Adultery KAMINA CHUDDAKAD - NEW VERSION .... - Page 39 - SexBaba
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Adultery KAMINA CHUDDAKAD - NEW VERSION ....

नवाज़ उसके दोनों मम्मी को भींच कर उनका रास निकलने मई लगा था .. पर असली रास तो उसकी छूट से निकल रहा था .. चेयर मई वो जैसे बैठे थी उस वजह से उसके आम तन कर खड़े हुई थे.. वो अब मस्त हो चुकी थी.

नवाज़ सिसकारी मरते हुई बोलै

एआरटीई….. ssssssssssssss…. …… ाऔउर कहा कहा किश करू.. सुखक करू…

जवाब मई आरती बोली..

कहींईईई.. nahiiiiiiiiiiiiiiii...

नवाज़ ने फिर से पूछा

कहहआ… sssssssssssssss…. बोल ना

मस्ती मई आपने आँखे आरती ने बंद किये हुई थे.. आरती भी उसके बातो मई आ गयी और धीरे बोल पड़ी

मेरे नैक पर ..





फिर नवाज़ ने वह किश किया

ssssssssssssssss….. आआअह्ह्हा…

सिर्फ यही निकला आरती के मू से

और फिर कहा ..

मेरे नवल पर

कहा .. आरती .. ठीक से बोल न..

फिर आरती खुद hi आपने एक हाथ अपनी नवल पर रखती है …

यहाँ..

नवाज़ वह किश करता है…

आआआआह्ह्हह्हह्हआआआ….

जीभ से चतु क्या

आआअह्हह्हआआ… मुझे नहीं पता..

फिर नवाज़ जीभ से चाटने लगा … उसकी सप्पड़ अब बाद गयी..

और कहा डार्लिंग..

आरती आँखे खोलकर नवाज़ की तरफ सेक्सी अड्डा के साथ देखते हुई कहती है..

और कही नहीं…

सच..

हाँ ..सच..

उसके नवल से चाटते हुई नीचे आकर कहता है

तुम्हारी … पुस्सीय ..को…

कमीने…

और वह मू रखता है ..





जैसे ही नवाज़ ने आपने मू आरती के छूट पर रखा वैसे hi आरती के मुँह से मस्ती भरी आह निकल गए….

आरती – ोूछ नवाज़ क्या कर रहे हो ..

अह्ह्ह्हह्हह उन्घ्ठ्ठ ओह्ह्ह्हह्ह

उसके छूट पर किश करते hi आरती फिरसे सिसक उठी

आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह ….. स्स्स्सस्छ्हःहः….

Kamineeeeeeeeeeeeeee…. न्यूऊऊ..

नवाज़ उसके छूट को चाटने लगा ...





Aaaaaaahhhhhhhhhhaaaaa… शह्ह्ह्ह…. ोुह्ह्ह्होऊ… एससससससससस…. ऐसे .. होई... माय बाबीयीय..

नवाज़ चेहरा उप्पर निकल कर कहता है..

माय बेबी.. हांण..

आरती शर्माकर कहती है..

बेशरम...

अब क्या करू..

ओनली छतो आप क .. जीभ से…

नवाज़ फिर से आरती के छूट को चाटने लगा .. आरती अब आहे बरने लगी..

अब आरती को बहकते हुई देखकर नवाज़ बोल पड़ा

उम्मम्मम्मम… आरती… कैसा लगा मेरे साथ किश करते हुई .. तेरे मम्मी को जब मई चूस रहा था .. तब कैसे लगा तुजे

.. आरती के आँखों के सामने अब फिर से थोड़े देर पहले वाला सन याद आ गया..

हांलाकि इससे पहले वो आपने हस्बैंड को किश कर चुकी थी पर ऐसा जबरदसर वाला किश .. जिस मई सामने से ज्यादा रिस्पांस मिले वो पहली बार था..

फिर भी नखरा दिखते हुई वो कहती है..

नवाज़ बहुत कमीने हो आप

बोल न कैसा लगा ..

शरमाते हुई आरती कहती है

अच्छा लगा

सिर्फ अच्छा लगा .. या मज़ा भी आया तुम

मज़ा आया

सिर्फ मज़ा या बहुत मज़ा

मुझे बेशर्म करने पे तुले हुई हो क्या..

बोल न

बहुत मज़ा आया .. अब कुश ..

ये सुनकर नवाज़ चहक उठा .. और जोश मई आकर आपने अंगूंठा आरती के छूट मई दाल दिया…

आआआआह्ह्हह्हह्हआआआआ…. कामिनी…. लकी … बास्टर्ड… क्या क्या करेगा … मेरे साथ तू… बहुत कुश किया है आज आपने ..

कुश तो हम तेरे छूट मरने पर hi होंगे..

कमीने.. चुप करो..

ऐसा कह के उसका अंगूंठा आपने छूट से उसने बहार निकल दिया..

अब नवाज़ उसके झाँगो को सहला रहा था ..वह दबा रहा था..

अब उसने हाथ थोड़ा और उप्पर किया.. जैसे hi उसके हाथ की उंगली आरती के छूट के द्वार पर राखी तब आरती के मू से एक बार फिर सिसकारी निकल गयी..

ssssssssssssshhhhhhhhhhhhh…

uuuuuuuummmmmmmmmmm…

इस बार उसके सिसकारी मई मादकता ज्यादा thi..nawaz के उंगली को आपने छूट के द्वार पर महसूस होते hi उसका शरीर कपङे लगा.. आरती की आँखे बंद थी.. अब नवाज़ ने उसके छूट के द्वार पर सहलाना शुरू कर दिया..

आआह्ह्ह्हआ….. naaaaaaaaaaa….. wwaaaa….zzzzz…. मत करूऊ…. Plzzzzzzzzzzzzzz…

वो न कह रही थी … पर उसके न मई कोई दम नहीं था.. जैसे जैसे नवाज़ की उंगली आरती के छूट के द्वार से उसके छूट की तरफ जा रही थी एक अजीब से तपिश का एहसास आरती को हो रहा था..

कैसा लग रहा है आरती ..

जो भी आरती के साथ नवाज़ कर रहा था उससे उसे मज़ा तो बहुत आ रहा था पर लज़्ज़ा के मरे, शर्म के चलते वो नवाज़ को बोल नहीं सकती..

मुझे नहीं पता

इधर नवाज़ तो सातवे आसमान पर था.. उसके मैं की मुराद आज पूरी होने जा रही थी..
 
अब आरती अपने आप ही बहकाने लगी थी ….भले ही स्टार्ट मई आरती के साथ नवाज़ ने जबरदस्ती की ….पर अब आरती के अंदर के आग बाधक चुकी थी….. मस्ती से भरी लहर आरती के पूरे बदन मैं दौड़ने लगी thi..aur उस वजह से वो सिसकने लगी .. शयद वो अब भूल गयी थी की वो अब आपने बैडरूम मई है और घर मई उसके ससुर भी है..

फिर नवाज़ अपनी उंगली आरती के छूट के द्वार पर घिसता है.. और उसको किश करते हुई कहता है

दालु क्या

मुझे नहीं पता

दालु क्या.. बता न..

इससे पहले सब मुझे पुचके किया था क्या जो अब पूछ रहे हो

उंगली छूट पे hi घूमता है नवाज़ ..और इधर उधर देखने लगता है

क्या देख रहे हो जी

मख्हन

क्या कर न है आप को उससे

बता न कहा है

फ्रीज मई.. किचन मई ..

वाह… तेरे गरम छूट मई ठंडा मख्हन .. मज़ा आ जायेगा..

कमीने .. कुछ भी करता है..

फिर नवाज़ उठा कर दूर ओपन करके बहार देखता है कोई है क्या ..फिर कोई नहीं है देख के किचन मई जेक फ्रीज से मख्हन लेता है और फिर झट से बैडरूम मई आके दूर लॉक करता है

और फिर अपनी एक उंगली मख्हन मई डालता है.. फिर थोड़ा मख्हन आरती के छूट पे लगा देता है..

आह्ह्ह्ह… बहुत ठंडा है…

फिर आरती को उठा के बीएड पाई दाल देता है .. फिर उस के पाँव उप्पर उठा लेता है.. और आपने जीभ से वह लगा हुआ मख्हन उसके पुरे छूट मई लगा देता है.. फिर अपनी जीभ मख्हन के बाउल मई डालके वह से मख्हन जीभ के नोक पे लगा देता है और अपनी जीभ उसके छूट के अन्दर डालने लगता है.. और उसकी छूट चाटने लगता है .. बीच बीच मई अपनी जीभ उसके छूट मई डालता भी रहता था..

Aaaaaaaaaahhhhhhhaaaaaaa….

Nnnnnnnnnnnnaaaaaawazzzzzzzzzzz…

Kamineeeeeeeeeee…

आरती के बदन में चीटियां सी दौड़ रही थी.. उसका मैं हो रहा था की बिना देर किये नवाज़ उसकी छूट का मुंह आपने लुंड से बार्कर बंद कर le..wo तड़पती रही पर कुछ बोल न सकीय.. कैसे बोलती की नवाज़ अब छूट चाटना बंद करो और मुझे छोड़ो.. लज्जा के कारन वो बोल नहीं पायी..

फिर उसकी जीभ थोड़ी और अन्दर दाल देता है.. तब आरती के मू से सिसकारी निकल जाती है…

Ummmmmmmmmmmmm…

Ufffffffffffffffffffffffffff….

क्या कर रहे hoooo…jii

उंगली दालु क्या

मुझे नहीं पता

फिर नवाज़ ने अपनी एक उंगली उसके छूट मई दाल दी ..





ाहहाआ.. ऊऊह्ह्हूऊऊ…. एससससससस….

ये सिसकारी इस बात का संकेत था की आरती को अपनी छूट मई नवाज़ की उंगली का एहसास बहुत अच्छा लगा था.

