Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

hotaks

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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running
 
Last edited:
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अपडेट #01

पेज 📄 07 -
धीरे करिये न.. जी.... (भानु स्पेशल)

अपडेट #02 - पेज No. 📄 18

👉
मादरचोद...

अपडेट #03 - पेज No. 📄 28

👉सुंदरपुर और उसका वो पीपल

अपडेट #04 - पेज No. 📄 36

👉 सत्तू की नज़रें

अपडेट #05 - पेज No. 📄 45

अपडेट #06

पेज 📄 54 - किया वो.. वनराज था ?

अपडेट #07 - पेज No. 📄 66

अपडेट #08

पेज 📄 75 - यु समझो.. इक माँ है तोह दूसरी मालती चची

पेज 📄 81 - मंगलसूत्र.. ाआखिरी निशानी

अपडेट #09

पेज 📄 95 - महिला मण्डली

पेज 📄 98 - किया मैं आपकी ले सकता हु.. ?

अपडेट #10

पेज 📄 107 -


बचपन की यादें.. शीला का यौवन

पेज 📄 112 - बचाओ.. बचाओ... कोई है..

पेज 📄 116 - दोनों खूंखार है.. (कुंदन - मालती)

अपडेट #11

पेज 📃 142 - पुरे जानवर hi हो आप (अनोखी वस कुंदन)

अपडेट #12

पेज 📃 154 - तुम्हारी छूट में दूसरे का लुंड देख क मुझे सिर्फ ख़ुशी मिलेगी.. (वीरू की ीचा)

अपडेट #13 - पेज No. 📃 164, 174, 181

अपडेट #14 - पेज No. 📃 196

अपडेट #15 - पेज No. 📃 206

अपडेट #16 - पेज No. 📃 218, 226, 235, 244, 258


अपडेट #17 - पेज No. 📃 275, 287, 292, 301-302

अपडेट #18 - पेज No. 📃 316-317, 326,

पेज 📄 334 -
घाना जंगल

अपडेट #19

पेज 📃 338 - कोण नहीं छोड़ना चाहता.. मालती को ?


पेज 📄 348 - गौरैया का पति.. गांड का दीवाना

पेज 📄 361-362 - पहलवान क खेत.. और Maha-Rand 'अवतार'

अपडेट #20

पेज 📄 390 -
सुबह का जोश

पेज 📄 395-396 - मेरी पत्नी चुद रही है..

पेज 📄 406 - मेरा पल्लू सरक सरक जाये

अपडेट #21 ( Chapter 👉 कामुक वर्षा.. )


पेज 📄 481-482 - माया की माया

Meri kahani k pehla Part 👇

मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete



Adultery - मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete

Part #02 (Running)Story 👇 मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) #01 Final Index ✍️ N Update List 👇मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete...



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👇

मैं आप सभी का इतना प्रेम और सहयोग मिला की मेरे पास सब्दो की कमी है

'4 अपर, 2024' को जिस सफर की सुरुवात की थी आज वो आप सभी की वजह से इतनी दूर आ गया है

इसके लिए आप सभी का दिल से धन्यवाद् 🙏

कहानी का पहला Part पूरा हो चूका है.. और अब यहाँ से Part #02 की सुरुवात होगी

पिछले Part सिर्फ मालती क चारो तरफ था.. पर इस बार कहानी परिवार क और कई किरदारों पे भी बात करेगी,

जिसका कुछ आईडिया मैंने Part #01 क अंतिम अपडेट मैं आप सभी को दे दिया था

वैसे कई लोगो को ऐसा लगता है की कहानी 'मोनू' की है.. पर नहीं दोस्त

कहानी हमेशा से 'मालती' क चारो तरफ थी.. और आगे भी रहेगी, हर चीज़ का केंद्र बिंदु हमारी 'मालती' hi है


नोट :

(15 जून '25)

Hello दोस्तों,

आप सभी ने मुझे इतना प्रेम दिया की मैं उसके लिए जितना भी आभार व्यक्त करू वो काम hi है

यही पे मेरे 2 दोस्तों (Rinkp219 न Mukhtar) ने मुझे सुझाव दिया था की मुझे कहानी क सभी पात्रो क बारे में कहानी क प्रथम पैन पे बताना चाहिए

तोह चलिए जानते है मेरी इस कामुक दुनिया क कामुक किरदारों क बारे में

मुरली दस


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मुरली दस एक मेहनती और पुरे गाओं क चहिते हुआ करते थे पर अफ़सोस 50 साल की उम्र में अपने पुरे परिवार की जिम्मेदारी अपने बड़े बेटे 'महेंद्र' को देके इस दुनिया से चल बेस

पर जब तक जीवित रहे पूरी शान से रहे और पुरे गाओं में इनका एक अलग hi रौब था

ठाकुर जैसे लोग भी अगर किसी क सामने खुद को बेबस समझते थे तोह यही 'मुरली दस' थे

मुरली दस ने पुरे जीवन किशनी की और आगे जेक गाओं वालों क प्रेम और इस गाओं में बढ़ते अपराध को रोकने क लिए यहाँ क 'सरपंच' भी बने

कहते है इनका किया हुआ फैसला कभी गलत नहीं होता था और वो निर्णय पुरे गाओं क लिए पत्थर की लकीर हुआ करता था

जब ये सरपंच थे तब इन्हे पता चला की गाओं में कुछ ऐसा है जिससे आने वाली नयी पीडिया बर्बाद हो सकती है, पर उन्ही दिनों ये दुनिया से चल बेस

वैसे इनका खुनी यानि 'वनराज' आज भी जीवित है जो सबसे छुपा हुआ पिछली 20 सालों से गाओं क पहाड़ी पे रह रहा है

कुंदन ने वनराज को मरने की कोशिश तोह पूरी की थी पर सायद उसकी किस्मत में उस समय मृत्यु नहीं लिखी थी

वैसे मुरली दस का एक और रूप था जिसमें कामुकता भरी पड़ी थी.. गाओं की कई औरतें इनके लिए पागल रहती थी और खुद अपने मर्दो से चोरी छुपे इनके खेतों में जेक इनसे अपनी गर्मी शांत करवाती थी

वैसे 'मुरली दस' ने बहार hi नहीं अपितु स्वयं क यहाँ की भी कुछ योनि क द्वारों को चौड़ा किया है, पर वो कोण है और किया हुआ था ये उनकी मृत्यु क साथ hi एक राज़ बांके रह गया.. एक काला कामुक राज़

~ © ~

सुरीली देवी


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मुरली दस की खूबसूरत और रास से भरी हुई धर्मपत्नी 'सुरीली देवी' ठीक अपने पति की hi तरह मात्र 46 वर्ष की आयु में स्वर्ग सिधार गयी थी

वैसे अपने बड़े बेटे क लिए 'सविता' का चुनाव उसी ने किया था पर शादी से 1 साल पहले hi एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी थी

38" की भरी हुई और उस उम्र में भी कासी हुई दूध जैसी गोरी गोल गोल चूचियों का दीवाना कोण नहीं होगा

उसपे "38 की hi चाटने लायक उसकी गांड क कहने hi किया

सुरीली का पति मुरली दस तोह उसकी गीली गुफा का ऐसा दीवाना था की मौका मिलते hi उसे चेतना और फिर अपनी खूबसूरत पत्नी को गोदी बनाने में तनिक भी देरी नहीं करता था

सुरीली की कामवासना कुछ ज्यादा hi थी सायद ऐसी कारन उसकी रासलीला कई बार उसके जवान होते बच्चों ने भी देखि थी

पर सुरीली इस बात पे ज्यादा धियान नहीं देती थी, उल्टा वो तोह अपने बच्चू से कुछ ज्यादा खुलके हसी मज़ाक कर लिया करती थी

सुरीली एक खूबसूरत और बहुत hi जिंदादिली से जीने वाली औरत थी, जो जब तक जीवित रही उसने अपने जिस्म की हर जरुरत को खुल क पूरा किया


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~ © ~

आज क लिए यही दोनों काफी है, पर बताने की जरुरत तोह है नहीं की इसके आगे और बहुत से कामुक किरदार है यहाँ मेरी इस छोटी सी कामुक दुनिया में


जिनसे में आगे ऐसे hi मिलते रहेंगे

---

नेक्स्ट 👉 अपडेट #01 - पेज No. 📄 07
 
थैंक ु सो मच माय ब्यूटीफुल ❤️ मम

कीप रीडिंग कीप सपोर्टिंग Laila Ali Khan
 
अपडेट #01

धीरे करिये न.. जी....


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"बंद कर दो उसका मुंह..."

भानु ने जबसे ये सब्द जब्बार से कहे है तबसे hi वो आगे किया करना है इस बारे मैं सोच रहा था.. जहा जल्दी hi उसने आगे की पूरी रूपरेखा बना ली थी

जिसे सोच सोच क उसके अधरों से हसी ख़तम hi नहीं हो रही थी.. आँखों मैं ग़ुस्सा और बदले की भावना से जलता हु भानु, अब खेल को बड़ा करने क बारे मैं सोच चूका था

दिन अपनी गति से ख़तम होता रहता है.. और रात का अँधेरा चारो तरफ अपनी चादर बिछा देता है

भानु खेत से निकल क सीधा गाओं क बड़े बाजार पहुँचता है.. यहाँ आने क पीछे 2 वजह थी

पहली ये पता करना की.. किया अभी तक किसी को अनोखी या मोनू की लाश मिली है की नहीं

और दूसरी गाओं क एकलौते देसी ठेके से शराब लेना

जहा भानु कई लोगो से बातें करता है और उसे यकीन हो जाता है की अभी तक किसी को कोई भनक नहीं है.. पर उसकी किस्मत थोड़ी सी ख़राब निकलती है ककी देसी शराब आज ख़तम हो चुकी थी, और विदेशी उसे पसंद नहीं

इसलिए वह से वो सीधा अपने घर की तरफ चल पड़ता है

यहाँ भानु क घर पे..

खुली खिड़की से आती रात की हलकी ठंडी हवा भी गरम जिस्म की शीला क पसीने को काम नहीं कर प् रही थी.. उल्टा ऐसा लग रहा है जैसे वो हवा शीला को और ज्यादा भड़का रही हो

शीला अपने हाथों मैं थामे हुए बेलन से उस खिड़की क कपट और ज्यादा खोल देती है ताकि उसके जिस्म को हवा कुछ और सुकून दे सके


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"उफ्फफ्फ्फ़... ये गर्मी भी न.. इतनी बारिश पर गर्मी मैं जरा भी कमी नहीं आयी"

खिड़की से आती हवा मैं कुछ बढ़ोतरी हो चुकी थी, पर शीला क पसीने से भीगे जिस्म क लिए वो हवा काफी नहीं थी

पर वो वापस से पराठे बेलना लग गयी थी.. उसके खूबसूरत चेहरा से पसीने की बुँदे बहती हुई उसके गोर गालों का चुम्बन करती है और फिर वह से आगे बाद चलती है

जहा वो नमकीन पानी उसके सुन्दर गले से होता हुआ उसके ब्लाउज को गीला करने लगता है.. साथ hi साथ पसीने की कुछ और बूंदें जिन्हे सायद शीला क उन्नत और कैसे गोल उरोजों से पियर हो गया था, ककी वो बुँदे मोतियों जैसी बन क उसके उरोजों पे सुशोभित हो चुकी थी

जिस बेलन से शीला पराठे बेल रही थी.. उसे नीचे की तरफ करती है और अपने पैरो क बीच एक खास स्थान पे एक खास खुजली को मिटने लगती है

जिस वजह से उसके खूबसूरत और कामुक चेहरा पे एक अलग hi लालिमा च जाती है, उसके तीखे नैन नक्श और कामुकता से बंद हुई आँखें बहुत खूबसूरत लग रही है

एक बार को तोह मन में आता है की सीधा अंदर कमरे मैं जाये और बेलन से थोड़ा प्रेम खेल.. खेल ले, पर वो ऐसा कुछ नहीं करती


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शीला अपना एक हाथ वही किचन की सेल्फ पे रख लेती है और दूसरे हाथ मैं थामे बेलन से अपने पैरों क दरमियान उठ रही खुजली को मिटने की कोशिश करने लगती है

"Aaaaaaaaaahhhhh.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... ये गरमममममीीी"

शीला क मुख से निकल रहे सब्दो से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो किसी और hi गर्मी की बात कर रही हो

शीला अपने पैरों को थोड़ा फैलाती है और बेलन क एक हिस्से को थोड़ा और अंदर घुसाने की कोशिश करती है

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhh....."

शीला बुरी तरह मचल पड़ती है.. और उसका हाथ किचन की रैक पे मजबूती से जकड जाता है

"ेस्स्स्सह्ह्ह्ह....... ये पसीने... हैईईई"

भरे और कैसे सुडोल जिस्म की मालकिन शीला का जिस्म धीरे धीरे हिलोरे मरने लगता है.. पर तभी तवे पे रखे हुए पराठे से जलने hi महक आने लगती है और शीला जल्दी से सावधान की अवस्था मैं लौट आती है

"हैई.. ये गर्मी किया किया करवा देती है"

शीला खुद की बात पे hi मुस्कुरा उठी थी.. की तभी उसके दोनों हाथों क नीचे से 2 हाथ आगे आते है और उसके सुडोल उरोजों को मजबूती से जकड लेते है

एक पल क लिए तोह शीला चौक hi पड़ी थी और उसका हाथ हल्का सा गरम तवे को छू भी गया था

"आआआअह्ह्ह्ह... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

शीला जल्दी से अपना हाथ झटक देती है पर उसके कुछ और कहने से पहले hi पीच उससे पूरी तरह चिपका हुआ मर्द अपना एक हाथ आगे बड़ा क उसके उस हाथ को पकड़ लेती है और उसकी उँगलियों को अपने मुंह मैं रख क चूस लेता है

"उम्मम्मम्म...... Srrrrrrppppppppppp......."

शीला भी मुस्कुरा पड़ती है और अपनी कमर को उस आदमी क पैरों क बीच दबा देती है.. जिससे उसके स्तम्बो पे कोई मोती धारधार चीज़ चुबने लगती है

शीला अपना खूबसूरत चेहरा घुमा क पीच चिपके हुए मर्द को हलकी नाराज़गी से देखते हुए

"आप भी न.. अचानक से यु आके दबोच लिया, देखो मेरी उंगलिया जल गयी"

आदमी शीला की उन उँगलियों को एक साथ अपने मुंह मैं लेके चूस रहा था.. इसलिए वो कुछ कहता नहीं बस शीला की आँखों में देखते हुए उसकी उँगलियों को और जोर से चूस लेता है

"सललललररररररपपपप....."

बेचारी शीला शर्मा जाती है.. और अपनी नज़रों को झुका लेती है, पर साथ hi अपनी कमर को और ज्यादा पीछे कर लेती है

यु समझो ये उसकी मौन सहमति थी

"अपनी खूबसूरत पत्नी को ऐसे बाहों मैं लेने का मज़ा hi अलग है"

अब तक तोह समझ hi गए होंगे किया ये मर्द और कोई नहीं बल्कि शीला का पति 'भानु' है.. जो घर आ चूका है

शीला अपने पति क मुंह से आज़ाद हुई अपनी उँगलियों को अपने होंठों से चुम लेती है और अब उसके दोनों हाथ सामने की सेल्फ पे टिक चुके थे.. जिस वजह से भानु ने वापस अपनी खूबसूरत पत्नी क दोनों कैसे हुए उरोजों को एक साथ जकड लिया था


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शीला- (मुश्किल से अपनी आँखों को खोले रख प् रही थी) आआआअह्ह्ह... किया कर रहे है जी.. खाना तोह बनाने दीजिये, आज आपकी पसंद का भरता और पराठे बना रही हु... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... Maaaaaaaaaaaaaaa... आआप... नाआ... बड़े बदमाश है.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह...."

