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यह देख, तरुण को बहोत बुरा लगा.. पर वो मौसम की स्थिति को समझ रहा था.. एक वक्त था जब मौसम बेहद लाचार और निःसहाय थी.. दिन मे पचास बार कॉल कर रही थी पर वो जवाब नहीं दे रहा था.. लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं थी.. मौसम के पास विशाल था.. और अब तो तरुण भी उस कतार मे खड़ा नजर आ रहा था
बगल मे मुंह फेरकर खड़ी मौसम के जवान पुष्ट स्तनों पर उसकी काले घने बालों वाली चोटी ऐसे लग रही थी.. जैसे सांप दूध पी रहा हो.. बेहद आकर्षक अंगों की मलेका मौसम की भरी हुई छाती.. इस तंग वातावरण मे.. सांसें लेते हुए ऊपर नीचे हो रही थी..
मौसम से और बर्दाश्त न हुआ और वो उठकर कमरे से बाहर चली गई.. उसके पीछे पीछे फाल्गुनी और कविता भी उठकर बाहर निकलने गई.. छोटे से दरवाजे से साथ में बाहर निकलते हुए फाल्गुनी के स्तन कविता की पीठ पर रगड़ गए.. कविता और फाल्गुनी की नजरें एक हुई.. फाल्गुनी के स्तनों को देखकर कविता सोचने लगी.. पापा ने कितनी बार इन स्तनों को रगड़ा होगा.. !!!
बाहर आकर कविता ने मौसम से कहा "ऐसे बाहर क्यों आ गई?? उन लोगों को बुरा लगेगा.. !!"
फाल्गुनी: "देख मौसम, विशाल से तेरी सगाई की बात चल रही है, अभी सगाई हुई नहीं है.. तू चाहें तो अब भी तरुण के साथ बात बन सकती है.. शायद कुदरत को भी यही मंजूर होगा.. वरना ऐसा संयोग कैसे होता... !!! हमारा यहाँ फोरम की तबीयत देखने आना.. और उनका मिलना.. सिर्फ कहानियों मे ही ऐसा मुमकिन हो सकता है.. सोच ले मौसम.. तरुण के लिए तू कितनी पागल थी ये मैं जानती हूँ.. अब निर्णय तुझे करना है"
मौसम ने असमंजस भारी नज़रों से फाल्गुनी की ओर देखा.. उसकी आँखों मे हजार सवाल नजर उमड़ रहे थे.. पर उन सवालों को कैसे पेश करना.. वह उसे समझ नहीं आ रहा था
जीवन कभी कभी ऐसे ऐसे मोड पर लाकर खड़ा कर देता है, की अच्छे से अच्छे आदमी की बोलती बंद हो जाती है..
कविता: "मौसम, तू अंदर चल और अच्छे से पेश आना.. वरना उन लोगों को बुरा लग जाएगा"
उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए अंदर ले गई कविता
रमिलाबहन अपनी बेटी की दुविधा को भलीभाँति समझ रही थी.. अभी कुछ दिनों पहले ही वो विशाल के घर गई थी उनके बेटे के हाथ मांगने.. और अब यह नई स्थिति आ खड़ी हुई थी..!!
तरुण के पापा ने बात आगे बढ़ाई "बहन जी, मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ.. मौसम को मना करके हम लोगों ने बहोत बड़ी गलती कर दी थी.. मुझे मेरी गलती का एहसास हो रहा है.. तरुण और मौसम तो एक दूसरे को पहले से ही बेहद पसंद करते है.. कुछ कारणवश मुझे वह निर्णय लेना पड़ा था.. जिसका मुझे बहोत खेद है.. मैं अपने परिवार की ओर से हाथ जोड़कर माफी मांग रहा हूँ.. और विनती कर रहा हूँ की आप बीती बातों को भूल कर आप की बेटी का हाथ हमें दे दीजिए.. !!"
रमिलाबहन: "भाईसाहब, मुझे तो अब तक यही मालूम नहीं है की आप लोगों ने सगाई क्यों तोड़ दी थी.. !!"
तरुण: "आंटी, बीती बातें याद करने से क्या फायदा..!! जो हो गया सो हो गया..!!"
रमिलबहन: "ऐसे नहीं.. मुझे कारण तो पता होना ही चाहिए.. तभी मैं कुछ आगे के बारे मे सोचूँगी"
सब गंभीर हो गए.. सीधी-सादी रमिलबहन को किसी ने असली कारण बताया ही नहीं था.. ताकि उन्हें उनके स्वर्गस्थ पति की असलियत के बारे मे पता न चले..
पर तरुण के पापा ने बात को बखूबी संभाल लिया
तरुण के पापा: "असल मे ऐसा हुआ था की मेरे और सुबोधकांत के बीच कुछ व्यहवारिक बातों को लेकर कहा-सुनी हो गई थी और सुबोधकांत ने मेरा अपमान कर दिया था.. बात बहोत बिगड़ गई थी.. फिर तो ऐसा मौका ही नहीं मिला की कुछ संभल सकें.. जो भी हुआ उसमें तरुण और मौसम की कोई गलती नहीं थी.. जो कुछ भी हुआ था, हम बड़ों के बीच ही हुआ था, जिसका फल ईन बेचारे बच्चों को भुगतना पड़ा था"
रमिलाबहन काफी सरल प्रकृति की थी.. और उनके गले मे यह बात आसानी से उतर गई.. वो मौसम का हाथ पकड़कर एक तरफ ले गए
रमिलबहन: "बेटा, मैं समझ सकती हूँ की तू अभी क्या सोच रही है.. !! विशाल को तेरी ज़िंदगी मे आए हुए बस कुछ ही दिन तो हुए है..!! तेरी और तरुण की तो मंगनी तक हो गई थी.. शादी होना तय था.. !! याद कर.. उसके बगैर क्या हाल हो गया था तेरा.. !! तेरा प्यार वापिस लौटकर आया है और तू मुंह फेर रही है??"
मौसम: "और विशाल से क्या कहूँ?? की वो सब भूल जाएँ?? कोई खिलौना है क्या वो??"
रमिलाबहन चुप हो गई.. उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था.. मौसम की बात में भी दम था
रात के साढ़े बारह बज रहे थे.. तरुण के माता-पिता अब भी रमिलाबहन को समझाने की कोशिश कर रहे थे.. मौसम उस बातचीत का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी इसलिए वो फाल्गुनी का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई और कहा "चल हम फोरम का हाल जानकर आते है"
जनरल रूम मे प्रवेश करते वक्त मौसम ने देखा.. सो रही फोरम के सर पर विशाल हाथ फेर रहा था.. इन दोनों को देखकर, विशाल उठा और बाहर आया
विशाल: "आप लोग यहाँ? इस वक्त? सब ठीक तो है ना?"
मौसम: "हमारी पहचान के एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हुआ था.. अब ठीक है उसे.. फोरम की तबीयत कैसी है अब?"
विशाल: "अच्छी है.. रिकवर कर रही है"
मौसम: "सो तो है... तेरे जैसा केयर-टेकर हो तो फोरम की तबीयत तो सुधर ही जाएगी ना.. !! पूरी रात जागकर बेड के किनारे बैठने वाला, किस्मत से ही मिलता है"
विशाल समझ गया की मौसम क्या कहना चाहती थी.. !!
विशाल: "मौसम.. हम दोनों का रिश्ता होने वाला है उसका यह मतलब नहीं है की मैं अपने पुराने दोस्तों का ख्याल नहीं रख सकता.. तुझे पता तो है फोरम का हाल कैसा है.. !! उनके परिवार की मदद करने वाला कोई नहीं है.. और फोरम मेरी बेस्ट फ्रेंड है, यह तुम भी अच्छी तरह जानती हो.. !!"
विशाल की बात सुनकर मौसम ईर्ष्या से जल उठी, उसने कहा "सिर्फ फ्रेंड है या उससे भी ज्यादा कुछ है?"
सुनकर विशाल सहम गया.. पर बेझिझक उसने कहा "जिस तरह के हालात हुए है उसमें किसी की भी गलती नहीं है मौसम.. जिस दिन तुम्हारे घर वाले मेरे घर रिश्ता लेकर आए थे.. उसी दिन फोरम ने अपने प्यार का इजहार किया था.. तब तो मुझे पता भी नहीं था की तुम मुझे पसंद करती हो..!! मम्मी के समझाने के कारण मैंने तेरे लिए हाँ कह दी और फोरम से मुझे रिश्ता तोड़ना पड़ा.. यह बात सिर्फ मैं और फोरम ही जानते है.. और अब तुम दोनों..!!"
मौसम और फाल्गुनी स्तब्ध होकर विशाल को सुनते रहे
विशाल: "और एक बात, फोरम की बीमारी के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, यह जानने के बाद भी अगर मैं उसकी मदद न करूँ तो ऊपर वाला मुझे कभी माफ नहीं करेगा.. उस बेचारी ने तो बिना कुछ कहें अपने प्यार को तुझे सौंप दिया... मैं तो बस उसे इस सदमे से बाहर आने मे मदद कर रहा हूँ.. जरूरत के इस समय क्या तुम मुझे इतना भी नहीं करने दोगी??"
मौसम: "ऐसी बात नहीं है विशाल.. पर मुझे हमेशा यह डर लगा रहता है की कहीं तुम दोनों के बीच नजदीकियाँ न बढ़ जाएँ.. !!"
विशाल: "जब तक हम दोनों की सगाई नहीं हो जाती तब तक मुझे मेरी किसी भी बात की सफाई तुम्हें देने की जरूरत महसूस नहीं हो रही"
परोक्ष रूप से अल्टिमेटम दे दिया विशाल ने
बात को बिगड़ता देख फाल्गुनी समझ गई और मौसम को खींचकर विशाल से दूर ले गई
फाल्गुनी: "अभी इन सब बातों का वक्त नहीं है मौसम.. जो होगा देखा जाएगा.. तू चिंता मत कर"
वह दोनों चले गए.. और विशाल फोरम के पास वापिस लौटकर आया..
फोरम की आँखों से आँसू बह रहे थे.. उनकी बातें फोरम ने सुन ली थी..
फोरम के सर पर हाथ फेरते हुए विशाल ने कहा "तू क्यों रो रही है फोरम.. !! तेरे लिए मेरे दिल मे अब भी जज़्बात है.. जिसे जो मन मे आए वो सोच सकता है.. मेरा प्रॉब्लेम नहीं है.. रो मत फोरम.. प्लीज"
फोरम ने रोना बंद कर दिया.. उसके सर पर रखा विशाल का हाथ अपने गाल पर दबाते हुए फोरम ने कहा "विशाल.. अगर तुम मुझे अब भी उतना ही चाहते हो तो मौसम से सगाई कर लो.. मैं तुझे कुछ भी नहीं दे पाऊँगी.. प्लीज.. मौसम के पास पैसा है और वो खूबसूरत भी है"
विशाल ने अपना हाथ झटकाते हुए कहा "पागल हो गई है क्या.. !! कुछ पाने के इरादे से प्यार कभी होता है क्या.. !! "
फोरम का इलाज भले ही डॉक्टर कर रहे थे.. पर उसके मर्ज की असली दवाई तो विशाल ही था..विशाल की प्रेम-वाणी का फोरम पर जादुई असर हुआ..
विशाल: "किसी इंसान के लिए प्यार बेश-किंमती होता है तो किसी के लिए सिर्फ टाइम-पास करने का जरिया.. प्यार की कोई किंमत नहीं होती.. इसीलिए तो उसे अनमोल कहा जाता है.. ये "अनमोल" शब्द भी कितना गहरा होता है ना.. !! एक ही शब्द के दो विपरीत अर्थ होते है.. शायद दुनिया का इकलौता शब्द होगा ऐसा.. "
विशाल की यह फ़िलोसोफीकल बातें फोरम को समझ नहीं आ रही थी..
विशाल ने समझाते हुए कहा "देख फोरम.. जिसकी किंमत तय की न जा सके उसे अनमोल कहते है, राइट?"
फोरम: "जैसे कोई तराशा हुआ हीरा.. तेरे जैसा"
विशाल: "वैसे ही, जिसकी कोई किंमत न हो उसे भी अनमोल ही कहते है"
फोरम उदास होकर बोली "जैसे की मैं.. !!"
विशाल: "बकवास बंद कर यार.. मैं तुझसे प्यार करता हूँ यह हकीकत है.. और मौसम से मुझे शादी करनी होगी यह मेरी वास्तविकता है.. !!" इतना बोलते बोलते विशाल हांफ गया
यह सुनकर, एक गहरी सांस लेकर फोरम ने विशाल का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया.. बिछड़ने की क्षण पर ही इंसान अपने साथी का हाथ और मजबूती से पकड़ लेता है.. !!
विशाल: "मैं अपने घरवालों को अच्छी तरह जानता हूँ.. वो कभी तेरा स्वीकार अपनी बहु के रूप मे नहीं करेंगे.. इसलिए नहीं की तुझ मे कोई खोट है.. मगर इसलिए की मौसम के परिवार के पास बहोत पैसा है.. और इस वक्त, मेरे परिवार की सारी समस्याओं का उपाय, पैसा ही है..!! अगर तेरा हाथ पकड़ूँगा तो मेरी दोनों छोटी बहनों की शादी नहीं हो पाएगी.. पापा ने जो घर का लोन लिया है वो भी चुकाने का और कोई रास्ता नहीं है.. मम्मी के इलाज मे भी बहोत पैसा जा रहा है.. !!" विशाल की आँखों से भी आक्रोश के रूप मे आँसू बहने लगे
फोरम: "और मेरे दिल मे जो जज़्बात और भावनाएँ है, उनकी कोई किंमत नहीं??"
विशाल: "दिल के जज़्बात?? वहाँ देख.. वो कोने में डस्टबिन पड़ा है.. उसमें जाकर डाल दे.. वहीं जगह होती है दिल के जज़्बातों की"
एक दूसरे से लिपटकर बहोत देर तक रोयें दोनों.. प्रेमियों के पास रोने के अलावा और कोई स्वतंत्रता नहीं होती..!!
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मौसम और फाल्गुनी दोनों रीसेप्शन पर बनी सीट पर बैठी थी
मौसम: "यार फाल्गुनी, मुझे पक्का शक है की विशाल अब भी फोरम से प्यार करता है"
फाल्गुनी: "हो सकता है.. प्यार पानी जैसा होता है.. प्रेमरूपी ढलान जिस ओर होती है, उसी ओर बहने लगता है"
मौसम: "तो फिर विशाल का झुकाव मेरी तरह होना चाहिए ना.. !! मैं तो उससे बहोत प्यार करती हूँ"
फाल्गुनी: "मौसम, मन के मंदिर मे एक बार भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई.. तो हो गई..!! फिर दूसरी मूर्तियों की स्थापना मुख्य प्रतिमा के इर्दगिर्द ही होती है"
मौसम: "मैं समझ रही हूँ फाल्गुनी.. पर अब इस स्थति में, मैं क्या करूँ, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. !! तू ही कुछ रास्ता बता"
फाल्गुनी: "मौसम बेटा... !!" मौसम को इस तरह संबोधित करते ही पुरानी बातें याद आ गई.. मौसम ने चोंककर फाल्गुनी की ओर देखा
फाल्गुनी: "चोंक क्यों गई.. !! हमारा असली रिश्ता भूल गई क्या?"
मौसम: "ओह याद आ गया मम्मी.. !!"
फाल्गुनी ने हंसकर मौसम की छाती पर हाथ रखकर उसके स्तनों को हौले हौले दबाते हुए कहा "अब देखना ये है की तेरे यह सुंदर रसगुल्लों की चासनी कौन चूसेगा.. !! कौन दबाएगा.. कौन चखेगा.. किसके नसीब मे होंगे ये?"

