Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 3 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running



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अपडेट #08

Part #02

मंगलसूत्र.. ाआखिरी निशानी

ये अपडेट हमारे Danny69 भाई और अपने कमैंट्स से मेरी हिम्मत बढ़ाने वाले सभी मित्रो को समर्पित है

~°~

हीरा अपना हाथ आगे बड़ा क दूर बेल्ल 🔔 बजाते हुए, अपने छोटे भाई पन्ना को देखते हुए हल्का सा मुस्कुरा पड़ता है और कहता है

"प्रेमलता"

दूर बेल्ल क ठीक बगल एक नाम प्लेट भी लटक रही थी जिसपे लिखा था

'मनोहर निवास'

जल्दी hi दरवाजा खुलता है और सामने एक खूबसूरत भरे जिस्म की महिला का चेहरा नज़र आता है

"आप... ?"

वो खूबसूरत और भरे जिस्म की औरत जिसने इस समय एक मैक्सी पेहेन राखी थी और ऊपर से काफी खुली खुली थी.. जिस कारन उसके जिस्म की महिमा और भराव का काफी कुछ अंदाजा वही से लगाया जा सकता था


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बल्कि पन्ना की नज़रें इस समय वही जैम चुकी थी.. और चेहरे की मुस्कान गहरी होती जा रही थी

Heera-Hum भानु भाई क आदमी है, मैं ही..

वो अपनी बात पूरी कर पता उससे पहले hi वो खूबसूरत भरे जिस्म की औरत जो यक़ीनन मालती क बड़े भाई की पत्नी 'प्रेमलता' थी.. जल्दी से दरवाजे क बहार आके चारो तरफ देखती है और तुरंत कहती है

"है.. है मुझे पता है, जल्दी से अंदर आओ"

दोनों तनिक भी देरी नहीं करते और जल्दी hi दोनों 'मनोहर निवास' क अंदर थे, प्रेमलता चारो तरफ देख क पक्का करती है और फिर संतुस होक जल्दी से दरवाजा बंद कर लेती है

यानि अब मालती क बड़े भाई क घर मैं उसकी खूबसूरत भरे जिस्म वाली भाभी और उसके साथ 2 हैवान.. भुजंग नाग जैसे दिखने वाले काले मर्द मौजूद थे

प्रेमलता दोनों को ऊपर से नीचे तक देखते हुए अंदर हॉल मैं hi पड़े सोफे क पास ले आती है और बैठने का इशारा करते हुए

"किया लेंगे आप दोनों.."

पन्ना- (प्रेमलता को ऊपर से नीचे तक देखते हुए.. पुरे कमीनेपन से मुस्कुरा पड़ता है) लूंगा तोह बस मैं.. हीरा भैया तोह बस देखना पसंद करते है

प्रेमलता पूरी तरह सेहम सी जाती है और उसका जिस्म पसीना चोर्ने लगता है

वो जल्दी से अपनी मैक्सी को सही करते हुए

"मैं चाय लेके आती हु"

हीरा- (प्रेमा की गदराई मोती गांड को निहारते हुए) भानु भाई ने कुछ पेपर्स क लिए भी कहा था ?

प्रेमा पीछे मुद क देखती है जहा वो पाती है की हीरा उसकी गांड क दीदार मैं खोया हुआ था.. वो इस बात को नज़रअंदाज़ कर देती है और है मैं सर हिला देती है

और बिना किसी विलम्ब क तुरंत किचन की तरफ चल पड़ती है.. प्रेमलता को जाते हुए देख क पन्ना अपनी पेंट क ऊपर से hi अपना लुंड मसल देता है

"भैया.. किया सच मैं ये.."

हीरा- (है क.. किचन की तरफ देखते हुए) जेक पक्का कर ले, भानु ने कहा है तोह सच hi होगा

पन्ना एक पल की भी देरी नहीं करता और तुरंत की अपनी जगह से उठ खड़ा होता है और अपने लुंड को सहलाते हुए किचन की तरफ चल पड़ता है

इधर प्रेमलता जल्दी से किचन मैं आके रैक पे दोनों हाथों को जमा लेती है.. उसकी साँसें उखड रही थी उसका गाला सुख रहा था

वो अपने हाथ से अपना पसीना पूछते हुए

"ये कमीना भानु.. आखिर मुझसे और किया किया करवाएगा, एक गलती को छुपाने क लिए और न जाने किया किया करना होगा मुझे.. और पता नहीं अब उन पेपर्स क साथ कोनसा सद्यन्त्र रचने वाला है"

प्रेमलता किचन मैं आके अपने दोनों हाथों को रैक पे जमाये हुए कड़ी थी वो अपनी hi सोच मैं इतनी डूबी हुई थी की उसे होश hi नहीं था की कब पन्ना ुस्तक आ चूका था

प्रेमलता पुरे भरे जिस्म की महिला है.. जिसके जिस्म का एक एक हिस्सा कैसा हुआ और भरा है

यौवन आज भी किसी नेयुवति से ज्यादा hi कैसा दिखेगा.. और उभरी हुई गांड की सोभा मैं कुछ कहने क लिए मेरे पास सब्द नहीं है

प्रेमलता को होश तोह तब आता है जब उसकी पीछे की तरफ निकली हुई गांड पे कोई गरम चीज़ चुभती है.. प्रेमलता जैसे उछाल hi पड़ती है

"आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह......"


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प्रेमलता जल्दी से खुद को संभालती है और जब पीछे देखती है तोह उसका जिस्म पसीना चोर देता है.. ककी उसकी मोती गांड की दर्द मैं चुभने वाली वो चीज़ पाना का काला हतियार था

एक पल क लिए तोह प्रेमलता यानि प्रेमा.. जैसे भूल hi गयी थी की वो किया कहने वाली है, पर जल्दी hi वो यथार्थ की धरा पे लौट आती है

"ये सब किया है... तुमने मुझे किया..... ये... तुम्हारे पास... ये"

प्रेमा ग़ुस्से से लाल होना सुरु hi हुई थी पर उसका ग़ुस्सा अचानक से ऐसा ख़तम हो गया मानो किसी ने गरम कोयले पे ठंडा पानी दाल दिया हो

और इसकी वजह पन्ना क हाथ मैं एक मंगलसूत्र था.. जो काफी पुराण सा था

पन्ना मन hi मन

'बहनचोद कुछ तोह बात है इस मंगलसूत्र की.. भानु भाई ने सही कहा ये काम करेगा'

पन्ना- (मुस्कुराते हुए) कुछ नहीं.. भानु भाई ने कहा था, ये तुम्हे दे दू इससे तुम्हे कुछ जरुरी याद आ जायेगा

प्रेमा जल्दी से लपक क पन्ना क हाथ से वो मंगलसूत्र चीन सी लेती है.. पर जैसे hi वो उसे अपने हाथ मैं लेती है उसे एहसास हो जाता है ये बस एक नक़ल है, असली नहीं

प्रेमा- (ग़ुस्से से) ये सब किया मज़ाक है.. ?

पन्ना मुस्कुराते हुए

"मुझे किया पता.. मुझे तोह भानु भाई ने दिया था, ताकि तुम कुछ भूलो नहीं

अब याद किया रखना है.. ये तोह तुम्ही को पता होगा"

किचन मैं कोई खास इतनी गर्मी थी नहीं.. पर प्रेमा क अंदर एक आग सी जल उठी थी

उसके अंतर्मन मैं एक ज्वाला सी प्रज्वलित होने लगी थी

'देख.. उस भानु क हाथ की कठपुतली बनने का नतीजा, लालच क यही अंजाम होता है'

पर प्रेमा अपने अंतर्मन को खुद पे हावी नहीं होने देती

प्रेमा- (खुद को शांत और ठंडा करते हुए) भानु से कह देना.. मैं कुछ भी नहीं भूली हु, तुम जेक हॉल मैं बैठे मैं चाय लेके आती हु, फिर तुम्हे जो पेपर्स चाहिए वो भी

प्रेमा इतना hi कहती है और उसे लगता है की पन्ना अब वापस हॉल मैं जेक बैठ जायेगा.. ककी वो पलट क अब वो गैस पे चाय चढ़ाने लगी थी

किचन मैं पूर्ण शांति हो चुकी थी.. पर प्रेमा क मन मैं एक अलग hi उथल पुथल मच चुकी थी

प्रेम मन hi मन

'एक जरा सी गलती क चक्कर मैं न जाने मुझे किया किया करना पड़ेगा'

प्रेमा अपने आप मैं इतनी खोयी हुई थी की उसे ये तक धियान नहीं था की पन्ना अब भी वही खड़ा है और उसका काला हतियार भी वैसे hi उसकी पेंट से बहार निकल क अपना आकर लिए हुए है

तभी प्रेमा को पन्ना क काले हतियार का धियान फिर से आता है.. और अनायास hi वो उसकी तुलना कुंदन से कर बैठती है

"कुंदन क मुकाबले 19 hi है"

ये वो सब्द थे.. जो प्रेमा क मन मैं नहीं, अपितु सब्दो क साथ बहार आये थे

प्रेमा अपनी बात पे धीरे से खुद hi मुस्कुरा उठती है और फिर चीनी का डिब्बा उठाने क लिए जैसे hi अपना एक हाथ ऊपर की तरफ उठती है

"Aaaaaaaaaahhhhh.... Kutteeeeeeeeeeeeeeeerrrr....."

प्रेमा क चिल्लाने की वजह थी वो दोनों हाथ जो उसकी कमर क दोनों तरफ लेपित गए थे.. जैसे मानो कोई अजगर उसे अपनी चपेट मैं लेने की कोशिश कर रहा हो.. पर प्रेमा क चिल्लाने की वजह सिर्फ इतनी नहीं थी बल्कि बात तोह ये थी की उसकी कमर पे लिपटे उन दोनों हाथों मैं से एक हाथ ने आगे बड़के नाभि वाले हिस्से को मुठी मैं जकड लिया था वो भी ऐसे की प्रेमा का पूरा जिस्म दर्द से तरप उठा था

ऐसी कारणवस प्रेमा की ऐसी कामुक ाः निकली जिसमें दर्द भी शामिल था

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प्रेमा जल्दी से उन दोनों हाथों को खुद से अलग करती है और पलट क ग़ुस्से से पन्ना को देखती है.. ककी ये हरकत तोह उसी ने की थी

"दिमाग सही है.. किया है ये सब, अपनी हद मैं रहो"

"चल रहने दे पन्ना, इसके बड़े नकरें है.. वैसे भी हमे वो असली मंगलसूत्र पहले इसके पति क पास लेके जाना है और फिर 'सुंदरपुर गाओं' मैं किसी मालती को देना है.. पता नहीं कोण है ये औरत मालती और गाओं भी कितना दूर है न"

प्रेमा का पूरा जिस्म मानो सूखे पत्ते जैसे काँप उठा था, उसका चेहरा पीला पद गया था.. वो काँप सी उठी थी

अपने पति और मालती क नाम मैं कुछ तोह था ककी वो बुरी तरह दर से काँप गयी थी

"मैं.. मैं कुछ कहा कह रही हु, तुम्हे कही जाने की जरुरत नहीं है.. मेरी बात बात तोह सुनो"

दोनों भाइयों यानि Heera-Panna का चेहरे पे हसी खेल गयी थी, ककी दोनों hi समझ चुके थे की अब ये वही करेगी जो हम कहेंगे..

यानि वही मर्दों का अहंकार, औरत को हमेशा काम समझना

प्रेमा अब भी सोच रही थी की वो कैसे इस पुरे मामले को संभाले की तभी हीरा क फ़ोन बज उठता है, हीरा अपने फ़ोन को देखते हुए

"लो भाई.. भानु भाई का hi फ़ोन है"

प्रेमलता एक पल की भी देरी नहीं करती, वो लपक क आगे बढ़ती है और हीरा क हाथ से फ़ोन चीन लेती है, और फ़ोन रेसिवेद करके बोल पड़ती है

"तुम चाहते किया हो ?"

दूसरी तरफ दिन की तेज़ धुप मैं अपने खेत पे बानी झोपडी क अंदर चारपाई पे लेता हुआ भानु फ़ोन पे प्रेमलता की आवाज़ और उसमें मौजूद कंपकपी देख क काफी क्युच समझ लेता.. सायद इसीलिए उसके अधरों पे मुस्कान बिखर गयी थी

भानु- ाचा किया फ़ोन तुमने hi उठाया, ककी इन दोनों को सुंदरपुर मैं इस्थापित करने का काम सिर्फ तुम्ही कर सकती हो

प्रेमा को जैसे कुछ समझ नहीं आया, वो दोनों भाइयों की तरफ देखती है जिसमें से हीरा उसे hi देखा जा रहा था, वही पन्ना ने गैस पे छड़ी चाय मैं चीनी डालना सुरु कर दिया था..

वही चाय की लत

प्रेमा भानु को अचे से जानती थी.. उसे पता है की भानु बहुत आगे की सोचता है वो कभी भी जल्दबाजी मैं कोई काम नहीं करता

"गाओं मैं इस्थापित करना है, मैं कुछ समझी नहीं.. तुम्हारे दिमाग मैं चल किया रहा है ?"

भानु- मैं चाहता हु की ये दोनों सुंदरपुर आये, पर एक साधु क भैस मैं.. तुम तोह जानती हो की आज कल कोई जल्दी किसी पर भरोषा नहीं करते, पर अगर तुम खुद इनकी मदद करोगी तोह पुरे घर को इनपे भरोषा जरूर होगा

प्रेमलता दोनों को ऊपर से नीचे तक देखती हुई

"तुम्हे कहा से ये साधु जैसे लगते है"

दूसरी तरफ से भानु

"आज कल जो होता है वो लगता कहा है, उन दोनों मैं से हीरा ने अपने सुरुवाती दिनों मैं नाटक कंपनी मैं काम किया है.. और तुम लोगो का भेष बदलने मैं माहिर हो"

प्रेमलता- (जैसे उसे कुछ भी समझ नहीं आया था) मैं.. समझी नहीं ?

भानु- गाओं की रामायण मैं तुम लोगो का मेकअप किया करती थी, खास करके साधु और उन जैसे लोग का

प्रेमा को एक पल क लिए जैसे यकीं hi नहीं होता की ये बात भानु को कैसे पता है.. ककी वो खुद भी ये सब भूल चुकी थी, इस बात को आज 20 वर्षो से ज्यादा गुजर चुके थे

प्रेमलता- तुम्हे ये सब कैसे पता.. ये तोह बहुत पुराणी..

भानु- (दूसरी तरफ से फ़ोन पे हस्ते हुए) जितना तुम सोचती हो मुझे उससे ज्यादा पता है.. इसलिए जैसे कहता हु बस वही करती जाओ

प्रेमलता- तुम समझ नहीं रहे हो.. ये बहुत पुराणी बात है.. अब मुझे कुछ याद नहीं है, उस समय तोह मेरी शादी भी नहीं हुई थी

भानु ऐसे ठहाका मर क हस्ता है जैसे रावण हो

"ाचा.. जो औरत अपने ससुर क झूठे सिग्न करके गाओं की ज़मीन मैं झोल कर सकती है, वो मुझे सिखाएगी.. वैसे वो तुम्हारी सास का मंगलसूत्र उनकी आखिरी निशानी जो आज तक किसी को मिला नहीं.. अगर तुम्हारे पति को मिल गया तोह..."

भानु को अब अपनी बात भी पूरी करने की जरुरत नहीं ककी प्रेमा की साँसें उखाड़ने लगी थी.. भानु गाओं मैं चारपाई पे लेता हुआ हस्ता रहता है, मानो वही लेते लेते उसे प्रेमा का पीला पड़ता चेहरा नज़र आने लगा हो

प्रेमलता- (जोर से काँप रही थी) मैं.. मैं कर लुंगी, पर ये सब कभी भी..

भानु- ज़मीन क लिए अपनी सास को ज़हर दे दिया, ससुर क झूठे सिगनॉट करके खेती का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा अपने नाम करवा लिया.. मैंने तोह ये सब भी नहीं बताया आज तक किसी को.. क्यू है न ?

प्रेमा का पूरा जिस्म पसीने से भीगने लगा था.. वही पन्ना चाय को 3 कप मैं दाल चूका था वो एक अपने बड़े भाई की तरफ बढ़ाता है और दूसरे से खुद पीना लगता है.. उसने प्रेमा क चाय क कप को उसे देना भी जरुरी नहीं समझा ककी इस समय प्रेमा क चेहरे का पीला पैन दोनों भाइयों को बड़ा सुहाना लग रहा था, वैसे भानु और प्रेमा क बीच किया बात हो रही है इसकी उन्हें तनिक भी जानकारी नहीं थी

प्रेमा- तुम्हे ये सब याद दिलाने की जरुरत नहीं है.. मुझे.. मुझे सब याद है, आज तक तुमने जो भी कहा मैं वही किया है

भानु- (अपने जबड़ो को भीचते हुए उठ क बैठ जाता है.. और घुर्राटे हुए कहता है) कोई एहसान नहीं किया है, बदले मैं तुम्हारे काले राज़ आज तक बहार नहीं आये है.. और अगर चाहती हो की आगे भी ऐसा hi रहे, तोह तुम्हे पता है की वही करना होगा जो मैं कहता हु

प्रेमा- वही तोह कर रही हु.. तुम्हारे hi कहने पे मैंने कुंदन को फसाया, उससे झूट बोल क उसका और मालती का रिस्ता तोडा.. और अपने पति क झूठे सिग्नेचर करके उसके अकाउंट से 1 लाख रुपया निकल तुम्हे दिए.. आखिर कब तक मुझे तुम्हारी कठपुतली बन क रहना होगा

भानु- (सैतान जैसी हसी हस्ते हुए) सब कुछ बस जल्दी hi ख़तम होने वाला है.. और तुम्हे मेरा कहा इसलिए भी मन्ना होगा ताकि तुम्हारे परिवार सुरक्षित रहे.. याद है न

प्रेमा का पूरा जिस्म जैसे झुरझुरी खा जाता है..

भानु आगे कहता है

"और है.. अभी क लिए एक और काम है ?"

प्रेमलता- किया ?

भानु फ़ोन क दूसरे तरफ से कामिनी हसी हस्ते हुए

"उन दोनों को किसी चीज़ क लिए मन मत करना.. किसी भी चीज़ क लिए, तुम्हारे लिए कोनसी बड़ी बात है

पहले ससुर, फिर कुंदन.. क्यू है न"

भानु इसके आगे कुछ नहीं कहता ककी वो फ़ोन काट देता है.. ककी सच ये था की अब उसे कुछ भी कहने की जरुरत नहीं थी

इधर प्रेमा क लिए पूरी दुनिया उसकी आँखों क आगे नाच रही थी, वो अपनी hi बुराई क जाल मैं बुरी तरह फास चुकी थी

हीरा आगे बड़के प्रेमलता क हाथ से फ़ोन ले लेता है

हीरा- तोह आगे किया करना है ?

प्रेमलता जैसे कुछ पलों तक कुछ समझ hi नहीं प् रही हो.. पर फिर खुद को सँभालते हुए खुद से कहती है

'इस भानु क दर से hi मैंने अपने दोनों बच्चों को यहाँ से इतनी दूर हॉस्टल मैं पड़ने भेजा है.. और अब.., कोई रास्ता तोह निकलना hi पड़ेगा... एक मं... रास्ता तोह सामने hi है'

प्रेमलता ने खुद को संभालना सुरु कर दिया था, वो एक लम्बी सांस लेते हुए हीरा पन्ना की तरफ देखती है और मैक्सी क ऊपर से अपने एक मोठे उरोज को छूटे हुए कहती है

"सुरुवात कोण करेगा"


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ख़ुशी पन्ना क चेहरे पे दिखने लगती है, और वो वही बात दोहराता है जो उसने यहाँ आने पे कही थी

"लूंगा तोह बस मैं.. हीरा भैया तोह बस देखना पसंद करते है"

प्रेमलता समझ चुकी थी की आज एक बार फिर से अपने जिस्म का सहारा लेना hi पड़ेगा.. जो उसके लिए कोई नयी बात नहीं थी

प्रेमा मन hi मन

'किया किया करना पड़ेगा.. ऐसा लगता है ये भानु कुछ बड़ा सोच रहा है, और अगर मुझे इसका पता लगाना है तोह इन दोनों को अपनी उँगलियों पे नाचना hi पड़ेगा और ऐसे मर्दो को गुलाम बनाने का एक hi तरीका होता है'

प्रेमा जो अब तक दर से भरी हुई थी अब वो तय कर चुकी थी की उसे आगे किया करना है, और चीज़ों को कैसे अपने हिसाब से लेके चलना है.. प्रेमा एक लम्बी सी सांस भर्ती है और अपनी मैक्सी को हल्का सा ऊपर उठाये हुए पन्ना की तरफ देख क मुस्कुरा पड़ती है

"आओ लूट लो"

प्रेमलता अब दर नहीं रही थी, बल्कि उसने ये बात मुस्कुरा क कही थी और अपनी ऐडा दिखते हुए हीरा की तरफ आँख भी मार दी थी और पन्ना की तरफ एक फ्लाइंग किश भी उछाल डाली

दोनों भक एक पल क लिए तोह जैसे चक्र hi गए थे, ककी जो औरत अभी अभी उनके आगे लचर नज़र आ रही थी.. अचानक वो चीज़ों को अपने हाथ मैं लेने लगी हो

हीरा खुद से कहता है

"साली.. ज्यादा hi पहुंची हुई है"

इधर प्रेमा बिना किसी विलम्ब क खुद hi अपनी मैक्सी उतर क हीरा क ऊपर फैक देती है.. जो उसके चेहरे से धीरे धीरे सरकते हुए नीचे गिरती है, पर इन चाँद पलों मैं hi हीरा को उस मैक्सी मैं बसी प्रेमा क जिस्म खुसबू मिल चुकी थी और उसके छोटे महाराज ने उछलना सुरु कर दिया था

हीरा- आअह्ह्ह.. किया खुसबू है तेरे कपड़ों की.. सस्न्नन्नन्नन्नफ़्फ़फ़फ़फ़..

