Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 4 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

Danny69 थैंक ु सो मच भाई फॉर सपोर्ट



न नया साल तोह मेरा यही ट्रैन मैं hi निकल गया था, रात भर का सफर था

एंड सुबह 6 बजे बनारस पंहुचा तोह बंद बज रही थी ठण्ड से

ओवरआल, Part ऑफ़ लाइफ 🧬



कीप रीडिंग
 


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अपडेट #11

पुरे जानवर hi हो आप (अनोखी वस कुंदन)

शीला अपनी बड़ी भाभी सविता क कमरे मैं अपने हाथ मैं टॉवल लिए हुए कड़ी थी, पर अभी वो ऐसे कड़ी थी मानो कोई मूर्ति हो और उसके कानो मैं बार बार उसके बड़े भाई क कहे सब्द गूंज रहे थे

"जा मेरे लिए एक टॉवल ले आ मैं नाहा लेता हु"

शीला का जिस्म झुरझुरी खाते हुए मानो होश मैं आता है और वो अपने घर क पीछे वाले बाथरूम की तरफ चल पड़ती है.. जहा एक एक कदम क साथ उसका जिस्म काँप रहा था और दिल मैं अलग अलग तरह की बातें आ रही थी

'किया भैया बिना कपड़ों क होंगे.. मतलब पुरे..'

शीला का मन गिलानी से भरता चला जाता है

"छी... छी मैं ये सब किया सोच रही हु, उफ्फ्फ्फ़ पागल हो गयी हु मैं भी"

शीला खुद को पूरी तरह सँभालते हुए घर क पीछे बने बाथरूम की तरफ चल पड़ती है.. जहा एक समय कुंदन पूरी तरह आते मैं सना हुआ एक मात्र लुंगी मैं खड़ा था

कुंदन बाथरूम का दरवाजा अचे से बंद करता है और अपनी एक मात्र लुंगी को भी उतर क अपने जिस्म से जुड़ा कर देता है.. जिससे उसका शांत पर हिलोरे मरता काला लुंड उभर क अपनी आभा फ़ैलाने लगता है

पर कुंदन क दिमाग मैं इस समय कई सवाल एक साथ चल रहे थे.. खास करके उस दिन बाजार मैं वो जिस आदमी क पीछे भगा था उसे बार बार लग रहा था की वो 'वनराज' है

कुंदन- (लम्बी सांस लेते हुए) पर ये कैसे संभव है.. ? मैंने तोह उसका पेअर काट दिया था, उसके बाद से उसका कभी कुछ पता नहीं चला.. फिर इतने सालों बाद.. नहीं नहीं ये संभव नहीं है

कुंदन अपनी सोच से बहार आता है और अपने जिस्म पे पानी डालने लगता है.. वो अपने जिस्म से आते को साफ़ करते हुए खुद से बोलने लगता है

"पर अगर वो सच मैं.. वनराज hi है, तोह कही ये जो कुछ हो रहा है उसके पीछे वही तोह नहीं"

कुंदन अपने सर पे पानी डालते हुए अपनी उलझन को दूर करने की कोशिश करता है और इसीलिए वो कुछ और सोचने की कोशिश करने लगता है.. और दिमाग मैं जो पहली चीज़ आती है उसे सोच क एक पल क लिए उसके आन्ध्रों पे ख़ुशी तोह अगले hi पल परेशानी भी आ जाती है

कुंदन- (नहाते हुए खुद hi बाड़बंदी लगता है) मालती की बेवफाई क बाद एक वही तोह थी जिसके गरम जिस्म का साथ था.. पर वो भी

कुंदन ये बोलते हुए एक पल क लिए रुक जाता है पर अगले hi पल उसका हाथ उसके काले सोये हुए लुंड पे पहुंच जाता है.. कुंदन अपने लुंड को सहलाते हुए


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"आज भी वो दिन याद है जब पहली बार मैंने उसकी..."

पर अगले hi पल कुंदन खुद पे हसने लगता है

"मैंने.. या उसने.. है.. हहहह"

कुंदन हस्ते हुए उसी प्रकार खड़े खड़े अपना लुंड सहलाने लगता है और उसकी आँखों क आगे उस दिन का दृश्य एक बार फिर से घूमने लगता है

ऐसी पल जब कुंदन सुण्या मैं खोया हुआ अपने लुंड को धीरे धीरे मसल रहा था.. जिससे उसके लुंड मैं जान आणि सुरु हो चुकी थी, तभी शीला टॉवल लेके वह पहुँचती है

पर जैसे hi वो बाथरूम क सामने आती है उसकी धड़कन बढ़ने लगती है, उसके मन मैं छुपा हुआ चोर उसे उकसाने लगता है

'सोच मत.. चुपके से देख न, आखिर पता तोह चले कैसा हतियार है तेरे भैया का ?'

शीला कांपते हुए धीरे से अपना कदम आगे बढ़ती है.. तोह उसका अंतर्मन उसे रोकने की कोशिश करने लगता है

'पागल हो गयी है किया.. किया कर रही है ये, वो तेरा बड़ा भाई है.. सागा भाई है'

शीला क कदम नहीं रुकते.. और अगले hi पल वो उस पुराने से दरवाजे की सांस क बीच अपनी आँखों को लगा क अंदर का नज़ारा देखना सुरु कर देती है

वैसे किस्मत का खेल भी कितना निराला है न.. कभी ऐसे hi सत्तू भी शीला को देख रहा था, और आज वो खुद अपने सेज भाई को सुण्या मैं खोये हुए अपने काले लुंड को मसलते हुए देख रही है

शीला को सबसे पहले उसके भाई का हाथ नज़र आता है, और फिर वो असली चीज़ जिसपे धीरे धीरे उसके भाई का हाथ आगे पीछे हो रहा था..

शीला क जिस्म मैं चीटिया रेंगना सुरु कर देती है.. साँसें जोरो से चलने लगती है, और नज़रें मानो वही अटक सी गयी थी

पर इन सब से बेखबर.. कुंदन अपनी यादों क पिटारे मैं कही खो सा गया था

हम भी कुंदन की यादों क सफर पे उसके साथ hi चलते है..

जहा इस समय..

कुंदन पूरी तरह नंगी अवस्था मैं एक चारपाई पे लेता हुआ था उसका लुंड पूरी तरह आसमान को चुनौती देते हुए अपना सर उठा क खड़ा था

और उसके पास hi कड़ी थी.. अनुभव की पत्नी.. 'अनोखी'


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अनोखी मुस्कुराते हुए नंगे लेते हुए कुंदन क चारो तरफ घूमते हुए एक शानदार और मजबूत मर्द क जिस्म का अपनी आँखों से अनुभव लेने लगती है.. वैसे किस्मत से उसके पति का नाम भी 'अनुभव' hi है

अनोखी अपने हाथ मैं थामे मोबाइल क कैमरा को खोल क कुंदन क काले हतियार की कुछ फोटोज लेती है और फिर वही कुंदन क बगल चारपाई पे फेक देती है

फिर उससे कुछ कदम पीछे होक कुंदन क टनटनाते हुए काले भीमकाय लुंड को देख क अपना थूक निगलने पे मजबूर होने लगती है

कुंदन- सिर्फ देखोगी.. और ये फोटो लेने की किया जरुरत जबकि सब कुछ सामने है

अनोखी- (अपनी साड़ी क ऊपर से अपनी छूट मसलते हुए, मज़ाक सा करती है) सोचा जब सेहर वापस जाउंगी.. तोह अपनी सास को दिखाउंगी ये फोटो, की देखो 'सासु माँ' असली लुंड ये होता है

कुंदन बस है पड़ता है, वही उसके सामने कड़ी अनोखी मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू सरका देती है जिससे उसके गोल और सुडोल उरोजों का खूबसूरत नज़ारा और ज्यादा खिल क कुंदन को नज़र आने लगता है..

पर तभी अनोखी रुकते हुए

"वैसे यहाँ कोई आएगा तोह नहीं न... मैं नहीं चाहती की मेरी इज़्ज़त लूट जाये"

कुंदन- ये कमरा मेरी चक्की क पीछे का है, और ये मैंने जब्बार को दिया हुआ है रहने क लिए.. इसलिए जब तक मैं नहीं चाहूंगा यहाँ कोई नहीं आएगा, खुद जब्बार भी नहीं.. वैसे भी वो इस समय आगे चक्की संभल रहा है

अनोखी की आँखों मैं ये सुनकर संतुष्टि नज़र आने लगती है.. और वो अपने पल्लू को पूरी तरह अलग कर देती है

जिससे कुंदन का लुंड तोह कुंदन से भी ज्यादा खुस नज़र आने लगा था ककी वो अनोखी की इस खूबसूरती से खुश होक झूमने लगा था, न जाने कितनी hi छूटो का रास निकलने वाला कुंदन भी अनोखी की इस अनोखी ऐडा क आगे पानी पानी हो रहा था.. उसका एक हाथ जैसे hi उसके लुंड पे पहुंचने hi वह होता है की अनोखी तुरंत बोल पड़ती है

"न.. न.. आज तुम खुद को हाथ नहीं लगा सकते, आज मेरा दिन है"

कुंदन का बहुत मन हो रहा था अपने लुंड को सहलाने का पर वो अनोखी की बात को टालता नहीं.. वो मुस्कुराते हुए वापस अपने लुंड क पास से अपना हाथ हटते हुए कहता है

"मुझे तोह इतनी जल्दी नंगा करवा लिया.. और खुद साड़ी मैं कैद हो"

अनोखी मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी को खोलना सुरु कर देती है.. और धीरे धीरे अपने जिस्म से अपनी साड़ी की एक एक पार्थ को अलग कर रही थी, साथ hi साथ धीरे धीरे ऐसे घूमती भी मानो नाच नाच क अपनी साड़ी को अलग करने का काम कर रही हो

और जल्दी hi अनोखी क संगमरमर जैसे जिस्म से उसकी साड़ी पूरी तरह उतर चुकी थी जो अब उसके पैरों मैं पड़ी हुई उसके खूबसूरत जिस्म का एलान कर रही थी

अनोखी अब सिर्फ एक कैसे हुए ब्लाउज और साये मैं रह गयी थी.. अनोखी कुंदन को वैसे hi लेते हुए देख क मुस्कुराते हुए धीरे धीरे चलती हुई उसके पास जाती है, मानो जैसे कोई नंगीं ज़हर क लिए आगे बाद रही हो

अनोखी अब उस चारपाई क बिलकुल पास थी जिसपे इस समय कुंदन पूरी तरह निवस्त्र अवस्था मैं लेता हु था.. अनोखी मुस्कुरा क कुंदन पे अपने हुस्न का जलवा निछावर करते है और झुक क अपनी चूचियों की गहरी घाटी का नज़र दिखते हुए अपने जलते हुए खूबसूरत होंठों पे मालती क पति 'कुंदन' क बीड़ी वाले काले होंठों से जोड़ देती है

कुंदन भी इस मोके को चोर्ने क मूड मैं बिलकुल भी नहीं था.. इसलिए उसने तुरंत hi अनुभव की खूबसूरत पत्नी अनोखी क होंठों को चूसना सुरु कर दिया

"उम्मम्मम्मम...... Ummmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmmmmmm... सललललररररररपपपप.... उम्मम्मम्मम"


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कुंदन, अनोखी क होंठों को ऐसे चूस रहा था मानो आज ये उसकी ज़िन्दगी का आखिरी चुम्बन होने वाला है, वो इतनी बेहरहमी से किसी गैर की पत्नी क होंठों का रास निचोड़ने लगता है की बेचारी को सास तक लेने मैं परेशानी होने लगती है.. सायद इसीलिए अनोखी जल्दी से पीछे हटने की कोशिश करने की सोचती है पर कुंदन एक पुराण खिलाडी था सायद इसीलिए वो तुरंत ये बात समझ गया था और उसने तुरंत अपने एक हाथ से अनोखी का सर दबोच लिया और उसे कसके अपने होंठों क ऊपर दबा लिया जिससे अब उसकी खुरदुरी जीभ अनोखी क पुरे मुंह क अंदर नृत्य कर रही थी

"उम्मम्मम्मम... Ummmmmmmmmmmm.... Ummmmmmmmmm"

अनोखी छटपटा सी जाती है वो कुंदन क बालों वाले मजबूत सीने पे अपना एक हाथ रख क उसे कसके दबाते हुए अपने जिस्म को पीछे की तरफ दक्का देती है जिससे उसके लाल गुलाब जैसे होंठ कुंदन की गिफट से आज़ाद हो जाते है

अनोखी- (लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए) आआआह्ह्ह्ह... उम्मम्मम्मम्म.. मैंने.. मैंने कहा था न आज तुम मुझे हाथ नहीं लगा सकते.. उम्मम्मम.. सांस भी नहीं ले प् रही थी... उम्मम्मम..

अनोखी बुरी तरह हाफने लगी थी.. पर वो कुंदन की इस हरकत का बुरा नहीं मानती पर तभी उसकी नज़र जमीन मैं पड़ी उसकी साड़ी पे जाती है और उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है

कुंदन- मुझे तोह यकीं hi नहीं हो रहा.. की अभी कुछ महीने पहले hi तुम हमारे पड़ोस मैं रहने आयी थी और आज..

कुंदन की बात पे अनोखी कुछ बोलती नहीं बस मुस्कुरा क रह जाती है

वो तुरंत hi अपनी साड़ी उठती है और जल्दी hi वो कुंदन की चारपाई क सिरहाने कड़ी थी, कुंदन को पहले तोह कुछ समझ नहीं आता पर अनोखी की कामुक मुस्कान और उसके हाथ मैं थमी साड़ी देख क उसे समझते दिएर नहीं लगती.. इसलिए वो खुद hi अपने हाथों को अपने सर क ऊपर उठा देता है

अनोखी मुस्कुराते हुए जल्दी hi कुंदन क दोनों हाथों को अपने साड़ी से बंद क उसने चारपाई क पाइये से जकड देती है, यानि अब कुंदन अपने हाथों का कोई भी इस्तिमाल नहीं कर सकता था

अनोखी मुस्कुराते हुए कुंदन की आँखों मैं देखती है और अपनी एक ऊँगली को अपने मुंह मैं रख क अपने थूक से गीली करती है फिर उस खूबसूरत ऊँगली को कुंदन क होंठों पे रख क फेरने लगती है

कुंदन भी तुरंत अपने मुंह खोल देता है.. जिसे अनोखी अपनी उस थूक वाली ऊँगली को उसके मुंह मैं घुसा देती है और कुंदन तुरंत hi उस ऊँगली को चूसने का काम सुरु कर देता है

"उम्मम्मम्मम्म... सललललररररररपपपप...... सररररलललपपपपप.... उम्मम्मम्मम.... सललललररररररपपपप.... सररररलललपपपपप.... Ummmmmmmmmmm"

कुंदन, अनोखी की ऊँगली को ऐसे चूस रहा था की अनोखी की कामुकता भी अपने चरम पे पहुंचे लगी थी और ऐसी कारन उसका एक हाथ उसके साये पे वह पहुंच गया था जहा उसके जिस्म का सबसे गरम हिस्सा यानि उसकी योनि थी

अनोखी- (अपनी hi योनि को अपने हाथों से मसलते हुए) आआआआह्ह्ह्ह..... आप तोह बहुत ाचा चूसते है.. ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

अनोखी ये कहते हुए मुस्कुरा क अपनी ऊँगली वापस खींच लेती है और उसे अपने मुंह मैं रख क अब खुद hi चूसना सुरु कर देती है.. बड़ा hi कामुक नज़ारा था

कुंदन- ऊँगली क्यू निकल ली.. अभी तोह और चुसनी थी

अनोखी मुस्कुराते हुए

"फ़िक्र न करिये, आज आपको बहुत कुछ चूसना है"

कुंदन तोह ख़ुशी से झूम hi पड़ता है, पर उससे ज्यादा झूमता हुआ उसका लोढ़ा नज़र आ रहा था.. जिसे अनोखी जितनी बार देखती उतनी बार उसे ऐसा महसूस होता की उसकी योनि से रास की बूंदें टपक रही हो

अनोखी अब अपने अगले खेल की तरफ आगे बढ़ती है, वो मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथों को पीछे ले जेक अपने ब्लाउज क हूक खोल देती है और फिर हाथ को आगे लाके उन्हें हल्का सा खींच क ढीला कर देती है, पर पूरी तरह अपने जिस्म से अलग नहीं करती

ककी उसके दिमाग मैं कुछ और hi ज्यादा कामुक चीज़ थी.. इसलिए वो उसी अवस्था मैं आगे बढ़ती है और एक बार फिर से कुंदन क ऊपर झुक जाती है, पर इस बार वो ऐसे झुकी हुई थी की उसकी गोल गोल चूचिया ठीक कुंदन क मुंह क ऊपर लटक रही थी

कुंदन जैसा जानवर भला ऐसा मौका कैसे हाथ से जाने देता.. वो तुरंत hi अपना मुंह ऊपर उठा क अपने दाँतों से अनोखी का ब्लाउज जकड क खींच लेता है, पर इस प्रक्रिया मैं एक पल क लिए अनोखी की दर्दभरी चीख जरूर फुट पड़ती थी

