Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 15 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

देह की होली





उसकी लंगोट की गाँठ,...

नहीं नहीं पूरी गाँठ नहीं खुली, दुष्ट ने बहुत कस के बांधा था,





लेकिन ढीली इतनी हो गयी थी, की कीचड़ से भरा मेरा हाथ, और भौजाई की होली असली वाली शुरू हो गयी थी,... लंगोट में हाथ डाल के मैंने उसे पकड़ लिया जिसके बारे में सुना इतना था लेकिन अबतक न देखा था न छुआ था, देख तो अभी भी नहीं पा रही थी , लेकिन छूने पकड़ने से ही अहसास हो गया की देवर की माँ भी मेरी सास की तरह , गदहे घोड़े से चुदवाने के बाद बियाई होंगी इसको,...

कड़ा तो लोहे का रॉड,





पर अभी तो होली होनी थी तो पहले तो कीचड़, और हाथ फैला के बगल में रखी पेण्ट और रंग की टूयब तो देवर के बाकी देह पर चार पांच कोट रंग पेण्ट वार्निश का चढ़ा था तो यही क्यों बच जाता,

और कीचड़ से निकल एक बार फिर हम दोनों अखाड़े में थे लेकिन मैंने झुक के कान में उसके बोल दिया था ,

मैं बड़ी हूँ , डालूंगी मैं जैसे तेरी बहने चुपचाप डलवाती है वैसे तू भी डलवा आज,

बेचारा देवर,... और देह की होली शुरू हो गयी।

और क्या होली हुयी देवर भाभी के बीच, कुछ देर तक तो देवर हिचका, झिझका,... लेकिन फिर भौजाई की बैंड बजा दी,...

शुरुआत तो मैंने ही की और उसे आँख से भी बरज दिया , मुंह से बोल के भी साफ़ साफ़ मना कर दिया और हाथ से भी पकड़ के रोक दिया, की मैं बड़ी हूँ, भौजाई हूँ, जो करुँगी मैं करुँगी , डालूंगी मैं वो अपनी बहनों की तरह चुपचाप डलवा ले,

और अखाड़े में उसे पटक के अखाड़े की मिटटी में ही गिरा दिया, और चढ़ गयी ऊपर,...





लंगोट रंग और कीच लगाने के लिए तो मैंने पहले ही ढीला कर दिया था, अबकी खोल के दूर फेंक दिया, भौजी देवर के बीच में लंगोट का क्या काम,... साड़ी मेरी छल्ले की तरह बस कमर से फंसी,

और फटा पोस्टर निकला हीरो,... और क्या हीरो था,

सच में जबरदस्त, लम्बाई तो मैंने पहले ही नाप ली थी, मेरे बीत्ते से भी एकाध इंच बड़ा ही रहा होगा, लेकिन जो देख के दिल दहल गया, वो था सुपाड़ा खूब मोटा तो था ही एकदम कड़ा, धूसर, बस पेशाब वाला छेद हलका सा दिखता था, लाल गुलाबी,





और अब मैं समझी मेरी एक से एक छिनार ननदों की भी मेरे इस देवर के आगे क्यों फटती थी, इस मोटे कड़े सुपाड़े को लीलने में भी भोंसड़ी वालियों की फूंक सरक जाती होगी,... पर मैं तो भौजाई थी, ...

अखाड़े में का देसी कडुआ तेल उठा के,... नहीं सुपाड़े पे नहीं पोता मैंने , ... सुपाड़ा दबा के छेद खोल के, जैसे मेरी देवर की माँ बचपन में लगाती होंगी, ... बस उसी तरह टप टप, बूँद बूँद सरसों का तेल,... मुझे मालूम था खूब छरछरा रहा होगा, छरछराये , मेरी भी तो परपरायेगी जब ये पेलेगा,... और फिर बाकी का तेल अपनी हथेली में लगा के बाकी के शिश्न पे,एकदम जड़ से लेकर,... जैसे पहलवान अखाड़े में कुश्ती लड़ने से पहले ढेर सारा तेल चुपड़ते हैं,





और मैंने अपनी गुलबिया में भी दो ऊँगली में ढेर सारा तेल चुपड़ के, एकदम अंदर तक, ...

असल में जो लौंडिया चुदने में चिल्लाती हैं एक तो छिनरपना और नौटंकी, स्साली शुद्ध नौटंकी और दूसरे, तैयारी नहीं करतीं चुदवाने के लिए जैसे सादी बियाह खाली मरद के चोदने के लिए होता है, लड़की को तो कुछ चहिये ही नहीं, मेरी तो जिस दिन से से इन लोगों ने लड़की देख के हाँ कहा था, बस तिलक बरीक्षा तो दूर, बस उसी दिन से, भाभियाँ तो छोड़िये, माँ मेरी उन से भी ज्यादा, गुलबिया को तेल पिलाया की नहीं, चिक्कन मुककन किया की नहीं,...





हाँ, देवर के सुपाड़े के लिए मेरी जीभ, होंठ, मुंह थे न,...

पहले वही पेशाब वाले छेद पर, जीभ की टिप डाल के जो सुरसुरी की मेरे देवर की महतारी की फट गयी,





उसके बाद जीभ से लपड़ सपड़ सुपाडे को चाट चाट के अपने थूक गीला कर दिया, और साथ में मेरे तेल लगे हाथ, देवर के लंड को मुठिया मुठिया के , बहुत मोटा बांस था, पूरी तरह से मुट्ठी में नहीं आ पा रहा था,...





और फिर भौजाई चढ़ गयी देवर की बांस की पिचकारी के ऊपर, मोटा मूसल,... लेकिन देवर पहलवान था तो भौजाई भी उस अखाड़े के जबरदस्त खिलाड़न,...

मैंने पहले दो ऊँगली डाल के अपनी बुर की फांको को फैला दिया, एकदम कैंची की खुली फाल की तरह, पूरी ताकत से,जाँघे भी पूरी तरह खुलीं,... और मेरी रसीली फांकों के बीच बस मैंने सुपाड़े को फंसा दिया, पहाड़ी आलू ऐसा मोटा सुपाड़ा, ... बस एक तिहाई फंसा होगा, पर इतना काफी था मेरे लिए, ...

अरे गन्ने अरहर के खेत में कुँवारी नयी उमर वाली जब जांघ के नीचे आती है तो गाँव के लौंडे बस , इतना भी सुपाड़ा भी घुस जाए तो फिर तो लड़की चाहे जितना रोये गरियाये , दुहाई दे, कोर्ट पुलिस का , बाप महतारी का नाम ले , बिन चोदे नहीं छोड़ते

तो मैं इत्ते मस्त देवर को क्यों छोड़ती,

तो मैंने भी नहीं छोड़ा,

बस गहरी सांस ले के, देवर के दोनों हाथ पकड़ के, ये मान के की आज इज्जत की बात है अगर मैंने इसकी इज्जत आज न लूटी , ... और पूरी ताकत से धक्का मार दिया,





चुदाई में जैसे लंड की लम्बाई मोटाई के साथ कमर का जोर और चूतड़ की ताकत लगती है वही बात जब औरत ऊपर होती है , तो मेरी कमर की ताकत किसी मर्द से कम नहीं थी, ...

गप्पांक, दो तीन धक्के और सुपाड़ा पूरा अंदर,... लेकिन उतने में ही मेरी माँ बहन सब चुद गयीं। लग रहा था मेरी बुर की एक एक मांसपेशियां फट के अलग अलग हो जाएंगी, जैसे किसी ने एक नहीं दो दो मुट्ठियां एक साथ मेरी बुर में जबरदस्ती पूरी ताकत से ठेल दी हों,... दर्द जाँघों तक फ़ैल गया था, लेकिन मैं जानती थी अगर इस समय मैं ज़रा भी चीखी, दर्द मेरे चेहरे पर आया तो मेरा ये देवर,... फिर कभी किसी लड़की की ओर मुंह भी नहीं करेगा,

दर्द मैं पी गयी, घूँट घूँट, औरत का जनम ही दर्द पीने के लिए होता है,

और फिर मेरे तरकश में सिर्फ एक ही तीर थोड़े ही थे , इस मर्द के लिए,... मेरे जोबन पर तो जान देता था वो, बस उसके दोनों हाथ अपने हाथों से खींच के मैंने अपनी भरी भरी छातियों पर रख दिया, और जिस तरह से उसे मुस्करा के देखा, कोयी भी पागल हो जाता,... और मेरा देवर तो पहले ही पागल था भाभी के जुबना पर, पहले तो झिझकते हुए उसने पकड़ा कुछ देर सहलाया, फिर पूरी ताकत से, सच्च में असली मर्द, जिस लड़की के हिस्से आएगा न उसकी जवानी धन्य हो जायेगी, ...





