Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller) - SexBaba
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Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller)

hotaks

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Dec 5, 2013
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मैंने कभी सोचा भी नहीं था के कभी कोई स्टोरी लिखूंगा . लेकिन स्टोरीज पढ़ते पढ़ते अचानक hi एक दिन दिल किया मुझे भी कहानी लिखनी चाहिए तो फिर क्या था ..लिखनी शुरू कर दी . मेरी पहली कहानी है (कुछ रंग ज़िन्दगी के ऐसे भी) ...

अब वो अछि है या बुरी वो आप hi बता सकते हैं .. स्टोरी शुरू किये अभी कुछ hi दिन हुए थे के मेरे दमाग में 4,5 और स्टोरीज के प्लाट बनना शुरू हो गए , वक़्त की कमी की वजा से दूसरी कहानी शुरू करना मुमकिन नहीं था . लेकिन दिल नहीं मान रहा था . तो वक़्त की कमी को गोली मारते हुए और दिल के हाथों मजबूर हो कर दूसरी लिखनी शुरू कर दी . नाम है ...Himmat-Wala.

ये कहानी टोटली मेरे अपने मंद की मुरत्तब की हुई है . अगर कहानी में किसी की ज़िन्दगी से मिलता जुलता कुछ हो तो इतस ान इंसिडेंट . इस कहानी का किसी की ज़िन्दगी से कोई लेना देना नहीं

शुक्रिया

कमैंट्स आफ्टर स्टोरी एंड्स......

अलोक साइड:

जस्ट मर्वेलौस एंड सुपर स्प्लेंडिड स्टोरी asadjee भाई.....

एन्ड तोह एक दम ज़बरदस्त और लाजवाब लगा और यह जानकार ख़ुशी हद से ज्यादा बढ़ गयी है की स्टोरी का सेकंड part भी आएगा. उम्मीद है की अगला part इससे भी ज्यादा मज़ेदार और रोमांचक होगा...... 🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰

Skb21 साइड:

बहुत hi सुन्दर और रोचक कथानक था

और बहुत सुन्दर समापन किया गया है

हैट्स ऑफ यू

johnsamuri साइड:

आपका तहे दिल से सुकरिअ की इस कहानी को अपने उसके अंजाम तक ले गए

बहुत बहुत सराहना है आपकी की अपने इतनी अछि कहानी की पेशकश की हम सब के सामने

उपदटेस भौत अचे लिखा है अपने लास्ट वाला part तो और गजब का था

एंड अब्ब देख ने को मिलेगा विजय एक देशभक्त की कहानी

थैंक यू सो मच फॉर थिस स्टोरी HIMMT-WALA

थे रियल हिम्मत- वाला इस थे राइटर

अस्सादजी

हैट्स ऑफ तो यू सर!!!!!

एंड होप यू विल कंटिन्यू बे ा HIMMAT-WALA

👑👒🎩👑👒🎩👑👒🎩

Battu साइड:

अदद भाई आपको और आपकी लेखनी को प्रणाम और प्यार. आपको बहुत बहुत धन्यवाद् की आपने एक प्यारी स्टोरी कम्पलीट करि. विजु और श्वेता की लाइफ क रंगो से रंगी यह स्टोरी हिम्मत वाला part 1 बहुत hi खूबसूरती क साथ आपने लिखी और हम जैसे पाठको का भरपूर मनोरंजन किया. आपकी स्टोरी में सबसे भेड़िया जो चीज़ थी वो आपकी कंटिन्यू अपडेट देने का हौसला. हर अपडेट ने हम पाठको को बंधे रखा कभी ऐसा नहीं लगा की अब बोर हो रहे हो. थैंक्स. आप आपके 2ंद परता का इंतज़ार रहेगा.

Mahendra Baranwal साइड:

एक महान स्टोरी का प्रथम episode के ख़त्म होने पर लेखक का कई बार अभिनन्दन

इंतज़ार नेक्स्ट episode का......

Shek साइड:

बहुत-बहुत badhiya Jabardast unexpected best revenge updates hai aur बहुत-बहुत Shukriya bahut kam lekhak hai jo apni story to regular based pay updates Dekhe complete kare so hai aur aapke writing skills fantastic aur ham jaldi Himmatwala ka part 2 Bhi aaega once again aapko बहुत-बहुत Shukriya ki X forum mein one of the best story likhane ke liye
 
इंट्रोडक्शन

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मेरी आगे इस टाइम 25 ईयर है . अब ज़िन्दगी में कुछ ठहराओ आया है तो सोचा आप सब से भी अपनी लाइफ स्टोरी शेयर करून . मेरी ज़िन्दगी में बोहत से उतार चढ़ाओ ए हैं . मेरी साड़ी ज़िन्दगी हंगामों में गुज़री है . जब भी गुज़रे वक़्त को याद करता हूँ तो दर्द भरे वाक़िआत याद आते हैं अगर में कमज़ोर दिल का इंसान होता तो ज़ोर ज़ोर से चीखता . लेकिन मुझे खुद पर गर्व है क मैंने अपने बुरे वक़्त में कभी भी हिम्मत नहीं हारी क्यूंकि मैं जनता था अगर मैंने हिमनत हार दी तो मेरा सब कुछ ख़तम हो जायेगा. मेरी हिम्मत ने hi आज मुझे एक khush-haal ज़िन्दगी दी है . हिम्मत किये बगैर कोई भी इंसान ज़िन्दगी में कभी भी कुछ हासिल नहीं कर सकता ...

मैंने होश संभाला तो अपने आप को एक कोठे पर पाया ...जहाँ दिन सोते और रातें जागती हैं ... घुंघरूं की और पायल की chan-kaar ... थिरकते बदन पैसों के लिए बदन की नुमाईएश ... पैसों की बरसात ... रात के वक़्त बंद कमरों में गूंजती सिसकियाँ ...

जब में साल का हुआ तो मैंने अपनी माँ को नाचते हुए देखा अपनी बेहेन को नाच सीखते हुए देखा ... मुझे अपनी माँ और बेहेन का नाचना ाचा नहीं लगता था ... कोठे के बहार मौजूद मार्किट में जब भी मैं जाता तो सब मुझे अजीब नज़रों से देखते ... मैं पैदा तो कोठे पर हुआ था लेकिन मेरी सोच सब से अलग थी ... मार्किट के दुकानदार मुझ पर हस्ते थे कोठे पर पैदा हो कर उसी कोठे से नफरत करता है ऐसा बोलते थे ... मेरी आगे तब साल थी लेकिन ज़माने की समझ मुझे साड़ी आ चुकी थी ... मार्किट में सिर्फ पान वाला hi था जिस से मेरी अछि बनती थी .. वो खुद भी एक ाचा इंसान था ... उस ने मुझे बोहत कुछ सिखाया दुन्या के बारे में जिस के चलते मेरी सोच कोठे के अगेंस्ट जाने लगी ... मैं चाहता था मेरी माँ ये धंदा छोड़ दे ...

इस लिए मैं रोज़ माँ से बहस करता माँ तुम नाचती क्यों हो ये बुरा काम है ...

लेकिन माँ कुछ नहीं बोलती थी लेकिन उस की ऑंखें सब कुछ बता देती थी के वो भी यहाँ मजबूर है ...

इंट्रोडक्शन :

विजय : आगे :25 (यानि के मैं)

मेरा इंट्रो..... आप मेरे बारे में स्टोरी में पढ़ कर जान लेना



शवेता : आगे :45

माँ का डिटेल इंट्रो आप खुद स्टोरी में जान लेना ...

माँ का अगर शारीरिक इंट्रो दिया जाये तो ... तो वो एक अप्सरा जैसी दिखती हैं उन की ऑंखें झील के जैसी गहरी हैं उदास लेकिन बेइंतेहा अट्रैक्टिव ... कमल की रंगत है उनकी ... वैरी फेयर कलर कोमल के जैसे उन के गाल शराबी ऑंखें ... जिस्म चर्बी से पाक ... सब से ज़यादा उन के बोओब्स और उन की थोड़ी बहार को निकली हुई गांड ग़ज़ब की है ... सुरीली आवाज़ पूरे एरिया में उन के जैसी किसी की नहीं ...



प्रिय ... आगे : 24 मेरी बेहेन

उन की तारीफ क्या करनी मेरी बेहेन है ... ज़ाहिर है सब कुछ माँ के जैसा hi हो गए ... इन की सूरत माँ से मिलती है ... ग़ज़ब की दिखती है ... इनको देख hi लगता है जैसे माँ जवान हो गई हूँ ... यक़ीनन माँ भी जवानी में प्रिय जैसी hi थी ... इन की बॉडी फिगर भी शामे 2 शामे माँ जैसा है ... लेकिन ऑंखें माँ जैसी नहीं ...



जहान्वी ... आगे :26 मेरी मोहन बोली बेहेन



षुरूति .. आगे :26 मेरी मोहन बोली बेहेन



ये दोनों बोहत has-mukh हैं डांस करने से बॉडी फिगर मस्त बन चूका है ...

फुल सेक्सी हियँ दोनों ...बूब्स जिस से दिखे ऐसे कपडे पहनती हियँ ... किसी का भी पानी झट से निकल दें ... ये दोनों भी कहीं से अगवा कर के ले गई हैं ...

रेखा बाई ... आगे 50

इन के कोठे पर hi मैं पैदा हुआ बोहत hi हरामी किसम की औरत हैं बच्चियों को अगवा कर के कोठे पर धंदे के लिए ट्रैन करती है और अलग अलग कोठे पर या कस्टमर्स को बेच देती है ... शहर के बड़े बड़े लोगों से रिलेशन्स हैं इस के ... इस से पन्गा लेना किसी के लिए आसान नहीं ...
 
अपडेट: 1

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लोकेशन: Mumbai.........Kotha रेखा बाई

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कोठे पर लड़कियां पैदा होना काम भी बात है ... कोठे की मालकिन लड़की के पैदा होने पर पूरे बाजार में मिठाई bant'ti है .. उन की ख़ुशी देखने लायक होती hai...kothe पर खूब चराग़ाँ किया जाते है ... लड़की की माँ को सब कोठे वालियां बधाई देती हैं .. जैसे जैसे वो बड़ी होती है उस के नखरे उठाये जाते हैं उस की हर खवाइश पूरी की जाती है ...

लेकिन वही जब किसी कोठे पर कोई लड़का पैदा हो जाये तो अपशगुन माना जाता है ... जिस के चलते

उस का जीना हराम कर दिया जाता है उसे नाली का कीड़ा बना दिया जाता है...

कोठे पर पैदा होना उस के अपने हाथ में तो नहीं ये साब तो भगवन hi करने वाला है लेकिन ये संगदिल दुनिया और उस से बढ़ कर कोठों की दुन्या ..

उस लड़के की ज़िन्दगी हराम कर दी जाती है ... बाज़ार वाले और पड़ोसियों के कोठों में बसने वाली दुन्या उस लड़के को अपना मुश्तर्का कुत्ता समझ लेती हैं ...

मेरे साथ भी ऐसा hi हुआ .

दूसरों के लिए ये कोठा है लेकिन मेरे लिए तो ये घर hi था जहाँ मेरी माँ और बेहेन रहती थी मेरी वैल्यू उस घर में एक कुत्ते से भी काम थी सारा दिन घर के काम मुझसे करवाए जाते . घर की सफाई से ले कर बाथरूम की सफाई और बहार से कुछ भी सामान लाना हो जो इस बाजार से मिल सके उस सामान को लाने की ज़मीदारी भी मेरी थी .. हालांकि कोठे पर और भी बन्दे थे ... रेखा बाई किसी से भी काम करवा सकती थी . लेकिन नजाने उसे मुझसे किस बात की दुश्मनी थी .. नफरत की इन्तहा की हद तक थी तो रेखा और मेरे बीच ....

अगर किसी काम में लेट हो गया तो वो मार पड़ती के तौबा hi भली .. आज भी मेरे जिस्म पर बचपन में हुए तशद्दुद के निशान मौजूद हैं ... मुझे सब बर्दाश्त करने की आदत पद चुकी थी मेरा इस दुन्या में मेरी माँ और बेहेन के इलावा कोई था भी नहीं ...

शुरू शुरू में जब मुझे मार पड़ती थी तो माँ के मुझे बचने के लिए कुछ भी न करने पर मुझे बोहत बुरा लगता था लेकिन बाद में माँ रेखा बाई से चुप कर मेरे ज़ख्म पर मरहम लगा दिया करती थी . हर बार नहीं कभी कभी

रेखा बाई की नज़र बोहत तेज़ थी वो मुझे गंदगी में पड़े किसी कचरे से काम नहीं समझती थी ..

माँ ने कई बार रेखा बाई के पेअर पकडे मुझे न मारे

लेकिन रेखा बाई को इस कोई से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था ..

