Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 13 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग २० -

छुटकी की हालचाल





" क्यों ननदोई जी, कैसी लगी मेरी छुटकी बहिनिया,... " और बिना उनके जवाब का इन्तजार किये मुड़ गयी,मेरी पीठ उनकी ओर , और अपने बड़े बड़े चूतड़ उनकी ओर देख के मटका दिए,...





वही असर हुआ जो मैं चाहती थी, खूंटा तन गया और नन्दोई ने कस के मुझे पीछे से दबोच लिया, उनके दोनों हाथ कस के चोली फाड़ते जोबन पे और तनी तलवार सीधे मेरी दरार के बीच, लग रहा था साडी साया फाड़ के यहीं खड़े खड़े मेरी गाँड़ मार लेंगे,... और जोबन का रस लेते बोले,...

" अरे बहुत रसीली है. लेकिन हमको तो बड़की वाली क ज्यादा मन करता है ,सच में इत्ती गाँड़ मारने को मिली लेकिन तोहार अइसन, ... कोई मुकाबला नहीं बोला कहिया मिली,... "

बस एक झटके में पलट के मैं गुस्से से अलफ़, और उन्हें पकड़ के पहले तो दस गाली उनकी बहन महतारी सब को, नाम ले ले के, मादरचोद , तोहरी महतारी पे हमार नन्दोई चढ़ें, उनके सार चढ़ें, सार क सार चढ़ें, और फिर कस के एक चुम्मी, चुम्मी क्या मेरे होंठों ने उनके होंठों को गपुच कर कचकचा के काट लिया , और जब छोड़ा तो मैंने अपना इरादा बता दिया,...

"स्साले ननदोई , अरे तोहार सलहज हूँ , अगर आगे से पूछा न तो मैं ही उलटे तेरी गाँड़ मार लूंगी, अरे जिसकी बहन की लेने के पहले कभी नहीं पूछते हो,... उसकी बीबी से क्या पूछना,... अरे ननदोई राजा जब चाहा, जहाँ चाहा, चाहे हमरी ननद के सामने,... बस पूछना मना है,... "





और पैंट के ऊपर से उनका खड़ा खूंटा मसल के अपने साजन के पास, हाँ नन्दोई को दिखा दिखा के चूतड़ मटकाना मैं नहीं भूली ,

सच में जबरदस्त दीवाने थे , मेरे पिछवाड़े के वो।

मैंने अपने साजन से सिर्फ दो सवाल किये और एक का जवाब हाँ में मिला दूसरे का नहीं में।

कुछ तो बात होती है सलहज में की नन्दोई सब अपनी बीबी, साली भूल के सिर्फ सलहज की बात मानते हैं , एक तो मेरे नन्दोई है जो अपनी सलहज के पीछे, मंडराते रहते हैं, और एक मेरी रीतू भाभी के नन्दोई, ये हैं अपनी सलहज की बात,...

इनकी सलहज ने इनसे एक बात मनवा ली थी जब इनकी सलहज की ननद , इनकी छुटकी साली, मेरी छुटकी बहिनिया, का पिछवाड़ा फटेगा तो एकदम सूखे,... बस ये बात उन्होंने मेरे नन्दोई को बता दी थी , और इसलिए जीजा साली बहला फुसला के मेरी छुटकी को आम की बगिया में, गाँव के एकदम बाहर ले गए थे, उसी की ब्रा पैंटी से कस कस के उसकी मुश्के बांध दी थीं,

की जब सूखे सूखे उस कच्ची कली की गाँड़ फाड़ी जायेगी तो बहुत चोकरेगी वो,... और नैना ने जो बताया था , उसकी आँखों देखी, उसके भइया ने, मेरे साजन ने , अपना मोटा खूंटा नीचे से अपनी साली के मुंह में ठूंस रखा था , हलक तक





और मेरी ननद की , नैना के जीजा, मेरे नन्दोई मेरी छुटकी बहिनिया की गाँड़ में चूतड़ पकड़ के पूरी ताकत से अपना मोटा खूंटा पेल रहे थे,





तो मेरा पहला सवाल था की क्या गुड्डो की नन्दोई जी ने इनकी छोटी साली की सूखी ही ली थी जैसा उनकी सलहज ने हुकुम दिया था , उसका जवाब था हाँ।

दूसरा सवाल था की इनकी साली की गाँड़ सिर्फ मेरे नन्दोई ने ही मारी या उन्होंने ने भी मारी, उसका जवाब था नहीं यानी सिर्फ नन्दोई ने मारी।





और उन्होंने जो हाल बताया बस मेरी गाँड़ में कीड़े काटने लगे नन्दोई से गाँड़ मरवाने के लिए, पक्का उन्होंने बचपन में ही अपनी महतारी की गाँड़ मार मार कर गाँड़ मारना सीखा होगा।
 
सूखी चिनाई





तो मेरा पहला सवाल था की क्या नन्दोई जी ने इनकी छोटी साली की सूखी ही ली थी जैसा उनकी सलहज ने हुकुम दिया था , उसका जवाब था हाँ।

दूसरा सवाल था की इनकी साली की गाँड़ सिर्फ मेरे नन्दोई ने ही मारी या उन्होंने ने भी मारी, उसका जवाब था नहीं यानी सिर्फ नन्दोई ने मारी।

और उन्होंने जो हाल बताया बस मेरी गाँड़ में कीड़े काटने लगे नन्दोई से गाँड़ मरवाने के लिए, पक्का उन्होंने बचपन में ही अपनी महतारी की गाँड़ मार मार कर गाँड़ मारना सीखा होगा।

बहुत देर तक सिर्फ आधे लंड से, गाँड़ का छल्ला एक बार पार होगया तो बस वहीँ तक, ह्च्चक ह्च्चक कर,





गाँड़ मरवाने में वो भी सूखी अंदर बाहर बहुत जगह चमड़ी छील जाती है , कट , स्क्रैच, कुछ खून खच्चर बहुत मामूली बात है,... लेकिन उसी छिली जगह पर जब दुबारा मोटा कड़ा सुपाड़ा रगड़ता, बेरहमी से दरेरता जाता है तो बहुत छरछराता है , जैसे कटे पर कोई मिरच छिड़क दे,

और जब तक दर्द का असर ख़तम हो उसके पहले ही दुबारा वहीँ पर रगड़ रगड़ कर घिसते हुए , बस जान नहीं निकलती सब कुछ हो जाता है,





पर गाँड़ मरवाने वाली हो या मारने वाला , असली मजा इसी दर्द में है,... और धीरे धीरे जिसकी मारी जाती है , उसे इस दर्द में ही मजा आने लगता है , जैसे कुछ लोगों को भले ही तेज मिर्च से जीभ पर आग लगा जाए , आंख में पानी भर जाए पर चाहिए उन्हें तेज मिर्च ही , बस मेरे नन्दोई आज छुटकी को उसी की आदत लगा रहे थे,

दूसरी बात मेरे साजन ने बतायी की वो सूखी चिनाई कर रहे थे ,

यानी ननदोई जी को झड़ने की जल्दी नहीं थी,... मैं ये बात पहले से जानती थी की इनकी तरह जीजा भी लम्बे रेस के घोड़े है , लेकिन आज बात दूसरी थी , आठ दस मिनट गाँड़ मारने के बाद वो रुक जाते थे, फिर कभी कच्ची अमिया कुतरते तो कभी गालों पर अपने दांत के निशान लगाते तो कभी छुटकी की गुलाबो में अपनी ऊँगली से अंदर बाहर कर के उसकी जादू के बटन को रगड़ रगड़ के , उसे मजे दे दे के झड़ने के कगार पर ले जा के





फिर हचक के कस के पूरे लंड से जड़ तक गाँड़ मारना शुरू करते और हर धक्का एकदम अंदर तक,...

