Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 50 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

मेगा अपडेट - १०,०००+ शब्दों का

पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

वैशाली को सब कुछ सच-सच बताकर शीला पीयूष से मिलने निकल गई.. शीला के साथ रंगीन रात गुजारने के लिए पीयूष ने अपने दोस्त के खाली पड़े बंगले का इंतेजाम किया था.. उतावले पीयूष के साथ शीला उस बंगले पर पहुंची.. वहाँ पहुंचते ही दोनों ने शराब पीने से शुरुआत की और फिर दोनों के बीच शुरू हुआ हवस का नंगा नाच..!!

शुरुआत में आक्रामक रहे पीयूष को धीरे धीरे शीला अपने गिरफ्त में लेती जा रही थी.. एक के बाद एक चल रहे संभोग-सत्र से पीयूष थकता जा रहा था वहीं शीला के चेहरे पर अब भी ताजगी छाई हुई थी.. उसकी भूख मिट ही नहीं रही थी.. यह सब शीला की महत्वाकांक्षी योजना का ही हिस्सा था.. वो पीयूष के शरीर और मन को इस कदर थका थकाकर तृप्त करना चाहती थी की वो पूर्णतः उसके काबू में आ जाए और उसे अपनी चाल चलने का मौका मिले..

अब आगे..

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शीला ने अचानक पियूष को धक्का देकर उलट दिया और खुद उसके ऊपर सवार हो गई.. "मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे अंदर झड़ो..." वह गुर्राई और अपनी चूत को पियूष के लंड पर तेजी से घुमाने लगी.. पियूष के हाथ शीला के कूल्हों पर चिपक गए जब उसने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया.. शीला की आँखें फटी की फटी रह गईं जब उसने पियूष के गर्म वीर्य को अपनी चूत की गहराइयों में महसूस किया..





"ओह... इतना... इतना गर्म..." शीला हांफते हुए बोली, अपने शरीर को झटकते हुए जब पियूष का लंड अभी भी उसकी चूत में धड़क रहा था.. वह आगे झुकी और पियूष के होंठों को चूसने लगी, उसके वीर्य की गंध उनके चुंबनों में मिल रही थी..

थोड़ी देर बाद जब पियूष का लंड नर्म हो गया तो शीला उससे अलग हो गई.. उसने अपनी चूत से निकलते पियूष के वीर्य को अपनी उंगलियों से चखा और मुस्कुराई.. "तुम्हारा स्वाद बिल्कुल वैसा ही है जैसा मुझे याद था..." उसने कहा और पियूष की छाती पर लेट गई..





बारिश अब हल्की हो चुकी थी लेकिन दोनों के शरीर अभी भी पसीने और बारिश से लथपथ थे.. पियूष ने शीला के गीले बालों को सहलाया और पूछा, "आपकी आग अब शांत हुई?"

शीला ने पियूष की छाती पर अपनी ठुड्डी टिकाते हुए मुस्कुराई, उसकी उंगलियाँ उसके सीने के बालों में खेल रही थीं.. "शांत? अभी तो शुरुआत भी नहीं हुई है..." उसने धीमे से कहा, अपनी जाँघ को पियूष के अभी भी नम लंड पर रगड़ते हुए.. पियूष की साँस फिर से तेज हो गई जब शीला ने अपने नाखूनों से उसके निप्पलों को चुटकी से दबोचा..

"वैसे..." शीला अचानक उठ बैठी, उसके भारी स्तन बारिश की बूंदों से चमक रहे थे, "इस बंगले में बाथटब है ना?" पियूष ने हाँ में सर हिलाया तो शीला उठ खड़ी हुई और उसका हाथ पकड़कर खींचने लगी.. "चलो फिर, अब गरम पानी में नहाने का मन कर रहा है.."

बाथरूम में प्रवेश करते ही शीला ने नल खोल दिया, गरम पानी की भाप जल्दी ही कमरे में फैलने लगा.. पियूष ने उसकी कमर से हाथ लपेटा और उसके गीले बालों को सूंघा.. "आपकी खुशबू आज भी वही है..." उसने कहा तो शीला पलटी और उसके होंठों पर काटने वाला चुंबन दिया..

टब भरते ही शीला ने पियूष को पानी में बैठा दिया और खुद उसकी गोद में बैठ गई.. गरम पानी ने उनकी थकी हुए मांसपेशियों को सुकून दिया.. पियूष के हाथ शीला के स्तनों पर तैरने लगे, जबकि शीला ने पीछे की ओर झुककर अपनी गर्दन को उसके चुंबनों के लिए प्रस्तुत किया.. "मुझे लगता है हमारी रात का दूसरा दौर शुरू हो रहा है," उसने धीमे से कहा, जब पियूष का लंड उसकी गांड के नीचे फिर से सख्त होने लगा..

शीला ने अपने हाथों से पानी को उठाकर अपने स्तनों पर बहाया, फिर पियूष के चेहरे को अपने ओर खींचा.. उसने उसके मुँह में अपनी जीभ घुसा दी, जबकि उसका एक हाथ पानी के नीचे पियूष के लंड को मसलने लगा.. पियूष ने शीला के कान में कुछ फुसफुसाया जिससे वह ठंडा होकर मुस्कुराई, फिर अचानक उठ खड़ी हुई..

"ठहरो," उसने कहा और टब से बाहर कदम रखा, उसका डूबा हुआ शरीर पानी की धाराओं से चमक रहा था.. उसने बाथरूम के कोने में पड़े टॉवल को उठाया और धीरे-धीरे अपने शरीर को पोंछना शुरू किया, जानबूझकर पियूष को अपनी हर हरकत का मजा लेने दिया.. जब वह अपने स्तनों को पोंछ रही थी, तो पियूष टब से बाहर कूदा और उसके पीछे आकर खड़ा हो गया..

"भाभी, आपका शरीर आज भी बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहली बार देखा था," पियूष ने कहा, अपने हाथों से शीला के नितंबों को मसलते हुए.. शीला ने पलटकर उसे देखा, टॉवल को फर्श पर गिरा दिया और अपने दोनों हाथों से उसके लंड को पकड़ लिया.. "और तुम्हारा यह आज भी वैसा ही स्वाद देता है," उसने कहा और झुककर उसके लंड के शीर्ष को चूस लिया..

पियूष ने आँखें बंद कर लीं जब शीला ने धीरे-धीरे उसके लंड को अपने मुँह में लेना शुरू किया.. उसकी जीभ नीचे से ऊपर तक लंड को चाट रही थी, जबकि एक हाथ से उसके अंडकोष को दबा रही थी.. अचानक शीला रुकी और पियूष को शावर क्यूबिकल में धकेल दिया.. "अब मेरी बारी," उसने कहा और ठंडे पानी का नॉब खोल दिया..

पियूष चिल्लाया जब बर्फ़ जैसा पानी उसके शरीर पर पड़ा, लेकिन शीला ने उसे वहीं रोके रखा, अपने शरीर से उसके सीने को दबाए हुए.. "तुम्हारे लंड को फिर से तैयार करने का यह सबसे अच्छा तरीका है," वह हँसी और अपने स्तनों को उसके सीने पर रगड़ने लगी.. ठंडे पानी में भी पियूष का लंड फिर से सख्त होने लगा, जिसे देखकर शीला ने गरम पानी चालू कर दिया..

भाप फिर से क्यूबिकल में भरने लगी जब शीला ने पियूष को घुमाया और उसकी पीठ को दीवार से सटा दिया.. उसने अपने घुटनों के बल बैठकर पियूष के लंड को फिर से अपने मुँह में ले लिया, इस बार और गहराई तक.. पियूष के हाथ शीला के गीले बालों में फँस गए जब वह उसके लंड को निगलने की कोशिश कर रही थी.. "ओह भाभी... कमाल का चूसती हो आप," उसने कराहते हुए कहा..

शीला ने अचानक उठकर पियूष को चूमा, उसकी जीभ उसके मुँह में घुस गई.. फिर वह पलटी और उसने पियूष के हाथों को अपने नितंबों पर रखवाया और खुद उसके लंड को अपनी चूत के बाहर रगड़ने लगी.. "अब डाल अंदर," उसने फुसफुसाया और धीरे-धीरे आगे पीछे होते हुए उसके लंड को अपने अंदर लेने लगी..

पियूष ने आँखें बंद कर लीं जब शीला की गर्म चूत उसे पूरी तरह निगल गई.. वह धीरे-धीरे हिलने लगी, अपने हाथों से बबले मसलते हुए.. शावर का गर्म पानी उनके शरीरों पर बह रहा था, जिससे उनकी त्वचा चमक रही थी.. शीला ने अपनी गति बढ़ा दी, उसके स्तन तेजी से हिल रहे थे..





"ओह पियूष... बहोत मज़ा आ रहा है" शीला ने कराहते हुए कहा.. उसने अपने हाथों से अपने स्तनों को मसलना शुरू किया, निप्पल्स को चुटकी लेते हुए.. पियूष ने शीला के हिप्स को पकड़ा और उसे और तेजी से ऊपर-नीचे करने लगा..

शीला ने अपना सिर पीछे झुकाया और जोर से कराह उठी जब पियूष ने उसे एक तेज धक्का दिया.. "हाँ! ऐसे ही! और जोर से!" उसने चिल्लाते हुए कहा.. वह अपने ऊपर होने वाले हर धक्के का मजा ले रही थी, उसकी चूत से पानी की तरह रस बह रहा था..

पियूष ने शीला को उठाकर शावर से बाहर धकेल दिया.. उसे बाथरूम के काउंटर पर बैठा दिया और उसके बड़े स्तनों को चूसने लगा.. शीला ने पियूष के सिर को अपनी छाती पर दबाया और उसके बालों को जकड़ लिया..

"अब मेरी पीठ फेरो," शीला ने आदेश देते हुए कहा.. पियूष ने उसे घुमा दिया और शीला ने खुद को काउंटर पर झुका लिया, अपनी गोल गाँड को उसकी तरफ उछालते हुए.. पियूष ने थूक लेकर उसकी चूत और गाँड के बीच में लगाया और अपना लंड फिर से उसके अंदर डाल दिया..

"ओह.. फाड़ देगा मेरी..!!" शीला चिल्लाई लेकिन उसने अपनी गाँड को और पीछे धकेला.. पियूष ने उसके कूल्हों को जकड़ लिया और तेजी से धक्के मारने लगा.. शीला की चीखें बाथरूम की दीवारों से टकरा रही थीं..





उसने अपनी उँगलियों से काउंटर को पकड़ लिया जब पियूष ने उसकी चूत में एक जबरदस्त धक्का दिया.. "येस! ठीक वहाँ! और अंदर!" शीला के शरीर से पसीना और पानी की बूँदें टपक रही थीं..

पियूष ने अपना लंड बाहर निकाला और शीला को घुमा दिया.. उसने उसे काउंटर पर बैठा दिया और अपना मुँह उसकी चूत पर लगा दिया.. शीला ने पियूष के बाल पकड़ लिए जब उसकी जीभ ने उसके चूत के छेद को चाटना शुरू किया.. "ओह्ह...तुम्हारी जीभ...ओह मर गई!"

वह तेजी से उसकी चूत को चाट रहा था, अपनी जीभ को अंदर तक घुसा रहा था.. शीला का सर पीछे झुक गया और उसने अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया.. "मैं...मैं झड़ने वाली हूँ...ओह्ह!"

पियूष की जीभ शीला की चूत के अंदर तक पहुँच गई, उसके गीले छेद को चीरती हुई.. शीला के शरीर में एक जबरदस्त झटका लहराया और उसकी चूत से गर्म पानी की धारा निकल पड़ी.. "ओह्ह माँ! मैं गई!" उसने चिल्लाते हुए पियूष के बालों को जकड़ लिया..

पियूष ने अपना मुँह उठाया, उसकी ठोड़ी शीला के रस से चमक रही थी.. "अब तुम्हारी बारी," शीला ने हांफते हुए कहा और काउंटर से नीचे उतर कर घुटनों के बल बैठ गई.. उसने पियूष के मुरझाए हुए लंड को अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे मसलना शुरू किया.. "इसे फिर से खड़ा करने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगेगा," उसने मुस्कुराते हुए कहा और अपने मुँह में ले लिया..

शीला की गर्म सांसों ने पियूष के लंड को फिर से जीवित कर दिया.. वह उसे गहराई तक ले जा रही थी, अपनी जीभ से सुपाड़े को चाटते हुए.. पियूष की आँखें झपक गईं जब शीला ने अचानक उसके अंडों को चूसना शुरू कर दिया.. "ओह बाप रे!" उसकी सांस तेज हो गई..

थोड़ी देर में ही पियूष का लंड फिर से पत्थर की तरह खड़ा हो चुका था.. शीला ने उसे छोड़ा और खड़ी हो गई.. "अब बिस्तर पर चलते हैं," उसने कहा और पियूष का हाथ पकड़ कर बाथरूम से बाहर खींच लिया..

बेडरूम में जाते ही शीला ने पियूष को बिस्तर पर गिरा दिया और पियूष के ऊपर सवार हो गई.. पियूष के लंड को अपनी चूत के छेद पर रगड़ते हुए शीला ने धीरे से अपना वजन नीचे डाला.. "ओह्ह येस...येस..." वह धीरे-धीरे उस पर नीचे-ऊपर होने लगी..

पियूष के हाथ शीला के भारी स्तनों पर चले गए, उन्हें मसलते हुए.. शीला ने अपनी गति बढ़ा दी, अपनी चूत को उसके लंड पर जोर-जोर से पटकना शुरू किया.. "ओह तुम्हारा लंड...आह्ह!" वह चिल्ला रही थी..

अचानक शीला रुकी और पियूष से कहा, "मुझे पीछे से चोद.." वह तुरंत उसके ऊपर से उतरी और बिस्तर पर हाथ-घुटनों के बल लेट गई, अपनी गोल गांड को उसकी तरफ उठाते हुए.. पियूष तुरंत खड़ा हुआ और उसके पीछे आकर खड़ा हो गया.. उसने अपने हाथों से शीला के चूतड़ों को फैलाया और अपना लंड उसकी चूत के छेद पर रगड़ने लगा..





"ओह हां...ऐसे ही," शीला ने सिसकते हुए कहा जब पियूष का गर्म लंड उसकी गीली चूत को छू रहा था.. अचानक पियूष ने जोर से धक्का दिया और उसका पूरा लंड शीला की चूत के अंदर घुस गया.. "आहह!" शीला चिल्लाई, उसकी उंगलियाँ चादर को जकड़ गईं..

पियूष ने एक लयबद्ध गति शुरू की, हर धक्के के साथ शीला के चूतड़ों पर ताली बजाते हुए.. शीला की चूत से गर्म पानी की धारा निकल रही थी जो पियूष के जांघों को गीला कर रही थी.. "ओह तुम मुझे मार डालोगे!" शीला चिल्लाई जब पियूष ने विशेष रूप से जोरदार धक्का दिया..

अचानक पियूष ने अपना लंड बाहर निकाला और शीला को घुमा दिया.. "क्या हुआ?" शीला ने हांफते हुए पूछा.. पियूष ने जवाब नहीं दिया, बस उसे बिस्तर पर पीठ के बल लेटा दिया और उसकी टांगों को कंधों पर रख लिया.. शीला की चूत पूरी तरह से खुली हुई थी, उसका गुलाबी छेद स्पष्ट दिख रहा था.. पियूष ने अपना लंड फिर से अंदर डाला, इस बार और भी गहराई तक.. "ओह्ह मेरी चूत फट जाएगी!" शीला चिल्लाई.. वैसे ये सारे शीला के नखरे ही थे.. घोड़े का लंड भी शीला के भोसड़े को फाड़ नहीं सकता था..

पियूष ने उसके स्तनों को जोर से दबाते हुए तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिए.. शीला के शरीर से पसीने की बूंदें टपक रही थीं, उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी.. वह अपने हाथों से अपने स्तनों को मसलने लगी, निप्पलों को घुमाते हुए.. "ओह्ह और जोर से... मेरी फाड़ दे आज!" वह चिल्ला रही थी..





पियूष ने अपनी गति और तेज कर दी.. कमरे में सिर्फ उनकी हांफने और शरीरों के टकराने की आवाजें गूंज रही थीं.. शीला ने अचानक अपनी आंखें बंद कर लीं और उसका शरीर कांपने लगा.. "निकल रहा है.. ओह्ह मैं झड़ रही हूँ!" उसने चीखते हुए कहा.. उसकी चूत से गर्म पानी की धार फूट पड़ी, जो पियूष के लंड और जांघों को भिगो रही थी..

पियूष ने भी अपनी गति तेज कर दी.. उसने शीला की टांगों को और जोर से पकड़ा और अपने लंड को पूरी तरह से अंदर धकेल दिया.. "ओह भाभी.. मेरा भी..." उसने हांफते हुए कहा और फिर उसका गर्म वीर्य शीला की चूत के अंदर फट पड़ा.. शीला ने अपनी आंखें खोलीं और पियूष की तरफ देखते हुए मुस्कुरा दी.. "तुम्हारा लंड अभी भी खड़ा है," उसने कहा, अपनी चूत में उसके लंड को महसूस करते हुए..

पियूष ने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला और शीला के बगल में लेट गया.. वे दोनों हांफ रहे थे, उनके शरीर पसीने से लथपथ थे.. शीला ने अपना हाथ पियूष के जांघों पर रखा और धीरे से उसके लंड को सहलाने लगी.. "तुम्हारा लंड मुझे पागल कर देता है," उसने कहा, उसके कानों में फुसफुसाते हुए..





पियूष ने शीला की तरफ देखा और उसके होंठों को चूम लिया.. "आपकी चूत भी कुछ कम नहीं है भाभी.. और खासकर आपके ये बड़े बड़े बबले" उसने जवाब दिया.. उनका चुंबन धीरे-धीरे गहरा होने लगा, उनकी जीभें एक-दूसरे से लड़ने लगीं.. शीला ने पियूष को अपने ऊपर घुमा दिया और उसके लंड को फिर से अपनी चूत के छेद पर रख लिया.. "एक और बार," उसने कहा, उसकी आंखों में वासना भरी हुई थी..

पियूष ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना लंड अंदर धकेल दिया.. शीला ने आंखें बंद कर लीं और एक लंबी सांस ली.. उसकी चूत अभी भी गीली थी, और पियूष का लंड आसानी से अंदर चला गया.. उन्होंने धीमी गति से संभोग करना शुरू किया, इस बार जल्दबाजी नहीं थी.. शीला ने अपने हाथों से पियूष के कंधों को पकड़ लिया और उसकी हर गति का आनंद लिया..

कमरे में सिर्फ उनकी हांफने की आवाजें और बिस्तर के क्रेक की आवाजें गूंज रही थीं.. बाहर बारिश अभी भी जारी थी, और बिजली की चमक कभी-कभी कमरे को रोशन कर देती थी.. शीला ने पियूष की पीठ पर अपने नाखूनों के निशान बना दिए, जब उसने अपनी गति तेज कर दी.. "ओह्ह येस... ऐसे ही..." उसने चिल्लाते हुए कहा..

पियूष ने उसकी टांगों को और जोर से फैला दिया और गहरे धक्के मारने शुरू कर दिए.. शीला का शरीर हर धक्के के साथ बिस्तर पर हिल रहा था.. उसने अपने हाथों से अपने भारी स्तनों को मसलना शुरू कर दिया, निप्पलों को घुमाते हुए.. "और जोर से लगा... और गहरा..." वह चिल्लाई..

अचानक पियूष ने उसे पलट दिया और उसकी पीठ के बल लेटा दिया.. उसने शीला की एक टांग को अपने कंधे पर रख लिया और दूसरी को बिस्तर पर फैला दिया.. इस नई पोजीशन में उसका लंड शीला की चूत में और गहराई तक जा रहा था.. "ओह गॉड... ऐसे नहीं..." शीला चिल्लाई, लेकिन उसकी आवाज में दर्द नहीं, बल्कि आनंद था..

पियूष ने उसके स्तनों को जोर से दबाया और तेजी से धक्के मारने लगा.. शीला के मुंह से लगातार आहें निकल रही थीं.. वह अपने हाथों से बिस्तर की चादर को जोर से पकड़े हुए थी, जैसे वह किसी चीज को थामने की कोशिश कर रही हो.. "ओहह कितनी बार झड़ूँगी मैं..." उसने हांफते हुए कहा..

उसी पल बाहर बिजली कड़की और तेज रोशनी ने पूरे कमरे को भर दिया.. शीला का चेहरा आनंद से विकृत हो गया था.. उसकी चूत में एक तेज झटका महसूस हुआ और फिर उसके पूरे शरीर में कंपन फैल गया.. उसके स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे जबकि पियूष ने उस पर जमकर हमला किया हुआ था..

"ओह्ह... ओह्ह... ओह्ह..." शीला की आवाज़ बिखर गई.. उसकी आँखें लुढ़क गईं और मुंह से लार की धारा बह निकली.. पियूष ने अपनी गति और तेज कर दी, उसका लंड शीला की चूत की गहराइयों तक जा पहुंचा था.. शीला के शरीर में एक और झटका लगा और उसकी चूत से गर्म पानी की धारा निकल पड़ी..

पियूष ने अब अपना संयम खो दिया.. उसने शीला के कूल्हों को जोर से पकड़ा और अपने लंड को पूरी ताकत से अंदर धकेल दिया.. "ओहह आह्ह आह्ह.." वह चिल्लाया.. शीला ने अपने हाथों से अपने स्तनों को मसलते हुए उसे और उत्तेजित किया.. "अंदर... अंदर निकाल दे..." वह चीखी..

पियूष का शरीर अकड़ गया और उसने एक लंबी आह भरी.. गर्म वीर्य की कुछ बूंदें शीला की चूत की गहराइयों में जाकर गिरी.. वह कुछ पलों तक स्थिर रहा, फिर धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला.. शीला ने अपनी टांगें फैला दीं और गहरी सांस ली.. उसकी चूत अभी भी धड़क रही थी..