शीला अपनी बात कहते हुए अचानक से मचल पड़ती थी और कामुकता की खूबसूरत लेखाये उसके चेहरे पे नज़र आने लगी थी

असल मैं भानु ने अचानक से उसकी दोनों चूचियों क निप्पल्स को एक साथ अपनी उँगलियों क बीच लेके बेहरहमी से मसल दिया था.. वो भी कोई पियर से नहीं, बल्कि ऐसी बेहरहमी से की दर्द की कशिश शीला क चेहरे पे साफ़ नज़र आने लगती थी

"आआआह्ह्ह्हह्ह.... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... माआआआआ..... कितने गंदे है.. अआप.. ऐसा कोई अपनी पत्नी क साथ करता है किया.... आआआआहहहहहहह....... Maaaaaaaaaaaaa... माअररररररर.... गयीईइ... रीई..."

शीला एक बार फिर से इतनी बुरी तरह से उछाल पड़ी थी की एक पल क लिए वो अपने पैरों क पंजो पे कड़ी हो गयी थी.. पर ऐसी क साथ उसे एक सख्त रगड़ भी अपने गोर और गोल चूतड़ों पे महसूस हुई थी

ऐसा इसलिए हुआ था ककी भानु पे उसके दोनों मोठे गोल दूध को एक साथ अपनी उँगलियों से इतनी कास क दबा दिया था.. की ऐसा लगा की उसकी सख्त मोती उंगलिया उसके दूध मैं अंदर तक घुस जाएँगी


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शीला- (आँखों मैं आँशु भर आये थे) उफ्फ्फ्फ़.... आपको न जाने किया हो जाता है, हैईईई छोड़िये न.. जी... आआआआहहह"

पर भानु रुकता नहीं.. उल्टा मुस्कुराते हुए अपनी खूबसूरत भरे और कैसे जिस्म वाली पत्नी की दोनों सख्त चूचियों को एक साथ जोर जोर से मसलने लगता है

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भानु आता घुन्ध रहा.. खिड़की से आती हवा भी अब शीला को गरम ताप्ती लू जैसी लग रही थी

पर ऐसी बेहरहमी से शीला क अंदर एक आग जरूर जल चुकी थी ककी अब वो जोर जोर से अपनी कमर को अपने पति क उभर चुके मोठे नाग पे रगड़ रही थी

"आआआआह्ह्ह्ह.... धीरे करिये न.. जी.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... माआआ..... आप बहुत गंदे है... हीी... माआआआआ..... उफ्फ्फ्फ़..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... धीरे बाबा... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

ऐसा लग रहा था जैसे शीला जितनी बार अपने पति से अपने स्तनों पे धीरे हाथ चलने को कहती है.. भानु उतनी बार और जोर से उनका मर्दन करने लगता

ये खेल अगले कुछ पलों तक यही चलता रहता है, पर इतनी hi दिएर मैं शीला क पैरों क बीच बहुत सारा चिपचिपापन आ चूका था

"आआआआहहहहहहह.. बस करिये न जी.... उफ्फ्फफ्फ्फ़..... मेरे स्तनों मैं दर्द होने लगा है"

भानु क कठोर हाथों की जकड ने सच मैं शीला क जिस्म मैं एक पीड़ा की लहर दौड़ा दी थी.. ककी पल प्रति पल भानु और ज्यादा जोर और बेहरहमी से अपनी पत्नी क गोल सुडोल दूध को मसलता जा रहा था

ऐसा समझो की अगर सही समय पे उसे रोका न जाये तोह पता नहीं वो आज शीला का किया हाल करता

भानु, शीला क उरोजों से हाथ हटाता है पर अगले hi पल वो शीला को हल्का सा दक्का देके उसे किचन की सेल्फ पे झुका देता है

"शीला... आआअह्ह्ह.. किया करते है जी.... माआआ"

पर भानु सुनता कहा है

"मैं कहा कुछ कर रहा हु.. करना तोह अब है"

भानु मुस्कुराते हुए अपनी खूबसूरत पत्नी की साड़ी को उठाना सुरु कर देता है.. जिससे शीला की साँसे जोर जोर से चलने लगती है

"आआआअह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... अंदर कमरे मैं चलिए जी.. यहाँ नहीं.... आआअह्ह्ह्ह... Maaaaaaaaaaaaaaa... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

पर भानु को न जाने क्यू अपनी पत्नी का ऐसा गिड़गिड़ाना ाचा लग रहा था, वो धीरे धीरे शीला की साड़ी को उठता जाता है जिससे जल्दी hi शीला पीछे से पूरी नंगी हो चुकी थी.. उसने अंदर और कुछ पहना hi नहीं था

ऐसा नज़ारा देख क भानु का नाग अकड़ जाता है और अपना फैन फ़ैलाने लगता है

भानु- (अपनी खूबसूरत पत्नी क गौर सुडोल चूतड़ों पे हाथ फिरते हुए) आआआह्ह्ह्ह... कितने खूबसूरत है... मन करता है पूरा खा जाऊ

शीला मारे शर्म क अपनी आँखों को बंद कर लेती है, उसके दोनों हाथ सामने की सेल्फ पे थामे हुए थे और वो खुली खिड़की को देखते हुए धीरे से कहती है

"आआअह्ह्ह... काम से काम ये खिड़की तोह बंद कर दीजिये न"

भानु- (शीला क चूतड़ों पे हल्का सा मरते हुए

...चटक) किसकी हिम्मत जो मेरी पत्नी को ऐसा नंगा देखे, साले की आँखें फोड़ दूंगा.. और आज सब कुछ यही होगा

अपने पति क मुख से निकली ऐसी मर्दानगी भरी बातों का पूरा असर शीला क पैरों क बीच दिख रहा था, ककी वह से अब एक गीली और चिपचिपी नदी बेहनी सुरु हो चुकी थी

भानु अपनी खूबसूरत पत्नी को हल्का सा झुका क उसके चूतड़ों पे पियर से मरते हुए झुक जाता है और दोनों हाथों से उसकी गांड का द्वार फैला देता है

"आआआह्ह्ह्हह्ह..... किया नज़ारा है"

और जैसे hi उसके काले होंठ उसकी पत्नी क भूरे छेद क करीब आते है.. शीला तुरंत घूम जाती है जिससे भानु क बीड़ी वाले काले होंठ उसकी पत्नी क आगे वाले गीले स्थल से टकराते है

"उम्मम्मम्मम्म..........."

पर भानु तब भी नहीं रुकता नहीं.. वो अपनी पत्नी की गीली छूट को चुम लेता है

"Ummmmmmmmmm....."

शीला जल्दी से अपने पति क सर पे हाथ रख क उसका मुंह अपनी गीली योनि से अलग करती हुई

"नहीं.. चीई... किया कर रहे है, उठिये"

पर भानु रुकता नहीं, उल्टा दोनों हाथों से योनि को पूरा फैला क उसपे अपनी खुरदुरी जीभ को लगा क किसी कुत्ते जैसे छत्त लेता है

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"सललललररररररपपपप....... Srrrrrrppppppppppp........."

शीला जैसे तरप जाती है, उसका पूरा जिस्म ऐसे काँप उठता है जैसे पतझड़ मैं सूखा पत्ता हो

"आआआआअह्ह्ह्ह... नहीं.. जी.... चींईईई..... नहीं... हटिये वह se....aaaaahhhhhhhhh"

शीला दोनों हाथों से अपने पति क बालों को पकड़ क उसका मुंह अपनी योनि से हटा देती है

"मुझे ये सब पसंद नहीं है... ये सब ाचा नहीं लगता"

पर उसका काँपता हुआ जिस्म सायद कुछ और hi कहना च रहा था.. पर भानु इस बार उसकी बात नहीं कट्टा और खड़ा हो जाता है

दोनों पति पत्नी की नज़रें आपस मैं टकराती है और अगले hi पल भानु क होंठ शीला क होंठों का रसपान कर रहे थे

"उम्मम्मम्मम..... उम्मम्मम्मम्म.... Ummmmmmmmmmmm"


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भानु एक लामा चौड़ा मर्द था, इसलिए शीला इस समय अपने पंजो पे कड़ी थी.. पर ऐसी इस्तिथि मैं भी वो अपने पति का पूरा साथ दे रही थी

"उम्मम्मम्मम...... Ummmmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm"

भानु अपनी खूबसूरत पत्नी क होंठ का रास निचोड़ते हुए अपना एक हाथ उसकी नंगी चूचियों पे रख क उनका फिर से मर्दन सुरु कर देता है

ककी जब उसने पहले अपनी पत्नी की चूचियों का मर्दन किया था तब ब्लाउज क कई बटन आगे से टूट गए थे इसलिए अब आगे से उसके दूध लगभग नंगे hi थे.. वैसे भी शीला ने ब्लाउज क नीचे कुछ पहना hi नहीं था


शीला क स्तन इतने नंगे थे की उसके दोनों कबूतरों को खिड़की से आती हुई ठंडी हवा का ेशास होने लगा था

ऐसी बीच भानु भी एक पल क लिए अलग होता है, और इससे पहले hi शीला कुछ समझ पाती उसकी साड़ी उतरनी सुरु हो जाती है

"नहीं... जी.. यहाँ नहीं.. रुकिए न... मान जाइए जी... यहाँ नहीं... खिड़की भी खुली है... ारीये..."

पर भानु सुनता नहीं और जल्दी hi उसकी साड़ी पूरी तरह उसके जिस्म से अलग होक वही रसोईघर की जमीन पे पड़ी हुई नज़र आती है

शीला जल्दी से अलग होक एक हाथ से अपनी दोनों चूचियों को छुपाये हुए खिड़की बंद करने लगती है, उसे दर था की कही कोई बहार से उसे ऐसे देख न ले

पर भानु उसे ऐसा नहीं करने देता.. वो उसकी खूबसूरत कमर से उसे जकड लेता है और उसे वही किचन की सेल्फ पे झुका देता है

"आआआअह्ह्ह.... किया करते है जी... खिड़की तोह बंद करने दीजिये न... Esssshhhh....maaaaaaaaa.......... वह.. अपनी ऊँगली निकलाईए.... हीी.... रईईए...... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... Maaaaaaaaaaa.... माअररररररर गयीईइ... रईईईई...... Ufffffffffff"

पर भानु किसी दरिंदे जैसा अब उसे कोई भी मौका नहीं दे रहा था.. वो शीला को किचन की सेल्फ पे झुका क उसके नंगे जिस्म को कसके मसल देता है, जिससे शीला की योनि से चिपचिपा प्राधारत टपक पड़ता है

पर वो इतने पे नहीं रुका था.. उसके अपनी बीच वाली मोती ऊँगली को बिना किसी चेतावनी की शीला की गांड क सूखे छेद मैं घुसा दिया था


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वार इतना जोरदार था की शीला बुरी तरह से तड़प गयी थी.. उसे भानु की ऊँगली का अचानक से यु उसकी गांड मैं घुसना बहुत अजीब लगता है

ये वो चीज़ थी जिसके लिए वो न जाने भानु को कबसे रोकती हुई आ रही थी

शीला- (अपनी गांड मैं अपने पति की ऊँगली को महसूस करती हुई) आआआअह्ह्ह्ह... माआआ... किया कर रहे है जी.... आआआआअह्ह्ह्ह..... निकालिये अपनी ऊँगली को वह से कितना दर्द हो रहा है..... आआआअह्ह्ह्ह... माआआआ.... माआआआ.... माअररर्र.... गईइइइइइ.... रीई..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फ़... उफ्फफ्फ्फ़... माआआआ

पर भानु कहा रुकने वाला था, वो एक हाथ से शीला को उसी सेल्फ पे दबाये रखता है और दूसरे हाथ की बीच वाली उसकी ऊँगली अब पूरी रफ़्तार से गपागप गपागप गपागप करती हुई उसकी गांड की दीवारों को रगड़ते हुए अंदर बहार होने लगी थी

शीला- (लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए) आआआह्ह्ह्ह.. माआआ..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...... वह कितना दर्द होता है पता है न..... Aaaaahhhhhhhhhh... माआआआ.... Maaaarrrrrrrrrrrrr गयीईइ... Reeeeeeeeeeee

शीला जितना गिड़गिड़ा रही थी.. भानु को उतनी ख़ुशी मिल रही थी

ऐसी ख़ुशी मैं उसने अपनी ऊँगली को इतनी जोर से अंदर तक घुसाया की शीला का पूरा जिस्म हवा मैं उठ गया था.. ये भानु की ताक़त का एक छोटा सा नमूना था की उसने सिर्फ अपनी बीच वाली ऊँगली से hi एक औरत को उसकी गांड से हवा मैं उठा दिया था

पर उसकी इस हरकत की वजह से शीला को कितना दर्द हुआ था.. इस बात का साबुत उसकी आँखों से बहने वाले आंशुओं से पता चल रहा था

"Aaaaaaaaaahhhhh... Maaaaaaaaaaaa.... किया कर रहे है जी.... माआआ..... माआररररररर गयीईइ.... रईईईई.... Maaaaaaaaaaaaaaaa.... हीी...... रईईईईई... Maaaaaaaaaaaa.... निकल लीजिये.... आआअह्ह्ह्हह... बहुत जोरो से दर्द हो रहा है.. मायआ.... माअररर्र... गईइइइइइ.... मैं... आआअह्ह्ह"

सायद भानु जैसे हैवान को भी अपनी पत्नी को यु दर्द से तड़पते हुए देख क कुछ रेहम आ गयी थी.. इसलिए वो गपक से अपनी ऊँगली बहार कीच लेता है और शीला वापस अपने पैरों पे कड़ी होक बुरी तरह से हाफने लगी थी

"आआआआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह..... Maaaaaaaaaa.... किया हो गया है... आपको..... आआआआअह्ह्ह्ह"

भानु, शीला क सर को किचन की सेल्फ पे दबा देता है और जिस ऊँगली को उसने अभी तक अपनी पत्नी की गांड मैं घुसा रखा था उसे अपने मुंह मैं रख क ऐसे चूसने लगता है मानो उसपे सेहद लगा हो

शीला- (ये सब हैरानी से देख रही थी.. पर न जाने क्यू उसकी छूट से बहुत सारा रास बहने लगता है) आआअह्हह्ह्ह्ह.... चींईईई... किया कर रहे है... चीई... निकलये अपनी ऊँगली मुंह से.... निकलये न

शीला क जिस्म मैं पीड़ा भी हो रही थी, पर इस समय उसे अगर किसी बात की परवा थी तोह सिर्फ इसकी की उसका पत्नी उस ऊँगली को चूस रहा है जो कुछ पल पहले उसकी गुदा क अंदर थी


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"निकलये न.. जी... चीई... "

भानु- (हस्ते हुए.. ऊँगली को शीला क होंठों क पास लाते हुए) तुम भी चूस क देखो.. बड़ा स्वाद है

"चींईईई.... चीई... दूर करिये ऐसे"

और अपने होंठों को जोर से बंद कर लेती है की कही उसका पति सच मैं वो ऊँगली उसके मुंह में न घुसा दे

भानु हस्ते हुए शीला को उसी प्रकार किचन की सेल्फ पे दबाये हुए उसके गोल गोर चूतड़ों पे मरते हुए... चटक... चटक

"आज तोह मैं ये इसका भरता बना क रहूँगा"

शीला जैसे काँप जाती है.. उसे याद अत है की उसने कहा था की आज वो भानु की पसंद का भरता बना रही है

"नहीं.. नहीं... मैं मर जाउंगी.. आपका बहुत बड़ा है, मुझसे सहा नहीं जायेगा.. नहीं नहीं.. ये मत करिये"

भानु- (जिसपे पूरी तरह हैवानियत चढ़ चुकी थी) आज मैंने एक ज़हरीली सपोले को अपने पैरों से राउंड दिया है.. आज मैं बहुत खुश हु मेरी जान, आज तोह मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाले

शीला को लगता है की खेत पे कोई साप का बचा होगा जिसे भानु ने मारा है.. ककी गाओं और खेतों मैं ये सब आम सी बात थी

शीला- मैं हाथ जोड़ती हुई.. रहने दीजिये न, पिछले बार आपने जबरदस्ती सरब पीला क अपनी मनमानी कर ली थी, 1 हफ्ते तक चलना मुश्किल हो गया था मेरे लिए

