Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 49 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

जो देखे उसे, होश उड़ जाए आसमाँ,

हक़ीक़त में ये कुदरत का इक अजब ख़ज़ाना है।

बड़ी चीज़ है ये, बड़े काम की चीज़ है,

कि इक बार जो चूमें, तो फिर सारा जहाँ दीवाना है।

इन पे गिरते हैं अगर फूल भी, तो दर्द करें,


इन पे लिख दूं मैं ग़ज़ल, तो कोई पढ़ने वाला है?

























 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

वैशाली की छुट्टियाँ खत्म हो गई हैं, इसलिए वह ऑफिस जाने की जल्दी में है.. नहाते समय वैशाली की असंतुष्टता छलक आती है..

नाश्ता करते वक्त शीला कहती है की वह वैशाली की ऑफिस आएगी.. वैशाली के ऑफिस जाने के बाद, शीला ऑफिस जाने के लिए बेहद आकर्षक ढंग से तैयार हो जाती है.. रास्ते में एक ऑटो वाले की हरकतों से परेशान होकर वह उसे ऑटो से उतरने से पहले डांट देती है..

ऑफिस पहुँचने पर पीयूष (जो पहले उसका पड़ोसी रह चुका हैं) उससे मिलता है और उसे अपने केबिन में ले जाता है,, वैशाली भी वहाँ आती है, लेकिन एक जरूरी कॉल आने पर चली जाती है..

केबिन में अकेले में पीयूष और शीला पुरानी यादों को ताजा करते हैं.. पीयूष शीला के आकर्षक शरीर, खासकर उसके स्तनों को देखकर बेकाबू हो जाता है और उन्हें छूने की जिद करने लगता है.. शीला पहले मना करती है, लेकिन उसे उकसाती भी रहती है.. अंत में वैशाली के केबिन में आने से पहले शीला पीयूष से कहती है कि वह अभी कुछ दिनों यहाँ है, कोई मौका मिलेगा तो जरूर..

चलिए देखते है की दूसरी तरफ मदन अपने घर पर क्या गुल खिला रहा है..

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आज मदन ने कुछ जल्दी ही खाना खा लिया.. वैसे भोजन तो नाम मात्र का ही किया था उसने.. दिमाग में तो उसके वही उधेड़बुन चल रही थी की कैसे रूखी को रात में बुलाने के लिए मनाया जाए..

सुबह रूखी के साथ जो मजा आया था.. आहाहाहा..!! उसके बड़े बड़े खरबूजों को निचोड़कर मीठा मीठा दूध चूसते हुए उस गदराए भोसड़े को चोदने में जो आनंद आया था.. वाह..!! आत्मा प्रसन्न हो गई थी..!! मन तो था रूखी के साथ पूरी रात बिताने का.. रूखी ने कहा था की कोई बहाना बना कर रखें ताकि वो पूरी रात यहाँ रह सकें.. पर कुछ सूझ ही नहीं रहा था..!! इस बारे में शीला का जवाब नहीं था.. ऐसी परिस्थितियों में उसका दिमाग इतना तेज चलता था की वह कोई न कोई तरकीब निकाल ही लेती थी.. पर अभी शीला यहाँ थी नहीं.. और होती तो भी रूखी को घर बुलाने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल हरगिज नहीं करती.. उल्टा एसी सोच के बदले मदन की गांड फाड़ देती..

क्या करूँ.. क्या करूँ.. कुछ नहीं आ रहा था मदन के दिमाग में.. वह सोच सोच में कमरे के चक्कर काटने लगा..

तभी मदन के मोबाइल की घंटी बजी.. अरे.. रूखी का फोन होगा शायद.. मदन ने झपटकर अपना फोन उठाया.. स्क्रीन पर देखा तो शीला का फोन था

"हैलो.." थोड़े सूखे स्वर में मदन ने कहा

"क्या कर रहा था?" शीला की आवाज

"कुछ नहीं.. बस ऐसे ही बैठा था.." मदन ने कहा

शीला: "खाने के लिए क्या कर रहा है? मालती मौसी के यहाँ से टिफिन तो मँगवा लेता है ना..!!" घर से दूर गई पत्नी की यह स्वाभाविक चिंता.. पति के दो वक्त के खाने के बारे में..!!

"नहीं यार.. मौसी के खाने में बहोत तेल होता है.. मेरा पेट डिस्टर्ब हो जाता है"

शीला: "तो बोल देता की तेल काम डाला करो.. टिफिन नहीं मँगवा रहा तो खाने का क्या कर रहा है?"

मदन ने तंग स्वर में कहा "कुछ नहीं यार.. झोमेटो या स्विगी से कुछ न कुछ मँगवा लेता हूँ.. मेरी बात छोड़.. वहाँ पर सब कैसा है? वैशाली ठीक तो है ना..!!"

शीला ने हँसकर कहा "सब ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं.. बस बहोत दिन हो गए थे वैशाली से मिले हुए.. पिंटू बेंगलोर गया हुआ है और उसके सास-ससुर भी ननद के घर गए हुए है.. तो सोचा कुछ दिन और यहाँ रुक जाती हूँ"

सुनते ही मदन की आँखें चमक उठी, वह बोला "अरे हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. तेरा जब तक मन करे आराम से रहना"

शीला: "हम्म बड़ा खुश हो गया तू ये सुनकर तो..!!"

जैसे शीला ने उसकी चोरी पकड़ ली हो.. मदन बोलने में लड़खड़ा गया "अमम.. अरे नहीं.. ही ही ही.. ऐसी कोई बात नहीं.. हा हा हा.. वो तो मैं.. मैं तो बस यही कह रहा था की अच्छा ही है अगर तू वैशाली के साथ और रही तो.. उसे अकेला महसूस नहीं होगा"

पत्नियों में यह जन्मजात कला होती है.. दूर बैठे बैठे, केवल पति की आवाज सुनकर.. थोड़े में ही बहुत कुछ समजने की विद्या से कुदरत ने उसे नवाजा है.. और इसका अनुभव यह पढ़ रहे सारे पतिदेवों को कभी न कभी जरूर हुआ होगा.. तो चलिए देखते है कैसे पत्नियाँ यह कर पाती है..

इसे पत्नी-शास्त्र का एक विशिष्ट अध्याय भी कह सकते हैं.. संस्कृत में कहें तो.. दूरस्थ पति-अनुभूति विद्या.. इसे जन्मजात विद्या कह लीजिए या फिर वैवाहिक जीवन की इंट्यूशन पावर, यह सच में अद्भुत होती है..!!

तो जरा इस विद्या पर थोड़ा रस भरा ज्ञान बिखेरते हैं..

पहला चरण होता है स्वर विश्लेषण विज्ञान

जब पत्नी घर से बाहर होती है, तब उसके कान सिर्फ कान न होकर सैटेलाइट डिश बन जाते हैं, जो पति की आवाज़ के हर डेसिबल को कैद कर लेते हैं..

पति को फोन करो और वो सामान्य टोन मे कहें "हां... बोलो..." अगर फोन उठाते ही पति की आवाज़ में वही रोज़ाना वाली उदासीनता है, जैसे वो सिर्फ इसलिए उठा रहा है क्योंकि फोन बज रहा था, तो वो समझ जाती है की सब ठीक है.. पति बिल्कुल वैसा ही है जैसा वह उसे छोड़ आई थी.. वह शायद टीवी पर कोई पुरानी फिल्म देख रहा है या फ्रिज में रखी रोटी और बची हुई सब्जी को युद्ध स्तर पर गरम करने की कोशिश कर रहा है.. कोई तकलीफ नहीं है, बस एक आलस्य का साम्राज्य है..!!

वहीं अगर फोन करने पर पति असामान्य उत्साह का प्रदर्शन करते हुए कहें "हैलोओओओ जी! कैसी हो वहाँ?" तो यह सुनते ही पत्नी के दिमाग में खतरे की घंटी बजने लगती है.. पति की आवाज़ में अगर फूल झड़ रहे हो, उत्साह का फव्वारा फूट रहा हो और वो पत्नी का हालचाल इस तरह ले रहा हो जैसे कोई प्रेमी हो, तो पत्नी का दिमाग तुरंत अलर्ट हो जाता है.. मन ही मन पत्नी सोचने लगती है "ये इतना खुश क्यों है? मेरे जाने के बाद तो इसे दुखी होना चाहिए! ये खुशी कहाँ से आ रही है? कहीं ये नई मिली आज़ादी में कोई गुल तो नहीं खिला रहा? मंगलवार की शाम को इतना उत्साह..!! मतलब दोस्तों के साथ पार्टी या... और कुछ?" बस फिर क्या, अगले ही पल पूछताछ शुरू "क्या खाया? कब खाया? किसके साथ खाया? टीवी पर क्या चल रहा है? घर पर कौन आया है?" तब तक जान नहीं छोड़ती जब तक सच का पता न लगा ले

यदि पत्नी के फोन करने पर पति दबी हुई आवाज में फुसफुसाते हुए कहे "हैलो..." तो हो गई बात खत्म.. पत्नी के लिए ये टोन सबसे रहस्यमयी है.. अगर पति फोन इस तरह उठाता है जैसे CIA की कोई अंडरकवर एजेंसी चला रहा हो, तो पत्नी के कान खड़े हो जाते हैं.. पति यह सोचता है "शायद वो समझेगी कि मैं लाइब्रेरी में हूँ या किसी मीटिंग में.." वही पत्नी का रडार भांप ही लेता है "ये आदमी झूठ बोल रहा है! इतना चुपके से बात करने की ज़रूरत किस बात की है? ये पक्का कोई ऐसा काम कर रहा है जो मुझसे छुपाना चाहता है.." और फिर पति को अगले १० मिनट तक यह समझाना पड़ता है कि वह सिर्फ पड़ोस वाले शर्मा अंकल के साथ शतरंज खेल रहा था..

दूसरा चरण होता है तकलीफ़ की पहचान.. पत्नी की यह विद्या सिर्फ शक करने के लिए नहीं होती, बल्कि तकलीफ भांपने के लिए भी होती है..

अगर पति की आवाज़ में एक अजीब सी सुस्ती है, बातों में वो तड़क नहीं है, और बार-बार "कोई बात नहीं, सब ठीक है" कह रहा है, तो पत्नी का दिल धक से कर जाता है.. उसे तुरंत पता चल जाता है कि या तो उसे बुखार है, या खाना बनाते समय उंगली जल गई, या फिर कबाब में हड्डी की तरह उसकी पसंदीदा शर्ट पर ग्रेवी का दाग लग गया है.. दूर बैठी-बैठी वो उसकी तकलीफ को महसूस कर लेती है, क्योंकि आखिर वही तो है जो रोज़ उसकी हर छोटी-बड़ी परेशानी को सुलझाती है..

अगर निष्कर्ष निकालकर देखें की आखिर ये विद्या इतनी तीक्ष्ण क्यों होती है?

कारण यह है की पत्नी ही वो इंसान होती है जो रोज़ सुबह उसकी ऊबी हुई आवाज़ "चाय बना दो", दोपहर की व्यस्त आवाज़ "खाना खा लिया?", शाम की थकी आवाज़ "आज ऑफिस में बहुत काम था" और रात को सोते वक्त की बड़बड़ाहट "लाइट बंद कर दे यार" सुनती है.. वह उसकी आवाज़ की हर आवृत्ति, हर तरंग को डिकोड करने में माहिर हो चुकी होती है..

ये कानों से सुनने की बात नहीं, दिल से सुनने की कला है.. दूर होने पर भी वह सिर्फ इसलिए सब भांप लेती है क्योंकि उसने सालों उसे सुना है.. उसके सुख में, दुःख में, क्रोध में और प्यार में.. और हाँ, इसी कला के बूते वह ये भी तुरंत पकड़ लेती है कि कहीं उसका पति इस नई मिली स्वतंत्रता' का दुरुपयोग तो नहीं कर रहा, क्योंकि आखिर वह आज़ादी उसने दी है, और उस पर उसका पेटेंट अधिकार है!

तो हे पतियों, अगली बार जब पत्नी बाहर जाए और फोन करे, तो आवाज़ पर थोड़ा कंट्रोल रखना, क्योंकि दूसरी तरफ पत्नी का रडार एकदम एक्टिव मोड में होता है.. मैं ये सब इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मैं इसे वर्षों के वैवाहिक अनुभव के बाद डिकोड कर पाया हूँ और जब डिकोड कर ही लिया है तो सोचा क्यों न इसका लाभ पाठकों के साथ भी साझा किया जाए..!!

पत्नी के इस रडार से बचने के दो रास्ते है.. पहला रास्ता है आत्मसमर्पण करना.. बस स्वीकार कर लीजिए की ये सिस्टम इतना एडवांस है कि इसे हैक नहीं किया जा सकता.. बस जैसे हैं वैसे ही रहिए, ईमानदारी से.. तकलीफ हो तो बता दीजिए, और अगर गुल खिलाने का मन हो तो पहले ही साफ़ कर दीजिए कि "प्रिये, मैं अब दो दिनों के लिए अपने दोस्तों के साथ एक छोटा सा गुल खिलाने जा रहा हूँ, कृपया अनुमति प्रदान करें।"

दूसरा रास्ता है वर्कअराउंड ढूंढना.. चूंकि अब आप एल्गोरिदम जान चुके हैं, तो आप इसका हल ढूंढ सकते हैं.. ये कोई धोखा देने की बात नहीं है, बल्कि सिर्फ फाइन-ट्यूनिंग है..

मान लीजिए की अगर आप खुश हैं तो आवाज़ में उत्साह होगा ही, लेकिन उस उत्साह के साथ ये जोड़ दीजिए: "हाँ, बहुत मज़ा आ रहा है, लेकिन तुम्हारी याद बहुत आ रही है.. खाना भी नहीं बन पा रहा, कपड़े भी नहीं धुले, घर सूना सूना सा लग रहा है तुम्हारे बगैर.." इस तरह अपने उत्साह को पत्नी-प्रशंसा के पैकेज में लपेट कर पेश कर दें, जिससे रडार अब गुल-ए-बेवफाई की तलाश करना बंद कर देगा..

बहुत बातें हो गई.. चलिए कहानी को आगे बढ़ाते है

मदन के बोल लड़खड़ाने पर शीला का रडार भी तेज हो गया.. पर फिर शीला ने सोचा की मदन उससे छुपाकर ज्यादा से ज्यादा क्या ही कर लेगा..!! फाल्गुनी के साथ मजे कर रहा होगा शायद.. और इस बात से शीला को कोई आपत्ति थी नहीं.. हकीकत में शीला यहाँ वैशाली के घर रहकर अपने ही गुल खिलाने वाली थी.. नहीं नहीं.. बाबिल के साथ नहीं.. बाबिल जैसे दस को तो वो अपने भोसड़े से रगड़कर कूड़ेदान में फेंक सकती थी.. शीला का दिमाग कुछ अलग ही फिराक में था.. इसलिए उसने मदन के उस उत्साह पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी

शीला: "ठीक है फिर.. मैं बाद में फोन करूंगी.. तू अपना खयाल रखना.. और पूरा दिन रेस्टोरेंट का खाना मत ठुसते रहना.. रखती हूँ"

शीला के फोन रखते ही मदन ने चैन की सांस ली.. अब फिर से उसका लंड रूखी को याद करने लगा.. रूखी.. रूखी.. रूखी.. कैसे बुलाऊँ तुझे.. क्या जुगाड़ लगाउ की तेरे सास ससुर को कोई शक न हो..

मदन फिर से अपने ड्रॉइंग रूम में चक्कर काटते हुए सोचने लगा.. काफी सोचने पर भी जब कुछ सुझा नहीं तो वो चप्पल पहनकर बाहर चलने निकल गया

घर के कंपाउंड से बाहर निकलते वक्त उसने पड़ोस वाले घर में देखा.. जहां फाल्गुनी रहती थी.. उसके घर का दरवाजा बंद था पर रोशनदान से ट्यूबलाइट की रोशनी नजर आ रही थी.. मतलब वो अंदर ही थी.. एक पल के लिए तो मदन का मन किया की वो फाल्गुनी के साथ ही रात गुजार ले.. बड़े दिन हो गए फाल्गुनी से मिले हुए.. पर फिर सोचा की फाल्गुनी के साथ तो वो शीला की मौजूदगी में भी मजे कर सकता था.. अभी तो जरूरत थी रूखी के दूध भरे बबलों की..

निरुत्साह से धीमे कदमों को आगे चलाते हुए वह सड़क के किनारे चाय की टपरी पर गया.. एक कटिंग चाय का ऑर्डर देकर उसने पनवाड़ी से सिगरेट ली और फूंकने लगा.. बगल में ही कोई नई इमारत बन रही थी और ढेर सारे मजदूर काम पर लगे हुए थे.. शाम का समय था इसलिए हर किसी को काम निपटाने की जल्दी थी.. पास पड़े रेत के ढेर के पास एक मजदूर महिला पालथी मारकर जमीन पर बैठे हुए, पल्लू से ढँककर अपने शिशु को स्तनपान करा रही थी.. बच्चे का पेट भर जाते ही उसने उसे उठाकर पास के रेत के ढेर पर बैठा दिया.. ऐसे करने पर उस औरत का पल्लू उठ गया और उसका नग्न स्तन मदन को दिख गया.. साँवले स्तन पर बादामी चक्र वाला निप्पल.. उस पर श्वेत बूंदों का जमावड़ा.. आहाहाहाहा.. मदन का दिल किया की वहीं कूद कर उसकी गोद में लेट जाएँ और उसकी निप्पल को मुंह में भर ले..!!!





उस औरत ने बड़ी ही लापरवाही से अपने उस दूध टपकाते स्तन को चोली में ठुसा और बच्चे को उठाकर इमारत के अंदर चली गई.. तब तक मदन की सिगरेट भी बुझ चुकी थी.. पैसे चुकाकर वह वापिस लौटने की सोच ही रहा था की तभी मोबाइल की रिंग बजी..

इस बार रूखी का फोन था.. एक पल के लिए खुश होकर मदन फिर निराश हो गया.. पक्का रूखी ने यह पूछने के लिए फोन किया होगा की क्या बहाना बनाया.. पर उसे तो अब तक कुछ सुझा ही नहीं था..!!!

मदन: "हाँ रूखी बोल..!!"

रूखी ने हंसी भरी आवाज के साथ कहा "क्या सेठजी.. आपने तो फोन ही नहीं किया..!!! शीला भाभी वापिस आ गई या आज रात को सरका लगाकर ही सो जाने वाले हो?"

मदन: "अरे नहीं यार.. मैंने बहोत सोचा.. पर कुछ आया ही नहीं दिमाग में..!!"

रूखी: "आप चिंता मत कीजिए सेठजी.. जुगाड़ तो मैंने ही लगा दिया.. मुझे पता था आप से न हो पाएगा..!!"

एक मामूली दूधवाली का यह कहना की "आपसे न हो पाएगा" मदन के अहंकार को ठेस जरूर पहुंचा गया पर फिलहाल अपने अहम से ज्यादा अहमियत थी लंड के भूख की.. रूखी के दूध की..

मदन: "क्या जुगाड़ लगाया.. जरा मुझे भी बता"

रूखी: "मैंने अपने सास-ससुर से ये कहा है की शीला भाभी और आप शहर से बाहर गए हुए है.. और घर का खयाल रखने के लिए मुझे रात को वहाँ रुकना है"

मदन खुश हो गया और बोला "अरे वाह.. और वो मान गए?"

शरारती अंदाज में रूखी ने कहा "कैसे नहीं मानते भला.. सुबह आपने जो पैसे दिए थे उसमें से ५०० का एक नोट सासुमा को थमा दिया.. बोलती ही बंद हो गई.. उल्टा खुशी खुशी जाने को कह दिया.. रसिक तो कल रात से घर आया ही नहीं है.. खेत पर ही पड़ा है.. और वो होता तो भी मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.. और हाँ सेठजी.. आपके लिए एक खास तोहफा भी लेकर आ रही हूँ.. तैयार रहिएगा..!!"

सुनकर मदन ऐसे खुश हुआ जैसे कानों में रूखी ने मिसरी घोल दी हो..

"क्या बात है यार रूखी..!! तेरा दिमाग तो सच में बड़ा तेज चलता है.. पर ये तोहफे वाली बात समझ में नहीं आई.. क्या लेकर आ रही है तू?"

रूखी ने हँसकर कहा "वो तो जब आऊँगी तब पता चल ही जाएगा.. बस अपने हथियार को मालिश करके तैयार रखिएगा.. आज रात उसकी जबरदस्त कसरत होने वाली है"

यह सुनते ही.. मदन और उसका लंड एक साथ उछल पड़े..

मदन: "तू कब आ रही है घर? मैं अभी घर पहुँच रहा हूँ"

रूखी "थोड़ा धीरज धरिए.. अभी तो ७ ही बजे है.. मुझे घर का सारा काम निपटाना है.. आते आते साढ़े नौ बज ही जाएंगे.."

मदन से अब रहा नहीं जा रहा था, वह बोला "जितना हो सकें जल्दी करना.. और सुन.. तू जब आए तब डॉरबेल मत बजाना.. दरवाजे के पास पड़े गमले के नीचे चाबी रखी है.. चुपचाप खोलकर अंदर चली आना.. और ध्यान रहें.. अड़ोस-पड़ोस में कोई देख न रहा हो"

रूखी "अब फोन रखिए भी" कहते हुए रूखी ने फोन काट दिया

मदन की चाल में तेजी आ गई.. वह फटाफट चलते हुए अपने घर पहुँच गया.. कंपाउंड का गेट खोलकर वह मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था की बगल के घर से फाल्गुनी ने आवाज लगाई..

मदन ने उसे अनसुना किया और ताला खोलकर घर के अंदर चला गया.. फाल्गुनी आश्चर्य से उसे देखती रही.. उसके पीछे पागलों की तरह दूम हिलाने वाले मदन ने आज उसकी तरफ देखा भी नहीं.. उसने आवाज दी तो जवाब भी नहीं दिया..!! फाल्गुनी को यह तो पता था की शीला भाभी वैशाली के घर गई थी और मदन घर पर अकेला था.. पर मदन का यह व्यवहार उसे समझ में नहीं आया..

मदन घर में अंदर आया और नहाकर फ्रेश हो गया.. अभी रूखी को आने में काफी समय था.. इसलिए वो बेडरूम में पलंग पर लेट गया.. इंस्टाग्राम पर बड़े बोबलों वाली सेक्सी रिल्स देखते देखते लंड हिलाते हुए कब उसकी आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला





जब उसकी आँख खुली और देखा तो रूखी बेड के पास खड़ी थी.. मदन को नंगे बदन मुट्ठी में लंड पकड़े सोता हुआ देख वो हंस रही थी.. मदन ने उठकर उसकी कमर में हाथ डाला.. पास खींचा और ज़ोर से चूम लिया..

"क्या रूखी, कितना टाइम लगा दिया यार.. तेरी चूत के शहद और बोबलों का दूध पीने के लिए कब से तरस रहा हूँ.. "

वह उससे छूट कर उसे आँख मारते हुए धीरे से बोली, "आप ही के काम में देर लग गई शेठजी.. ज़रा देखो, क्या माल लाई हूँ आपके लिए!" रूखी ने बेडरूम के दरवाजे की तरफ इशारा किया

मदन ने देखा तो दरवाजे में एक जवान लड़की खड़ी थी.. थोड़ी शरमा ज़रूर रही थी पर ताक लगाकर उसकी और रूखी के बीच की चुम्मा-चाटी देख रही थी.. मदन के लोड़े को भूखी नज़रों से घूर रही थी.. उसे देखते ही मदन चोंक गया.. उसने अपने लोड़े को छुपाना चाहा पर पास ऐसा कुछ पड़ा ही नहीं था की जिससे वह उसे ढँक सके.. फिर उसने सोचा की जब उसे रूखी ही लेकर आई है तब घबराने की कोई बात नहीं थी

अब मदन ने उसे नजर भरकर देखा.. और फिर असमंजस में रूखी की ओर देखा.. उसकी आँखों में जो प्रश्न था वह रूखी समझ गई

वह बोली "शेठजी, ये चम्पा है, मेरी पड़ोसन.. बीस साल की है, दो साल पहले शादी हुई थी इसकी.. अब एक बच्चा भी है" रूखी की बात सुनते सुनते मदन चम्पा को बड़े चाव से घूर रहा था.. रूखी उसे क्यों लाई थी यह भी उसे थोड़ा-थोड़ा समझ में तो आ ही रहा था..

चम्पा रूखी से हल्की सी साँवली थी पर उससे ज़्यादा खूबसूरत थी.. शायद उसकी जवानी की वजह से ऐसी लग रही थी.. रूखी से थोड़ी नाटी थी और उसका बदन भी रूखी से ज़्यादा भरा-पूरा था.. एकदम मांसल और गोल-मटोल, शायद माँ बनने की वजह से होगा.. उस लड़की का कोई एक अंग जो देखते ही नज़रों में बस जाता था तो वो था तो उसकी विशाल छाती..

उसका आँचल ढला हुआ था; शायद उसने जान-बूझकर भी गिराया हो.. उसकी चोली इतनी तंग थी कि छातियाँ उसमें से बाहर आने को कर रही थी.. चोली के पतले कपड़े में से उसके नारियल जैसे मम्में और उनके सिरे पर अंगूर जैसे निप्पलों का आकार दिख रहा था.. निप्पलों पर उसकी चोली थोड़ी गीली भी थी..!!





देखकर मदन का लंड खड़ा होने लगा.. उसे थोड़ा अटपटा लगा पर वह क्या करता, उस छोकरी की मस्त जवानी थी ही ऐसी..

रूखी आगे बोली.. "उसे मैने सब बता दिया है शेठजी, इसीलिए आप डरिए मत, कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं है" उसका लंड अब तक तन कर पूरा खड़ा हो गया था..