दूसरी भी दालु क्या

नहीं जायेंगे.. दोनों उंगलिया मोती है

पति का कैसे गया

उनका छोटा है

कितने बार छोड़ता है

15 दिन मई एक बार

फिर नवाज़ वह का माखन चाटता है

और वो एक और उंगली दाल देता है अन्दर …

दोनों के मू से एक साथ hi सिसकारी निकली.. आरती को ऐसा लगा की उसके छूट से लावा निकल कर बहार आ जायेगा ..नवाज़ को उस लावे के गर्मी के एहसास ने झुलसकर रख दिया था..

आआह्ह्ह्हह्हआआआआ… मर गयी… कमीने..

कुछ नहीं होगा

दो उंगली नहीं जा रही है

कुछ नहीं होगा रैंड

ये मुझे रैंड रखेल मत बोलै करो जी

रखेल बोलै hi नहीं न

रांड बोलै था इस लिए मुझे लगा रखेल भी बोलोगे

बोलू क्या

वैसे गंदे वर्ड मत बोलै करो

तो क्या बोलू

मुझे नहीं पता

ऐसा लग रहा था की आरती के छोटी से छूट मई नवाज़ की दो बड़ी उंगलिया जाकर फंस गयी है.. पर अन्दर से निकल रहे लावा ने वो घिसाये का काम आसान कर दिया था.. और जल्द hi उसकी छूट मई तेज़ी से उंगलिया अन्दर बहार करने लगा.

Aaaaaaahhhhhhhhhhhaaaaaa…. Uffffffffffffffffffffffff…. मर्डर गयीईइ..

Naawazzzzzzzzzzz….uuummmmm… धीरे कर न कमीने…

अब्ब आरती को बर्दास्त नहीं हो रहा tha…..wo अब झड़ने के बेहद करीब thee…usne बीएड के साइड को अपने हाथों मैं कास के दोबाच liya….shyad नवाज़ ये जान चूका था की आरती झड़ने के बेहद करीब hai….isslye उसने और तेजी से अपनी उंगलिया आरती के छूट मई अन्दर बहार करने लगा …

और जल्द hi वो लावा बहार निकल आया जो काफी देर से उसके अन्दर उबाल रहा था..

आरती के छूट मैं जमा लावा एक दम से पहात padha…..aur आरती चीखते हुए झड़ने लगी….. उसका पूरा बदन रह- रह कर झटके खा रहा था…..

आरती के लिए ये अहसास बहुत था की आज जिंदगी मई पहली बार किसी ने उसके छूट मई उंगली डाली थी.

इधर आरती झड़ती है तभी बहार से आवाज आता है …

बहु कहा हो

शेठजी की आवाज सुनते hi नवाज़ उठता है..

आरती- ओहूऊऊ noooooooooo

नवाज़ - हाँ .. तेरे ससुर आ गया नहीं तो तेरे छूट की प्यास आज hi बजा देता .. जाने दो कोई बात नहीं ककल तेरे छूट की प्यास बजा दूंगा..

चलो.. हातो. बदमाश.. पापा आ रहे है..

नवाज़ किश करने मू आगे करता है तब आरती उसे पीछे धकेल के कड़ी हो जाती है और आपने बाल और निघ्त्य ठीक कर लेते है..
 
नवाज़ जैसे hi किश करने के लिए अपना मुँह आगे बढ़ता है, आरती तुरंत उसे पीछे धकेल देती है. वो थोड़ी घबराई हुई सी वहां कड़ी हो जाती है और jaldi-jaldi अपने बिखरे हुए बाल और निघ्त्य ठीक करने लगती है ताकि सब नार्मल लगे.

तभी बहार से शेतजी की ज़ोर से आवाज़ आती है—

"नवाज़...... नवाज़...... तुम कहाँ हो?"

नवाज़ उस वक़्त गुस्से से तमतमा रहा था. उसके अंदर एक अजीब सी जलन और चिड़चिड़ाहट थी, पर वो छह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. ये पहली बार था जब कोई उसके हाथों से उसकी मर्ज़ी के खिलाफ छूट कर निकल गया था.

नवाज़ गुस्से से कहता है:

"इस बुड्ढे को भी इसी टाइम आना था!"

नवाज़ के गुस्से को नज़रअंदाज़ करते हुए, आरती तेज़ी से एक कोने में जाती है और अपने कपडे पहन लेती है.

शेतजी फिर चिल्लाते हैं: "कहाँ हो... बहार क्यों नहीं आ रहे?"

आरती अंदर से hi हिम्मत जूता कर जवाब देती है:

"जी पापा जी... वो दूसरे रूम में काम कर रहे हैं."

इतना कह कर आरती ने तुरंत दरवाज़ा खोला और तेज़ी से बहार निकल गयी ताकि शेतजी को कोई शक न हो.

आरती के बहार निकलते hi नवाज़ वही खड़ा रह गया, उसका सास फूल रही थी और गुस्से से चेहरा लाल हो चूका था. उसने कभी सोचा भी नहीं था की कोई लड़की उससे इस तरह हाट से निकल जाएगी. उसके कानो में अब भी शेतजी की आवाज गूँज रही थी, जो इस वक़्त उससे दुश्मन जैसी लग रही थी.

नवाज़ कुछ सोच कर भरी मैं से बहार की तरफ निकल गया, और बाजु वाले रूम मई घुस गया .. पर उसकी आँखों में अब भी वही पुराण जूनून और थोड़ा गुस्सा बरकरार था..

आरती ने जल्दी से अपने दुपट्टे को संभाला और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लेट हुए शेतजी के पास पहुंची.

"जी पापा जी, वो नवाज़ अंदर अलमारी साफ़ कर रहा था, शायद इसीलिए उससे सुनाई नहीं दिया,"

आरती ने बड़े सलीके से बात को घुमाया.

शेतजी ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और नवाज़ की रू की तरफ देखा तब वो कमरे से बहार आया था. नवाज़ ने अपने गुस्से को पीने की कोशिश की और सर्र झुका कर खड़ा हो गया.

शेतजी:

"नवाज़! इतनी देर लगती है क्या एक काम करने में? बहार बहुत सारा काम हैं और तुम यहाँ अंदर बैठे हो?"

नवाज़: "माफ़ी चाहता हूँ शेतजी... वो थोड़ा ज़्यादा सामन था तोह वक़्त लग गया."

नवाज़ की नज़रें एक पल के लिए आरती से टकराई. आरती ने तुरंत अपनी आँखें फेर ली और रसोई की तरफ निकल गयी. नवाज़ देख रहा था की आरती कितनी आसानी से सब नार्मल दिखने की कोशिश कर रही थी, पर उससे पता था की आरती के अंदर भी डर और घबराहट थी.

नवाज़ ने मैं hi मैं सोचा, "आज तोह बच गयी, लेकिन कब तक? अगली बार जब मौका मिलेगा, तोह ये शेतजी भी बीच में नहीं आएंगे."

शेतजी ने नवाज़ को इशारा किया, "चलो अब, काम पर लगो. और आरती, ज़रा मेरे लिए चाय बना देना."

आरती ने किचन से hi आवाज दी,

"जी पापा जी, अभी लती हूँ."

नवाज़ काम की तरफ बढ़ तोह गया, लेकिन उसका ध्यान अब भी उस अधूरे किश और आरती की उस निघ्त्य पर था जिसे वो ठीक कर रही थी. उसने फैसला कर लिया था की ये खेल अभी ख़तम नहीं हुआ है.
 
शेतजी ने नवाज़ को इशारा किया

, "चलो अब, काम पर लगो. और आरती, ज़रा मेरे लिए चाय बना देना."

आरती ने किचन से hi आवाज दी,

"जी पापा जी, अभी लती हूँ."

नवाज़ काम की तरफ बढ़ तोह गया, लेकिन उसका ध्यान अब भी उस अधूरे किश और आरती की उस निघ्त्य पर था जिसे वो ठीक कर रही थी.

उसने फैसला कर लिया था की ये खेल अभी ख़तम नहीं हुआ है.

नवाज़ के दिमाग में अब बस वही मंज़र घूम रहा tha—Aarti का वो घबराना और फिर उसका खुद को संभालना. पापा जी के आने से मौका तोह हाथ से निकल गया था, लेकिन आरती की थोड़ी सी सहमी हुई और थोड़ी सी शर्मीली आवाज ने नवाज़ की बेताबी और बढ़ा दी थी.

वो जानता था की आरती भी उस पल की गर्मी को महसूस कर चुकी है. किचन से आती बर्तनो की आवाज के बीच नवाज़ ने एक गहरी सांस ली. वो समझ गया था की आरती अब नज़रें चुराएगी, लेकिन उसका ध्यान भटकना इतना आसान नहीं होगा.

थोड़ी देर बाद आरती बहार आयी, हाथ में चाय का ट्रे था. उसने कोशिश की की वो सीधा पापा जी की तरफ देखे, लेकिन नवाज़ की नज़रें उसके हर मूव को फॉलो कर रही थी.

आरती ने जैसे hi चाय का कप टेबल पर रखा, उसकी उँगलियाँ हलकी सी काँपी, जो नवाज़ की नज़र से छुपा नहीं रहा.

"चाय पीजिये पापा जी,"

आरती ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में वो पहले वाली ठहराव नहीं थी.

नवाज़ ने एक तिरछी नज़र आरती पर डाली और हल्का सा मुस्कुराया. उसने मैं hi मैं सोच लिया था—पापा जी तोह थोड़ी देर में रूम मई चले जायेंगे, लेकिन ये दिन और फिर रात अभी बहुत लम्बी है.

ये सोच कर नवाज़ आरती की आँखों में देखकने लगा...






और आरती भी नवाज़ की आँखों में देखने lagi...wo दोनों कुछ मिनट तक बस ek-dusre को hi देखते rahe..,jab तक की पापा जी नहीं बोले

तुम दोनों जाने वाले है न ..नीता की तरफ


पापा जी की आवाज ने जैसे एक झटका दिया और दोनों का अटेंशन टूटा. आरती ने तुरंत अपनी नज़रें झुका ली, उसके गाल हलकी लाली से भर गए थे. वो भूल hi गयी थी की उनके बीच कोई तीसरा भी मौजूद है.

"जी... जी पापा जी, बस निकलने hi वाले हैं,"

आरती ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया, और जल्दी से अपना पल्लू थोड़ा और सँभालने लगी.