रेखा बाई का किसी को घूर कर देखना hi क़यामत ला देता था बोहत ग़ुस्से वाली थी रेखा बाई ..

एक बार मैंने माँ और अपनी छोटी बेहेन के घुंघरू कहीं छुपा दिए थे ..जब शाम ज़रुरत पड़ी तो कहीं नै मिले

अब घर में कोई भी चीज़ इधर उधर हो जाये और मुझ पर शक न हो किसी को ये हो नहीं सकता था रेखा बाई मुझे घूर कर देखने लगी लेकिन उस के ऐसे देखने से मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था.. रेखा बाई ने मुझे बोहत कहा के मैं घुंघरू ला के दूँ लेकिन मैं नहीं माना .. उस दिन सारे रिकॉर्ड hi तोड़ दिए रेखा बाई ने .. पहले वो खुद मारा करती थी उस शाम रेखा बाई ने कोठे के गार्ड को मुझे पीटने के लिए बोल दिया .. ..

पता नहीं उस हरामी गार्ड को मुझ पर किस बात का ग़ुस्सा था साले ने वो मार लगाई मेरा अंजार बंजर उधेड़ कर रख दिया ..

मेरी चीखें पूरे बाज़ार में गूँज रही थी माँ और छोटी रो रही थी लेकिन बचने वाला कोई नहीं था बोहत मार खाने के बाद में बेहोश हो गया तो मुझे एक गंदे से कमरे में फ़ेंक दिया गया ....

उस रात माँ भी मेरे पास नहीं आई

वो भी बेचारी क्या कर सकती थी अगर वो मेरी ज़यादा taraf-daari करती तो रेखा बाई माँ को धमकी देती के अगर वो मेरी फ़िक्र ज़यादा करेगी तो वो मुझे या मेरी बेहेन को किसी के हाथों बेच दे गई .. या फिर माँ का गैंगबैंग करवा देगी .. में वक़्त के साथ साथ ये सब जान गया था ..

उस रात रेखा बाई को मैंने नहीं बताया के मैंने घुंघरू कहाँ छुपाये हैं मजबूरन रेखा बाई को नए घुंघरू लाने पड़े .. माँ वो नए घुंघरू बाँध कर साड़ी रात नाचती रही

लेकिन मैं फिर भी खुश था के मैंने किसी को घुंघरू के बारे नहीं बताया . मैं खुश क्यों था मुझे इस बारे कोई अंदाज़ा नहीं था लेकिन अपनी हिम्मत मैंने टूटने नहीं दी .. रोज़ रोज़ की मार और नज़र अंदाज़ किये जाने की वजा से मैं ढीट ज़िद्दी और सरकश हो गया था ...

ये वाक़िअ तब का था जब में साल का हुआ था ..

अब में साल का हो गया था.

सारा दिन काम करना कभी घर की सफी कभी बाजार का चक्कर लगाना

इस बीच मैं अपने दोस्त ("पानवाले अंकल"

मैं उन को दोस्त hi बोलो गए वो उम्र में मुझसे बोहत बड़े थे

लेकिन मेरी उनसे बोहत जमने लगी थी

इस लिए हम दोनों दोस्त के जैसे बात किया जरते थे

मेरे दोस्त का नाम अजित है लेकिन बाजार में सब उसे अज्जू बोलते थे... पर मैं उस को अजित भाई hi बोलता था)

एक दिन में पान लगवा कर कोठे पर वापिस आया तो शाम का वक़्त हो चूका था मैंने रेखा बाई को पान दिए और अंदर कमरे में चला गया ..अंदर माँ और छोटी दोनों बीएड पर बैठी थी..

माँ ....... आजा मेरा बीटा यहाँ बेथ मेरे पास तू तो मेरे पास बैठता hi नहीं

विजय ..... बाजी तुम भी हर वक़्त मसरूफ रहती हो और मैं भी तो सारा दिन काम में फंसा रहता हूँ टाइम कहाँ से निकालों ..

(मैं माँ के पास बोहत काम बैठता था.. मुझे माँ के नाचने और जिस्म फरोशी से सख्त नफरत थी .. लेकिन अपनी माँ से नहीं .. फिर भी मैं अपनी माँ के पास ज़यादा नहीं बैठता था जब भी मैं माँ के पास बैठता था तो मेरी फीलिंग अजीब हो जाती थी मुझे ग़ुस्सा आने लगता था दिल करता हर तरफ आग लगा दूँ या इस कोठे को hi जला दूँ)

माँ ....... विज्जु बीटा कमरे में तो मुझे माँ बोलै कर क्यों दुःख देता है अपनी माँ को ...

(कोठे पर मेरी वैल्यू न होने से मेरा नाम बिगड़ कर विजय से विज्जु हो गया था एक पानवाले के इलावा कोई भी मुझे विजय नहीं बोलता था .. पर मुझे ग़ुस्सा नहीं आता था. विज्जु भी ाचा नाम है..)

प्रिय .... हाँ भाई माँ को माँ क्यों नहीं बोलते

विजय .... अरे माँ क्यों बोलों .. में कोण सा घर पे हूँ ये कोठा है .. यहाँ तो सिर्फ बाजी होती है माँ नहीं होती तुम भी तो सब के सामने माँ को बाजी hi बोलती हो ...

माँ ...... (रट हुए) मैं क्या कर सकती हूँ मेरा कोई ज़ोर नहीं चलता यहाँ पर ...

विजय ..... बाजी तो फिर सब छोड़ क्यों नहीं देती....

माँ ....... विज्जु तू अभी छोटा है ना सब नहीं समझ सकता . यहाँ से रहे पाना na-mumkin है . अगर हम यहाँ से भाग भी जाएँ तो कहाँ जायेंगे . हम जैसों के लिए ये कोठा hi सैफ है ...

विजय ..... बाजी तुम हर वक़्त ऐसे hi बातें करती हो प्रिय अभी छोटी है क्या जब ये जवान हो जाएगी तो इसे भी अपने धंदे में लगा लो गई .....

माँ ........ मैं कुछ नहीं कर सकती अगर गलती से किसी को हमारी बातों की भनक भी पद गई ना तो पता नहीं क्या हो जाये ..रेखा बाई बोहत खतरनाक है अगर उस ने ग़ुस्से में तुम को या तेरी बेहेन को किसी को बेच दिया तो में तो मर hi जाऊँगी .

तुम क्या समझते हो में अपनी मर्ज़ी से नाचती हूँ ... अपने मर्ज़ी से अपने जिस्म को बेचती हूँ ... अरे अगर में ये सब अपनी मर्ज़ी से कर रही होती तो मेरे पास पैसे होते ...

नाचती मैं हूँ रात को जिस्म बेचती हूँ लेकिन पैसा सारा रेखा बाई के पास जाता है . "ये बोल माँ अपने दुपट्टे को मोहन में दाल कर रोने लगी "

यहाँ खुल कर रोने पर भी पाबन्दी है .. छोटी भी माँ के गले लग रोने लगी.

कोठे पर रहते लड़की हो या लड़का उस के दमाग की आगे उस की रियल आगे से ज़यादा होती है मेरी प्रिय भी ज़माने की सब उंच नीच जान गई थी ...

प्रिय ..... भाई जल्दी से बड़े हो जाओ ना फिर हम को यहाँ से निकल कर ले जाना ... मुझे भी यहाँ ाचा नहीं लगता ..

अब्ब में क्या कर सकता था में ठहरा साल का लड़का

समझ भले hi दुन्या की साड़ी आ गई थी लेकिन यहाँ से माँ और छोटी को भगा कर ले जाना na-mumkin था ..

रेखा बाई से पन्गा लेना मतलब सीधा सीधा जान खतरे में डालना ..

मैं कुछ नहीं कर सकता था .. खून के घूँट पि कर चुप हो गया

कुछ देर बाद मैं बहार आ गया और माँ लग गई अपने धंदे पर ...

दिन ऐसे hi काटने लगे

सब कुछ अपनी रूटीन पर चल रहा था के ....एक दिन

एक दिन..

बग्गा नाम का एक गुंडा कोठे पर आया उस का बोहत टेहका था साथ के दुसरे शहर में .. अगर यहाँ रेखा बाई का डंका बजता था तो बग्गा के शहर में बग्गा hi सब गुंडों का बाप था अब गुंडों का बाप है तो ज़ाहिर है हरामी भी सब से ज़यादा हो गया ..

रेखा बाई उस से डर्टी नहीं थी लेकिन बिला वजा उस से कोई पन्गा भी नहीं लेना चाहती थी ..

लेकिन जो हो hi हरामज़ादा उसे हर कोई अपने जूतों के नीचे hi नज़र आता है

माँ का नाच देखते देखते बग्गा अपने होश खो बैठा..

उस रात माँ को भी पता क्या हुआ .. माँ ने नाचते वक़्त जो गाना गाय ..

गाना सुन मेरे साथ साथ बाई भी झूम रही थी

मुझे माँ की आवाज़ अछि लगती है

लेकिन दुसरे के सामने धंदे के दौरान नहीं .. मैंने बताया था इंट्रो में माँ की personality,figure उन की आवाज़ उन की ऑंखें कोई भी देखे तो खुद पर से कंटोल खो दे ..

आज माँ की आवाज़ में इक दर्द था जैसे माँ अंदर hi अंदर तड़प रही हूँ .. इस लिए उन की आवाज़ आज बोहत ग़ज़ब की थी ..

सब चीज़ों के गोबिनाशन ने माँ को ऐसा शो किया के बग्गा खुद पर कंटोल खो बैठा ... वो अपनी जगह से खड़े हुआ फिर चल कर माँ के पास आ कर माँ का हाथ पकड़ लिया ...............

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एक दम से पूरे हाल में सन्नाटा छ गया ...
 
अपडेट:2

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रेखा बाई भी अपनी जगह पे कड़ी हो गई वो बग्गा को घूर रही थी और बग्गा की लिमिट को देख रही के बग्गा किस हद तक जाता है ..

मैं भी अपनी जगा पे खड़ा हो गया मुझे बोहत ग़ुस्सा ा रहा था बग्गा की हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ का हाथ पकड़ने की ....

(आप रीडर्स लोग ये तो नहीं सोच रहे के जब मेरी माँ धंदा करती है तो मेरा ग़ुस्सा करना बनता है या नहीं तो में बता दूँ के धंदे के भी कुछ असूल होते हैं कोई भी ऐसे hi सब के सामने किसी की इज़्ज़त नहीं उतार सकता भले hi वो तवायफ hi क्यों न हो ..)

बग्गा माँ का हाथ कर माँ को अपने सीने से लगाने के लिए खेंचने लगा

.. मैं आगे बढ़ता उस से पहले hi माँ ने अपना हाथ छुड़ा कर एक थप्पड़ बग्गा के गाल पर जड़ दिया ...

बग्गा और उस के साथी सब हैरान रह गए क एक तवायफ ने किसी को थप्पड़ मारा..

मारा तो मारा लेकिन बग्गा जैसे गुंडों के बाप जो अपने शहर का सब से बड़ा गुंडा था उसे थप्पड़ मार दिया .. सब सोच रहे थे देखो अब्ब बग्गा क्या करता है ...

लेकिन बग्गा साला किसी कुत्ते की नेसल से था उसी गुस्सा नहीं आया बल्कि वो हरामी साला मादरचोद उस की माँ को छोड़ों .. वो बग्गा बेहेन का टक्का माँ की डेरिंग देख कर माँ पे फ़िदा हो गया ...

बग्गा ज़ोर ज़ोर से कहकहे लगाने लगा .हाहाहाःहाहा ..... फिर बग्गा अपने एक आदमी को देख कर बोलै

बग्गा ..... ोये पंकज मिल गई रे तुम लोगों की मालकिन ... हाहाहाहाहा

मज़ा ा गया (फिर माँ की तरफ देख कर बोलै) अब से तुम मेरी हो गई मैं तुम को अपने साथ ले जाऊँगा मेरे घर की मालकिन बन के मेरे आदमियों पर राज करेगी..

फिर बग्गा अपने आदमियों को आर्डर देते हुए बोलै

बग्गा ..... चलो रे इस का सामान उठा कर इसे ले कर चलो

(माँ अपने आप को कोसने लगी क्यों उस ने बग्गा को थप्पड़ मारा ....

तभी हाल के एक तरफ से तालियों की आवाज़ गूंजने लगी सब ने उस तरफ देखा..

रेखा बाई दोनों हाथों से पूरे ज़ोर से क्लैपिंग कर रही थे ..

वो क्लैपिंग कर रही थी और साथ में बग्गा की तरफ देख कर tamas-khrana अंदाज़ में मुस्कुरा रही थी...