"Aaaaaaaaaahhhhh...... Maaaaaaaaaaaaaaaaa... माअररररररर गयीईइ... रईईई"

अनोखी की इस कामुकता से भरी चीख की वजह थी.. कुंदन की हरकत, ककी उसके अपने दाँतों से ब्लाउज को नहीं अपितु अनोखी क निप्पल्स को जकड क खींचा था जिससे बेचारी क पुरे जिस्म मैं दर्द hi लहर दौड़ गयी थी पर फिर कुंदन अपने दाँतों की पकड़ ढीले करके सिर्फ ब्लाउज को खींच लेता है

अनोखी जल्दी से पीछे होती है पर अब वो ऊपर से पूरी तरह नंगी हो चुकी थी.. और उसके ब्लाउज का एक सिरा कुंदन क दाँतों क बीच फसा हुआ था

अनोखी अपने निप्पल्स को सहलाते हुए

"पुरे जानवर hi हो आप"

कुंदन फुक मार क ब्लाउज को एक तरफ करते हुए है पड़ता है और कहता है

"एक बार मेरे हाथ खोलो.. फिर दिखता हुआ अपने अंदर का जानवर"

अनोखी है पड़ती है पर कुछ कहने की जगह बस 'न' मैं अपना सर हिला देती है.. जल्दी hi उसके दोनों हाथ उसके साये पे आ चुके थे और उसका साया धीरे धीरे करके नीचे सरकने लगता है

सबसे पहले कुंदन को साये क धीरे धीरे नीचे होने की वजह से अनोखी की काली काली झाटों क बालों का नज़ारा देखने को मिलता है और फिर साया और नीचे होता है पर अनोखी तुरंत घूम जाती है जिससे अब अनोखी की मोती गोल गांड कुंदन की आँखों क आगे थी

कुंदन- आआअह्ह्ह्ह.... एस्ससे फाड़ने मैं तोह मज़ा hi आ जायेगा

कुंदन की बात सुनकर अनोखी क पुरे जिस्म मैं मानो करंट सा दौड़ जाता है और तुरंत घूम जाती है और लगभग कांपते हुए कहती है

"न बाबा न.. मैं गांड नहीं दूंगी"

पर तुरंत hi उसे अपनी कही बात पे शर्म आने लगती है इसलिए वो वापस घूम क मंद मंद मुस्कुराते हुए शर्माती रहती है.. उसका पूरा चेहरा शर्म से लाल पड़ने लगा था

कुंदन- (कामिनी मुस्कान क साथ) तुम कब तक अपनी गांड मुझसे बचा पाओगी, एक न एक दिन मैं इस खूबसूरत गांड मैं अपना लुंड घुसा क hi रहूँगा

अनोखी शरमाते हुए धीरे से मुद क कुंदन क हिलोरे कहते लुंड को देखती है तोह ऐसे काले हैवान जैसे लुंड को देख क और अपनी गांड का हाल सोच क बेचारी क पुरे जिस्म मैं कंपकपी सी दौड़ जाती है

अनोखी मन hi मन

'इतना बड़ा मेरी गांड मैं जायेगा भी.. उफ्फ्फ.. न बाबा.. संभव hi नहीं है'

कुंदन- (मुस्कुराते हुए) ज्यादा मत सोचो.. मैं संभव करके दिखाऊंगा

अनोखी तोह हैरान hi रह जाती है मानो जैसे कुंदन ने उसके दिल का हाल जान लिया हो, पर अगले hi पल वो बस मुस्कुरा क वापस अपने साये को नीचे करने लगती है

जिस कारणवस उसे थोड़ा झुकना पड़ता है और जल्दी hi उसका साया भी उसके जिस्म से जुड़ा हो चूका था.. पर वो कड़ी नहीं होती अपितु उसी इस्तिथि मैं अपनी गांड को और ज्यादा हिलाते हुए कुंदन को दिखने लगती है

कुंदन- (आआआह्ह्ह्ह भरते हुए) ऐसे तोह पक्का छोडूंगा

अनोखी मारे दर क तुरंत सीढ़ी कड़ी हो जाती है, ककी एक पल क लिए तोह उसे लगा की कुंदन अभी तुरंत hi उसकी गांड मैं अपना लुंड न घुसा दे..


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पर जब वो वापस पलटती है तोह देखती है की कुंदन क दोनों हाथ अब भी बंधे है, जिससे उसे रहत मिलती है और उसके चेहरे पे वापस से कामुकता की चाय नज़र आने लगती है

कुंदन को अब अनोखी की छूट का पूरा नज़ारा मिल रहा था.. छूट क ऊपर हलकी हलकी काले उगती हुई झातें देख क कुंदन का लुंड ऐसे हिलने लगता है मानो वो हवा मैं ुध क कही अनोखी की छूट मैं घुस न जाये

कुंदन- (अनोखी की छूट को बड़ी बारीकी से देखते हुए) साली तुम लोग झातें क्यू साफ़ करती हो, झाटों वाली छूट की बात hi अलग होती है

अनोखी मुस्कुरा क अपना एक हाथ अपनी छूट पे रख क उसे धीरे धीरे सहलाते हुए कहती है

"किया करू, मेरे पति को चिकनी छूट पसंद है"

कुंदन- (मानो जैसे हुकुम देता है) होगी पसंद उसे, पर अबसे तुम झातें साफ़ नहीं करोगी

अनोखी, कुंदन का ये अंदाज़ देख क खुद को गीला होता हुआ महसूस करती है.. इसलिए वो भी है मैं हामी भर देती है

कुंदन उसी प्रकार चारपाई से बंधा हुआ पूरी नंगी अवस्था मैं.. अब पूरी तरह नंगी हो चुकी अनोखी को देखते हुए कहता है

"वैसे आज तूने ब्रा पेंटी नहीं पहनी"

अनोखी आगे बढ़कर चारपाई पे चढ़ जाती है.. और धीरे धीरे किसी नंगीं जैसे सरकते हुए कुंदन क सीने पे चढ़के बैठ जाती है, यानि उसकी गरम और पानी चोरटी छूट अब कुंदन क सीने से चिपकी हुई थी

"सोचा जब आज आपसे छोड़ना hi है.. तोह ब्रा पेंटी पेहेन क किया होता, आखिर था तोह उतरना hi न"

अनोखी फिर कुंदन को और कुछ नहीं बोलने देती.. ककी वो वापस से उसके सीने से और ऊपर की तरफ खिसकते हुए अपनी छूट को कुंदन क मुंह क ऊपर रख क बैठ जाती है

और जैसे hi अपनी छूट पे कुंदन क होंठ और उसकी लपलपाती जीभ की छुवन अनोखी को महसूस होती है उसके जिस्म मैं चिंगारी फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaahhhhh....... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... माआआआ.... हैईईईई"

वही कुंदन को भी जब अपने मुंह पे अनोखी की छूट और उसके कोमल जिस्म का भार महसूस होता है तोह वो भी गंगना सा जाता है, ककी वो जनता था की सेहर की पड़ी लिखी लड़कियां और औरते किया किया नयी नयी चीज़े करती है चुदाई क वक़्त.. और इस समय अनोखी भी कुछ ऐसा hi नया खेल खेल रही थी

फिर तोह खेल ऐसा सुरु होता है की अनोखी की आअह्ह्ह्ह निकालनी बंद नहीं होती.. ककी कुंदन ने पहली hi बार मैं अनोखी की पूरी रास चोरटी छूट को ऐसे चूस लिया था की अनोखी आआअह्ह्ह भरते हुए कुछ इंच ऊपर उठ गयी थी

"आआआआअह्ह्ह्ह.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... माआआआ.... हैईईई"

पर अनोखी फिर से वापस अपनी छूट कुंदन क मुंह पे रख क कसके रगड़ना सुरु कर देती है.. और कुंदन भी अपनी जीभ को नुकीला करके छूट की गहराई मैं ऐसे उतर देता है की अनोखी को एक पल क लिए लगता है मानो उसके पति ने अपना लुंड घुसा दिया हो

"आआआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... माआआआ..... आआह्ह्ह्हह्ह...... चूस लो मेरी छूट.... आआआह्ह्ह्ह... मायआ..... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... हीी.... रीई.... माआआआआ"

कुंदन क हाथ बंधे हुए थे इसलिए वो बहुत कुछ कमल नहीं दिखा प् रहा था, पर उसकी खुरदुरी और नुकीली जीभ इस समय अनुभव की पत्नी की योनि की गहराई मैं घुस क अपना पूरा जादू दिखा रही थी

"उम्मम्मम्मम... सललललररररररपपपप..... सररररलललपपपपप..... Srrrrrrrrrrrrrrrr......... सललललररररररपपपप.... उम्मम्मम्मम.... Laaaaalllpppppp...srrrrlllpp.. सररररलललपपपपप... आआआहहहहह"


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जब्बार का वो कमरा इस समय कुंदन की छूट चटाई.. और अनोखी की कामुक आअह्ह्ह्ह से भरने लगा था

अनोखी जोर जोर से अपनी कमर हिलाते हुए अपनी छूट को कास कास क कुंदन क मुंह पे रगड़ रही थी और कुंदन भी किसी जानवर जैसे उसकी छूट को खूब कास क निचोड़ निचोड़ क चूस रहा था

अनोखी- (कामुकता की अधिकता से आँखें बंद हो चुकी थी) आआह्ह्ह्हह्ह..... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... माआआ.... आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... हैईईई..... रईईए.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

"सललललररररररपपपप.... सरररर.... लाहालललपपपपपप... लाहालललपपपपपप..... सररररलललपपपपप.... उम्मम्मम.... आआअह्ह्ह.... उम्मम्मम्मम... सररररलललपपपपप"

कुंदन अपने अनुभव का पूरा प्रयोग करते हुए 'अनुभव' की पत्नी की छूट क अंदर तक अपनी जीभ घुसा क उसका रास निचोड़ रहा था और अपनी जीभ से लगभग चुदाई सी कर रहा था

अनोखी- आआआअह्ह्ह्ह.... मायआ..... हैईईई..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह

कुंदन और अनोखी एक ऐसा खेल.. खेल रहे थे जिसमें कभी कोई न हारता है, न जीतने वाला था

पर तभी अनोखी का फ़ोन बजना सुरु हो जाता है.. जो वही उसी चारपाई पे पड़ा हुआ था

अनोखी उसी प्रकार अपनी छूट को जोर जोर से मालती क पति क मुंह पे रगड़ते हुए अपना हाथ आगे बड़ा क फ़ोन उठा लेती है.. जिसमे उसके पति अनुभव का नाम लिखा रहा था

अनोखी- (बिना कुछ सोचे फ़ोन उठा लेती है, और स्पीकर ों करके बात करने लगती है) हेल्लो.... हैईईई.... जीईई...... Aaaaaaaaaaaaahhhhh... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

अनुभव- (फ़ोन पे दूसरी तरफ से) अरे किया हुआ तुम्हे.. ये कैसे बात कर रही हो

अनोखी- (हवस की खुमारी मैं उसने फ़ोन तोह उठा लिया था पर अब उसे अपनी गलती का आभास हो चूका था) जी... वो.... आआआआअह्ह्ह्ह.... Maaaaaaaaaaaaaaa... Maaarrrrrrrrrrr.... गईइइइइइ.... रईईईईई..... आअह्ह्ह्ह

कुंदन ने जब सुना की फ़ोन पे दूसरी तरफ अनोखी का पति है तोह उसके अंदर का जानवर सैतानी करने की सोचता है.. इसलिए वो अनोखी की छूट की फाकों को अपने दाँतों से काट लेता है

अनुभव- (हड़बड़ा क) किया.. हुआ.. किया हुआ.. अनोखी.. अनोखी..

अनोखी ग़ुस्से से कुंदन को देखती है पर कुंदन की आँखों मैं हसी और चमक थी

अनोखी- (उसी प्रकार अपनी छूट को कुंदन क मुंह और होंठों पे रगड़ते हुए.. बात सँभालने की कोशिश करती है) अरे.. वो जी.. पेअर मैं एक काटा चुभ गया है

अनुभव- यानि फिर तुम गाओं क खेतों की तरफ गयी होगी घूमने क लिए, अरे कितनी बार तुमसे कहा है खेतों की तरफ घूमने मत जाया करो.. वह जाओगी तोह ऐसा होगा hi न

अनोखी- (अपने होंठों को खुद hi काटते हुए.. ककी नीचे उसकी छूट को सुंदरपुर का एक जानवर जैसा मर्द चूस रहा था) आआह्ह्ह... वो.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह...... माआआ..... अबसे यहाँ नहीं आउंगी.. बड़ा दर्द होता है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

अनोखी, कुंदन की आँखों मैं देखते हुए ये बात कहती है.. तोह कुंदन की आँखों मैं ऐसे चमक आती है मानो वो है रहा हो

अनुभव- अरे तोह अब इन्तिज़ार क्यू कर रही हो.. काटा निकालो जल्दी, वर्ण दर्द और होगा

अनोखी अपना एक हाथ पीछे ले जाके कुंदन क मोठे लुंड को मुट्ठी मैं जकड लेती है.. कुंदन का लुंड इतना मोटा था की उसकी मुठी तक बंद नहीं हो प् रही थी

अनोखी- किया करू.. बहुत बड़ा है दर लग रहा है

अनुभव- अरे इसमें डरना कैसा.. हिम्मत करो और कसके खींच लो बहार

अनोखी इस बार कुंदन की आँखों मैं देखती है और फिर फ़ोन पे अपने पति से कहती है

"पक्का..."

अनुभव- है बाबा पक्का.. मैं जो कहता हु बस वही करो, सब ठीक जो जायेगा

अनोखी धीरे से अपनी छूट को कुंदन क मुंह से हटती है.. और उसी अवस्था मैं हल्का उठे हुए hi पीछे की तरफ सरकती है, यानि इस समय उसकी छूट कुंदन क जिस्म क ऊपर हवा मैं लटकी हुई थी

अनोखी एक बार डरते हुए पीछे मुद क कुंदन क काले मोठे लुंड को देखती है और फिर कांपते हुए दिल और जिस्म क साथ फिर से कहती है

"पक्का न..."

अनुभव- (दूसरी तरफ फ़ोन पे मानो झुंझलाहट से भरते हुए कहता है) है बाबा.. है.. डरो मत, जैसा कहता हु वैसा hi करो देखना ज्यादा दर्द नहीं होगा

अनोखी हिम्मत करके अपनी छूट को कुंदन क तने हुए भीमकाय लुंड क टोपे पे रखते हुए कहती है

"ठीक है पति देवी.. जैसा आप कहो"

और इतना कहते hi अपने पुरे जिस्म का भार एक hi बार मैं कुंदन क जिस्म.. या लुंड पे चोर देती है, जिससे अनोखी की मासूम छूट एक hi बार मैं कुंदन क भीमकाय काले लुंड को अपने अंदर समाती चली जाती है

अनोखी मजबूती से अपने दाँतों को भींच लेती है ताकि उसे दर्द न हो, पर इतना बड़ा लुंड एक बार में अपनी छूट मैं समां लेना कोई खेल थोड़ी है

अनोखी को ऐसा लगता है जैसे उसकी छूट बीच से पहात रही हो.. और छूट की दिवार को कोई मोती चीज़ चौड़ा करते हुए अंदर तक घुस गयी हो

अनोखी का पूरा जिस्म काँप जाता है, और मुंह से एक दर्द भरी चीख निकल क जब्बार क उस छोटे से कमरे को भर देती है

"Aaaaaaaaaahhhhhh.... माआआआ........ माअररररररररर........ गईइइइइइ........ Reeeeeeeeeeeee..... हीी.... Maaaaaaaaaaaaa....."


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दूसरी तरफ से अनुभव फ़ोन पे

"बस.. बस हो गया.. देखो.. कहा था न डरने की जरुरत नहीं"

अनोखी दर्द से भरी हुई ग़ुस्से से अपने पति का फ़ोन काट देती है और वही चारपाई पे फिख्ते हुए पहात पड़ती है

"आआआहहहहह.. मायआ.. कुत्ते कमीने.. कैसे बताऊ की तेरी इस बीवी क पेअर मैं काटा नहीं, बल्कि उसकी छूट मैं लुंड घुसा है.. वो भी इतनी मोटा और काला जानवर जैसा... हैईईई.. मायआ"

अनोखी दर्द से भरी हुई तरप उठी थी, इसलिए वो तुरंत अपनी कमर को ऊपर उठा क कुंदन क लुंड को अपनी छूट से निकलने की सोचती है.. पर कुंदन तोह कुंदन hi है

कुंदन जैसे hi देखता है की अनोखी अपनी छूट को उसके लुंड से आज़ाद करवाने वाली है वो नीचे से अपनी कमर उठा क जितना लुंड बहार बचा हुआ था उसे भी अंदर तक उतर देता है

अनोखी को दर्द की तेज़ लहर महसूस होती है.. और उसकी आँखों मैं कामुकता से भरे हुए आंसू भर आते है

"आआअह्हह्ह्ह्ह... माआआआ............ माआररररर दियाआआ.... रईईई...... कैसा लुंड है... माआआ.... मररररर गयीईइ रईईई...."

