Part 18
उर्वशी एक शरीर और आत्मा से घायल स्त्री, जिसका शरीर और आत्मा दोनो घायल है, वो ना सिर्फ अपने बेटे से शर्मिंदा है बल्कि कल तक जिस प्रेमी के साथ स्वछन्द और उन्मुक्त हो कर कामलीला करती थी उसको हमराज बनाया आज उसके सामने यह जाहिर हो गया कि वह अपने पति और उसके अलावा भी किसी और के साथ भी रमण करने में लीन हो चुकी थी. चिड़िया ज़ब अपने झूंड से बिछड़ जाती है तब अक्सर शिकार बन जाती है. वैसे ही मर्यादा की चौखत जाँघने वाली महिला किसी भटकी हुईं चिड़िया जैसी हो जाती है तब सभ्य समाज मे छिपे भेडियो का वो आसान शिकार बन जाती है. भटक चुकी उर्वशी को इसी कारण ही चरित्र हीनता और कसूरवार होने का दंश झेलना पड़ा. दूसरी तरफ मानवीय वासनाओं और हवस की माया से अंजान शुभम उर्वशी की इस हालत के लिए खुद को दोषी मान रहा था. वह यह जानने के बाद और ज्यादा दुखी था कि नशे की गोली और पाउडर के प्रयोग कर उसकी माँ के साथ यह व्यभिचार किया. वह पहले आर्यन की फितरत को क्यो नही समझ पाया. इधर जय को पहले पहल तो यह लगा कि उर्वशी ने उसे भी धोखा दिया मगर जब नशे में अनचार का पता चल गया तो वह आगे बढ़ कर शुभम को और उर्वशी की मदद और उन्हें सम्हालने को आतुर हो गया था. एक शरीफ और जिम्मेदार इंसान को जो करना करना चाहिए था वो सब जय कर रहा था.
शुभम : mom रो मत mom...! आज से मै आप का खयाल रखूंगा mom...! आप खूबसूरत और और अकेली भी इसलिए लोग आप पर गंदी नियत रखते है....! आज से हर पल मै आप के साथ रहा करूँगा...! आप को कभी अकेली नहीं छोडूंगा...!
उर्वशी : हिरे समान एक ही तु मेरा बेटा है...! हो सके तो मुझे माफ कर देना...! मेरी की हुईं भूल को भुला जाना...!
आर्यन ने जलसाजी कर उर्वशी को जो नशा दिया था उस नशे आड़ मे आर्यन ने उर्वशी के अंदर का विवेक वात्सल्य रोंद दिया था. उस नशे से मुक्त हो कर उर्वशी को ज़ब होश आया तब वासना का माया जाल पुरी तरह नस्ट हो कर नस्ट हो चूका था. बीती हुईं परिस्थिति मे अंततः बेटे ने ही साथ दिया, देरी मे सही पर जय के रूप मे मदत ले आया. "बेटा ही मेरा अपना है, कोई बाहरी अपना नहीं हो सकता, खून का नाता ही सच्चा है, कोई शब्दों से नाता नहीं जोड़ सकता, वात्सल्य ही मेरी की असली पहचान है, वासना कभी मेरी पहचान नहीं बन सकती" ये मन मे सोच कर उर्वशी बहोत बड़ी सिख सिख गई थी. रो रो कर बेहाल शुभम और उर्वशी एक दूसरे को धीर बंधा रहे थे, आँसू पोछ रहे थे. सहारा दे रहे थे. आज दोनों माँ बेटे का वात्सल्य मिलाप चरम पर था. वही खड़ा जय दो माँ बेटे के उमड़े हुए जज्बातों को देख रहा था. समझ रहा था.
भला हो उस नेक मानस जय का जो ऐसे गंभीर परिस्थिति मे दोनों के मदत के लिए खड़ा रहा. दोनों माँ बेटे अंदर से तुट चुके थे. Best friend से धोका खा चूका शुभम समझ गया के दुनिया मे कोई भी बाहरी व्यक्ति खून के रिश्तो जितना सगा नहीं नहीं हो सकता. एक दूसरे के अलावा उनके जीवन मे कोई नहीं है ये बात शुभम समझ गया था. उर्वशी के गाल और गर्दन पर आर्यन के love bite की निशानी और उस से पड़े हुए लाल नीले निशान शुभम बार बार देख रहा था, उसपर ओठों से फुक मार रहा था, ऊन तीखे जख्मो को सहला रहा था. उर्वशी की नोची हुईं बालो की लटाओ को ठीक कर कानो के पीछे सरका रहा था. उसकी कानो परदो को पकड़ कर प्यार से सहला रहा था. शुभम के हर स्पर्श मे एक अलग ही पवित्र अपनेपण की दवाई थी जिस से उर्वशी को सुकून का अहसास होने लगा. आर्यन के दिए हुए जख्मो पर बेटे के हाथो का प्रेम स्पर्श और दुलार से उर्वशी को जीवन के वास्तविकता अनुभव होने लगा. एक दूसरे से वात्सल्य से लिपट कर माँ बेटे कब सो गए इसका आभास दोनों को नहीं हुवा. दोनों माँ बेटे को सोते हुवा देख जय उनके रूम मे ही जमीन पर चटाई और गद्दी बिछा कर सो गया था. जैसे तैसे तीनो की रात बीती.