यह देख रूखी हँसने लगी "लगता है मेरी पड़ोसन भा गई शेठजी आपको.. कहो तो इसे भी रोज लेकर आया करू.. आप की सेवा करेगी.. बस इसे थोड़ा सा खुश कर दीजिएगा" मदन रूखी का इशारा समझ गया.. वो पैसों की बात कर रही थी.. उस मतवाली छोकरी के लिए तो मदन कुछ भी करने को तैयार था..

"हाँ हाँ क्यों नहीं.. रोज लेकर आना.. मैं तेरे साथ साथ इसे भी खुश कर दूंगा"

"असल बात तो आप समझे ही नहीं शेठजी, चम्पा पिछले साल ही माँ बनी है.. बहुत दूध आता है उसको, बड़ी तकलीफ़ भी होती है बेचारी को.. बच्चा एक साल का हो गया, अब दूध नहीं पीता, पर इसका दूध बंद ही नहीं होता.. चूचियाँ सूज कर दुखने लगती है.. सुबह मुझे खयाल आया की अब मेरी छाती से उतना दूध आता नहीं की आपका पेट भर सकें.. तो क्यों ना चम्पा को ही आपके पास ले आऊँ, उसकी भी तकलीफ़ दूर हो जाएगी और आप का काम भी हो जाएगा.. बोलो, जमेगा ना शेठजी?"

मदन ने चम्पा के बबलों को घूरते हुए कहा "पर इसका मर्द पूछेगा नहीं की रात भर कहाँ रही? और इसका बच्चा?"

"उसकी फिकर आप मत करो, इसका आदमी काम से छः महीने को शहर गया है, इसकी सास अपने पोते के बिना नहीं रह सकती, बहुत लगाव है, इसीलिए पूरी रात वह बच्चे को संभाल लेगी, कोई टेंशन की बात नहीं है.. दूसरा उसकी सास मुझ पर बहोत भरोसा करती है.. मेरे साथ है तो उनको कोई चिंता नहीं है.. मतलब रास्ता एकदम साफ है..!!"

मदन को अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं हो रहा था.. रूखी के साथ साथ चम्पा भी मिल गई.. चार चार दूध से भरे हुए थन..!!!! आहाहाहा.. ओहोहोहो.. मज़ा ही आ जाएगा

वह चम्पा का जोबन देखने लगा.. उसका मन तो कर रहा था की कि पकड़ कर खा जाएँ, चढ़ कर मसल डालें उसके मतवाले रूप को.. चम्पा भी मजे से खड़ी थी, चुन्नी के छोर को दांतों तले दबाकर शरारत भरी नज़रों से मदन के गोरे खड़े लंड को देखते हुए धीरे-धीरे अपनी जाँघें रगड़ रही थी..





"सिर्फ़ दूध पीने की बात हुई है शेठजी, ये समझ लो.." रूखी ने उसे उलाहना दिया.. फिर चम्पा को मीठी फटकार लगाई "और सुन री छिनाल.. मेरी इजाज़त के बिना इस लंड को हाथ भी नहीं लगाना, ये सिर्फ़ मेरा माल है, समझी..!!"

"अरे भाभी, ऐसा क्या करती है..!! मेरे को भी मज़ा करने दे ना, कितना मतवाला लंड है.. गोरा गोरा सा.. एकदम बाबूसाहेब जैसा.. तू बता रही थी तो भरोसा नहीं था मेरा पर ये तो बड़ा खूबसूरत निकला" चम्पा मचल कर अपनी उंगली दांतों तले दबाते हुए बोली.. उसकी नज़रें मदन के लंड पर गढ़ी हुई थीं.. बड़ी चालू चीज़ थी, ज़रा भी नहीं शरमा रही थी, बल्कि चुदने को मरी जा रही थी..

"बदमाश कहीं की, तू सुधरेगी नहीं, मैने कहा ना फिर देखेंगे.. अभी चोली निकाल और फटाफट शेठजी को दूध पीला.." रूखी ने अपनी पड़ोसन को डाँटते हुए कहा..

रूखी अब मदन का लंड प्यार से मुठिया रही थी.. फिर उसने झुक कर उसे चूसना शुरू कर दिया.. उधर चम्पा ने अपना ब्लाउज़ खोल दिया.. उसकी पपीते जैसी मोटी-मोटी चूंचियाँ अब नंगी हो चुकी थीं.. एकदम फूली-फूली सी थी जैसे अंदर कुछ भरा हो.. वजन से वो लटक रही थी..





एक स्तन को हाथ में उठाकर सहारा देते हुए चम्पा बोली "भाभी देख ना, कैसे भर गये हैं मम्में मेरे, आज सुबह से खाली नहीं हुए, बहुत दुखते हैं"

"अरे तो टाइम क्यों खोटी कर रही है.. आ बैठ शेठजी के पास और जल्दी दूध पीला उनको.. भूखे होंगे बेचारे" रूखी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और पलंग पर उसके पास बिठा दिया.. वह सिरहाने से टिक कर बैठा था..

अब तो मदन के मजे ही मजे थे..!!

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

मदन रूखी के साथ रात बिताने की योजना बना रहा था लेकिन उसे कोई बहाना नहीं सूझ रहा था.. इसी बीच उसकी पत्नी शीला का फोन आया, जो अपनी बेटी वैशाली के यहाँ थी.. शीला ने बताया कि वह कुछ और दिन वहीं रुकेगी, जिससे मदन को खुशी हुई.. उसकी इस असामान्य खुशी पर शीला को शक हुआ, लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह खुद भी वैशाली के घर पर कुछ योजनाएँ बना रही थी..

फोन रखने के बाद मदन टहलने निकला और चाय की दुकान पर बैठा, जहाँ उसने एक मजदूर महिला को अपने बच्चे को दूध पिलाते देखा.. तभी रूखी का फोन आया.. रूखी ने बताया कि उसने अपने सास-ससुर से कह दिया है कि शीला और मदन शहर से बाहर गए हैं और घर की देखभाल के लिए उसे रात भर वहाँ रुकना होगा.. उसने अपनी सास को ५०० रुपए देकर मना लिया था..

रूखी ने मदन को एक खास तोहफा लाने की बात भी कही.. शाम साढ़े नौ बजे जब रूखी आई, तो वह अपनी पड़ोसन चंपा को भी लेकर आई.. चंपा बीस साल की युवा महिला थी, जो हाल ही में माँ बनी थी और जिसके स्तनों में अधिक दूध भर जाने की समस्या थी.. रूखी ने समझाया कि चंपा के पति छह महीने के लिए शहर गए हैं और उसकी सास बच्चे की देखभाल करेगी, इसलिए वह रात भर रुक सकती है.. रूखी ने चंपा को केवल मदन को दूध पिलाने के लिए लाने की बात कही, और चेतावनी दी कि चंपा मदन के लंड को बिना अनुमति न छुए..

अब आगे..

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"अरे तो टाइम क्यों खोटी कर रही है.. आ बैठ शेठजी के पास और जल्दी दूध पीला उनको.. भूखे होंगे बेचारे" रूखी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और पलंग पर उसके पास बिठा दिया.. वह सिरहाने से टिक कर बैठा था..

चम्पा मदन के पास सरकी, उसकी काली आँखों में मस्ती झलक रही थी.. उसके मम्में मदन के बिल्कुल सामने थे.. निप्पलों के चारों ओर तश्तरी जैसे बड़े गोले थे.. पास से वे मोटे-मोटे लटके स्तन और भी ज़्यादा रसीले लग रहे थे..

अब मदन से नहीं रहा गया और झुक कर उसने एक काला जामुन मुँह में ले लिया और चूसने लगा.. मीठा कुनकुना दूध उसके मुँह में भर गया.. उस अवस्था में तो उसे वह अमृत जैसा लग रहा था.. मदन ने दोनों हाथों में उसकी चूंचि पकड़ी और चूसने लगा जैसे कि बड़े नारियल का पानी पी रहा हो.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह फिर से बच्चा बन गया हो..





मदन अपनी आँखें बंद करके वह स्तनपान करता रहा.. तो दूसरी तरफ रूखी ने उसका लंड मुँह में ले रखा था.. अपनी कमर उछाल उछालकर मदन उसका मुँह चोदने की कोशिश करने लगा.. रूखी भी महा उस्ताद थी, बिना उसे झड़ाए प्यार से उसका लंड चूसती रही..





एक तरफ निप्पल की चुसाई और सामने रूखी का लंड चूसता हुआ द्रश्य.. अब तो चम्पा भी गरमा गई थी.. मदन का सिर उसने कस कर अपनी चूचियो पर भींच लिया जिससे वह छूट ना पाए और उसका निप्पल मुँह से ना निकाले.. उसे क्या मालूम था कि उसकी उस मतवाली चूंचि को छोड़ दे ऐसा मूर्ख नहीं था मदन..

उसका मम्मा दबा-दबा कर दुहते हुए वह दूध पीने लगा.. चम्पा ने बड़े ही प्यार से मदन के माथे को चूम लिया.. सुख की सिसकारियाँ भरती हुई बोली

"भाभी, ये शेठजी तो जोरदार है.. देख क्या मस्त चूस रहे हैं मेरी चूंचि, एकदम भूखे बच्चे जैसे पी रहे हैं.. और उनका यह लंड तो देख भाभी, कितनी ज़ोर से खड़ा है.. भाभी, मुझे भी चूसने दे ना!"

रूखी ने उसका लंड मुँह से निकाल कर कहा "कल से, आज नहीं, वो भी अगर शेठजी हाँ कहें तो! पता नहीं तेरा दूध उन्हें पसंद आया भी है कि नहीं" वैसे चम्पा के दूध के बारे में वह क्या सोचता है, इसका पता उसे उसके उछालते लंड से ही लग गया होगा..

चूसते चूसते आख़िर चम्पा का एक स्तन खाली हो गया.. मदन ने दबा-दबा कर पूरा दूध निचोड़ लिया.. फिर भी उसके उस मोटे जामुन से निप्पल को मुँह से निकालने का मन ही नहीं हो रहा था.. पर उसने देखा कि चम्पा के दूसरे निप्पल से अब दूध टपकने लगा था.. शायद इस स्तन में पहले वाले से कुछ ज्यादा ही दूध भर गया था..





मदन ने उसे मुँह में लिया और उसकी दूसरी चूंचि दूह कर पीने लगा.. चम्पा खुशी से चहक उठी..

"भाभी, ये तो दूसरा मम्मा भी खाली कर रहे हैं.. मुझे लगा था कि एक से इनका मन और पेटभर जाएगा.."

"तो पीने दे ना पगली, उन्हें भूख लगी होगी.. अच्छा भी लगा होगा तेरा दूध.. अब बकबक मत कर, मुझे शेठजी का लौड़ा चूसने दे ठीक से, बस मलाई फेंकने ही वाला है अब" कह कर रूखी फिर शुरू हो गई..

मदन ने जब दूसरा बोबला भी चूस चूसकर खाली कर दिया तब रूखी ने उसका लंड जड़ तक निगल कर अपने गले में ले लिया और ऐसे चूसा कि मदन अपने आप को ओर रोक नहीं पाया.. रूखी के कंठ के अंदर ही वो झड़ गया.. मदन को चम्पा का दूध पिला कर.. रूखी नाम की यह बिल्ली उसकी मलाई निकालकर खा गई..





इस परिश्रम से लस्त होकर मदन पीछे लुढ़क गया पर चम्पा अब भी उसका सिर अपनी चूची पर भींच कर अपनी चूंचि उसके मुँह में ठूँसती हुई वैसे ही बैठी थी.. मदन ने बड़ी मुश्किल से खुद को चम्पा के चंगुल से अलग किया..

चम्पा मदन की ओर देख कर बोली "शेठजी, पसंद आया मेरा दूध?" वह ज़रा टेंशन में थी कि मदन क्या कहता है..

जवाब में मदन मुस्कुराया और फिर उसने चम्पा का गाल खींच कर चूम लिया और बोला "बिल्कुल अमृत था चम्पा रानी, रोज पिलाओगी ना?" वह थोड़ी शरमा गई पर आँख मार कर हँसने लगी..

मदन ने रूखी से पूछा "कितना दूध निकलता है इसके थनों से रोज रूखी? आज तो मेरा ही पेट भर गया, इसका बच्चा कैसे पीता था इतना दूध..!!"

रूखी बोली "अभी ज़्यादा था शेठजी, कल से बेचारी की चूंचि खाली नहीं की थी ना.. नहीं तो करीब इसका आधा ही निकलता है एक बार में.. वैसे हर चार घंटे में पिला सकती है ये.."

मदन ने मन ही मन हिसाब लगाया.. उसने कम से कम पाव-डेढ़ पाव दूध ज़रूर पिया होगा.. अगर दिन में चार बार यह आधा पाव दूध भी दे तो आधा पौना लीटर दूध बन जाता होगा दिन का.. दिन में दो-तीन पाव देने वाली उस मस्त दो पैर की गाय को देख कर वह बहक गया..

मदन यह सोच ही रहा था की तब चम्पा ने झुक कर अचानक उसके लंड को चूम लिया.. वो कुछ कहता इसके पहले रूखी हँसती हुई उसके पास आकर बैठ गई.. उसका ज़ोर का चुंबन लेकर अपना बोबा उसकी छाती पर रगड़ते हुए बोली.. "अरे ये चम्पा तो बावरी हो गई है, जब से आपके गोरे मतवाले लंड को देखा है, पागल ही हो गई है.. मैंने मना किया था पर ये मानेगी थोड़े ही.. चलो सेठ अब आप मेरी बुर की सेवा करो, चम्पा आप के लंड के मजे लेगी अपने मुँह से.."

मदन: "अरे यार रूखी.. सांस तो लेने दो.. अभी अभी तो झड़ा हूँ.. थोड़ा वक्त दो फिर जाकर ये खड़ा होगा..!!"

चम्पा ने मचलते हुए कहा "बाबू शेठ, मुझे एक बार मौका तो दो.. मुंह में लेकर खड़ा कर दूँगी.. एकदम टाइट" हँसते हुए उसने अपनी मुट्ठी बंद कर झटका देते हुए खड़े लंड का इशारा किया

मदन घबरा गया.. कहीं ये दोनों चुड़ैलें मिलकर आज की रात उसके प्राण का हरण तो नहीं कर लेगी.. बाप रे बाप.. कितनी गरम और चुदासी है दोनों.. बेटा मदन.. दूध पीने के चक्कर में कहीं लंड से हाथ न धोना पड़ें..

"मैं बाथरूम जाकर आता हूँ" कहते हुए मदन उठा और बेडरूम के बाहर निकल गया.. वैसे बाथरूम तो बेडरूम में भी था.. पर वो फिलहाल कमरे से बाहर निकलकर अपने लंड को थोड़ा आराम देना चाहता था.. अंदर रहता तो वह दोनों डायनें उसका लंड नोच खाती..

हांफते हुए पहले तो वो किचन में गया.. फ्रिज से पानी की बोतल निकालकर उसने ढेर सारा ठंडा पानी मुंह के अंदर उंडेल दिया.. ठंडा पानी शरीर के अंदर उतरते ही उसकी सांसें पूर्ववत होने लगी.. फिर उसने दूसरे कमरे में जाकर दवाइओ वाले डब्बे से वायग्रा की गोली निकाली.. पूरी रात का चुदाई समारोह हो तो तब वो अक्सर इस गोली का उपयोग करता था.. थोड़े से और पानी के साथ उसने गोली खा ली और थोड़ी देर सोफ़े पर बैठ गया ताकि गोली को असर दिखाने का समय मिलें

करीब पंद्रह मिनट तक जब वो अंदर नहीं गया तो रूखी बेडरूम से बाहर आ गई

"ये क्या सेठजी, आप यहाँ बैठे है?? हम दोनों अंदर अपनी अँगीठियाँ जलाएँ राह देख रही थी की कब सेठजी आए और अपनी लकड़ी इसमें डालें..!!" हँसते हुए बड़े ही नटखट अंदाज में रूखी ने कहा.. जब वो हँसती थी तब उसके स्तन उछलते थे..





गोली भी अब असर दिखाने लगी थी.. बस थोड़ी सी सुस्ती थी मदन को

मदन "रूखी, एक कप चाय बना दे यार.. मैं बेडरूम में जाकर बैठता हूँ, वहीं ले आना"

एक पल के लिए सोच में पड़ गई रूखी.. फिर अचानक से उसकी आँखों में चमक आ गई.. वह हँसते हँसते किचन में चाय बनाने गई.. मदन फिर कुछ देर बैठा रहा सोफ़े पर.. उसके लंड में धीरे धीरे रक्त भर रहा था.. मरी हुई छिपकली से अब वो वापिस मूसल का स्वरूप धारण करने लग गया था..

जब लंड में पर्याप्त सख्ती महसूस हुई तब मदन बेडरूम के अंदर आया.. उसे देखते ही अधनंगी चम्पा ने अपना घाघरा उतार फेंका.. चड्डी तो वैसे भी यह गांवठी लड़कियां नहीं पहनती..

तभी मादरजात नंगी रूखी ने हाथ में चाय का कप लिए बेडरूम में प्रवेश किया.. मदन के हाथ में चाय का कप थमाकर वह अपने कूल्हे मटकाते हुए बेड पर बैठ गई.. यह देखकर मदन का लंड कस कर खड़ा हो गया..

अब उसने चाय की चुस्की लेने की कोशिश की और देखा तो बिना दूध की चाय थी..

मदन: "ये क्या रूखी? पानी और चायपत्ती मिलाकर ले आई तू.. दूध तो डाला ही नहीं"

बदमाश रूखी जो जानबूझकर बिना दूध वाली चाय लेकर आई थी वो दिखावे के लिए झूठ-मूठ अपना माथा धौंक कर बोली "हाय, मैं तो बताना ही भूल गई.. दूध ही खत्म हो गया है.. अब क्या करे"

मदन को समझ में नहीं आ रहा था की रूखी क्या बोल रही थी.. अभी शाम को उसने चाय बनाने के लिए फ्रिज से पतीला निकाला तब करीब आधे लीटर जितना दूध था अंदर.. एकदम से कैसे खत्म हो गया सारा दूध..!!

असमंजस के भाव से वो रूखी की ओर देखता रहा.. हाथ में बिना दूध वाली चाय का कप पकड़ें हुए..

उसे इस हाल में देखकर रूखी ठहाका मारकर हंस पड़ी और बोली "फिकर की बात नहीं है शेठजी, अब तो ये दो पैरों वाली दो थनों की खूबसूरत गैया है ना यहाँ! ए चम्पा, इधर आ जल्दी"

यह बातें चल रही थी उस दौरान चम्पा अपने आप को रोक नहीं पा रही थी और उसने मदन के लोडे को मुंह में लेकर चूसना भी शुरू कर दिया था और रूखी के बुलाने पर उसने ध्यान ही नहीं दिया





रूखी: "ये देखो इस चटोरी छिनाल को.. लंड देखा नहीं की चुंबक की तरह चिपक गई.. अरी ओ चम्पा.. छोड़ दे बाबू का लंड.. और देख सेठजी बिना दूध की चाय पी रहे है, चल अपना दूध डाल जल्दी, शेठजी की चाय में"

सुनते ही चम्पा तो तपाक से उठ कर रूखी के पास आ गई.. उसके देसी जोबन गजब का था.. बदन एकदम मांसल और गोल-मटोल था, चूंचियाँ तो बड़ी थी ही, चूतड़ भी अच्छे ख़ासे बड़े और चौड़े थे.. गर्भावस्था में चढ़ा माँस अब तक उसके शरीर पर था.. जाँघें भी मोटी-मोटी और पाव रोटी जैसी फूली बुर, पूरी बालों से भरी हुई..

"जल्दी दूध डाल चाय में" रूखी ने उसे खींच कर कहा..

चम्पा अपने दोनों बबले पकड़ कर चाय के कप के ऊपर लाई और दबा कर उसमें से दूध निकालने लगी.. दूध की तेज पतली धार चाय में गिरने लगी.. अपनी निप्पल को वो तक तक दुहती रही जब तक की काली चाय एकदम सफेद न हो गई..





"बस बहोत हो गया" रूखी का ये कहते ही चम्पा ने अपने चूँचियों को छोड़ दिया और फिर जाकर मदन की कमर के पास बैठ गई और उसके लंड को चाटने लगी..

मदन के लिए यह अद्वितीय अनुभव था.. मानव दूध तो उसने कई दफा पिया था पर इंसानी दूध से बनी चाय..!! ये पहली बार था.. हाथ में ये खास चाय और नीचे हो रही लंड चुसाई.. मुख-मैथुन का आनंद लेते हुए ऐसी अनोखी चाय पीने का लुत्फ ही अलग होगा..

मदन ने चाय की चुस्की लगाई.. स्वाद अलग था पर उसकी उस अवस्था में एकदम मस्त लग रहा था.. उसका सिर चकराने लगा.. एक जवान लड़की के दूध की चाय पी रहा है और वही लड़की उसका लंड भी चूस रही है और दूसरी तरफ रूखी इस इंतज़ार में बैठी है कि कब उसकी चाय खत्म हो और कब वह अपनी चूत उससे चुसवाए..

मदन ने चाय खत्म करके रूखी को बाँहों में खींचा और उसके अलमस्त मम्में मसलते हुए उसका मुँह चूसने लगा.. उसकी हालत देख कर रूखी ने कुछ देर उसे चूमने दिया.. फिर मदन को लिटा कर उसके मुंह पर चढ़ बैठी और अपनी चूत उसके मुँह में दे दी..

"शेठजी, अब नखरा ना करो, ऐसे नहीं छोड़ूँगी आपको, बुर का रस ज़रूर पिलाऊँगी, चलो जीभ निकालो, आज उसी को चोदूँगी" उधर रूखी ने उसे अपनी चूत का रस पिला रही थी तो दूसरी तरफ चम्पा मदन का लंड लोलिपोप की तरह चूस रही थी

रूखी को यूं मदन की मुंह की सवारी करते हुए देखकर चम्पा रुक गई और मदन का लोडा मुँह से निकालकर उठ खड़ी हुई.. रूखी के करीब आकर वो उससे लिपटने लगी

"हाय भाभी, कितना मज़ा आ रहा होगा ना.. मुझे तो यकीन नहीं हो रहा की सेठजी आपकी चाट रहे है"

चम्पा की बात सुन रही रूखी जवाब नहीं दे रही थी.. बस मदन के मुंह पर अपना भोसड़ा आगे पीछे रगड़ते हुए बस मुंह से सी-सी-सी की आवाज़ें निकाल रही थी.. वो अब झड़ने के बेहद करीब थी.. थोड़ी ही देर में वह थरथराते हुए झड़ गई और अपने भोसड़े का सारा खारा पानी मदन के मुंह में खाली कर गई..





एक बार और उसके मुँह में झड़ कर सामने से सी-सी करती रूखी उठी.. "चल चम्पा, अब शेठजी को अपना दूध पीला दे.. फिर आगे का काम करेंगे"

यह सुनते ही चम्पा मदन के ऊपर झुकी और उसे लिटाए-लिटाए ही अपना दूध पिलाने लगी.. रात के आराम के बाद फिर उसके मम्में भर गये थे और उन्हें खाली करने में उसे दस मिनट लग गये.. तब तक रूखी की जादुई जीभ मदन के लंड को चाटती रही..

वायग्रा की गोली और चम्पा के दूध ने ऐसा जादू किया कि मदन का लंड ऐसा खड़ा हुआ जैसे झड़ा ही ना हो..

रूखी उसका लंड मुँह से निकाल कर उसके पास आ कर बैठ गई.. उसकी आँखों में गहरी वासना थी..चम्पा की आँखों में भी जबरदस्त चुदासी थी

"तो आओ, अब कौन चुदेगा पहले, रूखी तुम या फिर चम्पा?" मदन ने दोनों से पूछा

"भाभी, पहले मैं चुदवा लूँ?" चम्पा ने अधीर होकर पूछा..

रूखी अब तैश में थी "बड़ी आई पहले चुदने वाली, अपनी भाभी को तो चुदने दे पहले सेठजी से.. तब तक तू ऐसा कर, उनको अपनी बुर चटा दे, वो भी तो देखें कि मेरी पड़ोसन की बुर का क्या स्वाद है.. तब तक मैं तेरे लिए उनका सोंटा गरम करती हूँ" उसे आँख मार कर रूखी हँसने लगी.. अब वह पूरी मस्ती में आ गई थी..

चम्पा फटाफट उसके मुँह पर चढ़ गई.. यह देखते ही रूखी ने चिल्लाते हुए कहा

"अरी ओ नलायक, बैठना मत अभी सेठजी के मुँह पर.. ज़रा पहले उन्हें ठीक से दर्शन तो करा अपनी जवान गुलाबी चूत के" यह सुनते ही चम्पा घुटनों पर टिक गई, उसकी चूत मदन के चेहरे के तीन-चार इंच ऊपर ही थी.. उसकी बुर रूखी से ज़्यादा गुदाज और मांसल थी.. झांटें भी घनी थी.. चूत के गुलाबी पपोते संतरे की फाँक जैसे मोटे थे और लाल छेद खुला हुआ था जिसमें से घी जैसा चिपचिपा पानी बह रहा था..

मदन ने चम्पा की कमर पकड़कर नीचे खींचा और उस मिठाई को चाटने लगा.. उधर रूखी ने उसका लंड अपनी बुर में लिया और उस पर चढ़ कर उसे हौले-हौले मज़े लेकर चोदने लगी.. अपनी पड़ोसन का स्तनपान देखकर वह बहुत उत्तेजित हो गई थी, उसकी चूत इतनी गीली थी कि आराम से मदन का लंड उसमें फिसल रहा था..





