Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 98 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

बुच्ची

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और तबतक बुच्ची आ गयी,

वही सूरजु की बूआ की लड़की, कच्चे टिकोरे वाली, जो जरा सा चिढ़ाने पे मुंह बना लेती थी और पैर पटकने लगती थी और ऐसी नंदों की तो भौजाइयां ऐसी की तैसी कर के रख देती थीं और शादी ब्याह का मौका हो तो और, लेकिन अभी कोई भौजाई बोलती बेचारी बुच्ची, खुद बोल पड़ी, बिना समझे

" शीरा तो मुझे बहुत अच्छा लगता है, एक एक बूँद चाट जाउंगी "

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अब सब भौजाइयां मुस्कराने लगीं और इमरतिया की एक सहेली, कहारिन,मुन्ना बहू जो उससे भी ज्यादा मुंहफट थी हंस के बोली

" ननद हो तो ऐसी, ….इमरतिया अब तोहार बारी,... आज ही शीरा पीयाय देना "

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सबसे ज्यादा सुरजू सिंह की माँ मुस्करा रही थीं, अब लग रहा था शादी बियाह का घर।

और इमरतिया क्यों पीछे रहती वो बुच्ची से बोली

" अरे ये भी एक रस्म है, दूल्हे की बहन को रोज जो दूल्हा मिठाई खायेगा, .खाना होता है ..तो तो तोहार भैया क रसगुल्ला क शीरा "

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बड़ी मुश्किल से औरतें अपनी मुस्कान रोक पा रही थीं, और ऊपर से सूरज सिंह की महतारी वो भी मैदान में आ गयीं

" और क्या बिना रस्म रिवाज के, इतनी आसानी से भौजाई मिले और बुच्ची तू और शीला दुनो जनी यहीं रात में कोहबर रखावे, और साथ में तोहार भौजाई लोग "

( उन्होंने इमरतिया और मुन्ना बहू, वही इमरतिया की सहेली कहारिन को इशारा किया, कोहबर में पांच औरतें रात में रहती थीं, जिसमे कुछ सुहागिन और कुछ कुँवारी लड़कियां रहती थीं। वो रात में कोहबर वाले कमरे में ही जबतक दुल्हन घर में नहीं आ जाती थी वहीं सोती थी। वो कमरा जिस कमरे में दुलहा रहता था उसके बगल में ही )

और पांचवीं औरत को वो ढूंढ ही रही थी की सूरज सिंह के ननिहाल की, रिश्ते की एक भौजाई, मंजू भाभी बोलीं, मैं रहूंगी ऐसी मस्त कच्ची कलियाँ साथ में रहेगी और बुच्ची का गाल नोच लिया।

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अब तो सब भौजाइयां एकदम ननदों के पीछे,

" लेकिन ठंड, " बुच्ची ने बचने की कोशिश की तो गाँव की कोई नयी ब्याहता लड़की, दुलारी उसे चिढ़ाते बोली,

" अरे ठंड क इलाज,... लंड है :"

और फिर भौजाइयां, सब एक साथ चालू हो गयीं। मुन्ना बहू सीधे बुच्ची से बोली

" और शादी बियाह के घर में तोहरे अस मस्त माल के लंड क कौन कमी, सब तो तोहरे भाई लगेंगे, करवा ला घपाघप, घपाघप ।

दूसरी बोली, ' जितना गर्मी चुदाई में है उतना रजाई में नहीं , एक बार करवाय के देख लो, फिर खुदे खोल के टहरोगी। "

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बुच्ची से ज्यादा हालत सरजू सिंह कीखराब हो रही थी, उनकी माँ ठीक सामने बैठीं थी, और ये सब बात सुन के खूब रस ले ले के मुस्करा रही थीं पर वो सुरजू की हालत समझ रही थीं, इमरतिया से बोलीं

" ले जा आपने देवर के उनकी कोठरी में, "

और इमरतिया ने उनका हाथ पकड़ के उठाया और कमरे की ओर लेकिन वो लोग कमरे में घुसे ही थे की सूरज सिंह की माँ ने अपने पूत को आवाज लगा के रोक लिया

" और सुनो, अपने भौजाई क कुल बात माना, अब तू उनके हवाले, ....सोच लो तभी मिठाई खाने को मिलेगी जो जो वो कहें " मुस्करा के वो बोलीं

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दूल्हे की कोठरी

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और कोठरी में घुसते ही इमरतिया ने दरवाजा बंद कर के कुण्डी लगा दी, और आँख नचा के बोली

" नई दुल्हन इतना नहीं लजाती, जितना तू लजा रहे हो। अरे कउनो परेशनी नहीं होगी, तोहार भौजी हैं न साथ में, बस जउन बात तोहार महतारी कहें है वही, और सीधे से नहीं मानोगे तो जबरदस्ती, बस अभी हम थोड़ी देर में बुकवा ले के आ रहे हैं."

