भोर का वो सपना- सास का पूत और सास
यही तो था सपने में
अगले दिन सुबह ये छुटकी को ले के मेरे घर और एक दिन बाद लखनऊ और अब लखनऊ से आ रहे थे , थोड़ी ही देर में पहुँचने वाले थे
सपनों में सब कुछ क्रम से तो होता नहीं,
ये पलंग पर बंधे छने, आंख पे मोटी पट्टी बंधी, काली। मैंने इन्हे समझा रखा था, ' कच्ची कलियों की तो बहुत फाड़ा तूने, जवान फूलों का भी रस लिया, आज तुझे एक खूब रसीले भोसड़े का रस दिलवाऊंगी, है मेरी एक खास, लेकिन दो शर्त है, एक तो तुझे आँख पे पट्टी बंधवानी होगी, और दूसरे तो तुझे पहले ऊपर चढ़ के चोदेगी, पूरे दस मिनट अगर तुम झड़ गए तो समझ लेना, और अगर नहीं झड़े तो पलट के उन्हें पेल देना, लेकिन झड़ने के पहले उन्हें झाड़ना होगा। "
उनके ऐसे गब्बर मर्द के लिए तो ये कौन बड़ी बात थी, लेकिन सुन के वो छनक गए, बोले
" ले आओ भौंसड़ी वाली को, फाड़ के चीथड़े चीथड़े न कर दिया, पता चलेगा किसी मरद का लौंड़ा घोंट रही है। " और छनकने के बात ही थी, कच्ची से कच्ची कलियों को भी तीन बार झाड़ने के बाद ही झड़ते थे वो।
लेकिन मान गयी मैं अपनी सास को, बातचीत में तो बहुत सीखा था मैंने सब मर्दों के साथ वाले दांव पेंच, और मुझे भी घमंड था ऊपर चढ़ के चोदने में मेरा मुकाबला नहीं, इनको और नन्दोई जी के तो ऊपर कितनी बार, फिर नए नए देवरों के साथ भी, लेकिन जब मैंने सास को देखा तब मैं समझी घुड़सवारी के असली गुर। कैसे घोड़े को सहला के, फुसला के कब्जे में किया जाता है, फिर चैलेन्ज, और सास की कलाई में भी अपने बेटे से कम ताकत नहीं थी।
पहले तो ललचाया, सास ने मेरी इनकी कलाई पकड़ी दोनों और बस अपने दोनों निचले होंठों से इनके फनफनाये सुपाड़े को देर तक छुअति रहीं, सहलाती रहीं, जैसे बदमाश मरद होते हैं, सुपाड़े को रसीली भीगी फुद्दी की फांको पे रगड़ते रहते हैं, औरत को पागल करते रहे हैं पिघलाते रहते हैं लेकिन पेलते नहीं, जब तक औरत खुद चूतड़ न उचकाने लगे, सिसक के पागल न हो जाए, एकदम उसी तरह लेकिन औरतों के पास तो मर्दों से दस गुना ज्यादा हथियार होते हैं। सावन के झूले की तरह वो झोंटा मारती थीं, मजाल है की कमर जरा भी हिले लेकिन उनके बड़े बड़े कड़े जोबना मेरे मर्द की चौड़ी छाती से रगड़ जा रहे थे।
बस थोड़ी देर में उनसे नहीं रहा गया, नीचे से उन्होंने चूतड़ उछाल के धक्का मारा, मेरी सास से तो वो नहीं पार पा सकते थे लेकिन मैंने भी उन्हें कस के गरियाया,
" स्साले, तेरी माँ बहन का भोंसड़ा मारुं, क्या बोला था चुपचाप दस मिनट चुदवाने को, स्साले तेरी माँ का भोंसड़ा है क्या जो ऐसे नीचे से धक्का मार के घुस जाओगे "
वो बेचारे, जस के तस, लेकिन माँ का दिल, मेरी सास को दया आ गयी, जरा सी चीज के लिए बच्चे का मन, कहने को तो उनका चार चार बच्चो का निकाल चुका भोंसड़ा था, लेकिन मैं जानती थी उस गुफा की हालत, गुफा नहीं बिल थी, वो भी सांप और चूहे की नहीं, चींटी की। एकदम बढ़िया रखरखाव, कसरत के साथ बरसों से एक दो ऊँगली से ज्यादा उसमे घुसी नहीं थी, हाँ बेचारी कन्या रस से काम चलाती थीं , न अजाने कितने देने बाद प्रेमगली को आहार मिला था, तो मेरी सास ने अपने भोसड़े की दोनों फांको को ऊँगली से फैला के दुलरुवा बेटे के मोठे सुपाड़े को फंसा लिया और बस हलके हलके दबाने लगीं।