मौसम: "अरे यार, इतने टेंशन मे भी तुझे ये सब सूझ रहा है.. !! यहाँ मेरी जान जा रही है और तुझे नीचे खुजली हो रही है?"
फाल्गुनी: "ऐसा नहीं है य आर.. जब किसी गंभीर समस्या का हल न दिखें.. तब सेक्स ही दिमाग को शांत और रिलेक्स करता है.. ऐसा तेरे पापा हमेशा कहते थे"
सुबोधकांत को याद करते हुए फाल्गुनी ने मजबूती से मौसम के स्तनों को दबा दिया..
देर रात हो गई थी.. रीसेप्शन के पास बने वैटिंग रूम मे फाल्गुनी और मौसम के अलावा कोई नहीं था.. मौसम चुपचाप फाल्गुनी के स्तन-मर्दन को महसूस करते हुए मौसम सोचने लगी.. तरुण की आँखों मे अब भी उसे अपने लिए प्यार नजर आ रहा था.. विशाल के लिए उसके मन मे प्यार उतना परिपक्व नहीं हुआ था.. पर विशाल उसे बेहद पसंद था.. दोनों की जोड़ी भी बड़ी ही जचती थी.. तरुण होनहार, गंभीर, आमिर और चार्टर्ड अकाउन्टन्ट था.. जब की विशाल बिन-अनुभवी, थोड़ा सा दिलफेंक और मध्यम परिवार से था.. देखने मे तरुण के मुकाबले विशाल हेंडसम था.. अब क्या करूँ? कीसे पसंद करूँ?
फाल्गुनी मौसम के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके उरोजों के ब्रा के ऊपर से मसल रही थी.. मौसम को अपने करीब खींचकर उसके गुलाबी अधरों को चूमते हुए फाल्गुनी खुद भी गरम हो रही थी और मौसम को भी उत्तेजित कर रही थी.. मौसम ने अपना एक हाथ फाल्गुनी के स्कर्ट के अंदर डाल दिया था और पेन्टी के ऊपर से वो उसके गीले होंठों को महसूस कर रही थी.. तो उसका दूसरा हाथ टॉप के ऊपर से ही फाल्गुनी की निप्पल को ढूंढकर मसल रहा था..

रात के सन्नाटे मे वहाँ किसी के भी आने की गुंजाइश नहीं थी.. इसलिए दोनों की हवस उछलने लगी.. मौसम ने फाल्गुनी को अपनी बाहों मे दबा दिया.. दोनों के स्तन आपस मे भीड़ गए थे.. और होंठों से होंठ भी मिले हुए थे.. दोनों की आँखें बंद थी


तभी उन्हें ढूंढते हुए कविता वहाँ पहुंची.. मौसम और फाल्गुनी को इस हाल मे देखकर वह छुपकर उनकी हरकतें देखने लगी
छोटे से बल्ब की रोशनी में जवान लड़कियां एक दूसरे से लिपटते हुए अपने जिस्मों को गरम कर रही थी.. कविता को पीयूष की याद आ गई.. उसका मन कर रहा था की वह अभी घर जाए.. सारे कपड़े उतारकर, पीयूष के साथ नंगे बदन ही, कंबल के नीचे लिपटकर लेट जाए.. धीरे धीरे कविता उन दोनों के नजदीक आई.. फाल्गुनी मौसम के टॉप के नीचे से हाथ डालकर उसके स्तनों को मसल रही थी.. यह देखकर कविता से रहा नहीं गया.. कविता ने अपना टॉप और ब्रा एक साथ ऊपर कर दीये.. और अपने एक स्तन पर फाल्गुनी का हाथ पकड़कर रख दिया और दूसरे स्तन पर रखने के लिए मौसम का हाथ खींचने लगी.. इस तरह वह भी उन दोनों के साथ उस खेल में जुड़ गई