और मेरी बुर को भी अब उस सुपाड़े की आदत पड़ गयी थी, एक दो बार मैंने अपनी बुर को टाइट, ढीला किया , फिर देवर की कमर पकड़ के, नहीं धक्के नहीं मारे बस सरकना,... जैसे नटिनी की जवान लड़की सरसर सरसर बांस पर सरकती है न मेले में, बस उसी तरह, फिर अच्छी तरह से सरसों के तेल से पोत पोत के मैंने चिकना कर दिया था, ... पूरी ताकत मैं लगा रही थी, लेकिन मैं भी,... किसी आदमी का जितना होता है उतना तो मैं घोंट गयी थी , छह सात इंच, पर उसका तो बांस था,...
 
देवर की बारी,

उसकी पिचकारी





और मेरी बुर को भी अब उस सुपाड़े की आदत पड़ गयी थी, एक दो बार मैंने अपनी बुर को टाइट, ढीला किया , फिर देवर की कमर पकड़ के, नहीं धक्के नहीं मारे बस सरकना,... जैसे नटिनी की जवान लड़की सरसर सरसर बांस पर सरकती है न मेले में, बस उसी तरह, फिर अच्छी तरह से सरसों के तेल से पोत पोत के मैंने चिकना कर दिया था, ... पूरी ताकत मैं लगा रही थी, लेकिन मैं भी,... किसी आदमी का जितना होता है उतना तो मैं घोंट गयी थी , छह सात इंच, पर उसका तो बांस था,...





कुछ देर के लिए मैं फिर रुक गयी, लेकिन देवर से अब नहीं रहा गया, मैं भी गोल गोल कमर घुमा के , कभी आगे पीछे हो के , क्या कोई मरद चोदेगा जिस तरह से मैं ऊपर चढ़ के,... वो भी अब नीचे से धक्का लगा के साथ दे रहा था, पर जब उससे नहीं रहा गया तो मेरी पतली कमरिया पकड़ के, उसने मुझे अपनी ओर खींचा और नीचे से भी धक्का मारा, पांच छह धक्के और अब मैंने पूरा घोंट लिया था,

और उसकी छाती पे लेट के अपने जोबन कभी उसकी छाती पर रगड़ती कभी उठ के उसके होंठों पर रगड़ देती, और भौजी हो और होली न हो , तो हाथ फैला के बगल की नाली से कीच निकाल के एक बार फिर से उसके मुंह पे , सीने पे,





कुछ देर की मस्ती के बाद, कमान देवर ने अपने हाथ में ले ली , मैं अब नीचे थी वो ऊपर , लेकिन मैंने इत्ते कस के मूसल भींच रखा था , ज़रा भी सरक के बाहर नहीं आया,... और उसके बाद तो क्या उसने धुनाई की, हर धक्का बच्चेदानी पर लगता था, ...

मुझे अब समझ में आ रहा था , चार चार बच्चो वाली माँ, काम करने वाली सब क्यों हार मान जाती थी, साइज के साथ ये जो तूफान मेल चलाता था,... एक पल के लिए भी सांस नहीं लेने देता था, पर मैं पूरा साथ दे रही थी,नीचे से चूतड़ उछालती , उसकी पीठ पे अपने नाख़ून धंसाती , और ज़रा भी सुस्ताता वो तो उसकी माँ भीं सब गरिया देती, ... मैं कितनी बार झड़ी पता नहीं, तीन चार बार तो कम से कम , और मुझे झाड़ना आसान नहीं था, तब भी,





मुझे समझ में आ गयी थी इसकी परेशानी, जैसे कोई भुक्खड़ हो , लगता हो कहीं सामने से थाली न छीन जाए,... हबड़ हबड़, जल्दी जल्दी, बस जो दो चार बार औरतों ने उसे मना कर दिया, बस उसे लगा की वो मना करें उसके पहले अपने मन की कर ले,...

और टाइम भी उसे बहुत लगता था , ताकत भी बहुत थी और औजार भी पूरा बुलडोजर था ,... बस अगर यही काम वो धीमे धीमे करता , कुछ देर तक लड़की को उसके लंड की आदत लग जाती फिर , थोड़ा और , फिर थोड़ा और,...

और एक बार अगर चीख पुकार ज्यादा हो तो रुक के थोड़ा चुम्मा चाटी, थोड़ा चूँची चूसता, क्लिट सहलाता, और उसे इतना गरम कर देता की वो खुद चुदवाने के लिए चिल्लाने लगती,

जो लग जल्दी झड़ते है उन्हें हड़बड़ी होती है, पर इसको तो आराम आराम से,

तलवार जबरदस्त थी, तलवार चलाने की ताकत भी बहुत थी, बस तलवार के पैंतरे सीखने बाकी थे,...

और आखिर भौजाइयां क्यों होती हैं तो बस ये जिम्मेदारी मेरे ऊपर, चंदू का आज ब्रह्मचर्य तो मैंने तुड़वा ही दिया, अब उसे नंबरी चुदक्क्ड़ बनाना था, गाँव की जितनी कुँवारी लड़कियां उसकी बहनें लगती हैं, चुदी, बिनचुदी, सब पर उसे चढ़ाउंगी,..





पर अभी मैं उसे रोक नहीं रही थी, अब मैं उसके इन तूफानी धक्को का मजा ले रही थी, गाँव में इस तरह खुले में, मस्त चुदने का और वो भी ऐसे मूसल छाप से, पहला मौक़ा था मेरा,...

पूरे आधे घंटे की नॉन स्टाप चुदाई के बाद झड़ा वो और पांच दस मिनट मैं उसे कस के अपनी बांहों में रही, मेरी कल कल मेरे इस देवर ने ढीली कर दी थी... और जब वो निकला बाहर तो मेरी आँखे फैली की फैली रह गयीं, एक तो इतनी ज्यादा मलाई, उसके गाँव की सब कुँवारी गाभिन हो जातीं,...

मेरी कटोरी ऊपर तक बजबजा रही थी और साथ में बह बह के मेरी जाँघों पर ,





देवर भाभी की असली होली तो यही सफ़ेद रंग वाली होली है, पिचकारी तो मेरे इस देवर की जबरदस्त है ही, रंग भी खूब गाढ़ा और ढेर सारा,..दूसरी बात अच्छी तरह झड़ने के बाद भी , अभी भी ६-७ इंच का और जितना सोया उससे ज्यादा जागा।

और ऊपर से मेरे देवर के ब्रम्हचारी बनने का चक्कर,... मैं अलसा रही थी , और सोच रही थी,

गाँव का टेलीग्राफ, आज शाम नहीं तो कल तक पूरे गाँव की मेरी सारी जेठानियों, ननदों को मालूम पड़ जाएगा, ... उर्वशी मेनका की तरह, नयकी भौजी ने भी,... मैं अपने देवर को देख के मुस्करा रही थी, देखने में भी एकदम कामदेव का अंश, और तीर भी उसका,...





और वो भी मुस्करा रहा था, पहली बार वो किसी पर चढ़ा था और वो चीख चिल्ला नहीं रही थी, उसे गरिया नहीं रही थी,..

उसे अपनी ओर खींच लिया मैंने और बाँहों में भर के देर तक चूमती रही, होंठों पर मुंह में जीभ डाल के सीने पर अपने उभार रगड़ रगड़ के,... पता नहीं क्या खाते हैं इस गाँव के लौंडे, मरद,... झंडा खड़ा होना शुरू हो गया, अब वो खूंटा तो मेरा था तो बस मैंने अपने मुट्ठी में, नहीं नहीं मुठिया नहीं रही थी, बस हलके से पकड़ के महसूस कर रही थी, उसका कड़ापन, मुटाई,... इत्ता अच्छा लग रहा था बता नहीं सकती,...



 
मज़ा देवर की पिचकारी का -होली में





,... झंडा खड़ा होना शुरू हो गया, अब वो खूंटा तो मेरा था तो बस मैंने अपने मुट्ठी में, नहीं नहीं मुठिया नहीं रही थी, बस हलके से पकड़ के महसूस कर रही थी, उसका कड़ापन, मुटाई,... इत्ता अच्छा लग रहा था बता नहीं सकती,...

और अब वो चालू हो गया, मैंने ब्रेक तो नहीं लगाया, लेकिन कुछ इशारे से कुछ बोल के कुछ उसके हाथों को खिंच के, ... फोरप्ले, एक लड़की के कितने काम केंद्र होते हैं धीरे, धीरे , कन्धों को, पीठ के ऊपरी हिस्से को जाँघों के अंदरूनी भाग को कैसे हलके हलके सहला के, उँगलियों की टिप का कब इस्तेमाल करना है कब पूरी हथेली का लेकिन हलकी हवा की तरह, और कैसे पता चलेगा लड़की अब गरमा रही है , उसकी जाँघे अपने आप खुलने लगे, आंख्ने बंद होने लगे , मुट्ठी बार बार खोलने भींचने लगे,...

