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- Dec 5, 2013
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ट्रैन अपने टाइम पर चल पड़ी और हमारी यात्रा शुरू हो गयी . हमने अपनी सीट पर सामान रख कर कुछ देर आराम किया 200 कम दूर मंदिर था जिसमे से 50 कम बस से जाना था. हम दोपहर को अपने आखरी स्टेशन पर पहुँच गए उसके बाद ह्यूमेन बस पकड़ी और रत होने से पहले हम आखिरी पड़ाव पर पहुँच गए जहाँ से आगे पैदल यात्रा थी . मैंने एक होटल में कमरा ले लिया और खाना खा कर सुबह की यात्रा शुरू करने क लिए आराम से सो गए. मैं भगवन से यही प्रार्थना कर रहा था क माँ की मुराद पूरी हो और उनके मन को भी शांति मिले शायद माँ बनने का बाद मेरे प्रति उनका बर्ताव बदल भी सकता है मगर मैं यही चाहता था क उनकी मुराद पूरी हो
अब आगे -
अगली सुबह जल्दी उठ कर मैं और माँ तैयार हो गए होटल से नाश्ता किया और अपनी यात्रा पर निकल पड़े . ये यात्रा बहुत मुश्किल थी पहाड़ों में सीधी चढ़ाई थी . यात्रा में और भी बहुत से लोग थे ज्यादातर लोग फैमिलीज़ क साथ थे और रस्ते में कहीं कहीं यात्रियों क लिए लंगर भी लगे हुए थे यहाँ का मौसम ठंडा था और बदल भी थे रस्ते में एक तरफ नदी बह रही थी .
कुदरत क बहुत सरे नज़ारे यहाँ पर देखने को मिल रहे थे हर तरफ हरियाली थी मगर कहीं कहीं रास्ता इतना संकरा था क पाऊँ फिसला तो सीधा परलोक पहुँच जाये आदमी . सीधी चढ़ाई किसी को भी थका देने क लिए काफी थी . मैं तो कसरत करने से मजबूर कद काठी वाला था मुझे कोई खास फरक नहीं पद रहा था अपने बैग मैंने hi उठा रखे थे. मगर माँ तो कोमल थी बेचारी इतनी मुश्किल यात्रा वो कैसे कर रही थी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था.
सुबह से लेकर शाम तक चलते चलते माँ का बुरा हल हो गया था और अब उनसे पाऊँ उठाना भी मुश्किल हो रहा था मगर फिर भी मन में आस लिए वो लगातार बढ़ती जा रही थी . जब अँधेरा होने लगा तो मैंने रस्ते में आते रहत शिविर में एक तम्बू में हम दोनों क लिए रहने की व्यवस्था की .
माँ का बुरा हल हो चूका था हम आधे से ज्यादा रास्ता पर कर चुके थे. मैंने माँ क पाऊँ दबाये और उन्हें कुछ आराम मिला थकावट इतनी ज्यादा हो चुकी थी क बिस्तर पर पड़ते hi नींद आ गयी. सुबह उठ कर ह्यूमेन फिर से यात्रा शुरू कर दी कल क मुकाबले आज माँ थकी हुई थी और धीरे चल रही थी जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे मौसम और भी ठंडा होता जा रहा था देखते hi देखते बदल उमड़ आये और ऐसा लगने लगा क बारिश होगी .
दोपहर को हम दोनों मंदिर में पहुँच गए . माँ ने दर्शन किये और मन्नत मांगी पंडित जी से हमने पूजा भी करवाई और पंडित जी ने कहा ‘ जाओ देवी तुम्हारी मनोकामना ज़रूर पूरी होगी ‘
पंडित जी क मुँह से ऐसी बात सुन कर माँ तो जैसे फूली नहीं समां रही थी जैसे उनकी मन्नत अभी पूरी हो गयी हो. एक नयी उम्मीद एक नयी ख़ुशी उनके चहरे से झलक रही थी . मंदिर में दर्शन करने क बाद मैंने आराम करने का सोचा
अमित : माँ आज हम यहीं रुक जाते हैं आप भी थकी हुई हैं कल सुबह वापिस चलेंगे.
गौरी ममी : नहीं बीटा भगवन क दर्शन कर क मेरी साडी थकावट उतर गयी है अभी तो काफी टाइम पड़ा है अब तो रस्ते में सिर्फ ढलान है हम रत तक निचे पहुँच जायेंगे
अमित : मगर माँ बदल घिर आये हैं अगर बारिश आ गयी तो रस्ते में फस्स जायेंगे
मेरे कहने पर भी माँ नहीं मणि और मुझे उनकी बात माननी पड़ी . हम वापिस चल पड़े. माँ तो वापसी में मुझसे भी आगे निकल रही थी एक नया जोश आ गया था उनमे जैसे hi अँधेरा होने लगा बारिश शुरू हो गयी और देखते hi देखती बहुत तेज़ हो गयी.