"कितनी बार चढ़ा मुझ पर आज?" शीला ने थकी हुई मुस्कान के साथ पूछा.. उसने अपनी उंगलियों से अपनी चूत को छुआ और फिर पियूष के सीने पर उसका रस मल दिया.. "चार बार? पांच?"

पियूष ने अपनी आँखें बंद कर लीं और मुस्कुराया.. "गिनती ही भूल गया.. आपकी चूत का नशा ही कुछ अलग है भाभी.." उसने शीला की तरफ देखा और उसके भीगे हुए बालों को संवारा.. बाहर बारिश अब हल्की हो गई थी, लेकिन हवा अभी भी गर्म थी..

शीला ने अपने हाथों से अपने भारी स्तनों को उठाया और उन्हें दबाया.. "अब तो इनमें दर्द हो रहा है.. तूने कितनी बार चूसा इन्हें?"

पियूष ने शीला के निप्पल्स को अपनी उंगलियों से दबाते हुए कहा, "मैं तो अभी और चूसना चाहता हूँ.." उसकी आँखों में वही पुरानी चिंगारी फिर से जगमगा उठी.. शीला ने अपनी आँखें झपकाईं और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए.. उनका चुंबन धीरे-धीरे आगे बढ़ा, फिर जैसे-जैसे पियूष का हाथ उसकी जांघों पर फिसला, शीला की सांसें तेज हो गईं..

"थोड़ा रुक जा," शीला ने अचानक चुंबन तोड़ते हुए कहा.. उसने बिस्तर से उठकर कमरे के बीचोंबीच खड़ी हो गई.. बारिश की हल्की फुहार खिड़की से अंदर आ रही थी, जो उसके गीले शरीर पर गिरकर और भी आकर्षक बना रही थी.. "इस बार मैं चाहती हूँ कि तू मुझे खड़े-खड़े चोदे.."

पियूष ने एक भावशून्य मुस्कान के साथ सर हिलाया और बिस्तर से उठकर उसके पास आ गया.. शीला ने अपनी पीठ उसकी तरफ कर ली और अपने चूतड़ों को हिलाते हुए कहा, "पहले इन्हें चाट.." पियूष ने घुटनों के बल बैठकर उसके गोल नितंबों को अपने हाथों से फैला लिया और जीभ से उसकी गांड के छेद को चाटना शुरू कर दिया.. शीला की आँखें ऊपर को लुढ़क गईं और उसने अपने हाथों से अपने स्तनों को मसलते हुए एक लंबी आह भरी..





अचानक शीला ने पीछे मुड़कर पियूष के बाल पकड़े और उसे खींचकर खड़ा किया.. "अब अपना लंड अंदर डाल," उसने कर्कश आवाज में कहा.. पियूष ने अपना कड़ा हुआ लंड उसकी गीली चूत के छेद पर रखा और धीरे से धकेलना शुरू किया.. शीला ने अपने सिर को पीछे की ओर झुकाया और उसके कंधे पर दांत गड़ा दिए जब उसका लंड पूरी तरह से अंदर समा गया..

खिड़की से आती हुई ठंडी हवा उनके गर्म शरीरों से टकरा रही थी.. शीला ने अपने हाथों से खिड़की की चौखट पकड़ ली जबकि पियूष उसकी पीठ से चिपका हुआ उसे जोर-जोर से धकेल रहा था.. उसकी चूत के भीतर लंड की गर्मी और बाहर की ठंडी हवा के संयोग ने शीला को एक अजीब सी सनसनी से भर दिया..

"ओह्ह... ठंडी हवा... और तेरा गरम लंड... आह्ह!" शीला के शरीर में एक झटका सा दौड़ गया.. पियूष ने उसकी प्रतिक्रिया देखकर और तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिए.. उसने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे से उसके भारी स्तन को मसलना शुरू किया..

शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खिड़की के शीशे पर अपनी सांस से धुंध बनाते हुए कहा, "और तेज... और गहरे... ओह भगवान!" उसकी चीखें कमरे में गूंजने लगीं जब पियूष ने उसे दीवार से टकरा दिया और उसके कूल्हों को जोर से पकड़कर और भी ज़ोरदार धक्के देना शुरू कर दिया..

अब पियूष ने शीला को पलट दिया और उसकी एक टांग को उठाकर अपने कंधे पर रख लिया.. शीला की पीठ दीवार से सटी हुई थी जबकि पियूष ने उसे इस नई स्थिति में चोदना जारी रखा.. "आपकी चूत... इतनी गर्म... आह्ह..." पियूष ने अपने दांतों से अपना निचला होंठ दबाते हुए कहा.. शीला की आंखें लुढ़क गईं जब उसने अपनी दूसरी टांग को भी उठा लिया और उसे पूरी तरह हवा में उठाकर धकेलना शुरू कर दिया..

बारिश की बूंदें अब खिड़की से अंदर आकर उनके शरीरों पर गिर रही थीं.. शीला के स्तनों पर पानी की बूंदें लुढ़क रही थीं जो पियूष के लिए और भी उत्तेजक दृश्य था.. उसने अपना मुंह आगे बढ़ाया और शीला के एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया.. शीला चीख पड़ी जब उसने जोर से काटा और साथ ही उसने अपने लंड को और भी जोर से अंदर धकेला..

"ऊईईई माँ.. ओह्ह..." शीला ने अपने हाथों से अपने ही स्तनों को मसलते हुए कहा.. उसकी चूत की मांसपेशियां तेजी से सिकुड़ने लगीं जैसे वह एक और बड़े ऑर्गेज्म की कगार पर हो.. पियूष ने उसके इस संकेत को समझ लिया और अपनी गति और तीव्र कर दी.. उसके लंड के हर धक्के से शीला का शरीर दीवार से टकराता और वापस उसके लंड पर गिरता..

तभी शीला के मुंह से एक ऐसी चीख निकली जिसे सुनकर पियूष ने भी अपनी आंखें बंद कर लीं.. उसकी चूत से गर्म पानी की धारा बह निकली और उसका पूरा शरीर ऐंठ गया.. पियूष ने अपने लंड को और भी गहराई तक धकेला और खुद भी एक जोरदार आह भरते हुए ठंडा हो गया..

"आह्ह... ओह्ह मर गई..." शीला ने थककर अपने हाथ पियूष के कंधों पर डाल दिए.. उसकी सांसें तेज थीं और शरीर पसीने से लथपथ.. पियूष ने धीरे से उसकी टांगों को नीचे किया और उसे अपनी बाहों में समेट लिया.. बारिश की ठंडी बूंदें अब उनके गर्म शरीरों पर गिरकर भाप बन रही थीं..

"कितनी बार हो चुका है आज?" शीला ने थकी हुई मुस्कुराहट के साथ पूछा, अपनी उंगलियों से पियूष के सीने पर बिखरे अपने ही रस को फैलाते हुए..

पियूष ने अपनी आंखें घुमाईं, "शायद पांचवीं या छठी बार? पता नहीं.. आज तो मेरा मन भर ही नहीं रहा है.." पीयूष को भी ताज्जुब हो रहा था की बार बार भाभी चुदाई की गिनती क्यों रख रही थी..!!

शीला की आँखों में एक शैतानी चमक आ गई जब उसने पियूष के जवाब सुना.. "छठी बार?" उसने अपनी उंगलियों को उसके सीने पर घुमाते हुए कहा, "और अभी तो हमारी रात बस शुरू हुई है.." पियूष ने उसकी कमर को थपथपाया जब शीला अचानक उठ खड़ी हुई, उसका शरीर अभी भी उत्तेजना से कांप रहा था..

खिड़की से आ रही बारिश की बूंदें अब शीला के गोरे बदन पर नाच रही थीं.. उसने अपने भारी स्तनों को थामा और धीरे से मसलते हुए कराह उठी, "मेरे बूब्स दर्द कर रहे हैं...तुम्हारे ज्यादा काटने से.." पियूष उसकी तरफ लपका और उसके निप्पलों को अपने होंठों से सहलाने लगा.. शीला ने अपनी उंगलियों से उसके बालों में घुसकर उसका सिर अपनी छाती से दबा लिया..

"इंतज़ार करो," शीला ने अचानक उसे धक्का देते हुए कहा और ड्रॉइंगरूम की तरफ लड़खड़ाते हुए चली गई.. वहाँ से टेबल पर रखी शराब की बोतल लेकर वापिस लौटी.. "व्हिस्की का एक घूंट," उसने मुस्कुराते हुए कहा और बोतल को अपने होठों से लगा लिया.. पियूष ने देखा कि कैसे शराब की बूंदें उसके ठुड्डी से होकर उसके स्तनों तक लुढ़क गईं..

वह तेजी से उठा और शीला को अपनी बाहों में उठा लिया..

"तू पिएगा नहीं?" शीला ने पूछा

"आप पिलाओगी तो जरूर पीऊँगा" पीयूष ने कहा

"रुक.. मैं पिलाती हूँ तुझे.." कहते हुए शीला ने धक्का देकर पीयूष को बेड पर लेटा दिया.. शराब की बोतल हाथ में लेकर वो पीयूष के मुंह पर सवार हो गई.. अपने विराट बबलों पर उसने व्हिस्की की धार की.. शराब उसके स्तनों से बहते हुए.. नाभि से होकर.. जंघाओं के मूल से उसके भोसड़े के होंठों पर गुजरते हुए पीयूष के मुंह पर गिरने लगी.. पीयूष प्यासे कुत्ते की तरह शीला का भोसड़ा चाटने लगा.. शराब पीने का इससे अनोखा तरीका और क्या हो सकता है..!!

बारिश की आवाज अब तेज हो चुकी थी, खिड़की से टकराती हुई.. शीला ने अपने पैरों को पियूष की कमर पर लपेट लिया जब वह उस पर झुका.. "क्या तुम्हें पता है," उसने उसके कान में फुसफुसाया, "मैंने सोचा था कि तुम इतने सालों में कमजोर हो गए होगे.. लेकिन तुम तो..." उसकी बात अधूरी रह गई जब पियूष ने अचानक उसकी गर्दन पर दांत गड़ा दिए..

"क्या तो?" पियूष ने उसके कान के पास गुर्राते हुए पूछा, अपने लंड को उसकी चूत के बाहर रगड़ते हुए.. शीला की आंखें बंद हो गईं जब उसने अपनी एड़ियों से उसकी पीठ को दबाया.. "तुम तो...पहले से भी ज्यादा ताकतवर हो," वह कराह उठी जब पियूष ने एक झटके में अपने लंड को उसकी गीली चूत में धंसा दिया..

उनकी गति शुरू में धीमी थी, लेकिन जैसे-जैसे शीला की सांसें तेज होती गईं, पियूष ने अपने धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी.. शीला ने अपने हाथों से बिस्तर की चादरें मुट्ठी में भींच लीं जब पियूष ने उसकी एक टांग को अपने कंधे पर रख लिया और और भी गहराई से घुसने लगा.. "ओह्ह... ये कोण... आह्ह वही वाला...!" शीला का सिर पीछे की तरफ झटका जब पियूष ने उसके G-स्पॉट पर सीधा प्रहार किया..





बारिश की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं, लेकिन कमरे के अंदर का तापमान बढ़ता जा रहा था.. पियूष के माथे से पसीने की बूंदें शीला के स्तनों पर गिर रही थीं जब वह उस पर झुका हुआ था.. उसने अपने दांतों से शीला के निप्पल को दबोच लिया, जिससे वह चीख उठी.. "हां... काटो मुझे... ओह्ह तुम्हारे दांत... आह्ह!"

पियूष ने अचानक उसे पलट दिया और कुत्ते की मुद्रा में ले आया.. शीला ने अपने चूतड़ों को हवा में उठा लिया, पियूष के लंड का स्वागत करने के लिए तैयार.. पहले धक्के ने उसे आगे की तरफ झटका दिया, लेकिन उसने अपनी कोहनियों से बिस्तर पर जमकर पकड़ बना ली.. "और... और जोर से...!" उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी जब पियूष ने अपने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़कर उस पर जमकर प्रहार किया..

शीला का शरीर अब फिर से गर्म हो चुका था.. उसकी चूत से निकलने वाला रस पियूष के जांघों पर बह रहा था.. वह अपने हाथों से बिस्तर पर टिकी हुई थी, लेकिन जब पियूष ने अचानक उसके बाल पकड़कर खींचे, तो उसका सिर पीछे की तरफ झटका और उसकी पीठ एक धनुष की तरह मुड़ गई.. "ओह्ह मेरे बाल... आह्ह येस्स...!"





पियूष ने शीला के बालों को ज़ोर से खींचते हुए उसकी गर्दन पीछे की ओर झुका दी.. बारिश की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं मानो उनके जुनून को और भड़का रही हों.. "आपकी चूत... भट्ठी जैसी गर्म है..." पियूष ने गुर्राते हुए कहा, अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ाते हुए..

शीला के नाखून बिस्तर की चादरों में घुस गए जब पियूष ने अचानक उसकी कमर को ऊपर उठा दिया और अपने लंड को पूरी तरह से अंदर धकेल दिया.. उसकी चीख कमरे में गूंज उठी, "ओह्ह मेरी गांड... आह्ह तुम तो... उह्ह...!" उसकी आवाज़ टूट रही थी जैसे ही पियूष ने उसकी एड़ियों को पकड़कर उसके पैरों को और फैला दिया..

बाहर बिजली चमकी और उसकी रोशनी में शीला का पसीने से तरबतर बदन चमक उठा.. पियूष ने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे से उसके भारी स्तनों को मसलना शुरू कर दिया.. "ओह्ह वो जगह... फिर से...!" शीला की आँखें पलकों के पीछे छिप गईं जब पियूष का लंड उसके अंदर उस स्थान पर टकराया जिससे उसका पूरा शरीर झटकों से भर गया..

अब पियूष ने उसे पलट दिया और उसके ऊपर आ गया.. शीला ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट लीं जैसे ही वह फिर से उसके अंदर घुसा.. उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ बारिश की आवाज़ में घुल मिल गई.. पियूष ने उसके होंठों को जकड़ लिया, उसकी सांसें चुराते हुए जबकि उसकी हिप्स लगातार उससे टकरा रही थीं..

"ओह्ह...इस तरह नहीं..." शीला ने हांफते हुए कहा जब पियूष ने अचानक उसकी टाँगों को कंधों पर रख दिया.. उसकी चूत पहले से कहीं ज्यादा गहराई तक खुल गई थी.. पियूष के हर धक्के से अब उसके गर्भ तक कंपन हो रहा था.. शीला ने चादरें मुट्ठियों में भींच लीं जैसे ही वह उसके अंदर और गहरे धँस गया..

उसकी आँखें लुढ़क गईं जब पियूष ने एक हाथ से उसके गले को थाम लिया और दूसरे से उसके स्तनों को मसलना शुरू कर दिया.. "ओह्ह...वो वाली जगह...फिर से..." शीला के शब्द टूट रहे थे जब पियूष का लंड उसके अंदर उस स्पॉट पर टकराया जहाँ से उसका पूरा शरीर अकड़ जाता था..

बाहर बिजली चमकी और उसकी रोशनी में शीला का चेहरा एक अजीब सी मुस्कान से भर गया.. "क्या हुआ?" पियूष ने हांफते हुए पूछा, अपने धक्कों की रफ़्तार धीमी करते हुए.. शीला ने अपनी उंगलियों से उसकी छाती पर खरोंचें खींचीं, "कुछ नहीं... बस सोच रही थी कि तुम्हारा ये लंड मेरी चूत में कितनी बार फट चुका है आज रात.."

पियूष ने गर्दन झटक दी और तेज़ी से फिर से धक्का मारा.. शीला की आँखें पलकों के पीछे छिप गईं जैसे ही उसका शरीर एक बार फिर से झटके से भर गया.. "उसके कूल्हों को अपनी हथेलियों से पकड़कर और तेज़ी से धकेलना शुरू कर दिया..

शीला ने अपनी टाँगें उसकी कमर से और ज्यादा कसकर लपेट लीं, अपनी एड़ियों से उसके नितंबों को दबाते हुए.. "हाँ... ऐसे ही... ओह्ह और तेज़!" उसकी आवाज़ बिजली की गड़गड़ाहट में डूब गई.. बारिश की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं, जैसे वो भी उनके इस जंगली नृत्य में शामिल होना चाहती हों..

शीला का शरीर एक बार फिर से अकड़ गया.. उसकी चूत की दीवारें पियूष के लंड को और ज्यादा कसकर दबा रही थीं, जैसे कोई जानवर अपने शिकार को निगल रहा हो.. वो अपनी सारी ताकत से पीछे की तरफ धकेल रही थी, ताकि पियूष का लंड उसकी चूत की सबसे गहरी जगह तक पहुँच जाए..

"ओह्ह.. ओह मार डाला तूने.." शीला ने हांफते हुए कहा, जब पियूष ने अपने आखिरी धक्के के साथ उसकी चूत में झड़ने का प्रयास किया.. पर वीर्य अब उसके अंडकोशों में बचा ही नहीं था निकलने के लिए.. ये तो दवाई का असर था जो उसके लंड को खड़ा रख पा रहा था

पियूष का शरीर शीला के ऊपर सुस्ता गया.. उसके कंधों पर शीला के नाखूनों के गहरे निशान थे.. बारिश की बूंदें खिड़की से अन्दर आकर उनके पसीने से तर बदन पर गिर रही थीं..

शीला ने धीरे से पियूष को अपने ऊपर से हटाया और बिस्तर पर लेट गई.. उसकी चूत से पियूष का माल धीरे-धीरे बाहर निकल रहा था.. उसने अपने उँगलियों से उसे सहलाते हुए पियूष की तरफ देखा, जो अभी भी हांफ रहा था.. "अब तो तेरा लंड फिर से खड़ा हो जाएगा ना?" शीला ने मुस्कुराते हुए कहा..

पियूष ने हंसते हुए कहा, "भाभी.. आज रात को ही मार डालोगी क्या मुझे..!! अभी अभी तो मेरा निकला है और वो भी पता नहीं कितनी बार..!!" पर शीला ने उसके मुरझाए हुए लंड को अपने हाथ में ले लिया और धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया.. "ओह.. नहीं.. शीला भाभी.. अब नहीं.." पियूष ने कराहते हुए कहा.. उसका लंड दर्द कर रहा था.. शरीर थकान से चूर हो चुका था.. शीला के हाथों की गर्मी से उसका लंड फिर से जवाब देने लगा..

शीला ने अपने रसीले होंठों को पियूष के कान के पास ले जाकर फुसफुसाया, "चल, इस बार मैं तुझे चोदूँगी.." ये कहकर उसने पियूष को बिस्तर पर पीठ के बल लिटा दिया और उसके ऊपर सवार हो गई.. पियूष का लंड अब भी आधा मुरझाया हुआ था.. शीला ने उसे अपनी चूत के छेद पर रगड़ते हुए कहा, "देख, कैसे तेरा लंड मेरी गीली चूत को ढूंढ रहा है.."

चुद-चुदकर शीला का भोसड़ा गरम गुफा में तब्दील हो गया था.. इसलिए उस मुरझाए लंड को अंदर डालने में ज्यादा तकलीफ नहीं हुई.. पियूष ने शीला के चूतड़ों को दबोच लिया और अपने लंड को उसकी चूत के अंदर धकेल दिया.. शीला ने सिर पीछे की तरफ झुकाते हुए एक लंबी आह भरी.. वो धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी, अपने स्तनों को पियूष के चेहरे के पास ले जाती हुई.. पियूष ने उसके निप्पल को मुँह में ले लिया और जोर से चूसना शुरू कर दिया..





"ओह्ह... ठीक वैसे ही..." शीला ने हांफते हुए कहा, जैसे वो अपनी सारी ताकत इकट्ठी कर रही हो.. अचानक वो पियूष के ऊपर से उतर गई और उसके पैरों के बीच घुसकर उसके लंड को मुँह में ले लिया.. पियूष ने चीखते हुए बिस्तर की चादरें पकड़ लीं.. शीला की जीभ उसके सुपाड़े के नीचे घूम रही थी, जैसे कोई बच्चा आइसक्रीम चाट रहा हो..

बारिश की आवाज़ के बीच पियूष की सिसकियाँ और ज़ोरदार हो गईं जब शीला ने अपने दाँतों से हल्का सा काटा.. "ओहह भाभी.. मत करिए..." वो बुदबुदाया, पर शीला ने उसकी बात अनसुनी कर दी.. उसने अपनी एक उँगली पियूष की गाँड के छेद में घुसा दी, जिससे वो एकदम से अकड़ गया..





"क्या हुआ? डर गया?" शीला ने मुस्कुराते हुए पूछा, जबकि उसकी उँगली धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रही थी.. पियूष ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें बंद कर लीं.. शीला ने फिर से उसके लंड को चूसना शुरू कर दिया, इस बार और ज़ोर से.. उसकी दूसरी हाथ से पियूष के अंडकोष को दबाते हुए, वो उसके शरीर को हिला रही थी जैसे कोई खिलौना हो..

अचानक शीला रुक गई.. "उठो," उसने कहा.. पियूष ने आँखें खोलीं तो देखा कि शीला खिड़की के पास खड़ी है, अपने भारी स्तनों को बारिश के पानी से गीला कर रही है.. "यहाँ आओ," उसने पुकारा.. पियूष उठकर उसके पास गया.. शीला ने उसका हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रख दिया.. "अंदर डालो," उसने कहा.. पियूष ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी गीली चूत में अपनी दो उँगलियाँ घुसा दीं.. लंड तो अब उसका हार चुका था.. शीला ने सिर पीछे झुकाते हुए एक लंबी आह भरी.. बारिश की ठंडी बूंदें उसके स्तनों से टकरा रही थीं, जबकि पियूष की गर्म उँगलियाँ उसके अंदर घूम रही थीं..





पीयूष शीला की इस भूख को देखकर अचंभित था.. क्या औरत है ये..!! इसकी भूख शांत ही नहीं होती..!! एक मर्द के बस की बात ही नहीं है ये भाभी.. एक साथ पाँच मर्द को भी थका सकती है..!!

