- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,779
अपडेट 127
सरितादिदी मेरे बिस्तर पर बैठी हुई थी, में समाज गया की ये आज मेरे साथ hi सोनेवाली है, पता नहीं पर अब मुझे किसी चीज का दर नहीं था, मुझे ये भी लग रहा था की यहाँ हर कोई सब कुछ जनता है, सब एक दूसरे के बारे में जानते है, भले hi कोई खुल कर बात नहीं करता. मेने किताब बंद की और बिस्तर पर जा कर लेट गया.
शिव : दीदी आप यहाँ? (मेने बस ऐसे hi पूछा था)
सरितादिदी : क्यों नहीं आना चाहिए था? (उन्होंने एक ऐडा से मेरी और देखते हुए कहा, वैसे भी लड़कीओ का थोड़ा नखरा करना बनता है, इस से उनके प्रति एक अलग hi खिंचाव महसूस होता है, वैसे भी में आज पुरे दिन से गरम था, पहले नाज़िआदिदी की वजह से फिर काव्य मैडम की वजह से, मुझे भी सेक्स की सख्त जरुरत थी, और दीदी आयी थी मतलब वो भी तड़प रही थी)
शिव : (उनको खिंच कर मेरे बाजु में लेटाया तो वो बिना किसी विरोध के लेट गयी और मेरी आंखोमे देखने lagi)Mene ऐसा थोड़ी न कहा था, मेने तो बस ऐसे hi कहा था, में ये पूछ रहा था की थोड़ी देर रुकने आयी हो की पूरी रात?
सरितादिदी : (उनके चेहरे पर शर्मीली मुस्कान आ gayi)Jaisa तू कहे.
शिव : (मेने उनके स्तन को कास के दबा दिया तो उनकी सिसकी निकल gayi)Ye कुछ बड़े नहीं हो गए दीदी?
सरितादिदी : शहहहहह इतनी जोर से दबाएगा तो बड़े तो होंगे hi, शहहह थोड़ा धीरे सीईव.
शिव : (हलके हाथो से दबाते hue)Aap को देख कर रहा नहीं जाता, सॉरी.
सरितादिदी : सॉरी मात बोल, वैसे भी तेरे साथ करना है तो दर्द की आदत डालनी hi पड़ती है, (थोड़ी देर उनके स्तन दबाने और किश करने के बाद मेने उनके सरे कपडे निकल दिए और में खुद भी नंगा हो गया, वो बिस्तर पर बैठी हुई थी मेने लुंड उनके मुँह के सामने कर दिया जिसे उन्होंने बड़े प्यार से अपने मुँह में भर लिया, में उनका शिर सेहला रहा था और वो चूस रही थी, वो कभी मेरे लुंड को बहार निकल कर हिला रही थी तो कभी अपने मुँह में ले रही थी, मेने उन्हें थोड़ी देर करने दिया.
शिव : (तक़रीबन दस मिनट बाद मेने अपना लुंड बहार निकला, उन्होंने मेरी और देखा, वो भी समाज गयी और लेट गयी और अपनी टंगे घुटनो से मोड़ कर पकड़ ली और फैला दी, हम दोनों अब एक दूसरे को समझते थे तो कहने की जरुरत नहीं पड़ती थी, मेने उनकी टैंगो के बिच बेथ गया और उनकी छूट को चाट कर उन्हें भी मज़ा देने लगा)
सरितादिदी : शह्ह्ह्ह शीइइइइव शह्ह्ह्हह्ह शह्ह्ह्हह्ह (वो लगातार सिस्किअ ले रही थी, थोड़ी देर उनकी छूट को अच्छे से चाटने के बाद मेने लुंड लगाया और हलके धक्के के साथ लुंड अंदर दाल diya)Ahhhhhh शह्ह्हह्ह्ह्ह. (दीदी मेरे सामने किसी छोटी लड़की की तरह लगती थी, उनका शरीर मेरे सामने बहोत छोटा था, छोटी सी छूट भी पूरी फ़ैल गयी, मेने उन्हें पकड़ कर धक्के लगाने laga)Ahhhhh शह्ह्ह्ह शहहहहह अह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह अह्ह्ह्हह शहहहहह अह्ह्ह अह्ह्ह शहहह शिईयिव शह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह.
शिव : मज़ा आ रहा है दीदी?
सरितादिदी : हा शह्ह्ह्ह बहोत मज़ा आ रहा है शह्ह्ह्ह तेरा बड़ा लुंड मुझे बहोत मज़ा दे रहा है शहहहहह.
पंद्रह मिनट तक में उन्हें छोड़ता रहा, कभी घोड़ी बनाया तो कभी बैठे बैठे, वो झाड़ गयी, और मुज से लिपट कर हांफ रही थी. में उनके कूल्हों को मसलते हुए हलके हलके उन्हें ऊपर निचे कर रहा था.
सरितादिदी : शहहहहह शिईयिव शह्ह्ह्ह, मेरे शिव शहहह. तेरे साथ इतना मज़ा आता है की में बयां नहीं कर शक्ति.
शिव: अभी पूरा मज़ा कहा लिया है, अभी मेरे बाकि है.
सरितादिदी : में जानती हु, मेरा शेर इतनी जल्दी ढेर नहीं होनेवाला, आज में अपने शेर का मेरे पिछवाड़े में लेना चाहती हु.
शिव : दर्द होगा. (मेने उन्हें चेताया)
सरितादिदी : होने दे, ये नया अनुभव मेरे दिमाग में हमेशा के लिए छाप जायेगा, तू हमेशा के लिए मेरे दिल में कैद हो जायेगा. तू रुक में तेल ले कर आती हु. (पता नहीं उनके दिमाग में क्या चल रहा था, वो उठी और दरवाजा खोला और झक के बहार देखा, वो नंगी hi थी, में उनके कूल्हों को देख रहा था, आज उनका उद्घाटन होनेवाला था. बहार सब शांत देख कर वो बहार चली गयी और थोड़ी देर में हाथ में तेल की कटोरी लिए वापस आ गयी, आते हुए वो मुस्कुरा रही थी)
शिव : क्या हुआ?
सरितादिदी : वो में नंगी घर में घूम रही थी न तो ये सोच कर hi हसी आ गयी.
शिव : आप बहोत नटखट हो. में भी यही सोच रहा था की आप बिना कपड़ो के क्यों गयी.
सरितादिदी : ऐसी अतरंगी चीजे करने में मज़ा आता है, ले अब इसे लगा दे. (उन्होंने मेरी और कटोरी बधाई और वो बिस्तर पर उलटी लेट गयी)
शिव : कहा लगाना है? (मेने मज़े लेते हुए पूछा)
सरितादिदी : आ है, अनजान तो ऐसे बन रहा है जैसे कुछ पता न हो, में सब जानती हु की तू सब जनता है, अब ज्यादा नाटक मत कर और अपना काम कर, वैसे भी ये सोच कर मेरी जान हलक में फांसी है की आज तेरा बड़ा लुंड मेरे पिछवाड़े में घुसनेवाला है.
शिव : (मेने तेल लिया और उनके सुडौल कूल्हों पर डाला, अब में बड़े बड़े कूल्हे देख चूका था तो उनके मुकाबले ये छोटे थे पर आकर्षक वैसे hi थे, में कूल्हों को मसलने लगा)
सरितादिदी : कूल्हों पर क्यों तेल दाल रहा है, वह छेड़ में डालना था.
शिव : पता है, पर इन्हे भी थोड़ा चमका दू, वैसे भी आकर्षक है थोड़े और आकर्षक हो जायेंगे.
सरितादिदी : (मंद मंद मुस्काते hue)Achchha शिव ये तो बता, तुम लड़को को ये कूल्हे क्यों इतने पसंद होते है?
शिव : वो तो पता नहीं है दीदी, पर लड़कीओ के कूल्हे उनकी और आकर्षित करते है.
सरितादिदी : वैसे कितनी लड़कीओ के कूल्हे ऐसे नंगे देख चूका है?
शिव : छोडो न दीदी, वो बताने की बात नहीं है.
सरितादिदी : क्यों, इसमें छुपानेवाली कोनसी बात hai.(Mene ऊँगली को तेल में डुबो कर उनकी गांड के छेड़ में dala)Shhhhhhh (अंदर गरम गरम भाठी थी, अजीब लग रहा था, मेने कूल्हे को थोड़ा फैलाकर छेड़ में जाती ऊँगली को देखा, बाटे हमारी जारी थी)
शिव : अभी आप पूछोगी की कितनी फिर पूछोगी कोण, तो में बता नहीं पाउँगा.
सरितादिदी : क्यों? मुझसे कैसी शर्म. (में ऊँगली अंदर बहार करते हुए और तेल लगा रहा था, छडे अंदर से भी चिकना हो रहा था)
शिव : ऐसी बात नहीं है दीदी, पर सोचो , में आपके बारे में किसी को बताऊ तो कैसा लगेगा.