ऐसी ही चार पांच बार रुक रुक के आठ दस मिनट मारते फिर चार पांच मिनट के ब्रेक के बाद दुबारा दूनी ताकत से,

छुटकी जितना रोती चिल्लाती, चूतड़ पटकती छूटने की कोशिश करती उतना ही कस के वो धक्के मारते,... पोज बदल के , पहले तो उन्होंने कुछ देर तक निहुरा के ली उसकी, कुतिया बना के,





( इनकी भी फेवरिट पोज वही थी और मुझे भी निहुर के गाँड़ मरवाने में बहुत मज़ा आता था )

पर नन्दोई जी सच में पिछवाड़े के जबरदस्त रसिया थे, पहले तो कुछ देर कुतिया बना के, फिर उसे पीठ के बल लिटा के ,





फिर गोद में लंड पे बैठा के , पहले दिन ही उन्होंने साले की साली को गाँड़ मरवाने के सात आठ पोज से परिचय करा दिया।





लेकिन झड़ते समय उन्होंने,... उसे फिर निहुरा दिया था , और चूतड़ खूब ऊंचा उठा के, ... पूरा अंदर घुसा के, ... और झड़ने के बाद भी पूरे दस मिनट तक लंड अंदर पेल के रखा और निकालने के बाद भी छुटकी को बोल रखा था, की कस के गाँड़ भींच के रखे,... अगर एक बूँद भी बाहर निकली न तो दोनों लोग दुबारा उसकी गाँड़ मार लेंगे, बेचारी इस धमकी के बाद तो,...





एकदम सही किया नन्दोई जी ने, सारे कटे फटे छिले पर मरद की मलाई से बड़ा कोई मरहम नहीं , और पक्का आधा पौन घण्टे में उसका सारा दर्द गायब तो नहीं होगा लेकिन बहुत कम हो जाएगा , और उसके चेहरे की मुस्कराहट वापस आ जाएगी,...

न उनका मन कर रहा था की मैं उनके पास से जाऊं , न मेरा लेकिन वहां मेरी ननद छिनार अकेले रसोई में होंगी, गरिया रही होगी मुझे, किसी तरह उसने छुड़ा के मैं रसोई में ,...
 
छुटकी की फिर से,...





न उनका मन कर रहा था की मैं उनके पास से जाऊं , न मेरा लेकिन वहां मेरी ननद छिनार अकेले रसोई में होंगी, गरिया रही होगी मुझे, किसी तरह उसने छुड़ा के मैं रसोई में ,...

आधे पौन घंटे में हम दोनों ने खाना लगा दिया था , मेरी सास अभी भी छुटकी को लिए अपने कमरे में बहला फुसला रही थीं , वो छुटकी को लेकर खाने की मेज पर आयीं और दोनों लोग हंसती खेलती, और खाने की टेबल पर भी वो अपने जीजा और डबल जीजा यानी मेरे नन्दोई के बीच में बैठी , और सामने हम तीनो , बीच मे मेरी सास , एक ओर मै और दूसरी ओर मेरी ननद।

और ननद के लिए दो बातें स्वयंसिद्ध हैं, पहली बात ननद होगी तो छिनार होगी ही, दूसरी बिना छेड़े वो रह नहीं सकती। तो बस मेरी ननद छुटकी के पीछे पड़ गयीं,...

" कैसे फटी हो छुटकी कैसे फटी, बगिया में तोहार,... अरे जब तुम्हारे जिज्जा और डबल जिज्जा तुझे आम की बगिया में ले गए तभी समझ जाना चाहिए थे की आज फटेगी, चल यार फटने वाली चीज है फट गयी कोई बात नहीं। "





पर मुझे सबसे बड़ी ख़ुशी हुयी, छुटकी ने बिना चिढ़े , उसी अंदाज में मुस्करा के जवाब दिया,...

" हमारे जिज्जा ने क्या आपकी भी उसी बगिया में फाड़ी थी ? "





मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी खिलखिलाहट रोकी, ... पर मुझसे ज्यादा मेरी सास खुश हो रही थीं, छुटकी के जवाब से। पर ननद खानदानी छिनार चुप थोड़े होने वाली थी, उन्होंने फिर छुटकी को चिढ़ाया,

" अरे हमसे बोली होती जाने के पहले, मिरचे के अचार वाला तेल दे देती , बल्कि ऊँगली डाल के अंदर तक लगा देती, मजा दूना हो जाता। इतनी क्या जल्दी थी की सूखे ही मरवाने,... "

पर अब मेरी सास आगयीं, अपनी दुलारी छुटकी को बचाने, ननद को हड़काया उन्होंने,...

" अरे खा लेने दो बेचारी को , एक तो मारे दर्द के बेचारी की हालत खराब थी, ऊपर से तुम,... "





ननद थोड़ी देर तक तो चुप रहीं, फिर उन्होंने दूसरा मोर्चा खोल दिया जिसका अंदाज मुझे भी नहीं पता चला,

मुझसे बोलीं, तोहरे तरह तोहरी छुटकी बहिनिया भी स्साली नौटंकी है , बढ़िया एक्टिंग करती है।





मैं तो नहीं बोली , पर छुटकी ट्रैप में फंस गयी, उसने बोल दिया,

" अरे दर्द के मारे जान निकल गयी, और आप कह रही हैं एक्टिंग "

बस ननद को मौका मिल गया, मुस्कराते हुए बोलीं वो,

" तभी तो कह रही हूँ , तुमने अपने जिज्जू और डबल जिज्जू को पटा लिया, ऐसे घूम के लौट आयी अरे बड़ी ताकत चाहिए पिछवाड़े में घोंटने के लिए,... इतना दर्द होता,... लेकिन एक्टिंग ऐसी की की एक बार मुझे भी लगा की फट गयी, ... "

छुटकी ने कुछ बोलने की कोशिश की, पर ननद ने बात काट दी, और मुझे आँख मारते हुए बोलीं,...

" अरे जंगल में मोर नाचा किसने देखा,... अगर सच में करवाया है तो अभी हम सब के सामने, हो जाए एक राउंड , पिछवाड़े वाला, डबल जिज्जू और जिज्जू के साथ ,... "





और जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची थी, उसपर मेरी सास ने न सिर्फ दरवाजा बंद कर दिया बल्कि मोटा सा भुन्नासी ताला भी लगा दिया,... ननद की बात के जवाब में छुटकी की ओर से वो बोलीं,

" अरे मेरी छुटकी बेटी को समझती क्या हो, डरती है क्या किसी से.... अभी देखो,... क्यों " और उन्होंने बॉल मेरे पाले में डाल दी.