बग्गा की तो रेखा को ऐसे मुस्कुराते देख कर झांट hi सुलग गई...

बग्गा ने रेखा बाई का सिर्फ नाम hi सुना था देखा नहीं था .

बग्गा .... तू कौन है ऋ जो बग्गा का मज़ाक़ उदा रही है ... जानती भी है बग्गा तेरा क्या हशर करे गए...

रेखा बाई ....... हाहाहाःहाहा ..... बग्गा ...... हाहाहाहाहा ..... बग्गा..........



बग्गा ........ शॉकेड

रेखा पागलों की तरह हँसते हुए बग्गा के चारों तरफ चाकर लगाने लगी हँसते हँसते वो एक दम चुप हुई ... फिर बग्गा की आँखों में देख कर बोली...

रेखा बाई ........ में जानती हूँ तू किस नेसल का है तेरा बाप कौन है तेरी माँ ने कैसे तुझे अपनी छूट से निकला ....

साले गन्दी नस्ली के कीड़े तू वो कुत्ता है जिस ने अपनी माँ और बेहेन को hi दस लिया

दो वक़्त की रोटी खाने के लिए kahan-kahan .. kis-kis के आगे हाथ नहीं फैलाये तुमने ... भीक मांगते मांगते चोरियां करने लगा .. चोरियां करते करते तू गुंडा गर्दी करने लगा और गुंडा गर्दी करते करते अपने hi बॉस की पीठ में चुरा घोंप कर तू अपने शहर का डॉन गया ....

साले गन्दी नाली के कीड़े तू मुंबई में आया है तो मुंबई के बारे जान तो लेता

अपने शहर में hi रहता तो ाचा था मुंबई आ कर तूने गलती करदी ...

बग्गा रेखा बाई के मोहन से अपना कच्चा चट्ठा सुन कर दांग रह गया

उसे अंदाज़ा जी नहीं था के उसे किसी ऐसी हस्ती के दर्शन जो जायेंगे बग्गा कुछ कुछ डर गया फिर पोछने लगा ...

बग्गा ....... तुम कौन हो ......

रेखा बग्गा की आँखों में देखने लगी फिर बोली

रेखा बाई .....तूने कभी अपने शहर में रेखा बाई का नाम सुना है...

Bagga.....Haan सुना है ..तुम ये क्यों पूछ रही हूँ

रेखा baai......sirf रेखा बाई का नाम hi सुना है या इस के बारे में कुछ जानते भी हो ......

बग्गा............ हाँ जानता हीं मुंबई में उस का hi सिक्का चलता है.....

Rekha............Sab जानते हो फिर भी उस के सामने अक्कड़ कर खड़े हो...

बग्गा और उस के आदमी ये सुन हैरान हो गए

Bagga............tum हो रेखा बाई.. Maan,na पड़े गए तुम्हारे ऐटिटूड और तुम्हारे स्टाइल को क्या डेरिंग है तुम में ... लेकिन तुम कोठे पर क्यों हो जितना तुम्हारा नाम है तुम्हें कोठे का धंदा चलने की क्या ज़रुरत है.....

रेखा........ (रूखे अंदाज़ me)wo jan'na तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं अब्ब फूट लो यहाँ से ... दादागिरी करनी है तो अपने शहर जा के करो यहाँ नहीं ... चलो अब्ब निकलो धंदे का टाइम ख़राब मत करो .....

अब्ब बग्गा ठहरा एक नंबर का हरामज़ादा उसे कहाँ चैन मिलने वाला था अपने शहर का डॉन जो tha...Ab हर डॉन अपने आप को शेर hi समझता है .. बग्गा रेखा से डर ज़रूर गया था लेकिन साला ज़िद्दी भी एक नंबर का था ...

बग्गा........... अरे रेखा बाई जी मुझे इस औरत को खरीदना है तो बोल कितने पैसे लोगी इस के.....

रेखा.......... कहा न फूट ले यहाँ से

बग्गा ......... क्यों तेरा यही तो काम है ना पैसा ले कर तू किसी को भी बेच देती है तो फिर मुझे इस औरत को क्यों नहीं बेच सकती ...

(माँ छोटी और में भी सब बातें सुन रहे हम सब के दिल की धड़कन बोहत बढ़ गई थी पता नहीं रेखा बाई क्या फैसला करती है लेकिन माँ को इक आस थी वो जानती थी रेखा बाई जैसी भी है अपने रूल्स से पीछे नहीं hat'ti ...

Rekha..........Bada ज़िद्दी है तू बग्गा जा चला जा यहाँ से ...ये मुंबई है बोले तो अपुन का मुंबई यहाँ तेरी ज़िद्द काम नहीं करेगी ......

Bagga.........Are बाई जी मैं ज़िद कहाँ कर रहा हूँ मैं तो बस तुम को तुम्हारे धंदे के बारे बता रहा हूँ मुझे ये औरत चाहिए चाहे मुझे कोई भी कीमत देनी पड़े ..........रेट अपनी मर्ज़ी लगा लो ..........

रेखा.......... हम्म्म्म बोहत पैसा है तेरे पास कितना दे सकते हो .......

बग्गा ........ कहा न बाई जी जो तुम बोलो वो मिल जायेगा ...

रेखा और बग्गा की कन्वर्सेशन जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी वैसे hi हमारे दिल की धड़कनें भी रफ़्तार की आखरी हद को छूने लगी थी .... मेरा ग़ुस्सा तो कब का रफू चक्कर हो चूका था ... आज मुझे सही मने में रेखा बाई की पावर का पता चला था. बग्गा जैसे रेखा के आगे कुछ भी नहीं थे ...

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रेखा बाई वाक़िए में माँ को बेचने का हक़ और पावर दोनों रखती थी ....
 
अपडेट: 3

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रेखा और बग्गा की बातें सुन कर हम तीनो की धड़कनें रुकने के कर्रेब थी

रेखा बाई ..... बग्गा तूने कहा तेरे पास बोहत पैसा है ... तू उस पैसे से कुछ बी खरीद सकता है ...

बग्गा .... (अकड़ कर) हाँ मैं कुछ भी खरीद सकता हूँ ... मैं क्या जिस के पास भी पैसा है वो कोई भी चीज़ खरीद सकता है .......

रेखा बाई ..... ह्म्म्मम्म्म्म तो इस का मतलब है के (रेखा बोलते बोलते रुकी फिर अचानक बग्गा की आँखों में देख मुस्कुराते हुए बोली) मेरे पास तुम से भी ज़यादा पैसा है तो क्या मैं तुम को भी खरीद सकती हूँ .... बोल कितना पैसा चाहिए मैं तुझे दूँगी ... यहाँ रह कर मेरे तलवे चेतना और जितना पैसा चाहे ले लेना .... बोल छाते गए मेरे तलवे ....

रेखा की बात सुन बग्गा ग़ुस्से से पागल हो गया ... तैश में आ कर वो रेखा के ऊपर झपटा .... लेकिन बीच में hi रेखा बाई के गार्ड्स आ गए ....

रेखा बाई .... (हँसते हुए) पहले बोल दिया था तुझे ये मुंबई है यहाँ मेरा राज चलता है और इस पूरे बाज़ार में मेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता तक हिल नहीं सकता और तू मुझ पर झपटे गए .... जा चला जा अपने आदमियों को ले कर वर्ण यहीं मारा जायेगा ...

बग्गा तिलमिला कर रह गया फिलवक्त वो कुछ कर नहीं सकता था ... उस का बस नहीं चल रहा था के इस कोठे की ईंट से ईंट बजा दे सब कुछ उजाड़ कर रख दे .... थोड़ी देर बाद वो अपने आदमियों को ले कर चला गया ...

हम सब अभी तक बट की मानिंद खड़े थे ... हाल में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ hi सुनाई दे रही थी ... जहाँ हम सकूं सा महसूस कर रहे थे ... के चलो बाला ताली ...रेखा बाई ने मेरी माँ को बग्गा के हवाले नहीं किया ... वहीँ मैं रेखा बाई का ये रूप देख कर परेशां हो गया जब बग्गा जैसों की यहाँ दाल नहीं गाल सकती तो मैं कैसे अपनी माँ और बेहेन को इस दलदल से निकल कर किसी सैफ जगह चुप सकता हूँ ... रेखा बाई से टकराना और उस की कमाई के ज़रिये को बर्बाद कर के अपनी माँ और बेहेन को यहाँ से लेजाना मेरे लिए नामुमकिन था ... रेखा बाई तो हमें पातळ से भी ढून्ढ निकलती ... अगर मुझे माँ और बेहेन को यहाँ से लेजाना है और उन को गुनहूँ से पाक ज़िन्दगी देनी है तो मुझे बग्गा से बढ़ कर कुछ ban'na होगा ... लेकिन कैसे ... हाउ इस थिस पॉसिबल .... हाउ कैन ी दो थिस ... हाउ कैन ी बिकम ा स्ट्रांग मन ... हाउ हाउ हाउ इतने हाउ थे मेरी छोटी सी ज़िन्दगी में ....

थोड़ी देर बाद रेखा बाई के बोलने पर हाल की ख़ामोशी टूटी ...

रेखा .... तुम सब ऐसे बट बन कर क्यों खड़े हो... चलो अपने अपने काम पे लग जाओ ... फिर जो बचे खुचे tamash-been थे वो बेथ गए ... और माँ के साथ जो दूसरी पांच लड़कियां थी ... माँ और वो लड़कियां फिर से नाचने लगी ... फिर कुछ नहीं हुआ और सब अपनी रूटीन के ऐन मुताबिक़ चलने लगा ... और रात ऐसे hi गुज़र गई ...

उस रात दो बातें मुझे पता चलीं

1...... यहाँ कोठे पर रहते माँ को कोई खतरा नहीं .... रेखा बाई के रहते बग्गा या बग्गा जैसा कोई और आ कर माँ के साथ ज़बरदस्ती नहीं कर सकता ... रेखा बाई को बी माँ से बोहत लगाओ था ... क्यूंकि यहाँ जितने भी कोठे थे

माँ जैसा नाच और आवाज़ किसी की नहीं थी ...

2.......अगर बग्गा का यहाँ ज़ोर नहीं चल सका तो मेरा काया चले गए ...रेखा बाई से टकराने के लिए मुझे बग्गा जैसों से भी बड़ा आदमी बनना होगा....

(साली रेखा बाई के पास अगर इतना पैसा है . के वो बग्गा को खरीदने की बात करती है तो फिर कोठा क्यों चलती है .. उसे माँ की कमाई की क्या ज़रुरत)

फिर कुछ दिन ऐसे hi बीत गए ...

एक दिन मैं बाजार के कुछ सामान ले कर कोठे पर आया ... तो मुझे किसी के रोने की आवाज़ आई .

विजय ... "ये प्रिय की आवाज़ तो है नहीं फिर कौन रो रहा है .." में मोहन hi मोहन में बड़बड़ाया .. सामान को एक कमरे में रखा और उस तरफ चल पड़ा जिधर से आवाज़ आ रही थी ... आगे जा के पता चला आवाज़ माँ के कमरे से आ रही है ...

मैं कमरे में गया तो देखा दो लड़कियों मेरी hi आगे की माँ के पास बीएड पर बैठी थी .. वो रो रही थी और माँ उन को चुप करा रही थी .. प्रिय भी पास बैठी उनको देख रही थी ...

विजय ..... बाजी ये कौन हैं और रो क्यों रही हैं ..

माँ ...... बीटा ये भी अगवा कर के लाइ गई हैं .... रेखा बाई इन्हें भी बेच दे गई ...

दोनों लड़कियों बोहत hi क्यूट थी . माँ से किसी खूफज़दा हिरणी की तरह लिपटी हुई थी ... मुझे वो दोनों बोहत पायरी लगी ... बिलकुल प्रिय जैसी मासूम सी..

विजय ..... बाजी रेखा बाई से बोल कर उन दोनों को यही रख लो ...

माँ ....... पागल हुए हो क्या यहाँ इनकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी ...

बिजय ...... बाजी यहाँ ये हमारे पास सेफ रहें गई ... रेखा बाई नजाने किस को बेच दे ... आगे चल कर इन की ज़िन्दगी कैसी हो ... नहीं बाजी इन दोनों को यही रख लो ...

माँ ....... विज्जु बीटा रेखा बाई कैसे माने गई ... वो अपनी मनमानी करती है वो भला मेरी बात कैसे मान सकती है ...

प्रिय ..... माँ प्लीज भाई की बात मान लो न मुझे भी ये दोनों बोहत पसंद हैं .... इन दोनों को यही रकः लू न ... मेरी दोस्त भी तो कोई यहाँ पर नहीं है ... प्लीज माँ (प्रिय मासूम सा चेहरा बना कर बोली)

माँ ...... ाचा ठीक है मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगी ..