पर नज़ारा तोह अभी बस सुरु hi हुआ था, ककी जैसे hi मैक्सी हीरा क चेहरे से अलग होती है उसके सामने एक भरते गदराये जिस्म की प्रेमा सिर्फ एक ब्रा पेंटी मैं कड़ी नज़र आती है


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प्रेम अपनी कमर पे दोनों हाथों को रख क पन्ना की तरफ देख क कहती है

"एक बार चाहिए.. या बार बार"

प्रेमा का सीधा इशारा अपनी कातिलाना जिस्म की तरफ था

प्रेमा मन hi मन

'बस तेरा जवाब भी मेरे ससुर वाला होना चाहिए'

पन्ना तुरंत से अपने लुंड को मुठी मैं जकड क मसलते हुए

"बार बार.. साली तू चाहती किया है, हम भानु भाई को देखा नहीं देंगे"

प्रेमा धीरे से अपने ब्रा क उठती है जिससे उसकी एक दूध से भरी हुई चुकी की हलकी झलक दोनों भाइयों को मिलती है पर प्रेमा वापस से अपनी ब्रा को सही कर लेती है

"किया तुम दोनों को पूरा यकीं है की.. भानु तुम्हे कभी देखा नहीं देगा, मैंने तोह इतना सब किया उसके लिए पर देखो"

प्रेमा ने दोनों भाइयों क अंदर संख्या का एक बीज बो दिया था, जिसे पन्ना ने नकारने की कोशिश जरूर की थी.. पर हीरा की सोच अलग थी जो उसकी बात से भी साबित हो गयी

"किया चाहिए तुम्हे"

प्रेमा क चेहरे पे विजेता वाली मुस्कान खिल उठी

"अभी तोह कुछ नहीं, पर समय आने पे मांग लुंगी.. ककी आज तुम दोनों का दिन है"

प्रेमा इतना कहते हुए इस बार एक hi झटके मैं अपनी ब्रा को उतर क हीरा क मुंह से फैक देती है

हीरा- (पसीने मैं भीगी उस ब्रा की खुसबू उसके रोम रोम मैं आग भर जाती है) आआअह्ह्ह्ह.. ठीक है मैं इस बारे मैं जरूर सोचूंगा, पर वडा नहीं करता

प्रेमा अपनी दोनों बड़ी और भरी चूचियों को जिन्हे कोई भी एक हाथ से जकड नहीं सकता था.. उन्हें पियर से मसलते हुए

"अभी क लिए इतना काफी है.. तोह पन्ना.."


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प्रेमा, पन्ना की आँखों मैं देखते हुए घूम क कड़ी हो जाती है और किचन की रैक पे दोनों हाथों को रख क अपनी भरी मटके जैसी गांड को पीछे की तरफ निकल देती है

दोनों भाइयों ने बहुत सी छूट और गांड देखि है.. पर प्रेमा तोह बस प्रेमा है

पन्ना आगे बढ़ने hi वाला था की उससे पहले hi हीरा आगे बाद जाता है.. और बिना देरी क प्रेमा की कोमल उभरी हुई गांड को पियर से सहलाता है और फिर जोर से मरता है

'Chatttaaaaakkkkkkkkkkkkkkk"

प्रेमा- (दर्द से तिलमिला पड़ती है) आआआह्ह्ह्हह्ह... मादरचोद... कुत्त्तीये

दोनों भाई है पड़ते है, पर हीरा का अभी कहा हुआ था वो दोनों हाथों से प्रेमा की पेंटी को पकड़ क एक hi बार मैं उसके पैरों तक उतर देता है

प्रेमा भी अपने पैरों को उठा क अपनी गीली पेंटी को पूरी तरह आज़ाद कर देती है.. हीरा जल्दी से पेंटी को उठाया है तोह उसे गीलापन महसूस होता है

हीरा का पूरा जिस्म गंगना सा जाता है वो पेंटी को अपने मुंह पे रख क एक लम्बी सी सांस लेता है मानो उस पेंटी मैं बसी खुसबू को पूरी तरह अपने अंदर बसा लेगा

"आआह्ह्ह्ह.. किया खुसबू है... संनननफफ्फ्फ्फहहहह.."

मनोहर की पत्नी का जिस्म भी गरमी से तरप उठता है, ककी वो अपना चेहरा पीछे घुमा क जब देखती है की हीरा उसकी पेंटी की खुसबू यु सुंग रहा है तोह उसकी योनि भी गीली होने लगती है

प्रेम मन hi मन

'ये दोनों बहुत काम आ सकते है'

प्रेमा ये सोच hi रही थी की सामने अब जो होता है उसे देख क वो अपने आप को रोक नहीं पाती और अपना एक हाथ अपनी गीली होती योनि पे रखने को मजबूर हो जाती है

ककी हीरा ने अब उस पेंटी को अपने मुंह मैं रख लिया था और ऐसे चूस रहा था जैसे उसमें सेहद लगा हो

प्रेमा का पूरा जिस्म कांपने लगता है उत्तेजना की आदिकता से.. उसके निप्पल्स तन चुके थे और छूट क अंदर भर भर क गर्मी का सैलाब उमड़ने लगा था

हीरा अपनी आँखों को बंद किये हुए कास कास क पेंटी को अपने पुरे मुंह मैं भर क चूसे जा रहा था, और ये नज़ारा देख क प्रेमा अपनी योनि की दरारों क बीच अपनी ऊँगली चलने लगी थी पर तभी उसकी आअह्हह्ह्ह्हह फुट पड़ती है

"aaaaaaahhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaa"

प्रेमा की इस कामुक ाः की वजह थी पन्ना क मजबूत हाथ को पीछे से आगे उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को डायबच चुके थे

पन्ना- आअह्ह्ह्ह.. किया मुलायम चूचिया है.. उफ्फ्फफ्फ्फ़.. आज तोह मज़ा hi आ जायेगा

प्रेमा रैक पे दोनों हाथों को अछेसे जमा लेती है जिससे उसकी गांड और ज्यादा बहार को निकल आती है और उसके पीछे खड़े पन्ना क बहार लटक रहे काले हैवान से चिपक जाती है

प्रेमा तोह नंगी थी hi.. और पन्ना का कला हैवान भी उसकी पेंट से बहार hi था, जिस वजह से वो अब प्रेमा की नंगी गांड की गहरी दरार क बीच पूरी तरह अपनी जगह बना चूका था

अपनी गांड और योनि पे एक साथ इतने गरम लुंड की छुवन से प्रेमा की जिस्म मचल पड़ा था

"आआअह्हह्ह्ह्हह.... उफ्फ्फफ्फ्फ़...."


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प्रेमा पानी आँखों को बंद किये हुए अपने होंठों को काटने पे मजबूर हो गयी थी, पर उसे होश भी तुरंत आ जाता है ककी पन्ना क काले लुंड ने उछाल क सीधा प्रेमा की योनि पे वार कर दिया था

प्रेमा एक बार फिर से अपने होंठों को काटते हुए आआह्ह्ह भरने पे मजबूर हो जाती है

"ेस्स्स्सस्स्स्शह्ह्ह... माआआ..."

प्रेमा अपना चेहरा पीछे घुमाकर

"आप थोड़ा धीरे मसलो.. आज पूरा रास पीलूँगी अपने जिस्म का.. ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

प्रेमा का पूरा जिस्म गरम होने लगा था, भानु और अपने घर की समस्त परेशानियां वो इस समय भूल चुकी थी

पन्ना भी अपने दोनों हाथों की मजबूत उँगलियों क बीच प्रेमा क काले निप्पल्स को मरोड़ने लगा था.. जिससे रह रह कर आज इस भरे जिस्म मैं तरंग उठ रही थी

वही हीरा भी चालू हो चुके इस कार्यक्रम को देखने मैं मस्त हो चूका था.. ककी अब उसने पेंटी को चूस चूस क उसका सारा रास निचोड़ क उसे दूर फैक दिया था और जल्दी जल्दी अपनी पेंट की चैन खोलने मैं व्यस्त हो चूका था

वही हीरा का छोटा भाई अपने काम मैं पूरी म्हणत कर रहा था, उसका खड़ा हो चूका लुंड प्रेमा की गांड और योनि पे बार बार टकरा रहा था.. ऐसा लग रहा था जैसे वो बस मौका देख रहा था, इस कामुक रसीले बिल मैं घुसने क लिए

प्रेमा अपना एक हाथ पीछे ले जेक पन्ना क सर पे रखती है तोह उसका हाथ पकड़ क उसकी कोमल गोरी उँगलियों को एक साथ अपनी मुंह मैं रख क चूस लेता है

"सललललररररररपपपप....."

प्रेमा- (कामुकता क नसे से उसकी आँखें भोझिल होने लगी थी) आआअह्हह्ह्ह्हह.. माआआ....... कहा थे तुम आज से पहले

हीरा जो अब अपने लुंड को बहार निकल चूका था, वो अपने लुंड की गन्दी चमड़ी को पीछे करते हुए एक सवाल पूछ लेता है

"वैसे उस कुंदन का बड़ा है या मेरे भाई का"

कामुकता मैं डूबी हुई प्रेमा को ये सवाल सुनाई पड़ता है तोह ये याद अत है जब उसने पन्ना क लुंड को देख क किया कहा था

'ये तोह कुंदन क आगे 19 है'

एक पल क लिए तोह प्रेमा को लगता है की हीरा ने उसकी बात कैसे जान ली पर फिर वो है पड़ती है और जब जवाब देने क लिए पीछे मुड़ती है, जहा उसकी नज़रें सीधा हीरा क लुंड पे पड़ती है जिसे वो बहार निकल क मसलने लगा था

प्रेमा- (आश्चर्य से) हैईईई.. री ऐसे मुसल उफ्फ्फ, और तुम्हे बस देखना पसंद है ?


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हीरा और पन्ना दोनों hi है पड़ते है तभी पन्ना अपना एक हाथ नीचे ले जेक प्रेमलता की योनि को मुठी मैं दबोच लेता है वो भी ऐसे hi प्रेमलता उछाल सी पड़ती है

प्रेमलता- (अपने पंजो पे कड़ी हो गयी थी) आआआहहह... कमीने... ेस्स्स्सह्ह

अपने छोटे भाई क हाथों यु किसी औरत को मसलते हुए देख हीरा क अंदर की गर्मी पुरे आश्मान को चुने लगती है वो जोर जोर से अपना लुंड मसलने लगता है.. जिससे उसका मोटा टोपा उसकी चमड़ी से बहार आकर पुरे किचन को अपनी कामुक सुगंध से भर देता है

हीरा- (अपने लुंड को जोर जोर से मसलते हुए) आअह्ह्ह्ह.. शाब्बाश छोटे, रगड़ दे साली को.. आह्ह्ह्हह


प्रेमलता कामुकता की आग मैं ताप्ती हुई

"आअह्ह्ह.. दोनों क दोनों पुरे कमीने हो"

प्रेमलता की इस्तिथि थोड़ी सही होती है और वो वापस से किचन की रैक पे अपने हाथ जमा लेती है, पर पन्ना अपना अंदाज़ नहीं बदलता.. ककी वो मनोहर की खूबसूरत पत्नी क दोनों कैसे हुए उरोजों को एक साथ जकड लेता है और पूरी बेहरहमी से मसलते लगता है

पन्ना, प्रेमा की चूचियों का मर्दन ऐसे कर रहा था मानो आता गूंध रहा हो.. प्रेमा भी अपनी गांड को पन्ना क काले लुंड पे दबाने लगती है, पर इस बीच वो कई बार हीरा क भयावह लुंड को ताड़ती जरूर है

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह....... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ असली चीज़ तोह वह है.. आअह्ह्ह

ये बात पन्ना और हीरा दोनों को सुनाई पड़ी थी, जिस वजह से उसके हाथ अपने लुंड पे और जोरो से चलना लगे थे.. वही पन्ना अपना लुंड प्रेमा की छूट की दरार मैं सत्ता देता है

प्रेमा को ऐसा लगता है मानो कोई गरम लोहे की रोड उसकी छूट की दरार को खोलने की कोशिश कर रही हो, और पन्ना भी पीछे नहीं रह जाता है वो प्रेमा को उसी रैक पे झुक क पूरा दबा देता है.. जिससे उसका लुंड सही जगह पे सेट हो जाता है

प्रेमा- ाः बड़ी जल्दी है.. आआह्ह्ह हैईईईई कुट्ट्टीीी.... इतनी जल्दी किया थी

पन्ना का लुंड जैसे hi प्रेमा की छूट क गहराई को चूमता है, वो अपना काबू खो देता है और एक जोरदार दक्का उस रास बहती हुई छूट मैं लगता है.. जिस कारणवस प्रेमा की चीख फुट पड़ी थी

पन्ना अपना काबू खोते हुए प्रेमा को वही रैक पे कसके दबा देता है और अपना लुंड जो उस छूट मैं आधे से ज्यादा घुस चूका था उसे वापस बहार तक खींचता है.. पर पूरा नहीं, टोपा अब भी छूट की फाकों को चुम रहा था

पन्ना एक हाथ से प्रेमा को रैक पे दबा क रखता है और दूसरे हाथ से उसका हाथ जकड लेता है और उसी की पीठ से जमा देता.. और वापस अपने खेल मैं लग जाता है

वो अपना लुंड को रास चोरटी छूट मैं वापस उतर देता है, प्रेमा की छूट की गीली फाकों को रगड़ता हुआ उसका लुंड गहराई मैं जेक रुकता है और प्रेमा क जिस्म का रोम रोम दर्द और कामुकता की तरंगो से भर उठता है

प्रेमा- हीी कमीने.. अभी तोह सही से गीली भी नहीं हुई थी.. आह्ह्ह्ह कुत्त्ते मादरचोद.. भड़वे

प्रेमा क मुंह ऐसे संस्कारी सब्दो को सुनकर हीरा को सबसे ज्यादा मज़ा आता है, ककी वो अब जोर जोर से अपना लुंड मसल रहा तह

हीरा- (अपने लुंड को ऊपर से नीचे.. और नीचे से ऊपर की तरफ रगड़ते हुए) आअह्ह्ह्ह.. ये हुई न बात छोटे, पहाड़ दाल साली की छूट.. आआआआह

हीरा का जिस्म कैंप रहा था, ककी वो जोर जोर से अपना लुंड मसल रहा था.. वही पन्ना भी अपने बड़े भाई की बात सुनकर जोश से भर गया था

वो वापस अपना लुंड बहार क लिए खींचता है और फिर से अंदर उतर देता है.. जिससे प्रेमा का पूरा जिस्म थरथरा सा जाता है, ककी पन्ना ने उसकी सुखी छूट मैं hi लोढ़ा उतर दिया था

अपनी छूट की गहराई मैं लुंड लेना प्रेमा क लिए कोई नया नहीं था, पर पन्ना का लुंड कोई बच्चों का लुंड नहीं था, वो एक तगड़ा काला सांप था.. जो मनोहर की पत्नी की छूट को अंदर तक दर्द से भर रहा था

प्रेमा का पूरा चेहरा धीरे धीरे लाल पड़ने लगा था.. ककी पन्ना क दकके अब लगातार बढ़ते जा रहे थे.. वो अपनी गति पाने लगा था


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पन्ना- आआह्ह्ह्ह.. हम भाइयों का साथ चाहिए तोह हमारी रखेल बनना होगा, फिर तू जो कहेगी हम वही करेंगे.. क्यू है न भैया

हीरा- (अपने लुंड क टोपे पे अपने खुद क नाख़ून लगते हुए) आआह्ह्ह.. सही कहा, तू कोई बची नहीं है, पहुंची हुई औरत है.. आअह्ह्ह तेरे लिए भानु भाई से देखा करेंगे तोह बदले मैं कुछ खास तोह मिलना hi चाहिए.. आअह्ह्ह

हीरा अपने लुंड को जोरो से मसलते हुए अपनी बात कहता है

प्रेमा जो पन्ना क जोरदार दक्कों से हिल रही थी और उसकी साँसे उखड रही थी

"आआह्ह्ह्ह... कमीने तेरे छोटे भाई का लुंड मेरी छूट मैं है और भला इससे ज्यादा किया चाहिए"


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पन्ना एक जोर का थपड प्रेमलता क गाल पे लगते हुए

"चटक......."

पन्ना- आअह्ह्ह.. साली ये सब तोह तू वैसे hi करवाती, वर्ण भानु भाई तेरे राज़ सबके सामने ला देते.. तोह बता हम तेरे लिए भानु भाई क साथ गद्दारी क्यू करे

प्रेमा उसी प्रकार रैक पे झुकी हुई अपनी छूट मैं पन्ना क जोरदार दकके कहते हुए अपना हाथ आगे बड़ा क अपना फ़ोन उठती है और उसमें कुछ खोल क उसे हीरा की तरफ उछाल देती है

हीरा जो इसके लिए तैयार नहीं था.. पर जल्दी से अपना लुंड चोर को फ़ोन को बीच हवा मैं hi लपक लेता है

हीरा- (ग़ुस्से से) साली रंडी फ़ोन क्यू फेक रही...

हीरा इतना hi बोल पता है की उसके आगे क सब्द वही क वही जैम जाते है.. ककी उसकी नज़र फ़ोन मैं एक फोटो ने पद चुकी थी.. जिसे प्रेमलता ने खोल क दिया था

पन्ना- (प्रेमा की छूट मैं जोर जोर से दकके मरते हुए) आआआहहह.. किया हुआ भैया, आपके जबान को लकवा क्यू मार गया ?

हीरा ने जैसे अपने छोटे भाई की बात सुनी hi न हो

"किया माल है.. पर अपनी किस्मत मैं ऐसी जवानी.."

हीरा अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाटा और प्रेमा अपनी छूट मैं मोटा लुंड लिए हुए बोल पड़ती है

प्रेमा- (चुदाई क जानदार दक्कों की वजह से पूरी तरह काँप रही थी.. ककी पन्ना क लुंड की ठोकर बार बार उसकी bache-dani तक लग रही थी) मेरी बेटी है.. मेरा साथ डोज तोह ये मिलेगी

प्रेमा की बात सुनते hi हीरा पन्ना दोनों का मुंह खुला का खुला रह जाता है.. हीरा कभी फ़ोन की उस फोटो को देखता तोह कभी प्रेमा को, उसकी तोह जैसे आवाज़ निकलना hi बंद हो गयी थी

पन्ना से भी सब्र नहीं हो पता वो गपक से प्रेमा की छूट से अपना लुंड निकलता है और दौर क अपने बड़े भाई क हाथ से फ़ोन ले लेता है

प्रेमा की छूट से निकला उसका काला लुंड छूट से सना हुआ पूरी तरह खड़ा था और बड़ा hi खतरनाक लग रहा था.. पर जब उसने उस फोटो को देखा तोह उसका लुंड से रास की हलकी सी धार बह उठी थी


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वही पन्ना भी अपने भाई की तरह सकते मैं आके प्रेमा को देखने लगता है.. जबकि प्रेमा अपनी छूट से टपकते रास को अपने हाथ से पूछते हुए खुद hi सही से कड़ी होती है और दोनों भाइयों की हालत देख क हसने लगती है

"बताओ.. भानु का साथ देने पे ऐसा कुछ मिलेगा"

हीरा जैसे होश मैं लौटा

"तू झूट बोल रही है.. अगर ये सच मैं तेरी बेटी है तोह तू भला क्यू.. ?"

प्रेमा- (अपनी गन्दी सोच का साबुत देते हुए) घर बेटे से चलता है.. बेटी से नहीं, तोह बताओ.. वर्ण आओ अपना काम पूरा करो और निकलो

हीरा और पन्ना एक साथ

"हम वही करेंगे जो तू कहेगी"

हीरा अकेला आगे कहता है

"पर याद रहे. हमसे झूट बोलै या धोका दिया तोह ाचा नहीं होगा"

प्रेमा अपनी छूट मैं होते दर्द की वजह से अपनी योनि पे उंगलिया फिरते हुए

"मेरे लिए खतरा भानु है.. तुम दोनों नहीं, वैसे भी अगर तुम दोनों मेरा साथ डोज तोह मेरी जैसी रखेल भी तौफे मैं मिलेगी"

प्रेम अपनी बात कहते हुए मुस्कुरा पड़ती है और वही दोनों हाथों को जमीन मैं टिका क किसी कुटिया जैसे बन क पैन की तरफ आगे बढ़ने लगती है

प्रेमा का ये अवतार देख क दोनों भाइयों क लुंड उछाल मरने लगते है

पन्ना अपने लुंड को सहलाते हुए, उस फोटो को देख क कहता है

"ऐसी छूट छोड़ने क लिए तोह मैं भानु किया.. उसके जैसे 10 को देखा दे दू"

हीरा भी फोटो को देख क लार टपकते हुए

"सही कहा छोटे.. किया माल है साली"

प्रेमा अपने घुटनो पे चलती हु पन्ना क करीब आ चुकी थी और दोनों घुटनो पे बैत क अपनी जीभ को बहार निकलती है और जो लुंड अभी अभी उसकी छूट की गहराई को चुम रहा था उसे चुम लेती है

"उम्मम्मम्म...."

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हीरा का लुंड वापस से मचल पड़ता है वो वापस उस फोटो को देखने की कोशिश करता है पर तब तक फ़ोन वापस लॉक हो चूका था.. ऐसा लगता है मानो फ़ोन भी लुकाछुपी खेल रहा हो

प्रेमा अपनी hi छूट क रास मैं साणे लुंड क टोपे को चूमते हुए बड़ी hi खूबसूरत लग रही थी, पन्ना अपना लुंड पकड़ता है और उसे ऊपर उठा देता है जिससे उसके बड़े बड़े गंदे ाँद जिनसे एक तेज़ पसीने की भभक सी निकलती है और प्रेमा क नाचने मैं भर लगती है

एक पल क लिए तोह प्रेमा को ऐसा लगता है जैसे उसे उलटी हो जाएगी, पर इस समय वो जिस रस्ते पे थी वह से लौटने का कोई सवाल नहीं था.. इसलिए न च क भी उसे पन्ना क उन गंदे और पसीने से भरे ाँद उसे अपने मुंह मैं भरना hi पड़ता है

"उम्मम्मम्म... सललललररररपपपप.... सरररलललललूउपपपपपप... उम्मम्मम्मम..."


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प्रेमा अपनी साँसों को रोक क पन्ना क एक ाँद को पूरा मुंह मैं भर क ऐसे चुस्ती है मानो उसका रास निचोड़ लेगी..

हीरा ने भी सायद आज से पहले ऐसा नज़ारा नहीं देखा होगा ककी उसका लुंड तोह हिलोरे मरने कागता है, मनो अभी क अभी रास बहा देगा

प्रेमा खुद से पन्ना का लुंड पकड़ लेती है और उसे और अचे से उठा क एक साथ दोनों ाँद को अपनी आँखों क सामने ला क सोचती है

'चींईईई.. कितने घिनोने है'

पर इस समय उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था, इसलिए उसे वापस से ाँद को मुंह मैं भर क उसे चूसना hi पड़ता है

"सररररलललपपपप.... सलललललूउपपपपप.... उम्मम्मम्मम.... सररररररररपपपपपपपप....."


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पन्ना- आअह्ह्ह्हह.. सालियी माँ ऐसी है तोह बेटी कैसी होगी... आआह्ह्ह्हह्ह चूस रैंड.. चूस

हीरा का हाल और बुरा होने लगता है, वो प्रेमा क सर पे अपना हाथ रख क उसे सहलाने लगता है.. और दूसरे हाथ से जोर जोर से अपना लुंड मथने लगता है

प्रेमा अब किसी आज्ञाकारी औरत जैसे पन्ना क मोठे ाँद चूसे जा रही थी.. बीच बीच मैं उसके मुंह मैं गंदे बाल भी आ जाते पर वो रूकती नहीं, बल्कि उसकी रफ़्तार बाद hi रही थी

प्रेमा कभी एक ाँद को मुंह मैं भर क चुस्ती तोह कभी दूसरे ाँद को.. वो पन्ना क लुंड को कसके ऊपर खींच क ुहाए हुए थी, जिससे पन्ना को हल्का दर्द भी हो रहा था पर मज़ा ऐसा मिल रहा था की वो मन भी नहीं कर रहा था

"सररररलललपपपप.... सलललललूउपपपपप.... उम्मम्मम्मम.... सररररररररपपपपपपपप....."

