी शेर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।

जब भी राज का हाथ या जिस्म का कोई हिस्सा उसकी चोट से टकराता, उसके मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल जाती। और दर्द का वह एहसास जैसे उसकी हवस को और बढ़ा देता। वह कामिनी को और ज़ोर से पकड़ लेता, उसके अंदर और गहराई तक जाने की कोशिश करता।

कामिनी ने इस खेल को एक नया मोड़ दिया। वह उसके ऊपर आ गई।

"अब तुम आराम करो," उसने राज की आँखों में देखते हुए कहा। "इलाज मैं करूँगी।"

उसने राज के लिंग को अपने हाथ में पकड़ा और धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।

राज की आँखें सुख से बंद हो गईं।

कामिनी अब पूरी तरह से नियंत्रण में थी। वह अपनी कमर को बहुत धीरे-धीरे, एक लय में घुमा रही थी। उसके लंबे बाल किसी काले झरने की तरह राज के सीने पर फैल गए थे।

"मैं तुम्हारा सारा दर्द चूस लूँगी," वह फुसफुसाई और नीचे झुककर उसे चूमने लगी।

वह जानती थी कि राज की पसलियों में दर्द है, इसलिए वह अपने जिस्म को ऐसे चला रही थी कि उस पर कम से ज़्यादा दबाव पड़े। वह एक कुशल नर्तकी की तरह थी, जो दर्द और जुनून के संगीत पर नाच रही थी।

राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। पसीने की बूँदें कामिनी के माथे से फिसलकर उसकी छाती पर गिर रही थीं। उसकी आँखें वासना से भरी हुई थीं। वह किसी देवी की तरह लग रही थी, एक ऐसी देवी जो दर्द हरकर सुख प्रदान करती हो।

लेकिन राज ज़्यादा देर तक निष्क्रिय नहीं रह सकता था। उसने कामिनी की कमर को पकड़ा और एक झटके में उसे पलट दिया।

"नहीं," वह गुर्राया। "आज मैं तुम्हें बताऊँगा कि दर्द में कितना मज़ा आता है।"

यह कहकर उसने अपनी पूरी ताक़त से धक्के लगाने शुरू कर दिए। यह संभोग अब इलाज नहीं, बल्कि एक जंग बन चुका था, एक ऐसी जंग जिसमें दोनों जीतना चाहते थे।
 
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कमरे का माहौल किसी तूफ़ान के केंद्र जैसा हो गया था। बिस्तर चरमरा रहा था, दीवारें उनकी कामुक चीखों से गूँज रही थीं। राज और कामिनी एक-दूसरे के जिस्म में ऐसे खो गए थे जैसे दुनिया में और कुछ बाकी ही न हो। राज का ग़ुस्सा अब पूरी तरह से हवस में बदल चुका था। वह कामिनी के जिस्म के हर कोने को फ़तह कर लेना चाहता था।

"राज... बस... मैं और नहीं..." कामिनी हाँफते हुए बोली, लेकिन उसकी आँखों की चमक और उसके जिस्म की अकड़न बता रही थी कि वह झूठ बोल रही है।

"चुप रहो!" राज ने उसकी गर्दन को हल्के से चूसते हुए कहा। "अभी तो बस शुरुआत हुई है।"

उसने कामिनी को बिस्तर के किनारे पर पेट के बल लिटा दिया और पीछे से उसके अंदर प्रवेश कर गया। यह पोज़िशन और भी ज़्यादा गहरी और पाशविक थी। राज उसके कूल्हों को पकड़कर किसी जंगली जानवर की तरह उसे पेल रहा था। कामिनी अपना चेहरा तकिये में छिपाकर सिसक रही थी, उसकी सिसकियों में दर्द और सुख का एक अजीब सा संगम था।

राज को महसूस हो रहा था कि वह अपने चरम पर पहुँचने वाला है। उसके जिस्म की सारी ताक़त, सारा ग़ुस्सा, सारा दर्द अब उसके लिंग के सिरे पर जमा हो गया था।

"मेरे साथ, कामिनी... अभी!" वह चिल्लाया।

और फिर दोनों के जिस्म एक साथ अकड़ गए। राज एक गहरी दहाड़ के साथ कामिनी के अंदर स्खलित हो गया, और उसी पल कामिनी का जिस्म भी चरमसुख की लहरों में काँप उठा।

एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया। दोनों पसीने में लथपथ, बेजान से एक-दूसरे पर पड़े थे। राज का सिर कामिनी की पीठ पर था, और उसकी साँसें किसी तूफ़ान के बाद की हवा की तरह चल रही थीं।

उन्हें लगा था कि सब खत्म हो गया। लेकिन राख के नीचे चिंगारी अभी बाकी थी।

कुछ मिनटों की खामोशी के बाद, राज ने अपना सिर उठाया। उसके जिस्म का दर्द अब काफ़ी कम हो गया था, जैसे संभोग ने किसी पेनकिलर का काम किया हो। लेकिन उसके दिमाग़ में राठौड़ के गुंडों के चेहरे घूम रहे थे। उसका अपमान अभी भी ताज़ा था। उसे और चाहिए था। उसे सिर्फ़ जिस्मानी राहत नहीं, बल्कि अपनी मर्दानगी का पूरा एहसास चाहिए था।

उसने धीरे से कामिनी के बालों को सहलाना शुरू किया। फिर वह उसके कान को चूमने लगा।

कामिनी मुस्कुराई। "अभी भी मन नहीं भरा, ज़ख़्मी शेर?"