"और तेज कर," शीला ने हांफते हुए कहा.. पियूष ने तीसरी उँगली जोड़ दी.. शीला की चूत पहले से ही फैल चुकी थी, पर अब वो और ज़्यादा खुलने लगी.. पियूष ने अपनी उँगलियों को तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया.. शीला ने अपने स्तनों को दबाते हुए चीख मारी.. "अभी मत रुकना," उसने कहा.. पियूष ने उसकी चूत के अंदर अपनी उँगलियाँ घुमाईं, उस स्पंजी दीवार को ढूंढते हुए जो उसके आने वाले ओर्गास्म की चेतावनी दे रही थी..





शीला ने अचानक पियूष का हाथ पकड़ लिया और उसे रोक दिया.. "मैं उंगलियों से झड़वाना नहीं चाहती.. मुझे लंड चाहिए.. इसे कैसे भी करके खड़ा कर"

पीयूष की शक्ल रोने जैसी हो गई.. हे भगवान.. आज ये मेरी जान ले लेगी..!!

शीला ने पियूष को बिस्तर की तरफ खींचा.. उसने पियूष को बिस्तर पर बैठाया और फिर उसके ऊपर सवार हो गई.. पियूष का अधमरा से लंड पर शीला अपनी बुर की फांक रगड़ने लगी..





फिर धीरे-धीरे नीचे बैठते हुए उसे अंदर लेने की कोशिश करने लगी.. लंड बीच रास्ते ही पिचक गया.. शीला ने पीयूष की आँखों में घिन से देखा.. पीयूष की आँखें झूक गई.. पर शीला ऐसे हार मानने वाली नहीं थी.. उसने वो पिचका हुआ लंड अपनी दोनों उंगलियों से पकड़ा और अपना भोसड़ा फैलाकर अंदर डाल दिया और ऊपर नीचे उछलने लगी..

"ओह माँ..." शीला ने सिर पीछे झुकाते हुए कहा.. वो धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी.. पियूष ने उसके भारी स्तनों को पकड़ लिया और उन्हें मसलना शुरू कर दिया.. इस आशा में की उसका लंड अंदर खड़ा हो जाए और उसकी इज्जत बच जाए.. शीला की चूत की गर्मी और उसके स्तनों का नरम मांस पियूष के हाथों को जैसे जलाने लगा था..

"तेज़... और तेज़..." शीला ने हांफते हुए कहा.. पियूष ने उसकी कमर पकड़कर उसे नीचे की ओर दबाया.. शीला की चीख बारिश की आवाज़ में दब गई..





शीला ने अपने नाखून पियूष के कंधों में गड़ा दिए.. वो अब पूरी तरह से उसके ऊपर झूल रही थी.. पियूष ने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया.. पीयूष के लंड में अब हल्के हल्के सख्ती आने लगी थी.. उसने शीला के पैरों को अपने कंधों पर रखा और फिर से अंदर घुस गया..

"हाँ... ऐसे ही... ओह मेरे राजा..." शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं.. पियूष के हर धक्के से उसका पूरा शरीर हिल रहा था.. उसके स्तन इतने तेज़ी से हिल रहे थे कि लग रहा था कोई दो गोल पत्थर उछल रहे हों.. पियूष ने अपना दाहिना हाथ उसके बाएँ स्तन पर मारा.. शीला की आँखें खुल गईं..

"और मार... ओह्ह... हाँ..." शीला ने उसकी कमर को अपनी टांगों से जकड़ लिया.. पियूष ने उसके दोनों स्तनों को पकड़कर जोर से मसलना शुरू कर दिया, उसके गुलाबी निप्पल उसकी उंगलियों के बीच से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे.. बारिश की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं, मानो उनके जंगी राग में शामिल होना चाहती हों..

"उह्ह... ऐसे ही... पूरा अंदर डाल..." शीला ने बिस्तर की चादर को मुट्ठी में भींच लिया.. बारिश की बूंदों की आवाज़ उनकी हांफती सांसों में डूब रही थी.. पियूष ने उसके कान के पास गरम सांस छोड़ते हुए कहा, "भाभी, आज तो आप किसी जिन्न की तरह मेरा सारा रस चूस रही है..."

शीला ने अपनी गीली पीठ उसके सीने से रगड़ते हुए जवाब दिया, "मेरी आग उसे ही भड़काने का हक है जिसके लंड में उसे बुझाने की ताकत हो" वो अचानक चीख उठी जब पियूष ने उसकी गांड पर एक तेज थप्पड़ मारा.. "हाँ... फिर मार..." उसने पलट कर पियूष के होंठों को अपने दांतों से दबा लिया..

वो उठकर बैठ गई और पियूष को धक्का देकर पीठ के बल लिटा दिया.. "अब मेरी बारी," उसने कहा और उसके लंड पर बैठ गई, धीरे-धीरे नीचे जाते हुए.. पियूष की आँखें फटी की फटी रह गईं जब शीला ने अपने भारी स्तनों को उसके चेहरे पर रख दिया.. "चूस," उसने आदेश दिया, और पियूष ने उसके निप्पल को मुँह में ले लिया..

बाहर बारिश की आवाज़ तेज़ हो रही थी, पर उनके कमरे में सिर्फ गीलेपन और गरमाहट की आवाज़ें गूँज रही थीं.. शीला ऊपर-नीचे होते हुए अपने हाथों से अपने स्तनों को दबा रही थी.. पियूष का लंड उसकी चूत में पूरी तरह समा चुका था, हर बार जब वो नीचे जाती तो उसका पेट उभर आता..

"ओह्ह... ये मज़ा... उह्ह... कभी खत्म न हो," शीला ने हांफते हुए कहा.. पियूष ने उसकी कमर पकड़ ली और जोर से ऊपर की ओर धक्का दिया.. शीला चिल्लाई, "हाँ! ऐसे ही! और जोर से!"

शीला की चिल्लाहट बारिश की आवाज़ में डूब गई जब पियूष ने उसे बिस्तर से उठाकर खिड़की की तरफ धकेल दिया.. ठंडी हवा ने उसके गीले शरीर पर चुभती हुई ठंडक फैला दी, पर अगले ही पल पियूष का गरम शरीर उसकी पीठ से चिपक गया.. "ओह्ह... साला कितनी ठंड है..." शीला ने अपने निप्पलों को खिड़की के शीशे से रगड़ते हुए कहा..

पियूष ने उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ा और एक झटके में अपना लंड उसकी चूत में घुसा दिया.. शीला का मुँह खुला का खुला रह गया, उसकी सांसें रुक सी गईं.. पियूष ने उसके कान में फुसफुसाया, "अब बोलिए... कैसा लग रहा है?" शीला ने हांफते हुए जवाब दिया, "ओह... ओह... बस... थोड़ा... रुक..." अब जब लंड खड़ा हो ही गया था तो पियूष का रुकने का कोई इरादा नहीं था.. उसने शीला को खिड़की के शीशे से चिपका दिया और जोर-जोर से धकेलना शुरू कर दिया..

खिड़की के शीशे पर शीला के भारी स्तन दबकर चपटे हो रहे थे.. उसकी साँसें गरम होकर शीशे पर धुंधली परत जमा रही थीं.. पियूष ने एक हाथ से उसके बाल खींचे और दूसरे हाथ से उसकी गांड के गड्ढे में अंगूठा घुसा दिया.. शीला चीख पड़ी, "आहह! नहीं... वहाँ मत... ओह्ह!" पर पियूष ने उसकी चीख को नज़रअंदाज करते हुए अपनी गति और तेज़ कर दी.. बारिश की बूंदें खिड़की पर टकरा रही थीं, मानो उनके जंगम प्रेम को देखने के लिए बेताब हों..

अचानक शीला ने पीछे हाथ बढ़ाकर पियूष की जांघों को पकड़ लिया.. "रुक... मैं... ओह्ह... मैं गिरने वाली हूँ..." वह हांफ रही थी.. पियूष ने उसे खींचकर बिस्तर की तरफ धकेला जहाँ शीला गिरते ही पलट गई और पियूष को ऊपर खींच लिया.. "अब धीरे... पूरा अंदर... ऐसे..." उसने निर्देश दिए जबकि उसके हाथ पियूष के कूल्हों पर थे, उसे नियंत्रित कर रहे थे.. पियूष ने आज्ञाकारी होकर धीरे-धीरे अपना लंड उसकी चूत में उतारा, हर इंच का आनंद लेते हुए..

शीला की आँखें बंद थीं, उसके होंठ काँप रहे थे.. "हाँ... ठीक वहाँ... ओह्ह..." वह मुस्कुराई जब पियूष ने उसके जी-स्पॉट को ढूंढ लिया.. उसने अपनी एड़ियों से पियूष की पीठ को दबाया, उसे और गहराई तक ले जाने के लिए.. कमरे में सिर्फ उनकी हांफने की आवाज़ें और बारिश की आवाज़ मिल रही थी.. पियूष ने झुककर उसके निप्पल को चूसा, शीला ने उसके बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं.. "और... और जोर से..." वह फुसफुसाई..

पियूष ने अपने घुटनों को मोड़ा और जोर से ऊपर धकेला.. शीला चिल्लाई, "ओह्ह! हाँ! ऐसे ही!" उसकी चूत पियूष के लंड को कसकर जकड़ रही थी, हर धक्के के साथ गरम पानी की धार बह रही थी.. पियूष ने उसकी टांगों को और फैलाया, अपने हाथों से उसके चूतड़ों को पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचा.. शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके होठों से लार की धारा बह रही थी.. "मुझे चोद... मुझे मार... ओह्ह!"

शीला ने अपनी आँखें खोलीं और पियूष के कंधों पर जोर से नाखून गड़ा दिए.. "रुक! मैं... मैं झड़ रही हूँ!" उसका पूरा बदन अकड़ गया, उसकी चूत में ऐंठन शुरू हो गई.. पियूष ने अपनी गति धीमी कर दी, पर रुका नहीं.. वह शीला को देख रहा था, उसके चेहरे पर आनंद के भाव, उसके स्तनों का तेजी से उठना-गिरना.. "





शीला ने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसे अपनी तरफ खींचकर एक जबरदस्त चुंबन दिया.. उनके होंठों के बीच लार की डोर बन गई.. बाहर बारिश की आवाज़ और तेज़ हो गई, मानो आसमान भी उनके जुनून से प्रभावित हो गया हो.. शीला ने चुंबन तोड़ते हुए कहा, "अब तेरी बारी... मैं चाहती हूँ कि तू मेरे अंदर झड़े.."

पियूष को पता था की अब उसके टट्टो में वीर्य का एक कतरा भी शेष नहीं बचा था.. वो अब जैसे बिना कारतूस की बंदूक चला रहा था.. फिर भी उसने शीला की टांगों को अपने कंधों पर रख लिया और जोर से धकेलना शुरू कर दिया.. शीला की चीखें कमरे में गूँजने लगीं.. उसकी चूत पियूष के लंड को निचोड़ रही थी, हर धक्के के साथ स्राव की धार बह रही थी.. पियूष का साँस लेना मुश्किल हो रहा था, उसकी पीठ पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं.. "बस अब और नहीं हो पाएगा मुझसे..." उसने हाँफते हुए कहा..

शीला ने अपनी आँखें खोलीं और उसके होठों पर मुस्कान तैर गई.. "ठीक है फिर.. झड़ जा मेरे अंदर... पूरा... ओह्ह!" उसने उसकी कमर को अपनी एड़ियों से खींचा.. पियूष का सिर पीछे की तरफ झटका और उसने एक जोरदार धक्का लगाकर लंड को गहराइयों में उतार दिया.. "ओह्ह... हाँ... ऐसे ही..." वह मुस्कुराई जब पियूष का शरीर उस पर भारी हो गया..

कुछ देर बाद जब पियूष ने अपना सिर उठाया तो शीला उसे देखकर हँस पड़ी.. उसके बाल पसीने से चिपके हुए थे, आँखें थकान से धुंधली हो रही थीं.. अस्पताल से निकले मरीज जैसा हाल था पीयूष का

"अभी से थक गया?" शीला ने उसकी ठुड्डी पकड़कर कहा.. सुनकर पीयूष के तो होश उड़ गए.. फिर भी उसने मुस्कुराते हुए उसके निप्पल को दाँतों से काटा.. "अब थोड़ा आराम तो करने दीजिए.."

"मुझे अभी और करना है पीयूष.. ऐसे मझधार में मत छोड़ मुझे" शीला ने सिसकते हुए कहा... पीयूष को तो समझ नहीं आ रहा था की अब इसके तूफान को आखिर शांत कैसे करें..

पीयूष ने अपना एक हाथ शीला के पेट पर होते हुए उसके भोसड़े तक पहुंचा दिया.. शीला ने अपनी गर्दन को पीछे की तरफ झुकाया, उसके कंधे पर दाँत गड़ा दिए जब पीयूष की उंगलियाँ उसके जामुन जैसी क्लिट को ढूँढ़ने लगीं.. "ओह्ह! आह्ह.. उफ्फ़.." शीला की साँसें उखड़ने लगी थीं.. पीयूष को लगा की अब शीला की आग उसे उंगलियों से ही बुझानी होगी..





पियूष ने उसके कान में गर्म साँस छोड़ते हुए कहा, "अब मेरी उंगलियों का मज़ा लीजिए भाभी..." उसकी उंगलियों ने एक जटिल लय बनाई.. कभी क्लिट पर गोलाई में घूमते हुए, कभी चूत के भीतर से गुजरते हुए.. शीला का शरीर तार-तार हो रहा था, उसके नाखून पियूष की जाँघों में घुस गए.. बाहर बारिश की बूँदों ने खिड़की पर एक तेज़ ताल बजा दिया, जैसे उनकी हाँफने की आवाज़ को डुबोना चाहती हों..

"बस बहुत हुआ.. अब तेरे लंड को फिर से तैयार कर.. मुझे अंदर डलवाना है" शीला ने पलटने की कोशिश की, लेकिन पियूष ने उसकी कमर को जकड़ लिया.. उसने अपनी ठुड्डी उसके कंधे पर टिका दी, उसकी उंगलियों का दबाव बढ़ा दिया.. शीला की चीख कमरे में गूँजी जब उसका शरीर एकाएक अकड़ गया.. वह जैसे हवा में लटक गई थी, उसकी चूत से पानी की धारा बह निकली..





जब पियूष को महसूस हुआ की शीला सिर्फ उंगलियों से शांत नहीं होती तब वह अपने घुटनों के बल बैठ गया.. उसने शीला के पैरों को अपने कंधों पर टिकाया, उसकी चूत को अपने सामने खींच लिया.. उसकी जीभ ने एक लंबी, धीमी रेखा खींची.. गाँड से लेकर क्लिट तक.. शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके हाथों ने चादर को जकड़ लिया.. पियूष ने उसकी चूत को अपने होंठों से चूसा, जैसे कोई प्यासा आदमी ओस की बूँदें चाट रहा हो..

शीला ने अपने घुटनों को मोड़ा, अपनी चूत को उसके मुँह की तरफ धकेला.. "और.. और गहरा," वह हाँफती हुई बोली.. पियूष ने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर घुसा दिया, गोल-गोल घुमाते हुए.. उसकी नाक शीला के क्लिट से रगड़ खा रही थी, हर साँस के साथ उसकी गंध उसे और उत्तेजित कर रही थी..

अचानक शीला ने उसके बालों को जकड़ लिया, उसके मुँह को अपनी चूत पर दबाया.. "ऐसे नहीं.. ऐसे," उसने उसके सिर को हिलाते हुए कहा.. पियूष ने अपनी उँगलियों को उसकी चूत में घुसा दिया, जीभ से क्लिट को चाटते हुए.. शीला का शरीर झटके खाने लगा, उसकी साँसें तेज हो गईं..





"हाँ.. हाँ.. ठीक वहाँ.. ओह्ह!" उसकी आवाज़ काँप रही थी.. पियूष ने उसकी चूत से अपना मुँह हटाया और उसकी गहरी साँसों को सुनकर मुस्कुराया.. उसने अपने लंड को उसकी चूत के छेद पर रगड़ा, फिर धीरे से अंदर घुसा.. शीला ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी तरफ देखा.. उसकी पुतलियाँ फैली हुई थीं, उसके होंठ गीले थे.. पियूष ने उसके स्तनों को अपने हाथों से भर लिया, उन्हें दबाते हुए आगे बढ़ा.. शीला ने अपने पैरों को उसकी पीठ पर लपेट लिया, उसे और अंदर खींचा.. थरथराते हुए शीला पीयूष के मुंह के अंदर झड़ गई.. उसके योनि-रस से पीयूष का पूरा मुंह पूत गया..

बाहर बारिश की आवाज़ तेज़ हो गई थी, लेकिन कमरे में केवल उनकी हाँफने की आवाज़ें गूँज रही थीं.. पियूष निढाल होकर शीला के आगोश में लेट गया.. उसकी हालत ऐसी थी जैसे हवा निकला हुआ गुब्बारा.. शीला उसकी सारी ऊर्जा चूसकर हवस की महारानी की तरह लेटी हुई थी.. अब जरा सी भी ताकत नहीं बची थी पीयूष में.. वो सोच रहा था की अब शीला भाभी की भूख शांत हो जाए तो गनीमत है वरना आज उसके प्राण शरीर से निकल जाएंगे..!!

पर ये तो शीला थी..!! एक ऐसी आग जिसे आप भड़का तो सकते हो पर बुझाना हर किसी के बस की बात नहीं..!! चुदाई की भूख की पीछे पनप रहे उसके मनसूबे को भांप सके उतनी बुद्धि थी नहीं पीयूष में..!! शीला का उद्देश्य पीयूष को संतुष्ट करना नहीं था.. वो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से उस हद तक थकाना और तोड़ना करना चाहती थी की उसके पास ज्यादा सोचने की शक्ति ही न बचें..

अपने दोनों चर्बी भरे विराट स्तनों को खुद के हाथों से ही मसलने के बाद, शीला ने अपने भोसड़े में तीन उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर की.. उँगलियाँ ऐसे बाहर निकली जैसे शहद में डुबोकर निकाली हो.. उन उंगलियों को अपने नथुनों तक लाकर शीला ने गहरी सांस ली.. और फिर उन्हें मुंह में ठुँसकर चाटने लगी..

शीला के बगल में ही लाश की तरह पड़ा हुआ पीयूष.. अधखुली आँखों से शीला की इस हरकत को देखता रहा.. इस औरत की बेहिसाब हवस देखकर उसे ताज्जुब हो रहा था.. सेक्स के मामले में शीला आक्रामक है यह तो पीयूष पहले से जानता था पर उसकी भूख इतनी तीव्र और उग्र होगी उसका अंदाजा आज ही हुआ..!! उसे एहसास हो गया की शीला को बिस्तर पर शांत करना किसी एक मर्द के बस की बात ही नहीं थी.. कम से कम चार-पाँच मर्द को एक ही रात में थका देने की ताकत थी उसमें.. मन ही मन पीयूष को शीला के पति मदन के प्रति आदर की भावना महसूस हुई.. जिन्होंने उतने सालों तक इस चुदक्कड़ तूफान को संभालकर रखा हुआ था..!

पीयूष शीला के बगल में पेट के बल लेटा हुआ था.. इसका कारण यह था की वो अपने लंड को शीला की नज़रों से छुपाकर रखना चाहता था.. शीला लंड देखते ही झपट पड़ती थी और अब उसमें या उसके लंड में जरा सी भी शक्ति शेष नहीं बची थी..

पर शीला आखिर शीला थी.. आखिरी संभोग के बाद जब करीब दस मिनट तक शीला बेड पर पड़ी रही.. अपने बबले खुद दबोचते हुए.. चूत रस से लिप्त उंगलियों को चाटते हुए.. तब कुछ पलों के लिए पीयूष को ऐसा लगा जैसे अब वो शांत ही पड़ी रहेगी.. थककर सो जाएगी.. और उसे भी सोने देगी.. पीयूष के जिस्म का हर कतरा थक चुका था और अब आराम मांग रहा था..

शीला अचानक से खड़ी हो गई.. "चल बाहर," आँखें बंद कर सुस्ता रहे पियूष का हाथ पकड़कर बेड से उठाते हुए कहा, "बारिश में भीगने का मज़ा लेते है.." पियूष ने आँखें खोलीं तो देखा कि शीला उसकी तरफ मुस्कुरा रही है, उसके भीगे हुए बाल उसके भारी स्तनों से चिपक रहे थे.. पीयूष ने ऐसी आँखों से शीला की तरफ देखा जैसे शेरनी के पंजे तले दबा हुआ हिरन का बच्चा खुद को छोड़ देने की विनती कर रहा हो..!!

शीला बेड से खड़ी हुई और पीयूष को लगभग घसीटते हुए छत की सीढ़ियों की तरफ ले गई.. वे दोनों बिना कपड़ों के ही छत की तरफ बढ़े, जहाँ बारिश की ठंडी बूंदें उनके गर्म शरीरों से टकरा रही थीं.. शीला ने अपने हाथों से चेहरे के बाल पीछे किए और पियूष के सामने खड़ी हो गई.. "मुझे पकड़ो," वो फुसफुसाई, और पियूष ने उसकी कमर को जकड़ लिया.. बारिश की ठंडी बूंदों से भीगकर शीला की निप्पल सख्त हो चुकी थी.. शीला की नजर पीयूष के पिचके हुए लंड पर गई.. और बिना वक्त गँवाएँ उसने अपनी हथेली से लंड को मसलना शुरू कर दिया..

ठंडे पानी से भीगकर पीयूष का बदन तरोताजा हो रहा था.. शीला का गदराया बदन बारिश में भीगकर कुछ अधिक ही सुंदर लगने लगा था.. शीला की जादुई उंगलियों ने भी अपना कमाल दिखाया.. पीयूष का मरा हुआ लंड धीरे धीरे खड़ा होने लगा.. जैसे उसे अमृत पिलाया गया हो..!!

