घर लौटते वक्त उसने फोन करके रेणुका को पूरी बात बताई.. शीला और रेणुका अब इतने करीब आ चुके थे की एक दूसरे को सारी बातें बताने लगे थे.. पर रेणुका ने सामने से ऐसे समाचार दीये.. जिसे सुनकर शीला अपना टेंशन भूल गई.. लेकिन उसे पता नहीं चल पा रहा था की यह सुनकर वो खुश हो या दुखी..!!
रेणुका ने शीला को बताया की... वो प्रेग्नन्ट थी.. !!
शीला ने मज़ाक करते हुए कहा "यार रेणुका, क्या लगता है तुझे.. किसका बच्चा होगा?? राजेश का या मदन का?"
रेणुका: "शीला, तेरे तो मजे है यार.. जब ईवीएम मशीन ही खराब हो चुका हो तो बोगस वोटिंग होने की कोई टेंशन ही नहीं.. हा हा हा हा हा.. !! अब वो तो मुझे भी पता नहीं की किसका होगा.. अगर मदन जैसा बच्चा हुआ तो मिठाई तुझे बाँटनी पड़ेगी"
शीला ने हँसते हुए कहा "साली मादरचोद.. ऐसा करूंगी तो पूरे शहर को पता चल जाएगा की मदन तुझे चोदता है.. और मैं तेरे पति से चुदवाती हूँ"
रेणुका: "तूने ये क्यों नहीं सोचा.. की मदन या राजेश के अलावा भी किसी और का हो सकता है.. !!"
शीला: "बाप रे.. वो तो मैंने सोचा ही नहीं.. सच सच बता.. कितने लोडो से चुद रही है तू?"
रेणुका ने जवाब नहीं दिया पर हँसते हँसते पाकीज़ा फिल्म का गाना गुनगुनाने लगी
𝄞..𝄞..चलते चलते... यूं ही कोई.. मिल गया था..♬⋆.˚
शीला: "चल अब फोन रखती हूँ.. अपना खयाल रखना.. !!"
रेणुका: "ख्याल रखने मे तो ऐसा है की.. तू अपने पति को यहाँ मत भेजना.. मुझे तो उससे ही सब से ज्यादा खतरा है.. और तो किसी बात से मुझे कुछ प्रॉब्लेम नहीं होने वाली"
शीला: "चल अब फोन रख.. घर आ गया मेरा"
शीला ने हंसकर फोन काट दिया और घर मे घुसी
सामने ही मदन खड़ा था.. शीला के चेहरे पर चुदाई के बाद की संतुष्टि और तृप्ति की चमक साफ दिखाई दे रही थी.. उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान भी थी
"ओहोहों.. आज तो बड़ी मुस्कुराहट बिखेरी जा रही है.. !! बहुत खुश लग रही हो, क्या बात है?" मदन ने कहा
शीला: "खुशी तो होगी ही.. नया मेहमान जो आने वाला है"
मदन: "कौन से मेहमान?? वैशाली की शादी को तो देर है.. अभी से कौन आ रहा है.. !! जरूर तेरे मायके से कोई होगा"
पेंट के ऊपर से मदन के लंड पर हाथ फेरते हुए शीला ने कहा "सब कमाल इसका है मेरे राजा.. कॉंग्रेटस.. !! तू बाप बनने वाला है.. !!"
मदन बुरी तरह चोंक उठा "ये क्या बकवास कर रही है तू? बेटी को दोबारा ब्याहने की उम्र मे बाप बनने की खबर देते हुए तुझे खुशी नहीं.. शर्म आनी चाहिए.. !"
शीला: "मुझे क्यों शर्म आएगी भला.. मैं तो खुश हूँ.. इतने सालों के बाद यह घर फिर से प्यारी प्यारी किलकारियों से गूँजेगा.. छाती दूध से भर जाएगी.. तेरी फेंटसी भी पूरी कर पाएगा तू.. तुझे तो गर्व होना चाहिए.. इस उम्र मे भी बाप बनने जितना दम है तेरे वीर्य मे.. !!"