प्रेमा जी भर क पन्ना क ाँद को चूस चूस क अपने थूक से चिकना कर देती है.. जो ाँद कुछ समय पहले गंदगी और पसीने से भरे हुए था, वो अब मालती क बड़े भाई की पत्नी क थूक से चमकने लगे थे

"उम्मम्मम्मम.... आआह्ह्ह्हह्ह.... उम्मम्मम...... सररररलललपपपप.... सलललललूउपपपपप.... उम्मम्मम्मम.... सररररररररपपपपपपपप....."

प्रेमा क ाँद चूसने का अंदाज़ ऐसा था की बेचारा हीरा अपना काबू खो देता है और अपना एक हाथ नीच करके जैसे hi प्रेमा की मोती चुकी को पकड़ता है उसके लुंड से सफ़ेद बारिश होने लगती है.. जिसे वो बिना किसी देरी क प्रेमा क काले घने बालों पे बर्षा देता है


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प्रेमा जब तक कुछ समझती उसके काले बालों पे सफेदी दिखने लगती है

प्रेमा- (जल्दी से उठते हुए) अरे ये किया कर दिया.. पता है कितनी मुश्किल से पार्लर जा जा क बाल सेट करवाए थे और तुम..

प्रेमा आगे कुछ नहीं कहती बस ग़ुस्से से हीरा को देखती रहती है

पन्ना हस्ते हुए अपने लुंड को मुठी मैं जकड क सहलाता रहता है और कहता है

"हमारी मदद चाहिए तोह ये सब की आदत दाल लो"

पन्ना की बात पे हीरा भी है पड़ता है

प्रेमा अपने बाल की परवा करना चोर देती है, ककी वो समझ गयी थी की ऐसे लोगो से और किया उम्मीद की जाये.. कुंदन की हरकतों क आगे तोह ये दोनों भी बचे hi है

कुंदन की हरकतों को सोच क एक पल क लिए प्रेमा क चेहरे पे मुस्कान खेल जाती है, पर दोनों भाइयों को ऐसा लगता है जैसे ये ख़ुशी उनकी वजह से है

इस बार आगे बढ़ने का काम पन्ना नहीं अपितु उसका बड़ा भाई हीरा करता है.. वो आगे बढ़ता है और प्रेमा की दोनों नंगी चूचियों को पियर से सेहला देता है.. जिसपे प्रेमा मुस्कुरा उठती है

"मुझे लगा तुम्हे सिर्फ देखना पसंद है"

हीरा सिर्फ मुस्कुराता रहता है कुछ बोलता नहीं.. ककी उसने दोनों चूचियों क काले जामुन को एक साथ उँगलियों क बीच लेके ऊपर से तरफ उठा दिया था, जिससे एक जोर का दर्द महसूस होता है प्रेमा को और न च क भी उसे अपने पंजो को उठा पड़ता है.. ककी हीरा लगातार उसे उसके निप्पल्स से दबोच क उठा रहा था


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प्रेमा- (इतना जोर का दर्द होता है की उसकी आँखों मैं आंसू भर आते है) आअह्ह्ह्ह.. माआ..... कुत्तत्ते किया कर रहा है.. माआआआ

प्रेमा को यु तड़पते हुए देख क दोनों hi भाई हसने लगते है.. तभी छोटा भाई पन्ना आगे बढ़ता है और प्रेमा को अपने कंधे पे उठा लेता है, प्रेमा एक भरे जिस्म की औरत थी पर उसने इतनी आसानी से उठा लिया था मानो वो कोई नयुवति हो

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह.. कहा ले जा रहे हो

पन्ना जैसे hi उसे अपने कंधे पे उठा क आगे बढ़ने क लिए घूमता है हीरा पीछे से उसकी मटके जैसी नंगी गांड पे एक जोर का थप्पड़ जड़ देता है

"चटाक्क्क्क......"

प्रेमा एक बार फिर से तरप पड़ी थी

"आअह्ह्ह्हह... हरामजादे कुट्टी... कामिनी.. मारररर गयीईइ.. री"

दोनों भाई एक साथ सैतानो जैसी हसी है पड़ते है, और जल्दी hi पन्ना, प्रेमलता को अपने कंधे पे उठाये हुए हॉल मैं ले जाता है और वही पड़े सोफे पे पटक देता है

पर इससे पहले की प्रेमा खुद को संभालती हीरा उसे पकड़ क घुमा देता है.. यानी अब प्रेमा सोफे पे घूम क पड़ी हुई थी यानि उसकी कोमल गांड पन्ना की आँखों क आगे थी

पन्ना तुरंत आगे बड़के अपने दोनों हाथों को उसकी कमर क नीचे ले जेक उसे ऐसे कर देता है जैसे मानो अब प्रेमा सोफे क सहारे कुटिया बानी हो

प्रेमा- आअह्ह्ह किया कर रहे हो तुम दोनों भाई.. आअह्ह्ह्ह

प्रेमा जैसे hi मुंह खोलती है हीरा वापस से उसकी गांड पे थप्पक जड़ देता है, अब तक उसकी गांड पूरी लाल हो चुकी थी और उसपे हीरा की उँगलियों क निशान नज़र आने लगे थे

हीरा आगे बढ़ता है और प्रेमा की गांड की दरार पे अपनी ऊँगली को आगे पीछे.. ऊपर नीचे करने लगता है. प्रेमा क जिस्म मैं गुड़गुई सी होने लगती है

कामुकता क तूफान क बीच ऐसी छोटी छोटी हरकते ऐसे पलों का मज़ा कई गुना बड़ा देती है

प्रेमा- आअह्हह्ह्ह्हह.... ेस्स्स्सह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कूटटटटीईईई....

पर प्रेमा की सिसकारी जल्दी hi तेज़ दर्द भरी चीख मैं बदल जाती है, ककी हीरा ने मुस्कुराते हुए अपनी बीच वाली मोती ऊँगली को उसकी गांड मैं गपक से घुसा दिया था

हीरा हस्ते हुए

"बड़ी गरम गांड है तेरी... साली किया कहती है"

प्रेमा- (दर्द से बिलखती हुई) कुट्टी.. वो खाने की नहीं, निकलने की जगह है.. ेस्सह्ह्हह्ह.. निकर हरामी अपनी ऊँगली को.. आआह्ह्ह्हह

प्रेमा दर्द से तृप्ति हुई घूमने की कोशिश करती है, पर पन्ना जल्दी से उसे दबोच लेता है ताकि वो कुछ कर न सके

हीरा हस्ते हुए गपक गपक करके अपनी मोती ऊँगली से प्रेमा की गांड छोड़ने लगता है.. प्रेमा मचलते हुए अपनी गांड इधर उधर घूमने लगती है ये सोच क की सायद इससे हीरा की मोती ऊँगली उसकी गांड से बहार निकल जाएगी, पैर हीरा तोह था hi हरामी वो और ज्यादा अंदर तक अपनी ऊँगली को घुसा देता है

प्रेमा- (दर्द की वजह से चेहरे की नसे तक नज़र आने लगती थी) आअह्ह्ह्ह.. कुत्त्ते हरामी, छूट क साथ जो करना है कर न.. हीी माआ... रीई..... कुत्ते जिसे देखो मेरी गांड क पीछे hi पड़ा रहता है

हीरा, प्रेमा की गांड से अपनी ऊँगली निकलते हुए दूसरे हाथ से वापस उसकी गांड पे जोर से थप्पड़ जड़ देता है

"कुट्टी.. हरामी.. सब मेरी गांड क पीछे क्यू पड़े रहते है.. हीी री..."

हीरा ने जो ऊँगली अभी अभी प्रेमा की गांड से निकली थी उसे अपने मुंह मैं रख क चूसते हुए कहता है

"ककी तेरी गांड मैं बड़ा स्वाद है"

प्रेमा दर्द से तरप उठी थी पर हीरा की हरकत और बात पे उसे भी हसी आ जाती है, पर खेल तोह अब अपने अंतिम पड़ाव तक आ चूका था.. इसलिए पन्ना बिना देरी क प्रेमा को उसकी कमर से जकड क वापस कुटिया जैसे बना देता है और अपना गरम जलता हुआ लुंड गांड क होल से छुआ देता है

प्रेमा- (दर से काँप उठती है) नहीं.. नहीं.. गांड मैं नहीं.. नहीं.. पन्ना देखो.. हैईईई माआ कुटटी हरामी.. सुवर..... सबको मेरी गांड से क्यू दुश्मनी है.. हीी री..... कुट्टी... माअररर्र गयीईइ.. रईईईई

हीरा हस्ते हुए वापस अपना लुंड मसलने लगता है और प्रेमा को देखते हुए कहता है

"कहा न.. तेरी गांड मैं बड़ा स्वाद है"

प्रेमा दर्द से तरप रही थी, वो जोर जोर से सोफे पे मरते हुए

"Aaaaaaaaaahhhhh... Maaaaaaaaaaaa.... कुत्ते तोह आ खा ले मेरी गांड.. तेरे मुंह मैं हग देती हु.. हैई मा... कामिनियी...... माआररररररर गयीईइ.... रईईईई.... Maaaaaaaaaaaaaaaa.... हीी...... रईईईईई... Maaaaaaaaaaaa.... निकल कुत्ते.... आआअह्ह्ह्हह... बहुत जोरो से दर्द हो रहा है.. मायआ.... माअररर्र... गईइइइइइ.... मैं... आआअह्ह्ह"

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पर पन्ना कहा रेहम करने वाला था, उसका जोश तोह जैसे और बाद गया था, तभी तोह उसने बिना लुंड पीछे खींचे अपना बचा हुआ लुंड भी गांड मैं अंदर उतर दिया

प्रेमा को ऐसा लगता है जैसे उसकी गांड को कोई दोनों हाथों से चीयर रहा हो.. उसकी आँखों क आगे दिन मैं hi चाँद टारे नज़र आने लगे थे

"आआआआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह..... Maaaaaaaaaa.... निकल हरामी कुत्त्तीये... मायआ...."

प्रेमा सूखे पत्ते जैसे काँप रही थी वही पन्ना अपना लुंड वापस खींचता है तोह उसके लुंड क साथ साथ प्रेमा की गांड की चमड़ी भी किचन लगती है, जिससे प्रेमा को आनंद और एक तीव्र दर्द एक साथ होता है

"नहीं.. आअह्ह्ह्हह कुटटी सुवर... मैं मर जाउंगी.. कुत्ते देख तोह तेरा कितना बड़ा है.. हीी रीई... मा... मुझसे सहा नहीं जा रहा.. हैई माआ.... हरामजादे.. सुवर..."

पर पन्ना को तोह सिर्फ मज़ा hi मिल रहा था, प्रेमा की गांड की गर्मी से भी और उसे तड़पते हुए देख क भी.. यानि दोनों तरह से

पन्ना- (अपना लुंड बहार खींच क वापस अंदर घुसते हुए) आअह्ह्ह्ह... साली की गांड बहुत कासी है भाई

ये सुनकर जहा प्रेमा को ग़ुस्सा आता है वही हीरा का जोश और ज्यादा बाद जाता है.. वो प्रेमा क चेहरे क सामने खड़ा होक अपने विकराल लुंड को मथने लगता है

प्रेमा- आअह्ह्ह्हह... कुत्त्तीये..... सुवर हीी री.... हरामी.. कैसे हरामियों क बीच फास गयी हु.. आअह्ह्ह पहले वो कुंदन और अब ये दोनों.. कुत्तों को मेरी गांड से न जाने कोनसी दुश्मनी है.. अह्ह्ह्हह

पन्ना हस्ते हुए अपना लुंड वापस खींचता है और जड़ तक वापस अंदर तक उतर देता है, प्रेमा बार बार कोशिश कर रही थी की वो किसी प्रकार बच सके

पर जैसे पन्ना क दक्कों मैं दम था वैसे hi उसकी पकड़ मैं भी, वो जोर जोर से प्रेमा की गांड का कचूमर बनाने मैं लगा हुअत है.. और उसकी हालत देखते हुए हीरा अपने लुंड की लस्सी निलने की पूरी कोशिश कर रहा था

इस समय मैं कामुकता का तूफान आया हुआ था.. तीनो hi पसीने मैं भीग चुके थे, पर कोई भी रुक नहीं रहा था.. माफ़ करे प्रेमा को चोर क ककी वो तोह लगातार अपनी गांड बचने मैं लगी हुई थी

पर आज उसका और उसकी गांड का बच पाना संभव नहीं था.. ये कामुक खेल अगले 20-25 मं तक यही जारी रहता है

"आआआआहहहहह.... कुत्ते और कितना छोड़ेगा.. आअह्ह्ह पहाड़ hi देगा किया मेरी गांड को.. आह्ह्ह्ह.. मा.. बस कर कुट्टी.. ऐसा लग रहा है जैसे गांड मैं लाल मिर्च भरी हो.. रुक जा कुत्ते.. हरामी मादरचोद"

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प्रेमलता जितनी ज्यादा गालिया दे रही थी.. पन्ना उतनी hi जोर जोर से उसकी गांड का कचूमर निकल रहा था, कभी कभी तोह एशिया लगा था मानो वो जान क पन्ना को ग़ुस्सा दिला रही थी

प्रेमा को यु मचलते और तड़पते हुए देख क सबसे ज्यादा सुकून और मज़ा हीरा को hi आ रहा था ककी वो अपने लुंड को मसलने क साथ साथ अपनी बड़ी बड़ी लटकती ाँद से भी खेल रहा था.. उसका मुंह खुला हुआ था और कुत्ते सामान हाफ रहा था, पर उसका हाथ रुक नहीं रहा था

समय क साथ साथ पन्ना का लुंड आसानी से अंदर बहार होने लगा था.. सायद उसके लुंड ने अपने लिए रास्ता और जगह दोनों बना लिए थे

पर प्रेमा अब भी वैसे hi मचल रही थी, उसका पूरा जिस्म पसीने मैं भीगा हुआ था और कुटिया सामान हाफ रही थी.. पर कही न कही इस जुल्म मैं उसे मज़ा भी खूब आ रहा था, ककी उसके तने निप्पल्स का मतलब तोह यही निकल रहा था

अगले 10 मं और ये रेस यही चलती रहती है

"आआआआहहहहह.... अब तोह निकल ले कुत्ते... बहुत दर्द हो रहा है जी.... Maaaaaaaaaaa.... बस कर हरामी.. हैईईई मोरी मैयाआआआ.... आआआअह्ह्ह्ह... maaaaaaaaaaaaaaa..."


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पर पन्ना तोह उल्टा और खुश होता जा रहा था.. उसके मन में एक बात आती है

'एक दिन ऐसे hi इसकी बेटी का हाल करूँगा..'

सायद ऐसा hi कुछ हीरा भी सोच रहा था ककी वो भी मंद मंद मुस्कुरा रहा था

प्रेमा अपनी गांड मैं पन्ना का मोटा काला लुंड लेते हुए अपनी गांड को गोल गोल घुमा रही थी

"आआह्ह्ह्हह्ह... माआआ..... कुटटटटी.... हैईईई... रईईई.... सुवर... मादरचोद... आआह्ह्ह्हह"

पन्ना, प्रेमलता की गांड को छोड़ते हुए उसकी गांड क पाटों पे जोर का थप्पड़ भी जड़ देता है

"Chataaakkkkkkkkkk"

प्रेमा एक बार फिर से बिलबिला सी जाती है

"Daiyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa.... Maaaaarrrrrrrrrrrrrrrrr gayiiiiiiiiiiiiiiiiiiii"

कामुकता का ये खेल धीरे धीरे अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचे लगा था.. पर अब भी कोई हार नहीं मान रहा था

"हैईईईई..... कैसे हरामी इन्शान है.... Maaaaaaaaaaa.... मरररररर जाउंगी... रईईईई..... निकल भोस्डिके क अपना लुंड"


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पन्ना का जिस्म भी अब कांपने लगा था सायद वो भी अपनी दौड़ क अंत तक आ चूका था, पर ये कुत्ता अब भी रुक नहीं रहा था

ककी पन्ना लगातार गपागप गपागप गपागप करके प्रेमा की मोती गांड का मुरब्बा बना रहा था

पन्ना अपना एक पेअर उठा क प्रेमा क सर पे रख क उसे दबा क बेहरहमी से छोड़ना चालू रखता है.. और प्रेमा बस अपनी गांड मरवाते हुए तृप्ति रहती है

"आआआहहह... कुटटटटी... हरामी.... पेअर हटा... सुवर कही क.. मादरचोद"

पन्ना और हीरा दोनों hi है पड़ते है, पर पन्ना इस बार प्रेमा पे थोड़ी रेहम दिखा देता है वो अपना पेअर उसके सर से हटा देता लेता है.. पर गांड मरना एक पल क लिए भी बंद नहीं करता

पन्ना- (प्रेमा की गांड मरते हुए) मज़ा आ रहा है.. साली रैंड.. बता न

प्रेमा- हरामी.. कुत्ते एक बार अपनी गांड मैं ये मोटा लुंड लेके देख तब मैं पूछूँगी.... आआह्ह्ह्हह कुट्टी.. सुवर अब बस कर न.. 3 बार मेरी छूट रो चुकी है.. आआह्ह्ह


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प्रेमा की हालत देख क हीरा भी अपना लुंड मसलते हुए है पड़ता है.. उसका चेहरे की नसे भी दिखने लगी थी, सायद उसका समय भी नजदीक था

"आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... और कितनी दिएर करेगा, बहुत दर्द हो रहा है पीछे... बस कर अब... आआआआहहहहह"

पन्ना जोर जोर से गांड का बजा बजाते हुए

"आआअह्ह्ह.. ये ले... साली रैंड.. कुटिया... ऐसे hi तेरी बेटी छोडूंगा... आआआहहहहह.. ये ले... आआह्ह्ह्ह.."

प्रेमा का पूरा जिस्म ऐसे हिलने लगता है जैसे कोई उसे पकड़ क झिंझोर रहा हो

"आआआआह्ह्ह्ह... माआआ.... बस कर मादरचोद... आआअह्ह्ह.. Maaaaaaaaaaaa... उफ्फफ्फ्फ़..... माआआआआ....."

पर पन्ना कहा रुकने वाला था.. वो तोह लगातार अपनी नयी रखेल की गांड का हवा महल बनाने पे तुला हुआ था

सटासट.. गपागप.. सटासट.. गपागप.. करके पन्ना का काला विकराल भुजंग नाग जैसा लुंड मनोहर की पत्नी की गांड का चीरहरण कर रहा था

प्रेमा का हाल ऐसा था की उसके मुंह से थूक और लार एक साथ बह रही थी.. आँखों जैसे खुल hi न प् रही हो, हाथ पैरों की जान किसी से चीन ली हो

"आआआह्ह्ह्ह... हरामी अब तोह रुक जा... आआअह्ह्ह.. मायआ.. सांस भी नहीं आ रही है.. रुक जा कुत्ते... मादरचोद"

पर पन्ना कहा रुकने वाला था.. वही प्रेमा की योनि न जाने कितनी बार झाड़ चुकी थी, यु समझो उसका रास निकलना बंद hi नहीं हो रहा था

हवस का ये नंगा नाच निरंतर ऐसी प्रकार चलता रहता है.. इस बीच प्रेमा ने हर तरह से पन्ना से रुकने क लिए भीख मांग ली थी पर वो हरामी रुका नहीं

तभी पन्ना क जिस्म हिचकोले खाने लगता है.. वो अपना पूरा दम मालती की भाभी की गांड पे लगते हुए उसके ऊपर ढेर हो जाता है

"आआआहहहहह... मज़ा आ गया साला.."

और यही वो पल था जब हीरा भी अपने लुंड की गाडी सफ़ेद बारिश करने लगता है, जो एक बार फिर से प्रेम क खूबसूरत चेहरे और बालों का रंग बदल देता है

प्रेमा- आआआअह्हह्ह्ह्हह... Maaaaaaaaaaaaaa

प्रेमा हाफति हुई लम्बी लम्बी साँसें लेने लगती है

वही पन्ना क लुंड से निकलने वाला गाड़ा प्राधारत प्रेमा की गांड की गहराई मैं भरने लगता है

प्रेमा- (अपनी गांड मैं भर्ती मलाई क खूबसूरत एहसास से धन्य हो जाती है) aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.....

जल्दी hi प्रेमा वही सोफे पे पूरी नंगी अवस्था मैं उलटी लेती हुई लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी, और हीरा पन्ना भी एक एक सोफे पे बैठे हुए खुद की हालत सुधर रहे थे

हीरा- (अपना पसीने पोछते हुए) उफ्फ्फ्फ़.. मज़ा गया, वैसे भानु ने कुछ पेपर्स भी लाने क लिए कहे थे उसका किया करना है

जो हीरा अब तक 'भानु भाई' कह रहा था, वो सब सीधा भानु पे उतर आया था.. वही अब वो प्रेमा को हुकुम नहीं दे रहा था, अपितु उससे पूछ रहा था


औरत बाबू भैया.. औरत

प्रेमा मुश्किल से सोफे से उठती है और लड़खड़ाती हुई अंदर कमरे मैं जाती है और थोड़ी दिएर बाद जब वापस आती है तोह उसके हाथ मैं एक पेपर थमा हुआ था

प्रेमा की गांड से अब भी पन्ना का गाड़ा रास बह रहा था.. जो उसकी गांड से निकल क उसके पैरों को भिगो रहा था

प्रेमा- (सोफे पे बैठते हुए) इन पेपर्स की एक फोटोकॉपी बना लेना.. आगे काम आएंगे

हीरा ये सुनकर जिज्ञासा से भर उठता है वो पेपर्स देखता है तोह उसके कमीने चेहरे पे मुस्कान आ जाती है

हीरा- ये तोह डीएनए रिपोर्ट है.. है न मालती, मोनू और कुंदन की ?

प्रेमा बस मुस्कुरा पड़ती है

पन्ना- (प्रेमा की तरफ देखते हुए) तोह आगे किया करना है ?

प्रेमा एक बार फिर से मुस्कुरा पड़ती है.. ककी भानु क हतियार अब उसके काम आने वाले थे

वो फोटो जो प्रेमलता ने हीरा पन्ना को दिखाया था

प्रेमा की बेटी प्रीती 👇


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नोट- 17 अपडेट लेफ्ट (Part #02)
 


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अपडेट #09

सन 🖼️ #01

महिला मण्डली

सुंदरपुर गाओं मैं ठण्ड अपने पेअर पसर चुकी थी.. सुबह सुबह हल्का कोहरा नज़र आने लगा था और जैसा कोहरा इस गाओं मैं पड़ता है, उस हिसाब से जल्दी hi सुबह क 9-10 बजे तक तोह लोग एक दूसरे को दिखना भी बंद हो जायेंगे

पर कुछ चीज़ें इस गाओं मैं कभी नहीं बदल सकती, वो है सुबह सुबह खेतों मैं औरतों का जाना और गाओं क तालाब पे उनका नहाना

समझ नहीं अत इतनी ठण्ड मैं भी वो ये कैसे कर लेती है.. वैसे गाओं मैं बहुत सी औरतें रात को भी हलकी होने जाती है

पर अभी चलते है महेंद्र क घर पे.. जहा दिन की सुरुवात हो चुकी है

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मालती सुबह सुबह ठण्ड से हौले हौले काँप सी रही थी, ककी इस समय वो घर क पीछे बने उसी टूटे से बाथरूम मैं थी और सुबह का स्नान कर रही थी.. पर उसका पूरा धियान सिर्फ इस बात पे था की वो फूल जिसे वो कुछ और hi समझ रही थी वो किसी काम नहीं आया, फिर उस अनजान और अजीब बुड्ढे ने उसे वो पुष्प दिया hi क्यू... ?