सरितादिदी : ये निर्भर करता है की तू किस को बता रहा है, सिर्फ अपनी बड़ाई करने के लिए किसी लड़के को या किसी अपनी चाहेवाली को, जिस तरह तू मुझे बता सकता है, वैसे hi अगर तू मेरे जैसी किसी और को बताएगा तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, हो सकता है की इस बात के चलते हम दोनों नजदीक आ जाये.
शिव : ये बात तो आपकी सही है. पर अभी नहीं, अभी तो पहले इस छेड़ ने मेरा हल ख़राब कर रक्खा है, थोड़ा ऊपर हो जाइये (मेने उन्हें घोड़ी बना दिया और फिर से तेल अंदर तक दाल दिया, फिर अपने लुंड पर भी तेल लगा दिया, और लुंड को गांड के छेड़ पर घिसने laga)Aap तैयार हो दीदी?
सरितादिदी : है शिव, पर ध्यान से, मुझे पता नहीं है की क्या होगा?
शिव : चिंता मात कीजिये, कुछ नहीं होगा.
सरितादिदी : है तुजे तो सब पता hi होगा, ठीक है पर आराम से (मेने लुंड को छेड़ पर सताया और अंदर धकेलने लगा, मुझे पता था की थोड़ा जोर लगेगा, एक बार छल्ला पर हो जाये तो फिर कोई दिक्कत नहीं, छेड़ फ़ैल रहा था, लुंड के दबाव से छेड़ अंदर तक डांस रहा tha)Ammmmmm(Unhe शायद दर्द हो रहा था जो वो अपना मुँह दबाये हुए थी, आधेसे ज्यादा सूपड़ा अंदर चला गया था, मेने थोड़ा जोर से धक्का दिया तो छेड़ फैलते हुए लुंड अंदर घुस गया, और टोपा छेड़ में चला gaya)Ahhhhhhh. (में रुक गया, और हाथ आगे बढ़ा कर उनके लटकते स्तन सहलाने लगा)
शिव : दर हो रहा है दीदी?
सरितादिदी : है, ऐसा लग रहा है की छेड़ पूरी तरह फ़ैल गया है, इतना तंग हो गया है की अभी फैट जायेगा.
शिव : कुछ नहीं होगा दीदी, वैसे भी वो छेड़ रोज फैलता सिकुड़ता है तो उसे आदत होती है. पर आपकी इच्छा पूरी हो गयी, आपकी गांड में मेरा लुंड है दीदी.
सरितादिदी : (दर्द में भी मुस्कुराते hue)Tuje कैसा लग रहा है वह?
शिव : बहोत गरम गरम है अंदर.
सरितादिदी : अपने पानी से उसे ठंडी कर देना.
शिव : आप बहोत अच्छी हो दीदी. (वो मुस्कुरायी, थोड़ी देर इंतजार करने के बाद में ने लुंड को थोड़ा हिलाया तो उन्हें रहत थी, में लुंड अंदर डालने लगा जो अब आराम से अंदर जा रहा था, वैसे भी गांड का अंदर का हिस्सा छूट की तरह सिकुड़ा नहीं होता, तो आहिस्ता आहिस्ता मेने पूरा लुंड अंदर दाल diya)Didi, पूरा अंदर चला गया.
सरितादिदी : में महसूस कर प् रही हु शिव, मुझे यकीं नहीं हो रहा है की तेरा इतना बड़ा अंदर चला गया.
शिव : कैसा लग रहा है?
सरितादिदी : अभी तो पता नहीं, पर ये सोच कर की तूने मेरी गांड में अपना लुंड दाल दिया है ये सोच कर hi एक अजीब सी खुसी मिल रही है.

शिव : थोड़ी देर में दूसरी भी खुसी मिलेगी आपको (में हलके हलके धक्के लगाने लगा, तेल की चिकनाहट और मेरे लुंड से निकल रहे रास की चिकनाहट से छेड़ चिकना हो गया था तो लुंड आराम से अंदर बहार हो रहा था, पतली कमर और उसीके हिसाब से चौड़े कूल्हे, उनको और आकर्षक बना रहा था, गोलाकार कूल्हे दबाते हुए में उन्हें छोड़ रहा था, दीदी की आवाजे बता रही थी की उन्हें दर्द भी है पर इसमें में कुछ नहीं कर शक्ति था, में उनकी गांड के छेड़ को देख रहा था, वो बहोत फ़ैल गया था, और छले पर कई जगह खिंचाव से लाला लाल दिखाई दे रहा था, गोलाकार दो कूल्हों के बिच में छोटेसे छेड़ में अंदर बहार हो रहा मेरा लुंड देख कर मुझे जोश आ रहा था, थोडिएर देर उन्हें ऐसे छोड़ते रहने के बाद में थोड़ी तेजी से में धक्के लगाने लगा, अब उनकी सिस्किअ बढ़ गयी थी जो बताता था की अब उन्हें मज़ा आ रहा hai)Achchha लग रहा है दीदी?

सरितादिदी : हआ शिव शहहह अच्छा लग रहा है, छूट जितना तो नहीं पर मज़ा आ रहा है.
शिव : अगर छूट में ज्यादा मजा आता है तो फिर छूट में दालु?
सरितादिदी : नहीं अभी थोड़ी देर इस नए मज़े का मज़ा लेने दे, मुझे पता है की लड़को को लड़कीओ की गांड मरने में बहोत मज़ा आता है, में वो मज़ा तुजे देना चाहती हु, अपनी गांड में तेरे लुंड को अच्छे से महसूस करना चाहती hu(Didi बहोत समर्पित थी मेरे प्रति, में उनका प्यार देख रहा था, मेरी खुसी के लिए वो कुछ भी करने को तैयार थी, थोड़ी देर तक में उनकी गांड मरता रहा, और साथ में उनकी छूट में भी ऊँगली दाल कर छूट का भी मज़ा देने लगा.) दो जगह पर एक साथ छोड़ने का एक अलग hi मज़ा है शिव, तेरी ऊँगली भी मुझे लुंड जैसी लग रही है, शह्ह्ह्हह्ह बहोत अच्छा लग रहा hai.(Thodi देर में उनकी गांड मरता रहा, फिर मेने लुंड बहार nikaldiya)Kya हुआ, बहार क्यों निकल लिया?
शिव : अब में छूट में लुंड डालता हु, आपको वह ज्यादा मज़ा आता है न.
सरितादिदी : तुजे जो करना है कर शिव, मुझे हर तरह से मज़ा hi मिल रहा है.

मेने लुंड बहार निकला और छूट में दाल दिया, तेज तेज धक्को से वो पूरी हिल रही थी, और उनकी सिसकीओ से पूरा कमरा गूंज रहा था, शायद उन्हें इसकी कोई फ़िक्र नहीं थी, लगातार मेरे लुंड से छोड़ने पर वो फिरसे झाड़ गयी, वो बिस्तर पर उलटी लेट गयी थी और हांफ रही थी, मेने फिर से गांड में लुंड दाल दिया, वो थोड़ी करहि पर फिर मजे से सिस्किअ लेने लगी, अपने निचे दबोच कर में उनकी गांड में लुंड डेल जा रहा था, वो पशीने से भीग चुकी थी और में भी, मेने उन्हें निचे दबोच कर उनकी पीठ और गले पर किश करते हुए उन्हें छोड़ रहा था, ऐसे hi हम दोनों काफी देर तक लगे रहे,

upload
मेने उन्हें सीधा किआ और टंगे पकड़ कर ऊपर ले जाते हुए लुंड गांड के छेड़ में दाल दिया, उन्होंने अपनी टंगे खुद पकड़ ली, में लगातार उनकी गांड में लुंड दाल कर छोड़ रहा था, वो आहे भर रही थी, छूट के मुकाबले गांड में ज्यादा घर्षण मिल रहा था जिस वजह से मेरा भी होनेवाला था.
शिव : दीदी मेरा होनेवाला है.
सरितादिदी : हम्म्म्म शहहहहह अंदर hi डालदे शहहहहह, में भी झाड़नेवाली हु शहहहहह तेरे साथ छोड़ने पर असली सुख मिलता है शहहहहह अह्ह्ह्हह मेरी गांड शहहह अह्ह्ह्हह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह शहहह में गयी शहहह अह्हह्ह्ह्ह maaaaaa(wo झाड़ गयी और आखिर कर मेने भी अपना लावा उनकी गांड में भर दिया, दोनों थक गए थे. (में जैसे hi साइड में लेता दीदी मेरी साइड से मेरी बाहोंमे आ gayi)Kaisa लगा तुजे? (उन्होंने मेरा लुंड पकड़ लिया और सहलाने लगी)
शिव : बहोत मज़ा आया, आपको?
सरितादिदी : मुझे भी (वो मुझे किश करने लगी और में उनके कूल्हों को मसल रहा था, थोड़ी देर हम दोनों ऐसे hi किश करते रहे).
शिव : यही सोनेवाली हो?
सरितादिदी : है, क्यों कोई दिक्कत है तुजे?