मदन गुस्से से परेशान होते हुए बोला "अब चुप भी हो जा शीला.. मुझे नहीं पीना है तेरा दूध.. अभी के अभी चल.. एबॉर्शन करवा लेते है.. !!"
शीला ने बड़े ही नाटकीय अंदाज मे मदन की बैंड बजाते हुए कहा "अरे बाप रे.. !! ये क्या कह दिया तूने मदन.. नहीं.. !!! मेरे कोख मे पल रही तेरी प्यारी निशानी को मैं हरगिज मिटने नहीं दूँगी"
मदन: "अरे पागल औरत.. !! इस बुढ़ापे मे अपना पेट फुलाकर घूमेगी तो लोग क्या कहेंगे? शर्म नहीं आएगी तुझे"
शीला: "जो भी होगा, देखा जाएगा" कहते हुए उसने मदन को धकेला और किचन मे चली गई.. अंदर जाकर उसकी हंसी ही नहीं रुक रही थी.. मदन को ऐसी हालत मे देखकर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था.. मदन की गांड फटकर दरवाजा हो गई थी और शीला बड़े ही मजे से गुनगुना रही थी
♪♫♪ आज मदहोश हुआ जाए रे.. मेरा मन.. मेरा मन.. मेरा मन.. ♫⋆。♪ ₊˚♬ ゚.
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अपने घर पहुंचते हुए साढ़े नौ बज गए कविता को.. वैसे उसका प्लैनिंग तो आठ बजे तक पहुँचने का था.. अच्छा हुआ जो पीयूष अब तक नहीं आया था.. वरना उसे सफाई देनी पड़ती..
घर पहुंचकर उसे बहोत अच्छे समाचार मिले.. मौसम ने कविता को बताया की विशाल का परिवार इस रिश्ते के लिए राजी था.. पर एक समस्या थी.. विशाल अब पीयूष की ऑफिस मे नौकरी नहीं करना चाहता था.. उसका कहना थी की जिस ऑफिस की मालकिन उसकी पत्नी हो, ऐसी ऑफिस मे काम करना उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाएगा.. !!
"बात तो सही है उसकी" कविता ने विशाल की साइड ली..
"जीजू ने तो विशाल का प्रमोशन देने की भी बात कही.. पर विशाल का कहना है की बात पोस्ट की नहीं.. उसके स्वाभिमान की है.. !!" मौसम विशाल के बारे में बातें करते थक नहीं रही थी.. और कविता के पास सुनने के अलावा और कोई चारा नहीं था
काफी बातें करने के बाद मौसम गई... काफी रात गए पीयूष बेंगलोर से लौटा.. उसने कविता को बताया की उनकी ऑफिस की रीसेप्शनिस्ट फोरम ने बिना कोई वजह बताए.. अचानक नौकरी छोड़ दी थी.. !!
पीयूष कविता को बेंगलोर ट्रिप के बारे मे बता रहा था.. उसकी बातें सुन रही कविता के हाथ मे रुमाल था.. जिससे उसने रसिक के वीर्य को पोंछा था.. सूख कर कडक हो गया था रुमाल.. जैसे स्टार्च किया हो.. उस रुमाल के कोने से खेलते हुए मुस्कुरा रही थी कविता.. जब पीयूष नहाने गया तब कविता ने उस वीर्य लगे रुमाल को अपने नाक पर दबाकर गहरी सांस ली.. वीर्य की अनोखी गंध ने उसे रसिक की मर्दानगी की याद दिला दी.. एक पल के लिए सिहर उठी कविता.. रसिक के लंड से खेलने के लिए फिर से बेताब हो गई.. !! अब तो उसका मन उस लंड से चुदने का भी करने लगा था
नहाने के बाद, पीयूष बाहर आया.. दोनों के बीच अब विशाल और मौसम को लेकर बातें हो रही थी..
