हल्दी चुमावन -पूनम
जब बुच्ची और लीला सूरजु को ले कर आंगन में पहुंचे तो पूरी घचमच मची थी खूब बड़ा सा आँगन, चारो और ढलान, आंगन इतना बड़ा की एक बरात एक साथ बैठ के भात खा ले, औरतें लड़कियां, काम करने वाली, हाँ मर्द लड़के कोई नहीं थी।
पर लौंडे बीच बीच में कुछ बहाने से दरवाजे के आसपास 'अपनी वाली' को झाँक जाते थे, इशारे बाजी कर लेते थे।
कम से कम सत्तर अस्सी औरतें लड़कियां, और आज गुट एकदम बंटे थे, सादी बियाह के घर में अक्सर कभी ननदें एक ओर तो भौजाइयां एक और तो कभी लड़कियां एक साथ और बियाहता एक साथ, लेकिन आज एकदम अलग मामला था।
सूरजु के ननिहाल की औरतें, लड़कियां सब बायीं ओर बैठी थीं, सूरजु के माई के मायके वालियां सब आज मिल गयी थीं, लड़कियां, सूरजु की मामियां, मौसी, ननिहाल की भाभियाँ, मंजू भाभी और रामपुर वाली भाभी, और उनकी छोटी बहन चुनिया तो सबसे आगे थीं।
और आज मंझली मामी, छोटी मौसी भी आ गयी थीं, और बड़ी मामी की लड़की रीनू, जो सूरजु की समौरिया थी, बियाह पिछले साल जेठ में हुआ था पर गौना अभी नहीं हुआ था, कल के रतजगे के बाद वो भी एकदम खुल गयी थी और चहक चहक के बोल रही थी, कम से कम पांच छह लड़कियां, कुँवारी, दो चार ब्याहता,, चार पांच भौजाइयां, और मौसी मामी भी जोड़ के कुल २५-२६ रही होंगी।
और आज इधर भी सूरजु के अपने गाँव का जमावड़ा भी कम नहीं था, दर्जन भर से ऊपर तो लड़कियां ही होंगी, उसमे चार पांच ब्याहता, आठ दस भाभियाँ, और फिर चाची, ताई, बूआ, कांति बूआ सब बड़की ठकुराइन के ससुराल में सबसे आगे और सब बहुओ को, लड़कियों को ललकार रही थीं।
और आज सूरजु के गाँव की लड़कियां भी जोस में थीं, क्योंकि उनकी दो ब्याहता बहने भी आ गयी थी।
और दोनों कुंवारे में भी सब लड़कियों की लीडर थी और अब तो और, सब से आगे अहिराने की पूनमिया और पश्चिम पट्टी वाली चननिया और बियाह के पहले भी दोनों में सगी बहन ऐसी दोस्ती थी। और दोनों आज तय कर के आयी थीं की आज गर्दा उड़ा देंगी और सब लड़कियों के आगे, ढोलक चननिया के हाथ में,
पूनिमिया या पूनम सूरजु क समौरिया बल्कि दो तीन साल छोटी ही होगी,
ग्वालिन चाची क एकलौती बिटिया, और ग्वालिन चाची बड़की ठकुराइन की देवरानी की तरह, एकदम घर वाली, चार गाय, पांच भैंस थी और सब अकेले दुह लेती थीं और सूरजु उनसे बचपन से ही हिले मिले थे । उनकी जिद्द थी की दूध जैसे भैंस दे वैसे ही सीधे उन्हें पीना है तो बस ग्वालिन चाची के आते ही, सूरजु उनके आगे पीछे, दूध के लालच में। लेकिन सबकी देखा देखीं ग्वालिन चाची को वो भौजी ही बोलते, बचपन से और वो छेड़ती भी ऐसे,
पूनमिया, जब दूध दूहने ग्वालिन चाची आतीं तो साथ साथ और फिर अक्सर सूरजबली सिंह के घर पर ही रुक जाती, साथ खेलती, झगडती, और सूरजु की देखा देखीं उनकी महतारी को माई बोलती और ग्वालिन को भौजी।
एक दिन सुबह सुबह ग्वालिन भैंस दूह रही थीं, पूनमिया उनकी पीठ पर चढ़ी बदमाशी कर रही थी , और सुरुजू, ग्वालिन चाची के आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, " भौजी दूध, भौजी दुध "
