Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 28 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

कविता की गाड़ी को नज़रों से ओजल होते हुए रसिक देखता रहा और मन ही मन बड़बड़ाया.. "भाभी, आज तो आपने मुझे धन्य कर दिया.. " पिछले चार-पाँच दिनों में रसिक का जीवन बेहद खुशहाल और जीवंत सा बन गया था..

रसिक के इस बदले बदले से रूप को देखकर शीला को भी ताज्जुब हो रहा था.. वो सोच रही थी.. या तो इसे लोटरी लगी है.. कोई धनलाभ हुआ है.. या तो इसकी दिल की कोई अदम्य इच्छ पूरी हुई है.. छोटा आदमी तो छोटी छोटी बात पर भी खुश हो सकता है.. गरीब इंसान को तो सेकंड-हेंड सायकल भी खुश कर देती है.. पर रसिक किस कारण से इतना खुश लग रहा था वह जानने की बड़ी ही बेसब्री हो रही थी शीला को

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गाड़ी चलाते हुए बोर हो रही कविता ने स्पीकर फोन पर वैशाली को फोन लगाया.. रसिक के साथ जो गुलछर्रे उड़ाये उसके बारे मे वो वैशाली को बतानी चाहती थी.. लेकिन फोन शीला ने उठाया.. मजबूरन कविता को शीला से बात करनी पड़ी.. थोड़ी सी प्राथमिक बातचीत के बाद, शीला ने अपना इन्टेरोगैशन शुरू कर दिया

शीला: "कविता, याद है वो दिन.. जब मैंने तुझे अपने प्रेमी पिंटू, जो की अब मेरा दामाद बनने वाला है, उसके साथ सेटिंग कर के दिया था.. !! यहाँ तक की तू आराम से उसके साथ वक्त बीता सकें इसलिए मैंने पीयूष को अपने दबाने भी दीये थे.. यह भी याद होगा.. की मैंने ही रेणुका को बात कर के पीयूष की जॉब लगवाई थी.. पीयूष की गैर-मौजूदगी मे, मैंने तुझे कई बार चाटकर ठंडा किया था.. सिनेमा हॉल मे वो पिंटू तेरी चूत मे उंगली डाल रहा था तब पीयूष देख न ले इसलिए मैंने तेरे पति को मेरे बबले दबाने दीये थे.. सब याद है या भूल गई?"

कविता को समझ नहीं आ रहा था की पिछली बातें याद दिला कर शीला भाभी अब क्यों एहसान जता रही थी

कविता: "अरे भाभी, आप ऐसा क्यों बोल रही हो.. !! सब कुछ याद है मुझे.. !!"

शीला: "तो फिर तू कुछ बातें मुझसे छुपा क्यों रही है?? तू पीयूष, पिंटू या मौसम से बातें छुपाएँ, ये मैं समझ सकती हूँ, पर मुझसे क्यों छुपाना पड़ रहा है तुझे? क्या तू जानती नहीं है मुझे... की कितना भी छुपा ले मुझे सब पता चल ही जाता है.. !! जिस शख्स के साथ तुम लोग नाश्ता कर रही हो.. उसके साथ मैं रोज खाना खाती हूँ, यह भूल गई क्या?"

कविता: "साफ साफ बताइए भाभी.. आप क्या कहना चाहती हो?"

शीला: "भेनचोद.. ज्यादा अनजान बनने की कोशिश मत कर... उस दिन जब मैंने पूछा की तू और वैशाली रात को कहाँ गए थे तब तू झूठ क्यों बोली? चलो वैशाली के सामने तू मुझे सच नहीं बता सकी.. पर बाद मे तो मुझे बता ही सकती थी ना.. !! मुझे पता है की तुम दोनों अपने भोसड़े मरवाने गई थी.. पर तेरे दिमाग मे ये क्यों नहीं आया की कुछ ही दिनों में वैशाली की शादी है.. !! कुछ उंच-नीच हो गई तो.. !! तेरी खुजली मिटाने के चक्कर मे, मेरी बेटी का भविष्य दांव पर लगा दिया तूने.. ????"

कविता: "भाभी, आप सारा दोष मुझे मत दीजिए.. खुजली मेरी नहीं.. वैशाली की चूत में उठी थी.. और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ... मैंने तो चुदवाया भी नहीं है.. ऐसा मोटा लँड मेरे छेद मे लेने की हिम्मत नहीं है मेरी, ये तो आप भी जानती हो.. !! वैशाली भी मुश्किल से आधा डलवा पाई थी.. उसने ही जिद की थी.. और मुझे खेत मे ले गई.. मैं तो सिर्फ साथ इसलिए गई थी की वैशाली की मदद कर सकूँ.. ऐसी जगह मैं उसे अकेले जाने देना नहीं चाहती थी.. मैंने तो रसिक का लंड लिया भी नहीं है.. हाँ ओरल सेक्स जरूर किया था पर उससे ज्यादा कुछ नहीं किया मैंने.. !!"

सुनकर शीला स्तब्ध हो गई.. उसकी आँखों के सामने रसिक का असुर जैसा लंड झलकने लगा.. जो लंड शीला और अनुमौसी को भी रुला गया हो.. उस लंड ने वैशाली का क्या हाल कर दिया होगा.. !! मन ही मन वो रसिक को गालियां देने लगी.. रसिक मादरचोद.. मेरी बेटी का घर बसने से पहले ही उझाड़ देगा क्या.. !! साले भड़वे.. तेरा गधे जैसा लंड लेने के बाद.. पहली रात को वैशाली उस पिंटू की मामूली सी नुन्नी से कैसे मज़ा ले पाएगी.. !!