बेचारी छुटकी कभी मुझे देखती कभी मेरी सास को,... और मुझे जल्द फैसला लेना था,

पहली बात सास की बात, वो भी सबके सामने काटने की मैं सोच भी नहीं सकती थी,फिर मैंने सोचा सास को अपने साथ मिलाने के बड़े फायदे हैं, पहली बात तो तुरंत ही, कल ननद भौजाई का जो मैच होगा उसमें जज वही होंगी,... और थोड़ा बहुत मैच फिक्सिंग,...

फिर अब घर में भी जेठानी और छुटकी ननदिया तो जेठ जी के पास चली गयी हैं साल में कभी कभार छुट्टी छपाटी,... और ये ननद नन्दोई भी चार पांच दिन में, ... फिर तो घर में मैं, मेरी छोटी बहिन, उसके जीजा,... और मेरी सास ही रहेंगी, ... मैं सोच रही थी सास जी के बारे में और मेरी चमकी, बहुत सी बड़ी उमर की औरतों को कुछ करने करवाने से ज्यादा मज़ा आता है,.. देखने में और जिस पर चढ़ाई हो रही हो , वोएकदम कच्ची उमर वाली, कच्चे टिकोरों वाली हो हो कहना ही क्या, फिर छुटकी को देख के सबसे ज्यादा आँखे उन्ही की चमकी थी, उसे साथ ले के अपने कमरे में चली गयीं थी,...

तो उसकी कच्ची अमिया उनके सामने कुतरी जाए , ये देखने का मन उनका कर रहा होगा

मैंने एक पल ननद जी की और उनके भैया की ओर देखा, और मुझे लगा की अगर आज सबके सामने , अपनी माँ के सामने ये खुल के मेरी बहन की चुदाई करेंगे तो इनकी जो भी झिझक है और ननद जी की भी वो सब निकल जायेगी, फिर एक दो दिन में मैं इनकी बहन के ऊपर इसी घर में अपने सामने चढ़ाउंगी, तब आएगा असली मज़ा. जो मजा ननद के ऊपर भौजाई को अपने सामने ननद के सगे भाई को चढ़ाने में आता है न उसके आगे कोई भी मजा फेल है।

बस ये सब सोच के मैंने अपनी सास का साथ दिया,...

" एकदम, क्यों डरेगी और किससे डरेगी, बड़ी बहादुर है मेरी छुटकी बस अभी थोड़ी देर में,... "





छुटकी ने कुछ बोलने की कोशिश की तो मैंने समझा दिया अरे मैं रहूंगी न तेरे साथ, ... और अबकी मेरी सास ने भी उसका साथ दिया,...

हाँ मैच शुरू होने के पहले मैंने कुछ शर्तें ननद औरसास से मनवा ली, वो क्या थीं, मौके पर बताउंगी।
 
लाल डायरी के सारे पन्ने खुल गए

मेगा अपडेट - जोरू का गुलाम

९,००० शब्दों से ज्यादा , ६ पोस्ट्स ,...

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और मैं आ गयी - एक मेगा अपडेट
 
भाग २१

छुटकी पर चढ़ाई -





और जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची थी, उसपर मेरी सास ने न सिर्फ दरवाजा बंद कर दिया बल्कि मोटा सा भुन्नासी ताला भी लगा दिया,... ननद की बात के जवाब में छुटकी की ओर से वो बोलीं,

" अरे मेरी छुटकी बेटी को समझती क्या हो, डरती है क्या किसी से.... अभी देखो,... क्यों " और उन्होंने बॉल मेरे पाले में डाल दी.





बेचारी छुटकी कभी मुझे देखती कभी मेरी सास को,...

और मुझे जल्द फैसला लेना था, पहली बात सास की बात, वो भी सबके सामने काटने की मैं सोच भी नहीं सकती थी,

फिर मैंने सोचा सास को अपने साथ मिलाने के बड़े फायदे हैं, पहली बात तो तुरंत ही, कल ननद भौजाई का जो मैच होगा उसमें जज वही होंगी,... और थोड़ा बहुत मैच फिक्सिंग,... फिर अब घर में भी जेठानी और छुटकी ननदिया तो जेठ जी के पास चली गयी हैं साल में कभी कभार छुट्टी छपाटी, लौटेंगी ... और ये ननद नन्दोई भी चार पांच दिन में, ...

फिर तो घर में मैं, मेरी छोटी बहिन, उसके जीजा,... और मेरी सास ही रहेंगी, ... मैं सोच रही थी सास जी के बारे में

और मेरी चमकी, बहुत सी बड़ी उमर की औरतों को कुछ करने करवाने से ज्यादा मज़ा आता है,.. देखने में,.... और जिस पर चढ़ाई हो रही हो , वोएकदम कच्ची उमर वाली, कच्चे टिकोरों वाली हो हो कहना ही क्या,





फिर छुटकी को देख के सबसे ज्यादा आँखे उन्ही की चमकी थी, उसे साथ ले के अपने कमरे में चली गयीं थी,... तो उसकी कच्ची अमिया उनके सामने कुतरी जाए , ये देखने का मन उनका कर रहा होगा

मैंने एक पल ननद जी की और उनके भैया की ओर देखा, और मुझे लगा की अगर आज सबके सामने , अपनी माँ के सामने ये खुल के मेरी बहन की चुदाई करेंगे तो इनकी जो भी झिझक है और ननद जी की भी वो सब निकल जायेगी, फिर एक दो दिन में मैं इनकी बहन के ऊपर इसी घर में अपने सामने चढ़ाउंगी, तब आएगा असली मज़ा. जो मजा ननद के ऊपर भौजाई को अपने सामने ननद के सगे भाई को चढ़ाने में आता है न उसके आगे कोई भी मजा फेल है।

बस ये सब सोच के मैंने अपनी सास का साथ दिया,...

" एकदम, क्यों डरेगी और किससे डरेगी, बड़ी बहादुर है मेरी छुटकी बस अभी थोड़ी देर में,... "





छुटकी ने कुछ बोलने की कोशिश की तो मैंने समझा दिया अरे मैं रहूंगी न तेरे साथ, ... और अबकी मेरी सास ने भी उसका साथ दिया,...

हाँ मैच शुरू होने के पहले मैंने कुछ शर्तें ननद औरसास से मनवा ली, वो क्या थीं, मौके पर बताउंगी।

और एक बात और रीतू भाभी ने जो सूखी गाँड़ मारने की शर्त रखी थी, वो तो सिर्फ पहली बार के लिए थी, फटने के लिए, ...

और फट तो चुकी ही थी उसकी इसलिए अब तो कोई भी चिकनाई उसको लगा सकती थी मैं, दूसरे नन्दोई जी ने जो कटोरी भर मलाई उसकी कच्ची गाँड़ में डाली थी उससे भी तो पिछवाड़े का छेद कुछ कुछ चिकना हो चुका होगा,...

बीच आँगन में ननद रानी ने गद्दे बिछा दिया, पर छुटकी बिचक रही थी, पर मैंने उसे बहलाया फुसलाया , चुम्मी ली , उसकी छोटी छोटी चूँचिया दबायी,...