पीयूष: "मैं सोच रहा था की वैशाली की शादी पर हम विशाल को भी साथ ले चलें.. इस बहाने हमें साथ रहने का मौका भी मिल जाएगा"
कविता ने जवाब नहीं दिया.. वो उतनी देर तक इंतज़ार करने के लिए तैयार नहीं थी.. मौसम की शादी पक्की करने मे वो अब कोई ढील करना नहीं चाहती थी..
दो दिन बाद, कविता और पीयूष ने विशाल को अपने घर खाने पर बुलाया.. जाहीर सी बात थी की मौसम भी साथ थी
खाना खाते वक्त मौसम और पीयूष की मौजूदगी मे कविता ने विशाल के साथ ढेर सारी बातें की.. उसका इरादा विशाल के बारे मे सारी जानकारी प्राप्त कर लेने का था.. उसकी पसंद-नापसंद.. उसका स्वभाव.. सब कुछ जानना चाहती थी कविता
विशाल ने भी सौम्यता से सारे जवाब दीये.. पर एक बात कविता और पीयूष दोनों की नज़रों मे आई.. और वो यह थी.. की विशाल सारे जवाब यंत्रवत दे रहा था.. और खुलकर इस चर्चा मे हिस्सा नहीं ले रहा था.. जैसे किसी बात की झिझक हो... कोई परेशानी हो.. !! ऐसा तो नहीं था की वो लोग एक दूसरे से अनजान थे.. काफी अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे को.. इस के बावजूद, विशाल किस बात को लेकर सहम रहा था, उसका पता नहीं चल पाया
जिस दिन विशाल ने रिश्ते के लिए हामी भरी उसी दिन उसने ऑफिस मे अपना त्यागपत्र दे दिया था.. तुरंत तो बराबरी की नौकरी मिलना मुश्किल था इसलिए उसने फिलहाल एक छोटी सी कंपनी मे नौकरी ले ली थी.. और अन्य बड़ी कंपनियों मे इंटरव्यू दे रहा था..
उस दौरान, वैशाली की शादी का न्योता आया.. शीला और मदन ने सब को बड़े ही आग्रहपूर्वक आने का आमंत्रण दिया.. पीयूष के कहने पर मदन ने एक निमंत्रण पत्रिका विशाल के परिवार को भी दे दी..
मौसम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था.. पर कुछ समय से वो महसूस कर रही थी की विशाल काफी गुमशुम और उदास रहता था.. हो सकता है की नौकरी बदलने के कारण उसके स्वभाव मे ऐसा परिवर्तन आया हो.. !! आखिर उसने सोचा की समय जाते ही सब ठीक हो जाएगा
एक बात मौसम को खटक रही थी.. जिस दिन विशाल ने नौकरी छोड़ी उसी दिन फोरम ने भी त्यागपत्र दिया था.. विशाल को लेकर, बेहद पजेसीव मौसम को यह शक था की विशाल जिस कंपनी से जुड़ा था शायद फोरम ने भी वही जॉइन किया न हो.. !!
यही विचार मौसम को दिन-रात सताने लगा था.. पूरा दिन वो फोरम के बारे मे जानकारी जुटाने मे मशरूफ़ रहती.. फोरम विशाल की कंपनी मे नहीं पर किसी और कंपनी मे नौकरी कर रही थी.. फिर भी मौसम, आए दिन उसे फोन करती और उसकी खबर रखती रहती थी
बेचारी फोरम की हालत खराब थी.. विशाल से अपने प्यार का परोक्ष इजहार करने के दो दिन बाद ही वो उससे छीन लिया गया था.. मध्यम वर्ग के परिवार से आती फोरम के लिए यह सदमा बहोत ही बड़ा था.. और उसका असर उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरी तरीके से पड़ा था.. वो बीमार रहने लगी थी.. अनियमितता के कारण उसे कंपनी से निकाल दिया गया.. विशाल भी गया और नौकरी भी.. !!
