Part 17
किसी चोटी बच्ची जैसे जय ने मोटी ताजी उर्वशी को एक ही झटके मे उठा लिया. उर्वशी को गोदी मे उठा कर जय hall मे ले आया, और बेड पर सुला दिया. उर्वशी के bedroom मे तीन अलमारीया थी. तीनो अलमारिया एक ही रंग की और एक समान ही थी. तीनो अलमारिया तीनो अलमारीया locked रहती थी. ऊन मे से एक मे उर्वशी की sanitary napkins, bra, panty, पेटीकोट, साड़ीया and dresses रखी हुईं रहती थी. दूसरी मे jwelery, cash, जरुरी कागजात and शुभम के पापा के कपडे रखे रहते थे. तीसरी मे क्या है यह शुभम भी नहीं जानता था.
जय : शुभम तुम्हारी mom को कपडे पहनाना है, अलमारी की चाबी कहा है....?
शुभम : uncle मुझे भी नहीं पता...
जय को चाबी का ठिकाना पता ही था, पर वो जान बुझ कर शुभम के आगे बन कर पूछ रहा था. शुभम को पता ना होने से जय ने खुद बेड के निचे वाला drawer खींचा... खर्रर्रर्रर्र.... और चाबी निकाल कर drawer बंद कर फिया खर्रर्रर्रर्र... फट...!
जय ने अलमारी के lock मे चाबी डाली... घुमाई और अलमारी unlock कर दी. वहा से उसने एक bra, एकजालीदार panty और एक रेशमी silk black gown dress निकाल कर अलमारी lock कर दी. जय ने सब कुछ इतने आसानी से धुंढ़ निकाला जैसे के उसे अलमारी मे कौनसी चीज कहा रखी है ये सब पता ही था, जय के इस हरकत को शुभम देखता रह गया. उर्वशी की टांगे उठा कर जय ने उर्वशी को panty पहना रहा था, चिकने चिकने बदन पर सरसराती हुईं panty अपने मुकाम तक पोहोच कर उर्वशी का घोसला सुरक्षित करने लगी. उर्वशी की बाहे खोल कर जय ने उसे bra पहनाई और उसके दोनों नोचे हुए रसभरे आम bra मे कैद कर दिए. देखते ही देखते उर्वशी को gown dress पहना कर उर्वशी का नंगा बदन ढक दिया. नंगी पड़ी उर्वशी अब फिर से कपड़ो मे ढक चुकी थी. जय ने अपना मानवता का कर्तव्य पूरी ईमानी से निभाया था, पर अब उसके नजरों मे वह प्यार नहीं बचा था जिस प्यार भरी नजरों से वो उर्वशी को ताड़ता था. उसके स्पर्श मे वो इज्जत नहीं थी जिस इज्जत से वो उर्वशी को नंगी किया करता था.
शुभम ने कई बार उर्वशी अधनंगा देखा था. कई बार सुसु करते हुए, कई बार panty पहनते हुए, तो कई बार वासना की आग मे ऊँगली करते हुए देखा था. एक ही घर मे रहने वाले लोग अक्सर एक दूसरे को कभी न कभी कपडे बदलते हुए या नहाते हुए या panty पहनते हुए अधनंगा देखते ही है. पर कोई पराया मर्द किसी घरेलु औरत को नंगी करते हुए या कपडे पहनाते हुए देखने का दुर्भाग्य शुभम के नसीब मे लिखा हुवा था. जहाँ आर्यन शुभम की mom को नंगा कर के चढ़ा हुवा था तो उसी घर मे जय शुभम की नंगी पड़ी mom को कपडे पहना रहा था. एक ही रात मे शुभम को ये सब देखना पड़ रहा था. ऐसी मनहूस रात थी के उसे उसकी mom को पराये मर्द हाथो नंगी होते और कपड़े पहनाते हुए दिखा रही थी.
उर्वशी का नशा उतर चूका था, वो सब समझ रही थी, कैसे जय और शुभम उसका खयाल रख रहे है वो ये भी देख रही थी और ऊन दोनों के चेहरे पर जो तिरस्कार का भाव था उसे समझ भी रही थी. जय के हाथो का तिरस्कारपूर्ण खुर्दरा स्पर्श, शुभम की घृणास्पद नजरें और दोनों की त्यागपूर्वक साधी हुईं चुप्पी उर्वशी को लज्जित कर रही थी. ना बेटा उससे बात कर रहा था न उसका आशिक उसका चेहरा देख रहा था. वो शुभम और जय के ही नहीं तो वो खुद की नजरों मे भी गिर चुकी थी. अपने बेटे के सामने आर्यन से हुईं चुदाई और अपने नंगे बदन पर होता हुवा जय का स्पर्श उसे उसके निच नग्नता का अहसास दिला रहा था. आखिर ये सब हुवा कैसे इसका उर्वशी अनुमान लगा रही थी, नशे के पीछे का राज समझने की कोशिश कर रही थी. आर्यन के हाथो से दूध पिने के बाद ही यह सब सुरु हुवा और सब आर्यन का ही किया धरा है ये बात उर्वशी जान गई. अब मेरा क्या होगा, मेरा तो आशिक भी रूठ जायेगा और बेटा भी मुझेसे दूर हो जायेगा. यह विचार कर कर के वो अंदर ही अंदर व्यथित होने लगी. उसके आँख मे आंसू भर आये, मुरझाये हुए चेहरे पर रुदनमुद्रा से ओठ कपकपाने लगें और एकदम से फुट फुट कर रोने लगी....