बेचारे नीचे से मचल रहे थे तड़प रहे थे और उनके ऊपर चढ़ी महतारी कभी कस के भींच के कभी ढील दे के , लेकिन अब मुझसे भी नहीं रहा गया, आखिर मरद तो मेरा ही न। मैंने अपनी सास से धीरे से कान में सिफारिश लगायी, " दे दीजिये न बेचारे को , तड़प रहे हैं "
और नीचे से सासू का बेटा सिसक रहा था, बेटे की तो आँखे बंद थी लेकिन माँ खूब मस्ती से देख रही थी, कभी उनको तो कभी मुझको जैसे सास मुझे अपनी बात याद दिला रही थीं, " देख तू बेकार में घबड़ा रही थी, मैं कह रही थी चढ़ के चोदूगी इसे, अरे तूने कह दिया बस अब हम दोनों मिल के इसे स्साले को पक्का मादरचोद बना देंगी "
और भोर का वो सपना लम्बा था, सिर्फ रात में बिस्तर पे ही नहीं
दिन दहाड़े रसोई में भी, जब कभी कोई भी आ जाता , ग्वालिन चाची, फुलवा की माई, पंडाइन भौजी
सास मेरी रसोई में झुकी हुयी चावल धो रही थी और मेरी नींद हलकी सी खुल गयी लेकिन मैंने कस के आँख मींच ली और सपना फिर गतांक से आगे चालू हो गया
ये आये और मैंने मुस्करा के एक बार देखा और बदमाशी से सास का साडी साया ऊपर उठा दिया, बस खेल चालू
मजा तो सास को भी बहुत आ रहा था लेकिन बनावटी गुस्से से बोलीं, " अरे बहू कम से कम रसोई में तो "
तबतक उनके बेटे ने गली के अंदर दाखिला ले लिया था , दोनों जोबन उसकी मुट्ठी में कस के
मैं कहीं और देख रही थी, इधर उधर और मुझे देसी घी वाला ही डिब्बा दिखा और हथेली पे उसे लुढ़काते हुए मैं बोली
" मेरी सास किसी से कम हैं क्या, जब चूतड़ मटकाते चलती हैं तो आदमी क्या गदहों का खड़ा हो जाता है और जित्ते लौंडो की नेकर सराक एक मारी होगी न, मेरी सास का पिछवाड़ा उससे भी टाइट है "
और सारा का सार हाथ का घी सास के गाँड़ के छेद पे, और जो थोड़ा बहुत निकल रहा था उसे भी अपनी ऊँगली में लपेट के अंदर तक, पहले एक ऊँगली और फिर उसपे चढ़ा के दूसरी ऊँगली और दो ऊँगली भी घी लगी होने पर भी मुश्किल से जा रही थी। लेकिन मेरा वाला तो गाँड़ मारने में एकदम उस्ताद, अपनी कच्ची कोरी दस में पढ़ने वाली साली की खाली थूक लगा के गाँड़ मार दी थी, तो मेरी सास तो
और जब प्रेम गली से खूंटा बाहर निकला तो बस हाथ में लगा सब घी लगा के मैंने कस कस के मुठियाया और उनके सुपाड़े को मेरी सास के पिछवाड़े, गोल छेद को चियार के सटा दिया, और बोली
" मार धक्का "
उधर सास के पिछवाड़े मेरे मरद का जोरदार धक्का पड़ा
जिसने मेरी नहीं छोड़ी, मेरी दसवें और नौवें में पढ़ने वाली बहनों का कोरा पिछवाड़ा नहीं छोड़ा, वो मेरी सास का पिछवाड़ा क्यों छोड़ता।
