बुच्ची- हल्दी
तब तक मामी, मौसी और औरतें भी हल्दी लगाने में जुट गयी थीं, नेकर के बाहर का कोई हिस्सा नहीं बचा था और सैय्यदायिन भौजी ने दोनों हाथों में हल्दी लगा के नीचे से सूरजु के नेकरमें हल्दी लगे हाथ डाल दिया
और पेट पे हल्दी लगाते रामपुर वाली का हाथ सरक के ऊपर से नेकर के अंदर,
भरौटी की भौजी जो दो महीने पहले गौने उतरी थी, बाईसपुरवा क सबसे नयी बहू, पीठ पर लगाते हुए उसने हाथ पिछवाड़े से चूतड़ के ऊपर
और रामपुर वाली ने बुच्ची को बुलाया फिर और लड़कियां सबसे आगे पूनम , लेकिन जब बुच्ची हल्दी लगा रही थी दो दो भौजाइयों ने उसका दांया हाथ पकड़ के उसके भाई के नेकर के अंदर डाल दिया।
" आरी बिन्नो यहाँ हल्दी लगाने का काम छोट बहिन का ही है " सूरजु के ननिहाल की एक भाभी ने समझाया,
" अरे जबरदस्त नेग मिलेगा बहिनिया को " ननिहाल की दूसरी भाभी ने पलीता लगाया
" क्या नेग मिलेगा " गलती से बुच्ची के मुंह से निकल गया और रामपुर वाली ने मौके का फायदा उठा के बोल दिया
" अरे हमार भाई,... तोहार यार तोहार भतार मिली। और गप्पू अब अकेले नहीं है उसके दो चार दोस्त भी आ गए हैं, तो एक साथ डबल धमाका होगा, दुनो छेद का मजा एक साथ मिली "
और उन्होंने भी नेकर के अंदर हाथ डाल दिया और बुच्ची का हाथ पकड़ लिया और भरौटी वाली और रामपुर वाली ने जबरदस्ती बुच्ची के हाथ में उसके भइया का खूंटा पकड़ा दिया और कस के मुठियाने लगी।
" अरे अइसन हल्दी लगाओ की सफ़ेद मलाई निकल जाए तब तो असली बहन मानी तुझे, कस कस के जैसे तोहरी बिलिया में सूरजु के ननिहाल के लौंडन क खूंटा जाई एकदम वैसे "
अहिराने वाली भौजी हंस के बुच्ची से बोलीं।
बड़की ठकुराइन, सूरजु की माई थोड़ी दूर खड़ी देख-देखकर मुस्कुरा रही थीं। अब आ रहा है शादी की रस्म का मजा।
बुच्ची बिचारी चाह के भी हाथ नहीं निकाल सकती थी और गाँव की ही दो भाभियों ने अब अंदर हाथ जकड़ रखा था,
बुच्ची को अच्छा भी लग रहा था, लेकिन झिझक भी रही थी, मज़ा भी आ रहा था लेकिन शर्मा भी रही थी।
बात भौजाइयों तक होती तो गनीमत थी, लकिन सब बड़ी उमर की औरतें भी, कांती बूआ, सूरज की बूआ, बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।
और ऐसे ही और भी, चाची, ताई, सूरजु भैया की मामियां,
और सबके सामने पकड़ना नहीं चाहती थी लेकिन भरौटी वाली भौजी, मुन्ना बहु की देवरान क पकड़ इतनी कस के थी और रामपुर वाली ने उसकी कलाई पकड़ के रखी थी,
" हे बिन्नो, खाली भैया का पकड़ने से काम नहीं चलेगा, जोर जोर से मुठियाओ, पानी निकालो "
चुनिया उसकी सहेली ने चिढ़ाया
तो सैयदायिन भौजी बोलीं, " अरे हमार देवर है इतना जल्दी पानी नहीं निकलेगा "
दो दो भौजाइयां पकड़ के बुच्ची का हाथ सूरजु के मोटे लंड पे, कस कस के मुठिया रही थीं,