नवाज़ ने एक गहरी सांस ली और पापा जी की तरफ देख कर थोड़ा नार्मल होने की कोशिश की.

"हाँ पापा जी, बस थोड़ी देर में निकलते हैं. नीता का कॉल आया था, वो इंतज़ार कर रही होगी."

लेकिन नवाज़ के अंदर अब भी वही हलचल थी. आरती का वो बिना कुछ कहे, इतनी देर तक उसकी आँखों में झांकना एक बड़ा इशारा था.

वो समझ गया था की आरती भी अब इस कशिश से बच नहीं पा रही है.

पापा जी ने चाय का सिप लिया और बोले,

"ठीक है, ध्यान से जाना. और सुनो, देरी हो जाये तोह वहीँ रुक जाना, रात को आने की जल्दबाज़ी मत करना."

नवाज़ ने एक शरारत भरी नज़र आरती पर डाली, "जी पापा जी, जैसा आप कहें. शायद हमें वहां रुकना hi पड़े."

आरती ने नवाज़ की बात सुन कर उसे एक हलकी सी चेतावनी भरी लेकिन प्यारी नज़र से देखा.





उसे पता था की नवाज़ अब इस 'रात' का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगा.

फ्रेश होने के बाद आरती जब हॉल में आयी, तोह उसके चेहरे पर पानी की बूंदें और हलकी ताज़गी साफ़ दिख रही थी. उसने शायद थोड़ा सा खुद को सँभालने की कोशिश की थी, लेकिन जैसे hi उसकी नज़र हॉल में बैठे नवाज़ पर पड़ी, वही पुराण नशा फिर से छ गया.

आरती ने बिना कुछ कहे नवाज़ के थोड़ा करीब hi सोफे पर जगह बनायीं. हॉल में पापा जी भी वही थोड़ा दूर बैठे थे, इसलिए सब कुछ बहुत 'नार्मल' दिखने की कोशिश चल रही थी. लेकिन ख़ामोशी के बावजूद, दोनों के बीच एक अलग hi baat-cheet चल रही थी.

नवाज़ ने देखा की आरती अब पहले से ज़्यादा रिलैक्स्ड लग रही थी, लेकिन उसकी साड़ी का वो हल्का सा लूसे गाला अब भी नवाज़ के ध्यान को भटका रहा था. आरती ने हलकी सी करवट ली और अपनी एक लत कान के पीछे करते हुए नवाज़ की तरफ देखा.

नवाज़ ने धीरे से कहा,

"तैयार हो?"

आरती ने हलकी मुस्कराहट के साथ आँख बंद कर के सर हिलाया, लेकिन उसकी बंद आँखों में अब वही शरारत थी जो थोड़ी देर पहले बीएड के पास थी.





वो जानती थी की पापा जी की मौजूदगी नवाज़ को रोक रही है, और शायद इसी बात का वो मज़ा ले रही थी.

नवाज़ ने जब आरती की आँखों में वो शरारत देखि, तोह उसे समझ आ गया की आरती अब डर नहीं रही, बल्कि इस खतरनाक खेल का मज़ा ले रही है. उसे पता था की पापा जी के सामने नवाज़ कुछ कर नहीं सकता, और इसी बेबसी का वो फायदा उठा रही थी.

नवाज़ आरती की और देखने लगा .. उसके चहरे पर मासूमियत और शरारत एक साथ झलक रही thi.Nawaz ने एक गहरी सांस ली और थोड़ा और आरती की और झुक कर, अपनी एक ऊँगली उसके होठों पर रख ली





आरती का दिल तेज़ी से धड़कने लगा. नवाज़ की ये be-parwah अदा उसे और भी पागल कर रही थी. उसने देखा की पापा जी अभी अपने चश्मे को साफ़ करने में लगे हुए हैं.

नवाज़ ने धीमी आवाज़ मई कहा .. इतनी धीमी आवाज़ में कहा जो सिर्फ आरती को सुनाई दे,

"ये जो तुम मुस्कुरा रही हो न... सब समझ रहा हूँ. पापा जी के होने का फ़ायदा उठा रही हो?"

आरती ने हल्का सा पालक झपका कर नवाज़ को देखा और jaan-boojh कर अपने पैरों को एक दूसरे पार्क थोड़ा और कम्फर्टेबले तरीके से रखा, जिससे उसकी साड़ी हलकी सी ऊपर चढ़ गयी. उसने नवाज़ की तरफ देख कर एक गहरी नज़र डाली और धीरे से फुसफुसाई,

"मैंने तोह कुछ किया hi नहीं... आप hi परेशान हो रहे हैं."

तब नवाज़ ने सोफे के नीचे से अपना पेअर आरती के पेअर से हल्का सा टच किया. आरती का सांस वही अटक गया, उसने उम्मीद नहीं की थी की नवाज़ इतना बड़ा रिस्क लेगा. उसने तुरंत नवाज़ की आँखों में देखा, जहाँ अब एक जीतने वाली चमक थी.

अच्छा

आरती ने नवाज़ की बात सुनी और उसने अपनी नज़रें नीचे कर ली, लेकिन उसके होठों पर एक हलकी सी मुस्कराहट अब भी बरक़रार थी.





उसने नवाज़ की तरफ देखे बिना, बहुत hi धीरे से कहा,

"फायदा मैं उठा रही हूँ या आप? पापा जी के सामने इतनी हिम्मत दिखाना आपको महंगा न पद जाये."

आरती ने अब अपनी नज़रें उठायी और सीधा नवाज़ की आँखों में देखा. उसका वो अंदाज़ नवाज़ की धड़कनो को और बढ़ा गया. वो समझ गया था की आरती अब सिर्फ इस खेल का हिस्सा नहीं थी, बल्कि वो इसे कण्ट्रोल कर रही थी. पापा जी पास hi बैठे चाय पी रहे थे और उनका ध्यान टीवी की तरफ था, मगर इन दोनों के बीच एक खामोश तूफ़ान उठ रहा था.

नवाज़ ने थोड़ा और करीब होकर फुसफुसाया,

"जो मज़ा खतरे में है, वो कहीं और नहीं. और तुम्हारी ये अड्डा... ये इशारा है या चेतावनी?"

"

आरती ने हल्का सा ठहाका दबा लिया और नवाज़ की ऊँगली होठों से हटा कर टेबल पर राखी, लेकिन इस बार उसने नवाज़ के हाथ के बहुत करीब अपना हाथ रखा. दोनों की उँगलियाँ बस मिलने hi वाली थी

आरती ने नवाज़ की आँखों में देखते हुए धीरे से अपनी उँगलियाँ आगे बधाई और नवाज़ की हथेली को हल्का सा छुआ.





पापा जी वहीँ बैठे चाय के घूँट ले रहे थे, और ये जानते हुए भी की ये कितना बड़ा रिस्क है, आरती के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और गरूर था.

नवाज़ ने जैसे hi आरती की ठंडी उँगलियों का टच महसूस किया, उसने तुरंत अपनी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में फसा ली. सोफे के पीछे से उनके हाथ अब ek-dusre को मज़बूती से थामे हुए थे. आरती ने एक पल के लिए अपनी सांस रोकी, और फिर नवाज़ की तरफ देख कर थोड़ा झुकी.





"ये न इशारा है, न चेतावनी,"

आरती ने बिलकुल कान के पास आकर फुसफुसाया,

"ये बस शुरुआत है. बाकी का हिस्सा तब... जब हम यहाँ से निकल जायेंगे."

नवाज़ ने आरती का हाथ हल्का सा दबाया, जैसे वो उसे बता रहा हो की वो अब पीछे नहीं हटने वाला. तभी पापा जी ने कप रखा और बोले,

"चलो भाई, अब तुम दोनों निकलने की तयारी करो, वर्ण अँधेरा ज़्यादा हो जायेगा."

ऐसा कह के वो टीवी के पास जेक बटन को कुछ करने लगे शयद वो ठीक से चल नहीं रहे थे

आरती ने झट से अपना हाथ पीछे खिंच लिया और कड़ी हो गयी, अपने कपडे ठीक करते हुए. उसने नवाज़ को एक ऐसी नज़र दी जिसमे आने वाले 'तूफान' का पूरा नशा था.





"चलिए... तैयार हो जाइये,"

आरती ने एक शरारत भरी मुस्कराहट के साथ कहा
 
आरती ने अपने कपडे ठीक किये और एक शरारत भरी मुस्कराहट के साथ नवाज़ की तरफ देखा,

"चलिए... तैयार हो जाइये."

नवाज़ ने एक गहरी सांस ली और धीरे से बोलै,

"सच कहूं तोह... मेरा बिलकुल मैं नहीं है अब कहीं जाने का."

आरती ने उसके जज़्बात भाप लिए और हल्का सा नज़दीक आकर फुसफुसाई,.. उसकी आँखों मई देखते हुई





"मेरा कहाँ मैं है? इतना अच्छा खासा मज़ा आ रहा था."

नवाज़ ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा,

"मज़ा तोह मुझे भी बहुत आया आज... लेकिन सच तोह ये है की मेरा मैं अभी भरा नहीं है. दिल कर रहा है वहीँ से शुरू करूँ जहाँ अधूरा रह गया था."

आरती ने हल्का सा ठहाका दबाया और एक उस्ताद खिलाडी की तरह बोली,

"सारा मज़ा एक साथ मिल जाये तोह उसकी क़ीमत ख़तम हो जाती है नवाज़ जी. थोड़ा इंतज़ार करना सीखिए... इंतज़ार का अपना hi नशा होता है, है न जी?"

नवाज़ ने गाडी की चाबी हवा मई घुमाई और एक तिरछी नज़र आरती पर डाली,

"ठीक है... अगर तुम्हें इंतज़ार पसंद है तोह वही सही. लेकिन याद रखना, घर का गेम ख़तम हुआ है, असली गेम तोह अब रस्ते में शुरू होगा."

आरती ने शर्मा कर नज़रें झुके पर उसकी मुस्कराहट बता रही थी की वो इस 'रोड गेम' के लिए पूरी तरह तैयार है.