. इमरतिया ने एक बार ध्यान से कमरे को देखा, इसी कमरे में उसका देवर अपनी नयकी दुलहिनिया की, उस हाईस्कूल पास की, चूत फाड़ेगा, अभी चौदह दिन बाद होगी चुदाई जबरदस्त, ११-१२ दिन बाद तो बरात जायेगी, दो दिन की बरात, चौदह दिन बाद उतरेगी दुल्हिन, और ये बात तो बियाह के पहले से लड़के लड़की दोनों को मालूम रहती है, खाली दुल्हिन के बियाह के लाने से कुछ नहीं होगा, जब तक नाउन और भौजी लोग कंगन नहीं खुलवाएंगी, मौरी नहीं सेरवाई जायेगी, ललचाते रो एक दूसरे को देख के मिठाई खाने को नहीं मिलेगी।

लेकिन इमरतिया ने इसलिए सुरजू देवर को समझा दिया था, पहले दिन ही कुश्ती होगी, बेचारे इतने सोझ, भौजाई चिढ़ा रही थीं और वो सच मान गए चेहरा कुम्हला गया, कैसा भुकुस गया,

कमरा खूब बड़ा था, आठ दस पलंग आ जाएँ ऐसा लेकिन अभी कोई पलंग क्या कुछ भी नहीं था, सिर्फ जमीन पर एक बिस्तर था, और दरी बिछी थी, हाँ जब बारात जायेगी तो बड़की ठकुराइन ने खुद इमरतिया को बताया था,

इमरतिया ने ही छेड़ कर ठकुराइन से पुछा था गोड़ दबाते समय,

सुरजू की माई को तेल लगाते समय बस पांच मिनट के अंदर साडी पेटीकोट सब इमरतिया कमर तक उलट देती थी, बोलती, अरे तेल लग जाएगा, और चला हमहुँ आपन उघाड़ ले रहे हैं कमरा तो बंद है"

तो बस तेल लगाते हाथ सरक के जांघ पे, फिर तेल की कटोरी सीधे, वहीँ , तो बस उसी समय इमरतिया ने सुरजू का जिक्र करते हुए छेड़ा था,

" हमार देवर तो पहलवान है, बड़की ठकुराइन तो कहीं पहली रात ही पलंग न टूट जाए, बड़ी बेइजजती होगी "

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" अपने देवर को बोल देना, ओह हाईस्कूल वाली पे जितना जोर लगाना हो लगा लेगा, पलंग नहीं टूटने वाली है, तोहरे देवर और ओकर दुलहिनिया के लिए अबकी सहर से नयी मसहरी बनवाये हैं, अइसन मजबूत लकड़ी है की हाथी चढ़ जाए तो न टूटे, और चौड़ी इतनी की तोहरे देवर क दुल्हिन के साथे ओकर दो चार बहिन महतारी हों तो वो भी लेट के मजा मार लें। और साथ में कुर्सी वुरसी सब, बरात जायेगी तो बस उसी दिन सब आ जायेगा, "

बस इमरतिया ने दोनों फांक फैला के तेल चुआना शुरू कर दिया, बस इन्ही सब बदमाशियों से तो बड़की ठकुराइन सुरजू क माई इमरतिया को मानती थीं, पर वो इमरतिया से बोलीं,

" तोहरे देवर को ताकत चाहे जितनी हो, लेकिन पलंग क कुश्ती क दांव पेंच में एकदम अनाड़ी है,...अभी तक खाली कुश्ती, अखाडा और लंगोट का सच्चा, "

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इमरतिया, सुरजू का माई क मतलब समझ गयी, अपनी हथेली से बड़की ठकुराइन की प्यासी चुनमुनिया पे मसलती बोली,

" अरे देवर क भौजाई काहें लिए है, लगन एक बार लगने दीजिये, कुल गुन सिखा दूंगी, गाँव का नंबरी चोदू मात, पहले दिन ही वो हाईस्कूल वाली अस चोकरेगी की ओकर महतारी क भी मालूम हो जाएगा, बिटिया अच्छे से चुद रही है "

बड़की ठकुराइन सिसकी लेते बोलीं,

" एकदम दस बार बोलीं,ओकर महतारी की हमार बिटिया हाईस्कूल पास है, मन में आया की बोल दूँ की आखिर भेज तो चुदवाने के लिए रही हो लेकिन सोचा की कहीं नया नया रिश्ता है बुरा न मान जाए, शहर के लोग "

" अरे बुरा मानने से कहीं बुरिया बचती है, " हँसते हुए मलते हुए इमरतिया बोली।

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तब तक सुरुजू बोले, और इमरतिया का ध्यान टुटा,

" भौजी, का सोच रही हो "

इमरतिया मुस्करा के छेड़ते बोली

" यही सोच रही हूँ देवर जी की चौदह दिन के बाद का होगा रात में यह कुठरिया में जब नयकी दुलहिनिया आएगी "

और सुरजू झेंप गए, उनका गाल मींजते हुए भौजी ने चिढ़ाया,

" इतना तो तोहार दुहिनिया न लजाये, अरे चुदवाये आएगी, तो चोदी जायेगी, न चोदबा का, अरे भौजाई और महतारी क नाक जिन कटवाया "

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और ऊँगली से चुदाई का इंटरनेशल सिंबल बना के अपने देवर को दिखाया,

" धत्त, भौजी "

इमरतिया जान रही थी की गाँव में १०० में ९५ लड़के तो घास वाली को काम वाली को चोद चोद के पक्के हो जाते है, बियाह के पहले दर्जनों को निपटा देते हैं बाकी पांच में दो चार को डर रहता है की मुट्ठ मार मार के कहीं कमजोर तो नहीं हो गया, ऐन मौके पे खड़ा होगा की नहीं और एकाध ही सुरजू की तरह सोझ होते हैं लेकिन सोचते वो भी हैं की हो पायेगा की नहीं, कभी किया तो है नहीं। "

लेकिन इमरतिया को अपने देवर के औजार पे पूरा भरोसा था हाँ वो चाला कैसा पायेगा, ये तो उसे ट्रेन करने पे था, फिर से छेड़ते सीधे सुरजू के खूंटे को घूरते बोली,

" लजा जिन, और अब तू भले लजा लो, मैं नहीं लजाने वाली, आज से ही तोहार कुल लाज बुकवा के साथे रगड़ रगड़ के छुड़ा दूंगी "