"यह मेरे ग़ुस्से को शांत करने के लिए काफ़ी नहीं था," राज ने कहा और कामिनी को अपनी ओर पलटा लिया।

इस बार उनका मिलना अलग था। इसमें पहली बार वाली जंगली और ग़ुस्सा नहीं था। यह धीमा, गहरा और ज़्यादा कामुक था। वे एक-दूसरे को ऐसे खोज रहे थे

जैसे वे पहली बार मिल रहे हों। राज का हर स्पर्श, हर चुंबन अब सिर्फ़ हवस नहीं, बल्कि एक तरह का अधिकार जता रहा था। वह कामिनी के जिस्म के ज़रिए अपनी टूटी हुई हिम्मत को वापस जोड़ रहा था।

वे घंटों तक एक-दूसरे में खोए रहे। उन्होंने कई बार प्यार किया, हर बार एक नए अंदाज़ में, एक नई गहराई के साथ। उन्होंने एक-दूसरे के जिस्म के हर राज़ को खोला, हर इच्छा को पूरा किया।

जब आख़िरी बार वे एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था। यह सिर्फ़ वीर्य का स्खलन नहीं था, यह राज की आत्मा का शुद्धिकरण था। वह अपने सारे दर्द, सारे अपमान और सारी हताशा को कामिनी के जिस्म की आग में जलाकर राख कर चुका था।

रात ढल चुकी थी। कामिनी उसकी बाँहों में सो रही थी। राज की आँखों में नींद नहीं थी। उसके जिस्म का दर्द अब एक मीठी सी थकावट में बदल गया था। लेकिन उसका दिमाग़... उसका दिमाग़ अब बर्फ़ की तरह ठंडा और किसी रेज़र की तरह तेज़ था।

उस रात के उन्माद ने उसे तोड़कर फिर से जोड़ दिया था। वह अब पहले से ज़्यादा ख़तरनाक और ज़्यादा केंद्रित था।

उसने अँधेरे में घूरते हुए क़सम खाई। विक्रम सिंह राठौड़ ने उसे ज़ख़्मी करके बहुत बड़ी ग़लती कर दी थी। अब यह जासूस सिर्फ़ अपनी क्लाइंट के लिए नहीं, बल्कि अपने ज़ख़्मों के इंतक़ाम के लिए भी लड़ेगा। कामिनी अपने घर चली गई और राज ने सोचा कि यह जगह उसके लिए अब सुरक्षित नहीं है।

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कामिनी के जाने के बाद, रात के अँधेरे को चीरती हुई राज की बाइक आख़िरकार 'शर्मा जी का ढाबा' के सामने आकर रुकी। ढाबा बंद हो चुका था, लेकिन पीछे बने छोटे से क्वार्टर की एक खिड़की से हल्की सी रोशनी छनकर आ रही थी। राज का जिस्म दर्द से टूट रहा था।

कामिनी के साथ गुज़री रात ने उसके ग़ुस्से को शांत कर दिया था, लेकिन उसके ज़ख़्म अभी भी ताज़ा थे। उसका अपना अपार्टमेंट अब सुरक्षित नहीं था। उसे एक ऐसी जगह की ज़रूरत थी जहाँ वह कुछ देर के लिए दुनिया की नज़रों से ओझल होकर अपनी अगली चाल सोच सके।

और इस पूरे शहर में अनुराधा जी के ढाबे से ज़्यादा महफ़ूज़ उसे कोई और जगह महसूस नहीं होती थी।

उसने हिम्मत करके क्वार्टर के दरवाज़े पर दस्तक दी। कुछ पल की खामोशी के बाद, अंदर से अनुराधा की सख़्त आवाज़ आई, "कौन है इस वक़्त?"