एक दिन, मौसम और फाल्गुनी, बाजार में शॉपिंग कर रहे थे.. वहाँ उन्हें फोरम के पापा मिल गए.. उनसे बात करने पर यह जानने को मिला की फोरम की तबीयत बहुत बिगड़ चुकी थी और वो अस्पताल मे थी
मौसम और फाल्गुनी दोनों ही एड्रेस लेकर अस्पताल पहुँच गए.. बेजान सी फोरम को बेड पर पड़ा देख दोनों को दुख हुआ.. पूछने पर पता चला की उसके प्लेटलेट्स की संख्या काफी कम हो गई थी.. दोनों फोरम के पास बैठे थे तभी विशाल वहाँ आ पहुंचा.. उसे देखकर मौसम को ताज्जुब भी हुआ और ईर्ष्या भी.. पर वह कुछ बोल न सकी क्योंकि फोरम विशाल की भी दोस्त थी और बीमार थी.. दूसरा, अब तक विशाल और मौसम की विधिवत सगाई नहीं हुई थी.. इसलिए विशाल पर अधिकार भावना जताना भी मुमकिन नहीं था
मौसम को देखकर विशाल भी थोड़ा सा सहम गया.. पर अब सब आमने सामने आ ही गए थे तो कुछ भी छुपाने का कोई मतलब नहीं बनता था
सब चुपचाप बैठे थे तब फोरम की मम्मी ने कहा "मौसम बेटा.. तुम्हारी ऑफिस से नौकरी छोड़ने के बाद हमारी तो ग्रहदशा ही जैसे खराब हो गई है.. नई नौकरी भी छूट गई और फोरम भी बीमार हो गई.. !!"
उनके कहने का मतलब समझ रही थी मौसम.. वह जानती थी की फोरम का घर उसकी तनख्वाह पर ही चल रहा था
फोरम के माता-पिता को किसी भी चीज की जरूरत हो तो बिना झिझकें कॉन्टेक्ट करने के लिए बताकर, मौसम और फाल्गुनी वहाँ से निकलने लगे.. अस्पताल की लिफ्ट मे नीचे उतरते वक्त मौसम के दिमाग मे यही बात चल रही थी की फोरम की किस तरह मदद की जाए जिससे की उसके और उसके परिवार के आत्मसन्मान को ठेस न पहुंचे..
लिफ्ट से ग्राउन्ड फ्लोर पहुंचकर वह दोनों लॉबी से चलते हुए रीसेप्शन की और जा रहे थे.. तभी.. उन्हों ने एक वयस्क व्यक्ति को एक स्ट्रेचर ठेलते हुए देखा.. स्ट्रेचर मे पड़ा मरीज लहू-लुहान था.. वह वयस्क व्यक्ति भी चोटिल था पर ज्यादा नहीं.. अपनी पीड़ा को भूलकर वो आते जाते डॉक्टरों से हाथ जोड़कर विनती कर रहा था की वह मरीज को जल्द से जल्द ट्रीट्मन्ट दे..
"प्लीज सर, मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ.. मेरे बेटे को बहोत गंभीर चोटें आई है.. प्लीज जल्दी से जल्दी इसका इलाज शुरू करवाइए" वह बूढ़ा हाथ जोड़कर डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ा रहा था
"देखिए, यह एक एक्सीडेंट का केस है.. पहले पुलिस को इसके बारे मे इत्तिला करना होगा उसके बाद ही हम कुछ कर पाएंगे" डॉक्टर ने बेरुखी से जवाब दिया और चल पड़ा
मौसम: "यार, इन्हें कहीं देखा है मैंने.. !!"
फाल्गुनी: "अरे, तूने पहचाना नहीं?? ये तो तरुण के पापा है.. !!"
मौसम ने चोंककर फाल्गुनी की तरफ देखा..
मौसम: "कहीं वो स्ट्रेचर पर लेटा आदमी, तरुण तो नहीं?? उस आदमी ने बेटे का जिक्र किया.. मतलब पक्का वो तरुण ही होगा.. !! क्या करें?"