नवाज़ ने जब जाने के लिए कदम बढ़ाये, तभी आरती की आवाज ने उसे रोक लिया.

"एक मिनट... रुकिए ज़रा,"

आरती ने शरारत से कहा और तेज़ी से अंदर कमरे में चली गयी. नवाज़ वहीँ रुक कर इंतज़ार करने लगा, उसके ध्यान में अभी भी वही पुराने पल घूम रहे थे.

थोड़ी देर बाद आरती वापिस आयी, उसके दोनों हाथों में दो खूबसूरत सरीयां थी. एक तरफ गहरा लाल रंग था और दूसरी तरफ एक चमकदार नीला. उसने दोनों सरीयां अपने जिस्म से लगा कर नवाज़ के सामने एक ऐडा से कड़ी हो गयी.

आरती ने नवाज़ की आँखों में देखते हुए पूछा,





"बोलिये जी... कौन सी साड़ी पह्नु? आप hi बताओ."

नवाज़ ने आरती के खिले हुए चेहरे और उन सरीयों को गौर से देखा. उसका ध्यान आरती के नंगे कन्धों और उसकी चमकती जिल्द पर गया. उसने थोड़ा सोच कर इशारा किया,

"राइट हैंड वाली... लाल रंग तुम पर ज़्यादा अच्छी लगेगी. तुम्हारी खूबसूरती खिल कर बहार आएगी."

आरती ने लाल साड़ी को देखा और फिर नवाज़ को देख कर एक कातिलाना मुस्कराहट दी.

"जैसा आप कहो... यही पहनती हूँ. बस थोड़ा इंतज़ार कीजिये, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ."

नवाज़ वहीँ खड़ा रह गया, ये सोच कर की लाल साड़ी में आरती का क़यामत धना तय है. उसने मैं hi मैं सोचा की ये सफर अब और भी दुश्वार होने वाला है

तभी नवाज़ के दिमाग में एक शरारत ने करवट ली. आरती ने जैसे hi मुद कर अंदर जाने की कोशिश की, नवाज़ ने तेज़ी से उसका हाथ थमा और उसे अपनी तरफ हल्का सा खिंचा.

"साड़ी तोह तुमने मेरी पसंद की चुन ली, लेकिन इसे अकेले पहनना थोड़ा मुश्किल नहीं होगा क्या ?"

नवाज़ ने दबी हुई आवाज़ में, उसके कान के पास जाकर कहा.

आरती ठिठक गयी. उसने पलट कर देखा, उसकी सांसें थोड़ी तेज़ थी.

"क्यों? पहले भी तोह खुद hi पहनती थी ..."

नवाज़ ने मुस्कुराते हुए उसके हाथ से लाल साड़ी का एक कोना पकड़ा और धीरे से बोलै,

"पहले की बात अलग थी. आज रंग मैंने चुना है, तोह इसकी 'फिटिंग' चेक करने का हक़ भी तोह मेरा बनता है. चलो, मैं मदद कर देता हूँ... पीछे की प्लेट्स या वो ब्लाउज की डोरी... मुश्किल होती है न?"

आरती का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. वो जानती थी की ये सिर्फ मदद का बहाना है, लेकिन नवाज़ की आँखों में जो तालाब थी, वो उसे इंकार नहीं कर प् रही थी. उसने एक नज़र टीवी की तरफ डाली जहाँ पापा जी कुछ कर रहे थे, और फिर नवाज़ की तरफ देख कर धीरे से मुस्कुरायी... और बड़े नखरे से कहा





"पापा जी बहार हैं... अगर उन्होंने देख लिया तोह?"

आरती ने उकसाते हुए पूछा.

नवाज़ ने उसके और करीब होकर फुसफुसाया,

"दरवाज़ा बंद कर देंगे. वैसे भी, लाल रंग में तुम कैसी लग रही हो, ये सबसे पहले मुझे देखना है."

आरती ने बिना कुछ कहे, हलकी सी शर्म के साथ अपना सर झुका लिया और कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, जो नवाज़ के लिए एक खामोश 'हाँ' थी..

आरती ने एक गहरी सांस ली और अपनी गर्दन हलकी सी घुमा कर नवाज़ की आँखों में देखा.





तस्वीर में आरती का वह रूप निखरकर सामने आ रहा था, जिसे देखकर नवाज़ की सांसें थम सी गयी. उस गहरी लाल साड़ी और सुनहरे बॉर्डर में वह किसी मूरत जैसी लग रही थी. आरती ने जैसे hi अपनी गर्दन तिरछी की और पीछे मुड़कर नवाज़ को देखा, उसकी आँखों में एक ऐसी कातिलाना चमक थी जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था.

आरती के चेहरे के haav-bhaav बता रहे थे की उसे अपनी ख़ूबसूरती का पूरा एहसास है. उसके चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कराहट थी, जो मानो नवाज़ की बेचैनी का मज़ा ले रही थी. उसने अपनी नज़रें थोड़ी तिरछी कर राखी थी, जैसे वह नवाज़ को चुनौती दे रही हो की "देख लो, अब क्या इरादा है?"

नवाज़ ने देखा की कैसे साड़ी का वह लाल पल्लू उसके कंधे से सलीके से नीचे ढल रहा था. आरती ने अपनी एक ऊँगली अपने होठों के करीब ले जाते हुए बड़े hi अदा से नवाज़ की तरफ देखा. उसके माथे पर गिरी बालों की लेथ और कानों के वह सुनहरे झुमके उसके चेहरे की कशिश को और बढ़ा रहे थे.

तब नवाज़ ने उसका हाट पकड़ा .. उसके होठों पर वही शरारत भरी मुस्कराहट वापिस आ गयी थी जो अब नवाज़ के दिल की धड़कन तेज़ी से बढ़ा रही थी.

"मुश्किल तोह होगा,"

आरती ने बिलकुल धीमी आवाज़ में कहा,

"पर अगर मदद करने वाला इतना 'एक्सपर्ट' हो, तोह डर लगता है की साड़ी पेहेन्ने में वक़्त ज़्यादा लगेगा या... कुछ और hi हो जायेगा."

नवाज़ ने उसका हाथ नहीं छोड़ा, बल्कि उसकी हथेली को हल्का सा सहलाते हुए उसे कमरे के दरवाज़े की तरफ इशारा किया.

"वक़्त की चिंता मत करो आरती, पापा जी को लगेगा की तुम तैयार होने में वक़्त ले रही हो. और रही बात डर की... तोह डर के आगे hi तोह जीत है."

आरती ने एक बार फिर पापा जी की तरफ देखा और फिर नवाज़ की तरफ, उसकी आँखों में अब एक खामोश इजाज़त थी. वो दोनों दबे पाऊँ कमरे के अंदर दाखिल हुए. जैसे hi नवाज़ ने पीछे से दरवाज़ा हल्का सा भिड़ाया, कमरे की तन्हाई ने उनके जज़्बातों को और भी गहरा कर दिया.

आरती ने वो लाल साड़ी बीएड पर राखी और नवाज़ की तरफ पीठ करके कड़ी हो गयी. उसने अपने बालों को एक तरफ किया, जिससे उसकी नंगी पीठ और ब्लाउज की डोरियन नवाज़ के बिलकुल सामने आ गयी.





"तोह शुरू कीजिये... देखते हैं आप कितने बड़े मददगार हैं,"

आरती ने आईने में नवाज़ का अक्स देखते हुए कहा.

नवाज़ ने dheere-dheere अपना हाथ आरती की पीठ की तरफ बढ़ाया, जहाँ उसकी उँगलियाँ ब्लाउज की डोरी के पास ठिठक गयी

नवाज़ ने धीरे से कहा,

"तुमने तोह कहा था की मदद चाहिए, पर इस साड़ी में तुम्हें देखकर तोह लगता है की तुम मुझे hi मुश्किल में डालने वाली हो."

आरती ने एक गहरी और नशीली नज़रों से नवाज़ को ऊपर से नीचे तक नापा. उसके चेहरे पर अब एक गंभरता और शरारत का अनोखा मेल था. वह धीरे से मुड़ी और नवाज़ के इतने करीब आ गयी की उसकी सांसें नवाज़ के चेहरे को छूने लगी. उसने अपनी गर्दन थोड़ी और झुके, जिससे उसके गले की सुराहीदार बनावट साफ़ दिखने लगी.

उसने धीमी, भारी आवाज़ में कहा,

"मुश्किल में तोह आप पहले hi पद चुके हैं नवाज़ जी... अब देखना ये है की आप इस साड़ी की प्लेट्स ठीक करते हैं या अपनी धड़कनों को

नवाज़ की उँगलियाँ अब आरती की नंगी पीठ पर ब्लाउज की डोरी के बिलकुल करीब ठिठक गयी थी.

आरती की तपिश और उसके जिस्म से आती हलकी खुशबु ने नवाज़ के होश उड़ा दिए थे. जब आरती ने पलट कर इतनी नज़दीक से नवाज़ की आँखों में देखा, तोह नवाज़ को लगा जैसे उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो.

आरती की सुराहीदार गर्दन और उस पर गिरती बालों की लेथ नवाज़ को उकसा रही थी. नवाज़ ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी डोरी को पकड़ने के बजाये, अपनी उँगलियों के पोरों से उसकी पीठ को हल्का सा छुआ.





आरती ने एक हलकी सी सिसकी ली और अपनी आँखें मूँद ली. नवाज़ ने उसके कान के पास झुक कर बहुत hi धीमी आवाज़ में कहा,





"प्लेट्स तोह ठीक हो जाएँगी आरती... लेकिन मेरी धड़कनों का जो हाल तुमने कर दिया है, उसका इलाज तोह सिर्फ तुम्हारे पास hi है. ये लाल रंग तुम पर नहीं, मुझ पर चढ़ रहा है."

आरती ने अपनी आँखें खोली, जिनमें अब शर्म से ज़्यादा be-panah तालाब थी. उसने नवाज़ का वही हाथ पकड़ा जो उसकी पीठ पर था, और उसे थोड़ा और दबाते हुए बोली,

"तोह फिर इलाज कीजिये न... किसने रोका है?