बाहर से भौजाइयां जिस तरह से नंदों को छेड़ रही थीं, सब आवाज साफ़ साफ़ आ रही थीं, सबसे ज्यादा बुच्ची की रगड़ाई हो रही थी और सबसे ज्यादा आवाज साफ़ सुनाई पड़ रही थी, सुरजू की माई की और वो भौजाइयों को खूब चढ़ा रही थीं ,

इमरतिया ने देखा, कमरे में तीन ओर बड़ी बड़ी खिड़कियां थीं, एक तो बरामदे में ही खुलती थीं, जहां औरतें बैठी थीं और जहाँ गाना होना था। लगता है बंद खिड़की में भी कुछ फोफर होगा, जिससे आवाज साफ़ साफ़ आ रही थी।

एक खिड़की सीढ़ी की ओर और एक पीछे आम के बगीचे में खुलती थी, शायद ठकुराइन ने सोचा होगा की दूल्हा दुल्हिन खिड़की खोल के पुरवाई का मजा लेते हुए चुदवाने का सुख लेंगे, खुद उन्होंने इमरतिया से बोला था

" एक बार दुल्हिन को ननद कुल पहुंचा देंगी तो रात में सीढ़ी का दरवाजा भी बंद, बारह घंटे बाद ही खुलेगा। कम से कम महीने भर सुरजू क खेत वेत जाना बंद, पोते का मुंह देखना है तो ये सब करना पड़ेगा "

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" और क्या नया खेत जोते न, डारे पानी मन भर " हँसते हुए इमरतिया बोली सुरजू क माई से बोलीं ,

तो एक बार सीढ़ी बंद हो जाती तो जहाँ चाहें छत पे वहां मजा लें और खिड़की खोल के तो एकदम ही , गाँव में किसी और का दुतल्ला उस समय तो था नहीं।

आती हूँ अभी बुकवा ले के और ये सब कपडा उतार के एक तौलिया पहन के तैयार रहना, हर जगह लगेगा " इमरतिया ने अपना इरादा साफ़ कर दिय और बाहर।

और बाहर सूरजु सिंह क महतारी सब औरतो को आगे क काम बता रही थी, और सबसे पहले बुच्ची और उसकी सहेली दखिन पट्टी वाली शीला को,

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" अभी जाके नीचे से बिछौना, बड़की रजाई, और अपने भैया के लिए खाना, ….जउन इमरतिया भौजी कहें, वो सब नीचे से और कउनो चीज्ज चाहे तो हलवाई से बोल के, …..बड़ी जिम्मेदारी है कोहबर रखावे की, अइसन मीठ मीठ भौजाई ऐसे न मिली और जैसे जैसे भौजी लोग कहें, …..पहले तोहार भैया खाय ले ओकरे बाद,"

और फिर भरौटी से आयी दो औरतों को उन्होंने काम पकड़ाया,

" कल से गाना शुरू हुयी, तो तोहनन क जिम्मेदारी आज से जाके बबुआने के साथ साथ भरौटी, चमरौटी , अहिरौटी, बाइस पुरवा क कउनो पुरवा बचना नहीं चाहिए। बोल देना की बड़के घरे में इतने दिन बाद बियाह पड़ा है, कउनो मेहरारू बिटिया, और ननदों को तो जरूर, नाच गाना, और कुल नंदों का पेटीकोट का नाडा खुलना चाहिए,

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ननद भौजाई- बुच्ची और इमरतिया

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" और जो शलवार वाली हैं ? " उनके मायके से आयी, मंजू भाभी ने ललचायी निगाह से कच्ची कलियों को देखते पुछा।

बुच्ची और शीला को देख के मुस्करा के सुरजू की माई बोलीं, " उनका तो सबसे पहले,....दूल्हा क बहिन हैं "

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बुच्ची का गाल सहलाते वो कहाईन मुन्ना बहू बोली,

" अरे नीचे क घास फूस साफ़ कर लीजिएगा, कल बिलुक्का ( बिल ) देखायेगा। "

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तबतक इमरतिया सूरजु को पहुंचा के बाहर निकल आयी थी और बुच्ची को पकड़ के बोली,

" अरे काहें हमारी बारी सुकुवाँरी ननद को तंग कर रही हो, वो काहें साफ़ करेंगी ? आखिर नाउन भौजी काहें हैं ? अरे नाऊ लोग जैसे मर्दन का दाढ़ी मूंछ बनाते हैं न ओहि से चिक्क्न, तोहार भौजी, नीचे वाले मुंह क बाल साफ़ करेंगी। जउन तोहार मक्खन अस चिक्कन गाल है न उससे भी चिक्कन नीचे वाला मुंह हो जाएगा , महीना भर तक झांट का रोआं भी नहीं जामेगा। जउन मरद देखेगा, चाहे तोहार भाई , चाहे भौजाई क भाई, बस गपागप, गपागप, घोंटना रोज टांग उठाय के "

उसका गाल सहलाते हुए इमरतिया ने समझा दिया।

" और आज रात को ही, अब कोहबर में तो हम ही पांच जने रहेंगे, बस हम हाथ गौड़ पकड़ लेंगे और इमरतिया आराम आराम से एकदम चिक्क्न "

"

मुन्ना बहू बोली,

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शीला, बुच्ची की सहेली तो नहीं घबड़ायी, खिलखलाती रही