उर्वशी : उहूँ हु हु...! ऊहु हु हु...! अब बर्बाद हो गई... उहूँ हु हु....! बेटा शुभम....! उहूँ हु हु....! मुझसे गलती हुईं थी... उहूँ हु हु...पर तुम्हारी बाते सुन कर मै बदल रही थी बेटा... उहूँ हु हु..! मैं सुधरने की कोशिश कर रही थी, सब affairs ख़त्म करने वाली थी, अब तुम्हारे future पर ही ध्यान देने की सोच रही थी.... उहूँ हु हु...! फिर अचानक कैसे बदलाव हुवा मै नहीं जानती... उहूँ हु हु ....मै कही की नहीं रही....! उहूँ हु हु हु....! मेरे एकलौते बेटे को exams सर पर होते हुए मुझे इस हालत मे देखना पड़ रहा है...! उहूँ हु हु...! आज मै किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं बचि बेटा...! उहूँ हु हु...!
तुम्हारे सोने के बाद आर्यन यहाँ आया था...उहूँ हु हु...! उसने मुझे तुम्हारी कसम दिला कर दूध पिलाया था उहूँ हु हु हु....! उसके बाद मुझे बेहोशी छाने लगी मै बहोत तेज नशे मे धुत हो गई थी.... उहूँ हु हु हु...! उसके बाद मेरे साथ क्या हो रहा है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था.... उहूँ हु हु...!
उर्वशी की बात सुनकर जय अंदाजा लगाने लगा, आखिर चीज का नशा उर्वशी को कराया गया था ये जानना भी जरुरी था. खोजबीन किये बिन जय मानने वाला कहा था. जय गंभीर आवाज मे बोला...
जय : आर्यन यहां क्यों और कब आया था...!
शुभम : उसकी family out of city चली गई है , उसके घर मे वो अकेला था इसलिए यहां सोने आया था. रात 8 बजे आया था.
जय : साथ मे कुछ लाया भी था..? कुछ food या जूस...
शुभम : कुछ भी नहीं...!बस bag ले कर आया था...!
जय : सोया कहा था वो निच...! उसने bag कहा रखी थी...!
शुभम : मेरे बेडरूम मे ही सोया था... वही रखी थी bag...!
जय : जाओ देखो तो bag है या नहीं...!
शुभम जल्दी जल्दी दौड़ता हुवा जाता है और रूम मे देखता है के bag है या नहीं. आर्यन bag वही छोड़ कर भगा था. उसकी bag अब भी टेबल पर पड़ी थी. पड़ी हुईं bag को उठा कर शुभम फिर उर्वशी के रूम मे ले आता है. Bag को अच्छे से खंगालता(check) करता है. Bag के एक पिछले वाले कोने से शुभम के हाथो Tablets Strip लगती है जिन मे से दो गोलिया निकाली हुईं होती है. और एक पुड़िया लगती है. एक चोटी सी फुटी हुईं पुड़िया जिसमे सफ़ेद पावडर था.
शुभम : ये क्या है....! ये कौनसी tablets strip है...?कौनसा पावडर है जय ankle...?
जय : क्या चीज दिखाओ तो....!
उस tablets strip को देख कर जय जान जाता है के ये तो नींद की गोलिया है. पर पावडर क्या था ये जानने के लिए जय उस फूटी हुईं पुड़िया का पावडर जीभ के नोक पर रख कर चकता है.....! सुंगता है... सुं सुं सुं...!
उस पुड़िया के सफ़ेद पावडर स्वाद ऐसा था मानो समुन्दर खारे पानी मे तीखी खटाई मिली हो. गंध ऐसी थी मानो बरसात के बाद मिट्टी सूखने से जो नमी भरी मोहक गंध आती है कुछ कुछ वैसे थी.
उस सफ़ेद महीन पावडर का रंग, स्वाद और गंध से जय जान जाता है के ये कोई पावडर नहीं बल्कि एक प्रकार का drugs है. उस 21 साल के लड़के के bag मे प्रतिबंधित drugs की पुड़िया देख कर जय दंग रह जाता है. उसके चेहरे पर एक शून्यता और आश्चर्य की मिली जुली रेखा खींच जाती है.