मुझे उसके देह की एक एक बटन मालूम थी , ट्रेन में तो इनके सामने हम दोनों ने खूब लेस्बो सेक्स कर के उसके जीजा को खूब ललचाया था तो बस फिर से वही,

" अरे चल थोड़ी देर हम दोनों मजा लेते है न , उसमें तो नहीं दर्द होगा तुझे न,... "

मैंने समझाया उसे और थोड़ी देर में हम दोनों आंगन में सिक्स्टी नाइन वाली पोज में थे, रीतू भाभी, मिश्राइन भाभी और मोहल्ले की भाभियों ने कब का छुटकी को चूत चूसने की तगड़ी ट्रेनिंग दे दी थी , और हम दोनों एक दूसरे की चूत चूसने में लगे थे , पर झाड़ने की जल्दी न मुझे थी न उसे।





छुटकी की फांके अभी एकदम चिपकी थीं, एक दो बार ही तो उसमें मूसल घुसा था, कस के एक दूसरे को पकडे जैसे सहेलियां बिछुड़ने के डर से गलबहिंया बाँध के बैठी हों, रस तो इतना छलक रहा था की संतरे की फांके झूठ,...





लेकिन मेरी जीभ ने वहां छुआ भी नहीं , बस जाँघों पर उसके आसपास, हाँ मेरे तगड़े हाथों ने कस के उसकी जाँघों को न सिर्फ फैला दिया बल्कि टाँगे उठा भी दी, और मेरी सास जो बगल में ही बैठीं थी, एक दो तकिये छुटकी के चूतड़ के नीचे भी लगा के खूब उठा दिए, मेरी जीभ और उँगलियाँ बस उस कुँवारी के रस कूप के आस पास,

और थोड़ी ही देर में वो रसकूप रस से भर गया, रस छलकने लगा , पर मैंने उसे तड़पने दिया, मैं जानती आज असली हमला तो कहीं और होना है,...





तो बस जीभ की टिप थोड़ा और नीचे,...

गोलकुंडा के गोल गोल दरवाजे पर जो आज ही थोड़ी देर पहले आम की बगिया में खुला था, जहाँ मेरे प्यारे दुलारे ननदोई का मोटा मूसल खूब जम के चला था, और जीभ की टिप नहीं नहीं गोलकुंडा के गोल कुंवे के अंदर नहीं, बस कुंवे के चारो ओर बनी चौड़ी जगत पर, कभी जीभ की टिप छू देती , कभी रगड़ देती कभी बस सहला देती, वो पिछवाड़े वाला छेद अब बुदबुदा रहा था, हलके हलके सिकुड़ता, फैलता,... और जैसे कोई दरवाजे की कुण्डी खटका के बच्चा भाग जाए, बस उसी तरह मेरी जीभ भी, चित्तौड़गढ़ के दरवाजे पर सांकल खटखटा के , एकदम से हट गयी, और फिर छोटे छोटे चुम्मे उस लौंडा छाप चूतड़ों पे,...





नहीं मैंने उस रस कूप को नहीं छोड़ दिया था , मेरी कोमल कोमल उंगलिया,... उस संतरे की रस से भरी फांको पर, कभी हलके हलके रगड़ती रगड़ती, कभी फांकों के बीच में हल्के से दबा के उस दरवाजे को खोलने की कोशिश करती, जिसके अंदर अब तक सिर्फ मेरे साजन को दाखिला मिला था,...





मेरी इन शरारतों से सिर्फ छुटकी की हालत नहीं खराब हो रही थी, मैंने देख लिया था की मेरी सास के साथ सास के दामाद भी, मेरे नन्दोई भी और शॉर्ट्स में उनका खूंटा पूरा तना,

नन्दोई का ख्याल सलहज नहींकरेगी तो क्या ननद की ननद करेगी ? मैंने इशारे से ऊँगली मोड़ के उन्हें पास बुलाया और एक झटके से उनकी शॉर्ट्स को खींच के उतार फेंका, इत्ता मस्त मोटा लंड, ... कैद में रहे, वो भी ससुराल में , मेरे ऐसी सलहज के रहते, ...





और मैंने कनखियों से देखा मेरी सास के चेहरे की ख़ुशी को,

अब मेरा एक हाथ नन्दोई के मोटे फनफनाये लंड को मुठिया रहा था, दूसरा हाथ मेरी छुटकी बहन के कभी जाँघों पे कभी उसकी चिपकी सहेली पर फिसल रहा था,... और होंठ उसी जगह अब चिपके थे जहाँ असली खेल होना था, मेरी छुटकी बहिनिया का पिछवाड़ा,...

खूब चूस रही थी , चाट रही थी , मुंह में ढेर सारा थूक ले के उसी जगह फैला के अंदर तक,...

बेचारे ननदोई , सलहज मुठिया रही थी , सलहज की छुटकी बहिनिया का पिछवाड़ा सामने , एकदम तैयार,...

ऊपर से मैंने आँख मार के उनसे बिन बोले पूछा, " चाहिए ये माल, इसकी कच्ची गाँड़ '





कौन मर्द पागल नहीं हो जाता।

और अब मैंने थोड़ा फास्ट फारवर्ड किया, ..सीधे अब जीभ कसी चूत पर दोनों फांके मेरे होंठों के बीच, कस कस के मैं चूस रही थी , जीभ कभी क्लिट को सहला देती , तो कभी दोनों फांकों को फ़ैलाने की कोशिश करती, और





अब मेरे दोनों हाथ असली काम में जुट गए थे, कस के मेरी बहन के चूतड़ फ़ैलाने में , उसके लौंडा मार्का छोटे छोटे चूतड़ नन्दोई जी को पागल बना रहा थे ,

हाँ मेरे सास की आइडिया थी , मैंने दोनों हाथों की दसों उँगलियों में घर के कोल्हू का कडुवा तेल, अच्छी तरह से एकदम तर कर लिया था,...

और अब वो उँगलियाँ छुटकी की पिछवाड़े की दरार में , दरार के पहले उस दर्रे में , उसके चारों ओर, गाँड़ मरवाते समय न सिर्फ जिस छेद में मूसल घुसता है वहां दर्द होता है, बल्कि उसके अगल बगल भी फटन होती है, और एक बार तो जबरन मंझली ऊँगली , तेल में डूबी दो पोर तक घुसेड़ कर पूरे दो मिनट तक गोल गोल ,





लेकिन सिर्फ बछिया को तैयार करने से नहीं काम चलने वाला था सांड़ को भी तो पागल करना था, बस जो होंठ मेरे बहिनिया की चूत चूस रहे थे वो खुले और नन्दोई का सुपाड़ा, अंदर खूब सटासट, और वो तेल लगी उँगलियाँ उस चर्मदण्ड को तेल से,... बस दोनों पगलाए थे,

एक बार फिर मैंने छुटकी की चूत को खूब कस कस के चूसना शुरू किया, और जीभ अब अंदर घुस गयी थी , बस वो झड़ने के कगार पर थी,

दोनों हाथों ने उसका पिछवाड़ा कस के पहले फैलाया, फिर एक हाथ से मैंने नन्दोई का खूंटा पकड़ के अपनी छुटकी बहिनिया की कसी गाँड़ के छेद पर सटाया,

बहुत ताकत थी मेरे प्यारे नन्दोईया की कमर में , क्या जबरदस्त धक्का मारा उन्होंने,... और मैं पहले से तैयार थी, छुटकी इतना तेज उछली, ... पर मैंने अपनी पूरी देह का वजन उसके ऊपर डाल रखा था, जैसे कोई बछिया खूंटा छुडाके भागने की कोशिश करे , कोई मछली जाल से पूरी ताकत से उछल के वापस नदी में जाने की कोशिश करे,

पर न बछिया खूंटा छुड़ा के भाग पाती है , मछली बच पाती है,

न छुटकी बची,...
 