पूनिमिया अब इतनी छोटी भी नहीं थी, कच्चे टिकोरे निकलने लगे थे, बस ग्वालिन चाची ने पूनमिया के टिकोरों को दबा के सूरजु को चिढ़ाया,
" हे इसका दूध पियोगे "।
और चिढ़ाने वाली, ग्वालिन चाची अकेले नहीं थी, सूरजु क माई, मुन्ना बहू सब,। सूरजु क माई सूरजु को चिढ़ाती,
" हे पूनमिया से बियाह करबे " और अब सूरजु लजाने लगे थे।
लड़कियां लड़कों से पहले जवान होती हैं, और पूनम अपने गाँव की लड़कियों से भी दो तीन साल पहले, माखन सा तन दूध सा जोबन, और जोबन भी जल्द ही हिलोरे मारने लगा। लेकिन पूनम का न तो सूरजु के घर आना जाना कम हुआ न सूरजु को चिढ़ाना, छेड़ना, घर में न कोई भाई था न बहन।
एक दिन ग्वालिन चाची, उनकी ननद, पूनम की बूआ, सूरजु की माई के घर आयी थीं और साथ में पूनम भी। बस सूरजु को देखते ही ग्वालिन चाची, चिढ़ाने पे जुट गयी, पूनम को दिखाते हुए छेड़ा,
" हे पीना है इसका दूध ? " फिर खुद जोड़ा, " लेकिन पहले अपनी मलाई खिलानी पड़ेगी तब दूध देगी ये । "
सूरजु की माई मुस्करा दी, सूरजु कस के लजा दिए और पूनम खिस्स खिस्स हंसने लगी लेकिन कहारिन भी थी, उसने छेड़ा
" अब ये मत कहना मलाई नहीं निकलती, रोज मैं पाजामा धोती हूँ, कटोरी भर के मांड निकलती है, बिन नागा, रात में सपने में गिराने से तो अच्छा है "
और इतनी जोर का ठहाका लगा, और पूनिमिया ने कस के सूरजु को चिकोटी काटी, बिना लजाये।
सूरजु की माई ने देखा और हँसते हुए बोलीं
" अरे तो क्या हुआ, ये तो इस गाँव का रिवाज है सब मरद बहनचोद होते हैं , गाँव के पानी का असर "
" और लड़कियां कुल भाई रखनी, "
पूनम को चिढ़ाते हुए ग्वाकिन चाची ने अपनी बेटी को छोड़ा और लगे हाथ अपनी ननद को भी लपेटा, पूनम से बोलीं,
" न विश्वास हो तो अपनी बुआ से पूछ लो, तुमसे छोटी थीं तो सबसे पहले उन्होंने किसका घोंटा था । "
पूनम खूब गोरी, सब कहते थे , अहिराने में पूनो का चाँद निकल आया है और चोली में भी दो पूनम के चाँद, लम्बाई भी अच्छी खासी, जितने बड़े जोबन उतने चौड़े कूल्हे, और गाने में मजाक में अकेले सब भौजाइयों का मुकाबला कर लेती , लौंडे बहुत पीछे पड़े थे लेकिन सब जानते थे इन दूध के दोनों कटोरों का स्वाद तो सूरजु ही चखेंगे, और जाँघों के बीच की दही की इस कहतरी का भी स्वाद वही चखेंगे। मन तो सूरजु का भी करता था,
लेकिन एक तो लजाधुर, पूनिमिया की सहेलियां सब कहती थीं , " यार तू ही पटक के चोद दे साले को ।"
लेकिन उसी के कुछ दिन बाद नाग को पिटारे में बंद कर दिया सूरजु ने, अखाड़े में उतर गए और गुरु का दिया लंगोट पहन लिया, पक्के ब्रम्हचारी, माई के अलावा किसी से खुल के बात भी नहीं करते थे।
और कुछ दिन बाद पूनम की शादी हो गयी, फिर पिछले अगहन में गौना, और मरद भी बस, कुछ ख़ास नहीं और दस पंद्रह दिन बाद पंजाब कमाने चला गया, और जैसे ग्वालिन ने खबर दी की सूरजु भैया क बियाह है बस पूनम ने अपना बिस्तर बाँध लिया, मरद वैसे बाहर था, दो चार दिन के लिए हफ्ते भर पहले आया था लेकिन अब छह महीने तक आने का कोई स्बावल नहीं था। भौजाई के न होने से छोटी ननद के और पंख खुल जाते थे, और पूनम की सास तो एकदम पूनम के कहे पर चलने वाली, बस एक मन उसको था की एक पोता/पोती कुछ दे दे बहुरिया।