लेकिन बुच्ची के मन में धकधक हो रहा था कहीं सच में तो नहीं, और सच में मुन्ना बहू की पकड़ एकदम सँडसी ऐसी है, एक अबार होली में पकड़ ली थी, बाएं हाथ से अपने दोनों हाथ की कलाई और लाख कोशिश कर के भी नहीं छूट रहा था। और कोहबर में रात में तो बस वही पांच जन रहेंगे, उसने मंजू भाभी की ओर देखा लेकिन मंजू भाभी जोर से मुस्करायी, और घबड़ायी बुच्ची को और चिढ़ाते इमरतिया को हड़काया,

" अरे खाली झँटिया साफ़ करने से का होगा, चुनमुनिया में अच्छी तरह से तेल चुपड़ चुपड़ के लगाना, अपनी ननदों क। बियाह शादी क घर है, कल कउनो तोहरे देवर क मन डोल जाये, पैंट टाइट हो जाए, तो लौंडे तेल वेल नहीं देखते, सीधे,

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और आगे की बात पूरी की, सुरजू की माई ने हँसते हुए,

" सीधे पेल देते हैं, सही कह रही हो, अपनी सुरक्षा खुद। इसलिए हम अभी कल ही पीली सरसों क अपने खेत क २० सेर कडुआ तेल पेरवाय क मंगाए हैं, कुछ तोहरे नयी देवरानी आएँगी उनके लिए और बाकी "

" हम लोगों की ननद के लिए " हँसते हुए मंजू भाभी ने बात पूरी की। मंजू भाभी, लगती तो बहू थीं लेकिन थीं एकदम सहेली की तरह खुले मजाक अपनी सास से।

" अरे हम लोगन को ननद को कउनो परेशानी नहीं होगी, आप देख लीजियेगा, हमरे और इमरतिया अस भौजाई के रहते, तोहरे सामने आज से कोहबर में ये दोनों क बुरिया हम फैलाइब और इमरतिया, बूँद बूँद कर के पूरे पाव भर कडुआ तेल पियाय देगी, बुर रानी के। चाहे हमरे देवर चढ़े चाहे हमरे भाई, चाहे टांग उठाय के लें चाहे निहुरा के, थूक लगाने की भी जरूरत नहीं, सटासट जाएगा। "मुन्ना बहू बोली,

छत पर अब सुरजू की माई के आल्वा सिर्फ वही पांच औरतें लड़कियां बची थी जिनके जिम्मे कोहबर रखाना था, बुच्ची,शीला, इमरतिया , मुन्ना बहू और मंजू भाभी।

इस छेड़छाड़ में अब सुरजू की माई भी शामिल थी हाँ वो थोड़ा कभी लड़कियों की ओर हो जाती तो बुच्ची का हौसला बढ़ातीं,

बुच्ची का गाल सहलातीं, वो दुलार से बोलीं, " हमरे बुच्ची का तू लोग का समझत हो " फिर बुच्ची से कहा " अरे बर्फी पेड़ा अस मीठ मीठ भाभी चाही, भौजी क दुआर छेंकने क नेग चाही तो बस १०-१२ दिन एकदम कोहबर क रखवारी में भौजी लोगो की बात चुपचाप, बिना दिमाग लगाये मानना चाहिए फिर फायदा ही फायदा "

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मुन्ना बहू, इमरतिया से भी एक हाथ आगे थी, बोली बुच्ची से, " और पहली बात भौजी लोगन की, कोहबर रखवाई में दूल्हा से चुदवाय ला, हमार देवर पक्का पहलवान है, "

" और पहले अपने भैया से चुदवावा फिर हम लोगन क भैया से " मंजू भाभी बोली और उस समय मंजू और बुच्ची दोनों के मन में रामपुर वाली भाभी के भाई गप्पू की शकल थी, जिस तरह से नैन मटक्का कर रहा था, बुच्ची ने उसके पैंट पे सीधे ' वहीँ' पानी गिराया, और गप्पू की बहन , बुच्ची की सहेली और रामपुर वाली भाभी की बहन चुनिया ने अपने भाई को बुच्ची का दुप्पटा छीन के पकड़ा दिया,

पर फाइनल फैसला सुरजू की माई ने सुना दिया,

" हमरे बुच्ची को समझती क्या हो, अरे यह गाँव का कुल लड़की भाई चोद हैं तो यह कैसे अलग होगी "

और मंजू भाभी ने बात और साफ़ की, " लड़कियां सब भाई चोद और लड़के सब बहनचोद "

" एकदम तो तोहार देवर भी तो इसी गाँव क पानी पिए हैं और बुच्ची क माई ( बुच्ची उनके बुआ की लड़की थी तो बुच्ची की माई उनकी बुआ , सुरजू के माई की ननद लगी, तो गरियाने का जबरदस्त रिश्ता ) तो हमरे आने के पहले से गाँव में कोई से पूछ लो, झांट आने के पहले से दो चार लंड रोज, और बुच्ची की उमर तक आने तक तो जबतक दो चार घोंट न लें तो नाश्ता नहीं करती थीं , मुझसे खुद कहती थीं , भौजी वो भी तो मुंह है भले बिना दांत का हो , तो बुच्ची सबका मन रखेगी लेकिन चलो अब रात हो गयी है, काम शरू करो, कल से गाना शुरू।"

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और थोड़ी देर में छत खाली हो गयी, शीला और बुच्ची बिस्तर लाने और मंजू भाभी को इमरतिया ने कुछ काम बता दिया।

थोड़ी देर में जब इमरतिया दो बड़े कटोरे में जब बुकवा ले के लौटी तो ऊपर छत पे खाली मुन्ना बहू थी , इमरतिया के हाथ में कटोरे भर बुकवा के साथ एक खाली कुल्हड़ भी था, उसे मुन्ना बहू को दिखा के मुस्कराती वो सूरजु की कोठरी में घुसी और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

