बुच्ची ----कच्ची कली
की कला
तब तक इमरतिया की निगाह बड़े कटोरे पे पड़ी और घड़ी पे भी, बुकवा ( उबटन ) जस का तस था और अभी भी एक घंटा बाकी था ग्रहण के टाइम में,
और बुकवा लगाने के साथ ही बात भी शुरू हो गयी, और किसकी बुच्ची की.
और देवर ने मान लिया की हुआ तो बहुत कुछ,... लेकिन वो नहीं हुआ जो भाभी चाहती है देवर और ननद के बीच में हो,
इमरतिया की हाथ में दम बहुत था और मालिश के गुन भी, सब थकान, रात भर की जगन पल भर में निकाल देती थी थी, पंजो और पैरों से होती हुईं इमरतिया की ऊँगली सूरजु की जांघों तक पहुँच गयी थी,
और वो सोच रही थी एक तरह से अच्छा ही हुआ, बुच्ची पहली बार चुदे उसके सामने.
खूब चीख पुकार हो, खून खच्चर हो, उसके सामने तो सब लाज सरम बुच्ची के पिछवाड़े घुस जायेगी, फिर तो बाइस पुरवा के हर पुरवा के जो लौंडे है, सब इमरतिया के देवर ही तो लगेंगे, सब को चढ़ायेगी, बुच्ची के ऊपर। वरना चुपके से चुद जाती तो, फिर तो जंगल में मोर नाचा किसने देखा और मुकर भी जाती, मजे भी ले लेती।
" अरे देवरु, आज ही, खाना लेके आएगी न तो बस खाने के बाद मिठाई में आज अपनी ननद को बुच्चिया को ही खिलाऊंगी , जैसे मुझे हचक के पेला था बस वैसे, अरे जब फटेगी तभी तो मजा आएगा, जब झिल्ली फटेगी, चिल्लायेगी, खून खच्चर होगा तब इस मुस्टंडे को असल मजा आएगा "
मोटे तन्नाए लौंड़े को पकड़ के दूसरे हाथ से छोटी कटोरी से पेसल तेल उसके ऊपर टप टप चुआते भौजी ने चिढ़ाया, फिर सुपाड़े को दबा के उसके पेशाब के छेद को खोल के, झुक के भौजी ने पहले जीभ से सुरसुरी की, फिर बूँद बूँद वो तेल उस छेद में चुआना शुरू कर दिया
सूरजु सिंह की हालत खराब हो रही थी जैसे लुढ़कते पुढ़कते तेल की बूंदे, अंदर सरक रही थीं, नीचे तक छरछरा रहा था , जैसे कोई खूंटे के नीचे चिकोटी काट रहा हो, झंडा फहर फहर फहरा रहा था।
लेकिन भौजी कौन जो देवर के मन के डर को आँखों की घबड़ाहट को बिन बोले न समझ जाए और इमरतिया भी समझ गयी, पहचान गयी, फिर दोनों हाथों अपने उसने वो तेल लगाया और क्या कोई ग्वालिन मथानी मथेगी, जिस तरह देवर की मथानी पकड़ के इमरतिया ने मथना शुरू किया, और सूरजु की परेशानी को पढ़ के इमरतिया ने बोल दिया,
" अरे ये तो नहीं सोच रहे हो की अभी उमरिया की बारी है, अभी कैसे इतना मोटा, तगड़ा, "
और बिन बोले सूरजबली सिंह की आँखों ने हामी भर दी और इमरतिया ने कस के उस खूंटे को भींच दिया,
" एकदम बुद्धू हो. .... तोहार दुलहिनिया को ओकर महतारी बाप, सोच समझ के,भेज रहे हैं न, दस बार आये थे बड़की ठकुराइन के पास , और काहें भेज रहे हैं, चोदवाने के लिए न. तोहरी दुलहिनिया को भी मालूम है ओकरे महतारी को भी मालूम है की बिदा हो के आएगी तो पहली रात ही पेली जायेगी, झिल्ली फटेगी, कोरी गुल्लक रात के बारह बजे के पहले फोड़ी जायेगी,... तो बोलो उसको पेलोगे की नहीं, "
" पेलुँगा, काहे नहीं पेलुँगा लेकिन वो तो, " कुछ झझकते हुए सूरजु ने कहने की कोशिश की और भौजी ने हड़का लिया,
" वो तो क्या, अरे बुच्चिया उससे साल भर ही तो छोट है, तो काहें नहीं घोंटेंगी?