और जिस दिन पूनम गाँव पहुंची उसके एक दिन पहले ही उसकी बचपन की सहेली भी आ गयी थी, चननिया। नाम उसका चांदनी था, पश्चिम पट्टी की लेकिन सब कहते चननिया ही थी, उसी ने पूनम को खबर दी थी की तेरे बचपन के यार ने अखाडा छोड़ दिया है, लंगोट उतार दिया है और अब बियाह होने वाला है। और मिलते ही जैसे दोनों गले भेंट के मिली, पूनमिया ने अपना इरादा बता दिया की सूरजु भैया के दुलहिनिया के आने के पहले वो सूरजु भैया की मलाई अबकी पक्का खायेगी।
उसके दोनों चूँची पकड़ के कस के दबाती मसलती हंसती चननिया बोली
" मलाई खायेगी तो नौ महीना बाद दूध भी देगी "
"एकदम, तू तो समझदार है, और एक बार क्यों, बार बार,... और दूध पिलाऊंगी भी उसको कब से बेचारा दूध दूध कर रहा था, एक चूँची से उसको, एक से उसके बेटवा को, जॉन सब कह रहे हैं न की पढ़ी लिखी आ रही है न उसके पहले निकाल दूंगी "
हँसते हुए पूनमिया बोली, फिर चननिया के साये में हाथ डाल के अपनी सहेली की बुलबुल को दबोचती बोली,
" अरे सखी, एक पंडित बोला था की पूरे आधे दर्जन बच्चे होंगे मेरे तो उसकी बात सही साबित करना है न, लेकिन बाप सबका वही होगा एक ही। "
दोनों सहेलिया खिखिलाने लगी लेकिन पूनमिया पक्की छिनार, चननिया की बिलिया में गचाक से एक ऊँगली जड़ तक पेल के बोली,
" और तोहरो चुनमुनिया में मलाई जाई, फिर कउनो दिन दोनों सहेली साथ साथ मजा लेंगी, अभी तो बरात जाने में सात आठ दिन है "
अपने गौने के पहले, पूनमिया ने ये अपनी जिद्द सिर्फ चननिया को बतायी थी, की उसकी छाती में दूध आएगा तो सूरजु भैया की ही मलाई खाने के बाद, और तरीका भी बता दिया था, गौने के महीने भर पहले से गाँव की आशा दीदी से बच्चा रोकने वाली गोली ले आई थी, लहंगा उसने खाली मरद के आगे अबतक पसारा था वो भी स्साला केंचुआ छाप, रहना न रहना बराबर, और दस दिन बाद पंजाब। पता नहीं ठीक से अंदर गया भी की नहीं। और अब पूनम ने जब से बियाह की खबर सुनी गोली बंद कर दी थी, आठ दस दिन पहले महीना हुआ था। मरद उसे बाद आया था,
तो वही पूनमिया, आज सब गाँव की लड़कियों की गोल बना के बैठी थी, और जो कच्ची कलियाँ थी उन्हें तो चुन चुन के लायी थी, फिर उसकी सहेली चननिया और दो चार ब्याहता लड़कियां और जैसे ही भैया चौके पे बैठे, चननिया ने इशारा किया, हाथ भर का नहीं तो बित्ते से तो पक्का बड़ा होगा, और मोटा कितना, खड़ा खूंटा नेकर में। बुच्चिया और लीला साथ में इमरतिया भौजी, चौके पे भैया को बैठाय के इमरतिया के पास, लीला पूनिमिया के पास और साथ में बुच्ची भी, आगे कांती बूआ थीं, बुच्ची की बड़ी मौसी।
गाने शुरू हो गए थे और आज सूरजु के गांव वाली औरतें लड़कियां उनके ननिहाल वालों को ललकार रही थीं, खुल के माँ बहिन कर के नाम ले ले के गरिया रही थीं, आंगन में खाली औरतें थीं इसलिए और खुल के।