अब शीला ने अपनी बाँहें पियूष के गले में डाल दीं और उसके होंठों को चूम लिया.. उनका चुंबन धीरे-धीरे जुनूनी होता गया, उनकी जीभें एक-दूसरे से लड़ने लगीं.. पियूष ने अपने हाथों से शीला के नितंबों को मसलना शुरू कर दिया, उसे अपने शरीर के करीब खींचते हुए.. शीला की चूत तो पहले से ही गीली थी, और अब बारिश का पानी उसके और पियूष के बीच से फिसल रहा था..

शीला ने पियूष को धक्का दिया और वह छत की दीवार से टकरा गया.. उसने मुस्कुराते हुए पियूष के लंड को पकड़ा और धीरे-धीरे उसे सहलाने लगी.. "कर दिया ना इसे फिर से तैयार..!!" मुस्कुराते हुए उसने कहा, और फिर झुककर उसे चूम लिया.. पियूष ने सिर पीछे झुकाया और आँखें बंद कर लीं, शीला के होंठों का गर्म स्पर्श उसे पागल कर रहा था..

घुटनों के बल बैठकर शीला ने अपनी जीभ से उसके लंड के सिरे को चाटना शुरू कर दिया, फिर धीरे-धीरे उसे पूरा निगल लिया.. पियूष ने अपनी उँगलियों से उसके बाल पकड़े और उसे अपने मुंह में और गहराई तक ले जाने दिया.. बारिश की बूंदें उन दोनों के शरीरों पर गिर रही थीं, लेकिन उनकी गर्मी उसे महसूस नहीं होने दे रही थी..





शीला ने उसका लंड मुंह से निकाला और खड़ी हो गई.. उसने पियूष को घूरते हुए कहा, "अब मेरी बारी.." वह दीवार की तरफ मुड़ी और अपने हाथों से दीवार पर टिक गई, अपने मोटे नितंबों को पियूष की तरफ उछालते हुए.. पियूष ने उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ा और अपने लंड को उसकी चूत के छेद पर रख दिया..

"आह्ह.. ओह्ह.. धीरे से," शीला ने मुंह बंद करते हुए कहा, लेकिन पियूष ने एक झटके में अपना पूरा लंड अंदर धकेल दिया.. शीला मदहोशी से झूम उठी.. और उसके मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई.. पियूष ने उसकी कमर को कसकर पकड़ा और तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिए.. बारिश की बूंदें उनके शरीरों पर गिर रही थीं, लेकिन उनके बीच की गर्मी कहीं ज्यादा तेज थी..

"ओह्ह.. ऐसे ही.. और जोर से!" शीला ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखते हुए कहा.. उसकी चूत पियूष के लंड को चूस रही थी, हर धक्के के साथ उसके भीतर जलन बढ़ती जा रही थी.. पियूष ने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे हाथ से उसके नितंबों को मसलते हुए उसे और पीछे की तरफ खींच लिया.. शीला की गांड उसकी जांघों से टकराई और वह आगे की तरफ झुक गई..

"तू मुझे मार डालेगा आज," शीला हांफती हुई बोली, लेकिन उसकी चूत पियूष के लंड को छोड़ने को तैयार नहीं थी.. पीयूष ने मन में सोचा "जान तो आज मेरी निकलने वाली है अगर आप नहीं रुकी तो.."

शीला ने अपने पैरों को और फैला लिया, जिससे पियूष को और गहराई तक जाने की जगह मिल गई.. पियूष ने अब उसे दीवार से दबा लिया और उसकी गर्दन पर गीले चुंबन लगाते हुए चोदना शुरू कर दिया.. शीला के मुंह से लगातार गंदी गालियां निकल रही थीं, उसकी आवाज़ बारिश में डूब जाती थी और फिर उभर आती थी..

"मैं.. मैं झड़ने वाली हूँ!" शीला ने अचानक चिल्लाते हुए कहा और उसका पूरा शरीर अकड़ गया.. पियूष ने भी अपनी गति को और तेज कर दिया, उसकी चूत के अंदरूनी हिस्से को चीरते हुए.. शीला की आँखें लुढ़क गईं और उसके होंठ कांपने लगे.. उसकी चूत से गर्म पानी बह निकला, जो बारिश के साथ मिलकर उनके पैरों के नीचे टपक रहा था..

पियूष ने अंतिम धक्का देते हुए वीर्य की कुछ बूंदें भीतर उड़ेल दी.. शीला ने अपनी पीठ को उसके सीने से दबाया और हांफते हुए कहा, "मज़ा आ गया यार.." उसके बाल बारिश से चिपक चुके थे और चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान थी..

वे दोनों छत के नीचे खिसक कर बैठ गए, एक दूसरे के शरीर से चिपके हुए.. पियूष ने अपना हाथ उसके पेट पर रखा और धीरे से सहलाया.. "गजब की हो आप तो भाभी.. मुझे पूरा निचोड़ लिया" उसने कहा.. शीला ने उसकी ओर देखा और हंस दी,

अंदर जाने से पहले उन्होंने एक बार फिर से एक दूसरे को चूमा, इस बार धीरे से, प्यार भरे चुंबन.. बारिश अब हल्की हो चुकी थी और हवा में सर्दी बढ़ गई थी.. शीला ने अपने आप को पियूष के शरीर से और चिपका लिया, उसकी गर्माहट महसूस करते हुए.. "चलो अंदर चलते हैं, नहीं तो सर्दी लग जाएगी," वह मुस्कुराते हुए बोली.. पियूष ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों बेडरूम की तरफ चल पड़े..

कमरे में प्रवेश करते ही शीला ने बिस्तर के पास खड़े होकर अपने गीले बालों को पीछे सरका दिया.. पियूष बाथरूम से तौलिया लाया और धीरे से उसके शरीर को सुखाने लगा.. तौलिया उसके निचले हिस्से पर पहुंचा तो शीला ने उसका हाथ रोक लिया और आंखों में चमक लिए बोली, "ये क्या कर रहे हो? अभी तो हमारा काम खत्म नहीं हुआ है.." शीला की बात सुनकर पियूष को चक्कर आने लगे..!!

शीला पियूष के कान के पास अपने होंठ ले गई और फुसफुसाई, "तुम भी दूसरे मर्दों की तरह मत करो, मुझे गीला छोड़ दो और फिर सुखाने आ जाओ.." यह कहते हुए उसने अपना एक हाथ उसकी जांघों के बीच सरकाया और उसके मरे हुए लंड को महसूस किया.. पियूष ने एक गहरी सांस ली और उसके कंधे पर अपना माथा टिका दिया.. "अब मुझसे और नहीं होगा भाभी.. मैं पूरी तरह थक चुका हूँ" अपनी हार मानते हुए पीयूष ने कहा..

शीला मुस्कुराई और उसने पीयूष को धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर सवार हो गई.. अपने भीगे हुए बालों को पीछे फेंका और उसके सीने पर बैठकर अपनी उंगलियों से उसके निपल्स को मसलना शुरू कर दिया.. पियूष की सांसें तेज हो गईं जब शीला ने धीरे से अपने नाखूनों से उसके सीने पर नीचे की ओर खरोंचे बनाईं.. "आज रात तुम मेरे हैं, पूरी तरह से," वह गुर्राई और फिर उसके निचले होंठ को अपने दांतों से काट लिया..

अपने शरीर पर सवार होकर उछल रही शीला को देखकर पीयूष को अब ऐसा लग रहा था जैसे कोई चुड़ैल उसका खून चूसने ऊपर चढ़ी हो.. दिमाग से चुदाई का सारा भूत उतर चुका था.. शरीर का कतरा कतरा दर्द कर रहा था.. और उसका लोडा तो ऐसे सुन्न पड़ गया था जैसे शरीर का हिस्सा ही न हो..!! पर शीला को रोक पाना उसके बस की बात नहीं थी

बेडरूम की हल्की रोशनी में शीला की गीली त्वचा चमक रही थी.. उसने पियूष की जांघों के बीच अपना हाथ सरकाया और उसके मरे हुए लंड को मजबूती से पकड़ लिया "तुम्हारा ये दोस्त थक गया लगता है" वह हंसी, "थोड़ी देर आराम करते ही फिर से तैयार हो जाएगा है.." कहते हुए शीला ने पिचके हुए लंड को मुठ्ठी में पकड़कर अपने गीले भोसड़े के होंठों पर रगड़ दिया..

पीयूष अब अपने सारे हथियार डाल चुका था.. उसने अपना शरीर और आत्मा शीला को सौंप दी थी.. और खुद को उसे समर्पित कर दिया था.. उसका जैसा मन चाहे करें.. क्योंकि अब तो विरोध करने जितनी ताकत भी नहीं बची थी पीयूष में..

शीला ने अपने वजन को थोड़ा आगे बढ़ाया और उसके मुरझाए लंड के ऊपर अपना भोसड़ा रगड़ने लगी, अपनी आंखें बंद करके उस पल का आनंद लेते हुए.. "हम्म... इस तरह भी मज़ा आ रहा है मुझे तो," वह धीरे से बुदबुदाई, वह धीरे-धीरे आगे-पीछे हिलने लगी, अपने हाथों से अपने भारी स्तनों को मसलते हुए.. पियूष लाश की तरह पड़ा रहा..

कमरे में सिर्फ शीला की सांसों और बिस्तर की टांगें हिलने की कीचुड़ कीचुड़ आवाजें ही सुनाई दे रही थीं.. शीला ने अपनी गति बढ़ा दी, अपने कूल्हों को जोर से घुमाते हुए लंड पर भोसड़ा रगड़ रही थी..

"उफ्फ़.. आहह.. ओहह..!!" शीला एक और ऑर्गेज़्म की तरफ बढ़ रही थी.. अपने गदराए बदन को पीयूष के लंड पर मथनी की तरह मथते हुए उसने दो उंगलियों से अपनी जामुन जैसी क्लिटोरिस को रगड़ना शुरू कर दिया.. बिना लंड-प्रवेश के झड़ने का यही उसका तरीका था..

एक हाथ से स्तन की निप्पल को मरोड़ रही शीला के दूसरे हाथ की उँगलियाँ उसकी क्लीट को मसल रही थी और साथ ही वो अपनी कमर को आगे पीछे घिस रही थी.. उसका शरीर खींचने लगा.. वो सीलिंग की तरफ देखते हुए कराहने लगी... एक हल्की चीख मारकर उसके भोसड़े ने ढेर सारा चिपचिपा रस पीयूष के मृत लंड पर गिरा दिया.. कुछ पलों के लिए उसी अवस्था में रहकर शीला ने इस ऑर्गेज़्म का पूरा लुत्फ उठाया.. फिर धीरे से सरककर वो पीयूष के बगल में लेट गई.. एक संतुष्टि भरी नजर से उसने खर्राटे मार रहे पीयूष की तरफ देखा और मुस्कुराकर करवट बदलकर सो गई..!!!

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पीयूष के दोस्त के खाली पड़े बंगले पर.. वो शीला भाभी के साथ अपनी रात रंगीन कर रहा था.. एक के बाद एक संभोग के दौर चलते रहे.. अलग अलग आसनों में.. बंगले की अलग अलग जगहों पर.. पीयूष थकता गया पर शीला भाभी की भूख खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.. एक चुदाई खत्म कर पीयूष अपनी सांस संभालता तब तक शीला उसे नए सिरे से उत्तेजित करना शुरू कर देती..

जब पाँच-छह बार चुदाई करने के बाद, पीयूष के शरीर ने जवाब दे दिया तब जाकर शीला ने उसकी जान छोड़ी.. यह सब शीला जानबूझकर कर रही थी.. पीयूष के उस हद तक संतुष्ट कर थका देना चाहती थी की वो उनकी किसी भी बात के लिए मना न कर सकें.. सब शीला की शातिर योजना का हिस्सा था..

अब आगे..

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दूसरी सुबह..

कमरे में एसी की हल्की गड़गड़ाहट और बाहर से छनकर आती सुबह की पीली रोशनी के सिवा कोई हलचल नहीं थी.. उस बंगले के आलीशान बेडरूम की हालत गवाही दे रही थी कि रात कितनी खूंखार रही होगी.. किंग साइज़ बेड की महंगी सिल्क की चादरें बुरी तरह से सिकुड़ी और आधी ज़मीन पर लटकी हुई थीं.. दो तकिये ज़मीन पर पड़े थे और साइड टेबल पर एक आधी पी हुई शराब की बोतल के पास पीयूष की रोलेक्स घड़ी उल्टी पड़ी थी.. पूरे कमरे की हवा में पसीने, शीला के परफ्यूम और सेक्स की वो भारी, मटमैली महक घुली हुई थी जो किसी भी इंसान के दिमाग पर चढ़ सकती थी..

पीयूष बेड के बीचों-बीच औंधे मुँह लेटा था.. उसका चौड़ा, कसरती नंगा बदन रात भर की मेहनत से टूट चुका था.. उसकी पीठ और कन्धों पर शीला के नाखूनों के हल्के लाल निशान साफ दिख रहे थे.. पीयूष ने एक गहरी साँस ली और करवट बदली.. उसकी मांसपेशियां दर्द कर रही थीं, लेकिन उसके होंठों पर एक गुरूर भरी मुस्कान थी.. एक अल्फा पुरुष वाला गुरूर.. शीला को आखिरकार तृप्त करने का..!! वो खुद को इस कमरे का, और शायद शीला का भी, सिकंदर मान रहा था..

तभी किचन से शीला बेडरूम में आई ..

पीयूष की उम्मीद के बिलकुल उलट, शीला के चेहरे पर रात भर चुदने वाली कोई थकावट या समर्पण नहीं था.. उसने एक डार्क मैरून रंग का सैटिन सिल्क का गाउन पहना हुआ था, जो उसके खरबूजे जैसे बड़े बड़े स्तनों पर पर कसा हुआ था.. उसके बाल करीने से जूड़े में बंधे थे, और चेहरे पर एक बेहद ठंडी, शातिर और रहस्यमयी मुस्कान थी.. वो एक ऐसी शिकारी लग रही थी जिसने अभी-अभी अपने जाल में एक ताज़ा शिकार फंसाया हो..

उसके हाथों में दो ब्लैक कॉफ़ी के मग थे, जिनमें से धुआँ उठ रहा था..





"और कुछ तो था नहीं किचन में.. दूध भी नहीं..!! कॉफी नजर आई तो यही बना लाई.. ये ले ब्लैक-कॉफी"

शीला अपने हाई हील्स के बिना भी इस वक्त पीयूष से कद में बड़ी लग रही थी.. उसने एक मग पीयूष के सीने के पास बेड पर रखा और खुद बेड के किनारे, एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाकर बैठ गई.. गाउन का कट उसकी जांघों तक खिसक गया, लेकिन शीला का ध्यान पीयूष के शरीर पर नहीं, उसकी आँखों पर था..

"उठ जाओ मेरे शेर..." शीला की आवाज़ मखमली थी, पर उसमें एक अजीब सी चुभन थी.. उसने अपनी कॉफ़ी का एक घूंट लिया..

पीयूष ने अंगड़ाई ली, कॉफ़ी का मग उठाया और शीला की खुली जांघ पर अपना हाथ फेरते हुए एक विजयी मुस्कान के साथ बोला, "रात की थकान अभी उतरी नहीं है भाभी... आप तो आग है, पर आपका ये शेर अब थोड़ा आराम मांग रहा है.. वैसे, कैसा रहा मेरा परफ़ॉर्मन्स रात को?" पीयूष ने अपनी मर्दानगी की तारीफ करते हुए कहा.. उसे उम्मीद थी कि शीला उसकी तारीफ करेगी, उसकी ताकत के कसीदे पढ़ेगी..

लेकिन शीला चुप रही.. वो बस अपनी ठंडी, पारदर्शी आँखों से पीयूष को देखती रही.. फिर अपनी उँगलियों को पीयूष के चौड़े सीने से सरकाते हुए उसके पेट तक ले गई.. उसकी ठंडी उँगलियों के मादक स्पर्श से पीयूष के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई.. लेकिन शीला के हाथ वहीं नहीं रुके.. उसकी उँगलियाँ चादर के नीचे सरकीं और सीधे पीयूष के शांत पड़े, थके हुए लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया..





शीला के हाथों में एक जादू था, एक तजुर्बा था.. उसने अपने नाख़ूनों से उसे हल्का सा खुरचा और फिर अपनी उँगलियों के पोरों से उसे मसलते हुए, पीयूष की सोई हुई रगों में फिर से आग लगाने की कोशिश करने लगी..

रात भर की बेतहाशा मेहनत के बाद पीयूष का शरीर पूरी तरह थक चुका था.. शीला के इस स्पर्श से उसके अंदर उत्तेजना की एक हल्की सी लहर तो उठी, लेकिन उसका थका-हारा जिस्म अब और साथ देने को तैयार नहीं था.. उसके लंड की नसें दर्द कर रही थीं..

पीयूष ने एक भारी, हताश सी साँस ली.. अपना हाथ चादर के नीचे ले जाकर शीला की कलाई को पकड़ कर रोक लिया..

"आह... भाभी... प्लीज़, अभी नहीं," पीयूष की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी, जो उसके थोड़ी मिनटो पहले वाले गुरूर से बिलकुल मेल नहीं खा रही थी "मेरा पोर-पोर टूट रहा है... रात भर आपने मुझे पूरा निचोड़ लिया है... सच कहूँ तो अब मुझमें अभी इसे खड़ा करने की ताक़त नहीं बची.."

शीला के होंठों पर एक शैतानी और मादक मुस्कान तैर गई.. यही तो वो चाहती थी.. पीयूष को यह एहसास दिलाना कि वो भले ही खुद को शेर समझता हो, लेकिन इस वक़्त वो शीला की हवस के सामने पूरी तरह बेबस है..!!

शीला एकदम आगे झुकी.. उसने अपना हाथ पीयूष की पकड़ से नहीं छुड़ाया, बल्कि उसी हालत में अपना पूरा वज़न पीयूष पर डाल दिया.. उसके पारदर्शक गाउन से झाँकती उसकी भारी, कसी हुई छाती में से एक स्तन बाहर निकालकर पीयूष के नंगी छाती पर रगड़ने लगी.. पीयूष के नथुने शीला के बदन की उस मदमस्त, जंगली खुशबू से भर गए जो रात भर उसे पागल करती रही थी..





शीला ने पीयूष की आँखों में आँखें डालीं, अपने गर्म होठों को पीयूष के कान के पास ले गई.. उसकी साँसें पीयूष की गर्दन को जला रही थीं, और तभी उसने फुसफुसाते हुए वो ज़हरीला तीर छोड़ा..

"पीयूष... तू बिस्तर पर तो वाकई शेर है.. एक नंबर का सांड.. लेकिन असल ज़िंदगी में... तू सिर्फ एक हारा हुआ मोहरा है.. मुझे तरस आता है तुझ पर.."

पीयूष का हाथ झटके से रुक गया.. उसके अंदर के मर्द को जैसे किसी ने चांटे से जगा दिया हो.. उसकी त्यौरियां चढ़ गईं..

"ये क्या बोल रही हो आप भाभी? मैं? हारा हुआ मोहरा?" पीयूष की आवाज़ में गुरूर पर लगी चोट का गुस्सा साफ़ छलक रहा था..

शीला ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा.. इसके बजाय, उसके होंठों पर एक बेहद ठंडी और चुभती हुई हँसी रेंग गई.. एक ऐसी हँसी जो किसी भी मर्द के बचे-खुचे गुरूर को बीच से चीर दे..

"बुरा लगा?" उसने पीयूष के चेहरे पर आई तिलमिलाहट को मानो किसी महंगी वाइन की तरह स्वाद लेकर चखा.. "सच हमेशा ऐसा ही नंगा होता है पीयूष... और मेरी इस बात से कहीं ज्यादा कड़वा भी.. रात भर तू मेरे ऊपर चढ़कर पागलों की तरह मुझे चोदते हुए हाँफ रहा था, यही सोचते हुए ही ना कि तूने पूरी दुनिया जीत ली? लेकिन तुझे भनक तक नहीं है मेरे शेर... कि जब तू मेरी चूत में अपना लोडा घुसकर धक्के लगा रहा था, ठीक उसी वक़्त तेरी बीवी.. तेरी वो सती-सावित्री कविता.. किसी गैर-मर्द के ख्यालों में अपनी जांघें रगड़ रही थी..!! तू यहाँ मेरे बूब्स को दबा दबाकर चूस रहा था, और वहाँ... वो किसी और के नाम से अपनी चूत गीली कर रही थी.."

"बकवास मत कीजिए भाभी...!!" पीयूष किसी घायल जानवर की तरह झटके से आगे लपका.. उसके जबड़े कसकर भिंच गए और गर्दन की नसें इस कदर तन गईं जैसे अभी फट पड़ेंगी..!! उसके काँपते हाथ से मग छूटा और उबलती हुई डार्क कॉफ़ी उस सफेद सिल्क की चादर पर एक गहरे, गंदे दाग की तरह फैल गई.. उसने शीला के दोनों कंधे अपनी भारी मुट्ठियों में दबोच लिए, "कविता के बारे में एक... एक लफ्ज़ और बका तो मैं भूल जाऊंगा की आप कौन है...!"

शीला की पलक तक नहीं झपकी.. गर्म कॉफ़ी रिसकर उसकी नंगी जांघों को छू रही थी, लेकिन वो अपनी जगह से एक सूत भी टस-से-मस नहीं हुई.. पीयूष की उँगलियाँ उसके कंधों की त्वचा में बेरहमी से गड़ रही थीं, पर शीला को दर्द का कोई एहसास नहीं था.. वो तो पीयूष की फटी हुई आँखों और उसकी काँपती हुई आवाज़ में उस खौफ, उस लाचारी और उस टूटते हुए अहंकार को देख रही थी... जिसके लिए उसने यह पूरा जाल बिछाया था.. एक मर्द का गुरूर अब उसके पैरों में बिखरे हुए काँच की तरह टूट चुका था..