दरवाज़ा बंद है और वक़्त हमारा है."

नवाज़ ने अब कोई देरी नहीं की. उसने डोरी की क्नॉट पर अपनी उँगलियाँ जमाई और उसे एक hi झटके में ढीला कर दिया. ब्लाउज का गाला थोड़ा और नीचे सरका, और आरती ने नवाज़ के काँधे पर अपना सर टिका दिया

नवाज़ की उँगलियों का वो एक झटका आरती के पूरे वजूद में एक करंट दौड़ा गया. जैसे hi डोरी ढीली हुई, ब्लाउज का गाला आरती के मखमली कन्धों से थोड़ा और नीचे सरका, जिससे नवाज़ की नज़रों के सामने उसकी नंगी पीठ का एक बड़ा हिस्सा विज़िबल हो गया.





आरती ने गहरी सांस लेते हुए नवाज़ के काँधे पर अपना सर टिका दिया. उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था की नवाज़ को अपने सीने पर उसकी हर एक धड़कन महसूस हो रही थी. कमरे में एक अजीब सी ख़ामोशी थी, जिसमे सिर्फ उन दोनों की तेज़ होती सांसें सुनाई दे रही थी.

नवाज़ ने अपनी हथेली आरती की नंगी पीठ पर राखी. उसकी ठंडक और आरती के जिस्म की गर्मी जब मिली, तोह आरती के शरीर में एक थरथराहट सी हुई. नवाज़ ने उसके कान के पास जाकर बहुत hi धीरे से फुसफुसाया,

"अब बताओ... क्या अब भी तुम चाहती हो की मैं तुम्हे ये साड़ी पहनाने में मदद करूँ? या फिर ये साड़ी और ये डोरी अब हमारे बीच से हैट hi जाये तोह बेहतर है?"

आरती ने पलट के नवाज़ के गले में अपनी बाहें दाल दी और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छुपा लिया. उसने बिना कुछ कहे नवाज़ को और कास कर पकड़ लिया, जो इस बात का इशारा था की अब उसे किसी साड़ी या किसी 'रोड ट्रिप' की जल्दी नहीं थी.





नवाज़ ने आरती की चीन पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर उठाया. आरती की आँखें नशीली हो चुकी थी





और उसके होठ हलकी थरथराहट के साथ खुले हुए थे. नवाज़ ने देखा की कैसे साड़ी का पल्लो अब dheere-dheere उसके कंधे से फिसल रहा था

नवाज़ ने आरती की आँखों में देखा, जहाँ अब शर्म की जगह एक बेबाक ख्वाहिश ने ले ली थी. उसने पल्लू को पकड़ने की कोई कोशिश नहीं की. उसने बस देखा की कैसे वह लाल रेशमी कपडा सरकता हुआ आरती की नरम ब्याह से होता हुआ, एक नरम सरसराहट के साथ ज़मीन पर जा गिरा.

पल्लू गिरते hi आरती के बदन की वो कशिश नवाज़ के सामने बिलकुल साफ़ थी. ब्लाउज की ढीली डोरी और कंधे से सरकता गाला उसे और भी be-panah खूबसूरत बना रहा था. आरती ने अपनी नज़रें नहीं हटाई, बल्कि नवाज़ के सीने पर अपने हाथ रख दिए, जैसे वह उसे अपने और करीब खिंच रही हो.

नवाज़ ने बहुत hi मद्धम आवाज़ में कहा,

"जो चीज़ गिर गयी है आरती, उसे वहीँ रहने दो... अब हमारे बीच कोई पर्दा नहीं होना चाहिए."

आरती ने एक गहरी सांस ली और नवाज़ की आँखों में झांकते हुए फुसफुसाई,





"आप बहुत ज़िद्दी हैं... पर मेरी ज़िद अब आप से भी बड़ी है."

इतना कह कर आरती ने नवाज़ के होठों की तरफ रुख किया, और इस बार नवाज़ ने उसे इंतज़ार नहीं कराया. उसने आरती की कमर में हाथ दाल कर उसे इतनी ज़ोर से अपने सीने से लगाया की दोनों की धड़कनें एक हो गयी. कमरे की तन्हाई और साड़ी का वो ज़मीन पर गिरा ढेर गवाह था की अब ये खेल 'रोड ट्रिप' से कहीं आगे निकल चूका था

नवाज़ ने आरती को इतनी शिद्दत से भीचा की उनके बीच की साड़ी दूरियां ख़तम हो gayi.aur आरती उसके होंटो को चूसने लगी ..





आरती के होठों का वो नाम और नरम स्पर्श नवाज़ के होश उड़ाने के लिए काफी था

नवाज़ ने उसे दरवाज़े की दीवार से सत्ता दिया, जैसे वो उसे दुनिया की हर नज़र से छुपा लेना चाहता हो.

दीवार की ठंडक और नवाज़ के जिस्म की गर्मी के बीच आरती ने एक सिसकी भरी. नवाज़ ने उसके होठों से अपनी गिरफ्त हलकी सी ढीली की और उसके चेहरे से होती हुई अपनी बाहें उसकी कमर पर कास ली.

"यहाँ से अब पीछे हटने का रास्ता नहीं है आरती,"

नवाज़ ने उसके होठों के बिलकुल पास सांस लेते हुए कहा.

आरती ने अपनी बाहें नवाज़ की गर्दन में दाल दी और उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फसते हुए नशीली आवाज़ में बोली,

"रास्ता तोह तभी बंद हो गया था जब आपने वो डोरी खोली थी... अब तोह बस मंज़िल चाहिए."

ऐसा बोल के उसको किश करने लगी ..





नवाज़ ने आरती को अपनी बाहों में उठा लिया. आरती का हल्का बदन और उसके जिस्म की लचक नवाज़ को और भी पागल कर रही थी.

वो उसे लेकर बीएड की तरफ बढ़ा, जहाँ खिड़की से आती चांदनी उनके इस नए सफर की गवाह बनने वाली थी. बीएड पर लेटते hi नवाज़ ने उसके चेहरे पर गिर रही बालों की लातों को हटाया और उसकी आँखों में dekha—wahan अब सिर्फ समर्पण था.

आरती ने नवाज़ का हाथ पकड़ कर अपने दिल पर रखा और धीरे से कहा,

"आज ये साड़ी का रंग मेरी धड़कनों में उतर गया है... इसे महसूस कीजिये.
 
नवाज़ और आरती के लिए अब वक़्त जैसे थम सा गया था. बहार पापा जी के चलने की आहात या रस्ते का intezar—sab कुछ उस कमरे की चौखट के बहार hi छूट गया था. नवाज़ ने जब आरती को बीएड पर लिटाया, तोह साड़ी का वो bacha-kucha हिस्सा भी उनके जज़्बातों के सैलाब में बाढ़ बनने की कोशिश कर रहा था.

नवाज़ ने आरती के ऊपर झुकते हुए उसकी नशीली आँखों में देखा और धीरे से फुसफुसाया,

"पापा जी को लगने दो की तुम तैयार हो रही हो... उन्हें क्या पता की तुम यहाँ मेरे इश्क़ के रंग में रंग रही हो."

आरती ने नवाज़ का चेहरा अपने दोनों हाथों में भरा और उसे और करीब खींचते हुए कहा,

"आज के बाद ये लाल रंग हमेशा मुझे ये पल याद दिलाएगा. नवाज़ जी, आज मैं सिर्फ आपकी होना चाहती हूँ... हर दर, हर बंदिश से परे."

नवाज़ ने उसके माथे को चूमा और फिर dheere-dheere उसके गालों और गर्दन पर अपने होठों से एक अनोखी दास्तान लिखने लगा. आरती ने अपनी आँखें कास कर मूँद ली और उसकी उँगलियाँ नवाज़ की पीठ पर निशाँ बनाने लगी. हर सांस के साथ उनकी बेताबी बढ़ती जा रही थी.

बहार से पापा जी की एक हलकी सी खांसी की आवाज़ आयी, जिसने एक पल के लिए आरती को चौंकाया, लेकिन नवाज़ ने उसके कान के पास सरसराते हुए कहा,

"ध्यान भटकाओ मत... ये लम्हा दोबारा नहीं आएगा."

आरती ने एक गहरी सांस ली और खुद को पूरी तरह नवाज़ के हवाले कर दिया. वो दोनों अब उस मुकाम पर थे जहाँ से वापसी नामुमकिन थी. कमरे की मद्धम रौशनी में उनका मिलान एक अधूरी ख्वाहिश को पूरा करने की तरफ बढ़ रहा था

नवाज़ और आरती उस लम्हे में पूरी तरह खो चुके थे जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. कमरे की मद्धम रौशनी उनके जज़्बातों को और गहरा कर रही थी. लेकिन जैसे hi नवाज़, आरती के और करीब आया, बहार से पापा जी की कड़क आवाज़ गूंजी:

"ारी नवाज़! कहाँ मर गए भाई?"

वो एक आवाज़ किसी ठन्डे पानी के झटके जैसी थी. आरती के होश ठिकाने आये और उसने घबरा कर नवाज़ को खुद से दूर धकेला. उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गयी थी.

"पापा जी!"

उसने फुसफुसाते हुए कहा,

"वो... वो अंदर तोह नहीं आएंगे न?"

नहीं आएंगे

तभी बहार से फिर आवाज़ आयी,

"नवाज़, ज़रा बहार तोह आओ! कब से ये टीवी ठीक करने की कोशिश कर रहा हूँ, पर हो hi नहीं रहा. ज़रा देखो तोह इसे!"

आरती ने जल्दी से अपना पल्लू संभाला और नवाज़ को पीछे धकेलते हुए सख्ती से इशारा किया,

"जाओ! जल्दी बहार जाओ!"

नवाज़ का नशा गुस्से में बदल गया. उसका मज़ा किरकिरा हो चूका था. उसने दबे पाऊँ दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए गुस्से में बड़बड़ाया,

"इस बूढ़े की तोह माँ की छूट ... हर बार बीच में आ जाता है! लगता है ये टीवी के सारे वायर इसके गांड के अंदर hi घुसाने पड़ेंगे तभी सुकून मिलेगा इसे."