"मैं हूँ, राज," उसकी अपनी आवाज़ उसे थकी हुई और टूटी हुई लगी।

दरवाज़े का बोल्ट खुलने की आवाज़ आई और दरवाज़ा खुला। सामने अनुराधा जी खड़ी थीं, एक साधारण सी सूती साड़ी में। उनके चेहरे पर नींद और हैरानी के भाव थे। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र राज के ज़ख़्मी चेहरे और सूजे हुए होंठों पर पड़ी, उनके चेहरे के सारे भाव एक गहरी, शांत चिंता में बदल गए।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा। न कोई सवाल, न कोई ताना। बस दरवाज़े से एक तरफ़ हट गईं और उसे अंदर आने का इशारा किया।

कमरा साफ़-सुथरा और सादगी से भरा था। अनुराधा की अपनी शख्सियत की तरह। उन्होंने राज को एक कुर्सी पर बैठने को कहा और खुद अंदर किचन से पानी लेने चली गई।

"किससे दुश्मनी मोल ले ली इस बार?" उन्होंने उसे पानी देते हुए कहा। उनकी आवाज़ में डाँट नहीं, बल्कि एक हक़ वाली परवाह थी।

राज ने उसे सब कुछ बता दिया। कविता के केस से लेकर, रुखसाना के क्लब और राठौड़ के गुंडों के हमले तक। वह बोलता रहा और अनुराधा खामोशी से सुन रही थी। अनुराधा ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा, उसका स्पर्श किसी माँ की तरह नर्म, लेकिन किसी मरहम की तरह असरदार था। उसके हाथों में वह जादू था जो दर्द को सोख लेता था।

जब उसने राज के चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया, उसकी आँखें राज की आँखों में झाँक रही थीं।

"तुम पागल हो, राज," वह फुसफुसाई।

"तुम्हें पता है तुम आग से खेल रहे हो?"

"मैं एक जासूस हूँ, अनुराधा जी। आग से खेलना मेरा काम है," राज ने कहा।

"मैं तुम्हारी बॉस या क्लाइंट नहीं हूँ, राज। मुझे अनुराधा कहो," उसने कहा, और उसकी पकड़ राज के चेहरे पर और मज़बूत हो गई। "और मुझे तुम्हारी परवाह है। मैं तुम्हें इस तरह किसी और के हाथों पिटते हुए नहीं देख सकती।"

उसकी आँखों में आँसू छलक आए। राज ने अपनी ज़िंदगी में अनुराधा को कभी इतना कमज़ोर या भावुक नहीं देखा था। वह हमेशा एक चट्टान की तरह मज़बूत नज़र आती थी। उसका यह रूप देखकर राज के अंदर कुछ पिघल गया।

उसने अपना हाथ बढ़ाकर अनुराधा के गाल पर रखा और उसके आँसू को पोंछ दिया।

"मुझे कुछ नहीं होगा," उसने कहा।

"मुझे पता है," अनुराधा ने कहा। "लेकिन शायद मैं यह नहीं जानती कि अगर तुम्हें कुछ हो गया... तो मेरा क्या होगा।"

और इन्हीं शब्दों के साथ, सालों से उन दोनों के बीच दबी हुई एक अनकही भावना सतह पर आ गई। अनुराधा नीचे झुकी, और उसके होंठ राज के ज़ख़्मी होंठों से मिल गए।

यह चुंबन किसी हवस की शुरुआत नहीं था, यह दो तन्हा रूहों का मिलन था, जो एक-दूसरे की ताक़त और कमज़ोरी, दोनों से प्यार करते थे। इस एक चुंबन के साथ, एक नया अध्याय शुरू हो चुका था, एक ऐसा अध्याय जो सिर्फ़ जिस्मों का नहीं, बल्कि आत्माओं का भी था।

वह चुंबन गहरा होता गया। अनुराधा के आँसुओं का खारा स्वाद राज के मुँह में घुल रहा था, और उसके होंठों की नरमी उसके ज़ख़्मों पर मरहम का काम कर रही थी। यह कामिनी की शरारत भरी प्यास या रुखसाना की ठंडी हवस जैसा नहीं था। यह कुछ और था... यह सम्मान था, समर्पण था।

अनुराधा ने खुद को पीछे किया और उसकी आँखों में देखा। "आज रात तुम यहीं रुकोगे।" यह कोई सवाल नहीं था, यह एक आदेश था, एक ऐसा आदेश जिसे राज खुशी-खुशी मानने के लिए तैयार था।

वह उसका हाथ पकड़कर उसे अपने छोटे से, सादे बेडरूम में ले गई। बिस्तर करीने से लगा हुआ था, और कमरे में मसालों और ताज़गी की एक मिली-जुली महक थी, जो अनुराधा की अपनी महक थी।

उसने राज को बिस्तर पर बिठाया और खुद उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने कुछ कहा नहीं, बस धीरे-धीरे राज के जूते और फिर उसके मोज़े उतारे।

उसका हर स्पर्श एक पूजा की तरह था।

फिर वह उठी और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया। "तुम्हारे जिस्म को आराम की ज़रूरत है," उसने कहा और गर्म पानी और तौलिया ले आई। उसने बहुत धीरे-धीरे राज के पूरे शरीर को, उसके ज़ख़्मों को बचाते हुए, पोंछना शुरू किया।

राज किसी बच्चे की तरह खामोश बैठा था, अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी को इस तरह अपनी परवाह करते हुए देख रहा था।