कुंदन हस्ते हुए नीचे से अपनी कमर को जोर जोर से हिलना सुरु करता है

कुंदन- आआअह्ह्ह... किया कासी हुई छूट है.. उफ्फ्फ्फ़.. लगता hi नहीं की साली तू चूड़ी हुई है.. उफ्फ्फ्फ़... मज़ा आ गया.. बस मेरी जान कुछ और झटके सेह ले.. फिर देखना तुझे भी बड़ा मज़ा आएगा

अनोखी- (दर्द से तड़पते हुए पर कुंदन क लुंड पे बैठ क उछलते हुए भी) आआह्ह्ह्ह... कुछ और झटके.. कमीने कुछ और झटकों मैं तोह स्वर्ग पहुंच जाउंगी.. आआह्ह्ह्हह... Maaaaaaaaaa.... कितना मोटा लग रहा है... आआअह्ह्ह

कुंदन- (हस्ते हुए) वही तोह कह रहा हु.. और कुछ झटकों क बाद तुझे स्वर्ग hi मिलेगा

अनोखी हिम्मत करते हुए अपने दोनों हाथों को कुंदन क सीने पे रख क अपनी कमर को जोर जोर से हिलना सुरु कर देती है.. सायद उसने भी इस दर्द को सहने का सोच लिया था

अनोखी- आआआहहह... मायआ... ेस्शह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़... माआ..... अरे.. बाबा... उफ्फ्फ... थोड़ा धीरे... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह


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पर कुंदन, अनोखी क कहे का बिलकुल उल्टा hi कर रहा था ककी वो अब नीचे से अपनी कमर को और ज्यादा जोर जोर से हिला रहा था जिससे उसका मोटा लुंड अब सटासट सटासट करके अनोखी की छूट की गहराई मैं अंदर बहार होने लगा था

अनोखी- आआआह्ह्ह्ह... माआआ.... ेस्सशः... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... Aaaaahhhhhhhhhh

दोनों hi पूरी म्हणत से ये खेल खेलने लगे थे.. कभी अनोखी अपनी कमर को इतना ऊपर तक उठती की कुंदन क लुंड का बस टोपा उसकी छूट मैं बचता पर फिर वो वापस से अपने जिस्म का पूरा भार लुंड पे डालते हुए बैठ जाती है.. इस प्रक्रिया मैं अनोखी को एक मीठा दर्द तोह मिलता पर उसे ऐसा मज़ा भी मिलने लगा था जिसे बताने लिए न उसके पास सब्द है.. न मेरे पास लिखने क लिए

कुंदन- आआआह्ह्ह्हह्ह.... देख साली अब तुझे भी मज़ा आ रहा है ना.... आआआअह्ह्ह्ह

अनोखी- (जोर जोर से लुंड पे उछलते हुए) आआअह्ह्ह्ह... माआआ.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़... मैंने आपके हाथ बंधे हुए है तब मेरा ये हाल हो रहा है, पता नहीं आप पूरी तरह आज़ाद होते तब मेरा किया हाल होता... आआअह्ह्ह्हह.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... माआआ... आआअह्हह्ह्ह्ह

कुंदन- (नीचे से अपनी कमर का जोरदार वार करते हुए, जिससे उसका भीमकाय लुंड गपागप करते हुए छूट की नाप ले रहा था) फ़िक्र मत कर मेरी जान.. किसी दिन तुझे वो भी जानने को मिल जायेगा.. आआअह्ह्ह... साली किया छूट है तेरी.. उफ्फ्फ्फ़.. छूट ऐसी है तोह न जाने गांड का किया hi हाल होगा.. आआह्ह्ह्ह... साली तेरी छूट ने मेरे लुंड को पूरी तरह जकड रखा है

जब्बार क उस छोटे से कमरे मैं एक समय गाओं मैं कुछ महीने पहले hi आयी एक खूबसूरत औरत अपने पति से झूट बोल क एक पराये मर्द से छुड़वा रही है.. भला कामुकता का खेल इससे ज्यादा और किया hi खूबसूरत हो सकता है

अनोखी पूरी तरह ऊपर की तरफ उठती और फिर गपक से कुंदन का लुंड अपनी छूट मैं भरते हुए बैठ जाती.. और कुंदन भी नीचे से अपनी कमर का जोरदार दक्का देने मैं पीछे नहीं हैट रहा था

अनोखी- (कामुकता से आँखें पूरी तरह बंद हो राखी थी) aaaaaaaaaahhhhh... माआआ.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़... हैईईई... रईईईई..... अभी तक वैसा hi मोटा लग रहा है... उफ्फफ्फ्फ़... माआआआ, और मेरी गांड क बारे मैं तोह सोचना भी नहीं... आआआअह्ह्ह्ह... छूट मैं लेके तोह जान निकल रही है... Esssssshhhhhhhhhhhhhhh... गांड मैं लुंगी तोह पक्का मर hi जाउंगी.. आआआअह्ह्ह्हह

कामुकता का ये खेल अगले 30-35 मं तक यही पुरे सबब पे चलता रहता है.. और अब हाल तोह ऐसा था की कुंदन मुस्कुराते हुए बस चारपाई पे लेते हुआ था.. लुंड पे उछलने का पूरा काम और म्हणत अकेली अनोखी खुद hi कर रही थी, और सायद उसे इसका एहसास भी नहीं थी

अनोखी को तनिक भी अंदाजा नहीं था की इस समय कुंदन क लुंड पे उछलते हुए वो अनुभव की पत्नी नहीं.. बस एक रैंड लग रही थी, वो भी एक बहुत कामुक और खूबसूरत रैंड.. अनोखी रैंड

अनोखी अब बहुत जोर जोर से उछलने लगी थी.. सायद वो एक बार फिर से अपना पानी बहाने वाली थी, ककी इस पूरी कामुक प्रक्रिया मैं वो अब तक 2 बार अपना गाड़ा पानी बहा चुकी थी


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वैसे कुंदन का जिस्म भी धीरे धीरे अकड़ रहा था.. कुंदन अपनी कमर को फिर से उछलते हुए

"आआअह्ह्ह... साली मेरा निकलने वाला है, चल हैट जा वर्ण कहेगी की एक दिहाती ने माँ बना दिया... आआअह्ह्ह"

अनोखी ये सुनते हुए तुरंत झुक क कुंदन क होंठों को चूमने और चूसने लगती है.. पर वो अपनी छूट से उसका लुंड बहार नहीं निकलने देती और उसी प्रकार गपागप गपागप करके लुंड कहती रहती है

कुंदन क पास अब और कोई रास्ता भी नहीं बचा था इसलिए उसके लुंड का बांड टूट जाता है और अनोखी की छूट मैं उसके लुंड की सफ़ेद गाडी बारिश होने लगती है

अनोखी को जैसे hi ये एहसास होता है की उसकी छूट मैं कुंदन का गाड़ा रास भरने लगा है.. वो अपनी छूट को कुंदन क पुरे लुंड पे जमा सा लेती है, और कुंदन को जोर जोर से चूमने लगती है

कुंदन भी उसी बंधी हालत मैं अपने लुंड की अंतिम बूँद तक अनोखी की खूख मैं भरता चला जाता है.. और जल्दी hi अनोखी उसके सीने पे अपना सर रख क बुरी तरह हाफ रही थी

ऐसा hi कुछ हाल हमारे कुंदन का भी था, पर दोनों क hi चेहरों पे संतुस्ती की ख़ुशी साफ़ साफ़ देखि जा सकती थी

की तभी अनोखी को फिर से उसके उसका फ़ोन बजता हुआ सुनाई पड़ता है, अनोखी उसी प्रकार लेते हुए फ़ोन उठा क देखती है तोह उसके पति अनुभव का hi था

अनोखी- (कॉल रेसिवेद करते हुए) जी.. कहिये

दूसरी तरफ से अनुभव कुछ परेशां सा

"अरे किया हुआ.. कटा निकला की नहीं, और तुम फ़ोन क्यू नहीं उठा रही थी इतनी दिएर से"

अनोखी जल्दी से फ़ोन की स्क्रीन और नोटिफिकेशन मैं देखती है तोह उसे पता चलता है की जब वो एक पराये मर्द से छुड़वा रही थी तब उसके पति ने 11 बार फ़ोन किया था

अनोखी- जी.. वो फ़ोन गलती से साइलेंट हो गया था, तोह पता hi नहीं चला

अनुभव- और काटे का किया?

अनोखी- (मुस्कुरा पड़ती है) जी.. जी वो निकल गया

अनुभव- दर्द हुआ था ?

अनोखी, कुंदन क सीने पे अपना सर सहलाते हुए

"है.. सुरु मैं बहुत हुआ था, पर फिर मज़ा भी बहुत आया"

अनुभव दूसरी तरफ से जैसा कुछ समझा hi न हो

"मज़ा.. मतलब.. किया बोल रही हो, मैं कुछ समझा नहीं"

अनोखी- (मुस्कुराते हुए) अरे कुछ नहीं बाबा.. मतलब अब मैं बहुत खुस हु, चलिए मैं बस थोड़ी दिएर मैं घर आ रही हु

अनोखी इतना कहते हुए फ़ोन काट देती है..

अनोखी- आज क लिए बस इतना.. बाकि

और ऐसी क साथ कुंदन वापस वर्तमान की धरा पे लौट आता है

उसकी आँखें खुलती है तोह देखता है की उसने बाथरूम मैं कितना सारा अपना गाड़ा रास बहा रखा है

कुंदन न जाने कबसे अनोखी की उस पहली चुदाई क बारे मैं सोच क बाथरूम मैं ऐसे hi खड़े खड़े अपना लुंड मसले जा रहा था.. उसे तोह होश भी नहीं था की उसकी सगी बहिन 'शीला' तबसे लगातार उसे लुंड मसलते हुए देख रही है

कुंदन जल्दी से अपने गाड़े वीर्य पे पानी दाल क उसे बहाने लगता है, पर उसका गाड़ा चिपचिपा रास इतनी आसानी से बेहटा भी नहीं.. कुंदन को ाचा खासा पानी बर्बाद करना पड़ता है, जबकि यहाँ उसे देख क शीला की छूट न जाने कितनी बार रो चुकी थी

कुंदन- शीला ो.. शीला जरा टॉवल तोह दे देना

शीला जल्दी से हड़बड़ा जाती है और कुछ कदम पीछे होक अपनी गीली छूट और अपने धधकते हुए दिल को सँभालने लगती है.. इस बीच कुंदन कई बार उसे टॉवल क लिए आवाज़ देता है

फिर जेक कही शीला उसे बाथरूम क दरवाजे क ऊपर से टॉवल पकड़ती है और ऐसे दर्शाती है की वो अभी अभी आयी हो

कुंदन- (बाथरूम क अंदर से hi) कहा रह गयी थी.. कितना समय लगाती है

शीला बाथरूम क बहार कुछ कदम पीछे कड़ी होक एक पल क लिए तोह खुद से कहती है

'मैं तोह कबसे यही थी भैया.. समय तोह आप लगते हो.. उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... इतना शानदार लुंड और इतनी दिएर तक मसलने क बाद कही उसका गाड़ा रास निकला.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ वो भी इतना सारा की पूरी छूट को एक बार मैं लबालब भर दे'

जबकि शीला ये तक नहीं जानती थी की उसका बड़ा किया सोच क अपना लुंड हिला रहा था

कुंदन- (बाथरूम क अंदर से फिर से कहता है) शीला.. चली गयी किया.. ?

शीला- (अपनी सोच से बहार आते हुए) नहीं.. नहीं वो भैया.. मैं यही हु, और कुछ चाहिए किया

कुंदन- (अपना सरीर पूछते हुए बाथरूम क अंदर है पड़ता है) अरे टॉवल तोह दे दी न.. और किया लूंगा

शीला- अपनी बहिन की छूट


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कुंदन- (बाथरूम क अंदर से) कुछ कहा किया.. ?

शीला- (सकपका सी जाती है) नहीं.. नहीं.. भैया.. वो.. मैं जेक चाय बनती हु.. नहाने क बाद ठण्ड लगती है न.. मैं.. चईई.. बनती हु... चाय

कुंदन- अरे किया हो गया.. एक चाय क लिए इतना हड़बड़ा क्यू रही है

शीला- (खुद को सँभालते हुए) नहीं.. वो बस ऐसे hi, वो याद आया की पता नहीं दूध होगा की नहीं ?

कुंदन- (हस्ते हुए) अरे कोई नहीं.. दूध होगा तोह ठीक, वर्ण काली चाय बना लेना

शीला को पता hi नहीं चलता की उसका एक हाथ कैसे उसकी कासी चुकी पे आ गया है.. और वो बाथरूम क दरवाजे की तरफ देखते हुए

"आपके लिए दूध hi दूध है"

तभी बाथरूम का दरवाजा खुलने को होता है तोह शीला जल्दी hi वह से निकल आती है और सीधा रसोईघर मैं आके लम्बी लम्बी साँसें लेने लगती है.. और जब कांपते हुए हाथों से अपनी योनि को सलवार क ऊपर से चुटी है तोह उसे पूरा चिपचिपा प्राधारत बेहटा हुआ मालूम पड़ता है

शीला की आँखें खुद hi बंद होती चली जाती है और उसके मुंह से एक hi बात निकलती है

"आआआह्ह्ह्ह.... भैया...."

जल्दी hi कुंदन सिर्फ एक टॉवल बंधे हुए नाहा क आता है तोह उसके जिस्म पे पानी की बुँदे देख क शीला का जिस्म एक बार फिर से झुरझुरी सी खा जाता है

पर उसका अंतर्मन उसे चेताते हुए

"किया कर रही है.. बड़ा भाई है वो तेरा... रोक खुद को वर्ण पाप कर बैठेगी"

शीला जैसे तैसे अपने मन को समझती है और चाय बना क जब आँगन मैं आती है तोह उसका भाई 'कुंदन' अब कपडे पेहेन चूका था और आँगन मैं लकड़ी सुलगा रहा था

शीला अपने चंचल मन को काबू करती हुई अपने भाई को चाय देती है और दोनों वही आग क पास बैठ क चाय का आनंद लेने लगते है

कुंदन नहाने क बाद अपनी खूबसूरत बहिन 'शीला' क हाथों की बानी गरम गरम चाय पीते हुए उससे पूछता है

"तुम तोह कह रही थी.. दूध नहीं है ?"

शीला जो अब तक खुद की भावनाओ पे काफी हद तक काबू प् चुकी थी.. वो एक पल क लिए तोह समझ hi नहीं पाती की इस बात का किया जवाब दे, पर जल्दी hi वो खुद को सँभालते हुए मुस्कुरा क कहती है

"मुझे लगा था की दूध नहीं है.. पर फिर याद आया की सविता भाभी ने कल रात hi दुहा था"

कुंदन चाय क अंतिम गुनत भरते हुए

"चलो मैं चक्की क लिए निकलता हु, तुम अपना धियान रखना"

शीला मुस्कुराते हुए चाय क कप उठती है और किचन की तरफ जाने लगती है की तभी जैसे उसे कुछ याद अत है

"भैया.. वो मालती भाभी काफी दिएर पहले घर गयी थी, अपने कपडे लेने क लिए.. जरा आप उधर देखते जाना की इतना समय कहा लग गया ?"

कुंदन का मन तोह नहीं था, पर अभी अगर वो मन करता तोह शीला और सायद उससे बाकि घरवालों को भी उसके और मालती क बीच की दुरी का अंदाज़ा होने लगता.. इसलिए वो बस 'है' मैं सर हिला क घर से निकल जाता है

यहाँ मालती बहुत दिएर तक उसी हालत मैं अपने सर से बहते खून क साथ बैठी रहती है, पर जल्दी hi उसे जैसे वास्तविकता का आभास होता है और वो अपनी जगह से उठती है और अपने साथ उस संदूक को भी उठा लेती है और स्नानघर की तरफ चल पड़ती है

जहा जल्दी hi, वो पूरी तरह निवस्त्र होक पानी क नीचे कड़ी थी.. इस समय उसे पानी क ठन्डे होने का भी फर्क नहीं पद रहा था

यहाँ कुंदन सीधा अपने घर आता है जहा उसे दरवाजा खुला मिलता है

"पता नहीं धियान कहा रहता है, दरवाजा भी ऐसे hi खुला छोरा हुआ है"

मालती जब आयी थी, तब उसी पल उसे अपने घर मैं जब्बार क होने की आहात मिली थी और उसके बाद जो हुआ उस कारन उसका धियान hi नहीं गया था दरवाजे को बंद करने का

कुंदन जैसे hi घर मैं अंदर आता है उसे बाथरूम मैं पानी गिरने की आवाज़ आती है इसलिए वो भी बिना कुछ सोचे सीधा बाथरूम क सामने पहुंच जाता है

जहा बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और उसके नीचे पूरी तरह निवस्त्र मालती कड़ी हुई थी..

तभी मालती अपने सर पे चोट वाली जगह को पानी से धुलते हुए जैसे hi घूमती है वो अचानक से वह कुंदन को देख क एक पल क लिए तोह चौक सी जाती है

पर अगले hi पल उसके चेहरे पे ग़ुस्सा नज़र आने लगता है.. वही कुंदन किसी मूर्ति जैसा बना हुआ कभी पूर्ण नग्न अवस्था में कड़ी अपनी पत्नी को देख रहा था तोह कभी बाथरूम की फारस पे पानी और खून का मिलाव देख रहा था

कुंदन- (अपने होश सँभालते हुए) ये खून... तुम.. ?