बहुत सरे लोग बारिश क अनुमान से पहले hi रुक गए थे हम रस्ते में अकेले hi थे क बारिश ने हमें घेर लिया . बारिश इतनी तेज़ थी क अब आगे बढ़ना मुश्किल हो गया था. मैं और माँ पूरी तरह भीग गए थे. मैं सर छिपाने क लिए जगह ढूंढने लगा मगर मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं हो रहा था क हम कहाँ है और आगे यात्री शिविर कितनी दूर हैं. ऐसी हालत में आगे बाद पाना बहुत मुश्किल था .
बारिश क साथ साथ ठण्ड बहुत बाद गयी थी और अब हमारे शरीर कम्पनी लगे थे मुझे रस्ते से हैट कर पत्थर की दीवारों से बनाई गयी चार दीवारी नज़र आयी. मैं माँ को साथ लेकर उसके भीतर घुस गया. अंदर घास पड़ी थी कच्ची ज़मीन थी ऊपर कुछ लकड़ी और पत्थर की छोटी छोटी सलेटों से छत बानी हुई थी. जो भी था सर छुपाने क लिए काफी था.
अमित : मैंने कहा था न माँ रुक जाते हैं अब न आगे जा सकते हैं न पीछे जब तक बारिश नहीं थमती यहीं रुकना होगा.
मैं माँ से बात कर रहा था मगर माँ मेरी बात का जवाब नहीं दे रही थी . मैंने जब माँ की तरफ देखा तो वो कांप रही थी और उनको बेहोशी छाने लगी . मैं उनकी हालत देख कर घबरा गया
अमित : माँ क्या हुआ माँ आप ठीक तो हैं माँ मुझसे बात कीजिये .
माँ मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे रही थी मैंने जल्दी से अपने बैग साइड में रखे और माँ को नीचे घास पर लिटा दिया और उनके हाथ पाऊँ को घिसने लगा.
एक पल में hi ज़िन्दगी क्या से क्या हो जाती है कभी कभी लगता है सब ठीक है और अबले पल में सब कुछ तबाह हो जाता है.
मैंने अपने माता पिता को नहीं देखा था भगवन ने बचपन में hi मुझे अनाथ कर दिया था मगर गौरी ममी और विजय मां ने मुझे माँ बाप की कमी महसूस नहीं होने दी. अब जब सब कुछ ठीक चल रहा था कामिनी ममी भी अब मुझे प्यार करने लगी थी . दीपिका ममी कामिनी ममी पूजा भाभी मंजरी इन सब क साथ मैं अपनी ज़िन्दगी हंसी ख़ुशी गुज़र रहा था और अब मुझे फिर से अपने सर से माँ की ममता दूर होती नज़र आ रही थी
मैं लगातार माँ की हाथ पाऊँ की तालियों को घिस रहा था मगर माँ पर कोई असर नहीं हो रहा था . बारिश पूरे ज़ोरों पर थी और किसी तरह की कोई मदद का कोई चांस नहीं था माँ का शरीर कम्प रहा था और मेरा भी सर्दी से बुरा हल था मगर मुझे अपनी कोई परवाह नहीं थी
मेरी आँखों क सामने अँधेरा छाने लगा अगर कहीं माँ को कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा मैं क्या जवाब दूंगा बाबा को . मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क क्या करूँ मगर और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था .
मैंने सोचा माँ क गीले कपडे उतर कर दूसरे कपडे पहना देता हूँ वर्ण गीले कपड़ों में तो सर्दी और ज्यादा लगेगी. इस जगह पर रौशनी क लिए कुछ भी नहीं था और बहार पूरा अँधेरा हो चूका था मैंने मोबाइल से रौशनी करनी चाही मगर वो भी पानी में भीग कर बंद हो गया था. मैंने माँ क कपडे उतरने क लिए हाथ बढ़ाया मैंने माँ की साडी निकली . साडी साइड में रख कर मैंने माँ क पेटीकोट को खोलने क लिए जैसे hi नाड़े को खोलना चाहा तो मेरी उंगलियां माँ क जिस्म से टच हुई माँ की बॉडी बर्फ की तरह ठंडी हो गयी थी मैं और ज्यादा घबरा गया.
मैंने जल्दी से पेटीकोट का नाडा खोला और खींच कर उतर दिया माँ की पेंटी भी गीली थी इस लिए मैंने उसे भी उतर दिया. अब माँ क जिस्म पर ब्लाउज hi बचा था मैंने उसे भी उतर दिया . अब माँ क जिस्म को मैंने जल्दी से बैग उठाया और माँ क दूसरे कपडे निकलने चाहे तो देखा सब कुछ पूरी तरह से भीग चूका था .
अब तो मेरा दिमाग ख़राब हो गया अब मैं क्या करूँ उधर माँ बेहोश थी इधर हमारे कपडे भीग गए थे सर्दी से बचने का और कोई रास्ता नहीं दिखाई पद रहा था तभी स्कूल में मास्टर जी की सिखाई हुई बात यद् आ गयी क जब सर्दी से बचने का कोई रास्ता न हो तो शरीर को शरीर की hi गर्मी बचा सकती है . मगर एक बेटे क लिए माँ क साथ कैसे ऐसा किया जा सकता है.