मुन्ना बहू मुस्करा के अपना आँचल संभालते बोली, " बुच्ची'

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" हाँ, शीरा" इमरतिया दरवाजे बंद करने के पहले आंख मार के मुस्कराती बोली।

बुकवा ले के आती इमरतिया के आँख के सामने सिर्फ एक नजारा बार बार घूम रहा था,

अखाड़े में जब सूरजु के लंगोट बांधते समय उसने बँसवाड़ी के पीछे से एकदम भोर भिन्सारे, देखा था, नाग नहीं नाग राज, जैसे संपेरा पुचकार के नाग को पिटारी में बंद कर रहा हो, एकदम वैसे ही लंगोट में, लम्बा मोटा और सबसे बड़ी खूब कड़ा, जितना और मर्दों का चूस चास के खड़ा करने पे नहीं होता, उससे बहुत ज्यादा, बित्ते भर का तो होगा।

उससे पहले ऐसा नहीं इमरतिया ने नहीं देखा था न हीं घोंटा था, एक से एक, अपने मरद के अलावा भी, लेकिन ये तो बहुत ही जबरदंग, जिस स्साली को मिलेगा, किस्मत बन जायेगी। एक बार भी मिल जाए न तो दूध पिला पिला के अपनी कटोरी का इस सांप को पक्का पालतू बना लेंगी।

लेकिन, लेकिन जरूरी है इस स्साले की सोच बदलना, पता नहीं कहाँ से अखाड़े और ब्रम्हचारी, अरे अब तो, दस दिन में इतनी सुंदर मिठाई मिलने वाली है। दस दिन में इसे न सिर्फ सब गुन ढंग सिखाना होगा, बल्कि पक्का चूत का भूत बना देना होगा, नंबरी चुदक्क्ड़, जो भी औरत को देखो सीधे उसकी चूँची देखे, उसकी चूत के बारे में सोचे, ये मन में आये की स्साली चोदने में कितना मजा देगी, बहन महतारी इसकी लाज झिझक, सब इसके, आखिर कुछ सोच के इनकी महतारी ने इमरतिया के हवाले किया होगा अपने बबुआ को।

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में भाग १०३ इमरतिया पृष्ठ १०७६

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जोरू का गुलाम भाग २४८- पार्टी की तैयारी, सीनियर्स की पार्टी, पृष्ठ 1545

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फागुन के दिन चार, भाग ३९ काशी चाट भण्डार, रीत जासूस पृष्ठ ४२८

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भाग १०४, बुकवा ( उबटन ) और इमरतिया भौजी

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इमरतिया सोच रही थी .

'" लेकिन, लेकिन जरूरी है इस स्साले की सोच बदलना, पता नहीं कहाँ से अखाड़े और ब्रम्हचारी, अरे अब तो, दस दिन में इतनी सुंदर मिठाई मिलने वाली है। दस दिन में इसे न सिर्फ सब गुन ढंग सिखाना होगा, बल्कि पक्का चूत का भूत बना देना होगा, नंबरी चुदक्क्ड़, जो भी औरत को देखो सीधे उसकी चूँची देखे, उसकी चूत के बारे में सोचे, ये मन में आये की स्साली चोदने में कितना मजा देगी, बहन महतारी इसकी लाज झिझक, सब इसके, आखिर कुछ सोच के इनकी महतारी ने इमरतिया के हवाले किया होगा अपने बबुआ को।"

और उधर सुरुजू, सूरजबली सिंह भी उहापोह में,

अभी इमरतिया भौजी आ रही होंगी, एक तो उसको देख के वैसे ही और अब माई ने, और माई भी क्या क्या। क्या सच में वहां तीसरी टांग में, ....लेकिन भौजाइयों का कोई ठिकाना नहीं, ऐसे ऐसे मजाक करती हैं, बुच्ची के ले के उसके साथ और इमरतिया तो और उन सबसे आगे, फिर माई भी उसको चढाती रहती हैं और आज माई के सामने ही

और तभी इमरतिया दोनों हाथ में बुकवा क दो दो बड़े कटोरे ले के कमरे में और दो काम इमरतिया ने एक साथ किया। पहले तो दरवाजा बंद किया, बाकायदा सांकल लगा के और दूसरे अपनी साड़ी उतार दी।

कुल्हड़ उसी साड़ी के अंदर रख दिया।

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और सूरजु बाबू निहारते रह गए,

लालटेन की रौशनी में इमरतिया को, खूब गोरा मुखड़ा, काजल से भरी बड़ी बड़ी आँखे, रसीले पान से लाल होंठ , नाक में छोटी सी नथ, गहरी ठुड्डी और नीचे काला तिल जो न जाने कितनो के लिए काल बना था। पर उनकी साँस रुक रही थी, गदराये रसीले जोबन, जो भौजी ने चोली में कस के बाँध रखा था पर दोनों कबूतर उड़ने को बेचैन थे। और गहरी इतनी की गोराई, गोलाई सब साफ़ दिख रहा था , और चिकने पेट, पतली कमर पे गहरी नाभी, चांदी की करधन और पेटीकोट बस किसी तरह कूल्हे पे टिका था बस।

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" अरे साड़ी इसलिए उतार दिए की कुल बुकवा तेल सब लग जाता, और तुंहु देवर कपड़ा सब उतार के ये तौलिया लपेट ला " उनको दिखाते, ललचाते इमरतिया ने अपने गोरे पैरों में पायल झमकायी और कमरे में हजार घुंघरू बज गए।