इधर चम्पा के चूतड़ पकड़कर मदन ने उसकी तपती बुर में मुँह छुपा दिया और जो भाग मुँह में आया वह आम की तरह चूसने लगा.. चम्पा की जवान चूत के अनार का कड़ा दाना मदन ने हल्के से दाँतों में लिया और उस पर जीभ रगड़ने लगा.. दो मिनट में वह छोकरी सुख से सिसकती हुई झड़ गई.. उसके मुँह में रस टपकने लगा..

चम्पा चहकते हुए बोली "अरी भाभी, सेठजी तो कितना अच्छा करते हैं.. मैं तो घंटे भर अपनी चूत चुसवाऊँगी आज.."

मदन अब एक अजीब मस्ती में डूबा हुआ उस जवान छोकरी की चूत चूस रहा था, वह ऊपर-नीचे होती हुई उसके सिर को पकड़कर उसका मुँह चोद रही थी और सामने की तरफ रूखी मदन के लंड को अपनी चिपचिपी बुर में डालकर चुदवा रही थी.. ऐसा लग रहा था जैसे वह साइकिल है और ये दोनों आगे-पीछे बैठकर उसपर सवारी कर रही है..

मदन मन ही मन सोचने लगा कि अगर यह स्वर्ग नहीं है तो और क्या है..!!

चम्पा हल्के-हल्के सिसकारियाँ भरते हुए रूखी से बोली "भाभी, चूचियाँ कैसी हल्की हो गई हैं, सेठजी ने पूरी खाली कर दी चूस-चूस कर.. तू देख ना, अब ज़रा तन भी गई हैं नहीं तो कैसे लटक रही थीं.."

मदन की नाक और मुँह चम्पा की बुर में क़ैद थे पर आँखें बाहर होने से उसका शरीर दिख रहा था.. उसने देखा कि रूखी ने चम्पा के दोनों स्तन पकड़ लिए थे और प्यार से उन्हें सहला रही थी..

"हाँ सच में, एकदम मुलायम हो गये हैं.. चल मैं इनकी मालिश कर देती हूँ, तुझे सुकून मिल जाएगा.." रूखी बोली.. उसके हाथ अब चम्पा के स्तनों को दबाने और मसलने लगे..

दस मिनट बाद उन दोनों ने जगह बदल ली.. मदन का लंड अब भी तना हुआ था और झड़ा नहीं था.. रूखी एक बार झड़ चुकी थी और अपनी चूत का रस मदन को पिलाना चाहती थी.. चम्पा दो-तीन बार झड़ी ज़रूर थी पर चुदने के लिए मरी जा रही थी..

रूखी तो सीधे मदन के मुँह पर चढ़ कर उसे बुर चुसवाने लगी.. चम्पा ने पहले उसके लंड का चुम्मा लिया, जीभ से चाटा और कुछ देर चूसा.. फिर लंड को अपनी बुर में घुसेड़ कर उसके पेट पर बैठ गई और चोदने लगी.. उसके मन में आया कि सेठ के लंड को चूसते समय रूखी की बुर के पानी का स्वाद भी उसे आया होगा..

चम्पा की चूत रूखी से ज़्यादा ढीली थी.. शायद माँ बनने के बाद अभी पूरी तरह टाइट नहीं हुई थी.. पर थी वैसी ही मखमली और मुलायम..

रूखी ने उसे हिदायत दी "ज़रा संभालकर चोदना नहीं तो सेठजी झड़ जाएँगे.. अब मज़ा कर ले पूरा"

चम्पा ने रूखी की बात मानी पर सिर्फ़ कुछ मिनट.. फिर वह ऐसी गरम हुई कि उछल-उछल कर उसे पूरे ज़ोर से चोदने लगी.. उसने उसे ऐसे चोदा कि पाँच मिनट में झड गई, मदन ने बड़ी मुश्किल से अपना वीर्य निकालने से रोका..

रूखी अभी और मस्ती करना चाहती थी इसीलिए चिढ़ गई.. उसके मुँह पर से उतरते हुए बोली "अरी ओ मूर्ख लड़की, अभी सेठ का काम तमाम हो जाता.. मैं कह रही थी सब्र कर और मज़ा कर.. मैं तो घंटों चोदती हूँ शेठजी को.. अब उतर नीचे नलायक वरना मैं भूखी रह जाऊँगी"

रूखी ने पहले मदन का लंड चाट कर साफ किया.. फिर उंगली से चम्पा की बुर से निकले पानी को साफ करके उंगली चाटने लगी

"अमम बड़ा लजीज है तेरा पानी.. तू ज़रा टाँगें खोल, ठीक से साफ कर देती हूँ" उसने उंगली से बार-बार चम्पा की बुर पुंछी और चाटी.. फिर झुक कर चम्पा की जाँघ पर बहे उसके चूत के पानी को चाट कर साफ कर दिया..

काफी देर तक दोनों ने अदला बदली का यह खेल जारी रखा.. कभी रूखी लंड पर बैठती तो चम्पा मुंह की सवारी करती तो कभी चम्पा घुड़सवारी का आनंद लेती और रूखी अपने दोनों विशाल चूतड़ों को फैलाकर मदन के मुंह पर बुर घिसाई करती.. मदन को रूखी के दोनों कूल्हों को पकड़कर सहारा देना पड़ता.. जब रूखी अपनी चूत रगड़ती तब मदन की नजर रूखी की सिकुड़ते फैलते गांड के छेद पर पड़ी और उसकी नियत डोल गई





जब दोनों चुदासी बुरें यह खेल खेलते हुए थक कर बेड पर बैठ गई तब आखिर मदन खड़ा हुआ.. अपने तने हुए गीले लंड को मसलने लगा.. थकी होने के बावजूद चम्पा ललचा कर उसके सामने बैठ कर उसे चूसने की कोशिश करने लगी तो मदन ने उसे रोक दिया..

"रुक जा चम्पा, तुझे अब बाद में खुश करूँगा, पहले तेरी इस चुदैल भाभी की गांड मारनी है.. कब से मेरे मुंह के ऊपर मचल रही थी.. चल रूखी, तैयार हो जा"

यह सुनते ही रूखी चुपचाप बिस्तर पर ओंधी लेट गई

"अब दुखेगा रे मुझे, देख कैसे खड़ा है शेठजी का लंड मूसल जैसा"

चम्पा बड़े उत्साह से मदन की ओर मुड़ कर बोली "सेठजी, मेरी मार लो, मुझे मज़ा आएगा.. बहुत दिनों से सोच रही थी कि गांड मरवाने का मज़ा मिले.. उंगली डाल कर और मोमबत्ती घुसेड़ कर कई बार देखा पर सुकून नहीं मिला.. आप से अच्छा लंड कहाँ मिलेगा गांड मरवाने को?"

मदन तैयार हो गया, अंधे को ओर क्या चाहिए दो आँखें! रूखी की गांड तो वो पहले भी मार चुका था.. अब इस नई कोरी गांड में घुसने की कल्पना से ही उसका लंड और उछलने लगा था..

दूसरी तरफ रूखी जान छूटने से खुश थी.. ऐसा नहीं था की उसे अपनी गांड मरवाना पसंद नहीं था.. पर आज वो बेहद थक गई थी

वह बोली "हाय चम्पा, तूने मेरी जान बचा ली.. जान क्या.. तूने तो मेरी गांड बचा ली आज.. चल तेल से मस्त चिकनी कर देती हूँ तेरी गांड, दुखेगा नहीं.. सेठजी, तेल की शीशी कहाँ रखी है?" हँसते हँसते रूखी ने कहा

मदन ने उंगली से इशारा करते हुए ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी हुई पैराशूट की नारियल तेल की बोतल दिखाई.. रूखी तुरंत वह नीले रंग की प्लास्टिक की बोतल ले आई.. फिर चम्पा को ओंधा लिटा कर उसने उसकी गांड में और मदन के लंड को तेल से सराबोर कर दिया..

तेल से चमचमाता हुआ लंड लेकर जब मदन चम्पा पर चढ़ा तो रूखी ने चम्पा के दोनों चूतड़ों को अपने हाथ से फैलाए.. उसके भूरे गुलाबी छेद पर मदन ने सुपाड़ा रखा और ठेलने लगा.. सुपाड़ा सूज कर बड़ा हो गया था फिर भी तेल से स्निग्ध होने के कारण फचाक से एक बार में ही गांड के अंदर घुस गया..





"ऊईईईई मेरी अम्मा.. मर गई मैं तो" चम्पा का शरीर दर्द से ऐंठ गया और वह काँपने लगी थी.. पर छोकरी हिम्मत वाली थी, अपनी जगह से हिली नहीं.. उसे संभलने का मौका देने के लिए मदन एक मिनट रुका और फिर लंड अंदर घुसेड़ने लगा..

इस बार उसने कस के एक धक्के में लंड सट से उसके चूतड़ों के बीच पूरा गाड़ दिया.. अब चम्पा बेचारी दर्द से चीख पड़ी.. सिसकते हुए बोली "माँ मेरी, मर गई मैं, सेठ ने गांड फाड़ दी.. देख ना भाभी, खून तो नहीं निकला ना!"

रूखी उसे चिढ़ाते हुए बोली "आ गई रास्ते पर एक झटके में? बातें तो पटर-पटर करती थी कि गांड मरवाऊँगी.. पर रो मत, कुछ नहीं हुआ है, तेरी गांड सही-सलामत है, बस पूरी खुल गई है चूत जैसी.. सेठजी, आपने भी कितनी बेरहमी से लंड डाल दिया अंदर, धीरे-धीरे पेलना था इस बच्ची के चूतड़ों के बीच जैसे मेरी गांड में पेला था.."

"अरे रूखी, मैं तो तेरी गांड ही मारने वाला था.. पर ये ही मरी जा रही थी ना गांड मराने को! तो सोचा कि दिखा ही दूँ असली मज़ा.. वैसे चम्पा तेरी गांड बहुत मोटी और गूँदाज है, डन्लोप की गद्दी जैसी है, इसे तकलीफ़ नहीं होगी ज़्यादा" उसने चम्पा के चूतड़ दबाते हुए कहा..

उसका लंड अब लोहे की मुसली जैसा उसके चूतड़ों की गहराई में उतर गया था.. चम्पा की गांड बहुत गुदाज और मुलायम थी.. रूखी जितनी टाइट तो नहीं थी पर बहुत गरम थी, भट्टी जैसी.. वह उस पर लेट गया और उसके मम्में पकड़ लिए.. उसके मोटे चूतड़ स्पंज की गद्दी जैसे लग रहे थे.. उसकी चूंचियाँ दबाते हुए वह धीरे-धीरे उसकी गांड मारने लगा..

शुरू में हर धक्के पर उसके मुँह से सिसकी निकल जाती, बेचारी को बहुत दर्द हो रहा होगा.. पर साली पक्की चुदैल थी.. पाँच मिनट में उसे मज़ा आने लगा.. फिर तो वह खुद ही अपनी कमर हिला कर गांड मरवाने की कोशिश करने लगी..

"सेठजी, मारो ना! और जम कर मारो, बहुत मज़ा आ रहा है! हाय भाभी, बहुत अच्छा लग रहा है.. आह सेठ, मारो मेरी गांड हचक-हचक कर, पटक-पटक कर चोदो मेरी गांड को, माँ कसम मैं मर जाऊँगी"





धनाधन धक्के लगाते हुए मदन की जब सांसें फूलने लगी तो रूखी को लगा की वो चम्पा की गांड में ही झड़ जाएगा..

"शेठजी अब बस भी करो.. फट जाएगी बेचारी की गांड" धक्के लगा रहे मदन से रूखी ने कहा

नीचे दबी हुई चम्पा चिलाई "मत रुकना सेठजी.. अंदर ही पिचकारी मार दो.. तब जाकर ही जलन ठंडी होगी"

मदन अब उलझन में था.. रूखी की बात सुनें या चम्पा की.. लेकिन तभी रूखी चम्पा के बगल में टांगें पसारकर ऐसे लेट गई की उसकी फूली हुई डबलरोटी जैसी गीली बुर उभरकर मदन को लुभाने लग गई..

मदन ने धीरे से चम्पा की गांड से लंड निकाला.. पास पड़े नेपकिन से उसे पोंछा और रूखी की खुली जांघों के बीच बैठ गया.. निराश चम्पा यूं ही उलटे पड़े पड़े दोनों का खेल देखने लगी.. वह चाहती तो थी की उसकी गांड-चुदाई जारी रहे पर रूखी के आगे उसकी चली नहीं

बड़े बड़े स्तनों की निप्पलें मसलते हुए कराह रही रूखी, अपने भोसड़े में मदन के लंड के घुसने का इंतज़ार कर रही थी.. मदन ने अपने मुंह से लार निकालकर लोडे को गीला किया.. रूखी के भोसड़े पर सुपाड़ा टिकाया और एक ही धक्के में पूरा लंड अंदर पेल दिया..





"आह्ह आह्ह उफ्फ़ आह्ह.. जोर सी.. ओह ओह्ह" मदन के हर धक्के के साथ रूखी के मुंह से आवाज़ें निकलती रही

आखिर कुछ मिनटों तक धक्के लगाने के बाद मदन को अपने टट्टे सिकुड़ते हुए महसूस हुए.. उसके लंड पर कब से अत्याचार हो रहा था और अब वह और बर्दाश्त कर सक्ने की स्थिति में नहीं था.. रूखी के शरीर पर झुककर उसके दोनों विराट स्तनों का सपोर्ट लेते हुए उसने आखिरी जोर लगाया और उसके भोसड़े को अपने वीर्य से पवित्र करने लगा.. करीब छह-सात पिचकारियाँ मारकर वह निढाल हो गया.. हांफते हुए वो की मिनटों तक रूखी के बबलों पर ही पड़ा रहा





बगल में लेटे हुए देख रही चम्पा की चूत नए सिरे से गरम हो गई.. पर अब इसका क्या मतलब?? मदन तो झड़कर चूर हो चुका था.. अब तो वो रूखी के शरीर से उतरकर, बेड के कोने पर जाकर लेट गया था.. थकान के कारण उसकी आँख भी लग चुकी थी

करीब आधे घंटे तक सोते रहने के बाद जब उसकी आँख खुली तो उसे महसूस हुआ की बेड पर उसके बगल में कुछ हरकतें हो रही है.. रूखी और चम्पा एक दूसरे के जिस्मों से खेल रही थी.. वहीं पड़े रहकर मदन उनका वह सजातीय खेल देखता रहा

रूखी चम्पा की जांघें फैलाकर अपनी जीभ लपलपाते हुए उसकी बुर चाट रही थी





चम्पा बोली "भाभी, बहुत अच्छा लग रहा है.. तू कितना मस्त करती है मेरी बुर को.. पर देख ना.. मेरी चूंचियाँ फिर टपक रही हैं, सेठजी भी सो गए.. बहुत भारी-भारी लग रहीं हैं.. अब मैं क्या करूँ?"

रूखी ने झुक कर उसके मम्में को प्रेम से चूमते हुए कहा "तो मैं काहे को हूँ मेरी रानी? मैं खाली कर देती हूँ दो मिनट में!"

चम्पा रूखी से लिपट कर खुशी से चहक पड़ी "सच भाभी? बड़ी छुपी रुस्तम निकली तू? मुझे नहीं पता था कि तुझे मेरे दूध की आस होगी!"

रूखी चम्पा को नीचे लिटाते हुए बोली "मेरे खुद का दूध निकलता है पर खुद का दूध कैसे चुसूँ भला..!! जब शेठजी को तेरा दूध चूसते हुए देखा, तब मेरे दिल में आग सी लग गई है.. मैं तो उनके सामने ही पी लेती पर क्या पता वो नाराज़ ना हो जाएँ इसीलिए चुप रही.. उनके हिस्से का दूध पीने में हिचक होती थी.. अब आजा, तेरी छाती हल्की कर दूँ, फिर तेरी बुर हल्की करूँगी"

चम्पा के बगल में लेट कर रूखी ने उसकी निप्पल मुँह में ली और आँखें बंद करके पीने लगी.. उसके चेहरे पर एक अजीब तृप्ति झलक रही थी.. चम्पा ने रूखी का सिर छाती से लगा लिया और उसे दूध पिलाने लगी..





रूखी के बालों में प्यार से उंगलियाँ चलाने लगी.. अब तक वो दोनों ऐसी गरम हो गई थी कि लिपट कर एक दूसरे पर चढ़ कर चूमते हुए कुश्ती खेलने लगी..

"आज तो तुझे कच्चा चबा जाऊँगी.." चम्पा कुछ कहने के लिए मुँह खोलती है मगर रूखी उसके मुँह में अपना मुँह डाल देती है और गहरे-गहरे चुंबन लेने लगती है.. चम्पा बहुत गरम हो जाती है और वो भी रूखी को पूरी तन्मयता से चूमने लगती है...

रूखी पागलों की तरह चम्पा को चूसती है फिर आहिस्ता-आहिस्ता किस करती है.. चम्पा रूखी की नंगी टाँगों पर हाथ फेरती है.. रूखी चम्पा के चूंचियों को दबाती है..और फिर बिस्तर पर धक्का दे कर गिरा देती है.. उसकी चूंचियों पर अपनी चूंचियाँ रगड़ने लगती है..

चम्पा फिर रूखी को बाँहों में भर कर पलट जाती है मगर रूखी फिर से उसके ऊपर आ जाती है.. अब दोनो नंगी औरतें बिस्तर पर लोट रही हैं.. रूखी चम्पा की चूंचियों को मुँह में लेकर चूसती है..

रूखी का सर अपनी चूंचियों पर दबाते हुए रूखी को कहती है, "कुतिया निचोड़ ले सारा दूध पी ले मेरा.." और रूखी यह सुन कर पागल हो जाती है और चम्पा की चूंचियों को काटने लगती है..

"सस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स आआआआआआआः" चम्पा के मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगती हैं.. रूखी उसकी दोनो चूंचियों को काफ़ी देर तक चूसती है.. चम्पा रूखी के नीचे से अपनी चूंचियाँ मसलने लगती है.... रूखी नीचे चूसते हुए चम्पा की टाँगों को खोलती है और उसकी झांटों से भारी हुई चूत देखती है... चूत की फाँकों के बीच से रस टपक रहा था

चम्पा ने कहा "क्या देख रही हो मेरी छिनाल माँ, खा लो सारी मेरी मलाई फिर भी खत्म नहीं होगी.." यह सुनते ही रूखी चूत पर टूट पड़ती है और बिल्ली की तरह चाटने लगती है

"उम्म्म्ममममममममम उम्म्म्ममममम म्‍म्म्मममममममममममम म्‍म्म्मममममममममममममममममम म्‍म्म्ममममम म्‍म्म्मम म्‍म्म्मम करती हुई चम्पा ज़ोर ज़ोर से सिसकारियाँ भरने लगती है.

चम्पा "आहा आहा छिनाल हरामजादी चूस रंडी और चूस, दिखा आज क्या कर सकती है, चूस चूस ओर ज़ोर से चूस" ओर उसकी आँखें बंद हो जाती है.. वो बिस्तर पर पड़े पड़े हाँफने लगती है.

चम्पा का पानी निकलने ही वाला था वह बोली "मेरा पानी निकलने वाला है.."

रूखी मचलते हुए कहती है "छोड़ दे मेरे मुंह मैं तेरा पानी.." ये कहते हुए उसने चम्पा की चूत में अपनी दो उंगलियाँ डाल दी ओर अंदर बाहर कर चोदने लगी.

चम्पा: "उम्म्म् ऊई माँ... आईईईई.. उफ्फ़" उसका पानी छूट गया, रूखी उसकी चूत को चटकारे मारते हुए चाटने लगती है.





कब से शांत पड़े हुए इन दोनों की रति क्रिया को देख कर मदन का मन तो बहुत हा उठकर शामिल होने का पर अब उसका लंड साथ नहीं दे रहा था.. इतनी घनघोर चुदाई के बाद दर्द कर रहा था.. वह वैसे ही पड़ा पड़ा इन दोनों के उठा-पकड़ देखता रहा और सो गया

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जब शीला वैशाली के ऑफिस जाकर पीयूष से मिलती है और तीनों साथ लंच करने का प्लान कर रहे थे तब, शीला के घर पर, मदन रूखी और चम्पा के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था.. चम्पा मदन को स्तनपान कराती है, जबकि रूखी उसका यौन उत्तेजना से स्वागत करती है.. तीनों के बीच शारीरिक संबंधों का एक लंबा सत्र घटित होता है, जिसमें मदन चम्पा का दूध पीता है और रूखी उसकी अन्य यौन आवश्यकताओं की पूर्ति करती है.. अंत में मदन थक जाता है और सो जाता है, जबकि रूखी और चम्पा आपस में एक-दूसरे से शारीरिक संबंध बनाती हैं

अब आगे..

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उस इलाके के मशहूर रेस्टोरेंट सेवन हर्ब्स के एक कोने वाले टेबल पर शीला, पीयूष और वैशाली बैठकर गप्पे लड़ा रहे थे.. वीकेंड नहीं था और समय भी दोपहर का था इसलिए उन तीनों के अलावा पूरी रेस्टोरेंट में और कोई नहीं था.. मैन कोर्स ऑर्डर हो चुका था और फिलहाल तीनों स्टार्टर्स पर हाथ साफ कर रहे थे

"याद है वो चन्दा मौसी.. जिनका लड़का कामवाली बाई के साथ भाग गया था..!!" वैशाली ने शरारती अंदाज से पीयूष की ओर देखते हुए कहा

वैशाली और शीला एक साथ बैठे थे और टेबल की उस तरफ पीयूष बैठा था..

"कौन चन्दा मौसी?? वो जिनका टकला पति पूरा दिन लूँगी में घूमता रहता था..!!" पीयूष ने कहा

"हाँ वही.. एक नंबर का ठरकी था उसका पति.. जैसा बाप वैसा बेटा.. बेटा कामवाली बाई को भगाकर ले गया और उसका बाप आती जाती जवान लड़कियों को ताड़ता रहता था" वैशाली ने हँसते हुए कहा

"वैसे उसकी नजर सब से ज्यादा तेरी मम्मी पर ही रहती थी" पीयूष ने आँख मारते हुए शीला की ओर इशारा किया

वैशाली हंस पड़ी.. शीला ने झूठमुट गुस्सा करते हुए कहा "ऐसे कुछ भी मत बोल.. हाँ, बूढ़े की नजर बहुत गंदी थी.. एक बार में आँगन में झाड़ू लगा रही थी तब मैंने देखा की साला कब से मेरी तरफ घूर रहा था.. मैंने झाड़ू उठाकर मारने का जैसे ही इशारा किया, दूम दबाकर अंदर चला गया.. उसके बाद कभी हिम्मत नहीं हुई उसकी"

तीनों यूं ही हंसी ठिठोली कर रहे थे जब वैशाली ने चुपके से अपनी टांग को सेंडल से निकालकर पीयूष के पैर को सहलाया.. अपनी माँ शीला के साथ विस्तारपूर्वक इस बारे में बात हो जाने पर अब उसका मन हल्का हो गया था.. एक तरह से जैसे उसे शीला से खुली छूट मिल चुकी थी.. एहतियात बरतनी थी और सही इंसान चुनना था.. अब इस मामले में पीयूष से बेहतर और कौन होगा? वैशाली को उसका अच्छा खासा तजुर्बा भी था.. पिंटू से शादी होने के पहले और संजय से संबंध तोड़ने के बाद, उसने पीयूष के साथ कई बार रंगरेलियाँ मनाई थी.. कभी किसी अंडर-कंस्ट्रक्शन घर के अंदर बालू के ढेर पर, कभी कपल केफे में.. कई बार तो उसने अपने मायके, यानि शीला के घर ही पीयूष के साथ मजे किए थे.. काफी सोचने पर वैशाली को लगा की पीयूष से बेहतर और कोई साथी नहीं हो सकता.. जान पहचान का भी, उसके साथ सेक्स का भी अच्छा अनुभव है और सबसे अच्छी बात की वह उसकी ऑफिस में ही नौकरी करती थी.. कहीं किसी ने साथ देख भी लिया तो आराम से बहाना बनाया जा सकता था..

जब पैर से पैर सहलाने पर भी पीयूष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तब वैशाली को थोड़ा गुस्सा आया.. पीयूष उसकी माँ के साथ बातों में ऐसा उलझा हुआ था की वैशाली की मौजूदगी का कोई एहसास ही न हो..!! वैशाली ने अब और एक कदम आगे बढ़ने का फैसला किया..!! उसने टेबल के नीचे से अपनी टांग उठाई और पीयूष के लंड वाले हिस्से पर लाकर रख दी.. और पैर के अंगूठे से हल्के हल्के सहलाने लगी.. यह करते समय उसकी नजर पीयूष के चेहरे पर थी.. उसने देखा, पीयूष के हावभाव एकदम से बदल गए.. वह थोड़ा सा सहम गया था पर फिर भी शीला से बातें किए जा रहा था.. हम्म.. शीला को शक न हो इसलिए वो मेरी तरफ नहीं देख रहा, वैशाली ने सोचा.. अब उसे इस खेल में मज़ा आने लगा..

तभी वैशाली के फोन की घंटी बजी.. स्क्रीन पर नाम देखकर उसने फोन उठाया

"हाँ, अगर रेडी हो कंसाइनमेंट तो डिसपेच कर दो.. मेरा इंतज़ार मत करना.. नहीं नहीं.. मैं लंच के लिए बहार निकली हूँ.. लौटते हुए वक्त लगेगा.. तुम सब अपने हिसाब से देख लेना" कहते हुए वैशाली ने फोन काट दिया

पीयूष ने वैशाली की ओर देखा और बोला "किसका फोन था?"