कविता: "चुप क्यों हो गए भाभी? मेरी बात का विश्वास नहीं हो रहा क्या आपको.. !!" चिंतित होकर कविता ने पूछा

शीला: "नहीं यार, मुझे पता है, रसिक का इतना बड़ा है की उसका लेना तेरे बस की बात ही नहीं है.. पर मुझे यह समझ मे नहीं आया की आखिर वैशाली और रसिक का कनेक्शन हुआ कैसे?"

कविता: "भाभी, वैशाली को सब पता चल गया है की आप और मेरी सास उसके लंड के आशिक हो.. और आप तो अभी भी उसके साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो.. मैंने ही बातों बातों में सब बता दिया था उसे.. मेरी सास और रसिक ने उस रात जो साजिश की थी.. उस घटना के बारे में बताते हुए मेरे मुंह से सब निकल गया.. लेकिन वो सब जान लेने के बाद.. वैशाली ने रसिक का लंड देखने की जिद पकड़ ली.. अब रसिक का लंड कोई सिनेमा थोड़े ही है की टिकट लिया और देख लिए.. !! मेरे लाख मना करने के बावजूद वैशाली नहीं मानी.. भाभी, आपकी बेटी भी आप ही की तरह बेहद शौकीन है..!! उस दिन वैशाली खुद दूध लेने उठी और वहीं से सब कुछ शुरू हुआ.. और फिर आप और मदन भैया रेणुका के घर चले गए अदला-बदली का खेल खेलने.. उसी रात वैशाली मुझे खींचकर रसिक के खेत पर ले गई.. " और फिर कविता ने पूरी घटना का विवरण दिया..

शीला ने सब कुछ सुनकर एक गहरी सांस ली और कहा "कविता, तूने तो रसिक और पिंटू, दोनों के लंड देख रखे है.. तुझे इतना भी खयाल नहीं आया की वैशाली को रसिक के महाकाय लंड की आदत लग गई तो वो पिंटू के संग कैसे खुश रह पाएगी?? अरे, जिस लंड को लेने मे, मुझ जैसी अनुभवी को भी आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है.. उस लंड से तूने वैशाली को चुदने दिया??? खैर, जो हो गया सो हो गया.. रखती हूँ फोन"

शीला को रसिक पर बहोत गुस्सा आ रहा था.. इस खेल को जल्द से जल्द रोकना पड़ेगा वरना बात हाथ से निकल जाएगी.. वैशाली से यह बात करने मे बेहद झिझक रही थी शीला.. अब एक ही रास्ता था.. सीधे रसिक से ही बात की जाए.. उस सांड को कैसे भी करके रोकना पड़ेगा.. वरना वो शादी से पहले ही वैशाली की चूत फाड़ देगा..!!!

सोचते सोचते शीला सो गई..

दूसरी सुबह, जब रसिक दूध देने आया.. तब रोज की तरह वो शीला के गदराए जिस्म से खेलने लगा.. और शीला ने उसे मना भी नहीं किया.. पर जैसे ही रसिक, शीला का एक बबला बाहर निकालकर चूसने गया, तब शीला ने कहा "रसिक, मुझे तुझसे एक बहुत जरूरी बात करनी है.. आज एक घंटे का समय निकाल.. बता, मैं कितने बजे आऊँ तेरे घर?"

रसिक: "दोपहर को आ जाना भाभी.. रूखी भी कहीं बाहर जाने वाली है उस वक्त"

शीला: "एक बजे ठीक रहेगा.. ??"

रसिक: "हाँ भाभी.. थोड़ा टाइम निकालकर आना.. काफी दिन हो गए है भाभी"

दोपहर के एक बजे.. शीला रसिक के घर पर थी.. रसिक सामने बैठा था.. बात को कैसे शुरू की जाए उस कश्मकश मे थी शीला..

शीला: "सुन रसिक.. मुझे कविता ने सब बता दिया है.. तूने दोनों को खेत पर बुलाया था.. और जो कुछ किया.. उसके बारे में बात करने आई हूँ"

रसिक: "भाभी, मैंने सामने से चलकर कुछ नहीं किया.. आपकी बेटी ही जिद कर रही थी.. उसे ही बड़ी चूल थी मुझसे करवाने की.. मैंने कभी कोई जबरदस्ती नहीं की किसी के साथ.. और कविता के पीछे मैं कितना पागल हूँ ये तो आपको पता ही है.. फिर भी मैंने उनके साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की.. ऊपर ऊपर से ही सब कीया था.. !!!"

शीला: "कोई बात नहीं रसिक.. मैं यहाँ तुझे धमकाने या डराने नहीं आई हूँ.. पर यह बताने आई हूँ की थोड़े दिन बाद वैशाली की शादी है.. अब तू ऐसे ही अगर अपने मोटे लंड से वैशाली को चोदता रहेगा, तो वो शादी के बाद किसी काम की नहीं रहेगी.. इसलिए तू मुझसे वादा कर की वैशाली कितनी भी जिद क्यों न करे.. तू ऊपर ऊपर से ही सब करना.. उसे चोदना मत.. !!"

रसिक: "भाभी.. वैशाली कितनी सुंदर है.. ऊपर ऊपर से करने के बाद मैं अपने आप को कैसे काबू मे रख पाऊँगा.. !! और वो तो खुद ही मेरा पकड़कर अंदर डाल देती है.. !!"