फाल्गुनी: "मुझे लगता है की हमें कुछ भी करने से पहले पीयूष जिजू से पूछ लेना चाहिए
मौसम ने तुरंत पीयूष को फोन किया पर किसी कारणवश पीयूष ने फोन नहीं उठाया.. मौसम ने अपनी मम्मी को फोन कर इस बारे मे बताया
रमिलाबहन: "देख बेटा.. पुरानी बातों को भूलकर, ऐसे मामले मे हमे इन्सानियत के नाते उनकी मदद करनी ही चाहिए... तुम दोनों से हो सकें उतना करो.. और मुझे अस्पताल का नाम बताओ.. मैं कविता को वहाँ भेजती हूँ"
मौसम और फाल्गुनी दौड़कर स्ट्रेचर के पास गए.. और तरुण के पापा को सहारा देते हुए कहा "अंकल, आप फिक्र मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा"
तरुण के पापा का सारा ध्यान अपने बेटे पर था.. उन्हों ने ठीक से देखा तक नहीं की वो सहायता करने आई लड़कियां कौन थी.. फाल्गुनी ने अपने पापा को फोन किया.. जिन्हों ने अस्पताल मे अपने कॉन्टेक्ट से बात कर, तरुण को तुरंत भर्ती करवा दिया.. तभी कविता और पीयूष भी वहाँ आ पहुंचे.. पीयूष ने अस्पताल मे जरूरत के सारे पैसे भरकर, यह सुनिश्चित किया की तरुण को अच्छे से अच्छी ट्रीट्मन्ट मिलें..
मुआयने और ट्रीट्मन्ट शुरू होने के बाद डॉक्टर ने आकर बताया की तरुण की हालत स्थिर थी और फिलहाल घबराने की कोई जरूरत नहीं थी.. बस, तरुण को तीन चार दिनों के लिए अस्पताल मे रहना होगा.. सुनकर उसके पापा को चैन मिला.. अब उनका ध्यान इस परिवार पर गया.. जो तारणहार बनकर उनकी मदद करने मे जुटा हुआ था.. उन्हें ताज्जुब तो तब हुआ जब उन्हों ने मौसम को पहचाना..!! वही मौसम जिसके साथ तरुण की मंगनी हुई थी और फिर उन्हों ने रिश्ता तोड़ दिया था..!!
पीयूष ने तरुण के पापा को आश्वासन देते हुए कहा की वो किसी भी चीज की जरूरत के लिए उन्हें बता सकते है.. आभारवश होकर तरुण के पापा ने कहा की उन्होंने अपने रिश्तेदार और परिवारजनों को बुला लिया है.. और शाम से पहले वो लोग पहुँच जाएंगे.. बातों बातों मे यह पता चला की तरुण और उसके पापा, लड़की देखने जा रहे थे तभी उनकी कार का एक्सीडेंट हुआ..
शाम होते ही तरुण के सारे रिश्तेदार आ पहुंचे.. और पीयूष, कविता, मौसम और फाल्गुनी ने उनसे इजाजत ली और घर लौटें.. रात को मौसम और फाल्गुनी सब के लिए खाना लेकर पहुंचे..
अनजान शहर मे, जब इस प्रकार कोई आपकी सहायता करता है, तब इंसानियत की किंमत समझ आती है.. पैसों के घमंड पर उछल रहे लोगों को जब कोई मामूली सा रेहड़ी-वाला या ऑटो-वाला, तकलीफ के वक्त अस्पताल पहुंचाकर उनकी ज़िंदगी बचाने मे मदद करता है.. तब उन्हें उस छोटे आदमी के बड़े दिल के प्रति जज़्बात पैदा हो जाते है.. पर सब ठीक-ठाक हो जाने पर.. वापिस पैसों की गर्मी सर पर चढ़ जाती है.. और फिर वही इंसान उन छोटे लोगों को तुच्छता से देखने लग जाता है..