तोहसे ज्यादा तो वो गर्मायी है और तू नहीं फाड़ोगे तो कोई और चढ़ जाएगा.
आज ही जब खाना ले के आएगी, चुदेगी वो, चोदोगे तुम और चुदवाउंगी मैं उसे अपने सामने आज ही, अपने हाथ से पकड़ के ये खूंटा सटाउंगी, घुसाना तुम, और तुम सुने नहीं कल का तोहार महतारी का कह रही थीं तोहरी बुआ, बुच्ची क महतारी के बारे में , जब बुच्ची क उम्र क थीं तो ३६ लंड घोंट चुकी थीं, और शीलवा बुच्चिया क सहेली को देखो हो "
" काहें नहीं, पूरब पट्टी वाली. कल वो भी बहुत मस्त नाची थी " मुस्कराते हुए सूरजु बोले,
" चहिए उसकी? बहुत मन कर रहा है इसका " मुठियाते हुए देवर को चिढ़ाया और जोड़ा,
" और वो साल भर के ऊपर से घोंट रही है , आगे भी पीछे भी, खुद मुन्ना बहू ने कई बार देखा है, एक बार तो भरौटी के दो लौंडो के साथ मुन्ना बहू ने गन्ने के खेत में पकड़ा था, तो सोचो बुच्चिया से साल भर छोटी रही होगी जब पहली बार घोंटा होगा, "
खूंटा फनफना रहा था पूरे २०० ग्राम तेल इमरतिया ने उसमे सोखा दिया था और अब घंटे दो घंटे झंडा झुकने वाला नहीं था ,अब कंधे पे बुकवा लगाते इमरतिया ने पुछा,
" अच्छा देवर ये बताओ, अंगूर कैसा लगता है खाने में मुंह में लेकर चुभलाने में "
" बहुत पसंद है मुझको जबरदस्त स्वाद होता है " सूरजु बोले तो इमरतिया ने थोड़ा और बुकवा लेकर छाती पर लगाते हुए अगली पसंद पूछी
" और बड़े बड़े दसहरी आम "
" अरे भौजी, हमरे बाग़ में हम दस पेड़ लागए है, कुल १०० पेड़ हैं आम के लेकिन हमरे बाग़ के उन दस पेड़ों के दसहरी का स्वाद ही अलग है खूब बड़े बड़े रसीले, मैं तो सीधे पेड़ से तोड़ के ही खाता हूँ "सूरजु ने मुस्करा के बोला
" और जौनपुर क खरबुज्जा, खूब रसीला होता है " इमरतिया ने आँख नचा के कहा, और सूरजु बात समझ गए और बोले
" हर फल क स्वाद अलग रस अलग, मजा अलग लेकिन मजा तो सबमे आता है और सब का स्वाद लेने का मन करता है "
बस यही बात तो मैं भी कह रही थी, हर उमर क लड़की का औरत का मजा अलग है और सबका स्वाद लेना चाहिए, आम का भी और अंगूर का भी लेकिन जैसे अंगूर का मजा अलग, खाने का तरीका अलग और रसीले आम का मजा अलग, खाने का ढंग अलग, तो ओहि तरह से चूँचिया उठान वाली, बुच्ची क समौरिया हों, उससे भी बारी कुँवारी हो उनका रस अलग है, जब छोट छोट अमिया कुतरोगे न तब लगेगा इमरतिया भौजी केतना सही कह रही थीं " बुकवा ख़तम करते इमरतिया भौजी ने गुरु ज्ञान दिया,
बुच्चिया के बारे में सोच सोच के छोटे ठाकुर मुस्करा रहे थे और इमरतिया बड़की ठकुराइन क मुन्ना बहू से हुयी बात सोच के मुस्करा रही थी जो कल रात वो बोलीं थी की अपने टोले क कउनो एकदम कच्ची कली, अरे बुच्चिया से भी छोट हो, लेकिन तन और मन दोनों से मजबूत और रसीली हो, और यही बात इमरतिया ने खुद सूरजु की माई से कही थी,