अचानक हुई इस हरकत से फाल्गुनी और मौसम दोनों चौंक गए.. कविता को इस अवस्था मे देख दोनों शरमा गई.. आज पहली बार मौसम ने अपनी सगी बहन को इस अवस्था मे देखा था..
फाल्गुनी: "अरे दीदी.. आप कब आए? मुझे तो पता ही नहीं चला"
मौसम तो कविता के आगमन से ज्यादा उसकी इस हरकत से ज्यादा अचंभित थी..
कविता: "जब इंसान सेक्स की दुनिया मे खोया हुआ हो तब उसे न कुछ दिखाई देता है और ना ही सुनाई देता है.. फाल्गुनी, तुझे सेक्स करने के लिए मेरे ही परिवार के लोग नजर आते है??"
फाल्गुनी चुप हो गई.. कविता के ताने का.. पर देने के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं था
कविता: "इतनी देर हो गई और तुम दोनों आई नहीं इसलिए मुझे चिंता होने लगी और मैं ढूँढने चली आई.. पर यहाँ टेंशन कम और पलेजर ज्यादा नजर आ रहा है.. तो सोचा मैं भी शामिल हो जाऊँ.. !!"
मौसम ने मुसकुराते हुए कहा "दीदी, ठंड कितनी है.. !! आप को तो जीजू के साथ गर्मी मिल जाती होगी पर हमें तो इसी तरह अपनी ठंड मिटानी पड़ती है.. !!"
कविता ने हंसकर कहा "तेरे जीजू ही अब ठंडे पड़ चुके है.. इसलिए तो मुझे तुम दोनों के साथ शामिल होना पड़ा.. अब तेरी ठंडी उड़ाने की तैयारियां चल रही है.. बता.. तुझे तरुण के शरीर की गर्मी चाहिए या विशाल की?"
मौसम : "आप क्या कहती हो दीदी??"
कविता: "तरुण भोला-भाला सा पतला है.. विशाल का शरीर एकदम मजबूत और तंदूरस्त है.. जिस्मानी तौर पर विशाल तुझे ज्यादा खुश रख पाएगा.. जज्बाती तौर पर कौन ज्यादा बेहतर है ये कहना मुश्किल है.. उसके लिए तो मुझे उन दोनों से क्लोज होना पड़ेगा.. तब पता चलेगा.. पर तुम दोनों इधर ऐसे ही कब तक खड़ी रहोगी? ऊपर चलो, मम्मी राह देख रही है"
मौसम: "आप जीजू के बारे मे क्या बता रही थी??"
कविता: "पापा का बिजनेस संभालने के चक्कर में, तेरे जीजू मुझे भूल ही गए है.. पहले तो हम दोनों साथ में कितने खुश थे.. !! अब तो वो समय बस याद बनकर ही रह गया है.. मैं उस टाइम को बहोत ही मिस करती हूँ मौसम.. !"
कविता मायूष हो गई पर उसकी उदासी को ज्यादा देर टिकने नहीं दिया फाल्गुनी ने
फाल्गुनी: "दीदी, आपके पास तो एक हीटर है.. मौसम के लिए तो दो-दो हीटर लाइन में खड़े है.. पर मेरा क्या??"
कविता: "तू भी अपना कुछ सेटिंग कर ले.. नहीं तो फिर से किसी बाप के उमर के मर्द के साथ उलझ जाएगी.. " फाल्गुनी की निप्पल पर चिमटी काटते हुए कविता ने कहा

मौसम: "चलिए चलते है.. बहोत देर हो गई.. विशाल और तरुण के बारे मे कल सोचेंगे"
तीनों ऊपर तरुण के कमरे मे पहुंचे.. सब चुपचाप बैठे थे.. तरुण के पापा की एक ही प्रपोज़ल ने सारे समीकरण बदलकर रख दीये थे.. सुबह वापिस आने का वादा कर चारों निकल गए
दोपहर के बारह बजे तरुण को डिस्चार्ज देने की तैयारी हो रही थी.. रमिलबहन, मौसम और फाल्गुनी भी उस वक्त वहाँ पहुँच गए..
मौसम और फाल्गुनी एक कोने मे खड़े होकर कुछ बात कर रहे थे तभी तरुण वहाँ पहुंचा
तरुण: "मौसम, हमारी सगाई भले ही टूट गई थी पर मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाया था.. जो हो गया उसे भूलकर.. मुझे माफ करने के बाद क्या तुम मुझे फिर से स्वीकार करोगी?"
मौसम कुछ नहीं बोली पर फाल्गुनी ने जवाब दिया "तरुण, दरअसल बात ऐसी है की जब तुम ने सगाई तोड़ दी उसके बाद मौसम एक साल तक तुम्हारा इंतज़ार करती रही.. पर जब तुम्हारे तरफ से कोई पहल नहीं हुई तब उसकी दोस्ती, उनकी ऑफिस मे काम करते विशाल के साथ हो गई.. और दोनों काफी आगे भी बढ़ चुके है.. इसलिए अब मौसम के लिए तय कर पाना बहोत ही मुश्किल हो रहा है"
तरुण का चेहरा लटक गया.. उदास होकर वो बोला "ओह्ह.. यह तो मुझे दिमाग मे ही नहीं आया.. जैसे मैं नया साथी तलाश रहा हूँ वैसे मौसम भी किसी को ढूंढ रही हो इसमे कुछ गलत नहीं है.. आई एम सॉरी मौसम.. !! फिर भी, मैं एक हफ्ते तक तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करूंगा.. वरना, बेस्ट ऑफ लक तुम्हें और विशाल को.. बस इतना ही कहूँगा की किसी भी कारणवश विशाल के साथ बात आगे ना बढ़ें तो लौटकर जरूर आना.. क्योंकि तुम्हें प्यार करते रहने से मैं कभी अपने आप को रोक नहीं पाऊँगा"
तरुण अपने परिवार के साथ चला गया
मगर उस दिन के बाद मौसम का मन विचलित हो गया.. कभी वो विशाल की तरफ झुकती तो कभी तरुण की तरफ.. इसके बारे मे वो हररोज फाल्गुनी से बात करती.. और तरुण रोज रात को फाल्गुनी से फोन पर बात करता.. और मौसम के विचारों के बारे मे जानकारी लेता रहता.. मौसम के दिल मे दोनों के लिए जज़्बात थे.. पर पसंद तो किसी एक को ही करना था.. कुछ सूझ नहीं रहा था उसे.. एक सप्ताह का समय भी तेजी से पूरा हो रहा था.. दो दिन ही बचे थे.. दूसरी तरफ विशाल फोरम की तरफ खींचता चला जा रहा था.. तरुण का जीवन भी अब मौसम के फैसले पर निर्भर था
उस दिन शाम को मौसम और फाल्गुनी कविता के बारे मे बातें कर रहे थे
मौसम: "यार जीजू दीदी को ऐसे इग्नोर क्यों करते होंगे? क्या उनका सेक्स करने को दिल नहीं करता होगा?"
फाल्गुनी: "मर्दों के लिए ऐसा कभी नहीं हो सकता की उन्हें सेक्स करने का मन न होता हो... अंकल का तो हमेशा खड़ा ही रहता था.. मैंने कभी उनका बैठा हुआ लंड देखा ही नहीं है.. मैं तो बस इतना ही कहूँगी की जीजू को इच्छा न होती हो, ऐसा हो ही नहीं सकता.. बस काम के बोझ के कारण समय नहीं निकाल पाते होंगे.. और जब वो फ्री हो तब हो सकता है की दीदी के पास टाइम न हो.. !!"
मौसम: "हम्म.. बात तो तेरी सही है.. पर इसका उपाय कैसे निकालें?"
फाल्गुनी: "सिम्पल है यार.. तेरे और जीजू के बीच वैसे भी खुल कर बातें होती ही है.. जाके सीधा पूछ ले.. !!"
मौसम: "फोन करूँ जीजू को?"
फाल्गुनी: "ऐसी नाजुक बातें फोन पर नहीं की जाती... वैसे भी तुम दोनों ऑफिस मे एक साथ ही होते हो.. जब आसपास कोई न हो तब उनकी चेम्बर मे जाके बात कर लेना.. !"
मौसम: "दिन के वक्त तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन ही नहीं है.. पूरा दिन कोई न कोई होता ही है.. और जब वो फ्री हो तब मैं बिजी रहती हूँ.. शाम को छह बजे के बाद जब सारा स्टाफ घर चला जाता है उसके बाद ट्राय करती हूँ कल शाम को.. कुछ भी हो जाए दीदी और जीजू के बीच की इस दूरी को कम करना ही पड़ेगा"
दूसरे दिन की शाम को साढ़े छह बजे जब स्टाफ के सारे लोग घर जा चुके थे तब मौसम ने पीयूष की केबिन मे प्रवेश किया.. आज के दिन के लिए मौसम ने साड़ी और लो-कट ब्लाउज पहना हुआ था.. फ़ाइल को बड़ी बारीकी से पढ़ रहे पीयूष का तो ध्यान भी नहीं गया.. जानबूझ कर अपने पल्लू को सरकाकर मौसम जीजू के सामने झुककर बैठ गई..
मौसम: "जीजू, काम के अलावा भी बहुत कुछ होता है ज़िंदगी मे"
फ़ाइल से आँख उठाकर अपनी साली के गोल स्तनों की ओर देखकर मुसकुराते हुए पीयूष ने कहा "मेरी प्यारी साली साहेबा.. आपके इरादे आज कुछ ठीक नहीं लग रहे है.. तूफान बनकर आई हो आज.. मेनका की तरह विश्वामित्र का तपोभंग करने.. !!"

मौसम ने रूठने का नाटक करते हुए कहा "जीजू, सगाई वाली रात हम दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसके बाद तो आप मुझे जैसे भूल ही गए.. !!"
पीयूष: "मौसम, उस रात को तूने ही तो मुझे कहा था की वो बस आखिरी बार था.. इसलिए मैंने फिर कभी कुछ जिक्र किया ही नहीं और खामोश रहा.. बाकी तेरे ये होंठ.. तेरे ये कातिल बूब्स.. मुझे कितना उत्तेजित कर देते है.. ये बस मैं ही जानता हूँ"
मौसम: "अरे जीजू.. आखिरी बार का इसलिए कहा था की उस दिन मेरी तरुण से सगाई जो हो रही थी.. पर जब सगाई ही टूट गई उसके बाद तो आप मुझसे फिर से मिलने आ सकते थे ना.. !!"
पीयूष: "यार.. काफी समय तक तू इतने सदमे मे थी.. और ऐसी मुरझाई सी शक्ल लेकर घूमती रहती थी.. की सेक्स के लिए फिर से प्रपोज करने का दिल ही नहीं किया"
मौसम: "उस बात को कितना वक्त बीत चुका है.. और मैं तो उस सदमे से कब की उभर चुकी हूँ.. पर आप ही मुझे भूल गए है"
पीयूष: "ऐसा नहीं है मौसम.. !!" पीयूष ने फ़ाइल को एक तरफ रख दिया.. और मौसम के चेहरे के करीब आकर उसके होंठों को चूम लिया..
मौसम ने जरा सा भी विरोध नहीं किया.. बल्कि उसने पीयूष की कीस का जवाब सिसककर दे दिया.. और पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रखते हुए बोली "आह्ह जीजू.. देखिए ना.. कितने टाइट हो गए है ये.. !! दबने के लिए कब से तरस रहे है.. प्लीज दबाइए ना.. !!"
मौसम का इतना कहते ही.. पीयूष की ऑफिस बेडरूम मे तब्दील हो गई.. वो खड़ा होकर मौसम के पीछे गया और उसे कमर से पकड़कर खड़ा कर दिया.. अपने लंड को उसकी गांड पर दबाते हुए उसकी साड़ी और पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर अपनी एक उंगली मौसम की मुनिया मे डाल दी..