शीला: "बेवकूफ, इसलिए तो तुझसे मिलने आई हूँ.. उसे समझाने का कोई मतलब नहीं है.. पर अब तुझे ध्यान रखना होगा... तू अब से उसे हाथ भी नहीं लगाएगा.. अगर फिर भी तूने कुछ किया.. और वैशाली की शादी में कोई बाधा आई.. तो समझ लेना.. मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा"

बड़े ही क्रोधित स्वर मे शीला ने कहा.. लेकिन रसिक जैसा मर्द, किसी औरत की धमकी को ऐसे ही सुन लेने वालों मे से नहीं था

रसिक: "एक बात मेरी भी ध्यान से सुन लीजिए भाभी.. मुझे धमकाने की कोशिश मत करना.. किसी के बाप से भी नही डरता हूँ मैं.. अब आप कह रही हो तो वैशाली को तो छोड़ो, मैं अब आपको भी कभी हाथ नहीं लगाऊँगा.. ठीक है.. !! अब खुश.. !!"

शीला: "अरे पागल, मुझे छूने से कहाँ मना कर रही हूँ तुझे.. !! बस वैशाली से दूर रहना"

रसिक: "ठीक है.. जैसी आपकी इच्छा"

शीला: "तो अब मैं जाऊँ?"

रसिक: "कल से दूध देने रूखी आएगी.. साहब को कहना की उससे दूर ही रहें"

शीला: "क्यों? तू नहीं आएगा?"

रसिक: "अगर मैं आऊँगा तो वैशाली मौका देखकर मेरा लंड फिर से पकड़ लेगी.. और फिर मैं मना नहीं कर पाऊँगा"

शीला: "अरे पर दूध तो रोज मैं ही लेती हूँ ना.. !!"

रसिक: "कभी आपको उठने मे देर हो जाए.. या कहीं बाहर गई हो तब वैशाली ही दूध लेने निकलती है.. एक दिन के लिए आप बाहर क्या गई.. यह सारा कांड हो गया.. !!"

शीला: "अब वैशाली की शादी होने तक मैं कहीं नहीं जाने वाली.. तू बेफिक्र होकर दूध देने आना.. और वैसे भी.. शादी से पहले मेहमान आना शुरू हो जाएंगे.. फिर ये सब वैसे भी बंद कर देना पड़ेगा"

रसिक: "ठीक है भाभी.. आप फिक्र मत करना.. आप सोच रही हो, उतना गिरा हुआ नही है ये रसिक.. !!"

शीला: "ठीक है.. तो मैं चलूँ?? और हाँ.. मेरी बात का बुरा मानने की जरूरत नहीं है.. और आज तुझे तेरी भाभी की बबले नजर क्यों नहीं आ रहे? मुझे देखने या छूने से कहाँ मना किया है मैंने?? " खड़े होकर अपने स्तनों को टाइट कर रसिक के सामने पेश करते हुए शीला ने कहा

"अरे क्या भाभी.. आप तो बस आप ही हो.. एक नंबर.. आप जैसा कोई कहाँ हो सकता है भला.. !!! चलिए भाभी.. तो अब मैं अपने काम पर लग जाऊँ?" रसिक ने कहा

"काम पर क्यों?? मेरे शरीर से ही लग जा.. !!" कहते हुए रसिक की कुहनी पर अपने स्तनों को दबाते हुए रसिक को गुदगुदी करने लगी शीला

"सुन भी रहा है.. !! ये भी तो काम ही है.. बाकी सारे काम मेरे जाने के बाद कर लेना.. पहले तेरे सामने आकर जो काम पड़ा हुआ है उसे कर" शीला ने अपना पल्लू गिराते हुए कहा

शीला की बातों से रसिक नाराज था पर फिर भी शीला ने अपने अनोखे अंदाज मे रसिक के शरीर से अपने भरे भरे स्तनों को दबाकर उसका खड़ा कर दिया.. रसिक का हाथ अपने ब्लाउज के अंदर डालकर वो पाजामे मे हाथ डालकर उसके लंड से खेलती रही.. रसिक ने शीला का एक स्तन बाहर निकालकर चूसना शुरू कीया ही था की तब शीला अपना स्तन छुड़वाकर वो नीचे बैठ गई.. और रसिक का लंड चूसने लगी






आज लंड चूसते वक्त शीला को कुछ अजीब सा एहसास हो रहा था.. सोच रही थी.. ये वही लंड है जो वैशाली की चूत मे गया होगा.. बाप रे.. बेचारी फूल सी कोमल बच्ची ने कैसे इतना मोटा लंड लिया होगा.. !!

रसिक का लंड शीला की लार से चमक रहा था.. मुठ्ठी मे उसे मोटे मूसल को पकड़े हुए शीला ने कहा "एक नजर इस लंड को तो देख.. ऐसा तगड़ा लंड भला वैशाली कैसे ले पाएगी? उसकी बुद्धि तो घास चरने गई थी पर तेरा दिमाग भी नहीं चला था क्या???"

रसिक: "अब ऊपर वाले ने मुझे ऐसा लंड दिया उसमे मेरी क्या गलती.. !! वैसे आपके भी बबले कितने बड़े बड़े है.. कविता भाभी से तो पाँच गुना ज्यादा बड़े है... !!" शीला के दोनों स्तनों को आटे की तरह गूँदते हुए रसिक ने कहा






शीला: "मैं समझती हूँ रसिक.. पर जरा सोच.. सायकल पर हाथी को बिठायेंगे तो क्या होगा??"