" अरे खाली बुच्चिया नहीं, तोहरे पूत से दुलहिनिया के आने के पहले दो चार क झिल्ली फड़वाउंगी, फिर हिम्मत भी रहेगी और झिझक भी खतम हो जायेगी, जउने दिन दुलहिनिया आएगी, ओकरे ठीक नौ महीना बाद पोते क मुंह देखबू, तब चांदी का चार अंगुल चौड़ी पायल लेब "।
बुकवा भले ख़तम हो गया था लेकिन भौजी की शिक्षा और बदमाशी नहीं कम हुयी थी, खड़े लंड को बायीं मुट्ठी में कस के पूरी ताकत से भींचते चिढ़ाया,
" जो कच्ची कोरी को पेलोगे न तो ऐसे कस के निचोड़ लेगी, एक इंच आगे नहीं बढ़ने देगी अपनी बुरिया में "
अब सूरजु सिंह भी मजा ले रहे थे, अपनी भौजी से बोले,
" अरे तो हमार भौजी सिखाएंगी न और उनकी पढ़ाई के बाद एक से कच्ची कली आ जाए आपका देवर पीछे हटने वाला नहीं "
इमरतिया यही सुनना चाहती थी। और उसने कच्ची कलियों की फाड़ने की ट्रेनिंग शुरू कर दी
"पहली बात जो खुद टाँगे न फ़ैलाने को तैयार हो, तुझे देख के जिसकी चूत में चींटे न काटने लगे उसे छूना नहीं लेकिन जिसकी गीली हो जाए, जो खुद घोंटने के लिए तैयार हो उसकी छोड़ना नहीं, न उमर न जात पांत न रिश्तेदारी "
इमरतिया ने पहली काम की बात बतायी और उसके पहले सूरजु सिंह पूछें की कोई कच्ची अमिया वाली लाजवंती होगी, नयी नयी जवानी की सांकल खटकाती, तो किऐसे पता चलेगा की उसका मन है देने का, इमरतिया ने सब निशानी गर्मायी लौंडिया की बता दी, साथ में बुकवा छुड़ा दिया
" देखो लाला, अगर तोहरे देखने से मुस्कराने लगे तो सीधे उसकी कच्ची अमिया को, टिकोरों को देखो। नहीं देने का मन होगा तो गुस्सायेगी, देने का मन होगा तो लजायेगी, छुपाएगी, फिर दिखाएगी, और उससे बात करोगे तो आगे बढ़ के बात करेगी, और एक बार ज़रा सा भी बात किया, छूने पे भले ही पहली बार छटके, अगर दूसरी बार नहीं छटकी तो समझ लो टांग फैला देगी और ऐसी लौंडिया को बिन चोदे छोड़ देने से बहुत पाप लगता है और अगर उसकी झिल्ली एक बार फाड़ दिए न तो बहुत पुण्य मिलेगा "
जो संशय आज सुबह उनको बुच्ची के साथ हुआ था वही फिर हुआ "
लेकिन भौजी उसकी तो एकदम कसी, टाइट चिपकी होगी, मुश्किल से दरार " अब सूरजु सिंह अपने मन का डर खुल के बोल रहे थे।
" उसकी भी तरकीब है बताती हूँ , देखो पहले गोद में बिठा के चुम्मा चाटी करो, बहलाओ फुस्लाओ, फ्राक के ऊपर से चूँची पकड़ो फिर सीधे कपड़े के अंदर हाथ डाल के थोड़ी देर चूँची सहलाओ, दबाओ, कस के मसलो, फिर टिकोरे मुंहे में ले के काटो और एक हाथ से जांघ सहलाधीरे धीरे आगे बढ़ते हुए सीधे चुनमुनिया पे, वो जांघ सिकोडेगी, छिनाल पन करेगी मतलब लंड लेने के लिए बेताब है,
तो जबरदस्ती जांघ खोल के बुर पे ऊँगली से फांक दोनों अलग अलग करो, थोड़ी देर में गरमा जाएगी "
लेकिन सूरजु को सीधे काम से मतलब था तो उन्होंने असली सवाल पूछ दिया
" लेकिन पेलते समय छिनरपन किया, और घुसेगा कैसे, फिर बिल उसकी ? "