जब उसका शरीर साफ़ हो गया, तो अनुराधा ने अपनी साड़ी के पल्लू से उसका चेहरा पोंछा।

"अब मेरी बारी," राज ने उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ते हुए कहा।
 
अनुराधा मुस्कुराई। उसने अपनी साड़ी के हुक खोले और वह रेशमी कपड़ा किसी झरने की तरह ज़मीन पर ढेर हो गया। पेटीकोट और ब्लाउज़ में, उसका भरा हुआ, कसा हुआ शरीर किसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति की तरह लग रहा था।

यह किसी युवा लड़की का अपरिपक्व शरीर नहीं था, यह एक औरत का शरीर था, जिसने ज़िंदगी को जिया था, जिसने संघर्ष किया था। और आज, यह शरीर सिर्फ़ राज का था।

राज ने उसे अपनी ओर खींचा और उसके ब्लाउज़ के बटन खोल दिए। अनुराधा ने कोई प्रतिरोध नहीं किया, बस अपनी आँखें बंद कर लीं। राज ने उसके शरीर के हर इंच को ऐसे चूमा जैसे वह किसी पवित्र ग्रंथ को पढ़ रहा हो। वह उसके पेट पर पड़े स्ट्रेच मार्क्स को चूम रहा था, उसकी पीठ के तिल को चूम रहा था। वह उसके शरीर की हर कहानी को अपने होठों से पढ़ रहा था।

जब वे दोनों पूरी तरह से नग्न थे, तो अनुराधा उसके ऊपर आ गई। "तुम्हें चोट लगी है," उसने कहा। "आज रात, मैं तुम्हें अपनी दुनिया की सैर कराऊँगी।"

यह कहकर वह धीरे-धीरे राज के लिंग पर बैठ गई। राज के मुँह से एक गहरी, संतुष्टि भरी आह निकल गई। अनुराधा की योनि गर्म और गीली थी, और वह उसे अपने अंदर ऐसे समा रही थी जैसे वह उसी के लिए बनी हो।

उसने अपनी कमर को घुमाना शुरू किया। उसकी गति में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। यह एक धीमा, गहरा और रूहानी मिलन था। राज नीचे लेटा हुआ बस अपनी आँखों से उसे देख रहा था। अनुराधा की आँखें बंद थीं, उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी।

उसके स्तन हर हरकत के साथ हल्के-हल्के हिल रहे थे। राज ने अपना हाथ बढ़ाकर उसके एक स्तन को अपनी हथेली में भर लिया। वह किसी पके हुए फल की तरह नर्म और भारी था। इस संभोग में वासना से ज़्यादा सुकून था, एक ऐसा सुकून जो राज ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।

कुछ देर बाद, जब उनके जिस्मों की पहली प्यास बुझ गई, तो वे एक-दूसरे की बाँहों में लेटे थे। कमरे में रात की खामोशी और उनकी साँसों की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं था।

"तुम राठौड़ के बारे में कुछ और जानती हो, है ना?" राज ने अनुराधा के बालों को सहलाते हुए पूछा।

अनुराधा ने एक गहरी साँस ली। "हाँ," वह फुसफुसाई। "बहुत साल पहले, जब मैंने यह ढाबा नया-नया शुरू किया था... तब वह इतना बड़ा आदमी नहीं था। वह हफ़्ता वसूली के लिए गुंडे भेजता था। मैंने पैसे देने से इनकार कर दिया था।"

राज का हाथ रुक गया।

"उसने मेरे ढाबे में आग लगवा दी थी," अनुराधा की आवाज़ में एक पुराना दर्द था। "सब कुछ जलकर राख हो गया था। मैं भी उस आग में मरते-मरते बची। मेरे चेहरे पर यह निशान..." उसने अपने आईब्रो के पास एक हल्के से निशान की ओर इशारा किया, "...उसी आग की देन है।"

राज ने नीचे झुककर उस निशान को चूम लिया। "तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"

"यह मेरा अतीत था, राज। मैं उसे दोबारा नहीं जीना चाहती थी। लेकिन आज, तुम्हें इस हालत में देखकर... वह सारी आग मेरे अंदर फिर से जल उठी है।"

उसने राज का चेहरा अपने हाथों में लिया। "उस शैतान को खत्म कर दो, राज। सिर्फ़ कविता के लिए नहीं, सिर्फ़ उन हज़ारों लड़कियों के लिए नहीं जिन्हें वह अपनी हवस का शिकार बनाता है... बल्कि मेरे लिए भी। मेरे उस जले हुए ढाबे के लिए। मेरे इस निशान के लिए।"

उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि आग थी। एक ऐसी आग जिसने राज के अंदर के बारूद में भी आग लगा दी।

उसने अनुराधा को अपनी नीचे खींचा और उसे दीवानों की तरह चूमने लगा। अब यह संभोग सुकून का नहीं, बल्कि एक क़सम का था, एक संकल्प का था।