शिव : नहीं, ऐसे hi पूछ रहा था. (वो मेरा लुंड सेहला रही thi)Fir से करना है?
सरितादिदी : (उन्होंने शर्मा के मुझे देखा फिर मुस्कुराते हुआ kaha)Ha.
शिव : थकी नहीं?
सरितादिदी : थक गयी हु पर दिल नहीं मंटा, ऐसा लगता है की तेरा ये अंदर लिए hi rahu.(Unki बात सुन कर में मुस्कुराया, थोड़ी देर बाद फिर से मेने उन्हें छोड़ा,

image uploader


मेरा दूसरी बार था तो पानी निकलने में वैसे भी देर लगी, आखिर कर हम दोनों थक कर वैसे hi सो गए)
दूसरी और काव्य को नींद hi नहीं आ रही थी, आज जो कुछ भी हुआ था वो उसे बार बार महसूस कर रही थी, उसका दिल बेचैन था, कभी वो अपनी झांघो को सेहला देती तो कभी उसका हाथ अपनी छूट पे चला जाता था, उसको इस बेचैनी की वजह समाज नहीं आ रही थी, वो बार बार शिव को याद कर रही थी. अपनी बेचैनी को काम करने के लिए उसने सोने का प्रयास किआ पर नीं भी जैसे कोसो दूर थी.
यहाँ सुबह दरवाजा खत खतने की आवाज से मेरी नींद खुल गयी, सरितादिदी अभी भी नंगी hi लेती हुई थी.
शिव : कोण?
लतादिदी : में हु, स्कूल नहीं जाना क्या?
शिव : (लतादिदी की आवाज थी, पर में नार्मल hi रहा, में इतना तो समज चूका था की ये दोनों आपस में अच्छी सहेलिया है और एक दूसरे की राजदार भी है तो मेने नॉर्मली hi जवाब diya)Jana है दीदी, आप चलिए, में आता हु.
लतादिदी : ठीक है. (उनके कदमो की आवाज दूर जाती सुनाई दे रही थी, में उठा और सरितादिदी को उठाया)
शिव : डीडीई, उठो, सुबह हो गयी है.
सरितादिदी : नींद में hi, में आती हु तू जा. (अब में क्या कहता, में दरवाजा ऐडा के बहार निकल गया, और बाथरूम में घुस गया)
सरिता उठी, अपने कपडे पहने, उसकी गांड के छेड़ में दर्द हो रहा था, पर बहार तो जाना hi था. उसने थोड़ा सा दरवाजा खोला और बहार देखा, किचन से आवाजे आ रही थी, पर वह कोई नहीं था, वो बहार निकली और चलते हुए बाथरूम की और जाने लगी, गांड में दर्द हो रहा था तो वो अपनी टंगे फैलाये चल रही थी. बाथरूम से जब वो किचन में पहुंची तो वह सब थे, लता गैस पर कुछ पका रही थी, विणा और रंजन रोटीआं बेल रही थी और गायत्री रोटीआं सेक रही थी, सरिता ने बहोत सँभालने की कोशिस की पर वो ठीक से चल नहीं प् रही थी, वो अपनी टंगे फैलाये हुए चल रही थी, जब रंजन की नजर पड़ी तो वो अपना मुँह दबाये हसने लगी, जिसे देख विणा ने भी सरितादिदी को देखा, वो बड़े गौर से उन्हें देख रही थी, उनकी हालत से वो समाज रही थी की क्या हुआ होगा, पर उसको हसी नहीं आ रही थी बल्कि दीदी पर दया आ रही थी. गायत्री की भी नज़र पड़ी, वो जानती तो थी पर फिर भी सरीतकी खिंचाई करते हुए बोली
गायत्री : ऐसे क्यों चल रही है, कुछ हुआ है क्या? (बोलते बोलते उनकी भी हसी निकल गयी)
लतादिदी : क्यों उसको तंग कर रहे हो, अपना अपन काम करो (सरिता ko)Tu क्यों आयी, थोड़ी देर आराम कर लेती.
सरिता : (थोड़ा शरमाते hue)Nahi में ठीक हु, बस वो बाथरूम में पेअर फिसल गया तो दर्द हो रहा है. (गायत्री और रंजन जोर जोर से हसने लगे)
लता : चुप, चुप बोलै न.
यहाँ सब को पता था की क्या हुआ होगा, पर फिर भी सब खुल कर नहीं बोल रहे थे, सब जानते थे की उनकी भी ऐसी hi हालत होती है, हर कोई सब कुछ जानते हुए भी एक दूसरे की इज्जत नहीं उछाल रहे थे, सब आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए थे. विणा को ये देख कर बहोत आश्चर्यहो रहा था.
सरिता : ला, में सब्जी का ध्यान रखती हु तू कुछ और कर ले.
में पंहुचा तो सब काम में लगे हुए थे. थोड़ी देर बाद में नास्ता कर के वह से निकल गया. आज भी रस्ते में मुझे वैस्वी और संयम मिल गए, नाज़िआ दीदी भी थी. जब में वह पंहुचा तो संयम बोली.
संयम : लो शिव आ गया, अब चले?
शिव : क्यों क्या हुआ?
संयम : कुछ नहीं, मेने कहा की स्कूल चलते है तो ये वैस्वी कह रही थी की शिव को आ जाने दो साथ में चलते है.
शिव : मतलब तू नहीं चाहती थी की में स्कूटर पर औ.
संयम : मेने ऐसा कब कहा, पर ये अब बदल गयी है, पहले तुजसे दूर भगति थी, और अब जब देखो तब शिव शिव करती रहती है. (उसकी बाते सुन कर मेने देखा की वैस्वी बहोत शर्मा रही थी, और अपनी नज़ारे झुकाये कड़ी थी)
नाज़िआ : अब देर नहीं हो रही तुमलोगो को?
संयम : में तो कब से कह रही थी, आइये शिव महाराज, बिराजिये ताकि हम जा सके. (में हस्ते हुए स्कूटर पर बेथ गया, संयम फिर से मेरे पीछे hi बैठी, और आखिर में वैस्वी, जैसे hi हम नाज़िआ दीदी से दूर हुए, संयम ने मेरी कमर में हाथ दाल दिया, मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे उसने जितनी जरुरी था उस से ज्यादा जोर से पकड़ा हुआ था, और साथ में वो अपने स्तन भी मेरी पीठ पर दबा रही थी, अक्सर लड़कीअ ऐसे बैठती है की उसके स्तन आगे पीठ पर न लगे, पर संयम के स्तन मुझे अपनी पीठ पर महसूस हो रहे थे, मेने उसे नॉर्मली hi लेने का सोचा, और में स्कूल की ार बढ़ता रहा.)
स्कूल में भी आज हम सब साथमे hi बैठे थे, वैस्वी ऐसे बैठी थी की उसका शरीर मुज से टच हो रहा था, एक बार तो उसने मेरे हाथ पर भी अपना हाथ रख दिया, सब खाने में लगे हुए थे तो किसी का ध्यान नहीं गया, मेने उसकी और देखा तो वो शर्मा के मुस्कुराने लगी. स्कूल से लौट ते वक़्त भी संयम वैसे hi बैठी थी, उसका हाथ फिसल कर मेरे लुंड वाले भाग पर भी चला गया था, वैसे भी उसके ऐसे पकड़ने से लुंड में थोड़ा तनाव तो था hi, उसने और कोई तो हरकत नहीं की पर अपना हाथ वैसे hi राख्छोडा. मेरी समाज में नहीं आ रहा था की ये सब वो जानबूझकर कर रही है की अनजाने में. मेने उसे घर छोड़ा और में अपने रस्ते निकल गया. कंस्ट्रक्शन साइट पैर जब में पंहुचा तो जैसे भोली मेरा hi इंतजार कर रही थी. में अपने काम में लग गया, भोली से ज्यादा झुमरी मेरे सामने नखरे दिखा रही थी.
ऐसा इस लिए हो रहा था की जुमारी, कमली और भोली में उस कल की बात को ले कर चर्चा हुई थी, जुमारी, भोली के पीछे hi पद गयी थी, क्या हुआ क्या हुआ पूछे जा रही थी, भोली कुछ नहीं बता रही थी, जुमारी ने बहोत मनाया तब जेक भोली ने जो कुछ हुआ वो बताया, जिसे सुन कर झुमरी आश्चर्य से भर गयी,
झुमरी : क्या सच में तूने उसका लुंड चूसा था?
भोली : है, अगर तू अपनी तंग न ादती तो शायद बाबू मुझे छोड़ भी लेता. तेरी वजह से सब ख़राब हो गया, कितना मज़ा आ रहा था, बाबुका लुंड कितना मस्त गोरा गोरा था, और बड़ा इतना की मुँह में भी नहीं समां रहा था, मेरी तो छूट पानी पानी हो गयी थी. कामिनी तू न आती तो बाबू का वो लुंड में अपनी छूट में ले भी चुकी होती.