पर तभी मालती को कुछ याद अत है.. और जेल बालों पे चलता हुआ उसका हाथ वही रुक जाता है

"पर उसने तोह सायद जमीन से एक सूखा पत्ता उठा क दिया था.. फिर अचानक से वो एक फूल मैं कैसे बदल गया.. किया वो सच मैं कोई अलौकिक शक्ति है.. नहीं नहीं.. ऐसा सब तोह सिर्फ किताबो मैं होता है, असल जीवन मैं ये सब कहा"

मालती वापस बाल्टी से पानी निकल क अपने जिस्म पे डालते हुए फिर से रुक सी जाती है

"पर इन्हे भी तोह जो बुद्धा मिला था.. वो भी ठीक ऐसा hi था"

मालती नहाते हुए एक लम्बी सांस लेती है और कड़ी हो जाती है पर वो जैसे hi कड़ी होती है उसके जिस्म पे एक मात्रा बंधा साया अपने आप hi खुल जाता है और मालती का भीगा हुआ नंगा कामुक जिस्म पूरी तरह अपनी कामुकता की रौशनी से उस नाम मात्र क बाथरूम को भर देती है

मालती वापस से साये को उठाने की कोशिश भी नहीं करती और ऐसे hi जग मैं पानी भर क अपने एक पेअर को आगे करके अपनी गोरी जांघों से डालना सुरु करती है और अपनी योनि द्वार तक पानी डालती रहती है

तदुपरांत वो अपना एक हाथ अपने पैरों की बीच उस गरम जगह पे लगाती है जिससे काफी समय से किसी मोती चीज़ का संपर्क नहीं हुआ था.. एक पल क लिए मालती को अपने शारीरिक सुख क उन अंतिम पलों की याद आ जाती है जब उस बारिश की रात वो अपने hi सेज बेटे क ऊपर हावी हो गयी थी और कैसे कामुकता का एक तूफान उस रात माँ बेटे क पवन रिश्ते को अपने रास से भिगोता चला गया था

पर फिर उसे याद आता है की उसके अगले दिन से hi उसके बेटे की ये हालत हो गयी.. और मालती को ऐसा लगता है मानो किसी ने उसके जिस्म से पूरी ताक़त चीन ली हो वो वही उसी प्रकार पूरी निर्वस्त्र होक बाथरूम की जमीन पे बैठ या यु लिखू की गिर सी पड़ती है और उसकी आँखों से ममता क प्रेम रूपी आँशु बहने लगते है

"कब ठीक होगा मेरा बीटा.. मैं कुछ भी कर सकती हु, बस मेरा बचा ठीक हो जाये..."

रोटी और सिसकती हुई मालती क आँखों से आंसुओं क बहने क साथ साथ उसकी लचर होती ममता को दर्शाने क लिए ये सबद भी उसके मुख से निकल hi जाते है

पर उसे नहीं पता था की बाथरूम क बहार hi अपने हाथ मैं टॉवल लिए सविता कड़ी थी..

मालती को यु टूटते हुए देख क उसका कलेजा भी मानो घायल सा हो जाता है.. सविता मैं लाख बुराई सही पर ममता उसमें भी थी

गाओं से बहार जाने की ीचा की वजह से भले hi उसने कुछ गलत रस्ते चुने थे पर यु एक माँ को बिखरते हुए देख क उसका दिल फटा जा रहा था

सविता की आँखों मैं भी आँशु भर आये था.. वो खुद से hi कहती है

'3 महीने से त्यागी जी लगातार मोनू को जड़ी बुटिया दे रहे है.. पर कोई फर्क hi नहीं पद रहा ?

एक मं किसी गुरु या तांत्रिक से.. पर घर क मर्द कहा ये सब मानेंगे पर बताने की जरुरत भी किया है उन्हें.. हम्म यही सही रहेगा'

सविता एक माँ का दुःख देख क खुद hi कुछ निष्कर्ष निकलने लगी थी.. सायद उसने सोचना सुरु कर दिया था की अब उसे आगे किया करना चाहिए

पर ठीक ऐसी समय बिस्तर पे पड़ा मोनू.. जो पिछले 3 महीने से एक सब्द भी नहीं बोलै होगा उसके होंठों मैं हलकी सी थिरकन सी होती है और एक नाम निकलता है उसके मुंह से

"माँ..."

पर किस्मत का खेल देखो, महेंद्र क ाढेसानुसार मोनू को कभी भी अकेला नहीं छोरा जायेगा.. पर इस समय मोनू क साथ कोई नहीं था, ककी सुबह सुबह का समय होने की वजह से घर क कुछ मर्द खेतों की दिशा मैं निकल गए थे तोह कुछ अब भी सो hi रहे थे और औरते सुबह hi स्नान और घर क दूसरे कामो मैं व्यस्त हो चुकी थी

एक पल क लिए ऐसा लगता है जैसे मोनू उठ क बैठ जायेगा.. पर फिर से उसका सरीर वैसे hi ेस्थिर हो जाता है.. मानो अभी अभी उसके सरीर मैं कोई हरकत हुई hi न हो.. और यही वो पल था जब सत्यम, मोनू क कमरे मैं प्रवेश करता है और उसके एक हाथ मैं कुदाल थी सायद वो खेतों की दिशा मैं कुछ करने वाला था

वो बेहोश पड़े मोनू क पास अत है और उसे यु देख क ग़ुस्से क भरते हुए कहता है

"पता नहीं तेरी वजह से हमे और किया किया सहना पड़ेगा.. न जाने वो दिन कब आएगा जब हम इस धुल मीठी और इस गाओं से निकल पाएंगे, ाचा खासा पूरा परिवार अलग था और सिर्फ 'पिता जी' और तेरी माँ को लाइन पे लाना था पर अब तेरी वजह से सभी एक साथ यही जैम गए है

ऐसे तोह मैं कभी भी इस गाओं से बहार नहीं निकल पाउँगा.. और पता नहीं किया है तेरे अंदर ककी अब मेरी माँ भी इस गाओं और इस घर को चोर्ने का नाम तक नहीं ले रही"

सत्यम एक लम्बी सांस भरता है.. पर ऐसा लगता है मानो कोई ज़हरीला सांप फुफकार रहा हो

"काश साले तू मर hi जाता...."

और पलट क कमरे से निकल जाता है और सुबह सुबह ठण्ड मैं मोनू को दुनिया जहाँ की गालियां देते हुए अपने खेतों का रुख कर लेता है

"तेरी तोह माँ छोडूंगा..."


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सत्यम ऐसे hi और न जाने किया किया बड़बड़ाते हुए अपने पैरों को पटकते हुए बड़ा चला जा रहा था

वापस मालती और सविता क पास चलते है जहा सविता अब दवा क साथ साथ तांत्रिक और ऐसी चीज़ों क बारे मैं सोचने लगती थी..

वापस एक बार फिर से उसे मालती की सिसकारी सुनाई पड़ती है जिससे सविता अप्पने ख्यालों से वापस लौट आती है और मालती को कुछ बोलने या उसे समझने क लिए आगे hi बढ़ने वाली थी की उसे किसी क आने hi आहात होती है

सविता पीछे मुद क देखती है तोह उसे शीला और हर्षिता एक साथ आती हु नज़र आती है.. हर्षिता क हाथ मैं जहा एक बाल्टी थी और उसमें कुछ कपडे वही शीला क हाथ मैं एक सलवार सूट दिख रहा था

सविता बिना किसी देरी क लपक क उनके पास आती है और बाथरूम क अंदर मालती की इस्तिथि का ज्ञान देती है

हर्षिता- हमे मालती भाभी को समझाना चाहिए.. एक माँ का दर्द मैं समझ सकती हु

हर्षिता की माँ वाली बात पे शीला थोड़ा सा दुखी सी हो उठती है जिसे सविता तुरंत ताड़ लेती है

सविता- तू कियु दुखी हो रही है अभी तोह तेरे मज़े लेने क दिन है.. समय आने पे माँ बन जाना

सविता की बात सुनकर हर्षिता तुरंत समझ जाती है की उसकी बात शीला क लिए कैसी थी.. इसलिए वो बिना देरी क माहौल को हल्का करने क लिए कहती है

"वैसे भी.. तेरा जिस्म जैसे भर रहा है उससे तोह यही लगता है.. हमारे जमाई जी दबा दबा क... उम्म्म्म"

शीला शर्मा सा जाती है

"किया आप दोनों भी न.. बचे बड़े बड़े हो गए है और दोनों पे जवानी सवार है"

हर्षिता कुछ ऐसा कहती है.. जिसपे शीला तोह नहीं पर सविता का धियान जरूर जाता है

"अरे जवानी तोह तुझपे चढ़ रही है हमारी नानन्द रानी.. जिसे देखो आज कल बस तुझे hi ताड़ रहा है"

सविता को हर्षिता की ये बात बस यही नहीं लगती, पर इस समय वो एसपी ज्यादा धियान नहीं देती और फिर हर्षिता और सविता एक साथ कुछ ऐसा करते है की शीला की आँखें चौड़ी हो जाती है.. वैसे ये हरकत कोई भी देखता उसका बहुत कुछ चौड़ा हो जाता

ककी सविता और हर्षिता ने एक साथ शीला की एक एक उछाल मरती चुकी पे अपना अपना हाथ रख उसे कसके दबोच दिया था.. और दोनों एक साथ बोलती है

"नानन्द रानी.. जवानी तोह तेरी फुट रही है"

शीला जल्दी से शरमाते हुए एक कदम पीछे हो जाती है.. उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया था, वो झेपते हुए कहती है

"बाप रे आप दोनों पे भूत सवार है आज.. वो भी हवस वाला, मैं तोह ये कपडे मालती भाभी को दे दू बस.. मुझे नहीं सौक है अपनी जवानी को आप दोनों से दबवाने का"

यानि इस माहौल का कुछ असर तोह शीला पे हो hi गया था.. ककी जिस प्रकार उसने अपने हाथ मैं थामे कपड़ों को दिखते हुए ये बात कही थी उससे तोह यही प्रतीत हो रहा है

सविता- मालती कबसे ये सब पहनने लगी.. ?

हर्षिता- है मैंने भी आज तक मालती भाभी को कभी भी साड़ी क अलावा और कुछ पेहेनते हुए नहीं देखा

हर्षिता की बात पे न जाने सविता क्यू मुस्कुरा पड़ती है

शीला- है वो साड़ी hi पहनती है.. पर 3-4 साड़ी hi थी उनके पास और वो सभी धूल क डाली हुई है और मौसम आप दोनों देख hi रही हो.. कोई कपडा सूखा hi नहीं तोह मैंने कहा आज मेरा कोई सूट पेहेन लो, ककी मेरा ब्लाउज तोह उन्हें आने वाला नहीं न

सविता- (हस्ते हुए) है वो तोह है.. कहा तेरे तने हुए संतरे.. और कहा उसके बड़े बड़े गोल मोठे पपीते


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शीला क संतरे

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मालती क बड़े बड़े पपीते

सविता की बात पे तीनो hi खिलखिला क है पड़ती है.. पर इतनी जोर से नहीं की मालती सुन सकती

तभी सविता क सैतानी दिमाग मैं एक विचार अत है और वो शीला क हाथ मैं से उन कपड़ों मैं से सलवार को निकल लेती है और कहती है

"मालती बेचारी दुखी है.. चलो उसको थोड़ा बहलाया जाये"

सविता की कामिनी मुस्कान देख क हर्षिता और शीला भी समझ गयी थी की की 'बड़की भौजाई' आज किया करने क मूड मैं है.. इसलिए वो दोनों भी उसका पूरा साथ देती है, ककी सब कुछ मालती क दुःख को बुलाने क लिए hi था.. भले hi कुछ समय क लिए hi सही

जल्दी hi बाथरूम क दरवाजे क एक तरफ सविता कड़ी थी और दूसरी तरफ हर्षिता

शीला- (दरवाजे क ऊपर से अपना सूट दिखते हुए) लो भाभी.. मैं ले आयी

मालती जैसे अपने दुःख क बादलों से बहार आती है.. वो अपने आंसू पूछते हुए जल्दी से 2-3 जग पानी अपने ऊपर और डालती है, और टॉवल से अपने जिस्म को पूछते हुए कहती है

"शीला मुझे नहीं लगता तेर कपडे मुझे आएंगे.. एक काम कर वही देख बहार मेरे कपडे पड़े होंगे है वही दे दे"

शीला मालती क उतरे हुए कपड़ों को देखती हुई कहती है

"की भाभी.. उतरे कपडे कोण पहनता है, आप यही पहनो"

मालती जानती थी की शीला उसकी नहीं सुनेगी ककी वो सुरु से थोड़ी जिद्दी सवभाव की रही यही.. तभी तोह उसने सबकी मर्ज़ी क विरुद 'प्रेम विवाह' किया, मालती अपना हाथ आगे बड़ा क उसके हाथ से कपडे ले लेती है पर जैसे hi वो उन्हें देखती है

"अरे इसकी सलवार कहा है"

शीला, हर्षिता और सविता तीनो hi है पड़ते है

शीला- (अपनी हसी दबाते हुए) अरे वो तोह लाना भूल hi गयी.. आप एक काम करो यही सूट पेहेन लो और बहार आ जाओ, अंदर चलकर सलवार भी पेहेन लेना

मालती- पागल है किया.. तू कह रही है की मैं नीचे से पूरी...

शीला- (अपनी हसी दबाते हुए) किया नंगी.. अरे तोह किया हुआ, वैसे भी अभी आँगन मैं कोई नहीं है किसी को कहा पता चलने वाला

मालती- सुबह सुबह धतूरा खा लिया है किया.. मैं ऐसे नंगी पुंगी बहार नहीं आने वाली

मालती की इस बात पे तीनो बड़ी मुश्किल से अपनी हसी रोक पाती है

शीला- आपकी मर्ज़ी मैं तोह चली

शीला इतना बोल क कुछ कदम पीछे होक चुपचाप कड़ी हो जाती है.. और मालती उसे आवाज़ देती रह जाती है

मालती- ये औरत पूरी पागल हो गयी है.. एसपी भी सविता भाभी का असर दिखने लगा है

मालती की बात सुनकर सविता बुरा सा मुंह बनती है.. मानो उसने कुछ खट्टा खा लिया हो जिसपे हर्षिता और शीला अपना अपना मुंह दबा क है पड़ती है

सविता अपने दोनों हाथ अपनी कमर पे रख क ऐसे तैयार हो जाती है की मानो कह रही हो

'आने दो ऐसे बहार.. बताती हु'

तभी दरवाजा खुलता है और सिर्फ एक सूट पहने और नीचे से पूरी नंगी मालती बहार आती है.. पर जैसे hi वो शीला को खड़े देखती है बेचारी शर्मा जाती है

"तू.. यही है.. इतनी दिएर से आवाज़ दे रही हु पर जवाब नहीं दिया, जेक नीचे की सलवार ले ा जल्दी से"

"वो क्यू जाये.. उसपे तोह सविता का असर चढ़ा है न.. बड़ी आयी महारानी"

दरवाजे की दूसरी तरफ छुपी सविता सामने आके अपनी बात कहती है.. तोह मालती को समझते दिएर नहीं लगती की ये सब उन्ही क दिमाग की उपज है

मालती जल्दी से अपने सूट को पकड़ क नीचे खीचते हुए वापस बाथरूम मैं भागने की कोशिश कटी है और ऐसी समय हर्षिता जल्दी से सामने से आके बाथरूम का दरवाजा बंद करके उसके आगे कड़ी हो जाती है

हर्षिता- (मालती को ऊपर से नीचे तक देखते हुए) ोययय्ययए.. houiiiiiiiiiii मालती भाभी तोह माल है पूरी, अगर मैं मर्द होती तोह यही काण्ड कर देती

मालती शर्म से लाल जो जाती है.. पर कही न कही इन पलों मैं वो अपना दुःख भी भूल गयी थी.. मालती आगे बढ़कर हर्षिता को दरवाजे से हटाने की कोशिश करती है पर साथ hi साथ एक गलती भी कर देती है.. वो अपने सूट से हाथ हटा लेती है

मालती- हैट वह से.. वर्ण आज मार खायेगी मेरे हाथों.. हटती है की वीरू को बुलाऊ

हर्षिता- (आँख मरते हुए) उनको बुलाने से किया फायदा भाभी.. वो कहा आपकी जवानी का भार उठा पाएंगे.. आपके लिए तोह कोई तगड़ा हैवान चाहिए

शीला- कहु तोह inko(Bhanu) बुला दू

बीचारि मालती पे सब तरफ से कामुक हमले होने लगे थे.. उसका पूरा सरीर शर्म से लाल होने लगा था, पर असली खेल तोह सविता करती है ककी वो आगे बढ़कर मालती का सूट उठा देती है

मालती तोह हैरान hi रह जाती है.. ऐसा लगता है मानो आज 3 औरते मिलकर उसका चीरहरण करने वाली हो

मालती अपने सूट को नीचे करने की कोशिश करती है.. पर अगर वो भरे जिस्म की गदराई गोदी है.. तोह सविता मस्त कामुक हथनी, इसलिए सविता से पार पाना इतना आसान कहा

सविता- (मालती की छूट को सबके सामने उजागर करती हुई) उफ्फ्फ्फ़... कामिनी कबसे झातें नहीं साफ़ की है


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मालती पूरा जोर लगा क अपना सूट शुरवाती है और नीचे करके दोनों हाथों से पकड़ क रखती है.. मानो उसे दर हो की सविता फिर से ऐसा कुछ कर सकती है

मालती- किया बड़की भौजाई.. आप न.. जरा भी लाज नहीं है

हर्षिता- (हस्ते हुए) वैसे मुझे तोह मालती भाभी इन्ही बड़ी बड़ी झाटों मैं अछि लग रही है.. कॉमर्स से भरे हुए काले काले बाल

हर्षिता ये कहते हुए एप होंठों पे अपनी जीभ फिर देती है.. जिससे न च क भी मालती क उन्नत उरोजों क काले निप्पल्स मैं एक अजीब सी तरंग उठाने लगती है

शीला- अरे तोह छत्त क देख ले न.. मालती भाभी मन थोड़ी करेगी

हर्षिता- (एक कदम आगे बढ़ते हुए) लाओ.. लाओ...

मालती तोह काँप सी जाती है उसे लगता है सच मैं हर्षिता उसकी छूट चाटने की बात कर रही है

मालती- (शीला और हर्षिता को देखते हुए) दोनों ने सुबह सुबह भाग पि ली है किया

सविता- (मुस्कुराते हुए) अभी कहा कुछ पिया है.. वैसे सोच रहे है आज तेरी छूट और चूचियों का रसपान करके दिन की सुरुवात करे

शीला- (मालती की बड़ी बड़ी चुकी.. जो उस सूट से बहार आने को बेताब हो रही थी, उन्हें देख क) दायी वाली मेरी

हर्षिता- बायीं मेरी..

मालती कभी शीला को देखती तोह कभी हर्षिता को.. उसकी बड़ी बड़ी आँखें हैरानी से और बड़ी होती जा रही थी

तभी सविता आगे बढ़ते हुए..

"छूट पे मैं मुंह लगा लुंगी"


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मालती की तोह सांस hi अटक गयी थी वो जल्दी से आगे बढ़कर हर्षिता को एक किनारे दक्का देती है और बाथरूम क अंदर घुस क उसे अंदर से बंद कर लेती है और अंदर से कहती है

"तुम सबको तोह मैं देख लुंगी"

हर्षिता, शीला और सविता तीनो hi जोरो से खिलखिला क हसने लगते है.. जिससे मालती क चेहरे पे भी हसी खेल जाती है

पर इन सभी मैं हर्षिता को सायद कुछ ज्यादा hi मज़ा आया था.. ककी वो सबकी नज़रों से छुपते हुए बार बार अपनी साड़ी क ऊपर से hi अपनी योनि को आते की तरह घुन्ध रही थी

मालती काफी दिएर तक बहार hi नहीं आती इसलिए हर्षिता और शीला बाद मैं नहाने की बाद कहते हुए वापस चले जाते है

सन 🖼️ #02

ऐसी दिन सुबह क करीब 10 बजे.. वापस ऐसी जगह ऐसी बाथरूम मैं

कंटिन्यू...
 


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अपडेट #09

सन 🖼️ #02

Scene 🖼️ #01 👇

मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)


ऐसी दिन सुबह क करीब 10 बजे.. वापस ऐसी जगह ऐसी बाथरूम मैं

कंटिन्यू...

शीला को आज नहाने मैं अछि खासी देरी हो गयी थी, इतनी की इस समय सुबह क 10 बज रहे होंगे.. सुबह आज पहले सविता फिर मालती और मालती क साथ हसी मज़ाक, ऐसी सब चक्कर मैं आज वो नहाने मैं बहुत दिएर कर चुकी थी

पर इस समय वो उसी बाथरूम मैं मौजूद थी..

सुबह का ठंडा ठंडा पानी शीला क जिस्म मैं गर्मी को बढ़ावा दे रहा था

सर से बेहटा हुआ पानी उसके पूरी तरह निवस्त्र सरीर पे बेहटा हु ऐसा मालूम पद रहा था.. मानो किसी तानी हुई पहाड़ियों से ठंडा पानी नीचे की तरफ बह रहा हो और जैसे जैसे वो नीचे की गहराई की तरफ बाद रहा हो उसमें गर्मी का ताप भर रहा हो


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शीला अपने पुरे जिस्म को गीला करने क बाद अपने एक हाथ मैं साबुन लेती है और अपनी कोमल गोल उन्नत यौवन वाली ऊंचाइयों पे मलने लगती है

साबुन की सफ़ेद झाग उसके काले जामुन जैसे निप्पल्स को ढकने लगती है.. पर ये नज़ारा ऐसा था की किसी की भी साँसें रुक जाये



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और कोई था भी जो इस कामुक नज़ारे को देख क सांस लेना तक भूल गया था, घर क पीछे बने नाम मात्र क उस बाथरूम क पुराने से दरवाजे पे कोई अपनी नज़रें जमाये हुए था.. और इस बात की तनिक भी भनक भानु की पत्नी 'शीला' को नहीं थी

गाओं मैं सेहरो क मुकाबले ठण्ड ज्यादा hi होती है, और खास करके सुबह सुबह तोह ठण्ड अपने पुरे उरोज पे होती है

ऐसे मैं शीला का पूरा निवस्त्र सरीर पानी मैं भीगा हुआ हौले हौले कांपना सुरु हो चूका था, और सायद इसकी वजह सुबह का ठंडा पानी नहीं.. अपितु उसके उन्नत दूध पे साबुन क साथ घूमता हुआ उसका हाथ था

ककी शीला की बंद हो चुकी आँखें तोह कुछ ऐसा hi बता रही थी

"Aaaaahhhhhhhhhh......."