पर शीला ने ये सब बोल क गलती कर दी थी.. ककी अब भानु का जोश पुरे चरम पे पहुंच गया था, मानो शीला की बातों ने उसकी आग मैं घी दाल दिया हो

वैसे एक बात ये भी थी की किसी का भी धियान एसपी नहीं गया तह की तवे पे छड़ी हुई रोटी जल क काली पड़ती जा रही थी, वैसे भी ऐसे कामुक हरकतों क बीच कहा किसी को रोटी की पड़ी होगी

भानु की नज़र गैस क पास hi रखे हुए देसी घी क डिब्बे पे जाती है और उसके अधरों पे एक कामिनी मुस्कान खेल जाती है

वही शीला का सर तोह भानु पे किचन की सेल्फ पे दबा रखा था, इसलिए वो देख नहीं प् रही थी की उसके पति क अचानक इतना खुस होने की वजह किया है

भानु ऐसी तरह शीला को दबाये रखता है और जल्दी जल्दी अपनी धोती खोलने लगता है.. जिसमें ज्यादा समय नहीं लगता, बाकि ऊपर से तोह वो नंगा था hi

जल्दी hi उसका विकराल लुंड अपना फैन फैला क शीला की गांड की खुसबू लेने लगता है


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भानु अपने पैरों से शीला क पैरों को मरते हुए उसके पैरों को फैलवा लेता है.. शीला को अंदाज़ा था की किया हो सकता है, पर फिर भी वो अपने पति का पूरा अनुशरण कर रही थी

पर भानु का खेल तोह बस सुरु hi हुआ था, वो अपना एक पेअर उठा क शीला क मुंह पे रख देता है.. किसी और औरत क लिए ये शर्मिंदा होने वाली बात हो सकती है

पर भानु की इस अजीब हरकत में न जाने किया था.. ककी उसके ऐसा करते hi शीला क योनि अपना गाड़ा रास बहाने लगती है

"आआआआहहहहह.... किया कर रहे है... जीई... आआअह्ह्ह्ह... माआआआ.. ऐसा कोनसा सपोला मार दिया.. जिससे खुस होक मेरी हालत बिगड़ रहे है... आआअह्ह्ह्ह"

शीला की योनि लगातार झाड़ रही थी.. उसका जिस्म हल्का होता जा रहा था, कामुकता की अधिकता से उसकी आँखों भोझिलता से बंद होने लगी थी

भानु- बहुत ज़हरीला सपोला था.. पर अभी सिर्फ सपोला निपटा है, नागिन अब भी बची हुई है

ये कहते हुए भानु की आँखों क सामने मालती का चेहरा घूम रहा था


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शीला को कुछ भी समझ नहीं आता.. पर भानु को कहा इस बात की परवा थी ककी भानु तोह अपना hi खेल खेलने मैं लगा हुआ था..

वो तवे क पास रखे देसी घी क डब्बे हो हाथ लगता है तोह उसकी उंगलिया जल सी जाती है, पर वो डरता नहीं और न पीच होता है

वो उस जलते हुए डब्बे हो उठा लेता है.. ककी अब उसके दोनों हाथ खली थे इसलिए वो दूसरे हाथ से शीला की गांड क छेद को फैला देता है

शीला- (जो अब भी समझ नहीं पायी थी की उसके साथ आज किया किया होने वाला है) आआह्ह्ह्ह... किया कर रहे है... वह न डालिये, बहुत दर्द होता है.. मान जाइए न.. आपका बहुत बड़ा है... आआआहहहहहहह... माआआआआ..... जल गयी reeeeeeeeeee.....

शीला को यु तड़पते देख भानु है पड़ता है.. ककी उसने उस गरम देसी घी को उसकी गांड क छेद पे टपकना सुरु कर दिया था

शीला- (अपनी कमर और गांड को जोर जोर से इधर दुहर हिलने लगती है) आआअह्ह्ह्ह... मायआ..... किया कर रहे है... हीी... रईईईईई... बहुत गरम है.... आआआहहहहहहह... आआआअह्ह्ह्ह... रुक जाइए जी.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... माआआ

शीला जितना चिल्ला रही थी, भानु उतना hi खुस होते हुए.. गरम देसी घी को अपनी खूबसूरत पत्नी की गांड क छेद पे डेल जा रहा था

शीला- आआअह्ह्ह.. ना.. करिये न.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... जल गयीईइ... आअज तोह मैं... हैईईई... रईईईई

भानु घी का डिब्बा वापस रख देता है और अपनी ऊँगली से बहते हुए देसी घी को अपनी गरम और भरे जिस्म वाली पत्नी की गांड क छेद में भरना सुरु कर देता है

"आआआआहहहहह... वह रहने दीजिये न... मां जाइए... रीई .. aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh"

शीला अपनी बात कहते कहते अचानक से तरप उठती है.. ककी भानु ने अपना अंगूठा उसकी गांड क छेद मैं घुसा दिया था


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देसी घी की वजह से उसकी गांड बहुत चिकनी हो चुकी थी.. इसलिए भानु का मोटा अंगूठा बड़ी सी सरलता से अंदर तक घुस गया था

पर दर्द तोह होना hi था.. ककी चिकनाहट की वजह से सिर्फ अंदर जाना आसान बना था.. वह जेक जो पीड़ा होने वाली थी उसका कोई इलाज थोड़ी हुआ था

"आआआआहहहहह.... निकलये न... बहुत दर्द हो रहा है जी.... Maaaaaaaaaaa.... बस करिये.. हैईईई मोरी मैयाआआआ.... आआआअह्ह्ह्ह... maaaaaaaaaaaaaaa... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

पर भानु तोह उल्टा और खुश होता जा रहा था.. उसके मन में एक बात आती है

'एक दिन ऐसे hi मालती का हाल करूँगा.. पर तब कोई रेहम नहीं होगा'

और ये सोचते हुए भानु मंद मंद मुस्कुरा पड़ता है

शीला- (अपनी गांड को मटकते हुए) अब छोड़िये न.. जी... बदन दर्द करने लगा है मेरा.. आअह्ह्ह.. छोड़िये न

भानु अपनी खूबसूरत पत्नी की बात सुनकर वापस धरातल पे वापस लौट आता है और अब वो देरी क मूड मैं नहीं था

ककी वो अपना काला विकराल लुंड पकड़ क उसको शीला क गांड का छेद दिखा देता है.. जैसे hi कुंदन की छोटी बहिन को आभास होता है की आगे किया होने वाला है वो काँप सी जाती है

"नहीं.. नहीं.... मान jayie..Naaa... उस दिन तोह शराब क नसे मैं थी.. और तब नहीं झेल पायी थी.. फिर आज..... हैईईई....... Daiyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa.... Maaaaarrrrrrrrrrrrrrrrr gayiiiiiiiiiiiiiiiiiiii"

भानु अपना असली खेल सुरु कर चूका था, उसने अपना काला विकराल लुंड अपनी पत्नी की गांड क भूरे छेद पे रख क एक जानदार दक्का जड़ दिया था..

देसी घी का कमल था की एक hi बार मैं उसका इतना बड़ा और जानवरो जैसा लुंड शीला की गांड क अंतिम चोर तक पाहकः गया था


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शीला- (आँखों से आंसू बहने लगे थे.. और चेहरे ऐसा लाल हो गया था, मानो किसी ने उसके चेहरे पे लाल गुलाल मॉल दिया हो) हैईईईई..... कैसे इन्शान है.... Maaaaaaaaaaa.... मरररररर जाउंगी... जी...... निकलये.. नाहा..... बचा लो कोई... कुंदन भैया...

सायद शीला ने अपने बड़े भाई 'कुंदन' का नाम लेके गलती कर दी थी.. ककी ये नाम सुनते hi, शीला का हाल ऐसा था जैसे उसकी आँखें किसी भी पल बहार लटक आएँगी और जीभ मुंह से बहार निकल क गिर जाएगी

ककी 'कुंदन' नाम सुनते है.. भानु की आँखों मैं सैतान उतर आया था.. उसने अपना लुंड बहार खींचे पर सिर्फ इतना hi उसका आलू बुखारे जैसा मोटा टोपा अंदर hi रहे

और फिर वापस से देसी घी से भरी शीला की गांड मैं घुसा देता है.. शीला सूखे पत्ते सामान काँप रही थी

पर भानु कहा इतनी आसानी से रुकने वाला था.. वो तोह जैसे सताब्दी ट्रैन बन गया था, जो 100 की रफ़्तार से भाग रही हो


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भानु का काला लुंड जिसपे अब देसी घी की परत चढ़ चुकी थी.. वो गपागप गपागप गपागप करके शीला की कोमल गांड का मुरब्बा बनाने लगा था

भानु उसके सर से अपना पेअर हटा चूका था.. पर शीला अब भी उसी किचन सेल्फ क सहारे झुकी हुई थी

उसे बहुत पीड़ा हो रही थी उसका पूरा जिस्म दर्द से भरा हुआ था.. पर उसका पति रुक नहीं रहा था

भानु ने अपने एक हाथ से शीला का गाला जकड लिया और उसी हालत मैं उसे दबाये हुए उसकी गांड मैं अपना जानवरो वाला लुंड पेलता रहा

"आआआअह्ह्ह्ह... रुक जाइए... धीरे... माआआ... आआअह्ह्ह्हह... बहुत दर्द हो रहा है... आआह्ह्ह्हह... माआआ.... धीरे करिये न... आआआहहहहहहह.... थोड़ा तोह रेहम करिये... आआआआह्ह्ह्ह... माआआआ"


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शीला जितना ज्यादा गिड़गिड़ाती.. भानु को उतना अधिक मज़ा आ रहा था, उसकी रफ़्तार काम होने की जगह और बढ़ती जी रही थी

खुली खिड़की से आती हवा पूरी रसोई मैं कॉमर्स की सुगंध को फैला रही थी.. जिससे पूरा वातावरण और अधिक कामुक होता जा रहा था

भानु- (पूरी तेजी से अपनी कमर चलते हुए) आआअह्ह्ह्हह... शीला.. मज़ा आ गया... आज... बहुत खुस हु आज मैं... है.... आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह

शीला- (ऐसे बोलती है मानो रेहम की भीख मांग रही हो) आआअह्ह्ह्हह.... उफ्फफ्फ्फ़.. ये कैसी ख़ुशी है.. जिसको मेरी हालत ख़राब करके मन रहे है... आआह्ह्ह्हह.. माआआ... अब रुक जाइए न... आआह्ह्ह्हह.... सच मैं बड़ा दर्द हो रहा है मुझे... आआअह्ह्ह... Maaaaaaaaaa

भानु हस्ते हुए और जोरदार धक्के मरते हुए

"मैं तोह बस अपनी ख़ुशी अपनी पत्नी क साथ मन रहा हु.. क्यू तुम मेरी ख़ुशी मैं खुस नहीं हो"

शीला- (पूरा चेहरे दर्द से लाल पड़ा हुआ था) आआअह्ह्ह्ह... बहुत खुस होती अगर मुझपे जरा रेहम दिखा देते.. आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... और कितनी दिएर करेंगे, बहुत दर्द हो रहा है पीछे... बस करिये न... आआआआहहहहह

शीला को सच मैं दर्द महसूस हो रहा था.. पर साथ hi साथ इस दर्द मैं कुछ तोह अलग था, ककी उसकी योनि निरंतर अपना पानी बहा रही थी और उसके निप्पल्स सुरु से hi तने हुए थे

ऐसा लग रहा था जैसे शीला अपनी हालत को सही से समझ न प् रही हो

"आआआआह्ह्ह्ह... माआआ.... बस करिये... जी.... Maaaaaaaaaaaa... उफ्फफ्फ्फ़..... माआआआआ....."

पर भानु कहा रुकने वाला था.. वो तोह लगातार अपनी खूबसूरत पत्नी की गांड का हवा महल बनाने पे तुला हुआ था

सटासट.. गपागप.. सटासट.. गपागप.. करके भानु का काला विकराल भुजंग नाग जैसा लुंड उसकी पत्नी की गांड का चीरहरण कर रहा था


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शीला का हाल ऐसा था की उसके मुंह से थूक और लार एक साथ बह रही थी.. आँखों जैसे खुल hi न प् रही हो, हाथ पैरों की जान किसी से चीन ली हो

पर भानु अपने अंतिम पड़ाव से पहले रुकने वाला नहीं था.. वही शीला की योनि न जाने कितनी बार झाड़ चुकी थी, यु समझो उसका रास निकलना बंद hi न हुआ हो

हवस का ये नंगा नाच अगले 30 मं तक निरंतर ऐसी प्रकार चलता रहता है.. इस बीच शीला ने हर तरह से अपने पति से रुकने क लिए भीख मांग की थी पर भानु रुका नहीं

देसी घी ने भी अपना पूरा कमल दिखाया और इतनी भुजंग लुंड क आने जाने का रास्ता सरल बना दिया

30 मं बाद.. भानु अपना पूरा दम अपनी पत्नी की गांड पे लगते हुए उसके ऊपर ढेर हो जाता है

उसका लुंड से निकलने वाला गाड़ा प्राधारत शीला की गांड की गहराई मैं भरने लगता है

शीला को जितना दर्द मिला था अभी तक.. अब उसे उठा hi सुकून प्राप्त हो रहा था

भानु- आआआहहहहह... मज़ा.. आआ गया... उफ्फ्फ्फ़

वही शीला कुछ बोल hi नहीं पाती ककी इस समय तक उसकी हालत ऐसी हो चुकी थी.. की उसके मुंह से सब्द निकलने भी मुश्किल हो रहे थे

भानु जब उसके ऊपर से उठता है और उसका लुंड उसकी गांड क छेद से आज़ाद होता है.. तोह लुंड निकलने क साथ साथ शीला की गांड से बहुत सारा गाड़ा सफ़ेद रास से बहार निकलने लगता है, जो भानु ने उसके अंदर भरा था


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शीला का हाल ऐसा हो चूका था की भानु क उठाने क बाद भी उससे हिला तक नहीं जा रहा था.. वो बस ऐसे हाफ रही थी मानो अपनी ज़िन्दगी क आखिरी दिन गईं रही हो

भानु- (अपनी धोती उठाते हुए) उफ्फफ्फ्फ़... अरे देखो रोटी तोह पूरी जल गयी है

भानु ये कहते हुए है पड़ता है, शीला मुश्किल से तवे की तरफ देखती है जहा से जाली हुई रोटी से दुआ निकल रहा था

वो अपनी पूरी हिम्मत जूता क कड़ी होने की कोशिश करती है.. पर उसमें सच मैं जरा भी ताक़त नहीं बची थी, ककी वो जैसे hi कड़ी होती है वो धड़ाम से नीच गिर पड़ती है

शीला की कोहनी मैं हलकी चोट भी आ गयी थी.. पर फिर भी उससे उठा नहीं जा रहा था, इसलिए भानु जल्दी से आके उसे उठता है

पर अपनी पत्नी की ऐसी हालत देख क वो हरामी मंद hi मंद है भी रहा था

वो शीला को उठा क अंदर कमरे मैं लाता है और बिस्तर पे लिटा देता है.. शीला को अपनी गांड मैं ऐसा तेज दर्द महसूस हो रहा था की वो पेट क बल लेती थी

भानु, शीला को देखते हुए हसे जा रहा था.. तभी उसकी नज़र शीला की लाल पद चुकी गांड और गांड का छेद, जो अब सूज गया था उसे देखता है.. और अपने लुंड को मसल क खुद पे गर्व करता है

भानु देखता है की शीला की गांड से अब भी उसके लुंड का गाड़ा रास बह रहा है

उस रात दोनों hi कुछ नहीं कहते.. ककी शीला से तोह उठा hi नहीं जा रहा था और भानु पहले hi बहुत खुस था

रात क करीब 12 बजे

भानु को घर क दरवाजे पे दस्तक महसूस होती है.. कोई लगातार दरवाजा पीते जा रहा था

भानु- (अपनी पत्नी की गांड मरने क बाद उसे बहुत अछि नींद आयी थी) कोण मादरचोद.. इस समय मर गया है

भानु अपनी धोती सँभालते हुए बिस्तर से उठता है.. वो अपनी नंगी पड़ी पत्नी को देखता है जिसे कुछ होश hi नहीं था, जैसी गांड आज उसकी छोड़ी गयी है उसके बाद उसे किया किसी को भी होश नहीं रहने वाला था

भानु अपनी धोती सही करते हुए दरवाजा खोलता है तोह सामने सत्तू खड़ा था.. पसीने मैं भीगा हुआ जैसे न जाने कहा से दौड़ क आया हो

भानु- किया हुआ सत्तू.. सब ठीक है न ?