सुबह के 9:15 बज चुके थे. gym जाने का आदतन जय भी सोया हुवा ही था. न शुभम की निंद खुली ना उर्वशी की. तभी उर्वशी ke मोबाइल की रिंग बजने लगी....ट्रिंगsss ट्रिंगsss...ट्रिंगsss ट्रिंगsss... ट्रिंग ट्रिंगsss...
पर तीनो मे से किसी की नींद न खुली, आया हुवा call miss हो गया.
फिर एक बार रिंग बजने लगी......ट्रिंगsss ट्रिंगsss...ट्रिंगsss ट्रिंगsss... ट्रिंग ट्रिंगsss...
फिर एक बार call miss हो गया.
तीसरी बार फिर रिंग बजने लगी.....ट्रिंगsss ट्रिंगsss...ट्रिंगsss ट्रिंगsss... ट्रिंग ट्रिंगsss...फिर एक बार call miss हो गया था
पर अब की बारी बजती हुईं रिंग जय के कानो मे गूंज कर उसकी नींद तोड़ने लगी. बार बार बजती हुईं रिंग से जय सतर्क हो गया. जरुर कोई important call होंगी यह सोच कर जय मोबाइल देखा. जय ने देखा के उर्वशी के मोबाइल का password जानता था. उसने passward डाल कर मोबाइल unlock कर दिया और call history देखने लगा. Call history मे उसे एक के बाद एक आये हुए 3 missed call दिखे. और वो missed call किसी और के नहीं बल्कि शुभम के पापा के थे, जिनका नंबर नंदू नाम से उर्वशी के mobile मे saved था. जरूर किसी important बात के लिए नंदू ने call किये होंगे यह समझ कर जय उर्वशी और शुभम को नींद से जगाने लगा...
जय : भाबी उठिये... शुभम उठो देखो तुम्हारे पापा के call आ रहे है...! अरे उठो...!
जय के बार बार जगाने से शुभम की नींद खुल गई. उंगलियों से आँखो की पलके मसल कर नींद त्यागने लगा और अंगड़ाई देते हुए शुभम बोल पड़ा...
शुभम : क्या... पापा का call आ रहा है...!
उसके चेहरे पर अब उत्साह की लकीर सी छा गई.
पापा का नाम सुनते ही शुभम ख़ुशी से चमक उठा.
शुभम : मम्मी उठिये... पापा का call आ रहा है मम्मी...!
शुभम उर्वशी को बार कंधो से हिला कर जगा रहा था. शुभम के हिलाने से उर्वशी जाग तो चुकी थी पर उसके अंदर बोलने की ताकत नहीं थी. न उठ बैठने की योग्यता बची थी. ऐसे अकड़ी पड़ी थी मानो के सारे बदन मे दर्द और मरोड़ की बर्फ सी जमी हो. उर्वशी से तो हिला तक नहीं जा रहा था. बदन तेज बुखार से तप रहा था. बीती रात ठंडी पड़ चुकी उर्वशी अब अचानक से बुखार के मार से सनसना रही थी.
जय : बेटा रुको...!
उर्वशी की हालात जय समझ चूका था. जय अपने पण की भावना से आगे बढ़ा. उसने उर्वशी की कलाई पकड़ी, जो बुखार से तप रही थी, उसे हाथ लगाते ही जय सब समझ गया. अब उर्वशी को दवाखाना ले जाना जरुरी लगने लगा.
जय : शुभम ...भाबी को बहोत ही तेज बुखार है दवाखाना ले जाना पड़ेगा...! अभी ही चलना पड़ेगा...!
शुभम भी उर्वशी को हाथ लगा कर चेक करता है वो भी जान जाता है के उर्वशी की हालात अब गंभीर है.