रसिक: "आप वैशाली को कम मत समझना.. मेरा आधा लंड तो बड़ी आसानी से ले लिया था.. हिम्मत तो उनकी आपसे भी एक कदम ज्यादा है.. हाँ, कविता भाभी बिल्कुल डरपोक है.. जरा सा भी अंदर लेने की कोशिश नहीं की"

शीला: "अंदर डालने से पहले तूने उसकी चाटी थी?"

रसिक: "हाँ भाभी.. चाट चाटकर पूरा छेद गीला कर दिया.. उसके बाद ही अंदर डाला था मैंने.. !!"

रसिक के अंडकोशों को चाटते हुए शीला ने पूछा "तूने ऊपर चढ़कर डाला था क्या?"






रसिक: "गोदी मे उठाकर.. फिर उन्हें उठाकर मैं खड़ा हो गया.. क्योंकि कविता भाभी और वैशाली को ये देखना था की कितना अंदर गया"





रसिक का आधा लंड मुठ्ठी मे दबाकर रसिक को दिखाते हुए शीला बोली "क्या इतना अंदर गया था?"

रसिक: "हाँ, लगभग उतना तो गया ही था.. कविता भाभी ने बाकी का आधा लंड पकड़कर रखा हुआ था.. ताकि बाकी का लंड अंदर ना घुस जाएँ.. पर सच कहूँ तो.. उससे ज्यादा अंदर जाने की गुंजाइश भी नहीं थी.. "

शीला: "जाहीर सी बात है.. वैशाली की जवान चूत मे इससे ज्यादा अंदर जाना मुमकिन ही नहीं है.. हाँ, मेरी और अनुमौसी की बात अलग है"

लंड चूसते चूसते शीला ने सब कुछ उगलवा लिया रसिक से.. और उस दौरान.. जब उसके भोसड़े से पर्याप्त मात्रा मे गीलापन टपकने लगा तब वो खड़ी हो गई और रसिक के कंधों पर जोर लगाते हुए उसे नीचे बीठा दिया.. अपने दोनों हाथों से भोसड़े के होंठों को फैलाकर रसिक के मुंह पर रख दिया.. रसिक ने अपनी खुरदरी जीभ से शीला के भोसड़े मे खजाना-खोज का खेल शुरू कर दिया.. भीतर के गरम गुलाबी हिस्से को कुरेद कुरेदकर चाटने लगा. अपनी उंगलियों से शीला की जामुन जैसी क्लिटोरिस को रगड़ भी रहा था..






शीला की चूत से अब रस की धाराएँ बहते हुए रसिक के पूरे चहरे को तर कर रही थी.. अब रसिक उठा.. शीला के दोनों हाथ दीवार पर टिकाकर.. उसने चूतड़ों के बीच से शीला के गरम सुराख को ढूंढकर अपने सेब जैसे बड़े सुपाड़े को रख दिया.. एक ही धक्के मे उस गीले भोसड़े ने रसिक के लंड को निगल लिया.. इंजन मे जैसे पिस्टन आगे पीछे होता है.. बिल्कुल वैसे ही, शीला के भोसड़े को धनाधान चोदने लगा रसिक.. शीला तब तक चुदवाती रही जब तक की रसिक के लोड़े के अंजर-पंजर ढीले नहीं हो गए.. !! रसिक के मजबूत लंड से २४ केरेट सोने जैसा शुद्ध ऑर्गजम प्राप्त नहीं कर लिया.. तब तक शीला ने उसे छोड़ा नहीं..

जब उसके भोसड़े ने संतुष्टि के डकार मार लिए.. तब शीला कपड़े पहने और घर जाने के लिए निकली..

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घर लौटते वक्त उसने फोन करके रेणुका को पूरी बात बताई.. शीला और रेणुका अब इतने करीब आ चुके थे की एक दूसरे को सारी बातें बताने लगे थे.. पर रेणुका ने सामने से ऐसे समाचार दीये.. जिसे सुनकर शीला अपना टेंशन भूल गई.. लेकिन उसे पता नहीं चल पा रहा था की यह सुनकर वो खुश हो या दुखी..!!

रेणुका ने शीला को बताया की... वो प्रेग्नन्ट थी.. !!

शीला ने मज़ाक करते हुए कहा "यार रेणुका, क्या लगता है तुझे.. किसका बच्चा होगा?? राजेश का या मदन का?"

रेणुका: "शीला, तेरे तो मजे है यार.. जब ईवीएम मशीन ही खराब हो चुका हो तो बोगस वोटिंग होने की कोई टेंशन ही नहीं.. हा हा हा हा हा.. !! अब वो तो मुझे भी पता नहीं की किसका होगा.. अगर मदन जैसा बच्चा हुआ तो मिठाई तुझे बाँटनी पड़ेगी"

शीला ने हँसते हुए कहा "साली मादरचोद.. ऐसा करूंगी तो पूरे शहर को पता चल जाएगा की मदन तुझे चोदता है.. और मैं तेरे पति से चुदवाती हूँ"

रेणुका: "तूने ये क्यों नहीं सोचा.. की मदन या राजेश के अलावा भी किसी और का हो सकता है.. !!"

शीला: "बाप रे.. वो तो मैंने सोचा ही नहीं.. सच सच बता.. कितने लोडो से चुद रही है तू?"