लेकिन बहुत देर मैंने इन्तजार नहीं कराया देवर को, मन तो मेरा भी कर रहा था, और अबकी मैंने कुछ किया भी नहीं, न मुख मैथुन , न मुठियाना,...





और ताकत का अंदाज तो मुझे पहली बार ही होगया था , लेकिन इस तरह से भी चोदा जा सकता है , चुदवाया जा सकता है, ... मैंने स्कूल की किताबों से ज्यादा , माँ की अलमारी से निकाल के चुपके चुपके हाईस्कूल के पहले आठ दस बार तो सचित्र कोकशास्त्र , ८४ आसन, असली, (बड़ा ) पढ़ चुकी थी पर उसमें भी ये सब नहीं था,

चार पांच तरीकों से तो खड़े खड़े,...





एक तो उसकी जाँघों के साथ उसकी हाथों में ताकत बहुत थी, हम दोनों आमने सामने, और एक हाथ से उसने मेरी एक जांघ उठा के , मेरी जांघ खुद फ़ैल गयी, दूसरा उसका हाथ मेरी पीठ पर थी, और मेरा पूरा वजन उसके दोनों हाथों पर, पहले तो धीरे धीरे , फिर इतने कस के धक्के मारे उसने ,

और फिर, मान गयी उसकी ताकत, दोनों हाथों से उसने मुझे उठा के और मैं अपनी दोनों लम्बी लम्बी टाँगे उसकी कमर में लपेट के, और मजाल है जो लंड सूत भर भी बाहर सरका हो, मेरे दोनों हाथ उसके गले के चारों ओर कंधे पर, मैं उससे चिपकी और वो मुझे गोद में उठाये खड़े खड़े चोद रहा था,...





लेकिन उसकी असली ताकत पता चली, जब उसने मुझे हवा में ही लिटाकर,... मैंने दोनों पैरों से कस के उसकी कमर को बाँध रखा था, उसके दोनों हाथ मेरे नितम्बों पर ,... और क्या धक्के मेरे मारे, मेरी ननदों के यार, उस बहनचोद देवर ने, हर धक्का एकदम अंदर तक बुर को फाड़ता, फैलाता रौंदता , सीधे बच्चेदानी तक, हर बार मैं झड़ने की कगार पर पहुँच जाती ,

लेकिन खड़े खड़े चुदने में मुझे सबसे ज्यादा मजा आया और सबसे कस के रगड़ाई हुयी, आम के पेड़ के नीचे, खूब पुराना, चौड़े तने वाला आम का पेड़ था, एकदम गझिन,...





बस उसी से सटा के, मेरी पीठ आम के पेड़ के तने से चिपकी,और मेरी एक टांग लता की तरह देवर की कमर से लिपटी, मैंने दोनों हाथों से उसकी पीठ को जकड़ रखा था,... और वो, मेरी ननदों का यार, अपनी बहनों का भतार, मेरा देवर,... पूरी तरह से मेरे अंदर धंसा, एकदम मुझसे चिपका, ... उसके हर धक्के पर मेरी सांस रुक जाती, मेरे बड़े बड़े उभार उसकी चौड़ी मजबूत छाती के नीचे दब कर पिस जाती, जो उन्होंने अपने बड़े खड़े होने का इतना गुमान था, मेरे जोबन को , आज मिला था उनके गर्व को चूर करने वाला, ...

और साथ में जिस तरह से मेरी पीठ, मेरे चूतड़ आम के पेड़ की छाल से रगड़ जाते, मैंने सोचा भी नहीं था की खुले आसमान के नीचे चुदने में इत्ता मज़ा आएगा,..

मैं कित्ती बार झड़ी, न वो धीमा हुआ , न मैंने गिना, बस चोद चोद के झाड़ झाड़ के मेरे देवर ने मुझे थेथर कर दिया था, ...





और जब वो झड़ा, वही आम का पेड़, उसी तने को पकड़ के मैं निहुरी हुयी थी, साथ भी दे रही थी उसका, बीच बीच में कभी धक्के मार के अपने चूतड़ से , कभी उसके मोटू को अपनी बुर में निचोड़ के तो कभी उसकी महतारी, अपनी चचिया सास को गरिया के,

" मादरचोद, लगता है अपनी महतारी क भोसड़े को चोद चोद के चोदना सीखे हो,... अरे ई तोहरे महतारी क भोंसड़ा अस ताल पोखरा नहीं है जहाँ हमरे मायके वाले डुबकी मारते हैं, हाथी ऊंट सब डूब आते हैं, ज़रा आराम से,... "

और महतारी का नाम लेने पे तो बस जैसे कोई घोड़े की ऐड मार दे , उसकी रफ़्तार दूनी हो जाती थी,...

लेकिन जब तक वो झड़ा मैं एकदम थेथर हो चुकी थी,... पर एक एक बूँद मैंने निचोड़ के, .. एक बूँद भी बाहर बहने नहीं दिया,





और जब मेरी हालत थोड़ी ठीक हुयी तो मैं समझी की देवर ने, खड़े खड़े या गोद में ले के,... वो नहीं चाहता था की मेरी देह में या साड़ी पर कीचड़ , अखाड़े की मट्टी न लगे,

लेकिन साड़ी पर तो पूरी की पूरी कीच लग ही चुकी थी, बस मैंने उतार के वहीँ लगे ट्यूबवेल पर धुल के,... और वो पास आता तो पानी उछाल के ,... साड़ी जब मैंने सूखने के लिए फैला दी, तो एक बार फिर से ट्यूबवेल के नीचे हम दोनों,





अबकी बदमाशी की शुरुआत मैंने की,.. और पहली बार ट्यूबवेल की मोटी धार के नीचे चुदी,

अब उसे जल्दी नहीं थी, न मुझे कभी वो पानी की धार के ठीक नीचे मेरे मोटे मोटे जोबन कर देता, तो कभी मेरी चूत, और पीछे से गपागप अपना लंड पेलता,

जहाँ वह लड़कियों के नाम से घबड़ाता, गाँव की औरतों की परछाई देख के दूर हो जाता, आज वहीँ एकदम खुले में , ट्यूबवेल के नीचे, अमराई में , अखाड़े में./
 
देवर की देवरानी





जहाँ वह लड़कियों के नाम से घबड़ाता, गाँव की औरतों की परछाई देख के दूर हो जाता, आज वहीँ एकदम खुले में , ट्यूबवेल के नीचे, अमराई में , अखाड़े में./

करीब पौने तीन घंटे मैं रही और तीन बार,... कुछ भीगी, कुछ सूखी साडी मैंने देह में लपेट ली , चोली भी जस तस बाँध ली , लेकिन चलने के पहले मैंने उसे एक बार हड़काया,... और चूमा भी,...

" सांझ को फिर आउंगी देवर जी, समझ लो, इन्तजार करना,... और एक बार फिर से,... "

मैं बोल ही रही थी की उसने बोलने की कोशिश की, बस कस के चूम के मैंने उसका मुंह बंद कर दिया और हड़का भी लिया, गरिया भी दिया,...

" तो कहाँ जाओगे, तोहरी महतारी कउनो बयाना दी हैं, उनके भोंसड़ा चोदने का मन कर रहा है, अरे मुझे मालूम है गाँव का रिवाज, एक पहर रात होने से पहले तो तुम गाँव में कदम भी नहीं रख सकते,... मज़ा आया न , तो शाम को फिर से,... "





असल में मुझे यह डर था की यह ब्रम्हचारी कहीं फिर से अपनी उस ब्रम्हचारी वाली खोल में न घुस जाए, इसलिए उसे चूत का चस्का ठीक से लग जाने के लिए दुबारा, तिबारा, चार पांच दिन में तो ये खुद चूत ढूंढता फिरेगा, और पूरे गाँव में नयकी भौजी ने जो बीड़ा उठाया था , उसे पूरा कर दिया ये भी मशहूर हो जायेगा,...

एकदम उसी तरह जिस तरह जेठानियाँ अपनी नयी देवरानी के मन से डर, हिचक दूर करने के लिए, पहली रात को अपने देवर को समझा बुझा के भेजती हैं,





" दुलहिन चाहे जितना नखड़ा करे, बहाना बनाये, ... मैंने चेक कर लिया है उसकी पांच दिन वाली छुट्टी अभी पांच दिन पहले ख़तम हुयी है,... टाँगे सिकोड़े, जाँघे भींचे , लहंगे के नाड़े पर हाथ न रखने दे,...छोड़ना मत उसको,... फटेगी तो उसकी आज ही रात,... और कोई मुर्रवत नहीं, चीखने देना, खूब खून खच्चर होगा तो होगा , दूसरे कम से कम तीन बार,... और हर बार मलाई पूरी की पूरी अंदर,... "





और अगले दिन, फिर दिन में कुछ न कुछ बहाना बना के अपनी देवरानी को देवर के पास छोड़ आतीं हैं , जिससे एक दो बार दिन दहाड़े भी , बस दो चार दिन में नई दुल्हिन के खुद खुजली मचने लगती है , खुद ही लंड का इन्तजार करती है... और यही हालत इस की भी होने वाली है , दो चार दिन, दोनों जून ,... उसके बाद तो ये खुद,...

