Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 2 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running



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अपडेट #05

सर्प नदी की गहराई और एक पिता की कहानी (मोनू की रक्षा)

दिल्ली क स्टेशन पे इस समय बहुत भीड़ थी, ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दिल्ली की जनता एक साथ कही जाने क लिए अपने अपने घरों से निकल आयी हो

कुंदन भी धोती और कुर्ते मैं अपने दोनों हाथों से थामे हुए सामान को लेके भीड़ को चीरता हुआ आगे बाद रहा था

"भाई हैट न.. मेरे गाओं क लिए यही ट्रैन है, छूट गयी तोह एक हफ्ते तक फिर इन्तिज़ार करना पड़ेगा"

कुंदन भीड़ को अपनी ताक़त से चीरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है और जल्दी hi वो अपनी सीट पे विराजमान था

कुंदन बहुत खुस था ककी उसने मोनू और जिस जिस ने जो भी कहा था सब कुछ ले लिया था.. अब उसे जल्दी से जल्दी अपने गाओं पहुंचना था

कुंदन- (खिड़की से बहार देखते हुए) पता नहीं ट्रैन कब चलेगी ?

फिर अपने लाये हुए सामान की तरफ देखते हुए खुद से कहता है

"वैसे वो दुकान वाली लड़की भी सही थी.. अछि साड़ी दी है"

पर बेचारे कुंदन को किया पता उन sales-girl ने उसके साथ कोनसा खेल कर दिया है

ट्रैन चलती है पर अपने समय से नहीं और ये देरी आगे क आने वाले हर स्टेशन पे होती रहती है.. जिस कारणवस अब ये ट्रैन रात क करीब 10-11 बजे सुंदरपुर पहुंचेगी

कुंदन खिड़की क बहार च रहे अँधेरे को देख क परेशां होते हुए सोच मैं पद जाता है

'स्टेशन से घर जाने मैं आज हालत ख़राब होने वाली है.. ऊपर से इतना सारा सामान भी है'

कुंदन अभी अपने विचारों मैं व्यस्त hi था की तभी एक स्टेशन पे जब गाड़ी रूकती है तोह एक बुद्धा जिसने सिर्फ लाल वस्त्र धारण किये हुए थे.. वो आके कुंदन क ठीक सामने बैठ जाता है


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उसकी उम्र 80-90 साल रही होगी और वो सही से खड़ा भी नहीं हो प् रहा था, कुंदन एक सरसरी नज़र उस बुड्ढे पे डालता है और वापस खिड़की क बहार देखने लगता है

ट्रैन अपनी गति से आगे बढ़ने लगती है और अब ट्रैन का अगला गंतव्य 'सुंदरपुर' गाओं hi था

समय काफी हो चूका था, और खिड़की क बहार अँधेरा पूरी तरह च चूका था

जल्दी hi ट्रैन की रफ़्तार काम होने लगती है, कुंदन अपना सामान सँभालने लगता है.. पर इतने मैं उसके सामने बैठा बुद्धा कहता है

"बीटा जरा मुझ बुड्ढे की भी मदद कर दो.."

इतना कहते हुए वो बुद्धा जैसे hi उठने की कोशिश करता है वो लड़खड़ा जाता है, अगर कुंदन ने उसे सही समय पे पकड़ न लिया होता तोह वो कब का नीचे गिर चूका होता

"अरे बाबा आप ठीक हो.. इतनी उम्र मैं अकेले सफर नहीं करना चाहिए.. किसी को साथ ले लेना चाहिए था न"

बुद्धा- अब कहे का साथ बीटा.. तुम जरा मेरी भी मदद करो दो मुझे भी यही उतरना है

कुंदन ने आज से पहले सायद hi उस बुड्ढे को कभी देखा होगा

"आप भी सुंदरपुर मैं उतरेंगे.. मैंने कभी देखा नहीं गाओं में"

बुद्धा- (खड़ा होने की कोशिश करता है पर वापस लड़खड़ा जाता है, अब उसका पूरा वजन कुंदन क ऊपर था) मैं तोह तुम्हारे पैदा होने से पहले का निवासी हु बीटा

कुंदन अब परेशां होने लगता है.. ककी ट्रैन बस रुकने वाली थी और परेशानी ये थी ये उसके गाओं मैं ट्रैन ज्यादा दिएर क लिए रूकती भी नहीं है

कुंदन- (थोड़ा गुस्से से) सीधा खड़े हो बाबा.. आपके चक्कर मैं मेरा स्टेशन चला जायेगा

पर बुद्धा तोह जैसे अपना पूरा वजन कुंदन क ऊपर दाल चूका था और हैरानी की बात ये भी थी कुंदन जैसा भीमकाय सरीर का मालिक भी उस बुड्ढे को अपने आप से अलग नहीं कर प् रहा था

कुंदन- (ट्रैन धीमी होने लगी थी और कुंदन अचे से जनता था की यहाँ ट्रैन ज्यादा समय क लिए रुकेंगी भी नहीं) अपने बल खड़े हो बाबा.. स्टेशन निकल जायेगा

कुंदन एक बार फिर से बुड्ढे को सहारे देके खड़ा करने की कोशिश करता है और बुद्धा कुछ कदम आगे भी बढ़ता है की फिर से रुक क हाफने लगता है

"अरे रुको.. रुको बीटा, सांस तोह लेने दो"

कुंदन को बहुत ग़ुस्सा आ रहा था पर वो अपना काबू नहीं चोरता और कहता है

"अरे एक कदम भी नहीं चले हो और कह रहे हो सांस लेने दो.. पता है यहाँ ट्रैन जरा समय क लिए hi रूकती है"

बुद्धा वापस खुद को संभालता है और इस बार दोनों ट्रैन क गेट तक आ जाते है पर बुद्धा इतना धीरे आगे बाद रहा था की ट्रैन स्टेशन पे पहुंच क रुक चुकी है, कुंदन का मन तोह कर रहा था की बुड्ढे को यही चोर दे और आगे बड़े

पर इस समय वो अनजान बुद्धा खुद क बल खड़ा भी नहीं हो प् रहा था और कुंदन को उसे ऐसी हालत मैं चूर्ण सही नहीं लग रहा था

बुद्धा बुरी तरह हाफने लगता है मानो उसकी साँसें उखड जाएगी

कुंदन अपनी किस्मत पे झुंझलाते हुए

"बहनचोद मेरी hi किस्मत ख़राब है"

कुंदन उस बुड्ढे को एक बार फिर से उठाने की कोशिश करता है और हैरानी की बात थी कुंदन उसे हिला तक नहीं प् रहा था और अंततः ऐसी उठा पटक मैं ट्रैन सुंदरपुर गाओं क स्टेशन को चोर क आगे बाद चलती है

अब तोह कुंदन का ग़ुस्सा फुट hi पड़ता है

"देखो किया हो गया.. जब खुद से खड़ा तक नहीं हुआ जा रहा तोह घर पे बैठो न, दूसरों को क्यू परेशां करते हो"

बुद्धा- (मंद मंद मुस्कुराते हुए) ऐसा ग़ुस्सा न करो बीटा.. एक दिन तोह तुम भी बुड्ढे होंगे न, हमेशा जवान थोड़ी रहोगे

कुंदन सोचता है की अब और किया दिमाग खपाऊ.. स्टेशन तोह निकल hi चूका है इसलिए वो बाबा क जैसे तैसे सँभालते हुए ट्रैन क गेट तक ले आता है, ताकि अगले स्टेशन पे फिर से वही सब न हो

बुद्धा- (कुंदन को देखते हुए) बड़े ग़ुस्से मैं लग रहे हो.. लगता है बीवी बच्चों से मिलनी की जल्दी है

कुंदन- (ग़ुस्से से बुड्ढे को देखते हुए) कहा से खुस दिख रहा हु, पहले hi इतनी रात हो चुकी और अब तुम्हारे चक्कर मैं..

कुंदन आगे नहीं कहता बस डाट पेश क रह जाता है, पर बुद्धा वैसे hi कुंदन की एक ब्याह पड़के उसके सहारे खड़े खड़े मुस्कुराता रहता है

"जीवन मैं जो भी होता है.. उसका एक कारन होता है, किया पता आज तुम्हारा अपने गाओं में न उतर पाना भी जरुरी हो"

कुंदन ग़ुस्से से बुड्ढे को ऐसे देखता है मानो उसे कच्चा hi खा जायेगा

बुद्धा- वैसे हो बड़े भले मनुष्य.. इस लचर बुड्ढे को अकेले नहीं छोरा, ाचा ग़ुस्सा क्यू होते है नाम तोह बता दो ?

"कुंदन"

ग़ुस्से से बहार अगले स्टेशन का इन्तिज़ार करते हुए कुंदन अपना नाम बता देता है

कुंदन की परेशानी अब बाद चुकी थी, ककी वो अचे से जनता था की ये ट्रैन यहाँ सिर्फ 2 स्टेशन पे hi रूकती है, पहला उसका गाओं 'सुंदरपुर' और दूसरा 'फुलवा गाओं' में बने स्टेशन पे

यानि अब उसे अपने गाओं क लिए उल्टा वापस आना पड़ेगा


जिसके लिए उसे पहले एक छोटे से गाओं 'सूरजमुखी' क बीच से बहने वाली नदी 'सर्प' पार करनी पड़ेगी और उसके लिए नौका का सहारा लेना पड़ता है

पर अब ये सब सोचने का कोई फायदा नहीं था.. ककी जो होना था वो हो hi चूका था

बुद्धा- (वापस अपनी चिरपरिचित मुस्कान क साथ) वैसे तुमने मेरा नाम नहीं पूछा ?

कुंदन- (चिढ़ते हुए, उसके आगे दोनों हाथ जोड़ लेता है) कोण हो बाबा.. ?

बुद्धा जोरो से है पड़ता है, फिर हस्ते हस्ते अचानक जैसे वो सुण्या मैं खो सा जाता है

"मैं कोण हु.. किया बताऊ.. अब तोह मुझे खुद भी याद नहीं, न मेरा अतीत.. न वर्तमान"

कुंदन मन hi मन कहता है

'पगला गया है बुद्धा'

फुलवा गाओं का स्टेशन भी जल्दी से आ जाता है पर हैरानी की बात थी की जो बुद्धा खुद से अब तक खड़ा भी नहीं हो प् रहा था वो खुद hi ट्रैन से उतरने लगता है

कुंदन तोह एक पल क लिए बस उसे देखता hi रह जाता है

बुद्धा- (ट्रैन से उतर से कुंदन को देखता है और मुस्कुराते हुए कहता है) चलना नहीं है.. देखो रात कितनी काली है

कुंदन अपने सर को झटक क अपनी सोच से बहार अत है और अपना पूरा सामान सँभालते हुए उस बुड्ढे क साथ स्टेशन क बहार निकल आता है.. पर हैरानी थी की वो 80-90 साल का बूढ़ा अब खुद से चल रहा था उसे किसी सहारे की जरुरत नहीं थी

कुंदन- (दूर तक फैले सन्नाटे को देखते हुए) इतनी रात गए कोनसा नाव वाला मिलेगा.. कैसे जाऊंगा अपने गाओं

फिर बुड्ढे की तरफ देखते हुए

"ऊपर से बुद्धा भी अजीब गले पद गया है"

बुद्धा जो कुंदन से कुछ कदम आगे hi चल रहा वो पीछे मुद क कुंदन को देखता है और अपने hi अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहता है

"अरे जल्दी जल्दी चलो.. बीटा"

कुंदन- (ग़ुस्से क मरे जैसे पहात hi पड़ता है) कहा चालू.. कोनसा चुटिया इस समय हमारे लिए नाम लेके नदी पे खड़ा होगा ?

बुद्धा- (मुस्कुराते हुए) क्यू तुम्हे नाव चलनी नहीं आती ?

कुंदन- सठिया गए हो किया बाबा.. मेरे पास कहा से नाव आएगी ?

बुद्धा- पर मेरे पास तोह है न

इतना hi कहता है और वो बुद्धा मुस्कुराते हुए आगे चल पड़ता है.. ये सुनते hi कुंदन का चेहरा खिल उठा है

वो अपना सारा ग़ुस्सा भूल जाता है और जल्दी से दोनों सर्प नदी क किनारे एक पुराने पेड क पास खड़े थे जहा एक पुराणी सी नाव लगी हुई थी.. जो इस समय उसी पेड से बंधी हुई थी

उस नाव को देखते hi कुंदन की जान मैं जान आती है, वो लपक क नाव का मुआयना करता है जो पूरी तरह से चलने की इस्तिथि मैं थी

कुंदन ख़ुशी ख़ुशी पीछे मुद क कहता है

"बाबा.. ये तोह बढ़िया.. बाबा.. बाबा.."