रेणुका ने जवाब नहीं दिया पर हँसते हँसते पाकीज़ा फिल्म का गाना गुनगुनाने लगी

𝄞..𝄞..चलते चलते... यूं ही कोई.. मिल गया था..♬⋆.˚

शीला: "चल अब फोन रखती हूँ.. अपना खयाल रखना.. !!"

रेणुका: "ख्याल रखने मे तो ऐसा है की.. तू अपने पति को यहाँ मत भेजना.. मुझे तो उससे ही सब से ज्यादा खतरा है.. और तो किसी बात से मुझे कुछ प्रॉब्लेम नहीं होने वाली"

शीला: "चल अब फोन रख.. घर आ गया मेरा"

शीला ने हंसकर फोन काट दिया और घर मे घुसी

सामने ही मदन खड़ा था.. शीला के चेहरे पर चुदाई के बाद की संतुष्टि और तृप्ति की चमक साफ दिखाई दे रही थी.. उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान भी थी

"ओहोहों.. आज तो बड़ी मुस्कुराहट बिखेरी जा रही है.. !! बहुत खुश लग रही हो, क्या बात है?" मदन ने कहा

शीला: "खुशी तो होगी ही.. नया मेहमान जो आने वाला है"

मदन: "कौन से मेहमान?? वैशाली की शादी को तो देर है.. अभी से कौन आ रहा है.. !! जरूर तेरे मायके से कोई होगा"

पेंट के ऊपर से मदन के लंड पर हाथ फेरते हुए शीला ने कहा "सब कमाल इसका है मेरे राजा.. कॉंग्रेटस.. !! तू बाप बनने वाला है.. !!"

मदन बुरी तरह चोंक उठा "ये क्या बकवास कर रही है तू? बेटी को दोबारा ब्याहने की उम्र मे बाप बनने की खबर देते हुए तुझे खुशी नहीं.. शर्म आनी चाहिए.. !"

शीला: "मुझे क्यों शर्म आएगी भला.. मैं तो खुश हूँ.. इतने सालों के बाद यह घर फिर से प्यारी प्यारी किलकारियों से गूँजेगा.. छाती दूध से भर जाएगी.. तेरी फेंटसी भी पूरी कर पाएगा तू.. तुझे तो गर्व होना चाहिए.. इस उम्र मे भी बाप बनने जितना दम है तेरे वीर्य मे.. !!"

मदन गुस्से से परेशान होते हुए बोला "अब चुप भी हो जा शीला.. मुझे नहीं पीना है तेरा दूध.. अभी के अभी चल.. एबॉर्शन करवा लेते है.. !!"

शीला ने बड़े ही नाटकीय अंदाज मे मदन की बैंड बजाते हुए कहा "अरे बाप रे.. !! ये क्या कह दिया तूने मदन.. नहीं.. !!! मेरे कोख मे पल रही तेरी प्यारी निशानी को मैं हरगिज मिटने नहीं दूँगी"

मदन: "अरे पागल औरत.. !! इस बुढ़ापे मे अपना पेट फुलाकर घूमेगी तो लोग क्या कहेंगे? शर्म नहीं आएगी तुझे"

शीला: "जो भी होगा, देखा जाएगा" कहते हुए उसने मदन को धकेला और किचन मे चली गई.. अंदर जाकर उसकी हंसी ही नहीं रुक रही थी.. मदन को ऐसी हालत मे देखकर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था.. मदन की गांड फटकर दरवाजा हो गई थी और शीला बड़े ही मजे से गुनगुना रही थी


♪♫♪ आज मदहोश हुआ जाए रे.. मेरा मन.. मेरा मन.. मेरा मन.. ♫⋆。♪ ₊˚♬ ゚.

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अपने घर पहुंचते हुए साढ़े नौ बज गए कविता को.. वैसे उसका प्लैनिंग तो आठ बजे तक पहुँचने का था.. अच्छा हुआ जो पीयूष अब तक नहीं आया था.. वरना उसे सफाई देनी पड़ती..

घर पहुंचकर उसे बहोत अच्छे समाचार मिले.. मौसम ने कविता को बताया की विशाल का परिवार इस रिश्ते के लिए राजी था.. पर एक समस्या थी.. विशाल अब पीयूष की ऑफिस मे नौकरी नहीं करना चाहता था.. उसका कहना थी की जिस ऑफिस की मालकिन उसकी पत्नी हो, ऐसी ऑफिस मे काम करना उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाएगा.. !!

"बात तो सही है उसकी" कविता ने विशाल की साइड ली..

"जीजू ने तो विशाल का प्रमोशन देने की भी बात कही.. पर विशाल का कहना है की बात पोस्ट की नहीं.. उसके स्वाभिमान की है.. !!" मौसम विशाल के बारे में बातें करते थक नहीं रही थी.. और कविता के पास सुनने के अलावा और कोई चारा नहीं था

काफी बातें करने के बाद मौसम गई... काफी रात गए पीयूष बेंगलोर से लौटा.. उसने कविता को बताया की उनकी ऑफिस की रीसेप्शनिस्ट फोरम ने बिना कोई वजह बताए.. अचानक नौकरी छोड़ दी थी.. !!