मोबाइल को पर्स में रखते हुए वैशाली ने कहा "किशोर का फोन था.. वर्मा टेक्सटाइल्स का कंसाइनमेंट निकल रहा है.. मुझे इंस्पेकशन के लिए बुला रहा था.. पर जरूरत नहीं है.. मैंने कहा उसे माल भेज देने के लिए"

पीयूष: "ऐसा मत करो वैशाली.. ये बड़ा ऑर्डर है.. कंसाइनमेंट में कहीं कोई गलती नहीं होनी चाहिए.. वरना पेमेंट करते समय वो लोग बहोत नाटक करते है"

वैशाली: "लेकिन पीयूष, किशोर ने सब देख रखा है.. और वैसे भी लंच खतम कर मुझे वहाँ पहुँचने में टाइम लगेगा"

पीयूष: "यार लंच-वंच तो सब होता रहेगा.. तू ऑफिस पहुँचकर एक बार सब देख ले"

वैशाली ने पीयूष की आँखों में देखा.. उतनी बड़ी कोई बात नहीं थी फिर भी पता नहीं क्यों पीयूष जिद कर रहा था.. खैर, बॉस है वो.. धंधे की समज उसे ज्यादा है.. वैशाली कुछ नहीं बोली और अपना पर्स समेटकर खड़ी हो गई

वैशाली: "ठीक है, आप दोनों आराम से लंच करो फिर मिलते है.. मम्मी, तुम ऑफिस आओ फिर साथ बैठते है"

शीला: "अरे कोई बात नहीं, तू आराम से अपना काम निपटा.. मैं तो यहाँ से फिर वापिस ऑफिस नहीं आऊँगी.. सब से मिल तो लिया.. सोच रही हूँ, यहाँ तक आई हूँ तो रमिलाबहन और कविता से आज ही मिल लूँ"

वैशाली: "ठीक है, जैसा तुम्हें ठीक लगे" मोबाइल पर किशोर को फोन लगाते हुए वैशाली रेस्टोरेंट से निकल गई

उसके जाते ही जैसे पीयूष ने चैन की सांस ली.. शीला को मिलने के बाद, पीयूष के अंदर का पुरुष अंगड़ाई लेकर उठ चुका था.. और जब शीला ने अपने स्तन उभारकर ऑफिस में दिखाए, पीयूष ने तय कर लिया था की आज तो किसी भी सूरत में उन नंगे बबलों को दबोच कर, चूस कर खाली करके ही दम लेगा..

पीयूष: "हम्म.. अब इत्मीनान से बातें होगी"

शीला: "क्यों अब तक क्या कोई टेंशन था??"

पीयूष: "टेंशन तो नहीं.. पर अब वैशाली नहीं है तो हम खुलकर बात कर सकते है ना..!!"

नजरें तीरछी करते हुए शीला ने कहा "ऐसी कौनसी बातें करनी है तुझे जो वैशाली के सामने नहीं कर सकता था?"

पीयूष ने हँसते हुए कहा "भाभी, आप भी ना मेरी फ़ीरकी ले रही हो.. एक तरफ मुझे सामने से उकसा रही हो और फिर पूछ रही हो की कौन सी बातें करनी है..!!"

शीला ने असमंजस में कहा "मैंने..!! मैंने कहाँ कुछ किया..!!"

पीयूष ने मुस्कुराते हुए कहा "अब भोली मत बनिए भाभी.. आपके पैर कब से कहाँ और क्या गुल खिला रहे थे..!! ऐसे तड़पाइए मत"

शीला ने आश्चर्य से कहा "मेरे पैर?? मैंने कहाँ कुछ किया..??"

पीयूष सोच में पड़ गया.. की तभी शीला के मोबाइल पर मदन का फोन आया.. दोनों कुछ बातें कर रहे थे तब पीयूष सोच रहा था.. अगर शीला भाभी पैरों से शरारत नहीं कर रही थी तो फिर वो कौन कर रहा था?? वैशाली?? पर वो तो अब कहाँ भाव दे रही है?? पिंटू से शादी के बाद वो तो बिल्कुल ही बदल चुकी है.. एक दो बार उसने कोशिश भी की थी पर उसने टाल दिया था.. पर अगर शीला भाभी ने नहीं किया था तो फिर वैशाली के अलावा और कोई हो भी नहीं सकता..

शीला ने फोन रखते हुए पीयूष ने कहा "यार, ये खाना कब आएगा.. भूख के मारे जान निकल रही है मेरी..!!"

पीयूष ने शरारती अंदाज में शीला के स्तनों की ओर देखते हुए कहा "पर मेरा मन तो कुछ और ही खाने को कर रहा है..!!"

पीयूष की नजर देखकर शीला मुस्कुराई, पल्लू से अपने स्तनों के उभार और क्लीवेज को ढँकते हुए बोली "तू भी ना पीयूष.. कहीं भी शुरू हो जाता है.. पब्लिक प्लेस पर बैठे है.. जरा तो शर्म कर..!!"

पीयूष: "बेकार टेंशन ले रही हो भाभी, पूरा रेस्टोरेंट खाली पड़ा है.. कोई नहीं देखनेवाला.. प्लीज, एक बार खोलकर दिखाइए ना.. मैं सुबह से मरा जा रहा हूँ देखने के लिए"

शीला: "पागल मत बन.. लोग नहीं है पर वेटर तो यहाँ वहाँ घूम रहे है..!! और ये कोई जगह है यह सब करने की..!!"

पीयूष ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा "भाभी, प्लीज प्लीज प्लीज.. देखो, वेटर सारे किचन में है.. आसपास कोई नहीं है.. और मैं यह मेनू कार्ड खोल रखता है.. किसी की नजर नहीं पड़ेगी, प्लीज भाभी, मेरे लिए आप इतना भी नहीं कर सकती?"

पीयूष की बातें सुनकर शीला थोड़ी सोच में पड़ गई.. रेस्टोरेंट में अपने दोनों धुरंधरों को खोलने मात्र की कल्पना से उसकी रीढ़ की हड्डी में हड्डी में सिहरन दौड़ गई.. उत्तेजना से उसकी नसों में रक्त तेजी से दौड़ने लगा

भारत जैसे संरक्षणवादी समाज में, जहाँ पहनावे और मर्यादा को लेकर शुरू से ही काफी सख्त नियम हैं, वहाँ एग्जिबिशनिज्म यानी पब्लिक में अपने शरीर के अंतरंग अंगों को दिखाने की फितरत एक बहुत ही पेचीदा मनोवैज्ञानिक व्यवहार है.. हालांकि यह आम भारतीय महिलाओं का स्वभाव नहीं है, पर एक खास तरह की फैंटसी या मनोवैज्ञानिक चाहत कह सकते है..

जिन महिलाओं में यह फितरत होती है, उनके लिए इसके पीछे की मानसिकता अक्सर समाज के बनाए गए नियमों को तोड़ने की होती है.. एक ऐसे समाज में जहाँ शरीर को ढक कर रखने का भयंकर दबाव हो, वहाँ अचानक से खाली हाइवे, सुनसान रेस्टोरेंट या सार्वजनिक जगह पर शरीर के कुछ खास अंगों को खोलना या खुद को निर्वस्त्र करना, उन्हें एक अजीब सी पर जबरदस्त उत्तेजना और आज़ादी का एहसास देती है..

इस थ्रिल का सबसे बड़ा कारण होता है पकड़े जाने का डर.. कोई देख तो नहीं लेगा वाली अनुभूति ही असल में वो किक है जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करती है.. कुछ के लिए यह अपने हुस्न के जादू को महसूस करने का तरीका होता है, तो कुछ के लिए बस एक विद्रोह और ध्यान पाने की चाहत.. यह जितना थ्रिलिंग लग सकता है उतना खतरनाक भी..

शीला ने अगल बगल देखा.. पीयूष की बात सच थी.. पूरा रेस्टोरेंट खाली था.. ग्राहक नहीं होने की वजह से सारे वेटर भी किचन के अंदर थे.. जिस कौने में वह दोनों बैठे थे, वहाँ कोई सीसीटीवी कमेरा भी नहीं था..

सलामती सुनिश्चित कर शीला ने पहले तो पास पड़ा मेनू कार्ड उठाया और अपने बगल में ऐसे रख दिया ताकि किचन का दरवाजा खोलकर उनके टेबल की ओर आ रहे किसी भी व्यक्ति को शीला की छाती का नजारा न दिखें.. दोनों तरफ नजर रखते हुए शीला ने हल्के से साड़ी का पल्लू खिसकाया.. और अपने मोरपंखी नील ब्लाउज के हुक खोलने लगी.. पीयूष की नजरें भाभी के बबलों पर ऐसे चिपकी हुई थी जैसे भूखे शेर की नजर बोटी पर हो.. अपने स्तनों के विशाल आकार को ब्लाउज में बंद करने में ही शीला को सुबह दिक्कत हुई थी.. यह ब्लाउज वह पहली बार पहन रही थी.. इसलिए हुक खोलने में समय लग रहा था

शीला: "कमबख्त दर्जी ने इस बार टाइट ब्लाउज सिल दिया है.. हुक खोलने और बंद करने में कितनी प्रॉब्लेम आ रही है..!!"

पीयूष ने हँसते हुए कहा "या फिर हो सकता है की नाप सही हो पर आपके ही और ज्यादा बड़े हो गए हो"

शीला ने चुटकी लेते हुए कहा "मैं कोई अठारह साल की कमसिन कुंवारी हूँ जो मेरे स्तन अब इस उम्र में बड़े होंगे.. बकवास कर रहा है"

पीयूष: "अरे भाभी, आपके खरबूजे तो वैसे भी बेमिसाल है.. उन पर कभी कोई नियम कानून लागू नहीं होता.."

शीला ने बमुश्किल दो हूक खोलें.. लाल रंग की जालीदार लेस वाली ब्रा में कैद दोनों स्तन बहार आने के लिए फुदक रहे थे.. यह देखकर ही पीयूष अपनी पतलून के ऊपर से ही लंड मसलने लगा..

एक हुक अभी भी बंद था.. जो शीला के स्तनों को मरते मरते संभाल रहा था

शीला: "बस इतने से ही काम चला ले.. सारे हुक खोल दिए और अगर कोई आ टपका तो मैं समय रहते बंद नहीं कर पाऊँगी.. देख रहा है ना तू..!! की ब्लाउज कितना टाइट है..!!"

पीयूष हल्की नाराजगी से बोला "अरे भाभी.. ऐसा मत करो.. यूं ब्रा के पीछे छिपाकर दिखाओगी तो क्या मज़ा आएगा..!! थोड़ा तो खोलिए"

पीयूष की छटपटाहट देखकर शीला भी पिघल गई.. लेकिन यूं खुले रेस्टोरेंट में अगर उसने अपनी पूरी लीला खोल दी तो उसे समेटने में जो वक्त लगता वह खतरनाक हो सकता था.. आखिर शीला ने बीच का रास्ता निकाला.. ब्रा के अंदर हाथ डालकर उसने अपना एक स्तन बाहर लटका दिया.. बिना ब्लाउज को पूरा खोले बस यही हो सकता था..

बादल छटते ही जैसे पूर्णिमा का चाँद बाहर निकला हो वैसे ही शीला का स्तन दिखते ही पीयूष की आँखें चमक उठी.. लंड के उभार को वो कब से रगड़ ही रहा था पर शीला का खुला स्तन दिखते ही उसने पेंट की चैन खोल दी और टेबल की नीचे ही लंड निकालकर मुठियाने लगा..



शीला अब मेनू कार्ड की आड़ में अपना एक भारी भरकम स्तन बाहर निकालकर पीयूष का मनोरंजन करने लगी.. कभी वो अपने स्तन को हथेली से दबाती तो कभी अपनी निप्पल को खींचती.. लंड हिलाने की हरकत से पीयूष का शरीर एक लय में हिल रहा था.. शीला को पीयूष की इस क्रिया का अंदाजा लगते ही उसने टेबल के नीचे से अपना हाथ आगे किया और पीयूष के लंड को अपने हाथों में ले लिया



शीला के हाथ अपने लंड पर महसूस होते ही पीयूष एकदम आराम से कुर्सी पर पीठ टीकाकर बैठ गया.. आँखें बंद कर वो इस अनोखी मस्ती का आनंद ले रहा था.. बीच बीच में अपनी आँख खोलकर वो शीला के उस नग्न स्तन को देख लेता, जिसे शीला अब भी सहला रही थी.. मांस का वो विशाल गोला.. श्वेत त्वचा में लिपटा हुआ.. बादामी रंग के चक्र से आच्छादित और ऊपर शिखरनुमा निप्पल.. आहाहाहाहा.. शीला के बबलों का जलवा बेमिसाल था..

शीला ने पीयूष के लंड को मुठियाने की गति बढ़ा दी.. उसे मज़ा तो बहोत आ रहा था पर वह इस खेल को जल्दी से जल्दी खत्म करना चाहती थी.. तभी दूर से किचन का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. शीला चोंक गई.. उसका हाथ पीयूष के लंड से छूटने ही वाला था की तभी पीयूष ने अपने हाथ को अपने लंड पर रखे शीला के हाथ पर दबा दिया और उसे हाथ खींचने से रोक लिया..

पीयूष कराहा और बोला "अब रुकना मत भाभी..!!"

शीला ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा "वेटर किचन से बाहर निकला है.. कभी भी यहाँ आ सकता है, छोड़ मेरा हाथ..!!"

पर पीयूष ने अपने हाथ से शीला के हाथ को अपने लंड पर दबाए रखा और ऊपर नीचे करता गया.. गनीमत थी की वह वेटर केवल दूर रखे टेबल पर पानी का जग रखने आया था.. उसने जग रखा और वापिस किचन में चला गया.. पीयूष और शीला की ओर उसकी नजर भी नहीं थी

"आह्ह.. आह्ह.. आह्ह.. ओह्हहहहहहहह" घुरघुराते हुए पीयूष शीला के हाथों में झड़ गया..



शीला की पूरी हथेली चिपचिपी हो गई.. उसने अपना हाथ लंड से दूर कर लिया और अपने स्तन को वापिस ब्लाउज के अंदर ठुसने गई.. पर वीर्य लगे हाथ से ऐसा करने पर ब्लाउज खराब हो सकता था.. तुरंत उसने टेबल पर पड़ा नेपकीन उठाया और हथेली पर लगा वीर्य पोंछ लिया.. फिर अपने खुले स्तन को बड़ी मुश्किल से ब्रा और ब्लाउज में कैद कर हुक बंद किए.. पल्लू ठीक किया और सभ्यता से बैठ गई.. तभी वेटर किचन से उनका खाना लेकर आ पहुंचा

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शीला, वैशाली की ऑफिस पहुँचती है जहां वह दोनों पीयूष के साथ लंच करने एक रेस्टोरेंट में पहुंचते है.. वैशाली को ऑफिस के काम के सिलसिले में फोन आता है और पीयूष के कहने पर वह ऑफिस लौट जाती है..

शीला भाभी के जबरदस्त स्तनों से मुग्ध पीयूष उसे अपना जिस्म दिखाने की विनती करता है.. शीला के अंग-प्रदर्शन से प्रभावित होते हुए वह खुद को सहलाता है और आखिर शीला की मदद से चरम पर पहुंचता है..

अब आगे..

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वहाँ शीला के घर पर..

मदन, रूखी और चम्पा का दूध दुहते हुए चुदाई का भरसक मज़ा उठा रहा था.. उनके पड़ोस वाले घर पर, जो पीयूष का घर था और अब वहाँ फाल्गुनी रहती थी, उस घर के ड्रॉइंग रूम में मौसम और फाल्गुनी दोनों सोफ़े पर बैठे थे.. बेंगलोर से अपने घर आई हुई मौसम का मन किया फाल्गुनी को मिलने का तो वो खुद ड्राइव कर फाल्गुनी के शहर आ पहुंची.. जब वह फाल्गुनी के घर गई तब वो ऑफिस की पार्टी में गई हुई थी.. फाल्गुनी के निर्देश पर उसने गमले के नीचे से चाबी निकाली और घर खोलकर अंदर गई.. कुछ ही देर में फाल्गुनी भी घर आ पहुंची..

दोनों सहेलियाँ सोफ़े पर बैठी थी.. फाल्गुनी ने गुलाबी रंग की शिफॉन साड़ी और बेहद आकर्षक, बिल्कुल पीछे से खुला, बिना आस्तीन का, बहुत गहरी और चौड़ी नेकलाइन वाला, पतली डोरियों वाला बिकिनी-स्टाइल ब्लाउज़ पहना हुआ था.. उसने बेहद सेक्सी, पाँच इंच की स्टिलेटो हील वाली काली सैंडल भी पहनी थी.. दोनों के हाथ में व्हिस्की का ग्लास था और एक बड़ी स्क्रीन वाले हाई-डेफ़िनेशन टीवी लगे बैठक कक्ष में दोनों आराम से बैठीथी

"घर तो बड़ा अच्छा सजाया है तूने," मौसम ने फाल्गुनी की ओर देखते हुए कहा..

ड्रिंक का एक सिप लेते हुए फाल्गुनी ने कहा "यार, तुझे तो पता है, मुझे हमेशा से स्टाइल से रहना पसंद था.. तनख्वाह अच्छी है और कोई जिम्मेदारी भी नहीं.. इसलिए आराम से अपने ऊपर पैसे खर्च करती हूँ और बिंदास रहती हूँ"

मौसम ने बड़े ध्यान से फाल्गुनी की ओर देखा.. काफी बदलाव आ गया था उस में.. जब वह साथ पढ़ते थे तब वह बड़ी ही शांत, सहमी सी और शर्मीली लगती थी.. और तब तक लगती रही जब तक उसे फाल्गुनी और अपने पिता सुबोधकांत के बीच के अनैतिक संबंधों के बारे में पता नहीं चला था.. फिर दोनों के बीच की सारी दीवारें गिर गई.. मौसम ने परिस्थिति का स्वीकार कर लिया फिर उसके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई और वो शादी कर बेंगलोर चली गई.. एक बड़ा लंबा अरसा बीत चुका था.. बदलाव तो उसमें भी आया था पर इतना नहीं जितना फाल्गुनी बदल चुकी थी

फाल्गुनी: "क्या सोच रही है?"

फाल्गुनी के प्रश्न से मौसम के विचारों पर रोक लग गई

मौसम: "कुछ नहीं यार.. मुझे लगता है की अब तुझे शादी कर लेनी चाहिए"

मुंह बिगाड़ते हुए फाल्गुनी ने कहा "यार जिसे देखो मेरी शादी के पीछे पड़ा हुआ है.. उधर मम्मी-पापा और इधर तुम"

मौसम ने हँसकर कहा "तो कर ले ना शादी.. क्या दिक्कत है?"

पलटकर फाल्गुनी ने कहा "तूने कर ली शादी.. खुश है ना तू..!! बस यही बहोत है मेरे लिए"

सुनते ही मौसम ने नजरें झुका ली.. उसके चेहरे से मुस्कुराहट गायब हो गई..

"हम्म.. मतलब कुछ तो गड़बड़ है..!!" फाल्गुनी ने मौसम के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा "पर चिंता मत कर.. मैं तुझे तेरी लाइफ के बारे में कुछ नहीं पूछूँगी और ना ही तू मुझे कुछ पूछेगी.. इतने टाइम बाद मिले है.. मजे करते है न यार..!!"

सोचने पर मौसम को भी यही ठीक लगा.. पुराने घावों को क्यों खरोंचना..!!

"यार फाल्गुनी, गजब की सेक्सी लग रही है तू.. इतनी बनठन कर गई थी पार्टी में? तुझे देखकर ही न जाने कितनों के खड़े हो गए होंगे" ग्लास से व्हिस्की का एक घूंट गले के नीचे उतारते हुए मौसम ने कहा

अपने कमसिन जिस्म पर हथेलियाँ फेरकर एक मस्त अंगड़ाई लेकर फाल्गुनी ने कहा "अब ऊपरवाले ने इतना हुस्न दिया है तो इसमें मेरी क्या गलती" कहते हुए वह ठहाका मारकर हंस पड़ी और साथ में मौसम भी

बातों बातों में दोनों सहेलियाँ तीन तीन पेग गटक चुकी थी.. शराब का शुरूर धीरे धीरे दोनों के मस्तिष्क पर चढ़ने लगा था

"कुछ मजेदार देखते है.. और ये हाफ बोतल तो खत्म हो गई.. मैं दूसरी निकालती हूँ" कहकर सोफ़े से उठने गई फाल्गुनी अपनी हाई-हील के सेंडल के कारण लड़खड़ा कर गिर गई

"अरे जरा संभलकर.." कहते हुए मौसम ने दोनों हाथों से गिर रही फाल्गुनी को पकड़ लिया.. फाल्गुनी उसकी गोद में लेट गई.. लेटे लेटे उसे क्या मस्ती सूझी.. उसने दोनों हाथों से मौसम के एक स्तन को पकड़ लिया और कपड़े के ऊपर से ही चूसने लगी..





"धत्त पागल.. क्या कर रही है" खिलखिलाते हुए मौसम ने कहा.. वैसे फाल्गुनी के साथ उसने भूतकाल में कई बार लेस्बियन सेक्स का अनुभव किया था.. पर उस बात को काफी समय बीत चुका था

मौसम की गोद में लेटे लेटे फाल्गुनी ने मौसम के स्तन को छोड़कर कहा "याद है मौसम, हम जब तेरे रूम में ये सब करते थे तब तू मुझे मम्मी कहकर बुलाती थी और तू मेरी बेटी बनती थी.. कितना मज़ा आता था न तब रोलप्ले करने में"

मौसम फिर भूतकाल की गलियों में सरक गई.. जब उसे अपने पिता और फाल्गुनी के संबंधों के बारे में पता चला तब पहले तो उसे बहुत गहरा सदमा लगा था.. फिर धीरे धीरे उसने वास्तविकता का स्वीकार कर लिया था.. फिर जब वो और फाल्गुनी सेक्स करते तब फाल्गुनी उसकी मम्मी बनती, उसके पिता की प्रेमिका होने के नाते, और मौसम उसकी बेटी

"क्या क्या याद दिला दिया तूने यार..!!" शराब के असर से बहकते हुए मौसम ने सामने से अपने स्तन को फाल्गुनी के चेहरे पर दबा दिया..

स्तन को वस्त्र के ऊपर से ही हल्के से काटकर फाल्गुनी खड़ी हो गई..

"चल फिर से वही पुरानी महफ़िल जमाते है..!! रुक मैं आती हूँ" कहते हुए संभलकर फाल्गुनी खड़ी हुई और लड़खड़ाते हुए अंदर के कमरे से एक बोतल लेकर बहार आई और चलकर पहले टीवी के केबिनेट के पास पहुँच गई.. ड्रॉअर से एक पेनड्राइव निकाली और टीवी के यूएसबी पोर्ट पर लगाकर रिमोट से कुछ बटन दबाने लगी..

टीवी के काले परदे पर रोशनी की एक परत दिखाई दी और फिर तीन नग्न आकृतियों के लोटने और क्रीड़ा करने के दृश्य नजर आने लगे.. उनमें दो पुरुष और एक महिला थी, दोनों पुरुष उसके शरीर को बेसब्री से सहला रहे थे, शायद उसकी मोहक चूत के अंदर सबसे पहले लंड घुसाने की होड़ में.. महिला ने अपनी टाँगें फैलाईं और अपनी धड़कती हुई चूत को उजागर कर दिया, दोनों मर्द अपने लंड हिलाते हुए उसकी तरफ जाने लगे

फाल्गुनी ने फिर ड्रॉअर से सिगरेट का पैकेट और लाइटर निकाला.. बोतल उठाई और आकर मौसम के पास सोफ़े पर बैठ गई.. सामने ब्लू लेबल की बोतल और सिगरेट रखकर

"तू सिगरेट कब से पीने लगी?" आश्चर्य से मौसम ने पूछा

"रेग्युलर नहीं हूँ यार.. कभी कभी शराब के साथ दो कश लगा लेती हूँ.. तूने कभी ट्राय नहीं की?"

"ट्राय किया है.. पर सिगरेट नहीं, बेंगलोर में काफी बार हुक्का ट्राय किया है.. मज़ा आता है" मौसम ने कहा

फिर शराब की बोतल की ओर देखते हुए मौसम ने कहा "ब्लू-लेबल स्कॉच तो बहुत एक्सपेंसिव होती है यार.. मैंने आज से पहले कभी ट्राय नहीं की" मौसम ने बोतल को हाथ में पकड़ते हुए कहा..

"हाँ यार…. महंगी है पर बहुत मस्त चीज़ है… फाल्गुनी ने कहा और ढक्कन खोलकर उसने मौसम का गिलास भर दिया

" मस्त टेस्ट है….मानना पड़ेगा" मौसम ने पेग पीते हुए कहा..

"हम्म अब तू सुना… कैसे गुजर रही है ज़िंदगी?…" फाल्गुनी ने उससे पूछा..