मैं दुविधा में फस्स गया था अब उनकी जान बच्चों क लाज बच्चों . मेरे पास ज्यादा वक़्त नहीं था इस लिए मैंने माँ को हाथ जोड़ते हुए माफ़ी मांगी और अपने गीले कपडे उतर कर माँ क ऊपर लेट गया . माँ का जिस्म बर्फ हो चूका था मैं माँ क ऊपर लेट तो गया मगर सिर्फ लेटने से क्या होने वाला था .
आज मैं उस मोड़ पर था जहाँ मेरे न कुछ करने से मैं माँ को हमेशा क लिए खो सकता था और अगर करता हूँ तो मैं हमेशा क अपनी और माँ की नज़रों से गिर जाऊंगा . मैंने आगे बढ़ना hi ठीक समझा . मैंने माँ क जिस्म से अपना जिस्म रगड़ने लगा मगर फिर भी कोई हलचल नज़र नहीं आयी फिर मैंने माँ क दोनों दूध मसलने शुरू किये ये कोशिश भी कोई असर न दिखा सकीय फिर मैंने माँ की छूट को हाथों से रगड़ना शुरू कर दिया.
5 मिनट्स तक छूट को रगड़ने पर भी जब कोई असर नज़र न आया तो मुझे साडी उम्मीदें ख़तम होती नज़र आने लगी. फिर मैंने सारा कुछ एक साथ तरय किया अपने होंठो से माँ क होंठ चूसने लगा अपने हाथो से दोनों दूध मसलने लगा और अपना लैंड जो अभी सोया हुआ था माँ की छूट से रगड़ने लगा . माँ की छूट से लैंड रगड़ते हुए और दूध दबाते हुए मेरे लैंड में तनाव आने लगा . मेरी मेहनत से माँ को होश तो आया नहीं मगर उनका जिस्म अब पहले की तरह ठंडा नहीं था मुझे उम्मीद नज़र आने लगी
मेरा लैंड अब पूरा खड़ा हो चूका था मैंने लैंड का सूपड़ा छूट क मुँह में थोड़ा थोड़ा घुसाने लगा मुझे छूट में लैंड डालना सही नहीं लग रहा था मगर अब यही एक रास्ता था.
मैंने मन को मरते हुए अपना लैंड माँ की छूट में घुसाने क लिए दबाव बनाया छूट क मुकाबले लैंड मोटा था जिससे मुझे थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा और मेरा लैंड धीरे धीरे अंदर जाने लगा. करीब 6 इंच तक लैंड छूट में घुस गया अब आगे और ज़ोर लगाने की ज़रूरत थी . और किसी कंडीशन में लैंड छूट में घुसता तो अब तक जड़ तक घुसा कर धक्के मर रहा होता मगर यहाँ मेरे अंदर वासना लेस मात्र भी नहीं थी.
मैंने उतने लैंड को hi छूट में अंदर बहार करना शुरू कर दिया. मैं धीरे धीरे लैंड को छूट में अंदर बहार कर रहा था और साथ में माँ क दूध मसल रहा था . मेरे जिस्म में अब गर्मी आ चुकी थी और मैं अपने लैंड क रस्ते अपनी गर्मी माँ की छूट में दाल रहा था . थोड़ी देर में hi मेरी मेहनत रंग लेन लगी और माँ क जिस्म में हलचल महसूस हुई मगर अभी भी वो बेहोश थी .
मुझे उम्मीद की किरण नज़र एते hi मैंने लैंड की स्पीड बड़ा डी ताकि जल्दी से माँ की बॉडी में हीट आ जाये. मेरा ध्यान चुदाई की तरफ नहीं था इस लिए मेरा पानी अभी निकलने वाला नहीं था. मैं लगातार अपनी कमर चला रहा था मुझे अब लैंड छूट में आसानी से अत जाता महसूस होने लगा इसका मतलब था छूट में लैंड की जगह बन गयी थी और छूट में भी थोड़ा पानी आ गया था.
मैं जैसे जैसे माँ की छूट में धक्के मर रहा था वैसे वैसे माँ का जिस्म थोड़ा थोड़ा गरम होने लगा. मैं 15 मिनट्स से छूट में धक्के मरे जा रहा था इसी बीच छूट ने बेहोशी की हालत में भी पानी छोड़ दिया था . तकरीबन आधे घंटे तक माँ की छूट छिड़ने क बाद अब मेरा भी सबर टूट गया और मैंने आखिरी धक्के पूरे जोर से लगा दिए जिससे माँ का पूरा जिस्म हिल गया और मेरा पूरा लैंड भी जड़ तक छूट में घुस गया. मैं खुद को और रोक नहीं पाया और छूट क अंदर पूरा लैंड घुसा कर अपना पानी छोड़ दिया.
मैं पहले hi थक चूका था और अब इस चुदाई ने मुझे भी निढाल कर दिया मैं ऐसे hi माँ क ऊपर गिर गया . मैं पता नहीं कब तक माँ क ऊपर ऐसे पड़ा रहा लैंड वैसे hi छूट में सो गया था. मुझे जैसे hi थोड़ा होश आया मैंने फिर से माँ को चेक किया तो वो अभी भी वैसे hi थी . मैंने फिर से उनका जिस्म मसलने लगा और एक बार फिर से उनकी ऐसी hi कंडीशन में चुदाई करदी.