धंस गया,... घुस गया,...

उईईई उईईईईई





दोनों हाथों ने उसका पिछवाड़ा कस के पहले फैलाया, फिर एक हाथ से मैंने नन्दोई का खूंटा पकड़ के अपनी छुटकी बहिनिया की कसी गाँड़ के छेद पर सटाया,

बहुत ताकत थी मेरे प्यारे नन्दोईया की कमर में , क्या जबरदस्त धक्का मारा उन्होंने,... और मैं पहले से तैयार थी, छुटकी इतना तेज उछली, ... पर मैंने अपनी पूरी देह का वजन उसके ऊपर डाल रखा था, जैसे कोई बछिया खूंटा छुडाके भागने की कोशिश करे , कोई मछली जाल से पूरी ताकत से उछल के वापस नदी में जाने की कोशिश करे,

पर न बछिया खूंटा छुड़ा के भाग पाती है , मछली बच पाती है,

न छुटकी बची,...

मैंने खुद नन्दोई जी का मोटा खूंटा पकड़ रखा था और उसे अपनी बहन की गाँड़ में ठेल रही थी, सलहज का इशारा नन्दोई न समझे , अबकी पहली बार से ही ज्यादा जोर से नन्दोई जी ने धक्का मारा , और पूरा तो नहीं लेकिन आधा सुपाड़ा उस कसी गाँड़ में अटक गया।





इतना अच्छा लग रहा था बता नहीं सकती, नन्दोई जी का लाल टमाटर ऐसा खूब मोटा फूला सुपाड़ा, आधे से ज्यादा छुटकी बहिनिया की गाँड़ में अटका धंसा, बस मैंने झुक के जो सुपाड़े का हिस्सा बाहर निकला था, उसे मारे ख़ुशी के चूम लिया,

थोड़ी देर तक मैं जीभ से अपनी लपर लपर उसे चाटती रही, जिस जगह सुपाड़ा बाकी लंड से जुड़ता है, वहां जो चमड़ा रहता है , उसे जीभ से सहलाती रही , फिर कभी एक हाथ से नन्दोई के बॉल्स को सहला देती तो कभी लंड जड़ से जहाँ तक गांड में घुसा था, धीरे धीरे चाटती।

नन्दोई मेरे गाँड़ मारने में पूरे उस्ताद थे, ... चोदने और गाँड़ मारने का अंतर् उन्हें अच्छी तरह मालूम था ,





चूत में जहाँ सुपाड़ा घुसा उसके बाद तो कस के पेल के , धक्के पर धक्का,... लेकिन गाँड़ में बस एक बार सुपाड़ा अटक जाए, जिसकी मारी जा रही है वो झटका दे के उसे निकाल न पाए , बस मारने वाला थोड़ी देर उसे उसी तरह छोड़ देता है, ... जिससे गाँड़ धीरे धीरे फ़ैल जाए, उसे उस मोटे सुपाड़े की आदत पड़ जाए, मसल्स थोड़ी ढीली हो जाए ,

बस कुछ रुक के अगला धक्का, दूसरी बात बजाय बार बार अंदर बाहर करने के शुरू में बस खाली पुश, पूरी ताकत से पुश , और एक बार गाँड़ का छल्ला पार हो जाए,...

लेकिन अब टाइम आ गया था,... पर सब बड़ी बात होती है की जिसकी मारी जाती है वो कहीं मारे डर के गांड़ लंड पर भींच न ले , किसी तरह वहां से ध्यान हटे,...

और नन्दोई का काम उसकी सलहज नहीं कराएगी तो कौन करायेगा, बस मैंने छुटकी की चूत कस कस के चूसनी शुरू की, और जब वो झड़ने के करीब आयी तो बस अंगूठे और तर्जनी से कस के उसकी क्लिट कस के पिंच कर दी,





और दूसरे हाथ से नन्दोई का खूंटा कस के पुश किया, इतना इशारा काफी था और नन्दोई ने वो जबरदंग धक्का मारा अबकी पूरा सुपाड़ा छुटकी की गाँड़ के अंदर था,... क्लिट में हो रहे दर्द के चक्कर में वो पिछवाड़े का दर्द एकदम भूल गयी थी और उसी का फायदा उठा के नन्दोई ने छक्का मार दिया , अब वो गांड भींच के भी क्या करती सुपाड़ा तो पूरा अंदर था।





लेकिन दर्द तो उसे हो ही रहा था , वो सिसक रही थी, कराह रही थी, बीच बीच में चीख भी रही थी, मैंने अपनी बुर से उसके मुंह को बंद करने की कोशिश की तो मेरी ननद ने इशारे से मना कर दिया ,

मेरी ननद तो यही चीख पुकार सुनना चाहती थीं, बल्कि गाँव भर को मालूम हो जाए की आज मेरी बहिनिया की अच्छी तरह ली गयी , उन्होंने खिड़कियां भी खोल दी,...

उईईई उईईईईई छुटकी चीख रही थी, चिल्ला रही थी , बिलख रही थी ,





पर अब जब आधा लंड गाँड़ में घुस चुका हो तो बिना गाँड़ मारे कौन छोड़ता , और नन्दोई तो बचपन के अपने साले की तरह पिछवाड़े के शौक़ीन,... और जब जिसकी मारी जाए, वो कच्ची अमिया वाली , गाँड़ एकदम कसी सिर्फ एक बार मूसल चला हो ,

और नन्दोई का हल नहीं ट्रैक्टर था,

मुझसे ज्यादा कौन जानता था , इत्ती बार ( शादी के तीसरे चौथे दिन से तो , रोज बिना नागा मेरी मारी जाती थी ) इनसे गाँड़ मरवाने के बाद भी जब चार दिन पहले ही तो, होली में नन्दोई ने गाँड़ मेरी मारी थी, ...बस जान नहीं निकली थी, ... लम्बा तो इन्ही का ज्यादा होगा , पर मोटा नन्दोई जी का ही , और जिस तरह से दरेरते, रगड़ते धकेलते थे , मजा भी खूब आता था लेकिन आँख में आंसू छलक जाते थे,हो

और ये तो नई बछेड़ी थी, आम के बाग़ में थोड़ी बहुत चीख पुकार मची भी होगी तो सिर्फ नैना ननदिया ने सुना था और तुरंत ही तो उसके जीजा ने अपना मूसल उसके मुंह में ठेल दिया था हलक तक,... अब दरद चाहे जितना हो , गाँड़ फट के चीथड़े चीथड़े हो जाए , वो एक आवाज नहीं निकाल पा रही थी , पर अभी तो

जोर जोर से चोकर रही थी, रो रही थी दुहाई दे रही थी , पर जब गाँड़ फटती है न तो बचाने वाला कोई नहीं होता,...

और चिढ़ाने मज़ाक उड़ाने वाले बहुत ,

यहाँ तो मेरी ननद ही थी , चिढ़ाने मज़ा लेने में , भौजाई की छोटी बहन की मारी जा रही हो , सबके सामने , मारने, फाड़ने वाला उसका अपना मर्द हो तो कौन ननद ये मौका छोड़ती ,...