(मैं और प्रिय खुश हो गए. पहले हम तीन थे अब्ब पांच हो जाएँ गे)

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फिलहाल इतना hi बाकी शाम को ... बे हैप्पी
 
अपडेट: 4

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दोनों लड़कियां अपनी पायरी पायरी आसनु बहती आँखों से मुझे देखने लगी . उनके मासूम चेहरे पर आसनु बहती ऑंखें कुछ ज़यादा hi सज रही थी . मैं उन के पास जा कर बेथ गया ... उन दोनों ने माँ की तरफ देखा तो माँ बोली..

माँ .... डरो नहीं बेटी ये मेरा बीटा है ... प्रिय का भाई और आज से तुम दोनों का भी .. इस से डरो मत. मैं पूरी कोशिश करूंगी. तुम दोनों को अपने से अलग न होने दूँ.. "वो दोनों हमारी जितनी समझदार तो नहीं थी"

फिर से माँ के कहने पर उन के आंसू से साणे चेहरे पर कुछ शान्ति आ गई .. मैंने उन दोनों का एक एक हाथ पकड़ लिया ... और उन की आँखों में देखते हुए प्यार से बोलै .

विजय ... डरो नहीं सब ठीक हो जाये गए. क्या तुम दोनों मुझे अपना भाई बनाओ गई.

दोनों ने ख़ुशी ख़ुशी सर हिला दिया .. फिर मैंने उन का डर कुछ काम करने के लिए उनसे बात करने लगा ..

विजय .... ाचा तुम दोनों के नाम क्या है..

एक बोली... मेरा नाम जहान्वी है ..

और मेरा नाम नाम षुरूति है ... दोनों ने अपना अपना नाम बताया ..

विजय ... बोहत hi प्यारे नाम हैं तुम दोनों के

दोनों .... थैंक्स यू भाई .. आप बोहत अचे हैं

मुझे दोनों से बात करना ाचा लग रहा था ...कुछ देर दोनों से बात करने के बाद मैं बहार आ गया ...

अगले दिन माँ ने पता नहीं क्या किया. के रेखा बाई ने दोनों लड़कियों को माँ के हैंडओवर कर दिया... माँ ने दोनों लड़कियों को नाचने और गाना सीखने की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी... मुझे भी इस पर कोई ऐतराज़ नहीं था ... सीखने और धंदा करने में फ़र्क़ है ... वो नाच और गाना सीखती रहेंगी तो रेखा बाई कुछ नहीं बोले गई... माँ ने ये बात जहान्वी और षुरूति को समझा दी थी.. वो दोनों तो माँ की कोई बात टालती hi नहीं थी.. मैं माँ और प्रिय की तरह जानवी और षुरूति से काम hi बात करता था.... रेखा बाई मेरा ज़यादा लगाओ देख कर कही मुझे उनसे या उनको मुझ से दूर न करदे. यही डर रहता था मुझे गर वक़्त...

वक़्त कभी ठहरा है न ठहरे गए. मेरा वक़्त भी किसी तेज़ रफ़्तार ट्रैन की तरह भागने लगा. देखते hi देखते मैं साल का हो गया...

माँ की khoob-soorti वैसी की वैसी hi थी. पता नहीं कैसे इतने दुःख में होने के बावजूद भी माँ का शबाब वैसे का वैसा hi था ... अभी तक माँ का डंका पूरे बाज़ार में zoor-o-shor से बजता था.. दूर दूर से tamash-been माँ के नाच और उनकी आवाज़ की कशिश में बावले हो कर आते रहते थे ... बग्गा के इलावा किसी और ने कभी कोठे पे आ कर दंगा करने या मा को ह्रास करने की कोशिश नहीं की ...

रेखा बाई अपने कोठे के साथ साथ अपने इललीगल कामों में आगे hi आगे बढ़ती जा रही थी ...

बग्गा ने कई बार कोठे पर हल्ला मचने और माँ को उठाने की कोशिश की... दो बार खुद आया अपने कई आदमियों को ले कर... उस के आदमी tamash-been बन कर माँ को उठाने की कोशिश में मारे गए... लेकिन बग्गा अपनी बेईज़ती भूल नहीं पाया था .. रेखा बाई ने भी तंग आ कर उस के शहर में hi उसे बोहत नुकसान पोंछाया ... उस के कई अड्डे तबाह करवा दिए लेकिन बग्गा कभी हाथ नहीं लगा.

रेखा बाई ने बग्गा को बर्बाद करने की ठान ली थी.. रेखा बाई के आदमियों ने बग्गा की तलाश में उस के 80% से ज़यादा अड्डे तबाह कर दिए ....

आज से तीन महीने पहले बग्गा के अचानक कोठे पर हमले में उस के सारे आदमी मारे गए... वो खुद भी मारा जाता लेकिन पुलिस आ गई ... वो बग्गा को पकड़ कर ले गई ... रेखा बाई बग्गा को जान से मारना चाहती थी ... लेकिन बग्गा भी काम नहीं था.. उसने इन दो सलून में मुंबई में अपनी कुछ बड़े लोगों से जान पहचान बना ली थी... इस लिए रेखा बाई बग्गा को क़तल करने में नाकाम रही.

रेखा बाई को बड़ा ग़ुस्सा आया.. लेकिन रेखा बाई के पार्टनर्स ने उसे ठंडा कर दिया क्यूंकि बग्गा के रिलेशन्स भी अचे थे...

बग्गा का केस चला और उसे 6 साल की जेल हो गई ...

प्रिय जहान्वी और षुरूति में बड़ा चेंज आ रहा था. उन के बदन की रंगत din-ba-din उजली होती जा रही थी... उन के पहाड़ों की उठान तो ऐसी बढ़ती जा रही थी .. जैसे खाया पिया सब ख़ास उन के पहाड़ों को लग रहा हो.. अभी उन की उम्र एंटी ज़यादा भी नहीं थी ... प्रिय साल की थी तो जहान्वी और षुरूति साल की थी... लेकिन उन के चुके किसी 18 साल की लड़की के जैसे बड़े बड़े दिखने लगे थे...

कोठे के माहौल में रहते किसी की शर्म बाकी नै रहती.. मैंने माँ को कई बार नंगा देखा था. कई बार माँ की चुदाई भी देखि थी . सच कहूँ तो माँ के जैसी आज तक मुझे कोई नहीं दिखी. यहाँ an-ginat कोठे हैं और उन कोहटों पर an-ginat लड़कियां हैं सब की सब अप्सराएं हैं हर कोई एक दुसरे से बढ़ कर khoob-soorat है.. अगर कोठे की khoob-soorat लड़कियों को किसी वर्ल्ड ब्यूटी कांटेस्ट में खड़ा कर दिया जाये तो बिला मुक़ाबला hi सब की सब जीत जाएँ... आखिर पूरे देश से khoob-soorti को ढून्ढ ढून्ढ कर अगवा कर के यहाँ कोठों की ज़ीनत बनाया जाता है . कोठे ऐसे hi तो आबाद नहीं रहते इन कोठों के जैसी khoob-soorti कहाँ..

तो मैं बात कर रहा था माँ के narm-o-nazuk शरीर और khoob-soorti की इन्तहा के बारे में. माने माँ को कई बार चुड़ते देखा.. माँ की सिसकियाँ मेरी राग राग में रच चुकी थी.. माँ कभी भी अपनी ख़ुशी से नहीं चूड़ी लेकिन अब्ब लुंड की मुसलसल माँ की छूट में aamd-o-raft हो और माँ को मज़ा न ए ये कसिए हो सकता है. चुदाई से पहले और बाद में माँ को ाचा नहीं लगता था... लेकिन लम्बी चलने वाली चुदाई से माँ का कण्ट्रोल अपने आप पर नहीं रहता था... कुछ वक़्त के लिए माँ भी चुदाई के मज़े में डूब जाती...

पता नहीं मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ.. अपनी माँ की ऐसी फीलिंग और चुदाई की यादें मुझे अपने दिल में रखनी चाहिए.. लेकिन आप रीडर से इन्साफ करना भी ज़रूरी है जो ऐसी मन पसंद और सुरूर में लिपटी बातून का इंतज़ार करते रहते हैं...

जिस रात माँ की चुदाई होती थी उस रात की अगली सूबा माँ बोहत उदास hoti..halanke चुदाई से तबियत खिल उठती hai.lekin माँ मजबूर है न इस लिए उदास रहती है. मैं माँ का चेहरा देखता माँ मुझसे नज़रें चुरा लेती ...

मैं बता रहा था कोठे पर रहते शर्म ख़तम हो जाती है.. मुझे भी किसी से शर्म नहीं आती थी लेकिन मैं बेशरम भी नहीं था.. मैंने अपनी माँ प्रिय या जहान्वी और षुरूति को baar-ha नग्न देखा था.. लेकिन उन के नंगे अंगों को देख कर मुझे कभी भी बाद फीलिंग नहीं आई.. हालांकि आस पास के कई कोठों पर मौजूद लड़के जो मेरी hi आगे के थे वो थोड़ी सी आगे में hi हर काम कर चुके थे.. लेकिन मैं उन सब से अलग था.. मुझे औरत की मजबूरियों का अहसास था मेरा सिर्फ एक hi मक़सद था अपनी माँ और बहनो को यहाँ से निकल एक सेफ ज़िन्दगी देना...

माँ भी अजीब थी अपनी मर्ज़ी से कभी भी नहीं चूड़ी लेकिन अपने आप को ीनता मेन्टेन किये रहती थी के क्या बताओं ..

जैसे कोई अठरा साल की लड़की अपने सपनो के राजकुमार के इंतज़ार में हो और उस के साथ फ्यूचर में होने वाली चुदाई की तैयारी के लिए अपने सब ख़ास पार्ट्स जैसे बूब्स निप्पल छूट गांड का ख्याल रखती हो..

वैसे hi माँ भी रखती थी... मैंने जब भी माँ को नंगा देखा... अपनी माँ की छूट के लबूं को हमेशा आपस में मिला हुआ देखा हर चुदाई के बाद माँ अपनी छूट की ऐसे केयर करती जैसे कोई अपनी लाड़ली बेटी के नाज़ नखरे उठता है.. माँ के इतने सालों तक छोड़ने के बाद भी माँ की छूट हर डैम टाइट hi रहती थी... शायद माँ फ्यूचर में किसी के लिए अपने आप को बचा कर रखना चाहती हो .. अगर ऐसा है तो मुझे नहीं पता किस के लिए...

अब्ब जब मैं 25 आगे में हूँ और माँ की उन दिनों की यादों में खोया हुआ हूँ... तो मैं hi नहीं भर रहा दिल छह रहा है माँ की तारीफ करते करते स्टोरी की साड़ी अपडेट भर दूँ.. माँ की khoob-soorti और उन के शरीर की क्वालिटी के बारे में सब बता दूँ लेकिन सब कुछ अभी नहीं बता सकता... वो तब बताऊंगा जब माँ मेरे लुंड से चुद रही होगी... अभी बोहत देर है उस से पहले मेरी तीन तितलियाँ मुझे नहीं छोड़ने wali..."all रीडर जस्ट इमेजिन करें "

कैसा मंज़र होगा वो जब मेरा जैसा लड़का बड़ा होगा.. जो चुदाई का शोक नहीं रखता और मेरी तितलियाँ मुझे चुदाई के लिए फाॅर्स करेंगी... या शायद तब तक वक़्त मुझे चुदाई का चस्का लगा दे...

मैंने इंट्रोडक्शन में कुछ स्पेशल डिटेल नहीं माँ के इलावा किसी की ...

माँ की khoob-soorti का थोड़ा सा डिटेल इंट्रो मैंने दे दिया है

अब मेरी बाकी की तीनो तितलियों का इंट्रो न दो तो ज़ियादती होगी..

akhir-kaar कहानी के हीरो की बहने हैं सब से ज़यादा हक़ उन का hi बनता है..

इन्सेस्ट कहानी में माँ और बहनो को छोड़ने से बढ़ कर मज़ा भी कही और नहीं मिलता ना...

मैंने माँ की तारीफ तो कर दी अब्ब आती है बारी मेरी तितलिओं की

तो मैं बता रहा था के मैंने तीनो तितलियों कोकई बार नंगा देखा था मेरे सामने कपडे बदलना उन के लिए आम बात थी.. बारे और पंतय बदलना भी आम बात है उन के जिस्म के हर अंग को मैं करीब से देख चूका हूँ. उन के गांड और छूट को देख और टच कर चूका हूँ लेकिन वासना मैं नहीं .. अभी तक मेरे अंदर वासना नहीं बेदार हुई थी.. इतना तो मेरा कण्ट्रोल था खुद पर...