सुबह होने तक मैंने माँ क जिस्म को गर्मी देने क लिए उनके ऊपर से नहीं उतरा और 4 बार अपना पानी माँ की छूट में hi दाल दिया मगर लैंड बहार नहीं निकला और न hi पोजीशन बदली आखरी बार पानी छोड़ते वक़्त बहार अँधेरा काम होने लगा था मतलब दिन चढ़ने वाला था और मैं भी पूरा टूट कर थक चूका था . मैं ऐसे hi माँ पर गिर गया और पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी.
मेरी नींद झटके से खुली जब माँ ने मुझे अपने ऊपर से धक्का दिया. माँ को होश आ गया था मैं खुश होकर जैसे hi माँ क पास गया माँ ने लगातार मेरे मुँह पर थप्पड़ मरने शुरू कर दिए और तब तक मरती रही जब तक वो थक नहीं गयी और बाद में ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . मुझे माँ क थप्पड़ से दर्द नहीं हो रहा था मगर माँ क आंसुओं से मेरी आत्मा छलनी हो रही थी मुझे अब अपनी और माँ की कंडीशन का एहसास हुआ . हम दोनों hi नंगे थे बहार दिन निकल आया था .
हमारी ऐसी हालत हो चुकी थी क न माँ मेरी तरफ देख रही थी न मेरी हिम्मत हो रही थी कुछ भी कहने और करने की. मगर इस कंडीशन से बहार तो निकलना hi था. मैंने दिल पर पत्थर रख कर अपने कपडे पहने जो पूरी तरह सूखे तो नहीं थे पर अब पहनने तो थे hi . मेरा शरीर जैसे मेरी आत्मा पर बोझ सा बन गया था मगर माँ को वापिस घर तो लेकर जाना होगा चाहे बाद में खुदखुशी कर लूँ.
मैंने अपने कपडे पहनने क बाद माँ क कपडे उठाये और माँ को दिए मगर उन्होंने कोई भी रिस्पांस नहीं दिया
अमित : माँ ये कपडे पेहेन लो
गौरी ममी : मत कह मुझे अपनी गन्दी ज़ुबान से माँ तू मर क्यों नहीं गया मेरे साथ ऐसा करने से पहले
अमित : मैं मजबूर था माँ मैं कैसे तुमने अपनी आँखों क सामने मरने देता क्या जवाब देता मैं बाबा को कैसे मैं जवाब देता अपनी आप को क मैंने अपनी माँ को मरने दिया
गौरी ममी : अब कौन सा ज़िंदा हूँ मैं ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गयी. तुमने सरे रिश्ते एक बार में hi तोड़ दिए काश मुझे मर जाने दिया होता अब तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी है तू मुझे मार क्यों नहीं देता . मैं क्या मुँह दिखाउंगी जा कर क अपने बेटे क हाथों अपनी इज़्ज़त लुटवा कर आयी हूँ. आखिर आज तूने साबित कर hi दिया क तू मेरा बीटा नहीं है
अमित : माँ मैंने जो भी किया आपकी जान बचने क लिए किया है और मैंने हमेशा आपको अपनी माँ hi मन है आप चाहे जो भी कहें अगर आपको मुझसे इतनी hi नफरत हो रही है तो मैं अभी अपनी जान दे देता हूँ
गौरी ममी : तेरे जान देने से क्या मेरी इज़्ज़त वापिस आ जाएगी . नहीं मैं ये दाग अपनी आत्मा पर बर्दाश्त नहीं कर सकती मैं अभी जान दे दूंगी
अमित : अगर कोई जान देगा तो वो मैं हूँ मैंने hi पाप किया है आप दोषी नहीं हैं
माँ ने जल्दी से अपने कपडे पहने और बहार भागने लगी मगर मैंने उन्हें पकड़ लिया
गौरी ममी : छोड़ दे मुझे पापी दूर रख अपने गंदे हाथ मुझ से
अमित : आप चाहे मुझे गलियां दो चाहे मुझे मारो मगर आपको आपके सुहाग का वास्ता आप अपनी जान नहीं देंगी. आप पहले घर चलिए मैं आपको सही सलामत घर पहुंचा दूँ उसके बाद ये मनहूस चेहरा कभी आपको नज़र नहीं आएगा
सुहाग की कसम देने से माँ रुक तो गयी मगर वो रोटी रही और मैंने बैग उठाये और दोनों चुप चाप वापिस चल पड़े.
कल और आज में ज़िन्दगी कितनी बदल गयी थी कल माँ कितनी खुश थी और हम ख़ुशी ख़ुशी वापिस जा रहे थे मगर आज ऐसा लग रहा था क अब ज़िन्दगी में कुछ बाकि नहीं रहा.