"यार अभी तो तूने कहा की हम अपनी ज़िंदगी के बारे में बात नहीं करेंगे"

"शादी-शुदा ज़िंदगी के बारे में बात नहीं करेंगे.. और बातें तो हो ही सकती है ना" अपनी कुहनी मौसम की कमर पर मारते हुए फाल्गुनी के शरारती ढंग से कहा

दोनों सहेलियों के बीच बातचीत का दौर चलता ही गया.. पेग पर पेग बनते गए और खाली होते गए

फाल्गुनी और मौसम, दोनों लगातार शराब पी रहे थे और सिगरेट फूंकते हुए टीवी पर चल रही ब्लू फ़िल्म भी देख रहे थे, जब मौसम थाईलेन्ड में देखे सेक्स शो के बारे में बताया रही थी तब टीवी के स्क्रीन पर गोरी अब अपनी पीठ के बल लेटी हुई थी, उसका शरीर कमर से नीचे उस पुरुष से ढका हुआ था जो उसे चोद रहा था, उसकी टाँगें उसकी अपनी टाँगों से सटी हुई थीं, उसकी बाहें उसके शरीर के दोनों ओर फैली हुई थीं, उसका मुँह पूर्ण आनंद में खुला हुआ था.. दूसरा पुरुष अपने घुटनों पर था और अपने लंड को उसके मुंह में डालकर चोद रहा था

फाल्गुनी और मौसम, दोनों नशे में धुत थे और गर्म भी हो रहे थे.. फाल्गुनी सोफ़े पर पीछे झुक गई और अपने पैर टी-टेबल पर टिका दिए.. मौसम, जो टीवी पर गरमागरम द्रश्य देख रही थी, उसने फाल्गुनी के काले ऊँची-हील वाली सैंडल में सुंदर पैरों को देखा..

"यार तेरे गोरे पैर इस सैंडल में बहुत सेक्सी लगते हैं…तू भी मेरी तरह सेक्सी हाई हील्स पहनना पसंद करती है…." मौसम ने सिगरेट का लंबा कश खींचते हुए कहा..

"हाई हील्स वाले सैंडल तो मेरी जान हैं…मेरे पास कम-से-कम २० जोड़ी सैंडल हैं… अलग अलग रंग के और डिज़ाइन के… " फाल्गुनी ने कहा.. "हाई हील्स की बात ही अलग होती है.. हील्स पहनने से चाल में कितना ग्रेस और चार्म आ जाता है…हर कदम कितना नाज़ुक और कोमल लगता है…" फाल्गुनी बोलती रही

इसी बीच मौसम ने भी अपने पाँच इंच की लाल हील्स वाले पैर मेज़ पर रख दिए.. "सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह है कि हर देखने वाले आदमी का लंड सलामी देने के लिए खड़ा हो जाता है.." फाल्गुनी ने और झुककर मौसम के पैरों को अपनी गोद में खींच लिया.. फिर, अपना सिर थोड़ा झुकाकर और मुँह खोलकर, फाल्गुनी ने अपनी जीभ सैंडल के चमड़े पर हल्के से फेर दी.. "सैंडल की अनोखी गंध मुझे पागल बना देती है" फाल्गुनी ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी जीभ मौसम के सैंडल की चमकदार लाल पट्टियों और हील्स पर नाचती और फिसलती रही..

मौसम ने बारीकी से देखा, खुशी से गुर्राई और बोली: "मम्म्म्म. मज़ा आ रहा है यार!"

फाल्गुनी की जीभ ने मौसम के सैंडल की बनावट पर पूरी शिद्दत से चक्कर लगाना शुरू कर दिया, और उसकी एड़ियों को लंड की तरह चूसा.. उसकी जीभ उसके खुले पंजों के बीच दौड़ी, मौसम के पसीने का तीखापन चखा, उसे अच्छी तरह साफ़ किया.. अब दोनों में से किसी की भी टीवी स्क्रीन पर दिख रहे दृश्यों में रुचि नहीं थी..





गरम हो रही मौसम ने फाल्गुनी को अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगी.. उनकी जीभों ने एक-दूसरे के मुँह के हर कोने को तलाश लिया.. वे क्षण भर के लिए अलग हुए और एक-दूसरे कपड़े उतारने में मदद करने लगे.. जैसे ही दोनों के जिस्म से लिबास का हर कतरा उतर गया, दोनों नंगे बदन एक-दूसरे से लिपट गई, उनके हाथ एक-दूसरे की चिकनी पीठ को सहला रहे थे.. फिर दोनों अलग हुए और एक-दूसरे के स्तनों को सहलाया..





मौसम के संतरे जैसे स्तनों को देखते ही फाल्गुनी उन पर झपटी और पूरा मुंह फाड़कर उसके स्तनों को लगभग निगल गई.. मौसम ने भी नीचे हाथ बढ़ाकर फाल्गुनी के स्तनों को सहलाया.. बीच-बीच में वे बार-बार किस करते रहे.. कुछ देर बाद फाल्गुनी ने सिर झुकाया और मौसम के संवेदनशील निप्पल्स को धीरे से चूसना शुरू कर दिया.. फाल्गुनी ने अपने नरम, गीले होठों से मौसम के मोटे गुलाबी निप्पल्स को तब तक खींचा जब तक उसकी आह्ह न निकल गई.. चूसने चाटने की वजह से मौसम की निप्पल लाल लाल हो गई थी.. फिर उसने निप्पलों को उंगलियों से कैंची की तरह दबाया, और उन्हें प्यार से मरोडा, कुरेदा और चिकोटी काटकर चूसने लगी.. इस बेतहाशा आनंद से मौसम पागल हुई जा रही थी..





वे दोनों अब हाँफ रहे थे, तड़प रहे थे, उत्तेजित थे.. मौसम ने अपनी बाहें फाल्गुनी की नंगी पीठ के चारों ओर डाल दीं और उसे खुद से सटा लिया.. दोनों के सख्त नंगे स्तनों को आपस में मसलते और रगड़ते हुए महसूस किया.. मौसम के सख्त निप्पल अभी भी फाल्गुनी की गर्म लार से गीले थे.. उसने अपनी जीभ फाल्गुनी के कान के सुराख में घुमा दी.. उसकी पीठ की चिकनी रेशमी त्वचा को सहलाया, उसकी लंबी मलाईदार गर्दन को चूमा और धीरे से काटा, धीमी, बेसुरी, भारी आवाज़ें निकालीं, फाल्गुनी के बालों में बुदबुदाई.. "ऊम्म्म्म…. छोड़ मुझे…कितना मज़ा आ रहा है… उफ्फ़…!!"

लगभग कामवासना से बेहाल फाल्गुनी, मौसम के काँपते शरीर से नीचे सरक गई.. मौसम अपने सैंडल के अलावा पूरी तरह नग्न थी, और फाल्गुनी की हरकतों के कारण उत्तेजना से काँप रही थी.. दोनों के तवे बेहद गरम हो चुके थे.. उनके चिकने, लचीले गोरे सेक्सी शरीर एक साथ कुंडली मार रहे थे.. मौसम ने अपने हाथ फाल्गुनी के कूल्हों तक फिराए, उन्हें दबाया, और अपनी उंगली उसकी गाँड की गर्म दरार में ऊपर-नीचे फिराई..





मौसम ने फाल्गुनी के उत्तेजित चेहरे को देखते हुए उसकी काँपती गांड के उभरे हुए गोल मांस के भूरे सँकरे छेद में अपनी उंगली डाल दी.. तेज़ गर्म झटकों ने उसके शरीर को जकड़ लिया..

"ओह्ह... ऊईईई" वह कराह उठी.. यूं गाँड में उंगली करते हुए फाल्गुनी को आनंद से बड़बड़ाते देखने में मौसम को मज़ा आ रहा था.. वह धीरे धीरे अपनी उंगली उस छेद में घूमा रही थी.. उंगली करवाते हुए भी फाल्गुनी की हरकतें जारी थी.. उसके हाथ मौसम की भीतरी जाँघों पर, हाँफते पेट पर और उसकी मुड़ती हुई कमर पर खूबसूरती से घूम रहे थे.. मौसम को इतना मज़ा आ रहा था कि सहन करना मुश्किल हो रहा था पर फिर भी वह चाहती थी की यह खेल चलता ही जाए

मौसम की चूत रस से टपक रही थी.. आग उबल रही थी.. उसकी चूत को अब मेहमानवाजी की तीव्र इच्छा हो रही थी.. और जाहीर सी बात थी की ऐसी इच्छा फाल्गुनी के मन में भी उठ रही होगी.. आँखें बंद कर लेटी मौसम करवट बदल कर ऐसी स्थिति में आना चाहती की जहां उसके मुंह और फाल्गुनी की चूत के बीच कुछ न हो.. पर इससे पहले ही मौसम का पूरा शरीर एक अनोखे आनंद से कांप उठा.. फाल्गुनी की जीभ उसकी गरम गीली दरार में घुस चुकी थी..!!

"उफ्फ़... ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह्ह.. आह्ह.. ईशशशश.. ऊई माँ..!" वह चीख पड़ी, उसके कूल्हे बेबसी से उछल रहे थे और सोफ़े पर गोल गोल घूम रहे थे.. गरम शहद जैसा प्रवाही चूत में से बह रहा हो ऐसी अनुभूति उसकी भूखी चूत में गोली की तरह दौड़ गई.. बेतहाशा उत्तेजना से वह फाल्गुनी के शरीर, कमर और रेशमी पीठ पर अपने नाखून से खरोंचने लगी..

फाल्गुनी की जीभ जब मौसम की चूत के होंठों को कुरेदते हुए अंदर घुस गई, तब मौसम को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसके प्राण निकल जाएंगे..!! उसका शरीर ढीला पड़ गया.. हाथ निर्जीव होकर सोफ़े पर गिर गए.. अब जैसे उसने अपना पूरा जिस्म फाल्गुनी के हवाले सौंप दिया था.. चरम के मदहोश अनुभव से उसका दिमाग कुछ क्षणों के लिए चकरा सा गया.. उसका मन कर रहा था की ऐसा अलौकिक अनुभव देने के लिए वो फाल्गुनी को चूम ले.. और उसकी चूत को भी ऐसे ही चाट कर मस्त कर दे.. लेकिन फिलहाल इसके बारे में वह कुछ नहीं कर सकती थी.. उसका अपना शरीर हवस की लौ से झुलस रहा था.. लहरा रहा था, पागल हुआ जा रहा था..

फाल्गुनी की जीभ ने उसकी भांप छोड़ रही चूत के गीले मांस को ओर टटोला.. मौसम को अपनी तनी हुई क्लिटोरिस और चीखती हुई तंत्रिकाओं के गुच्छे पर उसकी जीभ की रगड़न महसूस हो रही थी.. उसके मुंह से "आह्ह ओह्ह उफ्फ़" की पगलाई आवाज़ें निकल रही थी.. , वह तड़पती और कराहती रही.. कमर को गोल गोल घुमाते हुए फाल्गुनी की जीभ से अपनी चूत चटवाती रही..





एक ऑर्गेज़्म से अभी अभी उभरकर दूसरी पराकाष्ठा की ओर यात्रा कर रही मौसम, आनंद से कांपते हुए फुसफुसाई "आह्ह लीक मी.. उफ्फ़ फाल्गु.. इतना मज़ा आ रहा है की क्या बताऊँ.. फक.. ऐसे ही.. हाँ हाँ.. बिल्कुल वहीं पर.. थोड़ा और जोर से.. आह्ह फक..!!" कराहते हुए मौसम ने फाल्गुनी की जीभ के सामने सम्पूर्ण समर्पण स्वीकार लिया था..

चूत चाटते हुए फाल्गुनी के मुँह से चटकारों की तेज़ आवाज़ें सुनाई दे रही थी.. मौसम को फाल्गुनी की धीमी गुनगुनाती कराहें और घुरघुराहटें सुनाई दे रही थी.. उसके नाखूनों को अपनी जाँघों और नितंबों के मांस में गड़ता हुआ महसूस कर सकती थी.. फाल्गुनी की इन हरकतों ने उसकी कामुकता को और भी प्रचंड आग में झोंक दिया.. आँख बंद कर लेटे हुए मौसम ने अपनी दोनों हथेलियों को फाल्गुनी के हिलते हुए माथे पर रख दिया.. उसकी उँगलियाँ सिर के बालों को सहलाने लगी.. बीच में फाल्गुनी ने कुछ ऐसे जीभ चलाई की मौसम का पूरा शरीर एठ गया.. उसने फाल्गुनी की खोपड़ी पकड़ ली और उसके मुँह को अपनी रसीली बुर में जोर से दबा दिया





फाल्गुनी के सिर को अपनी उछलती जाँघों में जकड़ कर दबाते हुए, उन गहरी संवेदनाओं की भयंकर तीव्रता को बर्दाश्त करने की कोशिश कर रही थी मौसम.. उसकी चूत कभी सिकुड़ती तो कभी फैलती.. हर सिकुड़न के साथ अच्छी मात्रा में चिपचिपा गरम मीठा रस बहकर फाल्गुनी की जीभ को पावन कर रहा था.. असहाय होकर सोफ़े पर बलखाती, इठलाती मौसम जिस्म को मरोड़ते हुए आनंद के चरम पर कराह रही थी

दूसरी बार चरमसीमा की ओर यात्रा कर रही मौसम चाहती थी की ऑर्गेज़्म का वह असीम आनंद, आकर चला न जाएँ.. तब जो दिव्य अनुभूतियाँ होती है वह बस चलती रहे.. चलती ही रहे..!!

"आह्ह, और तेज चला अपनी जीभ.. फक मी हार्ड.. ऊईईई.. ओहहह फाल्गुनी.. मेरी जान.. आह्ह.. मेरा फिर से निकल रहा है, मेरी जान.. ऊँहहह.. आह्ह.. मैक मी कम डार्लिंग.. मैक मी कम वेरी लॉंग" फाल्गुनी जान गई की मौसम अब फिर से झड़ने की कगार पर है.. उसने मौसम की चेरी जैसी लाल कठोर क्लिटोरिस को मुंह में भर लिया और उसे होंठों की बीच दबाकर मुंह में शून्यवकाश रच दिया..





मौसम अपने चरम पर पहुँच गई.. वह चीख पड़ी.. उसका शरीर गर्म ऐंठनों से झुलस कर चूर हो गया.. चरमसीमा के जबरदस्त एहसास ने उसकी कोमल कच्ची तंत्रिकाओ को तोड़ कर रख दिया.. जलती हुई, कांपती हुई और बेकाबू होकर सिसक रही मौसम का शरीर थरथरा रहा था.. झटके पर झटके खा रहा था





इस धमाकेदार ऑर्गेज़्म के बाद मौसम निढाल होकर लाश की तरह सोफ़े पर पड़ी रही.. फाल्गुनी भी उसके बगल में लेट गई.. थोड़ी मिनटों तक यूं ही पड़े रहने के बाद अब फाल्गुनी का मन कर रहा थी की अपनी बुलबुलाती मुनिया को मजे कराए जाएँ

फाल्गुनी ने पास लेटी मौसम का चेहरा खींचकर अपनी लंबी लाल गीली चूत में घुसा दिया.. मौसम का मुंह फाल्गुनी के बहते हुए चूत के रस की गाढ़ी, कस्तूरी जैसी गंध से भर गया.. मौसम इस बात से दंग थी की दो भारी ऑर्गेज़्म के बाद भी उसकी इच्छा कम नहीं हुई थी..

मौसम को अपनी आँखों के पीछे, कानों के परदों में गर्म खून की धड़कन महसूस हो रही थी.. फाल्गुनी के उस सुंदर चमकते लाल घावनुमा बुर को मुग्ध होकर देखते हुए मौसम ने चूम लिया.. फाल्गुनी की चूत के मध्य में फैले लाल छेद के प्रत्येक तरफ सूजे हुए चिकने चूत-होठों को चाटा.. फाल्गुनी के कूल्हे अचानक तेज उछलती हरकतों से फड़फड़ाने लगे, उसकी गांड मरोड़ खाने लगी.. जाँघ की मांसपेशियाँ सिकुड़ने लगी.. फाल्गुनी कराहते हुए हिनहिना रही थी.. उसकी उन्मत्त उंगलियाँ सोफ़े के नरम कुशन में गड़ रही थीं..

"उफ्फ़फफ.. वाऊ.. यस यस्स.. " फाल्गुनी घुरघुराई.. "तेज़. डू इट फ़ास्ट. जोर से.. और जोर से! ओह हाँ.. ऐसे ही, उम्ममम..!!!!!"

फाल्गुनी की फैली हुई चूत रस से चमक रही थी, उसके चूत के होठ गर्म रक्त से सूजे हुए और फूले हुए थे.. उसके कूल्हे इतनी ऐंठन से उठ रहे थे, फड़फड़ा रहे थे और उछल रहे थे कि मौसम मुश्किल से अपना मुँह उस सुंदर मलाईदार दरार पर रख पा रही थी.. फिर भी, मौसम ने अपना चेहरा उसकी चूत में दबाया और अपनी जीभ को गरम जकड़ते योनिमार्ग में गहराई तक घुसा दिया..





फाल्गुनी की धधकती चूत के रसीले रस को मौसम ने बड़े ही चाव से चूसा और गटक गई.. उसने फाल्गुनी की चिपचिपी, स्वादिष्ट खाई को अपनी जीभ से खोदा और जड़ें जमाईं, जिससे फाल्गुनी की खुशी, कामुकता से भरे गरारों के रूप में व्यक्त हो रही थी.. फाल्गुनी की फुसफुसाहट भरी आवाज़ें.. उसके सुंदर शरीर का बेबस लोटना, मरोड़ना और साथ में मौसम की लपलपाती जीभ का उसकी चूत को और अंदर से कुरेदना.. उसे कामुकता के उच्च से उच्च स्तर पर ले गई..

हवस की पागल उबलती भूख से कराहते और गुनगुनाते हुए उसने फाल्गुनी की चमकती लाल दरार को चाट चाटकर साफ कर दिया.. ऊपर से नीचे तक स्वादिष्ट, मुलायम गीली परतों को चाटा, सूजे हुए लाल होंठों को अपने होठों के बीच दबाया और फाल्गुनी की सिकुड़ रही रस-बहती खाई को होठों से मसला, उसकी क्लिटोरिस के दाने को तब तक चूसती रही जब तक फाल्गुनी चीख नहीं पड़ी और बुरी तरह फड़फड़ा न उठी.. फाल्गुनी के कूल्हे उछल रहे थे और उमड़ रहे थे, उसका शरीर तन रहा था और मुड़ रहा था.. उसका पूरा शरीर एक धमाकेदार ऑर्गेज़्म की ओर अग्रेसर था..

"आआआआहहहहहह..!!!" फाल्गुनी कराह उठी, एक उन्मत्त लालसा से विक्षिप्त होकर.. मौसम ने अपनी सहेली की रसभरी स्वादिष्ट चूत को चूसा और अपनी जीभ से कुरेद कर रख दिया.. बेतहाशा प्यास से फाल्गुनी की चूत से रिस रहे मक्खन को निगलती गई.. चूत की गाढ़ी गंध को सूंघते ही उसका सिर चकरा गया, लेकिन छटपटाती, ऐंठती हुई फाल्गुनी को नीचे दबाए रखना अब मौसम के लिए मुश्किल हो रहा था.. मौसम से कद में दो इंच छोटी होने के बावजूद फाल्गुनी मज़बूत थी.. नियमित व्यायाम और जॉगिंग से उसका जिस्म कसा हुआ था.. वह उसके कूल्हे सोफे पर उछाल उछालकर हिला रही थी जिससे उसकी चूत मौसम के लालसी मुँह से टकराती जा रही थी..

मौसम ने फाल्गुनी की हिलती हुई जांघों को पकड़ा, उसकी उछलती हिलती जांघों की घूमती हड्डियों को थामने की कोशिश की, ताकि उसे स्थिर रख सके.. उसने अपनी उंगलियाँ फाल्गुनी के गोल, भिंचते कूल्हों में गड़ा दीं, और फाल्गुनी खुशी से चीख पड़ी..

"हाययययय हाँ...!" उसने दाँतों को पिसते हुए कहा.. "निचोड़ डाल मुझे, मेरी गांड दबा, मेरे बूब्स निचोड़...! आआहहहह..!!!" उसकी मजबूत जांघों ने मौसम के सिर को कसकर जकड़ लिया.. जोर जोर से हांफते हुए उसने अपनी चूत को मौसम के मुँह पर रगड़ा और मौसम ने अपने हाथ उसके सख्त निप्पल वाले हिलते स्तनों तक बढ़ाए.. उन्हें पकड़ लिया.. दबोच लिया..

उसके होंठ फाल्गुनी के भीगी सूजी हुई लाल लाल क्लिटोरिस पर कसकर चिपके हुए थे.. फाल्गुनी लहराते हुए शहद जैसे रस गिराते हुए, झटकों के साथ चरम पर पहुँचने लगी..





"ओह! ओह!" फाल्गुनी कराहते हुए बोली.. उसका शरीर तीव्र, ऐंठन भरे कंपनों से थरथरा रहा था.. "याइईईईई! उँह! याइईईईई!" वह चीखी, भयानक, हिंसक तीव्रता के साथ पूरे जिस्म को मरोड़ते हुए.. फाल्गुनी कराहती रही और ऐंठती रही और चूत से चरम का पानी गिराती रही.. उसके बुरी तरह थरथराते जिस्म को मौसम थामे रही, अपनी जीभ को उसकी चरम-त्रस्त चूत की गर्म रसीली गहराइयों में दबाए रखा, और अपने हाथों से फाल्गुनी के मस्त संतरों को मसलती रही.. जब ऑर्गेज़्म के तूफान का असर कुछ कम हुआ.. फाल्गुनी का शरीर शांत पड़ गया.. वह अभी भी हाँफ रही थी पर चेहरे पर असीम शांति और संतुष्टि के भाव थे..

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प्यारे वाचक मित्रों

फोरम में चल रही Ultimate Story Contest 2026 के अंतर्गत मैंने चार कहानियाँ पोस्ट की है।

दोस्तों, अगर आप रहस्य, सस्पेंस, जज़्बात और ज़बरदस्त कॉमेडी के दीवाने हैं, तो कुर्सी की पेटी बांध लीजिए!
🚀

मैं आपके लिए लेकर आया हूँ मेरी 4 सबसे चुनिंदा कहानियाँ। हर कहानी का मिज़ाज एकदम अलग है, इतिहास के पन्नों से लेकर आज के व्यंग्य तक, और खौफनाक गुनाहों से लेकर एक पिता के बलिदान तक।

एक नज़र डालिए इन कहानियों पर जो आपको पलकें झपकाने का मौका नहीं देंगी:

१. कालकूट का शृंगार (ऐतिहासिक थ्रिलर) 👈 Link





तीसरी शताब्दी के पाटलिपुत्र की एक रहस्यमयी दुनिया, जहाँ राजनीति और षड्यंत्र अपने चरम पर हैं। एक ओर है विषकन्या मदनरेखा का घातक आकर्षण, तो दूसरी ओर यवन राजनयिक जयवर्मन की शातिर चालें। और इन सबके बीच उलझे हैं महर्षि वात्स्यायन! क्या होगा जब सत्ता के इस खूनी खेल में 'ज़हर' (कालकूट) को ही शृंगार बना लिया जाए? एक ऐसा ऐतिहासिक थ्रिलर जो आपको प्राचीन भारत के सबसे खतरनाक रहस्यों के बीच ले जाएगा!

२. पचास करोड़ की राख (इमोशनल सस्पेंस) 👈 Link





एक पिता अपनी बेटी के सुरक्षित भविष्य के लिए किस हद तक जा सकता है? क्या वह मौत से भी सौदा कर सकता है? यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि इंश्योरेंस के पैसों और एक पिता के उस खौफनाक बलिदान की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान है, जिसका अंत आपको अंदर तक झकझोर कर रख देगा। आखिर एक मुट्ठी राख की कीमत पचास करोड़ कैसे हो सकती है?

३. जब ज़मीन बुलाती है (साइकोलॉजिकल थ्रिलर) 👈 Link





इंसान कामयाबी की कितनी भी ऊँचाइयों पर क्यों न पहुँच जाए, उसके अतीत के गुनाह उसका पीछा कभी नहीं छोड़ते। यह कहानी है एक ऐसे कामयाब इंसान की, जिसका काला अतीत अब खौफनाक साये की तरह लौट आया है। जब आपके अपने ही कर्म ज़मीन के नीचे से आपको पुकारने लगें, तो भागने का कोई रास्ता नहीं बचता। क्या कोई अपने ही बुने हुए जाल से ज़िंदा बाहर आ सकता है?

४. पंप तेरी ऐसी की तैसी (कॉमेडी/व्यंग्य) 👈 Link





सस्पेंस और थ्रिलर के बाद अब बारी है पेट पकड़ कर हँसने की! सोचिए... अमेरिका में बैठा रोनाल्ड पम्प मिसाइल छोड़ने की जगह अगर किसी सीधी-सादी भारतीय गृहिणी की चाय का पानी गिरवा दे, तो कैसा बवाल मचेगा? यह एक फुल-ऑन कॉमेडी और व्यंग्य है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का तड़का एक आम आदमी की चाय और अदरक के पानी के साथ लगता है। हँसी की पूरी गारंटी, उस नाशपीटे पंप की कसम!

ये चारों कहानियों का लिंक उसके टाइटल में है। लिंक पर क्लिक करते ही आप स्टोरी तक पहुँच जाएंगे। इमेज के नीचे Spoiler बटन पर क्लिक करते ही स्टोरी खुल जाएगी। आज ही पढ़ना शुरू करें और मुझे कमेंट्स में बताएं कि आपको कौन सी कहानी ने सबसे ज़्यादा चौंकाया या हँसाया! लाइक और कमेन्ट करेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा

साभार..

vakharia


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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

शीला के घर पर मदन, रूखी और चम्पा के साथ संबंध बना रहा होता है। वहीं दूसरी ओर, बेंगलोर से मौसम अपनी सहेली फाल्गुनी से मिलने आती है। फाल्गुनी अपने घर पर मौसम का स्वागत करती है, और दोनों शराब पीकर पुरानी यादें ताजा करती हैं। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होती हैं और लेस्बियन संबंध बनाती हैं, जिसमें वे एक-दूसरे को चरम सुख प्रदान करती हैं। यह दृश्य टीवी पर चल रही अश्लील फिल्म के बीच और अधिक उत्तेजक हो जाता है। धमाकेदार ऑर्गेज़्म के साथ दोनों तृप्त होकर शांत हो जाती है..