"क्या करेगा? मारेगा मुझे?" शीला की आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई, एक नागिन की फुफकार जैसी.. "आँखें खोल पीयूष! कविता तुझसे बहोत दूर जा चुकी है.. उसका दिल... और उसकी प्यास... आज भी पिंटू के लिए तड़पती है.. तू उसे वो सब दे रहा है जो वो बाज़ार से खरीद सकती है, लेकिन जो उसे असल में चाहिए... वो तेरे पास नहीं, पिंटू के पास है.."

शीला के होठों से निकले वो शब्द पीयूष के कानों में किसी खौलते हुए सीसे की तरह उतरे.. शीला के कंधों पर कसी उसकी मजबूत पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगी और उसके हाथ बेजान होकर नीचे गिर गए.. पीयूष का दिमाग सुन्न पड़ने लगा था.. गुस्से की जगह अब एक भयानक, घुटन भरे सच ने ले ली थी..

दिमाग के बंद दरवाज़े अचानक एक-एक करके खुलने लगे और पिछले कई महीनों की तस्वीरें फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने दौड़ने लगीं.. कविता का वो बर्ताव... रात को बिस्तर पर आते ही हमेशा करवट बदलकर पीठ फेर लेना.. अगर पीयूष कभी प्यार से उसके बदन को छूने की कोशिश भी करता, तो उसका वो झिड़क देना या कोई न कोई बहाना बना लेना..!!

पीयूष को याद आया कि कैसे बात-बात पर कविता बेवजह क्लेश खड़ा कर देती थी.. छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाकर लड़ना, सिर्फ इसलिए ताकि दोनों के बीच एक तनाव बना रहे और उसे पीयूष के करीब न जाना पड़े.. उसका वो गुस्सा कोई नाराज़गी नहीं थी, बल्कि एक मजबूत दीवार थी जो उसने अपने जिस्म और पीयूष के बीच खड़ी कर रखी थी..

और जब कभी हफ्तों की मिन्नतों के बाद वो अपना शरीर सौंपती भी थी... तो उसमें कोई जान, कोई तड़प नहीं होती थी.. पीयूष उसके ऊपर पसीने से लथपथ होकर अपनी जान लगा देता, पर नीचे लेटी कविता एक ठंडी लाश की तरह बर्ताव करती.. न कोई सिसकी, न कोई कामुकता, न नाखूनों की खरोंच.. पीयूष उसे चूमता था, पर कविता की आँखें या तो कसकर बंद होतीं या खालीपन से छत को घूर रही होतीं, जैसे वो बस ये गिन रही हो कि कब ये सब खत्म हो और वो वापस अपनी दुनिया में लौट जाए..!!

"किसी और के ख्यालों में अपनी चूत गीली कर रही थी..." शीला का यह वाक्य पीयूष के दिमाग में हथौड़े की तरह बजा.. अब उसे समझ आ रहा था कि बिस्तर पर कविता के शरीर की वो नाममात्र की नमी, जो पीयूष अपनी जीत समझता था, वो असल में उसके लिए थी ही नहीं! वो तो पिंटू के ख्यालों का रस था..!! पीयूष तो बस उसके लिए एक मशीन था, जबकि उसका मन किसी और के बिस्तर पर था..!!

तभी पीयूष के मन में एक विचार कौंधा

"एक मिनट..." पीयूष की आवाज़ में एक गहरा भ्रम था, जैसे वो कोई पहेली सुलझाने की कोशिश कर रहा हो.... "हो सकता है की आप जो कह रही हो वो सच हो.. पर पिंटू? पिंटू तो आपका दामाद है ना..!! वैशाली का पति! अगर वो कविता के साथ चक्कर चला रहा है.. तो आपकी अपनी बेटी का घर भी तो उजड़ रहा है! और आप? आप यहाँ मेरे बिस्तर पर नंगे बदन बैठे हुए मुस्कुरा रही हो? आपको अपनी बेटी की कोई फिक्र नहीं? कैसी माँ हो आप?"

शीला ने बहुत ही इत्मीनान से पीयूष के काँपते हाथों को अपने कंधों से हटाया और अपनी जांघ पर गिरी कॉफ़ी की बूंदों को उँगलियों से पोंछते हुए एक व्यंग्यात्मक, ठंडी हँसी हँसी.. उसकी आँखों में कोई शर्म या घबराहट नहीं थी, बल्कि एक खौफनाक स्पष्टता थी..

"घर?" शीला ने पीयूष की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, "घर तो तब उजड़ता है ना पीयूष, जब वो बसा हो.. मेरी वैशाली का तो कोई घर है ही नहीं.. पिंटू मेरी बेटी का पति अब सिर्फ उस मैरिज सर्टिफिकेट पर है... बिस्तर पर नहीं"

पीयूष की भौहें सिकुड़ गईं.. "मतलब? मैं समझा नहीं..!!"

शीला की आवाज़ अब एक बर्फीली छुरी की तरह हो गई.. "मतलब ये कि पिंटू एक नंबर का नामर्द है पीयूष.. उसका लंड खड़ा ही नहीं होता.. वो वैशाली की आग बुझा नहीं पाता.. मेरी जवान आग जैसी बेटी उस घर में हर रात घुट-घुट कर मर रही है..!! पिंटू अपनी नामर्दी का फ्रस्ट्रेशन वैशाली पर निकालता है, और वहाँ तेरी बीवी उसके खयालों में डूबी हुई है..!! और तू मुझसे पूछ रहा है कि मैं शांत क्यों हूँ? मैं शांत नहीं हूँ पीयूष... मैं तो इस मरे हुए रिश्ते का अंतिम संस्कार कर रही हूँ"

पीयूष अवाक् रह गया..

शीला ने आगे झुककर पीयूष की आँखों में झाँका "सच कहूँ तो मुझे कविता से या पिंटू से कोई हमदर्दी नहीं है.. मुझे तकलीफ होती है तो अपनी बेटी को देखकर... और तुझे देखकर.. जो औरत तेरी है ही नहीं, उसे तू सोने के पिंजरे में पाल रहा है, और जो पिंटू की है, उसका बिस्तर गरम कर पाने की उसकी हेसियत नहीं बची"

शीला के होठों से निकले वो शब्द पीयूष के कानों में किसी खौलते हुए सीसे की तरह उतरे.. दिमाग के बंद दरवाज़े अचानक एक-एक करके खुलने लगे और पिछले कई महीनों की तस्वीरें फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने दौड़ने लगीं.. कविता का वो बर्ताव... रात को बिस्तर पर आते ही हमेशा करवट बदलकर पीठ फेर लेना.. अगर पीयूष कभी प्यार से उसके बदन को छूने की कोशिश भी करता, तो उसका वो झिड़क देना...

शीला ने देखा कि लोहा अब पूरी तरह से गर्म हो चुका है.. अब हथौड़ा मारने का वक़्त था.. उसने अपनी आवाज़ में अचानक से एक माँ और एक औरत दोनों की हमदर्दी मिला ली.. वो खिसक कर पीयूष के एकदम करीब आ गई.. अपनी जांघों को पीयूष के पैरों से रगड़ते हुए उसने पीयूष का चेहरा अपने हाथों में ले लिया..

"मुझे तकलीफ होती है पीयूष... तेरे जैसे मर्द को यूं घुटते हुए देखकर.. तुझे वो औरत चाहिए ही नहीं जो तेरे पीठ पीछे किसी और के नाम से आहें भरती हो.. तुझे एक ऐसी रानी चाहिए जो तेरे इस मजबूत जिस्म की भूखी हो.. जो तेरे नाम से ही मचल जाए..!!"

पीयूष ने खाली नज़रों से शीला को देखा.. "कौन?"

शीला के होंठों पर एक शैतानी, पर बेहद मादक मुस्कान तैर गई..

"मेरी वैशाली.."

पीयूष की आँखें फटी की फटी रह गईं.. "वैशाली? प.. पर वो तो? कैसे? वो तो पिंटू की है!"

शीला ने पीयूष के होठों पर अपनी उंगली रख दी.. "वो पिंटू की पत्नी सिर्फ कागज़ों पर ही है पीयूष.. मेरी बच्ची अंदर से झुलस रही है.. पिंटू... पिंटू बिस्तर पर एक नंबर का नामर्द है.. उसका खड़ा ही नहीं होता.. वो वैशाली को कैसे खुश करेगा..!! वैशाली तड़प रही है... और पता है.. बंद कमरे में वो किसके बारे में बात करती है? तेरे बारे में पीयूष.. वो कहती है कि जो आग उसके अंदर लगी है, वो सिर्फ पीयूष बुझा सकता है.."

पीयूष की साँसें भारी होने लगीं.. एक तरफ पत्नी के धोखे का ज़हर उसके खून में दौड़ रहा था, और दूसरी तरफ एक जवान, प्यासी और खूबसूरत लड़की का लालच उसकी नसों में आग लगा रहा था.. वैशाली के पीछे तो वो भी पड़ा हुआ था लेकिन पिंटू से शादी के बाद वो उससे दूरी बनाए रखती थी.. वैशाली का भरा हुआ जिस्म पीयूष की आँखों के सामने घूमने लगा.. और एक बात पीयूष के ध्यान में आई.. उस दिन रेस्टोरेंट में जब उसके पैरों पर किसी के पैरों का स्पर्श महसूस हुआ था तब उसे लगा था की वह शीला भाभी कर रही होगी.. लेकिन वैशाली के जाने के बाद जब उसने शीला से पूछा तब उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था.. मतलब साफ था.. वो हरकत वैशाली ने ही की थी.. मतलब शीला भाभी सही कह रही थी.. वैशाली उसके लिए वाकई तड़प रही थी..

शीला ने आखिरी कील ठोंक दी.. "अगर तू वैशाली को अपना ले... तो वो तुझे बिस्तर पर वो जन्नत देगी जो कविता सात जनम में नहीं दे सकती.. और पिंटू? वो वैशाली को वैसे भी खुश नहीं रख सकता, वो अपनी कविता के पास लौट जाएगा.. सबका फायदा होगा पीयूष... सोच जरा..!"

शीला उठी, अपना कॉफ़ी का मग उठाया और बाथरूम की तरफ मुड़ गई.. दरवाज़े पर रुक कर उसने मुड़कर देखा.. पीयूष का थका हुआ शरीर और दिमाग, उसका टूटा हुआ अहंकार और उसकी वैशाली को लेकर उसके मन में नई जागी हवस... सब कुछ उस कॉकटेल में डूब चुका था.. वो चादर को मुट्ठी में भींचे, शून्य में घूर रहा था..

शीला ने मन ही मन मुस्कुराते हुए बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया.. पहला मोहरा कट चुका था..!!
 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

पीयूष और शीला भाभी के बीच रातभर की जबरदस्त चुदाई के बाद सुबह होती है। पीयूष थका हुआ है लेकिन अपने पुरुषत्व पर गर्व महसूस कर रहा है। शीला उसे ब्लैक कॉफी देती है और अचानक उसकी मानसिक कमजोरी पर वार करती है। वह बताती है कि पीयूष की पत्नी कविता असल में उसके दामाद पिंटू के बारे में सोचती है। पीयूष को यह जानकर सदमा लगता है कि उसकी पत्नी बिस्तर पर उससे दूर हो चुकी है।

शीला आगे खुलासा करती है कि पिंटू नामर्द है और उसकी बेटी वैशाली तड़प रही है। वह पीयूष को प्रस्ताव देती है कि वह वैशाली को अपना ले, जिससे सबकी समस्या हल हो जाएगी। पीयूष पहले विरोध करता है, लेकिन फिर वैशाली के प्रति उसकी छिपी हुई इच्छा जाग उठती है। शीला अपनी शातिर योजना में पहला कदम सफलतापूर्वक रख देती है।

अब देखते है आगे की शीला के घर पर मदन क्या गुल खिला रहा है..

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"अरे रुखी, चम्पा को लेके आई है ना? इतनी देर क्यों लगा दी आने में?" मदन ने दरवाज़ा खोलते ही गरमजोशी से कहा, पर आँखों में वही पुरानी चमक थी.. पूरा दिन वो इन दिनों के आने के इंतेज़ार में काट रहा था.. रुखी हँसकर अंदर घुसी, अपने भारी भरकम स्तनों को हिलाते हुए, "अरे सेठ, गाऊँ गई थी चम्पा! उसकी बस छूट गई थी तो आने में देर हो गई.."

चम्पा शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी, उसकी श्याम चमड़ी पर पसीना चमक रहा था.. मदन की नज़रें सीधे उसके गाढ़े नीले ब्लाउज के भीतर झाँक रही थीं, जहाँ से दूध भरे भारी थन बाहर झाँक रहे थे.. "आ जाओ दोनों अंदर.. इससे पहले की कोई देख ले" मदन ने लार टपकाते हुए कहा





रुखी ने चम्पा का हाथ पकड़कर अंदर खींचा, "सेठ, आपकी नजर तो सीधे इसके थनों पर ही जा चिपकी.. मुझे तो ठीक से देखे भी नहीं.. कोई बात नहीं.. देखना, आज तो ये दोनों थनों से नदियां बहाएगी!" उसने चम्पा की कमर पर हाथ फेरा, "दूध से फट रही है चूचियाँ इसकी!"

मदन ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया.. अंदर की गर्म हवा का झोंका तीनों के शरीर से टकराया.. सब बेडरूम में जा पहुंचे.. अंदर पहुंचते ही रुखी ने अपनी साड़ी का पल्लू हटाकर अपने विशालकाय स्तन बाहर निकाले, "देखो सेठ, पहले इसके मजे ले लो.. बाद में इस छिनार के बबलों से चिपक जाते हो और मुझे भूल जाते हो" कहते हुए रूखी ने चम्पा के ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए.. बटन खुलते ही दो आजाद कबूतरों की तरह चमपे के बबले बाहर कूद पड़े.. स्तनों में दूध इस कदर भरा हुआ था की बिना कुछ किए ही वह दूध की बूंदें गिराने लगे.. उसकी निप्पल के सिरे गुलाबी और सूजे हुए थे





"उफ्फ़.. क्या बात है यार!" मदन की आँखें फैल गईं.. उसने चम्पा को खींचकर अपने सामने बिठाया और एक हाथ से उसके दाएं स्तन को निचोड़ा.. गर्म दूध की धारा उसकी छाती पर फूट पड़ी.. रुखी तुरंत झपटी और उसने ज़मीन पर गिरे दूध को चाटना शुरू कर दिया, "अरे वाह! ताज़ा माल!"

चम्पा हांफने लगी जब मदन ने उसके बाएं स्तन को मुँह में भर लिया.. उसकी गर्म सांसें चम्पा की नंगी त्वचा को छू रही थीं.. रुखी ने पीछे से चम्पा की साड़ी उतार दी, उसकी गोल गांड देखकर मदन की सांस तेज हो गई.. "अबे, तू भी नंगी हो जा!" मदन ने रूखी से कहा.. अपने कपड़े उतारने से पहले रुखी ने मदन की पतलून खींचकर उतार दी, उसका लंबा खड़ा लंड हवा में झूलने लगा..

"ओहो! आज तो सेठ जान ही निकाल देंगे.. आहह!" चम्पा चीख़ पड़ी जब मदन ने उसे ज़ोर से नीचे दबोचा.. रुखी तुरंत ऊपर से जुड़ गई, उसने चम्पा के दूसरे स्तन को चूसते हुए उसकी चूत पर अपनी उंगलियाँ चलानी शुरू कर दीं.. चम्पा का शरीर झटके खाने लगा, "मत कर भाभी.. हाय माँ!"

"ओह्ह इतना मीठा दूध!" मदन चम्पा के दाएं स्तन से मुँह हटाते हुए गुर्राया, उसकी दाढ़ी दूध से भीग गई थी.. रुखी पहले से ही चम्पा की चूत को चाट रही थी, उसकी जीभ गर्म गीले मांस के भीतर घुस-घुस कर चम्पा को मदहोश कर रही थी.. "ओये रुखी, मेरा भी तो ख्याल रख!" मदन ने अपना लंबा खड़ा हुआ लंड दिखाते हुए रुखी के मुँह की ओर धकेला..





रुखी ने तुरंत चम्पा की चुची को छोड़ा.. अपना मुँह फैलाया और मदन के लंड को निगल लिया, उसकी गर्दन की नसें फूल गईं जब वह उसे गहराई तक ले गई.. चम्पा अब मदहोशी से कराह रही थी, उसके स्तनों से दूध की धारा बह रही थी जो मदन के पेट पर गिरकर नीचे तक बह रही थी.. "सेठ... मेरी मुनिया में... आह्ह कुछ हो रहा है..." चम्पा ने हांफते हुए कहा, उसकी उंगलियाँ मदन के बालों में फंस गईं..

मदन ने रुखी को धक्का देकर अलग किया और चम्पा को पलटकर डोगी स्टाइल में चार पैरों पर दिया.. उसकी गोल गांड हवा में ऊपर उठी, बीच से गीली चमकती हुई चूत साफ दिख रही थी.. "हां... हां... वहीं खुजली मची हुई है..." रुखी ने चम्पा के सिर को अपनी जांघों के बीच दबा लिया और उसके बाल पकड़कर अपनी चूत पर रगड़ने लगी..

मदन ने अपने लंड पर चम्पा के दूध से ही चिकना किया और एक झटके में उसकी चूत के भीतर घुस गया.. "आईय्य्य्याह!" चम्पा की चीख कमरे में गूंज गई जब मदन का मोटा लंड उसकी तंग चूत को फाड़ता हुआ अंदर तक चला गया.. रुखी ने चम्पा के बालों को जोर से खींचा और उसके मुँह में अपनी चूत भर दी, "चूस! अच्छे से चाट मेरी बुर!"





"ओहो सेठ... जरा धीरे धीरे धक्के लगाइए... फट जाएगी मेरी!" चम्पा की आँखें लाल हो गईं जब मदन ने उसकी चूत में पूरी ताकत से धक्का दिया.. उसके विशाल स्तन हवा में झूल रहे थे, दूध की धाराएँ बिस्तर पर फैल रही थीं.. रुखी ने चम्पा के बालों को जोर से पकड़कर उसका मुँह अपनी चूत में और गहरा धँसा दिया, "चुपचाप चूसती रह! तेरे जैसी गाँव की गंवार को तो बस यही करना आता है!"

मदन की हंसी कमरे में गूंजी जब उसने चम्पा की कमर पर जोर से थप्पड़ मारा, "देख रुखी, इस चम्पा की गांड कैसे हिल रही है!" उसकी उंगलियाँ चम्पा की गोल गांड में घुस गईं, जिससे चम्पा और जोर से चिल्लाई.. रुखी ने चम्पा के स्तनों को मसलते हुए उन्हें जोर से निचोड़ा, दूध की फव्वारे सीधे रूखी के चेहरे पर उड़े..

"अब बारी मेरी!" रुखी ने मदन को धक्का देकर चम्पा से अलग किया और खुद उसकी जगह ले ली.. उसकी विशालकाय गांड हवा में ऊँची उठी, गीली चूत से रस टपक रहा था.. मदन ने लार टपकाते हुए रुखी की चूत को चाटना शुरू कर दिया, उसकी जीभ गहराई तक घुसती हुई रुखी को बेहाल कर रही थी.. "ओहो माँ रे! ऐसा जीभ मत डालो... पागल हो जाऊँगी!" रुखी की चीखें कमरे की दीवारों से टकरा रही थीं..





चम्पा, अभी तक हांफती हुई, रुखी के स्तनों से लिपट गई और उन्हें चूसने लगी.. "अरे... ये तो सूखे हुए है" चम्पा ने निराश होकर कहा.. रुखी ने चम्पा के बाल खींचे, "साली! अब तुझे दूध पिलाने के लिए फिर से बच्चा करके अपना भोसड़ा फड़वा लूँ क्या..!! दूध पीना है तो अपनी ही बड़ी चुची ऊपर कर चूस ले.. !"

दूध का नाम सुनते ही मदन ने रुखी की चूत से मुँह हटाकर चम्पा को फिर से पकड़ लिया, उसके दूध से भरे स्तनों को जोर से दबाया.. दूध की गर्म धारा उसके चेहरे पर फैल गई.. "ओहो सेठ... धीरे..." चम्पा की आवाज़ कांप रही थी..

"तुझे दूध पीना है ना..!!" कहते हुए मदन ने उसकी निप्पल से अपने मुंह में दूध भर लिया और बिना उसे निगले उसने अपने होंठ चम्पा के होंठों पर दबा दिए और अपने मुंह का सारा दूध उसके मुंह में उंडेल दिया..

रुखी अब पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी.. उससे रहा नहीं गया.. चम्पा के होंठों से दूध चाट रहे मदन के कंधों पर हाथ रखकर उसे दूर धकेला और खुद चम्पा के ऊपर चढ़ गई..

"आज तू मेरी गाय बनेगी!" रुखी ने चम्पा के स्तनों को जोर से चूसना शुरू कर दिया, एक हाथ से उसकी चूत को रगड़ते हुए.. चम्पा की आँखें पलक झपकते ही बंद हो गईं, उसका शरीर झटके खाने लगा.. मदन ने रुखी की गांड पर जोर से थप्पड़ मारा, "अबे, मेरा भी तो ख्याल रख!" उसकी उंगलियाँ रुखी की गर्म चूत के भीतर घुस गईं, जिससे रुखी चीख पड़ी..





चम्पा अब आधी बेहोश सी हो चुकी थी.. उसके भारी स्तनों से दूध की धारा बह रही थी जो रुखी के चेहरे पर फैल गई.. मदन ने रुखी को पलटकर 69 की पोजिशन में लेटा दिया.. उसने रुखी की चूत को चाटना शुरू कर दिया जबकि रुखी ने उसके लंबे लंड को मुँह में भर लिया.. चम्पा अब तक तो बस देख ही रही थी, पर उसकी चूत फिर से गीली हो चुकी थी.. वह धीरे से रेंगती हुई मदन के पास पहुँची और उसके अंडकोष को चूसने लगी.. "ओहो सेठ... ये तो मजा आ गया!" मदन की आँखें पीछे को मुड़ गईं जब दोनों औरतें उसे दोनों तरफ से निगल रही थीं..