वैसे पता तोह था hi भानु को सब कुछ

सत्तू- वो.. मोनू... मोनू..

सत्तू अपनी उखड रही साँसों को सँभालते हुए.. इतना hi बोल पता है

मोनू का नाम सुनकर भानु अंदर से खुस हो उठा था, वो मन hi मन सोचता है

'लगता है.. सालों को उस सपोले की लाश मिल गयी है'

भानु- (ऐसे नाटक करता है, जैसे कुछ पता hi न हो) अरे किया हुआ मोनू बेटे को सब ठीक है न.. कुछ हुआ है किया

सत्तू- (अपनी साँसों को काबू कर चूका था) मोनू.. कुंदन चाचा को 'सर्प' नदी मैं मिला

भानु क पैरों क नीचे से जैसे जमीन खींच ली हो किसी ने, पहली बार सायद उसे दर का एहसास हुआ था

"मतलब.. मतलब.. वो ज़िंदा... मतलब सब ठीक है न"

सत्तू- है.. है.. पर अभी बेहोश है, पिताजी ने सभी को ऐसी वक़्त घर पे बुलाया है.. बुआ कहा है ?

भानु जिसके लिए पूरी दुनिया hi घूम रही थी, उसे कुछ समझ नहीं आता की किया कहे

भानु- वो.. वो.. अंदर सो रही है..

भानु को ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसको सांस नहीं आ रही हो और दरवाजे से बहार निकल क लम्बी लम्बी साँसें लेने लगता है

सत्तू को लगता है मोनू की खबर ने भानु को सदमे मैं दाल दिया हो

"आप ज्यादा सोचो मत.. त्यागी चाचा भी घर पे है, वो कह रहे है मोनू ठीक हो जायेगा"

भानु पे तोह जैसे किसी ने पूरा पहाड़ पटक दिया हो

इधर सत्तू अपनी बात कहते हुए अंदर चला जाता है.. शीला को बताने क लिए

वही भानु को समझ hi नहीं आ रहा था की ये किया हो गया है

"मादरचोद जब्बार.. एक काम भी तुझसे ठीक से नहीं हो पाया, मुझे भी दूसरे पे भरोषा नहीं करना चाहिए था, उसकी जगह खुद उस सपोले को ख़तम करना चाहिए था"

रात क करीब 12 बज रहे थे और अछि खासी ठंडक जैसी थी.. पर फिर भी भानु को पसीना आ चूका था

इधर सत्तू, शीला को ढूंढ़ते हुए सीधा कमरे क अंदर पहुंच जाता है.. पर जैसे hi वो अंदर पहुँचता है उसके पेअर मानो वही क वही जैम से जाते है

ककी सामने बिस्तर पे उसकी बुआ 'शीला' पूरी निवस्त्र होक लेती हुई थी


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शीला कुछ इस प्रकार से लेती हुई थी.. इस समय

सत्तू का तोह जैसे पसीना hi निकल गया था.. वो जल्दी से बहार भाग आता है, और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगता है

वो ऐसे hi दरवाजे क पास खड़ा था.. वापस अंदर जाने या अपनी बुआ को आवाज़ देना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा था

तभी भानु अंदर आता है, और सत्तू को दरवाजे पे खड़ा देख क उसे लगता है की वो अभी तक अंदर नहीं गया है

"अरे वो सत्तू.. शीला की जरा तबियत ख़राब है, एक काम करते है हम दोनों hi चलते है अभी क लिए"

सत्तू बेचारा किया कहता.. उसकी आँखों क आगे तोह कुछ अलग hi चल रहा था, इसलिए वो बस है मैं सर हिला देता है

3 महीने बाद

महेंद्र क घर पे सविता आंगन मैं मसाला पीस रही है, महेंद्र वही आँगन मैं एक तरफ बैठा हुआ बीड़ी फूक रहा है

कुंदन घर क बहार कुवे क पास एक पुराणी सी कुर्शी पे बैठा हुआ किसी सोच मैं डूबा है.. और उसी क पास उसके खेत को बताई पे लेने वाला 'मेहमूद' भी बैठा था

घर क अंदर रसोई मैं हर्षिता और शीला एक साथ लगी हुई है

जहा आँगन मैं hi बैठा सत्तू बार बार चोर नज़रों से अपनी शीला बुआ को काम करते हुए देख रहा था

बहार छप्पर क नीचे सत्यम और हर्षिता का बीटा सोनू बैठे हुए आपस मैं बातें कर रहे है

वीरू और भानु कही दिख नहीं रहे है.. बाकि पूरा परिवार आज एक छत्त क नीचे है

तभी महेंद्र अपनी जगह से उठता है और बीड़ी को एक तरफ फेकते हुए अंदर कमरे मैं जाता है.. जहा उसके घर की मंझली बहु 'मालती' एक चारपाई क पास बैठी हुई थी.. उसके चेहरे पे ुदशी और आँखों में आंसू थे

महेंद्र.. मालती क कंधे पे अपना हाथ रखते हुए

"परेशां मत हो बहु.. हमरा मोनू जल्दी hi अपनी आँखें खोलेगा"

ये कहते हुए महेंद्र की भी आँखें भर आयी थी और दोनों एक साथ सामने बिस्तर पे पिछले 3 महीनो से बेहोश पड़े 'मोनू' को देखते रहते है

मालती- (लगभग रट हुए) 3 महीने हो गए जेठ जी.. कब होश मैं आएगा मेरा बचा


महेंद्र क पास भी इसका कोई जवाब नहीं था

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नष्ट अपडेट ✍️

अपडेट #02 - पेज No. 📄 18
 
maurya भाई आपकी सभी पिक्स बहुत खूबसूरत है और बेस्ट पिक है



पर प्लीज यहाँ स्टोरी क बीच न पोस्ट करिये.. यहाँ सिर्फ स्टोरी से रिलेटेड hi पिक्स रखिये

मेरा एक अलग थ्रेड है, पिक्स क लिए

प्लीज वह ये सभी अवेसमे पिक्स शेयर करे 👇




 
अपडेट #02

मादरचोद...


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"आआआअह्ह्ह.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह किया कर रहे है जी.... आआआअह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... माआआ.... हैईईई... रईईईईई.... बस करिये न... माँ जी.. आती hi होंगी.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...... अरे बस करिये बाबा... हीी... कितने बदमाश है आप... जरा भी रेहम नहीं करते है... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... माआआआआ"

खूबसूरत भरे जिस्म की अनोखी जो इस समय एक खूबसूरत साड़ी मैं सजी हुई घर की छत्त पे कपडे सूखने आयी थी.. पर उसके पति ने कपडे सूखने तोह नहीं दिया, उल्टा कुछ और hi गीला करना सुरु कर दिया था

बेहद खूबसूरत और चर्चरी जिस्म की मलिका.. अनोखी इस समय अपने घर की छत्त पे एक हाथ मैं अपने पति 'अनुभव' की गीली शर्ट पड़के हुए थी, जिसे सायद वो वही तार पे डालने आयी थी

पर अनुभव ने अचानक से आके उसे पीछे से अपनी बाहों मैं जकड लिया था.. और इस समय उसके दोनों हाथ अनोखी की कासी हुई सुडोल चूचियों का मर्दन कर रही थी


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अनोखी- (काम अग्नि से तपते हुए जिस्म को काबू मैं करने की नाकाम कोशिश करते हुए) ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... माआआआआ..... किया कर रही है... हीी... बस करिये न... अभी हम कहा है ये भी देख लीजिये न.. आआआअह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़

अनुभव अपनी खूबसूरत पत्नी अनोखी क दोनों रास से भरे हुए संतरों का जोरदार मर्दन करते हुए उसके खूबसूरत जामुन जैसे निप्पल्स को पकड़ क अपनी उँगलियों क बीच मसल देता है.. जिससे अनोखी क जिस्म मैं ऐसा करंट लगता है, मानो किसी ने उसके जिस्म से नंगा तार छुआ दिया हो

"आआआआह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... बंद करिये न जी अपनी बदमाशी... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.. यहाँ किसी से ऐसे देख लिया तोह मोहल्ले वाले पता नहीं कैसी कैसी बातें करेंगे"

अनुभव- (अपनी खूबसूरत पत्नी क नंगे और तने हुए निप्पल्स को अपनी उँगलियों क बीच से मसलते हुए) किया कहेंगे.. मैं कोनसा पडोसी हु, अरे मैं तोह अपनी पत्नी से प्रेम कर रहा हु.. भला ये भी कोई पाप है ?

अनोखी क चेहरे पे मुस्कान खेल जाती है, पर साथ hi साथ उसके चेहरे पे काम वासना की लकीरों से एक अलग hi आभा निकल रही थी

"ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... बड़े बदमाश है.. आप एक साथ 2 तरफ़ा हुम्ला कर रहे है"

अनुभव अपनी खूबसूरत पत्नी क ब्लाउज से नज़र आते बड़े बड़े गोल संतरों की घाटी को देखते हुए उसके गोर गले पे यहाँ वह चूमना सुरु कर चूका था

"Ummmmmmmm...ummmmmmmmm... मैं कोनसा हुम्ला कर रहा हु.. मैं समझा नहीं मेरी जान... उम्मम्मम"

अनुभव 'अनोखी' को चैरते हुए उसके गले पे हल्का सा काट लेता है.. जिससे उसके गोर गले पे अनुभव क प्रेम की चाप बन जाती है

अनोखी- (बुरी तरह मचल रही थी.. और उसकी आँखें बार बार बंद होती जा रही थी) आआअह्ह्ह्हह... एक तोह मेरे संतरों का रास निचोड़ने मैं लगे हुए है, ऊपर से मेरी कमर पे पीछे से अपना किला भी चुभो रहे है मुझे

अनोखी ने शरारत करते हुए अपने पति क लुंड पे अपनी कमर को और पीछे करके उससे चिपकते हुए कहा

अनुभव क जिस्म मैं भी ये सुनकर एक अलग सी लहर दौड़ गयी थी.. वो अपनी कमर को जोर से अपनी पत्नी की उभरी हुई गांड पे रगड़ते हुए कहता है

"अब भला इसमें मेरी किया गलती.. ऐसा खूबसूरत जिस्म अगर किसी की पत्नी का होगा, तोह वो बेचारा ऐसी हरकतें तोह करेगा hi"

अनोखी अपने पत्नी की कामुक हरकतों और बातों की वजह से गीलापन महसूस करने लगी थी.. वो अपना एक हाथ पीछे ले जेक अपने पति 'अनुभव' क बालों मैं चलना सुरु कर देती है

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"बहु.. ऊपर हो"

तभी उन दोनों क कानो मैं सीढ़ियों से ऊपर आती हुई किसी औरत की आवाज़ सुनाई पड़ती है.. जिससे सबसे पहले अनुभव दर क अपनी पत्नी से दूर होता है

अनोखी एक पल को है पड़ती है, पर अगले hi पल वो भी अपनी साड़ी और अपने पल्लू को सही करने मैं लग चुकी थी

बस कुछ hi अंतराल क बाद एक 46-47 साल की औरत सीढ़ियों से चढ़ते हुए छत्त पे पहुंच चुकी थी.. जहा उसकी नज़र अपनी बहु क अलावा अपने बेटे पे भी पड़ती है

"अरे तुम आ गया.. ट्रैन की टिकट ले आया न"

अनुभव अपनी जेब से 2 टिकट निकल क अपनी माँ को दिखते हुए

"जी माँ.. पर मेरा मन अब भी नहीं मान रहा, आपको यहाँ अकेले कैसे चोर सकते है"

अनोखी- ये सही कह रहे है माँ जी.. आप भी साथ चलो हमारे, वर्ण सिर्फ इन्हे जाने दीजिये हम दोनों यही रहते है

वो औरत अपने बेटे और बहु क पास आते हुए.. पियर से उनके सर पे हाथ रखती हुई कहती है

"शादी क बाद से तुम दोनों कही नहीं गए हो.. ऐसी बहाने साथ जाओगे, थोड़ा समय एक साथ व्यतीत करोगे.. अरे भाई तभी तोह इस घर मैं किलकारियों की आवाज़ गूंजेगी"

अपनी सास की बात सुनकर अनोखी शर्म से लाल पद जाती है और अपना चेहरा नीचे झुका लेती है.. वही अनुभव का भी हाल कुछ अलग नहीं था, वो भी बेचारा इधर उधर देखने लगता है

जिसपे वो अनोखी की सास हस्ते हुए कहती है

"वैसे भी कुछ महीनो की तोह बात है.. ऐसी बहाने तुम दोनों को गाओं की सुध हवा और वह की हरियाली भी देखने को मिलेगी"

अनुभव- पर आप यहाँ अकेली हो जाओगी.. नहीं नहीं.. या तोह आप भी साथ चलो वर्ण मैं ये पोस्टिंग क लिए मन कर देता हु

औरत झूठा ग़ुस्सा दिखते हुए

"पागल है किया.. इस नौकरी क लिए कितनी म्हणत की है तूने, और अब आगे बढ़ने का मौका है तोह पीछे हटने की बात कर रहा है

और मैं कोनसा अकेली हु.. अस्स पड़ोस क सभी लोग अपने hi तोह है

तुम दोनों चुपचाप अपनी तैयारी करो.. और जब वापस लौटना तोह मुझे खुसखबरी सुन्नी है"

औरत हस्ते हुए अपनी बात पूरी करती है.. जिससे दोनों पति पत्नी फिर से शर्मा जाते है

वो औरत अपने बाचों को शरमाते हुए देखती रहती है.. पर धीरे धीरे इन आँखों मैं आँशु भरने लगते है

आंशुओं का सैलाब जब थमता है तोह ये आँखें बदल चुकी थी, ककी ये याद अनोखी की सास की नहीं अपितु उसके पति अनुभव की थी

अनुभव क लिए अब सब कुछ बदल चूका था, ककी उसकी अनोखी हमेशा हमेशा क लिए उससे दूर जा चुकी थी

अगर कुछ बचा था तोह सिर्फ दर्द..

और आज उसे ये दर्द सहते हुए पूरा 1 महीना हो चूका था

अनुभव कमरे में एक तरफ गुमसुम सी बैठी अपनी माँ को देखता और फिर सामने दिवार पे 'अनोखी' की लटकती हुई तस्वीर को.. जिसपे माला छड़ी हुई थी

जहा वही औरत यानि अनुभव की माँ और अनोखी की सास, अपने पल्लू से अपने बहते आंशुओं को साफ़ करती और मुख से बस यही निकलता है

"काश उस दिन मैंने अपनी बहु को जाने न दिया होता"

~ ✨ ~

अनोखी और मोनू क साथ जो हुआ.. उसके 2 महीने बाद

सुबह सुबह खेतों की हरियाली अलग hi खूबसूरत और मनमोहक प्रस्तुति देती है, जहा तक देखो बस हरे भरे खेत लहलहाते हुए नज़र आते है


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पर ऐसे खूबसूरत वातावरण में गाओं की औरते भी सुबह सुबह पानी लिए खेतों क बीच बैठी हुई मिल जाएंगी.. जो वह आती तोह दैनिक नित्यक्रम करने है

पर अगर कही एक से ज्यादा औरते एक साथ बैठ गयी तोह समझ हो सुरु हो गयी उनकी अपनी गाओं वाली किती पार्टी

फिर अस्स पड़ोस की सभी औरतों और जवान लड़कियों की बुराई करते हुए hi इनका पेट हल्का होता है

"आआआहहह.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... आज तोह बड़ा दम लगाना पद रहा है... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

पुस्सस्स्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह....... पुट्ट्ट्ट............ फूऊऊऊष्ठ्हहहह..... फुर्रररर........