हम दोनों चुप चाप चलते हुए दोपहर तक निचे उतर आये और बिना वक़्त गंवाए बस पकड़ ली. बस क बाद ट्रैन पकड़ी और अगले दिन तक हम घर पहुँच गए
ट्रैन अपने टाइम पर चल पड़ी और हमारी यात्रा शुरू हो गयी . हमने अपनी सीट पर सामान रख कर कुछ देर आराम किया 200 कम दूर मंदिर था जिसमे से 50 कम बस से जाना था. हम दोपहर को अपने आखरी स्टेशन पर पहुँच गए उसके बाद ह्यूमेन बस पकड़ी और रत होने से पहले हम आखिरी पड़ाव पर पहुँच गए जहाँ से आगे पैदल यात्रा थी . मैंने एक होटल में कमरा ले लिया और खाना खा कर सुबह की यात्रा शुरू करने क लिए आराम से सो गए. मैं भगवन से यही प्रार्थना कर रहा था क माँ की मुराद पूरी हो और उनके मन को भी शांति मिले शायद माँ बनने का बाद मेरे प्रति उनका बर्ताव बदल भी सकता है मगर मैं यही चाहता था क उनकी मुराद पूरी हो
अब आगे -
अगली सुबह जल्दी उठ कर मैं और माँ तैयार हो गए होटल से नाश्ता किया और अपनी यात्रा पर निकल पड़े . ये यात्रा बहुत मुश्किल थी पहाड़ों में सीधी चढ़ाई थी . यात्रा में और भी बहुत से लोग थे ज्यादातर लोग फैमिलीज़ क साथ थे और रस्ते में कहीं कहीं यात्रियों क लिए लंगर भी लगे हुए थे यहाँ का मौसम ठंडा था और बदल भी थे रस्ते में एक तरफ नदी बह रही थी .
कुदरत क बहुत सरे नज़ारे यहाँ पर देखने को मिल रहे थे हर तरफ हरियाली थी मगर कहीं कहीं रास्ता इतना संकरा था क पाऊँ फिसला तो सीधा परलोक पहुँच जाये आदमी . सीधी चढ़ाई किसी को भी थका देने क लिए काफी थी . मैं तो कसरत करने से मजबूर कद काठी वाला था मुझे कोई खास फरक नहीं पद रहा था अपने बैग मैंने hi उठा रखे थे. मगर माँ तो कोमल थी बेचारी इतनी मुश्किल यात्रा वो कैसे कर रही थी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था.
सुबह से लेकर शाम तक चलते चलते माँ का बुरा हल हो गया था और अब उनसे पाऊँ उठाना भी मुश्किल हो रहा था मगर फिर भी मन में आस लिए वो लगातार बढ़ती जा रही थी . जब अँधेरा होने लगा तो मैंने रस्ते में आते रहत शिविर में एक तम्बू में हम दोनों क लिए रहने की व्यवस्था की .
माँ का बुरा हल हो चूका था हम आधे से ज्यादा रास्ता पर कर चुके थे. मैंने माँ क पाऊँ दबाये और उन्हें कुछ आराम मिला थकावट इतनी ज्यादा हो चुकी थी क बिस्तर पर पड़ते hi नींद आ गयी. सुबह उठ कर ह्यूमेन फिर से यात्रा शुरू कर दी कल क मुकाबले आज माँ थकी हुई थी और धीरे चल रही थी जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे मौसम और भी ठंडा होता जा रहा था देखते hi देखते बदल उमड़ आये और ऐसा लगने लगा क बारिश होगी .
दोपहर को हम दोनों मंदिर में पहुँच गए . माँ ने दर्शन किये और मन्नत मांगी पंडित जी से हमने पूजा भी करवाई और पंडित जी ने कहा ‘ जाओ देवी तुम्हारी मनोकामना ज़रूर पूरी होगी ‘
पंडित जी क मुँह से ऐसी बात सुन कर माँ तो जैसे फूली नहीं समां रही थी जैसे उनकी मन्नत अभी पूरी हो गयी हो. एक नयी उम्मीद एक नयी ख़ुशी उनके चहरे से झलक रही थी . मंदिर में दर्शन करने क बाद मैंने आराम करने का सोचा
अमित : माँ आज हम यहीं रुक जाते हैं आप भी थकी हुई हैं कल सुबह वापिस चलेंगे.
गौरी ममी : नहीं बीटा भगवन क दर्शन कर क मेरी साडी थकावट उतर गयी है अभी तो काफी टाइम पड़ा है अब तो रस्ते में सिर्फ ढलान है हम रत तक निचे पहुँच जायेंगे
अमित : मगर माँ बदल घिर आये हैं अगर बारिश आ गयी तो रस्ते में फस्स जायेंगे
मेरे कहने पर भी माँ नहीं मणि और मुझे उनकी बात माननी पड़ी . हम वापिस चल पड़े. माँ तो वापसी में मुझसे भी आगे निकल रही थी एक नया जोश आ गया था उनमे जैसे hi अँधेरा होने लगा बारिश शुरू हो गयी और देखते hi देखती बहुत तेज़ हो गयी.