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ए.सी. बेडरूम में रेशम की चादर से लिपटी हुई मौसम के नंगे शरीर को देखते हुए फाल्गुनी कुछ सोच रही थी.. एक छोटे से लेस्बियन सेशन के बाद मौसम थककर सो गई पर फाल्गुनी के दिमाग के विचार उसे सोने नहीं दे रहे थे.. मौसम के सो जाने के बाद जब वो रोज की तरह घर के दरवाजे को लॉक करने गई तब उसने दो गांवठी औरतों को चुपके से शीला भाभी के घर के अंदर जाते हुए देखा.. उससे पहले की वो कुछ और देख पाती घर का दरवाजा बंद हो गया

शीला भाभी तो कई दिनों से वैशाली के घर थी और घर पर मदन अकेला था.. जरूर कुछ हो रहा था शीला भाभी के पीठ पीछे.. पिछले कुछ दिनों से मदन उसे कुछ खास रिस्पॉन्स नहीं दे रहा था यह बात भी फाल्गुनी के ध्यान में थी.. इसकी तहकीकात तो होनी ही चाहिए

वो वापिस बेड पर आई यह तसल्ली करने के लिए की मौसम ठीक से सो गई या नहीं.. फिर धीरे से बेड से उठकर फाल्गुनी ने अपने नंगे बदन को एक नाइटगाउन से ढँक लिया और घर के बाहर निकली.. बाहर बेमौसम बारिश की छिटपुट बूंदें बरस रही थी

मदन के घर के कंपाउंड का दरवाजा उसने बिना आवाज किए खोला और चुपके से पीछे के रास्ते गई जहां पर शीला और मदन का बेडरूम था.. कांच की खिड़कियां अंदर से बंद थी और उसपर परदे लगे हुए थे.. पर परदे यक एक छोर थोड़ा सा हटा हुआ था जहां से अंदर का नजारा दिख रहा था

जैसा फाल्गुनी ने सोचा था वैसा ही चल रहा था.. मदन उन दोनों औरतों के साथ गुल खिला रहा था.. ध्यान से देखने पर फाल्गुनी को याद आया की दोनों में से एक औरत तो उनके दूधवाले रसिक की बीवी थी..!! क्योंकि वो भी कभी कभी दूध देने आती थी..

बारिश की हल्की फुहारों ने उसकी कलाई को गीला कर दिया था, लेकिन उसका ध्यान तो अंदर चल रही गर्माहट पर था..मदन के कमरे की गर्म हवा में दो औरतें.. रुखी और चंपा.. उसके सामने बेखौफ नंगी होकर चूदवा रही थी..

थोड़ी देर बाद मदन ने रुखी को फिर से डोगी पोजिशन में लेटा दिया.. उसने अपने लंड पर चम्पा के दूध से चिकनाई की और एक झटके में रुखी की चूत के भीतर घुस गया.. रुखी की चीख कमरे में गूंज गई, "अरे राम! ऐसा जोर मत मारो सेठ!" पर मदन को अब रुकने का मन नहीं था.. उसने रुखी की कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए.. चम्पा अब रुखी के सामने बैठ गई थी और उसके झूलते हुए स्तनों को चूस रही थी.. रुखी ने चम्पा के बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया और उसके मुँह में जोर से चुंबन लिया.. दोनों औरतों की जीभें आपस में उलझ गईं जबकि मदन पीछे से रुखी को जोर-जोर से चोद रहा था..

फाल्गुनी की साँसें तेज़ हो गईं जब मदन ने रुखी को धक्का देकर अलग किया और चम्पा को पकड़ लिया.. मदन ने चम्पा को घोड़े की तरह सवारी करने के लिए बिठाया.. चम्पा की आँखें डर से फैल गईं, "नहीं सेठ... मैं नहीं..." पर मदन ने उसकी एक न सुनी.. उसने चम्पा की कमर पकड़कर उसे अपने लंड पर बिठा दिया.. चम्पा की चीख कमरे में गूंज गई जब मदन का मोटा लंड उसकी तंग चूत को चीरता हुआ अंदर तक घुस गया.. रुखी अब पीछे से आई और उसने चम्पा के स्तनों को जोर से निचोड़ा, "चल साली, ठीक से हिल! नहीं तो मैं तेरे थन ही तोड़ दूँगी!" चम्पा ने डर से हाँफते हुए ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया.. उसके चेहरे पर दर्द और मजा दोनों के भाव थे.. फाल्गुनी के मुँह से अनजाने में एक हल्की सी आह निकल गई.. उसने अपने होठों को दबा लिया, डर कि कोई उसकी आवाज़ सुन लेगा..

मदन की आँखें चम्पा के झूलते हुए स्तनों पर टिकी थीं.. उसने एक हाथ से चम्पा के दाएं स्तन को निचोड़ा.. गर्म दूध की धारा सीधे उसके मुँह में फूट पड़ी.. "ओहो!" मदन ने लार टपकाते हुए कहा.. रुखी तुरंत झपटी और उसने चम्पा के बाएं स्तन को अपने मुँह में भर लिया.. दोनों ओर से चूसे जाते हुए चम्पा का शरीर झटके खाने लगा.. उसकी चूत से रस टपक रहा था जो मदन के जांघों पर गिर रहा था..

फाल्गुनी की उँगलियाँ अब अपनी भीगी हुई चूत को रगड़ने लगी थीं.. वह खिड़की के शीशे से सटकर खड़ी थी, उसकी साँसें गर्म होकर शीशे पर धुंधला रही थीं..





रुखी ने मदन को धक्का देकर हटा दिया और खुद चम्पा के ऊपर चढ़ गई.. उसने चम्पा के दोनों स्तनों को जोर से निचोड़ा, दूध की गर्म धाराएँ उनके चेहरों पर फैल गईं.. "अब तेरी बारी है गोरी!" रुखी ने चम्पा की चूत को जोर से फैलाकर अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया.. चम्पा का शरीर झटके खाने लगा, उसकी आँखें पलक झपकते ही बंद हो गईं.. मदन ने खड़े होकर इस दृश्य का आनंद लिया, अपने लंबे लंड को हाथ से पकड़कर जोर-जोर से मसलने लगा.. चम्पा जोर जोर से कराह रही थी और फाल्गुनी के कानों में वह आवाज़ गूँजने लगी जैसे कोई दूर से आती हुई बारिश की फुहार..

अब रुखी ने चम्पा को पलट दिया और उसकी गांड हवा में उठा दी.. उसने चम्पा की तंग गांड के छेद को अपनी उंगलियों से खोलना शुरू कर दिया.. "नहीं भाभी... वहाँ नहीं... दर्द करेगा..." चम्पा ने डर से काँपते हुए कहा.. पर रुखी ने उसकी एक न सुनी.. उसने मदन की ओर देखा, "लो सेठ, आज तो इसकी गांड भी मारोगे न?" मदन की आँखें चमक उठीं.. उसने अपने लंड पर चम्पा के दूध से चिकनाई की और धीरे से चम्पा के गुदा के पास टिका दिया.. चम्पा की चीख कमरे में गूंज गई जब मदन का मोटा लंड धीरे-धीरे उसकी तंग गांड के भीतर घुसने लगा.. रुखी ने चम्पा के सिर को पकड़कर उसे चूमा, "धीरे-धीरे सहलाओ सेठ को... अभी तेरी चूत की तरह ढीली हो जाएगी..."





अंदर का नज़ारा देखकर फाल्गुनी की हथेली तेजी से नीचे रगड़ने लगी.. उसकी उँगलियाँ अपनी गीली चूत की परतों में घुस गईं, और वह मदन की तरह ही चंपा की आवाज़ों की नकल करने लगी.. "अह... हाँ... ऐसे ही..." वह फुसफुसाई, जैसे कोई भूखी चुहिया अनाज के ढेर में छुपकर खाती हो.. उसकी आँखें अंदर के दृश्य पर टिकी हुई थीं

थोड़ी देर बाद मदन ने चम्पा की गांड में पूरी तरह घुसकर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए.. चम्पा के आँसू निकल आए थे, पर उसके चेहरे पर दर्द के साथ-साथ एक अजीब सी खुशी भी थी.. रुखी अब चम्पा के सामने बैठ गई थी और उसके स्तनों को चूसते हुए अपनी गीली चूत को चम्पा के मुँह की ओर धकेल रही थी.. चम्पा ने रुखी की चूत को अपने होठों से छुआ तो रुखी चीख पड़ी, "हाँ छिनार! ऐसे ही चाट! तेरी जीभ बड़ी कटिली है!"

मदन ने चम्पा की गांड से अपना लंड निकाला और रुखी को पकड़कर डोगी पोजिशन में लेटा दिया.. उसने रुखी की गांड पर थप्पड़ मारा, "अब तेरी बारी है रूखी!" रुखी ने पीछे मुड़कर देखा तो मदन ने अपना लंड उसकी गांड के छेद पर टिका दिया.. रुखी बोली "अरे सेठ! धीरे से करना.. फिर सुबह बहोत दिक्कत होती है..." पर मदन ने उसकी कमर जोर से पकड़कर एक झटके में अपना लंड अंदर धकेल दिया.. रुखी की चीख पूरे कमरे में गूंज गई, उसके नाखून चादर को फाड़ने लगे..





चम्पा अब उठकर बैठ गई और रुखी के सामने जाकर उसके स्तनों को मसलने लगी.. "कैसा लग रहा है भाभी?" चम्पा ने शरारत भरी मुस्कान के साथ पूछा.. रुखी ने उसके बाल खींचे, "साली, मेरे मजे ले रही है!" मदन ने रुखी की गांड पर थप्पड़ मारा और जोर से धक्का दिया.. रुखी की साँसें तेज हो गईं, उसका मुँह खुला रह गया.. चम्पा ने फौरन अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी.. दोनों औरतों की जीभें फिर उलझ गईं जबकि मदन पीछे से रुखी की गांड को जोर-जोर से चोद रहा था..

थोड़ी देर बाद मदन ने रुखी को पलटकर चित कर दिया.. उसने रुखी की चूत पर थूक लगाया और अपना लंड वापस उसकी चूत में घुसा दिया.. रुखी ने राहत की साँस ली और अपनी टाँगें मदन की कमर पर लपेट लीं.. चम्पा अब रुखी के सिर के पास बैठ गई और उसने अपनी गीली चूत रुखी के मुँह के ऊपर लटका दी.. रुखी ने चम्पा की चूत को जीभ से चाटना शुरू कर दिया.. मदन ने रुखी की चूत में तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिए, हर धक्के के साथ रुखी का मुँह चम्पा की चूत में और गहरा धँसता जा रहा था..

फाल्गुनी की उँगलियाँ तेजी से चलने लगीं.. उसे लगा जैसे वह अंदर ही लेटी है, और मदन उसकी चूत में लंड डाल रहा है.. उसकी साँसें तेज हो गईं जब उसने मदन को रूखी की चूत को धनाधन चोदते देखा.. रूखी की आँखें पलकों में डूब गईं, और उसके बड़े बड़े स्तन मदन के हर धक्के के साथ आगे पीछे होने लगे.. फाल्गुनी ने अपनी उँगलियों को गहराई तक घुसा दिया, और उसकी चूत से निकला गीला पानी उसके गाउन को और भीगोने लगा.. उसका मन कर रहा था की वो भी इन तीनों के साथ शरीक हो जाए पर इन गंवार औरतों के साथ ये सब करना उसे ठीक नहीं लग रहा था

अब मदन ने रूखी की चूत से लंड निकाला और उसे उठाकर कुर्सी पर बिठा दिया.. उसकी चौड़ी गांड कुर्सी के किनारे से लटक रही थी, चूत से रस की धारा बह रही थी.. "अब तेरी और चम्पा की बारी एक साथ!" मदन ने हांफते हुए कहा.. चम्पा डर से कांप उठी जब मदन ने उसे खींचकर रुखी की गोद में बिठा दिया.. रुखी ने चम्पा की कमर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा, उनके स्तन आपस में दब गए.. मदन ने अपना लंबा लंड दोनों औरतों की चूतों के बीच में रखा और जोर से धक्का दिया..

"हाय राम!" दोनों औरतें एक साथ चीख उठीं जब मदन का गर्म लंड उनकी नम चूतों के बीच में घिसने लगा.. कभी वो रूखी की चूत में डालता तो कभी चम्पा में.. रुखी ने चम्पा के बाल पकड़े और उसके मुँह पर जोर से चुंबन लगाया.. चम्पा की जीभ रुखी के मुँह में घुस गई जबकि मदन उन दोनों के बीच अपने लंड को आगे-पीछे कर रहा था.. कमरे में तीनों के हांफने और चूमने की आवाजें गूंज रही थीं..

बाहर बारिश की बूँदें अब तेज हो रही थीं, लेकिन फाल्गुनी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.. उसका सारा ध्यान अंदर के उस मंज़र पर था.. मदन बारी बारी चम्पा रूखी की चूतें चोद रहा था.. तीनों साथ में हांफ रहे थे और फाल्गुनी की उँगलियाँ भी उसी ताल पर नाच रही थी..

थोड़ी देर इसी तरह चोदते रहने के बाद मदन ने चम्पा को उठाकर बेड पर लिटा दिया.. उसने चम्पा की टाँगें कंधों पर रखीं और उसकी चूत में जोर से घुस गया.. चम्पा की आँखें पलक झपकते ही बंद हो गईं, उसके होंठ काँपने लगे.. रुखी कुर्सी से उठकर अब चम्पा के सिर के पास बैठ गई और उसने अपनी गीली चूत चम्पा के मुँह पर लटका दी.. "चाट साली!" रुखी ने चम्पा के बाल खींचते हुए कहा.. चम्पा ने डर से रुखी की चूत को अपनी जीभ से छुआ तो रुखी चीख उठी, "हाँ! ऐसे ही!"





मदन अब चम्पा को जोर-जोर से चोद रहा था, उसकी तंग चूत से चिकनाई की फ़च फ़च की आवाजें आ रही थीं.. रुखी ने चम्पा के स्तनों को निचोड़ा, दूध की कुछ बूँदें निकलकर चम्पा के पेट पर गिर गईं.. मदन ने झुककर उन बूँदों को चाट लिया.. रुखी हंस पड़ी और उसने चम्पा के दूसरे स्तन को मुँह में भर लिया.. चम्पा का शरीर झटके खाने लगा, उसकी चूत से रस की धारा बह निकली..

आखिरी चंद धक्के लगाते हुए मदन ने अपना सारा गाढ़ा माल चम्पा की बुर में बौछार दिया.. और साथ रूखी भी अपनी क्लिटोरिस को रगड़ते हुए पानी बहाने लगी.. इन तीनों की इस अवस्था में देख फाल्गुनी ने भी अपनी चूत को ऐसे दबोचकर निचोड़ा की उसका पानी बह गया.. अंदर तीनों बेड पर पड़े पड़े हांफ रहे थे तब फाल्गुनी ने धीरे से अपना गाउन ठीक किया और चुपके से अपने घर चली आई
 
स्टोरी अपडेटेड

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

शीला के घर पर, मदन जबरदस्त अईयाशियाँ कर रहा है.. रूखी और साथ में चम्पा के रूप में मिली दोनों दुधारू गायों का वो मन भरकर मज़ा उठा रहा है.. और उसे यह सब करते हुए फाल्गुनी देख लेती है और वह खुद भी उत्तेजित हो जाती है..

तो दूसरी तरफ शीला ने पीयूष के साथ एक जबरदस्त रात बिताकर उसे अपने काबू में कर लिया था.. उसने पीयूष के दिमाग में यह बीज भी बो दिया था की वह कविता को छोड़कर वैशाली को अपना ले.. क्योंकि उसकी पत्नी कविता, उसकी कभी थी ही नहीं.. और दूसरी तरफ वैशाली उसे हर प्रकार का शारीरिक सुख दे सकती थी जो वो चाहता था.. शीला की धारदार दलीलों को सुनकर पीयूष का मन भी वैशाली की ओर ढलने लगा.. वैसे भी वो कविता से परेशान था और वो भी उससे हर वक्त चिड़चिड़ी रहती थी..

अब आगे देखते है की शीला अपनी अगली चाल कैसे चलती है..

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सुबह की नर्म, सुनहरी धूप वैशाली के घर के छोटे से आँगन में उतर रही थी, मानो रात के गहरे गुनाहों और बुनी गई साज़िशों पर चालाकी से एक उजली चादर डाल रही हो। शीला दरवाज़े की चौखट पर टिक कर खड़ी थी। उसकी पारखी आँखों ने पीयूष की चमचमाती ब्लैक मर्सिडीज़ को तब तक घूरा, जब तक वह गली का आख़िरी मोड़ मुड़कर नज़रों से पूरी तरह ओझल नहीं हो गई। गाड़ी के टायरों से उड़ी हल्की सी धूल हवा में तैर रही थी, ठीक उसी तरह जैसे पीयूष की ज़िंदगी में अब एक बड़ा भूचाल आने वाला था।

शीला ने एक लंबी, संतुष्ट साँस ली और दरवाज़ा बंद कर लिया। घर के अंदर एक गहरा सन्नाटा पसरा था। वैशाली अपने ऑफिस के लिए निकल चुकी थी, और इस वक्त घर का यह खालीपन शीला के लिए किसी वरदान से कम नहीं था।

अंदर आते ही शीला को अपनी शारीरिक हालत का अंदाज़ा हुआ। उसके कदम भारी हो रहे थे और जांघों की नसें शिथिल पड़ चुकी थीं। रात भर चली उस बेतहाशा जिस्मानी आग, हर हद को पार कर जाने वाली उठा-पटक और बेइंतहा सेक्सुअल एनकाउंटर्स ने सिर्फ पीयूष को ही नहीं, बल्कि शीला को भी बुरी तरह निचोड़ कर रख दिया था। उम्र के इस पड़ाव पर पीयूष जैसे एक भूखे और जुनूनी मर्द को संतुष्ट करने में उसने अपनी देह की ऊर्जा का कतरा-कतरा झोंक दिया था। उसकी कमर दर्द से टीस रही थी और आँखों में नींद की भारी खुमारी थी, लेकिन दिमाग किसी रडार की तरह सक्रिय था।

थकान से चूर शीला सीधे किचन की तरफ गई और गैस जलाकर चाय का पानी चढ़ा दिया। उबलते हुए पानी में चायपत्ती डालते हुए उसके होठों के कोनों पर एक बेहद सधी हुई, धारदार और शैतानी मुस्कान रेंग गई।

शतरंज की बिसात पर जब वज़ीर अपनी सबसे घातक चाल चलता है, तो ज़ाहिर है वो खुद भी थकता है। लेकिन एक शातिर खिलाड़ी को असली सुकून अपनी थकान मिटाने में नहीं, बल्कि सामने वाले राजा के किले को ताश के पत्तों की तरह ढहते हुए देखने में मिलता है। शीला के लिए भी यह थकान उस जीत की कीमत थी, जो अब महज़ चंद कदमों की दूरी पर थी।

चाय के उबलने की आवाज़ के बीच शीला का दिमाग बड़ी तेज़ी से दौड़ रहा था। वह बाखूबी जानती थी कि पीयूष इस वक्त शारीरिक रूप से एक खाली खोल से ज़्यादा कुछ नहीं है। एक ऐसा मर्द, जिसकी देह आराम के लिए तड़प रही है, लेकिन जिसका दिमाग शीला के उकसाए हुए एक भयंकर और मीठे नशे—'वैशाली'—में पूरी तरह धुत है। शीला ने बड़ी ही चालाकी से पीयूष के ज़ेहन में वैशाली के सुडौल, भरे-पूरे जिस्म, उसकी अतृप्त प्यास और उसकी दहकती जवानी का ऐसा बीज बो दिया था, जो अब एक परजीवी (parasite) की तरह उसके पूरे वजूद को जकड़ चुका था। पीयूष का शरीर भले ही लाचार था, लेकिन उसकी बेलगाम कल्पनाओं में सिर्फ और सिर्फ वैशाली का तिलिस्म राज कर रहा था।

शीला ने उबलती हुई चाय को कप में छाना और दीवार घड़ी की तरफ देखा। उसकी आँखें सिकुड़ गईं। वक्त बहुत कम था। पीयूष का घर यहाँ से महज़ बीस मिनट की दूरी पर था। शीला को अपनी अगली और सबसे निर्णायक चाल पीयूष के घर पहुँचने से ठीक पहले चलनी थी। उसे उस बारूद में चिंगारी लगानी थी, जिस पर कविता बैठी थी, और वो भी तब जब पीयूष रास्ते में हो।

चाय की उठती हुई भाप के बीच शीला ने कप को होठों से लगाया। चाय की पहली घूंट ने गले को तर किया और उसके अंदर की थकान को थोड़ी देर के लिए पीछे धकेल दिया। एक खतरनाक और कामुक शिकारिन से वह महज़ कुछ सेकंड में एक हमदर्द और फिक्रमंद भाभी के मुखौटे में छुप गई। उसने अपना फोन उठाया और बिना एक पल गँवाए कविता का नंबर डायल कर दिया। वह जानती थी कि पीयूष की जिस्मानी कमज़ोरी और मानसिक भटकाव के इसी सटीक तालमेल के बीच, कविता के सब्र पर आखिरी हथौड़ा मारने का इससे बेहतर मौका फिर कभी नहीं आएगा।

चाय के कप से उठती भाप के बीच शीला ने फोन को कान से लगाया। दूसरी तरफ जैसे ही कॉल उठी, शीला के चेहरे के सख्त और शातिर भाव एक झटके में पिघल गए। उसकी आवाज़ में एक ऐसी गहरी, सधी हुई और बनावटी फिक्र उतर आई, जिसे सुनकर कोई भी धोखा खा जाए।

"हैलो... कविता..." शीला की आवाज़ अब दुनिया की सबसे फिक्रमंद, हमदर्द और दुखी भाभी की आवाज़ थी। उसने अपने शब्दों में हल्की सी कंपकपी भी मिला दी थी, जैसे वह सच में कविता के दर्द से टूट चुकी हो।

"देख कविता... परसों जब तेरे घर आई थी और तू मेरे कंधे पर सिर रखकर किसी छोटी बच्ची की तरह फूट-फूट कर रो रही थी न, तो सच कहूँ मेरा कलेजा फट गया था। तेरे उन महँगे कपड़ों और झूठी मुस्कान के पीछे छुपी तेरी वो जानलेवा तड़प, वो घुटन... मुझसे देखी नहीं गई। जब से मैंने तेरे वो आँसू गिरते देखे हैं, मेरे अंदर की माँ बर्दाश्त न कर सकी.. मेरी तो रातों की नींद ही उड़ गई है मेरी बच्ची।"

शीला एक पल के लिए रुकी, ताकि उसके शब्द कविता के ज़ेहन में परसों वाली उस गहरी और जज़्बाती बातचीत को पूरी तरह से ताज़ा कर दें। फिर उसने अपने तरकश का सबसे ज़हरीला तीर निकाला, जिस पर हमदर्दी का मीठा लेप लगा था।

"तुझे याद है न मैंने उस दिन तुझे क्या समझाया था? कि तुझे हारना नहीं है, इस अकेलेपन के ज़हर को नहीं पीना है। मैंने कहा था न कि अगर पीयूष तुझे वो जगह नहीं दे रहा, तो तुझे अपना हक़ छीनना होगा! आज वही दिन है कविता। मेरी बात मान, आज एक आखिरी कोशिश कर। अपने इस दम तोड़ते रिश्ते को बचाने के लिए आज अपना सब कुछ दांव पर लगा दे। आज पीयूष को वो सब दे, जिसकी उसे चाहत है, जिसे वो बिज़नेस के बहाने बाहर ढूँढता है। अपने गुरूर, अपनी झिझक को ताक पर रखकर, आज उसे अपना वो रूप दिखा जो उसने कभी न देखा हो। लेकिन..."