प्रिय तो मेरे हाथों में बड़ी हुई उसे तो मैं शुरू से अक्सर नंगा देखता आ रहा हूँ. वक़्त के साथ साथ प्रिय के बदन में जो जो तब्दीलियां आती जा रही थी सब मेरे सामने hi थे..

जहान्वी और षुरूति शुरू शुरू में मेरे सामने कपडे बदलते हुए झिझक फील करती थी लेकिन प्रिय को देख कर और मुझे देख कर अपनी झिझक ख़तम करदी .षुरूति और जहान्वी को मेरी आँखों में कभी भी गंदगी नज़र नहीं आई इस लिए जल्द hi वो मेरे सामने कुहल गई... षुरूति और जहान्वी जब यहाँ लाइ गई थी तो उन के बूब्स छोटे छोटे थे लेकिन प्रिय के तब भी उन दोनों से बड़े थे...

दो साल इतनी स्पीड से नहीं गुज़रे जितनी स्पीड से प्रिय षुरूति और जहान्वी बड़ी होती गई उन तीनो के बूब्स और गांड की उठान बोहत hi ग़ज़ब नाक होती जा रही थी..

बाकी की तारीफ मेरी तितलियों की बाद में..

(मुझे लगता है कही मैं ुन्देरगे रूल्स के खिलाफ तो नहीं जरा...)

रेखा बाई तीनो लड़कियों को देख कर माँ से बोहत खुश थी के माँ ने तीनो लड़कियों की अछि केयर की है ...

अब आगे बताता हूँ

ये दो साल बग्गा के मुसलसल हमलों की वजा से टेंशन में hi गुज़र गए .. मैं कुछ भी नहीं कर पाया... मैं अपने आप को इस काबिल नहीं बना पाया. के मैं अपनी माँ और बहनो के लिए कुछ कर सकूं ...

बग्गा के जेल जाने के बाद कुछ सकूं हुआ.. लेकिन जाने क्यों मुझे ये सकूं कुछ ाचा नहीं लग रहा था जैसे तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी होती है.. तूफ़ान के आने पर अचानक से जब ये ख़ामोशी toot'ti है तो सब कुछ बर्बाद कर के रख देता है.. मुझे भी ये ख़ामोशी कुछ ऐसी hi लग रही थी.

अब्ब मैंने ठान लिया था के बोहत वक़्त बर्बाद कर लिया अब कुछ करना चाहिए. यहाँ रह कर मैं कुछ नहीं कर सकता था.. मुझे यहाँ से जाना होगा किसी दुसरे दूर दराज़ के शहर में. वहां से कुछ बन कर लौटों. यहाँ रह कर मैं कुछ नहीं बन पाऊँगा.

वक़्त मुठी में बंद रेट की तरह मेरे हाथ से निकलता जा रहा था.. पहले हम तीन थे अब्ब पांच हॉग ए थे. आखिर मेरे hi कहने पर माँ ने जहान्वी और षुरूति को यहाँ पर रखा था.. जहान्वी और षुरूति मुझसे एक साल बड़ी थी और प्रिय एक साल छोटी. प्रिय की इतनी टेंशन नहीं जितनी अब्ब मुझे जहान्वी और षुरूति को ले कर होने लगी थी...

मैं अक्सर ऐसी hi सोचो में गम रहने लगा. माँ मुझसे पूछती तुम आज कल किन सोचो में गम हो. अब्ब माँ को क्या बताता सब तो जानती थी फिर भी पोछती रहती थी.

एक बात और बता दूँ माँ को मुझ पर और मेरा जो उनसे प्यार है उस पर पूरा भरोसा था. लेकिन मैं उनको यहाँ से निकल कर ले जाऊँगा इसपर यकीन नहीं था माँ को. मेरी पूरी ज़िन्दगी यहीं पे गुज़र गई थी. मैंने एंटी मार खाई थी के डेरिंग और ज़िद्द मेरे अंदर कूट कूट कर भरी हुई थी. लेकिन हर जगह ज़िद्द और डेरिंग काम नहीं आती. बाँदा अलका हो तो हर किसम के खतरे में कूद सकता है लेकिन अगर उस के साथ narm-o-nazuk बदन वाली औरतें हूँ तो फ़क़त डेरिंग काम नहीं आती. डेरिंग के साथ ताक़त और ज़हानत भी होनी ज़रूरी होती है.

और लड़ने का फन तो लाज़मी होना चाहिए..

एंटी सी आगे में मैं ये सब बातें सीख गया था. लेकिन कोई रास्ता नज़र में नहीं था. रास्ता दिखने वाला चाहिए या खुद ढूंढ़ना चाहिए. यहाँ कोठे पर रह कर तो मुझे न तो कोई रास्ता दिखने वाला मिल सकता था. न मैं खुद ढून्ढ सकता था. मुझे यहाँ से भागना होगा. लेकिन फिर मेरे पीछे अगर कुछ हो गया तो. कहीं रेखा बाई ने माँ या मेरी बहनो में से किसी को कही बेच दिया तो. मेरा सिटी छोड़ कर जाना किस काम का. ऐसी hi बातें मेरा दमाग ख़राब करती रहती थी.

बड़ी हिम्मत आ गई थी मुझ में मैं किसी से डरता नहीं. दर्द को बर्दाश्त करने की तो मुझे आदत सी हो गई थी. रेखा बाई से पूरा शहर डरता था. लेकिन मैं नहीं. मुझे अगर रेखा से डर था तो अपनी और बहनो को ले कर था. रेखा बाई उन के साथ कुछ न कर दे बस वही डर था.

मज़ीद एक महीना इसी सोचो में गुज़र गया. क्या करून भागों या न भागों .

यहाँ रह कर अपनी माँ और बहनो की ज़िन्दगी भी बर्बाद होते नहीं देख सकता था और यहाँ से जाने के बाद पीछे जाने क्या हो ये डर भी था .

एक महीने में इतना दमाग ख़राब हुआ. के पूछो hi मैट.. दमाग की माँ hi चुद गई थी....

इसी स्ट्रेस में मैं बीमार हो गया

एक हफ्ते तक बिस्तर पर पड़ा रहा. माँ और बहने मेरा ख्याल रखती रही. लेकिन मेरे दर्द को कैसे जान पाती .

जब मेरी बीमारी चली गई तो मैं एक बार फिर से खुद को मज़बूत बनाने लगा. मुझे यहां से जाना हो गए जो होगा देखा जायेगा शायद भगवन और वक़्त ने मेरे बारे कुछ ाचा सोच रखा हो.

मैंने मैं बना लिया मुझे जाना है तो जाना है. अब्ब और कुछ नहीं सोचना. मेरे इरादे को एक दिन रेखा बाई ने पक्का कर दिया...

प्रिय के बढ़ती उम्र उस के शबाब के चर्चे माँ की तरह hi बाजार में हर किसी की ज़बान पर होने लगे. ोप्पर से कम्बख्त प्रिय khoob-soorat तो थी hi नाच और आवाज़ में मुआमले में माँ से भी दो हाथ आगे निकल गई. रेखा बाई को माँ के बाद प्रिय की शकल में अपने कोठे का फ्यूचर नज़र आने लगा..

एक दिन वो ऐसी hi बातें माँ से कर रही थी.. माँ बेचारी रेखा बाई की हाँ में हाँ मिलाये जा रही थी.. रेखा बाई बोहत खुश थी.. साली को tamash-beeni का कुछ ज़यादा hi नशा था. लड़कियों का मुजरा करना उसे बोहत पसंद था. पता नहीं हरामज़ादी ने इतना पैसा कमा कर कहाँ ले जाने थे...

उस दिन रेखा बाई के प्रिय बारे इरादे जान कर मैं अंदर तक हिल गया मतलब 6 साल. फिर प्रिय भी यहीं रह कर माँ की तरह चुद जाएगी.

मैं बहार अपने दोस्त पानवाले के पास चला गया उससे कुछ बात चीत हुई. एक बार फिर से मुंबई से दूर कौन कौन से शहर हैं उस पर बात की. मैंने अपने दोस्त अजित भाई को भी अभी तक नहीं बताया था के मैं आजकल क्या सोच रहा हूँ .

उस से डिटेल ले कर मैं घर आ गया .

कुछ देर बाद मैं माँ के कमरे मैं गया तो माँ कमरे में नहीं थी. मेरी तितलियाँ खाना खा रही थी. मैं भी उन के साथ hi बेथ गया वो मुझे खाना खिलने लगी सब बारी बारी मुझे खिला रही थी. हमारा प्यार हर गुज़रते दिन के साथ बढ़ता hi जा रहा था. थोड़ी देर लगी खाना ख़तम हुआ सब ने बर्तन साइड हटा मुझे खाना शुरू कर दिया. ये उन की रूटीन में शामिल हो गया था जब भी तीनो मुझे एक साथ मिलती मुझे पकड़ कर मेरी हालत खराब कर देती. चूम चूम कर मेरे गाल गीले कर देती तीनो थोड़ी सी hi आगे में बोहत बिगड़ गई थे.. वो सब कुछ मेरे साथ करती जिन की डिटेल अभी नहीं बता सकता. कहीं फिरसे वही ुन्देरगे रूल्स के अगेंस्ट न जाये. लेकिन इतना भी नहीं. जो आप सोच रहे हैं सिर्फ मस्ती और इस से बढ़ और कुछ nahi(is मस्ती में फुल नुदितय भी शामिल है) वो तीनो तो मेरे साथ बोहत कुछ करना चाहती थी लेकिन में इस काम से दूर था. पता नहीं तीनो आपस में कुछ ज़यादा करती थी या नहीं. लेकिन मेरे साथ लिमिट में रहती थी रात तो यहाँ हमें एक साथ सोने की इजाज़त नहीं थी मेरा कमरा हमेशा hi अलग रहता था. और वैसी भी वो रात देर धंदे में माँ के साथ मसरूफ रहती थी.. वो नाच सीख रही थी. tamash-beeno के सामने नाचती नहीं थी. लेकिन अब्ब पिछले कुछ महीनो से वो भी हाल में beth'ti थी रेखा बाई के सख्त ऑर्डर्स थे. आखिर फ्यूचर में रेखा बाई को इन तीनो को भी अपने साथ अपने धंदे पे लगाना था तो टैनिंग का ये भी एक हिस्सा था.. रोज़ रात को हाल में रहना.

मस्ती में मेरे कड़पे के साथ साथ अपने कपडे भी उतार देती थी. लेकिन आज नै क्यूंकि दरवाज़ा खुला था कोई भी किसी भी वक़्त आ सकता था. माने उन तीनो को साइड हटाया. माँ का पुछा कहाँ है .

प्रिय ... बैठी हो किसी के पास इतनी तो लड़कियां हैं यहाँ पे..

मैंने आप को एक बात नहीं बताई जहाँ जितनी लड़कियां हैं हमारी उन से बात चीत होती रहती है मेरी भी कई लड़कियों से बात चीत है कुछ ज़यादा बड़ी आगे की भी है. उन के साथ भी बात चीत होती रहती है लेकिन मैंने उन का ज़िक्र स्टोरी मैं नहीं किया. उन का ज़िक्र इस स्टोरी में ज़रूति नहीं इस लिए मैंने उन का ज़िक्र नहीं किया और वैसी भी उन के ज़िक्र से स्टोरी और लम्बी हो जाती और उन का स्टोरी से कोई लेना देना भी नहीं... ये मैट सोचना आप लोग के मैंने अपनी माँ और बहनो की मदद के लिए अपनी इतनी फीलिंग शेयर की हैं तो उस को भी इस दलदल से निकलने के बारे मैंने कोई बात क्यों नहीं की.

हम पांच हैं हमें अपनी आप को इस दलदल से निकलने के लिए नजाने कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे. मैं अपनी माँ और बेहेन को hi यहाँ स इ सरफे निकल कर ले जाऊं ये भी बोहत बड़ी बात है. बाकी सब को इस दलदल से निकलने के लिए ये कोई फंतासी स्टोरी नहीं है के हीरो एक चुटकी बजाये और पूरा का पूरा कोठा अपनी जगा से इनविजिबल हो कर फंतासी हीरो के बेसमेंट में मुन्तक़िल हो जाये.

सॉरी इतस नॉट पॉसिबल हेरे.

ी can't सेव इतर वीमेन और गर्ल्स.

अगर वक़्त ने साथ दिया और कुछ करने के काबिल हुआ. तो मुझे जहाँ जहाँ कोठे नज़र ए उजाड़ कर रख दूंगा. और कोठे को चलने वालियों को मैं मारूंगा नहीं उन का वो हशर करूंगा के जब तक ज़िंदा रहेंगी. वो यही सोचती रहेंगी के इस जनम में उन्हों ने कोठे पे धंदे का कारोबार कर के अपने इस जनम की सब से बड़ी गलती करदी.