" अरे भौजी क छुटकी बहिनिया , चीख लो , चिल्ला लो ,... पूरे गाँव में सुनाई पड़ रही होगी ,... और पूरे गाँव वाले मेरे सब भाई तेरे जीजू लगेंगे, और ये छोटी छोटी गाँड़ जो मटका के चलती है न , महीने भर में तेरी माँ के भोंसडे से चौड़ा तेरी गाँड़ का छेद हो जाएगा ,... "





छुटकी कुछ भी कहने सुनने की हालत में नहीं थी , सिर्फ चीख चिल्ला रही थी और ननद के साथ अगर किसी और पे उसका असर हुआ तो वो मेरे नन्दोई थे जो हर चीख के साथ दूनी ताकत से धक्के मार रहे थे ,

सास मेरी बोल तो नहीं रही थीं , लेकिन कच्ची कली की गाँड़ फाड़ी जाती देख के उन्हें भी बहुत मजा आ रहा था,.. उनकी आँखे उस की कच्ची गाँड़ के छेद पे चिपकी थीं ,





नन्दोई अब धीमे धीमे ठेल रहे थे , एक बार उसकी गाँड़ तो मार ही चुके थे और उन्होंने खुद मेरे साजन से कबूल किया था की उन्होंने दर्जनों कच्ची गांड खोली थी, लेकिन अबतक की ये सबसे कसी थी।

मैं अपनी छुटकी बहिनिया की कस कस के चूस रही थी, पर वो जैसे झड़ने के किनारे आती मैं रुक जाती दो चार बार ऐसे ही तड़पाया मैंने उसे , फिर एक बार जब वो किनारे पर आयी, मैंने कस के उसकी क्लिट को चूसना शुरू कर दिया और दो ऊँगली एक साथ जड़ तक उसकी चूत में पूरी ताकत से पेल दी , मोड़ के , बस वो झड़ने लगी





पर मैं अबकी इत्ती आसानी से नहीं छोड़ने वाली थी, मेरी मुड़ी उँगलियों के नकल ने उसकी बिल के अंदर उसके जी प्वाइंट ढूंढ लिया था, बस मैं वहीँ बार बार रगड़ रही थी , साथ में मेरी जीभ मेरे होंठ उसके क्लिट पर, एक बार उसका झड़ना रुकता उसके पहले वो दूसरी बार झड़ना शुरू कर देती ,

और मौके का फायदा उठा के नन्दोई जी ने अपना बांस पूरा ठेल दिया गांड का छल्ला पार हो गया।





अब मैं रुक गयी और नन्दोई जी पूरी ताकत से और पूरी स्पीड से चालू गए, जैसे कोई धुनिया रुई धुनें उस तरह छुटकी की गाँड़ मारी जा रही थी,... जैसे इंजिन का पिस्टन अंदर बाहर हो उसी तरह ननदोई जी का लंड मेरी बहन की गाँड़ में,...

आठ दस मिनट तक ,

छुटकी रो रही थी , चीख रही थी अपने हाथ पटक रही थी , पर जितना वो तड़पती उतना ही नन्दोई जी और कस कस के,...

तभी मैंने देखा की मेरे साजन भी, उन्हें मैं क्यों बख्शती , उनकी भी शार्ट उतर गयी , ननदोई का खूंटा मेरी छोटी बहन की गाँड़ में और ननदोई के साले का खूंटा नन्दोई की सलहज के मुंह में ,...
 
दोनों बहनों की एक साथ,...





छुटकी रो रही थी , चीख रही थी अपने हाथ पटक रही थी , पर जितना वो तड़पती उतना ही नन्दोई जी और कस कस के,...

तभी मैंने देखा की मेरे साजन भी, उन्हें मैं क्यों बख्शती , उनकी भी शार्ट उतर गयी , ननदोई का खूंटा मेरी छोटी बहन की गाँड़ में और ननदोई के साले का खूंटा नन्दोई की सलहज के मुंह में ,...





मस्त हो कर मैं चूस रही थी , और जब बीच में उन्हें छोड़ के उनकी साली की चुत चुसाई में लग जाती तो मेरी उँगलियाँ ,

दस बाहर मिनट तक नन्दोई जी छुटकी की गाँड़ मारते रहे , छुटकी चीखती चिल्लाती रही,... पर पता नहीं साले जीजा में क्या बात चीत हुयी , खिलाड़ी बदल गए ,

अब छुटकी के जीजा छुटकी के पिछवाड़े,... छुटकी की चीख के साथ मेरी भी चीख निकली ,

पीछे से ननदोई जी ने मेरी गाँड़ में ठेल दिया था और एक बार में आधा बांस, मैं जोर से चीखी,...





और मेरी छिनार ननद खूब जोर से हंसी,

" अब मजा आ रहा है , दोनों बहनों की एक साथ गाँड़ मारी जा रही है , खुले आँगन में "





हम दोनों बहने सिक्सटी नाइन की पोज में , मेरी बहन के पिछवाड़े मेरे साजन और मेरे पिछवाड़े नन्दोई जी , मेरी गाँड़ के रसिया

और मैं भी कभी गांड में उनके लंड को निचोड़ लेती कभी उनके धक्के का जवाब धक्के से देती , कभी उनकी बहिन महतारी गरियाती ,





आधे घंटे के बाद जीजा साले एक साथ झड़े, और देर तक हम दोनों के अंदर ,

मुझे सहारा देकर ननद जी ने खड़ा किया और सासू जी ने छुटकी को।

सासू जी छुटकी को लेकर अपने कमरे की ओर जाने लगीं तो छुटकी का मुंह छोटा सा हो गया, वो मुड़ मुड़ के अपने जीजू की ओर देखने लगी, और इनकी आँखे भी ललचाती हुयी छुटकी को देख रही थीं सासू जी की आँखों से तो कुछ छिपा नहीं रहता, तो बस छुटकी से वो बोलीं,...

" बस मुझे ज़रा सी नींद लगने लगे तो तू अपनी दीदी के पास चली जाना।"

बोल तो वो छुटकी से रही थी लेकिन, जैसे सूरज को देख के कमल खिलता है, उनका चेहरा खिल रहा था.

उधर ननद रानी भी नन्दोई जी के साथ जाने के लिए मुड़ी तो मैंने नन्दोई जी को जबरदस्त आँख मार दी, और इन्हे उकसाते,

ननद जी को छेड़ते अपने साजन से बोली,

" आज आपने मेरी बहिनिया की गाँड़ मारी तो कल अपनी बहिनिया की मारिएगा,.. बहुत मस्त चूतड़ हैं ननद रानी के "





और साथ में कस के चिकोटी ननद के मोटे मोटे चूतड़ों में काट ली,... "

मुस्कराती ननद, नन्दोई के साथ अपने कमरे में, और ये बोले,

" तेरी ननद की तो कल देखी जायेगी, आज अभी तो ननद की भाभी अपना पिछवाड़ा बचाएं "

मैं भी जानती थी और ये भी जानते थी की न मैं बचाने वाली न ये छोड़ने वाले, अरे बचाने के लिए थोड़ी मेरी माँ ने इनके पास भेजा था, पर मैं बोली,

" तो कल ननद के पिछवाड़े पर ननद के भइया चढ़ेंगे, पक्का "

और खिलखिलाते हुए अपने कमरे में इनके आगे आगे , मैं खुद पलंग को निहुर के पकड़ के,





दरवाजा भी इन्होने नहीं बंद किया , इत्ती जल्दी मची थी इस जल्दबाज को,... बस मेरी साड़ी पकड़ के खींचनी शुरू की और उनसे तेज मैंने अपनी साड़ी उतारकर वहीँ फर्श पे, साया मोड़ के उन्होंने कमर तक कर दिया, ब्लाउज की आधी बहने तो छेड़छाड़ में इनकी बहना ही खोल देती थीं,... बाकी इन्होने, टाँगे मैंने खुद अच्छी तरह फैला दीं,...
 