शीला ने अपनी आवाज़ को अचानक बहुत गंभीर और भारी कर लिया, ठीक वैसे ही जैसे उस दिन ड्रॉइंग रूम में उसने कविता का चेहरा हाथों में थाम कर कहा था।

"अगर आज, तेरे इस चरम समर्पण के बावजूद वो इंसान नहीं पिघला.. अगर आज भी उसने तुझे ठुकरा दिया.. तो समझ लेना कि वो पत्थर है, वो तेरे लायक कभी था ही नहीं। मैंने उस दिन भी कहा था न, कुछ प्यार मुकम्मल होने के लिए नहीं बने होते। अगर पीयूष आज भी तुझे वो प्यार न दे सके, तो खुद को इस खूबसूरत कब्र में मत दफनाना। फिर तू वही करना जो तेरा दिल पिंटू के लिए कहता है। फिर तुझे आज़ाद होने का पूरा हक़ है।"

फोन कट गया। दूसरी तरफ, अपने उस महलनुमा घर के विशाल और सन्नाटे से भरे बेडरूम में, कविता के हाथ से फोन फिसल कर रेशमी चादर पर गिर पड़ा। उसकी आँखों में पिछले कई दिनों से तैर रही बेबसी और आंसुओं की धुंध अचानक छंट गई थी। उसकी जगह एक अजीब सी, खतरनाक चमक और 'करो या मरो' वाली ज़िद ने ले ली थी।

शीला भाभी ने अनजाने में ही सही.. जैसा कविता को लग रहा था, उसे एक नैतिक छूट दे दी थी.. या तो आज पीयूष उसका हो जाएगा, या फिर वो हमेशा के लिए अपनी उस घुटन से आज़ाद होकर पिंटू की हो जाएगी। शीला ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला था, एक ऐसी मनोवैज्ञानिक चाल चली थी, जिसका वार खाली जाना नामुमकिन ही नहीं, असंभव था।

रिश्तों की बिसात का भी अपना एक बेहद क्रूर और स्याह फलसफा होता है। कई बार इंसान एक गहरे भ्रम में जीता है, यह सोचकर कि वह अपने फैसले खुद ले रहा है, अपनी किस्मत की लकीरें खुद खींच रहा है; जबकि हकीकत में वह किसी और के रचे हुए अदृश्य चक्रव्यूह में महज़ एक बेबस कठपुतली की तरह नाच रहा होता है। उसकी डोर किसी और की उँगलियों में उलझी होती है और वह अपनी आज़ादी के गुमान में अपने ही पतन की ओर बढ़ रहा होता है।

शीला ने उस भयानक चक्रव्यूह का दरवाज़ा पूरी तरह खोल दिया था। कविता पूरे जोश और शिद्दत से उस आग में कूदने को तैयार थी, यह सोचकर कि वो इस आग से अपने ठंडे पड़ चुके वैवाहिक जीवन को गर्माहट देगी।

लेकिन बेचारी कविता यह नहीं जानती थी कि जिस आग को वो भड़काने जा रही है, उसे बुझाना तो दूर, पीयूष इस वक्त उसकी आँच तक सहने की हालत में नहीं था..!! एक तरफ कविता की दबी हुई, हताश और आक्रामक कामुकता थी, जो आज अपना वजूद बचाने के लिए हर हद पार करने को तैयार थी.. तो दूसरी तरफ पीयूष का वो निढाल, थका-हारा शरीर था, जिसका पोर-पोर शीला ने निचोड़ लिया था, और जिसका दिमाग अब सिर्फ वैशाली के ख्यालों की गिरफ्त में था। एक भयंकर विस्फोट अब बस कुछ ही पलों की दूरी पर था।

पीयूष जब अपने महलनुमा घर के भारी नक्काशीदार सागौन के दरवाज़े को धकेल कर अंदर दाखिल हुआ, तो उसकी हालत ऐसी थी जैसे कोई सिपाही किसी बेहद लंबी, हिंसक और थका देने वाली जंग हार कर लौटा हो। रात भर शीला की अनुभवी और हवस से भरी देह के साथ चली उस बेतहाशा जिस्मानी उठा-पटक वाली चुदाई ने उसके पौरुष का कतरा-कतरा निचोड़ लिया था। उसकी जांघों की नसें दर्द से चीख रही थीं, चाल में एक अजीब सा भारीपन था और आँखों के नीचे थकान के गहरे, काले घेरे छाये थे।

लेकिन इस चरम शारीरिक पतन के बीच, उसके जेहन में एक अलग ही मानसिक व्यभिचार (mental adultery) उबल रहा था। उसके दिमाग में वैशाली के बड़े बड़े बबले, भरे-पूरे जिस्म, उसकी दहकती जवानी और शीला द्वारा बुने गए उस रंगीन, कामुक भविष्य की तस्वीरें एक थ्री-डी फिल्म की तरह चल रही थीं। शीला ने उसके अंदर एक ऐसा मीठा ज़हर भर दिया था, जिसने उसे यह पूरा विश्वास दिला दिया था कि वो एक ऐसा अभागा राजा है जो गलत, ठंडी रानी कविता के साथ फँस गया है, जबकि उसकी असली मल्लिका वैशाली, जिसके जिस्म में उसके जैसी ही आग थी, वो कहीं और किसी नामर्द के साथ फँसकर घुट रही थी।

ड्रॉइंग रूम में पीयूष के भारी कदमों की आहट सुनते ही कविता किचन से बाहर आई। पीयूष को देखते ही उसके कदम ठिठक गए। पीयूष के बाल बुरी तरह बिखरे हुए थे, महँगी फॉर्मल शर्ट की ऊपर की दो बटनें टूटी हुई थीं, और उसके कॉलर से एक अजीब सी अनजानी महक, जो शीला के मादक परफ्यूम की थी, वह आ रही थी, जिसे पीयूष ने अपनी पसीने की बदबू से ढंकने की नाकाम कोशिश की थी।

हल्की सी हैरानी, शक और फिक्र के मिले-जुले भाव के साथ कविता ने पूछा "पीयूष? सुबह के साढ़े नौ बज रहे हैं... रात भर कहाँ थे तुम? तुम्हारा फोन कल शाम से लगातार आउट ऑफ रीच आ रहा था। मैं पूरी रात सो नहीं पाई इस बड़े से घर में। और तुम्हारी ये हालत.. तुम्हारी आँखें इतनी लाल क्यों हैं? सब ठीक तो है?"

पीयूष ने बिना उसकी आँखों में देखे, अपनी कार की चाबी काँच की मेज़ पर इतनी ज़ोर से फेंकी कि उसकी झंकार पूरे हॉल में गूँज गई। कविता का इस तरह सवाल पूछना उसे पत्नी की फिक्र नहीं, बल्कि एक जेलर की पूछताछ लग रही थी। शीला के कहे शब्द.. 'वो तुम्हें कभी नहीं समझ सकती पीयूष, वो सिर्फ तुम्हें कंट्रोल करना जानती है'.. उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगे।

रूखेपन और तीखी खीझ के साथ पीयूष ने जवाब दिया "मुझसे पुलिस की तरह तहकीकात मत करो कविता! मैं कोई भगोड़ा नहीं हूँ। एक बहुत बड़ा ओवरसीज़ प्रोजेक्ट था.. क्लाइंट्स के साथ ओवरनाइट मीटिंग चल रही थी। मेरा सिर दर्द से फट रहा है और मेरा शरीर इस वक्त टूट रहा है। मुझे तुम्हारे इन फिजूल के सवालों का कोई जवाब नहीं देना।"

कविता ने उसकी बेरुखी को उसकी बिज़नेस की थकान समझ कर एक घूंट में पी लिया। शीला भाभी के फोन कॉल ने उसके अंदर जो नई उम्मीद और करो या मरो की ज़िद जगाई थी, उसने उसे आज हर कड़वाहट को बर्दाश्त करने की ताकत दे दी थी।

अपनी आवाज़ को जानबूझकर बहुत नर्म करते हुए कविता ने कहा, जैसे किसी बीमार को सहला रही हो "ठीक है पीयूष, मैं और सवाल नहीं पूछूँगी। तुम रिलैक्स करो। मैं तुम्हारे नहाने के लिए गीजर ऑन कर देती हूँ। ऑफिस कितने बजे निकलना है तुम्हें? तुम्हारी ब्लू वाली सूट निकाल दूँ?"

जूते उतारते हुए, बेपरवाही और चिड़चिड़ाहट से पीयूष ने कहा "मैं आज ऑफिस नहीं जा रहा। पूरा दिन घर पर ही हूँ। मेरे कमरे के पर्दे गिरा देना और मुझे कोई डिस्टर्बेंस नहीं चाहिए। बस सोना है मुझे.. बहोत थक गया हूँ।"

यह सुनते ही कविता की आँखों में एक अचानक सी चमक आ गई। उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। 'पूरा दिन घर पर?' उसे लगा जैसे कायनात शीला भाभी की भविष्यवाणी को सच कर रही है। आज पीयूष घर पर था, आज उसे मीटिंग्स की जल्दी नहीं थी, और आज ही उसे अपनी आखिरी, सबसे बड़ी चाल चलनी थी।

कविता ने पीयूष के नहाने के दौरान किचन में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। उसने नौकरों को बाहर कर दिया। पूरे घर में देसी घी में सिकते पराठों और अदरख वाली हर्बल चाय की महक फैल गई। उसे लगा जैसे ये नाश्ता महज़ खाना नहीं, बल्कि उनके ठंडे पड़ चुके, बंजर रिश्ते में प्यार का बीज बोने की एक आखिरी कोशिश है।

पीयूष नहाकर निकला। गरम पानी ने उसकी मांसपेशियों की जकड़न को थोड़ा कम ज़रूर किया था, लेकिन रात भर की जिस्मानी लूट ने उसे खोखला कर दिया था। शीला ने उसके अंग अंग को ऐसा निचोड़ा था की उसमें अब रत्तीभर की ताकत नहीं बची थी.. उसका लंड भी दर्द से चीख रहा था.. वो सीधे बेडरूम की तरफ जा ही रहा था कि कविता ने उसे डाइनिंग एरिया के पास रोक लिया। उसने आगे बढ़कर अपना हाथ पीयूष के कंधे पर रखा।

पीयूष का शरीर झिझक से हल्का सा पीछे हट गया। रात भर शीला के नाखूनों और दांतों के निशानों से छिले उसके शरीर पर कविता का यह स्पर्श उसे राहत के बजाय एक चुभन सा लग रहा था।

बेहद मीठी आवाज़ में कविता ने कहा "पीयूष, बस दस मिनट के लिए रुक जाओ। मैंने तुम्हारे लिए नाश्ता लगाया है। तुम्हारी पसंद के पनीर स्टफ्ड पराठे बनाए हैं, अपने हाथों से। आओ न, बैठो।"

कविता का हाथ झटककर पीयूष ने जवाब दिया "कविता, मुझे बिल्कुल भूख नहीं है। मुझे उबकाई आ रही है। मैंने कहा न मुझे सिर्फ और सिर्फ सोना है। तुम खा लो और मुझे बख्श दो।"

पीयूस के पास आकर, लगभग गिड़गिड़ाने वाले अंदाज़ में कविता ने कहा "प्लीज़ पीयूष... ऐसा मत करो। तुम रात भर से भूखे-प्यासे काम कर रहे थे। खाली पेट सो जाओगे तो एसिडिटी हो जाएगी और सिर का दर्द और बढ़ जाएगा। सिर्फ दो निवाले खा लो। बहुत महीनों बाद मौका मिला है कि हम सुबह आराम से साथ हैं.. मेरे लिए ही सही... प्लीज बैठ जाओ न।"

पीयूष ने एक गहरी, झुंझलाहट भरी साँस ली। वो इस वक्त बहस करके अपनी बची-खुची ऊर्जा और अपना दिमागी सुकून खत्म नहीं करना चाहता था। उसने बिना कोई जवाब दिए, भारी कदमों से डाइनिंग टेबल की कुर्सी खींची और धम्म से बैठ गया।

इटालियन मार्बल की उस विशाल डाइनिंग टेबल पर चाँदी के बर्तनों में शाही नाश्ता सजा था। सब कुछ परफेक्ट था, सिवाय उस इंसान के, जिसके लिए ये सब किया गया था। पीयूष ने बिना किसी दिलचस्पी के, एक मशीन की तरह पराठे का टुकड़ा तोड़ा और मुँह में रख लिया। उसे खाने के स्वाद से कोई मतलब नहीं था। जब कविता उसे पराठा परोस रही थी, तो पीयूष की नज़रें कविता पर नहीं थीं.. उसका दिमाग तो वैशाली की उस कल्पना में डूबा था कि कैसे वैशाली अपने कामुक होंठों से उसे चूमती, कैसे उसके पौरुष को अपनी आग में पिघला देती।

डाइनिंग टेबल पर एक अजीब सा, दमघोंटू सन्नाटा था। सिर्फ चम्मच और कांटों के टकराने की तीखी आवाज़ उस बड़े से कमरे में गूँज रही थी। कविता ने उस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की।

उम्मीद भरी नज़रों से पीयूष को देखते हुए कविता ने पूछा "कैसा बना है? याद है शादी के शुरुआती दिनों में, जब संडे को हमेशा हम ऐसे ही बैठकर नाश्ता किया करते थे.. मैं तुम्हें अपने हाथों से खिलाती थी। हम कितना हँसते थे न पीयूष?"

कविता की बात बीच में ही काटते हुए, निहायत ही सर्द आवाज़ में पीयूष ने जवाब दिया "ज़िंदगी बहुत आगे बढ़ चुकी है कविता, और तुम आज भी उन्हीं पुरानी यादों का अचार डाल रही हो। इंसान को प्रैक्टिकल होना चाहिए। पराठा ठीक बना है, बस नमक थोड़ा कम है।"

पीयूष का ये रूखा, भावनाओं से खाली जवाब कविता के उत्साह पर बर्फ के ठंडे पानी की तरह गिरा, लेकिन उसने शीला की सिखाई बात याद रखी 'अपना सब कुछ दांव पर लगा दे'। उसने पीयूष के गिलास में थोड़ा और फ्रेश संतरे का ज्यूस डाला।

चेहरे पर ज़बरदस्ती एक मुस्कान लाते हुए, आवाज़ में थोड़ी और मिठास घोल कर कविता ने कहा "कोई बात नहीं, अगली बार ध्यान रखूँगी। अच्छा पीयूष.. आज तुम पूरे दिन घर पर हो.. तुम्हें ऑफिस नहीं जाना है.. तो क्या हम शाम को कहीं बाहर चलें? सिर्फ हम दोनों। कोई बढ़िया सी जगह डिनर पर चलेंगे, लॉन्ग ड्राइव पर जाएँगे। मुझे सच में तुम्हारे साथ थोड़ा वक्त बिताना है... एक पत्नी होने के नाते, मुझे मेरी जगह चाहिए पीयूष।"

पीयूष के हाथ एकदम से रुक गए। उसने ज्यूस का गिलास इतनी ज़ोर से टेबल पर पटका कि थोड़ा सा ज्यूस छलक कर टेबल क्लॉथ पर गिर गया। उसकी आँखों में अब साफ तौर पर भयंकर गुस्सा, चिड़चिड़ाहट और एक अजीब सी नफरत थी।

आवाज़ को ऊँचा करते हुए, एक-एक शब्द चबाकर बोलते हुए पीयूष उबल पड़ा "तुम्हारे दिमाग में क्या भूसा भरा है कविता? तुम्हें मेरी बात एक बार में समझ क्यों नहीं आती? मैंने अभी तुमसे क्या कहा? मैं रात भर से जगा हुआ हूँ, मेरा शरीर टूट रहा है, मेरी नसें फट रही हैं... और तुम्हें डिनर डेट की सूझी है? लॉन्ग ड्राइव?"

पीयूष कुर्सी को ज़ोर से पीछे धकेलते हुए खड़ा हो गया।

पीयूष: "तुम्हारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम ही यही है कविता! तुम सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचती हो! मेरी थकान, मेरी दिमागी परेशानी, मेरे बिज़नेस का प्रेशर.. इन सबसे तुम्हें कोई मतलब नहीं! तुम्हें बस एक शो-पीस पति चाहिए जो तुम्हारे साथ ड्राइव पर जाए और तुम्हें डिनर कराए। तुम मेरी शांति कभी बन ही नहीं पाईं!"

इंसान जब किसी दूसरे के नशे में होता है, तो उसे अपने सामने वाले का प्यार भी एक बोझ, एक सज़ा और एक साजिश लगने लगता है। पीयूष के लिए कविता का ये समर्पण, ये नाश्ता, ये प्यार भरे शब्द.. सब कुछ एक बेमतलब का शोर था। उसके दिमाग का कैनवस को शीला ने वैशाली के वाइल्ड और कामुक रंगों से इतना भर दिया था कि कविता के इस घरेलू और सीधे-सादे प्यार के लिए अब वहाँ कोई जगह बची ही नहीं थी।

कविता का गला रुंध गया, उसके होंठ कांपने लगे, लेकिन उसने अपने आँसुओं को पलकों के किनारे ही रोक लिया। वो चुपचाप पीयूष को देखती रही। पीयूष ने अपनी प्लेट आधी अधूरी छोड़ी, नैपकिन से अपने होंठ पोंछे और गुस्से में फुफकारता हुआ बेडरूम की तरफ चला गया।

पीछे डाइनिंग टेबल पर कविता अकेली रह गई। लेकिन शीला के उस आखिरी मास्टरस्ट्रोक ने उसे इतना ज़िद्दी बना दिया था कि ये छोटी सी हार उसे रोक नहीं सकती थी। उसे तो आज अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी आर-पार की लड़ाई लड़नी थी। नाश्ते की मेज़ पर भले ही पीयूष ने उसे ठुकरा दिया हो, लेकिन बेडरूम की बंद दीवारों के पीछे, अपने जिस्म और अपने हुस्न के उस आखिरी मादक हथियार का इस्तेमाल करना अभी बाकी था, जिसके लिए वो अब खुद को तैयार करने जा रही थी। उसने ठान लिया था कि या तो आज ये दूरियाँ मिट जाएंगी, या फिर ये रिश्ता हमेशा के लिए ख़ाक हो जाएगा।

बेडरूम के भारी, गहरे रंग के मखमली पर्दों ने सुबह की तेज़ धूप को पूरी तरह से बाहर ही रोक दिया था। कमरे में एक कृत्रिम रात का सा सन्नाटा और अँधेरा पसरा था। पीयूष का थका-हारा, टूटा हुआ शरीर उस किंग-साइज़ बेड के नर्म गद्दे में धँसता जा रहा था। रात भर शीला के साथ बिताए गए उस बेतहाशा जंगलीपन ने उसकी हर एक नस को सुन्न कर दिया था। कुछ ही पलों में नींद एक गहरे, काले कुएँ की तरह उसे अपनी आगोश में ले रही थी।

तभी कमरे के भारी दरवाज़े के खुलने की एक बेहद हल्की सी क्लिक आवाज़ हुई।

कविता अंदर आई। उसने आहिस्ता से दरवाज़ा लॉक कर दिया। अगर यह कोई और दिन होता, कोई और आम रात होती, तो दरवाज़े पर खड़ी कविता का यह रूप देखकर पीयूष के होश उड़ जाते, उसके अंदर का सोया हुआ मर्द एक झटके में जाग उठता। कविता ने खुद को एक बेहद कामुक, पारदर्शी और मादक काले रंग की लेस लॉन्जरी में सजा रखा था। उस जालीदार, महीन काले कपड़े से झांकता उसका दूधिया गोरा बदन एक अजीब सा तिलिस्म पैदा कर रहा था। लॉन्जरी का डीप नेकलाइन उसके उभरे हुए, सुडौल स्तनों की कशिश को और भी ज़्यादा उभार रहा था। उसकी कमर के पास कसा हुआ वो रेशमी धागा और पारदर्शी कपड़ा उसकी जवानी की पूरी दास्तान बिना कुछ कहे ही बयान कर रहा था। योनि की रेखा उस महीन कपड़े से छनकर नजर आ रही थी.. शैम्पू किए हुए सुगन्धित, खुले बाल उसके नंगे कंधों पर बिखरे हुए थे.. होठों पर लगी गहरे लाल रंग की लिपस्टिक उसके इस करो या मरो वाले इरादे की खुली गवाही दे रही थी।