बहुत सरे लोग बारिश क अनुमान से पहले hi रुक गए थे हम रस्ते में अकेले hi थे क बारिश ने हमें घेर लिया . बारिश इतनी तेज़ थी क अब आगे बढ़ना मुश्किल हो गया था. मैं और माँ पूरी तरह भीग गए थे. मैं सर छिपाने क लिए जगह ढूंढने लगा मगर मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं हो रहा था क हम कहाँ है और आगे यात्री शिविर कितनी दूर हैं. ऐसी हालत में आगे बाद पाना बहुत मुश्किल था .
बारिश क साथ साथ ठण्ड बहुत बाद गयी थी और अब हमारे शरीर कम्पनी लगे थे मुझे रस्ते से हैट कर पत्थर की दीवारों से बनाई गयी चार दीवारी नज़र आयी. मैं माँ को साथ लेकर उसके भीतर घुस गया. अंदर घास पड़ी थी कच्ची ज़मीन थी ऊपर कुछ लकड़ी और पत्थर की छोटी छोटी सलेटों से छत बानी हुई थी. जो भी था सर छुपाने क लिए काफी था.
अमित : मैंने कहा था न माँ रुक जाते हैं अब न आगे जा सकते हैं न पीछे जब तक बारिश नहीं थमती यहीं रुकना होगा.
मैं माँ से बात कर रहा था मगर माँ मेरी बात का जवाब नहीं दे रही थी . मैंने जब माँ की तरफ देखा तो वो कांप रही थी और उनको बेहोशी छाने लगी . मैं उनकी हालत देख कर घबरा गया
अमित : माँ क्या हुआ माँ आप ठीक तो हैं माँ मुझसे बात कीजिये .
माँ मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे रही थी मैंने जल्दी से अपने बैग साइड में रखे और माँ को नीचे घास पर लिटा दिया और उनके हाथ पाऊँ को घिसने लगा.
एक पल में hi ज़िन्दगी क्या से क्या हो जाती है कभी कभी लगता है सब ठीक है और अबले पल में सब कुछ तबाह हो जाता है.
मैंने अपने माता पिता को नहीं देखा था भगवन ने बचपन में hi मुझे अनाथ कर दिया था मगर गौरी ममी और विजय मां ने मुझे माँ बाप की कमी महसूस नहीं होने दी. अब जब सब कुछ ठीक चल रहा था कामिनी ममी भी अब मुझे प्यार करने लगी थी . दीपिका ममी कामिनी ममी पूजा भाभी मंजरी इन सब क साथ मैं अपनी ज़िन्दगी हंसी ख़ुशी गुज़र रहा था और अब मुझे फिर से अपने सर से माँ की ममता दूर होती नज़र आ रही थी
मैं लगातार माँ की हाथ पाऊँ की तालियों को घिस रहा था मगर माँ पर कोई असर नहीं हो रहा था . बारिश पूरे ज़ोरों पर थी और किसी तरह की कोई मदद का कोई चांस नहीं था माँ का शरीर कम्प रहा था और मेरा भी सर्दी से बुरा हल था मगर मुझे अपनी कोई परवाह नहीं थी
मेरी आँखों क सामने अँधेरा छाने लगा अगर कहीं माँ को कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा मैं क्या जवाब दूंगा बाबा को . मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क क्या करूँ मगर और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था .
मैंने सोचा माँ क गीले कपडे उतर कर दूसरे कपडे पहना देता हूँ वर्ण गीले कपड़ों में तो सर्दी और ज्यादा लगेगी. इस जगह पर रौशनी क लिए कुछ भी नहीं था और बहार पूरा अँधेरा हो चूका था मैंने मोबाइल से रौशनी करनी चाही मगर वो भी पानी में भीग कर बंद हो गया था. मैंने माँ क कपडे उतरने क लिए हाथ बढ़ाया मैंने माँ की साडी निकली . साडी साइड में रख कर मैंने माँ क पेटीकोट को खोलने क लिए जैसे hi नाड़े को खोलना चाहा तो मेरी उंगलियां माँ क जिस्म से टच हुई माँ की बॉडी बर्फ की तरह ठंडी हो गयी थी मैं और ज्यादा घबरा गया.
मैंने जल्दी से पेटीकोट का नाडा खोला और खींच कर उतर दिया माँ की पेंटी भी गीली थी इस लिए मैंने उसे भी उतर दिया. अब माँ क जिस्म पर ब्लाउज hi बचा था मैंने उसे भी उतर दिया . अब माँ क जिस्म को मैंने जल्दी से बैग उठाया और माँ क दूसरे कपडे निकलने चाहे तो देखा सब कुछ पूरी तरह से भीग चूका था .
अब तो मेरा दिमाग ख़राब हो गया अब मैं क्या करूँ उधर माँ बेहोश थी इधर हमारे कपडे भीग गए थे सर्दी से बचने का और कोई रास्ता नहीं दिखाई पद रहा था तभी स्कूल में मास्टर जी की सिखाई हुई बात यद् आ गयी क जब सर्दी से बचने का कोई रास्ता न हो तो शरीर को शरीर की hi गर्मी बचा सकती है . मगर एक बेटे क लिए माँ क साथ कैसे ऐसा किया जा सकता है.