शुभम : मम्मी आप को तो बहोत तेज बुखार है...! मम्मी चलिए दवाखाना चलिए..!
जय : शुभम...! मेरे रूम मे जाओ, कोई भी pant और t shirt ले आओ...! और हा टेबल पर मेरा wallet होगा वो भी ले आओ...! जाओ जल्दी भागो...!
शुभम : अभी लाता हु...!
शुभम उठ कर तेजी से ऊपर सीढी चढ़ते हुवे जाता है और जय के कपडे और wallet ले आता है. जय ऊन कपड़ो को फटाफट पहन कर wallet जेब मे घुसा देता है.
जय : भाबी चलिए...! उठने की कोशिश करिये...!
उर्वशी : अsss मै दवाखाना नहीं जाउंगी...! अsss क्या मु दिखाउंगी...! अsss डॉक्टर को क्या बताउंगी ...!
जय : शुभम...! भाबी को दवाखाना तो ले जाना ही पड़ेगा...! जो होगा देखा जायेगा...! तुम्हारा कोई identity card या कॉलेज id card होगा तो साथ ले लो....चलो...car की चाबी ले लो.
उर्वशी के बदन पर जो चादर लिपटी थी उसी के साथ जय उर्वशी को उठाने लगता है. अपने दोनों मजबूत बाजुओ मे जय उर्वशी को उठा कर निकल पड़ता है. जय के कदमो पे कदम रख कर जय के पीछे पीछे शुभम चलने लगता है. Main दरवाजे के बाहर आते ही शुभम ताला लगा कर दरवाजा lock कर देता है. आगे बढ़ कर शुभम car का door खोल देता है, और दौड़ते हुए जा कर compound का gate खोल देता है. जय उर्वशी को पिछली सीट पर लिटा देता है जट से car start कर के Steering सभाल लेता है. Gate से car बाहर निकलते ही शुभम आगे बैठ जाता है. तीनो अब दवाखाना निकल पड़ते है.
शहर के एक नामी Gynecologist डॉक्टर के दवाखाना के पार्किंग मे जय car पार्क करता है. उर्वशी को गोदी मे उठा कर दरवाजे की सीढ़ी चढ़ने लगता है. इंसानियत के नाते जय उर्वशी को दवाखाना तो ले आया, पर उर्वशी की हालात, दवाखाना का गंभीर माहौल और आगे formalities मे जो सवालातो का उसे जो सामना करना पड़ने वाला था वह सब सोच कर जय के मन मे खयालो का भूचाल सा आने लगा. अब क्या होगा यह सब सोच कर दवाखाने की एक एक सीढ़ी एक एक मंजिला जितनी उची लगने लगी. तीन मंजिला आलीशान बड़ा सा दवाखाना, चहलपहल करते घूमते हुए compounder और नर्स, अगल बगल लोगो की भीड़ देख कर कोई तंदरुस्त मन भी खुद को रोगी मान बैठे. दवाखाना के के अंदर एक बड़ा सा हॉल होता है, वहां बैठने के लिए benches लगें होते है. डॉक्टर के cabin के बाहर सटे हुए एक बेंच पर जय उर्वशी को बिठा देता है.
जय : शुभम तुम यहि भाबी के पास रुको. मै formalise पूरी कर आता हु...!

सामने ही hospital receptionist और एक nurse बैठी हुईं दिखती है. सोच मे डूबा हुवा जय आगे बढ़ कर वहा जाता है.
Nurse और hospital receptionist दोनों महिलाये फालतू बक बक करने मे मगन होती है.
जय : excuse me...!
जय वहा दोनों staff member से बात करने की कोशिश करता है, पर दोनों महिलाये ध्यान न दे कर बक बक जारी रखती है. ये देख कर जय को गुस्सा आजाता है. जय गुस्से मे जोर से चिल्लाता हुवा अपने दोनों पंजो लो receptionist के table पर जोर से पटकता है.
जय : hello...! कब का देख रहा हु बक बक करि जा रही हो...! सुनाई नहीं देता क्या...! It an emergency..!
जय के झल्लाने और उग्र रूप को देख कर दवाखाना का सारा माहौल और भी गंभीर बन जाता है. Dr. Mercy अपने cabbie मे जा ही रही होती है, उसके look को देख कर लगता है के अभी अभी operations theatre से बाहर निकली हो. के जय और receptionist के बिच हो रही कहा सुनी को देख कर Dr. Mercy वहा पोहोचने लगती है. Dr. Mercy को देख कर hospital receptionist और nurse दचक कर खड़ी होती है.