मालती ने उस संदूक को अब भी अपने साथ वही बाथरूम मैं रखा हुआ था.. उसे उठती है और आगे बढ़कर कसके कुंदन क सीने पे मरते हुए दहाड़ सी पड़ती है

"मुझे नहीं पता इसके अंदर किया है, पर आज ऐसी की वजह से जब्बार ने मुझे मरने की कोशिश की.. और हमारे बेटे 'मोनू' का ये हाल भी उसने hi किया था.. पर अफ़सोस वो मेरे हाथों बच गया"

कुंदन जल्दी से उस संदूक को संभल तोह लेता है.. पर वो अब भी मानो कोई अजूबा देख रहा था, ककी मालती का कोई ऐसा रूप भी होगा ये उसने कभी सोचा भी नहीं था

मालती उसी हालत मैं बिना किसी झिझक क उसके ठीक बगल से होते हुए अपने कमरे मैं जाने लगती है.. पर अचानक से मुड़ते हुए एक एक सब्द पे जोर देते हुए कहती है

"ढूंढो उस जब्बार को.. ककी असली खतरा वो नहीं है, वो सायद सिर्फ एक पियादा है

ये सारा खेल किसी और का रचा हुआ है"

मालती इतना बोल क आगे बाद जाती है पर जैसे hi दरवाजे से कमरे क अंदर जाने लगती है वो फिर से पीछे मुद क अपने पति को देखते हुए कहती है

"अब तक सिर्फ आपने अपनी नफरत और ग़ुस्सा दिखाया है

पर अगर दुबारा मेरे बेटे को कुछ हुआ.. तोह याद रखना

आप मेरा ग़ुस्सा देखोगे"

मालती अपने चेहरे पे ज़माने भर का ग़ुस्सा इकठ्ठा करते हुए

"ढूंढो और ख़तम करो उस जब्बार.. और उसको भी जो उसके पीछे है

और अगर आपसे नहीं हो पता तोह मुझे बता देना"

मालती क इन अंतिम सब्दो

ने जैसे कुंदन क पुरे जिस्म मैं आग लगा दी थी, उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज उसकी पत्नी ने उसकी मर्दानगी को ललकारा हो

कुंदन की आँखें ग़ुस्से से लाल होने लगी थी और आँखों क आगे सिर्फ एक चेहरे घूम रहा था.. जब्बार.. का चेहरा
 
आज मैंने एक अपडेट लिखना सुरु किया, पर अलग hi लाइन पकड़ ली.. कुछ महीने पहले एक सन सोचा था पर उस टाइम वो स्टोरी की तिमेलिने मैं सेट नहीं हो रहा था, पर आज पता नहीं कैसे वही पूरा लिखता चला गया

ी होप जब वो फाइनल करके पोस्ट करूँगा तोह आप सभी को पसंद आये

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खालिद की अम्मी - नसरीन खला



 
मालती की सास (सुरीली देवी)



 
अपडेट #12

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तुम्हारी छूट में दूसरे का लुंड देख क मुझे सिर्फ ख़ुशी मिलेगी.. (वीरू की ीचा)

मालती अपने चेहरे पे ज़माने भर का ग़ुस्सा इकठ्ठा करते हुए

"ढूंढो और ख़तम करो उस जब्बार.. और उसको भी जो उसके पीछे है

और अगर आपसे नहीं हो पता तोह मुझे बता देना"

मालती द्वारा अपने पति को ऐसे ललकारे जाने पे कुंदन पूरी तरह भड़क चूका था.. और अब उसका एक hi उद्देस था जब्बार को ढूंढ़ना

वही दूसरी तरफ हर्षिता अपने खेत से वापस आ रही थी जहा सूरज की गरम किरणे उसके गरम जिस्म को और ज्यादा गरम कर रही थी

हर्षिता हरे भरे खेतों और खेत मैं काम करने वाले मर्द और औरतों को देखते हुए अपने घर की तरफ आगे बड़ी चली जा रही थी की तभी उसे एक खेत की माइड पे अंकुरित होते छोटे छोटे पौधे नज़र आते है..


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जीवन की सुरुवात इतनी खूबसूरत हो सकती है.. भला कोण जान सकता है

हर्षिता वही माइड पे बैठ क उन अंकुरित होते नन्हे नन्हे पौधों को देखने लगती है.. जो भूमि से बहार आकर एक नए जीवन की सुरुवात कर रहे थे

हर्षिता मुस्कुराते हुए

"ऐसे hi मेरे जीवन मैं भी वो दिन आया था, जब उस सब की शुरुवात हुई थी"

हर्षिता मानो अपने जीवन मैं किसी नयी चीज़ क अंकुरण को याद करने लगती है.. और देखते hi देखते वो उस दिन मैं पहुंच जाती है

चलिए हम भी उस दिन को थोड़ा और विस्तार से जानते है, सिर्फ हर्षिता नहीं बल्कि उसे जुड़े हर इन्शान की नज़रों से.. मेरी नज़रों से

कुंदन क द्वारा सर्प नदी में 'मोनू' क मिलने क 3 दिन बाद..

सुंदरपुर गाओं क बड़े बाजार क पास hi एक छोटे पर गाओं क चाँद घरों मैं से एक पक्के बने हुए घर मैं वीरेंदर पिछली रात की खुमारी को तोड़ते हुए उठता है

"आआह्ह.. बहनचोद लगता है कल ज्यादा हो गयी"

वीरेंदर उर्फ़ वीरू अपने सर मैं होते जोर क दर्द से परेशां अपने माथे पे हाथ रख लेता है

"ये भानु क चक्कर मैं आये दिन 1-2 पेग ज्यादा hi हो जाते है"

वीरू यानि कुंदन का छोटा भाई जो अभी अभी बिस्तर से उठा hi था अपने सर मैं होते दर्द को दूर करने क लिए रसोईघर की तरफ चल पड़ता है

जहा उसकी खूबसूरत पत्नी सुबह भोर मैं hi उठ क घर क सरे काम को पूरा करके अब रसोई क कामो मैं लग चुकी थी

40 साल क वीरू की खूबसूरत पत्नी 'हर्षिता' इस समय पूरी तरह पसीने मैं भीगी हुई थी

उसके माथे का पसीना उसकी कामुकता को चूमते हुए उसके चेहरे से होक आगे बाद रहा था.. साथ साथ उसके बालों की एक लत बार बार उसके चेहरे पे आके उसके साथ अठखेलियां कर रही थी

जिसे वो अपने आते से साणे हुए हाथों से अपने कानो क पीछे कर दे रही थी.. और इस वजह से उसके चेहरे पे हल्का सा आता लग गया था

ऐसा लगा मानो उस आते की वजह से उसकी सलोनी सूरत और ज्यादा निखार गयी हो

हर्षिता की अगर बात करू तोह उम्र अभी कोई 34-35 से ज्यादा नहीं होगी..

पड़ोस वाले गाओं से ब्याह क जब हर्षिता यहाँ आयी तोह 18 की भी नहीं हुई थी.. जहा उसकी दोनों बड़ी देवरानी सविता और मालती पड़ी लिखी थी वही इन तीनो मैं अकेली हर्षिता hi थी जो पूरी तरह अनपढ़ थी

पर सिलाई कढ़ाई मैं इसका हाथ कोई नहीं पकड़ सकता, और इसके हाथों का बना खाना अपना hi स्वाद रखता है

शिक्षा की कमी को पूरा तोह नहीं किया जा सकता.. पर हर्षिता खुद को जिस तरह संभालती और बन स्वर क रहती है उससे कोई ऐसे देख क ये नहीं कह सकता की इसके लिए काला अक्सर बैँश बराबर है

साथ hi साथ ये अपनी म्हणत से चीज़ों को बड़ी जल्दी सीख लेती है.. हर चीज़ मैं निपुड़ता हासिल करना बखूबी जानती है

हर्षिता और वीरू की शादी करने मैं सबसे बड़ा योगदान सविता का hi था, जबकि उस समय कोई भी इस रिश्ते क लिए तैयार नहीं था

सभी का कहना था की उनकी मंझली बहु 'बा' पास है तोह आने वाली नयी बहु उससे ज्यादा नहीं तोह कमसेकम उतनी पड़ी लिखी तोह होनी hi चाहिए

यहाँ तक एक बार को खुद वीरेंदर यानि वीरू भी शादी से मन करने वाला था.. पर फिर न जाने सविता की बातों ने ऐसा कोनसा झाड़ू किया की पूरा घर इस शादी क लिए मान गया

है मालती ने अंतिम समय तक शिक्षा क महत्व पे बात करने की कोशिश की पर सविता ने आखिर उसे भी समझा hi दिया

"की.. तू भी तोह बा पास है, बता कोनसा फायदा हुआ.. जब रहने हमे गाओं मैं hi है तोह संस्कार काफी है"

और इस तरह हर्षिता की शादी इस परिवार मैं होती है और हलके पक्के रंग की पर सलोनी सूरत वाली लड़की हर्षिता इस घर की बहु बन क आती है

करीब 34-35 साल की हर्षिता इस उम्र मैं भी किसी चलती फिरती क़यामत से काम नहीं है

चलने पे उसके उछलते हुए स्तन कइयों की लार टपका देते है.. और मैं मुंह वाली लार की बात नहीं कर रहा हु 😉

किसी मादक हिरणी जैसी हिलती उसकी कमर लोगो को पूर्ण स्तम्भ कर देती है.. बेचारे आने जाने का रास्ता भूल जाते है

कहने को 1 बीटा है पर अगर कोई कसम भी खा ले, तोह दूसरा ये नहीं मानेगा की उसकी उम्र 35 की होगी.. ऐसी है हमारी सलोनी हर्षिता


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सलोनी रंगत भी इतनी कामुक हो सकती है.. इसका चीखता हुआ साबुत है वीरू की पत्नी

हमेशा कैसा ब्लाउज पहनने की आदत की वजह से उसके दोनों सलोने यौवन क पर्वत ऐसे लगते है मानो किसी भी पल वो ब्लाउज को पहाड़ क बहार निकल आएंगे

वैसे इन पर्वतों को देखने की ीचा न जाने कितनो की होगी

साड़ी और कभी कभी सूट पहनने वाली मुरली दस की सबसे छोटी बहु हर्षिता सर्वगुण संपन्न नारी है

उसपे नाभि से नीचे साड़ी बांधने की वजह से पसीने मैं भीगी रहने वाली नाभि को तोह बस चूस लेने का मन करता है

वैसे हर्षिता सुरु से ऐसी नहीं थी.. उसकी इस कामुकता की पूरी बदहि उसके पति वीरू को जाती है

जिसने एक अनपढ़ सीधी सधी लड़की को ऐसा कामरूप दे दिया.. अब कैसे निकरा ये यौवन ये बताने की जरुरत तोह नहीं है न 😉

वैसे हर्षिता क जिस्म की कसावट की असली वजह उसका पूरा दिन घर क कामो मैं लगे रहने और कभी कभी अपने पति क साथ खेतों क कामो मैं हाथ बताना भी है

वैसे इस सर्वगुण संपन्न हर्षिता मैं अगर कोई दोष है तोह वो है उसका अन्धविश्वास.. ये ऐसी बातों और चीज़ों पे बड़ी hi जल्दी विस्वास कर लेती है

आसान भाषा मैं हर्षिता एक पूर्ण काम देवी का रूप और भारतीय नारी है

हर्षिता क रूप वर्णन क बाद चलिए वापस कहानी पे आते है

वीरू कल रात दारू ज्यादा होने की वजह से अपने सर दर्द से परेशां रसोईघर की तरफ चल पड़ता है जहा वो जैसे hi रसोई मैं पेअर रखने वाला होता है उसकी सलोनी पत्नी उसे टोक देती है

"बिना स्नान करे रसोई मैं प्रवेश नहीं करिये.. पाप लगेगा"

पर वीरू कहा सुनने वाला

वीरू- ये सब अन्धविश्वास पे मुझे यकीं नहीं.. तुम जल्दी से निम्बू पानी बना क दो

हर्षिता बुरा सा मुंह बनाते हुए

"आप ये दारू पीना चोर क्यू नहीं देते.. कोई अछि चीज़ थोड़ी है ये"

वीरू- (थोड़ी झुंझलाहट से) यार अपना भसड़ बंद करो और जल्दी से निम्बू पानी बनाओ

हर्षिता बेचारी जो अपने पति से ुचि आवाज़ मैं बात भी नहीं करती वो और किया करती.. चुपचाप काम मैं लग जाती है

पर वीरू को एहसास होता है की उसने ज्यादा hi जोर से बोल दिया तोह वो आगे बाद क पीछे से अपनी खूबसूरत पत्नी को बाहों मैं भर लेता है

हर्षिता- (अंदर hi अंदर गुनगुना गयी थी.. पर दर्शाती नहीं) अरे छोड़िये मुझे काम करने दीजिये, देती हु आपका निम्बू पानी

वीरू- (हर्षिता क हाथों क नीचे से अपने दोनों हाथों को ले जेक उसके उन्नत और दोनों कठोर पर्वतों को दबोच लेता है) सोच रहा हु इनका रास पी लू.. ये निम्बू से ज्यादा ाचा काम करेंगे

हर्षिता जो सुबह सुबह अपनी चूचियों पे अपने पति की मजबूत पकड़ पाके अंदर तक उमंग से भर उठी हुई वो कसमसाती हुई कहती है

"अरे.. अरे किया करे रहे है जी, छोड़िये न काम करने दीजिये"

पर वीरू अपने दोनों हाथों की पकड़ और मजबूत कर देता है जिससे उसकी उँगलियों की पकड़ उसकी खूबसूरत पत्नी क रसीले दूध मैं धस सी जाती है.. और कामुकता की अग्नि की लपट हर्षिता को गंगना देती है

"आआह्ह्ह... किया कर रहे है जी.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

वीरू आया तोह निम्बू पानी क लिए था, पर अब काम दूध दुहने का करने लगा था

वो दोनों चूचियों को मजबूती से पकड़ क उन्हें गोल गोल घूमते हुए मसलने लगता है.. उन्हें जोर जोर से दबाने लगता है

वीरू की मजबूत पकड़ हर्षिता क जिस्म मैं एक बिजली सी पैदा करने लगती है और उसके पैरों क बीच गीलेपन की सुरुवात होने लगती है

"आआअह्ह्ह्हह... मायआ.. किया कर रहे है जी... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... आआह्ह्ह... छोड़िये न... हैईईई..... उफ्फफ्फ्फ़.... माआआआ.... इत्ती जोर से नहीं आआह्ह्ह्हह्ह.. माआआआ"

वीरू अपना सर दर्द पूरी तरह भूल चूका था, उसे भी यु सुबह सुबह अपनी सलोनी पत्नी का दूध मसलने मैं बड़ा मज़ा आ रहा था

"हैई... तुंहारी दोनों चूचिया कितनी मुलायम है.. आआह्ह.. मेरी उंगलिया पूरी धस जाती है इनमें"

हर्षिता बेचारी पानी पानी होने लगती है.. कामुकता से तृप्ति हुई वो अपना एक हाथ पीछे ले जाती है जिसमें अब भी आता लगा हुआ था, पर इस समय कहा किसी को इस बात की परवा

और फिर वो अपना हाथ अपने पति क बालों मैं चलना सुरु कर देती है.. जिससे वीरू भी उसके और करीब आ जाता है और अपने जलते हुए होंठों को हर्षिता की पसीने से भीगी हुई गर्दन पे रख देता है

हर्षिता तोह जैसे तरप सी पड़ती है अपनी गर्दन पे यु चुम्बन पाके

"आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह........."

वीरू भी पीछे नहीं रहता वो दोनों हाथों की पकड़ और मजबूत करते हुए अब और जोर जोर से अपनी खूबसूरत पत्नी क उरोजों का मर्दन सुरु कर देता है.. साथ hi साथ उसकी गर्दन पे जगह जगह अपने गीले चुम्बन की बौछार सी कर देता है

"आआह्ह्ह्हह्ह.. मा... बड़े जेठ जी क यहाँ गए थे.. आआअह्ह्ह्ह.. मोनू अब कैसा है... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.. मायआ... आआअह्हह्ह्ह्हह"

हर्षिता अपने दाँतों से अपने होंठों को काटते हुए कहती है.. वही वीरू भी दोनों हाथ क पंजो की पूरी पकड़ बनाये हुए अपनी खूबसूरत सलोनी पत्नी का दूध का दुहन पूरी म्हणत से कर रहा था

वीरू- है.. कल शाम को गया था, अभी होश नहीं आया है और वैद जी (त्यागी) बता रहे है की सर पे चोट लगने की वजह से भविष्य मैं कब तक होश आएगा कुछ कहा नहीं जा सकता

हर्षिता अपने पति क मजबूत हाथों से अपनी चूचियों का मर्दन करवाते हुए बड़ी मुश्किल से अपनी आखों को खोले रख प् रही थी

"आआआह्ह्ह्ह... बेचारा बचा.. न जाने किस करमजले ने उसके साथ ये किया होगा.. ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह..

