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- Dec 5, 2013
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निहुरा के
और इमरतिया सूरजु क खूंटा देख रही थी, एकदम खड़ा हो गया था लेने लायक और ये देख के सोच के उसकी राजदुलारी गीली हो गयी थी, मुंह में उसके पानी आ रहा था और बात को ऐक्शन की ओर मोड़ते बोली
" अरे देखो होंगे सांड कैसे ऊपर चढ़ के बछिया को चांपता है, बछिया एक इंच सरक नहीं पाती और सांड हाथ भर क लौंड़ा अंदर ठोंक देता है , कातिक भर कुतिया जैसे, कुत्ते सब चढ़े रहते है,.... बस एकदम उसी तरह चढ़ के पेलना, बस वैसे करना, मन कर रहा है न निहुरा के लेने का "
" हाँ भौजी"लार टपकाते सूरजु बोले
और इमरतिया वहीँ फर्श पे चौपाया बनी निहुर गयी।
खूब चौड़े चौड़े भरे भरे मांसल चूतड़,
फैली खुली दावत देती जाँघे,
और उन जाँघों के बीच, दुबदूबाता, दावत देता छेद, और जिसमे अभी भी सूरजु की ही सफ़ेद रोशनाई का एक कतरा छलक रहा था,
क्या किसी बौराये सांड़ की हालत होती होगी बछिया को देख के, और भूखे की छप्पन भोग की थाली को देख कर, एकदम नदीदे की तरह
सूरजु चढ़ गए पर घुसेड़ने के पहले ही सूरजु को इमरतिया भौजी की डांट पड़ गयी, प्यार से पगी, चाशनी में भीगी,
" अरे बबुआ का सिखाये थे, ....अइसन भूख़ड अस, "
और सूरजबली सिंह समझ गए, पहले गर्माओ, पनियाओ औरत को पागल कर दो, फिर ऊँगली अंदर और उसके बाद औजार वो भी खाली सुपाड़ा,
और कुछ देर बाद ही धक्के पे धक्का,
बस अपने दोनों पैरों को भौजी के पैरों के बीच में धंसा के, भौजी के पैरों को थोड़ा और फैलाया, जैसे सांड़ अपने अगले दोनों पैरों से पहले बछिया को दबोच लेता है, एकदम उसी तरह पूरी ताकत से उन्होंने खूब रसीली भौजी को दबोच लिया, ताकत की कोई कमी तो थी नहीं उनकी देह में, और फिर जैसे भौजी ने समझाया था, सिखाया था अपने मूसल को एक हाथ से पकड़ के उन गोले भगोष्ठों पर बस रगड़ना शरू कर दिया
कुछ देर में ही मोटे मांसल कड़े सुपाड़े का स्पर्श पाकर, दोनों फांके फुदकने लगीं, और सूरजु समझ गए यही समय है जोबन को रगड़ने मसलने का निपल को पकड़ के खींचने का, कन्धों से लिकर नितम्बों तक चुम्बनों की बारिश कर देने का, न उन्हें ढीला होने का डर था न जल्दी गिरने का,
और अब वो सीख गए थे, सांड़ से ज्यादा बछिया को पागल कर दो
इमरतीया की हालत खराब थी, वो चाह रही थी देवर अब भौजी की बुर में लंड पेल दें, वो चूतड़ मटका रही थी, लेकिन खुश भी की उसकी सिखाई, पढ़ाई काम आ रही थी और उसके देवर सूरजु बाबू जिस भी लौंडिया को, औरत को ऐसे गरम कर देंगे, वो खुद अगली बार अपने आके निहुर जायेगी,
" अरे देवर, " भौजी ने निहोरा किया।
एक कामासक्त स्त्री की आवाज अब सूरजु समझने लगे गए थे और यह भी की रतिदान को आतुर स्त्री की इच्छा न पूरी करना सबसे बड़ा पाप है
गच्चाक
एक धक्के में सुपाड़ा अंदर था
इमरतिया की खूब चुदी बुर, और अभी भी अंदर तक सूरजु की मलाई और सूरजु के गरमाने से बुर खुद मुंह बाए थी और साथ में इमरतिया ने पाव भर सरसों का तेल लंड पे लगाया था, सुपाड़ा एकदम तेल से चपचप कर रहा था, और सूरजु ने पूरी ताकत से धक्का मारा था