और एक बात मैंने उससे कही चलने के पहले, पहले तो उसे बिस्वास नहीं हुआ , फिर खुस हुआ फिर लजा गया,...

लेकिन उसके पहले उससे अपना रिश्ता समझा देती हूँ,...

मेरे ससुर के दो बेटे, एक तो जेठ जी, जो अक्सर बाहर रहते हैं,... ससुर जी का बंबई में काफी कारोबार था वो देखते हैं,...

और छोटे ये मेरे साजन, उसी तरह मेरे अजिया ससुर के भी दो बेटे बड़े मेरे ससुर जी और छोटे मेरे चचिया ससुर, जो अब नहीं है , मिलेट्री में बड़े अफसर थे,... लड़ाई में,... ये मेरा देवर उन्ही का एकलौता लड़का, ...

मेरे अजिया ससुर बड़े जमींदार थे , पन्दरह बीस गाँव की जमींदारी, और अपने रहते ही उन्होंने सब कुछ दोनों बेटों में , मेरे ससुर और मेरे चचिया ससुर में बाँट दिया था, पचासो बीघे तो गन्ने के खेत, बाग़ ,





और भी बहुत,... लेकिन रिश्ता अभी भी एकदम घर का, गलती से भी कभी मैं या कोई भी चचिया नहीं बोलती थी,... और एक बात, मेरी जेठानी के कुछ बच्चेदानी में प्रॉब्लम थी इसलिए उनके लिए बच्चा होना मुश्किल था,... और मेरे इस देवर ने ब्रम्हचारी होने का फैसला कर लिया था और जिद्दी बचपन का,...

तो एक दिन मेरे देवर की माँ, मेरी चचिया सास, मेरी सास के पास, मैं भी थी वहां,... इतनी उदास मेरी सास से बोलने लगी, अब हमार बंस नहीं चलेगा, बात मेरी सास और हम दोनों समझते थे, उनका एकलौता लड़का , मेरा देवर और उसने तय कर लिया था शादी नहीं करेगा, इतनी जमीन जायदाद,... बस आंसू नहीं गिर रहे थे ,





मुझे भी बहुत खराब लग रहा था, लेकिन बात और माहौल बदलने में मेरी सास का कोई मुकाबला नहीं था,... एक बार उन्होंने मुस्करा के मेरी ओर देखा , फिर मेरी चचिया सास को,... और उनकी ठुड्डी पकड़ के बोलीं,...

" तोहें कौन लाया था देवर के लिए,... "





इस उम्र में भी मेरी चचिया सास लजा गयीं, आँखे झुक गयीं , उदास चेहरे पर वो बात याद कर के मुस्कान आ गयी और वो बोलीं,...

" और कौन , आप लायी थीं , उस जमाने में लड़की देखने का कौन रेवाज थोड़े ही था,... "

मेरी ओर इशारा कर के , मेरी सास उनसे बोलीं,

" बस, तो ये हमार तोहार चिंता क बात थोड़े है , हैं न जेठानी,... ये लाएंगी अपने लिए देवरानी काहें को परेशान हो रही हैं, इसका काम है , ये जाने,... "

बस मेरे लिए इशारा काफी था, मैं उनसे हँसते हुए बोली,...

"एकदम, घबड़ाइये मत मेरी जिम्मेदारी है आप काहे को परेशान हो रही हैं, देवरानी मेरी मैं लाऊंगी न,... और सिर्फ लाऊंगी नहीं , जिस दिन देवरानी आएगी न उसके ठीक नौ महीने बाद सोहर होगा , ... अभी से तैयारी कर लीजिये, देवरानी उतारने के लिए चुनरी लूंगी और पोता होने क पियरी , और उसकी दोनों दादी लोगन क सोहर के साथे जम के गारी सुनाऊँगी। "





वो इतनी खुश,... उनसे बोला नहीं जा रहा था, मुश्किल से बोलीं,...

" अरे बहू तोहरे मुंह में घी गुड़,... देवरानी लाने क जिम्मेदारी तो सच में तोहरे हैं "

तो बस, मैंने देवर से वही कहा था, ...

" जब तक देवरानी नहीं आती, ... "

मेरी बात पूरी होने के पहले ही उसके मुंह से कौन निकल गया,

और मैंने जोर से हड़का लिया,

" देवरानी मेरी है की तुम्हारी, ... तुमसे मतलब कौन होगी मेरी देवरानी, तेरी आँख में पट्टी बाँध के ले जाउंगी, बियाह के अपनी देवरानी ले आउंगी, ... हाँ उसके बाद तोहरे हवाले ,... फिर कर लेना अपने मन की,... लेकिन ले मैं ही आउंगी और जल्द ही , समझ लो "....





और उसके बाद मैं मंजू भाभी की ओर मुड़ चली , वहां भी एक किशोर देवर, एक कच्चा केला इन्तजार कर रहा था।

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Please do read, enjoy, like and must share your comments,...
 
वो बेचारा,..





stick smileys

दरवाजे पर मैंने हाथ लगा के देख लिया था, सिटकनी बंद तो थी लेकिन बस हलके से फंसा दिया गया था यानी अगर कोई बाहर से सच में दरवज्जा खोलना चाहे तो खोल ले , ... मन उसका भी कर रहा था लेकिन, बस हिचक रहा था, ये स्साले नयी उम्र के लौंडे न , कच्ची कलियों से ज्यादा भाव खाते हैं, ऐसे चिकने कमसिन लौंडों की तो बिना गाँड़ मारे छोड़ना एकदम पाप है।

छत पर ये अकेला कमरा था,... छत बहुत बड़ी थी, वहां से तो आधा गाँव, वो बाग़ जहाँ कल मेरी छोटी बहन की बड़ी बेरहमी से कच्ची गाँड़ नन्दोई जी ने कूटी थी, दूर दूर तक फैले खेत सब कुछ,... दिखता था लेकिन छत पर पर बहुत ऊँची मुंडेर थी, मेरे सीने से भी ऊँची,... तो दूर से भी छत पर का कुछ नहीं दिख सकता था,

नीचे से आने वाली सीढ़ी पर भी दरवाजा था, पहले तो मैंने उसे बंद किया,कस के सांकल लगाई,...अब नीचे से कोई ऊपर नहीं आ सकता था और मैं इस स्साले लौंडे की खुल के प्यार से ले सकती थी, ... और फिर चुन्नू के दरवाजे को हलके से पहले अपनी ओर खींचा, फिर एक झटके से पुश किया, दरवाजा खुल गया।

आराम से अंदर घुस के मैंने पहले मुड़ के मैंने अबकी दरवाजा अच्छे से बंद किया , सिटकनी भी चुन्नू को दिखाते हुए अबकी ठीक से फंसा कर बंद किया।

वो बेचारा,..

स्साला, जैसे किसी चूहे की बिल में बिल्ली अंदर धंस जाए उसकी लेने के लिए,.. तो उसकी जैसे फटती होगी, बस यही हालत उसकी हो रही होगी,...

लेकिन मेरी हालत,... खूब गोरा चिकना, अभी रेख भी ठीक से नहीं आनी शुरू हुयी थी, आवाज बस फूट ही रही थी,... एकदम कमसिन लौंडा,... लेकिन कल मैं चेक कर चुकी थी उसकी मशीन, पकड़ के दबा के , साइज ठीक ठाक थी साढ़े पांच , छह इंच तो होगा ही,.. पानी भी काफी निकला था और सबसे बड़ी बात छूते ही खड़ा हो गया था और कड़ा भी कितना, खूब देर तक,... मैंने जोर जोर से कल मुठियाया था देर तक, और जरा भी ढीला नहीं, पानी फेंकने के बाद भी एकदम कड़ा ,...





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मेरी चूत पनिया रही थी, बस मैं अपने को रोक नहीं पा रही थी , जोबन भी पथरा रहे थे, ... निप्स कंचे ऐसे कड़े हो रहे थे,...चोली फाड़ती चूँचियाँ जब देखने पे ये हालत थी तो स्साले गांडू की लेने में कितना मज़ा आएगा,...