इतने सालों क बाद तोह वो वापस अपने घर आया था, आआह्ह्ह्ह मुझे तोह दर है की उसको किसी भूत प्रेत की नज़र न लग गयी हो.. आआह्ह्ह्ह.. मंजलि जेठानी से कहिये की वो उसे किसी बाबा को भी दिखा दे.. ेस्स्स्सह्ह्ह्ह माआआ... आऍप नाआ..... आआआअह्ह्ह"

वीरू अपनी पत्नी क अन्धविश्वास से भली भांति परिचित है.. इसलिए वो उसकी मुलायम चूचियों का भरपूर मर्दन करते हुए

"हमे सायद सविता भाभी क यहाँ रहना होगा कुछ दिन.. भैया का कहना है की सायद खतरा दूसरों को भी हो सकता है.. आअह्ह्ह.. पर अभी ये सब बातें चोरो मेरी जान.. आज खुद चली जाना, और ये बाबा सबा वाला सुझाव खुद hi दे देना"

हर्षिता कोई जवाब नहीं देती ककी उसकी आवाज़ लड़खड़ने लगी थी.. ये खेल यही चलता रहता है और फिर

हर्षिता- (जिस्म मैं आग पूरी तरह भड़क चुकी थी) आआआह्ह्ह्हह्ह... माआआ.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़... धीरे दबाओ जी.. आअह्ह्ह्ह... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.. माआआ...

अपनी पत्नी की बात मानते हुए वीरू अपनी पकड़ को कुछ काम कर देता है.. पर ये बात सायद हर्षिता को उतनी पसंद नहीं आती

ककी इस एक पल क लिए उसकी कामुकता मैं मानो वीगन सा आ गया हो, पर वो कुछ बोल नहीं पाती.. इसलिए अपनी कमर को पीछे करते हुए अपने पति क हतियार से मिला देती है

वीरू भी अपनी कमर को अपनी सलोनी पत्नी की गांड से चिपका क उसके मम्मो को धीरे धीरे पियर से दबाने लगता है.. पर अब हर्षिता की सिसकारियां कुछ काम हो गयी थी

तभी वीरू उसकी पसीने से भीगी हुई गर्दन को चूमते हुए कहता है

"ाचा हर्षिता.."

हर्षिता- (अपनी आँखों को बंद किये हुए और अपनी पीट को अपने पति क सीने से लगाए हुए धीरे से कहती है) जी... आआअह्हह्ह्ह्हह

वीरू- सोचो इस समय मैं नहीं कोई और तुम्हारी चूचियों को दबा रहा है

वीरू क मुंह से निकली इस बात ने मानो हर्षिता की साडी कामुकता एक पल मैं ख़तम कर दी हो और वो जल्दी से घूमती है जिससे वीरू की कमजोर पकड़ उसके मोठे पर्वतो से अलग हो जाती है

हर्षिता घूम क वीरू को देखते हुए

"आप फिर सुरु हो गए.. कितनी बार कहा है मुझे ऐसी बातें नहीं पसंद, किसी पराये मर्द क बारे मैं सोचना भी मेरे लिए पाप है..

मैं देख रही हु जबसे आप वो गन्दी कहानी वाली किताब पद रहे थे, तभी से ऐसी गन्दी बातें सुरु की है"

वीरू आगे बाद क फिर से अपने दोनों हाथों को उसके उन्नत और मोठे यौवन पे रखते हुए

"यार मैं कोनसा कह रहा हु की सच मैं किसी से दबवाओ.. बस सोचने क लिए hi तोह कह रहा हु"

वीरू अपने एक हाथ से अपनी सलोनी पत्नी की गोल चुकी को दबोच लेता है और अपना दारू की बदबू मरता मुंह आगे करके अपने होंठों को अपनी पत्नी क होंठों से मिला देता है

हर्षिता- आप... आह्ह्ह्ह... उम्म्म्म

वीरू, हर्षिता को कुछ कहना का मौका hi नहीं देता ककी उससे पहले hi वो अपनी पत्नी क होंठों का चुम्बन सुरु कर देता है

"उम्मम्मम्मम्म..... Ummmmmmmmmmmm..... Srrrrrrrrrrrrrrrr.... उम्मम्मम्मम"

वीरू एक हाथ से हर्षिता की गोल चुकी को मसलते हुए उसके निचले होंठ को अपने मुंह मैं भर क कास क चूस लेता है

"ह्म्मम्म्म्म.... सललललररररररपपपप... ह्म्मम्म्म्म"

हर्षिता भी अपनी बात भूल क वापस से अपने पति क बालों मैं अपने आते वाले हाथों को चलना सुरु कर देता है

दोनों पति पत्नी सुबह की कामुक सुरुवात कर चुके थे

"उम्मम्मम्म..... Hmmmmmmmmmmm... Srrrrrrrrrrrrrrrr.... उम्मम्मम"


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वीरू अब एक हाथ को हर्षिता क सर क पीछे ले जेक उसे और अपने से चिपका क उसके होंठों का रास निचोड़ रहा था.. तोह दूसरे हाथ को नीचे सरकते हुए सीधा योनि द्वार पे लाके रोकता है

हर्षिता अपने जिस्म पे सुरु हुए इस दोहरे हमले से पूरी तरह जिस्म की तपिश मैं जलना सुरु होने लगी थी

हर्षिता- आआह्ह्ह्हह..... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... आआअह्ह्ह..... उम्मम्मम्मम्मम

हर्षिता क होंठ एक पल क लिए आज़ाद होते है पर वीरू वापस से उसके खूबसूरत होंठों को जकड लेता है और वापस से उसकी योनि को मुठी मैं भर क मसलते हुए उसका यौवन चूसने लगता है

"ह्म्मम्म्म्म.... Ummmmmmmmmmmm... सररररलललपपपपप....."

वीरू क सर मैं अब भी कल रात क दारू की वजह से हल्का दर था, पर इस समय अपनी सलोनी पत्नी को मसलने मैं वो उस दर्द को पूरी तरह भूल चूका था

हर्षिता कभी अपनी छूट क मसले जाने की वजह से मचल पड़ती तोह कभी अपने बाहों को अपने पति क गले मैं दाल क अपने होंठों को जोर जोर से चुसवाने मैं मांग होने लगती

किसी पति पत्नी क लिए इससे अछि सुबह की शुरुवात और किया हो सकती है

पर अब धीरे धीरे दोनों की साँसे उखाड़ने लगी थी.. जिस कारन वीरू hi अगला कदम उठता है और अपनी सलोनी पत्नी को किचन की rack/self की तरफ घूम क उसके ऊपर झुका देता है

हर्षिता- आआअह्ह्ह.. किया कर रहे है जी, अभी तोह सुबह hi हुई है.. आआआह्ह्ह्ह... ारीये... रुकिए ना... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

पर वीरू उसकी एक नहीं सुनता उसे रसोई की रैक पे झुका क पीछे से उसकी साड़ी को उठाना सुरु कर देता है.. वैसे इस पुरे प्रकरण में अब तक किसी क भी कपडे नहीं उतरे थे

पर जल्दी hi वीरू अपनी सलोनी पत्नी की साड़ी को पूरी तरह हवा मैं उठा देता है जिससे हर्षिता की रास बहती योनि पीछे से नज़र आने लगती है

वीरू का लुंड जो पहले से hi खड़ा था.. वो यु अपनी पत्नी की योनि से बेहटा हुआ रास जो उसके गोरी जाँघों तक बह रहा था, उसे देख क और ज्यादा उछाल मरने लगता है

वीरू का जिस्म कामुकता की अधिकता से कांपना सा सुरु हो गया था, इसलिए वो अपनी जीभ निकल क अपनी पत्नी की खूबसूरत जांघ पे अपनी जीभ लगा क चेतना लेता है

"Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.................."

हर्षिता जैसे काँप उठती है

"आआआहहहहह..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह.... चींईईई... ये आऍप... आअह्ह्ह्ह.... किया कर रहे है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह...."

पर वीरू अब कहा रुकने वाला था, वो यही अपनी पत्नी की दोनों नंगी हो चुकी गांड को कसके अपने मुठी मैं दबोच क फैला देता है.. जिससे हर्षिता की गांड पूरी तरह खुल क सामने आ जाती है और उसकी गांड और छूट का साफ़ साफ़ नज़ारा दिखने लगता है

पर अपने पति की ऐसी कामुक हरकतों पे हर्षिता का जिस्म ऐसे आग मैं झुलसने लगता है मानो किसी भी पल उसकी योनि से रास की बारिश हो सकती है

हर्षिता- आआअह्ह्ह्ह... आआप्प.. ये सुबह.. सुबह किया कर रहे है... उफ्फफ्फ्फ़.... सोनू आ जायेगा... एससष्ठ

वीरू- आ जाने दो.. वो भी अपनी माँ की छूट क दर्शन कर लेगा

हर्षिता का पूरा जिस्म मानो ऐसे काँप जाता है जैसे अभी अभी उसके जिस्म मैं कामुकता की बिजली दौड़ी हो

हर्षिता- चींईईई.... आआप्प.. न...... आआआआहहहहह.... माआआआ

हर्षिता अपनी बात कहते कहते अचानक से मानो तरप उठी है, ककी वीरू आगे बढ़कर अपनी पत्नी की फैली हुई गांड पे अपना मुंह लगा देता है.. और बिना देरी क उसका रसपान सुरु कर देता है

"सररररलललपपपपप..... उम्मम्मम्मम्म...... सररररलललपपपपप....... Ummmmmmmmmm.... सररररलललपपपपप.... उम्मम्मम्मम्म"

हर्षिता तोह जैसे पागल होने लगती है, न जाने उसके पति को पिछले कुछ दिनों से किया होता जा रहा है.. आये दिन कुछ न कुछ नया करते रहते है, जैसे आज वो उसकी गन्दी गांड को छत्त रहे है

हर्षिता- (कामुकता क मरे आँखें बंद हो चुकी थी) आआआअह्ह्ह्ह.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... चींईईई.... ये.. ाअप्प्प किया कर रहे है.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... माआ... हीी.... जीई.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह..... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....... हीी... रीई.... माआ

पर वीरू बिना कोई जवाब दिए बस अपने कार्य मैं लगा रहता है, वो हर्षिता क गांड क छेद मैं अपनी जीभ चलते हुए उस पुरे हिस्से को ऐसे छत्त रहा था मानो उसपे सेहद लगाया गया हो

"Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... उम्मम्मम्म.... सररररलललपपपपप..... सललललररररररपपपप...... Ummmmmmmmmmmmmmm"


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हर्षिता रसोई की रैक पे झुकी हुई पूरी तरह पागल हो रही थी, वो धीरे धीरे अपनी सुध बुध खोने सी लगी थी और रैक पे रखा हुआ सामान उसके हाथों से लग क गिर रहा था पर इस समय कहा कोई परवा करता इन बातों की

वीरू, हर्षिता की नाज़ुक गांड पे अपनी उँगलियाँ धसाये हुए उसकी गांड क छेद पे लगातार अपनी जीभ से वार करते हुए छत्त रहा था

"सररररलललपपपपप.... उम्मम्मम्म.... सललललररररररपपपप..... सररररलललपपपपप.... सललललररररररपपपप.... लललललललूउऊउउउपप... उम्मम्मम्मम"

हर्षिता- आआअह्ह्ह.... उफ्फफ्फ्फ़.. किया कर रहे है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... माआआ.... कहा से ये सब नयी नयी चीज़ें सीख रहे है... आआआह्ह्ह्ह... माआआ.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. जरूर उसी गन्दी वाली मैं पड़ा होगा... आआअह्ह्ह

वीरू कुछ कहता नहीं पर है पड़ता है, वो हर्षिता की गांड को और जोर से दबोच क उसे और फैलने की कोशिश करता है..

की तभी एक पल क फ़ुस्स्सस्स्स्सस्स... की हलकी सी आवाज़ क साथ उसे अपने चेहरे पे एक हवा का झोका सा महसूस होता है, और उसे एक मीठी मीठी सुगंध दी महसूस होती है जो धीरे धीरे पुरे वातावरण मैं फैलने लगती है

हर्षिता पूरी तरह पानी पानी हो जाती है.. उसकी आँखें खुल जाती है, उसे दर लगता है की कही उसका पति ग़ुस्सा न हो जाये

हर्षिता- (झिझकते और शरमाते हुए) जी.. वो... वो

पर वीरू ग़ुस्सा करने की जगह उल्टा मुस्कुराते हुए कहता है

"वाःह्ह्ह... किया खुसबू है तुम्हारी पाद मैं.. आआह्ह्ह्हह्ह... मज़ा आ गया"

हर्षिता मारे शर्मा क पानी पानी हो जाती है पर उसकी छूट से ढेर सारा रास निकलने लगता है.. और जिस्म हौले से कांपना सुरु हो जाता है

हर्षिता की आँखें एक बार फिर से बंद होती चली जाती है और मुंह से संतुस्ती भरी आअह्ह्ह फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhhh........."

ये बदलाव वीरू भी महसूस कर चूका था, इसलिए वो बिना देरी क सीधा खड़ा होता है और अपने तन चुके लुंड को जल्दी से अपनी धोती से बहार निकलता है..

उसके लुंड क आलू बुखारे जैसे टोपे से कॉमर्स की बुँदे निकल रही थी.. जिसे वो अपनी ऊँगली पे लगा क पुरे लुंड पे मसलने लगता है, मानो जैसे अपने hi वीर्य की बून्द से अपने लुंड की मालिश कर रहा हो

पर इस कार्य मैं वो ज्यादा दिएर समय नस्ट नहीं करता और एक हाथ से हर्षिता की साड़ी को ऊपर उठा क कसके पकड़ लेता है साथ hi अपने दूसरे हाथ पे थूकता है फिर वही थूक अपने लुंड पे लगा क वापस से एक आखिरी मालिश करता है

जबकि इधर रसोई की रैक पे झुकी हुई हर्षिता की आँखें अब भी बंद थी ककी उसकी योनि से उसका कॉमर्स धीरे धीरे टपक रहा था.. पर तभी अचानक से उसकी आँखें खुल जाती है और चौड़ी होनी सुरु हो जाती है ककी उसे अपनी छूट क द्वार पे कुछ गरम और गीला छूटा हुआ महसूस होता है

हर्षिता- आआह्ह्ह्ह... ाअप्प्प... हैईईईई... Maaaaaaaaaa....... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह....... ही.... Reeeeeeeeeeeee... माआआआआ........ बता तोह देते... हैई... माआआ.... माअररररर.... गयी... रईईईईई

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की वीरू अपने थूक मैं साणे लुंड को अपनी खूबसूरत सलोनी पत्नी की योनि मैं उतर चूका था

वीरू ने वार इतना जोरदार किया था की बिना किसी वीगन क उसका पूरा लुंड उसकी धर्मपत्नी की योनि की दिवार को फैलता हुआ अंदर तक घुसता चला गया था

वीरू- aaaaahhhhhhhhhh...... उफ्फ्फफ्फ्फ़...... तुम्हारी ये छूट... आआअह्हह्ह्ह्ह

हर्षिता अपने होंठों को काटते हुए.. अपने जिस्म मैं होने वाली मीठी मीठी दर्द की लहर को महसूस करती हुई

"आआआह्ह्ह्ह.... आप आज कल न जाने किया होता जा रहा है... उफ्फ्फ्फ़... पता नहीं किया किया उलटी सीढ़ी चीज़े सीख रहे है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"

वीरू अपने जिस्म का पूरा भार अपनी सलोनी पत्नी क ऊपर डालते हुए अपने लुंड को वापस बहार की तरफ खींचता है, और अपना एक हाथ आगे ले जेक वापस से उसकी झूलती हुई चुकी को कसके दबोच लेता है और अब उसका टोपा hi सिर्फ अंदर रह गया था और फिर उसी अवस्था मैं अपनी पत्नी की चुकी को मसलते हुए धीरे से कान क पास अपना मुंह लेक कहता है

"सोचो इस समय मैं नहीं कोई और तुम्हारी चूचियों को दबा रहा है"

पहले जब वीरू ने यही बात कही थी तब हर्षिता नज़र हो गयी थी.. पर इस समय उसकी योनि द्वार मैं उसके पति क लुंड का मोटा टोपा फसा हुआ था और उसकी चुकी का मर्दन चल रहा था, ऐसे में वो भी कहा तक खुद को संभालती.. बेचारी बहक जाती है

हर्षिता- (अपने होंठों को काटते हुए) आआह्ह्ह्हह.... कोण दबा रहा है.... ?

हर्षिता ये कहते हुए अपनी कमर को पीछे करके अपनी योनि मैं अपने पति का लुंड थोड़ा और अंदर उतर लेती है.. वही अपनी पत्नी क मुंह से ये बात और उसकी हरकत देख क वीरू तोह ख़ुशी से फुला नहीं समता

वो अपना दूसरा हाथ भी आगे जेक दूसरी चुकी को भी कसके दबोच लेता है और एक जोरदार वार क साथ अपने लुंड को पूरी तरह वापस गहरी मैं उतर देता है.. और कहता है

"तुम बताओ... कोण दबा रहा है मेरी पत्नी की चुकी... और"

अपनी छूट मैं अपने पति का मोटा लुंड घुसता हुआ महसूस करती हुई हर्षिता काम की अग्नि मैं जलना सुरु हो चुकी थी.. वो मुश्किल से अपनी आँखों को खोल क हवस भरी मादक आवाज़ मैं धीरे से कहती है

"आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... अआप बताओ.. . आअह्ह्ह... कोण दबा सकता है आपकी पति की चूचियों को... उफ्फ्फफ्फ्फ़...