झुमरी : क्या सच में इतना बड़ा था? (कमली भी शांति से सब सुन रही थी)
भोली : तो क्या में झूठ बोल रही हु, बाबू का लुंड कितना मस्त था, मुझे तो अभी भी वही दिखाई दे रहा है, मेरी छूट में तो अभी भी पानी आ रहा है.
झुमरी : तुजे दर नहीं लगता?
भोली : इसमें डरना कैसा, मेने तो सुना है की इतना बड़ा लुंड तो नसीबवाली को मिलता है, कल तो में बाबू को पकड़ hi लुंगी, और तुजे कह देती हु, अबकी बार बिच में आयी तो तेरी खैर नहीं.
झुमरी : क्यों, वो तेरा खसम है क्या, में भी बाबूसे छुडवाउंगी. (ऐसे hi दोनों लड़ झगड़ रही थी)
आज भी झुमरी बार बार मुझे रिझाने की कोशिस में मेरे आगे पीछे घूम रही थी, वो मेरे सामने अपनी गांड मटकते हुए चलती और मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी, झुमरी के बार बार ऐसा करने से भोली को चांस नहीं मिल रहा था, वो दोनों कभी कभी आपस में उलझ भी रही थी.
भोली : तू क्यों बार बार मेरे रस्ते में आ रही है?
झुमरी : तो क्या, बाबू सिर्फ तेरा hi है, मुझे भी वो पसंद है, अगर वो मेरे साथ भी करे तो तुजे क्या दिक्कत है?
भोली : बाबू को सिर्फ में hi पसंद हु, वो मेरे साथ hi करेगा, देखलेना.
झुमरी : देखलेंगे.
में उन्दोनो की हरकते देख रहा था, पर सुपरवाइजर और में दोनों साथ में काम देख रहे थे तो कोई मौका नहीं मिला था उन दोनों को. शाम को मेने भार्गवी मैडम को भी फ़ोन किआ तो वो बिजी थी. मेने सोचा की एक बार काव्य मैडम को भी पूछ लू की अब कैसा है तो मेने उन्हें फ़ोन लगा दिया.
काव्य : Hello.
शिव : Hello, में शिव बोल रहा हु.
काव्य : तुम्हारा नंबर सेव है, मुझे पता है, कहो. (काव्य को बहोत शर्म आ रही थी, शिव से बात करने में, कल की घटना के बाद वो देर तक सो नहीं पायी थी, बार बार उसे अपनी योनि के पास शिव का वो स्पर्श महसूस हो रहा था, कैसे उसने शिव को वह छूने दिया था ये सोच सोच कर hi उसे शर्म आजाती थी, कभी कभी वो अपने आप पर गुस्सा भी हो जाती thi,ki कैसे वो ऐसा कर सकती है, पर फिर खुद को hi वो समजती थी की कबतक वो ऐसे कुवारी रहेगी, शादी उसे करनी नहीं थी, पर क्या सेक्स भी नहीं कर शक्ति. कभी कभी उसका मान कहता की अगर सेक्स hi करना है तो शादी कर ले, पर फिर मान और भी कहता की सिर्फ सेक्स के लिए शादी? न जाने कितनी hi बार वो ऐसे तर्क वितर्क कर चुकी थी.)
शिव : मेने बस तबियत पूछने के लिए फ़ोन किआ था, अब दर्द कैसा है? (अब उसे दर्द नहीं था, पर फिर भी उसने कोई जवाब नहीं diya)hello , क्या हुआ मैडम? मेने पूछा, की दर्द कैसा है?
काव्य : है अभी थोड़ा थोड़ा. (उसे खुद समाज नहीं आ रहा था की वो जूथ क्यों बोल रही है)
शिव : (थोड़ा चिंतित होते hue)Agar दर्द था तो फिर डॉक्टर के पास गयी थी आप?
काव्य : नहीं, उतना नहीं है, रहत है.
शिव : क्या में आजौ? (काव्य खामोश हो गयी, एक तरफ तो वो चाहती थी, पर दूसरी और उसे ऐसा करना चिप भी लग रहा था, उनको खामोस देख मेने फिर puchha)Kya में फिर आ जाऊ?
काव्य : में तुम्हे तकलीफ देना नहीं चाहती. (उसने सीधे सीधे इंकार भी नहीं किआ)
शिव : इसमें तकलीफ कैसी, ठीक है में आता हु थोड़ी देर में.
शिव ने फ़ोन काट दिया था, पर काव्य फ़ोन को हाथ में लिए फ़ोन को hi देख रही थी. वो समझने का प्रयत्न कर रही थी की वो क्या कर रही है, उसे ऐसा कोई दर्द नहीं है की उसे शिव से मालिस करवानी पड़े, पर उसको शिव का ऐसे छूना अच्छा लगने लगा था, वो सिर्फ पंतय में उसके सामने थी, ये सोच कर hi उसकी छूट में रिसाव होने लगा था, और जिस तरह शिव ने उसके अंग को छुआ था वो इतनी ज्यादा उत्तेजित महसूस कर रही थी की उसको अपने मान पर काबू hi नहीं था. पता नहीं आज क्या होगा, क्या वो फिर से उसके साथ वैसा hi करेगा, या और कुछ भी करेगा, क्या वो उसे करने देगी, मान तो उसका बहोत कर रहा था पर फिर भी कही न कही एक झिझक थी, वैसे तो उसको पता था की मर्द और औरत के बिच कैसे रिश्ते होते है पर फिर भी वो सब सुनी हुई बाटे थी, कभी उसने महसूस नहीं किआ था, न hi इतना ज्यादा खुल कर उसे पता था. वो बैठे बैठे न जाने क्या क्या सोच रही थी की दरवाजे की घंटी बजी, आज उसने गाउन पहन रक्खा था, उसकी धड़कने तेज चलने लगी, वो भरी कदमो से दरवाजे की और बढ़ी, धड़कते दिल से उसने दरवाजा खोला, सामने शिव hi था, उसकी मुस्कान देख उसके चेहरे पर मुस्कान तो आयी पर फिर अपने खयालो को सोच कर उसको शर्म आयी और उसने नज़ारे झुकाली और शिव को अंदर आने को कहा.
मैडम का व्यव्हार कुछ अजीब था, वो शर्मा रही थी और थोड़ी परेशान भी लग रही थी, शायद कल की वजह से, वो मेरे साथ किस परिस्थिति में थी, ये सोच कर मुझे भी एक अजीब सी उल्जन हो रही थी, मेने अंदर आते हुए कहा.
शिव : गुड इवनिंग मैडम.
काव्य : हम्म्म, गुड इवनिंग, बैठो में पानी लती hu(wo किन्ही खयालो में थी, वो किचन की और बढ़ गयी, पर मेने नोटिस किआ की वो ठीक से चल रही थी, मेरी समाज में नहीं आया की अगर उनको दर्द है तो वो ठीक से कैसे चल रही है, और अगर दर्द नहीं है तो फिर उन्होंने मुझे क्यों कहा, में सोचते हुए सोफे पर बेथ गया, वो पानी ले कर आयी और मुझे दिया, मेने जब उनकी आँखों में देखा तो उन्होंने अपनी नज़ारे झुका ली, मेने पानी लिए और पि लिया, गिलास देने के बाद मेने कहा)
शिव : आप तो अच्छे से चल प् रही है.
काव्य : (उनके चेहरे पर उल्जन आ गयी फिर वो शांत हो गयी) वो दर्द है पर हल्का हल्का.
शिव : तो क्या आपको मालिस की जरुरत है?
काव्य : (कुछ देर वो मेरी आँखों में देख रही थी, जैसे जान न चाहती हो की में क्या सोच रहा हु, क्या बिना दर्द के मेरी इच्छा है उनकी मालिस करने ki)Tumhe जैसा ठीक लगे. (उन्होंने धीमी आवाज में hi जवाब दिया, मुझे लग रहा था की कुछ न कुछ तो जरूर है, शायद वो कुछ और चाहती है, पर फिर में संभल गया क्यों की अगर मेरी सोच गलत निकली तो गड़बड़ हो सकती है)
शिव : ठीक है चलिए अंदर चलते है. (मेने भी सोचा की देखा तो जाये की जो में सोच रहा हु वो सही है की नहीं)
काव्य : हम्म्म. (हम दोनों अंदर की और चलने लगे, मेरा दिल जोरो से धाकड़ रहा था, ऐसे सोचो तो कुछ भी अजीब नहीं था पर फिर भी मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे आज शिव कुछ न कुछ जरूर करेगा, अगर उसने कुछ किआ तो में क्या करुँगी, मुझे कुछ समाज नहीं आ रहा था, मेरी धड़कने इतनी तेज चल रही थी की में उसे सुन प् रही थी, एक के होते हुए भी मुझे पसीना आ रहा था, मेने एक का तापमान और काम कर दिया, मेरी हालत ऐसी थी की में शिव की और देख भी नहीं प् रही थी, मुझे इतनी शर्म आ रही थी की बोलने की भी हालत में नहीं थी)
सरितादिदी मेरे बिस्तर पर बैठी हुई थी, में समाज गया की ये आज मेरे साथ hi सोनेवाली है, पता नहीं पर अब मुझे किसी चीज का दर नहीं था, मुझे ये भी लग रहा था की यहाँ हर कोई सब कुछ जनता है, सब एक दूसरे के बारे में जानते है, भले hi कोई खुल कर बात नहीं करता. मेने किताब बंद की और बिस्तर पर जा कर लेट गया.