जब कोई औरत अपने आत्मसम्मान और अपनी झिझक की आखिरी दीवार भी गिरा देती है, तो उसका जिस्म महज़ हाड़-मांस का एक ढाँचा न रहकर, एक दहकता हुआ हथियार बन जाता है। कविता आज वही हथियार बनकर आई थी.. अपनी दम तोड़ती शादी को बचाने की आखिरी, हताश और सबसे आक्रामक कोशिश।

कविता ने कमरे की मेन लाइट बंद कर दी और सिर्फ बेडसाइड की एक वार्म, डिम एम्बर लाइट ऑन रहने दी, जिसकी सुनहरी रौशनी उसके काले लिबास और गोरे बदन पर एक जादुई चमक बिखेर रही थी। कमरे के सर्द एसी वाले माहौल में अचानक उसके महँगे फ्रेंच परफ्यूम, जिसमें कस्तूरी-मस्क और वेनिला की एक बेहद नशीली और उत्तेजक महक थी.. उस महक ने घुलना शुरू कर दिया।

वह किसी बिल्ली की तरह दबे पाँवों बिस्तर पर चढ़ी और पीयूष के पास जाकर लेट गई। उसने अपने तपते हुए, रेशमी जिस्म को पीयूष की ठंडी और थकी हुई पीठ से पूरी तरह सटा दिया। उसके बबलों की गर्माहट पीयूष की पीठ पर साफ़ महसूस हो रही थी। कविता ने अपनी नर्म, कांपती हुई उंगलियाँ पीयूष के बिखरे बालों में फेरीं और अपने होंठ पीयूष के कान के बिल्कुल करीब ले गई।

"पीयूष..." कविता की आवाज़ महज़ एक पुकार नहीं थी.. उसमें एक मदहोश कर देने वाली कशिश, एक भूखी औरत की तड़प और सालों की दबी हुई प्यास थी। उसकी गर्म साँसों की आँच सीधे पीयूष की गर्दन पर पड़ रही थी।

लेकिन पीयूष? पीयूष का दिमाग शीला के भरे हुए वैशाली के नशे में कैद था और शरीर शीला की दी हुई उस भयंकर जिस्मानी थकान में चूर था। कविता का यह मादक स्पर्श, उसकी वो नशीली महक उसे किसी जन्नत का एहसास नहीं पर एक भारी चुभन जैसा लग रहा था। नींद की गहरी खुमारी और भयंकर झुंझलाहट में, पीयूष ने एक हिंसक झटके के साथ कविता का हाथ अपने बालों से हटाकर दूर फेंक दिया।

"प्लीज़ कविता... मेरा दिमाग खराब मत करो!" पीयूष की आवाज़ में नींद, तीखी चिड़चिड़ाहट और एक अजीब सी नफरत घुली हुई थी। "मुझे सोने दो। मेरा शरीर टूट रहा है। मेरी रगों में दर्द हो रहा है और मैं बहुत थका हुआ हूँ। मुझे इन सब चीज़ों में कोई इंटरेस्ट नहीं है।"

पीयूष ने करवट बदली और कविता की तरफ पीठ कर ली, मानो उसने कविता के उस दहकते हुए हुस्न, उसकी तैयारियों और उसके इस चरम समर्पण को किसी रद्दी कागज़ की तरह ठुकरा दिया हो।

लेकिन कविता कहाँ रुकने वाली थी? उसके दिमाग में तो शीला भाभी के वो ज़हरीले शब्द हथौड़े की तरह बज रहे थे 'आज अपना सब कुछ दांव पर लगा दे... अपना वो रूप दिखा जो उसने कभी न देखा हो.. हार मत मानना'। शीला की उस मनोवैज्ञानिक साज़िश ने कविता को इतना ज़िद्दी बना दिया था कि पीयूष का यह तिरस्कार उसे पीछे धकेलने के बजाय और भी ज़्यादा आक्रामक कर रहा था।

कविता ने हार नहीं मानी। उसने अपनी झिझक और शर्म की आखिरी चादर भी उतार फेंकी। वह थोड़ा और आगे खिसकी और पीयूष के ऊपर आधी चढ़ गई। उसने अपने होंठों से पीयूष के नंगे, थके हुए कंधे को ज़ोर से चूमा, उसे अपने दांतों से हल्का सा काटा और अपना एक हाथ पीयूष के सीने पर खिसकाते हुए उसकी धड़कनों के पास रख दिया।

"हमेशा थके क्यों रहते हो पीयूष?" कविता की आवाज़ में अब प्यार कम और एक अधिकार भरी, हताश ज़िद ज़्यादा थी। उसने पीयूष के सीने के बालों में अपनी उँगलियाँ फंसाते हुए, उसके कान में फुसफुसा कर कहा, "ये थकान, ये काम, ये बिज़नेस... ये सब तो ज़िंदगी भर चलता रहेगा। आज तो तुम मेरे पास हो.. मेरे अपने घर में, मेरे बिस्तर पर। मुझे तुम्हारी ज़रूरत है पीयूष.. एक औरत की तरह मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। मुझे ऐसे अधूरा और अकेला मत छोड़ो।"

रिश्तों की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक पत्नी, अपने ही पति के बिस्तर पर, अपने हक़ के लिए एक भिखारिन की तरह गिड़गिड़ा रही थी और साथ ही उसे लुभाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी। और वो पति, जो पूरी रात किसी गैर औरत के जिस्म की भूख मिटा कर आया था, अपनी ही पत्नी के इस मादक हुस्न को एक सज़ा मान रहा था।

पीयूष का सब्र, जो पहले ही रात भर की भयंकर जिस्मानी थकान और शीला के उकसावे के कारण एक कच्चे धागे से बंधा था, इस मादक लेकिन हताश स्पर्श से एक झटके में टूट गया। नींद की खुमारी और शीला द्वारा उसके दिमाग में भरा गया वैशाली का नशा—सब कुछ एक विस्फोटक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।

उसने एक हिंसक और क्रूर झटके के साथ कविता को खुद से दूर धकेला। पीयूष का धक्का इतना ज़ोरदार था कि कविता का संतुलन बिगड़ गया और वह बिस्तर के दूसरे छोर पर जाकर गिरी।

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या कविता?!" पीयूष चीख पड़ा। उसकी आवाज़ बेडरूम की उस कृत्रिम शांति को चीरती हुई गूँजी। उसकी आँखें नींद और गुस्से से लाल अंगारे जैसी हो रही थीं। "तुम्हें मेरी बात एक बार में समझ नहीं आती? मैंने कहा न मैं थका हुआ हूँ! मेरा शरीर टूट रहा है! इंसान हूँ मैं, तुम्हारी हवस मिटाने की कोई मशीन नहीं!"

कविता, जो अभी-अभी झटके से बिस्तर पर गिरी थी, एक पल के लिए सन्न रह गई। उसकी आँखों में अविश्वास तैरा। उसने अपनी सारी झिझक, अपना सारा आत्मसम्मान दांव पर लगाकर खुद को इस पारदर्शी काले लिबास में सिर्फ पीयूष के लिए सजाया था, और बदले में उसे एक फटे हुए चीथड़े की तरह दुत्कार दिया गया। अगले ही सेकंड, उसके अंदर की वो औरत पूरी आक्रामकता के साथ जाग उठी जिसका चरम तिरस्कार किया गया था। वह बिस्तर पर ही घुटनों के बल बैठ गई, उसके नंगे, गोरे कंधों पर बाल बिखरे हुए थे, लेकिन अब उसके जिस्म की कामुकता की जगह एक खूंखार गुस्से ने ले ली थी।

"हवस?!" कविता की आवाज़ में एक तीखी, काँच जैसी चुभन थी। वह ज़ोर से चीखी, "मेरी हवस?! एक पत्नी अपने पति से प्यार और अपना हक़ मांग रही है, और तुम उसे हवस का नाम दे रहे हो? अगर तुम्हें मुझे छूने में इतनी ही मौत आती है, तो शादी क्यों की थी मुझसे पीयूष? सिर्फ मुझे एक सजावटी कुतिया की तरह पालने के लिए? जो कोने में पड़ी रहे?"

"अपनी ज़बान पर लगाम दो कविता!" पीयूष बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। उसकी मुट्ठियाँ कस गई थीं और माथे की नसें तन गई थीं। "तुम मुझे क्या सिखाओगी? तुमने मुझे दिया ही क्या है? सिर्फ शिकायतें और अपनी ये रोज़-रोज़ की ड्रामेबाज़ी! कभी मेरे वक्त को लेकर, कभी मेरे काम को लेकर! तुम्हें क्या लगता है, ये ऐश-ओ-आराम, ये गाड़ियाँ, ये नौकर.. ये सब आसमान से टपकते हैं? मैं दिन-रात जो खून-पसीना एक करता हूँ, वो किसके लिए करता हूँ?"

जब एक रिश्ते में संवाद खत्म हो जाता है, तो इंसान सिर्फ अपनी कुंठाओं को शब्दों में लपेट कर सामने वाले पर फेंकता है। पीयूष का गुस्सा उसकी अपनी कमज़ोरी और शीला के साथ किए गए धोखे को छुपाने का एक हिंसक तरीका था, जबकि कविता का गुस्सा उसके बरसों के अकेलेपन का लावा था।

"तुम्हारा खून-पसीना?!" कविता ने एक बेहद ज़हरीली, तिरस्कार भरी और चुभती हुई हँसी हँसी। उसने बिस्तर से उतर कर पीयूष की आँखों में सीधे देखते हुए कहा। अब उसका लहज़ा इतना धारदार था जो किसी भी मर्द के अहंकार को चीर कर रख दे। "तुम्हें अपने इस बिज़नेस और अपनी इस दौलत पर बहुत गुरूर है न पीयूष? तो आज एक सच सुन लो, जिसे तुम रोज़ आईने के सामने खड़े होकर झुठलाते हो!"

कविता ने पीयूष के बिल्कुल करीब आकर, उसकी आँखों में आँखें डालते हुए फुफकार कर कहा, "ये बिज़नेस तुम्हारा नहीं है पीयूष! ये साम्राज्य तुमने नहीं खड़ा किया! ये मेरे मरे हुए बाप, सुबोधकांत की खैरात है जो तुम्हें मिली है! तुम उनके पैसों पर, उनकी छोड़ी हुई गद्दी पर बैठे एक एहसान-फरामोश इंसान हो! तुम मेरे बाप के टुकड़ों पर पल रहे हो और मुझे ही मेरी औकात दिखा रहे हो?"

खैरात और बाप के टुकड़ों जैसे शब्द सुनते ही पीयूष का पौरुष, उसका झूठा अहंकार और उसका घमंड पूरी तरह तिलमिला उठा। एक ऐसे मर्द के लिए जो अपनी सेल्फ-मेड छवि पर घमंड करता हो, उसे उसकी पत्नी द्वारा यह याद दिलाना कि वह सिर्फ अपने ससुर की मेहरबानी और मौत का फायदा उठाकर यहाँ तक पहुँचा है, उसकी नामर्दगी साबित करने जैसा था। शीला ने वैसे ही उसे वैशाली का लालच देकर उसे ये विश्वास दिला दिया था कि वो कविता से कहीं बेहतर का हक़दार है। और अब कविता की इस बात ने आग में घी नहीं, सीधा बारूद डाल दिया था।

पीयूष की साँसें धौंकनी की तरह चलने लगीं। उसका पूरा शरीर गुस्से से कांपने लगा। उसकी आँखों में एक डरावना, वहशीपन उतर आया।

"मेरी औकात?" पीयूष दाँत पीसते हुए गुर्राया। "तुम मुझे मेरी औकात बताओगी?"

"हाँ! बताऊँगी!" कविता भी पीछे नहीं हटी, वो भी उसी आक्रामकता से चीखी। "क्योंकि तुम सिर्फ एक खोखले इंसान हो! एक नाकाम पति जो अपनी पत्नी को न बिस्तर पर संतुष्ट कर सकता है और न ही..."

चटाक्!!

इससे पहले कि कविता अपना वाक्य पूरा कर पाती, पीयूष का भारी और बलिष्ठ हाथ पूरी ताकत से हवा में उठा और कविता के गाल पर एक भयंकर तमाचे की तरह जड़ उठा।

तमाचे की गूँज उस बड़े से, शांत बेडरूम में किसी बम के फटने जैसी थी। वार इतना ज़ोरदार और अप्रत्याशित था कि कविता हवा में ही घूम गई और सीधा साइड टेबल से टकराती हुई फर्श पर जा गिरी। टेबल पर रखा क्रिस्टल का लैंप ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया, ठीक उसी तरह जैसे उन दोनों का बचा-खुचा रिश्ता।

कमरे में अचानक एक भयानक, श्मशान जैसा सन्नाटा छा गया। सिर्फ पीयूष की भारी, हाँफती हुई साँसों की आवाज़ और टूट कर बिखरे हुए काँच के टुकड़ों के हिलने की हल्की सी आवाज़ आ रही थी।

कविता ज़मीन पर गिरी थी। उसके मादक काले पारदर्शी लिबास की एक पट्टी कंधे से खिसक गई थी। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसके गोरे गाल पर पीयूष की चार उँगलियों के निशान लाल सुर्खी की तरह छप गए थे और उसके होंठ के दाहिने कोने से खून की एक बारीक, गाढ़ी लकीर रिस कर उसकी ठुड्डी तक आ गई थी।

लेकिन उसकी आँखों में... उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं था। न ही कोई खौफ। सिर्फ एक डरावना, सर्द और पत्थर जैसा ठहराव था।

वह धीरे-धीरे ज़मीन से उठी। उसने अपने होंठ से रिसते खून को अपने अँगूठे से पोंछा और पीयूष को एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें पीयूष के लिए कोई इंसानियत नहीं बची थी।

"बहुत हो गया पीयूष..." कविता की आवाज़ अब चीख नहीं रही थी, बल्कि वो इतनी सर्द और खामोश थी कि पीयूष की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। "तुमने आज अपना असली रूप दिखा दिया। तुमने मुझे मेरे बाप की दौलत की सही कीमत चुकाई है। अब इस घर में, और तुम्हारे साथ.. मेरा एक पल भी रुकना मेरे वजूद के लिए गाली होगी। मैं आज, और अभी... तुम्हें हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हूँ।"

पीयूष ने उसे एक पल के लिए देखा। शीला का ज़हर, उसका खुद का टूटा हुआ अहंकार और रात भर की थकान.. इन सबने मिलकर उसके सोचने-समझने की ताकत को लकवा मार दिया था। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था, सिर्फ एक बेतहाशा गुस्सा और आज़ादी की एक हिंसक चमक थी।

"जाओ! दफा हो जाओ यहाँ से! भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी वो बाप की दौलत!"

गुस्से में फुफकारता हुआ पीयूष पलटा, उसने ज़मीन पर पड़े अपने कपड़े उठाए, अपनी कार की चाबी उठाई और कमरे से बाहर निकल गया। कुछ ही सेकंड बाद घर का मुख्य दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि बेडरूम की खिड़कियों के मोटे काँच थरथरा गए।

पीछे कमरे में, टूटे हुए लैंप के काँच के टुकड़ों के बीच खड़ी कविता की आँखों में अब एक ऐसी आग जल रही थी जो सब कुछ भस्म करने वाली थी। शीला की बिछाई हुई बिसात का सबसे अहम मोहरा अब पूरी तरह से कट चुका था। वैशाली और पीयूष के एक होने का रास्ता अब लहूलुहान होकर खुल चुका था।

शहर के दूसरे छोर पर, वैशाली के घर की छोटी सी छज्जे वाली बालकनी में बैठी शीला अपनी चाय का कप पकड़े हुए एक गहरी, सर्द और आत्मसंतुष्ट मुस्कान के साथ दूर आसमान को घूर रही थी। चाय से उठती हुई भाप उसके चेहरे की लकीरों पर एक रहस्यमयी, लगभग शैतानी साया डाल रही थी। जहाँ एक तरफ पीयूष के महलनुमा घर में चीख-पुकार, काँच के टूटने और एक पवित्र रिश्ते के हमेशा के लिए बिखरने का खौफनाक बवंडर शांत हुआ था, वहीं दूसरी तरफ शीला के अंदर एक ऐसा खामोश सुकून था, जो किसी शातिर ग्रैंडमास्टर को अपनी सबसे पेचीदा चाल के सफल होने पर मिलता है।

उसकी बिछाई हुई शतरंज की बिसात पर कोई आम खेल नहीं चल रहा था। इंसानी जज़्बातों, हवस, कुंठा और कमज़ोरियों का वो खौफनाक खेल था, जिसमें शीला ने खुद अपने हाथों से एक भी मोहरा नहीं पीटा.. बल्कि उसने अपनी चालों से मोहरों को कुछ इस तरह आमने-सामने खड़ा कर दिया कि उन्होंने अपनी ही तलवारों से एक-दूसरे का कत्ल कर दिया। पीयूष और कविता.. दोनों ही उसके रचे हुए चक्रव्यूह की वो अंधी कठपुतलियाँ बन गए थे, जिन्हें आखिरी साँस तक यही लगता रहा कि वो अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, अपने फैसले खुद ले रहे हैं।

एक बेहतरीन साज़िश वो नहीं होती जिसमें दुश्मन को मारा जाए, बल्कि वो होती है जिसमें दुश्मन खुद अपने हाथों से अपना घर जला दे और साज़िश रचने वाले को अपना सबसे बड़ा हमदर्द माने। शीला की यह साज़िश इसी फलसफे का एक जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण थी।

शीला की इस शानदार जीत के पीछे कोई संयोग नहीं, बल्कि इंसानी मनोविज्ञान की एक बेहद गहरी और डरावनी समझ थी। उसने बड़ी ही बारीकी से दोनों पति-पत्नी की ब्रेकिंग पॉइंट की पहचान की थी और उन पर एक साथ, लेकिन अलग-अलग तरीकों से वार किया था।

शीला जानती थी कि पीयूष को सीधे तौर पर कविता के खिलाफ नहीं भड़काया जा सकता। इसलिए उसने पीयूष के लिए अपनी अनुभवी देह का इस्तेमाल महज़ एक हथियार के रूप में किया। उसने रात भर पीयूष को इतना निचोड़ा, उसकी शारीरिक ऊर्जा को इतना सोख लिया कि उसकी सोचने-समझने की दिमागी नसें पूरी तरह सुन्न पड़ गईं। और जब पीयूष का दिमाग अपनी सबसे कमज़ोर और लाचार अवस्था में था, तब शीला ने बड़ी ही चालाकी से उसके जेहन में वैशाली नाम का वो मीठा और मादक ज़हर इंजेक्ट कर दिया। उसने पीयूष के पुरुषार्थ को सहलाते हुए उसे यह विश्वास दिला दिया कि वह किसी जन्नत का हक़दार है, जो उसे कविता के पास कभी नहीं मिलेगी।

दूसरी तरफ, कविता के साथ उसने जो खेल खेला, वो मनोवैज्ञानिक युद्ध की एक मिसाल था। शीला जानती थी कि एक हताश औरत का सब्र तब सबसे जल्दी टूटता है, जब उसे किसी अपने से झूठी हमदर्दी मिल जाए। शीला ने फिक्रमंद भाभी का चोला पहनकर कविता की बरसों की दबी जिस्मानी और जज़्बाती कुंठा को चिंगारी दी। उसने कविता को यह एहसास दिलाया कि पीयूष को लुभाने की ये कोशिश उसकी आखिरी लड़ाई होनी चाहिए। शीला ने बहुत चालाकी से कविता के दिमाग में पिंटू का बैकअप प्लान भी डाल दिया था, ताकि जब पीयूष उसे ठुकराए, तो कविता टूटकर बिखरने के बजाय, विद्रोह कर दे और घर छोड़कर चली जाए।

शीला का सबसे बड़ा अस्त्र उसकी टाइमिंग थी। उसने फोन करके कविता को ठीक उसी वक्त बेडरूम में अपना हुस्न लेकर जाने को कहा, जब पीयूष रास्ते में था.. थका हुआ, चिड़चिड़ा, नींद में चूर और वैशाली के ख्यालों में धुत। शीला को सौ प्रतिशत यकीन था कि इस वक्त पीयूष, कविता के उस कामुक और आक्रामक रूप को प्यार नहीं, बल्कि एक भारी चुभन और सिरदर्द मानेगा। दोनों की टाइमिंग का यह बेमेल टकराव एक ऐसा बारूद था, जिसे फटना ही था।

चाय का आखिरी घूंट गले के नीचे उतारते हुए शीला ने कप को टेबल पर रखा। उसकी आँखें अब एक खूंखार, लालची और विजयी चमक से भर उठी थीं।

वैशाली के लिए उस आलीशान महल का, इटालियन मार्बल से सजे उन कमरों का, उस बेहिसाब दौलत का और पीयूष जैसे एक संपूर्ण, जुनूनी मर्द के बिस्तर का रास्ता अब पूरी तरह से साफ हो चुका था। सुबोधकांत का खड़ा किया हुआ वो करोड़ों का साम्राज्य अब उसकी बेटी के कदमों में आने वाला था।

लेकिन शीला के चेहरे की वो शैतानी मुस्कान इसलिए सबसे गहरी थी क्योंकि इस पूरी तबाही में किसी को भी, कभी भी शीला पर ज़रा सा भी शक नहीं होने वाला था। कविता हमेशा यही सोचेगी कि शीला भाभी ने उसका घर बचाने की आखिरी कोशिश करवाई थी, और पीयूष हमेशा शीला का एहसानमंद रहेगा कि उसने उसे एक घुटन भरी शादी से निकालकर वैशाली जैसी 'आग' सौंप दी। शीला ने सिर्फ घर नहीं तोड़ा था, उसने अपने हाथों को साफ रखते हुए एक नया साम्राज्य जीत लिया था।
 
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