पिछवाड़े की कुटाई





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मुस्कराती ननद, नन्दोई के साथ अपने कमरे में, और ये बोले,

" तेरी ननद की तो कल देखी जायेगी, आज अभी तो ननद की भाभी अपना पिछवाड़ा बचाएं "

मैं भी जानती थी और ये भी जानते थी की न मैं बचाने वाली न ये छोड़ने वाले, अरे बचाने के लिए थोड़ी मेरी माँ ने इनके पास भेजा था, पर मैं बोली,

" तो कल ननद के पिछवाड़े पर ननद के भइया चढ़ेंगे, पक्का "





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और खिलखिलाते हुए अपने कमरे में इनके आगे आगे , मैं खुद पलंग को निहुर के पकड़ के,





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दरवाजा भी इन्होने नहीं बंद किया , इत्ती जल्दी मची थी इस जल्दबाज को,... बस मेरी साड़ी पकड़ के खींचनी शुरू की और उनसे तेज मैंने अपनी साड़ी उतारकर वहीँ फर्श पे, साया मोड़ के उन्होंने कमर तक कर दिया, ब्लाउज की आधी बहने तो छेड़छाड़ में इनकी बहना ही खोल देती थीं,... बाकी इन्होने, टाँगे मैंने खुद अच्छी तरह फैला दीं,...

और फिर क्या करारा धक्का लगा मेरे पिछवाड़े, इनके जीजा की मलाई अभी तक पिछवाड़े बजबजा रही थी, बस बिना किसी चिकनाई के मोटा मूसल पांच छह धक्कों में आधे से ज्यादा अंदर,...

बहुत ताकत थी इस स्साले सास के लौंडे में , सच में मेरी सास ने गदहे घोड़े से चुदवा चुदवा के इन्हे पैदा किया था , या क्या पता पंचायती सांड़ के पास गयी हों,... और जब आधे से ज्यादा करीब साढ़े चार पांच इंच घुस गया था, मेरी गाँड़ फ़टी जा रही थी,... परपरा रही थी ,





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तो बस उन्होंने मेरी दोनों चूँची कस के पकड़ ली , और लगे मीजने,

इतना मज़ा आ रहा था मैं बता नहीं सकती, जितना कस के ये मेरे जोबन मसलते थे उतना ही मजा आता था, शादी के पांच छह महीनों में ही मेरी कप साइज बढ़ के सी से डी हो गयी थी, ननद मुझे चिढ़ाती भी थी, भाभी यही हाल रही है तो साल भर में भैया एफ साइज कर देंगे,...





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कर दें तो कर दें न , मेरा साजन चाहे जो कुछ करे,... फिर मैं कौन सी ब्रा पहनती थी, न घर में न बाहर,...

उनकी उँगलियों का भरे भरे गदराये जोबन पर दबाव और जिस तरह से वो दुष्ट, अपनी तर्जनी और मंझली ऊँगली के बीच में कैंची की तरह फंसा फंसा के मेरे कंचे ऐसे बड़े कड़े निप्स को दबाता था,





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मस्ती से जान निकल जाती थी, लेकिन मैं कौन थी, थी तो अपने साजन की सजनी, अपनी माँ की बेटी,... तो अबकी मायके में माँ ने पिछवाड़े का जो गुन ढंग सिखाया था, वो सब, कैसे खूंटे को आराम से पहले हलके हलके दबाओ, फिर कस के निचोड़ो, खुद कैसे धक्के का जवाब धक्के से दो, बस कभी मैं धक्के मारती तो कभी वो, मैं कस के पलंग की पाटी पकडे थी, कभी मेरी चीख निकलती कभी सिसकी,

दरवाजा खुला हुआ था , बगल के कमरे से ननद रानी की सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी, उनकी भी चुदाई जबरदस्त हो रही थी.

धक्का दोनों और से लगने का असर हुआ की बस थोड़ी देर में इनका बित्ते भर का बांस जड़ तक मेरी गाँड़ में समा गया, गाँड़ फटी पड़ रही थी, पूरे जड़ तक मेरी ननद के यार ने धंसा रखा था, लेकिन जितना दर्द हो रहा था, उतना ही मजा आ रहा था,

पर उस बदमाश के तरकस में कोई एक दो तीर थे , हर रोज नयी स्टाइल, मेरे निप्स खींच खींच के उसने मूंगफली के दाने की तरह कर दिया था , और हरदम टनटनाया रहता था, बस दोनों हाथों से मेरे निपल को पकड़ के, जैसे ग्वाला गाय की छीमी पकड़ के खींच खींच के दूध दुहता है , बस एकदम उसी तरह,

एक नए तरह का दर्द , एक नए तरह का मज़ा और अब मुझसे नहीं रहा गया, मैं कस कस के गांड में घुसे मोटे लंड को कस कस के निचोड़ रही थी , गाँड़ अपनी कस कस के सिकोड़ रही थी और जवाब में वो कस के एकदम दूध दुहने की तरह मेरे निप्स पकड़ पकड़ के खींच रहे थे,

और अब न उनसे रहा गया, न मुझसे क्या मस्त गाँड़ मरौव्वल हुयी मेरी, लेकिन मैं भी , दस पांच धक्के वो मारते, तो एक दो मैं भी,...





कभी लंड पकड़ के गाँड़ में मेरा साजन गोल गोल घुमाता था, कभी हौले से पूरा मूसल बाहर निकाल के पूरी ताकत से वो धक्का मारते की बगल के कमरे में मेरी ननद को तो सुनाई ही पड़ता , सासू जी के कमरे में ,सासू जी और छुटकी बहिनिया को भी,...

एक बार तो अभी मेरी छुटकी बहिनिया की गाँड़ में वो झड़े ही थे , तो सेकेण्ड राउंड में टाइम तो लगना ही था, पूरे आधे घंटे,.... नान स्टॉप तूफ़ान मेल मात और जब झड़ना शुरू हुए तो बस, जैसे गर्मी के बाद सावन भादो में बादल बरसे, सूखी धरती की तरह मैं रोप रही थी , और गिरना ख़तम होने की बाद भी बड़ी देर तक मैं वैसे निहुरी रही और वो मेरे अंदर धंसे, ...





और उसी तरह मुझे उठा के पलंग पर,

बड़ी देर तक बिना बोले हम दोनों एक दूसरे से चिपके रहे, लेकिन फिर शुरुआत भी मैंने की , बस छोटे छोटे चुम्मे, उनके चेहरे पर , ईयर लोब्स पर, ... उँगलियों से उनकी छाती सहलाती रही,

वो बस ललचायी नज़रों से मुझे देखते रहे,

बाहर रात झर रही थी, चन्द्रमा पश्चिम की ओर जल्दी जल्दी डग भर रहा था, ...
 