शिव : दीदी आप यहाँ? (मेने बस ऐसे hi पूछा था)
सरितादिदी : क्यों नहीं आना चाहिए था? (उन्होंने एक ऐडा से मेरी और देखते हुए कहा, वैसे भी लड़कीओ का थोड़ा नखरा करना बनता है, इस से उनके प्रति एक अलग hi खिंचाव महसूस होता है, वैसे भी में आज पुरे दिन से गरम था, पहले नाज़िआदिदी की वजह से फिर काव्य मैडम की वजह से, मुझे भी सेक्स की सख्त जरुरत थी, और दीदी आयी थी मतलब वो भी तड़प रही थी)
शिव : (उनको खिंच कर मेरे बाजु में लेटाया तो वो बिना किसी विरोध के लेट गयी और मेरी आंखोमे देखने lagi)Mene ऐसा थोड़ी न कहा था, मेने तो बस ऐसे hi कहा था, में ये पूछ रहा था की थोड़ी देर रुकने आयी हो की पूरी रात?
सरितादिदी : (उनके चेहरे पर शर्मीली मुस्कान आ gayi)Jaisa तू कहे.
शिव : (मेने उनके स्तन को कास के दबा दिया तो उनकी सिसकी निकल gayi)Ye कुछ बड़े नहीं हो गए दीदी?
सरितादिदी : शहहहहह इतनी जोर से दबाएगा तो बड़े तो होंगे hi, शहहह थोड़ा धीरे सीईव.
शिव : (हलके हाथो से दबाते hue)Aap को देख कर रहा नहीं जाता, सॉरी.
सरितादिदी : सॉरी मात बोल, वैसे भी तेरे साथ करना है तो दर्द की आदत डालनी hi पड़ती है, (थोड़ी देर उनके स्तन दबाने और किश करने के बाद मेने उनके सरे कपडे निकल दिए और में खुद भी नंगा हो गया, वो बिस्तर पर बैठी हुई थी मेने लुंड उनके मुँह के सामने कर दिया जिसे उन्होंने बड़े प्यार से अपने मुँह में भर लिया, में उनका शिर सेहला रहा था और वो चूस रही थी, वो कभी मेरे लुंड को बहार निकल कर हिला रही थी तो कभी अपने मुँह में ले रही थी, मेने उन्हें थोड़ी देर करने दिया.
शिव : (तक़रीबन दस मिनट बाद मेने अपना लुंड बहार निकला, उन्होंने मेरी और देखा, वो भी समाज गयी और लेट गयी और अपनी टंगे घुटनो से मोड़ कर पकड़ ली और फैला दी, हम दोनों अब एक दूसरे को समझते थे तो कहने की जरुरत नहीं पड़ती थी, मेने उनकी टैंगो के बिच बेथ गया और उनकी छूट को चाट कर उन्हें भी मज़ा देने लगा)
सरितादिदी : शह्ह्ह्ह शीइइइइव शह्ह्ह्हह्ह शह्ह्ह्हह्ह (वो लगातार सिस्किअ ले रही थी, थोड़ी देर उनकी छूट को अच्छे से चाटने के बाद मेने लुंड लगाया और हलके धक्के के साथ लुंड अंदर दाल diya)Ahhhhhh शह्ह्हह्ह्ह्ह. (दीदी मेरे सामने किसी छोटी लड़की की तरह लगती थी, उनका शरीर मेरे सामने बहोत छोटा था, छोटी सी छूट भी पूरी फ़ैल गयी, मेने उन्हें पकड़ कर धक्के लगाने laga)Ahhhhh शह्ह्ह्ह शहहहहह अह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह अह्ह्ह्हह शहहहहह अह्ह्ह अह्ह्ह शहहह शिईयिव शह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह.
शिव : मज़ा आ रहा है दीदी?
सरितादिदी : हा शह्ह्ह्ह बहोत मज़ा आ रहा है शह्ह्ह्ह तेरा बड़ा लुंड मुझे बहोत मज़ा दे रहा है शहहहहह.
पंद्रह मिनट तक में उन्हें छोड़ता रहा, कभी घोड़ी बनाया तो कभी बैठे बैठे, वो झाड़ गयी, और मुज से लिपट कर हांफ रही थी. में उनके कूल्हों को मसलते हुए हलके हलके उन्हें ऊपर निचे कर रहा था.
सरितादिदी : शहहहहह शिईयिव शह्ह्ह्ह, मेरे शिव शहहह. तेरे साथ इतना मज़ा आता है की में बयां नहीं कर शक्ति.
शिव: अभी पूरा मज़ा कहा लिया है, अभी मेरे बाकि है.
सरितादिदी : में जानती हु, मेरा शेर इतनी जल्दी ढेर नहीं होनेवाला, आज में अपने शेर का मेरे पिछवाड़े में लेना चाहती हु.
शिव : दर्द होगा. (मेने उन्हें चेताया)
सरितादिदी : होने दे, ये नया अनुभव मेरे दिमाग में हमेशा के लिए छाप जायेगा, तू हमेशा के लिए मेरे दिल में कैद हो जायेगा. तू रुक में तेल ले कर आती हु. (पता नहीं उनके दिमाग में क्या चल रहा था, वो उठी और दरवाजा खोला और झक के बहार देखा, वो नंगी hi थी, में उनके कूल्हों को देख रहा था, आज उनका उद्घाटन होनेवाला था. बहार सब शांत देख कर वो बहार चली गयी और थोड़ी देर में हाथ में तेल की कटोरी लिए वापस आ गयी, आते हुए वो मुस्कुरा रही थी)
शिव : क्या हुआ?
सरितादिदी : वो में नंगी घर में घूम रही थी न तो ये सोच कर hi हसी आ गयी.
शिव : आप बहोत नटखट हो. में भी यही सोच रहा था की आप बिना कपड़ो के क्यों गयी.
सरितादिदी : ऐसी अतरंगी चीजे करने में मज़ा आता है, ले अब इसे लगा दे. (उन्होंने मेरी और कटोरी बधाई और वो बिस्तर पर उलटी लेट गयी)
शिव : कहा लगाना है? (मेने मज़े लेते हुए पूछा)
सरितादिदी : आ है, अनजान तो ऐसे बन रहा है जैसे कुछ पता न हो, में सब जानती हु की तू सब जनता है, अब ज्यादा नाटक मत कर और अपना काम कर, वैसे भी ये सोच कर मेरी जान हलक में फांसी है की आज तेरा बड़ा लुंड मेरे पिछवाड़े में घुसनेवाला है.
शिव : (मेने तेल लिया और उनके सुडौल कूल्हों पर डाला, अब में बड़े बड़े कूल्हे देख चूका था तो उनके मुकाबले ये छोटे थे पर आकर्षक वैसे hi थे, में कूल्हों को मसलने लगा)
सरितादिदी : कूल्हों पर क्यों तेल दाल रहा है, वह छेड़ में डालना था.
शिव : पता है, पर इन्हे भी थोड़ा चमका दू, वैसे भी आकर्षक है थोड़े और आकर्षक हो जायेंगे.
सरितादिदी : (मंद मंद मुस्काते hue)Achchha शिव ये तो बता, तुम लड़को को ये कूल्हे क्यों इतने पसंद होते है?
शिव : वो तो पता नहीं है दीदी, पर लड़कीओ के कूल्हे उनकी और आकर्षित करते है.
सरितादिदी : वैसे कितनी लड़कीओ के कूल्हे ऐसे नंगे देख चूका है?
शिव : छोडो न दीदी, वो बताने की बात नहीं है.
सरितादिदी : क्यों, इसमें छुपानेवाली कोनसी बात hai.(Mene ऊँगली को तेल में डुबो कर उनकी गांड के छेड़ में dala)Shhhhhhh (अंदर गरम गरम भाठी थी, अजीब लग रहा था, मेने कूल्हे को थोड़ा फैलाकर छेड़ में जाती ऊँगली को देखा, बाटे हमारी जारी थी)
शिव : अभी आप पूछोगी की कितनी फिर पूछोगी कोण, तो में बता नहीं पाउँगा.
सरितादिदी : क्यों? मुझसे कैसी शर्म. (में ऊँगली अंदर बहार करते हुए और तेल लगा रहा था, छडे अंदर से भी चिकना हो रहा था)
शिव : ऐसी बात नहीं है दीदी, पर सोचो , में आपके बारे में किसी को बताऊ तो कैसा लगेगा.