नवाज़ की गुस्से से भरी बात सुनकर आरती का चेहरा एकदम से सख्त हो गया. उसके होठों पर जो अभी तक थरथराहट थी, वो अब गुस्से की लकीर में बदल गयी. उसने अपने बिखरे हुए पल्लू को एक झटके में संभाला और नवाज़ को एक सख्त नज़र, तिरछी गर्दन और गुस्से भरा रुख दिखते हुई देखा ..अपने दोनों हाथ कमर पर रखे हुए और आँखों में आग लिए हुई ..





"जुबां संभाल कर नवाज़ जी!"

आरती ने गुस्से में दबी आवाज़ में कहा,

"वो मेरे ससुर हैं, इस घर की इज़्ज़त हैं. उनके बारे में ऐसी बात मैं बर्दाश्त नहीं करुँगी. वो बेचारे वहां परेशान हैं और आप उन्हें गाली दे रहे हैं? शर्म कीजिये!"

आरती का ये सख्त रूप देख कर नवाज़ ठिठक गया. उसने समझ लिया था की आरती के लिए उसके परिवार की इज़्ज़त उसके इश्क़ से ऊपर है. आरती ने दरवाज़े की तरफ इशारा करते हुए सख्ती से कहा,

"अभी बहार जाइये और उनकी मदद कीजिये, वर्ण मुझसे बुरा कोई नहीं होगा."

जाना तो पड़ेगा रानी ..पर हर बार डिस्टर्ब करने चले आते है ..

आरती की आँखों में जो तीखापन है, वही तीखापन उसकी आवाज़ में भी उतर आया. उसने नवाज़ को पीछे धकेलते हुए अपने ब्लाउज की डोरी को कसना शुरू किया और गुस्से में कहा:

"जुबां को लगाम दीजिये नवाज़ जी! वो सिर्फ एक बुज़ुर्ग नहीं, मेरे ससुर हैं... इस घर की इज़्ज़त हैं. उनके बारे में ऐसी घटिया बातें मैं बर्दाश्त नहीं करुँगी."

आरती ने अपनी कमर पर हाथ रखा और नवाज़ की तरफ एक शिकायती नज़र से देखा,





उसके चेहरे पर गुस्से के saath-saath एक मर्यादा भी दिख रही है.

"टीवी ख़राब है तोह वो आपको hi बुलाएँगे न? वो बेचारे तोह हमें नेक समझ रहे हैं, और आप उन्हें hi गाली दे रहे हैं? चलिए अब, ये सब दिमाग से निकालिये और बहार जाकर उनकी मदद कीजिये."

नवाज़ को अपनी गलती का एहसास तोह हुआ, लेकिन उसके अंदर की भड़की हुई आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. आरती ने उसकी एक न सुनी और आईने में अपना चेहरा ठीक करते हुए साफ़ इशारा कर दिया की अब और मज़ाक नहीं.

"जाओ!" आरती ने थोड़े सख्त लहज़े में दोबारा कहा

तब नवाज़ बहार चला गया
 
उधर नवाज़ के जाने के बाद कंचन की फ्रेंड किरण की भाभी शर्मीला को सब याद आता है रात भर सोचने के बाद वो सुबह किरण को फ़ोन करती है..

फ़ोन करने से पहले वो आपने छोटी बहन से उस वाकिया के बारे मई पता करती है . वो लड़के कोण थे कहा से थे ..वो बोलती है कोई लोफर आस पास के गाँव के गुंडे टाइप लड़के थे

शर्मीला किरण से कहते है

किरण तुमने तो कहा था कंचन के भैय्या अरविन्द अग्रवाल और उनकी वाइफ आरती रुकने वाला है हमारे फ्लैट मई

हां भाभी वही तो रुके थे

No ये कोई अग्रवाल नहीं है .. कोई गले का गुंडा तह ..

आप को कैसे पता

मई जानती हु उस लोफर लड़के को ..एक नंबर का जगलादु लड़का है.. मेरे छोटे बहन को उसके किसी दोस्त ने चीड़ तह तो मई इसे समजने गयी तो ये मुझसे hi जगदा करने लगा तह

ओह्ह भाभी मुझे नहीं पता पर उसके साथ क्या आरती भाभी hi थी क्या

वो मुझे पता नहीं … एक खूबसूरत लेडी थी पर मुझे पता नहीं

भाभी सच मई मुझे नहीं पता कंचन ने बोलै वही आप को बोलै ..

कंचन से एक बार पूछ लेना ये क्या माजरा है

जी भाभी

कहके किरण फ़ोन रखते है

फ़ोन रखने के बाद किरण कंचन के रूम मई जेक

हो गया क्या तेरे भाई का बर्थडे

है

पक्का भाई hi था न

हां

जूथ मत बोल ..तेरे वजह से मुझे मेरे भाभी की दन्त पदु

तब कंचन हस्ते हुई कहते है

नहीं वो नवाज़ था .. हमारा नौकर

वही तो भाभी वही कह रही थी एक नंबर का लोफर लड़का है …

कंचन को किरण ने सब बता दिया जो उसके भाभी ने बोलै तह

अच्छा मतलब तेरे भाभी नवाज़ की पहले से जनता है

हां पर कंचन तुजे तेरे भाभी के बॉयफ्रेंड का बर्थडे एन्जॉय करना तह टाइम स्पेंड करना तह तो पहले मुझे बताना चाहिए था

अरे ऐसे कोई बात नहीं यही वो मेरे भाभी का बॉयफ्रेंड नहीं है और वो हमारा नौकर है ..हम दोनों ने डीडे किया था उसका बर्थडे सेलिब्रेट करने का और मई वह थी पुरे दिन

तू कब आये

तेरे भाई भाभी आने से 10 मिनट पहले

तुजे कैसे पता

तेरे भाभी को पूछ वो कब आये और आपने वरदान से पूछ मई कब आये तब यकीं हो जायेगा तुजे

नहीं यार मई तुम पाई शक नहीं कर रही हु पर भाभी को बताना पड़ेगा

हां पता है मई जैसे बोलती हु वैसे बता फिर वो कुछ शक नहीं करेंगे

बता क्या बताना है

तब कंचन सब डिटेल्स मई किरण को बताती है भाभी को क्या क्या बोलना है

इधर कुछ देर बाद आरती अपने कमरे से बहार nikli...aur उसे देखते hi नवाज़ का दिल खुश हो gaya...kyoki उसने नवाज़ के पसंद की साड़ी पहनी हुई थी...

नवाज़ को देखते hi उसने साड़ी को टच किया और मुस्कुरा दिया...





जैसे कह रही हो की देख lo...aapki पसंद hi है...

नवाज़ ने भी ध्यान से उसे हाथ से इसरा कर दिया की कमाल लग रही ho...fir वो नजरे झुका जार शर्मा गई ...तब नवाज़ उसके पास गया .... तुम बेहद खूबसूरत लग रही हो...

तब नखरे से कहते है

एक डैम झूट...

सच में...

कोई सच नहीं है...

यकीन नहीं मेरी बात का.... तो मेरी आँखों में देख लो..... आँखे झूठ नहीं कहती

चलिए ..हमें नीता की तरफ जाना है

चलो

कह के दोनों बहार चले गए नवाज़ ने बाइक स्टार्ट की. आरती पीछे बैठी और इस बार उसने कोई पर्दा नहीं rakha—usne अपने दोनों हाथ नवाज़ के सीने पर बाँध दिए और अपना सर उसकी पीठ पर टिका दिया.

नीता का घर गाँव से थोड़ा बहार तह ..दोपहर का समय था .. सुनसान सड़क थी.. पर बाइक की रफ़्तार और उनका इश्क़, दोनों परवान चढ़ रहे थे.
 
प्रोफाइल मई स्टोरी क्यों नहीं दिख रहे है ..
 
चलिए ..हमें नीता की तरफ जाना है

चलो

कह के दोनों बहार चले गए नवाज़ ने बाइक स्टार्ट की. आरती पीछे बैठी और इस बार उसने कोई पर्दा नहीं rakha—usne अपने दोनों हाथ नवाज़ के सीने पर बाँध दिए और अपना सर उसकी पीठ पर टिका दिया.

नीता का घर गाँव से थोड़ा बहार तह ..दोपहर का समय था .. सुनसान सड़क थी.. पर बाइक की रफ़्तार और उनका इश्क़, दोनों परवान चढ़ रहे थे.

नवाज़ बाइक चलते हुए लगातार आगे देख रहा था, पर उसके सीने पर कैसे हुए आरती के हाथ और पीठ पर टिका उसका सर, उसे एक अजीब सा सुकून दे रहे थे. सुनसान सड़क पर बाइक की आवाज़ के बीच नवाज़ थोड़ा ज़ोर से बोलने लगा ताकि आरती को सब सुनाई दे.

"ये जो बाएं तरफ बड़ा सा आँगन दिख रहा है न रानी, ये गाँव के मुखिया का पुराण घर है. अब यहाँ कोई नहीं रहता,"

नवाज़ ने एक हाथ से इशारा करते हुए बताया.

मतलब तुम्हारे वंदना का पुराण घर

उसने तना मारा

नवाज़ ने जैसे hi वंदना का नाम सुना, उसने मुस्कुरा कर शीशे में आरती की तरफ देखा. उसकी आँखों में एक शरारत थी.





"अरे रानी! पुराणी बातों को लेकर अभी से तना मरने लगी?"

नवाज़ ने बाइक की रफ़्तार थोड़ी काम करते हुए हलके से कहा.

"वो पुराण घर मुखिया जी का है, और वंदना से मेरा अब कोई lena-dena नहीं है. अब तोह जो कुछ भी है, बस तू hi है."

आरती ने उसके सीने पर बने अपने हाथों को थोड़ा और कैसा, जैसे वो जाता रही हो की नवाज़ पर अब सिर्फ उसका हक़ है. उसके चेहरे पर थोड़ी जलन साफ़ दिख रही थी, पर वो नवाज़ की इस बात से अंदर hi अंदर खुश भी हुई.