Dr. Mercy : ये Mister...दवाखाना है ये.... समझें....! आवाज नीची रखो...!

5फिट7inch उची महिला doctor mercy लगभग 38-40 आयु की होंगी, दिखने से ही Dr. Mercy एक रुतबेदार अनुभवी पर नवजावान डॉक्टर लगती थी. उसका गंभीर आवाज सुन कर जय शांत हो जाता है.
जय : देखिये mam...! इनकी गलती है...! बार बार request कर के भी इन्होने मेरी सुनी नहीं, मजबूरन मुझे चिल्लाना पड़ा...!
Dr. Mercy : hmmm...! इनकी formalities पूरी कर दो... और सुनो बाते कम किया करो समझी...!
Dr. Mercy वहां से जा ही रही होती है, अपने cabin मे प्रवेश कर ही रही होती है के Dr. Mercy की नजर cabie के बगल मे बेंच पर बैठी 40-41 वर्ष की चादर से ढकी हुईं एक महिला पर पडती है जिसकी बिगड़ी हुईं अवस्था देखने से पता लग रही होती है, साथ मे एक लड़का जो अभी अभी teen age पार कर चूका हुवा होता है. दोनों माँ बेटे को को Dr. Mercy एक तक देखती है. उर्वशी के पास जा कर उर्वशी की हालात देख रही Dr. Mercy मामले का अनुमान लगा लेती है. उदासी और निराशा से भरा शुभम उर्वशी के पास ही खड़ा होता है. शुभम को देख कर Dr. Mercy बोलने लगती है.
Dr. Mercy : क्या ये पेशंट तुम्हारे साथ है...? इनके कौन हो तुम...?
शुभम : जी हा...! ये मेरी mom है...!
Dr. Mercy : बेटा साथ मे और कोई है के नही...!
शुभम : जी..! जी है....! वो वहा खड़े formalities पूरी कर रहे है...!
Dr. Mercy : कौन है वो....! पेशंट के क्या लगते है...!
डॉक्टर के इस प्रश्न को उचित उत्तर क्या दे यह शुभम के समझ के बाहर थी. सरकारी नौकरी पर इसी वर्ष जय लगा हुवा था. उसकी भी कुछ मर्यादाये थी. "मम्मी की हालात की वज़ह डॉक्टर समझ गई और सवाल पूछेगी फिर उसे मै क्या क्या बताऊ कुछ गलत बोल दिया तो जय खामखा फस न जाए" इन विचारों मे डूबा शुभम सुन्न पड़ गया था. सदमे मे तो वो था भी. ऐसी बिकट परिस्थिति मे जय जो दोनों माँ बेटे का साथ दे रहा था ऐसे मे शुभम जय का बोझ और नहीं बढ़ाना चाहता था.
समाज मे ऐसे कुछ ऐसे रिश्ते बन जाते है जिनका सीधा खून से कोई सम्बन्ध नहीं होता पर वो अपनों से बढ़ कर साथ निभाते है. इस विपदा मे दोनों माँ बेटे के लिए जय वही साथिदार बना जिसका कोई सीधा सम्बन्ध खून से नहीं था. कही न कही जय भी इन माँ बेटों से एक अजीब सी मोह भरी माया से बंधा हुवा था. शुभम के चेहरे पर छाए हुए सुखापन और निरुत्तर सन्नाटे को जय बखूबी भाप गया. Formalities पूरी हो भी गई थी. तभी तेजी से जय वहां आजाता है.
Dr. Mercy : बेटा आप ठीक तो हो...! कौन है वो...!
शुभम : जी जो वो....
शुभम कुछ बोलता उस से पहले जय बोल पड़ा.
जय : पापा हु...! वो मेरी wife उर्वशी...!
शक की नजरों से Dr. Mercy जय को गंभीरता से ऊपर से निचे तक निहारती है. उसका छे फिट ऊंचा लोहे जैसा शरीर और रेशेदार muscul परन्तु 27-28 साल की उमर देख कर उर्वशी और जय के आयु का अंतर से वो शंका मे पड़ जाती है. फिर एक बार शुभम के चेहरे को ऐसे देखती है मानो "मन ही मन शुभम से पूछ रही हो, बयान मांग रही हो के क्या ये आदमी सही कह रहा है?"
शुभम : जी ये मेरे papa and वो मेरी mom है...!
मासूम शुभम की बात सुन कर Dr. Mercy बोल पड़ी.
Dr. Mercy : ये nurse..! इस पेशंट को फ़ौरन special word मे शिफ्ट करो....!
nurse : जी...!