मैं दुविधा में फस्स गया था अब उनकी जान बच्चों क लाज बच्चों . मेरे पास ज्यादा वक़्त नहीं था इस लिए मैंने माँ को हाथ जोड़ते हुए माफ़ी मांगी और अपने गीले कपडे उतर कर माँ क ऊपर लेट गया . माँ का जिस्म बर्फ हो चूका था मैं माँ क ऊपर लेट तो गया मगर सिर्फ लेटने से क्या होने वाला था .
आज मैं उस मोड़ पर था जहाँ मेरे न कुछ करने से मैं माँ को हमेशा क लिए खो सकता था और अगर करता हूँ तो मैं हमेशा क अपनी और माँ की नज़रों से गिर जाऊंगा . मैंने आगे बढ़ना hi ठीक समझा . मैंने माँ क जिस्म से अपना जिस्म रगड़ने लगा मगर फिर भी कोई हलचल नज़र नहीं आयी फिर मैंने माँ क दोनों दूध मसलने शुरू किये ये कोशिश भी कोई असर न दिखा सकीय फिर मैंने माँ की छूट को हाथों से रगड़ना शुरू कर दिया.
5 मिनट्स तक छूट को रगड़ने पर भी जब कोई असर नज़र न आया तो मुझे साडी उम्मीदें ख़तम होती नज़र आने लगी. फिर मैंने सारा कुछ एक साथ तरय किया अपने होंठो से माँ क होंठ चूसने लगा अपने हाथो से दोनों दूध मसलने लगा और अपना लैंड जो अभी सोया हुआ था माँ की छूट से रगड़ने लगा . माँ की छूट से लैंड रगड़ते हुए और दूध दबाते हुए मेरे लैंड में तनाव आने लगा . मेरी मेहनत से माँ को होश तो आया नहीं मगर उनका जिस्म अब पहले की तरह ठंडा नहीं था मुझे उम्मीद नज़र आने लगी
मेरा लैंड अब पूरा खड़ा हो चूका था मैंने लैंड का सूपड़ा छूट क मुँह में थोड़ा थोड़ा घुसाने लगा मुझे छूट में लैंड डालना सही नहीं लग रहा था मगर अब यही एक रास्ता था.
मैंने मन को मरते हुए अपना लैंड माँ की छूट में घुसाने क लिए दबाव बनाया छूट क मुकाबले लैंड मोटा था जिससे मुझे थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा और मेरा लैंड धीरे धीरे अंदर जाने लगा. करीब 6 इंच तक लैंड छूट में घुस गया अब आगे और ज़ोर लगाने की ज़रूरत थी . और किसी कंडीशन में लैंड छूट में घुसता तो अब तक जड़ तक घुसा कर धक्के मर रहा होता मगर यहाँ मेरे अंदर वासना लेस मात्र भी नहीं थी.
मैंने उतने लैंड को hi छूट में अंदर बहार करना शुरू कर दिया. मैं धीरे धीरे लैंड को छूट में अंदर बहार कर रहा था और साथ में माँ क दूध मसल रहा था . मेरे जिस्म में अब गर्मी आ चुकी थी और मैं अपने लैंड क रस्ते अपनी गर्मी माँ की छूट में दाल रहा था . थोड़ी देर में hi मेरी मेहनत रंग लेन लगी और माँ क जिस्म में हलचल महसूस हुई मगर अभी भी वो बेहोश थी .
मुझे उम्मीद की किरण नज़र एते hi मैंने लैंड की स्पीड बड़ा डी ताकि जल्दी से माँ की बॉडी में हीट आ जाये. मेरा ध्यान चुदाई की तरफ नहीं था इस लिए मेरा पानी अभी निकलने वाला नहीं था. मैं लगातार अपनी कमर चला रहा था मुझे अब लैंड छूट में आसानी से अत जाता महसूस होने लगा इसका मतलब था छूट में लैंड की जगह बन गयी थी और छूट में भी थोड़ा पानी आ गया था.
मैं जैसे जैसे माँ की छूट में धक्के मर रहा था वैसे वैसे माँ का जिस्म थोड़ा थोड़ा गरम होने लगा. मैं 15 मिनट्स से छूट में धक्के मरे जा रहा था इसी बीच छूट ने बेहोशी की हालत में भी पानी छोड़ दिया था . तकरीबन आधे घंटे तक माँ की छूट छिड़ने क बाद अब मेरा भी सबर टूट गया और मैंने आखिरी धक्के पूरे जोर से लगा दिए जिससे माँ का पूरा जिस्म हिल गया और मेरा पूरा लैंड भी जड़ तक छूट में घुस गया. मैं खुद को और रोक नहीं पाया और छूट क अंदर पूरा लैंड घुसा कर अपना पानी छोड़ दिया.
मैं पहले hi थक चूका था और अब इस चुदाई ने मुझे भी निढाल कर दिया मैं ऐसे hi माँ क ऊपर गिर गया . मैं पता नहीं कब तक माँ क ऊपर ऐसे पड़ा रहा लैंड वैसे hi छूट में सो गया था. मुझे जैसे hi थोड़ा होश आया मैंने फिर से माँ को चेक किया तो वो अभी भी वैसे hi थी . मैंने फिर से उनका जिस्म मसलने लगा और एक बार फिर से उनकी ऐसी hi कंडीशन में चुदाई करदी.