"आआआहहह.. अब कुछ निकला"

हरे भरे खेतों की बीच बैठी एक औरत अपना दैनिक नित्यक्रम करते हुए पूरा दम लगा रही थी, और जल्दी hi उसके चेहरे पे संतुष्टि क भाव दिखने भी लगते है

"चीई... भाभी बाप रे किया खाया था रात को, बाप रे सांस तक नहीं ली जा रही.. नाक क बाल तक जल गए मेरे"

उसी क पास बैठी दूसरी खूबसूरत और भरे जिस्म वाली औरत जो इस समय अपनी साड़ी उठाये हुए बैठी थी वो जल्दी से अपनी नाक को कसके दबा लेती है, मानो उसे दर हो की कही हवा का हल्का सा झोका भी अंदर चला गया तोह उसका दम घुट जायेगा

पहली औरत जिसका जिस्म उससे भी ज्यादा भरा और गदराया था वो थोड़ा खिसियाते हुए

"और किया खाउंगी.. वही जो सबने खाया था, और तेरी गांड से कोनसी खुसबू आ रही है.. कोई सुंग ले तोह यही दम तोड़ दे"

दूसरी वाली औरत एसपी ग़ुस्सा नहीं होती उल्टा हसने लगती है

"किया बड़की भौजाई.. आप न सुधरेगी, अरे अब तोह सत्तू की शादी क समय आने वाला है.. कुछ शर्म किया करो"

जी है अपनी गांड से ये मधुर आवाज़ उत्पन करने वाली और कोई नहीं बल्कि सत्यम और सत्तू की माँ 'सविता' है

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सविता- (मुस्कुरा क छेड़ते हुए) तू रहने दे जैसे तू बड़ी शरीफ है, पक्का कह सकती हु.. अपने जमाई जी क कहने से पहले hi तू खुद गोदी बन जाती होगी

दूसरी वाली बेचारी शर्म से लाल पद जाती है

"किया बड़की भौजाई"

सविता- (अपने चिरपरिचित अंदाज में, दूसरी औरत की गांड की तरफ देखते हुए) वैसे भी तेरे ये मटके हमारे 'भानु' जमाई जी ने फोड़े न हो ये कैसे संभव है

बेचारी वो औरत जो भानु की पत्नी और सविता की ननद यानि 'शीला' थी.. इतनी बुरी तरह झेप जाती है की उससे कोई जवाब hi नहीं दिया जाता

पर एक पल क लिए आज से 2 महीने पहले उसके पति भानु ने रसोईघर में उसका जो हाल किया था वो सब जरूर याद आ जाता है


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यहाँ सविता हस्ते हुए अपनी गांड को थोड़ा उठती है तोह पीला सोना उसकी गांड से पटट्ट्ट्ट.. पट्ट्ट्ट किसी बुलेट जैसी आवाज़ करते हुए निकल पड़ता है

शीला- (फिर से अपनी नाक पे पल्लू रखते हुए) बाप रे मुझसे न बैठा जायेगा आपके पास.. आप तोह सांस न लेने दो किसी को

और शीला सच मैं अपना लोटा उठती है और खेत क और थोड़ा अंदर जेक बैठ जाती है

सविता- (जोर जोर से हस्ते हुए) ाचा बाबा अब नहीं करुँगी.. यहाँ आ न, ाचा सुना न बाबा ओह शीला.. सुन न

पर शीला जो अब खेत क दूसरे चोर पे जेक बैठ चुकी थी

"मैं न आने वाली, वैसे भी मेरा हो गया है.. "

शीला वह बैठ क पानी को अपनी कोमल गांड पे थापक से मरते हुए उसे धुलना सुरु कर देती है

पर शीला नहीं जानती थी की 2 आंजन आँखें इस समय उसकी गांड का खूबसूरत नज़ारा देखने मैं पूरी तरह व्यस्त थी

इधर सविता चिल्ला क कहती है

"अरे इतनी जल्दी.. मुझे तोह अभी समय लगेगा"

शीला जो अब तक अपने दैनिक कार्य से पूरी तरह निपट चुकी थी

"है तोह आप आराम से आना.. में छोटे बाजार से होक घर आती हु"

सविता- (तेज़ आवाज़ में) वह किया करने जाएगी?

शीला- (खड़े होक अपनी साड़ी को सही करते हुए) सोच रही हु आज इधर से जाते हुए सबके लिए गरम गरम जबेली लेके जाऊ

फिर थोड़ा मायुशि क साथ आगे कहती है

"अपने 'मोनू' को भी जबेली कितनी पसंद थी न बड़की भौजाई"

सविता- (जैसे अचानक से ग़ुस्सा हो गयी हो) पसंद थी.. इसका किया मतलब हुआ, अरे पसंद है और देखना जल्दी hi वो फिर से उठ खड़ा होगा और फिर से जलेबी की मांग करेगा

शीला- (आँखों में जैसे आँशु भर आये हो, पर सविता की बात से उसे हसी आ जाती है) सही कहा भाभी.. कितनी बदमाशी किया करता था.. बुआ ये बुआ वो.. पीछा hi नहीं चोरता था

सविता अपनी जगह बैठे बैठे माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश करते हुए

"अब तेरा पिछवाड़ा hi ऐसा.. उसमें अपने मोनू की किया गलती"

शीला अचानक से जैसे सटपटा सी जाती है.. उसे सब्द hi नहीं मिलते की वो कोई जवाब दे पाए, जिसपे सविता khil-khila क है पड़ती है

शीला- हद है बड़की भौजाई.. आप भी न, जो मुंह में आता है बोल देती हो.. आप अपना काम करो मैं चली 'छोटे बाजार'


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शीला इतना कहते हुए खेत से निकल क सच में गाओं क छोटे बाजार की तरफ चल देती है.. उसके वह से जाते hi उन दोनों आँखों का मालिक अपनी जगह से हिलता है और सविता की तरफ चल पड़ता है

जहा सविता अलग hi अपने धमाके किये जा रही थी.. एक आनंदित संतुष्टि की वजह से उसकी आँखें बंद थी तभी उसके होंठों से कोई जलती हुई चीज़ चुटी है

सविता तुरंत अपनी आँखें खोलती है और सामने खड़े इन्शान को देख क मुस्कुरा पड़ती है.. पर वो इतने में hi नहीं रूकती

वो अपने होंठों को चुने वाली गरम चीज़ पे अपनी जीभ लगा देती है.. जिससे उस इन्शान क मुख से आआह्ह्ह फुट पड़ती है

"आआआहहह... माआआआ"

ये और कोई नहीं बल्कि सविता का छोटा बीटा 'सत्यम' था

सविता हस्ते हुए अपने जवान बेटे का लुंड अपने हाथों में दबोच लेती है.. और उसपे अपना हाथ आगे पीछे करके फिरने लगती है

जिससे उसके जवान बेटे का लुंड पूरी तरह खुल क सामने आ जाता है

सविता- (सत्यम क लुंड पे थूकते हुए.. ताकि उसे अचे से गीला कर सके) ाःह थूऊऊऊ.... उफ्फ्फ्फ़ ये तोह पहले से hi खड़ा, पर लगता है आज इसके जोश की वजह मैं नहीं हु

सविता अपने जवान बेटे क लुंड पे थूक क उसे पुरे लुंड पे मलने लगती है..

बड़ा hi अनोखा नज़ारा था जहा एक सगी माँ अपने जवान बेटे क लुंड को अपने थूक से गीला कर रही थी.. और अपने कोमल हाथों से पुरे लुंड की गीली मालिश सी कर रही थी


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सत्यम- (अपनी माँ की हरकतों से आनंदित होते हुए) किया करू माँ, बुआ की गांड है hi इतनी लाजवाब.. साला पूरा जिस्म हिला दिया

सविता हस्ते हुए अपने जवान बेटे क लुंड क मोठे टोपे को अपने होंठों क बीच लेती है और किसी रसीले आम की तरह उसे चूस डालती है

"Ummmmmmmmmmm....... Srrrrrrppppppppppp..... सललललररररररपपपप...... Aaaaaaaaaaaahhhh"

सविता- आआह्ह्ह.. कमीने कभी तोह अचे से नाहा लिया कर, कितनी बदबू आती है तेरे लुंड से.. और तू जब चुप चुप क हमारे पीछे आ रहा था तभी समझ गयी थी की तेरा इरादा किया है

सत्यम बस हस्ता है कुछ बोलता नहीं, पर वो अपनी गदराई माँ क सर पे अपना हाथ रखता है और उसे कसके अपने लुंड पे दबा लेता है

जिससे उसका तना हुआ कठोर लुंड गपक से सविता क मुंह की गहराई में समां जाता है.. और फिर सुरु हो जाता है माँ बेटे क प्रेम का असली खेल

"आअह्हह्ह्ह्ह.... Mmmmmmmmmm..... गलल्लूऊऊऊप्प्प्पप... गररररऊऊप्प्प्पप... srrrrrrppppppppppp... सललललररररररपपपप... सल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्"


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सविता सायद सही से सांस नहीं ले प् रही थी इसलिए थोड़ा चटपटा सी जाती है, वो ग़ुस्से से अपने बेटे क दोनों नंगे चूतड़ों पे अपनी उँगलियों को धसा देती है.. जिससे उसके नाख़ून भी सत्यम को चुबने लगते है

पर सत्यम रुकता नहीं, वो दोनों हाथों से अपनी माँ का सर जकड लेता है और पुरे वेग से अपना लुंड उनके मुंह क अंतिम चोर तक उतर देता है

सत्यम का लोअर इस समय उसके पैरों में फसा हुआ था और उसने t-shirt पेहेन राखी थी जो उसने ऊपर उठाई हुई थी

सत्यम अपनी कमर जो थोड़ा पीछे करता है जिससे सविता क चेहरे पे थोड़ा सुकून आने लगता है

पर जैसे hi सत्यम का आलू बुखारे जैसा टोपा उसकी माँ क होंठों तक आता है वो वापस से दक्का मर क पूरा लुंड अपनी माँ क गले तक उतर देता है

"गररररऊऊप्प्प्पप....... गलल्लूऊऊऊप्प्प्पप..... गररररऊऊप्प्प्पप..."

सविता एक बार फिर से चटपटा जाती है.. पर उसका छोटा बीटा अपनी माँ की ऐसी हालत करने पे हसने लगता है, मानो उस खुद पे गर्व हो रहा हो

पर सविता भी कोई आज पैदा नहीं हुई थी.. बल्कि इस समय जो लुंड उसके मुंह में घुसा हुआ था, सिर्फ वो लुंड hi नहीं बल्कि उसका मालिक भी उसी की छूट से निकला था

सविता अपना पूरा दम लगा क सत्यम का लुंड अपने मुंह से बहार निकल देती है और जोर जोर से सांस लेने लगती है

"मादरचोद भड़वे.. कितनी बार कहा है, आराम से किया कर पूरा जानवर hi बन जाता... अह्ह्ह्हह... गररररऊऊप्प्प्पप.... गललललपपपपप"

पर सत्यम अपनी माँ को उनकी बात पूरी नहीं करने देता.. ककी वो उनके बालों को जकड क वापस से अपना लुंड उनके मुंह मैं उतर देता है


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पर इस बार वो बड़ी जल्दी में लग रहा था.. ककी वो जोर जोर से अपना लुंड अपनी खूबसूरत गदराई हुई माँ क मुंह क अंदर बहार करने लगा था

उस हरे भरे खेत में बड़ा hi मनोरम करने वाला दृश्य बन चूका था.. जिसे अगर कोई देख ले तोह बेचारा का लुंड बिना हाथ लगाए यही उलटी कर दे

इस समय दोनों माँ बेटे को अगर कोई देखता तोह उसे सिर्फ एक भरे जिस्म वाली औरत क आगे एक लड़का खड़ा हुआ नज़र आता, जिसने अपना हाथ उस औरत क सर पे रखा हुआ था और उसका सर कॉकस के अपनी कमर पे दबा रहा था

वही उसे औरत क दोनों हाथ उसके सामने खड़े लड़के की कमर पे रखा हुआ नज़र आते, कुलमिलाकर उसे दोनों में से किसी का भी चेहरा नहीं दीखता


सत्यम अपनी माँ को अपने लुंड का पूरा दम दिखा रहा था.. वो बिना कोई आवाज़ किये 'सविता' क सर पे अपना हाथ रखे हुए उसे जोर जोर से अपनी कमर पे दबा रहा था और उसकी माँ भी पीछे नहीं थी.. वो भी जोर जोर से अपने बेटे का लोढ़ा चूस रही थी

"गलल्लूऊऊऊप्प्प्पप... गररररऊऊप्प्प्पप.. srrrrrrppppppppppp... ह्ह्हह्हहपपपपपपप... गममममममरररर..... Srrrrrrppppppppppp"

सविता क मुंह क किनारो से उसका थूक बहने लगा था जो सत्यम क काले लुंड को पूरी तरह चीखना किये हुआ था.. बहुत hi मनोरम दृश्य था


सत्यम पूरा दम लगा क हरे भरे खेत में अपनी माँ का मुंह छोड़ रहा था

सविता- आअह्ह्ह्ह.... सल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्.... उम्मम्मम्मम्म.... गररररऊऊप्प्प्पप.... उम्मम्मम.....

दोनों माँ बेटे पूरी म्हणत कर रहे थे.. कोई भी हरने को तैयार नहीं हो रहा था

जहा सत्यम पूरी ताक़त से अपनी माँ का सर अपने लुंड पे दबा रहा था, वही सविता भी अपने जवान बेटे का लुंड अपने गले क अंतिम चोर तक घुसा क उसे पूर्ण मज़ा दे रही थी

सच मैं गाओं कुछ ज्यादा hi एडवांस हो चूका है 😉

"घहहपपपपपप.... घूउपपपपपप...... घूणप्पोप्पोप..... घूउपपपपपप.. srrrrrrppppppppppp..... गररररऊऊप्प्प्पप..."

सविता क लुंड चूसने की मधुर आवाज़ पुरे खेत में सुनाई पद रही थी, पर सुनने वाला कोई नहीं था


ये खेल अगले 10-15 मं तक पूरी सिद्दत से यही चलता रहा

सत्यम का जिस्म अकड़ना सुरु हो चूका था, उसके जिस्म की नसे तन गयी थी उसकी आँखों में अलग सा नशा दिखने लगा था और वो पुरे जोश से अपनी माँ का सर अपने लुंड पे दबा देता है

बेचारी सविता जैसी गदराई गाय भी अचानक से चटपटा गयी थी

सविता, सत्यम की कमर पे अपने दोनों हाथों से मरने लगी सायद वो छूटने की कोशिश कर रही थी पर जल्दी hi उसकी छटपटाहट काम होनी लगी ककी उसके मुंह में गाडी सफ़ेद मलाई भरने लगी थी


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जो उसके होंठों क किनारो से हलकी हलकी बहार hi आ रही थी.. सत्यम अपनी भरे जिस्म वाली माँ क मुंह पे अपनी मलाई की आखिरी बून्द तक भर देता है

जिसे सविता सीधा अपने पेट में उतर लेती है

करीब 2 मं तक सत्यम अपने लुंड को अपनी भरे जिस्म वाली माँ क मुंह मैं घुसाए रहता है और जब अलग होता है उसके मुरझा चुके लुंड क साथ साथ बहुत सी सफ़ेद मलाई भी उसकी माँ क मुंह से बहार बह निकलती है

जिसे सविता वापस अपने हाथों से अपने मुंह में भर लेती है.. माना पड़ेगा बड़ी वाली चिनार है सविता 😉

सविता खासते हुए कड़ी होती है और अपने जवान बेटे और उसकी मर्दानगी को देखते हुए बहुत खुश होती है

"पूरा जानवर है.. कही मेरी जगह तेरी बुआ शीला होती तोह पता नहीं बेचारी का किया हाल करता"

सविता ने कहते हुए धीरे से अपनी एक आँख दबा दी..