खूंटा नेकर के अंदर था लेकिन सब लड़कियों औरतों को साफ़ लग रहा था कि क्या हो रहा है। भाभियाँ तो ननद को रगड़ें का कोई मौका नहीं छोड़ती लेकिन अब बड़ी उमर की औरतें भी पनिया रही थीं और वो उधरा जाएँ तो फिर ऐसी गालियां होती हैं की लोग कान में ऊँगली डाल ले, और सबसे ज्यादा गरमाई थीं दूल्हे की माई, बुच्ची की मामी, बड़की ठकुराइन। हँसते हुए गाँव की बहुओं को ललकारा उन्होंने,
" अरे अगर हमार ननद होतीं तो हम सीधे मुट्ठी करते अंदर,अगर भाइचॉद छिनार पानी न निकालती, ... ऐसे सस्ते न छोड़ते "
" अरे तो हमरो ननद कुल मुठियाई जाएंगी, और बुच्ची बबुनी को तो मैं खुद, एक बार बारात जाने तो दीजिये, अइसन नंगई होगी, कउनो ननद छिनार के बदन पे एक सूत नहीं रहेगा हाँ ओकरे पहले ज़रा हमरे देवर लोगन से पेलवा पेलवा के आपन बुरिया चौड़ चाकर करवाय लें, और सबसे पहले जिसकी मुठिया रही हैं "
अहिराने से एक भौजाई बोली,
पूनम क चचेरी भौजाई, सामु बहू, देह क खूब करेर, अकेले एक जून में पांच छह भैस दूह लेती थी। कल ही मायके से आई थी, बड़ी ठकुराइन की खूब मुँह लगी।
पर रामपुर वाली अपना फायदा नहीं भूल सकती थीं, उन्हें अपने भाइयों का ध्यान था, उन्होंने सीधे बुच्ची से कहा,
" हे मजा आ रहा है न भैया का मूसल पकड़ने में, अरे अभी सबके सामने अपने भाई का पकड़ के हिला रही हो, फिर मेरे भाई का भी नंबर लगेगा"
आज दूल्हे की माई भी खूब गरमाई थीं, बुच्ची के बहाने अपनी ननद को गरियाने का मौका क्यों छोड़ देतीं, मंजू भाभी और मंझली मामी साथ में बैठी थी, और उन्ही अपने मायके वालियों के साथ, दूल्हे की माई भी, तो हंसती हुयी सूरजु की मामी से बोलीं,
" अरे हमार छोट ननद ...बुच्ची क माई, हमरे कुल भाई के टांग उठा उठा के दी थीं,.... तो ये भी अपने माई पे पड़ी है। "
" अरे हमार ननद तोहार ननद से बहुत आगे जायेगी, एक ओर से आपन भैया एक ओर से हमार भैया, अभी सबके सामने मुठिया रही है हमारे देवर का तो घोंटेंगी भी "
दूल्हे के खूंटे पर कस के उस दर्जा नौ वाली के कोमल कोमल हाथ दबाते भरौटी वाली भौजी बुच्ची को चिढ़ाते बोलीं।
" और क्या जो खड़ा करेगा, वो घोंटेंगे भी " हँसते हुए मंझली मामी भी अब बुच्ची के पीछे पड़ गईं।
वैसे तो रस्म के समय रसम का ही गाना होता है, लेकिन जब ननदो की रगड़ाई हो रही है भौजाइयों को रोकना मुश्किल है, और अहिराने वाली भौजी ने बुच्ची के लिए गाना टेर दिया, दूल्हे को गरियाते,
" अरे दूल्हे देखा दिवारिया पर का लिखल बा, अरे दूल्हे देखा दिवारिया पर का लिखल बा,
इतवार लिखल बा , सोमवार लिखल बा, तोहरी बहिनी क दस दस भतार लिखल बा,, अरे तोहरी बुच्ची क दस दस भतार लिखल बा"
और उनकी निगाह तभी अहिराने वाली ननद पूनम के ऊपर पड़ गयी, तो उसको भी लपेट लिया,
इतवार लिखल बा , सोमवार लिखल बा, तोहरी बहिनी क दस दस भतार लिखल बा,, अरे तोहरी पूनम क दस दस भतार लिखल बा"
लेकिन पूनमिया कम नहीं थी, सूद के साथ अपनी भौजाई को लौटा दिया, बोली,
" अरे भौजी तोहरे मुंह में घी गुड़, ....चला दो चार तोहे भी दे दूंगी, भैया है नहीं तो मशीन तो चालू रहनी चाहिए, "