अब आगे..

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कविता के आलीशान घर का द्रश्य..

विशाल ड्रॉइंग-रूम के महंगे सोफ़े पर शीला पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी..

कमरे की छत से लटकते हुए विशाल क्रिस्टल के झूमर की सुनहरी रौशनी उस आलीशान ड्रॉइंग रूम में एक नरम सा उजाला बिखेर रही थी.. इटालियन मार्बल के फर्श पर शीशे की मेज़ और मखमली काउच सजे थे.. यह कविता का घर था.. एक ऐसा महल जो उसके पिता सुबोधकांत के गुज़र जाने के बाद पीयूष को मिली विरासत और उसकी दिन-रात की मेहनत का नतीजा था..

शीला:"नज़र न लगे तुम्हारे इस आशियाने को! कितने टाइम बाद मिल रहे हैं हम, कविता.. सच कहूँ तो तू बिल्कुल बदल गई है, एकदम इस महल की महारानी लग रही है.."

कविता के होठों पर एक बहुत ही सधी हुई, शिष्टाचार वाली मुस्कान तैर गई.. उसने पास खड़े नौकर को इशारा किया, जिसने बेहद नज़ाकत से दोनों के सामने क्रिस्टल के गिलासों में व्हिस्की उड़ेल दी..

गिलास शीला की तरफ बढ़ाते हुए कविता ने कहा "पर आप बिल्कुल नहीं बदली भाभी! इतने वक्त बाद आपको देखकर सच में ऐसा लग रहा है जैसे कोई अपना इतने बड़े और खाली घर में आ गया हो.. अच्छा हुआ आप आई.."

व्हिस्की का एक छोटा घूंट लेते हुए शीला ने कहा "अरे, बस वक्त ही नहीं मिला.. वैशाली की ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ... संजय से उसका वो दर्दनाक तलाक, फिर पिंटू के साथ उसकी नई शुरुआत... इन सब में उलझ कर रह गई थी.. पर सच बताऊँ, पीयूष ने सुबोधकांत के जाने के बाद जिस तरह से बिज़नेस को बड़े अच्छे से संभाला और इतना बड़ा बना दिया, काबिले-तारीफ है.."

कविता ने अपना गिलास उठाया.. उसकी उंगलियाँ गिलास के ठंडे काँच को सहला रही थीं.. उसने एक हल्का सा घूंट लिया, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँच रही थी..

कविता: "हाँ भाभी... पापा के अचानक चले जाने से सब बिखर गया था.. लेकिन पीयूष ने दिन-रात एक कर दिया.. ये घर, ये गाड़ियाँ, ये रुतबा... सब उसकी मेहनत का नतीजा है.."

कमरे में एक पल के लिए हल्की सी खामोशी छा गई, जिसे सिर्फ बैकग्राउंड में बज रहे बेहद धीमे वाद्य संगीत ने भरा.. शीला की पारखी नज़रें कविता के चेहरे को पढ़ रही थीं.. इतने महँगे लिबास और सजे-संवरे रूप के पीछे एक अजीब सी थकान और उदासी छुपी थी.. शीला ने अपना गिलास टेबल पर रखा और थोड़ी गंभीर हो गईं..

शीला: "घर तो बहुत खूबसूरत बना लिया है पीयूष ने.. लेकिन सच बता कविता... क्या तू खुश है यहाँ? पीयूष ने बिज़नेस तो बहुत बड़ा कर लिया, लेकिन मुझे लगता है इस आपाधापी में वो तुझे कहीं पीछे छोड़ गया है.."

शराब की गर्माहट धीरे-धीरे कविता की नसों में उतर रही थी, और उसके साथ ही वो औपचारिकता का पर्दा भी पिघलने लगा था जो उसने ओढ़ रखा था..

हल्की सी आह भरते हुए और अपनी नज़रें झुका कर कविता ने जवाब दिया "खुशी क्या होती है भाभी, अब तो मुझे याद भी नहीं.. पीयूष के पास फुर्सत ही कहाँ है? सुबह वो उठता हैं तो फोन पर बात करते हुए, रात को लौटता है तो थका हारा.. कई बार हफ्तों गुज़र जाते हैं और हम ढंग से बात भी नहीं कर पाते.. कभी-कभी तो लगता है कि मैं इस आलीशान घर में महज़ एक कीमती शोपीस बनकर रह गई हूँ, जिसकी देखभाल तो होती है, पर जिससे कोई प्यार नहीं करता.."

शीला अपनी जगह से उठीं और आकर कविता के पास सोफे पर बैठ गईं.. उसने अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा.. शीला हमेशा से ही बहुत खुले विचारों वाली रही थीं, दुनियादारी के झूठे पर्दों से उसे कोई खास वास्ता नहीं था..

आवाज़ में एक राज़दार वाली नर्मी लाते हुए शीला ने कहा "मैं तुझे बरसों से जानती हूँ कविता.. वो भी एक वक्त था जब मेरी ही छत के नीचे, मेरे ही घर के उस छोटे से कमरे में तेरे और पिंटू के कहकहे गूँजते थे.. याद है न? तेरी शादी पीयूष से हो जाने के बाद भी मैंने तुम दोनों को कितनी बार मिलवाया था..!!"

पिंटू का नाम सुनते ही कविता के हाथ में पकड़ा गिलास हल्का सा कांप गया.. उसकी आँखों में एक पल के लिए घबराहट और एक पुरानी टीस तैर गई.. उसने जल्दी से अपना हाथ शीला की पकड़ से छुड़ाया और व्हिस्की का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतार लिया..

आवाज़ में हल्की सी झिझक और घबराहट के साथ कविता ने कहा "भाभी... प्लीज़... पुरानी बातें अब क्यों निकाल रही हैं? अब तो बहुत कुछ बदल गया है.. वैशाली... अब पिंटू की पत्नी है.. और सबसे बड़ी बात, वैशाली और पिंटू दोनों अब पीयूष के ही ऑफिस में काम करते हैं.. रोज़मर्रा का आमना-सामना है... मैं... मैं उस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहती.."

शीला ने हार नहीं मानी.. उस ने कविता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी आँखों में सीधा देखा..

शीला: "कविता, मेरी आँखों में देख.. मैं यहाँ वैशाली की माँ बनकर नहीं बैठी हूँ.. मैं तेरी वही पुरानी शीला भाभी हूँ.. वैशाली मेरी बेटी है, और पिंटू ने उसे एक नई ज़िंदगी दी है, वो सब अपनी जगह है.. लेकिन आज मैं तेरी बात कर रही हूँ.. शराब का ये गिलास तेरे हाथ में है, और मैं जानती हूँ ये घूंट तू पीयूष की बेरुखी को भुलाने के लिए नहीं, किसी और की याद को दबाने के लिए पी रही है.. मुझे सच बता... क्या आज भी तेरे दिल में पिंटू के लिए वही जज़्बात हैं?"

कविता ने नज़रें चुराने की बहुत कोशिश की, लेकिन शीला के स्पर्श, उस पुराने अपनेपन और शराब के नशे ने उसके अंदर सालों से बनाए गए सब्र के बाँध में दरार डाल दी.. कविता की आँखें अचानक भर आईं.. उसके होंठ कांपने लगे..

रुंधे हुए गले से कविता बोली "आप क्यों पूछ रही हैं भाभी? क्यों कुरेद रही हैं उन ज़ख्मों को जिन्हें मैं रोज़ अपने इन महँगे कपड़ों और झूठी मुस्कान के नीचे छुपाती हूँ? आप सच जानना चाहती हैं? तो सुनिए..."

कविता ने अपना गिलास टेबल पर ज़ोर से रखा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी बेबसी, गुस्सा और दीवानगी एक साथ झलक रही थी..

कविता: "हाँ भाभी! हाँ, मैं आज भी उसी तरह तड़पती हूँ उसके लिए! बल्कि अब तो ये तड़प और भी जानलेवा हो गई है.. पीयूष से मेरी दूरियां अब खाई बन चुकी हैं.. हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं बचा.. और दूसरी तरफ... दूसरी तरफ जब मैं पिंटू को पीयूष के ऑफिस की पार्टियों में देखती हूँ... जब उसे वैशाली के साथ मुस्कुराते हुए देखती हूँ, तो मेरे सीने में आग लग जाती है भाभी.. मैं पागल हो जाती हूँ ये सोचकर कि वो शख्स, जिसकी बाहों में मैंने जन्नत महसूस की थी, जिसके लिए मैंने दुनिया से बगावत करने की सोची थी... वो मेरे सामने है, पर मेरा नहीं है!"

कविता की आवाज़ अब सिसकियों में बदल गई थी.. उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छुपा लिया.. शीला चुपचाप उसकी पीठ सहलाती रहीं..

रोते हुए, टूटती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "आपको पता है भाभी, जब रात को इस बड़े से बेडरूम में मैं अकेली होती हूँ, तो ये दीवारें मुझे खाने दौड़ती हैं.. मैं फोन उठाती हूँ, उसका नंबर डायल करने ही वाली होती हूँ... फिर मुझे याद आता है कि वो अब मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरी भाभी की बेटी का पति है.. मैं अपने ही होंठ काट लेती हूँ ताकि मेरी चीख बाहर न निकले.. मैं उसे भूलना चाहती हूँ, पर जितनी बार वो काम के सिलसिले में पीयूष के साथ इस घर में आता है, मेरी सालों की तपस्या एक पल में टूट जाती है.. मैं आज भी सिर्फ और सिर्फ पिंटू से प्यार करती हूँ... मैं उसके बिना घुट-घुट कर मर रही हूँ भाभी.."

कविता पूरी तरह से टूट चुकी थी.. उसने अपना सिर शीला के कंधे पर रख दिया और किसी छोटी बच्ची की तरह फूट-फूट कर रोने लगी.. शीला ने उसे अपने गले से लगा लिया, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी सोच और कशमकश तैर रही थी..

कमरे में अब सिर्फ कविता की सिसकियों की आवाज़ थी, जो उस विशाल और शांत घर की दीवारों से टकराकर और भी गहरी लग रही थी.. एसी की ठंडी हवा के बावजूद माहौल में एक अजीब सा भारीपन आ गया था.. महँगी व्हिस्की की सोंधी महक और कविता के आंसुओं की नमी आपस में घुल-मिल गई थी..

शीला कुछ पलों तक बिल्कुल खामोश रहीं.. उसके चेहरे की लकीरों पर एक गहरी कशमकश और दर्द उभर आया था.. एक तरफ उसकी अपनी बेटी वैशाली थी.. दूसरी तरफ उसकी बाँहों में वो कविता थी, जिसके इश्क की वो खुद गवाह रही थीं, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से पिंटू से मिलाया था..

शीला ने बहुत ही कोमलता से कविता के उलझे हुए बालों को सहलाया और उसे तब तक रोने दिया जब तक कि उसके सीने का गुबार आँसुओं के रास्ते थोड़ा कम नहीं हो गया.. फिर, उन्होंने एक गहरी साँस ली और कविता का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामकर ऊपर उठाया.. कविता की आँखें लाल हो चुकी थीं और काजल गालों पर फैल गया था..

बेहद शांत, ठहरी हुई और भारी आवाज़ में शीला ने कहा "रो ले कविता... आज जी भर के रो ले.. इन आँसुओं को इस महँगे मार्बल पर गिर जाने दे.. तूने बहुत सालों तक इस दर्द को अपने सीने में दबा कर रखा है.."

शीला ने टेबल से नैपकिन उठाया और बहुत ही प्यार से कविता के आँसू पोंछे.. उनकी आँखों में कोई शिकायत या तिरस्कार नहीं था, बल्कि दुनिया की कड़वी सच्चाई को समझ लेने वाली एक गहरी उदासी थी..

शीला: "तू मुझे भाभी कहती है न? तो आज एक बात बहुत ध्यान से सुन.. मैं दुनिया की उन आम औरतों में से नहीं हूँ जो तुझे ये नसीहत दूंगी कि अब तू शादीशुदा है, तुझे अपने पति पर ध्यान देना चाहिए या पिंटू अब मेरी बेटी का पति है, तुझे ये सब सोचना पाप है.. मैं जानती हूँ कविता, कि दिल के मामले किसी कागज़ के सर्टिफिकेट या समाज के बनाए दायरों के मोहताज नहीं होते.. जिस इंसान से रूह जुड़ जाए, उसे दिमाग से खुरच कर नहीं निकाला जा सकता.."

कविता सुबकते हुए शीला की आँखों में देख रही थी.. उसे उम्मीद नहीं थी कि वैशाली की माँ होने के बावजूद शीला उसे इस तरह से समझेंगी..

शीला ने अपना गिलास उठाया, उसे हल्का सा घुमाया और बिना पिए वापस रख दिया.. उनकी नज़रें अब कमरे के एक खाली कोने में टिकी थीं, जैसे वो बीते हुए वक्त को देख रही हों..

शीला: "इश्क पर किसी का ज़ोर नहीं होता कविता.. मैं तुझे गलत नहीं मानती कि तू आज भी पिंटू से प्यार करती है.. लेकिन... लेकिन किस्मत ने हम सबके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया है, ये देख.. जिस वैशाली को संजय ने हर दिन तिल-तिल कर मारा था, उस वैशाली को पिंटू ने समेटा है.. और दूसरी तरफ... पीयूष, जो शायद तुझे वो प्यार नहीं दे पा रहा जिसकी तू हक़दार है, लेकिन उसी पीयूष ने वैशाली और पिंटू को अपने ऑफिस में काम देकर उन्हें पैरों पर खड़ा किया है.."

शीला की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी.. उन्होंने वापस कविता की ओर देखा, इस बार उनकी आँखों में एक अजीब सा भाव था..

शीला: "तू रोज़ एक आग के पास बैठती है कविता, और सोचती है कि तू जलेगी नहीं? पिंटू को रोज़ अपने सामने देखकर जो तू घुट रही है, ये घुटन एक दिन तुझे, पीयूष को, वैशाली को और पिंटू को... सबको भस्म कर देगी.. तू मेरी बच्ची जैसी है, और वैशाली मेरी कोख से जन्मी है.. मैं दोनों में से किसी का घर उजड़ते हुए नहीं देख सकती.."

कविता ने अपना सिर झुका लिया और अपने हाथों को ज़ोर से भींच लिया..

कांपती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "तो मैं क्या करूँ भाभी? आप ही बताइए मैं क्या करूँ? मैं ज़हर खा लूँ? मैं कैसे निकाल दूँ उसे अपने दिल से जब हर रोज़ उसकी परछाई मेरे घर के दरवाज़े तक आती है? मैं कोशिश करती हूँ पीयूष के करीब जाने की, पर वो अपने लैपटॉप और मीटिंग्स से सिर ही नहीं उठाता.. मैं इस अकेलेपन से हार गई हूँ भाभी.."

शीला ने कविता के हाथ को कसकर पकड़ लिया.. उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी दृढ़ता थी..

शीला: "तुझे हारना नहीं है, और न ही इस अकेलेपन के ज़हर को पीना है.. अगर पीयूष तुझे वो जगह नहीं दे रहा, तो तुझे अपना हक़ छीनना होगा.. और रही बात पिंटू की... तो कविता, कुछ प्यार मुकम्मल होने के लिए नहीं बने होते.. उन्हें बस एक खूबसूरत याद बनाकर दिल के किसी बंद संदूक में उम्र भर के लिए कैद करना पड़ता है.. पिंटू अब एक बीता हुआ कल है, और वैशाली का आज.. तुझे अपने कल से लड़कर अपने आज को सुधारना होगा, वरना ये आलीशान घर तेरे लिए एक बहुत खूबसूरत कब्र बन जाएगा.."

फिर से वही खामोशी छा गई.. बाहर दूर कहीं बादलों के गरजने की हल्की सी आवाज़ आई, जैसे मौसम भी इस भारी बातचीत के साथ करवट ले रहा हो.. कविता शून्य में घूर रही थी, शीला के कहे हुए एक-एक शब्द उसके जेहन में हथौड़े की तरह बज रहे थे..

कमरे में अब सिर्फ एसी की हल्की सी भिनभिनाहट और कविता की थकी हुई सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी.. बाहर मौसम ने भी जैसे इस उदासी की चादर ओढ़ ली थी; काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर बारिश की बूँदें फिसल रही थीं, जो कमरे के अंदर की सुनहरी रौशनी में मोतियों जैसी चमक रही थीं.. कविता ने अपना सिर शीला की गोद में रख दिया था और आँखें मूँद ली थीं..

शीला बहुत ही नर्मी से कविता के बाल सहला रही थीं, लेकिन बाहर से जितनी शांत वो दिख रही थीं, उनके दिमाग के भीतर ख्यालों का एक भयानक तूफ़ान आकार ले रहा था.. उनकी तेज़ और पारखी नज़रें कमरे की हर एक कीमती चीज़ का जायज़ा ले रही थीं, दीवारों पर टंगी लाखों की पेंटिंग्स, पैरों के नीचे बिछा वो बेशकीमती पर्शियन कालीन, और वो शानदार इटालियन मार्बल जिस पर शराब की कुछ बूँदें गिरकर चमक रही थीं..

अचानक, शीला के दिमाग में एक ऐसी सोच ने जन्म लिया जो किसी भी आम औरत के होश उड़ाने के लिए काफी थी.. लेकिन शीला आम नहीं थीं.. समाज के बनाए खोखले उसूल और नैतिकता की बेड़ियाँ उनके आज़ाद ख्यालों को कभी बाँध नहीं पाई थीं..

शीला की नज़रें कविता के आँसुओं से भरे चेहरे से हटीं और शून्य में टिक गईं.. उसका दिमाग शतरंज के एक बहुत ही खतरनाक और रोमांचक खेल की बिसात बिछाने लगा था..

शीला मन ही मन सोच रही थी 'कितना अजीब है न इंसानी रिश्तों का ये ताना-बाना...' शीला ने गहरी साँस लेते हुए सोचा.. 'इस आलीशान घर में सब कुछ है, बस वो नहीं है जिसकी इसे ज़रूरत है.. और दूसरी तरफ मेरी वैशाली है...'

वैशाली का खयाल आते ही शीला की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. पिंटू ने वैशाली को संजय नाम के हैवान से ज़रूर बचाया था, लेकिन शीला एक माँ होने के साथ-साथ एक औरत भी थीं.. वो जानती थीं कि अपनी बेटी की ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच क्या है.. वैशाली एक बेहद खूबसूरत, जवान और अरमानों से भरी औरत है, जिसकी रगों में वासना दौड़ती है.. लेकिन पिंटू? पिंटू एक अच्छा इंसान तो है, पर बिस्तर पर वो वैशाली की उस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम है.. उसकी नामर्दी के कारण वैशाली की रातें एक अलग ही तरह की तड़प और घुटन में कट रही हैं.. एक औरत के लिए शारीरिक संतुष्टि के बिना एक नीरस शादी में बंधे रहना किसी सज़ा से कम नहीं होता..!!

'और ये पीयूष?' शीला की नज़र पास ही रखी पीयूष और कविता की एक बड़ी सी फ्रेम की हुई तस्वीर पर गई.. 'मैं पीयूष को जानती हूँ.. वो कोई मशीन नहीं है जो सिर्फ पैसा छापना जानता हो.. वो तो एक बेहद रोमैंटिक, जुनूनी और जज़्बाती मर्द है.. अगर आज वो कविता से दूर भाग रहा है, खुद को बिज़नेस के बहाने ऑफिस में बंद रख रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके अंदर का मर्द मर गया है.. इसका सीधा सा मतलब ये है कि कविता अब उसके अंदर वो आग, वो चाहत पैदा नहीं कर पाती.. पीयूष का दिल भर चुका है, वो बस इस रिश्ते को ढो रहा है..'

शीला के होंठों के कोनों पर एक बहुत ही बारीक, लगभग न दिखने वाली मुस्कान तैर गई.. उसका दिमाग अब एक परफेक्ट 'कैलकुलेशन' कर रहा था..

'क्या हो अगर इस बिसात के मोहरे बदल दिए जाएँ?' शीला के रोंगटे इस खयाल मात्र से खड़े हो गए..

'चार लोग... और चारों अपनी-अपनी जगह पर घुट रहे हैं.. प्यास किसी और चीज़ की है, और सामने जो कुआँ है, उसका पानी उन्हें चाहिए नहीं.. वैशाली को अपनी दहकती हुई जवानी के लिए पीयूष जैसा एक संपूर्ण और जुनूनी मर्द चाहिए, जो उसे भरसक चोदकर एक औरत होने का पूरा अहसास करा सके.. और पीयूष को अपने नीरस हो चुके जीवन में वैशाली जैसी एक बेबाक और हसीन आग चाहिए, जो उसके अंदर के सोए हुए आशिक को फिर से जगा दे..

और ये पगली कविता? इसे इस महलों की कोई परवाह नहीं है.. इसे तो बस अपने पिंटू का प्यार चाहिए, उसकी बाहें चाहिए.. और मुझे यकीन है कि पिंटू के दिल के किसी कोने में आज भी कविता ही बसती है.. अगर ये दोनों पुरानी जोड़ियाँ वापस मिल जाएँ, तो क्या बुराई है?'

शीला ने एक बार फिर उस विशाल, राजमहल जैसे कमरे को देखा.. इस बार उनकी आँखों में एक गहरी लालसा और महत्त्वाकांक्षा थी..

'अगर पीयूष और वैशाली एक हो जाते हैं... तो मेरी वैशाली...' शीला का दिल ज़ोर से धड़कने लगा.. 'मेरी बच्ची सिर्फ एक बिस्तर की रानी नहीं बनेगी, वो इस पूरे साम्राज्य की मल्लिका बन सकती है..!! सुबोधकांत का खड़ा किया हुआ ये करोड़ों का अंपायर, ये गाड़ियाँ, ये नौकर-चाकर... वैशाली एक महारानी की तरह राज करेगी.. और उसे वो शारीरिक सुख भी मिलेगा जिसके लिए वो आज अंदर ही अंदर जल रही है..'

एक पल के लिए शीला के दिमाग में समाज का खयाल आया.. 'तमाशा बन जाएगा.. लोग थू-थू करेंगे..'

लेकिन अगले ही पल शीला ने इस खयाल को किसी गंदे कीड़े की तरह अपने दिमाग से झटक दिया..

'माँ चूदाने जाए ये दोगला समाज!' शीला ने मन में एक ठंडी, तिरस्कार भरी हँसी हँसी.. 'जब वैशाली उस हैवान संजय के हाथों रोज़ पिटती थी, तब कौन सा समाज उसे बचाने आया था? ये दुनिया सिर्फ झूठे उसूलों का चोला पहनना जानती है.. अगर चार घुटते हुए, मरते हुए लोग अपनी जगह बदल कर एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल ज़िंदगी पा सकते हैं, तो इसमें गलत क्या है? कोई पाप नहीं है इसमें.. ये धोखा नहीं है, ये तो एक परफेक्ट गणित है... ज़िंदगियों को सुलझाने का एक अचूक तरीका..'

शीला ने अपना गिलास उठाया और उसे एक ही घूंट में खाली कर दिया.. उसके दिमाग में अब धुंध छँट चुकी थी और मंज़िल बिल्कुल साफ थी.. कविता अभी भी उसकी गोद में सिर रखे सुबक रही थी, इस बात से बिल्कुल बेखबर कि जिस औरत के कंधे पर वो रो रही है, वो उसी के घर, उसी के पति और उसी के पुराने प्रेमी को लेकर एक ऐसी चाल चलने वाली है, जो इन चारों की ज़िंदगियों को हमेशा के लिए पलट कर रख देगी..

शीला ने बहुत ही प्यार से कविता के माथे को चूमा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा आत्मविश्वास था.. एक ऐसा मास्टरमाइंड जिसका प्लान अब एक्शन में आने के लिए पूरी तरह तैयार था..

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कविता के आलीशान घर में शीला और कविता के बीच शराब के गिलासों के साथ एक भावुक मुलाकात होती है। शीला कविता की आलीशान ज़िंदगी की तारीफ करती है, लेकिन जल्द ही बातचीत गहरी हो जाती है। कविता अपने दिल का दर्द बयान करती है कि पति पीयूष के व्यस्त होने के कारण वह अकेली और उपेक्षित महसूस करती है। शीला पुरानी बातें छेड़ती है, जिसके बाद कविता स्वीकार करती है कि वह आज भी पिंटू से प्यार करती है.. जो अब शीला की बेटी वैशाली का पति है। कविता पूरी तरह टूट जाती है और शीला की गोद में रोती है।

शीला उसे सांत्वना देती है और समझाती है कि दिल के मामलों पर कोई ज़ोर नहीं होता, लेकिन चेतावनी देती है कि यह जुनून सबको नष्ट कर सकता है। हालाँकि, शीला के मन में एक खतरनाक योजना बनने लगती है। वह सोचती है कि चारों लोग.. पीयूष, कविता, पिंटू और वैशाली.. अपनी-अपनी जगह दुखी हैं... वैशाली शारीरिक रूप से असंतुष्ट है, पीयूष रोमांस से दूर है, कविता पिंटू को चाहती है। शीला मन ही मन यह गणित लगाती है कि अगर पीयूष और वैशाली एक साथ आ जाएँ तो वैशाली इस साम्राज्य की मल्लिका बन सकती है, और कविता को पिंटू मिल जाएगा। वह समाज के नैतिक बंधनों को नकारते हुए इस परफेक्ट गणित को अमल में लाने का निर्णय लेती है।

अब आगे..

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शीला ने बिस्तर पर पड़े फोन को देखा.. स्क्रीन पर एक मैसेज चमका: "जगह का बंदोबस्त हो चुका है.. एक दोस्त का बंगला खाली पड़ा है.. एकदम सुरक्षित.. आज रात तैयार रहना.."

