Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 96 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग १०१ - मेरा मरद, पृष्ठ १०६७

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छुटकी, होली दीदी की ससुराल में का अल्पविराम समाप्त और आप सब के अनुरोध पर एक बार फिर से,

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Joru ka Gullam

Phagun ke din Char and this story.

I had promised that in the first week of July, posts would come and now my request to friends, please do share your comments on all these stories.
 
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फागुन के दिन चार भाग ३७, और दंगा नहीं हुआ, पृष्ठ ४१९

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जोरू का गुलाम भाग 246 ----तीज प्रिंसेज कांटेस्ट पृष्ठ १५३३

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अगले अपडेट से सुगना और उनके ससुर सूरजबली सिंह का किस्सा शुरू होगा जो शायद आठ दस भागो में कम से कम चलेगा

सुगना भौजी और उनके ससुर के बारे में पहले भी इस कहानी में जिक्र आ चूका है

भाग ८२ पृष्ठ ८३० में

सुगना एकदम रस की जलेबी, वो भी चोटहिया, गुड़ की जलेबी, हरदम रस छलकता रहता, डेढ़ दो साल पहले ही गौने उतरी थी, जोबन कसमसाता रहता, चोली के भीतर जैसे अंगारे दहकते रहते, जैसी टाइट लो कट चोली पहनती सुगना भौजी, सीना उभार के चलतीं, जवान बूढ़ सब का फनफना जाता था, ... गौना उतरने के कुछ दिन बाद ही मरद कमाने चला गया, क़तर, दुबई कहीं, सास थीं नहीं। ननद बियाहिता। घर में खाली सुगना और उसके ससुर।

ससुर के सामने अभी भी हाथ भर का घूंघट काढती, पर्दा करती, परछाईं तक बेराती। घर में एक काम वालियां रहती हीं, कूटना, पीसना, सबके सामने बहुत सम्हल कर, गांव क रीत रिवाज, तुरंत क गौने उतरी बहुरिया,

लेकिन अब ससुर के सामने वो किसी न किसी बहाने, भले ही परदे में,...

कभी चूड़ी खनकाती, कभी पायल झनकाती, कभी कभी आँचल लहराती।

अंगिया भी उसी डारे पर सूखने के लिए डालती जहाँ ससुर बैठते, और टांगती उतारती भी तभी जब ससुर जी आस पास ही हों.

और ससुर को खाने खिलाते उनका दिल भी टटोलती, आग लगाती, उकसाती,...

" भूखे मत रह जाइयेगा, वरना सोचियेगा की कैसी बहू लाया हूँ ससुर को भूखा रखती है, मेरे रहते आप भूखे रहें मुझे अच्छा नहीं लगेगा
। "

और उसके बाद अँजोरिया अस चेहरा और दीये ऐसी बड़ी बड़ी आँखे उठा के देखती तो ससुर जी का टनटना उठता। एक दिन उनके मुंह से निकल गया,

" अरे बार बार मागूंगा, तो तू इतनी सुकुवार देते देते थक जायेगी ".

" अरे बाऊ जी, आप मांग कर के तो देखिये, ... आप भले थक जाएँ, मैं देते देते कभी नहीं थकूँगी,... सुकुवार हूँ, लेकिन जवान भी हूँ,... आपकी बहू हूँ, ..." हँसते हुए कटोरी में दही डालते वो बोली।

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सुगना खुद भी तो सुलग रही थी और ख़ास तौर से जिस दिन माहवारी ख़त्म होती, बाल धोती वो,... और ससुर जी के सामने, वो भी समझ जाते, ...