भरौटी वाली जो अभी भी कस के बुच्ची का हाथ सूरजु के लंड पे पकड़ाए थीं, हंस के बुच्ची को और उसके भाई को दिखाते बोलै,
" अरे दुलहा से का बोल रही हो, अपनी बहिनिया का, ये बुच्ची का तो पहला भतार उहे हैं, बाकी सब का बंबर बाद में आएगा। "
कांती बूआ जो अबतक चुप बैठी थीं वो भी मैदान में आ गयी और जोर अपनी भौजाई को चिढ़ाती मंझली मामी से बोलीं, " अरे दुलहवा खाली अपने बहिनिया पे ही नंबर लगाएगा की अपनी महतारी पे भी "
और मंझली मामी अपने ननद को, दूल्हे की माई को पकड़ के बोलीं, "
एकदम अपने महतारी पे भी नंबर लगाएगा, बेचारी लम्बा मोटा देख के ललचा रही हैं, ऊपर नीचे दोनों मुंह में पानी आ रहा है , बचपन में अपने पूरे गाँव को बांटी, जवानी में ससुराल में, सबका मन राखीं,... तो दूल्हा क मन काहे नहीं रखेंगी"
अब तो औरतों में जो ठहाका लगा, लेकिन बड़की ठकुराइन ने एकदम बुरा नहीं माना। उन्हें तो मज़ा आ रहा था, अब उनकी ननद-भौजाई तो उन्हें गरिआयेंगी ही।
उधर बुच्ची को भी मजा आ रहा था, वो भैया के चेहरे की ओर देख देख के चिढ़ा रही थी और खुल के मुठिया रही थी ,
चार पांच कोट हल्दी तो वहां लगा ही चुकी थी और पीछे से सूरजु के, दूल्हे की महतारीकी आवाज आयी,
" अरे बाकी जगह तो और सब लोग लगा लें, लेकिन मोटके मूसल में लगाने का हक तो बहिनी का ही है "
वो झुकी थी और अहिराने की एक भौजी ने पकड़ के बुच्ची का टॉप उठा लिया और पीठ पर और पिछवाड़े कस के हल्दी लगाना शुरू कर दिया पर पूनम आ गयी साथ देने और उसने अपने अहिराने की भौजी को पीछे से खुद हल्दी लगनी शुरू कर दी और चोली में हाथ डाल के दोनों जोबन रगड़ने शुरू कर दिए।
थोड़ी देर में एकदम फ्री फॉर ऑल हो गया।
बुच्ची झिझक रही थी। वैसे तो कितनी बार इमरतिया ने कोठरी में पकड़ाया था और अब बुच्ची खुद ही भैया का मोटा मूसल पकड़ के सोहराती थी, दबाती थी। भैया में अभी भी थोड़ी झिझक थी, लेकिन अब बुच्ची ही पहल करती थी। अरे अभी थोड़ी देर पहले ही खुद अपने हाथ से लीलवा को पकड़ाया था, दोनों ने मिल के वो पेसल तेल भी लगाया था, और भैया का 'वो' कितना सुन्दर और मजबूत भी था, मोटा और लम्बा तो था ही एकदम लोहे का मोटा रॉड,
पर अभी सबके सामने, चलिए भौजाइयों की कोई बात नहीं थी, लेकिन बड़ी बड़ी औरतें और सब से बढ़कर कांती बूआ ( बुच्ची की सगी बड़ी मौसी लगती थीं) और भैया के ननिहाल से भी मामी मौसी सब लोग,
लेकिन भौजाइयों ने पकड़ के बुच्ची का हाथ उसके भैया के लंड पे, और हुक्म सुना दिया
" ननद रानी अब हमरे देवर को यहाँ तब तक हल्दी लगाओ जब तक उसका पानी न निकल जाए, "
बुच्ची गिनगीना गयी, सबके सामने, न जाने कैसा कैसा लग रहा था, लेकिन रामपुर वाली की पकड़ बड़ी तगड़ी थी, उसके हाथ को पकड़ के सूरजु के खूंटे पे और हाथ चलाने लगी, नीचे उस दर्जा नौ वाली का कोमल मुलायम हाथ कच्ची ककड़ी की तरह की कलाइयों को भाभियों ने जकड़ लिया था और धीरे धीरे बुच्ची खुद हाथ चलाने लगी, उसे मजा आ रहा था और बस वो सोच रही थी, की जब मुट्ठी में इतना मजा आ रहा है तो नीचे की बिलिया में कितना मजा आएगा।