"मुझे सब पता है नवाज़,"

आरती ने उसकी पीठ पर अपना चेहरा लगाए हुए थोड़ा मुँह बनाकर बोलै.

"गाँव के हर कोने में तुम्हारी कोई न कोई कहानी छुपी हुई है."

नवाज़ ने एक छोटा सा ठहाका लगाया और बाइक को नीता के घर के रस्ते को मोड़ते हुए बोलै,

"कहानियां चाहे जितनी भी हो बेगम, पर उन सबका आखरी पन्ना तोह तेरे नाम पर hi आकर रुकेगा. अब चलो, नीता का घर नज़दीक hi है. अपने इस गुस्से को थोड़ा ठंडा कर लो, वर्ण वो देखेगी तोह क्या सोचेगी."

आरती ने थोड़ा सर उठाकर देखा और फिर से उसकी पीठ से टिक गयी.

"और वो जो आगे बरगद का पेड़ है, वहां क्या है?"

उसने पूछा.

"वो गाँव की पुराणी चौपाल है. शाम को वहां सब बुज़ुर्ग बैठते हैं. पर इस वक़्त वहां परिंदा भी नहीं मिलेगा,"

नवाज़ ने हस्ते हुए जवाब दिया.

और ये जो सामने से रास्ता काट रहा है, ये सीधे नीता के घर की तरफ जाता है. पैदल रास्ता है .. गाँव से थोड़ा अलग है, इसलिए यहाँ शांति रहती है.

आरती ने उसकी पकड़ और मज़बूत कर ली.

नवाज़ ने बाइक को उस पेडल रस्ते के शुरुआत पर hi रोक दिया. सड़क के दोनों तरफ unche-unche खेत थे और बीच में से एक पतली डंडी नीता के घर की तरफ जा रही थी. दोपहर की धुप और पेड़ों की छाव के बीच वो रास्ता बिलकुल सुनसान और शांत लग रहा था.

"चलो रानी, अब यहाँ से आगे बाइक नहीं जाएगी. थोड़ा पैदल चलना पड़ेगा,"

नवाज़ ने स्टैंड लगते हुए कहा.

आरती बाइक से उत्तरी और उसने अपने साड़ी ठीक ki...aur आगे चलने लगी ..





नवाज़ ने भी बाइक कड़ी की और आगे बढ़ने लगा. लेकिन इस सुनसान पैदल रस्ते पर चलते hi नवाज़ ने पीछे मुड़कर देखा और अचानक आरती का हाथ अपने हाथ में थामे हुए उसे खींच लिया.

आरती थोड़ा झिझकी,

"नवाज़... कोई देख लेगा. गाँव का रास्ता है."

नवाज़ ने कुटिलता से हस्ते हुए चारो तरफ नज़र घुमाई और बोलै,

"कहा न रानी, दोपहर का समय है. इस रस्ते पर इस वक़्त कोई नहीं आता. और अब तोह तू मेरी होने वाली बेगम है, फिर डर कैसा?"

आरती ने sharmo-haya से अपनी नज़रें झुका ली, लेकिन इस बार उसने नवाज़ का हाथ झटका नहीं, बल्कि उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फसा ली.

नवाज़ ने जब महसूस किया की आरती ने उसकी उँगलियों को मज़बूती से थाम लिया है, तोह उसने क़दम रोक दिए. उसने झटके से आरती को अपनी तरफ खींचा, जिससे आरती सीधे उसके सीने से जा टकराई. दोपहर की धुप पेड़ों के पत्तों से छान कर उन दोनों पर पद रही थी, और चारो तरफ एक गहरा सन्नाटा था.

"नवाज़... क्या कर रहे हो? रास्ता है..."

आरती ने दबी ज़बान से कहा, मगर उसकी सांसें तेज़ हो चुकी थी. उसकी हिचकिचाहट अब शर्म और चाहत में बदल रही थी.

"कहा न रानी... इस वक़्त यहाँ कोई नहीं आएगा,"

नवाज़ ने फुसफुसाते हुए कहा. उसने अपना दूसरा हाथ आरती की कमर पर रखा और उसे अपने और क़रीब कर लिया. ब्लाउज में क़ैद उसके भरी मम्मी नवाज़ के सीने पर ज़ोर से डाब गए, जिससे दोनों की धड़कनें एक जैसी तेज़ हो गयीं.

नवाज़ ने हलके से आरती की चीन को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया. आरती ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर ली थी, और उसके सुर्ख गुलाबी होंठ हलके से काँप रहे थे.

नवाज़ अब रुकने वाला नहीं था. उसने धीरे से अपने होंठ आरती के नरम और गर्म होंठों पर रख दिए.





पहले तोह नवाज़ ने बिलकुल नरम और धीमी शुरुआत की, जैसे वो आरती के होंठों का रास चख रहा हो. पर जैसे hi आरती के हाथों ने नवाज़ के कन्धों को कास के पकड़ा, नवाज़ का जोश बढ़ गया. उसने आरती के नीचे वाले होंठ को अपने होंठों के बीच दबाया और उसे ज़ोरदार ढंग से चूसना शुरू कर दिया.

आरती के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली

—"मममहह..."—

जो नवाज़ ने अपने मुँह के अंदर hi समेत ली.

नवाज़ का एक हाथ आरती के बालों में फिसला और दूसरा हाथ नीचे जाकर उसकी गोल और टाइट गकनद को ज़ोर से दबाने लगा. इस अचानक छुवन से आरती का जिस्म पूरी तरह से खींचा चला गया और वो नवाज़ के होंठों का साथ देते हुए खुद भी उसके होंठ को चूसने लगी.

दोपहर के उस सुनसान रस्ते पर दोनों एक दुसरे की साँसों की गर्मी में पूरी तरह खो गए थे ..

नवाज़ का जोश अब बेकाबू हो रहा था. उसने आरती के होंठों को छोड़ने के बजाये उन्हें और भी ज़्यादा शिद्दत से चूसना शुरू कर दिया, जैसे वो उसे पूरी तरह अपना बना लेना चाहता हो. आरती की सांसें उखाड़ने लगी थी, पर वो नवाज़ के इस जूनून में इस क़दर डूब चुकी थी की खुद को पीछे हटाने की ताक़त उसमे नहीं बची थी.

नवाज़ ने अपने होंठों को हलके से अलग किया, मगर दूर नहीं हुआ. उसने आरती के गीले होंठों से लेकर उसकी चीन और फिर उसकी नरम, गोरी गर्दन पर अपने गरम होंठ रख दिए.

जैसे hi नवाज़ ने उसकी गर्दन पर एक गहरी किश की और वहां हल्का सा काटा, आरती के जिस्म में एक झुरझुरी दौड़ गयी.

"आआह्ह्ह... नवाज़..."

आरती के मुँह से एक नरम सिसकारी निकली और उसने डर और चाहत के मरे अपनी आँखें कास के बंद कर ली.

नवाज़ का हाथ अब रुकने वाला नहीं था. उसने आरती की पीठ से होते हुए अपना हाथ नीचे बढ़ाया और उसकी टाइट, well-shaped अस्स को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी तरफ ज़ोर से खींचा. साड़ी में क़ैद आरती का जिस्म नवाज़ के मरदाना जिस्म से इस तरह चिपक गया की दोनों के बीच हवा की भी जगह नहीं बची. नवाज़ ने उसके गोल मम्मी को अपनी उँगलियों से बुरी तरह दबाना और सहलाना शुरू किया, जिससे आरती का पूरा बदन उत्तेजना से काँप उठा.

"नवाज़... बस कीजिये... मैं कड़ी नहीं हो प् रही हूँ..."

आरती ने उसके कन्धों पर अपना सर टिकते हुए toot-ti आवाज़ में फुसफुसाया. उसके पेअर सच में thar-thar काँप रहे थे और उसकी सांसें बोहोत तेज़ चल रही थी.

नवाज़ ने उसे अपनी बाहों में मज़बूती से संभाला, उसकी आँखों में देखा जो इस वक़्त पूरी तरह चाहत से नशीली हो चुकी थी, और कुटिलता से मुस्कुरा कर बोलै,

"अभी से ये हाल है रानी? कल खेत में जब पूरी रात हमारी होगी, तब तेरा क्या होगा?"

आरती ने शर्म से अपना लाल चेहरा फिर से उसके सीने में छुपा लिया, जबकि उसकी धड़कन अभी भी बुलेट ट्रैन की तरह भाग रही थी.

तभी पास के खेत में किसी सूखे पत्ते पर किसी के चलने की आवाज़ आयी—char-char—और दोनों झटके से एक दुसरे से अलग हो गए.

आरती ने घबरा कर चारो तरफ देखा और शर्म के मारे अपने बिखरे बाल और कपडे ठीक करने लगी. नवाज़ ने भी एक गहरी सांस ली और माहौल को नार्मल करने के लिए कुटिलता से मुस्कुरा दिया.

आरती ने अपनी तेज़ साँसों को काबू में करते हुए फुसफुसाई,





नवाज़ की और देखते हुई

"चलिए... नीता का घर नज़दीक hi है न? अब देर मत कीजिये."

नवाज़ ने उसकी घबराहट को देखा और उसका हाथ हलके से दबाते हुए बोलै,

"हाँ रानी, बस सामने जो मोड़ है, उसके पार hi उसका घर है. 5 -10 मिनट का रास्ता है."

दोनों ने अपने कदम आगे badhaye.neeta के घर की तरफ बढ़ने लगे..
 
नवाज़ और आरती अब थोड़ा आगे बड़े .. उस मोड़ से होते हुए थोड़ा आगे बढे, तोह उन्होंने देखा की दोपहर के उस सुनसान रस्ते पर एक आदमी और एक लड़की साइकिल पर बैठे आपस में अजीब तरीके से रोमांस कर रहे थे. नवाज़ ने उन्हें देखते hi गुस्से में चिल्ला कर बोलै:

"क्या बे रामलाल! क्या कर रहा है इस लड़की के साथ?"

उस आदमी ने पलट कर धीटपणे से जवाब दिया,

"दिख नहीं रहा है क्या भोस्डिके?"