जैसे कोई बरसों बाद प्रेमी के मिलने पर औरत उसे गलबाहें भर भींच लेती हैं उसी तरह से भौजी की बुर ने देवर के लंड को भींच लिया
रिश्ता है देवर भाभी का ऐसा और सूरजु का लंड भूखा भी बहुत था, दो चार बार कस के इमरतिया ने भींचा निचोड़ा और सूरजु ने समझा दिया की अब वो नौसिखिया नहीं है, बिना किसी जल्दी के, बिना आगे ठेले, उनकी उँगलियाँ, होंठ सब मैदान में आ गए और ावो समझ भी गए इस कुतिया बना के छोडने का फायदा,
मन भर के चूँची दबाओ, निचोड़ दो, पूरी पीठ तुम्हारी है, चूमो चाटो, नाख़ून के निशान कंधे पर बनाओ,
इमरतिया ने समझा दिया था की दूल्हे को पहली रात में ही दुल्हन की देह पर अपना मालिकाना साबित करने के लिए कम से कम ३६ जगह पर अपना निशान छोड़ देना चाहिए जों कम से कम चार पांच दिन तक रहें जब तक चौथी लेके उसके भैया ना आएं, देख ने ले अपनी बहिनिया की देह के वो निशान.और हर दूल्हा पहले दिन ही दुल्हन का गाल जरूर काटता है, होंठों पर दाँत के निशान छोडता है, चूँची तो रगड़ के मसल के लाल की ही जाती है , काट काट के भी, अरे आखिर ननदें अगले दिन छेड़ेंगी कैसे, दुल्हन की सास को कैसे मालूम होगा की उनकी समधन की बिटिया कस के चोदी गयी है
तो सूरजु भी दांतो के निशान, चुंबनों की बारिश
लेकिन इमरतिया गरमाई थी और अब वो सीधे असली मजे का पाठ पढ़ाना चाहती थी, फिर उस ने गुहार लगाई, " अरे मादरचोद कर न "
फिर तो धक्को का तूफ़ान आ गया, दरेरते, रगड़ते फाड़ते फैलाते सूरजु का मोटा मूसल हाथ भर का भौजी की बुर का बुरा हाल करने लगा, जैसे आज चीथड़े कर के दम लेगा, कभी कमर पकड़ के गिन के बीस धक्के और फिर रुकते, कभी बिना गिने, सुपाड़े तक निकाल के, फिर रगड़ते हुए धीरे धीरे इमरतिया की फुदकती बुर में एकदम जड़ तक हथोड़ा मार देते
और इमरतिया भी कम चुदक्कड़ नहीं थी, धक्को का जवाब धक्को से देती कभी कस के बुर भींच के निचोड़ लेती कभी ढीला छोड़ देती कभी सूरजु की माईबहिन गरियाती,
" एक बार भैया ऐसे बड़की ठकुराइन को, ....आने वाली दुलहिनिया की सास को, बुच्चिया की मामी को ऐसे चोद देते न तो मजा आ जाता उनको भी हमको भी "
और जवाब में सूरजु एकदम बाहर तक निकाल के जड़ तक पेल देते और इमरतिया गिनगीना जाती,
पचासो बार इमरतिया इस तरह पेली गयी थी, मायके में अपने, ससुराल में, सूरजु की ननिहाल में, घर में गन्ने के खेत में लेकिन ऐसी जबरदस्त रगड़ाई कभी नहीं हुयी थी। इमरतिया समझदार, खुद अपने दोनों हाथों और सर के नीचे सपोर्ट के लिए तकिये लगा लिए थे अब वो एकदम झुकी थी
वो झड़ी लेकिन देवर रुका नहीं और धक्के चलते रहे,
करीब आधे घंटे की आंधी तूफ़ान के बाद जब इमरतिया झड़ी तो बस साथ साथ देवर भी और अपनी पूरी पिचकारी भौजी की बुर में खाली कर दी
और कुछ देर तक दोनों ऐसे ही पड़े रहे, चिपके और जब इमरतिया की निगाह घडी पे पड़ी तो दो घंटे गुजर गए थे, सूरज का ग्रहण ख़तम हो गया था और बस थोड़ी देर में हल्दी की रस्म शरू होनी वाली थी।