पीयूष कविता को बेंगलोर ट्रिप के बारे मे बता रहा था.. उसकी बातें सुन रही कविता के हाथ मे रुमाल था.. जिससे उसने रसिक के वीर्य को पोंछा था.. सूख कर कडक हो गया था रुमाल.. जैसे स्टार्च किया हो.. उस रुमाल के कोने से खेलते हुए मुस्कुरा रही थी कविता.. जब पीयूष नहाने गया तब कविता ने उस वीर्य लगे रुमाल को अपने नाक पर दबाकर गहरी सांस ली.. वीर्य की अनोखी गंध ने उसे रसिक की मर्दानगी की याद दिला दी.. एक पल के लिए सिहर उठी कविता.. रसिक के लंड से खेलने के लिए फिर से बेताब हो गई.. !! अब तो उसका मन उस लंड से चुदने का भी करने लगा था

नहाने के बाद, पीयूष बाहर आया.. दोनों के बीच अब विशाल और मौसम को लेकर बातें हो रही थी..

पीयूष: "मैं सोच रहा था की वैशाली की शादी पर हम विशाल को भी साथ ले चलें.. इस बहाने हमें साथ रहने का मौका भी मिल जाएगा"

कविता ने जवाब नहीं दिया.. वो उतनी देर तक इंतज़ार करने के लिए तैयार नहीं थी.. मौसम की शादी पक्की करने मे वो अब कोई ढील करना नहीं चाहती थी..

दो दिन बाद, कविता और पीयूष ने विशाल को अपने घर खाने पर बुलाया.. जाहीर सी बात थी की मौसम भी साथ थी

खाना खाते वक्त मौसम और पीयूष की मौजूदगी मे कविता ने विशाल के साथ ढेर सारी बातें की.. उसका इरादा विशाल के बारे मे सारी जानकारी प्राप्त कर लेने का था.. उसकी पसंद-नापसंद.. उसका स्वभाव.. सब कुछ जानना चाहती थी कविता

विशाल ने भी सौम्यता से सारे जवाब दीये.. पर एक बात कविता और पीयूष दोनों की नज़रों मे आई.. और वो यह थी.. की विशाल सारे जवाब यंत्रवत दे रहा था.. और खुलकर इस चर्चा मे हिस्सा नहीं ले रहा था.. जैसे किसी बात की झिझक हो... कोई परेशानी हो.. !! ऐसा तो नहीं था की वो लोग एक दूसरे से अनजान थे.. काफी अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे को.. इस के बावजूद, विशाल किस बात को लेकर सहम रहा था, उसका पता नहीं चल पाया

जिस दिन विशाल ने रिश्ते के लिए हामी भरी उसी दिन उसने ऑफिस मे अपना त्यागपत्र दे दिया था.. तुरंत तो बराबरी की नौकरी मिलना मुश्किल था इसलिए उसने फिलहाल एक छोटी सी कंपनी मे नौकरी ले ली थी.. और अन्य बड़ी कंपनियों मे इंटरव्यू दे रहा था..

उस दौरान, वैशाली की शादी का न्योता आया.. शीला और मदन ने सब को बड़े ही आग्रहपूर्वक आने का आमंत्रण दिया.. पीयूष के कहने पर मदन ने एक निमंत्रण पत्रिका विशाल के परिवार को भी दे दी..

मौसम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था.. पर कुछ समय से वो महसूस कर रही थी की विशाल काफी गुमशुम और उदास रहता था.. हो सकता है की नौकरी बदलने के कारण उसके स्वभाव मे ऐसा परिवर्तन आया हो.. !! आखिर उसने सोचा की समय जाते ही सब ठीक हो जाएगा

एक बात मौसम को खटक रही थी.. जिस दिन विशाल ने नौकरी छोड़ी उसी दिन फोरम ने भी त्यागपत्र दिया था.. विशाल को लेकर, बेहद पजेसीव मौसम को यह शक था की विशाल जिस कंपनी से जुड़ा था शायद फोरम ने भी वही जॉइन किया न हो.. !!

यही विचार मौसम को दिन-रात सताने लगा था.. पूरा दिन वो फोरम के बारे मे जानकारी जुटाने मे मशरूफ़ रहती.. फोरम विशाल की कंपनी मे नहीं पर किसी और कंपनी मे नौकरी कर रही थी.. फिर भी मौसम, आए दिन उसे फोन करती और उसकी खबर रखती रहती थी

बेचारी फोरम की हालत खराब थी.. विशाल से अपने प्यार का परोक्ष इजहार करने के दो दिन बाद ही वो उससे छीन लिया गया था.. मध्यम वर्ग के परिवार से आती फोरम के लिए यह सदमा बहोत ही बड़ा था.. और उसका असर उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरी तरीके से पड़ा था.. वो बीमार रहने लगी थी.. अनियमितता के कारण उसे कंपनी से निकाल दिया गया.. विशाल भी गया और नौकरी भी.. !!

एक दिन, मौसम और फाल्गुनी, बाजार में शॉपिंग कर रहे थे.. वहाँ उन्हें फोरम के पापा मिल गए.. उनसे बात करने पर यह जानने को मिला की फोरम की तबीयत बहुत बिगड़ चुकी थी और वो अस्पताल मे थी

मौसम और फाल्गुनी दोनों ही एड्रेस लेकर अस्पताल पहुँच गए.. बेजान सी फोरम को बेड पर पड़ा देख दोनों को दुख हुआ.. पूछने पर पता चला की उसके प्लेटलेट्स की संख्या काफी कम हो गई थी.. दोनों फोरम के पास बैठे थे तभी विशाल वहाँ आ पहुंचा.. उसे देखकर मौसम को ताज्जुब भी हुआ और ईर्ष्या भी.. पर वह कुछ बोल न सकी क्योंकि फोरम विशाल की भी दोस्त थी और बीमार थी.. दूसरा, अब तक विशाल और मौसम की विधिवत सगाई नहीं हुई थी.. इसलिए विशाल पर अधिकार भावना जताना भी मुमकिन नहीं था

मौसम को देखकर विशाल भी थोड़ा सा सहम गया.. पर अब सब आमने सामने आ ही गए थे तो कुछ भी छुपाने का कोई मतलब नहीं बनता था

सब चुपचाप बैठे थे तब फोरम की मम्मी ने कहा "मौसम बेटा.. तुम्हारी ऑफिस से नौकरी छोड़ने के बाद हमारी तो ग्रहदशा ही जैसे खराब हो गई है.. नई नौकरी भी छूट गई और फोरम भी बीमार हो गई.. !!"