तो उस दिन वही दिन था, सुगना सुलग रही रही थी सोच रही बहुत हुआ चोर सिपहिया,

और उस दिन ससुर जी की भी हालत ख़राब थी,... बाल धोने के बाद बहू जब आंगन में आयी थी अलग ही रूप छलक रहा था, चेहरे पे कैसी जबरदस्त प्यास थी । उन्हें मालूम नहीं था क्या की जिस दिन औरत की पांच दिन की छुट्टी खतम होती है वो कितना तड़पती है, सुगना की भी वही हालत थी ।

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सुगना और उसके ससुर - सुरजबली सिंह

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भाग १०२ - सुगना और उसके ससुर -सूरजबली सिंह

now
 
भाग १०२ - सुगना और उसके ससुर -सूरजबली सिंह

२५,३९,५३५

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सुगना की कहानी सुनानी तो है लेकिन बात कहाँ से शुरू करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा।

सुगना इस कहानी में आ चुकी है, पायल खनकाते, बिछुए बजाते, उनके और उनके ससुर सूरजबली सिंह की जिक्र भी थोड़ा बहुत लेकिन उसी समय मैंने आप मित्रों से वायदा किया था की सुगना और उनके ससुर का हवाल सुनाऊँगी पूरे विस्तार से, और उसी बीच मेरी मित्र आरुषि जी ने एक अच्छी लम्बी कविता चित्रों भरी ससुर और बहू पर पोस्ट कर दी।

उस समय भी मैंने वायदा किया था की ससुर बहू के इस रिश्ते पर मैं भी ट्राई करुँगी। इन्सेस्ट लिखना मुझे आता नहीं लेकिन सब मित्रों के कहने पर इस कहानी में कई प्रसंग जैसे पहली बार सगे भाई बहन का किस्सा अरविन्द और गीता के किस्से के रूप में आया,।

तो चलिए बहुत इधर उधर की बात हो गयी, अब आती हूँ मुद्दे पे लेकिन फिर वही बात, बात शुरू कहाँ से शुरू करूँ, और मैंने पहले ही बोल दिया था की अब काल क्रम से नहीं बल्कि एक एक बात पकड़ के, तो छुटकी के कबड्डी कैम्प में जाने के बाद याद नहीं पन्दरह दिन या महीने भर के बाद मैं गयी सुगना भौजी के यहाँ, शायद महीना भर हो ही गया था, तो सुगना भौजी खूब खुश।

बड़े आदर के साथ मुझे पलंग पे बैठाने लगीं, सिरहाने

" अरे नर्क भेजेंगी का , आपकी देवरानी हूँ , पहले आप बैठिये, आप गोड़ नहीं छुलवातीं, छोटी बहन की तरह रखती हैं लेकिन मेरा भी तो "मैं हाथ छुड़ाते बोली। पक्की सहेली, छोटी बहन की तरह, मानती थीं लेकिन थीं तो मेरी जेठानी ही न

लेकिन सुगना भौजी हाथ जोड़ के " आपकी, छाया की मदद से मेरी जिन्नगी लौटी है मैं तो तोहार गोड़ जिन्नगी भर धोऊंगी'

उस समय कुछ समझ में नहीं आया लेकिन बाद में पता चला की उनके ससुर ठीक हो गए हैं बल्कि पहले से भी तगड़े, एकदम जैसे जवानी वापस लौट आयी है और उनके साथ सुगना की ख़ुशी भी,

बताया तो था, जब ये किस्सा पहले आया था भाग ८२ प्रृष्ठ ८३० में ससुर उनके कमर के नीचे एकदम बेकार हो गए थे, छह महीने से, और वैसे भी तबियत नहीं ठीक रहती थी, सूरजबली सिंह ने पलंग पकड़ लिया था, बिस्तर से उठना मुहाल था, बस सब कुछ सुगना के जिम्मे, लड़का तो कतर में था, और गाँव में सूरज बली सिंह की देखभाल हो या सैकड़ो बीघा खेत बाग़ सब सुगना, लेकिन इतना ख्याल करती थीं बीमारी में ससुर का

लेकिन अब वो एकदम ठीक थे, बल्कि पहले से भी अधिक तगड़े हो के बिस्तर छोड़ा था उन्होंने,