मौसम की आह निकल गई.. जीजू का लंड उसके कूल्हें को छु रहा था और उनकी मर्दाना उंगली चूत के अंदर घुस चुकी थी.. गर्दन पर जीजू की सांसें भलीभाँति महसूस कर रही थी मौसम.. पीयूष ने अपनी जीभ निकालकर मौसम की गर्दन को चाट लिया.. !!!


चूत के अंदर फूल स्पीड से अंदर बाहर होती उंगली ने थोड़ी ही देर मे मौसम को स्खलित कर दिया.. और वो हांफने लगी.. पहला ऑर्गजम जल्दी हो जाने वाला था यह मौसम और पीयूष दोनों ही जानते थे..

अपनी अनियमित साँसों को अनदेखा कर.. मौसम हाथ पीछे ले गई और पीयूष का लँड पेंट के ऊपर से पकड़ लिया.. उस मर्दाना सख्ती को छूकर मौसम फिर से उत्तेजित होने लगी

पीयूष ने लहराती आवाज मे मौसम के कानों मे कहा "मौसम... !!"
मौसम: "हाँ जीजू.. !!"
पीयूष; "इतने दिनों तक क्यों तड़पाया मुझे?" पीयूष ने अपनी एफ.आई.आर दाखिल की
मौसम: "मैंने नहीं.. आपने ही मुझे तड़पाया है जीजू.. इतने महीनों से आपको मेरी तरफ देखने का समय ही नहीं मिला.. !!"
यह सुनते ही, पीयूष ने मौसम की साड़ी को उतारा और उसे धक्का देकर उलटे पेट टेबल पर लेटा दीया.. उसकी पेटीकोट और पेन्टी को उतार दिया.. पीयूष की नज़रों के सामने, मौसम के चाँद जैसे दो कूल्हें खुले हुए थे.. यह देखते ही पीयूष का लंड झटके खाने लगा..
पीयूष ने मौसम को टेबल से खड़ा किया और मौसम उसकी और मुड़ी.. साड़ी तो उतर चुकी थी.. पर ऊपर पहने टाइट ब्लाउज को उतारने में बड़ी मुशक्कत करनी पड़ी... क्योंकि हुक खुल ही नहीं रहे थे.. पर आखिर ब्लाउज उतर ही गई.. मौसम ने आज वही ब्रा पहनी थी जो पीयूष ने उसे सगाई से पहले गिफ्ट की थी
पीयूष: "ये तो वही ब्रा है ना.. !!"
मौसम: "हाँ जीजू.. मैंने संभालकर रखी हुई थी.. इसे देखकर मुझे आपके साथ बिताया वह अद्भुत समय याद आ जाता था.. इसलिए फिर कभी पहनी नहीं.. !!"
ब्रा की कटोरियों के ऊपर से मौसम के सुंदर स्तनों को दबाते हुए पीयूष ने पूछा "तो फिर आज क्यों पहन ली?"
मौसम ने सिसकते हुए कहा "आज तो मैं मन बनाकर आई थी.. कैसे भी करके आपको आज पाकर ही रहूँगी"
पीयूष ने मौसम की नाजुक निप्पलों को मरोड़ दिया..

मौसम: "आह्ह.. !!! जरा धीरे धीरे करो जीजू.. दर्द हो रहा है मुझे"
पीयूष: "धीरे से तो कर रहा हूँ... ये तो बहुत दिनों से किसी ने छूए नहीं इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है वरना बबलों को तो ऐसे ही दबाया जाता है.. वैसे तरुण ने सगाई के बाद दबाए नहीं थे तेरे?"
मौसम: "चांस ही नहीं मिला... !!"
पीयूष: "किस तो की होगी.. "
मौसम: "वो भी नहीं.. आपने जो पहली बार मुझे लीप किस की थी उसके बाद से मेरे ये होंठ अभी भी कोरा कागज ही है"
यह सुनते ही, ताव मे आकर, पीयूष ने अपने पेंट की चैन खोल दी और लंड बाहर निकालकर मौसम के हाथों में दे दिया..
मौसम: "वाऊ जीजू... इट इस सो हार्ड एंड हेंडसम"

एक लंबे अरसे बाद लंड को देखकर मौसम जोश मे आ गई और झुककर उसने लंड के टोपे पर किस कर दिया.. धीरे धीरे वो पीयूष के लंड को मुंह मे लेकर चूसने लगी..
सिसकते हुआ पीयूष, मौसम के बालों मे उँगलिया फेरते हुए अपने लंड को मौसम के मुंह के अंदरूनी हिस्सों पर रगड़ता रहा.. कभी अपनी कमर से ठेलता तो कभी मौसम के सर को दोनों हाथों से पकड़कर लंड को गर्दन तक अंदर धकेलता..

मौसम के मुंह को चोदते हुए पीयूष ने पूछा "मौसम, तुझे विशाल ज्यादा पसंद है या तरुण?"
जवाब देने के लिए खुद को पीयूष की गिरफ्त से छुड़ा कर, मुंह से लंड बाहर निकालते हुए मौसम ने कहा "वही तो कन्फ़्युशन है जीजू.. पता ही नहीं चल रहा की मैं क्या करूँ.. !! आप का क्या सजेशन है?"
पीयूष: "अब इसमें मैं भला क्या कहूँ? जो भी तय करना है वो तुझे करना है.. जीना तुझे है या मुझे? हाँ इतना कह सकता हूँ की दोनों ही लड़के होनहार है.. तुझे खुश रखेंगे... अगर तरुण को चुनेगी तो तुझे शहर छोड़ना होगा.. अपनी मम्मी से दूर जाना पड़ेगा.. उन्हें कभी कुछ जरूरत पड़ी तो तू समय पर पहुँच नहीं पाएगी.. विशाल को पसंद करेगी तो इसी शहर मे रहेगी.. हम सब की नज़रों के सामने.. तुझे कभी भी, कुछ भी जरूरत पड़ी तो हम सब दौड़ कर तेरे पास आ सकेंगे"
मौसम: "आप की बात सौ फीसदी सच है जीजू.. विशाल की ओर ही मेरा रुझान है.. पर तरुण के साथ मेरा टयूनिंग बहुत अच्छा था.. और हम दोनों काफी क्लोज भी थे.. इसलिए मुझे पता नहीं चल रहा है की कीसे पसंद करूँ.. !!"
पीयूष मौसम के स्तनों से खेलते हुए बोला "सोच समझकर तय करना.. अगर इसी शहर मे रहेगी तो यह तेरा सुंदर जोबन मुझे देखने तो मिलेगा.. वरना फ़ोटो देखकर ही मन मनाना पड़ेगा.. यार मौसम, शादी हो जाने के बाद तू मुझे कुछ नहीं देगी?"
मौसम: "पागल हो क्या जीजू?? शादी के बाद कैसे दे पाऊँगी?"
पीयूष ने मौसम को खड़ा किया और टेबल पर सुला दिया.. उसकी दोनों टांगों को जितना हो सकता था उतना चौड़ा कर अपनी गर्दन के इर्दगिर्द उन्हें सेट कर.. बड़े ही चाव से मौसम की चूत को चाटने लगा.. मौसम कराहने लगी..

चूत चाटते हुए पीयूष ने सवाल किया "क्यों नहीं दे पाएगी.. !! चूत नहीं दे पाएगी.. पर दबाने तो देगी ना.. !! दबाने से तेरे बूब्स घिस नहीं जाएंगे"
मौसम: "वैसे देखने जाओ तो चूत भी कहाँ देने से घिस जाने वाली है... !! आह्ह.. अब बातें छोडो जीजू.. और डाल दो अंदर.. !!
पीयूष खड़ा हो गया.. और अपने लंड को मौसम की चूत की सिलवटों पर रगड़ने लगा..

गरम गरम मर्दाना स्पर्श अपने निजी अंग पर महसूस होते ही मौसम की छातियाँ ओर टाइट हो गई.. और उसकी निप्पलें बंदूक की कारतूस जैसे कडक हो गई.. पीयूष का गरम सुपाड़ा उसकी क्लिटोरिस को सुलगा रहा था तो दूसरी तरफ उसकी क्लिटोरिस पर लंड का लावारस, मरहम का काम कर रहा था..
मौसम से अब और बर्दाश्त न हुआ "ओह्ह जीजू, अब खेलना बंद भी कीजिए.. डाल दीजिए अंदर.. वरना मैं कपड़े पहनकर यहाँ से चली जाऊँगी.. !!" मौसम इतनी नाराज हो गई थी.. नाराजगी से ज्यादा बेताबी थी.. एक साल तरसने के बाद आखिर लंड उसकी योनि मे प्रवेश करने जा रहा था.. !!
मौसम के दोनों स्तनों को पकड़कर पीयूष ने अपने लंड को धीरे से उसके गुलाबी गरम छेद के अंदर डाल दिया.. और मस्ती पूर्वक धक्के लगाने लगा.. पहले से पसीज चुकी चूत के अंदर काफी गीलापन था.. मक्खन मे गरम छुरी की तरह उसका लंड अंदर घुस गया

मौसम सातवे आसमान मे उड़ते हुए अपनी गांड की नीचे से उठाते हुए गोल गोल घुमाकर.. लंड के नायाब स्पर्श का लाभ, चूत के हर अंदरूनी हिस्से को देने लगी.. !! उसकी सिसकियों से पता चल रहा था की वह अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ पलों को अनुभवित कर रही थी..
तीन-चार मिनट के अनोखे समागम के बाद पीयूष ने लंड बाहर निकाल लिया और अपने पेंट पर ही वीर्य गिरा दिया.. और इस कामोत्सव को परिपूर्ण कर दिया..