सत्यम मुस्कुराते हुए अपने लोअर को चढ़ाता है और खेत क बहार आके खड़ा हो जाता है, जहा आने क बाद वो सबसे पहले चारो तरफ देख क पक्का करता है की कोई आस पास है तोह नहीं

फिर अपनी माँ को बहार आने क लिए बोल देता है

जहा खेत क अंदर सविता लाये हुए पानी से अपना मुंह धुलती है और अपने चेहरे से पाप क सभी सबूत मिटा देती है, पर अब पानी बचा नहीं था इसलिए वो बिना अपनी गांड की धुलाई किये ऐसे hi साड़ी नीचे करके बहार आ जाती है

सत्यम अपनी टीशर्ट और लोअर को सही करते हुए चारो तरफ देख भी रहा था.. की कोई अस्स पास तोह नहीं, या कोई उसे और उसकी गदराई माँ को एक साथ खेत से निकलते न देख ले

वैसे भी इन पिछले 2 महीनो मैं इस गाओं मैं काफी कुछ बदल चूका है.. आज कल हर किसी को सक hi नज़रों से देखा जा रहा है

सविता भी जल्दी hi अपनी साड़ी सही करते हुए बहार आ गयी थी.. अपनी माँ को देख क

सत्यम- (अपनी माँ को खूबसूरत होंठों को देखते हुए जिसपे अभी भी उसके लुंड की गाडी मलाई लगी हुई थी) ऐसे साफ़ कर लो माँ वर्ण घर पे बापू पूछेंगे तोह किया जवाब डौगी

सविता- (जल्दी से अपने होंठों पे हाथ लगाती है तोह वो गाडी चिपचिपी मलाई लगी हुई पाती है.. जिससे वो है पड़ती है) कह दूंगी.. तुम्हारा लड़का जवान हो गया है

इस बात पे सविता और सत्यम दोनों hi हसने लगते है, सविता अपने पल्लू से अपने जवान बेटे की मलाई पूछती है.. और दोनों माँ बेटे खेतों क बीच से होते हुए पतली पगडण्डी पे चलते हुए आएगी बढ़ने लगते है

सविता कुछ कदम आगे थी.. जहा हमारा सत्यम पीछे पीछे अपनी खूबसूरत माँ की भरी हुई गांड जो किसी पेंडुलम की तरह हिल रही थी.. उसे देखते हुए मस्त मनोरम हरियाली से भरे वातावरण मैं चला जा रहा था


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सविता- (आगे चलती हुई, पर उसे पता था की उसका बीटा किया देख रहा है) नालायक थोड़ा तेज चल

सत्यम- (जैसे चोरी पकड़ी गयी हो) है.. माँ.. वो

सविता- (मंद मंद मुस्कुराते हुए) नाटक बंद कर, मुझे पता है तेरी नज़रें कहा है

सत्यम अपनी खूबसूरत चोरी पड़के जाने पे है पड़ता है

थोड़ा और आगे जाने क बाद, सत्यम अपनी माँ कबगल मैं आते हुए

"माँ.. वैसे मैं कह रहा था की.."

सविता अपने बेटे की अधूरी बात पे उसे सवाल भरी नज़रों से देखते हुए

सत्यम- (अपनी बात को आगे कहता है) मैं सोच रहा था.. अगर मोनू नदी से मिलता hi नहीं, तोह सायद ज्यादा आसानी से हम लोग ये सब बैच क इस गाओं से निकल.... आआह्ह

सत्यम अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाटा उससे पहले hi सविता का जोरदार झापड़ उसके गालों को लाल कर देता है

भोली भली गाओं की दिहताँ औरत सविता में कितनी ताक़त है इस बात का अंदाजा ऐसी से लगा लो की उसके थपड से hi सत्यम क होंठों क किनारे पहात गए और उसमें से हल्का खून निकल आया था

सविता- (ग़ुस्से से लाल) आज क बाद अगर ऐसा कुछ सोचा भी तोह मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.. मन की हमे इस गाओं से बहार निकलना है, पर इसका ये मतलब नहीं की एक माँ से उसका बचा चीन लू, एक औरत तब तक hi सरीफ है जब तक बात उसकी हो.. बात जब उसके बचे की होती है तोह तू समझ भी नहीं सकता की वो किस हद तक जा सकती है

सविता.. सत्यम को खा जाने वाली नज़रों से घूरती है तोह सत्यम तुरंत अपनी नज़रें नीचे कर लेता है

"जो बात आज मुंह से निकली है.. दुबारा इसके बारे मैं सोचना भी नहीं"

सत्यम को अपनी माँ का ये बदला हुआ अंदाज कुछ समझ नहीं आता, ककी उन्ही की वजह से तोह उसने मालती को फ़साना सुरु किया था.. अचानक ऐसा क्यू ?

'सायद मैं कुछ ज्यादा hi बोल गया आज..'

सत्यम मन hi मन ऐसी निष्कर्ष पे पहुँचता है

सविता फिर से आगे बाद चलती है, और सत्यम अपना गाल सहलाते हुए धीरे धीरे पीछे चल रहा था

सत्यम अपनी माँ क पीछे पीछे चलते हुए सोचता है

'चलो माँ ने तोह गाल लाल कर दिए.. कोई नहीं अपने नए दोस्त रॉकी से मिल क गाला गीला कर लूंगा'

~ 🍃 ~

अनोखी और मोनू क साथ जो हुआ.. उसके 15 दिनों बाद

कुंदन अपनी चक्की पे बैठा हुआ किसी गहरी सोच मैं डूबा हुआ था

'पहले 'गुफरान' और फिर अब 'अनोखी' दोनों का एक सा हाल हुआ है, ये सब इत्तिफाक नहीं हो सकता.. कुछ तोह ऐसा है जो मुझे पता करना होगा'

"कुंदन भैया.. वो मसाले वाली मशीन फिर से चलनी बंद हो गयी"

कुंदन जैसे किसी नींद से जगा हो.. वो सामने देखता है तोह उसे 'जब्बार' खड़ा हुआ नज़र आता है, आते से सना हुआ

कुंदन- (एक लम्बी सांस लेते हुए) लगता है अब इस मशीन को बदलना hi पड़ेगा, जाओ तुम पानी पि ले मैं देखता हु

जब्बार- (मशीन की तरफ जाते हुए कुंदन को देखते हुए ग़ुस्से से भर उठता है और खुद से hi बड़बड़ाने लगता है) साले मादरचोद तेरी वजह से hi आज तेरी औलाद 'मोनू' मेरे लिए गले की हड्डी बन गया है.. उसके होश मैं आने से पहले अगर उसे ख़तम नहीं किया, तोह मेरी जान को खतरा हो सकता है

जब्बार वह से निकल क चक्की क पीछे बने एक छोटे से कमरे मैं आता है और पानी पीते हुए

"समझ नहीं आ रहा उस सपोले 'मोनू' की साँसें कैसे बंद करू, हर समय कोई न कोई उसके साथ hi रहता है.. ऊपर से पूरा परिवार अब एक hi छत्त क नीच है"

जब्बार पानी पीटा hi जा रहा था, पर उसका गाला सूखा hi लग रहा था.. एक अजीब सा दर बैठा हु था उसका अंदर

ऐसी समय महेंद्र क घर पे कमरे क अंदर मालती अपने बेटे को एकटुक देखे जा रही थी

उसकी आँखों में आंसू और दिल से एक hi दुआ निकल रही थी.. की


'मेरा बीटा जल्दी से उठ खड़ा हो'

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नष्ट अपडेट ✍️

अपडेट #03 - पेज No. 📄 28
 
अपडेट #03

सुंदरपुर और उसका वो पीपल


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अनोखी की मौत क ठीक 10 दिनों बाद, मुंबई जैसे बड़े सेहर में पुलिस हेडक्वार्टर पे

"ये पहली बार नहीं है.. जब सुंदरपुर गाओं में ऐसी अजीब मौत हुई है, इससे पहले भी हमने उस गाओं में अपना एक खबरि बनाया था"

अपनी आरामदायक कुर्शी पे बैठा हुआ एक आदमी जिसका पेट निकला हुआ था और उसके सामने पड़ी टेबल पे उसकी नामपलट राखी हुई थी जिसपे 'नवाब खान' लिखा था

नवाब खान नाम का ये आदमी इस समय अपने सामने बैठे एक आदमी से बात कर रहा था.. जिसके सर क बाल नाम मात्र क बचे थे और आँखों पे बड़ा सा चस्मा चढ़ा हुआ था

"आप सायद 'गुफरान' की बात कर रहे है"

खान- सही कहा 'यादव'

खान और यादव करके इन दोनों आदमियों ने इस समय सादे कपडे पहने हुए थे.. पर उनकी बातों से वो कोई सरकारी नौकर प्रतीत हो रहे थे

यादव- यानि दोनों मौतों का जिम्मेदार कोई एक है ?

खान अपना सर है में हिलता है और अपनी बात को आगे कहता है


"है सही कहा.. जिस रहस्य को पता करने क लिए हमने 'गुफरान' को अपना खबरि बनाया था, जिसके बारे मैं उसे कुछ पता भी चला था पर इससे पहले hi सचाई बहार आ पति उसका भी वही हाल हुआ

ठीक उसी प्रकार उसे भी मार क बिना कपड़ों क उसी तालाब मैं दाल दिया गया था, और अब ये औरत 'अनोखी'"

यादव अपने चश्मे को सही करते हुए

"ये सब इत्तेफाक तोह नहीं हो सकता सर"

खान जिसके हाव भाव से hi पता चल रहा था उसका रुतबा ज्यादा है

"सही कहा.. इसलिए मैं चाहता हु की उस गाओं में फिर से हमारा कोई आदमी हो, पर इस बार ऐसा कोई जो हर मुश्किल से निपटना जनता हो"

यादव जो फिर से अपना चस्मा सही करता है और कहता है

"आपकी बात सही है पर आपके डिपार्टमेंट मैं एक से एक पुलिस अफसर है, फिर मुझे क्यू बुलाया ?"

इन दोनों की बातों से ये तोह पक्का हो चूका था की ये पुलिस डिपार्टमेंट का हिस्सा है, पर जिस्म पे कोई वर्दी नहीं थी

खान अपनी सीट से खड़ा होता है और थोड़ी चहलकदमी करते हुए

"यही तोह प्रॉब्लम है, सुंदरपुर और अस्स पास क सभी 5 गाओं पे 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' का राज चलता है"


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यादव- (अपने दिमाग पे जोर लगते हुए) ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह, ये वही है न जिसने अभी कुछ दिनों पहले रूलिंग पार्टी को एक मोटा चंदा दिया है

खान- (वापस अपनी कुर्शी पे बैठते हुए) सही कहा, और तुम तोह जानते hi हो हमारे नेता कैसे है.. जो आदमी उन्हें चंदे क रूप मैं काली कमाई देता है, उसके वो टट्टे तक छत्त सकते है

यादव- (सोचते हुए) आपकी बात सही है, पर मैं समझ नहीं प् रहा आपको मेरी किया जरुरत है ?

"तुम्हारे डिपार्टमेंट का काम hi लोगो क काले धन का पता लगाना है.. जिसके लिए वो लोगो क बीच रहकर अपनी पहचान छुपाना अचे से जानते है"

यादव बस है मैं सर हिलता है और खान अपनी बात आगे कहता है

"मुझे कोई ऐसा आदमी चाहिए जो अपनी पहचान छुपाने में माहिर हो और जरुरत आने पे हथियार चलना भी जनता हो"

यादव- अगर मैं गलत नहीं हु.. तोह ये सब ों पेपर नहीं होने वाला है न ?

"है.. ककी 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' उन सभी गाओं में किसी पुलिस वाले को आने नहीं देता.. और बड़े बड़े नेता उसकी बात नहीं टालते, और वजह तुम जानते hi हो"

यादव- पैसा.. चंदा.. काला धन

खान बस है में अपना सर हिला देता है,

यादव कुछ दिएर सोचने क बाद

"हम्म.. एक आदमी है, पर बहुत टेडी खोपड़ी है"

खान- इस समय हमे ऐसे hi आदमी की जरुरत है, ककी सुंदरपुर का रहस्य सुलझाने क लिए कोई ऐसा hi चाहिए.. जो लोड़मी जैसा चालक और हमारे लिए कुत्ते जैसा वफादार हो

यादव- (मुस्कुरा पड़ता है) उसमें इन दोनों जानवरो वाली खूबियां तोह है, पर साथ साथ सैंड वाली आदत भी है

खान जैसे समझ न पाया हो

यादव- (मुस्कुराते हुए) गदराई गाय की चढाई करना

खान है पड़ता है और साथ hi साथ यादव भी

खान- (मुस्कुराते हुए) उससे हमे कोई प्रॉब्लम नहीं.. अगर काम क साथ साथ वो थोड़ी बहुत मस्ती भी कर ले तोह हमे किया, वैसे कोनसा नाम है तुम्हारे दिमाग में ?

यादव- आप तोह जानते है में उसकी असली पहचान नहीं बता सकता.. पर उसका कोड नाम 'रॉकी' है


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खान- काम तोह कर लेगा न ?

यादव- आपने सुंदरपुर गाओं क बारे में जो बताया है.. उसके हिसाब से वही है जो ये कर सकता है

खान- फिर देरी किस बात की.. लगाओ उसे इस मिशन पे

~ 🔗 ~

ये पूरी कहानी सुंदरपुर गाओं क लोगो की है.. इसलिए आगे बढ़ने से पहले थोड़ा इस गाओं की इस्तिथि भी जान लेते है

सुंदरपुर गाओं कुछ ऐसा है जिसे देख क आप कह सकते है ये आज भी बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ है

और इसकी सबसे बड़ी वजह है 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' और उनके पूर्वज.. वैसे कहते है कभी ऐसी परिवार क लोग यहाँ क राजा हुआ करते थे

यहाँ आज भी आपको सहकारी जैसी रूढ़िवादी परंपरा मिल जाएगी, तोह बैंक जैसी सुविधाएँ भी

गाओं की आबादी अछि खासी है, यानि यहाँ लोगो की तनिक भी कमी नहीं है.. खासकरके लड़कियों और महिलाओं की


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Qki jadatar Mard paise k liye Gaon se bahar jana pasand karte hai.. waise es Gaon ki mukhya jeevika kheti hi hai

Eske alawa Gaon main 2 bazar bhi lagte hai.. jaha aas pas k sabhi Gaon wale bhi aate hai

Pehla Bazar 'Choti Mandi' ya 'Chota Bazar' k naam se jana jata hai.. jaha aapko dainik jaruraton ka sara saman mil jayega, sabji fal Kapdon ki 1-2 dukan aur mochi, Saloon, Mithai aur aisi sabhi cheeze

Waise es bazar main logo k ghar bhi hai.. jadatar logo ne apne gharon main hi aage dukan nikal rakhi hai, jismain se kuch dukan logo ne kiraye pe de rakhi hai aur kuch me khud hi apna rojgar karte hai

Wahi Dusra Bazar 'Bade Bazar' k naam se jana jata hai.. yaha Sundarpur aur ass pass k 5 Gaon k logo thok main anaj ko kharedne aur baichne ka kaam karte hai

Esi Bade Bazar k pass Gaon ka eklauta 'Cold Storage' bhi hai.. jiske Malik Gaon k sarpanch 'Sheikh Sahab' hai

Wahi es anaj ki mandi ko sambhalne ka kaam 'Pahalwan' karta hai

Sundarpur Gaon ki Purav (पूर्व) disha me ek pahadi hai jise aaj tak koi bhi paar nahi kar paya hai, aisa nahi hai ki kisi ne koshish nahi ki.. par jo bhi es pahadi ko paar karne ki koshish karta hai wo kabhi bhi wapas nahi ata

Aur jaisa hi hum logo main andhvishwas ki koi kami hai.. toh es Pahadi ko leke bhi aisi baaten fail chuki hai

Gaon k kuch bache hue Buddhon ka kehna hai ki es Pahadi pe 'Yaksha' raaj karte hai esliye waha kisi ko aane nahi dete

Toh kuch pade likhe logo ka ye bhi manna hai ki us pahadi pe Daku' Chor, Badmash aur lutere chup k rehta hai.. esliye waha jo bhi jata hai koi laut k nahi aata

Wahi Gaon ki उत्तर disha main aisa ghana jungle hai jiska koi ant nahi.. es Jungle ki kahani bhi alag nahi hai, ki yaha bhi Jane wala kabhi laut k nahi aaya

Kehte hai jungle itna ghana hai ki jungle k beech main Suraj ki roshni tak nahi pahuchti


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Esliye koi bhi Jungle k jada andar jane ki galti nahi karta

Waise es Jungle k thoda hi andar kai khubsurat chote chote chupe talab bhi hai.. jaha Gaon k kuch manchale aur Manchali apni bhook miltane aati hai

Ab konsi Bhook ye batane ki aapko jarurat nahi.. qki yaha mere sabhi Dost bahut Samajhdar hai 😉

पश्चिम main Sundarpur Gaon, baki k 5 alag alag Gaon se judta hai

Surajmukhi Gaon, Pulhwa Gaon, Lobhi Gaon, Haripur aur Menaka puri Gaon

Ye wo Paanch Gaon hai jo Sundarpur k sath jude hue hai..