उनके कहने का मतलब समझ रही थी मौसम.. वह जानती थी की फोरम का घर उसकी तनख्वाह पर ही चल रहा था

फोरम के माता-पिता को किसी भी चीज की जरूरत हो तो बिना झिझकें कॉन्टेक्ट करने के लिए बताकर, मौसम और फाल्गुनी वहाँ से निकलने लगे.. अस्पताल की लिफ्ट मे नीचे उतरते वक्त मौसम के दिमाग मे यही बात चल रही थी की फोरम की किस तरह मदद की जाए जिससे की उसके और उसके परिवार के आत्मसन्मान को ठेस न पहुंचे..

लिफ्ट से ग्राउन्ड फ्लोर पहुंचकर वह दोनों लॉबी से चलते हुए रीसेप्शन की और जा रहे थे.. तभी.. उन्हों ने एक वयस्क व्यक्ति को एक स्ट्रेचर ठेलते हुए देखा.. स्ट्रेचर मे पड़ा मरीज लहू-लुहान था.. वह वयस्क व्यक्ति भी चोटिल था पर ज्यादा नहीं.. अपनी पीड़ा को भूलकर वो आते जाते डॉक्टरों से हाथ जोड़कर विनती कर रहा था की वह मरीज को जल्द से जल्द ट्रीट्मन्ट दे..

"प्लीज सर, मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ.. मेरे बेटे को बहोत गंभीर चोटें आई है.. प्लीज जल्दी से जल्दी इसका इलाज शुरू करवाइए" वह बूढ़ा हाथ जोड़कर डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ा रहा था

"देखिए, यह एक एक्सीडेंट का केस है.. पहले पुलिस को इसके बारे मे इत्तिला करना होगा उसके बाद ही हम कुछ कर पाएंगे" डॉक्टर ने बेरुखी से जवाब दिया और चल पड़ा

मौसम: "यार, इन्हें कहीं देखा है मैंने.. !!"

फाल्गुनी: "अरे, तूने पहचाना नहीं?? ये तो तरुण के पापा है.. !!"

मौसम ने चोंककर फाल्गुनी की तरफ देखा..

मौसम: "कहीं वो स्ट्रेचर पर लेटा आदमी, तरुण तो नहीं?? उस आदमी ने बेटे का जिक्र किया.. मतलब पक्का वो तरुण ही होगा.. !! क्या करें?"

फाल्गुनी: "मुझे लगता है की हमें कुछ भी करने से पहले पीयूष जिजू से पूछ लेना चाहिए

मौसम ने तुरंत पीयूष को फोन किया पर किसी कारणवश पीयूष ने फोन नहीं उठाया.. मौसम ने अपनी मम्मी को फोन कर इस बारे मे बताया

रमिलाबहन: "देख बेटा.. पुरानी बातों को भूलकर, ऐसे मामले मे हमे इन्सानियत के नाते उनकी मदद करनी ही चाहिए... तुम दोनों से हो सकें उतना करो.. और मुझे अस्पताल का नाम बताओ.. मैं कविता को वहाँ भेजती हूँ"

मौसम और फाल्गुनी दौड़कर स्ट्रेचर के पास गए.. और तरुण के पापा को सहारा देते हुए कहा "अंकल, आप फिक्र मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा"

तरुण के पापा का सारा ध्यान अपने बेटे पर था.. उन्हों ने ठीक से देखा तक नहीं की वो सहायता करने आई लड़कियां कौन थी.. फाल्गुनी ने अपने पापा को फोन किया.. जिन्हों ने अस्पताल मे अपने कॉन्टेक्ट से बात कर, तरुण को तुरंत भर्ती करवा दिया.. तभी कविता और पीयूष भी वहाँ आ पहुंचे.. पीयूष ने अस्पताल मे जरूरत के सारे पैसे भरकर, यह सुनिश्चित किया की तरुण को अच्छे से अच्छी ट्रीट्मन्ट मिलें..

मुआयने और ट्रीट्मन्ट शुरू होने के बाद डॉक्टर ने आकर बताया की तरुण की हालत स्थिर थी और फिलहाल घबराने की कोई जरूरत नहीं थी.. बस, तरुण को तीन चार दिनों के लिए अस्पताल मे रहना होगा.. सुनकर उसके पापा को चैन मिला.. अब उनका ध्यान इस परिवार पर गया.. जो तारणहार बनकर उनकी मदद करने मे जुटा हुआ था.. उन्हें ताज्जुब तो तब हुआ जब उन्हों ने मौसम को पहचाना..!! वही मौसम जिसके साथ तरुण की मंगनी हुई थी और फिर उन्हों ने रिश्ता तोड़ दिया था..!!