अस्पताल में तीसरी रात को जब मौसम और फाल्गुनी, तरुण के स्पेशल रूम मे बैठे थे तब..
फाल्गुनी: 'तरुण, तुम जिस लड़की को देखने जा रहे थे.. वह शायद तुम्हारी किस्मत मे नहीं होगी.. इसीलिए कुदरत ने तुम्हें जाने से पहले रोक लिया"
यह सुनते ही, मौसम के दिल की खिड़की.. हल्की सी खुल गई..!! और पुरानी यादें ताज़ा होने लगी.. देखने जाए तो तरुण और मौसम के बीच किसी प्रकार की अनबन तो थी ही नहीं.. जो कुछ भी हुआ था वो सुबोधकांत के कारण और तरुण के पापा की जिद के कारण ही हुआ था.. मौसम तरुण पर पहले भी मरती थी और आज भी वह उसके दिल मे बसा हुआ था.. हालांकि, अब विशाल ने उसके दिल के महद हिस्से को कब्जे मे ले रखा था.. पर फिर भी .. !! सौम्य और हेंडसम तरुण, एक समय पर, मौसम के दिल की धड़कन था.. और आज उसी मौसम ने, समय रहते मदद कर, उसे मरने से बचा लिया था.. विडंबना बस यही थी.. की अब मौसम ने अपने दिल की चाबी विशाल के हाथों मे थमा दी थी..!!
बात करते हुए अचानक तरुण को खांसी आई.. और मौसम उसके लिए पानी भर रही थी तभी विशाल का फोन आया.. वो न उठा पाई और मिसकॉल हो गया.. विशाल के लिए मौसम ने अलग से रिंगटोन सेट कर रखी थी.. इसलिए बिना पर्स से फोन निकाले उसे मालूम चल जाता था की उसका फोन था..
चौथे दिन डॉक्टर ने बताया की तरुण की हालत बेहतर थी और अब उसे डिस्चार्ज किया जा सकता था.. तरुण और उसके पापा ने मौसम, फाल्गुनी, रमिलबहन के प्रति आभार प्रकट किया.. अगर पुरानी बातों को लेकर उनके परिवार ने वक्त रहते मदद न की होती तो पता नहीं क्या हो जाता.. !! आकस्मिक विपत्ति मे मौसम के परिवार ने जिस प्रकार उनकी सहायता की थी.. उसे देखकर, तरुण के पापा की आँखों मे आँसू आ गए..!!
उन्होंने रमिलबहन के आगे दो हाथ जोड़कर कहा "बहनजी, अगर आप लोगों ने समय रहते हमारी मदद न की होती तो मैं सोच भी नहीं सकता की क्या हो जाता.. !! आप लोगों का किस तरह शुक्रियादा करूँ, मुझे तो समझ नहीं आ रहा.. !! आपके परिवार से संबंध तोड़ने के बावजूद.. बिना किसी कड़वाहट के आप लोगों ने हमारी बहोत मदद की.. और साबित कर दिया की आप लोग मुझ से कई ज्यादा गुणी हो.. एक समय पर मुझे लगा था की मौसम और आपका परिवार मेरे लायक नहीं है.. पर अब समझ मे आ रहा है की हकीकत मे, हम ही, आप लोगों के लायक नहीं थे.. मौसम जैसी लड़की हमारे नसीब मे ही नहीं थी.. !!"
यह सुनकर, कमरे मे बैठे हुए सारे लोग भावुक हो उठे.. !! तरुण ने उदास नज़रों से मौसम की ओर देखा पर मौसम ने नजरें फेर ली..
यह देख, तरुण को बहोत बुरा लगा.. पर वो मौसम की स्थिति को समझ रहा था.. एक वक्त था जब मौसम बेहद लाचार और निःसहाय थी.. दिन मे पचास बार कॉल कर रही थी पर वो जवाब नहीं दे रहा था.. लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं थी.. मौसम के पास विशाल था.. और अब तो तरुण भी उस कतार मे खड़ा नजर आ रहा था..!!
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