वैशाली बाथरूम से निकलकर आई, तौलिए से अपने गीले बाल सुखा रही थी.. "मम्मी, किसका मेसेज है?"

शीला ने फोन को वापस बिस्तर पर रखते हुए मुस्कुराई, "है कोई... जिससे मैं आज रात मिलने जा रही हूँ" उसकी आँखों में एक चमक थी जो वैशाली से छुपी नहीं थी..

वैशाली ने तौलिए को कन्धे पर डाला और शीला की आँखों में आँखें डालते हुए बोली, "क्या मम्मी.. आप का मन अभी भी नहीं भरा.." उसके हाथों में एक हल्की कंपकंपी थी..

शीला ने बेटी के चेहरे को देखा.. वह धीरे से उसके पास गई और उसके गीले बालों में उंगलियाँ फिराते हुए बोली, "वैशाली, मैं चाहती तो तुझसे झूठ बोल सकती हूँ.. पर अब मैं हम दोनों के बीच ऐसा कोई पर्दा नहीं चाहती.. तू जानती है न.. मैं कभी तेरी निजी बातों में दखल नहीं देती और तू भी मेरी बातों में दखल मत दे"

कमरे में सन्नाटा छा गया.. वैशाली ने अपनी मम्मी की आँखों में झाँका, फिर अचानक उसकी आँखें भर आईं.. "मम्मी, मैं..." वह रुक गई, गला रुंधने लगा था..

शीला ने उसे गले लगा लिया.. "देख बेटा... हमने इस पर कितनी लंबी बातचीत की है..!! जिस्म की भूख सिर्फ तुझे ही नहीं सताती.. मेरी भी तो जरूरतें है" उसके हाथों ने वैशाली के गीले बालों को सहलाया..

वैशाली ने तीखी नज़रों से शीला की ओर देखते हुए कहा "वो पियूष ही है न?"

शीला एक पल के लिए चोंक उठी फिर उसने सिर हिलाया "हाँ बेटा.. पर..."

"पर क्या?" शीला ने उसका चेहरा उठाया.. उसकी आँखों में वैशाली के आँसू देखकर उसकी मुस्कुराहट गहरी हो गई.. "तुझे कैसे पता लगा..!!"

वैशाली ने एक गहरी साँस ली.. "मम्मी, आपके और पीयूष के बात करने के ढंग से साफ जाहीर हो रहा था.. जब आप उसके साथ ऑफिस में बैठी थी तब मैं दरवाजे पर कान लगाकर आपकी सारी बातें सुन रही थी" उसकी आवाज़ धीमी हो गई..

शीला के चेहरे पर एक चालाक सी मुस्कान आई.. उसने वैशाली के गाल पर हल्का थपथपाया.. "बड़ी चालाक है मेरी बेटी.. आखिर मुझपर जो गई है तू..!!"

वैशाली ने आँखें नीची कर लीं.. "मम्मी, यहाँ मेरा कुछ हो नहीं रहा और आप पीयूष के साथ जा रही है..."

वैशाली की बात अधूरी छोड़कर शीला ने उसके कंधे पर हाथ रखा.. "वैशाली तू मेरी बेटी है.. मैं यह जो कर रही हूँ तेरी खुशी के लिए ही कर रही हूँ" उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो वैशाली को समझ नहीं आई.. शीला के मन के भेद सिर्फ शीला ही जानती थी..

शीला की उँगलियाँ वैशाली के बालों में फँसी हुई थीं.. उसने धीरे से कहा, "मेरे रहते हुए तुझे उदास होने की कोई जरूरत नहीं है.. बस थोड़े वक्त की ही बात है" उसकी आँखें वैशाली के गीले ब्लाउज़ पर टिकी थीं जो उसकी गदराई हुई चूचियों के आकार को साफ़ उभार रहा था..

वैशाली ने अचानक अपनी मम्मी को गले से लगा लिया.. "मम्मी, पता नहीं सब कैसे ठीक होगा..!!"

शीला ने उसके कानों के पास होकर फुसफुसाया, "चिंता मत कर बेटा.. मैं इस बारे में कुछ करने जा रही हूँ.. कब तक तुझे पिंटू के साथ तड़पने दूँगी.. उसके निकम्मे लंड से तुझे संतुष्टि मिलने से रही" वैशाली के कंधे पर एक चुटकी काटते हुए बोली, "पर अभी तू मुझे इस बारे में कुछ मन पूछना.. तू तो जानती है मैं तुझ से कुछ नहीं छुपाती पर फिलहाल तेरी इस बात को न जानने में ही भलाई है"

वैशाली की साँसें तेज़ हो गईं.. उसने अपनी मम्मी की बाँहों से खुद को छुड़ाते हुए कहा, "पर मम्मी...मुझे कुछ तो बताइए..."

शीला ने वैशाली की ठोढ़ी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया.. "देख बेटा.. आज रात को मैं जा रही हूँ.. पीयूष के साथ.. और वहीं से मेरे प्लान का आगाज होगा.. बस इससे ज्यादा मैं तुझे कुछ नहीं बता सकती" उसकी उँगलियाँ वैशाली के नम होठों पर फिसलीं

वैशाली की साँसें अटक गईं जब शीला ने अचानक उसकी गीली चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से दबोच लिया.. "मम्मी...क्या कर रही हो..!!!!!"





"कुछ नहीं बेटा," शीला ने उसके निप्पल्स को मरोड़ते हुए कहा, "तुझे सीखना चाहिए कि जब मर्द करीब न हो तो खुद को कैसे शांत करें.." वैशाली के होठों से एक दबी हुई आह निकली जब शीला ने अचानक उसके ब्लाउज के बटन खोल दिए.. गीला कपड़ा उसकी गुलाबी चूचियों से चिपक गया था..

वैशाली ने बेचैनी से कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा.. "पर मम्मी...ये सब..."

"कुछ मत बोल" शीला ने उसके कानों में गर्म सांसें छोड़ते हुए कहा.. उसकी उँगलियाँ वैशाली के ब्लाउज के अंदर घुस गईं और उसकी नंगी छाती को मसलने लगीं.. "तू तो जानती है मैं कैसे तेरी चिंता करती हूँ.. तू कब से तड़प रही है.. पहले तुझे थोड़ा रिलैक्स कर दूँ"

वैशाली के शरीर में एक कंपन सा दौड़ गया जब शीला ने अचानक उसके निप्पल्स को नाखूनों से कुरेदा.. उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं, आँखें बंद हो गई थीं.. शीला ने मुस्कुराते हुए उसकी गर्दन को चाटा, फिर धीरे से कान के पास कहा, "अब बता.. क्या मन कर रहा है तेरा अभी?"





वैशाली की आँखें चौंधियाईं जब शीला ने उसकी चूचियों को नाखूनों से खरोंचा.. "मम्मी...वो...मेरा मन कर रहा है की कोई मजबूत मर्द अपने बड़े बड़े हाथों से मेरी ब्रेस्ट को दबाएं..." उसकी आवाज़ डूब गई जैसे ही शीला ने उसके ब्लाउज को पूरी तरह खोल दिया..

शीला के मन में इस समय कोई वासना नहीं थी, न ही किसी प्रकार की विकृत कामेच्छा.. वह अभी जो कुछ भी कर रही थी, वह एक माँ की उस विवशता के कारण था जो अपनी कोख से जन्मी बेटी को तड़पता देखकर स्वयं जल उठती है.. वैशाली की रातें पिंटू की नामर्दी के कारण अधूरी थीं, उसका यौवन बेबसी के आँसू बहा रहा था, और एक माँ का हृदय यह दृश्य सहन नहीं कर पा रहा था..

शीला खुद से सवाल कर रही थी... क्या यह अप्राकृतिक है? शायद हाँ, समाज की नज़र में.. लेकिन जब एक बेटी अपने ही पति से वह आधार नहीं पाती जिसकी वह हकदार है, तो क्या माँ का कर्तव्य उसे किसी भी कीमत पर उसकी पीड़ा को कम करने के लिए प्रेरित नहीं करता?

वह यह कदम उठाने को तैयार हुई थी, पर अपनी खुशी के लिए नहीं.. जिम्मेदारी के बोझ तले दबी एक माँ की तरह, जो अपने अस्तित्व का बलिदान कर अपनी संतान की प्यास बुझाने उतर आई हो.. उसके स्पर्श में माँ का वात्सल्य था, प्रेमिका का उन्माद नहीं.. वह चाहती थी कि वैशाली उसकी बाँहों में वह सुख पाए जो उसे पिंटू के बिस्तर में नसीब नहीं हुआ, भले ही इसके लिए उसे अपनी ही देह की सीमाओं को लाँघना पड़े..

शीला के लिए यह कोई यौन आनंद का क्षण नहीं था.. यह एक माँ की वह चुपचाप बहती हुई वेदना थी, जो अपने गर्भ की नस्ल को संवारने के लिए स्वयं मिट्टी हो जाती है.. वह अपने शरीर को एक ऐसे पुल के रूप में इस्तेमाल कर रही थी, जिस पर चलकर उसकी बेटी अधूरे सुख के उस पार तक पहुँच सके, जहाँ उसका अपना पति उसे कभी ले जा ही नहीं सका.. यह उसकी विवशता थी, विकृति नहीं.. और यही उसके इस कृत्य को एक दुखांत का वैभव प्रदान करता था..

शीला ने वैशाली के स्तनों को अपनी हथेलियों से ढँक लिया.. "और.. और क्या क्या मन होता है तुझे.." उसने धीरे से पूछा, अपनी उँगलियों से वैशाली के निप्पल्स को घुमाते हुए..

वैशाली ने सिर हिलाया, उसकी पलकें भारी हो रही थीं.. शीला ने अचानक उसे धक्का देकर बिस्तर पर लिटा दिया.. "क्या क्या इच्छा होती है तुझे.. सब कुछ खुलकर बता"

वैशाली के हाथ काँप रहे थे जब उसने अपनी मम्मी के कुर्ते के बटन खोलने शुरू किए.. शीला ने उसे रोका नहीं, बस उसकी हर हरकत को भूखी निगाहों से देखती रही.. जैसे ही कपड़ा हटा, वैशाली के सामने उसके विशाल स्तन झूल आए - गदराए हुए, पूरी तरह परिपक्व, जिन पर नीली नसें साफ़ दिख रही थीं..

"अब बता" शीला ने वैशाली की उँगलियों को अपने निप्पल्स पर ले जाते हुए कहा, "अगर अभी कोई मर्द तेरे सामने होता तो तू क्या करना चाहती उसके साथ??"

वैशाली की उँगलियाँ शीला के दूधिया मांस में धँस गईं.. "वो...पहले उसके हाथों से इन्हें मसलवाऊँगी" उसने धीरे से कहा, "फिर वो इन्हें चूसेगा...बहुत ज़ोर से.." अपनी निप्पल की ओर इशारा करते हुए वैशाली ने कहा.. शीला की साँसें तेज हो गईं जब वैशाली ने अचानक उसके निप्पल्स को मरोड़ दिया..

"और फिर?" शीला ने हाँफते हुए पूछा.. वैशाली की उँगलियाँ उसके निप्पल्स पर नाच रही थीं, जैसे कोई पियानो बजा रहा हो.. उसने अपनी बेटी की कलाई पकड़कर उसे नीचे धकेला - अपने भारी पेट, फिर घुटनों तक.. "बोल ना...और क्या क्या करवाना चाहती है?"

वैशाली की साँसें गर्म हो उठीं.. उसकी उँगलियाँ शीला के पेट के निचले हिस्से पर रेंगने लगीं, जहाँ साड़ी का पल्लू अभी भी थोड़ा ढका हुआ था.. "वो...वो यहाँ हाथ डालें," वह धीरे से बोली, अपनी मम्मी की कमर के नीचे से हाथ सरकाते हुए..

शीला ने झटके से अपनी साड़ी का पल्लू उठा दिया.. अब वैशाली का हाथ सीधे उसकी नंगी जाँघों पर था.. "दिखा मुझे...बिल्कुल वैसे ही जैसे तू करवाना चाहती है," शीला ने कहा, अपनी बेटी के बाल पकड़कर उसे और नीचे खींच लिया..

वैशाली के हाथ काँप रहे थे जब वे शीला की गर्म जाँघों के बीच पहुँचे.. उसकी उँगलियाँ एक गर्म, नम स्थान पर ठहर गईं.. शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं - वैशाली की साँसें उसकी जाँघों पर गर्माहट छोड़ रही थीं.. "और...फिर?" शीला ने धीरे से पूछा, अपनी बेटी के बालों में उँगलियाँ फँसाते हुए..

वैशाली ने झिझकते हुए अपनी मम्मी की चूत के ऊपर से सिल्की पेटीकोट को सरकाया.. शीला की चूत के गुलाबी होठ स्पष्ट दिख रहे थे, थोड़ी नमी से चमक रहे थे.. "वो...अपनी उँगली यहाँ रगड़ें," वैशाली ने कहा, मुंह में डालकर गीली करके अपनी मध्यमा उँगली धीरे से शीला की चूत के ऊपर फेरते हुए..





शीला की साँस रुक गई.. उसने अपनी जाँघों को थोड़ा और फैला लिया.. "कैसे?" उसने हाँफते हुए पूछा.. वैशाली की उँगली अब शीला की चूत के बीच में थी, धीरे-धीरे उसके छेद के ऊपर चक्कर काट रही थी.. "ऐसे..." वैशाली ने कहा, और अचानक अपनी उँगली अंदर धकेल दी..





"आह!" शीला का सिर पीछे की ओर झटका.. वैशाली की उँगली उसकी चूत में पूरी तरह समा गई थी.. "हाँ...और फिर?" शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं, अपनी बेटी की कलाई पकड़कर उसे और अंदर धकेलते हुए..

वैशाली की साँसें तेज़ हो गईं.. उसने धीरे से अपनी उँगली हिलाई, फिर दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी.. शीला की चूत की गर्मी उसकी उँगलियों को जलाने लगी.. "वो...ऐसे ही दो उँगलियाँ अंदर डाल दें," वैशाली ने कहा, अपनी उँगलियाँ अंदर-बाहर करते हुए..

शीला की मुट्ठियाँ बिस्तर की चादर पकड़ गईं.. उसकी चूत वैशाली की उँगलियों से भर गई थी, जो अब तेजी से अंदर-बाहर हो रही थीं.. "और...और फिर.. आगे बोल" शीला ने हाँफते हुए पूछा, उसकी आँखें अभी भी बंद थीं..

वैशाली ने अपनी मम्मी की चूत में उँगलियाँ घुमाईं.. "वो...अपना अँगूठा मेरे गांड के छेद पर रख दें," उसने धीरे से कहा.. शीला की आँखें एकाएक खुल गईं.. वह वैशाली की तरफ देखने लगी, जिसकी आँखों में अब कोई संकोच नहीं था..

"तो...तुझे पीछे से मजे लेने का भी मन है.. ??" शीला ने पूछा, उसकी साँसें तेज हो गईं.. वैशाली ने सिर हिलाया.. शीला ने अचानक वैशाली का हाथ पकड़ लिया और उसकी उँगलियाँ अपनी चूत से बाहर खींच लीं.. "कैसे करवाना है वो दिखा," उसने कहा, अपनी गांड ऊपर उठाते हुए..

वैशाली ने झिझकते हुए अपनी उंगली शीला के गांड के छेद पर रखी.. शीला की साँसें रुक गईं.. वैशाली ने धीरे से दबाव डाला.. "ऐसे..." वह बोली.. शीला का मुँह खुला रह गया.. उसने अपनी गांड को ऊपर उठाया, वैशाली की उंगली गाँड के छेद को सहलाते हुए धीरे-धीरे अंदर जाने लगी..





"ओह...मम्मी...!" वैशाली की आँखें फैल गईं.. शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके होठों से एक लंबी सिसकारी निकली.. वैशाली ने देखा कि उसकी उंगली अब शीला की गांड में आधी समा चुकी थी.. उसने धीरे से हिलाई.. शीला का बदन झटका.. "हाँ...और फिर?" शीला ने हाँफते हुए पूछा..

वैशाली ने अपना दूसरा हाथ शीला की चूत की ओर बढ़ाया.. उसकी उँगलियाँ फिर से उसकी चूत के गीले छेद में घुस गईं.. शीला का सिर पीछे की ओर झटका.. वैशाली अब एक हाथ से शीला की चूत में उँगलियाँ डाल रही थी और दूसरे हाथ की उंगली से उसकी गांड को खोल रही थी..





"ओह...बेटी...तूने...ओह...क्या क्या सीख लिया है..." शीला ने टूटी हुई आवाज़ में कहा.. वैशाली ने तेज़ी से अपनी उँगलियाँ हिलाईं.. शीला की चूत से पानी बहने लगा.. वैशाली ने अपनी अँगूठे को गांड में और गहरा धकेला.. शीला का बदन अकड़ गया.. उसके पैरों की उँगलियाँ मुड़ गईं.. "आह...ओह...नहीं...रुक..." शीला चिल्लाई..

वैशाली ने अपनी उँगलियाँ और अँगूठा एक साथ बाहर खींच लिया.. शीला का बदन ढीला पड़ गया.. वह साँस लेने के लिए हाँफ रही थी.. वैशाली ने अपनी गीली उँगलियाँ देखीं.. उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी..

"मम्मी...तुम्हारी चूत...कितनी गरम है..." वैशाली ने कहा.. शीला ने आँखें खोलीं.. उसकी नज़रें वैशाली के चेहरे पर टिक गईं.. वैशाली ने अपनी उँगलियाँ शीला के मुँह के पास लाईं.. शीला ने एक पल झिझकाई, फिर अपना मुँह खोल दिया.. वैशाली की उँगलियाँ उसके होठों के बीच सरक गईं.. शीला ने उन्हें चूसना शुरू कर दिया.. वैशाली की साँस तेज़ हो गई..





"तेरे बूब्स भी कितने प्यारे है.. जो भी मर्द तेरे पास आएगा सब से पहले इनके साथ खेलेगा" शीला ने वैशाली की उँगलियों को छोड़ते हुए पूछा.. वैशाली ने अपने दोनों हाथ शीला के स्तनों पर रख दिए.. "हाँ मम्मी.. बिल्कुल ऐसे..." वह बोली, अपने अँगूठों से शीला के निप्पलों को रगड़ते हुए.. शीला ने अपनी आँखें बंद कर लीं.. वैशाली ने झुककर उसके कान में कहा, "फिर वो मेरे निप्पलों को दाँतों से काटेगा..."





शीला ने अचानक वैशाली को पकड़ा और उसे बिस्तर पर दबोच लिया.. वैशाली की साँसें तेज़ हो गईं.. शीला ने उसके नाइटगाउन को ऊपर सरका दिया.. वैशाली की नंगी देह उसके सामने थी.. शीला ने अपने दाँत वैशाली के निप्पल पर गड़ा दिए.. वैशाली चिल्लाई.. "आह! मम्मी...!"

"हम्म...तेरे निप्पल...कितने नाजुक हैं..." शीला ने कहा, अपनी जीभ से वैशाली के निप्पल को चाटते हुए.. वैशाली का बदन झूल गया.. शीला का हाथ वैशाली की जाँघों पर सरकने लगा.. वैशाली ने अपनी जाँघें खोल दीं.. शीला की उँगलियाँ वैशाली की चूत के ऊपर आईं.. एकदम गीली और चिपचिपी..!!

"कितनी गरम हो गई है तू" शीला ने धीरे से पूछा, अपनी उँगली वैशाली के चूत के छेद पर घुमाते हुए.. वैशाली ने अपना सिर हिलाया.. शीला ने अचानक अपनी उँगली अंदर धकेल दी.. वैशाली ने चीख़ लगाई.. "आह! मम्मी...छोड़ दो..!!"

शीला ने वैशाली की आँखों में देखा.. "पिंटू ऐसे ही करता था न?" उसने धीमी आवाज़ में पूछा.. वैशाली ने शर्माते हुए सिर हिलाया.. शीला ने अपनी दूसरी उँगली वैशाली की चूत के छेद पर रखी.. वैशाली ने अपनी आँखें बंद कर लीं.. शीला ने धीरे-धीरे दोनों उँगलियाँ अंदर डाल दीं.. वैशाली का मुँह खुला रह गया..

"उफ्फ...तेरी चूत...कितनी टाइट है..." शीला ने कहा, अपनी उँगलियों को हिलाते हुए.. वैशाली ने अपनी मुट्ठियाँ बिस्तर पर जकड़ लीं.. शीला ने धीरे-धीरे उँगलियाँ आगे-पीछे करना शुरू किया.. वैशाली का मुँह खुला रह गया.. "मम्मी...ऊईई माँ...क्या कर रही हो...!!" वह हाँफती हुई बोली..

शीला ने मुस्कुराते हुए अपनी उँगलियों की गति तेज़ कर दी.. वैशाली का बदन झटकने लगा.. "आह! नहीं...रुको..." वैशाली ने शीला का हाथ पकड़ लिया.. शीला ने उँगलियाँ रोक दीं.. "क्या हुआ बेटा?" उसने पूछा.. वैशाली की आँखें नम थीं.. "मैं...मैं झड़ने वाली हूँ..." वह फुसफुसाई..

शीला की आँखें चमक उठीं.. उसने अपनी उँगलियाँ और गहरी धकेल दीं.. "तो झड़ जा...मेरे सामने..." उसने कहा.. वैशाली का सिर पीछे की ओर झटका.. उसकी चूत सिकुड़ी और फिर शीला की उँगलियों पर गरम पानी की एक छोटी सी पिचकारी बह निकली.. वैशाली के होठों से एक लंबी कराह निकली..





शीला ने धीरे-धीरे उँगलियाँ बाहर निकालीं.. वैशाली का बदन ढीला पड़ गया.. शीला ने अपनी गीली उँगलियाँ वैशाली के मुँह के पास ले जाकर कहा, "चख ले...अपनी चूत का स्वाद..." वैशाली ने आँखें बंद कर लीं.. शीला ने उसके होंठों पर उँगलियाँ रगड़ दीं.. वैशाली की जीभ बाहर निकली और उसने अपनी मम्मी की उँगलियाँ चाटना शुरू कर दिया..





"कैसा लगा?" शीला ने पूछा.. वैशाली ने शर्माते हुए कहा, "अजीब लगा...पर...बहुत अच्छा..." शीला मुस्कुराई.. "तेरी चूत बहुत सुंदर और प्यारी है बेटा...बिल्कुल मेरी तरह..." उसने वैशाली की जाँघों को सहलाते हुए कहा..

वैशाली ने अपनी आँखें खोलीं.. "मम्मी...तुम...पियूष के साथ..." शीला ने हँसते हुए उसके बालों में हाथ फेरा.. "हाँ बेटा...कई बार.. जब वो हमारे पड़ोस में रहता था.. उसका लंड भी बहुत मस्त है..." वैशाली की साँस तेज हो गई.. "तुझे तो पता ही है की कैसा है..!!" शीला ने अपने हाथों से इशारा किया.. वैशाली की आँखें शर्म से झुक गई

वैशाली ने अपनी जाँघें सिकोड़ लीं.. शीला ने उसकी हालत देखकर मुस्कुराई.. "तुम्हें फिर से चाहिए?" वैशाली ने चेहरे पर हाथ रख लिया.. शीला ने उसके हाथ हटा दिए.. "शर्माने की कोई बात नहीं...तेरी चूत गीली हो रही है..." उसने वैशाली की चूत पर हाथ फेरा.. वैशाली ने कराहते हुए अपनी टाँगें फैला दीं..

शीला ने अपनी उँगलियाँ फिर से चूत के छेद पर रखीं.. "पियूष को याद कर..." उसने फुसफुसाया.. वैशाली ने आँखें बंद कर लीं.. शीला ने धीरे से एक उँगली अंदर डाल दी.. वैशाली का मुँह खुला रह गया.. "वो ऐसे ही करता था?" शीला ने पूछा.. वैशाली ने सिर हिलाया..

"फिर..." शीला ने दूसरी उँगली अंदर धकेल दी.. वैशाली का बदन झटका.. "आह! मम्मी...!" शीला ने उँगलियाँ गहरी डाल दीं.. "पियूष ने तुम्हें गोद में बिठाया था?" वैशाली ने हाँ में सिर हिलाया.. शीला ने उँगलियों की गति तेज़ कर दी.. "और फिर?" वैशाली हाँफने लगी

शीला ने अचानक उँगलियाँ बाहर खींच लीं.. वैशाली ने आँखें खोल दीं.. "जैसा मैंने कहा, मैं पियूष से मिलने जा रही हूँ आज रात," शीला ने कहा.. वैशाली की साँसें तेज हो गईं.. "पर...कहाँ?" शीला मुस्कुराई.. "उसके दोस्त का बंगला है.. खाली पड़ा है.. पियूष के पास चाबियाँ हैं.." वैशाली का गला सूख गया..

शीला ने वैशाली की चूत पर हाथ फेरा.. "तेरी प्यास अब भी नहीं बुझी..." वैशाली ने सिर हिलाया.. शीला ने उसके कान में फुसफुसाया, "आज नहीं...पर जल्द ही...जल्द ही ये सपना हकीकत में बदल जाएगा बेटा" वैशाली की चूत से पानी बह निकला..

अपनी बेटी को इस हालत में छोड़कर शीला बाथरूम में चली गई.. गरम पानी से नहाते हुए उसने अपने भरे हुए स्तनों को मसला.. पियूष की याद आते ही उसके निप्पल सख्त हो गए.. उसने अपनी उंगलियों से चूचियों को दबाकर मरोड़ा, जैसे पियूष किया करता था.. "आज रात बड़ी खास होने वाली है..." वह कराह उठी..