पर वह कोई था hi नहीं.. तभी कुंदन को ऐसा लगता है की जिस पेड से वो नाव बंधी थी उस पेड क ऊपर एक पल क लिए कोई लाल कपडा लहराया हो, ठीक वैसा hi जैसे उस बुड्ढे ने धारण किया हुआ था

कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आता और वो चारो तरफ देखने लगता है.. काफी समय तक वो इधर उधर जेक 'बाबा.. बाबा' चिल्लाता रहता है

पर कोई उत्तर नहीं मिलता.. ऐसा लगता है जैसे वह कभी कोई था hi नहीं

कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था इसलिए अंत मैं वो नाव को अलग करता है उसमें अपना सारा सामान रखता है और पानी मैं उतर देता है

नाव पे चढ़के वो चप्पू संभालता है और एक बार फिर से 'बाबा' कहकर चिल्लाता है पर इस बार भी वही हाल.. कोई जवाब नहीं

कुंदन तय करता है की अभी वो इस नाव से अपने गाओं जायेगा.. फिर कल दिन मैं आके ये नाव वापस कर देगा

और जल्दी hi कुंदन उस नाव पे सवार होक अपने गाओं की तरफ चल पड़ता है.. कुंदन को ऐसा लगता है जैसे उसे नाव चलने मैं कोई म्हणत hi नहीं करनी पद रही

मानो वो नाव खुद hi उसके गाओं की दिशा मैं चली जा रही हो

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कुंदन अपने गाओं क बहुत करीब आ गया था, अब वो 2 पहाड़ियों क बीच से गुजर रहा था की तभी उसे नदी क किनारे एक पेड क सहारे कुछ अटका हुआ दीखता है

अँधेरे की वजह से उसे साफ़ साफ़ समझ नहीं आता पर उसकी नाव खुद hi उस तरफ चल पड़ती है.. ऐसा लगता है जैसे वो अपनी दिशा खुद तय कर रही हो

जैसे जैसे नाव उसक चीज़ क करीब पहुंच रही थी कुंदन की साँसें जोर पकड़ने लगी थी.. पर जैसे hi पानी क बहार अटकी हुई उस चीज़ को कुंदन सही से देखता है उसकी आँखों क आगे मानो अँधेरा hi च जाता है

ककी वो चीज़ उसका बीटा मोनू था जो नदी क किनारे बेहोश हालत में उस पेड की टहनी से अटका हुआ था.. इस समय सिर्फ उसका चेहरा hi बहार था बाकि का पूरा सरीर पानी की लेहरो क साथ हिलोरे खा रहा था

मोनू का पूरा चेहरा खून से लाल हुआ पड़ा था

कुंदन एक पल की भी देरी नहीं करता और पानी मैं कूद पड़ता है

"मोनू.. मेरा बचा"

इतने लम्बे सफर की वजह से कुंदन बुरी तरह से थका हुआ था पर इस समय उसे न अपनी थकन की परवा थी न अपनी जान की

वो जल्दी जल्दी तरिता हुआ मोनू क करीब पहुँचता है

"मोनू.. उठ.. मोनू.. किया हुआ मेरे बचे को... उठ न"

कुंदन उसे पेड की टहनी से अलग करता है और वापस नाव की तरफ लेके चल पड़ता है.. पर उसे ऐसा लगता है जैसे मोनू का सरीर बहुत भरी हो, मानो कोई नीचे की तरफ उसे खींच रहा हो..

पर कुंदन हार नहीं मंटा और जल्दी hi वो मोनू को नाव पे लाने मैं कामयाब रहता है

कुंदन, मोनू क पेट पे हाथ रख क उसपे दबाव बनता है ताकि पानी को बहार निकल सके

पर इसके बाद भी कोई प्रभाव नहीं पद रहा था.. वो भायखला सा रहा था, वो मोनू को अपनी साँसे देता है

पर अभी भी फर्क नहीं पद रहा था.. कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा वो अपने बेटे क दिल की धड़कन सुनने की कोशिश है जो धीरे धीरे काम होती जा रही थी

कुंदन मोनू को सही से लिटाता है और पूरी ताक़त से नाव को संभल लेता है.. ककी उसका गंतव्य सीधा उसका गाओं था

"मुझे उस पल ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने बेटे को हमेशा हमेशा क लिए खो दूंगा"

कुंदन अपनी बात कहते हुए भावुक हो गया था.. पर मर्दो को रोने की इजाजत कहा है इसलिए कुंदन भी अपना दर्द हसी मैं ताल देता है और आगे कहता है

"फिर तोह Bhabhi-J
ाँ आप सब जानती hi है"

कुंदन अपनी बात पूरी करता है और सभी को ऐसा लगता है जैसे वो भी कुंदन क साथ साथ उस रात मैं पहुँच गए हो.. कुंदन का कहा एक एक सब्द वह उसे सुनने वाले हर किसी क आँखों क सामने किसी सजीव चित्र की तरफ चल गया था

"वैसे उस दिन हुआ किया था.. मोनू तुम्हे मिला कैसे था"

खालिद की अम्मी 'नसरीन' क पूछे गए सवाल का जवाब कुंदन ने किसी सजीव चित्रण की तरह दे दिया था

सविता- (अपने आंसुओं को पूछते हुए) इतना सब तूने आज तक हम सब से पूछा क रखा.. मन करता है एक जोर की लागू तुझे

सविता की बात सुनकर वह बैठा हर इन्शान है पड़ता है

महेंद्र अपने बचे जैसा भतीजे और उस रात वो कुंदन को कैसे नीला ये सब जान क उसे भी दर्द का एहसास होता है पर वो माहौल को थोड़ा हल्का करने की नियत से कहता है

"अरे ऐसे कैसे लगा डोंगी मेरे छोटे भाई को.. अभी उसका बड़ा भाई ज़िंदा है"

सविता कुछ कहने hi वाली होती है की कुंदन बोल पड़ता है

"देखो भैया.. मेरे और भाभी क बीच न आना, मेरी भाभी को डाटने और मरने का पूरा हक़ है"

कुंदन की बात पे वह बैठे सभी फिर से है पड़ते है

मालती भी एक तरफ बैठी अपने आंसुओ को पूछते हुए है पड़ती है.. पर साथ hi साथ वो कुछ उलझन मैं भी लग रही थी

सविता अपने पति महेंद्र को देख क महारानी जैसा मुंह बनाते हुए कहती है

"बड़े आये.. मेरे छोटे भाई वाले, अब बोलो.. बोलो"

जिसपे महेंद्र और वह सभी लोग khil-khila क हसने लगते है

खालिद की अम्मी नसरीन

"चलो भाई.. बड़ी रात हो गयी निकलते है हम सभी"

वीरू- (मज़ाक करते हुए) अरे नसरीन भाभी आज हमारे यहाँ hi रुक जाओ न

नसरीन- (वीरू को उसी अंदाज मैं जवाब देती हुई) सोच लो वीरू.. झेल पाओगे

वीरू बेचारा खिसियाहट क मरे इधर उधर देखने लगता है.. उसे समझ hi नहीं आता की जवाब किया दे

जल्दी hi सभी अपने अपने घरों की तरफ चल दिए, रात क खाने क बाद सोने का प्रभंद होने लगता है

कुंदन- (महेंद्र क पास जाते हुए) भैया.. अगर आपको और भाभी को परेशानी न हो तोह पीछे वाला कमरा हम

जब पूरा परिवार एक साथ हुआ करता था तब घर मैं पीछे वाला एक कमरा कुंदन का hi हुआ करता था

कुंदन की बात सुनते hi.. महेंद्र ख़ुशी से मानो भर उठा है, पर उसके कुछ कहने से पहले से सविता बोल पड़ती है

"उनसे किया पूछ रहा है.. तेरा कमरा है, कल सुबह hi साफ़ करवा देती हु"

महेंद्र ख़ुशी ख़ुशी अपनी पत्नी को देखता है और कुंदन क कंधे पे हाथ रखते हुए

"ये तेरा hi तोह घर है.. इसमें भला पूछना किया है"

सविता अचे से जानती थी की पुरे परिवार का फिर से साथ आना उसके लिए ाचा नहीं है.. ककी अगर ऐसा हुआ तोह वो कभी भी इस गाओं से निकलने का अपना सपना पूरा नहीं कर पायेगी

पर इस समय वो भी इन बातों की परवा नहीं कर रही थी.. वो तोह अपने पति को सालों बाद इतना खुस देख क उसी मैं खुस थी

पर वही खाने क बाद आँगन मैं एक तरफ बैठा सत्यम जरूर ये सब सुनकर कूदता जा रहा था

'बहनचोद ये भी यही रहेंगे.. ऐसे तोह ऐसी गाओं मैं फसा रहूँगा, अब तोह लगता है माँ भी किसी काम की नहीं रही'

वही घर क पिछले हिस्से मैं एक पुराने से kamre(Kothri) मैं जिसमें रज़ाई और बिस्तर रखे जाते है वह इस समय मालती और उसकी छोटी देवरानी 'हर्षिता' मौजूद थी

मालती हाथों मैं बिस्तर पड़के हुए किसी सोच मैं डूबी हुई थी

हर्षिता- किया हुआ भाभी.. कहा खो गयी, चलिए सभी को नींद आ रही है

मालती जैसे होश आती है

"अरे.. वो कुछ नहीं"

हर्षिता पियर से मालती क कंधे पे हाथ रखते हुए

"मैं जानती हु आप मोनू को लेके परेशां है.. पर देखना वो जल्दी hi उठ खड़ा होगा

और आप मुझे रोकना मत.. मैं तोह खूब डाटूंगी उसे, इतना परेशां करता है किया कोई भला"

हर्षिता क स्नेह भरे सब्दो ने मालती को बहुत हिम्मत दी, इसलिए उसके अधरों पे भी हसी आ जाती है

घर तोह वैसे काफी बड़ा है पर जब सभी भाई अलग हो गए तोह घर का पिछले हिस्सा ज्यादातर बंद कर दिया गया.. या कुछ कमरों का इस्तिमाल अनाज भरने क लिए किया जाने लगा

पर अब लगता है ये घर की रौनक वापस आने वाली है

पर अभी क लिए इस्तिथि कुछ ऐसी है की जिसे जहा जगह मिल जाती है वही अपना बिस्तर लगा लेता है

पर महेंद्र क कहे अनुसार 2 लोगो को मोनू क कमरे मैं जरूर सोना होगा

जैसे आज कुंदन और उसका छोटा भाई वीरेंदर (वीरू) सोयेंगे

बाकि.. सत्यम, सत्तू और सोनू आँगन मैं चारपाई दाल क सोने वाले है


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बाकि महेंद्र घर क बहार दरवाजे क पास अपनी चारपाई डाले हुए है

सविता, हर्षिता और शीला.. 'सविता' वाले कमरे मैं सोयेंगे

भानु अब भी रात मैं अपने घर चला जाता है सोने क लिए.. पर महेंद्र ने उससे भी कह दिया है की तुम भी यही रहा करो

जिससे सबसे ज्यादा ख़ुशी शीला को हुई थी ककी उसके और भानु क प्रेम विवाह की वजह से उसका पूरा परिवार उससे दूर हो गया था पर अब उसे लग रहा था जैसे ये एक मौका है अपने परिवार से वापस जुड़ने क

बाकि हमारी खूबसूरत मालती आज तीनो बच्चों से थोड़ा hi अलग छप्पर क नीचे अपनी चारपाई बिछा चुकी थी

जल्दी hi सभी लोग अपने अपने बिस्तर पे जा चुके थे.. कुछ तोह पड़ते hi सोने लगे थे तोह कुछ अपनी अपनी परेशानी क बारे मैं सोच रहे थे

हर किसी की ज़िन्दगी मैं उसकी अपनी एक लड़ाई होती है

पर इन सब से अलग बिस्तर पे लेती हुई मालती एक अलग उलझन मैं फांसी हुई थी.. ककी उसके पति कुंदन ने आज जो बताया उसमें एक बुड्ढे क बारे मैं भी था

कुछ कुछ वैसा hi बुद्धा जैसा उसे उस शापित कहे जाने पीपल क वृक्ष क पास मिला था और अचानक कही गायब हो गया था

मालती को ये बात बड़ी अजीब लग रही थी की जैसा बुद्धा उसे मिला ठीक वैसा hi उसके पति को.. और वो भी अचानक कही गायब हुआ जैसा उसके समय हुआ था