शीला क मुंह से फूटी सी ाःह ने अब इस बात को पूरी तरह सच साबित कर रही थी, तभी एक और हलकी सिसकारी सुनाई पड़ती है

पर ये शीला की तोह नहीं थी.. ककी इस अनजान सिसकारी को सुनते hi शीला जैसे धरातल पे लौट आयी हो, वो जल्दी से बाथरूम क अंदर hi टंगे टॉवल को उठा क अपने नंगे जिस्म पे रख क उसे छुपाने की नाकाम सी कोशिश करती है

ये सब बहुत जल्दबाजी मैं होता है.. पर शीला सबसे ज्यादा हैरान तब होती है जब उसे एक पल क लिए ऐसा लगता है की उसने दरवाजे की बीच की हलकी जगह पे किसी की आँखों को देखा हो

शीला- कोण है.. कोण है वह ?

शीला अपने जिस्म को छुपाने की नाकाम कोशिश करती हुई धीरे से दरवाजा खोलती है तोह सामने किया अगल बगल भी कोई नहीं था

शीला का दिल जोरो से डाक डाक कर रहा था, ककी उसे पूरा यकीं था की उसने पक्का किसी की आँखों को देखा है

शीला अपने नंगे जिस्म पे उस टॉवल को मुश्किल से लपेट क उस टूटे से बाथरूम से थोड़ा आगे देखना सुरु करती है की आखिर कोण है जो चुप क उसके यौवन का रास पीने की कल्पना कर रहा है

पर शीला को वह कोई भी नज़र नहीं आता, पर उसे पूरा यकीं था की उसने जो देखा है वो गलत नहीं है

"पागल हो गयी हो किया.. जो ऐसे नंगी पाऊँगी घूम रही हो, मालती भाभी वाला मज़ाक किया सच मैं करने वाली हो, अरे घर मैं इतने सरे मर्द है और तुम"

शीला अचानक से दर जाती है ये सब सुनकर पर जब वो पीछे मुद क देखती है तोह उसके पीछे हर्षिता अपनी साड़ी को अपनी कमर मैं घुसते हुए एक हाथ मैं बाल्टी लिए हुए कड़ी थी

शीला तोह जैसे शर्म से जमीन मैं धस जाये.. ऐसा प्रतीत होता है उसे

शीला- (अपनी टॉवल को जोर से पकड़ लेती है की कही गलती से वो खुल न जाये, या मालती वाला मज़ाक उसके साथ न हो जाये) वो.. वो.. चुटकी भाभी, मैंने अभी अभी किसी को दरवाजे पे देखा तोह...

हर्षिता है पड़ती है

"अरे पगली वो मैं hi थी, देख रही थी की अंदर कोण है.. इसमें किया डरने की बात है"

शीला रहत की सांस चोरते हुए

"ओह.. तोह आप थी, मुझे लगा"

हर्षिता हस्ते हुए

"तुझे किया लगा, सुबह सुबह कोई तेरी जवानी क दर्शन करने आया है"

शीला- किया चुटकी भाभी.. आप न

हर्षिता- (शरारत क साथ शीला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए) वैसे अगर तू और कुछ दिएर ऐसे hi कड़ी रही तोह मैं पक्का तेरी टॉवल उतर दूंगी


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शीला को जैसे अपने नंगे जिस्म की याद आती है और दौर क बाथरूम की तरफ भाग पड़ती है.. पर टॉवल इतनी छोटी थी की शीला पीछे से पूरी नंगी hi थी

हर्षिता- उफ्फ्फ्फ़... ये भी न

शीला क अंदर जाते hi हर्षिता चारो तरफ देखती है और अपनी बाल्टी को धीरे से एक तरफ रख देती है.. और दबे पाऊँ उस पुराने और टूटे बाथरूम क पीछे की तरफ बढ़ती है, जहा पेड 🌴 पौधे और बड़ी बड़ी झाड़ियां hi थी

पर हर्षिता जैसे hi उस हिस्से मैं पहुँचती है उसके चेहरे पे मुस्कान खेल जाती है

ककी उसके सामने 'सत्तू' था को दिवार क सहारे छुपा हुआ था और बुरी तरह दर से काँप रहा था

सत्तू जैसे hi हर्षिता को देखता है उसके पसीने छूट जाते है.. वो कुछ बोलने hi वह होता है की हर्षिता आगे बाद क उसका मुंह अपने हाथ से बंद कर देती है

और करीब आके उसके कान मैं धीरे से कहती है

"कमीने सुबह सुबह अपनी बुआ को नंगा देख क शर्म नहीं आती"

सत्तू- (दर से पूरी तरह काँप रहा था.. हर्षिता ने भी उसके मुंह से अपना हाथ हटा दिया था) चुटकी चची.. वो.. मैं.. मैं

हर्षिता- मुझसे तोह नाटक करना भी नहीं.. पिछले कई दिनों से देख रही हु, तू कैसे चुप चुप क शीला क ताड़ता है

सत्तू की जैसे सांस hi अटक गयी थी, पर हर्षिता रूकती नहीं वो आगे कहती रहती है

"तू शीला से ज्यादा बात भी अब नहीं करता, पर उसको चुप चुप क रोज़ देखते हो.. और आज तोह"

हर्षिता इस बात को कहते हुए मुस्कुरा पड़ती है.. बेचारा सत्तू तोह जैसे सांस लेना hi भूल गया था, वो अपना थूक निगलते हुए बड़ी मुश्किल से कहता है

"नहीं.. नहीं.. चुटकी चची आप गलत सोच रही हु मैं तोह मैं.. मैं.. वो"

हर्षिता उसके और करीब आ जाती है इतना hi सत्तू की दरी और सेहमी हुई साँसे हर्षिता को अपने चेहरे और गर्दन पे महसूस होने लगती है.. और सत्तू अपने पंजो पे खड़ा होने पे मजबूर हो जाता है

"किया.. ये वो.. मैं.. मैं लगा रहा है, और कुछ भी बोलने से पहले इसकी सफाई भी दे देना"

हर्षिता ये कहते हुए अपनी नज़रों को नीचे करती है, जिसका पीछा सत्तू भी करता है और जो देखता है उसे तोह बेचारे की हालत और पीली पद जाती है

ककी शीला को चुप क देखते समय उसने अपना लोढ़ा बहार निकल लिया था और उसे hi मैथ रहा था.. जब शीला को एहसास हो जाता है की कोई उसे देख रहा है

वो तोह समय रहते वो जल्दी से भाग क यहाँ बाथरूम क पीछे आ गया था वर्ण आज पकड़ा जाता.. पर बेचारे की किस्मत सच मैं ख़राब थी ककी उसको भाग क यहाँ छुपते हुए 'हर्षिता' ने देख लिया था

और अब जो हो रहा है वो तोह सबके सामने है hi.. 😉

असल मैं सत्तू ने जब हर्षिता की बात को समझने क लिए अपनी नज़रों को नीचे किया तोह पाया की उसका लुंड जिससे अब भी कॉमर्स की एक लकीर जैसी टपक रही है वो इस समय पूरी तरह से हर्षिता की नाभि से चिपका हुआ है और उसका गाड़ा कॉमर्स हर्षिता की नाभि मैं भर रहा है


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सत्तू तोह जैसे काँप उठता है और पीछे होने की कोशिश करता है पर पीछे तोह दिवार थी.. बेचारा पूरी तरह फास चूका था

हर्षिता आगे बाद क और चिपक जाती है जिससे अब सत्तू का लुंड मानो उसकी गहरी नाभि मैं घुसने सा लगा था.. कुछ तोह खास था ककी एक पल क लिए हर्षिता की भी आँखें बंद हो जाती है और उसके मुंह से आआह्ह्ह्हह फुट पड़ती है

"Esssssshhhhhhhhhhhhhhh..."

सत्तू क तोह मानो तोते hi ुध गए थे उसके समझ नहीं आता वो किया बोले

हर्षिता- (खुद को तुरंत hi संभल लेती है) ये शीला और तेरा कबसे चल रहा है.. ?

सत्तू कुछ बोलने क लिए मुंह जरूर खोलता है पर बेचारे क मुंह से कुछ निकल hi नहीं पता.. वो तोह बस कभी 'है' मैं, कभी 'न' मैं अपना सर हिलता रहता है

हर्षिता खुद hi कुछ कदम पीछे हो जाती है, और सत्तू को देख क मुस्कुरा उठती है.. और इधर उधर देखते हुए कहती है

"जरा धियान रखा कर अपना.. हर बार मैं नहीं बचा पाऊँगी"

और पलट क जैसे hi जाने लगती है वापस कुछ सोचते हुए सत्तू को देख क कहती है

"आज मैंने बचाया है.. ये भूलना मत, ककी इसके बदले तुझे भी मेरे काम आना पड़ेगा"

हर्षिता जब ये बोल रही थी तोह अनायास hi उसकी नज़रें सत्तू क हिलोरे लेते लुंड पे चली जाती है

हर्षिता- (आगे कहती है) कमीने अब तू ऐसे अंदर कर ले.. कब तक अपनी चची को इसके दर्शन करवाएगा

सत्तू हड़बड़ा सा जाता है और जल्दी से अपने लुंड को अपनी धोती क अंदर भरने लगता है.. जिससे हर्षिता मुस्कुरा पड़ती है और वह से निकल क बाथरूम क पास आती है जहा अब भी शीला नाहा hi रही थी इसलिए हर्षिता वापस घर क अंदर चल पड़ती है

पर घर मैं जाते हुए उसका एक हाथ उसकी नाभि पे था और उसमें भरे सत्तू की गाड़े चिपचिपा पानी को वो धीरे धीरे अपने पुरे पेट पे मॉल रही थी

हर्षिता क चेहरे पे एक मुस्कान सी चाय गयी थी और उसके पैरों क दरमियान ऐसा हाल था मानो पूरा सैलाब आया हो.. और कॉमर्स बून्द बून्द करके टपक रहा हो


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सन 🖼️ #03

दिन क करीब 3 बज रहे होंगे.. मालती, शीला क कपड़ों मैं अपने घर की तरफ चली जा रही थी, ककी उसे वह से और कपडे लाने थे

शीला का वो 'सलवार सूट' मालती क भरे और गदराये जिस्म क लिए काफी कैसा हुआ था.. ककी उसमें से जिस्म का एक एक कटाव और उभर ऐसे hi नुमाइश हो रहा था

कंटिन्यू...
 


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अपडेट #09

सन 🖼️ #03

किया मैं आपकी ले सकता हु.. ?

दिन क करीब 3 बज रहे होंगे.. मालती, शीला क कपड़ों मैं अपने घर की तरफ चली जा रही थी, ककी उसे वह से और कपडे लाने थे

शीला का वो 'सलवार सूट' मालती क भरे और गदराये जिस्म क लिए काफी कैसा हुआ था.. ककी उसमें से जिस्म का एक एक कटाव और उभर ऐसे hi नुमाइश हो रहा था

कंटिन्यू...

जबसे मोनू ने बेहोशी की चादर ोधी है, तबसे ऐसा काम hi हुआ है की मालती क खूबसूरत चेहरे पे मुस्कान की चाय नज़र आयी हो

पर आज सविता की छत्रछाया मैं शीला और हर्षिता ने कुछ पलों क लिए hi हसी उसे हसने पे मजबूर कर hi दिया था

जीवन की परेशानियों से लड़ने का सबसे सरल उपाय 'अपने' होते है

किसी ने कहा भी है..

'अपने तोह अपने होते है'

पर सवाल तोह यही है, की ये कैसे पहचाने की सच मैं अपना कोण है.. और पराया कोण ?

पर इन दिनों बड़ी hi मुश्किल से मालती क खूबसूरत चेहरे पे ख़ुशी की चमक आती थी.. और आज ऐसा hi एक दिन था

मालती अपने घर की तरफ चली जा रही थी, वजह थी उसके कपडे.. ककी मोनू क साथ जो हुआ उसकी वजह से वो बाकियों की तरह hi जल्दबाजी मैं महेंद्र क घर आयी थी और तबसे सब क सब यही रह रहे है

ऐसे मैं मालती ने बीच मैं 1-2 साड़ी अपने घर से मंगवा ली थी पर अभी जो हालत है ऐसे मैं यही लगता है की भविष्य मैं सायद सभी एक साथ यही रहने वाले है

इसलिए अब मालती को और कपड़ों की जरुरत थी.. वर्ण भला आज वो शीला का ये कैसा हुआ सलवार सूट क्यू पहने हुए होती

वैसे तोह शीला भी हरे भरे जिस्म की कासी औरत है.. पर मालती तोह मालती है न

शीला अगर उछलती हुई गोदी है तोह मालती वो गदराई गाय है जिसके स्तनों का दूध पीने की ीचा तोह पुरे गाओं को है

शीला क आगे अगर उठी उठी पहाड़िया है तोह मालती का यौवन हिमालयन जैसा विशाल है

शीला का पिछले हिस्सा अगर किसी क लुंड मैं जोश भरने का दम रखता है, तोह मालती वो है जिसे देख क लोग मुठ मरे बिना रुक hi नहीं सकते है

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अब ऐसे मैं शीला क कपडे मालती क भरे और कैसे जिस्म पे ऐसे चिपके हुए थे की दर लग रहा था की कही उसका उछलता हुआ यौवन कपड़ों को पहाड़ क बहार न निकल आये.. खासकरके उसके बड़े बड़े कबूतर तोह बेताब हो रहे थे अपने पंख फड़फड़ाने क लिए

दुःख क बादलों क बीच मुश्किल से आयी चेहरे की हसी लिए हुए मालती आगे बड़ी चली जा रही थी की तभी एक आवाज़ ने उसका धियान अपनी तरफ खींच लिया

"असली खूबसूरती तोह यहाँ है"

मालती हैरानी और कुछ ग़ुस्से से जैसे hi मुड़ती है उसे एक 25-30 साल क बीच का मर्द दिखाई पड़ता है जिसके गले से एक कैमरा लटका हुआ था

वो आदमी इस समय मालती की तरफ hi देखे जा रहा था

मालती- तमीज नहीं है औरतों से बात करने की.. जो मुंह मैं आया बक डोज ?

मालती ने एक hi सांस मैं उस आदमी की पूरी क्लास लगा दी थी, वही वो आदमी एक पल क लिए तोह बस सकते मैं खड़ा रहा और फिर एक लम्बी सी सांस लेते हुए कहता है

"माना आप बहुत hi खूबसूरत है.. पर इस समय मैं आपकी नहीं उन फूलों की बात कर रहा था"

मालती हैरानी से भरी हुई अपने पीछे देखती है तोह वह गाओं की कच्ची सड़क क किनारे पीले पीले फूल खिले हुए थे


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मालती- (अपनी गलती पे बुरी तरह झेप गयी थी) वो.. मुझे लगा की आप मुझे.. एक मं

जैसे मालती को कुछ याद आया हो

"किया कहा आपने.. माना की मैं भी खूबसूरत हु, आप कही फूलों क बहाने मुझे hi तोह नहीं बोल रहे है"

आदमी मुस्कुराते हुए मालती क काफी करीब आ चूका था

"वैसे तोह मैं बात फूलों की hi की थी.. पर इसमें कोई सक नहीं की आप भी बहुत खूबसूरत है.. और और.. इससे पहले की आप मुझे कुछ कहे, मैं सिर्फ यही कहूंगा की मैं सिर्फ आपकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा हु मेरा कोई गलत उद्देस नहीं है"

मालती फीकी की हसी हस्ते हुए उसकी बात से सहमत सी हो जाती है, वैसे उसे ाचा भी लगता है ककी कुंदन ने तोह उसकी तारीफ करना तोह दूर उसकी तरफ धियान देना भी चोर दिया है

मालती जैसे hi आगे बढ़ने को होती है वो आदमी फिर से कहता है

"किया मैं आपकी ले सकता हु.. ?"

मालती हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए

"किया कहा ?"

आदमी जैसे उसे समझ hi न आया हो की उसने ऐसा किया कह दिया

"आपकी एक फोटो ले सकता हु.. और आप इतना चौक क्यू जाती है ?"

एक पल क लिए तोह मालती को खुद पे hi हसी आ जाती है और मन hi मन कहती है

'मालती तेरी सोच कितनी गन्दी हो गयी है.. वो बेचारे तोह फोटो की बात कर रहा है'

मालती- मेरी फोटो क्यू ?, और आप है कोण मैं तोह जानती भी नहीं आपको

आदमी अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए

"इस न चीज़ को 'रॉकी' कहते है.. मैं एक फोटोग्राफर हु, मुझे नेचर की खूबसूरती को अपने कैमरा मैं कैद करने का सौक है"

रॉकी अपने कैमरा की तरफ इशारा करते हुए अपनी बात कहता है

और है ये वही रॉकी है, जो इस गाओं मैं हो रही मौतों और यहाँ क रहस्य पता करने आया है


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मालती- तोह नेचर की खूबसूरती की फोटो लीजिये.. मेरी क्यू लेनी है

रॉकी- (मुस्कुराते हुए) किया कहा.. आपकी ?

मालती- (मानो हड़बड़ा सी जाती है) फोटो... फोटो.. की बात कर रही हु

रॉकी- क्यू आप इस संसार का हिस्सा नहीं है, और आपको भी तोह उसी ने बनाया है जिसने पूरा संसार बनाया.. किया मैं गलत कह रहा हु ?

मालती- (है सी पड़ती है) बातें बनाना खूब अत है आप सेहरी लोगों को

रॉकी- (अपने कैमरा को ऊपर की तरफ उठाते हुए) तोह किया मैं आपकी...

मालती- जी नहीं.. इन सब का सौक नहीं

रॉकी- (अपना तरीका बदलते हुए) मैं आपसे पहली बार मिला हु, पर ऐसा लगता है इस हसी क पीछे कोई गहरा दर्द है

मालती को एक पल क लिए हैरानी होती है की एक अनजान आदमी भी उसके दर्द को पहचान ले रहा है.. ये बात कही न कही उसके लिए ऐसी थी जैसे किसी ने उसके जख्मों पे फूक मरी हो

मालती- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए) जी मेरे बीटा...

मालती इतना hi कहती है की रॉकी हैरानी से भर उठता है

"किया.. आपका बीटा, आप शादीशुदा है"

मालती- (एक पल क लिए फिर से मालती क चेहरे पे झूटी hi सही हसी जरूर आ जाती है) जी है मैं शादीशुदा हु.. और मेरा एक बीटा भी है

रॉकी- (मानो उसे यकीं hi न हो रहा हो) पर आप तोह इतनी खूबसूरत है ?

मालती- मतलब.. जिनके बचे होते है वो खूबसूरत नहीं होती है ?

"नहीं नहीं मेरा वो मतलब नहीं था, मेरा मतलब आपको देख क लगता नहीं न..

वैसे चलिए मैं अबसे रोज़ प्राथना करूँगा की आपका बीटा जल्दी से जल्दी ठीक हो जाये और आपको कसके गले से लगा ले"

मालती क चेहरे पे इस बार सच मैं ख़ुशी च जाती है

"ऐसा हुआ तोह मैं खुद आपका मुंह मीठा करौंगी"

रॉकी अपने कैमरा को फिर से उठाते हुए

"एक फोटो.. "

मालती कुछ सोचने क बाद

"आप मेरे मोनू क लिए प्राथना करिये.. जिस दिन आपकी ये प्राथना पूरी हो जाएगी, उस दिन आपकी फोटो वाली ीचा मैं पूरी कर दूंगी"

रॉकी- (खुस होते है.. अपना हाथ आगे बड़ा देता है) तोह डील पक्की

मालती को भी उसके तरीके पे हसी आ जाती है, और वो हाथ मिलाने की जगह अपने दोनों हाथों को जोड़ क नमस्ते करते हुए कहती है

"ये है हमारी संस्कृति"

रॉकी- (मुस्कुराते हुए) ok जी.. पर पहले आप वडा करिये, आपके बेटे क ठीक होने क बाद आप मुझे देंगी

मालती- पक्का.. मैं जरूर दूंगी

रॉकी- (धीरे से आँख मरते हुए) मैं फोटो की बात कर रहा हु वैसे

मालती का मुंह तोह खुला का खुला hi रह जाता है हैरानी से

रॉकी- ok.. ok अब मैं चलता हु

और मौका देख क वह से खिसकने मैं hi अपनी भलाई समझता है.. पर थोड़ी दूर जाने क बाद

"मैं रोज़ सुबह सुबह प्राथना करूँगा की आपका बीटा जल्दी से जल्दी ठीक हो जाये, ककी उसके बाद आप फोटो क लिए मन नहीं कर सकती"

मालती भी है पड़ती है इस बार और सिर्फ है मैं अपना सर हिला देती है.. और एक बार फिर से अपने घर की तरफ चल पड़ती है

जहा घर मैं इस समय पहले से hi कोई मौजूद था, जो पूरी तरह परेशां होक पुरे घर को अस्त व्यस्त करने मैं लगा हुआ था

"पता नहीं मादरचोद 'कुंदन' ने उस चीज़ को कहा छुपा क रखा होगा"

कंटिन्यू.. इन अपडेट #10
 


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अपडेट #10

सन 🖼️ #01

बचपन की यादें.. शीला का यौवन


"पता नहीं मादरचोद 'कुंदन' ने उस चीज़ को कहा छुपा क रखा होगा"

इतने सालों से उस खंजर क चक्कर मैं मादरचोद कुंदन की गुलामी करता आ रहा हु.. उस बहनचोद भानु का कुत्ता भी बना पर मेरे हाथ किया आया.. जानता

2-2 लोगो को जान से मार दिया उस भानु क कहने पे, पर अब वो मेरी hi जान क पीछे पद चूका है.. उसे लगता है मुझे समझ नहीं आ रहा

अगर वो सपोला होश मैं आ गया तोह भानु खुद को बचने क लिए मेरी बलि देने से पीछे नहीं हटेगा..

वो अपने मकसद क लिए किसी भी हद तक जा सकता है"

अब तक तोह समझ hi चुके होंगे की ये और कोई नहीं बल्कि 'जब्बार' है.. कुंदन की चक्की मैं काम करने वाला और वही चक्की क पीछे एक छोटी सी झोपडी नुमा कमरा मैं रहने वाला

जब्बार अपने आप बड़बड़ाते हुए मालती और कुंदन क कमरे को पूरी तरह अस्त व्यस्त कर चूका था, मालती का एक एक कपडा उसने यहाँ वह बिखेर दिया था और यही हाल उसने कुंदन क कपड़ों क साथ भी किया था

"मादरचोद कुंदन ने न जाने वो खंजर कहा रखा होगा.. ?"