सरितादिदी : ये निर्भर करता है की तू किस को बता रहा है, सिर्फ अपनी बड़ाई करने के लिए किसी लड़के को या किसी अपनी चाहेवाली को, जिस तरह तू मुझे बता सकता है, वैसे hi अगर तू मेरे जैसी किसी और को बताएगा तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, हो सकता है की इस बात के चलते हम दोनों नजदीक आ जाये.
शिव : ये बात तो आपकी सही है. पर अभी नहीं, अभी तो पहले इस छेड़ ने मेरा हल ख़राब कर रक्खा है, थोड़ा ऊपर हो जाइये (मेने उन्हें घोड़ी बना दिया और फिर से तेल अंदर तक दाल दिया, फिर अपने लुंड पर भी तेल लगा दिया, और लुंड को गांड के छेड़ पर घिसने laga)Aap तैयार हो दीदी?
सरितादिदी : है शिव, पर ध्यान से, मुझे पता नहीं है की क्या होगा?
शिव : चिंता मात कीजिये, कुछ नहीं होगा.
सरितादिदी : है तुजे तो सब पता hi होगा, ठीक है पर आराम से (मेने लुंड को छेड़ पर सताया और अंदर धकेलने लगा, मुझे पता था की थोड़ा जोर लगेगा, एक बार छल्ला पर हो जाये तो फिर कोई दिक्कत नहीं, छेड़ फ़ैल रहा था, लुंड के दबाव से छेड़ अंदर तक डांस रहा tha)Ammmmmm(Unhe शायद दर्द हो रहा था जो वो अपना मुँह दबाये हुए थी, आधेसे ज्यादा सूपड़ा अंदर चला गया था, मेने थोड़ा जोर से धक्का दिया तो छेड़ फैलते हुए लुंड अंदर घुस गया, और टोपा छेड़ में चला gaya)Ahhhhhhh. (में रुक गया, और हाथ आगे बढ़ा कर उनके लटकते स्तन सहलाने लगा)
शिव : दर हो रहा है दीदी?
सरितादिदी : है, ऐसा लग रहा है की छेड़ पूरी तरह फ़ैल गया है, इतना तंग हो गया है की अभी फैट जायेगा.
शिव : कुछ नहीं होगा दीदी, वैसे भी वो छेड़ रोज फैलता सिकुड़ता है तो उसे आदत होती है. पर आपकी इच्छा पूरी हो गयी, आपकी गांड में मेरा लुंड है दीदी.
सरितादिदी : (दर्द में भी मुस्कुराते hue)Tuje कैसा लग रहा है वह?
शिव : बहोत गरम गरम है अंदर.
सरितादिदी : अपने पानी से उसे ठंडी कर देना.
शिव : आप बहोत अच्छी हो दीदी. (वो मुस्कुरायी, थोड़ी देर इंतजार करने के बाद में ने लुंड को थोड़ा हिलाया तो उन्हें रहत थी, में लुंड अंदर डालने लगा जो अब आराम से अंदर जा रहा था, वैसे भी गांड का अंदर का हिस्सा छूट की तरह सिकुड़ा नहीं होता, तो आहिस्ता आहिस्ता मेने पूरा लुंड अंदर दाल diya)Didi, पूरा अंदर चला गया.
सरितादिदी : में महसूस कर प् रही हु शिव, मुझे यकीं नहीं हो रहा है की तेरा इतना बड़ा अंदर चला गया.
शिव : कैसा लग रहा है?
सरितादिदी : अभी तो पता नहीं, पर ये सोच कर की तूने मेरी गांड में अपना लुंड दाल दिया है ये सोच कर hi एक अजीब सी खुसी मिल रही है.

शिव : थोड़ी देर में दूसरी भी खुसी मिलेगी आपको (में हलके हलके धक्के लगाने लगा, तेल की चिकनाहट और मेरे लुंड से निकल रहे रास की चिकनाहट से छेड़ चिकना हो गया था तो लुंड आराम से अंदर बहार हो रहा था, पतली कमर और उसीके हिसाब से चौड़े कूल्हे, उनको और आकर्षक बना रहा था, गोलाकार कूल्हे दबाते हुए में उन्हें छोड़ रहा था, दीदी की आवाजे बता रही थी की उन्हें दर्द भी है पर इसमें में कुछ नहीं कर शक्ति था, में उनकी गांड के छेड़ को देख रहा था, वो बहोत फ़ैल गया था, और छले पर कई जगह खिंचाव से लाला लाल दिखाई दे रहा था, गोलाकार दो कूल्हों के बिच में छोटेसे छेड़ में अंदर बहार हो रहा मेरा लुंड देख कर मुझे जोश आ रहा था, थोडिएर देर उन्हें ऐसे छोड़ते रहने के बाद में थोड़ी तेजी से में धक्के लगाने लगा, अब उनकी सिस्किअ बढ़ गयी थी जो बताता था की अब उन्हें मज़ा आ रहा hai)Achchha लग रहा है दीदी?

सरितादिदी : हआ शिव शहहह अच्छा लग रहा है, छूट जितना तो नहीं पर मज़ा आ रहा है.
शिव : अगर छूट में ज्यादा मजा आता है तो फिर छूट में दालु?
सरितादिदी : नहीं अभी थोड़ी देर इस नए मज़े का मज़ा लेने दे, मुझे पता है की लड़को को लड़कीओ की गांड मरने में बहोत मज़ा आता है, में वो मज़ा तुजे देना चाहती हु, अपनी गांड में तेरे लुंड को अच्छे से महसूस करना चाहती hu(Didi बहोत समर्पित थी मेरे प्रति, में उनका प्यार देख रहा था, मेरी खुसी के लिए वो कुछ भी करने को तैयार थी, थोड़ी देर तक में उनकी गांड मरता रहा, और साथ में उनकी छूट में भी ऊँगली दाल कर छूट का भी मज़ा देने लगा.) दो जगह पर एक साथ छोड़ने का एक अलग hi मज़ा है शिव, तेरी ऊँगली भी मुझे लुंड जैसी लग रही है, शह्ह्ह्हह्ह बहोत अच्छा लग रहा hai.(Thodi देर में उनकी गांड मरता रहा, फिर मेने लुंड बहार nikaldiya)Kya हुआ, बहार क्यों निकल लिया?
शिव : अब में छूट में लुंड डालता हु, आपको वह ज्यादा मज़ा आता है न.
सरितादिदी : तुजे जो करना है कर शिव, मुझे हर तरह से मज़ा hi मिल रहा है.

मेने लुंड बहार निकला और छूट में दाल दिया, तेज तेज धक्को से वो पूरी हिल रही थी, और उनकी सिसकीओ से पूरा कमरा गूंज रहा था, शायद उन्हें इसकी कोई फ़िक्र नहीं थी, लगातार मेरे लुंड से छोड़ने पर वो फिरसे झाड़ गयी, वो बिस्तर पर उलटी लेट गयी थी और हांफ रही थी, मेने फिर से गांड में लुंड दाल दिया, वो थोड़ी करहि पर फिर मजे से सिस्किअ लेने लगी, अपने निचे दबोच कर में उनकी गांड में लुंड डेल जा रहा था, वो पशीने से भीग चुकी थी और में भी, मेने उन्हें निचे दबोच कर उनकी पीठ और गले पर किश करते हुए उन्हें छोड़ रहा था, ऐसे hi हम दोनों काफी देर तक लगे रहे,

upload
मेने उन्हें सीधा किआ और टंगे पकड़ कर ऊपर ले जाते हुए लुंड गांड के छेड़ में दाल दिया, उन्होंने अपनी टंगे खुद पकड़ ली, में लगातार उनकी गांड में लुंड दाल कर छोड़ रहा था, वो आहे भर रही थी, छूट के मुकाबले गांड में ज्यादा घर्षण मिल रहा था जिस वजह से मेरा भी होनेवाला था.
शिव : दीदी मेरा होनेवाला है.
सरितादिदी : हम्म्म्म शहहहहह अंदर hi डालदे शहहहहह, में भी झाड़नेवाली हु शहहहहह तेरे साथ छोड़ने पर असली सुख मिलता है शहहहहह अह्ह्ह्हह मेरी गांड शहहह अह्ह्ह्हह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह शहहह में गयी शहहह अह्हह्ह्ह्ह maaaaaa(wo झाड़ गयी और आखिर कर मेने भी अपना लावा उनकी गांड में भर दिया, दोनों थक गए थे. (में जैसे hi साइड में लेता दीदी मेरी साइड से मेरी बाहोंमे आ gayi)Kaisa लगा तुजे? (उन्होंने मेरा लुंड पकड़ लिया और सहलाने लगी)
शिव : बहोत मज़ा आया, आपको?
सरितादिदी : मुझे भी (वो मुझे किश करने लगी और में उनके कूल्हों को मसल रहा था, थोड़ी देर हम दोनों ऐसे hi किश करते रहे).
शिव : यही सोनेवाली हो?
सरितादिदी : है, क्यों कोई दिक्कत है तुजे?