और फिर बुच्ची खुद कभी अपनी मुट्ठी कस के भींच लेती तो कभी ढीली कर देती, कभी एकदम दबा के रगड़ती तो कभी सहलाती, और साथ में बुच्ची की चुनमुनिया भी कभी कस के भिंच जाती थी, कभी थोड़ी ढीली हो जाती थी, कभी वो इतनी टाइट कर लेती थी की तर्जनी घुसाना भी मुश्किल हो तो कभी पूरी ताकत से ढीली करने की कोशिश करती जैसे सूरजु का मुट्ठी से भी मोटा लंड घोंट रही हो, और कल रात में मुन्ना बहु ने सिखाया था की मरद का लेते समय कैसे बिल को टाइट और ढीला करते हैं जिससे उसको पूरा मजा आये। कभी जैसे मूतवास रोकने के लिए पूरी टाक से सिकोड़ लेते हैं, टाइट कर लेते हैं एकदम वैसा और फिर जैसे धीरे धीरे ढीला करें वैसे। बुच्ची की दो ऊँगली अपनी बिल में लेकर मुन्ना बहु ऐसी ही कभी सिकोड़ती कभी फैलाती, और बुच्ची तो जल्द सीखने वाली,
और उसका जबरदस्त असर सूरजु पर हो रहा था।
कुँवारी कोरी दर्जा नौ वाली बहन का हाथ मूसल पे वो भी सबके सामने भद भद भरे आंगन में, सूरजु कभी आँख बंद कर लेते, कभी सिसकते और बस ये सोचते की कब ये बुच्ची की चुनमुनिया मिलेगी, स्साली की मुट्ठी में इतना मजा मिल रहा है तो जब कसी कोरी बिल में फाड़ता दरदराता जाएगा तो कितना रस मिलेग।
मंजू भाभी ने बुच्ची को चिढ़ाया भी " अरे छिनार कब से भौजी लोग छोड़ दी हैं तब भी भैया का मोटा मूसल पकडे हो, अरे लेना हो तो बिलिया में लो "
भौजाइयों ने इस लिए छोड़ दिया था की अब हल्दी ननद को लग रही थी अहिराने की दो भौजाइयों ने कस के बुच्ची को छाप लिया था और रामपुर वाली भाभी ने आराम से फ्राक उठा के हल्दी दोनों हाथ में लगा के दोनों खुले चूतड़ पर कस कस के, और गाँव क सबसे नयी बहू, मुन्ना बहू क टोली की, भरौटी की, भौजाई उसी ने बुच्ची के दोनों जोबन पे सीधे छापा मारा तो मुन्ना बहू बोलीं
" अरे अच्छी तरह से टटोल के देख लो, अहिरौटी भरौटी के कुल तोहरे देवर चढ़ेंगे यह माल के ऊपर "
एक हाथ से जोबन दबाते हुए भरौटी वाली भौजी ने दूसरा हाथ सीधे बुच्ची की बिलिया पे और हथेली से कस कस के रगड़ने लगी और चिढ़ाते बोली
" जितना मोरे गाँव के देवर हैं सब को ननदोई बनाउंगी लेकिन खाली अपने भाइयों को देगी की हमारे भाइयों को भी चखाएगी ?:"
" अरे सब को देगी, हमारे भाई से तो पहले ही फंसी है, सब लड़के इस गाँव के स्साले बनेंगे हम लोगो के भाई के"
बुच्ची के गोल गोल मुलायम चूतड़ सहलाते, उसपे हल्दी लगाते, गचाक से पिछवाड़े की दरार में ऊँगली पेलते रामपुर वाली भाभी ने चिढ़ाया।
बुच्ची की बुर लासा हो रही थी, हाथ में सूरजु भैया का मोटा मस्त कड़क लंड, और अगवाड़े, पिछवाड़े और गाँव की भौजाइयों का हाथ, कस कस के रगड़ते मसलते, बस मन कर रहा था की जो हाथ में है वो बिलिया में चला जाए,