दोनों जवान शरीर हांफने लगे.. कुछ मिनटों के बाद मौसम ने कपड़े पहनने की शुरुआत करते हुए पेन्टी हाथ मे ली.. और सवाल जवाब शुरू किए.. जिस उद्देश्य के लिए वो यहाँ आई थी वो मौसम भूली नहीं थी
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बगल मे मुंह फेरकर खड़ी मौसम के जवान पुष्ट स्तनों पर उसकी काले घने बालों वाली चोटी ऐसे लग रही थी.. जैसे सांप दूध पी रहा हो.. बेहद आकर्षक अंगों की मलेका मौसम की भरी हुई छाती.. इस तंग वातावरण मे.. सांसें लेते हुए ऊपर नीचे हो रही थी..
मौसम से और बर्दाश्त न हुआ और वो उठकर कमरे से बाहर चली गई.. उसके पीछे पीछे फाल्गुनी और कविता भी उठकर बाहर निकलने गई.. छोटे से दरवाजे से साथ में बाहर निकलते हुए फाल्गुनी के स्तन कविता की पीठ पर रगड़ गए.. कविता और फाल्गुनी की नजरें एक हुई.. फाल्गुनी के स्तनों को देखकर कविता सोचने लगी.. पापा ने कितनी बार इन स्तनों को रगड़ा होगा.. !!!
बाहर आकर कविता ने मौसम से कहा "ऐसे बाहर क्यों आ गई?? उन लोगों को बुरा लगेगा.. !!"
फाल्गुनी: "देख मौसम, विशाल से तेरी सगाई की बात चल रही है, अभी सगाई हुई नहीं है.. तू चाहें तो अब भी तरुण के साथ बात बन सकती है.. शायद कुदरत को भी यही मंजूर होगा.. वरना ऐसा संयोग कैसे होता... !!! हमारा यहाँ फोरम की तबीयत देखने आना.. और उनका मिलना.. सिर्फ कहानियों मे ही ऐसा मुमकिन हो सकता है.. सोच ले मौसम.. तरुण के लिए तू कितनी पागल थी ये मैं जानती हूँ.. अब निर्णय तुझे करना है"
मौसम ने असमंजस भारी नज़रों से फाल्गुनी की ओर देखा.. उसकी आँखों मे हजार सवाल नजर उमड़ रहे थे.. पर उन सवालों को कैसे पेश करना.. वह उसे समझ नहीं आ रहा था
जीवन कभी कभी ऐसे ऐसे मोड पर लाकर खड़ा कर देता है, की अच्छे से अच्छे आदमी की बोलती बंद हो जाती है..
कविता: "मौसम, तू अंदर चल और अच्छे से पेश आना.. वरना उन लोगों को बुरा लग जाएगा"
उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए अंदर ले गई कविता
रमिलाबहन अपनी बेटी की दुविधा को भलीभाँति समझ रही थी.. अभी कुछ दिनों पहले ही वो विशाल के घर गई थी उनके बेटे के हाथ मांगने.. और अब यह नई स्थिति आ खड़ी हुई थी..!!
तरुण के पापा ने बात आगे बढ़ाई "बहन जी, मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ.. मौसम को मना करके हम लोगों ने बहोत बड़ी गलती कर दी थी.. मुझे मेरी गलती का एहसास हो रहा है.. तरुण और मौसम तो एक दूसरे को पहले से ही बेहद पसंद करते है.. कुछ कारणवश मुझे वह निर्णय लेना पड़ा था.. जिसका मुझे बहोत खेद है.. मैं अपने परिवार की ओर से हाथ जोड़कर माफी मांग रहा हूँ.. और विनती कर रहा हूँ की आप बीती बातों को भूल कर आप की बेटी का हाथ हमें दे दीजिए.. !!"
रमिलाबहन: "भाईसाहब, मुझे तो अब तक यही मालूम नहीं है की आप लोगों ने सगाई क्यों तोड़ दी थी.. !!"
तरुण: "आंटी, बीती बातें याद करने से क्या फायदा..!! जो हो गया सो हो गया..!!"
रमिलबहन: "ऐसे नहीं.. मुझे कारण तो पता होना ही चाहिए.. तभी मैं कुछ आगे के बारे मे सोचूँगी"
सब गंभीर हो गए.. सीधी-सादी रमिलबहन को किसी ने असली कारण बताया ही नहीं था.. ताकि उन्हें उनके स्वर्गस्थ पति की असलियत के बारे मे पता न चले..
पर तरुण के पापा ने बात को बखूबी संभाल लिया
तरुण के पापा: "असल मे ऐसा हुआ था की मेरे और सुबोधकांत के बीच कुछ व्यहवारिक बातों को लेकर कहा-सुनी हो गई थी और सुबोधकांत ने मेरा अपमान कर दिया था.. बात बहोत बिगड़ गई थी.. फिर तो ऐसा मौका ही नहीं मिला की कुछ संभल सकें.. जो भी हुआ उसमें तरुण और मौसम की कोई गलती नहीं थी.. जो कुछ भी हुआ था, हम बड़ों के बीच ही हुआ था, जिसका फल ईन बेचारे बच्चों को भुगतना पड़ा था"
रमिलाबहन काफी सरल प्रकृति की थी.. और उनके गले मे यह बात आसानी से उतर गई.. वो मौसम का हाथ पकड़कर एक तरफ ले गए
रमिलबहन: "बेटा, मैं समझ सकती हूँ की तू अभी क्या सोच रही है.. !! विशाल को तेरी ज़िंदगी मे आए हुए बस कुछ ही दिन तो हुए है..!! तेरी और तरुण की तो मंगनी तक हो गई थी.. शादी होना तय था.. !! याद कर.. उसके बगैर क्या हाल हो गया था तेरा.. !! तेरा प्यार वापिस लौटकर आया है और तू मुंह फेर रही है??"
मौसम: "और विशाल से क्या कहूँ?? की वो सब भूल जाएँ?? कोई खिलौना है क्या वो??"
रमिलाबहन चुप हो गई.. उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था.. मौसम की बात में भी दम था
रात के साढ़े बारह बज रहे थे.. तरुण के माता-पिता अब भी रमिलाबहन को समझाने की कोशिश कर रहे थे.. मौसम उस बातचीत का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी इसलिए वो फाल्गुनी का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई और कहा "चल हम फोरम का हाल जानकर आते है"
जनरल रूम मे प्रवेश करते वक्त मौसम ने देखा.. सो रही फोरम के सर पर विशाल हाथ फेर रहा था.. इन दोनों को देखकर, विशाल उठा और बाहर आया
विशाल: "आप लोग यहाँ? इस वक्त? सब ठीक तो है ना?"
मौसम: "हमारी पहचान के एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हुआ था.. अब ठीक है उसे.. फोरम की तबीयत कैसी है अब?"
विशाल: "अच्छी है.. रिकवर कर रही है"
मौसम: "सो तो है... तेरे जैसा केयर-टेकर हो तो फोरम की तबीयत तो सुधर ही जाएगी ना.. !! पूरी रात जागकर बेड के किनारे बैठने वाला, किस्मत से ही मिलता है"
विशाल समझ गया की मौसम क्या कहना चाहती थी.. !!
विशाल: "मौसम.. हम दोनों का रिश्ता होने वाला है उसका यह मतलब नहीं है की मैं अपने पुराने दोस्तों का ख्याल नहीं रख सकता.. तुझे पता तो है फोरम का हाल कैसा है.. !! उनके परिवार की मदद करने वाला कोई नहीं है.. और फोरम मेरी बेस्ट फ्रेंड है, यह तुम भी अच्छी तरह जानती हो.. !!"
विशाल की बात सुनकर मौसम ईर्ष्या से जल उठी, उसने कहा "सिर्फ फ्रेंड है या उससे भी ज्यादा कुछ है?"
सुनकर विशाल सहम गया.. पर बेझिझक उसने कहा "जिस तरह के हालात हुए है उसमें किसी की भी गलती नहीं है मौसम.. जिस दिन तुम्हारे घर वाले मेरे घर रिश्ता लेकर आए थे.. उसी दिन फोरम ने अपने प्यार का इजहार किया था.. तब तो मुझे पता भी नहीं था की तुम मुझे पसंद करती हो..!! मम्मी के समझाने के कारण मैंने तेरे लिए हाँ कह दी और फोरम से मुझे रिश्ता तोड़ना पड़ा.. यह बात सिर्फ मैं और फोरम ही जानते है.. और अब तुम दोनों..!!"
मौसम और फाल्गुनी स्तब्ध होकर विशाल को सुनते रहे
विशाल: "और एक बात, फोरम की बीमारी के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, यह जानने के बाद भी अगर मैं उसकी मदद न करूँ तो ऊपर वाला मुझे कभी माफ नहीं करेगा.. उस बेचारी ने तो बिना कुछ कहें अपने प्यार को तुझे सौंप दिया... मैं तो बस उसे इस सदमे से बाहर आने मे मदद कर रहा हूँ.. जरूरत के इस समय क्या तुम मुझे इतना भी नहीं करने दोगी??"
मौसम: "ऐसी बात नहीं है विशाल.. पर मुझे हमेशा यह डर लगा रहता है की कहीं तुम दोनों के बीच नजदीकियाँ न बढ़ जाएँ.. !!"
विशाल: "जब तक हम दोनों की सगाई नहीं हो जाती तब तक मुझे मेरी किसी भी बात की सफाई तुम्हें देने की जरूरत महसूस नहीं हो रही"
परोक्ष रूप से अल्टिमेटम दे दिया विशाल ने
बात को बिगड़ता देख फाल्गुनी समझ गई और मौसम को खींचकर विशाल से दूर ले गई
फाल्गुनी: "अभी इन सब बातों का वक्त नहीं है मौसम.. जो होगा देखा जाएगा.. तू चिंता मत कर"
वह दोनों चले गए.. और विशाल फोरम के पास वापिस लौटकर आया..
फोरम की आँखों से आँसू बह रहे थे.. उनकी बातें फोरम ने सुन ली थी..
फोरम के सर पर हाथ फेरते हुए विशाल ने कहा "तू क्यों रो रही है फोरम.. !! तेरे लिए मेरे दिल मे अब भी जज़्बात है.. जिसे जो मन मे आए वो सोच सकता है.. मेरा प्रॉब्लेम नहीं है.. रो मत फोरम.. प्लीज"
फोरम ने रोना बंद कर दिया.. उसके सर पर रखा विशाल का हाथ अपने गाल पर दबाते हुए फोरम ने कहा "विशाल.. अगर तुम मुझे अब भी उतना ही चाहते हो तो मौसम से सगाई कर लो.. मैं तुझे कुछ भी नहीं दे पाऊँगी.. प्लीज.. मौसम के पास पैसा है और वो खूबसूरत भी है"
विशाल ने अपना हाथ झटकाते हुए कहा "पागल हो गई है क्या.. !! कुछ पाने के इरादे से प्यार कभी होता है क्या.. !! "
फोरम का इलाज भले ही डॉक्टर कर रहे थे.. पर उसके मर्ज की असली दवाई तो विशाल ही था..विशाल की प्रेम-वाणी का फोरम पर जादुई असर हुआ..
विशाल: "किसी इंसान के लिए प्यार बेश-किंमती होता है तो किसी के लिए सिर्फ टाइम-पास करने का जरिया.. प्यार की कोई किंमत नहीं होती.. इसीलिए तो उसे अनमोल कहा जाता है.. ये "अनमोल" शब्द भी कितना गहरा होता है ना.. !! एक ही शब्द के दो विपरीत अर्थ होते है.. शायद दुनिया का इकलौता शब्द होगा ऐसा.. "
विशाल की यह फ़िलोसोफीकल बातें फोरम को समझ नहीं आ रही थी..
विशाल ने समझाते हुए कहा "देख फोरम.. जिसकी किंमत तय की न जा सके उसे अनमोल कहते है, राइट?"
फोरम: "जैसे कोई तराशा हुआ हीरा.. तेरे जैसा"
विशाल: "वैसे ही, जिसकी कोई किंमत न हो उसे भी अनमोल ही कहते है"
फोरम उदास होकर बोली "जैसे की मैं.. !!"
विशाल: "बकवास बंद कर यार.. मैं तुझसे प्यार करता हूँ यह हकीकत है.. और मौसम से मुझे शादी करनी होगी यह मेरी वास्तविकता है.. !!" इतना बोलते बोलते विशाल हांफ गया
यह सुनकर, एक गहरी सांस लेकर फोरम ने विशाल का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया.. बिछड़ने की क्षण पर ही इंसान अपने साथी का हाथ और मजबूती से पकड़ लेता है.. !!
विशाल: "मैं अपने घरवालों को अच्छी तरह जानता हूँ.. वो कभी तेरा स्वीकार अपनी बहु के रूप मे नहीं करेंगे.. इसलिए नहीं की तुझ मे कोई खोट है.. मगर इसलिए की मौसम के परिवार के पास बहोत पैसा है.. और इस वक्त, मेरे परिवार की सारी समस्याओं का उपाय, पैसा ही है..!! अगर तेरा हाथ पकड़ूँगा तो मेरी दोनों छोटी बहनों की शादी नहीं हो पाएगी.. पापा ने जो घर का लोन लिया है वो भी चुकाने का और कोई रास्ता नहीं है.. मम्मी के इलाज मे भी बहोत पैसा जा रहा है.. !!" विशाल की आँखों से भी आक्रोश के रूप मे आँसू बहने लगे
फोरम: "और मेरे दिल मे जो जज़्बात और भावनाएँ है, उनकी कोई किंमत नहीं??"
विशाल: "दिल के जज़्बात?? वहाँ देख.. वो कोने में डस्टबिन पड़ा है.. उसमें जाकर डाल दे.. वहीं जगह होती है दिल के जज़्बातों की"
एक दूसरे से लिपटकर बहोत देर तक रोयें दोनों.. प्रेमियों के पास रोने के अलावा और कोई स्वतंत्रता नहीं होती..!!
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मौसम और फाल्गुनी दोनों रीसेप्शन पर बनी सीट पर बैठी थी
मौसम: "यार फाल्गुनी, मुझे पक्का शक है की विशाल अब भी फोरम से प्यार करता है"
फाल्गुनी: "हो सकता है.. प्यार पानी जैसा होता है.. प्रेमरूपी ढलान जिस ओर होती है, उसी ओर बहने लगता है"
मौसम: "तो फिर विशाल का झुकाव मेरी तरह होना चाहिए ना.. !! मैं तो उससे बहोत प्यार करती हूँ"
फाल्गुनी: "मौसम, मन के मंदिर मे एक बार भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई.. तो हो गई..!! फिर दूसरी मूर्तियों की स्थापना मुख्य प्रतिमा के इर्दगिर्द ही होती है"
मौसम: "मैं समझ रही हूँ फाल्गुनी.. पर अब इस स्थति में, मैं क्या करूँ, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. !! तू ही कुछ रास्ता बता"
फाल्गुनी: "मौसम बेटा... !!" मौसम को इस तरह संबोधित करते ही पुरानी बातें याद आ गई.. मौसम ने चोंककर फाल्गुनी की ओर देखा
फाल्गुनी: "चोंक क्यों गई.. !! हमारा असली रिश्ता भूल गई क्या?"
मौसम: "ओह याद आ गया मम्मी.. !!"
फाल्गुनी ने हंसकर मौसम की छाती पर हाथ रखकर उसके स्तनों को हौले हौले दबाते हुए कहा "अब देखना ये है की तेरे यह सुंदर रसगुल्लों की चासनी कौन चूसेगा.. !! कौन दबाएगा.. कौन चखेगा.. किसके नसीब मे होंगे ये?"