शिव : नहीं, ऐसे hi पूछ रहा था. (वो मेरा लुंड सेहला रही thi)Fir से करना है?
सरितादिदी : (उन्होंने शर्मा के मुझे देखा फिर मुस्कुराते हुआ kaha)Ha.
शिव : थकी नहीं?
सरितादिदी : थक गयी हु पर दिल नहीं मंटा, ऐसा लगता है की तेरा ये अंदर लिए hi rahu.(Unki बात सुन कर में मुस्कुराया, थोड़ी देर बाद फिर से मेने उन्हें छोड़ा,

image uploader


मेरा दूसरी बार था तो पानी निकलने में वैसे भी देर लगी, आखिर कर हम दोनों थक कर वैसे hi सो गए)
दूसरी और काव्य को नींद hi नहीं आ रही थी, आज जो कुछ भी हुआ था वो उसे बार बार महसूस कर रही थी, उसका दिल बेचैन था, कभी वो अपनी झांघो को सेहला देती तो कभी उसका हाथ अपनी छूट पे चला जाता था, उसको इस बेचैनी की वजह समाज नहीं आ रही थी, वो बार बार शिव को याद कर रही थी. अपनी बेचैनी को काम करने के लिए उसने सोने का प्रयास किआ पर नीं भी जैसे कोसो दूर थी.
यहाँ सुबह दरवाजा खत खतने की आवाज से मेरी नींद खुल गयी, सरितादिदी अभी भी नंगी hi लेती हुई थी.
शिव : कोण?
लतादिदी : में हु, स्कूल नहीं जाना क्या?
शिव : (लतादिदी की आवाज थी, पर में नार्मल hi रहा, में इतना तो समज चूका था की ये दोनों आपस में अच्छी सहेलिया है और एक दूसरे की राजदार भी है तो मेने नॉर्मली hi जवाब diya)Jana है दीदी, आप चलिए, में आता हु.
लतादिदी : ठीक है. (उनके कदमो की आवाज दूर जाती सुनाई दे रही थी, में उठा और सरितादिदी को उठाया)
शिव : डीडीई, उठो, सुबह हो गयी है.
सरितादिदी : नींद में hi, में आती हु तू जा. (अब में क्या कहता, में दरवाजा ऐडा के बहार निकल गया, और बाथरूम में घुस गया)
सरिता उठी, अपने कपडे पहने, उसकी गांड के छेड़ में दर्द हो रहा था, पर बहार तो जाना hi था. उसने थोड़ा सा दरवाजा खोला और बहार देखा, किचन से आवाजे आ रही थी, पर वह कोई नहीं था, वो बहार निकली और चलते हुए बाथरूम की और जाने लगी, गांड में दर्द हो रहा था तो वो अपनी टंगे फैलाये चल रही थी. बाथरूम से जब वो किचन में पहुंची तो वह सब थे, लता गैस पर कुछ पका रही थी, विणा और रंजन रोटीआं बेल रही थी और गायत्री रोटीआं सेक रही थी, सरिता ने बहोत सँभालने की कोशिस की पर वो ठीक से चल नहीं प् रही थी, वो अपनी टंगे फैलाये हुए चल रही थी, जब रंजन की नजर पड़ी तो वो अपना मुँह दबाये हसने लगी, जिसे देख विणा ने भी सरितादिदी को देखा, वो बड़े गौर से उन्हें देख रही थी, उनकी हालत से वो समाज रही थी की क्या हुआ होगा, पर उसको हसी नहीं आ रही थी बल्कि दीदी पर दया आ रही थी. गायत्री की भी नज़र पड़ी, वो जानती तो थी पर फिर भी सरीतकी खिंचाई करते हुए बोली
गायत्री : ऐसे क्यों चल रही है, कुछ हुआ है क्या? (बोलते बोलते उनकी भी हसी निकल गयी)
लतादिदी : क्यों उसको तंग कर रहे हो, अपना अपन काम करो (सरिता ko)Tu क्यों आयी, थोड़ी देर आराम कर लेती.
सरिता : (थोड़ा शरमाते hue)Nahi में ठीक हु, बस वो बाथरूम में पेअर फिसल गया तो दर्द हो रहा है. (गायत्री और रंजन जोर जोर से हसने लगे)
लता : चुप, चुप बोलै न.
यहाँ सब को पता था की क्या हुआ होगा, पर फिर भी सब खुल कर नहीं बोल रहे थे, सब जानते थे की उनकी भी ऐसी hi हालत होती है, हर कोई सब कुछ जानते हुए भी एक दूसरे की इज्जत नहीं उछाल रहे थे, सब आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए थे. विणा को ये देख कर बहोत आश्चर्यहो रहा था.
सरिता : ला, में सब्जी का ध्यान रखती हु तू कुछ और कर ले.
में पंहुचा तो सब काम में लगे हुए थे. थोड़ी देर बाद में नास्ता कर के वह से निकल गया. आज भी रस्ते में मुझे वैस्वी और संयम मिल गए, नाज़िआ दीदी भी थी. जब में वह पंहुचा तो संयम बोली.
संयम : लो शिव आ गया, अब चले?
शिव : क्यों क्या हुआ?
संयम : कुछ नहीं, मेने कहा की स्कूल चलते है तो ये वैस्वी कह रही थी की शिव को आ जाने दो साथ में चलते है.
शिव : मतलब तू नहीं चाहती थी की में स्कूटर पर औ.
संयम : मेने ऐसा कब कहा, पर ये अब बदल गयी है, पहले तुजसे दूर भगति थी, और अब जब देखो तब शिव शिव करती रहती है. (उसकी बाते सुन कर मेने देखा की वैस्वी बहोत शर्मा रही थी, और अपनी नज़ारे झुकाये कड़ी थी)
नाज़िआ : अब देर नहीं हो रही तुमलोगो को?
संयम : में तो कब से कह रही थी, आइये शिव महाराज, बिराजिये ताकि हम जा सके. (में हस्ते हुए स्कूटर पर बेथ गया, संयम फिर से मेरे पीछे hi बैठी, और आखिर में वैस्वी, जैसे hi हम नाज़िआ दीदी से दूर हुए, संयम ने मेरी कमर में हाथ दाल दिया, मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे उसने जितनी जरुरी था उस से ज्यादा जोर से पकड़ा हुआ था, और साथ में वो अपने स्तन भी मेरी पीठ पर दबा रही थी, अक्सर लड़कीअ ऐसे बैठती है की उसके स्तन आगे पीठ पर न लगे, पर संयम के स्तन मुझे अपनी पीठ पर महसूस हो रहे थे, मेने उसे नॉर्मली hi लेने का सोचा, और में स्कूल की ार बढ़ता रहा.)
स्कूल में भी आज हम सब साथमे hi बैठे थे, वैस्वी ऐसे बैठी थी की उसका शरीर मुज से टच हो रहा था, एक बार तो उसने मेरे हाथ पर भी अपना हाथ रख दिया, सब खाने में लगे हुए थे तो किसी का ध्यान नहीं गया, मेने उसकी और देखा तो वो शर्मा के मुस्कुराने लगी. स्कूल से लौट ते वक़्त भी संयम वैसे hi बैठी थी, उसका हाथ फिसल कर मेरे लुंड वाले भाग पर भी चला गया था, वैसे भी उसके ऐसे पकड़ने से लुंड में थोड़ा तनाव तो था hi, उसने और कोई तो हरकत नहीं की पर अपना हाथ वैसे hi राख्छोडा. मेरी समाज में नहीं आ रहा था की ये सब वो जानबूझकर कर रही है की अनजाने में. मेने उसे घर छोड़ा और में अपने रस्ते निकल गया. कंस्ट्रक्शन साइट पैर जब में पंहुचा तो जैसे भोली मेरा hi इंतजार कर रही थी. में अपने काम में लग गया, भोली से ज्यादा झुमरी मेरे सामने नखरे दिखा रही थी.
ऐसा इस लिए हो रहा था की जुमारी, कमली और भोली में उस कल की बात को ले कर चर्चा हुई थी, जुमारी, भोली के पीछे hi पद गयी थी, क्या हुआ क्या हुआ पूछे जा रही थी, भोली कुछ नहीं बता रही थी, जुमारी ने बहोत मनाया तब जेक भोली ने जो कुछ हुआ वो बताया, जिसे सुन कर झुमरी आश्चर्य से भर गयी,
झुमरी : क्या सच में तूने उसका लुंड चूसा था?
भोली : है, अगर तू अपनी तंग न ादती तो शायद बाबू मुझे छोड़ भी लेता. तेरी वजह से सब ख़राब हो गया, कितना मज़ा आ रहा था, बाबुका लुंड कितना मस्त गोरा गोरा था, और बड़ा इतना की मुँह में भी नहीं समां रहा था, मेरी तो छूट पानी पानी हो गयी थी. कामिनी तू न आती तो बाबू का वो लुंड में अपनी छूट में ले भी चुकी होती.