बताउंगी सब बात, लेकिन अभी तो शुरू से, शुरू से मतलब एकदम शुरू से

पर या सब बाते बाद की है अभी से बताने से सब गड्डमगड्ड हो जाएगा।

पांच दिन जो मैं और सास मेरी साथ थे उस में सुगना के ससुर के बारे में बहुत कुछ तो मेरी सास ने बताया,.... लेकिन उनसे ज्यादा बड़की नाउन जो उम्र में मेरी सास से भी पांच दस साल ज्यादा ही थीं, गुलबिया की सास ने वो सुगना के घर की भी नाउन थीं और उनके ससुर के शादी भी कराने में वही,

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और ग्वालिन चाची ने भी, .....उन्होंने देखा तो नहीं था लेकिन सुना था उनके ससुर के शादी के पहले के दिन के बारे में ,.... सुगना की सास के बारे में

तो वही सब जोड़ जोड़ के,

और ये बात जितनी सुगना भौजी की है उतनी ही बाबू सूरजबली सिंह की भी है। वैसे तो ससुर बहू के किस्से में बस उम्र का अंतर, मौका और जवान माल को देखे के ललचाने का एक दो सीन और ससुर का घोड़े जैसा और बहू, लेकिन उसके पीछे का किस्सा भी तो होता है तो जो जो सुना है और कुछ बिना ज्यादा मिर्च मसाला के पता लगा बस वो सब सोच के आपके सामने,....

तो पहले सुगना भौजी के बारे में, पहले भी लिख चुकी हूँ एक बार फिर से लिख देती हूँ , उनके रूप जोबन का बखान और सब सच्चा
 
सुगना

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सुगना एकदम रस की जलेबी, वो भी चोटहिया, गुड़ की जलेबी, हरदम रस छलकता रहता, डेढ़ दो साल पहले ही गौने उतरी थी, जोबन कसमसाता रहता, चोली के भीतर जैसे अंगारे दहकते रहते, जैसी टाइट लो कट चोली पहनती सुगना भौजी, सीना उभार के चलतीं, जवान बूढ़ सब का फनफना जाता था,

सुगना ऐसी रसीली भौजाई पूरे गाँव बल्कि पूरे बाइस पुरवा में नहीं थीं।

... गौना उतरने के कुछ दिन बाद ही मरद कमाने चला गया, क़तर, दुबई कहीं,... सास थीं नहीं।

घर में खाली सुगना और उसके ससुर।

सुगना क जोबन जैसे गुड़ क डली, कोई नयी बियाही साल दो साल पहले गौने से उतरी, और जेकर मरद चार पांच महीने बाद चला गया हो,... अभिन लड़कोर न हो, जोबन चोली में टनाटन कसमसात हों, और वो जो जुबना उभार के छोट छोट चोली में,...

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तो का होगा जैसे गुड पे चींटे लगते हैं उसी तरह,... लेकिन सुगना जानती थी ये चोली के अंदर वाली दोनों गुड़ की डली गाँव क लौंडन क ललचाने के लिए तो ठीक हैं, लेकिन उसके आगे ज्यादा नहीं,.. हाँ देह उसकी गुड़ की जलेबी की तरह मीठी रसीली, भारी भारी कूल्हे और चोली फाड़ते जोबना क देख के , और ये जानते हुए की इन्हे दबाने मीसने वाला साल डेढ़ साल से बाहर है, कब आएगा, पता नहीं,... ऊपर से घर में टोकने वाली न सास न जेठान, आग लगाने वाली न कोई छोट ननद न बड़ी, और घर में सेंध लगाने वाला देवर भी नहीं

सुगना का,मस्त जोबन... सब लौंडो का पजामा टाइट रहता है. का पता भौजी कब केकरे आगे लहंगा पसार दें,., चटक चांदनी की तरह रूप के साथ सुगना की मिठास शहद ऐसी बोली में थी, ... और जो उससे चिपक गया, चाहे लड़का या लड़की वो छूट नहीं सकता था।

तो जब सुगना गौने उतरी, तो एक दो रिश्ते की सूरजबली सिंह की भौजाईयो ने मजाक में पूछा भी,

" ये उजरिया अस बहुरिया केकरे लिए लाये हो अपने लिए की,... बेटवा के लिए. "

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तो चलिए कुछ बातें सुगना के ससुर सूरजबली सिंह के बारे में भी
 
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