मैंने आराम से कोंछे सेसब रंग की पुड़िया, पेण्ट की ट्यूब , कड़ाही के पेंदे की कालिख,... उसकी मेज पर उसे दिखाते रखी,... मेरी निगाह उसी पर गड़ी थी, इत्ता मस्त माल लग रहा था, बस एक सफ़ेद बिना बांह वाली बनियाइन और सफ़ेद शार्ट,... और उसके अंदर आलरेडी सुनगुन शुरू हो गयी थी,... उसका शेप साइज सब साफ़ साफ़ नजर आ रहा था,

बस मन कर रहा था खोल के स्साले का गप्प से मुंह में ले लूँ ,...

रंग वंग निकाल के बस मैंने अपना आँचल ढीला किया और अपनी पतली कमर में लपेट लिया





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मेरी खूब टाइट तनी तनी चोली में जोबन का कड़ाव, कटाव गहराई अब सब साफ़ साफ़ दिख रहे थे, गाँव में चड्ढी बनियान पहनने का चलन तो था नहीं , तो बस चोली के नीचे चोली फाड़ती चूँचियाँ ही थीं,

और मेरे जोबन देख के तो बुड्डो पर वियाग्रा की डबल डोज से ज्यादा असर होता था और यहां इस चिकने की जवानी तो अभी छनछना रही थी। साड़ी भी मैंने कूल्हे के सहारे खूब नीचे बाँधी थी , तो गोरा चिकना पेट , गहरी नाभि सब साफ़ साफ़ दिख रहा था और उसका असर भी उसके शॉर्ट्स के अंदर अब साफ़ साफ दिख रहा था और गहरी सांसों पर भी,...





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मुझे देख के मजा आ रहा था , बस मैं उसके बगल में जा के बैठ गयी और उसके चिकने गाल ऊँगली से छूते सहराते बोली,

"रज्जा मेरे डलवाने से इत्ता डरते काहें हो, खूब आराम आराम से डालूंगी, ... रगड़ रगड़ के ,... "

और उसके गाल पर एक चुम्मा ले लिया ,





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वो सनसना गया ,... और मैं गिनगीना गयी,

देवर भाभी की होली शुरू हो गयी थी। अगला नंबर था उसे टॉपलेस करने का और बिना किसी झगड़ा झंझट के जब तक वो समझ मेरे दोनों हाथों ने उसकी छोटी सी बनयाइन उतार कर कमरे के दूसरे ओर फेंक दिया, स्साला इत्ता मस्त लग रहा था , खूब गोरा चिकना,... रेख भी अभी ठीक से नहीं आयी थी तो सीने पर बाल होने का सवाल ही नहीं था , कांखों में भी बस भूरे भूरे बाल आने शुरू ही हुए थे,...

क्या कोई लड़की शरमाती टॉपलेस होने पर जिस तरह वो शरमाया, और जितना वो लजाता उतना ही मैं पनिया रही थी,...

'अच्छा चल मैं भी अपनी साड़ी उतार देती हूँ , बल्कि तुम उतार दो,... : और साडी तो पहले ही मैंने पेटीकोट में बस बाँध रखी थी,... और उसका हाथ लगते ही,... मैं समझ गयी , इसको सिखाने पढ़ाने में ज्यादा टाइम नहीं लगेगा, जल्द ही अपनी बहनों की शलवार का नाड़ा खोलने लगेगा,... और मेरी साड़ी भी सररर,... सम्हालकर मैंने उसे बिस्तर पे रख दिया, और मैं खीँच के उसे कमरे के बीच में,





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" अरे पहले भौजी से गले तो मिल लो " और मैंने धृतराष्ट्र की तरह के अंगपाश में उसे कस के भींच लिया, मेरे चोली फाड़ते उभार कस कस के उस के सीने में रगड़ रहे थे, बरछी की तरह नुकीले निप्स छाती भेद रहे थे। और मेरे दोनों हाथ कस के उसे भींचे हुए जिससे मैं भी तम्बू में बम्बू की लम्बाई मोटाई भांप सकूँ,

खूब टनटना रहा था मेरे टीनेज देवर का, और मैंने भी जाँघे अपनी फैला के, दोनों जांघों के बीच, खुद सीधे सेंटर कर दिया और वो बेचारा अभी ग्राइंडिंग, ड्राई हंपिंग क्या जाने,... मैं खुद,... और एक हाथ से बगल की टेबल से कालिख उठा के,... एक हाथ में लगा के शार्ट में उसके पिछवाड़े,...

जब तक वो सम्हले उसका छोटा सा चूतड़ मुट्ठी में, और कालिख की परत दर परत, और एक ऊँगली दोनों नितम्बों के बीच में,...

एकदम मक्खन मलाई,...

मैं सोच रही थी जिस दिन ये किसी लौंडे बाज के हाथ पड़ा न , और मेरे मायके में तो एक से एक , बस कोई बहाना बना के इसे मायके ले जाउंगी और वहां तो दावत हो जायेगी,...

जैसे जैसे मैं चूतड़ उसके दबा रही थी,वो फड़फड़ा रहा था, ... जैसे किसी मुर्गे के पंख नोचे जा रहे हों तो बस वही हालत उस कुंवारे बिनचुदे देवर की भी हो रही थी,...

अभी तो चिकेन दो प्याजा बनना था,... छु मैं पीछे रही थी असर आगे पड़ रहा था, एकदम तना,... जैसे मेरी चोद कर रख देगा , और मैं तो खुद ही चुदवाने आये थी, आज मेरी चोदेगा कुछ दिन बाद अपनी बहनों की चोदेगा,... मुझे अपनी ननदों का हमेशा ख्याल रहता था,...

" हे भौजी बेईमानी, आप तो इत्ते रंग ले ले आयीं और मेरे पास कुछ नहीं,.. "

मेरे मुंह से निकलते निकलते रह गया इत्ती मस्त पिचकारी तो है और सफ़ेद रंग भी ,... लेकिन मैं उससे बोली ,

"अरे देवर रज्जा देवर भौजाई का कुछ बांटा है "

और उसने लाल रंग उठा लिया , बेचारे की हिम्मत नहीं पड़ रही थी चोली के भीतर घुसने की , लेकिन बिना चोली के अंदर घुसे देवर भौजाई की होली शुरू होती है न जीजा साली की,... वो नौसिखिया और मैंने खुद ही उसका हाथ पकड़ के , बटन भी एक दो ही बचे थे, कुछ टूटे कुछ खुले , वो हाथ हटा न ले , इसलिए मैंने खुद अपने हाथ उसके हाथों पर,... चोली भी मैंने अब खुद साड़ी के ऊपर फेंक दी,... हम दोनों टॉपलेस ,... वो शार्ट में मैं साये में,...





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थोड़ी देर में हम दोनों खुली छत पर थे और होली जम के हो रही थी , मैं उसे रंग लगाने दे रही थी, चेहरे पर पेट पर पीठ पर , लेकिन फिर साये के अंदर घुसने में उसे संकोच लग रहा था , पहल मैंने ही की उसका शार्ट खींच के छत के दूसरी ओर,... और पेण्ट की ट्यूब हथेली में लगा के मोटू पे ,..
 
बहुत भइल अब चोर सिपहिया , ...





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"अरे देवर रज्जा देवर भौजाई का कुछ बांटा है " और उसने लाल रंग उठा लिया , बेचारे की हिम्मत नहीं पड़ रही थी चोली के भीतर घुसने की , लेकिन बिना चोली के अंदर घुसे देवर भौजाई की होली शुरू होती है न जीजा साली की,... वो नौसिखिया और मैंने खुद ही उसका हाथ पकड़ के , बटन भी एक दो ही बचे थे, कुछ टूटे कुछ खुले , वो हाथ हटा न ले , इसलिए मैंने खुद अपने हाथ उसके हाथों पर,... चोली भी मैंने अब खुद साड़ी के ऊपर फेंक दी,... हम दोनों टॉपलेस ,... वो शार्ट में मैं साये में,...

थोड़ी देर में हम दोनों खुली छत पर थे और होली जम के हो रही थी , मैं उसे रंग लगाने दे रही थी, चेहरे पर पेट पर पीठ पर , लेकिन फिर साये के अंदर घुसने में उसे संकोच लग रहा था , पहल मैंने ही की उसका शार्ट खींच के छत के दूसरी ओर,... और पेण्ट की ट्यूब हथेली में लगा के मोटू पे ,..





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वो भी देख चुका था की सीढ़ी के रस्ते पर सांकल लगी है , मुंडेर छत की इतनी ऊँची है कुछ नहीं दिख सकता,... और उस की भी हिम्मत बढ़ गयी , आधे घंटे तक , वो मेरे जोबन में रंग लगाता, मैं उसे लगाने देती बल्कि उकसा के लगवाती ,





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फिर उन्ही दोनों रंग लगे जोबन से कभी उसकी छाती कभी पीठ पर तो कभी उसके छोटे नवाब को दोनों चूँचियों के बीच रगड़ रगड़ कर वहां भी रंग लगाती,...