नवाज़ का पारा चढ़ गया,

"गली देगा मुझे?"

"हाँ दूंगा मादरचोद! क्या कर लेगा?"

उस आदमी ने बिना डरे पलट कर जवाब दिया.

आरती ने डर कर नवाज़ का हाट खींचा और फुसफुसाई,

"नवाज़, चलो यहाँ से... ये बद्द्तमीज़ लग रहा है."

उस आदमी ने आरती की आवाज़ सुन ली और अकड़ते हुए बोलै,

"ू मेमसाब! कौन बद्द्तमीज़? किस को बद्द्तमीज़ कहा तूने? मेमसाब होगी अपने घर की, मैं क्या किसी से डरता हूँ क्या?"

आरती उस आदमी के इस तरह बात करने से बुरी तरह डर गयी. उस आदमी ने नवाज़ की तरफ देखा और आगे बोलै,

"बद्द्तमीज़ी दिखाऊ क्या अभी?"

नवाज़ ने गरज कर पूछा,

"किस को दिखायेगा बे बद्द्तमीज़ी?"

"इस मेमसाब को!"

उस आदमी ने आरती की तरफ इशारा किया.

आरती ने घबरा कर नवाज़ का हाथ पकड़ा,

"नवाज़, रहने दो न... चलो प्लीज."

नवाज़ ने उस आदमी को घूर ते हुए कहा,

"तुझे पता भी है ये कौन है?"

"मुझे क्या करना है कोई भी हो!"

उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ.

तब नवाज़ का गुस्सा आठवें आसमान पर पहुँच गया. . आरती लगातार डर के मारे बोल रही थी,

"नवाज़ चलो... हमें नीता के पास जाना है."

और उस आदमी की तरफ जाने लगा

उस आदमी ने नवाज़ को आपने और आते हुई देख के ताना मारा,

"मुझे डरा रहा है क्या? मेरे पास आ के क्या करेगा, मुझे मरेगा क्या?"

नवाज़ ने ठन्डे मगर खौफनाक भाव से कहा,

"हाँ, मरूंगा."

"मैं भी मरूंगा!"

उस आदमी ने भी जवाब दिया.

नवाज़ ने आरती की तरफ देखा और बिलकुल गंभीर आवाज़ में बोलै,

"मेमसाब, आप दो मिनट के लिए वही साइड रुको ."

आरती डर के मारे चुपचाप साइड मई जेक कड़ी हो बी गयी. नवाज़ बसे उस आदमी के पास बढ़ने लगा, उसकी आँखों में इस वक़्त सिर्फ और सिर्फ खून सवार था.

नवाज़ के दिमाग में गुस्से का उबाल था. वो उस आदमी के बिलकुल करीब पहुंचा, जो अभी भी अपनी साइकिल पर तीख कर अकड़ दिखा रहा था और वो लड़की नीचे उतर चुकी थी ..

"बद्द्तमीज़ी दिखायेगा न तू? वो भी मेमसाब के सामने?"

नवाज़ की आवाज़ में इतनी गरज थी की रस्ते का सन्नाटा छिड़ गया.

उस आदमी ने साइकिल से उतारते हुए धीटपणे से कहा,

"हाँ, दिखाऊंगा! क्या उखाड़ लेगा तू बे?"

नवाज़ ने एक पल का भी वक़्त नहीं गवाए. उसने पूरी ताक़त से उस आदमी का कालर पकड़ा.. और पूरी ताक़त से गरज कर बोलै:

"इस मेमसाब का नाम आरती है! दीपक अग्रवाल जी की बहु और अरविन्द जी की बीवी!"

खटाक!

नवाज़ ने एक ज़ोरदार थप्पड़ उस आदमी के मुँह पर रसीद कर दिया. थप्पड़ इतना बुरा था की उस आदमी के होंठ से खून निकल आया.

आरती डर के मारे पीछे हैट गयी और रट हुए चिल्लाई,

"नवाज़! मारो मत... छोड़ दो उसे!"

उस आदमी का सारा नशा एक झटके में उतर गया. शेठजी का नाम सुनते hi उसके पैरों टेल ज़मीन खिसक गयी. वो ज़मीन पर girte-girte बचा और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा,

"नवाज़ भाई... नवाज़ भाई मुझे पता नहीं था ये शेठजी की बहु हैं... नाम सुना था पर कभी देखा नहीं था!"

"बद्द्तमीज़ी दिखा रहा था न उन्हें?!"

नवाज़ ने उसकी शर्ट को आगे खींचते हुए डांटा.

"नहीं नहीं! मई कैसे मेमसाब के साथ बद्द्तमीज़ी कर सकता हूँ... मैं तोह उनके hi raham-karam पर जी रहा हूँ!"

उस आदमी ने दोनों हाथ जोड़ लिए.

नवाज़ का गुस्सा और बढ़ गया. उसने चिल्लाकर कहा,

"उनकी जगह पर अपना मुर्गी का बिज़नेस कर रहा है, और उन्ही को अपनी बद्द्तमीज़ी दिखायेगा भड़वे तू?!"

खटाक!

नवाज़ ने एक और ज़ोरदार थप्पड़ उसके दुसरे गाल पर मार दिया. उस आदमी की साइकिल एक तरफ गिर गयी और वो खुद खेत की डंडी पर ढेर हो गया. आरती ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर ली और फिर कुछ सोच के आगे आयी और नवाज़ का हाथ पकड़ कर उसे पीछे खींचने लगी..

नवाज़ का गुस्सा अब शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. आरती ने डर कर नवाज़ का हाथ पकड़ा और बोली,

"नवाज़, मारो मत, ये तुमसे बड़े हैं!"

"इसकी बड़ी उम्र गयी तेल लेने मेमसाब!"

नवाज़ ने गुस्से में भांपते हुए कहा.

"आपके साथ बद्द्तमीज़ी कर रहा था. अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ sare-aam छिछोरी हरकत कर रहा है! इससे शर्म नहीं आ रही है मेमसाब, तोह इसको क्या रेस्पेक्ट देनी है?"

रामलाल ने ज़मीन पर baithe-baithe hi डरते हुए गिड़गिड़ा कर कहा,

"नवाज़ मुझे मालूम नहीं था..."

नवाज़ ने एक कुटिल मुस्कान दी और अपनी जेब से मोबाइल बहार निकला.

"तोह अब पता चल जायेगा!" ु

स्ने स्क्रीन पर उँगलियाँ चलते हुए नंबर डायल करना शुरू किया.

"किसको कॉल कर रहे हो नवाज़?"

रामलाल की जान हलक़ में आ गयी.

नवाज़ ने फ़ोन कान से लगते हुए कहा,

"अब तू बता, शेठजी को कॉल लागू या छोटे मालिक को?"

शेठजी और अरविन्द का नाम सुनते hi रामलाल के होश उड़द गए. वो झट से रास्ता छोड़ कर सीधे नवाज़ के पैरों में गिर गया.

"नवाज़ मुझे माफ़ कर दो! उनको कॉल करोगे तोह मैं भूखा मरूंगा... मेरे बच्चों का क्या होगा!"

"मर न साले!"

नवाज़ ने उसे लात मार कर पीछे धकेल दिया.

नवाज़ के पैरों से हटकर रामलाल अब आगे बढ़ा और सीधे आरती के पैरों में गिर गया.

"मेमसाब मुझे माफ़ कर दो! मैं ऐसी गलती कैसे कर सकता हूँ... मेरी मति मरी गयी थी!"

रामलाल ज़मीन पर सर रख कर zor-zor से रोने लगा. गाँव के उस सुनसान रस्ते पर उसकी रोने की आवाज़ सुनकर aas-paas के खेतों से लोग वहां इकठ्ठा होने लगे. कुछ hi देर में वहां acchi-khaasi भीड़ जमा हो गयी, जिससे आरती को बोहोत ज़्यादा ावक्वार्ड फील होने लगा. वो शर्म और घबराहट के मारे idhar-idhar देखने लगी.

भीड़ में से aane-jaane वाले लोग पूछने लगे,

"क्या हो गया? ये रामलाल रो क्यों रहा है?"

तभी आरती को पहली बार पता चला की इस बद्द्तमीज़ आदमी का नाम रामलाल है. जब भीड़ बढ़ने लगी और रामलाल और ज़्यादा रोने लगा, तोह आरती ने ावकवर्डनेस्स से बचने के लिए जल्दी से कहा,

"आप उठ जाइये."

"नहीं मेमसाब, आप पहले माफ़ कर दो!"

रामलाल ने रट हुए अपना सर उनके पैरों की तरफ बढ़ाया.

उठने और माफ़ी मांगने की हड़बड़ाहट में गलती से रामलाल का हाथ आरती के पैरों को छू गया. जैसे hi उसने आरती को टच किया, नवाज़ का दिमाग पूरी तरह घूम गया.

उसने बिना एक पल गवाए रामलाल के मुँह पर do-teen लाठ zor-zor से मार दी.

"हाथ लगा रहा है क्या मेमसाब को?!"

नवाज़ खौफनाक तरीके से चिल्लाया. रामलाल के मुँह से खून निकल आया और वो दर्द से कराहने लगा.

भीड़ में से एक औरत ने आगे बढ़कर पूछा,

"नवाज़, इसने क्या किया? क्यों मार रहे हो इस बेचारे को?"

नवाज़ ने गुस्से में भीड़ की तरफ देखा और बोलै,

"मेमसाब के साथ बद्द्तमीज़ी कर रहा था ये साला!"

औरत ने जैसे hi सुना, उसने डर और हैरानी से अपने मुँह पर हाथ रख लिया,

"है ढैय्या! बहुरानी के साथ?! इसकी क्या मति मरी है क्या... अब शेठजी को पता चलेगा तोह सच में भूखा मरेगा!"

भीड़ में खड़े बाकी लोग भी रामलाल को घूरने लगे और आपस में kaana-phoosi शुरू हो गयी.

आरती का चेहरा शर्म और डर से लाल हो चूका था. वो इस भीड़ और तमाशें से जल्द से जल्द निकलना चाहती थी.
 
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