शुभम : जय uncle बताओ ना ये क्या है...!
जय : अरे बाप रे बाप....! अरे ये तो नींद की गोलिया और कोकन(Cocaine) है...! बहोत ही ख़तरनाक और नशीला drug है...!
शुभम : uncle...! मुझे दूध आज कड़वा सा लगा था....! मै जब बाथरूम गया था तब आर्यन मेरे रूम मे अकेला था और दूध का glass भी वही था. आर्यन ने मुझे ही नींद की गोलिया दी होंगी...! मै 12 बजे तक पढ़ाई करता हु... पर 10 बजे से पहले ही सो गया था... आँखे बहोत भारी हो चुकी थी. बहोत तेज नींद आ रही थी uncle...!
अपने माँ की नशे से सूजी लाल आँखे और बरसाती पानी सा ठंडा हो चूका शरीर उसकी बाते सच साबित कर रही थी. उसके गिरते हुए आंसू और उसके बदन पर जो निशान बने हुए थे उस से उसके ऊसपर ज्यादती हुईं थी इसका जिंदा सबूत बने हुए थे. मेरे दोस्त ने मेरे साथ बहोत बड़ा धोखा किया है. मेरी माँ सच बोल रही है, उसको फसाया गया है, मेरी माँ दर्द से रो रही है, आर्यन को मै समझ ना सका, वो इतना गिरा हुवा और बुरी नियत वाला था मै कैसे जान न सका.
जय के हाथ मे जो tablets strip और पाउडर पाउछ था उस से जो सच्चाई सामने आई ये सब देख कर शुभम गहरे सदमे मे था. उसके हाथ पाव ढीले पड़ गए और मन पीड़ा से भर गया, चेहरे पर घोर अपराधी भाव छा गया था. शुभम ने खुद के माथे को पकडा और धड़ाल कर निचे जमीन पर बैठ गया. शुभम अब सब समझ गया था. शुभम के मन मे तो विचारों का तूफान सा आ गया.
(घर के किसी सदस्य पर ज़ब बाहरी मुसीबते बेरानण पड़ती है तब उसके दोष देखे नहीं जाते, उसके गुनाहो को भुला कर उसके साथ खड़े होने वाले जो होते है वही अपने होते है और वही परिवार कहलाता है. शुभम उर्वशी के कांड कारनामें जानता था, उसकी माँ का जय के साथ का affair चल रहा है यह भी वो जान गया था, आर्यन के साथ उर्वशी जो गुलुगुलु कर रही थी ये भी शुभम भाप गया था, पर फिर भी उसने अपनी माँ को भला बुरा ना कभी कहा न कभी नीची नजरो से देखा. आज की घटना से पहले ही उसने अपने सुलझे हुए अंदाज से अपनी माँ को समझाने की कोशिश भी करी थी)
अपनी माँ के गिरते आंसू और उसकी हो चुकी दुर्दशा देख कर आखिर शुभम का दिल पिघल गया, आखिर शुभम बेटा था. माँ के गिरते आँसू देख कर कैसे न पिघलता. माथे पर हाथ रख कर खुद के बाल नोंचने लगा, और फुट फुट कर रोने लगा.

शुभम : आज मै सोता नहीं तो ये सब नहीं होता जय ancle ... उहूँ उहूँ उहूँ हु हु....! घर मे मै हो कर भी कुछ ना कर सका...! उहूँ उहूँ उहूँ हु...!
जय : शुभम..!... रो मत....संभाल खुद को...!... Strong बन...! बहोत Strong बन...! मै हु बेटा... तुम्हारे साथ मै हु ना...! जो होना था हो गया...! रो मत..!
जय शुभम को संभाल रहा था, हिम्मत दे रहा था, अपने हाथो से उसके आंसू पोछ रहा था. .
शुभम को रोता देख उर्वशी भी फुट फुट कर रोने लगी. शुभम जमीन से उठ खड़ा हुवा और तेजी से जा कर अपनी माँ को लिपट गया. पीड़ा युक्त वात्सल्य से भरी हुईं उर्वशी और लाचारी मिश्रित करुणा से भरा शुभम दोनों पीड़ित माँ बेटे एक दूसरे से लिपट लिपट रोने लगें. इस शैतानी रात के मनहूस वक़्त ने आर्यन को तो खूब मजे दिए पर एक माँ और बेटे को खूब पीड़ित कर दिया था.
दोनों माँ बेटे का करुण रुदन और वात्सल्य मिलन देख कर जय की आँखे भर आई, जो हादसा हुवा था उसका अंदाजा जय लगा चूका था. अब जय ने शुभम और के साथ खड़ा रहने का फैसला ले लिया.
जय : खुद को संभालो भाबी...! ये सब बहोत बुरा हुवा....!होना ही नहीं चाहिए था...!पर आप दोनों को ये सब भूलना पदेगा...! संभलना पड़ेगा...!