अलगनी से एक छोटी सी तौलिया उतार के इमरतिया ने उन्हें पकड़ाई और एक चटाई जमीन पर बिछा दिया, " चलो लेटो "

सूरजु कुछ हिचक रहे थे पर कुछ नखड़े के साथ कुछ अधिकार के साथ, हलके से धक्के से इमरतिया ने उन्हें उसी चटाई पे, और दोनों बुकवा वाले कटोरे के साथ एक शीशी में कडुवा तेल ले के, पहले हाथ में तेल मल के,

" तोहार महतारी का कहें थी, मिठाई चाही तो दस बारह दिन चुप चाप भौजी क बात माना तभी मिलेगी। घबड़ा जिन, मैं रहूंगी एकदम परछाई की तरह तोहरे साथ, कउनो परेशानी नहीं होगी हमरे देवर को, मिलेगी मिठाई। खूब जम के भोग लगाना,... उहो समझे कौन गाँव में आयी हूँ , कौन मरद मिला है, जबरद्स्त, ....देह तोड़ के रख देना दुलहिनिया की पहली रात को ही। "

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सूरजु लेकिन एकटक इमरतिया को देख रहे थे, झुकने से इमरतिया की खुली खूब लो कट चोली की गहराई से जोबन अंदर तक दिख रहे थे , मन कर रहा था हाथ बढ़ा के छू ले।

लेकिन मरद की चोरी कभी औरत से छिपती है और इमरतिया ने रस लेते हुए झिड़क दिया,

" हे आँख बंद, नजरावा जिन, और तनी दोनों टांग फैला दो, अरे तोहसे जल्दी तो तोहार जउन मिठाई आएगी वो टांग फैला देगी, लौंडिया अस लजा रहे हो। अब लाज शरम क दिन गए, झिझक छोड़ा, मजा लेना शुरू करा, यहां तू इतना लजा रहे हो, वाहन तोहरी दुलहिनिया को उसकी भौजाई लोग टांग, फैलाना, टांग उठाना सिखा रही होंगी। अरे ओकरे गाँव क नाउनिया बता रही थी, बहुत सुन्नर, एकदम बारी कुँवारी, चंदा चकोरी, अरे बुच्ची से थोड़िके बड़ी है, साल दो साल मुश्किल से "
 
मालिश

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और इमरतिया ने पहले तलुवों में फिर पिंडलियों में मालिश करनी शुरू कर दी। सूरज सिंह को इतना आराम मिल रहा था की बस देह एकदम ढीली होनी शुरू हो गयी, न जाने कब की थकान, टांगो से निकलकर पिघलकर बहकर निकल रही थी।

इमरतिया की मालिश का जादू यही था। वैसे भी गाँव की नाउन,कहाईन की हाथ में बहुत ताकत होती है लेकिन इमरतिया पहले जिस को मालिश करती थी, पहले एकदम सहज कर देती थी, खूब आराम देती थी और उस समय कोई बातचीत भी नहीं, सिर्फ इमरतिया की उँगलियों का जादू।

हाँ बदमाशी शुरू होती थी जब वो उँगलियाँ घुटनो के ऊपर जांघ के आस पास पहुँचती थीं। फिर कभी सांप की तरह रेंगती, कभी बिच्छू की तरह टहलती रह रह के डंक मारतीं, लगता था बस अब खजाने के दरवाजे के पास पहुंची, तब पहुंची, लेकिन पास पहुँच के लौट आती थी और जब मालिश जिस की हो रही वो चूतड़ उचकाने लगती, सिसकने लगती तो कुछ देर तड़पाने के बाद अचानक बाज की तरह झपट्टा मार के गौरेया को दबोच लेती और फिर क्या रगड़ाई होती, जब तक दो तार की चाशनी नहीं निकलती, ....वो छोड़ती नहीं थी।

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और बड़की ठकुराइन, सूरजु की महतारी को इसी जादू से इमरतिया ने मुट्ठी में कर लिया था। इमरतिया के आये दो का तीसरा दिन हुआ की सूरज सिंह दरवाजे पे, " भौजी, माई बुलाई हैं "।

और वैसे भी और तो कोई घर में था नहीं तो इमरतिया मस्ती की भी सहेली और वैसे भी राजदार,

और आज वही मालिश का जादू,

आज इमरतिया की उँगलियों में एक नया नशा था, एक किशोर मर्द की जवान देह, जिसने कभी स्त्री सुख न भोगा हो और वो ताकत जिसके बारे में सोच सोच के गाँव भर की औरतों के कूँवो में पानी भर जाता हो, आज इस तरह इमरतिया के आगे बिछी,

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सुरजू की जाँघों पर इमरतिया की उँगलियाँ कभी फिसलतीं, कभी थिरकतीं, कभी सहम के ठिठकती, कभी पतुरिया की तरह नाचती, कभी हलके से जाँघों को दबा देतीं, कभी सहलाती हुयी, नाख़ून चुभा देती, और वो, वो बस इन्तजार कर रहा था, उसके कान में थोड़ी देर पहले की भौजी की बात गूज रही थी

अरे तिसरकी टांग में तो जरूर लगाउंगी अपने देवर के और रगड़ रगड़ के लगाउंगी जबतक शीरा न निकल जाए, कब भौजी तौलिया हटाएंगी,

" नहीं नहीं भौजी, तौलिया मत खोलिये, नहीं नहीं " उसके मुँह से निकल गया।

कौन भौजी कुंवारे देवर की बात मानती है और इमरतिया तो पक्की आदमखोर, उसने अपने लहुरे देवर को जोर से डपट दिया,