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उम्मीद है आप सब को ये अपडेट पसंद आएगी
 
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उस दिन माँ से कोई बात नहीं हुई. दुसरे दी मैंने मौका देख माँ को इशारा किया माँ कमरे में चली गई. में भी इधर उधर देख माँ के पास कमरे में चला गया. कमरे में दाखिल होते hi मैंने दूर की चटखनी लगा दी. माँ मुझे hi देख रही थी.

माँ .... विज्जु बीटा तूने कुण्डी क्यों लगाई है सब ठीक तो है.

विजय ..... हाँ बाजी सब ठीक है बस आप से एक बात करनी थी.

माँ ... हाँ बोल बीटा क्या बात करनी है.

विजय .... मैं माँ का हाथ पकड़ कर बीएड पर बेथ गया. मैं सोचने लगा कैसे मैं माँ से बात करून. मेरी बात का क्या असर होगा माँ पर. क्या वो मुझे जाने देगी अपने से दूर इक अनजान दुन्या में जहाँ मैं पहले कभी नहीं गया. मैं भले hi अपनी उम्र के लड़कों से बोहत आगे था लेकिन ज़माने से आगे नहीं. कैसे इक अनजान शहर में अपने आप को संभल पाऊँगा. ये सब माँ भी लाज़मी सोचेगी.

माँ है ना, बेचारी तो डर जाएगी. कैसी अपने जिगर के टुकड़े को अपनी आँखों से दूर कर पाए गई. ज़माने की दर दर की ठोकरें खाने को मिलेंगी उस के बेटे को .....

भला एक माँ इतनी हिम्मत अपने अंदर कहाँ रखती है.

पर कोठे पर रहते माँ को भी बहादुर होना चाहिए. लेकिन मेरी माँ कितनी बहादुर है अब्ब पता नहीं.

मैं उन्ही सोचो में गम था . के माँ ने मुझे झंझोड़ डाला.

माँ ... बीटा किन सोचों में गम हो. बात करने आया है तो बात कर ना. इस से पहले के कोई आ जाये.

विजय .... बाजी मैं कैसे कहूँ कुछ समझ नहीं आ रहा .

माँ ...... ऐसी कौनसी बात है जिस के लिए इतना सोच रहे हो.

विजय .... वो .. वो .. मैं ये कहना चाहता था के यहाँ रह कर मैं कुछ नहीं कर सकता हम साडी ज़िन्दगी ऐसे hi रहते रह जायेंगे. आपकी तरह प्रिय की भी ज़िन्दगी इस कोठे की नज़र हो जाएगी. मैं सोच रहा था के मैं किसी और शहर मैं जा कर खुद को किसी काबिल बना कर आप सब को यहाँ से निकल कर ले जाऊं.

मेरी बात सुन कर माँ की आँखों में आसनु आ गए वो मुझे गले लगा कर रोने लगी मैं भी माँ के गले लग कर उनकी पीठ को हाथ से सहलाने लगा.

माँ ... मेरा बीटा इतना बड़ा हो गया है वो अपनी माँ और बेहेन के लिए ये सब सोच रहा है. लेकिन मैं तुझे कैसे जाने दे सकती हूँ. तू अगर चला गया तो हमारा क्या होगा.

विजय ... बाजी जाना पड़े गए वर्ण सब कुछ ख़तम हो जायेगा. अब तो रेखा बाई ने प्रिय को भी आप की hi तरह धंदे पर लगाने वाली है. उस से पहले के रेखा बाई प्रिय को भी धंदे पर लगाए. हमें यहाँ से निकलना हो गए.

माँ ..... विज्जु बीटा ये इतना आसान नहीं है जितना तू समझ रहा hai.rekha बाई के चुंगल से बच निकलना बोहत मुश्किल है. यहाँ हम खुश नै हैं लेकिन फिर भी यहाँ पर रेखा बाई के रहते कोई खतरा नहीं है.

विजय .... बाजी सब से बड़ा खतरा तो रेखा बाई खुद है. बाकी के खतरे बाद में देखे जायेंगे. पहले हमें यहाँ से निकलना होगा.

माँ .... लेकिन बीटा तू जायेगा कहाँ. तू इस से पहले कभी इस बाजार से बहार भी तो नहीं निकला. कहीं कुछ और गड़बड़ न हो जाये. मुझे डर लगता है. भगवन न करे अगर तुमको कुछ हो गया तो फिर हमारा क्या होगा. मैं तो सिर्फ तुम दोनों की वजा से ज़िंदा हूँ वर्ण कब की मर गयी होती.

मैंने माँ के मरने की बात सुन कर उनके मोहन पर हाथ रख दिया फिर बोलै

विजय .... बाजी प्लीज मरने की बात न किया करो मेरे सामने मेरा भी तो आप दोनों और षुरूति जहान्वी के सिवा कौन है इस दुन्या में. मैं तो सिर्फ आप सब के लिए यहाँ से जाने का सोच रहा हूँ. यहाँ से जाऊँगा नहीं तो आप सब को लेकर कैसे जाऊँगा. मुझे पहले यहाँ से निकल कर अपने लिए कोई ठिकाना ढूंढ़ना है. फिर कुछ बनना है. इतना ताक़तवर बनना है के रेखा बाई हमें न रोक सके ...

अभी प्रिय छोटी है तो हमारे पास कुछ साल का टाइम है. फिर रेखा बाई प्रिय को भी धंदे पर लगा देगी. षुरूति और जहान्वी तो मुझसे बड़ी हैं उनको तो रेखा बाई जल्द hi धंदे पर लगाएगी. मुझे प्रिय और आप सब के लिए जल्दी hi जाना होगा वापिस आने के लिए.

बाजी जब तक हम हिम्मत नहीं करेंगे हम इस दलदल से कैसे निकलेंगे.

माँ .... विज्जु बीटा तू सही कह रहा है. लेकिन कहीं ऐसा न हो के अछि ज़िन्दगी तलाशने की चक्कर में इस ज़िन्दगी में जो खुशियां तुम्हारे और प्रिय की सूरत में मेरे पास हैं कहीं वो न मुझसे छीन जाये. विज्जु बीटा बस यही डर रहता है मुझे हर वक़्त. मेरी सांसें सिर्फ तुम दोनों की वजा से चलती है.

ये बोल माँ दुपट्टे को मोहन पर दबा कर फूट फूट कर रोने लगी. मेरा दिल भी अंदर hi अंदर खून के आंसू रोने लगा. ऐसी सीटूशन में पास माँ को दिलासा देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था. फिर भी मैं माँ को झूठे दिलसे देने लगा. उन के आंसू अपनी ऊँगली की पोरों से साफ़ करने लगा. माँ का रोना रुक hi नहीं रहा था. बड़े दिनों बाद आज माँ का कण्ट्रोल ख़तम हुआ था. माने भी कुछ सोच कर माँ को रोने दिया. माँ तब तक रोटी रही जब तक माँ के अंदर की घुटन किसी हद तक आसनु की सूरत में बह कर निकल न गई. कुछ देर बाद मा थोड़ी रिलैक्स हुई.

मैं माँ की आँखों में और माँ मेरी आँखों में देखने लगी कितना दर्द था माँ की आँखों में. अगर मेरा दिल कमज़ोर होता तू यकीनन माँ की इस तड़प को देख कर शीशे की तरह चूर चूर हो जाता.

लेकिन कम्बख्त इस ज़माने ने इतना दर्द मेरे लिए बचा कर रखा हुआ था के दिल चूर चूर तो न हुआ लेकिन इस दिल के दर्द को बर्दाश्त करने की शक्ति अपने अंदर ख़तम होते महसूस होने लगी. माँ ने अपने अंदर की घुटन को अपने आंसुओं की सूरत निकल कर कुछ तो खुद को रिलैक्स कर लिया. मैं क्या करता मैं कैसे अपने अंदर की घुटन को निकालों मेरे पास तो कोई रास्ता कोई कन्धा नहीं था. माँ का कन्धा या आँचल मुझे सकूं देने से क़ासिर थे. नजाने कितने साल मुझे इसी घुटन के साथ रहना था. या इसी घुटन को सहते सहते मर्डर जाना था. ज़िन्दगी कितनी थी मेरी. थी भी या नहीं. मैं नहीं जनता था...

जिस राह पर मैं निकलने की सोच रहा हूँ उस राह पर मेरे लिए साँसों की बड़ी अहमियत थी. वक़्त ख़तम होने से पहले मुझे अपने मक़सद में कामियाब होना था. लेकिन कैसे ............
 
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कुछ देर ऐसे hi सोचते-2 गुज़र गई. माँ भी अब बेहतर लग रही थी.

विजय .... बाजी रोने से क्या होगा अगर हिम्मत न की तो बाकी की ज़िन्दगी भी ऐसे hi रट गुज़र जाएगी. पहले आप अकेली थी और कोई आप का सहारा नहीं बन पाया था. इस लिए आप यहाँ मजबूर हो कर खुद को बर्बाद होने से बचा न पाई.

लेकिन अब्ब मैं हूँ न आप के साथ. हम दोनों को मिल कर प्रिय, षुरूति और जहान्वी को यहाँ से निकलना है. बाजी आप सुन रही हैं न मेरी बात. कुछ साल और बर्दाश्त करलो. भगवन ने चाहा तो हम यहाँ से निकल जायेंगे. कोशिश करने से hi कुछ हो सकता है. आपको हिम्मत रखनी चाहिए.

मैं यहाँ से जाने के बाद अजित भाई से आप सब की खैरियत जनता रहूंगा.

कभी भी अगर मेरी ज़रुरत पड़ी तो मैं आ जाऊँगा. लेकिन मेरा जाना ज़रूरी है. आप अपने दिल को मज़बूत बना लें.

माँ मेरी सुन खुश भी थी. उदास भी थी. दर्री हुई भी लग रही थी. एक साथ रहने से हौसला मितला रहता है. मेरे जाने से वो अकेली पद जाएगी. यही सोच उस की हिम्मत टूटने लगती थी............

"एक ठंडी गहरी सांस लेते हुए माँ ने मुझे गले लगा लिया और लगी मेरे पूरे चेहरे को चूमने. कुछ देर ऐसे hi मेरे चेहरे को चूमने के बाद माँ मुझसे अलग हुई. उनकी आँखें फिर से नाम हो गई थी...... "

माँ ..... 14 साल हो गए हियँ विज्जु बीटा दुःख दर्द झेलते झेलते सहते सहते अंदर से खोखली हो गई हूँ (इक गहरी सांस लेते हुए) कुछ साल और सही. तू जा मेरा बीटा, जा और "himmat-wala" बन कर आ हम सब तेरा इंतज़ार करेंगे. हम सब की दुआएं तेरे साथ हैं. लेकिन बीटा हर दम अपना ख्याल रखना ये कभी न भूलना के तू यहाँ हम सब को इस क़ैद में छोड़ कर जा रहा है. अगर तुझे कुछ हुआ तो तेरे साथ साथ 4 और भी मारेंगी ये याद रखना.

हम सब साथ हैं तो ज़िंदा hain.....warna ज़िन्दगी में और कुछ है नहीं हमारा.

अब्ब मुझ में और बोलने की हिम्मत नहीं है. अब्ब अपनी बहनो को तुझे खुद hi संभालना होगा. मैं नहीं उनसे बात कर सकती. प्रिय का क्या हाल होगा. जब उसे तेरे जाने का पता चलेगा. तू खुद hi उन तीनो से बात कर.

माँ ने तीनो बिल्लियों को मेरे हवाले कर दिया और मैं माँ का चेहरा देखने लगा. माँ का चेहरे पर जो कुछ देर पहले जो दर्द और मुझसे बिछड़ने के भाव थे अब्ब तीनो बिल्लियों को "मैंने मानना है" इस बात को ले कर शरारत के भाव दिख रहे थे. मैं इतनी जल्दी माँ के चेहरे के भाव बदलते देख हैरान रह गया. पर माँ को तो दर्द सहने की आदत पद चुकी थी. उनके लिए खुद को कण्ट्रोल करना भी आता था. वो अब्ब आँखों में शरत लिए मुझे देख रही थी. मैं भी हड़बड़ा गया.

विजय ... बाजी मैं उन तीनो से कैसे बात करूंगा. वो आप की बात जल्दी समझ जाती हैं. मुझसे ये होना मुश्किल है. प्लीज आप मेरी हेल्प करदें उनको मानाने में.

माँ ..... (हँसते huye)na न ये तेरा काम है तू खुद hi कर. बोहत देर हो गई है अब्ब तू जा कर कुण्डी खोल दे किसी को कोई शक न हो जाये. तू यहाँ से ख़ामोशी से जाना किसी को भनक न पड़ने देना.