"मैं उसे खत्म कर दूँगा, अनुराधा," उसने उसके कानों में गुर्राते हुए कहा। "मैं उसे तुम्हारी आँखों के सामने घुटनों पर ला दूँगा।"

उनका दूसरा मिलन पहले वाले से बिलकुल अलग था। यह जंगली, उन्मादी और आग से भरा था। अब राज के ज़ख़्मों का दर्द गायब हो चुका था। अब उसके जिस्म में सिर्फ़ एक ही एहसास था - इंतक़ाम।

वह अनुराधा को ऐसे ले रहा था जैसे वह राठौड़ के साम्राज्य को अपनी मर्दानगी से रौंद रहा हो। उसके हर धक्के में एक वादा था, एक क़सम थी। और अनुराधा भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी। वह अपनी योनि को उसके लिंग पर ऐसे भींच रही थी जैसे वह अपनी सारी ताक़त राज को दे रही हो।

वे एक-दूसरे के जिस्म पर अपनी सत्ता नहीं, बल्कि अपना दर्द और अपना ग़ुस्सा साझा कर रहे थे। यह दो योद्धाओं का मिलन था, जो एक बड़ी लड़ाई से पहले एक-दूसरे की आत्माओं को एक कर रहे थे।

जब आख़िरी बार वे एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह सिर्फ़ एक जिस्मानी स्खलन नहीं था। यह एक भावनात्मक विस्फोट था। राज अनुराधा के अंदर दहाड़ रहा था, और अनुराधा उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाकर चीख रही थी।

यह दो जिस्मों का नहीं, बल्कि दो संकल्पों का मिलन था, जो एक होकर एक ज्वालामुखी बन गए थे।
 
जब सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सो रहे थे। राज की नींद खुली तो उसने अनुराधा को अपने पास सोते हुए देखा। उसके चेहरे पर एक मासूमियत और एक शांति थी। रात के तूफ़ान ने सब कुछ धोकर साफ़ कर दिया था।

वह उठा और बाहर ढाबे के किचन में जाकर दो कप चाय बनाकर ले आया। जब अनुराधा की आँख खुली, तो राज चाय का कप लिए उसके पास बैठा था।

वे दोनों खामोशी से चाय पीते रहे। अब कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। रात ने उनके बीच के सारे फासले और सारे पर्दे हटा दिए थे। वे अब सिर्फ़ दोस्त या प्रेमी नहीं थे, वे अब एक-दूसरे के हमराज़ थे, एक टीम थे।

"तो अब क्या प्लान है?" अनुराधा ने पूछा।

"मैं आज रात उस फार्महाउस में घुसूँगा," राज ने कहा।

"अकेले? यह ख़ुदकुशी होगी।"

"मेरे पास एक आइडिया है," राज ने कहा। "राठौड़ हर हफ्ते अपने फार्महाउस पर एक प्राइवेट पार्टी रखता है, जिसमें वह नए 'टैलेंट' को अपने बड़े क्लाइंट्स के सामने पेश करता है। मुझे उस पार्टी में एक वेटर बनकर अंदर घुसना होगा।"

"यह बहुत ख़तरनाक है, राज।"

"मेरे लिए नहीं," राज मुस्कुराया। "क्योंकि इस बार मेरे साथ तुम हो।"

अनुराधा ने उसकी आँखों में देखा। उसे पता था कि वह राज को रोक नहीं सकती। और शायद वह रोकना चाहती भी नहीं थी।

"ठीक है," उसने कहा। "इस काम में गीता तुम्हारी मदद कर सकती है। वह शहर के सबसे बड़े कैटरर को जानती है जो ऐसी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। शायद वह तुम्हारी एंट्री करवा सके।"

राज को एक नई उम्मीद की किरण दिखाई दी। वह अनुराधा की ओर झुका और उसके माथे को चूम लिया।

"शुक्रिया," उसने कहा।

"शुक्रिया नहीं," अनुराधा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। "बस ज़िंदा वापस आना। क्योंकि अब... मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा।"

राज ने उसके हाथ को चूमा। वह अनुराधा के पास एक ज़ख़्मी और भटका हुआ इंसान बनकर आया था। और अब, वह एक नए मक़सद, एक नई ताक़त और एक नई साथी के साथ जा रहा था। यह रात सिर्फ़ वासना की रात नहीं थी, यह एक योद्धा के पुनर्जन्म की रात थी।

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अनुराधा की बाँहों में गुज़री रात ने राज के ज़ख़्मी शरीर और थके हुए मन पर एक मरहम का काम किया था। उसने राज को सिर्फ़ अपना जिस्म ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का एक टुकड़ा भी दिया था। अब राज के पास लड़ने के लिए एक और वजह थी।

एक नई ताक़त और एक ठोस योजना के साथ, वह अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चला। अनुराधा की सलाह के अनुसार, उसका रास्ता अब गीता आंटी के आँगन से होकर गुज़रता था।