जब्बार न जाने कोनसे खंजर को ढूंढ रहा था, जो इतना परेशां था.. हाल ये था की उसे मालती क कुछ गहने भी मिलते है पर वो उनकी तरफ धियान तक नहीं देता, और कुंदन क कपड़ों मैं अचे खासे पैसे भी.. पर फिर से वही बात उसने उनकी तरफ भी जरा भी दिन नहीं दिया

सायद उसे सिर्फ वही खंजर चाहिए था, जब्बार कमरे से निकल क बहार आता है और इधर उधर देखने लगता है मानो तय कर रहा हो की अब कहा ढूंढे

"इतने सालों मैं जब भी मुझे मौका मिला है मैंने उस खंजर को ढूंढे की कोशिश की है.. पर आज तक वो मुझे मिला नहीं, कुत्ते कुंदन ने न जाने उसे कहा छुपा रखा है

मुझे वो खंजर किसी भी हाल मैं चाहिए, एक बार वो मेरे हाथ लग लगा तोह मैं रातो रात अमीर हो जाऊंगा.. फिर कभी भी कुछ नहीं करना पड़ेगा"

जब्बार लगातार खुद से बोले जा रहा था वो अब रसोईघर मैं आ चूका था, अपनी कमर पे दोनों हाथों को रखते हुए रसोईघर में रखे डिब्बे पे नज़र दौड़ने लगता है और फिर एक एक करके सभी डिब्बे को खोल क जमीन पे पटकने लगता है.. पर किसी मैं भी कुछ नहीं मिलता

जब्बार गुस्से मैं पागल हो रहा था ककी उसे पता था मोनू क होश मैं आते hi उसकी ज़िन्दगी को खतरा है

वो रसोई से बहार आता है तोह उसे एक किनारे बना स्टोर रूम जैसा नज़र आता है.. उसकी उम्मीद फिर से जाग जाती है

जब्बार दौड़ क उस स्टोर रूम मैं पहुँचता है..

वैसे ये वही स्टोर रूम था जहा कभी जग्गू चोर छुपा था

{Part #01, अपडेट #34}

स्टोर रूम जैसी इस जगह पे गेहू चावल की बोरिया hi नज़र आ रही थी साथ मैं कुछ रज़ाई और बिस्तर रखे हुए था.. जब्बार क हाथ इस बार फिर से निरसा hi हाथ लगी थी

पर वो जैसे hi बहार निकलने को होता है उसे ऊपर ताड़ पे रज़ाई और बिस्तर क बीच कुछ नज़र आता है

जब्बार क लिए ये ऐसा था.. मानो मरती हुई मछली को वापस पानी मिल गया हो

वो एक पल की भी देरी नहीं करता और लपक क एक बोरी को उठा क उस ताड़ क नीचे रख देता है.. बोरी काफी भरी थी पर जब्बार कोई कमजोर इन्शान नहीं था, ऐसे hi वो एक और बोरी को उठा क पहली वाली बोरी पे रखता है और अब उसपे चढ़ चूका था

जब्बार जल्दी जल्दी किसी कोतुहल से भरे बचे जैसा.. रज़ाई और बिस्तर को हटा क देखता है तोह उसकी आँखों मैं चमक आ जाती है, ककी वह एक छोटा सा संदूक था


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"जरूर ऐसी मैं होगा.. वो खंजर"

जब्बार जैसे hi.. संदूक को उठता है दोनों बोरिया मैं हलकी हरकत होती है और ऊपर वाली बोरी फिसल जाती है जिससे जब्बार संदूक क साथ साथ धड़ाम से जमीन पे गिरता है, उसकी कमर मैं चोट भी आती है पर इस समय उस अपने दर्द की परवा नहीं थी

जब्बार क गिरते hi ऊपर रखे बिस्तर और रज़ाई भी उसके ऊपर गिरने लगते है.. इन सब की वजह से वो संदूक भी उसके हाथ से निकल क दूर जा गिरा था.. और एक क बाद एक इन सभी क चक्कर मैं अछि खासी आवाज़ भी हो गयी थी

"कोण है मेरे घर मैं.. मैंने पूछा कोण है अंदर"

जब्बार की साँसे मानो रुक सी जाती है.. ककी ये आवाज़ उसके मालिक कुंदन की पत्नी की थी.. यानि 'मालती' की

सन 🖼️ #02

ऐसी समय मनोहर क यहाँ.. इसलिए वापस चलते है.. जहा हलकी ठण्ड मैं धीरे धीरे सूरज सर पे आ चुके था.. यानि ठण्ड मैं सूरज की ये गर्मी कितनी लुभावनी लगती है ये बताने की जरुरत तोह है नहीं

महेंद्र जो अभी तक मोनू क पास hi बैठा हुआ था.. वो कमरे से निकलते हुए बहार आता है जहा शीला भी उसी समय रसोई से निकल रही थी और उसके हाथ मैं एक कटोरी मैं सरसो का टेल था

महेंद्र- ये किया करने जा रही है

शीला- (जिसने अपने बड़े भाई को भी देख लिया था) अरे भैया वो सर मैं खुश्की जैसी हो रही है.. सोच रही हु सरसो क टेल की मालिश कर लू

महेंद्र- (मानो किसी पुराणी याद मैं खो सा गया हो) हम्म.. किया दिन होते था न जब माँ हम चारो क सरो पे टेल से मालिश किया करती थी

शीला भी मुस्कुरा पड़ती है

"और वीरू भैया को किटनी डाट पड़ती थी"

महेंद्र है पड़ता है

"अरे वो चम्पी क नाम पे बहाने भी तोह खूब बनता था"

शीला- (हस्ते हुए) बहाने क्यू नहीं बनाते.. चम्पी क बाद नहाना पड़ता था और वो तोह पानी क नाम से भागते थे

महेंद्र भी अपने बचपन क दिनों को याद करके है पड़ता है

शीला- (महेंद्र क हाथ मैं थमी लाठी देख क सवाल करती है) भैया आप कही जा रहे है किया.. ?, ये लाठी.. ?

महेंद्र- है जरा छोटे बाजार तक कुछ काम था.. वैसे तुझे कैसे पता चला की मैं कही जा रहा हु ?

शीला- (हस्ते हुए) किया भैया.. आप भी तोह बिलकुल बाबू जी जैसे है, वो भी बिना लाठी क बहार नहीं निकलते थे और आप भी वैसे hi है

महेंद्र- (है पड़ता है) अब किया करू पिताजी की कुछ आदतें सायद मुझ मैं भी है.. वैसे तेरे आवला कोई दिख नहीं रहा, कहा है सब ?

शीला- बड़की भौजाई सत्तू और सत्यम क लिए नास्ता लेके खेत गयी है, और हर्षिता भौजाई अपने खेत गयी है वीरू भैया का नास्ता लेके

महेंद्र- मालती और कुंदन ?

शीला- कुंदन भाई चक्की गए थे.. कह रहे थे थोड़ी दिएर मैं आ जाऊंगा, और मालती भाभी अपने घर गयी है कुछ कपडे लेने

महेंद्र- (कुछ सोचते हुए) हम्म.. फिर रहने देता हु, पहले कोई आ जाये फिर चला जाऊंगा

शीला- किया भैया.. अब मैं बची थोड़ी हु, आप जाओ मैं हु न यहाँ

महेंद्र- (मोनू क कमरे की तरफ देखते हुए) वो बात नहीं है पर..

शीला- आप इतनी फ़िक्र न करो भैया, वैसे भी सब आते hi होंगे.. आप जाओ

महेंद्र एक पल क लिए एक लम्बी सी सांस लेते हुए सोचता है और फिर मुस्कुरा क कहता है

"चल ठीक है.. तेरे लिए बाजार से कुछ ले औ"

शीला- आपको तोह पता hi है मुझे किया पसंद है

महेंद्र- है.. है तू और तेरी जलेबी, मैं आते हुए लेके आऊंगा

महेंद्र ये कहते हुए मुस्कुरा पड़ता है और अपने एक हाथ मैं अपनी लाठी थामे घर से बहार निकल जाता है.. यानि अब घर मैं सिर्फ 2 लोग hi बचे थे, 1 बेहोश मोनू और दूसरी शीला

शीला वही आँगन मैं एक छोटे से स्टूल पे बैठ जाती है और सरसो क टेल की कटोरी अपने पास रख क अपने एक पेअर को आगे करती है और बिना किसी झिझक क अपनी साड़ी को ऊपर तक किसका लेती है

असल मैं वो बालों क साथ साथ अपने हाथ पैरों मैं भी टेल की मालिश करने वाली थी पर ये बात अपने बड़े भाई से तोह कह नहीं सकती थी

शीला की साड़ी इस समय उसकी गोरी जांघ से पूरी तरह ऊपर उठ चुकी थी.. इतनी की उसकी कासी हुई पेंटी की हलकी लकीर तक दिखने लगी थी पर इस समय एक हिसाब से वो घर पे अकेली hi थी ऐसी वजह से उसे कोई दर नहीं था


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शीला अपनी उँगलियों को गुनगुने सरसो क टेल मैं डुबोती है और फिर दोनों हाथों की गदेलियों पे मलने क बाद उसे अपनी लगभग निवस्त्र हो चुकी जांघ पे मालिश सी करने लगती है, वो अपने पेअर मैं पहनी हुई पायल की जगह से सुरु करती है और अपनी गुदाज जाघों से होते हुए अपने पैरों क जोड़ तक आके उसका हाथ रुक रहा था

कैसे और उन्नत जिस्म की मलिका शीला क जिस्म पे उसकी उँगलियों का फिसलना उसे बहुत hi आनंद दे रहा था.. वो बार बार अपने पेअर क पायल वाले हिस्से से सुरु करती और जैसे जैसे ऊपर की तरफ उसका हाथ बढ़ता उसके हाथों की पकड़ मजबूर होने लगती पर जैसे hi वो पैरों क जुड़ाव तक पहुँचती वो अपने घंटों की मजबूती को काम कर लेती

शीला क हिसाब से वो अभी अकेली थी इसलिए वो बिना किसी शर्म क अपनी खूबसूरत जाघों और पैरों की गुनगुने रासो क टेल से मालिश करने मैं व्यस्त थी.. पर इस बार उसका हाथ जब उसकी जांघ क अंतिम हिस्से तक आता तोह टेल की फिसलन की वजह से उसका हाथ कुछ ज्यादा hi आगे तक फिसल जाता और उसकी उंगलिया उसकी पेंटी क ऊपर से उसकी कोमल योनि को छुपाये हुए कपडे पे लग जाती

ये एहसास कुछ खास था ककी ऐसा होते hi उसकी आँखें बंद होती चली जाती है पर वापस से तुरंत की हक़ीक़त की दुनिया मैं लौट आती है.. पर उसके चेहरे पे आयी लाली तोह कुछ और hi बया कर रही थी

शीला फिर से अपने पेअर की मालिश करने लगती है पर इस बार जब उसका हाथ उसकी पेंटी क करीब आता है तोह उसके होंठों पे हलकी सी मुस्कान आ जाती है और वो अपने हाथों को रोकती नहीं जिस कारणवस उसका हाथ सीधा उसकी योनि की कोमल फाकों से जा लगता है

"ेस्स्स्सह्ह्हह्हह्ह्ह्ह..."

शीला क जिस्म मैं एक कामुक थिरकन सी दौड़ जाती है, वो अपना दूसरा पेअर आगे करती और उसकी साड़ी भी ऊपर तक उठा देती.. जिससे अब उस छोटे से स्टॉले पे बैठी हुई शीला की पेंटी पूरी तरह नज़र आने लगी थी.. पर अगर कोई उसकी पेंटी को देखता तोह उसे धीरे धीरे पेंटी पे हल्का गीला धब्बा दीखता जो लगातार बाद रहा था

शीला इस बार दोनों हाथों की उँगलियों को गुनगुने सरसो क टेल मैं डुबोती और एक एक हाथ दोनों परिजन पे रख क नीचे से लीके ऊपर की तरफ मालिश करती हुई बढ़ने लगती

पर इस बार उसकी साँसे भी बाद रही थी.. यु समझो जैसे जैसे उसका हाथ ऊपर की तरफ बाद रहा था वैसे वैसे उसकी साँसे भी उखड रही थी

पर ये कामुकता का हल्का सा झोका अभी तूफान बनने मैं कुछ दुरी पे था.. पर कब तक ये कहा नहीं जा सकता है

शीला अपने दोनों हाथों से अपनी गोरी जाँघों पे दबाव बनाते हुए ऊपर की तरफ बढ़ती है और उसके दोनों हाथ इस बार एक साथ उसके पैरों क बीच की योनि पे आके रुकते है.. पर उँगलियों की थिरकन अब भी बंद नहीं हुई

कभी एक हाथ की उंगलिया पेंटी क ऊपर से योनि की फाकों क ऊपर सेहलाव करती तोह कभी दूसरी हाथ की उंगलिया पेंटी मैं छूट की नज़र आती दरार पे चलने लगती.. वो अपने दोनों हाथों की उंगलिया को एक साथ काम पे लगाए हुए थी

"आआआहहहहह... essssshhhhhhhhhhhhhhhh.."


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शीला की साँसे उखाड़ने लगी थी सायद इसलिए वो अपने लाल होंठों को खुद hi काट ले रही थी

उसका कैसा यौवन धीरे धीरे ऊपर नीचे होने लगा था, उसकी कासी हुई चूचियों मैं उतर चढ़ाव साफ़ साफ़ देखा जा सकता था.. ऐसा लग रहा था मालती क अंदर की गर्मी आज शीला मैं आ गयी हो

"आआआह्ह्ह्ह.. 3 महीने से इन्होने हाथ नहीं लगाया है.. उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. आज कुछ ज्यादा hi मन कर रहा था.. हैईईई.. सायद आज मेरा ये हाल मालती भाभी क साथ हुए उस कामुक हसी मज़ाक की वजह से है

उफ्फ्फ ये सविता भाभी भी न.. ेस्शह्ह्ह"

शीला क दोनों हाथों की थिरकन एक साथ उसकी गीली होती पेंटी क ऊपर कुछ ज्यादा hi चलना सुरु हो चुकी थी.. सायद ऐसी वजह से उसकी आँखें भी बंद होने लगती थी..

पर शीला बार बार अपना काबू वापस प् ले रही थी वो कोशिश करती खुद को रोकने की और अपने हाथों को वह से हटा क अपनी जाघों की मालिश करने लगती पर उसके अंदर बस चूका चोर उससे कुछ और hi करवाना च रहा था

शीला इस बार जब गुनगुने सरसो क टेल मैं अपनी उँगलियों को डुबोती तोह वो वापस अपने हाथ को अपने पेअर या जांघ पे नहीं रखती बल्कि सीधा उसका हाथ उसकी योनि की तरफ बाद रहा था..

ये बात शीला का दिल भी अचे से जनता था इसलिए वो उस स्टॉले पे बैठे हुए हल्का सा पीछे की तरफ होती और दूसरे हाथ से अपनी पेंटी को हल्का सा खींच क नीचे सरका लेती यानि अब दूसरा हाथ सीधा उसकी योनि की तरफ बाद रहा था


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की तभी दरवाजे क पास कोई आहत होती है और शीला जल्दी से कड़ी होक अपनी साड़ी नीचे करती हुई खुद को सँभालने लगती है.. वो ऐसे जोर जोर से साँसे ले रही थी मानो चोर को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया था

शीला जल्दी से अपनी साड़ी सही करके टेल की कटोरी उठती है और ऐसी समय घर क अंदर आते मैं सना हुआ कुंदन प्रवेश करता है.. उसने ऊपर की अपनी कमीज सायद दरवाजे पे hi उतर ली थी ककी इस समय वो सिर्फ धोती मैं था ऊपर से पूरी तरफ नंगा

बालों और चेहरे पे आता लगा हुआ था यहाँ तक उसकी मजबूत और चौड़ी बलिस्त भुजाये भी आते मैं सनी हुई थी

कुंदन- (अंदर आते हुए) इस जब्बार को आज hi कही जाना था

शीला जल्दी से अपनी कटोरी वाला हाथ पीछे कर लेती है.. मानो उसे दर हो की उसका भाई उससे सवाल न करने लगे

कुंदन अंदर आते hi शीला को आँगन मैं पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा हुआ देख क

"अरे तुझे किया हो गया.. यु क्यू कड़ी है"


शीला- (हड़बड़ा सी जाती है) वो.. वो कुछ नहीं भैया बस ऐसे hi, आप.. आपको ये किया हो गया

कुंदन- अरे किया बताऊ.. आते की बोरिया उठा क सही से लगा था, एक बंद नहीं थी और मैंने देखा नहीं.. पूरा आता मेरे ऊपर hi गिर गया

शीला इस बार है पड़ती.. पर न जाने क्यू उसकी नज़रें बार बार उसके भाई की चौड़ी छाती से हैट hi नहीं रही थी

शीला मुस्कुराते हुए अपनी नज़रों को नीचे की तरफ करती है तोह उसे ऐसा लगता है जैसे अभी अभी उसके बड़े भाई की धोती मैं कोई सांप हिला हो

शीला अपना थूक गटकने पे मजबूर हो जाती है

कुंदन- अब ऐसे किया कड़ी है, जा मेरे लिए एक टॉवल ले आ मैं नाहा लेता हु

और कुंदन ये कहकर घर क पीछे बने उसी नाम मात्र क शौचालय की तरफ चल देता है.. पर जब तक वो शीला की आँखों से ओझल नहीं हो जाता शीला अपनी नज़रों को हटा नहीं पाती

पर कुंदन क जाते hi शीला को अपने अंदर पनपी हवस की हलकी सी उस झलक का एहसास हो जाता है.. और वो गिलानी से भर उठती है

'चीई.. चीई.. ये मैं किया देख रही थी.. चीई.. शीला ये किया पाप कर रही थी वो तेरा बड़ा भाई है.. और तू.. चीई'

शीला जल्दी जल्दी अपने खूबसूरत गालों पे थपथपाते हुए अपनी गलती की माफ़ी मांगने लगती है

"उफ्फ्फ.. पागल हो गयी थी किया मैं जो अपने बड़े भाई को ऐसे देख रही थी.. उफ्फ्फ्फ़, ाचा हुआ समय रहते मुझे अकाल आ गयी"

पर बात यही पे ख़तम नहीं होती.. उसका अंतर्मन सावल कर लेता है

'तू किस बात की माफ़ी मांग रही है.. तूने किया hi किया है ?, अब तेरा भाई hi तेरे सामने ऐसे आ गया तोह उसमें तेरी किया गलती'

शीला क मुंह से सब्द फुट पड़ते है

"है बात तोह सही है मैंने कुछ गलत थोड़ी किया है"

पर उसका अंतर्मन फिर से कुछ ऐसा कहता है की उसकी साँसे भाग पड़ती है

'वही तोह तूने कुछ गलत नहीं किया है.. है वो अलग बात है की इस समय सायद तेरा भाई पूरा.....'

शीला का पूरा जिस्म एक सार्ड लहर सा काँप जाता है.. कहने को ठण्ड सुरु हो गयी थी पर उसे गर्मी का एहसास हो रहा था

सन 🖼️ #03

मालती ने जैसे hi अपने घर का टाला खोला की तभी उसे घर क अंदर किसी चीज़ क गिरने की आवाज़ सुनाई पड़ती है

मालती दर जाती है पर इस समय वो अकेली थी और इधर उधर देखती है पर अभी उसे कोई भी नज़र नहीं आता

मालती हिम्मत करती है और धीरे से दरवाजा खोल क अंदर प्रवेश करती है.. पर उसने घर मैं प्रवेश करते hi सबसे पहले एक किनारे राखी हसिया उठा ली थी


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मालती को समझ आ जाता है की वो जो कोई भी है इस समय स्टोर रूम मैं है.. इसलिए वो हिम्मत करके आगे बढ़ती है और चिल्ला क कहती है

"कोण है मेरे घर मैं.. मैंने पूछा कोण है अंदर"

कंटिन्यू...
 


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अपडेट #10

सन 🖼️ #03

बचाओ.. बचाओ... कोई है..

जब्बार जो पूरी तरह से लड़खड़ा रहा था ककी उसकी पीट से खून निकल रहा था.. वो इस समय किसी क खेतों क बीचे दर्द से तरप रहा था

"मादरचोद.. ये मालती भी कुंदन जैसी hi है, यकीं नहीं होता एक औरत.. चीई चुल्लू भर पानी मैं दुब क मर जाना चाहिए मुझे"

जब्बार अपनी जेब से दारू की एक छोटी सी सीसी निकलता है और उसे जमीन पे रख क अपनी कमीज जो उतर क एक किनारे फैक देता है.. जब्बार की नज़र उसकी कमीज पे जाती है जो पूरी तरह खून से लैपटॉप हो चुकी थी

जब्बार खुद को धिक्कारते हुए दारू की सीसी उठता है और उसे खोल क अपने हाथ से अपनी पीठ क उस जख्म पे डालने लगता है

जब्बार दर्द से तरप उठता है पर किया मजाल की उसके मुंह से एक चीख भी निकली हो.. पर उसका पूरा चेहरा लाल हो चूका था

अपने जख्मों पे दारू डालने क बाद बची हुई दारू पीते हुए.. जब्बार खुद से कहता है

"आज से 20 साल पहले उसी संदूक क कारन मैंने 'कुंदन' को पहली बार देखता था..

और आज ऐसा लग रहा है जैसे उस रैंड मालती से भी पहली बार मिला हु

यकीं नहीं होता वो रैंड मेरा ये हाल कर सकती है.. एक बार फिर से आज वो संदूक मेरे हाथ आते आते रह गयी"

जब्बार बची हुई दारू का आखिरी घुट गले से नीचे उतारते हुए.. सीसी को एक तरफ फेक देता है और ऊपर आसमान मैं चमकते हुए चाँद को देखते हुए मानो 20 साल पहले क समय मैं जाने लगता है

हम भी जब्बार क साथ साथ चलते है..

✍️ वैसे मालती और जब्बार क बीच किया हुआ था, ये इसके बाद जानने को मिलेगा

आज क 20 साल पहले...

मुंबई जैसे बड़े सेहर क बारे मैं कहा जाता है की ये सेहर कभी सोता नहीं.. पर अँधेरा यहाँ भी होता है, और जहा कला अँधेरा हो वह गुनाह न हो ऐसा संभव नहीं हो सकता.. वैसे भी ये तोह मुंबई है

सपनो और गुनाह की दुनिया.. मुंबई, यानि तब की बम्बई

मुंबई क एक सुनसान सड़क पे जहा इस समय दूर दूर तक कोई नहीं था, ऐसे मैं एक 55 साल का आदमी जिसके सर से खून रिस रहा था वो पागलों की तरह भागा जा रहा था.. पर वो रह रह क पीछे भी देख रहा था

उसके चेहरे पे नज़र आता दर देख क ऐसा लग रहा था मानो उसके पीछे मौत पड़ी हो.. और सायद ऐसा hi था ककी उसके पीछे 2 नहीं अपितु 4 कदमो की आवाज़ भी थी जो धीरे धीरे उसके नज़दीक आ रही थी

"बचाओ.. बचाओ... कोई है न..."