भाग २२

रात बाकी





और अब न उनसे रहा गया, न मुझसे क्या मस्त गाँड़ मरौव्वल हुयी मेरी, लेकिन मैं भी , दस पांच धक्के वो मारते, तो एक दो मैं भी,... कभी लंड पकड़ के गाँड़ में मेरा साजन गोल गोल घुमाता था, कभी हौले से पूरा मूसल बाहर निकाल के पूरी ताकत से वो धक्का मारते की बगल के कमरे में मेरी ननद को तो सुनाई ही पड़ता , सासू जी के कमरे में ,सासू जी और छुटकी बहिनिया को भी,...

एक बार तो अभी मेरी छुटकी बहिनिया की गाँड़ में वो झड़े ही थे , तो सेकेण्ड राउंड में टाइम तो लगना ही था, पूरे आधे घंटे,.... नान स्टॉप तूफ़ान मेल मात और जब झड़ना शुरू हुए तो बस, जैसे गर्मी के बाद सावन भादो में बादल बरसे, सूखी धरती की तरह मैं रोप रही थी , और गिरना ख़तम होने की बाद भी बड़ी देर तक मैं वैसे निहुरी रही और वो मेरे अंदर धंसे, ... और उसी तरह मुझे उठा के पलंग पर,





बड़ी देर तक बिना बोले हम दोनों एक दूसरे से चिपके रहे, लेकिन फिर शुरुआत भी मैंने की , बस छोटे छोटे चुम्मे, उनके चेहरे पर , ईयर लोब्स पर, ... उँगलियों से उनकी छाती सहलाती रही,

वो बस ललचायी नज़रों से मुझे देखते रहे,

बाहर रात झर रही थी, चन्द्रमा पश्चिम की ओर जल्दी जल्दी डग भर रहा था, ...





कुछ देर तक तो मेरी लम्बी गोरी उँगलियाँ, उनके मेल टिट्स की परिक्रमा करती रहीं, मैं समझ रही थी, उनके मन में क्या चल रहा होगा। वो सोच रहे थे की अब मेरे लम्बे नेल्स उनके मेल टिट्स को स्क्रैच करेंगे, पिंच करेंगे, उनके टिट्स उतने ही सेंसिटिव थे जित्ते मेरे निप्स। लेकिन कई बार तड़पाने का मज़ा ही कुछ और है, मैंने जस्ट ऊँगली से उनके टिट्स को ब्रश किया फिर उँगलियाँ नीचे की ओर बढ़ गयीं,...

और दूसरा मेरा फेवरिट अड्डा उनकी देह पर , ( उनकी असल में थोड़ी थी , अब तो वो मेरी हो गयी थी, इसलिए तो मेरी मर्जी मैं चाहे जिसपर उसे चढ़ाऊँ, उनकी माँ बहन ) उनकी नेवल,...और वहीँ मैं ठहर गयी. उनके उस लम्बे मोटू के अलावा कम से कम १५ इरोजेनिक प्वाइंट्स उनकी देह पर मैं जानती थीं, बस जहाँ थोड़ी सी शरारत, और झंडा उनका फहराने लगता था.





नेवल भी,... तो कुछ देर नाभि परिक्रमा के बाद मेरी एक ऊँगली हलके से सरक कर उस कूप में ( असल में मेरे बूब्स और हिप्स के साथ मेरे नेवल उन्हें भी पागल करते थे तो मेरे खूब टाइट डीप लो कट ब्लाउज तो मेरे बूब्स ख़तम होने के पहले ही ख़तम हो जाते थे, और साड़ी मैं एकदम कूल्हों पर बांधती थी, नाप के नाभि से कम से कम ८ अंगुल नीचे, तो गोरे पान से चिकने पेट पर, मेरे नेवल हरदम बवाल मचाते रहते थे ).





दूसरा हाथ बहुत हलके हलके उनकी जांघ पर सरक रहा था, मेरी अनावृत गोरी गोरी गोलाइयाँ, उनकी देह को कभी सहला देतीं तो कभी बस एक अंगुल की दूरी पे ,





मेरे होंठ उनके कानों के लोब्स पर,

हम दोनों में यह अलिखित संधि थी, दूसरे राउंड की शुरुआत मैं करुँगी,...

क्या होना है वो भी मैं ही , हाँ एक बार कुश्ती शुरू हो गयी तो उसके बाद कोई नियम कानून नहीं ,

और मेरी मर्जी भी पहले दिन से ही यही थी की अब इस जिंदगी में सिर्फ इस लड़के की मर्जी चले.

वो तड़प रहे थे, झंडा एकदम खड़ा,... मोटा बदमाश सुपाड़ा, जिसने अभी कुछ दूर पहले मेरी छोटी बहिनिया की गांड फाड़ के रख दी थी,... एकदम खुला,... मेरी जीभ का बहुत मन कर रहा था लेकिन उसे डांट के मैंने मना किया, आज मेरी प्लानिंग कुछ और थी, और,... थोड़ी देर में ही मेरी दोनों हाथों की उंगलिया ,... एक तो उनकी नेवेल से दक्षिण की यात्रा कर के , और दूसरी जाँघों से ऊपर सरक के, उस कुतबमीनार के बेस पर बस सुरसुरी कभी अंगूठे और तर्जनी से पकड़ के हलके हलके दबा देती तो कभी सरकते हुए उस मोटी लम्बी मीनार के ऊपरी हिस्से तक,...





नहीं नहीं मैं मुठिया नहीं रही थी, उसे दबा भी नहीं रही थी , बस हलके हलके , जैसे कोई किसी पंख से उसे सहलाये, हाँ बदमाश उँगलियाँ मेरे बस में तो हरदम रहती नहीं, तो उस चर्मदण्ड के पीछे की ओर, मेरा कोई नाख़ून हलके से स्क्रैच भी कर दे रहा था, और वो चीख उठते,

वो कौन सा मेरी चीखों का ख्याल करते थे जो मैं करूँ, और अब मेरी जीभ भी कभी उनके कानों में गुनगुनाती, कभी उनके चिकने गोरे गालों को बस सहला देती ,...

बेचारे उनकी हालत बहुत ख़राब थी,...

पर मेरी हालत कम खराब थी,

पिछवाड़े तो आज खूब मजा आया, पहले नन्दोई जी ने हचक के मारी, और फिर उस नन्दोई के साले ने,...

लेकिन मेरी रामपियारी अभी भी आठ आठ आंसू रो रही थी,





आज किसी ने उसे हाथ भी नहीं लगाया था, और तो उसे बस वो मोटा मूसल चाहिए था, ... इसलिए मैंने सोचा बहुत हो गया चोर सिपाही का खेल , और मैं सीधे उनके ऊपर चढ़ गयी,...

वो कहते हैं न आज कल आत्मनिर्भर,... तो बस वही,... लेकिन इस लड़के को तड़पाने का मजा अलग है, थोड़ी देर तक तो मेरी गुलाबो उसके तड़पते बौराए पगलाए मोटे सुपाडे पर रगड़ती रही,... फिर जैसे कोई दया कर के जरा सा दरवाजा खोल दे दोनों फांके खुलीं , थोड़ा सा सुपाड़ा घुसा और दरवाजा फिर बंद,...
 
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