मालती न च क भी कड़ियों को आपस मैं जोड़ने की कोशिश कर रही थी.. तभी अचानक से मालती को उस फूल की याद आती है जो उस बुड्ढे ने उसे दिया था

मालती जल्दी से अपनी जगह से उठती है और वापस उसी कोठरी मैं जाती है जहा सरे बिस्तर, रज़ाई और बाकि सब सामान रखा हुआ था

मालती वही एक पुराणी और टूटी सी लड़की की अलमारी को खोलती है जिसमें एक छोटा सा डिब्बा जैसा था.. उसे खोलती है तोह उसे वही फूल नज़र आता है

पर हैरानी की बात तोह ये थी की इतनी दिनों बाद भी वो फूल मुरझाया नहीं था.. बल्कि अब भी उसमें से भीनी भीनी खुशबु निकल रही थी

मालती डिब्बे को वापस बंद कर देती है और खुद से कहती है

"किया इसका रास मोनू को पिलाना चाहिए"

मालती एक लम्बी सी सांस लेती है, ककी वो किसी निष्कर्ष पे नहीं पहुंच प् रही थी

इसलिए थक हार क वापस आपके अपनी चपरि पे लेत जाती है.. जहा कब उसे नींद आती है उसे भी होश नहीं रहता है

सुबह की हलकी लालिमा फैलनी सुरु हो जाती है, गाओं की महिलाएं जो रोज़ सुबह खेतों की सैर पे जाती है वो अपने अपने घर से निकल चुकी थी

सविता को भी खेतों की सैर का सौक था.. इसलिए वो भी रोज़ सुबह ऐसी समय उठती थी

वो सबसे पहले अपने पास लेती हर्षिता और शीला से पूछती है पर दोनों hi मन कर देती है

"लाइटों तुम दोनों.. तुम दोनों सुबह सुबह खेतों का मज़ा किया जानो"

हर्षिता धीरे से आँखें खोलते हुए सविता को देखती है और मुस्कुराते हुए कहती है

"आज आप करके आओ सैर.. हम बाद मैं जायेंगे"

शीला भी आँखें बंद किये हुए बस हल्का सा मुस्कुरा देती है

सविता दोनों को वैसे hi सोता चोर क अपनी साड़ी सही करती हुई आँगन मैं आती है जहा तीनो बचे गहरी नींद मैं सो रहे थे

सविता छप्पर क नीचे सोती हुई मालती क पास आके उसे उठती है

"मालती.. अरे ओह मालती.. खेत चलेगी"

मालती कुनमुनाते हुए अपनी आँखें धीरे से खोलती है

"नहीं भाभी.. आप जाओ कल नींद बड़ी दिएर से आयी"

सविता- चल ठीक है.. पर सोती न रह जाना सबके लिए नास्ता भी बनाना है.. और जरा उन दोनों महारानियो को भी ज्यादा लेना

मालती उसी प्रकार अपनी आँखों को बंद किये हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ती है और 'है' मैं सर हिला देती है

सविता पानी का लोटा भरके खेतों की तरफ चल पड़ती है

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सविता क जाने क बाद मालती वापस से सो जाती है.. सुबह की नींद कुछ होती hi ऐसी है

थोड़ी दिएर मैं मालती की नींद वापस से खुलती है और वो अंगड़ाई लेती हु जैसे hi बिस्तर से अपने पेअर नीचे रखती है उसे कुछ अजीब लगता है

और जैसे hi वो अपने पैरों की उँगलियों को देखती है उसकी बची खुची नींद एक पल मैं ुध जाती है..

ककी उसके पैरों की खूबसूरत उँगलियों पे कुछ गाड़ा चिपचिपा और सफ़ेद सा लगा हुआ था.. मालती की साँसें जोर पकड़ने लगती है उसका दिल डाक डाक का शोर करने लगता है


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मालती डरते हुए अपने पेअर को ऊपर उठती है और जब सही से देखती है तोह उसकी साँसें hi अटक जाती है.. ककी वो अचे से जान गयी थी की उसके पेअर और उनकी उँगलियों पे ये किया है

पर पक्का करने क लिए वो एक ऊँगली से उस चिपचिपी चीज़ को चुटी है तोह उसका दर सच साबित होता है.. ककी वो किसी का गाड़ा वीर्य रास था

मालती- ये.. यहाँ.. मतलब किसी ने..

मालती को कुछ समझ नहीं आता उसकी नज़रें सबसे पहले आँगन मैं सोते हुए सत्यम, सत्तू और सोनू पे hi जाती है

जिसमें वो सोते हुए सत्यम को ज्यादा hi ग़ुस्से से देखती है

"ये ऐसी का काम होगा.. मैंने hi ज्यादा मुंह लगा लिया है, हिम्मत तोह देखो इसकी"

मालती ग़ुस्से से अपना पल्लू खींचती है और उससे अपने पेअर की उँगलियों पे लगे उस गाड़े रास को पोछने hi जा रही थी की न जाने उसे किया होता है.. वो एक ऊँगली को उस रास मैं भिगोती है और धीरे से मुंह मैं रख लेती है

एक पल क लिए मालती की आँखें बंद होती चली जाती है.. मानो वो उस स्वाद को अचे से पहचान रही हो.. पर लगता नहीं वो किसी निष्कर्ष पे पहुंच पायी हो


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उसका दूसरा हाथ धीरे धीरे उसकी गॉड मैं उसकी योनि की तरफ बढ़ने लगता है.. पर जैसे hi वो अपनी योनि को चुटी है मानो उसका अंतर्मन उसे झिंझोर देता है

'पागल हो गयी.. मोनू की ऐसी हालत है और तू चींईईई'

मालती वापस धरातल पे लौट आती है और जल्दी से अपने मुंह से उस ऊँगली को निकलती है पर अब वो ऊँगली पूरी तरह साफ़ थी ककी उसपे लगी मलाई वो चाट गयी थी

मालती चारो तरफ देखते हुए अपने आप मैं अपराध बोध को महसूस कर रही थी, वो जल्दी से अपने पल्लू से अपने पेअर की उंगलियां साफ़ करती है

और लगभग भागते हुए घर क पीछे वाले नाम मात्र क बाथरूम की तरफ भाग पड़ती है


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असल मैं महेंद्र और कुंदन ने मिलकर hi इस बाथरूम को अभी क लिए बना दिया था, ताकि सभी महिलाओं को परेशानी न हो.. बाकि बाद मैं सब सही से व्यवस्था की जाएगी

इधर मालती जैसे hi पीछे वाले बाथरूम की तरफ भगति है.. उन तीनो मैं से एक धीरे से उठता है और डरते हुए धीरे धीरे उसी तरफ चल पड़ता है जहा मालती गयी हुई थी

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नष्ट अपडेट ✍️



Adultery - मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)

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अपडेट #06

किया वो.. वनराज था ?

वर्तमान की बात करने से पहले जरा वापस उसी दिन चलते है जब कुंदन को बाजार मैं 'पहलवान' मिला था

कुंदन क मन मैं बार बार यही बात आ रही थी की आज पहलवान को किया हो गया था.. आज से पहले कभी भी वो उससे ऐसे अचे से नहीं मिला न hi उसने कभी उससे ऐसे बात की

पर कुंदन बाजार क बीच यही आगे बढ़ते हुए अपने अंदर उठ रहे इन सवालों का उत्तर भी स्वंम hi दे देता है

'उस दिन जो हुआ था वो सिर्फ एक स्पर्धा थी.. कोई लड़ाई नहीं, मैं hi सायद उस दिन को लेके ज्यादा सोचा करता हु'

कुंदन आगे बढ़ते हुए एक लम्बी सांस खींचता है और अपने अंदर से आती आवाज़ को वापस से सुनने लगता है

'सायद पहलवान इतना गमंडी नहीं जितना लोग उसे समझते है.. चलो ाचा hi हुआ बुरे समय hi अचे लोगो की पहचान होती है'

कुंदन अपने अंदर पहलवान की एक अछि छवि बना चूका था.. जिस कारन उसके अधरों पे संतोषी जैसी सोभा दिखने लगती है, पर जीवन मैं सब कुछ इतना सरल कहा होता है

कुंदन जैसे hi बाजार की एक मोड़ से मुड़ता है वो किसी से टकरा जाता है

आदमी बुरी तरह लड़खड़ा जाता है वो बड़ी मुश्किल से खुद को संभल पता है ककी वो एक लाठी क सहारे चल रहा था.. इस समय अछि खासी गर्मी हो रही थी पर तब भी उसने अपने ऊपर एक मोती चादर लपेट राखी थी

"बहनचोद दीखता नहीं है की....."

कुंदन अपने hi विचारो मैं व्यस्त था और मोड़ मुड़ते hi उस आदमी से टकरा गया था.. उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वो उसके लिए माफ़ी मांगने hi वाला था की उस आदमी क मुख से निकले सब्दो और उस आवाज़ ने मानो कुंदन को एक पल क उसी जगह स्तम्भ सा कर दिया था

इधर वो आदमी बोलते बोलते hi बीच मैं रुक गया था.. ककी जैसे hi उसने कुंदन को देखा उसकी साँसे ऐसे उखाड़ने लगी मानो वो कोई धावक हो जो लम्बी दौड़ से भाग क आया हो

किस्मत से उसके चेहरे और जिस्म से वो चादर अभी हटी नहीं थी.. इसलिए वो एक पल की भी देरी नहीं करता और लंगड़ाते हुए जल्दी से भीड़ क बीच लगभग भागने सा लगता है

कुंदन मानो होश मैं लौटा हो

"वनराज.. नहीं नहीं ये संभव नहीं हो सकता.. वो तोह.."

कुंदन क पुरे जिस्म मैं ऐसा करंट दौड़ गया हो, मानो किसी ने उसके जिस्म से नंगा तार छुआ दिया हो

कुंदन बिना देरी किया उस आदमी क पीछे भागता है

"अरे भाई.. ो भाई.. सुनो तोह"

कुंदन को अब भी पूरी तरह यकीन नहीं हुआ था की 20 साल पुराण कोई आदमी यु उसके अतीत से निकल क सामने आ सकता है

"अरे भाई रुको तोह.. सुनो जरा.. "

इस समय कुंदन बाजार क बिलकुल मध्य मैं था जिस कारन भीड़ कुछ ज्यादा hi थी, कुंदन उस आदमी क पीछे भागते हुए एक बुद्धि औरत से टकरा जाता है.. जिसके हाथ मैं सब्जिया थी जो पूरी तरह इधर उधर फ़ैल जाती है

बुढ़िया- नासपीटे.. करमजले तेरे मुंह मैं कीड़े पड़े, आँखें है की बटन

अस्स पास क सभी क लोग कुंदन और उस औरत को hi देखना सुरु कर देते है

कुंदन- (जल्दी जल्दी उस औरत की सब्जियों को उठाते हुए) माफ़ करना अम्मा जल्दी मैं था.. देख नहीं पाया

पर इतना समय उस अनजान आदमी क लिए काफी था वह से निकल भागने क लिए.. बाद मैं कुंदन उस आदमी को ढूंढ़ता भी है पर उसे वो कही नहीं दीखता

कुंदन- (बाजार मैं हर तरफ उस आदमी को ढूंढ़ने क बाद) उसकी आवाज़ मुझे उस कुत्ते वनराज की याद दिला रही है, पर वो तोह सालों पहले गाओं से भाग गया था.. वो भला वापस आने की गलती क्यू करेगा ?

कुंदन अपनी सोच मैं डब्बा आगे बढ़ता चलता है.. पर अचानक जैसे उसका पूरा जिस्म पसीने से भीग जाता है, उसके पेअर जहा थे वही क वही थम से जाते है

"अगर वो सच मैं वनराज हुआ तोह... कही मेरे मोनू क साथ जो हुआ उसके पीछे वही तोह नहीं ?"


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~~°~~

चलिए अब वापस आज मैं लौट आते है.. ✍️

मालती को उसके जिस्म मैं बढ़ती हुई गर्मी का एहसास होने लगा था.. वही उसका अंतर्मन बार बार उसको झिंझोर रहा था

'शर्म नहीं आती तुझे.. तेरे जिस्म मैं ये गर्मी किस बात की है, भूल गयी तेरा बीटा मौत से लड़ रहा है'

मालती को खुद पे घिन से आने लगती है वो खुद को दोष देना सुरु कर देती है

'साडी गलती मेरी है.. ये सब मेरे पाप की वजह से hi हुआ है, एक माँ होक मैंने अपनी hi बेटे क साथ अंतरंग सम्बन्ध बनाये.. चींईईई कैसी नीच माँ हु मैं'

एक पल क लिए मालती की आँखों मैं आँशु भर आये थे जिसे उसने अपने पल्लू से पाउच लिया और घर क पीछे बने उस नाम मात्र क बाथरूम मैं अंदर घुस गयी, जहा पहले से hi बाल्टी मैं भरा हुआ था

मालती ने दोनों हाथों में पानी भरा और अपने खूबसूरत चेहरे पे मरते हुए अपनी नींद और अपने विचारों को भागने की भरकश कोशिश करने लगी

"उफ्फ्फ्फ़.. ये सब पक्का सत्यम ने hi किया होगा, और कोण हो सकता है भला ?"