सुबह होने तक मैंने माँ क जिस्म को गर्मी देने क लिए उनके ऊपर से नहीं उतरा और 4 बार अपना पानी माँ की छूट में hi दाल दिया मगर लैंड बहार नहीं निकला और न hi पोजीशन बदली आखरी बार पानी छोड़ते वक़्त बहार अँधेरा काम होने लगा था मतलब दिन चढ़ने वाला था और मैं भी पूरा टूट कर थक चूका था . मैं ऐसे hi माँ पर गिर गया और पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी.
मेरी नींद झटके से खुली जब माँ ने मुझे अपने ऊपर से धक्का दिया. माँ को होश आ गया था मैं खुश होकर जैसे hi माँ क पास गया माँ ने लगातार मेरे मुँह पर थप्पड़ मरने शुरू कर दिए और तब तक मरती रही जब तक वो थक नहीं गयी और बाद में ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . मुझे माँ क थप्पड़ से दर्द नहीं हो रहा था मगर माँ क आंसुओं से मेरी आत्मा छलनी हो रही थी मुझे अब अपनी और माँ की कंडीशन का एहसास हुआ . हम दोनों hi नंगे थे बहार दिन निकल आया था .
हमारी ऐसी हालत हो चुकी थी क न माँ मेरी तरफ देख रही थी न मेरी हिम्मत हो रही थी कुछ भी कहने और करने की. मगर इस कंडीशन से बहार तो निकलना hi था. मैंने दिल पर पत्थर रख कर अपने कपडे पहने जो पूरी तरह सूखे तो नहीं थे पर अब पहनने तो थे hi . मेरा शरीर जैसे मेरी आत्मा पर बोझ सा बन गया था मगर माँ को वापिस घर तो लेकर जाना होगा चाहे बाद में खुदखुशी कर लूँ.
मैंने अपने कपडे पहनने क बाद माँ क कपडे उठाये और माँ को दिए मगर उन्होंने कोई भी रिस्पांस नहीं दिया
अमित : माँ ये कपडे पेहेन लो
गौरी ममी : मत कह मुझे अपनी गन्दी ज़ुबान से माँ तू मर क्यों नहीं गया मेरे साथ ऐसा करने से पहले
अमित : मैं मजबूर था माँ मैं कैसे तुमने अपनी आँखों क सामने मरने देता क्या जवाब देता मैं बाबा को कैसे मैं जवाब देता अपनी आप को क मैंने अपनी माँ को मरने दिया
गौरी ममी : अब कौन सा ज़िंदा हूँ मैं ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गयी. तुमने सरे रिश्ते एक बार में hi तोड़ दिए काश मुझे मर जाने दिया होता अब तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी है तू मुझे मार क्यों नहीं देता . मैं क्या मुँह दिखाउंगी जा कर क अपने बेटे क हाथों अपनी इज़्ज़त लुटवा कर आयी हूँ. आखिर आज तूने साबित कर hi दिया क तू मेरा बीटा नहीं है
अमित : माँ मैंने जो भी किया आपकी जान बचने क लिए किया है और मैंने हमेशा आपको अपनी माँ hi मन है आप चाहे जो भी कहें अगर आपको मुझसे इतनी hi नफरत हो रही है तो मैं अभी अपनी जान दे देता हूँ
गौरी ममी : तेरे जान देने से क्या मेरी इज़्ज़त वापिस आ जाएगी . नहीं मैं ये दाग अपनी आत्मा पर बर्दाश्त नहीं कर सकती मैं अभी जान दे दूंगी
अमित : अगर कोई जान देगा तो वो मैं हूँ मैंने hi पाप किया है आप दोषी नहीं हैं
माँ ने जल्दी से अपने कपडे पहने और बहार भागने लगी मगर मैंने उन्हें पकड़ लिया
गौरी ममी : छोड़ दे मुझे पापी दूर रख अपने गंदे हाथ मुझ से
अमित : आप चाहे मुझे गलियां दो चाहे मुझे मारो मगर आपको आपके सुहाग का वास्ता आप अपनी जान नहीं देंगी. आप पहले घर चलिए मैं आपको सही सलामत घर पहुंचा दूँ उसके बाद ये मनहूस चेहरा कभी आपको नज़र नहीं आएगा
सुहाग की कसम देने से माँ रुक तो गयी मगर वो रोटी रही और मैंने बैग उठाये और दोनों चुप चाप वापिस चल पड़े.
कल और आज में ज़िन्दगी कितनी बदल गयी थी कल माँ कितनी खुश थी और हम ख़ुशी ख़ुशी वापिस जा रहे थे मगर आज ऐसा लग रहा था क अब ज़िन्दगी में कुछ बाकि नहीं रहा.
हम दोनों चुप चाप चलते हुए दोपहर तक निचे उतर आये और बिना वक़्त गंवाए बस पकड़ ली. बस क बाद ट्रैन पकड़ी और अगले दिन तक हम घर पहुँच गए