" चुप, भूल गए तोहार महतारी का बोली हैं। चुप चाप भौजाई क बात मानो। हमसे का लाज शर्म, हम तो परछाई की तरह अब जब तक दुल्हिन नहीं आ जाती तोहरे साथ, नहाये जाबा तो, कहीं जाबा अकेले नहीं जाना है, और हमार देवरानी आये जाए तो ओकरे आगे खोलबा की न , की वहां भी पर्दा में छुपाय के, अरे तौलिया खोल नहीं रही हूँ, खाली सरका रही हूँ,। तेल लग जायेगा तो साफ़ तो हमी को करना पड़ेगा

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और इमरतिया भौजी ने तौलिया सरका दिया,.... एकदम कमर तक,
 
फटा पोस्टर निकला हीरो,

खुला सुपाड़ा

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नहीं नहीं बित्ते भर का नहीं था, थोड़ा कम ही लग रहा था लेकिन अभी पूरा खड़ा भी नहीं था। मोटा खूब था, लेकिन भौजी ने कुछ देखा और गुस्से से आगबबूला,

" स्साले, अबे,..... एकदम ही बुरबक, कोई सिखाया भी नहीं, तोहरी बहिनी क बुर चोदो, बुच्ची बुरचोदी "

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और सूरजु की हिम्मत भी नहीं पड़ी की भौजी से पूछूं की क्या गड़बड़ हो गयी। बस उन्होंने सरसो के लेल की बोतल पकड़ के खोली , एक हाथ से थोड़ा सोया, थोड़ा जाएगा खूंटा पकड़ा और दूसरे हाथ से बोतल से कडुवा तेल, टप टप , टप टप, बूँद बूँद

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जैसे अखाड़े में उतरने से पहले पहलवान तेल पोत कर एकदम चपचप हो जाते हैं, जैसे मलखंभ को तेल पिलाया जाता है, बस एकदम उसी तरह वो मोटा मूसल तेल से डूबा, तेल छलक के बह रहा था, और फिर जब इमरतिया ने मुट्ठी में पकड़ा तो उसे अहसास हुआ की कितना मोटा है।

उसकी कलाई के बराबर तो होगा ही, मुश्किल से मुट्ठी में पकड़ में आ रहा था और कड़ा भी खूब, हाँ तेल से चुपड़े होने के बाद सटासट इमरतिया का हाथ चल रहा था, दो चार बार कस के मुठियाने के बाद उसने झटके से खींची और सुपाड़ा एकदम खुल गया,

खूब मोटा, एकदम गुस्साया जैसा, लाल, कड़ा मांसल, छोटे टमाटर जैसा, लंड से भी मोटा,

इमरतिया के मुंह में पानी भी आ गया और दहल भी गयी, इतना मोटा, इसे लेने में जनम की छिनार, जिस भोंसडे से चार पांच बच्चे निकल चुके होंगे उस भोसंडी वाली को भी पसीना छूट जाएगा और जो आ रही है तो तो एकदम कच्ची कोरी, बारी उम्र वाली,....

फिर इमरतिया के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आ गयी।

भेज रहे हैं महतारी बाप चुदवाने को तो चुदेगी, रोयेगी, चीखेगी, चूतड़ पटकेगी, महतारी क नाम ले के चिल्लायेगी, तो चिल्लाये, चुदवाने आएगी तो चोदी जायेगी और ह्च्चक के चोदी जायेगी, उसके खानदान वाले भी यद् करेंगे, बेटी को किस गाँव भेजा था, और इमरतिया की जिम्मेदारी है की अपने देवर को तैयार करे की, आनेवाली कितना भी चिचिचियाये , एक झटके में ये मोटा सुपाड़ा अंदर पेल दे,

और अपने चेहरे का भाव बदलते हुए, हड़काने वाले रूप में वो सूरजु पे चढ़ गयी,

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" एकदम बुरबक हो, दुल्हिन क घूंघट काहें, ओढ़ा के रखा था। बता दे रही हूँ ये सुपाड़ा अब हरदम खुला रहना चाहिए, नाही तो कल तोहरे महतारी के सामने खोल के देखब, अगर कहीं बंद मिला "

" नाही भौजी " महतारी के नाम पे सरजू की फटती थी, घबड़ा के वो बोला।

अब मुस्करा के इमरतिया ने पहले उसका गाल सहलाया और दुलराते उसके मोटे जबरदस्त सुपाड़े को अपनी तर्जनी से सहलाते बोली

" पागल, इसका ख्याल कर। असली खेल तो इसी का है, भाले की नोक है ये। बारह दिन बाद जब इम्तहान होगा मेरे देवर का न, तो बस इसी का दम देखना होगा। एकदम ही कसी होगी उसकी, दोनों फांके चिपकी, जैसी बुच्ची की हैं, एकदम वैसी।

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और उसको फैला के दरेररते, फाड़ते, फैलाते, एक धक्के में पूरा पेलना होगा। कल से दिन में चार बार तेल पिलाऊंगी इसको में और हदम खुला रखना "

ये कह के इमरतिया ने मोटे सुपाड़े को जरा सा दबाया और उसने अपनी इकलौती आँख, चियार दी।

बस बूँद बूँद सरसों का तेल, उसी छेद से होते हुए अंदर, सरसो के तेल की झार, चरपराहट, सरजू तिलमिला गए, लंड एकदम पत्थर का हो गया।