अपनी जान और उस चीज़ को जिसे उसने अपने सीने से लगा रहा था बचने क लिए वो इस उम्र मैं भी किसी जवान लड़के की तरह पूरी हिम्मत करके भागा रहा था

उसने सीने से लगी वो चीज़ किसी संदूक जैसी दिख रही थी.. एक छोटे संदूक जैसी, और जिस प्रकार से उसने उसे अपने सीने से चिपका रहा था ऐसा लग रहा था मानो उसे अपनी जान से ज्यादा उस चीज़ की परवाह हो

वो आदमी भागते भागते हाफने लगा था.. उसकी साँसे उखाड़ने लगी थी, सायद इसीलिए उसकी रफ़्तार कुछ काम पद रही थी.. की तभी

"भाग साले और कहा तक भागेगा.. चुपचाप वो संदूक हमे दे दे"

बुद्धा जो पूरी तरह थक चूका था.. अपने पीछे से आयी इस आवाज़ की वजह से पीछे देखने पे मजदुर हो जाता है

जहा उसे अपने पीछे 2 आदमी आते हुए नज़र आते है, दोनों hi जवान पर काले भुजंग नाग जैसे प्रतीत हो रहे थे

बुद्धा पीछे देखते हुए भागना बंद नहीं करता.. जिस कारणवस उसका पेअर लड़खड़ा जाता है और वो भागते हुए गिर पड़ता है, पर सच मैं उसे इस समय अपनी तनिक भी परवाह नहीं थी ककी गिरने की वजह से उसके चेहरे और हाथ पैरों मैं चोट आ गयी थी उसके मुख से दर्द की आह भी निकल पड़ी थी

"आआह्ह्ह्हह्ह.. मायआ..."

पर वो अपना संतुलन वापस बना लेता है और तुरंत उठ खड़ा होता है पर सायद उसके घुटनो मैं भी चोट आयी थी ककी अब उससे भागा नहीं जा रहा था, जिसका पूरा फायदा उसके पीछे आते आदमियों को मिल रहा था

उसके पीछे आते दोनों आदमियों मैं से एक हस्ते हुए

"लो हीरा भैया.. अब ये बुद्धा और न भाग पायेगा मरेगा साला आज"

दूसरा

"सही कहा छोटे.. साले ने बहुत भगाया है"

जी है ये दोनों और कोई नहीं बल्कि हीरा पन्ना है.. वही जिसे भानु ने अपने गाओं बुलाने का पूरा इंतिज़ाम कर लिया है और ये वही है जिन्होंने मालती क बड़े भाई क पत्नी की छूट का चौबारा बना दिया था

55 साल का वो बुद्धा उस संदूक को अपने सीने से लगाए हुए अब सड़क पे भागते हुए ऐसी जगह आ चूका था जहा रोड किनारे मजदुर जैसे कुछ लोग सो रहे था

बुद्धा उन्हें देखते hi.. पूरी ताक़त लगा क चिल्लाते हुए कहता है

"बचाओ मुझे.. बचा लो, वर्ण ये मुझे मार देंगे.. बचा लो"

बुद्धा भागते हुए रोड किनारे सोते उन 5-6 आदमियों को जगाना सुरु कर देता है.. वो उन्हें झिंझोरना सुरु कर देता है

"बचाओ.. बचाओ मुझे"

जिस कारणवस उन सभी की नींद खुल जाती है.. उनमें से एक

"अरे किया हुआ सेठ जी.. किया हुआ"

बुद्धा- (अपनी साँसों को सँभालते हुए) मुझे.. मुझे बचा लो उन दोनों से

बुद्धा ये कहते हुए अपने पीछे आते उन दोनों की तरफ इशारा करता है, वो बुरी तरफ हाफ रहा था.. उसका पूरा जिस्म काँप रहा था

वो सभी आदमी जो गाओं क लग रहे थे.. वो बुद्धा को देख क उठ क खड़े हो जाते है और उनमें से एक चिल्ला क

"क्यू सालों सेठ को कहे परेशां कर रहा हो बे ?"

हीरा पन्ना अब तक बुड्ढे क पास आ चुके थे और वो दोनों अपने सामने गाओं क 5-6 आदमियों को देख क तनिक भी नहीं डरते बस दोनों भाई अपने पेंट मैं पीछे छुपाये हुए धार दार चाकू निकल लेते है जो कुछ ज्यादा hi बड़े है

पन्ना- (चाकू की धार पे ऊँगली फिरते हुए) किसे बनना है हीरो.. हम्म.. बताओ.. बताओ ?

हीरा भी अपने चाकू को अपने जीभ पे फिरते हुए है पड़ता है

गाओं क वो सभी सीधे साढ़े मजदुर जैसे लोग दोनों भाइयों को देख क समझ जाते है की वो कोई भले लोग नहीं है.. इसलिए उनमें से जिसकी उम्र सबसे ज्यादा थी

"कुक.. कुछ नहीं भैया.. wo..wo तोह हम यहाँ से कही और जा रहे है.. यहाँ नींद नहीं आ रही न.. चल.. चल जब्बार इधर से.. जल्दी चल"

जब्बार नाम अब नया तोह है नहीं हम सभी क लिए.. हीरा पन्ना की तरह hi जब्बार भी अपनी जवानी क दिनों मैं था


जब्बार- (अपने गाओं क सयाने की तरफ देखते हुए) पर दादा वो.. हम सेठ जी को ऐसे..

गाओं की उस टुकड़ी मैं सबसे बड़ी उम्र का वो आदमी

"मुंह बंद कर अपना.. ये बंबई है अपना गाओं नहीं, यहाँ हमने ज्यादा बोलै तोह मार क किसी नाले मैं फेक दिए जायेंगे और किसी को पता तक नहीं चलेगा"

जब्बार सायद वह रुकना च रहा था पर जब देखता है उसकी ठोली का एक भी आदमी वह उस सेठ की मदद करने को तैयार नहीं तोह वो भी समझ जाता है की उसे भी अपनी जान बचानी चाहिए.. वैसे इतने समय मैं उसकी नज़र कई बार उस बुड्ढे सेठ क सीने से लगे उस संदूक पे जरूर गयी थी

सेठ- ये.. ये किया कह रहे हो.. अरे वो सिर्फ 2 hi लोग है और तुम सब इतने.. मुझे बचा लो ऐसा न करो.. बचा लो मुझे

सेठ उन सभी गाओं वालों क आगे भीख सी मांगने लगता है पर इस समय उन्हें सिर्फ अपनी जान की परवाह थी.. इसलिए कोई भी वह रुकता नहीं है

हीरा- (सैतान की तरह जोर जोर से हस्ते हुए) आज तेरी कोई मदद नहीं करेगा.. जैसे तेरे बेटे और बहु को मारा है वैसे hi अब तेरी बारी है, सिर्फ इस एक संदूक क लिए अपने पुरे परिवार को मरवा दिया.. कैसे इन्शान है रे तू.. कितना लालची है

बुद्धा सेठ- मुझे पता है तुम्हे किसने भेजा है.. पर जब तक मैं ज़िंदा हु इस अमानत को कभी भी किसी गलत मैं हाथ नहीं लगने दूंगा

पन्ना- (पहले उस संदूक और फिर अपने बड़े भाई की तरफ देखते हुए) भैया.. वैसे इस छोटी सी संदूक मैं है किया ?

हीरा- पता नहीं.. पर जिसे ये चाइये वो हमे इतने पैसे दे रहा है की हम पूरी ज़िन्दगी मिलकर भी वो पैसे ख़तम नहीं कर पाएंगे, इसलिए हमारा काम सिर्फ एक संदूक को उस आदमी तक पहुंचना है

बुद्धा- (धीरे धीरे पीछे खिसकते हुए) मैं जनता हु ये किसे चाहिए.. पर मेरे रहते ये कभी भी उसके हाथ नहीं लगेगा ककी अगर ये उसके हाथ लग गया तोह वो ऐसी ताक़त पे काबू प् लेगा जिसके बारे मैं तुम दोनों को अंदाजा भी नहीं

पन्ना- बक बक बक.. बंद कर अपना मुंह और चुप चाप वो संदूक हमे दे क्यू बुढ़ापे मैं मरना चाहता है

बुद्धा जो धीरे धीरे पीछे हैट रहा था वो फिर से भागना सुरु कर देता है पर इस बार उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था इसलिए वो वही पास मैं एक पुराणी बिल्डिंग जो अभी अभी बननी hi सुरु हुई थी उसकी तरफ भाग पड़ा था

हीरा पन्ना दोनों भी एक साथ हस्ते हुए

"अब तोह ये खुद hi फास गया.. कोई नहीं, जैसे इसका बीटा और बहु मरे है वैसे hi ये साला भी मरेगा"

पन्ना- वैसे इसका पोता बच गया..

हीरा- (हस्ते हुए) वो दूध पीटा बचा हमारा किया बिगड़ लेगा?

वो बुद्धा सेठ जिसने सायद आज hi अपने बेटे बहु को खोया है वो उस बिलिंग क ऊपर चढ़ने लगता है जो एक क बाद एक फ्लोर पे चढ़ता चला हटा है

और जल्दी hi वो सीढ़ियों से ऊपर छत्त पे आ चूका था और अब उसके पास जाने क लिए कोई जगह नहीं थी

बुद्धा ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए

"ये तेरा कैसा न्याय है.. इस संदूक और इसके अंदर क उस खंजर को बचने क लिए आज मेरा पूरा परिवार ख़तम हो गया, पर तूने कुछ नहीं किया

तेरी इस दुनिया मैं पाप को बढ़ने से बचने क लिए आज मेरे पुरे परिवार ने अपनी जान दे दी.. पर इतना सब होने क बाद भी सायद आज मैं इस खंजर की रक्षा नहीं कर पाउँगा"

"पागल हो गया है किया रे बुड्ढे"

ये बात पन्ना ने कही थी.. हीरा पन्ना भी हस्ते हुए ऊपर आ चुके था और बुड्ढे को आसमान की तरफ चिल्लाते हुए देख क है रहे थे

हीरा- अगर हमारे कहने पे तूने वो संदूक पहले hi हमे दे दी होती तोह आज तेरा परिवार मरता नहीं

बुद्धा- (मानो रो सा पड़ा था.. पर पूरा दम लगा क चिल्लाते हुए) पता भी है इस संदूक क अंदर जो खंजर है वो ऐसे यक्षों को काबू कर सकता है जो पाप और सर्वनाश ला सकते है

हीरा और पन्ना जोरो से है पड़ते है और हीरा अपने डाट पेस्स्ट हुए कहता है

"ये बुद्धा सठिया गया है.. आज क समय मैं ये सब बकवास करके हमे चुटिया बनाना चाहता है

पन्ना ख़तम कर साले को बहुत टाइम खोटी कर दिया बुड्ढे ने.. ये संदूक उस आदमी को आज सुबह की पहली किरण निकलने क पहले चाहिए"

बुद्धा- है ककी 20-25 वर्षो मैं सिर्फ एक बार ऐसा योग बनता है जब इस खंजर से उन सैतानी यक्षों को काबू किया जा सकता है.. मैं हाथ जोड़ता है ऐसा पाप न करो

पन्ना- (आगे बढ़ते हुए अपने चाकू को बुड्ढे की तरफ कर देता है) बहुत हुई तेरी बकवास.. aaaaahhhhhhhhhh..... बहनचोद... माररररर गया रईईए........

पन्ना जैसे hi अपना चाकू उस बुड्ढे सेठ क पेट मैं घुसाने hi वाला था की तभी कही से एक लोहे की सरिया हवा मैं रेहराती हुई आयी और पन्ना क हाथ मैं घुसती चली गयी.. जिससे उसके हाथ मैं थमा चाकू छूट गया

हीरा पन्ना क साथ साथ वो बुद्धा भी उसी तरफ देखता है जहा उसी छत्त पे एक तरफ से एक जवान आदमी जिसने इस समय सिर्फ एक धोती पेहेन राखी थी और ऊपर से पूरा निवस्त्र था उनकी तरफ चला आ रहा था

उसके चेहरे पे ग़ुस्सा था और आँखें पूरी लाल.. उसका ग़ुस्सा देख क एक पल क लिए तोह हीरा भी काँप उठा था पर वो अपने आप को तुरंत संभल लेता है

"साले मरना है किया.. मेरे भाई को चोट पंहुचा क तूने अपनी मौत पक्की कर ली है"

वो जवान मर्द हीरा पन्ना और उस बुड्ढे क बीच आके खड़ा हो जाता है और अपनी मूंछो पे ताव देते हुए मुस्कुरा पड़ता है.. ऐसा लग रहा था मानो दर किया होता है इसकी परिभाषा उसे पता hi न हो

एक लम्बी सी अंगड़ाई लेते हुए वो है पड़ता है और कहता है

"मर गए कुंदन को मरने वाले"

कंटिन्यू...
 


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अपडेट #10

सन 🖼️ #04

दोनों खूंखार है.. (कुंदन - मालती)


कुंदन और जब्बार क बीते हुए कल क बारे मैं जानने से पहले थोड़ा वर्तमान पे लौट चलते है

मालती ने जैसे hi अपने घर का टाला खोला की तभी उसे घर क अंदर किसी चीज़ क गिरने की आवाज़ सुनाई पड़ती है

मालती दर जाती है पर इस समय वो अकेली थी और इधर उधर देखती है पर अभी उसे कोई भी नज़र नहीं आता

मालती हिम्मत करती है और धीरे से दरवाजा खोल क अंदर प्रवेश करती है.. पर उसने घर मैं प्रवेश करते hi सबसे पहले एक किनारे राखी हसिया उठा ली थी


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मालती को समझ आ जाता है की वो जो कोई भी है इस समय स्टोर रूम मैं है.. इसलिए वो हिम्मत करके आगे बढ़ती है और चिल्ला क कहती है

"कोण है मेरे घर मैं.. मैंने पूछा कोण है अंदर"

जब्बार बोरियों क ऊपर से फिसलते हुए नीचे आ चूका था उसकी कमर मैं खासा चोट भी आयी थी पर इस समय उसे परवा थी तोह सिर्फ उस संदूक की जिसके लिए उसने अपनी ज़िन्दगी क इतने सालों को व्यर्थ कर दिया था

पर इससे पहले की वो अपने पैरों पे खड़ा हो पाटा उसके कानो मैं मालती की आवाज़ पद चुकी थी

जब्बार जल्दी से अपना दर्द भूलते हुए खड़ा होता है पर अब उसका दिमाग बहुत तेज़ी से चल रहा था.. ककी उसे मालती क उसकी तरफ बढ़ते हुए कदम पता चल रहे थे और उसकी आँखों क आगे इस समय वही संदूक था

जब्बार सोचने मैं ज्यादा समय व्यर्थ नहीं करता और लपक क उस संदूक को उठा लेता है.. पर तब तक मालती स्टोर रूम क दरवाजे तक आ चुकी थी

वो देखती है की अंदर कोई आदमी झुका हुआ है और किसी संदूक जैसी चीज़ को उठाने की कोशिश कर रहा है.. वैसे उसे याद नहीं आता की ये संदूक उसने आज से पहले अपने घर मैं कभी देखा भी हो, पर इस समय उसका धियान सिर्फ उस आदमी पे था

मालती क हाथ की पकड़ उस हसिया पे और ज्यादा मजबूत होती चली जाती है

"कोण... कोण हो तुम.. मैंने... आआआहहह"

अपने कानो मैं मालती की आवाज़ पड़ते hi जब्बार अपना अगला कदम उठा चूका था, वो बिना पीछे मुड़े अपनी कमर से एक धारदार चाकू निकलता है और सीधा मालती की तरफ उछाल देता है

पर मालती पहले से hi सावधान थी और अगर वो समय रहते अपना चेहरा पीछे न करती तोह सायद वो चाकू आज उसके खूबसूरत चेहरे का नक्शा बदल चूका होता

मालती- (बुरी तरह दर चुकी थी) आआह्ह्ह... कोण हो... आअह्ह्ह.. किया.. किया चाहिए ?

जब्बार और अधिक समय व्यर्थ न करते हुए उस संदूक को उठता है और दरवाजे की तरफ दौड़ लगा देता है.. इधर जैसे hi दरी हुई मालती जब्बार का चेहरा देखती है उसे समझ नहीं आता की ये सब किया है

किया जिस इन्शान को वो इतने सालों से जानती है.. जो उसके पति क यहाँ काम कर रहा है, उसने अभी अभी एक चाकू से उसपे हमला किया था

मालती- (हैरानी से) आप.. जब्बार भैया.. आऍप.... आह्ह्ह्हह

पर जब्बार कोई जवाब देने क मूड मैं तोह बिलकुल नहीं था ककी उसे इतने सालों से जो चीज़ चाहिए थी.. वो इस समय उसके हाथ लग चुकी थी

वो मालती को जोर से दक्का देता है और दरवाजे से उसे दूर हटते हुए रसोईघर की तरफ दौड़ पड़ता है.. इधर अपने ऊपर हुए हमले की वजह से मालती का सर जोर से दरवाजे की चौखट से टकराता है

एक पल क लिए तोह उसे ऐसा लगता है की उसका सर घूम गया हो और उसकी आँखों क आगे अँधेरा चने लगा हो.. पर वो खुद को तुरंत hi संभल लेती है

और रसोईघर की तरफ भाग पड़ती है, इधर जब्बार रसोईघर मैं आते hi ऊपर सेल्फ पर चढ़ जाता है सायद वो रसोई की खिड़की से बहार खुदने वाला था की तभी मालती अपनी पूरी हिम्मत जूता क कुछ ऐसा करती hi जिसकी उम्मीद किसी ने सायद hi कभी उससे की होगी

मालती पूरी ताक़त से वो हसिया जब्बार की तरफ फेकती है.. जो सीधा जबाबर की पीट मैं घुसती चली जाती है

और जब्बार अभी अभी बस खिड़की से कूदने hi वाला था वो वापस रसोईघर मैं अंदर की तरफ की गिर पड़ता है.. पर आज उसकी किस्मत कुछ ज्यादा hi ख़राब थी ककी वो पीट क बल hi गिरा था जिससे उसकी पीट मैं धसी वो हसिया और ज्यादा अंदर तक घुसती चली जाती

एक पल क लिए तोह जब्बार को ऐसा लगा की उसका अंतिम समय आ चूका था, पर वो फिर से उठ खड़ा होता है और अपना हाथ पीछे ले जेक उस हसिया को बहार खींच लेता है

जब्बार- (दर्द से तरप उठा था) आआआह्ह्ह्हह्ह.... मादरचोद रैंड.... आआअह्ह्ह


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जब्बार हसिया को जैसे hi बहार निकल क मालती की तरफ पलटता है उसका जिस्म फिर से झुरझुरी खा जाता है

ककी मालती क सर से खून बह रहा था जिससे उसका पूरा खूबसूरत चेहरा धीरे धीरे लाल होने लगा था, पर जब्बार की हैरानी की वजह ये नहीं था

वो तोह इस लिए हैरान था ककी मालती ने रसोईघर मैं आते hi एक साथ 2-2 चाकू दोनों हाथों मैं थाम लिए थे

मालती- (ग़ुस्से से एक एक सब्द को चबाती हुई) जब्बार भैया किया है ये सब.. किया मेरे मोनू को आपने..

न जाने क्यू मालती को अभी जो कुछ भी हो रहा था वो सब उसके बेटे क साथ जुड़ा हुआ लगने लगा था.. आखिर वो एक माँ है, इसलिए उसका सवाल स्वाभाविक भी था

जब्बार- (दर्द से तड़पते हुए) साली तेरा सपोला तोह बच गया था उस दिन.. पर आज तू मारेगी, और फिर वो भी नहीं बचेगा.. ककी वो अपना बदला लेके रहेगा.. तेरे पापों की सजा तेरे बेटे और पुरे परिवार को मिलेगी

जब्बार ने सायद बस यही एक बड़ी गलती कर दी थी, उसने एक माँ क सामने उसके बेटे क लिए ऐसा बोल जो दिया था

ककी अगले hi पल मालती का हाथ घूमता है और उसके एक हाथ मैं थमा चाकू सीधा जब्बार क दिल की तरफ बढ़ता चला जाता है वो तोह जब्बार की नज़रें भी मालती पे hi थी इसलिए वो तुरंत घूम क एक तरफ हो जाता है, पर बचता तब भी नहीं

ककी वो जैसे hi घूमता है.. मालती अपने दूसरे हाथ मैं थामे चाकू को उसकी तरफ फेक देती है, वो इस बार ठीक उसकी पीट मैं उसी जगह घुसता चला जाता है जहा पहले वो हसिया घुसी हुई थी

अब तोह जब्बार की हालत ऐसी थी की उसकी आँखों क आगे उसका अंतिम समय नज़र आने लगा था, उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की मालती जैसी अबला उसके लिए मौत की बाला बन सकती है


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यहाँ मालती और समय व्यर्थ नहीं करती और अपनी रसोईघर मैं ऐसी कोई भी चीज़ जिसे वो आज हतियार की तरह इस्तिमाल कर सके उठा लेती है, आज उसे देख क कोई भी नहीं कह सकता था की वो गाओं की कोई भोली भली औरत है

जब्बार की आँखों क आगे अँधेरा चने लगा था, उसे यकीं होने लगा था की ऐसी हालत मैं वो और दिएर मालती का सामना नहीं कर सकता.. वैसे भी इतने शऊर शराबे क बीच लोगो क आने का दर भी था अब

इसलिए वो फिर से वही हसिया उठा क मालती की तरफ फेक देता है.. जो ठीक मालती क कान क पास से उसके कुछ बालों को कट्टा हुआ गुजर जाता है

मालती तोह दर क मारे जैसे मूर्ति मैं बदल जाती है.. पर जब्बार को मौका मिल जाता है वह से निकलने का

वो तुरंत hi खिड़की से दूसरी तरफ खुद क वह से भाग जाता है.. इधर जब मालती संभालती है तोह उसकी नज़र सबसे पहले उसी संदूक पे जाती है जो जब्बार क हाथों से गिर गया था

मालती लपक क उस संदूक को उठा लेती है फिर दूसरा काम वो वापस उस हसिया को उठाने का करती है

मालती बुरी तरह दर रही थी पर इस समय उसे जब्बार क रूप मैं उसके बेटे का अहित करने वाला नज़र आ रहा था

वो घर क आँगन मैं बैठ जाती है, और मानो वापस जब्बार क आने का इन्तिज़ार करने लगी हो

यहाँ जब्बार पीछे से पूरी तरह खून मैं लथपथ गाओं क खेतों की तरफ भाग आता है, ठण्ड की वजह से बहुत काम लोग hi खेतों पे रात मैं रुकते है इसलिए जब्बार को ज्यादा परेशानी नहीं हुई

और जल्दी hi वो एक खेत क बीचों बीच बैठ हुआ था.. उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की एक औरत उसका ये हाल कर सकती है

जब्बार- आज.. पहली बार मुझे मालती और कुंदन मैं कोई फर्क नहीं नज़र आ रहा था, ऐसा लग रहा है जैसे 20 साल पहले की वो रात वापस मेरी आँखों क सामने चलने लगी हो..