मौसम: "अरे यार, इतने टेंशन मे भी तुझे ये सब सूझ रहा है.. !! यहाँ मेरी जान जा रही है और तुझे नीचे खुजली हो रही है?"
फाल्गुनी: "ऐसा नहीं है य आर.. जब किसी गंभीर समस्या का हल न दिखें.. तब सेक्स ही दिमाग को शांत और रिलेक्स करता है.. ऐसा तेरे पापा हमेशा कहते थे"
सुबोधकांत को याद करते हुए फाल्गुनी ने मजबूती से मौसम के स्तनों को दबा दिया..
देर रात हो गई थी.. रीसेप्शन के पास बने वैटिंग रूम मे फाल्गुनी और मौसम के अलावा कोई नहीं था.. मौसम चुपचाप फाल्गुनी के स्तन-मर्दन को महसूस करते हुए मौसम सोचने लगी.. तरुण की आँखों मे अब भी उसे अपने लिए प्यार नजर आ रहा था.. विशाल के लिए उसके मन मे प्यार उतना परिपक्व नहीं हुआ था.. पर विशाल उसे बेहद पसंद था.. दोनों की जोड़ी भी बड़ी ही जचती थी.. तरुण होनहार, गंभीर, आमिर और चार्टर्ड अकाउन्टन्ट था.. जब की विशाल बिन-अनुभवी, थोड़ा सा दिलफेंक और मध्यम परिवार से था.. देखने मे तरुण के मुकाबले विशाल हेंडसम था.. अब क्या करूँ? कीसे पसंद करूँ?
फाल्गुनी मौसम के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके उरोजों के ब्रा के ऊपर से मसल रही थी.. मौसम को अपने करीब खींचकर उसके गुलाबी अधरों को चूमते हुए फाल्गुनी खुद भी गरम हो रही थी और मौसम को भी उत्तेजित कर रही थी.. मौसम ने अपना एक हाथ फाल्गुनी के स्कर्ट के अंदर डाल दिया था और पेन्टी के ऊपर से वो उसके गीले होंठों को महसूस कर रही थी.. तो उसका दूसरा हाथ टॉप के ऊपर से ही फाल्गुनी की निप्पल को ढूंढकर मसल रहा था..

रात के सन्नाटे मे वहाँ किसी के भी आने की गुंजाइश नहीं थी.. इसलिए दोनों की हवस उछलने लगी.. मौसम ने फाल्गुनी को अपनी बाहों मे दबा दिया.. दोनों के स्तन आपस मे भीड़ गए थे.. और होंठों से होंठ भी मिले हुए थे.. दोनों की आँखें बंद थी


तभी उन्हें ढूंढते हुए कविता वहाँ पहुंची.. मौसम और फाल्गुनी को इस हाल मे देखकर वह छुपकर उनकी हरकतें देखने लगी
छोटे से बल्ब की रोशनी में जवान लड़कियां एक दूसरे से लिपटते हुए अपने जिस्मों को गरम कर रही थी.. कविता को पीयूष की याद आ गई.. उसका मन कर रहा था की वह अभी घर जाए.. सारे कपड़े उतारकर, पीयूष के साथ नंगे बदन ही, कंबल के नीचे लिपटकर लेट जाए.. धीरे धीरे कविता उन दोनों के नजदीक आई.. फाल्गुनी मौसम के टॉप के नीचे से हाथ डालकर उसके स्तनों को मसल रही थी.. यह देखकर कविता से रहा नहीं गया.. कविता ने अपना टॉप और ब्रा एक साथ ऊपर कर दीये.. और अपने एक स्तन पर फाल्गुनी का हाथ पकड़कर रख दिया और दूसरे स्तन पर रखने के लिए मौसम का हाथ खींचने लगी.. इस तरह वह भी उन दोनों के साथ उस खेल में जुड़ गई