फिर मैंने दूर की कुण्डी खोल बहार चला गया. अपनी बिल्लियों से फिर कभी किसी मुनासिब टाइम देख कर बात करने का सोच कर मैं बाजार के लिए निकल गया.

आज बोहत दिन के बाद मुझे अपने अंदर का माहौल कुछ हल्का फुल्का सा लग रहा था. माँ से अपने जाने की बात करना आसान नहीं था. माँ मान भी गई थी. मेरे जाने के लिए. और माँ ने खुद को संभल भी लिया था. आज बोहत दिन बाद मुझे बाजार के माहौल में घुटन कुछ काम महसूस हो रही थी.

"...........शायद मेरे जाने का वक़्त आ गया था.............."

मैं चलते हुए अजित भाई की दूकान पर चला गया. इस वक़्त वो अकेला hi था अपनी दूकान पर. माने ये मौका सही जाना और अजित भाई की दूकान के अंदर चला गया. अजित भाई मुझे दुकान में देख खुश हो गए.

अजित भाई.... अरे बिजय आज कुछ ख़ास है क्या बोहत बदला बदला लग रहा है.

विजय ....... हाँ अजित भाई आज सच में कुछ बदला हुआ है.

अजित भाई.... मुझे बता, सब ठीक तो है ना..

विजय ....... हाँ अजित भाई सब ठीक hi है. कुछ बात करनी थी आप से.

अजित भाई ... हाँ हाँ बोलो, क्या कहना है. मुझे बताओ.

विजय ....... अजित भाई एक काम था आपसे. कैसे कहूँ काम अजीब भी है, और खतरनाक भी...

अजित भाई ... ऐसी क्या बात हो गई, तू आज बड़ी अजीब अजीब बातें कर रहा hai,baat को घुमा मत सीधे सीधे बोल, कैसा काम, और कैसा खतरा...

विजय ....... (धीमे लहजे में ) अजित भाई मैं यहाँ से निकलने की सोच रहा हूँ .

अजित भाई ... (शॉकेड) क्याआआआ

विजय ....... अजित भाई प्लीज अपनी आवाज़ धीमी रॉकहॉ मरवाओ गे क्या...

अजित भाई ... (आवाज़ डाउन) हाँ क्यों जाना चाहता है और कहाँ जाना चाहता है .

विजय ....... अजित भाई आप तो सब जानते हैं मेरी माँ और बहने यहाँ कितनी मजबूर हैं. माँ ये सब मजबूरी में कर रही है. और अब्ब तो प्रिय भी बड़ी हो रही है. अगर मैंने कुछ न किया तो प्रिय को भी रेखा बाई बर्बाद कर देगी..

(थोड़ा सा डिटेल इंट्रो अजित भाई के बारे में...)

अजित भाई की ज़िन्दगी भी अछि नहीं गुज़री है जब वो 15 साल के थे. तो इन के चाचा ने इनके माता पिता को मार कर अजित भाई को घर से निकल दिया था.

अजित भाई के पिता के पास 30 एकर ज़मीन थी. उस ज़मीन के लांच में अजित भाई के चाचा ने अजित भाई के माता पिता को मार दिया था. इन की एक बेहेन भी थी जिस की आगे उस टाइम 13 साल थी. जब अजित भाई को घर से निकला गया था, तब अजित भाई की बेहेन घर में नहीं थी वो अपनी सहेली के घर गई हुई थी. अजित भाई dar-ba-dar भटकते हुए मुंबई पोहंच गए, यहाँ रह कर खुद को काबिल बनाया और 20 साल की आगे में अपने घर गए, तो पता चला के उस के चाचा तो कब के घर और ज़मीन बेच कर कहीं चले गए, अजित भाई को अपनी बेहेन का बोहत ग़म था, 2 साल तक कई शहरों में ढूँढ़ते rahe,lekin बेहेन नहीं मिली, थक हार कर फिर से मुंबई ा गए, और इनकी ज़िन्दगी में मालती नाम की लड़की आ गई वो भी be-sahara थी तो, दोनों ने शादी कर्ली, तबसे वो यही रह कर लाइफ गुज़र रहे है,)

अजित भाई (पानवाला) आगे: 35 साल

मालती (वाइफ) आगे: 34 साल

शिखा बेटी आगे: ....

रूपा बेटी आगे: ....

राज बीटा आगे: ....

__________________________________________

अजित भाई ... (कुछ देर मुझे देखते रहे) "बोले" मैंने खुद से कई बार सोचा था तुमसे ये बात करों लेकिन डर लगता था कहीं किसी को भनक भी पद गई तो रेखा बाई मुझे और मेरी फॅमिली को मार दे गई. इस लिए डरता था तुमसे बात करते हुए. सच कहूँ तो मुझे तुम को देख कर कभी भी नहीं लगा तू यहाँ की ज़िन्दगी का हिस्सा बन सकता है. इस लिए सोचता था के तुम को कुछ और करने का मश्वरा दूँ लेकिन दर लगता है था. अब्ब तू खुद hi यहाँ से जाना चाहता है तो इस से अछि बात क्या होगी. लेकिन तेरे जाने के बाद तेरी माँ और बहने उन का क्या होगा.

विजय .... अब्ब जाना तो है hi और जाना ज़रूरी भी है. जाऊं गए नहीं तो काबिल कैसे बनूँ गए. और काबिल नहीं बना तो माँ और बहने रूल जाएँगी.

इस लिए हिम्मत तो करनी पड़ेगी ना. बाकी सब भगवन जाने.

अगर भगवन ने हम सब की ज़िन्दगी ऐसे hi सिसकते कुचलते हुए लिखी है. तो हम क्या कर सकते हैं. और भी नजाने कितनी ज़िंदगियाँ यहाँ सिसक सिसक कर ख़तम हो गई. और कई यहाँ पर अपनी साँसों की डोर थमने का इंतज़ार कर रही हैं.

लेकिन मैंने अभी हिम्मत नहीं हारी, अभी मेरी सांसें चल रही हैं....

"जब तक सांस तब तक आस"

में जाऊं गए यहाँ से वापिस आने के लिए देखते हैं भगवन ने मेरे और मेरी फॅमिली के लिए किया लिख रखा है...

अजित भाई आप अपना मोबाइल नंबर कभी बंद मत करना. मैं आप से राब्ते में रहूँगा. यहाँ कुछ भी गड़बड़ हो तो आप मुझे बना देना. और हाँ अजित भाई भाभी का नंबर भी मुझे दे दो, कभी आप का नंबर बंद हुआ तो मैं भाभी के नंबर पर कॉल कर लूंगा...

अजित भाई .... चल ठीक है जितना मुझसे हुआ उतना मैं करूंगा.

विजय ...... अजित भाई किसी को पता न चलने देना मेरा आप से राब्ता है, वर्ण रेखा बाई का कुछ पता नहीं माँ और मेरी बहनो के साथ क्या करे. और अआप के लिए खतरा हो सकता है, हो सकता है मेरे जाने के बाद वो आप से ये पूछें के मैं कहाँ गया हूँ..

अजित भाई ... मैं सावधान रहूँगा तुम भी कोई प्लान बना कर निकलो यहाँ से ऐसे hi न भाग जाना.

विजय ...... कुछ न कुछ तो सोचना पड़ेगा. ाचा अब्ब मैं चलता हूँ.

अजित भाई से बात करके ाचा भी लगा और डर भी, यहाँ से जाना आसान नहीं था मेरे पीछे रह जाने वालों के लिए सिचुएशन अछि नहीं थी, अजित भाई के लिए भी खतरा हो सकता था. कही मैं अपने चक्कर में अजित भाई की khush-haal फॅमिली के लिए खतरा न जाओं. ये सब भी हो सकता था, रेखा बाई कोई आम औरत तो थी नहीं और न hi उसे किसी पर दया आती थी. अगर उसे ज़रा भी भनक पद गई के अजित भाई मेरे बारे कुछ जानते हैं. तो रेखा बाई अजित भाई तो कुत्तों के आगे दाल देगी.

ऐसे hi सोचता हुआ मैं अपने दलदली ठिकाने पर पोहंच गया.
 
ऐसे hi सोचता हुआ मैं अपने दलदली ठिकाने पर पोहंच गया.



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आज का दिन ऐसे hi गुज़र गया. अगले दिन मैंने मुनासिब मौका मिलते hi अपनी तितलियों के कमरे में इंट्री मारी. वो लगी हुई थी अपनी सोसिप में. मेरी तितलियाँ मुझे देख कर चहकने लगीं.

(अभी इन के चेहरे की चमक उतरने वाली थी. बड़ा परेशां किया था इन दो सालों में इन तीनो ने मुझे अब्ब मेरी बारी थी, (...जॉकिंग....)

"भला मैं अपनी इन तितलियों को परेशां कर सकता था जितना उन को दर्द होता उल्टा मुझे भी hota.maine दूर की चटखनी lagai.aur उन के पास बेथ गया. उन को लगा मैं कोई बात करने वाला हूँ इस लिए मस्ती को पेंडिंग कर दिया उन तीनो ने..."

प्रिय .... भाई कुछ कहने वाले हैं आप, बोलिये क्या बात है

शुरतुइ .... हाँ भाई हमें बताओ. जो भी कहना है

मेरा चेहरा संजदीदा था इस लिए वो ऐसे बोल रही thi.jhanvi भी मेरी तरफ देख रही थी.

एक ठंडी सांस के साथ मैंने षुरूति और जहान्वी का एक एक हाथ पकड़ कर प्रिय की गॉड में सर रख दिया.

मेरी ऐसे रियेक्ट करने पर तीनो पागल होने लगी. "उनके दिल की धड़कने बढ़ने लगी. हम सब एक दुसरे को अचे से जानते थे. इतनी फेस रीडिंग तो आती hi थी."

तीनो ने पहले एक दुसरे की तरर्फ देखा प्रिय मेरे सर के बालों में उँगलियाँ फेरने लगी. षुरूति और जहान्वी ने मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर कास लिया और लगी मुझे घूरने "जैसे मैं अभी कोई बम फोड़ने वाला हूँ" बम तो मैं रियल में hi फोड़ने वाला था अब्ब इस का क्या रिजल्ट निकलता है "भगवन जाने"

अपनी आँखों को दो तीन बार भींच कर लम्बी सांस ले कर मैंने तीनो को बारी बारी देखा.

और फिर बोलने लगा, इस बीच तीनो के दिल की धड़कनों को आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी.

विजय ..... तुम तीनो को मुझ पर कितना भरोसा है.

तीनो ...... ये कैसा सवाल है, और मतलब क्या है आप का

विजय ...... नहीं पहले बताओ

(प्रिय रोने लगी, और षुरूति और जहान्वी भी प्रिय का साथ देने वाली )

"प्रिय रट हुए बोली"

प्रिय .... भाई ऐसे बात मत करो मुझे डर लग रहा है प्लीज.....

षुरूति और जहान्वी से बोलै न गया वो कभी मुझे और कभी प्रिय को देख रही थी उनकी पकड़ मेरे हाथों पर सख्त होने लगी...

विजय ...... (अपना एक हाथ छुड़ा कर प्रिय का हाथ पकड़ कर चूमते हुए) रो क्यों रही हो मैंने कोई ऐसी बात तो नहीं की है सिर्फ यही पुछा है के मुझ पर कितना भरोसा है...

प्रिय ... (न न में सर हिलाते हुए) नहीं भाई आप वो बात करें जो करने ए हैं मुझे लगता है कोई और बात hai..:"priya मेरी जान रोये जा रही थी"

(मैं उठ कर बेथ और प्रिय के चेहरे को पकड़ कर चूमते हुए अपने गले लगा लिया प्रिय का जिस्म रोने की वजा से कम्पनी लगा था मैं प्रिय की पीठ को सहला कर उसे शांत करने लगा. षुरूति और जहान्वी भी पीछे से मेरे गले लग गई)

दिल को दिल से राह होती है. प्रिय मेरी जान थी वो मेरे दिल में हो रही हलचल से अनजान कैसे रह सकती थी. वो जान गई थी मैं कोई ऐसी बात करने वाला जून जो उससे बर्दाश्त नहीं होगी. इस दुन्या मैं हमारा था hi कौन बस छोटी सी दुन्या थी हमारी उस में भी दर्द hi दर्द बढ़ते जा रहे थे. नन्ही सी जान मेरी प्रिय कैसे इतना दर्द बर्दाश्त करती. मेरे बगैर रहना तो माँ के लिए भी मुमकिन नहीं था लेकिन दर्द सहते सहते उनकी सहन शक्ति बढ़ गई थी लेकिन प्रिय वो कैसे मेरी जुदाई सेह पायेगी. कही प्रिय को कुछ हो न जाये मेरे दूर जाते hi और षुरूति, जहान्वी उन का भी अब्ब हमारे इलावा कोई नहीं था उनको भी सिर्फ हम तीनो की hi आरज़ू थी. जहान्वी और श्रुति थोड़े से आरसे में hi हमारी आदि हो गई थी. और हमारी hi वजा से उनकी ज़िन्दगी में थोड़ी सी रौनक थी. पिछले दो साल में इन तीनो ने मेरे साथ खूब मस्ती की थी अब्ब मेरी गैर मौजूदगी में कैसे अपने आप को शांत रख पाएंगी. हम पांचो एक दुसरे के इतने आदि हो गए थे. के दूरी के बारे सोचना मतलब.. ऐसे जैसे अपनी सांस को हलक़ में अटकता महसूस करना.....