" अरे बहुत आसान है, आज बुच्ची की पेलवाउंगी न अपने सामने फिर दो चार और एकदम ओहु से कच्ची, अरे भौजाई काहें हैं तो समझ लो, पहली बात कोई जल्दीबाजी नहीं, और दूसरे बिना झिल्ली फाड़े, बिना चोदे छोड़ना मत चाहे जितना चिचियाये, चिल्लाये,।
तो पहले अपने मोटे मूसल से उसकी बिलिया पे रगड़ रगड़ के गरमा के उसको महसूस करा दो, लंड छूने पे इतना मजा आ रहा है तो अंदर घुसने पे कितना मजा आएगा, उसक बाद सरसों का तेल, कउनो चिकनाई, कुछ ना हो तो थूक ही लगा के ऊँगली से आराम आराम से उसकी फांक फैलाओ, वो अपने आप टांग सिकोड़ने की कोशिश करेगी तो पहले से अपने दोनों पैर उसकी टांगो के बीच फंसा के पूरी ताकत से फैला के रखना जिससे लाख कोशिश करे तो टांग न सिकोड़ पाए। बस थोड़ी देर में बुर पनिया जायेगी, तो गच्च से ऊँगली एक पोर तक पेल दो और थोड़ी देर कुछ मत करो। उसकी बुर को अंदर लेने की धीरे धीरे आदत लग जायेगी, अब हलके हलके उस ऊँगली को और ठेलो, गोल गोल घुमाओ दो चार मिनट तक साथ में चुम्मा चाटी चूँची क मिसवाई, फिर ऊँगली निकाल के सुपाड़ा फंसा दो, तेरा इतना मोटा है एक बार में फंसेगा नहीं तो बस थोड़ा जितना फंसे बस बहुत धीरे धीरे से धक्का देते, धकेलते, कम से कम आधा सुपाड़ा फंसा दो। बस हो गया काम "
" लेकिन, पेलुँगा नहीं ? " सूरजु बेसबरे हो रहे थे।
" नहीं एकदम नहीं, बहुत कच्ची अमिया खाने के लिए बेसबरे हो रहे हो थोड़ा इन्तजार करो देवर जी "
हँसते हुए इमरतिया बोली और खूंटे को दुलार से सहलाने लगी, फिर जोड़ा,
" पेलना खूब हचक के, लेकिन दो चार मिनट सुपाड़ा अंदर घुसे रहने देना और जब उसे लगे की अभी तुम नहीं पेलने वाले हो, देह ढीली कर दे, बस उसी समय दोनों हाथों से कस के उसकी कलाई पकड़ लो, चुम्मा लेते होंठों से उसका मुंह भींच लो और कस के पूरी ताकत से पेल दो। वो पानी से निकली मछली की तरह तड़पेगी, देह ऐंठेगी, लेकिन बिना रुके बस पेलते रो धकेलते रहो पूरी कमर की ताकत लगा दो। चार पांच धक्के के बाद जब सुपाड़ा घुस जाए, धंस जाए, अड़स जाए तो धक्के मारना बंद, लेकिन न उस स्साली कच्ची अमिया वाली की कलाई छोडो न मुंह खोलो,
और दो चार मिनट के बाद मुंह खोल दो, होंठो से लेकिन कलाई मत छोड़ना, वो चीखेगी, सिसकेगी, सुबकेगी, बोलेगी निकाल लो लेकिन अभी तो खेल शुरू हुआ है । देह पटक के थक जायेगी, फिर पेलना शुरू करो, एकदम धीरे धीरे लेकिन आगे पीछे नहीं सिर्फ आगे और जब लंड थोड़ा और अंदर घुस जाए तो समझ लो अब झिल्ली आ गयी है।
उस समय फिर चुम्मा चाटी, और अबकी मुंह में जीभ डाल के थोड़ा सा लंड बाहर खीँच लो, हलके हलके, वो समझे की बाहर निकाल रहे हो बस रुक जाओ और फिर पूरी ताकत से एक बार में ही सब जोर लगा के धक्का मारो, एक दो बार,... चार बार,.... झिल्ली फटेगी, खून निकलेगा तेरे मूसल में भी खून लगेगा लेकिन रुकना मत और आठ दस धक्के के बाद रुकना और अब मुंह खोल दो उसका "