अचानक हुई इस हरकत से फाल्गुनी और मौसम दोनों चौंक गए.. कविता को इस अवस्था मे देख दोनों शरमा गई.. आज पहली बार मौसम ने अपनी सगी बहन को इस अवस्था मे देखा था..
फाल्गुनी: "अरे दीदी.. आप कब आए? मुझे तो पता ही नहीं चला"
मौसम तो कविता के आगमन से ज्यादा उसकी इस हरकत से ज्यादा अचंभित थी..
कविता: "जब इंसान सेक्स की दुनिया मे खोया हुआ हो तब उसे न कुछ दिखाई देता है और ना ही सुनाई देता है.. फाल्गुनी, तुझे सेक्स करने के लिए मेरे ही परिवार के लोग नजर आते है??"
फाल्गुनी चुप हो गई.. कविता के ताने का.. पर देने के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं था
कविता: "इतनी देर हो गई और तुम दोनों आई नहीं इसलिए मुझे चिंता होने लगी और मैं ढूँढने चली आई.. पर यहाँ टेंशन कम और पलेजर ज्यादा नजर आ रहा है.. तो सोचा मैं भी शामिल हो जाऊँ.. !!"
मौसम ने मुसकुराते हुए कहा "दीदी, ठंड कितनी है.. !! आप को तो जीजू के साथ गर्मी मिल जाती होगी पर हमें तो इसी तरह अपनी ठंड मिटानी पड़ती है.. !!"
कविता ने हंसकर कहा "तेरे जीजू ही अब ठंडे पड़ चुके है.. इसलिए तो मुझे तुम दोनों के साथ शामिल होना पड़ा.. अब तेरी ठंडी उड़ाने की तैयारियां चल रही है.. बता.. तुझे तरुण के शरीर की गर्मी चाहिए या विशाल की?"
मौसम : "आप क्या कहती हो दीदी??"
कविता: "तरुण भोला-भाला सा पतला है.. विशाल का शरीर एकदम मजबूत और तंदूरस्त है.. जिस्मानी तौर पर विशाल तुझे ज्यादा खुश रख पाएगा.. जज्बाती तौर पर कौन ज्यादा बेहतर है ये कहना मुश्किल है.. उसके लिए तो मुझे उन दोनों से क्लोज होना पड़ेगा.. तब पता चलेगा.. पर तुम दोनों इधर ऐसे ही कब तक खड़ी रहोगी? ऊपर चलो, मम्मी राह देख रही है"
मौसम: "आप जीजू के बारे मे क्या बता रही थी??"
कविता: "पापा का बिजनेस संभालने के चक्कर में, तेरे जीजू मुझे भूल ही गए है.. पहले तो हम दोनों साथ में कितने खुश थे.. !! अब तो वो समय बस याद बनकर ही रह गया है.. मैं उस टाइम को बहोत ही मिस करती हूँ मौसम.. !"
कविता मायूष हो गई पर उसकी उदासी को ज्यादा देर टिकने नहीं दिया फाल्गुनी ने
फाल्गुनी: "दीदी, आपके पास तो एक हीटर है.. मौसम के लिए तो दो-दो हीटर लाइन में खड़े है.. पर मेरा क्या??"
कविता: "तू भी अपना कुछ सेटिंग कर ले.. नहीं तो फिर से किसी बाप के उमर के मर्द के साथ उलझ जाएगी.. " फाल्गुनी की निप्पल पर चिमटी काटते हुए कविता ने कहा

मौसम: "चलिए चलते है.. बहोत देर हो गई.. विशाल और तरुण के बारे मे कल सोचेंगे"
तीनों ऊपर तरुण के कमरे मे पहुंचे.. सब चुपचाप बैठे थे.. तरुण के पापा की एक ही प्रपोज़ल ने सारे समीकरण बदलकर रख दीये थे.. सुबह वापिस आने का वादा कर चारों निकल गए
दोपहर के बारह बजे तरुण को डिस्चार्ज देने की तैयारी हो रही थी.. रमिलबहन, मौसम और फाल्गुनी भी उस वक्त वहाँ पहुँच गए..
मौसम और फाल्गुनी एक कोने मे खड़े होकर कुछ बात कर रहे थे तभी तरुण वहाँ पहुंचा
तरुण: "मौसम, हमारी सगाई भले ही टूट गई थी पर मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाया था.. जो हो गया उसे भूलकर.. मुझे माफ करने के बाद क्या तुम मुझे फिर से स्वीकार करोगी?"
मौसम कुछ नहीं बोली पर फाल्गुनी ने जवाब दिया "तरुण, दरअसल बात ऐसी है की जब तुम ने सगाई तोड़ दी उसके बाद मौसम एक साल तक तुम्हारा इंतज़ार करती रही.. पर जब तुम्हारे तरफ से कोई पहल नहीं हुई तब उसकी दोस्ती, उनकी ऑफिस मे काम करते विशाल के साथ हो गई.. और दोनों काफी आगे भी बढ़ चुके है.. इसलिए अब मौसम के लिए तय कर पाना बहोत ही मुश्किल हो रहा है"
तरुण का चेहरा लटक गया.. उदास होकर वो बोला "ओह्ह.. यह तो मुझे दिमाग मे ही नहीं आया.. जैसे मैं नया साथी तलाश रहा हूँ वैसे मौसम भी किसी को ढूंढ रही हो इसमे कुछ गलत नहीं है.. आई एम सॉरी मौसम.. !! फिर भी, मैं एक हफ्ते तक तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करूंगा.. वरना, बेस्ट ऑफ लक तुम्हें और विशाल को.. बस इतना ही कहूँगा की किसी भी कारणवश विशाल के साथ बात आगे ना बढ़ें तो लौटकर जरूर आना.. क्योंकि तुम्हें प्यार करते रहने से मैं कभी अपने आप को रोक नहीं पाऊँगा"
तरुण अपने परिवार के साथ चला गया
मगर उस दिन के बाद मौसम का मन विचलित हो गया.. कभी वो विशाल की तरफ झुकती तो कभी तरुण की तरफ.. इसके बारे मे वो हररोज फाल्गुनी से बात करती.. और तरुण रोज रात को फाल्गुनी से फोन पर बात करता.. और मौसम के विचारों के बारे मे जानकारी लेता रहता.. मौसम के दिल मे दोनों के लिए जज़्बात थे.. पर पसंद तो किसी एक को ही करना था.. कुछ सूझ नहीं रहा था उसे.. एक सप्ताह का समय भी तेजी से पूरा हो रहा था.. दो दिन ही बचे थे.. दूसरी तरफ विशाल फोरम की तरफ खींचता चला जा रहा था.. तरुण का जीवन भी अब मौसम के फैसले पर निर्भर था
उस दिन शाम को मौसम और फाल्गुनी कविता के बारे मे बातें कर रहे थे
मौसम: "यार जीजू दीदी को ऐसे इग्नोर क्यों करते होंगे? क्या उनका सेक्स करने को दिल नहीं करता होगा?"
फाल्गुनी: "मर्दों के लिए ऐसा कभी नहीं हो सकता की उन्हें सेक्स करने का मन न होता हो... अंकल का तो हमेशा खड़ा ही रहता था.. मैंने कभी उनका बैठा हुआ लंड देखा ही नहीं है.. मैं तो बस इतना ही कहूँगी की जीजू को इच्छा न होती हो, ऐसा हो ही नहीं सकता.. बस काम के बोझ के कारण समय नहीं निकाल पाते होंगे.. और जब वो फ्री हो तब हो सकता है की दीदी के पास टाइम न हो.. !!"
मौसम: "हम्म.. बात तो तेरी सही है.. पर इसका उपाय कैसे निकालें?"
फाल्गुनी: "सिम्पल है यार.. तेरे और जीजू के बीच वैसे भी खुल कर बातें होती ही है.. जाके सीधा पूछ ले.. !!"
मौसम: "फोन करूँ जीजू को?"
फाल्गुनी: "ऐसी नाजुक बातें फोन पर नहीं की जाती... वैसे भी तुम दोनों ऑफिस मे एक साथ ही होते हो.. जब आसपास कोई न हो तब उनकी चेम्बर मे जाके बात कर लेना.. !"
मौसम: "दिन के वक्त तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन ही नहीं है.. पूरा दिन कोई न कोई होता ही है.. और जब वो फ्री हो तब मैं बिजी रहती हूँ.. शाम को छह बजे के बाद जब सारा स्टाफ घर चला जाता है उसके बाद ट्राय करती हूँ कल शाम को.. कुछ भी हो जाए दीदी और जीजू के बीच की इस दूरी को कम करना ही पड़ेगा"
दूसरे दिन की शाम को साढ़े छह बजे जब स्टाफ के सारे लोग घर जा चुके थे तब मौसम ने पीयूष की केबिन मे प्रवेश किया.. आज के दिन के लिए मौसम ने साड़ी और लो-कट ब्लाउज पहना हुआ था.. फ़ाइल को बड़ी बारीकी से पढ़ रहे पीयूष का तो ध्यान भी नहीं गया.. जानबूझ कर अपने पल्लू को सरकाकर मौसम जीजू के सामने झुककर बैठ गई..
मौसम: "जीजू, काम के अलावा भी बहुत कुछ होता है ज़िंदगी मे"
फ़ाइल से आँख उठाकर अपनी साली के गोल स्तनों की ओर देखकर मुसकुराते हुए पीयूष ने कहा "मेरी प्यारी साली साहेबा.. आपके इरादे आज कुछ ठीक नहीं लग रहे है.. तूफान बनकर आई हो आज.. मेनका की तरह विश्वामित्र का तपोभंग करने.. !!"

मौसम ने रूठने का नाटक करते हुए कहा "जीजू, सगाई वाली रात हम दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसके बाद तो आप मुझे जैसे भूल ही गए.. !!"
पीयूष: "मौसम, उस रात को तूने ही तो मुझे कहा था की वो बस आखिरी बार था.. इसलिए मैंने फिर कभी कुछ जिक्र किया ही नहीं और खामोश रहा.. बाकी तेरे ये होंठ.. तेरे ये कातिल बूब्स.. मुझे कितना उत्तेजित कर देते है.. ये बस मैं ही जानता हूँ"
मौसम: "अरे जीजू.. आखिरी बार का इसलिए कहा था की उस दिन मेरी तरुण से सगाई जो हो रही थी.. पर जब सगाई ही टूट गई उसके बाद तो आप मुझसे फिर से मिलने आ सकते थे ना.. !!"
पीयूष: "यार.. काफी समय तक तू इतने सदमे मे थी.. और ऐसी मुरझाई सी शक्ल लेकर घूमती रहती थी.. की सेक्स के लिए फिर से प्रपोज करने का दिल ही नहीं किया"
मौसम: "उस बात को कितना वक्त बीत चुका है.. और मैं तो उस सदमे से कब की उभर चुकी हूँ.. पर आप ही मुझे भूल गए है"
पीयूष: "ऐसा नहीं है मौसम.. !!" पीयूष ने फ़ाइल को एक तरफ रख दिया.. और मौसम के चेहरे के करीब आकर उसके होंठों को चूम लिया..
मौसम ने जरा सा भी विरोध नहीं किया.. बल्कि उसने पीयूष की कीस का जवाब सिसककर दे दिया.. और पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रखते हुए बोली "आह्ह जीजू.. देखिए ना.. कितने टाइट हो गए है ये.. !! दबने के लिए कब से तरस रहे है.. प्लीज दबाइए ना.. !!"
मौसम का इतना कहते ही.. पीयूष की ऑफिस बेडरूम मे तब्दील हो गई.. वो खड़ा होकर मौसम के पीछे गया और उसे कमर से पकड़कर खड़ा कर दिया.. अपने लंड को उसकी गांड पर दबाते हुए उसकी साड़ी और पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर अपनी एक उंगली मौसम की मुनिया मे डाल दी..