दोपहर का वक़्त था। 'शर्मा जी का ढाबा' ग्राहकों से खचाखच भरा हुआ था। हवा में उड़ती गर्म पूरियों, मसालेदार सब्ज़ियों और ताज़े तड़के की महक किसी को भी अपनी ओर खींच सकती थी। यह गीता की दुनिया थी, उसकी सल्तनत, जहाँ वह एकछत्र आरके करती थी।

राज एक कोने में लगी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया और उसे देखने लगा। गीता किसी तूफ़ान की तरह अपनी रसोई में घूम रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें थीं, बाल एक ढीले-ढाले जूड़े में बँधे थे, और उसकी सूती साड़ी पर हल्दी के कुछ दाग़ भी थे।

लेकिन इन सब के बावजूद, उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। वह ज़िंदगी थी - असली, बिना किसी मिलावट के।

राज ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। वह जानता था कि गीता को उसके काम के बीच में टोकना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था। क़रीब आधे घंटे बाद, जब भीड़ थोड़ी छँटी, तो गीता ने हाथ में पानी का गिलास लिए उसकी टेबल की ओर रुख़ किया।

"बड़े दिनों बाद इस ग़रीब के ढाबे की याद आई, जासूस साहब," उसने गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक जानी-पहचानी शरारत और अपनापन था। "या फिर आजकल कहीं और पेट भर रहा है?"

राज मुस्कुराया। "आपके हाथ के खाने की बात ही कुछ और है, गीता जी। और फिर, कुछ पुराने स्वाद भुलाए नहीं भूलते।" उसका इशारा दोहरा था, जिसे गीता बख़ूबी समझ गई।

उसकी आँखों में एक पल के लिए एक गहरी चमक उभरी और फिर गायब हो गई। "मेरे लिए सिर्फ़ गीता," उसने कहा। "और बताओ, चेहरा उतरा हुआ क्यों है? लगता है किसी ने अच्छी-खासी मरम्मत की है।" उसने राज के होंठ के पास अब हल्के पड़ चुके निशान की ओर इशारा किया।

"बस थोड़ा बिज़नेस का लेन-देन था," राज ने बात को टालते हुए कहा।

गीता ने उसे कुछ देर तक घूरा। वह जानती थी कि यह सिर्फ़ 'लेन-देन' नहीं है। "ख़ैर, तुम यहाँ सिर्फ़ मेरी दाल की बड़ाई करने तो नहीं आए हो। काम की बात बताओ।"

"काम ज़रूरी है, और ख़ुफ़िया भी," राज ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।

"क्या हम कहीं अकेले में बात कर सकते हैं?"

गीता का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। वह समझ गई कि मामला संगीन है। उसने आस-पास देखा और फिर राज की ओर झुकी। "रात को मेरा काम खत्म होने के बाद, मेरे कमरे पर आ जाना। वहीं बात करेंगे। और हाँ, बिना खाना खाए मत आना। लगता है तुम्हें ढंग के खाने की सख़्त ज़रूरत है।"

यह सिर्फ़ एक न्योता नहीं था। यह एक निमंत्रण था - अतीत की उन यादों को फिर से जीने का, जो उन दोनों के जिस्मों पर अपनी छाप छोड़ गई थीं। राज जानता था कि आज की रात सिर्फ़ राठौड़ के मिशन पर बात नहीं होगी। यह रात उन दो जिस्मों की कहानी को भी दोहराएगी जो एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे।

रात के दस बजे, जब ढाबे का शटर गिर चुका था और सारे कर्मचारी जा चुके थे, राज गीता के कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने दरवाज़ा खटखटाया।

"आ जाओ, खुला है," अंदर से गीता की आवाज़ आई।

राज अंदर दाख़िल हुआ। कमरा छोटा लेकिन बहुत साफ़-सुथरा था। एक तरफ़ एक छोटा सा बिस्तर, दूसरी तरफ़ एक अलमारी और एक मेज़। कमरे में अगरबत्ती और घर के बने मसालों की एक सुकून देने वाली महक फैली हुई थी। यह एक घर था, एक पनाहगाह।

गीता बिस्तर पर बैठी थी। उसने नहाकर एक दूसरी साड़ी पहन ली थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर फैले हुए थे। बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत आकर्षक लग रही थी। मेज़ पर दो थालियों में खाना लगा हुआ था। गर्मागर्म रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल।

"आओ, बैठो," उसने मुस्कुराते हुए कहा।

राज उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। गीता ने उसे खाना परोसा। राज भूखे की तरह खाने पर टूट पड़ा। यह सिर्फ़ खाना नहीं था, यह परवाह थी, एक ऐसा एहसास जिसकी राज को अपनी ज़िंदगी में हमेशा से कमी महसूस होती थी।

खाना खाते हुए, राज ने उसे अपनी पूरी योजना बताई। उसने बताया कि कैसे वह राठौड़ के फार्महाउस में एक वेटर बनकर घुसना चाहता है, और इसके लिए उसे एक भरोसेमंद कैटरर की ज़रूरत है।