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धीरे धीरे उसकी शर्म जा रही थी , खुल के मजे ले रहा था लेकिन असली होली की पहल तो मुझे ही करनी थी,...

बस हल्का सा धक्का देकर उसे छत पर लिटा दिया और झंडा तो खड़ा ही था , रंगा पुता पहले तो एक हाथ में लेकर मैं हलके हलके मुठिया रही थी , फिर एक झटके से चमड़ा खींच दिया,...

मस्त लीची,... कुछ देर तो देख देख के ललचाती रही फिर सिर्फ जीभ से कभी सुपाड़े को चाटती तो कभी जीभ की नोक से उसके पेशाब के छेद में

मैंने झुक के उसके दोनों हाथों को कस के पकड़ रखा था , स्साला इत्ती जोर से छटपटा रहा था,.. और जब नहीं रहा गया तो मुंह में उस लीची के लेकर ालके हलके चूसने लगी , जीभ साथ साथ रसीले सुपाड़े को सहलाती, सिर्फ सुपाड़ा चूसने का ही इतना मजा आ रहा था,...





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बहुत भइल अब चोर सिपहिया , ... मैंने खुद से कहा.,... और उसके ऊपर,..

नहीं नहीं घोटा नहीं सिर्फ र्थोड़ी देकर मेरी गुलाबो सुपाड़े को सहलाती रही , जैसे कोई तगड़ा खेला खाया मरद बालिस्त भर के लंड वाला किसी कच्ची कन्या कुमारी को पहले खूब गरमाता है , रस से पिघलाता है , और जब उसकी आँखे बंद होने लगती हैं मस्ती से , वो सिसकने लगती है, कच्ची चूत पनिया जाती है तभी,..

तो बस उसी तरह , फिर उसे दिखाके अपनी दोनों रसीली फांकों को फैलाया और उस के बीच उसके सुपाड़े को फंसा दिया,... दोनों हाथ उसकी दोनों कलाई कस के पकडे थे , आँखों से मैं उसकी आँखे देख रही थी,

अब वो भी समझ रहा था क्या होना है , उसने कुछ लाज से कुछ घबड़ाहट से अपनी आँखे बंद कर ली, और मैंने एक करारा धक्का मारदिया ,





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सुपाड़ा अंदर था , और मैं फिर रुक गयी , मेरी चूत उसके कुंवारे सुपाड़े को दुलराती सहलाती,.... कभी प्यार से भींचती और मैं अब झुक के कभी उसके होंठ चूमती कभी चिकने गाल , तो कभी सीने पर के मेल टिट्स,... कुछ देर में वो भी साथ देने लगा , उसके हाथ मैंने खुद खींच के रंग लगे जोबन पर और जिस लांडे को एक बार जोबन का रस मिल जाता है फिर वो जोबन का दीवाना हो जाता है , ...

कुछ देर में वो कस के चूँची मसल रहा था और मैं उसे कस कस के चोद रही थी , उसके ऊपर चढ़ी, धीरे धीरे पूरा लंड मेरी चूत ने घोंट लिया था , अब कभी कभी वो भी नीचे से धक्के लगाता,...





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लेकिन असली खेल अभी बाकी था , उसे लिए दिए मैंने पलटी खायी , चूत ने कस के लंड को भींच रखा था जरा भी मैंने बाहर नहीं होने दिया,

अब वो ऊपर मैं नीचे, मैंने खुद अपनी टाँगे , जाँघे फैला के रखी थीं ,

था वो नौसिखिया पहली बार कोई भी होता है , लेकिन औजार जबरदस्त था और मेरी ऐसी भाभी थी सिखाने वाली ,... कुछ देर में वो भी हचक के ,... दस पंद्रह मिनट देह की होली हुयी और हम दोनों साथ, ... उसकी पिचकारी का सफ़ेद रंग मेरी बाल्टी में भर गया।लेकिन चाहे नयी अनचुदी लौंडिया हो या अनचुदा लौंडा, चुदाई का मजा दूसरी बार में ही आता है , और कभी भी लौंडिया या लौंडे को एक बार चोद के नहीं छोड़ना चाहिए , जख्मी शेर वाली हालत होती है,... और एक बार हदस गयी तो दुबारा नाड़ा खोलने के पहले दस बार सोचेगी,...
 
देह की होली





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दस पंद्रह मिनट देह की होली हुयी और हम दोनों साथ, ... उसकी पिचकारी का सफ़ेद रंग मेरी बाल्टी में भर गया।लेकिन चाहे नयी अनचुदी लौंडिया हो या अनचुदा लौंडा, चुदाई का मजा दूसरी बार में ही आता है , और कभी भी लौंडिया या लौंडे को एक बार चोद के नहीं छोड़ना चाहिए , जख्मी शेर वाली हालत होती है,... और एक बार हदस गयी तो दुबारा नाड़ा खोलने के पहले दस बार सोचेगी,...

तो अपने देवर को भी बिना दुबारा चोदे तो मैं छोड़ने वाली नहीं थी, और नयी उमर की नयी फसल के साथ फायदा यही की झट से रिचार्ज हाइट हैं जैसी पावर बैंक लगा रखा हो,... तो बस थोड़ी देर कुछ होली , कुछ छेड़छाड़ , कुछ गाँव की लड़कियों उसकी रिश्ते की बहनों का नाम ले लेकर मज़ाक,.. उसने शार्ट पहनने की कोशिश की तो मैंने हाथ से खींच के हड़काया,

' फेंक दूंगी अभी बाग़ में , नंगे पकड़ के नीचे ले जाउंगी , मैंने तो चोद के छोड़ दिया है, बाकी नीचे जो भौजाइयां है स्साले बिना तेरी ये चिकनी गाँड़ मारे छोड़ेंगी नहीं,... "





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अरे खुद नंगे होने में शरमाएगा स्साला, तो होनी बहनों को कैसे नंगा करेगा, तो पहली लाज तो मैंने उसकी उतार दी, देर तक ऐसे ही छत पर नंगे पुंगे,...

और जो उसका खड़ा हुआ तो अबकी वही ऊपर,... हाँ मैं खुद नीचे लेट गयी , अपनी टाँगे फैला के जाँघे खोल के , अपनी टाँगे मैंने उसके कंधे पर भी रख दिया , और छेद में पकड़ के सटा दिया

और क्या धक्का मारा स्साले ने ,





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बड़ी ताकत है इस लौंडे में मैं मान गयी, बस थोड़ी सी ट्रेनिंग और,... दरेरते, रगड़ते, घिसटते जिस तरह मेरी बुर में घुसा मजा आ गया,

अब चोदने का काम उसका था और चुदवाने का मेरा,.... लेकिन था तो नौसिखिया ही, कई बार खींच के उसका हाथ मैं अपने जोबन पे रखती , उसके होंठों को निप्स पे ,





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चोदने के साथ साथ जब तक बाकी कामकाज न हो, आधे से ज्यादा लोग सोचते हैं सिर्फ घुसेड़ने के पहले ही लौंडिया को गरम करना चाहिए , ये नहीं जानते की चुदाई में असली मजा तभी है जब बाकी काम भी चलता रहे,

यहाँ तक की उसकी ऊँगली पकड़ के मैंने अपने जादू के बटन, क्लिट पर भी और हचक कर चोदते समय एक साथ होंठ से कस के निपल चूसने के साथ, औरत की क्लिट को अंगूठे से रगड़ने से कैसी भी खूंखार चुदकड़ औरत क्यों न हो, झड़ जाती है,...





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मैं भी झड़ गयी , और दुबारा उसके साथ भी,.... कटोरी भर मलाई छोड़ी होगी उसने मेरी बुर में ,

दो ऊँगली डाल के मलाई निकाल के उसे दिखा के मैं चाट गयी और बोली, जबरदस्त स्वादिष्ट है , और फिर जो मेरे होंठों पे बचा था उसे चटा दिया और कस के चूम लिया ,





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नीचे से आवाजें आ रही थीं , इसका मतलब भौजाइयों का जमावड़ा शुरू हो गया था और कोई सूंघते ऊपर आ जाए उससे पहले मेरा नीचे जाना जरूरी था ,...