पीयूष ने तरुण के पापा को आश्वासन देते हुए कहा की वो किसी भी चीज की जरूरत के लिए उन्हें बता सकते है.. आभारवश होकर तरुण के पापा ने कहा की उन्होंने अपने रिश्तेदार और परिवारजनों को बुला लिया है.. और शाम से पहले वो लोग पहुँच जाएंगे.. बातों बातों मे यह पता चला की तरुण और उसके पापा, लड़की देखने जा रहे थे तभी उनकी कार का एक्सीडेंट हुआ..

शाम होते ही तरुण के सारे रिश्तेदार आ पहुंचे.. और पीयूष, कविता, मौसम और फाल्गुनी ने उनसे इजाजत ली और घर लौटें.. रात को मौसम और फाल्गुनी सब के लिए खाना लेकर पहुंचे..

अनजान शहर मे, जब इस प्रकार कोई आपकी सहायता करता है, तब इंसानियत की किंमत समझ आती है.. पैसों के घमंड पर उछल रहे लोगों को जब कोई मामूली सा रेहड़ी-वाला या ऑटो-वाला, तकलीफ के वक्त अस्पताल पहुंचाकर उनकी ज़िंदगी बचाने मे मदद करता है.. तब उन्हें उस छोटे आदमी के बड़े दिल के प्रति जज़्बात पैदा हो जाते है.. पर सब ठीक-ठाक हो जाने पर.. वापिस पैसों की गर्मी सर पर चढ़ जाती है.. और फिर वही इंसान उन छोटे लोगों को तुच्छता से देखने लग जाता है..

अस्पताल में तीसरी रात को जब मौसम और फाल्गुनी, तरुण के स्पेशल रूम मे बैठे थे तब..

फाल्गुनी: 'तरुण, तुम जिस लड़की को देखने जा रहे थे.. वह शायद तुम्हारी किस्मत मे नहीं होगी.. इसीलिए कुदरत ने तुम्हें जाने से पहले रोक लिया"

यह सुनते ही, मौसम के दिल की खिड़की.. हल्की सी खुल गई..!! और पुरानी यादें ताज़ा होने लगी.. देखने जाए तो तरुण और मौसम के बीच किसी प्रकार की अनबन तो थी ही नहीं.. जो कुछ भी हुआ था वो सुबोधकांत के कारण और तरुण के पापा की जिद के कारण ही हुआ था.. मौसम तरुण पर पहले भी मरती थी और आज भी वह उसके दिल मे बसा हुआ था.. हालांकि, अब विशाल ने उसके दिल के महद हिस्से को कब्जे मे ले रखा था.. पर फिर भी .. !! सौम्य और हेंडसम तरुण, एक समय पर, मौसम के दिल की धड़कन था.. और आज उसी मौसम ने, समय रहते मदद कर, उसे मरने से बचा लिया था.. विडंबना बस यही थी.. की अब मौसम ने अपने दिल की चाबी विशाल के हाथों मे थमा दी थी..!!

बात करते हुए अचानक तरुण को खांसी आई.. और मौसम उसके लिए पानी भर रही थी तभी विशाल का फोन आया.. वो न उठा पाई और मिसकॉल हो गया.. विशाल के लिए मौसम ने अलग से रिंगटोन सेट कर रखी थी.. इसलिए बिना पर्स से फोन निकाले उसे मालूम चल जाता था की उसका फोन था..

चौथे दिन डॉक्टर ने बताया की तरुण की हालत बेहतर थी और अब उसे डिस्चार्ज किया जा सकता था.. तरुण और उसके पापा ने मौसम, फाल्गुनी, रमिलबहन के प्रति आभार प्रकट किया.. अगर पुरानी बातों को लेकर उनके परिवार ने वक्त रहते मदद न की होती तो पता नहीं क्या हो जाता.. !! आकस्मिक विपत्ति मे मौसम के परिवार ने जिस प्रकार उनकी सहायता की थी.. उसे देखकर, तरुण के पापा की आँखों मे आँसू आ गए..!!

उन्होंने रमिलबहन के आगे दो हाथ जोड़कर कहा "बहनजी, अगर आप लोगों ने समय रहते हमारी मदद न की होती तो मैं सोच भी नहीं सकता की क्या हो जाता.. !! आप लोगों का किस तरह शुक्रियादा करूँ, मुझे तो समझ नहीं आ रहा.. !! आपके परिवार से संबंध तोड़ने के बावजूद.. बिना किसी कड़वाहट के आप लोगों ने हमारी बहोत मदद की.. और साबित कर दिया की आप लोग मुझ से कई ज्यादा गुणी हो.. एक समय पर मुझे लगा था की मौसम और आपका परिवार मेरे लायक नहीं है.. पर अब समझ मे आ रहा है की हकीकत मे, हम ही, आप लोगों के लायक नहीं थे.. मौसम जैसी लड़की हमारे नसीब मे ही नहीं थी.. !!"

यह सुनकर, कमरे मे बैठे हुए सारे लोग भावुक हो उठे.. !! तरुण ने उदास नज़रों से मौसम की ओर देखा पर मौसम ने नजरें फेर ली..


यह देख, तरुण को बहोत बुरा लगा.. पर वो मौसम की स्थिति को समझ रहा था.. एक वक्त था जब मौसम बेहद लाचार और निःसहाय थी.. दिन मे पचास बार कॉल कर रही थी पर वो जवाब नहीं दे रहा था.. लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं थी.. मौसम के पास विशाल था.. और अब तो तरुण भी उस कतार मे खड़ा नजर आ रहा था..!!

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