मौसम की आह निकल गई.. जीजू का लंड उसके कूल्हें को छु रहा था और उनकी मर्दाना उंगली चूत के अंदर घुस चुकी थी.. गर्दन पर जीजू की सांसें भलीभाँति महसूस कर रही थी मौसम.. पीयूष ने अपनी जीभ निकालकर मौसम की गर्दन को चाट लिया.. !!!


चूत के अंदर फूल स्पीड से अंदर बाहर होती उंगली ने थोड़ी ही देर मे मौसम को स्खलित कर दिया.. और वो हांफने लगी.. पहला ऑर्गजम जल्दी हो जाने वाला था यह मौसम और पीयूष दोनों ही जानते थे..

अपनी अनियमित साँसों को अनदेखा कर.. मौसम हाथ पीछे ले गई और पीयूष का लँड पेंट के ऊपर से पकड़ लिया.. उस मर्दाना सख्ती को छूकर मौसम फिर से उत्तेजित होने लगी

पीयूष ने लहराती आवाज मे मौसम के कानों मे कहा "मौसम... !!"
मौसम: "हाँ जीजू.. !!"
पीयूष; "इतने दिनों तक क्यों तड़पाया मुझे?" पीयूष ने अपनी एफ.आई.आर दाखिल की
मौसम: "मैंने नहीं.. आपने ही मुझे तड़पाया है जीजू.. इतने महीनों से आपको मेरी तरफ देखने का समय ही नहीं मिला.. !!"
यह सुनते ही, पीयूष ने मौसम की साड़ी को उतारा और उसे धक्का देकर उलटे पेट टेबल पर लेटा दीया.. उसकी पेटीकोट और पेन्टी को उतार दिया.. पीयूष की नज़रों के सामने, मौसम के चाँद जैसे दो कूल्हें खुले हुए थे.. यह देखते ही पीयूष का लंड झटके खाने लगा..
पीयूष ने मौसम को टेबल से खड़ा किया और मौसम उसकी और मुड़ी.. साड़ी तो उतर चुकी थी.. पर ऊपर पहने टाइट ब्लाउज को उतारने में बड़ी मुशक्कत करनी पड़ी... क्योंकि हुक खुल ही नहीं रहे थे.. पर आखिर ब्लाउज उतर ही गई.. मौसम ने आज वही ब्रा पहनी थी जो पीयूष ने उसे सगाई से पहले गिफ्ट की थी
पीयूष: "ये तो वही ब्रा है ना.. !!"
मौसम: "हाँ जीजू.. मैंने संभालकर रखी हुई थी.. इसे देखकर मुझे आपके साथ बिताया वह अद्भुत समय याद आ जाता था.. इसलिए फिर कभी पहनी नहीं.. !!"
ब्रा की कटोरियों के ऊपर से मौसम के सुंदर स्तनों को दबाते हुए पीयूष ने पूछा "तो फिर आज क्यों पहन ली?"
मौसम ने सिसकते हुए कहा "आज तो मैं मन बनाकर आई थी.. कैसे भी करके आपको आज पाकर ही रहूँगी"
पीयूष ने मौसम की नाजुक निप्पलों को मरोड़ दिया..

मौसम: "आह्ह.. !!! जरा धीरे धीरे करो जीजू.. दर्द हो रहा है मुझे"
पीयूष: "धीरे से तो कर रहा हूँ... ये तो बहुत दिनों से किसी ने छूए नहीं इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है वरना बबलों को तो ऐसे ही दबाया जाता है.. वैसे तरुण ने सगाई के बाद दबाए नहीं थे तेरे?"
मौसम: "चांस ही नहीं मिला... !!"
पीयूष: "किस तो की होगी.. "
मौसम: "वो भी नहीं.. आपने जो पहली बार मुझे लीप किस की थी उसके बाद से मेरे ये होंठ अभी भी कोरा कागज ही है"
यह सुनते ही, ताव मे आकर, पीयूष ने अपने पेंट की चैन खोल दी और लंड बाहर निकालकर मौसम के हाथों में दे दिया..
मौसम: "वाऊ जीजू... इट इस सो हार्ड एंड हेंडसम"

एक लंबे अरसे बाद लंड को देखकर मौसम जोश मे आ गई और झुककर उसने लंड के टोपे पर किस कर दिया.. धीरे धीरे वो पीयूष के लंड को मुंह मे लेकर चूसने लगी..
सिसकते हुआ पीयूष, मौसम के बालों मे उँगलिया फेरते हुए अपने लंड को मौसम के मुंह के अंदरूनी हिस्सों पर रगड़ता रहा.. कभी अपनी कमर से ठेलता तो कभी मौसम के सर को दोनों हाथों से पकड़कर लंड को गर्दन तक अंदर धकेलता..

मौसम के मुंह को चोदते हुए पीयूष ने पूछा "मौसम, तुझे विशाल ज्यादा पसंद है या तरुण?"
जवाब देने के लिए खुद को पीयूष की गिरफ्त से छुड़ा कर, मुंह से लंड बाहर निकालते हुए मौसम ने कहा "वही तो कन्फ़्युशन है जीजू.. पता ही नहीं चल रहा की मैं क्या करूँ.. !! आप का क्या सजेशन है?"
पीयूष: "अब इसमें मैं भला क्या कहूँ? जो भी तय करना है वो तुझे करना है.. जीना तुझे है या मुझे? हाँ इतना कह सकता हूँ की दोनों ही लड़के होनहार है.. तुझे खुश रखेंगे... अगर तरुण को चुनेगी तो तुझे शहर छोड़ना होगा.. अपनी मम्मी से दूर जाना पड़ेगा.. उन्हें कभी कुछ जरूरत पड़ी तो तू समय पर पहुँच नहीं पाएगी.. विशाल को पसंद करेगी तो इसी शहर मे रहेगी.. हम सब की नज़रों के सामने.. तुझे कभी भी, कुछ भी जरूरत पड़ी तो हम सब दौड़ कर तेरे पास आ सकेंगे"
मौसम: "आप की बात सौ फीसदी सच है जीजू.. विशाल की ओर ही मेरा रुझान है.. पर तरुण के साथ मेरा टयूनिंग बहुत अच्छा था.. और हम दोनों काफी क्लोज भी थे.. इसलिए मुझे पता नहीं चल रहा है की कीसे पसंद करूँ.. !!"
पीयूष मौसम के स्तनों से खेलते हुए बोला "सोच समझकर तय करना.. अगर इसी शहर मे रहेगी तो यह तेरा सुंदर जोबन मुझे देखने तो मिलेगा.. वरना फ़ोटो देखकर ही मन मनाना पड़ेगा.. यार मौसम, शादी हो जाने के बाद तू मुझे कुछ नहीं देगी?"
मौसम: "पागल हो क्या जीजू?? शादी के बाद कैसे दे पाऊँगी?"
पीयूष ने मौसम को खड़ा किया और टेबल पर सुला दिया.. उसकी दोनों टांगों को जितना हो सकता था उतना चौड़ा कर अपनी गर्दन के इर्दगिर्द उन्हें सेट कर.. बड़े ही चाव से मौसम की चूत को चाटने लगा.. मौसम कराहने लगी..

चूत चाटते हुए पीयूष ने सवाल किया "क्यों नहीं दे पाएगी.. !! चूत नहीं दे पाएगी.. पर दबाने तो देगी ना.. !! दबाने से तेरे बूब्स घिस नहीं जाएंगे"
मौसम: "वैसे देखने जाओ तो चूत भी कहाँ देने से घिस जाने वाली है... !! आह्ह.. अब बातें छोडो जीजू.. और डाल दो अंदर.. !!
पीयूष खड़ा हो गया.. और अपने लंड को मौसम की चूत की सिलवटों पर रगड़ने लगा..

गरम गरम मर्दाना स्पर्श अपने निजी अंग पर महसूस होते ही मौसम की छातियाँ ओर टाइट हो गई.. और उसकी निप्पलें बंदूक की कारतूस जैसे कडक हो गई.. पीयूष का गरम सुपाड़ा उसकी क्लिटोरिस को सुलगा रहा था तो दूसरी तरफ उसकी क्लिटोरिस पर लंड का लावारस, मरहम का काम कर रहा था..
मौसम से अब और बर्दाश्त न हुआ "ओह्ह जीजू, अब खेलना बंद भी कीजिए.. डाल दीजिए अंदर.. वरना मैं कपड़े पहनकर यहाँ से चली जाऊँगी.. !!" मौसम इतनी नाराज हो गई थी.. नाराजगी से ज्यादा बेताबी थी.. एक साल तरसने के बाद आखिर लंड उसकी योनि मे प्रवेश करने जा रहा था.. !!
मौसम के दोनों स्तनों को पकड़कर पीयूष ने अपने लंड को धीरे से उसके गुलाबी गरम छेद के अंदर डाल दिया.. और मस्ती पूर्वक धक्के लगाने लगा.. पहले से पसीज चुकी चूत के अंदर काफी गीलापन था.. मक्खन मे गरम छुरी की तरह उसका लंड अंदर घुस गया

मौसम सातवे आसमान मे उड़ते हुए अपनी गांड की नीचे से उठाते हुए गोल गोल घुमाकर.. लंड के नायाब स्पर्श का लाभ, चूत के हर अंदरूनी हिस्से को देने लगी.. !! उसकी सिसकियों से पता चल रहा था की वह अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ पलों को अनुभवित कर रही थी..
तीन-चार मिनट के अनोखे समागम के बाद पीयूष ने लंड बाहर निकाल लिया और अपने पेंट पर ही वीर्य गिरा दिया.. और इस कामोत्सव को परिपूर्ण कर दिया..

दोनों जवान शरीर हांफने लगे.. कुछ मिनटों के बाद मौसम ने कपड़े पहनने की शुरुआत करते हुए पेन्टी हाथ मे ली.. और सवाल जवाब शुरू किए.. जिस उद्देश्य के लिए वो यहाँ आई थी वो मौसम भूली नहीं थी
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