मालती खुद से ये कहते हुए वापस पानी क छींटे अपने चेहरे पे मरने लगती है और फिर कड़ी होक वही बाथरूम मैं एक तरफ लटक रही टॉवल को उठा लेती है पर जैसे hi वो उसे अपने चेहरे क करीब आती है एक भीनी भीनी अनोखी सी सुगंध उसके जिस्म मैं भरने लगती है.. और हमारी खूबसूरत मालती की आँखें पूरी तरह फ़ैल जाती है

वो जल्दी से टॉवल को दूर करती है और उसे पूरी तरह फैला क देखने लगती है तोह उसकी हैरानी और ज्यादा बाद जाती है ककी किसी ने उस टॉवल क साथ भी वही किया था जो उसके पैरों का किया था

यानी उस टॉवल मैं भी गाड़ा वीर्य दीखता है.. जो लगभग पूरी hi टॉवल मैं कई जगह लगा हुआ था

और उसकी तीव्र गांड मालती की साँसों क साथ उसके जिस्म क हर कोने मैंने जाने लगती थी.. और अभी अभी जो औरत अपने अपराध बोध से परेशां थी अब उसे पैरों क बीच कुछ सीलन सी महसूस होने लगती है


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"चीई... पागल हो गया है ये लड़का, ये सब.. चीई अगर कही कोई मुझसे पहले यहाँ आ जाता तोह"

मालती उस टॉवल को एक तरफ रखने लगती है पर उसके जिस्म मैं बढ़ती गर्मी उसे ऐसा करने से रोक रही थी

"किया सत्यम मेरे लिए इस हद तक चला गया होगा.. की उसने मेरी याद मैं.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ कैसे समझौ इस लड़के को"

मालती धीरे से बाथरूम का दरवाजा जो उसने अंदर से बंद किया हुआ था उसे चेक करती है की कही वो खुला तोह नहीं है और फिर अपने धक् धक् करते दिल और जोर होती धड़कनों क साथ उस टॉवल को अपने चेहरे क बिलकुल करीब ले आती है जिससे उसके अनोखी खुसबू अब पूरी तरह मालती की साँसों का हिस्सा बनने लगी थी

न च क भी मालती का दूसरा हाथ नीचे की तरफ सरकने लगता है और जल्दी hi वो उसके पैरों क बीच था.. मालती अपने हाथ से अपनी गीली होती योनि को दबोच लेती है

"Aaaaaaaaaahhhhh.... सत्यम बीटा, तू क्यू मुझे मजबूर कर रहा है... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... संनननननफफ्फहहहहहह"

मालती एक तेज़ सांस खींचती है जिससे उस टॉवल मैं छुपी हुई खुसबू उसके जिस्म मैं बिजली दौड़ा देती है

मालती जैसे पूरी तरह किसी क सम्मोहन मैं कैद हो चुकी हो.. कमसे काम उसे देख क तोह ऐसा hi प्रतीत हो रहा है इस समय

वो वापस से टॉवल को दोनों हाथों से पकड़ती है और एक खास जगह जहा सबसे ज्यादा गाडी मलाई लगी हुई थी उस जगह को भरपूर देखती है और अगले hi पल उसकी जीभ निकल क उस जगह चलने लगती है

इधर बाथरूम क पिछले हिस्से मैं कोई खड़ा हुआ था जिसके हाथ मैं उसका मजबूत खिलौना मचल रहा था

वो मन hi मन

'आआअह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ.... मालती चची.... आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... मेरा भी पानी ऐसे hi छतो न..'

इधर अंदर मालती इस बात से बेखबर थी की कोई उसकी जासूसी कर रहा है वो तोह अपनी गर्मी क आगे हतियार डालने लगी थी

मालती अपनी खूबसूरत सी जीभ बहार निकल क टॉवल मैं लगी हुई गाडी और ताज़ा मलाई को चेतना सुरु कर देती है

"सललललररररररपपपप.... Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmm"

मालती का जिस्म कामुकता की अधिकता क कारन काँप रहा था और टॉवल को अपने पुरे मुंह पे रख क ऐसे मलना सुरु कर देती है मानो मुंह धुलने क बाद जैसे कोई अपना चेहरा पॉंच रहा हो

और वापस फिर से मालती का दूसरा हाथ उसके पैरों क दरमियान आ जाता है पर इस बार हाथों मैं तेज़ी थी ककी वो जोर जोर से अपने हाथ से साड़ी क ऊपर से hi अपनी गीली योनि को मसल रही थी

"आआआह्ह्ह्ह.... सत्यम तू ये सब कैसा पाप करवा रहा है मुझसे... आआआआअह्ह्ह्ह... कमीने कहा फसा दिया.. ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... संनननननफफ्फहहहहहह"

इधर बहार चुप क मालती की कामुक हरकतों का गवाह ये सब देखते और सुनते हुए अब इसको साबुत मैं बदलने लगा था..

ककी उसके एक हाथ मैं इस समय उसका मचलता हुआ लुंड था जो जवानी का खेल खेलने क लिए पूरी तरह बेताब था

वही दूसरे हाथ मैं उसका मोबाइल जिसमें अब वीडियो रिकॉर्डिंग सुरु हो चुकी थी

इधर मालती पूरी तरह पागल होती जा रही थी वो कभी अपनी योनि को जोर जोर से मसलती तोह कभी दोनों हाथों से उस टॉवल को फैला क देखती और जहा उसे गाडी मलाई नज़र आती वही उसकी जीभ चलने लगती

इस समय मालती का हाल ठीक वैसा hi थी जैसा उस रात था.. जब उसने अपने hi सेज बेटे क साथ गंदे रिश्ते बनाये थे


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पर उस रात की लज्जत वो कभी भूल नहीं सकीय थी..

मालती टॉवल को पूरी तरह छत्त छत्त क साफ़ कर चुकी थी अब उसमें उसके लिए कुछ भी नहीं बचा था इसलिए वो उसे वही जमीन पे दाल देती है

और उसके अंदर की गर्मी का बढ़ता हुआ पारा किस हद तक उसे परेशां कर रहा है इसका सबूत था की वो जल्दी जल्दी अपनी साड़ी को खोलना सुरु कर चुकी थी

"कमीने कुत्ते सत्यम.. मैं छोडूंगी नहीं तुझे, ये सब किया करवा रहा है"

आज मालती क साथ जो हो रहा है.. या सही कहा जाये तोह वो खुद कर रही है, वो उसके लिए सत्यम को जिम्मेदार ठहरा रही थी

मालती जल्दी से अपनी साड़ी को अपने जिस्म से अलग कर देती है अब वो एक साये मैं कड़ी थी और इतना नज़ारा hi काफी था बहार खड़े उस साक्ष क लिए ककी ये नज़ारा देखते hi उसके लुंड से गाडी पिचकारी फुट पड़ती है जो बाथरूम की दिवार का रंग बदलना सुरु कर चुकी थी


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लुंड से निकलते लावे की वजह से उसकी आँखें बंद हो जाती है पर उसका हाथ निरंतर उसके लुंड पे चलता रहता है और वीडियो रिकॉर्डिंग का काम भी जारी था

यानि उसके मोबाइल मैं बाथरूम क अंदर का पूरा नज़ारा कैद हो रहा था

"आआआअह्ह्ह्ह................."

अचानक उस इन्शान को एक कामुक आआआह सुनाई पड़ती है जिससे उसकी आँखें वापस से खुल जाती है

पर हैरानी की बात थी अभी अभी उसके लुंड से इतना गाड़ा रास निकला है पर फिर भी सिर्फ मालती की इस एक आअह्ह्ह की वजह से उसके नाग ने फिर से जागना सुरु कर दिया था

कुछ तोह बात है हमारी मालती मैं...


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पर इस बार जब वो बाथरूम मैं बने उसे छेद से अंदर देखता है तोह खेल बहुत आगे बाद चूका था

मालती क जिस्म से उसका साया और ब्रा पेंटी तक उतर चुकी थी.. और इस बात का अंदाजा उसके मालती क खूबसूरत पैरों क पास पड़ी ब्रा पेंटी और साये से hi लगाया था

'आआअह्ह्ह्ह... चची क पेअर कितने खूबसूरत है.. दिल करता है पुरे छत्त छत्त क खा जाऊ'

उस इन्शान की आँखें जिसमें इस समय हवस क लाल डोरे नाच रहे थे.. वो मालती क पैरो से होती हुई ऊपर की तरफ बढ़ती है और जल्दी hi उसे मालती क पैरो क बीच हाथ नज़र आता है

जिसकी 2 उँगलियाँ इस समय तेज़ी से खूबसूरत और बेहद कामुक मालती की योनि अंदर चल रही थी

"आआआआअह्ह्ह्ह..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह..... Ufffffffffff.... आआआआअह्ह्ह्ह..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

मालती पूरी तरह मादरजात नंगी अवस्था मैं बाथरूम क अंदर कड़ी होक अपनी योनि मैं गपागप गपागप गपागप करके अपनी उँगलियों को चला रही थी

ऐसा नज़ारा देख क उसका किया किसी का भी लुंड खड़ा हो जाये.. आखिर ये मालती है

बाथरूम क छेद से ये नज़ारा देखते हुए उस इन्शान का हाथ वापस से उसके लुंड पे चलना सुरु हो जाता है, पर दूसरे हाथ मैं थमा उसका मोबाइल अपनी सही जगह पे जमा हुआ था जिसमें हर एक सन पूरी तरह कैद होता जा रहा था.. और बेचारी मालती को इसकी खबर तक नहीं थी

मालती का जिस्म जोरो से कांपने लगता है.. वो जल्दी से अपना एक हाथ बाथरूम की दिवार पे टिका लेती है

"Aaaaaaaaaaaahhhh..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... Maaaaaaaaaaaaaa..... आआआआअह्हह्ह्ह्हह"

मालती का खूबसूरत जिस्म पूरी तरह अकड़ना सुरु हो जाता है वो वही बाथरूम क एक कोने मैं बैठ जाती है और दोनों टैंगो को पूरी तरह फैला लेती है

पर इस प्रक्रिया मैं उसने एक पल क लिए भी अपनी उँगलियों को बहार नहीं निकला था.. पर अब वो योनि क अंदर उँगलियों को घुसाने क अलावा भी कभी कभी बस बहार से अपनी गीली छूट को रगड़ भी रही थी


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पूरी सिद्दत क साथ वो खुद अपनी योनि का छोडन कर रही थी.. आत्मनिर्भर नारी

"आआअह्ह्ह्हह.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़..... आआआआअह्ह्ह्ह"

मालती जोर जोर से अपनी योनि मैं अपनी 2 उँगलियों को अंदर तक घुसा क बहार निकलती और फिर वापस पूरी गति से अंदर घुसा लेती है.. खेल पूरी तेज़ी से चल रहा था

उसका काँपता हुआ जिस्म बाथरूम की दिवार क सहारे लगा हुआ था और उसके अपने इस खास कार्यक्रम की वजह से उसकी दोनों नंगी बड़ी बड़ी चूचियों जो किसी तरबूज जैसी प्रतीत हो रही थी.. पूरी गति से हिलोरे मार रही थी

"आआआह्ह्ह्ह.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह..... उफ्फफ्फ्फ़..... आआअह्ह्ह्ह.... हैईईई..... रईईई......"