जल्दी से मैंने ब्लाउज पहना साड़ी लपेटी,... लेकिन मेरे नीचे उतरने से पहले मेरे छोटे बाले देवर ने मुझे रोककर पूछा,

" भौजी, फिर कब होगी होली, अगले फागुन में "

कस के उसे बाँहों में बाँध के पहले तो मैंने दस बार चुम्मा लिया कचकचा के गाल काटा , और उसके 'छोटू ' को पकड़ के सहलाते बोली ,

" बुद्धू , देवर भौजाई का फागुन तो साल भर चलता है , कल फिर लूंगी तेरी और अच्छी तरह से , हाँ लेकिन कल अगर दरवाजा बंद मिला या तूने कुछ भी नखड़ा किया न तो तेरी ये चिकनी गाँड़ पहले मारूंगी, चोदुंगी बाद में ,... "





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और धड़ धड़ मैं सीढ़ी से नीचे लेकिन उतरते समय भी मैं चुन्नू के बारे में ही सोच रही थी,

कामवालियां ,... रमजनिया जो चंदू के साथ , गाँव की हर औरत लड़की के बारे में उसे रत्ती रत्ती खबर रहती है तो कामवालियों में , खेत में घर में जो थोड़ी बड़ी खूब खेली खायी ,.. ऐसी दो चार को इस देवर के साथ , सिखा सिखा के पक्का कर देंगी,...

और नैना ,...उसी ने तो इस कच्चे केले के बारे में बताया था ,.. तो वो मजा ले ले और गाँव की लड़कियों के साथ इसकी सेटिंग कराने में तो उससे अच्छी कोई नहीं, दो चार पे वो चढ़वा देगी उसके बाद तो वो खुद ही शिकार करने लगेगा और उन दोनों के मुंह मारने के पहले हफ्ते दस दिन तो में खुद इस नए माल को अचे से भोगूंगी ,...

मेरी हालत देख के ही सब लोग समझ गयीं की ' होली हो गयी ' लेकिन अभी बात सीरियस चल रही थी और मैं भी कान रोप कर सुनने लगी.

एक मेरी बड़ी उम्र की जेठानी कहने लगीं,... ' अरे इसमें क्या इतना सोचना है,... मौज मस्ती ही तो है , क्या जीत हार, अरे पिछले कितने सालों से तो ननदें ही जीतती आयीं है , इस बार फिर वही जीतेंगी। इसमें क्या प्लानिंग, क्या,... "

और उन की बात में बात जोड़ती उन्ही की उमर की एक जेठानी बोलीं, ' सही कह रही हो , हम तो भुलाई गए कब भौजाई लोगन की टीम जीती थी,... अरे ननदों के आगे,...
 
भाग २५



पिलानिंग - ननदों की लेने की



 
भाग २६

पिलानिंग - कच्ची ननदों की लेने की





" भौजी, फिर कब होगी होली, अगले फागुन में "

कस के उसे बाँहों में बाँध के पहले तो मैंने दस बार चुम्मा लिया कचकचा के गाल काटा , और उसके 'छोटू ' को पकड़ के सहलाते बोली ,

" बुद्धू , देवर भौजाई का फागुन तो साल भर चलता है , कल फिर लूंगी तेरी और अच्छी तरह से , हाँ लेकिन कल अगर दरवाजा बंद मिला या तूने कुछ भी नखड़ा किया न तो तेरी ये चिकनी गाँड़ पहले मारूंगी, चोदुंगी बाद में ,... "

और धड़ धड़ मैं सीढ़ी से नीचे लेकिन उतरते समय भी मैं चुन्नू के बारे में ही सोच रही थी,





कामवालियां ,... रमजनिया जो चंदू के साथ , गाँव की हर औरत लड़की के बारे में उसे रत्ती रत्ती खबर रहती है तो कामवालियों में , खेत में घर में जो थोड़ी बड़ी खूब खेली खायी ,.. ऐसी दो चार को इस देवर के साथ ,

सिखा सिखा के पक्का कर देंगी,...





और नैना ,...उसी ने तो इस कच्चे केले के बारे में बताया था ,.. तो वो मजा ले ले और गाँव की लड़कियों के साथ इसकी सेटिंग कराने में तो उससे अच्छी कोई नहीं, दो चार पे वो चढ़वा देगी उसके बाद तो वो खुद ही शिकार करने लगेगा और उन दोनों के मुंह मारने के पहले हफ्ते दस दिन तो में खुद इस नए माल को भोगूंगी ,...

मेरी हालत देख के ही सब लोग समझ गयीं की ' होली हो गयी ' लेकिन अभी बात सीरियस चल रही थी और मैं भी कान रोप कर सुनने लगी.

एक मेरी बड़ी उम्र की जेठानी कहने लगीं,... ' अरे इसमें क्या इतना सोचना है,... मौज मस्ती ही तो है , क्या जीत हार, अरे पिछले कितने सालों से तो ननदें ही जीतती आयीं है , इस बार फिर वही जीतेंगी। इसमें क्या प्लानिंग, क्या,... "

और उन की बात में बात जोड़ती उन्ही की उमर की एक जेठानी बोलीं, ' सही कह रही हो , हम तो भुलाई गए कब भौजाई लोगन की टीम जीती थी,... अरे ननदों के आगे,... "

मुझे बड़ा बुरा लगा, मैं तो आयी ही थी अपनी ससुराल, ननदों की गाँड़ मारने, अपने भाइयों, देवरों से सब ननदो को चुदवाने, रगड़ रगड़ कर,...

और यहाँ तो मैच शुरू होने के पहले ही कोच कप्तान सब हार मान के बैठे हैं,... और गबर गबर खाली गुझिया खाये जा रहे हैं, और उसी समय मैंने तय कर लिया की आज चाहे जो हो जाय ननदों को तो हरा के ही रहना है, अरे साल भर स्साली छिनारों की नाक रगड़ने का मौक़ा,..

लेकिन अभी सुनने और समझने का था,

तब तक एक जेठानी और , वही हार में ख़ुशी मनाने वाली ,... बोलीं,...

" अरे थोड़ा बहुत कोशिश करते भी लेकिन अबकी तो नैना भी आगयी है जब्बर छिनार , उसको तो सौ गुन आते हैं,... "





ये बात मैं मान गयी की नैना के आने से मुकाबला थोड़ा टाइट होगया लेकिन ननदों की टाइट को ढीला उनकी भाभियाँ नहीं करेंगी तो कौन कराएगा, फिर अभी अभी दो देवरों को चोद के आ रही हूँ , जिसके आगे सब ने हाथ झाड़ लिया था,...

मंजू भाभी, ने मेरी ओर इशारा भी किया,...

"अरे अबकी मेरी नयकी देवरानी आ गयी है , करेगी न नैना क मुकाबला, अरे तीन दिन पहले होली के दिन , मिश्राइन भौजी के यहाँ कैसे कुल ननदों क बुर गाँड़ सब बराबर,... "





अब माहोल थोड़ा बदला ,

लेकिन मैं अभी भी सुन रही थी और समझने की कोशिश कर रही थी की आखिर क्यों हर बार भौजाइयों की टीम हार जाती है और कोई न कोई तो ननदों में कमजोरी होगी , जिसका हम सब फायदा उठा सकते हैं,... और मुझे कुछ बातें तो समझ में आ गयी,...

पहली बात ये थी की टीम ११ की होती थी,...

और ननदें ज्यादातर टीनेजर, या जो शादी शुदा वो भी २० -२२ वाली,

लेकिन भौजाइयों की औसत उमर तीस से ऊपर और सीनियारिटी के नाम पर जो बड़ी होती थीं वो भी कई टीम में , ४० के पार वाली भी जो चुद चुद के, बच्चे जन जन के घर का काम कर के थकी मांदी ,

तो ताकत और एनर्जी दोनों में ननदों की टीम बीस नहीं पच्चीस पड़ती थी,...

दूसरी बात की मैच का कोई टाइम नहीं होता था तो वो पहले तो मजे ले लेकर , भौजाइयों को दौड़ा के थका देतीं थीं और उसके बाद,...





तीसरी बात जो मैं देख रही थी , भौजाइयों की टीम में बार बार हारने के बाद जीतने की न इच्छा बची थी , न विश्वास

और आखिरी बात, कोई स्ट्रेटजी प्लानिंग भी नहीं होती थी और बेईमानी के कौन जीतता है तो लेकिन बेईमानी के लिए बहुत जुगत लगानी पड़ती है और वो यहाँ दिख नहीं रहा था,... अंत में सब लोगों ने मुझसे पूछा ,

असल में जो सबसे नयी होती थी , जिसकी पहली होली होती थी वो कप्तान तो नहीं, छोटा कप्तान जरूर रहती थी , फिर मिश्राइन भाभी के यहाँ जो मैंने सबकी रगड़ाई की थी तो थोड़ा बहुत मेरे नाम से ननदें,... और यह तय हो गया था की अबकी मंजू भाभी कप्तान रहेंगी तो उनका प्यार दुलार तो रहता था,...

तो मैंने अपनी प्लानिंग,...
 