Par aisa nahi hai ki.. ek se dusre Gaon main jana koi itna asan hai, kabhi aapko Nauka ki sawari karni padegi toh kahi aapko Baansh ka Pul paar karke Jana hoga toh kabhi Aapko kisi jungle k beech se gujarna padega

Par in sabhi kathinaiyon k baad bhi ye sabhi Gaon ek dusre se jude hai

Waise ek Pakka rasta hai bhi hai ek se dusre Gaon main jane ka, jispe sarkari Bus bhi chalti hai par wo kaafi lamba aur ghumavdar rasta hai.. jismain acha khasa samay lagta hai

Wapas Sundarpur ki baat kare toh yaha दक्षिण main ek Station bhi hai.. aur sahi mayne main yahi es Gaon main aane ka sabse surakshit rasta bhi hai

Sundarpur Gaon k liye hafte main sirf ek hi train chalti hai aur wo bhi subha bhor main 4 baje yaha pahuchti hai, aur kabhi dair ho gayi toh aadhi raat hi yaha k Station pe pahuchti hai

Eske alawa bus ka bhi ek tarika hai, par uske liye ek ghana jungle aur phir pahadi chetr jaha har samay lut ka khatra bana rehta hai use paar karna padta hai

Waise yee rasta 'Menaka puri Gaon' se hoke aata hai

Waise yaha aane waali ye Train sirf 2 Station pe hi rukti hai, pehla Sundarpur or dusra 'Pulhwa Gaon' me bane station pe


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और कभी कभी ट्रैन पहले स्टेशन यानि सुंदरपुर मैं भी नहीं रूकती तोह लोगो को उल्टा वापस आना पड़ता है..

जिसके लिए उन्हें पहले एक छोटे से गाओं 'सूरजमुखी' क बीच से बहने वाली नदी 'सर्प' पार करनी पड़ती है जिसके लिए नौका का सहारा लेना पड़ता है

वैसे ये नदी 'सर्प' इन सभी गाओं को आपस मैं जोड़ती भी है.. और यहाँ की हरियाली की प्रमुख वजह भी है

पर साथ hi साथ इस नदी ने कई जाने भी चीनी है.. कइयों का अन्धविश्वास तोह ये भी कहता है की ये 'सर्प' नदी असल मैं एक 'यक्षिणी' का घर है और उसी का नाम सर्प था

पर कोण जाने.. किया सच है और किया अन्धविश्वास

और यही सब वजह है की हर कोई ट्रैन का सफर hi चुनता है

जब्बार ने अनोखी और मोनू क साथ जो किया उसके एक महीने बाद

मालती नंगे पाऊँ एक बड़े से पीपल क पेड क चारो तरफ चक्कर लगा रही थी.. उसकी आँखों से आँशु बह रहे थे और लगातार चलते रहने की वजह से उसके पाऊँ मैं दर्द और कई कंकड़ पत्थर चुबने की वजह से खून भी निकलने लगा था

पर वो रुक नहीं रही थी वो निरंतर अपनी आँखों को बंद किये हुए और हाथ जोड़े हुए उस पुराने पीपल क पेड क चक्र काट रही थी और उसके होंठ बार बार भगवन का नाम दोहरा रहे थे

"बांध करो ये.. पिछले 3 जानते से ऐसे hi चल रही हु, बीमार पद जाओगी"

मालती अपनी आँखों को खोलती है तोह उसके सामने उसका पति कुंदन खड़ा था

सुबह का सूरज धीरे धीरे आश्मान की तरफ बढ़ने लगा था जिसकी किरणे इस समय उसके पति क सरीर पे पद रही थी

मालती- (उसी प्रकार उस पेड़ क आगे हाथ जोड़े हुए) अपने बेटे की सेहत क लिए मैं जो कर सकती हु वो करुँगी

और उसकी आँखों से आँशु बह निकलते है, उस पल कुंदन का दिल भी पसीज गया था वो आगे बढ़ने की सोचता है.. सोचता है की अपनी पत्नी को अपनी बाहों मैं लेके उसके समझाए

पर तभी उसकी आँखों क आगे प्रेमलता का चेहरा आ जाता है, मानो वो कुंदन को देख क है रही हो

'इतनी जल्दी सब भूल गए.. भूल गए की मालती ने तुम्हे धोखा दिया है'

और कुंदन क बढ़ने वाले कदम वापस से रुक जाते है.. और पत्नी को देखते हुए थोड़ा ग़ुस्से से कहता है

"ये सब अन्धविश्वास है और कुछ नहीं, मैं कहता हु घर चलो.. वैसे भी यहाँ कोई नहीं आता, सपित है ये वृक्ष"


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मालती- अभी 50 चक्कर और पूर्ण करने है.. उससे पहले मैं ये बंद नहीं कर सकती, और अपने बेटे क लिए मैं कोई भी शाप से लड़ सकती हु

कुंदन कुछ कहना जरूर च रहा था, पर वो जनता था की मालती इस समय सिर्फ एक माँ है और वो उसकी कोई बात नहीं सुनने वाली

इसलिए वो पलट क बिना कुछ कहे वापस गाओं की तरफ चल देता है.. और मालती भी वापस से उस गाओं क बहार एकांत मैं उस एकलौते पीपल क पेड़ क चक्कर लगाना सुरु कर देती है

मालती का पूरा जिस्म पसीने मैं भीग चूका था, पैरों मैं ऐसा दर्द होने लगा था मानो पका फोड़ा हो.. पर वो तब तक नहीं रूकती जब तक वो उस पीपल क पेड़ की 101 बार परिक्रमा पूरी नहीं कर लेती

और जैसे hi 101 परिक्रमा पूरी होती है उसका जिस्म कांपना सुरु हो जाता है वो जल्दी से उसी पीपल क पेड़ क चाव में बैठ क बुरी तरह हाफने लगती है

"पानी पिओगी पुत्री"

अचानक एक सुकून देनी वाली आवाज़ मालती क कानो मैं पड़ती है.. न जाने उस आवाज़ मैं अलग किया था, ककी मालती की थकन जैसे गायब होनी सुरु हो गयी थी

मालती आवाज़ की डिश मैं देखती है तोह 80-90 साल का एक बुद्धा जो सीधी तरह खड़ा भी नहीं प् रहा था.. न जाने वह अचानक कहा से आ गया था और वो अब उस पीपल क पेड क पास जमीन मैं मानो कुछ ढूंढ रहा हो

मालती- (चारो तरफ देखते हुए) आप कोण है.. और कब आये ?

बुद्धा जमीन से एक पत्ता उठाते हुए

"मैं कोण हु.. किया बताऊ.. अब तोह मुझे खुद भी याद नहीं, न मेरा अतीत.. न वर्तमान"

मालती- बाबा.. मैं कुछ समझी नहीं ?

वो बुद्धा मालती को वही पत्ता देते हुए जो उसने अभी अभी जमीन से उठाया था

"मेरी चोरो तुम बताओ.. मितांश को लेके परेशां हो"

मालती को जैसे झटका लगता है.. उस बुड्ढे को उसके बेटे का नाम कैसे पता है, वैसे भी अगर कोई जनता भी है तोह वो उसे मोनू hi कहता है.. ये असली नाम तोह खुद उसने भी अपने बेटे का सालों से नहीं लिया होगा

मालती- (न जाने क्यू उसके हाथ जुड़ते चले जाते है) आप कोण है बाबा.. मेरे बेटे क बारे मैं कैसे जानते है ?

"अभी तोह कहा.. मैं कोण हु, ये खुद नहीं जनता

रही तुम्हारे बेटे की बात तोह बस ये समझो.. इन पत्तों ने बता दिया मुझे"

बुड्ढे ने मुस्कुराते हुए ऊपर हवा से हिलाते हुए पेड़ और उसके पत्तों को देखते हुए कहा था


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मालती को कुछ भी समझ नहीं आता, पर अपने बेटे को सोच क उसकी आँखों मैं आंसू जरूर आ जाते है

बुद्धा- अब तुम्हारी ज़िन्दगी मैं इन आंशुओ क लिए जगह नहीं है, एक बड़ी जुंग होने वाली है.. जिसमें बहुत कुछ डाव पे लगने वाला है

मालती- आपकी बातें इतनी रहस्य से भरी हुई क्यू है.. और कैसी जुंग

बुद्धा- (मुस्कुराते हुए) ज़िन्दगी से बड़ी जुंग और किया होगी.. और रहस्य तोह हम सभी की ज़िन्दगी मैं है, पर याद रखना हर रहस्य की कड़ियाँ हमारे बीते हुए कल से जुडी होती है

मालती- मैं समझी नहीं.. बाबा

बुद्धा मुस्कुराते हुए

"हर चीज़ की कीमत होती है.. जब लगे वो इन्शान उस कीमत को चूका सकेगा, तभी उसे और सवाल करने चाहिए

वैसे ऐसे पानी मैं घोल क पीला देना.. मितांश ठीक हो जायेगा"

मालती को समझ नहीं आता की वो बुद्धा किस चीज़ की बात कर रहा है.. पर इससे पहले की वो कोई सवाल करती है, एक हलकी सी आंधी सी आती है जिस वजह से एक पल क लिए मालती की आँखें बंद हो जाती है

और जब मालती वापस अपनी आँखों को खोलती है तोह वह कोई नहीं था.. ये पीपल का पेड गाओं क दूर एक एकांत और खुली जगह मैं था फिर अगर कोई यहाँ से ऐसे जायेगा भी तोह वो नज़र आना चाहिए था

पर वह मालती क अलावा कोई था hi नहीं, मालती को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की ये सब किया था

तभी मालती क ऊपर उस पीपल क पेड़ क कई पत्ते एक साथ गिरते है और जब मालती ऊपर देखती है तोह उसे ऐसा लगता है जैसे कोई लाल कपडा एक पल क लिए उन पत्तों क बीच लहराया हो

बिलकुल वैसा hi जैसा उस बुड्ढे ने धारण किया था, मालती को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था और यही वो पल था जब उसकी नज़र अपने हाथ मैं थामे एक सफ़ेद फूल पे जाती है

उसे याद अत है की उस बुड्ढे ने उसे जमीन से एक पत्ता उठा क दिया था.. पर ये फूल उसके हाथ मैं कहा से आया और वो पत्ता कहा चला गया


मालती को कुछ भी समझ नहीं आता, वो बहुत दिएर तक वही बैठी अपने बेटे क लिए आँशु बहती रहती है और फिर वापस चल पड़ती है.. अपने बेटे 'मोनू' क पास

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नष्ट अपडेट ✍️

अपडेट #04 - पेज No. 📄 36
 
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मालती अपनी जवानी मैं 👆
 
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अपडेट #04

सत्तू की नज़रें

पूरी तरह से जवान हो चूका सतेंद्र यानि सत्तू चारपाई पे बैठा हुआ आज से ठीक 23 दिनों पहले क उस खूबसूरत नज़ारे में खोया हुआ था जो उसने उस रात देखा था जब वो भानु फूफा क यहाँ उन्हें और अपनी बुआ शीला को बुलाने गया था

सत्तू इस बारे में जितना सोच रहा था उसके जिस्म में उतनी hi आग लग रही थी.. ककी वो खूबसूरत नज़ारा उसकी आँखों से दूर hi नहीं हो रहा था


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सत्तू की माँ यानि सविता इस समय हर्षिता क साथ मिलकर रसोईघर में खाना बना रही थी और उसके पिताजी और 'चाचा कुंदन' घर क बहार कुवे क पास बैठे हुए बातों में व्यस्त थे

वीरू और भानु कही गए हुए थे

आज कल पूरा परिवार एक hi छत्त क नीचे थे और उसकी वजह मोनू क साथ जो हुआ.. वो थी

सत्तू इस समय उसी चारपाई पे बैठा हुआ था जिसपे मोनू बशोषी की हालत में पड़ा हुआ था

असल मैं ये महेंद्र यानि मालती क बड़े जेठ जी का hi फैसला था की मोनू को कभी भी अकेला नहीं छोरा जायेगा, हर समय किसी न किसी का उसके साथ रहना जरुरी है

ऐसी कारणवस इस समय सत्तू मोनू क पास hi उसकी चारपाई पे बैठा हुआ था.. पर वो अलग hi खूबसूरत ख्यालों मैं खोया हुआ था जिसमें कामुकता hi हलकी मिलावट भी थी

सत्तू इस लम्बी सांस लेते हुए अपने लोअर क ऊपर से hi अपने लुंड को सेहला देता है और कुछ पलों क लिए उसकी आँखें बंद हो जाती है जहा उन बंद आँखों से भी उसे एक hi दृश्य नज़र आता है

उसकी खूबसूरत शीला बुआ जो इस समय पूरी तरह निवस्त्र अपने बिस्तर पे सो रही थी.. सत्तू को अपने ख्यालों में ऐसा लगता है मानो शीला उसे अपने पास बुला रही हो

पूरी तरह जवान हो चूका सत्तू इन खूबसूरत यादों में खो सा जाता है और अपने लुंड को सहलाते हुए अपनी बुआ क नंगे जिस्म को याद करता रहता है

तभी उसके कानो मैं हलकी सी आहत सुनाई पड़ती है और वो पूरी तरह सजग हो जाता है.. वो चारो तरह देखता है जहा कोई भी खतरा नहीं था

पर तभी उसकी नज़र कमरे क दरवाजे क बहार झाड़ू लगाती हुई खूबसूरत शीला की झलक मिलती है


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शीला इस समय बैठ क झाड़ू लगा रही थी, जिस वजह से पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें उसके खूबसूरत गोल और कठोर उरोजों पे किसी मोती की तरह नज़र आ रही थी

ये जरा सी झलक भी इतनी कामुक थी की थी सत्तू का लुंड पूरी तरह सलामी देने लगा था.. न च क भी सत्तू अपने लुंड को ऊपर से नीचे.. नीचे से ऊपर तक सहलाने लगा था

पर ये नज़ारा ज्यादा दिएर तक नहीं चलता ककी शीला झाड़ू लगते हुए दरवाजे क पास से आगे बाद जाती है और खूबसूरत नज़ारा ख़तम हो जाता है

सत्तू- (एक लम्बी सी ाः भरते हुए बेहोश मोनू को देखते हुए कहता है) एक बात बताऊ भाई.. पता नहीं क्यू आ कल हर औरत मैं मुझे शीला बुआ hi नज़र आती है, कितनी खूबसूरत है न अपनी बुआ.. उफ्फ्फ्फ़ किया जिस्म है न मोनू..