मालती क जिस्म की गर्मी निरंतर बाद रही थी, ककी अब उसके अपना दूसरा हाथ अपनी हिलती मोती दुधारू चूचियों पे रख क उन्हें स्वंम hi दबाना और मसलना सुरु कर दिया था

एक खूबसूरत नारी पूरी तरह नंगी अवस्था मैं बाथरूम क अंदर अपनी योनि और चूचियों से खेल रही है.. भला ऐसा नज़ारा देख क किसका लुंड अपना रास नहीं चोर देगा

यही हाल उसका भी हुआ तोह ये सब चुप क देख रहा था.. और उसकी फिल्म भी बना रहा था

एक बार फिर से उसका लुंड अपना गाड़ा रास बहाने लगता है.. बेचारे का पूरा जिस्म थक चूका था और काँप रहा था उसके लिए खड़ा होना भी मुश्किल होता जा रहा था पर वो अपना काम पूरी म्हणत से कर रहा था

'आआआअह्ह्ह.... चची.. लाओ मैं अपनी छूट छत्त लू, आप क्यू मेहनत कर रही हो... आआआह'

इधर अंदर मालती का जिस्म भी पसीने मैं भीग चूका था उसका हाथ दर्द करने लगा था.. वो अपने हाथों की गति को जरा भी काम नहीं कर रही थी

"आआआआहहहहह.... Maaaaaaaaaa..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह..... उफ्फ्फफ्फ्फ़... हैईईई... रईईईईई"

मालती की दोनों टंगे फ़ैल जाती है और पूरी तरह सीधी होक अकड़ जाती है उसका जिस्म ऊपर की तरफ तन जाता है और उसकी योनि से चिपचिपा प्राधारत भर भरा क बहन सुरु हो जाता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh............"

मालती पूरी तरह ठंडी हो जाती है वो अपनी योनि से अपनी उंगलिया निकलती है तोह काफी सारा गाड़ा रास बहार बहने लगता है.. जिसे देख क वो इन्शान एक बार फिर से उमंग से भर जाता है

मालती आँखों को बंद किये ऐसे hi पड़ी हुई लम्बी लम्बी साँसें लेने लगती है

'लगता है चची का खेल ख़तम हो चूका है'

वो इन्शान मुस्कुराते हुए अपने मोबाइल की रिकॉर्डिंग बंद करता है और चुपचाप बिना किसी आवाज़ क वह से वापस अपनी चारपाई पे आके लेत जाता है.. पर उससे पहले वो पक्का कर लेता है की सत्तू अब भी सो रहा है न

वो जल्दी से अपना मोबाइल अपनी तकिया क नीचे खिसकता है और अपनी बगल वाली चारपाई पे लेते हुए सत्यम को धीरे से आवाज़ देता है

"सत्यम भैया.. भैया"

सत्यम मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी आँखें खोलता है और अपने और अपने बड़े भाई सत्तू क बीच चारपाई पे लेते हुए 'सोनू' को देख क मुस्कुरा क कहता है

"मज़ा आया...."

सोनू शर्मा जाता है

सत्यम- (धीमी आवाज़ मैं) साले अब शर्मा रहा है बता न किया किया देखा ?

सोनू- (मुस्कुराते हुए) सब कुछ.. आपकी वजह से hi तोह सब संभव हुआ

सत्यम- (कुटिल मुस्कान क साथ) अगर मेरे हिसाब से चलेगा तोह बहुत कुछ मिलेगा.. ये तोह बस छोटा सा ट्रेलर है

सोनू- (जल्दी से) है है.. भैया आप जैसा कहोगे मैं वैसा hi करूँगा

सत्यम- शाब्बाश अब ये हुई न बात.. चल अब सो जा, हिला हिला क थक गया होगा

सत्यम अपनी बात कहते हुए है पड़ता है.. जिसपे बेचारे सोनू शर्म से लाल हो जाता है

सोनू- (अपने बिस्तर पे जैसे hi लेटता है उसके मन मैं एक सवाल उठता है और वो वापस से सत्यम को आवाज़ देके उससे पूछता है) वैसे भैया.. आपको कैसे पता की मालती चची ग़ुस्सा नहीं करेंगी, मुझे तोह दर लग रहा था जब आप उनके पैरों पे अपना पानी निकल रहे थे और फिर बाथरूम मैं भी टॉवल गन्दी कर दी आपने

सोनू अपनी बात कहते हुए थोड़ा है पड़ता है

सत्यम- (अपने दोनों हाथों को अपने सर क नीचे रखते हुए.. पुरे घमंड से) बीटा अभी तू बचा है, तू बस वही कर जो मैं कहता हु.. फिर देख तुझे कैसे असली मज़ा दिलवाता हु

सोनू किसी गुलाम की तरह

"जी.. भैया अबसे आज जो कहोगे मैं वही करूँगा"

सत्यम मुस्कुराते हुए

"चल अब सो जा.."

सत्यम वापस अपनी आँखें बंद कर लेता है इधर सोनू भी धीरे से सत्यम की बंद आँखों को देखता है और चुपके से अपना एक हाथ अपनी तकिया क नीचे ले जेक अपनी मोबाइल को चेक करता है

सोनू मन hi मन

'सत्यम भैया को इस मोबाइल रिकॉर्डिंग क बारे मैं कुछ नहीं बताऊंगा... वैसे सच मैं आज तक मैंने मालती चची जैसी खूबसूरत औरत नहीं देखि'

सत्यम और सोनू को जल्दी hi वापस नींद आ जाती है ककी दोनों hi सुबह 3 बजे उठ गए थे अपने खेल को सुरु करने क लिए

दोनों क सोने क करीब 5 मं बाद hi सविता वाले कमरे से हर्षिता अपनी नींद से भोझिल आँखों क साथ बहार आती है

अपने बालों को सही करते हुए वो तीनो बच्चों की चारपाई क पास से आगे गुजरती है और अपने बेटे सोनू को देख क उसे उसपे स्नेह आने लगता है

हर्षिता 'सोनू' की चारपाई क पास जेक उसके सलोने से चेहरे को देख क उसकी बालाएं लेते हुए कहती है

"कितना भोला है मेरा बचा.. ऐसे किसी की गन्दी नज़र न लगे"

वो कहते है हर माँ को उसका बचा शरीफ hi लगता है.. पर उन्हें को बताये

गंगाधर hi शक्तिमान है

ऐसी दिन सुबह क करीब 10 बजे ✍️

महेंद्र क घर क बहार थोड़ी hi दूर पे एक कार कड़ी थी.. जिसमें बैठा हुआ इन्शान सुबह क करीब 10 बजे hi पीना सुरु कर चूका था

उसके एक हाथ मैं सिग्रेटे और दूसरे मैं 🍺 बियर का चैने था, दोनों का बरी बरी मज़ा लेते हुए वो इस समय महेंद्र क घर पे नज़रें जमाये हुए थे

सिग्रेटे का एक लम्बा काश लेते हुए

"इस गाओं मैं जो भी हो रहा है.. उसके तार कही न कही इस घर से भी जुड़े है"

वो महेंद्र क घर की तरफ देख hi रहा था की तभी एक औरत अंदर से आती है और उसके हाथों मैं झाड़ू थमा हुआ था

वो अपने पल्लू को अपनी कमर मैं घुसती है.. उसकी इस एक ऐडा ने कार मैं बैठे हुए इन्शान का पूरा धियान अपनी तरफ खींच लिया था

"किया सॉलिड माल है.. मिया 'रॉकी' अगर ये हाथ लग जाये तोह इस गाओं मैं दिन काटने मैं मुश्किल नहीं होगी"

जी है ये वही रॉकी था जिसका जिक्र सत्यम ने अपनी माँ से किया था.. और पुलिस हेडक्वार्टर मैं खान और यादव कर रहे थे

रॉकी तुरंत hi अपनी सिगेरट को दूर फेकता है और अपनी सीट क बगल hi राखी हुई दूरबीन (बिनोकुलर्स) को उठा क अपनी आँखों से लगा लेता है

जिससे वो औरत जो अब झुक क झाड़ू लगाने मैं व्यस्त हो चुकी थी.. वो रॉकी की आँखों क बिलकुल करीब आ चुकी थी, इतनी की रॉकी का मन उसे चुने का करने लगा था

रॉक अपनी बियर की चैने को अपने लुंड पे रख क उभरते हुए नाग को दबाते हुए

"आआह्ह्ह... साली किया माल है, आज तक ऐसा हुस्न नहीं देखा

किया कैसा हुआ जिस्म है.. और ये इसके कठोर कबूतर, सालों को एक साथ दोनों हाथों से दबाना पड़ेगा"

रॉकी अपने बिनोकुलर्स को थोड़ा और एडजस्ट करता है.. जिससे अब पूरा फोकस उस हसीं जिस्म वाली औरत की उन्नत चूचियों क बीच आ चूका था


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"वूऊऊ.. यार सच मैं कहा छुपी हुई थी ये हुस्न की देवी"

रॉकी का लुंड जोर से उछाल मरने लगा था पर रॉकी उसे अपनी ठंडी बियर क चैने से नीचे दबाता रहता है, जिससे एक अलग hi अनोखा आनंद उसे मिल रहा था

वही वो खूबसूरत औरत रॉकी की उपस्थिति से पूरी तरह अनभिग अपने कार्य मैं व्यस्त थी.. पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें उसके उरोजों पे किसी मोती सामान नज़र आने लगी थी

जो इस समय रॉकी को बिनोकुलर्स की वजह से कुछ ज्यादा hi पास और साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी

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रॉक अपने बियर चैने से अपने लुंड को ज्यादा जोर से दबाते हुए

"आआआहहह.. इतनी बंदियों को नंगा देखा है, पर जो मज़ा ऐसे साड़ी मैं देख क आ रहा है उसकी बात hi अलग है"

तभी महेंद्र क घर का दरवाजा खुलता है और एक भरे जिस्म की महिला दरवाजे पे कड़ी होक जोर से आवाज़ देते हुए कहती है

"मालती.. मालती, झाड़ू बाद मैं लगाना चल अंदर आ.. पूरा घर सही करना है ताकि सभी क सोने की सही से व्यस्था हो सके"

घर क बहार कच्ची सड़क क पास अपनी कार मैं बैठा रॉकी अपनी बियर चैने की ठंडक अपने लुंड तक पहुंचते हुए

"मालती.. बिलकुल सही नाम है, सच में माल है"

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की ये जादू लगाने वाली खूबसूरत औरत कोण थी

मालती अपना पल्लू निकल क अपने पसीने को पूछते हुए घर क अंदर चल पड़ती है

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"भानु अब तुम्हे म्हणत करने की जरुरत.. आअह्ह्ह्ह... जरुरत नहीं है, मेरी पत्नी है न... आआअह्ह्ह्हह"

नष्ट अपडेट ✍️

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जोर जोर से अपने लुंड को हिलाते हुए.. सायद उसका अंतिम समय निकट था

"आआअह्ह्ह्हह... मुझे पूरा भरोषा है.. आआह्ह्ह... तुम ऐसे संभल सकती हो.. आआअह्हह्ह्ह्ह.. तुम मेरी पत्नी हो..."

नष्ट अपडेट ✍️


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1 महीने क अंदर hi 1 लाख व्यूज क लिए सभी का दिल से धन्यवाद् 🙏

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अपडेट #07

पुष्प.. किया ये कुछ खास है ?

सुंदरपुर गाओं से दूर दिल्ली जैसे बड़े सेहर मैं दिन क करीब 3 बजे

2 भुजंग नाग जैसे काले आदमी जिनको देख क hi मालूम पद रहा था की वो अचे इन्शानो की गिनती मैं नहीं आते है.. वो एक घर क बहार खड़े थे

दोनों एक दूसरे को देखते है और फिर इधर उधर देख क पक्का करने लगते है की किसी का धियान इस समय उनपे तोह नहीं

वैसे भी बड़े सेहरो की बड़ी परेशानी है.. यहाँ दिन क वक़्त आदमी अपने घरों क बहार निकलना पसंद hi नहीं करता है, बल्कि आज कल हालत तोह ऐसे है की अगर पड़ोस मैं कुछ हो भी जाये तोह पडोसी को कुछ पता तक न चले

उन दोनों मैं से एक इधर उधर देखते हुए

"हीरा भैया.. मुंबई से यहाँ दिल्ली हम सिर्फ इस औरत से मिलने आये है ?"

हीरा नाम का वो आदमी जो अपने छोटे भाई 'पन्ना' को देखते हुए कहता है

"छोटे.. अभी हमे सिर्फ उतना hi करना है, जितना 'भानु भाई' हमे करने को कहते है"

वैसे अगर इन दोनों भाइयों की उम्र की बात की जाये तोह बड़ा भाई यानि 'हीरा' 50 क लपेटे मैं है वही छोटा यानि 'पन्ना' 45 क अस्स पास कुछ है

बाकि दोनों का जिस्म बिलकुल एक जैसा भरा और तगड़ा है.. देखने से hi गुंडे मावली नज़र आते है

आसान भासा मैं अगर लिखू तोह यु समझो.. सांड को इन्शान बनाया जा रहा था पर बीच मैं hi रोक दिया गया

बस यही एक परिभाषा है जो इन दोनों भाइयों क ऊपर बिलकुल सही जमती है

पन्ना- वैसे भैया.. अचानक 'भानु भाई' क पास इतना पैसा और माल कहा से गया ?