""""ी can't जस्टिस और एक्सप्लेन विथ थी फीलिंग""""""



कुछ देर हम चरों ऐसे hi एक दुसरे को सँभालते rahe.."phir मैंने हिम्मत कर के बोलै"

विजय .... मेरी बात सुने बगैर hi तुम सब ने रोना शुरू कर दिया. बात जैसी भी हो अगर करनी ज़रूरी हो. बताओ क्या मैं उसे अपने दिल में रखों या तुम तीनो को बता doon..."bolo"

"तीनो मुझे देखने लगी और सोचने लगी मुझे क्या जवाब दें"

प्रिय .... भाई आप बात करें... हम को बताएं क्या परेशानी है आपको..

विजय .... क्या तुम तीनो अपनी पूरी ज़िन्दगी यही बिताना चाहती हो

तीनो .... नहीं भाई हम यहाँ कैसे पूरी ज़िन्दगी बिता सकते हैं यहाँ तो हम सब बर्बाद हो जाएँगी.

विजय ..... तो फिर बताओ मुझे क्या करना चाहिए.



"तीनो फिर से चुप"



विजय ..... देखो हमें एक अलग घर चाहिए जहाँ हम रह सकें .

प्रिय ..... भाई हम घर कैसे लेंगे हमारे पास तो पैसे भी नहीं.

विजय ..... तो उस के लिए मुझे काम करना पड़ेगा ना यहाँ रह कर तो मैं कुछ नहीं कर सकता. और न hi तुम सब के लिए घर बना सकता हूँ. उस के लिए मुझे काम ढूंढ़ना पड़ेगा ना.

षुरूति .... भाई तो इस में परेशानी क्या है काम तो आप कही भी कर सकते हैं.

जहान्वी ..... हाँ भाई आप भी बाजार में किसी दूकान पर काम करना शुरू करदें ...."जहान्वी की बात सुन कर मुझे हंसी आ गई "

"तीनो boli".."bhai आप हंस क्यों रहे हैं हमने कोई जोके सुनाया है क्या.."

विजय ...... जोके hi तो है, यहाँ रह मैं क्या काम करूंगा. और रेखा बाई मुझे किसी दूकान पर काम करने देगी. नहीं वो मुझे किसी दूकान पर काम नहीं करने देगी. और किसी दूकान पर काम कर के मैं घर कैसे ले सकता हूँ.

जहान्वी ..... भाई ये तो मैंने सोचा hi नहीं था...

षुरूति .... भाई फिर हम क्या करेंगे. हम कहाँ जायेंगे हमारे पास तो घर भी नहीं. "मासूम सी सूरत बना कर बोली"

प्रिय ...... हाँ भाई बोलो ना हम कहाँ रहेंगे.

विजय ...... मैं बात घोर से सुनो, अब्ब जो बात मैं कहने वाला हूँ उसे पूरी तरह से समझना है तुम तीनो ने....

"तीनो" जी भाई

विजय ...... अगर हम सब यहाँ से जल्दी नहीं निकले तो तुम तीनो की भी ज़िन्दगी माँ की तरह बर्बाद हो जाएगी. रेखा बाई तुम तीनो को भी धंदे पर लगा देगी, अब्ब तुम तीनो मुझे ये बताओ क्या तुम तीनो यहाँ रह कर बर्बाद होना चाहती हो या यहाँ से निकलना चाहती हो.

तीनो ...... भाई हम यहाँ से निकलना चाहती हैं, हम यहाँ नहीं रहना चाहती हम माँ को भी यहाँ से ले जायेंगे.

विजय ...... चलो अब्ब तुम तीनो मुझे बताओ हम सब कहाँ जायेंगे. हमारे पास तो घर भी नहीं है. और अगर हम यहाँ से भागे तो क्या रेखा बाई हमें यहाँ से भागने देगी. बोलो है तुम तीनो में से किसी के पास जवाब....

"तीनो मेरी इस बात पे शॉकेड हो गई"

तीनो के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरने लगी

विजय ....... नहीं है न कोई जवाब तुम तीनो के paas...."teeno ने ना में सर हिला दिया" उनसे बोलै hi नहीं गया...! क्या बोलती वो तीनो बेचारियों ने इस बात पे इतना घोर hi नहीं किया था कभी....

विजय ....... अब मेरी बात फिर से सुनो.... मैं इस लिए कह रहा था के मुझ पर भरोसा है या नहीं.... जब से हम यहाँ हैं, हम कुछ भी करने के काबिल नहीं और न hi हमारी यहाँ कोई हैसियत है.... हम यहाँ रह कर जितना भी जोरर लगा लें हम आज़ाद नहीं हो सकते अगर इसी हालत में हम यहाँ से भाग भी जायेंगे तो कहाँ जायेंगे. और रेखा बाई भी हमें कही से भी ढून्ढ निकलेगी.

"तीनो रोने लगी" और मुझे ऐसे देख रही थी जैसे रेखा बाई अभी उनको धंदे पर लगाने वाली हो और उनके पास कोई रास्ता नहीं और मदद के लिए मेरी तरफ लचर नज़रों से देख रही हो... वो माँ के धंदे के दौरान होने वाली सिचुएशन को इमेजिन करने लगी.. उन के चेहरे का रंग उतरना शुरू हो गया.

विजय ..... अब अपना मोहन ठीक करो अभी बोहत वक़्त पड़ा है.

प्रिय ..... भाई हमें बचा लो हमें नहीं करना ये गन्दा धंदा....

विजय ..... अगर यहाँ से बच निकलना है तो उस के लिए बाहर कुछ करना और सहना padega."bolo" क्या इतना हिम्मत और बर्दाश्त है तुम तीनो में

तीनो मेरी तरफ टेंशन से देखने लगी पता मैं अगली बात क्या कहना वाला हूँ

विजय ...... मैं यहाँ से किसी और शहर में जा कर काम करने का सोच रहा हूँ जहाँ रेखा बाई या उन के आदमियों मुझ तक न पांच सकें. और फिर एक घर ले कर मैं तुम तीनो को यहाँ से ले जाऊँगा. ठीक है न मेरी बात की समझ आई या नहीं .

प्रिय ...... भाई आप हमें छोड़ कर क्यों जाओगे. यही रह कर कोई काम ढून्ढ लो ना. मुंबई इतना बड़ा तो शहर है.

विजय ...... बोलै ना यहाँ रेखा बाई का खतरा है अगर उस को पता लग गया के मैं किसी काम पे लग गया हूँ. तो वो पूरी बात समझ सकती है .



जहान्वी ..... भाई "पूरी बात" ..... मतलब



विजय ...... सीढ़ी सी तो बात है अगर मैं काम करूंगा तो रेखा बाई ये समझ लेगी के अगर मैं यहाँ से जा कर किसी काम पे लग जाता हूँ तो किसी दिन अचानक मैं माँ और तुम तीनो को यहाँ से भगा कर न ले जाऊं... वो कभी भी नहीं चाहे गई के माँ और तुम तीनो कभी भी यहाँ से जाओ और अगर उसे गलती से पता भी चल गया के हम सब यहाँ से भागने की सोच रहे हैं. तो वो तुम सब का बुरा हशर करेगी. और ये हो सकता है वो तुम तीनो में से किसी को कही बीच दे फिर हम में से कोई कुछ कर पायेगा क्याआ... आयी मेरी बात समझ या दोबारा समझाओ

तीनो ...... भाई समझ तो आ गई लेकिन जिस तरह आप बात कर रहे हैं. उस से तो लगता है. ये कभी नहीं हो सके गए और हम यहाँ से कभी नहीं जा सकेंगे.

विजय ...... नहीं दररने की ज़रुरत नहीं है. दुन्या में कई लोग ऐसे हैं जिन की ज़िन्दगी में मुश्किलें आती हैं लेकिन हर मुश्किल का कोई न कोई हल ज़रूर होता है..... बस उस रातसे को ढूंढ़ना है मुझे ........

विजय ...... मैं इस लिए किसी दुसरे शहर मैं जाने वाला हूँ. वहां मेरे लिए खतरा भी काम होगा. और कोई रास्ता भी मिल जायेगा.

प्रिय ...... भाई इस में तो बोहत टाइम लगे गए......

विजय ...... (प्रिय के चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ कर) पता नहीं कितना लगेगा ... लेकिन हिम्मत तो करनी करनी पड़ेगी ना और अगर मैं कामियाब हो गया और हम सब यहाँ से निकल गए तो सोचो हम कितने खुश होंगे और फिर हमारी लाइफ में कभी कोई परेशानी नहीं होगी .....

(में उन तीनो को मासूम बच्चियों की तरह समझा रहा था. .लेकिन मुझे पता था मैं जो करने जा रहा हूँ वो नामुमकिन की हद तक मुष्किल है. लेकिन अपनी तितलियों मो भी हसला देना था वर्ण वो तो मेरी जुदाई और यहाँ से भाग निकलने में नाकाम होने पर मर्डर hi जाएँगी..)

अपने दिल को मज़बूत बना कर मैं बोहत मुष्किल से तीनो कन्विंस कर रहा tha.ye मेरे लिए इतना आसान नहीं था जितनी dhakkad-pel मेरे अंदर हो रही थी उसे मैं अपने चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दने चाहता था वर्ण मरती तितलियाँ तो डर डर कर hi मर्डर जाती......

विजय .... एक बात और कभी भी गलती से आपस में बेथ कर मेरे जाने की बात

न करना. यहाँ हमारा साथ देना वाला कोई नहीं. और दूसरी बात मेरे जाने के बाद मेरी जुदाई का बोहत बाध्य से नाटक करना है.

प्रिय .... भाई नाटक क्यों ....

shuruti,jhanvi..... भाई हम समझ गई हैं आप क्या कहना चाहते हैं..

प्रिय ..... क्या मतलब तुम दोनों को क्या पता है ...

जहान्वी .... प्रिय भाई का मतलब है जब को यहाँ से जाएँ तो हम सब को रो रो कर ये दिखाना है के कोई हमारे भाई को ढून्ढ कर ला दे ....

प्रिय .... ह्म्म्मम्म हाँ ये भी शै है वर्ण वो कमीनी रेखा बाई को शक न हो जाये ...

षुरूति .... हाँ हम माँ को भी सब समझा देंगी "फिर मुझसे से बोली"

षुरूति .... भाई आप चितना मत करो हम सैम सम्जभाल लेंगे रेखा बाई को किसी पर शक नहीं होगा .....

फिर तीनो आपस में khusar-phusar करने lagi."kuch देर बाद तीनो बोली"

तीनो ........ भाई आप जाने की तैयारी करो हम तीनो संभल लेंगी ...

पता नहीं उन तीनो ने आपस में क्या डीडे किया था .....

कुछ देर बाद मैं कमरे से भर ा गया.....



दो दिन ऐसे hi निकल गए. मैंने ने बोहत सोचा के अचानक hi भाग निकलो लेकिन ऐसे थोड़ी न भगा जाता है कोई तो प्लान बनाना पड़ेगा. क्या प्लान होना चाहिए यही सोचते सोचते तीन दिन और निकल गए.
 
कितना मुष्किल होता है उन लोगों से दूर जाना. जिन के बगैर आपकी ज़िन्दगी किसी काम की नहीं. और फिर उनको मानाने के लिए कितने दर्द खुद में छुपा कर अपनों को हौसला दे कर और नै ज़िन्दगी का सुहाना मंज़र दिखा कर अग्रि करना. हालांकि वो खुद नहीं जनता के वो ऐस कर पायेगा या नहीं.

माँ और बहने तो ांसो बहा कर अपना दर्द कुछ काम कर सकती हैं लेकिन विजय और विजय जैसे लोग अपना दर्द बाँटने के लिए किस का कन्धा ढूंढे

और विजय जो कोठे के बाज़ार से कभी कही गया hi नहीं उस के लिए ज़िन्दगी आसान तो नहीं होगी
 
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