और इमरतिया सूरजु क खूंटा देख रही थी, एकदम खड़ा हो गया था लेने लायक और ये देख के सोच के उसकी राजदुलारी गीली हो गयी थी, मुंह में उसके पानी आ रहा था और बात को ऐक्शन की ओर मोड़ते बोली
" अरे देखो होंगे सांड कैसे ऊपर चढ़ के बछिया को चांपता है, बछिया एक इंच सरक नहीं पाती और सांड हाथ भर क लौंड़ा अंदर ठोंक देता है , कातिक भर कुतिया जैसे, कुत्ते सब चढ़े रहते है,.... बस एकदम उसी तरह चढ़ के पेलना, बस वैसे करना, मन कर रहा है न निहुरा के लेने का "
" हाँ भौजी"लार टपकाते सूरजु बोले
और इमरतिया वहीँ फर्श पे चौपाया बनी निहुर गयी।
खूब चौड़े चौड़े भरे भरे मांसल चूतड़,
फैली खुली दावत देती जाँघे,
और उन जाँघों के बीच, दुबदूबाता, दावत देता छेद, और जिसमे अभी भी सूरजु की ही सफ़ेद रोशनाई का एक कतरा छलक रहा था,
क्या किसी बौराये सांड़ की हालत होती होगी बछिया को देख के, और भूखे की छप्पन भोग की थाली को देख कर, एकदम नदीदे की तरह
सूरजु चढ़ गए पर घुसेड़ने के पहले ही सूरजु को इमरतिया भौजी की डांट पड़ गयी, प्यार से पगी, चाशनी में भीगी,
" अरे बबुआ का सिखाये थे, ....अइसन भूख़ड अस, "
और सूरजबली सिंह समझ गए, पहले गर्माओ, पनियाओ औरत को पागल कर दो, फिर ऊँगली अंदर और उसके बाद औजार वो भी खाली सुपाड़ा,
और कुछ देर बाद ही धक्के पे धक्का,
बस अपने दोनों पैरों को भौजी के पैरों के बीच में धंसा के, भौजी के पैरों को थोड़ा और फैलाया, जैसे सांड़ अपने अगले दोनों पैरों से पहले बछिया को दबोच लेता है, एकदम उसी तरह पूरी ताकत से उन्होंने खूब रसीली भौजी को दबोच लिया, ताकत की कोई कमी तो थी नहीं उनकी देह में, और फिर जैसे भौजी ने समझाया था, सिखाया था अपने मूसल को एक हाथ से पकड़ के उन गोले भगोष्ठों पर बस रगड़ना शरू कर दिया
कुछ देर में ही मोटे मांसल कड़े सुपाड़े का स्पर्श पाकर, दोनों फांके फुदकने लगीं, और सूरजु समझ गए यही समय है जोबन को रगड़ने मसलने का निपल को पकड़ के खींचने का, कन्धों से लिकर नितम्बों तक चुम्बनों की बारिश कर देने का, न उन्हें ढीला होने का डर था न जल्दी गिरने का,
और अब वो सीख गए थे, सांड़ से ज्यादा बछिया को पागल कर दो
इमरतीया की हालत खराब थी, वो चाह रही थी देवर अब भौजी की बुर में लंड पेल दें, वो चूतड़ मटका रही थी, लेकिन खुश भी की उसकी सिखाई, पढ़ाई काम आ रही थी और उसके देवर सूरजु बाबू जिस भी लौंडिया को, औरत को ऐसे गरम कर देंगे, वो खुद अगली बार अपने आके निहुर जायेगी,
" अरे देवर, " भौजी ने निहोरा किया।
एक कामासक्त स्त्री की आवाज अब सूरजु समझने लगे गए थे और यह भी की रतिदान को आतुर स्त्री की इच्छा न पूरी करना सबसे बड़ा पाप है
गच्चाक
एक धक्के में सुपाड़ा अंदर था
इमरतिया की खूब चुदी बुर, और अभी भी अंदर तक सूरजु की मलाई और सूरजु के गरमाने से बुर खुद मुंह बाए थी और साथ में इमरतिया ने पाव भर सरसों का तेल लंड पे लगाया था, सुपाड़ा एकदम तेल से चपचप कर रहा था, और सूरजु ने पूरी ताकत से धक्का मारा था