हीरा- (अपनी नाक को खुजाते हुए) पता नहीं.. पर ऐसा लगता है की भानु कोई बड़ा खेल रच रहा है, और इसमें वो अकेला नहीं है

पन्ना- सही कहा भैया.. वर्ण इतना सॉलिड माल उन्हें कहा से मिलता, मैं मुंबई मैं चेक करवाया था 1 नंबर का माल था

हीरा- इसीलिए कह रहा हु.. हमे इस चक्कर मैं नहीं पड़ना है, बस भानु जितना कहता है चुपचाप वो करते जाना है.. समझे

हीरा अपने भाई की तरफ देखते हुए पक्के इरादे से कहता है

जिसपे पन्ना भी है मैं सर हिला देता है.. पर अगले hi पल वो सवाल भी करता है

"वैसे हम यहाँ करने किया आये है ?"

हीरा- (याद दिलाते हुए) एक औरत से मिलने

पन्ना- औरत... कोण?

हीरा अपना हाथ आगे बड़ा क दूर बेल्ल 🔔 बजाते हुए, अपने छोटे भाई पन्ना को देखते हुए हल्का सा मुस्कुरा पड़ता है और कहता है

"प्रेमलता"

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~•~

मालती बुरी तरह हाफ रही थी, साँसें ऐसे भाग रही थी मानो मीलो भाग क आयी हो.. जिस्म का एक एक हिस्सा दर्द कर रहा था

सरीर पे जगह जगह जख्मों क निशान थे जिनसे खून लगातार बेहटा जा रहा था, जिसके कारन मालती क ऊपर थकन हावी होने लगी थी

सर्प नदी क किनारे कड़ी मालती.. ठन्डे पानी क ऊपर बहती हवा भी इस समय उसे अछि नहीं लग रही थी

पर उसके इरादे कमजोर नहीं थे.. और हाथ मैं थमी कुल्हाड़ी क बल खुद को सँभालते हुए कड़ी होती है और अपने सामने खड़े इन्शान को देख क ग़ुस्से से फुफकार उठती है

"जब तक मैं ज़िंदा हु.. तू मेरे बचे का कुछ नहीं बिगड़ सकता"

सामने खड़ा आदमी जिसका पूरा चेहरा खून से सना हुआ था.. उसके सरीर पे भी मालती क दिए हुए जख्मों क निशान उसकी बढ़ती हुई हार की तरफ इशारा कर रहे थे

"तू बस एक औरत है.. तुझे लगता है तू मेरा कुछ बिगड़ पायेगी"

मालती दर्द से तरप जरूर रही थी पर फिर भी उसके अधरों पे मुस्कान खेल गयी

"बस एक औरत.. तू किसकी खोख से निकला है ?"


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मालती ने जैसे उसके साथ व्यंग किया हो

आदमी- तुझे लगता है, तू मुझे अपनी बातों मैं फसा क अपने बेटे की बची हुई साँसें कमा लेगी

उस आदमी क इन सब्दो ने जैसे मालती को लहूलुहान कर दिया हो, मालती अपने पीछे जमीन पे रेंगते मोनू को देखती है.. जो पूरी तरह खून मैं सना हुआ था

पर जैसे hi मालती वापस पलटती है.. उस साक्ष ने उसपे वार कर दिया, पर मालती मैं कुछ तोह अलग था

उसने अंतिम समय पे अपनी कुल्हाड़ी से उसकी तलवार का वार न सिर्फ रोका.. बल्कि उसके मरदाना सीने पे अपने पेअर से जोर का वार भी किया

"Aaaaaaaaaahhhhh..... साललीईई.... हरामजादी"

वो आदमी किसी हलाल होते बकरे जैसे चीख पड़ा और कुछ कदम पीछे जेक गिर पड़ा

"साली आज तोह तू मारेगी.. तुझे कोई नहीं बचा पायेगा, और न तेरे इस सपोले को"

वो वापस खड़ा होता है, ककी इरादे उसके भी कमजोर नहीं थे.. इस बार वो अपनी पूरी इच्छाशक्ति को समेत क अपनी तलवार का जोरदार वार मालती क ऊपर करता है

जिसे मालती ने अपनी कुल्हाड़ी से रोकने की पूरी कोशिश की पर वो कामयाब नहीं हुई, और एक माँ को कुछ कदम पीछे जाना पड़ा

मालती बुरी तरह थक चुकी थी.. पर जब वो अपने बेटे को देखती है, जिसकी अंतिम साँसें टूटने लगी थी

वो वापस कड़ी होने की कोशिश करती है.. पर गिर पड़ती है

"आआआहहहहह......... माआआ"

आदमी- (जोरो से हस्ते हुए) हाहाहाहा.. तू मुझे रोकने चली थी, आज मैं अपने परिवार क हर इन्शान का बदला लूंगा

इस एक पल क लिए मालती को ऐसा लगता है जैसे वो सच मैं ये जुंग हारने वाली हो.. पर तभी उसके कानो मैं सुकून देने वाले सब्द गूंज जाते है

"उठो बेटी.. तुम अकेली नहीं है, तुम्हारे साथ पूरी सेना है"

मालती को कुछ समझ नहीं आता.. वो आवाज़ की डिश मेज देखती है तोह एक ुचे पत्थर पे उसे वही बुद्धा नज़र आता.. वो भी उन्ही लाल वस्त्रो मैं

"किया हुआ.. मौत आयी तोह दिमाग काम करना बाद कर दिया किया ?"

मालती को समाज नहीं अत कुछ.. किया अभी अभी ये वाणी सिर्फ उसने सुनी है

पर वो इन्शान इस बात की परवा नहीं करता और अपनी तलवार उठाये आगे बड़के अंतिम वार करने की तैयारी कर लेता है

मालती की आँखों मैं आंसू आ जाते है.. सायद एक माँ आज हार जाएगी

पर वो है न.. रावण को हनुमान जी अकेले ख़तम कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा किया नहीं.. बल्कि वो भी वानर सेना का हिस्सा बने

मालती की गर्दन और उस इन्शान की तलवार क बीच बस कुछ दुरी hi बची होगी, की तभी पूरा वातावरण तेज़ स्वर से दोल पड़ा

वो दर सा गया था और एक कदम पीछे होक जब देखता है तोह स्तब्ध रह जाता है

ककी सामने से मालती की सेना दौड़ी चली आ रही थी.. किसी क हाथ मैं लाठी, तोह कोई हसिया लिए हुए था

इस सेना मैं औरत मर्द दोनों थे.. और सबसे आगे थी...

"आआह्ह्ह्हह.... ये... ये"

यही वो पल था जब मालती की आँख खुल जाती है, वो चारो तरफ देखती है पर वह कोई होता तब न दीखता

मालती को अपनी इस्तिथि का ेशास होता है, वो इस समय अपने बेटे मोनू क पास बैठी हुई थी.. और कब यही बैठे बैठे उसे नींद आ गयी उसे पता hi नहीं चला

"ये कैसा अजीब सपना था.. ऐसा क्यू लग रहा है जैसे ये कोई चेतावनी हो"

मालती को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, पर असली बात तोह ये थी की अभी अभी जो सपना उसने देखा उसमें से उसे बस 2 चेहरे hi याद थे

पहली वही रहस्य्मय बुद्धा.. लाल वस्त्रो वाला

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और दूसरा वो औरत जो उस सेना या भीड़ मैं सबसे आगे थी

मालती की आँखों मैं आंसू भरे हुए थे.. सायद ये उसकी ममता थी

मालती पियर से अपने बेटे क सर पे हाथ फिरती है और फिर अगले hi पल वो कमरे से निकल जाती है

पर इसमें ज्यादा समय नस्ट नहीं होता.. ककी जल्दी hi वो वापस अपने बेटे क पास कड़ी थी, पर इस बार उसके हाथों मैं वही पुष्प था जो उसी बुड्ढे ने उसे दिया था


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मालती बिना विलम्ब क उस फूल को अपने पल्लू क सिरे मैं रखती है और उसे अपने बेटे क होंठों क पास लेक दबा देती है

उस फूल से एक बून्द रास निकलता है.. जो मालती की साड़ी से होता हुआ मोनू क मुख मैं समय जाता है

मालती अपनी साँसें थामे हुए कुछ पल यही कड़ी रहती है.. पर मोनू की इस्तिथि मैं कोई बदलाव नहीं आता

अंततः अपनी सोच को गलत समझ क मालती मायुशि क साथ कमरे से जैसे hi बहार आती है उसे सविता नज़र आती है.. और इससे पहले की वो कुछ बोल पाती सविता कहना सुरु कर देती है

"शाम होने को है.. और तूने कुछ भी नहीं खाया है, ऐसे तोह बीमार पद जाएगी.. चल पहले कुछ..."

सविता अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाती.. उससे पहले hi मालती लपक क सविता क गले लग जाती है

सविता को कुछ भी समझ नहीं आता.. वो पियर से मालती क सर को सेहलते हुए

"तू फ़िक्र क्यू करती है, हमारा मोनू जरूर ठीक है.. अरे इतने बड़े बड़े डॉक्टर है आज कल

और अगर उनसे भी कुछ नहीं हुआ तोह मैं बड़े बड़े बाबा, तांत्रिक.. वैद क पास जाउंगी.. कुछ नहीं होगा.. हमारे...."

सविता भी अपनी बात पूरी नहीं कर पाती उसकी आँखों मैं भी आंसू भर आये थे

दोनों hi कुछ नहीं बोलते बस यही कुछ पलों तक एक दूसरे को संभालती रहती है.. और जब अलग होते है तोह मालती 'सविता' को बस निहारती है

सविता- (हस्ते हुए) ऐसे किया देख रही है.. अब चुम्मा लेगी किया ?


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सविता की बात पे दोनों hi है पड़ते है

सविता पियर से मालती क बालों को सही करते हुए

"ज्यादा मत सोचा कर.. हम सब है न, मैं भले hi तेरी सगी बहिन नहीं हु.. पर तू मेरी छोटी बहिन जरूर है"

सविता इतना कहकर रसोईघर की तरफ चल पड़ती है.. ताकि मालती क लिए कुछ खाने को ला सके

पर मालती की आँखों क आगे सपने का वही हिस्सा चलने लगता है जहा कुछ लोग उसे और उसके बेटे को बचने क लिए उसकी तरफ दौड़ रहे थे.. जिनमें से सबसे आगे वो औरत और कोई नहीं.. 'सविता' hi थी


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~•~

ऐसी दिन शाम क वक़्त, जब सूरज अपनी अंतिम विदाई से पहले चमकता है 🌞

गाओं मैं हलकी हलकी ठंडक दस्तक देने लगी थी.. खासकरके नदी, तालाब और खेतों पे अछि खासी ठंडक होने लगी है

और ऐसे मैं सूरज की थोड़ी रौशनी भी बहुत सुहानी लगने लगती है.. और ऐसा hi कुछ हाल इस समय वीरू क खेतों पे था

पर यहाँ का नज़ारा पूरी तरह अलग था.. जो सुहाना नहीं बल्कि कामुक था

वीरू क खेतों मैं एक तरफ बड़ी बड़ी कारबी लगी हुई थी जिसके अंदर बीचो बीच एक समय बहुत hi गरम माहौल बना हुआ था

"मुझे ये सही नहीं लग रहा.. मैं ये.. मतलब ये तुम्हारी पत्नी है.. फिर"

खेत क बीच जहा अछि खासी जगह बानी हुई थी वह इस समय 3 लोग मौजूद थे.. जिनमें से 1 भरे जिस्म की खूबसूरत औरत थी, तोह 2 मर्द

औरत- (अपने जिस्म से अपने पल्लू को हटते हुए) इतना मत सोचिये.. जब मेरे पति को परेशानी नहीं है तोह आप क्यू पीछे हैट रहे है


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पर जब वो अपना पल्लू हटा रही थी.. तोह उसके अंदर की लज्जा भी दिख रही थी

"पर मैं.. मतलब वीरू मेरे छोटे भाई जैसा है और मैं भला तुम्हारे साथ, मतलब उसकी पत्नी क साथ कैसे"

खेत क अंदर मौजूद ये तीनो और कोई नहीं बल्कि भानु, कुंदन का छोटा भाई वीरेंदर यानि वीरू और उसकी कैसे जिस्म वाली पत्नी हर्षिता थे


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इस बार वीरू कहता है.. जो काफी दिएर से अपने लुंड को अपनी धोती क ऊपर से hi मसल रहा था

"भानु भाई.. आप आगे बड़ो, हर्षिता को कोई दिक्कत नहीं है"

भानु- (सोच मैं पद जाता है) मुझे ये सही नहीं लग रहा है.. हर्षिता मेरी भाभी है, मैं भला उनके साथ कैसे

भानु की बात को हर्षिता काट देती है

"क्यू... मुझ मैं कोई कमी है, किया शीला मुझसे ज्यादा खूबसूरत है ?"