मैं समझ गयी थी, बस ये एक बार छुटकी को छोड़ के आ जाएँ, उसके बाद इनका पक्का मादरचोद बनना तय, और मेरी सास भी समझ गयी थी, लिखा कौन टार सकता था और वो सोच के मुस्करा रही थीं उनके किस्मत में मेरे मरद का गदहा छाप लिखा था।
लेकिन सपने में सब डिटेल तो होता भी नहीं, ये अगले दिन लखनऊ से नहीं आये, लेकिन ये अपनी किस्मत ऊपर से लिखवा के लाये थे , ससुराल वाली
बस से अपनी साली के साथ लखनऊ सुबह पहुंच तो गए, फिर पता चला की स्पोर्ट्स हॉस्टल में कुछ चक्कर हो गया है और वहां रहने की जगह पांच दिन बाद ही छुटकी को मिलेगी, इनके एक परिचित विधायक थे तो पहले एम् एल ए हॉस्टल में लेकिन जब उन को पता चला की इनके साथ इनकी साली भी है नाक की बात है तो उन्ही के दोस्त का एक होटल था हजरतगंज में ही बस वहीँ, तो पांच दिन ये होटल में अपनी साली के साथ, और सिर्फ साली ही नहीं, वो कैम्प में आयी लड़कियों से छुटकी की दोस्ती भी हुयी और पांच छह साली और मिल गयी,
और जिस ने अपनी बहन को नहीं छोड़ा वो साली बल्कि सालियों को छोड़ता,
छठवें दिन ये लौटे तो सब बताया लेकिन उससे पहले मेरी छोटी बहन ने भी बहुत कुछ बता दिया था, बस की बात भी। बस हंसती रही बोली , जीजू ने जब मुझे ट्रेन में नहीं छोड़ा हाथ बाँध के तो फिर बस में तो छोड़ने का सवाल ही नहीं था।
बताउंगी बताउंगी, छुटकी का सब किस्सा, लौट के आएगी ने कबड्डी से तो वो खुद ही क्या हुआ गीता के यहाँ, नैना के यहाँ और कबड्डी के कैमो में
लेकिन वो पांच दिन मेरे कैसे गुजरे मेरी सास के साथ बस थोड़े में उसकी भी कुछ बात
पति के साथ मन में घुसने का रास्ता तन से हो के जाता है इसलिए गौने की रात या सुहागरात और उसके बाद की तीन चार रातें बहुत इम्पोर्टेन्ट हैं और एक बार तन मन की गांठे खुल गयीं तो फिर तो दूध भात की तरह सब घुल मिला जाता है, कहाँ से पत्नी शुरू होती है और कहाँ से पति ये पता नहीं चलता,
लेकिन घर परिवार के बाकी लोगों के साथ, सास हो ननद हो, घुसने का रास्ता मन से है और एक बार मन मिल गए तो कई बार तन भी मिल जाते हैं
तन मन का यह द्व्न्द जितना जल्दी ख़तम हो उतना ही अच्छा है और मेरे और मेरी सास के साथ यही हुआ, उनके अकेलेपन का अहसास उनसे ज्यादा मुझे था, खास तौर से जब से में मायके से लौटी थी, उनकी बड़ी बहू और छोटी बेटी बड़े बेटे, गाँव के कितने बेटों बहुओं के साथ बंबई चली गयी थी और अब बस तीज त्यौहार में मेहमान की तरह, और मैंने अपनी सास को साफ़ बोल दिया था की मैं उन्हें छोड़ के कहीं नहीं जाने वाली अपने मायके तक नहीं।
और इन पांच दिनों में हम और नजदीक आ गए, देह में भी नेह में भी। पहले जब ये नहीं होते तो जिस सेज पर इनके रहने पर पहंचने की जल्दी लगी रहती थी वही नागिन की तरह डराती थी, सौतन की तरह काटती थी
लेकिन अब तो मेरी सेज, जब ये सास का पूत नहीं होता था तो सास के पूत की माँ के साथ, मेरी सास के साथ। कभी बात करते करते रात कट जाती तो कभी मस्ती करते करते, देह सुख के इतने मंतर मेरी सास ने मुझे सिखाये, पुरुषों से भी और औरतों से भी