मस्ती से आँखे बंद हो गयी और अब क्या कोई ग्वालिन मथानी मथेगी, इमरतिया के दोनों हाथों के बीच जैसे सूरजु का वो खम्भा मथा जा रहा था। पहली बार कसी औरत का हाथ वहां पड़ा था और वो भी इमरतिया जैसी खेली खायी, और जिसके बारे में सोच सोच के सपने में कितनी बार सुरजू का पानी निकल चुका था। वो उ उ कर रहा था, कभी चूतड़ पटकता, कभी सिसक सिसक के, लेकिन इमरतिया ने रगड़ने मसलने की रफ़्तार कम नहीं की और पांच दस मिनट के बाद ही छोड़ा।

खूंटा अब एकदम पूरे जोश में था। एक बार मुट्ठी में कस के दबा के इमरतिया ने सरजू को छोड़ दिया और बुकवा ( उबटन ) के दोनों कटोरे लेकर उनके सिरहाने बैठ गयी और कंधे पर से होते हुए बुकवा लगाने लगी। और उसने वो बात छेड़ दी , जिसे करने में सुरजू को सबसे ज्यादा मजा आता था।
 
दंगल

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उसके दंगल जीतने की।

" बड़की ठकुराइन, तोहार माई कहत रहीं अबकी पंचमी को हमार देवर बहुत बड़ा दंगल जीते हैं, अरे पूरे गाँव जवार में, यहाँ तक की हमरे मायके में बड़ा हल्ला रहा, हम तो सबको बोले, की हमार लहुरा देवर हैं, एकदम ख़ास। " इमरतिया ने बाँहों पर बुकवा लगाते बात छेड़ी

,” कउनो तगड़ा पहलवान रहा का ? "

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" अरे भौजी तोहार और माई क आसीर्बाद,....वो ससुरा पूरे दस जिला में चैलेंज दिया था, तीन साल से पंचमी क दंगल वही जीतता था लेकिन अबकी तोहार लहुरा देवर भी तय कर लिए थे,..... तो हम पूरा तीन महीना तैयारी किये, ताकत तो थी ही उसमे लेकिन दांव पेंच कही पंजाब से सीख के आया था, और यहाँ के लोगों को अंदाज नहीं था, " सुरजू बोले।

" ताकत तो हमरे देवर में भी कोई से कम नहीं है लेकिन दांव पेंच कैसे, …जब दस जिला के पहलवान हार गए थे तो "

बाहों की मालिश करते इमरतिया बोली।

सूरजबली सिंह की बाँहों की मछलियां, ताकत देख रही थी वो और सोच रही थी की जब इन तगड़े हाथों से कच्ची कली की पतली नरम कलाइयां पकड़ के पूरी ताकत से अपना ये मोटा सुपाड़ा पेलेगा तो सच में चीख पूरे गाँव में तो सुनाई ही देगी, आनेवाली के मायके तक जायेगी।

सूरजबली सिंह मुस्कराये और बोले,

" भौजी, दांव पेंच और तोहार और माई का आसीर्बाद, एक तो वो जो जो पहलवान को वो हराये था तीन साल में उससे हम बात कर के सब पूछे, की कौन खास दांव हैं उसके, और हमरे गुरु जी, उनसे बात कर के, सब दांव की काट और फिर एक दो और अखाडा में जा के कुछ नयी नयी ट्रिक सीखे, एक जुडो वाले के पास भी, और फिर सब मिला के, …कुश्ती में ताकत के साथ साथ, दिमाग, हिम्मत और सबसे बड़ी बात ऐसा गुरु मिले जो कुल दांव जानता हो और सिखाये भी, और अगले के हर दांव की काट भी तो हामरे गुरु जी ने बहुतसाथ दिया .

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इमरतिया ने अब दूसरा दांव खेला, बुकवा लगाते हुए सुरजू के चेहरे पर वो झुकी, और चोली फाड़ते जोबन अब सुरजू के मुंह से बस इंच भर दूर रहे होंगे, खूंटा जोर से फड़कने लगा।

यही वो देखना चाहती थी, खूंटा लम्बा था, मोटा तो बहुत ही था, पहली बार लेने में तो उसका भी जाड़े में पसीना छूट जाएगा, कड़ा भी था एकदम टाइट,

लेकिन असली खेल था की कितनी देर तक कड़ा और खड़ा रह पाता है, जब खास तौर से न कोई उसे छू रहा हो न कोई सेक्स वाली बात हो रही हो, बुकवा लगाते दस मिनट हो गए थे लेकिन वो बांस अभी भी उसी तरह, कड़ा, खड़ा और फनफनाता

" तो हमर देवर कैसे उस ससुरे को " चौड़ी छाती पे बुकवा मलते इमरतिया ने पूछा

" अरे भौजी, तोहार देवर हई, तोहार, अपने गाँव क माई क नाक तो नहीं कटवानी थी न "

हँसते हुए सुरजू बोले, फिर समझाया

" तोहरे देवर को मालूम था की ताकत में वो हमसे बीस है तो हम शुरू में खाली बचते रहे, बस थोड़ी देर में वो थकने लगा, दूसरे हमको अंदाज लग गया की कौन कौन से दांव वो सोच के आया है। अब तक जितनी कुश्ती जीता था शुरू के पांच दस मिनट में हावी हो जाता था लेकिन अबकी दस पन्दरह मिनट तक तो अखाड़े में हम नचाये उसको, और जब वो थक गया, तो झुंझलाने लगा और बस, उसी क पोजीशन का फायदा उठा के और एक बार चित्त हो गया तो फिर उठने नहीं दिए "

सुरजू ने मुस्कराते हुए कहा।

इमरतिया अब तक जांघ पर बुकवा लगा रही थी और सोच रही थी जबरदस्त ताकत होगी इस के धक्के में , लेकिन देवर को छेड़ते बोली

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