चलो वापस 20 सा पहले की उसी रात पे वापस लौट चलते है.. और देखते है किया हुआ था

सन 🖼️ #05

"मर गए कुंदन को मरने वाले"

पन्ना क हाथ मैं सरिया आर पार हो चूक थी इसलिए उसके पूरा चेहरा दर्द से लाल पद चूका था पर फिर भी वो अपने डाट पीसते हुए

"साले आज सबसे पहले तू hi मार्ग.. चूर्ण नहीं भैया इस मादरचोद को"

अपने छोटे की बात पे हीरा को जोश आ जाता है वो कुंदन को एक दिहाती समझ क उसे मरने क लिए अपना चाकू आगे करते हुए बढ़ता है और उसके पास पहुंचते hi अपना हाथ घूमता है.. उसका निशाना कुंदन की गर्दन थी, पर कुंदन को काबू करना बच्चों का खेल थोड़ी है

ककी कुंदन एक सांड है.. वो भी मारकः सांड


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कुंदन हीरा का हाथ बीच मैं रोक देता है और इससे पहले की हीरा कुछ समझ पाटा अगले hi पल उसके मुख से दर्द भरी आवाज़ अस्स पास क पुरे इलाके मैं गूंज जाती है..

ककी कुंदन ने हीरा का हाथ जैसे hi बीच हवा मैं रोका उसने तुरंत hi बिना देरी क उसके हाथ घुमा दिया था.. जिससे उसके हाथ से चाकू छूट जाता है पर कुंदन यहाँ अपनी तेज़ी का सबूत देते हुए उस गिरते हुए चाकू को बीच हवा मैं hi लपक लेता है और अगले hi पल उसके दूसरे हाथ मैं आ चूका चाकू घूमता है और सीधा हीरा क पेट को चीरता हुआ उसकी अंतड़ियों को काटता चला जाता है

अपने जिस भाई को आज तक तीस मार खान समझने वाला पन्ना जब उसका ये हाल देखता है उसके चेहरा पीला पद जाता है..

उसका हाल तोह ऐसा था जैसे उसने कोई अजूबा देख लिया हो, उसे यकीन hi नहीं हो रहा था की गाओं का एक दिहाती इतनी आसानी से उसके बड़े भाई का ये हाल कर देगा

वैसे ऐसा hi कुछ हाल सीढ़ियों से अभी अभी ऊपर आये जब्बार का भी था जिसने ऊपर आते hi कुंदन को ऐसे अवतार मैं देख लिया था

कुंदन, हीरा क पेट मैं घुसा चाकू बहार निकलता है और अपने पेअर से एक जोरदार वार सीधा हीरा क पेट मैं उभरे हुए जख्म पे करता है.. जिससे हीरा हलाल होते बकरे जैसे पीछे की तरफ लगभग हवा मैं उड़ता हुआ दूर जा गिरता है

पन्ना- (जैसे होश मैं लौटा होइ) मादरचोद मैं.. aaaaahhhhhhhhhh..

पन्ना अपने हाथ क जख्म को भूल क अपने बड़े भाई का बदला लेने क लिए जैसे hi आगे बढ़ता है कुंदन क हाथ मैं थमा वही खून से सना हुआ चाकू हवा मैं लहराता है और इस बार वो सीधा पन्ना क जांघ क फाड़ते हुआ अंदर घुस जाता है.. पन्ना की आँखों क आगे तोह जैसे अँधेरा hi च गया था

वैसे कुंदन का निशाना जरा सा भी और चूक जाता तोह इस समय ये चाकू पन्ना क लुंड को मूली की तरफ काट चूका होता

कुंदन- (ग़ुस्से से लाल आँखों क साथ दोनों भाइयों को दर्द से तड़पते हुए देख क) मादरचोद.. कहा था न..

'मर गए कुंदन को मरने वाले'

कुंदन फिर से आगे बढ़ता है तोह दर्द और खून बहने की वजह से बंद होती आँखों वाला हीरा एक ैत (ब्रिक) जो उस निर्माण धीं बिलिंग मैं यहाँ वह पड़ी थी उसे उठा क कुंदन की तरफ फेकता है जिससे बचने क लिए कुंदन एक तरफ खुद पड़ता है और दोनों भाइयों को मौका मिल जाता है

हीरा- भाग पन्ना वर्ण ये दिहाती मार डालेगा

दोनों भाई लड़खड़ाते हुए भाग पड़ते है, कुंदन वापस संभल क खड़ा हो चूका था पर वो कोशिश भी नहीं करना उन दोनों भाइयों का पीछा करने की

इधर जैसे hi जब्बार दोनों भाइयों को अपनी जान बचा क भागते हुए देखता है वो कुंदन की मर्दानगी और शारीरिक ताक़त का कायल हो चूका था

जब्बार- साला किया मर्द है.. लड़ता ऐसे है तोह छोड़ता कितना मस्त होगा

जब्बार क अंदर छुपी चुदाई देखने की लालशा एक बार फिर से उसके अधरों पे आ hi गयी थी.. पर वो जैसे hi दोनों भाइयों को आते हुए देखता है लपक क एक किनारे ऐसी जगह चुप जाता है जहा से वो दोनों भाई ठीक उसके बगल से गुजरते है पर उन दोनों की नज़र उसपे नहीं पड़ती

इधर कुंदन अब उस सेठ की तरफ देखते हुए

"जाइए सेठ जी.. अब वो दोनों आपको परेशां करने की सोचेंगे भी नहीं"

कुंदन जम्हाई लेते हुए वापस उसी बिल्डिंग की छत्त पे एक तरफ चल पड़ता है, असल मैं वो पिछले कुछ सालों से यही सेहर मैं रहकर काम कर रहा है पर अभी यहाँ उसका जानने वाला कोई नहीं है

इसलिए दिन मैं जो काम मिलता है वो कर लेता है और रात को ऐसी खली बिल्डिंग की छत्त पे सोने चला अत है, उसे फुटपाथ पे सोने की जगह यहाँ आके सोना ज्यादा पसंद था

सेठ- (कुंदन को जाते हुए देख क) रुको बीटा.. कोण हो तुम, अगर आज तुम न आते तोह पक्का ये दोनों इस खंजर को मुझसे छीन hi लेते

कुंदन को उस सेठ की बात बड़ी अजीब लगती है, उसके अंदर कुछ उत्सुकता सी भी जाग पड़ती है.. वो पलट क बुड्ढे क सीने से अब भी चिपके उस संदूक की तरफ देखते हुए कहता है

"आपको नहीं लगता सेठ जी.. एक संदूक क लिए अपनी जान की परवा न करना कुछ ज्यादा हो गया, अरे दे देते तोह ये सब होता hi नहीं"

सेठ- (मायुशि क साथ) इस संदूक को बचने क लिए आज मेरे बेटे और बहु तक की बलि चढ़ गयी.. और न जाने मेरा एकलौता पोता कहा है, और तुम कहते हो ये मैं उन सैतान को दे देता

कुंदन- (हैरानी क साथ) किया इस छोटे से संदूक क लिए.. पर ऐसा किया है इसमें जो आपको अपने बच्चों से ज्यादा प्रिये है

सेठ कुछ कहता नहीं बस वो संदूक कुंदन की तरफ बड़ा देता है.. कुंदन भी जैसे किसी सम्मोहन मैं बंद सा जाता है और आगे बढ़कर उस संदूक को हाथ मैं लेता है और बिना पूछे hi उसे खोल देता है

कुंदन हैरानी से कभी उस संदूक क अंदर देखता तोह कभी उस बुड्ढे सेठ को

सेठ- (जिसके चेहरे पे आज अपने परिवार को खोने का दुःख साफ़ दिख रहा था) निकालो उसे बहार

कुंदन एक बार फिर से सेठ को देखता है और उस संदूक मैं हाथ दाल क उसके अंदर से एक खंजर को बहार निकलता है.. उन दोनों से दूर चुप क सब कुछ देख रहे जब्बार की नज़रें जब उस संदूक से निकलते उस खंजर पे पड़ती है तोह उसकी आँखें खुली की खुली hi रह जाती है, वैसे उसे नहीं पता था पर उस संदूक क अंदर भी सोने क बहुत से सिक्के भरे हुए थे


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वैसे जब्बार जहा से ये सब देख रहा है वह तक सेठ और कुंदन की आवाज़ उसे सुनाई नहीं पद रही थी

इधर कुंदन उस खंजर को बहार निकल चूका था.. उसकी आँखें भी खुली की खुली रह गयी थी ककी उस खंजर पे हीरे मोती जेड हुए थे, यानि जितना सोना उस उस संदूक क अंदर था उससे कही ज्यादा वो खंजर अनमोल लग रहा था

कुंदन- इसकी कीमत तोह बहुत होगी?

सेठ- तुम इस खंजर की कीमत इसके हीरे मोती से लगा रहे हो.. पर इसका मोल इससे बहुत ज्यादा है

कुंदन- (हैरानी से सेठ की तरफ देखते हुए) मतलब?

सेठ- ये खंजर जिसके पास रहेगा.. वो कई यक्षों को काबू कर सकता है और उनसे अपना मनचाहा काम करवा सकता है, साथ hi ये खंजर अपने मालिक को असीम ताक़त प्रधान करता है

कुंदन जोरो से है पड़ता है

"किया सेठ जी.. गाओं में मैं रहता हु, और अन्धविश्वास की बातें आप कर रहे हो

ऐसा कही होता है किया"

सेठ- ये सब सत्य है बीटा, ये कोई मामूली खंजर नहीं

कुंदन- ाचा चलो मान लिया ऐसा है, पर फिर आपने इससे किसी यक्ष को काबू करके आज अपनी जान क्यू नहीं बचा ली ?

सेठ- (हसने की कोशिश जरूर करता है, पर आज अपने परिवार को खोने का दुःख उसकी हसी पे भरी पद रहा था) ककी ये ऐसे काम नहीं करता, 20-25 वर्षो मैं एक बार hi ऐसा सैयोग बनता है जब ये खंजर खुद अपना मालिक चुनता है और उसके राखत से बंद जाता है, जिसके लिए.. आआअह्ह्ह

सेठ अपनी बात भी पूरी नहीं कर पता, की लहि से एक गोली चलती है और ठीक उस सेठ क दिल को अपना निशाना बनती चली जाती है

कुंदन जैसे भायखला सा जाता है और इधर उधर देखते हुए

"कोण है.. कोण है.. सामने आ बहनचोद"

तभी कुंदन की नज़र बिल्डिंग क नीचे खड़े एक आदमी पे जाती है पर रात की वजह से कुंदन को उसका चेहरा समझ नहीं आता, पर उसके हाथ मैं थमी बन्दुक जरूर कुंदन ने देख ली थी

"रुक मादरचोद.. बुड्ढे पे गोली चलता, एक बाप का है तोह वही रुक"

कुंदन गाला पहाड़ क नीचे खड़े उस आदमी को ललकारते हुए कहता है पर वो आदमी पूरी शांति क साथ वह से चल पड़ता है की तभी उसके पास एक कार आके रूकती है और वो उसमें बैठ जाता है

कुंदन नीचे की तरफ भागने hi वाला था की सेठ अपने टूटी हुई साँसों क साथ कुंदन को रोकते हुए कहता है

"नहीं बीटा.. अब.. अब उसका कोई फायदा नहीं, मेरा अंतिम समय आ चूका है"

कुंदन लपक क उसके करीब आता है और उसे सर अपनी गौड़ मैं रख क कहता है

"डरो मत सेठ मैं तुम्हे अभी हॉस्पिटल ले चलता है.. तुम ठीक हो जाओगे"

सेठ- (मुस्कुरा पड़ता है) नहीं बीटा.. मेरा समय यही तक था, अब मैं अपने परिवार से मिलूंगा.. ाःह.. पर अबसे.. इस.. इस खंजर की रक्षा करना तुम्हारी जिम्मेदारी है

कुंदन- पर मैं.. मैं.. किया.. सेठ.. सेठ.. सेठ जी..

पर अब वो सेठ कुछ भी नहीं बोल सकता था, ककी उसकी साँसे पूरी हो चुकी थी पर जाते जाते उसने कुंदन को एक बड़ी जिम्मेदारी जरूर सौप दी थी

इधर छुपा हुआ जब्बार सेठ और कुंदन की किसी बात को भले hi सुन न पाया हो, पर आँखों क आगे बार बार वही हीरे मोती से ज्यादा हुआ खंजर घूम रहा था.. जिस खंजर का असली कार्य तक जब्बार को नहीं पता था

तभी पुलिस सिरुन की आवाज़ सुनाई पड़ने लगती है.. जब्बार तुरंत वह से निकल पड़ता है, वैसे उसने सोचा था की वो इस कुंदन का पीछा करेगा ताकि वो खंजर को पाने का रास्ता ढूंढ सके पर इस समय यहाँ रुकना उसे सही नहीं लग रहा था, ककी अभी अभी एक आदमी मारा है यहाँ

"आआआह्ह्ह्ह..."

अपनी पीट में उठते दर्द की वजह से जब्बार वापस वर्तमान मैं लौट आता है

अपनी पीट मैं होते दर्द और अपनी शर्मनाक हार वो भी एक औरत है.. ये सब जब्बार क लिए किसी ज़हर पीने से भी ज्यादा कड़वा था, उसने इस गाओं मैं 2-2 लोगो (खालिद क बाप 'गुफरान', और अनुभव की पत्नी 'अनोखी') की जान ली पर आज उसे एक औरत क हाथों हारना पड़ा, इस बात को जब्बार मैंने को तैयार hi नहीं हो रहा था

"किया कुछ नहीं किया उस संदूक क लिए, सालों पागलो की तरह पहले उस कुंदन को ढूंढा फिर उसका भरोषा जीता और इतने सालों तक उसका नौकर बनकर भी रहा

यहाँ जब उस भानु का कुत्ता भी बना.. ये सोच क की सायद उसका साथ पाके वो संदूक जल्दी मिल जाये

पर आज मैं एक औरत से हार गया.. चींईईई"

जब्बार एक पल क लिए रुकता है और फिर उसकी नफरत उसके सब्दो का रूप लेके बहार आने लगती है

"पिछले 18 सालों से उस कुंदन क साथ उसकी चक्की पे नौकर बन क रह रहा था, और जब भी मौका मिला उसके घर मैं उस खंजर को ढूंढा पर आज से पहले जैसे वो मुझे दिखा hi नहीं था.. और आज आअह्ह्ह्ह..."

जब्बार का जबड़ा कसता चला जाता है.. मानो वो किसी निष्कर्ष पे पहुंच चूका हो

"इतने सालों बाद वो खंजर आज मुझे मिल सकता था, पर उस रैंड मालती ने आज मुझसे ये मौका चीन लिया.. पर मैं इतनी आसानी से हार नहीं मान सकता

पूरी ज़िन्दगी मैंने उसी खंजर को पाने का सपना देखा है, और वो मैं पाके रहूँगा.. अब लड़ाई चुप क नहीं.. आमने सामने से होगी"

जब्बार खेत क बीचों बीच बैठ हुआ सायद तय कर चूका था की अब सामने आना hi पड़ेगा.. ककी मालती उसका चेहरा देख hi चुकी थी

न जाने वो किया करने वाला था, ककी सायद जब्बार अब सीधा हमला करने की सोच रहा था.. पर किया 'भानु' इसके लिए तैयार होगा

वही ठीक ऐसी समय अपने घर मैं मालती अपने हाथ मैं वही हसिया और अपने पास उस संदूक को रखे हुए बैठी हुई थी उसका पूरा जिस्म अब भी काँप रहा था माते से बेहटा हुआ खून उसके खूबसूरत चेहरे पे अलग सी सोभा बना रहा था

पर इस समय उसे सिर्फ अपने कानो मैं जब्बार की कही हुई बात hi सुनाई पद रही थी

"साली तेरा सपोला तोह बच गया था उस दिन.. पर आज तू मारेगी, और फिर वो भी नहीं बचेगा.. ककी वो अपना बदला लेके रहेगा.. तेरे पापों की सजा तेरे बेटे और पुरे परिवार को मिलेगी"

मालती क कानो मैं बार बार यही सुनाई पद रहा था, खास करके वो सब्द जहा जब्बार ने कहा था

"वो अपना बदला लेके रहेगा"

~©~

20 साल पहले उसी दिन जब्बार क उस बिल्डिंग से भाग आने क बाद आखिर किया हुआ था, लगे हाथ ये भी जानते चलते है

पुलिस सिरुन की आवाज़ सुनते है, कुंदन परेशां होने लगा था.. ककी उसके सामने एक सेठ की लाश पड़ी हुई थी और अभी उसके पास एक ऐसा संदूक था जिसमें सोने क सिक्खो क साथ एक ऐसा खंजर था जिसपे अनमोल हीरे मोती जेड हुए थे

कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की वो आखिर किया करे.. और सबसे बड़ी बात किया पुलिस उसकी बात मानेगी ?

कुंदन- (खुद से कहता है) नहीं नहीं.. पुलिस को लगेगा इस सेठ को मैंने hi मारा है.. मुझे निकलना hi होगा यहाँ से

कुंदन बिना किसी देरी क उस सेठ को अंतिम बार देखता है और उस खंजर को जल्दी से उस संदूक मैं रखते हुए उस सेठ क ठंडी पड़ती लाश से वडा करता है

"जब तक मैं जीवित हु.. ये खंजर किसी को नहीं मिलेगा"


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कुंदन बिना किसी विलम्ब क तुरंत hi वह से आके अपना बिस्तर उठता है.. की तभी उसे एक साथ कई लोगो क सदियों से ऊपर आने की आहत होती है वो जल्दी से एक तरफ चुप जाता है

ऊपर आने वाले पुलिस क लोग था.. कुंदन उसने छुपते हुए वह से निकलने मैं सफल रहता है

कुंदन पूरी रात यहाँ वह भटकता रहता है और सुबह की पहली किरण क साथ hi उसने तय कर लिया था की वो हमेशा क लिए सेहर चोर देगा और वापस अपने गाओं चला जायेगा

इसलिए उसने डरते हुए उस संदूक में से एक सोने क सिक्के को बैच दिया.. जिससे उसे इतना पैसा मिला की अब कोई अपने गाओं मैं कोई भी काम सुरु कर सकता था

और ठीक उसी रात वो अपने गाओं जाने वाली ट्रैन मैं सवार हो जाता है.. पर इस समय कुंदन अकेला नहीं था वो संदूक भी था उसके साथ था

और उसके दिमाग मैं गाओं वापस जेक एक चक्की सुरु करने का पक्का इरादा.. ककी उसे याद था की गाओं क बाकि सभी लोगो की तरह उसे भी कभी आता और दूसरी चीज़ों क लिए पैदल hi पड़ोस क गाओं जाना पड़ता था

सन 🖼️ #06

इधर कुंदन क वह से आने क बाद वो पुलिस वाले हर जगह तलासी लेते है, पर उनके हाथ वो नहीं लगता जिसकी सायद उसे तलाश थी.. और जल्दी hi उन सभी में से सबसे बड़ा पुलिस वाला अपने केबिन मैं बैठा हुआ था, की तभी उसकी टेबल पे रखा हुआ फ़ोन बजना सुरु हो जाता है


पुलिस वाला अपने पास खड़े हवलदार को देखता है और फिर एक लम्बी सी सांस चोरते हुए फ़ोन उठता है

"नमस्कार ठाकुर साहब"

दूसरी तरफ से कुछ कहा जाता है जिसपे वो पुलिस वाला फिर से जवाब देता है

"ठाकुर साहब हमने एक एक चप्पा चप्पा छान मारा था पर वह कोई भी संदूक नहीं.."

उस पुलिस वाले की बात भी पूरी नहीं हो पाती की दूसरी तरफ से एक ग़ुस्से से भरी आवाज़ आती है

"इतने सालों तक मैंने इस दिन का इन्तिज़ार किया पर ये बुद्धा मरते मरते मेरा काम बिगड़ गया.. "

पुलिस वाला- ठाकुर साहब हमारे लिए आगे किया हुकुम है ?

दूसरी तरफ से

"पता नहीं वो खंजर इस समय कहा होगा.. या किसके पास होगा ?

पर अभी क लिए तुम्हे हीरा पन्ना को ठिकाने लगाना होगा"

पुलिस वाला- आप कहो तोह एनकाउंटर मैं मरवा दे सालों को

दूसरी तरफ से

"नहीं अभी क लिए उन्हें ढूंढो और जेल मैं दाल लो.. सायद आगे उनसे कोई जरुरी जानकारी मिल सके, किया पता उन्हें पता हो वो खंजर अब किसके पास हो सकता है"

पुलिस वाला- पर अगर उन्होंने आपकी पहचान बता दी ?

दूसरी तरफ से आदमी ऐसे हस्ता है मानो उस पुलिस वाले ने कोई मज़ाक किया हो

" 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' का नाम अपने होंठों पे लेन का मतलब उनकी मौत है.. और ये वो दोनों अचे से जानते है"

ऐसी क साथ फ़ोन काट जाता है, वो पुलिस वाला एक बार अपने फ़ोन को देखता है और अपने पास खड़े हवलदार को देखते हुए कहता है

"साला ये ठाकुर बड़ी पहुंची चीज़ है, पता नहीं बहनचोद चाहता किया है.. वैसे इस सेठ क परिवार मैं कोई बचा ?"

पुलिस वाला फ़ोन को रखते हुए, अपने हवलदार से पूछता है

हवलदार- इनका एक पोता था.. किया नाम था.. किया नाम था.. है.. 'रौनक'

पुलिस वाला- वो ज़िंदा है, या..

हवलदार- पता नहीं साहब.. हमने सेठ का पूरा घर चेक किया था, पर वो बचा मिला नहीं ?

पुलिस वाला- (एक लम्बी सी सांस लेते हुए) किया पता उन दोनों बदमाशों ने उसे किसी गटर मैं फेक दिया हो, चलो साला काम hi काम हुआ

पुलिस वाले ने अपने बात से साबित कर दिया था की वो किस घटिया सोच का इन्शान है

और जल्दी से हीरा पन्ना पुलिस की गिरफ्त मैं होते है और फिर कई महीनो तक पुलिस वाले हीरा पन्ना से हर तरह से पूछते है.. पुलिस की हर डिग्री की मार आजमाई जाती है उनपे

पर वो खुद कुंदन से उस दिन पहली बार मिले थे, इसलिए वो भी ज्यादा कुछ मदद नहीं कर पाते

है ये बात अलग है की उन्हें भले की कुंदन क बारे मैं कुछ पता न हो.. पर उन दोनों ने ये भी नहीं बताया की उस अनजान आदमी का नाम 'कुंदन' था

सायद वो अपना बदला खुद लेने की सोच चुके थे..

अगले 20 साल दोनों भाई उसी जेल मैं सड़ते रहे.. सायद ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह को भी उसने कोई मतलब नहीं रह गया था

और आज 20 साल बाद दोनों भाई आज़ाद थे.. पर ये उनकी किस्मत hi थी

की वो जल्दी hi उसी कुंदन से मिलने वाले थे, जिसकी वजह से उन दोनों की ज़िन्दगी क 20 पास जेल मैं काटे
 
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Post in thread मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)

 
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