गीता खामोशी से उसकी हर बात सुनती रही। उसकी आँखों में चिंता साफ़ झलक रही थी।

"यह आग का दरिया है, राज। राठौड़ एक ऐसा नाम है जिससे पूरा शहर काँपता है।"

"मैं जानता हूँ। इसीलिए मुझे किसी ऐसे की मदद चाहिए जिस पर मैं आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ।"

गीता ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है," उसने कहा। "रमेश कैटरर्स शहर की सबसे बड़ी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। मेरा पुराना जानने वाला है। मैं कल सुबह उससे बात करूँगी। कल रात की पार्टी के लिए उसे कुछ एक्स्ट्रा लड़कों की ज़रूरत थी। मैं तुम्हारा नाम डलवा दूँगी। लेकिन तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा।"

काम हो चुका था। मिशन का पहला पड़ाव पार हो गया था। लेकिन अब कमरे का माहौल बदल चुका था। मिशन की चिंता अब पीछे छूट गई थी, और उसकी जगह एक पुरानी, जानी-पहचानी कशिश ने ले ली थी।

खाना खत्म करने के बाद, गीता ने बर्तन उठाए और उन्हें एक तरफ़ रख दिया।

जब वह वापस आई, तो वह राज के ठीक बगल में आकर बैठ गई, इतनी क़रीब कि उसकी साड़ी का गर्म, मुलायम स्पर्श राज की जाँघ को महसूस हो रहा था।

"उस रात की बात याद है, राज?" उसने बहुत धीमी, शहद जैसी आवाज़ में पूछा, जो किसी फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।

राज ने अपना चेहरा उसकी ओर घुमाया। सड़क की हल्की रोशनी जो खिड़की से आ रही थी, वह गीता के चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें और भी ज़्यादा गहरी और नशीली लग रही थीं।

"ऐसे लगता है जैसे कल की ही बात हो," उसने ईमानदारी से कहा।

गीता की उंगलियाँ अनजाने में ही राज के हाथ पर रेंगने लगीं। "उस रात के बाद, मैंने कई बार सोचा... कि तुम वापस क्यों नहीं आए।"

"मैं उलझा हुआ था, गीता," राज ने कहा।

"और आज?" उसने पूछा, उसकी उँगलियाँ अब राज की कलाई को सहला रही थीं। "आज भी तो उलझे हुए हो। बल्कि आज तो तुम्हारी जान दाँव पर लगी है।"

वह राज के और क़रीब आ गई, इतनी क़रीब कि राज को उसकी गर्म साँसों में घुली इलायची की महक महसूस हो रही थी। "इतने तनाव के साथ किसी मिशन पर जाना ठीक नहीं है, जासूस। पहले इस जिस्म के बोझ को, इस दिमाग़ के तूफ़ान को हल्का करना पड़ता है।"

यह कहकर वह उठी और कमरे की बत्ती बंद कर दी। अब कमरे में सिर्फ़ बाहर से आती सड़क की हल्की रोशनी थी, जिसने हर चीज़ को रहस्यमयी और अंतरंग बना दिया था।

वह वापस आई और इस बार वह राज के सामने खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ कहे, धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया, और फिर एक-एक करके अपनी साड़ी की सिलवटें खोलने लगी। राज अपनी जगह पर बैठा, अपनी साँसों को रोके, उसे देखता रहा।
 
गीता का शरीर किसी युवा लड़की की तरह छरहरा नहीं था। यह एक औरत का शरीर था - भरा हुआ, माँसल, जिस पर ज़िंदगी ने अपने निशान छोड़े थे। और यही निशान उसे और भी ज़्यादा असली और आकर्षक बना रहे थे।

जब वह सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज़ में रह गई, तो वह नीचे झुकी और राज के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन गर्म, गहरा और मसालों के स्वाद से भरा हुआ था। यह किसी पुरानी, पसंदीदा शराब की तरह था, जिसका नशा धीरे-धीरे चढ़ता है, लेकिन बहुत गहरा होता है। राज ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को उस स्वाद के हवाले कर दिया। यह स्वाद घर का था, अपनेपन का था, एक ऐसी औरत का था जो जिस्म और रूह, दोनों को तृप्त करना जानती थी।

गीता का चुंबन किसी शांत नदी में उठे ज्वार की तरह था - धीमा, लेकिन ताक़तवर। उसने राज के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उसे ऐसे चूमने लगी जैसे वह सालों की प्यास बुझा रही हो।

राज भी पूरी तरह से उसका साथ दे रहा था। यह कोई कच्चा, जल्दबाज़ी वाला चुंबन नहीं था; यह दो ऐसे लोगों का मिलन था जो एक-दूसरे के जिस्म के भूगोल से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे।

"बिस्तर पर चलो," गीता ने हाँफते हुए कहा और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने छोटे से बिस्तर की ओर खींच लिया।