झुमरी : क्या सच में इतना बड़ा था? (कमली भी शांति से सब सुन रही थी)
भोली : तो क्या में झूठ बोल रही हु, बाबू का लुंड कितना मस्त था, मुझे तो अभी भी वही दिखाई दे रहा है, मेरी छूट में तो अभी भी पानी आ रहा है.
झुमरी : तुजे दर नहीं लगता?
भोली : इसमें डरना कैसा, मेने तो सुना है की इतना बड़ा लुंड तो नसीबवाली को मिलता है, कल तो में बाबू को पकड़ hi लुंगी, और तुजे कह देती हु, अबकी बार बिच में आयी तो तेरी खैर नहीं.
झुमरी : क्यों, वो तेरा खसम है क्या, में भी बाबूसे छुडवाउंगी. (ऐसे hi दोनों लड़ झगड़ रही थी)
आज भी झुमरी बार बार मुझे रिझाने की कोशिस में मेरे आगे पीछे घूम रही थी, वो मेरे सामने अपनी गांड मटकते हुए चलती और मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी, झुमरी के बार बार ऐसा करने से भोली को चांस नहीं मिल रहा था, वो दोनों कभी कभी आपस में उलझ भी रही थी.
भोली : तू क्यों बार बार मेरे रस्ते में आ रही है?
झुमरी : तो क्या, बाबू सिर्फ तेरा hi है, मुझे भी वो पसंद है, अगर वो मेरे साथ भी करे तो तुजे क्या दिक्कत है?
भोली : बाबू को सिर्फ में hi पसंद हु, वो मेरे साथ hi करेगा, देखलेना.
झुमरी : देखलेंगे.
में उन्दोनो की हरकते देख रहा था, पर सुपरवाइजर और में दोनों साथ में काम देख रहे थे तो कोई मौका नहीं मिला था उन दोनों को. शाम को मेने भार्गवी मैडम को भी फ़ोन किआ तो वो बिजी थी. मेने सोचा की एक बार काव्य मैडम को भी पूछ लू की अब कैसा है तो मेने उन्हें फ़ोन लगा दिया.
काव्य : Hello.
शिव : Hello, में शिव बोल रहा हु.
काव्य : तुम्हारा नंबर सेव है, मुझे पता है, कहो. (काव्य को बहोत शर्म आ रही थी, शिव से बात करने में, कल की घटना के बाद वो देर तक सो नहीं पायी थी, बार बार उसे अपनी योनि के पास शिव का वो स्पर्श महसूस हो रहा था, कैसे उसने शिव को वह छूने दिया था ये सोच सोच कर hi उसे शर्म आजाती थी, कभी कभी वो अपने आप पर गुस्सा भी हो जाती thi,ki कैसे वो ऐसा कर सकती है, पर फिर खुद को hi वो समजती थी की कबतक वो ऐसे कुवारी रहेगी, शादी उसे करनी नहीं थी, पर क्या सेक्स भी नहीं कर शक्ति. कभी कभी उसका मान कहता की अगर सेक्स hi करना है तो शादी कर ले, पर फिर मान और भी कहता की सिर्फ सेक्स के लिए शादी? न जाने कितनी hi बार वो ऐसे तर्क वितर्क कर चुकी थी.)
शिव : मेने बस तबियत पूछने के लिए फ़ोन किआ था, अब दर्द कैसा है? (अब उसे दर्द नहीं था, पर फिर भी उसने कोई जवाब नहीं diya)hello , क्या हुआ मैडम? मेने पूछा, की दर्द कैसा है?
काव्य : है अभी थोड़ा थोड़ा. (उसे खुद समाज नहीं आ रहा था की वो जूथ क्यों बोल रही है)
शिव : (थोड़ा चिंतित होते hue)Agar दर्द था तो फिर डॉक्टर के पास गयी थी आप?
काव्य : नहीं, उतना नहीं है, रहत है.
शिव : क्या में आजौ? (काव्य खामोश हो गयी, एक तरफ तो वो चाहती थी, पर दूसरी और उसे ऐसा करना चिप भी लग रहा था, उनको खामोस देख मेने फिर puchha)Kya में फिर आ जाऊ?
काव्य : में तुम्हे तकलीफ देना नहीं चाहती. (उसने सीधे सीधे इंकार भी नहीं किआ)
शिव : इसमें तकलीफ कैसी, ठीक है में आता हु थोड़ी देर में.
शिव ने फ़ोन काट दिया था, पर काव्य फ़ोन को हाथ में लिए फ़ोन को hi देख रही थी. वो समझने का प्रयत्न कर रही थी की वो क्या कर रही है, उसे ऐसा कोई दर्द नहीं है की उसे शिव से मालिस करवानी पड़े, पर उसको शिव का ऐसे छूना अच्छा लगने लगा था, वो सिर्फ पंतय में उसके सामने थी, ये सोच कर hi उसकी छूट में रिसाव होने लगा था, और जिस तरह शिव ने उसके अंग को छुआ था वो इतनी ज्यादा उत्तेजित महसूस कर रही थी की उसको अपने मान पर काबू hi नहीं था. पता नहीं आज क्या होगा, क्या वो फिर से उसके साथ वैसा hi करेगा, या और कुछ भी करेगा, क्या वो उसे करने देगी, मान तो उसका बहोत कर रहा था पर फिर भी कही न कही एक झिझक थी, वैसे तो उसको पता था की मर्द और औरत के बिच कैसे रिश्ते होते है पर फिर भी वो सब सुनी हुई बाटे थी, कभी उसने महसूस नहीं किआ था, न hi इतना ज्यादा खुल कर उसे पता था. वो बैठे बैठे न जाने क्या क्या सोच रही थी की दरवाजे की घंटी बजी, आज उसने गाउन पहन रक्खा था, उसकी धड़कने तेज चलने लगी, वो भरी कदमो से दरवाजे की और बढ़ी, धड़कते दिल से उसने दरवाजा खोला, सामने शिव hi था, उसकी मुस्कान देख उसके चेहरे पर मुस्कान तो आयी पर फिर अपने खयालो को सोच कर उसको शर्म आयी और उसने नज़ारे झुकाली और शिव को अंदर आने को कहा.
मैडम का व्यव्हार कुछ अजीब था, वो शर्मा रही थी और थोड़ी परेशान भी लग रही थी, शायद कल की वजह से, वो मेरे साथ किस परिस्थिति में थी, ये सोच कर मुझे भी एक अजीब सी उल्जन हो रही थी, मेने अंदर आते हुए कहा.
शिव : गुड इवनिंग मैडम.
काव्य : हम्म्म, गुड इवनिंग, बैठो में पानी लती hu(wo किन्ही खयालो में थी, वो किचन की और बढ़ गयी, पर मेने नोटिस किआ की वो ठीक से चल रही थी, मेरी समाज में नहीं आया की अगर उनको दर्द है तो वो ठीक से कैसे चल रही है, और अगर दर्द नहीं है तो फिर उन्होंने मुझे क्यों कहा, में सोचते हुए सोफे पर बेथ गया, वो पानी ले कर आयी और मुझे दिया, मेने जब उनकी आँखों में देखा तो उन्होंने अपनी नज़ारे झुका ली, मेने पानी लिए और पि लिया, गिलास देने के बाद मेने कहा)
शिव : आप तो अच्छे से चल प् रही है.
काव्य : (उनके चेहरे पर उल्जन आ गयी फिर वो शांत हो गयी) वो दर्द है पर हल्का हल्का.
शिव : तो क्या आपको मालिस की जरुरत है?
काव्य : (कुछ देर वो मेरी आँखों में देख रही थी, जैसे जान न चाहती हो की में क्या सोच रहा हु, क्या बिना दर्द के मेरी इच्छा है उनकी मालिस करने ki)Tumhe जैसा ठीक लगे. (उन्होंने धीमी आवाज में hi जवाब दिया, मुझे लग रहा था की कुछ न कुछ तो जरूर है, शायद वो कुछ और चाहती है, पर फिर में संभल गया क्यों की अगर मेरी सोच गलत निकली तो गड़बड़ हो सकती है)
शिव : ठीक है चलिए अंदर चलते है. (मेने भी सोचा की देखा तो जाये की जो में सोच रहा हु वो सही है की नहीं)
काव्य : हम्म्म. (हम दोनों अंदर की और चलने लगे, मेरा दिल जोरो से धाकड़ रहा था, ऐसे सोचो तो कुछ भी अजीब नहीं था पर फिर भी मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे आज शिव कुछ न कुछ जरूर करेगा, अगर उसने कुछ किआ तो में क्या करुँगी, मुझे कुछ समाज नहीं आ रहा था, मेरी धड़कने इतनी तेज चल रही थी की में उसे सुन प् रही थी, एक के होते हुए भी मुझे पसीना आ रहा था, मेने एक का तापमान और काम कर दिया, मेरी हालत ऐसी थी की में शिव की और देख भी नहीं प् रही थी, मुझे इतनी शर्म आ रही थी की बोलने की भी हालत में नहीं थी)