जैसे कोई बरसों बाद प्रेमी के मिलने पर औरत उसे गलबाहें भर भींच लेती हैं उसी तरह से भौजी की बुर ने देवर के लंड को भींच लिया
रिश्ता है देवर भाभी का ऐसा और सूरजु का लंड भूखा भी बहुत था, दो चार बार कस के इमरतिया ने भींचा निचोड़ा और सूरजु ने समझा दिया की अब वो नौसिखिया नहीं है, बिना किसी जल्दी के, बिना आगे ठेले, उनकी उँगलियाँ, होंठ सब मैदान में आ गए और ावो समझ भी गए इस कुतिया बना के छोडने का फायदा,
मन भर के चूँची दबाओ, निचोड़ दो, पूरी पीठ तुम्हारी है, चूमो चाटो, नाख़ून के निशान कंधे पर बनाओ,
इमरतिया ने समझा दिया था की दूल्हे को पहली रात में ही दुल्हन की देह पर अपना मालिकाना साबित करने के लिए कम से कम ३६ जगह पर अपना निशान छोड़ देना चाहिए जों कम से कम चार पांच दिन तक रहें जब तक चौथी लेके उसके भैया ना आएं, देख ने ले अपनी बहिनिया की देह के वो निशान.और हर दूल्हा पहले दिन ही दुल्हन का गाल जरूर काटता है, होंठों पर दाँत के निशान छोडता है, चूँची तो रगड़ के मसल के लाल की ही जाती है , काट काट के भी, अरे आखिर ननदें अगले दिन छेड़ेंगी कैसे, दुल्हन की सास को कैसे मालूम होगा की उनकी समधन की बिटिया कस के चोदी गयी है
तो सूरजु भी दांतो के निशान, चुंबनों की बारिश
लेकिन इमरतिया गरमाई थी और अब वो सीधे असली मजे का पाठ पढ़ाना चाहती थी, फिर उस ने गुहार लगाई, " अरे मादरचोद कर न "
फिर तो धक्को का तूफ़ान आ गया, दरेरते, रगड़ते फाड़ते फैलाते सूरजु का मोटा मूसल हाथ भर का भौजी की बुर का बुरा हाल करने लगा, जैसे आज चीथड़े कर के दम लेगा, कभी कमर पकड़ के गिन के बीस धक्के और फिर रुकते, कभी बिना गिने, सुपाड़े तक निकाल के, फिर रगड़ते हुए धीरे धीरे इमरतिया की फुदकती बुर में एकदम जड़ तक हथोड़ा मार देते
और इमरतिया भी कम चुदक्कड़ नहीं थी, धक्को का जवाब धक्को से देती कभी कस के बुर भींच के निचोड़ लेती कभी ढीला छोड़ देती कभी सूरजु की माईबहिन गरियाती,
" एक बार भैया ऐसे बड़की ठकुराइन को, ....आने वाली दुलहिनिया की सास को, बुच्चिया की मामी को ऐसे चोद देते न तो मजा आ जाता उनको भी हमको भी "
और जवाब में सूरजु एकदम बाहर तक निकाल के जड़ तक पेल देते और इमरतिया गिनगीना जाती,
पचासो बार इमरतिया इस तरह पेली गयी थी, मायके में अपने, ससुराल में, सूरजु की ननिहाल में, घर में गन्ने के खेत में लेकिन ऐसी जबरदस्त रगड़ाई कभी नहीं हुयी थी। इमरतिया समझदार, खुद अपने दोनों हाथों और सर के नीचे सपोर्ट के लिए तकिये लगा लिए थे अब वो एकदम झुकी थी
वो झड़ी लेकिन देवर रुका नहीं और धक्के चलते रहे,
करीब आधे घंटे की आंधी तूफ़ान के बाद जब इमरतिया झड़ी तो बस साथ साथ देवर भी और अपनी पूरी पिचकारी भौजी की बुर में खाली कर दी
और कुछ देर तक दोनों ऐसे ही पड़े रहे, चिपके और जब इमरतिया की निगाह घडी पे पड़ी तो दो घंटे गुजर गए थे, सूरज का ग्रहण ख़तम हो गया था और बस थोड़ी देर में हल्दी की रस्म शरू होनी वाली थी।