मेरी पिलानिंग





और आखिरी बात, कोई स्ट्रेटजी प्लानिंग भी नहीं होती थी और बना बेईमानी के कौन जीतता है तो लेकिन बेईमानी के लिए बहुत जुगत लगानी पड़ती है और वो यहाँ दिख नहीं रहा था,... अंत में सब लोगों ने मुझसे पूछा ,

असल में जो सबसे नयी होती थी , जिसकी पहली होली होती थी वो कप्तान तो नहीं, छोटा कप्तान जरूर रहती थी , फिर मिश्राइन भाभी के यहाँ जो मैंने सबकी रगड़ाई की थी तो थोड़ा बहुत मेरे नाम से ननदें,... और यह तय हो गया था की अबकी मंजू भाभी कप्तान रहेंगी तो उनका प्यार दुलार तो रहता था,...

तो मैंने अपनी प्लानिंग,...

नहीं पूरी नहीं बताउंगी, फिर तो मैच का मजा ही ख़तम हो जाएगा , हाँ बस थोड़ी सी झलक,...

तो बात शुरू की मैंने टीम बदलने से,...





किसी तरह से मुझे ज्यादा जवान , कम उमर वाली खूब तगड़ी औरतें चाहिए थीं और जो एकदम बेसरम हों , ...





और मैंने जुगत लगा ली,... लेकिन मेरी प्लानिंग में दो बड़ी अड़चने थीं एक तो टीम में बदलाव दूसरा थोड़ा बहुत रूल्स , और मैच की अम्पायर को तो मैं सम्हाल लेती , आखिर मेरी सास ही थीं, और उन्हें मैंने छुटकी ऐसी बड़ी सी घूस थमा दी थी, और उनके साथ जो एक दो और होंगी , छुटकी सुबह से ही उनका मन बहला रही थी , लेकिन ज्यादा बड़ी दिक्कत थी मेरी टोली की ही, भौजाइयों की टीम की जो पुरानी खिलाड़ी थी हर बार हारती थीं , उन्हें मनाना,

और इस मामले में मंजू भाभी ने पूरा मेरा साथ दिया,

टीम ११ की ही थी,.... तो कम से ४ -५ तो जवान खूब तगड़ी, और ऐसी भौजाइयां होनी चाहिए जो न गरियाने में पीछे हटें न ननदों के इधर उधर छूने रगड़ने उँगरियाने में,...

और वैसे भी ननद भौजाई की इस होली वाली कबड्डी में कुछ भी फाउल नहीं होता था, ... कपडे तो सबके फटते थे और पूरी तरह, आधे टाइम तो वैसे ही , लेकिन उस समय कोई मरद चिड़िया भी नहीं रहती थी तो औरतों लड़कियों में क्या शर्म, वो भी होली के दिन,...

लेकिन मैं सोच रही थी की कम से कम आधी ऐसी हों जिनके अभी बच्चे न हों, शादी के चार पांच साल से ज्यादा न हुए हों पर गाँव में पिछले दो तीन साल में तो सिर्फ मेरी ही डोली उतरी थी , और चार पांच साल में पांच छह बहुएं आयी तो थी,... लेकिन मेरे अलावा तीन ही थीं जिन्होंने गाँव को अपना अड्डा बनाया था बाकी की सब अपने मर्दों के साथ, काम पर,....

फिर एक बार दिल्ली बंबई पहुँचने के बाद कौन गाँव लौटता है,...





होली के इस खेल में गाँव में हम लोगो की ही, मलतब भरौटी, अहिरौटी और बाकी सब टोले वाली नहीं,... वैसे तो गाँव में औरतों के बीच के बीच पूरा समाजवाद चलता है, जब मैं आयी थी तो उम्र और रिश्ते के हिसाब से जो भी सास और जेठानी लगती थीं, सब का पैर मैंने हाथ में आँचल ले के दोनों हाथ से पूरा झुक के छूआ था, और गाँव में जो मेरी अकेली देवरानी लगती थी, कुसमा, ...





उस का मर्द कुंए पे पानी भरता था और वो पानी अंदर लाती थी, हाथ पैर भी दबाती और अपने मर्द के किस्से सुनाती थी , कैसे रगड़ रगड़ के, उसे बर्थ कंट्रोल पिल्स भी मैंने ही दिया था और होली के दिन उसके टोले में जा कर होली भी अपने देवर, उसके मरद के साथ खेली थी,... तो उसी की तरह की और भी थीं कुछ अगर दो तीन उस तरह की टीम में हमारी आ जाएँ तगड़ी तगड़ी,...

जैसे ही मैंने उसका नाम लिया,

वही मेरी जेठानी जो हारने में कोई बुराई नहीं देखती थी ४० -४५ की रही होंगी देह भी एकदम ढीली ढाली,... उचक के बोलीं

" अरे उ कलुआ क मेहरारू,... "





मैं तो समझ गयी, गयी भैंस पानी में,... मेरी पतंग की डोर उड़ने से पहले ही उन्होंने काट दी,...

लेकिन मेरी जेठानी मंजू भाभी थी न , उन्होंने अपनी सहेली की ओर देखा, और बस मोर्चा उन्होंने सम्हाल लिया,... और मेरी ओर तारीफ़ की निगाह से देखते बोलीं,

"नयको को इतने दिन में ही कुल बात , ... एकदम सही कह रही है,... अरे बहुत जांगर ओहमें हैं देह दबाती है तो देह तोड़ के रख देती है, एकदम बड़ी ताकत है,... सही है। "





ये तो मुझे मालूम था रोज रात भर मेरे ऊपर इनके चढ़ने के बाद जब उठा नहीं जाता तो कटोरी भर तेल ले के मेरी देह मेरी जाँघों में , दोनों पैर या तो रात भर उठे रहते या निहुरी रहती , और इनके धक्के भी हर धक्के में पेंच पेंच ढीली हो जाती,...

और उसकी मालिश के बाद तो मन यही करता की, अब एक दो बार और हो जाए तो कोई बात नहीं,...





असली खेल था जांघ की मालिश की बाद बात बात में वो हथेली से रगड़ रगड़ के सीधे गुलाबो पे , और हर चढ़ाई का किस्सा सुन के ही , फिर उँगलियों से दोनों फांको को रगड़ के, दो ऊँगली एकदम जड़ तक अंदर,... दो चार मिनट में तो कोई भी झड़ने के कगार पर पहुँच जाए , ....





और खाली शादी शुदा ही नहीं कुंवारियां भी , आज स्कूल में मैच है की आज पी टी में कमर पिराने लगी , और पांच मिनट में उस लड़की के पोर पोर का दर्द , मालिश करवाने वाली भी जानती थी और कुसुमा भी की मालिश कहाँ की होनी है,...

असल में नाम तो उसका कुसुमा था लेकिन मेरी एक सास लगती थीं उनका भी मिलता जुलता नाम तो अब सबने नाम उसका बदल के चमेली कर दिया था तो मैं भी उसी नाम से पुकार के,...

" हाँ उहे चमेलिया,... अरे गाँव में हमारी अकेली देवरान , हमरे बाद तो वही आयी बियाह के और ओकरे साथ,... '

मैंने बात आगे बढ़ाने की कोशिश की तो एक बार फिर मेरी बात काट दी गयी वही मंजू भाभी की सहेली , मेरी जेठानी और उन्होंने सही बात काटी,...

" अरे छोडो , समझ गए हम सब चमेलिया और ठीक है तू और मंजू आपस में बात करके तय कर लो ,... सही बात है यह बार कुछ नया होना चाहिए और ननदों को हराना चाहिए "

मैं समझ गयी , अगर मैं बाकी का नाम लेती और वो जेठानी जो कुछ भी नए के खिलाफ थीं वो फिर.... अगर किसी के खिलाफ हो जातीं तो ,...

अब मैंने टीम की बाकी मेंबर्स का नाम एनाउंस किया , मेरे अलावा जो तीन भौजाइयों की टीम में वही जो लड़कोर नहीं थीं,... मंजू भाभी , वो जो हमारा साथ दे रहे थी और एक दो और

फिर मैंने जो बड़ी बुजुर्ग भाभी लोग थीं उनकी ओर मुंह कर के बोला, खूब आदर के साथ ५०० ग्राम मक्खन मार के,

" और आप लोग थोड़ा हम लोगों का का कहते हैं उ, मार्गदर्शक रहिएगा,... आप लोगों का जो इतना एक्सपीरियंस है, एक एक ननद क त कुल हाल चाल आप लोगों को मालूम होगा ही, तो बस आप लोग जैसे कहियेगा,... एकदम वैसे वैसे , और आप लोगन क आसीर्बाद और पिलानिंग से कहीं जीत गए,... तो जितने कच्चे टिकोरे होंगे न सब आप लोगों की झोली में,... "





वो भी मेरी बात से सहमत होती बोलीं , " ठीके कह रही हो , अब सांस फुला जाती है, चूल्हा झोंकते बच्चे पैदा करते,... "



 
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