सत्तू अपनी hi बात पे थोड़ा शर्मा सा जाता है, पर आगे कहता है

"वैसे सबसे बड़ी बात है की मैं अपनी ये खुवाईश किसी को बता भी नहीं सकता.. और किया कहूंगा की मुझे 'शीला बुआ' अछि लगने लगी है"

सत्तू एक लम्बी सी सांस चोरते हुए मोनू क हाथ को पकड़ते हुए आगे कहता है

"ये सब तुझसे बता रहा हुआ, पर तू भी कहा कुछ सुन रहा होगा.. ऐसा नहीं है की मैंने कोशिश नहीं की"

सत्तू एक बार दरवाजे की तरफ देखता है और फिर आगे कहता है

"मैंने बहुत कोशिश करि की शीला बुआ को लेके ऐसा कुछ न सौचु, ककी न hi ये सामाजिक तौर पे सही है.. न hi ऐसा कुछ संभव है, पर किया करू जीवन में पहली बार कोई पसंद आया और वो भी अपनी hi बुआ.. जो शादीशुदा है"

सत्तू आगे बढ़ता है और पियर से मोनू क बालों को सही करते हुए अपनी बात कहता रहता है

"मैं जनता हु तुझे हसी आ रही होगी की सत्तू भैया को ये किया हो गया है ?

पर किया करू मैं बहुत कोशिश कर रहा हु पर शीला बुआ को अपने ख्यालों से निकल hi नहीं प् रहा हु.. हर समय उनका खूबसूरत चेहरा मेरी आँखों क आगे घूमता रहता है"

'ओहु.. कोण है वो खुशकिस्मत जिसपे हमारे सत्तू का दिल आ गया.. जरा मुझे भी उसके बारे में बताओ"

अपने पीछे से आणि वाली इस आवाज से सत्तू बुरी तरह दर जाता है, और पलट क देखता है तोह अंदर आने वाली और कोई नहीं बल्कि उसकी बुआ शीला hi थी

बेचारे सत्तू की तोह जैसे सांस hi अटक गयी थी, चेहरा ऐसा नीला पड़ने लगा मानो किसी नाग ने देश लिया हो

शीला- (मोनू और सत्तू क पास आके वही राखी कुर्शी पे बैठते हुए) बताओ बताओ.. कोण है वो खुशकिस्मत लड़की ?

शीला अपने गले और चेहरे से पसीना पूछते हुए.. अपने हाथों को ऐसे उठती है मानो अंगड़ाई ले रही हो


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सत्तू- (बुरी तरह सकपका सा गया था) कोण.. कोण सी लड़की बुआ.. कोण सी...

शीला- (हस्ते हुए) ाचा जी अपने छोटे भाई को अभी अभी बता रहे थे की किसी का चेहरा हर समय आँखों क आगे घूमता है, और अब मैं पूछ रही हु तोह मुझसे नाटक

शीला मोनू क पियरे से चेहरे और माथे पर स्नेह से हाथ फिरते हुए

"देख रहा है मोनू, तेरा बड़ा भाई तुझसे तोह पियर करता है.. अपने दिल की बात भी बताता है पर अपनी शीला बुआ से उसे जरा भी पियर नहीं"

पियर जैसा सब्द बोलके शीला ने जैसे सत्तू क जख्म हरे कर दिए थे इसलिए बेचारा थोड़ा भुजा भुजा सा कहता है

सत्तू- (चेहरे पे जबरदस्ती की हसी लाते हुए) नहीं बुआ ऐसी कोई बात नहीं है, आप गलत समझ रही हो.. मैं तोह बस ऐसे hi मोनू से बातें करने की कोशिश कर रहा था

शीला- रहने दे रहने दे.. आज तूने बता दिया की तुझे अपनी बुआ से बिलकुल भी पियर नहीं

सत्तू- नहीं बुआ ऐसी बात नहीं है.. आपसे तोह मुझे बहुत पियर.. मेरा मतलब हम सभी पियर करते है, सच मैं ऐसा कुछ नहीं है

शीला- चलो ठीक है, वैसे कभी कोई पसंद आये तोह तू मुझे बता सकता है.. तू तोह जनता है न मुझे एक्सपीरियंस भी है

शीला अपने और भानु क प्रेम विवाह की तरफ इशारा करते हुए कहती है

सत्तू बेचारा कुछ बोल hi नहीं पाया.. कुछ पलों तक पूरी शांति रहती है

शीला- वैसे कैसी लड़की पसंद है तुझे, मुझे बता मैं वैसी hi ढूंढ लाऊंगी

सत्तू- (फीकी सी हसी हस्ते हुए) आप नहीं ढूंढ पाओगी.. ाचा बुआ मुझे जरा कुछ काम है, आप अगर मोनू क पास है तोह होक औ

शीला- है.. है जरूर क्यू नहीं, वैसे सच में तुझे कुछ काम है या अपनी बुआ से भाग रहा था, वैसे भी मैं देख रही हु आज कल तू मुझसे कुछ कटा कटा रहता है

सत्तू- (दर जाता है, मानो उसकी चोरी पड़की गयी हो) नहीं.. नहीं बुआ ऐसा कुछ नहीं है, आप ऐसे hi सब सोच रही हु बस.. मैं आता.. आता हु

इतना कहकर सत्तू जल्दी से कमरे से बहार चला जाता है.. मानो उसे दर हो जैसे वो वह और रुका तोह अपने दिल की बात न कह दे

शीला को भी बड़ी हैरानी होती है.. की आज कल ऐसे हो किया गया है, असल मैं शीला जब अंदर आयी तोह उसने सिर्फ चेहरे वाली बात hi सुनी थी इसलिए उसे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया

पर फिर वो ऐसी निष्कर्ष पे पहुँचती है की आज कल घर मैं हर कोई मोनू को लेके परेशां है.. इसलिए सत्तू भी ऐसी से गुजर रहा है

शीला ममता भरी नज़रों से मोनू को देखती है और पियर से उसके माथे पे हाथ रख क बोलती है

"तू जल्दी से ठीक हो जा.. फिर दोनों मिलकर सत्तू क लिए कोई अछि सी लड़की ढूंढेंगे"

अब शीला को कोण समझाए उसके भतीजे सत्तू को लड़की नहीं एक औरत की चाहत है

ऐसी दिन शाम को गाओं क बड़े बाजार में कुंदन अपने कंधे पे अपना गमछा रखे हुए बाजार क बीचो बीच चला जा रहा था


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कुंदन क दिमाग में अब भी उसका बीटा hi चल रहा था जिसे अभी तक होश नहीं आया था

'इतनी जल्दी मैं कहा चल दिए कुंदन भैया"

तभी कोई कुंदन को आवाज़ देता है.. कुंदन आवाज़ देने वाले को देखता है तोह वो और कोई नहीं बल्कि उसी क गाओं का पहलवान था

✍️ ये वही पहलवान है जिसकी बात त्यागी और वनराज कर रहे थे 👇

अपडेट #50, Part #01

"इतने सालों तक tumhe(Vanraj) सबसे छुपाये रखने क लिए hi मैंने गाओं क 'पहलवान' क साथ मिलकर ऐसी अफवाहें फैलाई की इस पहाड़ी पे एक आत्मा का वाश है.. ताकि कोई भी यहाँ आने की गलती न करे"

इन जनाब पहलवान का विस्तारपूर्वक परिचय मैं आगे दूंगा..

कुंदन को बड़ी हैरानी होती है की आज सामने से पहलवान ने उसे आवाज़ कैसे दे दी.. पर कुंदन भी उसका पूरा सम्मान करते हुए

"आप भाइयों की कृपा है.. आप बताइए कैसे है ?"

पहलवान अपने सब्दो में रास घोलते हुए

"कृपा तोह हमेशा बड़े भाई की होती है.. और वो आप है, मैं तोह आपका छोटा भाई हु

वैसे आपके बेटे क बारे मैं सुना बहुत दुःख हुआ"

कुंदन क चेहरे पे भी दर्द आ hi जाता है.. इसलिए वो कुछ बोल नहीं पता बस है में अपना सर हिला क रह जाता है

"आओ कुंदन भाई यही पास hi घर है, चलो एक एक कप चाय हो जाये"

कुंदन को आज पहलवान का अंदाज बहुत अजीब लग रहा था जिस आदमी से.. आज से पहले कभी उसकी बात भी न हुई हो, दोनों एक दूसरे को देख क अपना अपना रास्ता बदल लेते हो वो आज इतने पियर से बात क्यू कर रहा है ?

कुंदन- (अपनी सोच को जाहिर नहीं होने देता) जरूर भाई.. पर आज नहीं आज जरा कुछ काम है

पहलवान- चलो ठीक है, कोई नहीं आप सायद मुझे अपना नहीं समझते.. मैं तोह आपको अपना बड़ा भाई hi मंटा हु

कुंदन- नहीं नहीं पहलवान ऐसी कोई बात नहीं है, बस वो अभी सच में कुछ जरुरी काम और थोड़ा जल्दी मैं भी हु.. बस इसीलिए

पहलवान- ाचा ठीक है भाई.. पर अगली बार आपकी एक नहीं सुनूंगा

कुंदन भी हस्ते हुए

"है.. है जरूर पहलवान"

इतना कह क दोनों एक दूसरे को अलविदा कह क आगे बाद जाते है

पहलवान- (कुंदन को जाते हुए देख क हसने लगता है और खुद से कहता है) बहनचोद तेरी वजह से मुझे पहलवानी चोरनी पड़ी थी न.. तुझे ऐसे तड़पते हुए देख क बड़ी ख़ुशी हो रही है

पहलवान अपनी मूछों पे ताव देते हुए

"अभी तोह तेरी परेशानी और तेरा ये दर्द और बढ़ेगा.. जिसे देख क मेरे दिल को असली ठंडक मिलेगी

आज भी मैं अपनी उस बेइज़्ज़ती को नहीं भुला हु जो तेरी वजह से हुई थी.. सालों से इस आग मैं जला हु मैं, पर अब तेरे रोने का समय है"

कुंदन, पहलवान क इरादों से पूरी तरह अनजान अपने काम पे आगे बाद जाता है वही पहलवान भी कुछ दिएर तक उसे hi देखता रहता है और फिर वो भी अपने रस्ते चल पड़ता है

चलिए आगे बढ़ने से पहले ये जान लेते है की आखिर ये महोदय है कोण ?

सुंदरपुर गाओं मैं 2 बाजार लगते है.. पहली छोटी मंडी या 'छोटा बाजार' और दूसरा बाजार 'बड़े बाजार' क नाम से जाना जाता है

इस बड़े बाजार में अस्स पास क 5 गाओं क लोगो थोक मैं अनाज को खरीदने और बेचने का काम करते है

पर बड़े बाजार मैं सबसे मोती कमाई होती है यहाँ की अनाज मंडी से.. ककी यहाँ अस्स पास क सभी गाओं क किशन अपना अनाज बेचने आते है और फिर यहाँ से ये सारा अनाज अस्स पास क बड़े सेहरो में जेक बेचा जाता है और इस अनाज की मंडी को सँभालने का काम 'पहलवान' करता है

वैसे ये अनाज मंडी पे राज करने वाला का नाम 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' है और पहलवान उन्ही का खास आदमी है


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पहलवान जिसका असली नाम 'मंगल सिंह' है वो किसी ज़माने मैं पहलवानी किया करता था.. पर फिर ऐसा कुछ हुआ की उसे पहलवानी चोरनी पड़ी

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और तबसे लेके आज तक ये ठाकुर बलवंत का खास है

ठाकुर से नज़र कुछ लोग तोह ऐसे 'ठाकुर का कुत्ता' भी कहते है

पहलवान यानि मंगल सिंह क परिवार की बात करू तोह उसके अलावा इस परिवार मैं 2 और लोग भी है

बुलबुल


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35 साल की सवाली पर बेहद खूबसूरत और गोल चेहरे की बुलबुल बिलकुल अपने नाम जैसी है

जिसकी सलोनी सूरत देख क किसी का भी लुंड चहकना सुरु कर दे

ज्यादातर साड़ी पहनने वाली बुलबुल को देख क गाओं क मर्द अक्सर यही कहते है

'पहलवान जैसे लंगूर को बुलबुल क अंगूर मिले है'

बुलबुल जब पल्लू चढ़ा क चलती है, तोह उसके चलने का अंदाज़ ऐसा होता है की देखने वालों क अरमान मचल उठते है

उसकी हिलती हुई गांड को देखने क लिए लोग अपनी साँसें लेना भूल जाते है और बड़े बड़े गाय क थान जैसी उसकी चूचियों का मर्दन करने क लिए हर कोई अपने हिसाब से अपने अपने ख्यालों में खो जाता है

वैसे बता दू की पहलवान और बुलबुल क कोई बचा नहीं है

पहलवान क घर का आखिरी सदस्य है

हंसिनी


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जवानी और उसकी आग किया होती है ये बस अभी अभी जानना सुरु hi किया है इसने

कहानियों और फिल्मों में हीरो हीरोइन को साथ में पियर करते हुए देख क इसका जिस्म भी अकड़ने लगता है.. ऐसे भी अपनी ज़िन्दगी क हीरो का इन्तिज़ार है

ऐसा नहीं है की स्कूल में किसी लड़के ने कोशिश नहीं की, पर हासिनि को न जाने किसकी तलाश है और वो कब जेक पूरी होगी

वैसे कभी ये और मोनू एक साथ एक hi क्लास मैं हुआ करते थे.. पर फिर मोनू क साथ जो हुआ उसके कारन उसे दिल्ली जाना पड़ा और उसके बाद से आज तक ये दोनों मिले नहीं है

वैसे जिन लड़कों ने ऐसे पाने की कोशिश की है उसमें 'सत्यम' भी आता है, पर हासिनि ने उसे ठीक वैसे hi नज़रअंदाज़ कर दिया जैसे इलेक्शन जीतने क बाद 'नेता' देश की जनता को करते है

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ऐसी दिन रात मैं सभी लोग महेंद्र क यहाँ घर क आँगन मैं बैठे हुए थे.. और इन्हे क साथ गाओं की एक दो औरतें भी थी जिसमें से मोनू क खास दोस्त खालिद की अम्मी भी थी जो एक तरफ सबसे अलग अपनी hi सोच मैं घूम कुंदन को देखते हुए कहती है

"कुंदन"

कुंदन जैसे अचानक अपनी सोच से बहार आते हुए

"जी भाबीजां... कहिये"

खालिद की अम्मी 'नसरीन'

"वैसे उस दिन हुआ किया था.. मोनू तुम्हे मिला कैसे था"

नसरीन की बात सुनकर वह हर किसी का धियान पूरी तरह कुंदन पे आ चूका था.. जिसमें सबसे ज्यादा उतावली मालती थी

वैसे आज इस बात को आज 23 दिन हो चुके थे, पर अभी तक कुंदन ने उस रात क बारे मैं किसी को कुछ नहीं बताया था

वीरेंदर उर्फ़ वीरू, कुंदन का छोटा भाई

"है कुंदन भैया.. उस रात आपको मोनू नदी मैं कैसे मिला था.. हुआ किया था, आप नदी पे कैसे पहुंचने"

कुंदन सभी की तरफ देखता है और एक लम्बी सी सांस लेते हुए जैसे उस दिन मैं वापस लौटने लगता है

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ऐसी समय सर्प नदी क ठन्डे पानी क बीच से एक सवाली पर भरे जिस्म वाली कामुक सी औरत पानी से ऐसे बहार आती है मानो वो सीढ़ियों को चढ़ते हुए ऊपर आ रही है

पानी क बहार आते hi उसकी भीगी साड़ी कुछ ज्यादा hi जल्दी सूखने लगती है

पर इस समय इस औरत क आँखें पूरी तरह लाल थी, ग़ुस्से से उसका हर अंग काँप रहा था.. उसके मुख से कुछ सब्द निकलते है जो किसी जलते हुए अंगारो से काम नहीं थे

"कुंदन.. तुमने मेरे जल से एक जीवन को बचा कर मेरा आहार चीन है, तुमने माया क ग़ुस्से को ललकारा है.. इसका अंजाम बहुत दरदानक होगा"


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नष्ट अपडेट ✍️

अपडेट #05 - पेज No. 📄 45
 
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