और आपका ये 'और' से किया मतलब.. कही अपनी धर्मपत्नी की छूट मैं भी तोह किसी का लुंड नहीं डलवाने की सोच रहे है.. ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"

वीरू ने लिए ये पल हैरानी से भरा हुआ था.. ककी उसने कभी भी नहीं सोचा था की उसकी पत्नी कुछ ऐसा भी बोल सकती है

पर ये बात सुनकर वीरू का रोम रोम खिल उठा था.. और ऐसी ख़ुशी मैं उसने अपना पूरा लोढ़ा अंदर तक उतर दिया

हर्षिता- आआआआअह्ह्ह्ह.... Maaaaaaaaaaaaaa

वीरू मारे ख़ुशी क अपना लुंड बहार खींचता है और वापस पुरे वेग से अंदर उतर देता है

वीरू- आअह्ह्ह्ह... मुझे तोह लगता है तुम्हारी चूचियों और छूट को इस समय भानु मसल रहा है... क्यू है न... आअह्ह्ह्ह

वीरू पुरे जोश मैं भरा हुआ था पर फिर भी ये आखिरी बात कहते हुए वो दर जरूर रहा था

पर ख़ुशी तोह उसे तब हुई जब उसकी पत्नी ने कोई ग़ुस्सा नहीं किया उल्टा अपनी गांड को और ज्यादा पीछे करने लगी ताकि उसके पति का लुंड और अंदर तक घुस सके

हर्षिता- (कामुकता से भरी हुई सही गलत भूल चुकी) आआह्ह्ह्ह... दामाद जी को क्यू परेशां करते है... आअह्ह्ह्ह... मुझे तोह लगता है इस समय आपकी पत्नी का यौवन चूसने वाला... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

हर्षिता अपनी बात अधूरी चोर देती है.. सायद जान क या वीरू को जोरदार धक्कों की वजह से, ये कहा नहीं जा सकता


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पर वीरू तोह जैसे पागल हो जाता है ये सुनकर वो जोर जोर से अपनी पत्नी की छूट को चौड़ा करने मैं लग जाता है और कांपते हुए पूछता है

"कोण.. कोण.. छोड़ रहा है मेरी पत्नी को.. आअह्ह्ह्ह.... बताओ... बताओ मुझे"

हर्षिता- (दोनों हाथों को रसोई की रैक पे जमाये हुए, अपने पति का लुंड अपनी योनि मैं अनुभव करती हुई) आअह्ह्ह्ह... आप ग़ुस्सा तोह नहीं होंगे.. आआअह्ह्ह्ह... आआह्ह्ह्ह आराम से जी... आआआह्ह्ह्ह.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़.... हैईईई

पर वीरू क ग़ुस्सा होने का तोह सवाल hi नहीं था.. उल्टा उसके दक्कों मैं और ज्यादा जान आ गयी थी

वीरू- (अब दोनों हाथों को आगे लेक एक साथ अपनी पत्नी की दोनों गोल चूचियों को निचोड़ते हुए.. लगभग जैसे गिड़गिड़ाने सा लगता है) आआह्ह्ह.. नहीं.. नहीं.. मैं ग़ुस्सा नहीं होऊंगा तोह.. तुम बताओ न... आआअह्ह्ह

हर्षिता क चेहरे पे पहली बार कुछ ऐसी मुस्कान आयी जैसे मानो उसने कोई किला फ़तेह कर लिया हो.. पर जल्दी hi अपनी ख़ुशी को काबू मैं करती हु कहती है

"मेरे हिसाब से आपकी पत्नी की योनि मैं इस समय सत्तू का लुंड है.. आआआ..... Aaaaaaaaaaaahhhh"

वीरू तोह जैसे पागल hi हो जाता है, उसने सपने मैं भी कभी अपनी पत्नी को लेके सत्तू यानि अपने भतीजे क साथ नहीं सोचा था

वीरू- (जोर से अपनी पत्नी की चूचियों को मरोड़ते हुए) आआह्ह्ह्ह... किया सत्तू पर.. वो तोह अभी बचा है.. आआह्ह्ह

वीरू ये कहते हुए पूरा जोर लगा क अपनी पत्नी की छूट छोड़ रहा था

हर्षिता- आआअह्ह्ह... मुझे नहीं लगता वो अब बचा है.. मुझे तोह लगता है वो अब आपकी इस पत्नी क पेट से एक बचा पैदा कर सकता है.. आआह्ह्ह्ह... हैईईई... ाआराममममम से जी.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

वीरू पूरा दम लगा क अपनी पत्नी की छूट को छोड़ते हुए

"आआअह्ह्ह... यानि.. वो.. वो... मेरी पत्नी की खूख मैं अपना बीज दाल सकता है... आआअह्ह्ह"

वीरू तोह जैसे ये सुनकर पागल हो उठा था की उसकी पत्नी की खूख से किसी और क बीज का बचा पैदा होगा.. वो इतनी जोर से अपनी पत्नी की छूट मैं दकके मरने लगता है की बेचारी हर्षिता का पूरा जिस्म थरथरा सा पड़ता है


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"आआअह्हह्ह्ह्ह.... आराम से जी.. आआह्ह्ह.. माआआ.... उफ्फफ्फ्फ़... हैईईई... मायआ..... अरे... धीरे... धीरे... धीरे.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... माआआआ... आआआह्ह्ह्हह्ह"

पर वीरू अब कहा रुकने वाला था वो पूरा दम लगा क अपनी सलोनी रंगत वाली पत्नी की छूट को फाड़ने मैं लग चूका था.. पर हर्षिता एक बार फिर से इस आग मैं घी दाल देती है

"आआआहहह... उफ्फ्फफ्फ्फ़... वैसे.. मैंने सुना है की आज कल... आआअह्ह्ह... जवान बचे भी अपनी माँ को... आआआह्ह्ह्ह"

वीरू जोश क मरे पागल होता जा रहा था.. वो अपनी पत्नी क ऊपर झुक क उसके एक कान को अपने मुंह मैं भर क चूस लेता है और हकलाते हुए कहता है

"किया... किया... बताओ... न... आआह्ह्ह्हह्ह... रुको मत... आअह्ह्ह्ह.... बोलो... ना... बोलो... आआआअह्ह्ह"

हर्षिता अपने एक हाथ को अपने पति क हाथ पे रख लेती है.. जो उसकी चुकी का मर्दन कर रहा था और ऐसे अपने पति का हाथ दबाने लगती है मानो कह रही हो और जोर जोर से दबाओ.. निचोड़ लो.. आज इन्हे

हर्षिता- आआह्ह्ह्ह.. यही.. की... आआअह्ह्ह... की जवान बेटे भी अपनी माँ को छोड़ने लगे है आज कल.. आअह्ह्ह... किया ये सच है... आआआह्ह्ह्ह

वीरू की आँखें अब बंद होने लगती है और जिस्म अकड़ने लगा था

"हां... आआअह्ह्ह.. है.. है... ये.. ये सच है... किया... तुम भी.. सोनू से... आआआह्ह्ह्ह... बताओ... न... हर्षिता.. आआअह्ह्ह"

हर्षिता क चेहरे पे एक पल क लिए फिर से वही रहस्य्मय मुस्कान आती है और पर वो वापस खुद पे काबू प् लेती है

"आआह्ह्ह्हह... आपको बुरा नहीं लगेगा... की हमारा सोनू जिस छूट से निकला है.. उसी छूट मैं अपना लुंड डालेगा.. आआअह्ह्ह्हह"

वीरू कामुकता की बहती हुई नदी मैं ऐसी डुबकियां लगाने लगा था की उसने इस बात पे भी धियान नहीं दिया की आज से पहले कभी भी उसकी पत्नी से ऐसे खुले.. लुंड, छूट जैसे सब्द नहीं बोले थे

वीरू- (जोर जोर से अपनी पत्नी को छोड़ते हुए) आआअह्ह्ह्ह... नहीं.. नहीं... तुम्हारी छूट मैं लुंड देख क मुझे सिर्फ ख़ुशी मिलेगी.. असली ख़ुशी.. फिर चाहे वो लुंड किसी का भी हो

हर्षिता- (कामुकता से अपने होंठों को काटते हुए, थोड़ा डर्टी है और फिर कुछ ऐसा पूछती है) आआह्ह्ह्ह... किसी का भी.. सच्ची... भले hi.. वो मेरे अपने पिता क्यू न हो...

पर वीरू को इस समय कहा होश था.. उसका लुंड तोह गरम गरम मलाई निकलना सुरु कर चूका था

"आआआह्ह्ह्हह्ह.... मज़ा... आआ... गया... Uffffffffffffffff...."

वीरू अपना पूरा वजह दाल क अपनी पत्नी पे ढेर हो चूका था.. वही इन अंतिम पलों मैं हर्षिता की छूट भी अपना कॉमर्स बहा चुकी थी, इसलिए वो भी वही किचन की रैक पे धड़ाम से गिर क पूरी तरह हाफने लगी थी

कुछ पलों तक रसोईघर मैं पूर्ण शांति रहती है.. अगर वह कुछ था तोह वह की हवा मैं उनके कॉमर्स की महक सिर्फ

हर्षिता- (कुछ समय बाद, अपने पति को पीछे की तरफ दक्का देते हुए) उठिये जी.. आपने आज मुझे अपनी गन्दी बातों मैं फसा क न जाने किया किया बुला दिया, पक्का मुझे पाप लगेगा.. अब तोह मुझे 2 दिन का व्रत करना पड़ेगा.. इस पाप को काम करने क लिए

वीरू को भी आज बहुत मज़ा आया था अपनी पत्नी को छोड़ क.. सायद सबसे ज्यादा

पर वो मन hi मन खुद से कहता है

'काश मेरी हर्षिता ने आज जो बातें कही है.. वो सब सच मैं हो जाता'

वीरू ये सोचते हुए अपनी पत्नी से अलग होता है तोह उसका लुंड उसकी पत्नी की योनि से बहार आता है और उसके साथ hi हर्षिता की योनि मैं भरा हुआ ढेर सारा वीर्य भी निकल क उसकी गोरी जाँघों से होता हुआ उसकी पायल तक बहने लगता है

वीरू का जिस्म तोह ऐसा खूबसूरत नज़ारा देख क मंत्रमुग्ध सा हो जाता है

वीरू मन hi मन

'काश ये बेहटा हुआ वीर्य मेरी जगह किसी और का होता.. काश भानु का होता...'

वही हर्षिता शर्माती हुई अपनी नज़रों को नीचे करके रसोईघर से बहार निकलने लगती है

पर जब वो रसोईघर क बहार आती है तोह उसका हाथ उसके गले मैं पड़े एक लॉकेट पे जाता है.. जिसे वो अपने दूसरे हाथ का सहारा लेके खोलती है

जिसपे 2 फोटो थी.. एक तोह उसकी पर तब की जब वो जवानी को जान रही थी और दूसरी उसके पिता की

हर्षिता अपने पिता की फोटो देख क मुस्कुरा पड़ती है और अपनी आँखों को बंद करके उसे चुम लेती है

पर जब उसकी आँखें खुलती है तोह वो खुद को उसी माइड पे बैठा हुआ पाती है उन्ही अंकुरित होते पौधे को देखते हुए


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हर्षिता अपने पिता की फोटो को एक बार फिर से चुम लेती है.. और अपनी जगह से उठती हुई अपनी साड़ी से मिटटी झड़ती हुई खुद से कहती है

"जल्दी hi हमारा मिलान होगा... और इस बार आप मुझे रोक नहीं पाओगे, आपको अपनी बेटी को अपना प्रेम और अपना ...भीज देना hi होगा.. देना hi होगा"

हर्षिता मुस्कुराते हुए घर की तरफ चल पड़ती है, जहा उसके आन्ध्रों पे ऐसी मुस्कान थी मानो जल्दी hi वो अपना उद्देश्य पाने वाली हो

हर्षिता अब घर की तरफ चल पड़ी थी, जहा इस समय उसकी आँखों क आगे वो दिन आता है जब उसने सत्तू को खेत पे चोरी से वो किताब पड़ते हुए देखा था

और देखा था की कैसे वो अपना भीमकाय लुंड मसल रहा था उसे पड़ते हुए.. जिससे उसे ये बात समझते हुए देरी नहीं लगी की वो किताब किस प्रकार की है

और वही से उसे अपने बर्षो पुराने सपने को साकार करने का एक रास्ता नज़र आता है

और फिर कैसे उसने वो किताब वह से चोरी की और जब अपने पति को खाना देने गयी तोह किस प्रकार उसने उस किताब को ऐसी जगह रख दिया जिससे उसके पति जब काम से फुर्सत पाके सुस्ताने क लिए बैठता तोह उसकी नज़रें सीधा उस किताब पे जाती

उसके बाद वही हुआ जो वो चाहती थी

हर्षिता- (आगे बढ़ते हुए) मुझे वैसी और किताबो की जरुरत है.. खास करके ऐसी जिसमें बाप बेटी का मिलान हो, और ऐसी किताब मुझे सिर्फ वही लेक दे सकता है.. यानि.. सत्तू

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अपडेट #13

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सन 🖼️ #01




आज से ठीक 2 दिन पहले.. ये वही दिन है जब मालती और जब्बार क बीच वो झड़प हुई थी

असल मैं इस दिन जब रॉकी मालती को मिला था.. तोह वो उससे मिलने क बाद सीधा गाओं क जंगल की तरफ चल पड़ा था

जिस वजह से ऐसी सुबह उसके सीनियर 'यादव' का वो फ़ोन आया

रॉकी इस समय गाओं की एक छोटी सी नहर क पास अपनी कार क बोनेट पे बैठा हुआ.. दूर खेतों मैं काम करती औरतों और उनकी जवानी को ताड़ने का काम कर रहा था

रॉकी- (गाओं की हरियाली.. और भरी जवानी को अपनी नज़रों मैं कैद करते हुए.. खुद से कहता है) मन्ना पड़ेगा, इस गाओं मैं पीने क लिए बड़ा रास है.. पर पता नहीं कब कोई हाथ आएगी

रॉकी एक हाथ की उँगलियों क बीच सिगेरट सुलगाये हुए दूर औरतों क मदमस्त यौवन को देखते हुए अपने दिल की बात बोल hi पड़ा था.. की तभी उसकी जेब मैं पड़ा फ़ोन बजना सुरु हो जाता है

रॉकी तुरंत hi सिगेरट को दूर फिख्ते हुए अपना मोबाइल बहार निकलता है.. जिसे 'यादव सर' लिखा हुआ था

रॉकी- (फ़ोन रेसिवेद करते हुए) कहिये सर.. मेरी याद कैसे आ गयी ?

दूसरी तरफ यादव अपने ऑफिस मैं बैठा हु पूरी संजीदगी क साथ

"कुछ पता चला ?"

रॉकी को समझते दिएर नहीं लगती की उसका सीनियर इस समय ज्यादा hi सीरियस है

"ज्यादा कुछ तोह नहीं.. पर यहाँ कुछ बड़ा गेम है, पहले गुफरान और अब ये अनोखी"

रॉकी अपनी बात कहते हुए रुक जाता है ककी तभी उसके पास से एक बाला की खूबसूरत औरत अपनी गौड़ मैं एक बचे को लिए हुए गुजरने लगती है

उस खूबसूरत औरत की नज़रें एक पल क लिए रॉकी से टकराती है और वो एक पल क लिए रॉकी और फिर उसकी कार को देखते हुए अपने पीछे एक साइकिल पे सामान लादे आ रहे लड़के को देखते हुए कहती है

"किया हुआ.. जल्दी जल्दी चल न"

उसके पीछे आने वाला करीब 24 साल का हत्ता कट्टा लड़का.. जो पूरी तरह थक चूका और ऐसी ठण्ड मैं भी पूरी तरह पसीने मैं भीगा हुआ था वो लगभग हफ्ते हुए कहता है

"आ रहा हु दीदी.. साली इस साइकिल को भी आज hi ख़राब होना था"

वो बाला की खूबसूरत औरत अपनी गौड़ मैं थामे हुए बचे को सँभालते हुए फिर से रॉकी को देखती है और धीरे से कहती है

"किया रे.. गीतेश, आज कल अपने गाओं मैं सेहरी बाबू भी आने लगे है.. वो भी पैसे वाले"


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Rocky ye sunkar muskura padta hai.. wahi wo aurat ab aage bad jaati hai, aur jaldi hi uske peeche aane wala jo sayad uska chota bhai tha.. wo bhi aage badte hue nikal jata hai

Rocky- (khud ko wapas akela paake apne Phone ko kaan se laga leta hai) Sir wo...

Dusri taraf se Yadav

"Ha.. mujhe Idea hai, koi aa gaya hoga.. aage batao"

Rocky- Gufran ko jarur kuch aisa pata chala tha jis wajah se use maar diya gaya, par ye Anokhi toh aisa kuch nahi kar rahi thi.. na hi hamare liye kisi prakar ki koi jasusi phir ye..