हर्षिता ये कहते हुए अपनी साड़ी को उतरना सुरु कर देती है.. जैसे जैसे उसके जिस्म से साड़ी अलग हो रही थी वैसे वैसे भानु की लुंगी मैं एक बड़ा सा तम्बू आकर लेने लगा था

पर असली मज़ा तोह हर्षिता क पति परमेश्वर यानि वीरू को आ रहा था.. ककी यु अपनी पत्नी को किसी और क लिए साड़ी उतारते हुए देख क उसकी साँसें तेज़ी से भागने लगी थी उसका गाला सुकून लगा था

वो एक पल की भी देरी नहीं करता ककी अगले hi पल उसकी धोती सामने से खुल चुकी थी और उसका सावला लुंड उसके हाथों की सोभा बड़ा रहा था

वही भानु जो अपनी सुध बुध खोये हुए शामे हर्षिता क जिस्म से उसकी साड़ी को अलग होते हुए देख रहा था.. वो अपने सूखे गले को अपने थूक से गीला करते हुए वीरू की तरफ देखता है

वीरू- (भानु को अपनी तरफ देखते हुए पाके) आगे बड़ो भानु.. मेरी हर्षिता मैं काटे नहीं लगे है

भानु कुछ कहने क लिए अपना मुंह जरूर खोलता है पर कुछ कह नहीं पता ककी तभी वो सामने का नज़ारा देख लेता है

जहा हर्षिता की साड़ी उसके जिस्म से पूरी तरह अलग होक वही खेत की जमीन पे गिरी पड़ी हुई थी और हर्षिता ने अंदर साया भी नहीं पहना था

यानि वीरू की हसीं पत्नी इस समय अपने नन्दोई क सामने नीली ब्रा पेंटी मैं रह गयी थी

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भानु न चाहते हुए भी अपना लुंड पकड़ hi लेता है और उसे अपनी लुंगी क ऊपर से hi मसल देता है

वीरू- (मुस्कुराते हुए और अपने लुंड को अपनी मुठी मैं जकड क) भानु आज तुम्हे म्हणत करने की जरुरत नहीं है.. आज सब कुछ मेरी हर्षिता करेगी, है न..

वीरू अपनी खूबसूरत पत्नी की तरफ देखते हुए अपना लुंड मसलने लगा था.. उसके हाथ की रफ़्तार धीरे धीरे बढ़ने लगी थी

हर्षिता मुस्कुराते हुए अपना दोनों हाथों को पीछे करती है.. वो भानु को थोड़ा तर्पण क इरादे से घूम जाती है और अपनी कोमल उभरी हुई गांड को मटका क भानु क लुंड पे बिजलिया गिरते हुए धीरे से अपनी ब्रा को आगे से खींच लेती है


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पर पूरी तरह जिस्म से अलग करने से पहले भानु की आँखों मैं ऐसे देखती है.. मानो उसकी पियास को जगा रही हो

और जल्दी hi उसकी ब्रा उसके खूबसूरत उरोजों को नंगा करते हुए धीरे धीरे उसके उन्नत दूध से हटने लगती है

हरे भरे खेत मैं इस समय हर्षिता अपने हुस्न की आग लगाने लगी थी

अगर इस समय खेत क बहार कोई होता भी तोह बेचारे को अंदाज़ा नहीं होता की खेत क अंदर कोनसा खेल खेलने की कोशिश की जा रही है

भानु से भी रहा नहीं जाता इसलिए वो भी अपनी लुंगी क ऊपर से hi अपने तगड़े लुंड को मुठी मैं जकड लेता है.. पर उसकी नज़रें हर्षिता क खूबसूरत जिस्म से हैट hi नहीं रही थी

हर्षिता, भानु को देख क धीरे से मुस्कुरा पड़ती है.. पर उसकी मुस्कराहट मैं एक शर्म और हाय भी थी

वही अपनी खूबसूरत पत्नी को यु किसी और क लिए नंगा होता देख.. वीरू क लुंड से ख़ुशी का एक आंसू टपक पड़ा था

वीरू अपने लुंड को मुठी मैं कसके जकड लेता है और उसे आगे से पीछे.. पीछे से आगे करते हुए मुठ मरना सुरु कर देता है

"हर्षिता.. घर क दामाद को ज्यादा दिएर तर्पण पाप होता है"

वीरू अपने लुंड को जोर जोर से मसलते हुए अपनी खूबसूरत और ऊपर से पूरी तरह नंगी हो चुकी पत्नी से कहता है

हर्षिता मुस्कुराते हुए अपने पति की तरफ देखती है और फिर वो अपने दोनों हाथों को अपनी पेंटी की डोरी पे रख लेती है.. और वापस वीरू को देखते हुए धीरे धीरे आहिस्ता से अपनी पेंटी को अपने जिस्म से जुड़ा करने लगती है

जल्दी hi हर्षिता क जिस्म पे मौजूद उसकी पेंटी भी उसके जिस्म से अलग हो चुकी थी.. जिसे वो भानु की तरफ उछाल देती है

भानु का हाल तोह ऐसा हो चूका था की किसी भी पल उसका लुंड आग उगलना सुरु कर दे.. पर असल हाल तोह वीरू को बिगड़ रहा था

ककी वीरू अब जोर जोर से अपना चप्पू चलना लगा था


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"आआअह्ह्ह्ह.. आगे बड़ो हर्षिता... आआआआहहहहह... कितना किस्मत वाला हु मैं, जो तुम्हारे जैसी संस्कारी पत्नी मिली है मुझे.. आआआआहहहहहहह"

वीरू अपनी खूबसूरत पत्नी क सम्मान मैं सब्दो की बारिश करते हुए जोर जोर से अपने लुंड को मथने लगा था.. उसका जिस्म हौले हौले कांपना सुरु हो चूका था, और साँसें भरी पड़ने लगी थी

हर्षिता एक कदम आगे बढ़ती है पर फिर रुक जाती है.. मानो वो कुछ सोचने लगी थी

वो उसी प्रकार सोचते हुए अपनी पति को तरफ देखती है और आँखों hi आँखों मैं मानो उससे कुछ पूछ रही हो.. या सायद किसी बात की आज्ञा मांग रही थी

जिसपे वीरू है मैं सर हिला देता है.. और अगले hi पल हर्षिता अपनी hi जगह पे झुकती चली जाती है, उसके दोनों हाथ वही खेत की धरा से मिल जाते है और वो अब किसी कुटिया क सामान 4 पैरों पे धीरे धीरे चलते हुए भानु की तरफ आगे बढ़ने लगी थी


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वीरू का हाथ तोह जैसे 100 की रफ़्तार से चलना लगता है.. वो जोर जोर से अपने लुंड को आगे पीछे करते हुए उसकी लस्सी निकले की म्हणत करने लगता है

"शाब्बाश... उफ्फफ्फ्फ़... कितनी पियरी है मेरी पत्नी.. aaaaaaaaaaaahhhh"

हर्षिता पूरी मादरजात नंगी अवस्था मैं धीरे धीरे किसी आवारा कुटिया सामान भानु की तरफ आगे बाद रही थी.. जिसपे उसकी मोती मटके जैसे गांड ऐसे थिरक रही थी की उसे लिखने क लिए मेरे पास सब्दो का अकाल है

भानु का गाला पूरी तरह सुख चूका था.. वो बार बार अपना थूक निगलने की कोशिश कर रहा था पर उसमें भी उसे कामयाबी नहीं मिल रही थी

भानु लगातार अपनी लुंगी क ऊपर से hi अपने लुंड को मसल रहा था.. उसकी नज़रें सामने उसकी तरफ बढ़ती हुई हर्षिता से हैट hi नहीं प् रही थी

पर उसे ज्यादा इन्तिज़ार नहीं करना पड़ा ककी जल्दी hi हर्षिता उसके बड़े से उभर क आगे अपना मुंह किये हुए बैठी थी

हर्षिता मुस्कुराते हुए भानु का हाथ पकड़ लेती है, पर बोलने का काम वो नहीं वीरू करता है

"भानु अब तुम्हे म्हणत करने की जरुरत.. आअह्ह्ह्ह... जरुरत नहीं है, मेरी हर्षिता है न... आआअह्ह्ह्हह"

वीरू जोर जोर से अपने लुंड को मसल रहा था.. ऐसा लग रहा था की किसी भी पल उसका लुंड गाड़ा लावा गिरा देगा

हर्षिता भी और देरी नहीं करीत और एक hi झटके से भानु की लुंगी नीचे खींच देती है.. जिससे एक मोटा काला विकराल अड़ियल नाग उसकी आँखों क आगे मचल पड़ता है

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhhh.... इतना बड़ा.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

वीरू- (जोर जोर से अपने लुंड का गाला दबाते हुए) आआआहहह... कैसा है तुम्हारे नन्दोई का लुंड.. हर्षिता

हर्षिता- (अपनी एक ऊँगली को भानु क मोठे लुंड क सुपडे की नोक पे लगते हुए) एजीई... ये तोह आपसे भी बड़ा है

वीरू- (जोर जोर से अपने लुंड को हिलाते हुए.. सायद उसका अंतिम समय निकट था) आआअह्ह्ह्हह... मुझे पूरा भरोषा है.. आआह्ह्ह... तुम ऐसे संभल सकती हो.. आआअह्हह्ह्ह्ह

भानु- (उत्तेजना से कांपते हुए.. अपना एक हाथ हर्षिता क सर पे रख क उसे जोर से अपने लुंड पे दबाने की कोशिश करता है) अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता... वीरू कहो न अपनी पत्नी से.. आआह्ह्ह..

वीरू- (पूरा जिस्म पसीने से भीग चूका थे और जिस्म काँप रहा था.. पैरों मैं जैसे जान बची hi न हो) है.. है... हर्षिता.. ले लो... ले लो अपने मुंह मैं.. अपने नन्दोई का लुंड... आआआअह्ह

हर्षिता भी मुस्कुराते हुए अपनी जीभ निकलती है और भानु क लुंड क मोठे आलूबुखारे जैसे सुपडे पे अपनी जीभ की नोक लगा लेती है.. पर वो इतने मैं नहीं रूकती

वो अपने सर से भानु क काले लुंड को उठाई है और जैसे hi उसके काले काले एंड उसकी नज़रों क आगे आते है.. हर्षिता ललप क एक ाँद को मुंह मैं भर लेती है


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"Aaaaaaaahhhhhhhhhhhhh...... Aaaaaaaaaahhhhhhhhhh....."

भानु क साथ साथ वीरू की आआह्ह्ह्ह भी निकल पड़ती है, उसकी आँखें बंद होती चली जाती है और उसके लुंड से गाड़ा रास टपकने लगता है

वीरू अपनी आँखों को बंद किये हुए तब तक अपना लुंड मसलता रहता है.. जब तक उसके रास की अंतिम बुध निकल नहीं जाती

वीरू- aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.......

वीरू का पूरा जिस्म थकन से भर उठा था.. उसके पेअर काँप रहे थे

पर जब उसकी आँखें खुलती है.. तोह नज़ारा कुछ और hi था

ककी वो अपने खेत क मध्य मैं जरूर था पर बिलकुल अकेला.. वह न उसकी खूबसूरत पत्नी 'हर्षिता' थी और न hi भानु

न hi उसकी हर्षिता नंगी हुई थी.. न hi नंगी होने क लिए वह थी

वीरू अपने लुंड को अपनी धोती से साफ़ करते हुए

"आआह्ह्ह्ह... किया हो गया है मुझे, कैसे अजीब अजीब ख्याल पलने लगा हु.. उम्मम्मम्मम..

भला हर्षिता कभी मानेगी मेरी ये ीचा पूरी करने क लिए.. ?"


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वीरू खुद से सवाल करते हुए अपने लुंड को अपनी धोती क अंदर करता है और खेत क बहार चल पड़ता है.. जहा वो जैसे hi खेत क बहार अत है उसे सामने 'भानु' नज़र आता है

भानु- किया हुआ.. वीरू, तुम्हे इतना पसीना ?
 