" बहुत रोयेगी, चिल्लायेगी " सूरजु परेशान होकर बोले
" अरे बुद्धू वही तो मजा है बाद में वही सब चिढ़ाएँगी " हँसते हुए इमरतिया बोली और छेड़ा,
" अरे देवर तोहरे अस मुलायम दिल सब मरदन का हो न तो कउनो लड़की क फटेगी ही नहीं . बिना बेरहमी के जोर जबरदस्ती के मजा आता नहीं और तोहसे ज्यादा लड़कियों को मालूम है लेकिन बस दो बात और एक तो कच्ची कली के साथ कभी पहली चुदाई में ये बांस पूरा मत घुसाना लेकिन दो तिहाई से कम भी औरपानी पूरा अंदर। पर जब दूसरी चुदाई करना तो बांस एकदम जड़ तक, बच्चेदानी पे ठोकर लगनी चाहिए और कभी बिना दो बार चोदे बिना नए माल को छोड़ना मत, पहली बार हदस जाती है, फट तो जाती है, डर ख़तम होजाता है , लेकिन लड़की को असली मजा जब पहली बार चुद रही हो तो दूसरी बार की चुदाई में ही आता है। लेकिन एक बार और ध्यान रखना, इमरतिया ने अपने देवर के अब एकदम तन्नाए, खड़े खूंटे को पकड़ के कस के मुठियाते समझाया
" का भौजी। "
एक आज्ञाकारी देवर की तरह सूरजु बोले, और कौन देवर जिसकी भाभी उसे कच्ची कलियाँ दिलवाने वाली हो, उन पर चढ़ने की ट्रिक समझा रही हो, ऐसी भौजी की बात टालेग।
" नए माल को पहली दूसरी बार , एक दो दिन खाली ऊपर चढ़ के चोदना, टांग उठा के, फैला के, दुहरी कर के लेकिन सिर्फ ऊपर चढ़ के, और बहुत हुआ, दो चार बार ढंग से कचर दिए हो अच्छे से तो चलो साइड से भी, लेकिन एक दो दिन बाद नई वाली को भी और तोहार भौजी अस हो, तो फिर तो, "
लेकिन इमरतिया की बात काट के इस मामले में भी अपने पढ़े लिखे होने का परिचय देते हुए सूरजु बोले,
" लेकिन भौजी, हम तो सुने थे की ६४ आसन, और वो दिनेशवा जउने दिन हम अखाडा छोड़े यही दिन, असली कोकशास्त्र ८४ आसान सचित्र, बड़ा सजिल्द दिया, उसमे तो, "
और अब बात काटने की बारी इमरतिया की थी, खिलखिलाते हुए भौजी बोलीं,
" देवर तू न एकदम बौरहा हो, असली बुद्धू , अरे कउनो मर्द को आठ दस तरीका भी आ जाए तो बहुत है, और १२ -१४ तरीका तो तोहें सिखाय पहड़े के हम दुलहिनिया के आने के पहले पक्का कर देंगे, पेलना मन भर उस पढ़ी लिखी को, लेकिन असली चीज है प्रैक्टिस और जम कर अलग उम्र के साथ, एकदम कच्ची कली से लेकर तोहार महतारी अस, तो देखो कच्ची कली के साथ तो पहले ऊपर चढ़ के और ओहु क अलग अलग, टांग फैलाये के, टांग कंधे पे अपने रखे, दुहरा कर के, फिर साइड से, पीछे से, लेटा कर ऊपर चढ़ के पीछे से, फिर बैठ के गोदी में बैठा के, खड़े खड़े, लेकिन जो मजा निहुरा के पेलने में है वो किसी में नहीं। दुलहिनिया को तो जरूर दूसरे नहीं तो तीसरे दिन ही निहुरा देना, चौथी आने के पहले तो एकदम कचर देना, बुच्ची को तो दूसरी बार में ही निहुरा के,
सूरजु सिंह ध्यान से इमरतिया को देख रहे थे, एक एक बात सुन रहे थे, गाँठ बाँध रहे थे