Dusri taraf se Yadav phone pe apne ek ek sabd pe jor dete hue

"Wo sab mat dohrao jo main janta hu.. tumhe kuch naya pata chal ki nahi ?"

Rocky man hi ek baar apne senior Yadav ko khadush bolta hai aur phir aage kehta hai

"Es Gaon main jo kuch bhi ho raha hai uske taar yaha k ek pariwar se jude hai.. aur"

Yadav- (Apni kurshi pe apni estithi badalte hue) aur kiya.. ?

"Yaha ka jungle.. aisa lagta hai jo kuch bhi hai uski wajah jungle k andar hi hai"

Yadav maano apna faisla sa sunate hue

"Toh intizar kis baat ka kar rahe hai.. pata karo, aur yaad rahe pichli baar tumne jo kaand diya tha usse tumhe bahar nikalne k liye main kiya kiya kara tha

Ab ummid karta hu tum meri ummid pe khare utroge"

Rocky- Mujhe sab yaad hai.. aur wapas mujhpe jo barosha kiya hai wo tutega nahi

Yadav- Maine pehle bhi kaha hai.. tum apna kaam apne hisab se karo, bus mujhe natija chahiye

Rocky- Yes Sir

Eske baad Yadav aur kuch bolne ya Rocky ki taraf se sunne tak ka intzar nahi karta aur phone cut jata hai

Rocky Phone ko jaib main wapas se rakhte hue.. ek lambi si saans leta hai aur dur faile junglon ko dekhte hue

"Hmm.. pata toh karna hi hoga"

Rocky apni car se apna camera nikalta hai aur use apne gale me daal leta hai aur phir car ko ache se lock aur check karne k baad use wahi chor k Gaon k Jungle ki taraf akela hi paidal chal padta hai

Waise toh yaad hi hoga.. par wapas se bata deta hu

Sundarpur Gaon kuch aisa hai jise dekh k aap keh sakte hai ye aaj bhi bahari Duniya se puri tarah kata hua hai

Or eski Sabse Badi wajah hai 'Thakur Balwant Pratap Singh' aur unke Purvaj.. waise kehte hai kabhi esi Pariwar k log yaha k Raja hua karte thay

Yaha aaj bhi Sahukari jaisi rudhiwadi parampara mil jayegi, toh Bank jaisi suvidhayen bhi

Waise dono hi cheezon pe hukum 'Thakur Balwant Pratap Singh' yani 'Thakur ji'.. ka hi chalta hai

Gaon ki abadi achi khasi hai, yani yaha logo ki tanik bhi kami nahi hai.. khaskarke Ladkiyon aur mahilaon ki qki jadatar mard toh kaam ki talash main Gaon se bahar hi chale jate hai

Rocky chalte hue jungle k bilkul pass aa chuka tha.. jaha jungle k andar se Jhingur ki dhimi dhimi par ajeeb si daravani aawaz si aa rahi thi

Aisa sayad itne sannate ki wajah se tha

Rocky- (Aage badne se pehle charo taraf dekhte hue) hmm.. maine us Pahalwan ko kai baar esi taraf se jungle main aate jaate dekha hai, aakhir yaha itne ghane jungle main karne kiya ata hai ?

Asal main Rocky ne Yadav ko puri baat nahi batayi thi.. wajah bhi sidhi thi ki abhi khud use sab pata nahi tha

Rocky jabse Gaon aaya hai tabhi se apni chaan bheen main lag gaya tha, jaha use pata laga ki Thakur ji k sabse kareeb logo mein ya toh uske 2 gunde jaise aadmi hai.. ya Pahalwan

Esliye Rocky ne Pahalwan k bare pata karna suru kiya toh usne paya ki wo aksar chori chupe jungle main ata jata hai.. aur esi karan aaj wo khud yaha khada tha

Waise agar aap sabhi Pahalwan ko bhool gaye hai toh yaad dila du ki Gaon ki 'Anaj mandi' ko sambhalne ka kaam yahi karta hai

Rocky charo taraf dekh k pakka karta hai aur phir jungle k andar pravesh kar hi jata hai

Jungle k bare main agar likhu toh ye Gaon ki उत्तर disha main ek aisa ghana jungle hai jiska koi ant nahi..

ye jungle itna ghana hai ki jungle k beech main Suraj ki roshni tak nahi pahuchti

Esliye koi bhi Jungle k jada andar jane ki galti nahi karta

Waise es Jungle k thoda hi andar kai khubsurat chote chote chupe talab bhi hai.. jaha Gaon k kuch manchale aur Manchali apni bhookh mitane aate hai

Aur konsi bhookh.. ye toh aap samajh hi gaye honge 😉

Par koi bhi jungle k jada andar jana pasand nahi karta.. ya sayad kisi ki bhi jungle k aur andar jane ki himmat hi nahi hoti

Aur eski kuch wajah Gaon main prachalit kai kisse kahaniya hai

Gaon k kai bade budhon ka kehna hai ki aksar yaha Jane wala jaldi laut k nahi aaya

Phir aisi jagah Pahalwan kiya karne ata hoga.. esi baat ne Rocky ko uspe saq karne k liye majbur kar diya tha, aur usi baat ka pata karne aaj wo khud es jungle main pravesh kar chuka tha

Jaldi hi Jungle ko paar karta hua Rocky kaafi aage nikal ayaa tha.. sayad jungle k beecho beech aa chuka tha wo

wo baar baar peeche mud k dekhta bhi ja raha tha ki koi hai toh nahi

Puri satarkta k sath wo aage bad raha tha ki sirf uske pairon k neeche aane waale sukhe patton ki aawaz hi us jungle k sannate ko tod rahi thi ki tabhi achanak se Rocky ki peet pe koi sard cheez aake chuti hai

"Kon hai be"

Rocky ek police wala tha.. esliye aisi cheezon se darna usne nahi seekha tha

Rocky- (Jaldi se apne gale main pade camera ko thamte hue) wo.. main jungle main anokhe pakshiyon ki photo leta hu.. photographer.. hu

Rocky darne ka aisa natak karta hai maano abhi mut padega.. jispe wo aadmi has padta hai

"Chal be.. munh meri taraf kar"

Rocky darte uski taraf dekhta hai.. aur us chehre ko dekh k Rocky man hi man khus ho jata hai

Rocky k man main ek hi baat aati hai

'Kuch toh gadbad hai es jungle main.. warna Thakur ka ye kutta yaha banduk liye kiya kar raha hota'

Rocky jab mudta hai toh dekhta hai ki uski peet pe wo sard cheez ek banduk hi thi jo abhi bhi usi aadmi k hathon main thi

Wo aadmi apne tambaku waale gande munh.. jispe bade bade chaichak k daag thay, aur aise gande munh se haste hue Rocky ko uper se neeche tak dekhta hai aur phir ghusse se uski taraf banduk dikhate hue kehta hai

"Tu toh bada chikna sehri hai.. sach sach bata kiya kar raha hai yaha"

Rocky usi prakar kaanpte hue wapas se apna camera dikhate hue

"Photo.. main.. main photographer hu.. wo main"

Wo aadmi Rocky ko uper se neeche tak dekhta hai aur phir bina kuch kahe aage badkar uske gale se camera kheech leta hai..

Rocky ka man toh karta hai use yahi nipta de par apne ghusse pe kabu rakhta hai

Aadmi- sun pe chikne.. tu sehri lag raha hai esliye chor raha hu, par aaj k baad es Jungle main dikha toh goli seedha Gand pe marunga.. wo bhi ched main banduk ki nali ghusa k samjha..

Rocky jaldi se ha main sar hilata hai maano bahut dar raha ho

Aadmi- chal nikal yaha se..

Rocky bina kuch kahe wapas jungle k bahar ki taraf chal padta hai.. wo kai baar peeche mud k us aadmi ko dekhta hai jo uska camera cheen k has raha tha

Rocky jungle k bahar aakar

"Yani jo kuch hai.. uska pata esi jungle se chalega, par es jungle main aakhir aisa kiya chal raha hai jiske liye Thakur ka khas kutta.. 'Kaaliya' yaha ki rakhwali kar raha hai

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कालिया एक 40-42 साल का गुंडा है.. जो पिछले 5-7 सालों से ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह यानि 'ठाकुर जी' क लिए काम करता आ रहा है

पूरी तरह हरामी और अय्याश किस्म का मर्द है.. पर अपने काम मैं माहिर और बेरहम

रॉकी कुछ पल क लिए कुछ सोचता है और अगले hi पल वो मुस्कुरा पड़ता है.. और जल्दी hi वो अपनी कार क अंदर बैठा था जहा सीट क नीचे हाथ दाल क वो दूसरा कैमरा निकल क अपनी बगल वाली सीट पे रख लेता है

रॉकी- ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह.. हम्म्म.. इसकी कुंडली बनानी hi पड़ेगी, पर उससे पहले मुझे हमारे खबरि गुफरान क परिवार से मिलना होगा.. सायद उनसे कुछ मदद मिल सके

रॉकी गुफरान क परिवार क बारे मैं सोचता है तोह एक पल क लिए उसकी आँखों क आगे गुफरान की खूबसूरत बेगम.. 'नसरीन' का भरा हुआ जिस्म और बड़ी बड़ी लटकती चूचियों का दृश्य उसकी आँखों क आगे नाच जाता है


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रॉकी- (अपनी पेंट क ऊपर से hi अपना लुंड मसलते हुए) उफ्फ्फ्फ़... किया भरा माल है साली... मज़ा आ जायेगा

सन 🖼️ #02

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मालती सुबह सुबह hi नाहा क पूजा पथ करके पुरे घर मैं सभी को बरी बरी से आरती दे रही थी

ऐसा करने क लिए आज उससे हर्षिता ने कहा था.. और एक माँ अपने बचे क लिए कुछ भी करने से पीछे कहा रहती है

आज घर कुछ ज्यादा hi भरा हुआ था.. वजह थी आज से ठीक 2 दिनों पहले जब्बार और मालती क बीच वो लड़ाई

वैसे उसे लड़ाई कहना सही नहीं होगा, ककी उसमे जब्बार ने जो किया.. मालती को पहले उसकी तनिक भी भनक नहीं थी

मालती का सर पे चोट कुछ ज्यादा नहीं आयी थी, पर सर पे एक छोटा सा घाव होने की वजह से खून निकल आया था

मालती बरी बरी से सभी औरतों को आरती देती है और फिर मर्दो की तरफ बाद चलती है

मालती की नज़रें बड़े जेठ जी 'महेंद्र' क पास बैठा अपने पति कुंदन पे जाती है

जहा उसे धियान अत है की कुंदन ने उसे पहले की कह दिया था की वो घर पे उस संदूक को लेके कोई बात न करे.. किसी से भी नहीं

इसलिए मालती जब अपने पति कुंदन क साथ घर आयी थी, तबसे उसने सब कुछ बताया.. बस उस संदूक को लेके कोई बात नहीं की

मालती आरती की थाली लिए हुए सबसे पहले सोनू क पास जाती है.. जहा सोनू मालती को देखते hi मुस्कुराते हुए खड़ा हो जाता है और आरती लेते हुए मुस्कुरा क कहता है

"वाह्ह्ह.. चची, आपने कोई नया साबुन लगाया है किया ?"

मालती को कुछ भी समझ नहीं आता इसलिए वो सवालिया नज़रों से पूछती है..

'की उसके कहने का किया मतलब है ?'

सोनू भी अपनी खूबसूरत चची की बात को उनकी नज़रों क इशारे से hi समझ जाता है और मुस्कुराते हुए कहता है

"वो आपसे बहुत अछि खुसबू आ रही है न"

मालती मुस्कुराते क उसे मरने का इशारा करती है और फिर ऐसे hi मुस्कुराते हुए वही आँगन मैं बैठे हुए सत्तू की तरफ चल पड़ती है

मालती, सत्तू क सामने आके हल्का झुक क कड़ी होती है तोह उसे मानो होश आता है और वो जल्दी से अपनी जगह से उठने लगता है जहा एक पल क लिए उसकी नज़रें अपने सामने मालती क ब्लाउज क अंदर की गहराई पे चली hi जाती है पर वो अपने आप को बहकने से रोक लेता है

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मालती इशारे से कुछ पूछती है

सत्तू- चची, मैं कुछ समझा नहीं.. ?

तभी वही आँगन से थोड़ा हटकर हर्षिता और शीला क साथ बैठी सविता बोलती है

"वो पूछ रही है.. ये सत्यम कहा है ?"

"अरे वो.. कुछ नहीं यही घर क पीछे गया है, पेशाब करने

वैसे मालती चची आज ऐसे इशारे से क्यू सवाल कर रही है ?"

सत्तू वापस अपनी जगह पे बैठते हुए अपनी बात पूरी करता है

जिसपे इस बार उसके सवाल का जवान देने का काम हर्षिता करती है

हर्षिता- (मुस्कुराते हुए) ककी मेरे मायके मैं एक पंडित जी है, उनका कहना है था की सुबह की आरती और पूजा समाप्त होने तक कुछ नहीं बोलना चाहिए.. वर्ण अनिष्ट होता है

शीला- (हस्ते हुए) हमारी भोली भली हर्षिता भाभी और उनके अन्धविश्वास

शीला की बात पे वह बैठा हर एक इन्शान है पड़ता है.. वैसे हस्ती तोह मालती भी है पर फिर भी वो आज हर्षिता की बताई इस बात पे चल रही थी

वो कहते है न.. की इन्शान जब निराश होता है तोह वो किसी भी बात को सच मान लेता है

वही एक कुर्सी पे बैठा हुआ महेंद्र अपने घर मैं ऐसा ख़ुशी का माहौल देख क मंद मंद मुस्कुराते हुए मालती को देखता है और कहता है

"बहु.. अब तुम्हारे सर की चोट कैसी है?"

मालती कुछ बोल पाती उससे पहले hi वीरू हस्ते हुए बोल पड़ता है

"अभी तोह भाभी आपके सवालों का जवान भी न देनी वाली, बेचारे आज हर्षिता की बातों मैं आके फास गयी है"

वीरू की बात पे इस बार पूरा घर khil-khila क है पड़ता है.. जिससे हर्षिता अपने पति को देख क बुरा सा मुंह बना लेती है, उसका ऐसा बच्चों सा रूठना देख क वीरू भी खुद को हसने से रोक नहीं पाटा

इस बार महेंद्र क ठीक पास बैठा हुआ त्यागी कहता है

"भाई.. मैंने इलाज किया है मालती बहु का, ऐसे कैसे ठीक नहीं होगी.. देखना 1-2 दिन मैं hi उसकी चोट पूरी तरह ठीक हो जाएगी"

त्यागी अपनी बात पूरी करते हुए अपनी जगह से उठता है और साथ hi अपने पास रखा हुआ झोला उठता है

सविता- अरे भाई साहब कहा चल दिए, वैसे भी इतने दिनों से न जाने कहा गायब हो गए थे ?

सविता अपनी बात कहते हु.. अपने हाथों को हल्का सा उठा का अंगड़ाई से लेती है, वैसे भी पिछले 2 दिनों से सायद hi कोई सही से सोया होगा



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सविता का ऐसा कामुक अवतार और उसके हाथों क यु उठने क कारन उसकी नमकीन बगल नज़र आने लगती है.. जिसे देख क त्यागी का मन किसी मयूर सामान नाच पड़ता है

त्यागी तोह.. एक पल क लिए सविता को ऐसे देखता है मनो अपनी खुवाईश को देख रहा हो, पर वो अपने इरादे अपने चेहरे से जाहिर नहीं होने देता

"मोनू क लिए एक खास जड़ी बूटी लेने हिमालयन गया हुआ था.. "

त्यागी की बात सुनते hi वह बैठा हर इन्शान आशा की किरण की तरह त्यागी को देखने लगता है

त्यागी एक एक करके सभी को देखता है और फिर एक लम्बी सी सांस लेते हुए कहता है

"अपने समस्त ज्ञान का इस्तिमाल करके मैं इस निष्कर्ष पे पंहुचा हु की मोनू क स्वस्थ करने का यही एकलौता तरीका है अब"

त्यागी अपनी बात कहते हुए अपने झोले से एक घास जैसी कुछ जड़ी बूटी निकलता है

सविता- ये तोह घास लग रही है ?

त्यागी- नहीं सविता भाभी, ये एक अलौकिक जड़ी बूटी है.. जो सिर्फ हिमालयन क एक खास स्तन पे मिलती है, और ऐसे प्राप्त करने क लिए hi मैं इतने दिनों से गाओं से बहार था

मालती की आँखों मैं आशा की किरण सामान आशु भर आते है, पर अभी वो कुछ बोल नहीं सकती थी

त्यागी- मैं.. मोनू क कमरे मैं जा रहा हु, अगले 10-15 मं तक कोई भी उस कमरे क करीब नहीं आएगा.. ककी इस जड़ी बूटी को जला क जो धुवा उत्पन किया जायेगा वो मोनू की अवस्था क हिसाब से लाभकारी होगा पर दूसरों क लिए हानिकारक हो सकता है

त्यागी अपनी बात पूरी करते हुए मालती की तरफ बढ़ता है और आरती लेता है..