नई अपडेट ⬇️





अडुल्टेरी - ये आग है.. नफरत और जिस्म की

मेरी हमेशा कोशिश रहती है की अपडेट को ज्यादा से ज्यादा सब्दो क साथ पोस्ट करू.. पर काम की व्यस्तता क कारन ऐसा संभव नहीं हो पाटेवेन कई बार लिखने का मन भी नहीं होता, पर अब सभा क प्रेम क कारन हर वीक 1 अपडेट जरूर लाता हप्लस इस टाइम मैं एक और शॉप सुरु करने वाला हु...



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अपडेट #08

Part #01

यु समझो.. इक माँ है तोह दूसरी मालती चची

ये अपडेट हमारे Danny69 भाई को समर्पित है

रात क करीब 12 बजने को होंगे और ऐसे मैं सत्तू हाथ मैं टोर्च 🔦 लिए हुए.. खेत की मेड पे बैठा हुआ था, गाओं मैं ऊपर से खेतों क बीच ठण्ड लग्न बहुत आम सी बात है

सत्तू खेत की तरफ देखते हुए

"जल्दी कर"

खेत क अंदर बैठा हुआ सत्यम अपने पिछवाड़े से दमके करते हुए कहता है

"अरे भैया.. छोले भठूरे खा लिए थे न वही निकल रहे है, थोड़ा टाइम तोह लगेगा न"

सत्तू- (ठण्ड की वजह से अपनी बाहों पे हाथ रगड़ते हुए) सुबह तक रुक नहीं सकता था.. कितनी ठण्ड होने लगी है

सत्यम- (अपनी जगह बदलते हुए) अरे भैया.. रुक सकता तोह आपको इतनी रात जगाता थोड़ी

सत्तू- अरे तोह घर मैं भी था न शौचालय?

सत्यम- (हस्ते हुए) घर मैं कहा खेतों वाला मज़ा

सत्तू भी अपने छोटे भाई की बातों पे अपना माथा पीट लेता है.. और उसी प्रकार बैठा रहता है तभी उसके मन मैं एक बात आती है और वो थोड़ा सकुचाते हुए कहता है

"ाचा सुन.. ये बता की तुझे कोई पसंद है किया"

सत्यम भी अचानक ऐसी बात सुनकर हैरान रह जाता है.. पर फिर उसके अधरों पे मुस्कान बिखर जाती है, ककी उसे लगता है की माँ का जादू बड़े भैया पे भी काम करने लगा है


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सविता का जादू 🔥

पर बात तोह बिलकुल अलग थी

सत्यम- (चेहरे पे कमीनापन नज़र आने लगा था) मुझे तोह कई पसंद है भैया.. पर आपको किया हो गया.. यु अचानक, कोई है किया

सत्तू को लगता है की उसका भाई उसकी बात को बस मज़ाक समझ रहा है

"अरे मैं मज़ाक की बात नहीं कर रहा हु, मेरा मतलब.. कोई ऐसी जिसके लिए तू.. मेरा मतलब की.. ाचा चल चोर

सत्यम- (गंभीरता दिखते हुए) अरे पहली बार तोह आपने दिल खोला है.. ऐसे कैसे ाचा बताइए तोह

सत्तू- मतलब की.. तेरी ज़िन्दगी मैं किया कोई ऐसी है की उसके लिए तू.. मतलब की

सत्यम- ओहु.. लगता है मेरे भैया को प्रेम हो गया है

सत्यम इतना कहते हुए हसने लगता है.. जिसपे सत्तू थोड़ा झेप सा जाता है

सत्यम- (अपने आप को हल्का करके खेत से बहार आते हुए) अरे भैया कहा आप इन सब चक्कर मैं पद गए, ज़िन्दगी है मज़े करो बस

सत्तू- (समझने की कोशिश करते हुए) मैं समझा नहीं ?

सत्यम अपने लोटे का बचा हुआ पानी गिरते हुए

"रहने दो आप.. आपको कुछ बताऊंगा तोह पहले खुद hi 10 बातें सुनाओगे और फिर घर पे बता डोज"

जिज्ञासा इन्शान से कुछ भी करवाती है, और सत्तू तोह वैसे इस समय एक नाजुक लम्हें को जी रहा है

"अरे बता न.. मैं कुछ नहीं कहूंगा, और किसी से बताऊंगा भी नहीं"

सत्यम कुछ कहने क लिए अपना मुंह खोलने hi वाला होता है की उसे मालती का ध्यान आता है.. और उसके होंठों पे विजेता वाली मुस्कान खेल जाती है

"कसम खाओ.. "

सत्तू- किया.. ?

सत्यम- आपका किया भरोषा.. पहले खुद कूट दो, फिर घर पे कुतवा दो

सत्तू है पड़ता है

"ाचा ठीक है.. तेरी कसम, मैं कुछ नहीं कहूंगा"

सत्यम- (महाराज जैसी अंगड़ाई लेते हुए) मेरे पास एक नहीं 2 है

और है क आँख मार देता है, जबकि सत्तू ये सुनकर वही का वही थम सा जाता है

सत्तू जो कुछ कदम आगे बाद गया वो पीछे मुड़के अपने बड़े भाई की हालत देख क है पड़ता है

"बस इतने मैं hi.. जब ये बताऊंगा की मैं किया किया करा है तब किया हाल होगा आपका"

सत्तू- (मानो वापस होश मैं लौटा हो) किया 2.. तू पागल है किया, कोण है वो.. कैसे.. कब ?

सत्तू एक hi सांस मैं अपने छोटे भाई पे ग़ुस्सा भी करता है और हैरानी से सभी सवाल भी कर डालता है

"आपने कसम खाई की आप डाटोगे नहीं.. वर्ण ठीक है मुझे किया, कुछ नहीं बताऊंगा

वैसे मैं सायद आपकी कुछ मदद भी कर देता.. 2-2 का ज्ञान है"

सत्यम गर्व से सीना चौड़ा करते हुए कहता है

सत्तू- (टपक से) मैं.. मैं डाट नहीं रहा हु, पर 2-2 लड़किया ?

"किया भैया.. आप भी गाओं क बुद्धू hi रहोगे, समय क साथ चलना सीखो

अरे आज कल संतरों का समय नहीं है.. बड़े बड़े पपीतों का समय है"

सत्तू अपना सर खुजाने लगता है.. वैसे इसमें उसकी गलती भी नहीं

उसके जीवन का मतलब.. घर से खेत और खेत से घर hi था, जब तक उसे अपनी शीला बुआ क प्रति इस नए एहसास का पता नहीं चला

सत्तू- किया पपीते.. संतरे कर रहा है, साफ़ साफ़ बता न

सत्यम हस्ते हुए अपने सीने पे दोनों हाथ रखता है और ऐसे चलता है मानो बड़ी बड़ी चूचियों को सेहला रहा हो


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सत्तू का तोह थूक तक सूखने लगता है.. उसके सीधे शादी जीवन मैं सत्यम कामुकता का तूफान लाने लगा था

सत्तू क दिमाग की बत्ती जल उठती है.. उसके आँखें पूरी फ़ैल जाती है और मुंह खुला का खुला रह जाता है

"मतलब तू जिन 2 की बात कर रहा है वो..."

सत्यम- बस यु समझ लो.. एक माँ है तोह दूसरी मालती चची

सत्तू- (ग़ुस्से से) किया बक रहा है.. दिमाग ठीक है

सत्यम- (समझ जाता है की सत्तू उसके रस्ते पे इतनी आसानी से नहीं चलने वाला है) अरे मेरे कहने का मतलब है की वो दोनों माँ और मालती चची जैसी hi है

सत्तू- किया.. मतलब.. सच्ची.. कोण है बता न ?

सत्तू अगले hi पल वापस अपनी जिज्ञासा से ग्रसित हो चूका था

सत्यम- नाम तोह नहीं बता सकता.. बाकि सब जानना है तोह...

सत्तू- है.. है बता न.. बता

सत्यम अपने बड़े भाई की हालत देख क मन hi मन है पड़ता है और खुद से कहता है

'सोनू क बाद एक और एक मिल गया'

पर वो अपनी ख़ुशी को जाहिर नहीं होने देता है

"सब बताऊंगा.. पर अभी घर चलो, बड़ी नींद आ रही है"

सत्यम आगे बाद चलता है, सत्तू भी लगभग दौड़ क उसके करीब आते हुए

"फिर... फिर कब बताएगा"

सत्यम- (समझ चूका था की अब चिड़िया फास चुकी है) सोच रहा था सुबह खेत पे बता दूंगा.. पर कल तोह सुबह सुबह मुझे टूबवेल और हौद की पूरी सफाई करनी है, फिर कैसे..

सत्तू- (बिना विलम्ब क) वो सब मैं कर दूंगा.. तू बस..

सत्यम- (मन hi मन हस्ते हुए) सब बताऊंगा.. वैसे नंगा तोह मैंने दोनों को किया है, पर छोड़ा बस एक को है

सत्तू क लिए ऐसा खुला सब्द 'छोड़ा' वो भी अपने छोटे भाई क मुंह से सुन्ना बड़ा अजीब लग रहा था.. पर साथ hi साथ उसके अंदर एक नयी तरंग सी उठने लगी थी

सत्यम- (अपने बड़े भाई की इस्तिथि का पूरा अनुमान लगते हुए) अगर आपको ये सब बातें पसंद नहीं तोह मैं रहने देता हु.. मुझे किया, वैसे हर प्रेम क सफर का अंत बिस्तर पे hi होता है


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सत्यम ने अपनी आखिरी बात थोड़ा धीमी आवाज़ मैं कही, मानो वो दर्शन च रहा हो की वो अपने बड़े भाई का सम्मान कर रहा है.. जबकि वो सत्तू क साथ सिर्फ खेल रहा था

सत्तू- (थोड़ी दिएर सोचने क बाद) दूसरी वाली क साथ क्यू नहीं कुछ.. मतलब की उसके साथ जल्दी अभी

सत्यम- (सत्तू की इस बात से उसे यकीं हो जाता है की उसका बड़ा भाई अब पूरी तरह उसकी गिरफ्त मैं आ चूका है) अरे नहीं भैया.. पिछली ठण्ड से उसके साथ चल रहा है, बस उसे पाना इतना आसान नहीं है न.. साली आसानी से हाथ नहीं आ रही है

सत्तू को यु किसी औरत क लिए गाली सुन्ना ाचा नहीं लगता.. वो भी अपने छोटे भाई क मुंह से, पर इस समय वो इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर जाता है

"क्यू वो तुझे पियर नहीं करती"

सत्यम- (है पड़ता है) भैया ये पियर वियर का चक्का मैं नहीं पलटा.. बाकि कैसे समझौ आपको, यु समझो मेरी जगह और कोई होता तोह उसे पाने की सोचता भी नहीं इतना मुश्किल है

सत्तू को ऐसा लगता है मानो सत्यम अपनी बात न करके उसकी इस्तिथि पे बात कर रहा हो.. ककी 'शीला' उसकी सगी बुआ है, और उसके लिए भी उसे पाना भी लगभग असंभव hi है

सायद यही वजह थी की सत्तू की लिए अब सत्यम और इस औरत की कहानी उसका केंद्र बिंदु बन चुकी थी

सत्यम- वैसे पहले वाली मैं ज्यादा परेशानी नहीं आयी थी, यु समझो वो खुद..

सत्तू- उसकी चोर.. मुझे ये दूसरी वाली क बारे मैं बता

सत्यम मन hi मन

'अब आये न भैया.. बोतल मैं'

सत्यम- (जान क जम्हाई लेते हुए) अभी तोह बड़ी नींद आ रही है, घर भी आ चूका है.. कल बताता हु न खेत पे आप बस वो टूबवेल और हौद की सफाई का..

सत्तू- Ha..ha वो सब मैं कर दूंगा, तू वो सब चोर

सत्यम मंद मंद मुस्कुराते हुए घर मैं पहुंच चूका था.. और जल्दी hi दोनों भाई अपनी अपनी चारपाई पे लेटने लगते है

सत्यम- (अपने ऊपर चादर डालते हुए) वैसे भैया.. बापू को न बताना की टूबवेल और हौद की सफाई..

सत्तू- उसकी फ़िक्र न कर, मैं कह दूंगा सब तूने hi किया है

सत्तू को अंदाज़ा नहीं था की उसका छोटा भाई उसकी इस्तिथि का पूर्ण फायदा उठाने लगा है

जल्दी hi दोनों भाई चारपाई पे लेत चुके थे.. जहा जल्दी hi सत्यम गहरी नींद की आगोश मैं खो जाता है पर सत्तू की आँखों से नींद मानो गायब सी हो चुकी थी

ऐसी दिन भरी दोपहरी को दिल्ली मैं.. 'मनोहर निवास' पे

अपडेट #08

Part #02 कमिंग सून...
 
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