अँधेरे कमरे में, उनके जिस्म एक-दूसरे को फिर से पहचानने की कोशिश नहीं कर रहे थे; वे एक-दूसरे को याद कर रहे थे। राज के हाथ जब गीता के ब्लाउज़ के हुक पर पहुँचे, तो उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। और जब गीता की उँगलियाँ राज की शर्ट के बटन खोल रही थीं, तो वे किसी पुराने, जाने-पहचाने रास्ते पर चल रही थीं।

जैसे ही राज का नग्न सीना गीता के ब्लाउज़ में क़ैद स्तनों से टकराया, दोनों के मुँह से एक गहरी आह निकल गई।

गीता ने राज के सीने पर अपने नाखून गड़ा दिए। "तुम कुछ भी नहीं भूले, जासूस," वह सिसकी।

"तुम्हारी ख़ुशबू भूलने वाली चीज़ नहीं है, गीता," राज ने उसकी गर्दन पर अपना चेहरा रगड़ते हुए कहा।

उसने गीता का ब्लाउज़ और पेटीकोट उतार दिया। चाँदनी जैसी रोशनी में, गीता का नग्न शरीर किसी देवी की मूर्ति की तरह चमक रहा था। उसके स्तन भारी और गोल थे, उनकी निपल्स राज के स्पर्श की उम्मीद में सख्त हो चुकी थीं।

उसका पेट थोड़ा नरम था, और उसकी जाँघें भरी हुई और मज़बूत थीं। यह एक असली औरत का शरीर था, और राज के लिए इस वक़्त दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ यही थी।

वह नीचे झुका और उसके पेट पर चूमने लगा। वह उसके हर तिल, हर निशान को अपने होंठों से छू रहा था। जब वह उसके स्तनों तक पहुँचा, तो उसने एक निपल को अपने मुँह में भर लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा। गीता का शरीर कमान की तरह तन गया। उसके मुँह से दबी-दबी आहें निकल रही थीं।

"आह... राज... हाँ... बस वहीं... तुम जानते हो... तुम सब जानते हो..." वह बड़बड़ा रही थी।

राज मुस्कुराया। वह जानता था। वह जानता था कि गीता को तेज़ और जंगली तरीक़े पसंद नहीं हैं। उसे धीमा, गहरा और पूरे एहसास से भरा हुआ प्यार पसंद है। उसने अपनी पूरी कला का प्रदर्शन शुरू कर दिया। उसकी जीभ और उसके होंठ गीता के शरीर पर एक ऐसी कविता लिख रहे थे जिसे सिर्फ़ उसकी आत्मा ही पढ़ सकती थी।

जब गीता पूरी तरह से उत्तेजित हो गई, उसकी साँसें तेज़ हो गईं और उसका शरीर और ज़्यादा माँगने लगा, तब उसने राज को अपनी ओर खींचा। "अब और नहीं, राज... अब आ जाओ मेरे अंदर।"

राज उसके ऊपर आया और उसके योनि के द्वार पर अपने लिंग को स्थापित किया। गीता पहले से ही रस से गीली हो चुकी थी, उसके स्वागत के लिए तैयार थी। राज ने एक गहरा, धीमा धक्का लगाया और वह पूरी तरह से उसके अंदर समा गया।

यह किसी घर वापसी जैसा था। गीता की योनि गर्म, गीली और बहुत आरामदायक थी। उसने अपनी मज़बूत जाँघों से राज की कमर को जकड़ लिया, जैसे वह उसे कभी जाने नहीं देगी।

उनकी गति में एक लय थी, एक समझ थी। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई पाशविकता नहीं। यह एक शांत नदी में नाव चलाने जैसा था, जहाँ हर लहर सुख की एक नई अनुभूति लेकर आ रही थी। वे एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, बिना कुछ कहे ही बातें कर रहे थे।

यह सिर्फ़ दो जिस्मों का मिलन नहीं था, यह दो पुराने दोस्तों का, दो प्रेमियों का मिलन था जो एक-दूसरे को दुनिया में किसी भी और इंसान से बेहतर समझते थे। यह वासना का एक ऐसा आरामदायक समंदर था जिसमें वे दोनों हमेशा के लिए डूब जाना चाहते थे।

जब वे दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी हिंसक विस्फोट की तरह नहीं था। यह एक गहरी नदी के अपने सागर में मिलने जैसा था - शांत, गहरा और संपूर्ण। राज ने गीता के अंदर अपनी आख़िरी साँस तक ख़ाली होते हुए महसूस किया, और गीता ने उसके हर क़तरे को अपने अंदर सोख लिया।

वे कुछ देर तक एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे, पूरी तरह से शांत और तृप्त।

कमरे में अब सिर्फ़ उनकी धीमी साँसों की आवाज़ थी। यह मिशन से पहले की शांति थी, एक ऐसी शांति जिसकी राज को सख़्त ज़रूरत थी।
 
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