मालती कुछ कहती नहीं पर उसकी आँखों मैं ममता और प्रेम से भरे हुए आंसू देख क कोई भी बता सकता था की इस समय उसे त्यागी उसके लिए किसी देवतुल्य सामान है

पर अभी इस घर मैं सायद की किसी को पता होगा की.. त्यागी असल मैं कैसा इन्शान है और उसके असल इरादे किया है

त्यागी अबकी बार सत्तू की तरफ देखते हुए

"बीटा मुझे थोड़ी सी आग चाहिए और एक गीला कपडा"

सत्तू तुरंत hi कुंदन और अपने पिता महेंद्र की तरफ देखता है, मानो उसे इजाजत मांग रहा हो

महेंद्र- मुंह किया देख रहा है.. त्यागी चाचा जो कहते है, तुरंत दे उन्हें

सत्तू अबकी जरा भी देरी नहीं करता और रसोईघर क पास जेक आग जलने का जुगाड़ लगाने लगता है.. जिसमें उसकी मदद क लिए शीला भी तुरंत उसके साथ hi रसोईघर की तरफ चल पड़ती है

त्यागी वापस से मालती और बाकि औरतो की तरफ देखते हुए

"आप सभी प्राथना करिये की आज मैं सफल राहु.. और..

चोरो वो सब, बाद मैं बताऊंगा"

हर कोई त्यागी से पूछना चाहता था की ऐसा किया है जो वो बताते बताते रुक गए, पर अभी घर का माहौल बहुत सी संजीदा हो चूका था.. इसलिए किसी ने भी अभी ये सवाल करना सही नहीं समझा

जल्दी hi शीला और सत्तू एक लोहे क तसले मैं आग जला क ले आते है

त्यागी- मुझे एक गीला कपडा भी चाहिए

इस बार ये काम क लिए हर्षिता आगे बढ़ती है.. और जल्दी hi त्यागी की जरुरत का सारा सामान उसके सामने था

त्यागी- ये सभी सामान मोनू क कमरे मैं रख दो, और याद रहे अगले 10-15 मं तक कोई भी उसके कमरे क नज़दीक नहीं आना चाहिए.. कुंदन ये तुम्हारी जिम्मेदारी है

त्यागी ने अपनी अंतिम बात कुंदन की तरफ देखते हुए कही

इसके बाद जल्दी hi त्यागी मोनू क कमरे क अंदर था और उसने अंदर जाते hi दरवाजा अंदर से बंद कर लिया, और अब सभी वापस से आँगन मैं बैठे हुए उसी कमरे की तरफ देख रहे थे

ऐसी बीच मालती ने सभी को आरती दिला दी थी.. इसलिए वो भी बाकि सभी औरतों क साथ आके बैठ गयी और अपने हाथ जोड़ क प्राथना करने लगी

घर मैं मौजद हर कोई यही प्राथना कर रहा था की आज कोई करिश्मा हो जाये.. सिवाए एक क.. यानि 'भानु'

ककी उसकी आँखों क आगे तोह कल शाम जो हुआ.. उसका एक एक दृश्य किसी चलचित्र सामान चल रहा था

जिसे याद करते हुए उसके जबड़े भींच गए.. और मुठिया खास गयी थी

भानु ग़ुस्से से बड़बड़ा पड़ता है


"मादरचोद.. त्यागी..."

जल्दी मिलता हु वापस, विथ अपडेट #13, सन #03
 
अपडेट #13



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सन 🖼️ #03

भानु पूरी तरह पसीने मैं भीगा हुआ था.. सुबह की ठंडक भी उसके बहते पसीने को रोक नहीं प् रही थी

वो अपने खेत की माइड पे उघि हुई घास को साफ़ कर रहा था, पर उसका हाथ कुछ ज्यादा hi जोरो से चल रहा था

मानो किसी बात का ग़ुस्सा कही और निकल रहा हो

भानु हासिये को जोरो से चलते हुए घास को मानो काटने की जगह उसका गाला राइट रहा हो

"मादरचोद.. ये जब्बार मेरा पूरा खेल बिगड़ देगा"

भानु एक पल क लिए सांस लेने क लिए रुकता है और वही माइड पे बैठ क बगल की नाली मैं बहते हुए ठन्डे पानी को अपने मुंह पे मरते हुए वापस अपने ग़ुस्से की आग उगलने लगता है

"ये साला जब्बार न जाने कुंदन क घर किया करने गया था.. और इस बहनचोद को मालती पे हमला करने क लिए किसने कहा था

कही कुछ ऐसा तोह नहीं है.. जिसके बारे मैं मुझे पता hi न हो

वो तोह ाचा है की मालती बच गयी.. ककी उसकी जिंदगी बर्बाद करने का हक़ सिर्फ मेरा है

पर उससे पहले उसका वो हाल करूँगा की साली मौत की भीख मांगेंगी"

भानु एक पल क लिए रुकता है और आसमान मैं उड़ती हुई चिड़िया को देख क वापस बड़बड़ाने लगता है

"जब्बार को इस समय अपना पूरा धियान मोनू को ख़तम करने पे लगाना चाहिए था.. ककी अगर वो सपोला जाग गया तोह मेरी सालों की म्हणत बर्बाद हो जाएगी

इस मादरचोद मोनू क कारन पहले 'अनोखी' को मरवाना पड़ा और अब ये साला जब्बार न जाने क्यू मालती क पीछे पद गया है.. आखिर बात किया है ?"

भानु जो हमेशा शांत और अपनी बुद्धि और सद्यन्त्र पे भरोषा रखने वाला इन्शान है वो इस समय पूरी तरह बैचेन था

भानु अपनी जगह से उठता है और पुरे खेत मैं एक कोने से दूसरे कोने तक चैहाल कदमी करते हुए ऐसी ठण्ड मैं भी आने वाले पसीने को अपने गमछे से पूछते हुए

"कल से इस जब्बार का भी कुछ पता नहीं चल रहा.. न जाने ये मादरचोद कहा गायब है

मिल जाये तोह इसका गाला अपने हाथ से दबा दू, मेरी सालों की म्हणत बर्बाद कर रहा है"

भानु न जाने ऐसे hi कबतक टहलता रहता है.. और अंततः थक क वही खेत पे किनारे लगे इमली क पेड क नीचे पड़ी हुई चारपाई पे जेक बैठ जाता है

भानु अपना फ़ोन निकलता है और उसे हाथ मैं लिए हुए कुछ पलों तक बस सोचता hi रहता है

और आखिर मैं एक निर्णय पे पहुंचते हुए किसी को फ़ोन मिलता है

दूसरी तरफ फ़ोन रेसिवेद होता है और एक परिचित सी आवाज़ आती है

"बस भानु भाई.. थोड़ी दिएर मैं हम सुंदरपुर गाओं क स्टेशन पे पहुंचने वाले है"

भानु एक लम्बी सी सांस लेता है.. जिससे उसकी निराशा का पता भी चलता है

दूसरी तरफ से

"किया बात है भानु भाई.. कोई परेशानी है, हम साधु बनने का पूरा सामान लेके आये है.. आप बस बताओ करना किया है ?"

अब तोह आप समझ hi गए होंगे की फ़ोन पे दूसरी तरफ और कोई नहीं बल्कि पन्ना है.. और उसके साथ हीरा भी

षडयंत्र अनुसार हीरा पन्ना को गाओं आना था.. जिसके लिए साडी तैयारियां हो चुकी थी, पर जब्बार ने जो कांड किया है उसकी वजह से काफी कुछ बदलना पद रहा है भानु को

भानु- (कुछ पलों तक सोचने क बाद) नहीं अभी क लिए तुम दोनों इस गाओं मैं मत आना..

हीरा- पर हम तोह सुंदरपुर स्टेशन पहुंचने hi वाले है ?, अचानक ये सब.. ?

भानु बिना सांस लिए जब्बार का मालती पे हमला करने वाली बात बताता चला जाता है.. वैसे पूरी बात तोह खुद भानु भी नहीं जनता था

हीरा- (दूसरी तरफ से फ़ोन पे) मैंने पहले hi कहा था, ये जब्बार मुझे भरोषा का आदमी नहीं लगता ?

भानु- (वापस अपनी जगह से उठ क खेत पे टहलते हुए) हम्म.. पर अब कुछ किया नहीं जा सकता, ककी जब्बार की इस हरकत की वजह से महेंद्र ने अपने पुरे परिवार को और सजग कर दिया है.. इसलिए अभी क लिए तुम दोनों इस गाओं मैं मत आना

हीरा- फिर अब..

भानु कुछ सोचने क बाद

"जिस ट्रैन पे अभी तुम दोनों हो वो यहाँ सिर्फ 2 गाओं पे रूकती है.. पहले हमारे सुंदरपुर गाओं और दूसरे एक और गाओं 'फुलवा' में

तुम दोनों सुंदरपुर न उतर क फुलवा गाओं मैं उतरना.. वह एक आदमी मिलेगा उसके साथ चले जाना, तुम्हारी खातिरदारी मैं कोई कमी नहीं आएगी

बाकि मैं जल्दी hi बताऊंगा आगे किया करना है ?"

भानु अपनी बात समझा क फ़ोन काट देता है और एक पल क लिए रुकता है और तुरंत hi दूसरा फ़ोन मिलता है.. और इस बार वो जिसे फ़ोन मिला रहा था उसके लिए उसकी स्क्रीन पे जो नाम नज़र आ रहा था वो था

'ठाकुर जी'

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भानु अपनी बात पूरी करके फ़ोन को चारपाई पे फैकता है और ग़ुस्से से जब्बार को वापस गाली देता है.. की तभी उसको किसी क हसने और ताली बजने का स्वर सुनाई पड़ता है

पहले से hi ग़ुस्से से लाल भानु जैसे hi मुड़के उस आदमी को कुछ सुनाने hi वाला था की वो रुक पड़ता है

ककी उसके सामने खेत पे माइड पे खड़ा हुआ वो आदमी जो हस्ते हुए ताली बजा रहा था वो और कोई नहीं बल्कि 'त्यागी' था

सन 🖼️ #04

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ठीक ऐसी समय दूसरी तरफ गाओं से दूर स्टेशन क पास एक टूटी और कभी भी गिरने जैसी इस्तिथि मैं कड़ी हुई झोपडी क अंदर

जब्बार उल्टा होक लेता हुआ था.. उसकी पीट पे किसी प्रकार की जड़ी बूटी का लैप गया हुआ था

जब्बार उसी प्रकार से लेते हुए अपना चेहरा उठा क पास मैं hi मिटटी क चूल्हे पे चाय बनाते हुए आदमी से बोलता है

"तुम्हारा ये एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगा, समय आने पे ऐसे hi तुम्हारे भी काम जरूर आऊंगा"

चूल्हे क पास बैठा हुआ वो आदमी जब्बार की तरफ देख क मुस्कुरा पड़ता है

"अरे जब्बार भाई, ये जग्गू तुम्हारे कुछ काम आ सका ये बड़ी बात है.. वैसे भी एक बार आपने भी ऐसे hi मेरी मदद करि थी

वैसे ये इतना गहरा घाव आया कैसे ?

ऐसा लग रहा है जैसे किसी शेरनी ने पंजा मारा हो"

जग्गू ने मुस्कुराते हुए चूल्हे की तरफ देखते हुए अपनी बात कही, पर उसकी बात मैं कही न कही एक कटाक्ष भी था.. जिसे सायद जब्बार अभी क लिए समझ नहीं पाया था

जब्बार- (जिसे अभी भी दर्द महसूस हो रहा था) कहे की शेरनी.. उसकी औकात तोह मैं दिखाऊंगा

जग्गू चूल्हे से चाय का बर्तन उतारते हुए

"कुछ कहा किया.. जब्बार भाई"

जब्बार- (जैसे अपने होश संभालता है) नहीं.. नहीं जग्गू कुछ नहीं

वैसे सायद आपको जग्गू याद नहीं होगा.. इसलिए फिर से एक बार थोड़ा बता देता हु

40-42 साल का जग्गू असल मैं एक चोर है

परिवार क नाम पे बस अकेला है है.. अपने मैं मस्त रहता है, लोगो से ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं

हाल ऐसा है की सुंदरपुर मैं बहुत से लोग तोह जानते तक नहीं की जग्गू नमक कोई व्यक्ति भी है

गाओं क स्टेशन क पास एक टूटी सी झोपडी.. और यही इसका घर संसार है

काम क नाम पे पूरी रात चोरी क लिए अस्स पास क गाओं मैं फिरता है और दिन मैं सोता रहता है

अगर किसी चीज़ का सौक है तोह बस 'छूट' का


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एक नंबर का ठरकी और दारू बाज है.. नासा भी खूब करता है, और इसके लिए नसे की पुड़िया बनाने का काम बांकेलाल करता है

घर या झोपडी की इस्तिथि की बात करू तोह ये स्टेशन वाले रस्ते पे उससे थोड़ा पहले है, झोपडी क आगे जामुन का एक पेड है, और पीछे बस घास और जंगल जैसा है

बहार hi जामुन क पेड 🌴 क पास एक पानी का हैंडपंप लगा हुआ है, जहा इसका नहाना और कपडे धुलने का काम होता है

वैसे ऐसे देख क लगता नहीं.. की ये कभी नाहटा भी होगा

झोपडी क अंदर जमीन पे hi एक गद्दा पड़ा है जो इसने स्टेशन से चुराया था.. और इस समय जब्बार ऐसी पे पड़ा हुआ है

कमरे मैं एक पुराण टीवी है और बताने की जरुरत तोह है नहीं की वो भी चोरी का है.. वैसे जग्गू इस टीवी पे जिसपे सिर्फ गन्दी गन्दी फिल्मे देखता है डीवीडी पे लगा क

कमरे मैं एक किनारे चूल्हा है, जिसपे आग जला क अपने लिए कभी कभी खाना बना लेता है.. और ऐसी पे वो इस समय जब्बार और अपने लिए चाय बना रहा था

वैसे ज्यादातर तोह स्टेशन क पास वाले ठेके से दारू और वही एक ढाबा है उसी पे खाना खा लेता है

जग्गू चाय को कप मैं दाल चूका था.. जब्बार जैसे तैसे दर्द दे तड़पते हुए उठता है और जग्गू क हाथ से चाय का कप ले लेता है

जग्गू वही एक तरफ बैठते हुए

"वैसे सुबह सुबह जब तुम दरवाजे पे ऐसी हालत मैं आये तोह मुझे यकीं hi नहीं हुआ की कोई तुम्हारा भी ये हाल कर सकता है.. वैसे बताया नहीं ये इतना गहरा झकम आया कैसे ?"

जब्बार चाय का घुट भरते हुए

"वो.. एक कुटिया ने हमला कर दिया था"

जग्गू- (मज़े लेते हुए) आप जैसे सैर का एक जरा सी कुटिया ने ये हाल बना दिया ?.. वैसे किया अपने गाओं की थी वो कुटिया?

जब्बार कुछ बोल नहीं पाटा बस जग्गू को खा जाने वाली नज़रों से देख क खुद को शांत कर लेता है

जब्बार- मत भूलो की एक बार ऐसे hi तुम चोरी करके भाग रहे थे और तब मैंने तुम्हे चक्की मैं छुपा क लोगो से बचाया था.. वो भी बिना किसी सवाल जवाब क

जब्बार, जग्गू को एहसास करवा देता है की उसका यु बार बार सवाल करना उसे पसंद नहीं आ रहा है

पर जग्गू तोह है hi महाहारामि.. वो अपने पीले पीले डाट दिखते हुए

"अरे भाई तुम तोह बुरा मान गए, मैं तोह बस इसलिए पूछ रहा था की किस्में इतनी हिम्मत आ गयी जिसने मेरे जब्बार भाई को भीगी बिल्ली दिया"

जग्गू बेचारे कुछ बोल नहीं पाटा बस बेज्जती का कड़वा घुट पिके रह जाता है.. पर जागु की बात से एक पल क लिए उसकी आँखों क आगे मालती का चेहरा जरूर नाच गया था


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जागु अपनी चाय का अंतिम घुट पीते हुए

"चलो मैं एक काम करता हु, अभी थोड़ी दिएर मैं जेक कुंदन से मिलता हु.. ताकि वो कुछ और मदद कर सके"

जब्बार जैसे अपनी जगह से उछाल पड़ता है, वो तुरंत बोल पड़ता है

"नहीं नहीं.. कुंदन या उसके परिवार मैं से किसी को पता नहीं चलना चाहिए की मैं कहा हु"

जग्गू मन hi मन मुस्कुरा पड़ता है

'यानि मेरा सोचना सही था.. गाओं मैं जो उड़ती हुई कबर है की जब्बार ने hi कुंदन क बेटे को मारा था, जिसकी वजह से उसकी ऐसी हालत है

उस बात मैं कुछ तोह सचाई है'

जागु अपनी ख़ुशी छुपाते हुए

"ठीक है.. जब्बार भाई आप जब तक चाहो यहाँ आराम से रहो

किसी को कभी पता नहीं चलेगा की आप कहा हो

आपका ये भाई है न"

जग्गू, जब्बार को भरोषा तोह दिला रहा था.. पर उसके दिमाग मैं एक अलग hi खिचड़ी पकने लगी थी

जग्गू मन hi मन कुछ सोचते हुए जब्बार की तरफ देखता है और मुस्कुरा पड़ता है

'अगर दिमाग से काम लू.. तोह सायद ये जब्बार उस मालती तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है'


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