नहाकर निकलते ही उसने वैशाली को बेडरूम में सोता पाया.. शीला ने धीरे से उसकी टांगों के बीच हाथ घुसाया - अभी भी गीली थी.. मुस्कुराते हुए उसने अपने सूटकेस से एक काली लेस की चोली निकाली जो उसके भारी स्तनों को बस ढकने भर की थी.. पहनते ही निप्पल बाहर झांकने लगे..

"मम्मी...?" वैशाली की नींद टूटी.. शीला ने घूमकर उसे अपना पूरा नंगापन दिखाया.. वैशाली की आँखें उसके स्तनों पर चिपक गईं.. "मैं जा रही हूँ," शीला ने साड़ी पहनते हुए कहा..

"पर...कैसे...?" वैशाली बैठ गई.. शीला ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा करते हुए उसकी तरफ देखा.. "पीयूष लेने आ रहा है मुझे.. मैन रोड पर खड़े रहने के लिए कहा है मुझे" वैशाली के हाथ काँपे..

शीला ने वैशाली की ओर देखा और पूछा "क्या सोच रही है?" वैशाली ने आँखें नीची कर लीं.. "और...पापा...?"

शीला का हाथ वैशाली की जांघ पर सरक आया.. "बेटा, तुम्हारे पापा को पता है कि मेरी चूत किसी एक की कभी नहीं हो सकती" उसने अंगुलियों से वैशाली की गीली चूत को छुआ.. "और अब तो तुम भी..." वैशाली ने एक झटके से शीला का हाथ पकड़ लिया.. "मम्मी...नहीं..." पर शीला की उँगलियाँ पहले से ज्यादा तेजी से चलने लगीं.. "ओह्ह...आह!" वैशाली की आँखें लाल हो गईं..

शीला ने अचानक हाथ खींच लिया.. "आज के लिए बस इतना ही.. अब मुझे जाना होगा.. आज तो पियूष मेरा पूरा जिस्म चाटेगा.." उसने जानबूझकर झुकते हुए अपने बबले दिखाए और ब्लाउज के ऊपर से दबा दिए.. वैशाली की साँसें तेज हो गईं..

शीला घर के दरवाजे से बाहर निकली और तेजी से चलते हुए मैन रोड की तरफ जाने लगी.. वैशाली खिड़की से उसे जाते हुए देखती रही..!

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शीला को पीयूष का मेसेज आता जहां वो कहता है की एक रात साथ रहने के लिए उसने जगह का बंदोबस्त कर लिया है.. शीला के मुख के भाव देखकर वैशाली यह बात समझ जाती है.. दोनों के बीच इस बारे में बातचीत होती है.. शीला पहले कुछ बताती नहीं और फिर पीयूष से मिलने की बात कुबूल करती है.. इस बात को लेकर वैशाली के गुस्से को अपने तरीके से शांत करने के लिए उसकी यौन भूख को अपने शरीर के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करती है..

थोड़ी देर बाद शीला वैशाली को छोड़कर पीयूष से मिलने जाने के लिए निकलती है..

अब आगे...

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शीला घर के दरवाजे से बाहर निकली और तेजी से चलते हुए मैं रोड की तरफ जाने लगी.. वैशाली खिड़की से झाँक रही थी..

मैन रोड पर खड़ी शीला बेसब्री से पीयूष का इंतज़ार कर रही थी की तभी उसकी काली मर्सिडीज शीला के पास आकर रुकी.. दरवाजा खुला और शीला अंदर बैठ गई..

शीला के अंदर बैठते ही पीयूष ने उसे गर्दन से पकड़कर उसके होंठों को चूम लिया..





"इतना उतावला क्यों हो रहा है..!! एक बार पहुँच जाएँ फिर जो मर्जी कर लेना..!!" शीला ने खुद को पीयूष की गिरफ्त से छुड़ाते हुए कहा

"आप को देखकर रहा ही नहीं जा रहा भाभी.. बस जल्दी वहाँ पहुँच जाते ही.. फिर आप है और मैं हूँ..!!"

पीयूष ने फूल स्पीड से गाड़ी भागा दी.. करीब पाँच मिनट की ड्राइव के बाद वे दोनों एक बड़े से बंगले के गेट पर पहुँच गए.. बंगला रिहायशी इलाके से थोड़ा दूर था और आसपास घनी झाड़ियों के अलावा कुछ नहीं था.. शीला मन ही मन मुस्कुरा रही थी.. जिस तरह की सुरक्षित जगह वो चाहती थी, यह बिल्कुल वैसी ही थी..

पियूष ने बंगले के गेट खोला और गाड़ी अंदर लेकर आ गया.. जब वो गेट बंद कर रहा था तब शीला गाड़ी से उतरी.. शीला का हुस्न देखकर पीयूष की साँसें रुक गईं.. शीला की काली साड़ी उसके दूधिया शरीर पर चिपकी हुई थी..

बंगले का कंपाउंड बड़ा विशाल था.. आँगन में संगेमरमर के फव्वारे लगे हुए थे.. जो फिलहाल बंद थे.. पूरा बंगला घने पेड़ों से घिरा हुआ था.. ऐसे की बाहर से कोई अंदर देख न सके..!

"अंदर चलिए भाभी," पियूष का गला सूख गया.. वह कांपते हुए हाथों से दरवाजे के लेच लोक को खोलने लगा..

शीला अचानक पियूष के गले से लिपट गई.. "कितने साल हो गए..." उसने पियूष के कान में काटते हुए कहा..

"अंदर चलते है भाभी.. फिर आराम से मजे करते है..!!" पीयूष ने फुसफुसाहट भरी आवाज में कहा

वे लिविंग रूम में पहुँचे तो शीला ने टेबल पर व्हिस्की की बोतल देखी.. "अरे वाह तूने बोतल मँगवाकर रखी है.. चलो, पहले दो दो पेग पीते हैं.. थोड़ा माहोल बनेगा तो मज़ा आएगा.. वैसे भी हमारे पास पूरी रात पड़ी है"

शीला ने पियूष की तरफ वासना भरी नजर से देखा.. जैसे ही पियूष ने गिलास भरा, शीला ने अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और उसकी जांघ पर बैठ गई.. "तुम्हारी याद में कितनी रातें गीली हुई हैं," शीला ने नखरे शुरू कर दिए

"कभी कभी तो सोचता हूँ.. वो पुरानी वाली ज़िंदगी ही अच्छी थी.. नौ से पाँच बजे तक की नौकरी.. फिर घर पहुंचते ही कविता के साथ टाइम बिताता था.. बगल में आप थी.. कितना सुकून था..!!" ग्लास से व्हिस्की का एक घूंट भरते भरते पीयूष भूतकाल के उस सुनहरे दौर में पहुँच गया

शीला ने पीयूष का दूसरा खाली हाथ पकड़ा और उसे अपने बड़े से स्तन पर रख दिया.. पीयूष मुस्कुराया और हल्के हल्के से शीला के उस पपीते जीतने बड़े स्तन को मसलने लगा.. ब्लाउज के महीन कपड़े से शीला की निप्पल बगावत करते हुए अपना आकार दिखा रही थी.. अंगूठे और उंगली की मदद से पीयूष उसे हल्के हल्के मसलता रहा

"जो बीत चुका उसकी याद में तू वो भूल रहा है जो तेरे आगोश में है..!!" शीला ने पीयूष के गाल पर चिमटी काटते हुए शरारती अंदाज में कहा

"आपको भला कैसे भूल सकता हूँ भाभी..!! सपनों में आती हो आप मेरे.. और आपके ये बड़े बड़े.." कहते हुए पीयूष ने बड़ी जोर से शीला के बबले को मसल दिया





"उफ्फ़... क्या कर रहा है..!!" अपने स्तन को मसल रही पीयूष की हथेली पर हल्की सी थपकी मारते हुए शीला ने कहा "बड़े जतन से पाल पोसकर बड़ा किया है इन्हें मैंने.. जरा प्यार से पेश आ उनके साथ"

पीयूष की गोद में बैठे बैठे शीला अपने चूतड़ों को गोल गोल घुमाकर उसके लंड को छेड़ रही थी.. पीयूष का लंड पेंट के अंदर ही धीरे धीरे अपने पूर्ण कद पर पहुंचा और शीला की गाँड पर चुभने लगा

शीला ने नीचे की ओर इशारा करते हुए कहा "ये अभी से फुदक रहा है.. देख लेना पीयूष.. अगर ये जल्दबाजी में उलटी कर बैठा तो मज़ा नहीं आएगा.. आज तो मुझे तसल्ली से आग बुझानी है.."

"आप इत्मीनान रखिए भाभी.. आज तो आप थक जाओगी पर मैं पीछे नहीं हटूँगा" पीयूष ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा

"वियाग्रा की गोली खाकर आया है क्या?" शीला ने खिलखिलाते हुए पूछा

"ऐसी गोली की जरूरत तो उन्हें पड़ती है जिनका आप जैसी आग को देखकर भी खड़ा नहीं होता.. मुझे वो दिक्कत नहीं है.." पीयूष ने हँसते हँसते कहा





पीयूष का ड्रिंक खतम हो चुका था.. उसने अपना ग्लास टेबल पर रख दिया.. यह देखकर शीला ने भी एक ही घूंट में बाकी का ड्रिंक पी लिया..

अब शीला ने पीयूष का हाथ पकड़कर अपने ब्लाउज और ब्रा के अंदर डाल दिया.. आहह..!! उन नंगे स्तनों की चमड़ी का स्पर्श होते ही पीयूष के शरीर में बिजली दौड़ गई.. रेस्टोरेंट में तो सिर्फ इनके दर्शन हुए थे.. आज जी भरकर उन्हे दबोचने का मौका मिलेगा.. सोचकर ही पीयूष का हथियार टनटनाने लगा..

पियूष का हाथ काँप रहा था जब शीला ने अचानक उसकी पैंट की ज़िप खोल दी.. "अभी से?" पियूष हकलाया.. शीला ने उसके कान में जीभ डालकर कहा, "तुम्हारा खड़ा लंड देखने के लिए मैं कब से पागल हुई जा रही हूँ.."

शीला ने पीयूष को सोफे पर धकेल दिया.. मदहोशी से मचलते हुए उसने अपने दांतों से उसकी शर्ट के बटन खोलें.. थोड़ी ही मिनटों में उसने पीयूष के सारे कपड़े उतार दिए.. और बड़ी ही स्टाइल से स्ट्रिपटीज़ करते हुए,

उसने अपने ब्लाउज के हुक खोल दिए.. काली ब्रा में कैद वो दो विशाल गुंबज.. ब्रा फाड़ने की धमकी दे रहे थे.. स्तनों का ज्यादातर हिस्सा तो ब्रा से बाहर ही था.. दोनों स्तनों के बीच एक फुट लंबी मांसल क्लीवेज.. आहाहा..!! वो इतनी गहरी थी की अच्छे अच्छे मर्द उसमें कूदकर अपनी जान दे दें..!!

"और कितना तड़पाओगी भाभी..!! अब इन्हें खोल भी दीजिए" नंगे बदन सोफ़े पर लेटे हुए पीयूष ने लंड सहलाते कहा

पीयूष की बात को अनसुना कर शीला ने अपनी ब्रा स्तनों पर लपेटे ही रहने दी.. और साड़ी का पल्लू खींचकर उसे उतारने लगी.. जिस्म के चारों तरफ गोल गोल हाथ घुमाते हुए साड़ी उतार दी.. फिर पेटीकोट के नाड़े की गांठ खींचकर खोल दी.. एक ही पल में वह पेटीकोट शीला के पैरों के इर्दगिर्द ढेर बनकर गिर गया.. शीला ने पेन्टी नहीं पहनी थी.. दो मांसल जांघों के बीच उसके भोसड़े का टीला.. हल्की हल्की झांटों वाला.. और उसके बीच की गीली चिपचिपी दरार पीयूष की नज़रों के सामने ही थी..





अब शीला नंगे बदन केवल ब्रा पहने खड़ी थी..!! देखकर ही पीयूष की सांसें रुक गई.. पीयूष सोच रहा था की अब वो उसपर हमला करेगी लेकिन शीला ने टेबल पर पड़ी व्हिस्की की बोतल उठाई और ग्लास में उँड़ेलने के बदले उसे मुंह से लगा लिया और दो घूंट नीट व्हिस्की हलक के नीचे उतार दी.. व्हिस्की की कड़वाहट से उसका मुंह बिगड़ गया पर फिर से उसके चेहरे पर वो हवस भरी मुस्कान छा गई.. पीयूष को वो ऐसी नज़रों से देख रही थी जैसे शिकारी शिकार को देखता है..

आज पीयूष को अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था.. सुमसान इलाके के एक सुरक्षित बंगले के बंद दरवाजों के बीच.. शीला जैसी महा-सेक्सी औरत.. अपने नंगे हुस्न का जलवा बिखेरते हुए उसके सामने खड़ी थी.. उसके लाल गुलाबी होंठ व्हिस्की से गीले थे और उसका भोसड़ा लार टपका रहा था.. पीयूष ने अपने तने हुए लंड को देखा.. आज की रात के लिए वो भी तैयारी करके आया था.. एनर्जी की गोलियां खाई थी ताकि वो थके नहीं और लंड पर उसने त्वचा को सुन्न करने वाली क्रीम लगा रखी थी.. ताकि वो देर तक तसल्ली से शीला को चोद सके और जल्दबाजी में झड़ न जाए..!!

पीयूष अपनी तैयारी के साथ आया तो दूसरी तरफ आज शीला भी तय करके आई थी.. पीयूष के साथ ऐसी रंगीन रात बितानी है की उसे जीवनभर याद रहे.. उसे ऐसे संतुष्ट करना था की वो शीला की किसी भी बात के लिए मना न कर सके.. ये सब उसकी योजना का हिस्सा था..

बाहर बेमौसम की बारिश शुरू हो गई.. इस बंगाल की खाड़ी को किसी अच्छे दिमाग के डोकटर को दिखाना चाहिए.. जब देखो डिप्रेशन आ जाता है..!!

शीला अब धीमे कदमों से मचलते हुए सोफ़े के करीब आई.. पियूष की नंगी जांघों पर बैठ गई और बोली "याद है वो पहली बार?" उसने पियूष के छाती के बालों को मरोड़ते हुए कहा, "जब हमने रात को मेरे घर के बाहर किया था.. जब मैं तुम और कविता मूवी देखकर लौटे थे.. और तुम चाबी लेने के बहाने मेरे घर आए थे???"

पियूष की सांसें तेज हो गईं जब शीला ने अपने गीले भोसड़े को उसके खड़े लंड पर रगड़ा.. "उफ्फ़ भाभी.. उस रात को मैं चाहकर भी नहीं भूल सकता. पहली बार आपने अपनी दिखाई थी और मैंने चाटी भी थी.." उसने हांफते हुए कहा..





शीला ने ठंडे हाथों से पियूष के लंड को जकड़ लिया.. "ओह! भाभी..!" पियूष चीखा.. शीला ने शराब से गीला मुंह खोला और पियूष के लंड को जबड़े में ले लिया.. बारिश की आवाज़ उसके गले के गीले घुट्टों से टकरा रही थी.. पियूष ने शीला के बाल पकड़े जब उसकी जीभ ने लंड के नीचे के नाजुक हिस्से को छुआ.. "ऐसे ही...ओह भाभी.. आहह.."

अचानक बारिश की तेज आवाज़ के बीच शीला ने पियूष के लंड को मुँह से छोड़ा.. उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं, पास पड़ी साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए वह उठ खड़ी हुई..

"यहाँ बहोत गर्मी हो रही है.. ए.सी. नहीं है क्या?" शीला ने अपनी गर्दन पर और अपनी दोनों जांघों के बीच के पसीने को साड़ी से पोंछते हुए कहा

"यहाँ नहीं पर बेडरूम में ए.सी. है.. वहीं चलते है.." शीला को अपने शरीर से उठाते हुए पीयूष ने कहा..

दोनों बेडरूम में पहुंचे.. इटालियन मार्बल की फर्श वाले बेडरूम में एक शानदार बड़ा सा बिस्तर था.. पीयूष ने नाइट लेंप और एसी ऑन किया.. दोनों बेड पर बैठ गए

"इस बंगले में कितनी देर तक कोई नहीं आएगा?" हाथों से अपने भारी स्तनों को सहलाते हुए शीला ने पियूष की तरफ देखते हुए पूछा,

पियूष ने बेड पर पीछे झुककर अपने खड़े लंड को थाम लिया.. "यहाँ कोई नहीं आएगा भाभी.. महीनों से बंद पड़ा है.. यहाँ आने का प्लान था इसलिए मैं आज दोपहर को यहाँ आया था और सफाई करवा दी थी...बोतल भी तभी रख गया था.. यह बंगला मेरे दोस्त का है...वो छह महीने से विदेश में है.." उसकी आँखें शीला के नंगे पेट की ओर चिपकी हुई थीं जहाँ पसीने की बूँदें नाभि के गड्ढे में जमा हो रही थीं.. शीला ने अब धीरे से अपनी ब्रा खोल दी.. रुई के गद्दे जैसे शीला के बड़े बड़े स्तन बारिश की उमस से गीले होकर चमक रहे थे..





ए.सी. की ठंडक अब धीरे धीरे बेडरूम में फैलने लगी थी

शीला ने अपने दोनों स्तनों को दबाते हुए कहा "तो फिर...जल्दी क्या है?" पियूष की साँस रुक गई जब उसने देखा कि शीला की गुलाबी निप्पल्स बारिश और एसी की ठंडी हवा से सख्त हो चुकी थी..

"तुझे याद है..." शीला ने अपने एक स्तन को हाथ में लेते हुए कहा, "...जब हम सब तेरी ऑफिस की ट्रिप में माउंट आबू जाने वाले थे.. और अगले दिन सब प्रोग्राम तय करने के लिए मेरे घर पर इकठ्ठा हुए थे.. तब बेग उतारने के बहाने मैंने तुझे अंदर बुलाया था.. और इन्हें खोलकर दिखाया था..!! कैसे टूट पड़ा था तू.. जैसे कभी देखे ही न हो..!!"

"देखे तो थे भाभी.. पर इतने बड़े कभी नहीं देखे थे..!!" पियूष बिस्तर से उठ बैठा और शीला के पास खिंचता चला गया.. उसने अपने होठों से शीला के निप्पल को छुआ तो शीला की पूरी काया कांप उठी..

"ओह! तू आज भी वैसे ही चूस रहा है जैसे तब चूसे थे!" शीला ने पियूष के बाल खींचते हुए उसके मुंह को अपने स्तन पर दबाया.. पियूष ने उसे बड़े से खरबूजे समान स्तन को जैसे ही जोर से चूसा, शीला के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.. वह पियूष के ऊपर गिर पड़ी, उसकी नंगी छाती पियूष के चेहरे से सट गई..

शीला ने हंसते हुए पियूष के कान में गर्म सांस भरी, "आज तो मैं तुझे कच्चा चबा जाऊँगी..." उसने अपने घुटनों को पियूष के कूल्हों के बीच में फंसाते हुए कहा..

"ये बारिश..." पियूष ने शीला के गीले बालों को सूंघते हुए कहा, "..आपकी तरह ही बेकाबू है.." उसने शीला के कान को दांतों से काटा.. शीला की एक हल्की सी चीख निकल गई जब पियूष ने अचानक उसे पलटकर नीचे दबोच लिया.. बारिश की बूंदें खिड़की से अंदर आकर उनके शरीरों पर गिर रही थीं..

शीला ने अपनी टांगें पियूष के कमर के इर्द-गिर्द लपेट दीं.. "इस उम्र में भी आपका जलवा कायम है भाभी..." शीला ने पीयूष की गर्दन पर अपने दांत गढ़ा दिए.. पियूष ने शीला के स्तनों को जोर से दबाया, उसके निप्पल्स को उंगलियों के बीच घुमाते हुए.. शीला की सांसें तेज हो गईं जब पियूष ने अपने लंड को उसकी गीली चूत के बाहर रगड़ना शुरू किया..





"ओह! वो पुरानी यादें..." शीला ने अपनी आंखें बंद करते हुए कहा, जब पियूष ने अचानक उसकी चूत में घुसपैठ शुरू कर दी.. उसका शरीर एक झटके के साथ उछल पड़ा.. पियूष ने शीला के कूल्हों को पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया, हर धक्के के साथ गहरा जाता हुआ..

"सालों बाद भी आपकी चूत वैसी ही नशीली है..." पियूष शीला के कान में फुसफुसाया.. उसकी सांसें तेज हो गईं जब शीला ने अपने नाखून उसकी पीठ में घोंप दिए.. एसी चालू होने के बावजूद उन्हों ने कमरे की खिड़की खुली रखी थी.. बेड बिल्कुल खिड़की से सटकर ही था.. बारिश की बूंदें अब उनके जुड़े हुए शरीरों पर गिर रही थीं, पसीने के साथ मिलकर एक अजीब सी चिपचिपाहट पैदा कर रही थीं..

शीला ने अपने पैरों को पियूष की कमर पर और कसकर लपेट लिया.. "और जोर से... ओह! हां ऐसे ही!" उसकी आवाज़ बारिश की आवाज़ में डूब रही थी.. पियूष ने शीला के एक स्तन को मुंह में ले लिया, जबकि दूसरे को जोर से मसलता रहा.. शीला का सिर पीछे की ओर झटका जब पियूष ने उसकी गर्दन पर जोर से काट लिया..

"मुझे घूमने दो..." शीला ने कहा और पियूष को धक्का देकर उलट दिया.. अब वह उसके ऊपर सवार हो गई, उसके लंड को अपनी चूत में लेते हुए.. उसने अपने हाथों से अपने स्तनों को दबाया, निप्पल्स को मसलते हुए.. पियूष ने शीला के कूल्हों को पकड़कर उसे ऊपर-नीचे करने में मदद की.. बारिश अब और तेज हो चुकी थी, उनके शरीरों पर गिरती बूंदें उनकी गर्मी को और बढ़ा रही थीं..

"ओह पीयूष! हर रात मुझे तेरा ख्याल आता था..." शीला ने झूठ-मुट उसे उकसाने के लिए सिसकते हुए कहा, अपनी चूत को पियूष के लंड पर तेजी से घुमाते हुए.. उसकी चूत की दीवारें पियूष के लंड को कसकर जकड़े हुए थीं, हर बार ऊपर-नीचे होने पर उसे एक अलग ही मजा दे रही थीं.. पियूष ने शीला के नितंबों को जोर से दबाया, उसे अपनी ओर खींचकर और गहरा धक्का मारा.. शीला का सिर पीछे की ओर झटका और उसके मुंह से एक जोरदार चीख निकल गई..





अचानक शीला ने पियूष को धक्का देकर अपनी चूत से निकाल लिया.. "इधर आ..." वह बिस्तर के किनारे गई और घुटनों के बल बैठ गई.. पियूष समझ गया और उसके पीछे आकर खड़ा हो गया.. शीला ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा, फिर अपने कूल्हों को हिलाया.. पियूष ने अपने लंड को उसकी चूत के छेद पर रखा और धीरे से धक्का दिया.. शीला ने अपने सिर को झटक दिया जब पियूष का लंड उसकी चूत में पूरी तरह घुस गया..

"ओह!... कितना बड़ा हो गया है तेरा..." शीला ने अपने दांतों से होठ दबाते हुए कहा.. पियूष ने शीला के कूल्हों को पकड़ा और तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिए.. शीला का शरीर हर धक्के के साथ आगे की ओर झटका खाता, फिर वह पीछे की ओर धकेलती.. उसके स्तन हवा में लहराते हुए, बारिश की बूंदें उन पर पड़ रही थीं.. पियूष ने एक हाथ से शीला के बाल पकड़े और दूसरे से उसके एक स्तन को मसलना शुरू कर दिया..

"ओह्ह... और तेज... " शीला चिल्लाई.. उसकी चूत की दीवारें पियूष के लंड को जकड़े हुए थीं, हर धक्के के साथ उसे और अंदर खींच रही थीं.. पियूष ने शीला के कूल्हों को जोर से पकड़ा और अपने लंड को पूरी तरह बाहर निकाला, फिर एक जोरदार धक्के के साथ वापस अंदर डाल दिया.. शीला का मुंह खुला रह गया, कोई आवाज नहीं निकली.. उसकी आंखें पलकों से जुड़ गईं जब पियूष ने इसी तरह तीन और जोरदार धक्के दिए..

"मैं... मैं गिर जाऊँगी..." शीला हांफते हुए बोली.. पियूष ने तुरंत उसे पकड़ा और बिस्तर पर लिटा दिया.. शीला के पैर अभी भी कांप रहे थे जब पियूष ने उन्हें कंधों पर रख लिया.. उसने शीला की चूत को देखा, जो अब पूरी तरह खुल चुकी थी, गुलाबी गीली मांसलता बारिश और उनके रस से चमक रही थी.. पियूष ने अपने लंड को फिर से उसकी चूत के छेद पर रखा और धीरे से दबाया.. शीला ने अपनी आंखें बंद कर लीं, उसके होठ कांप रहे थे..





"नहीं... ऐसे नहीं..." शीला ने कहा और पियूष को धक्का दे दिया.. वह तेजी से उठी और पियूष को बिस्तर पर पीठ के बल लिटा दिया.. "अब मेरी बारी है..." वह मुस्कुराई.. शीला ने पियूष के लंड को अपने हाथ में लिया और उसे चाटना शुरू कर दिया.. पियूष की आंखें बंद हो गईं जब शीला ने उसके लंड के सिरे को अपने मुंह में ले लिया.. वह धीरे-धीरे नीचे जाती, फिर तेजी से ऊपर आती.. पियूष ने शीला के सिर को पकड़ा और उसे और नीचे धकेलना चाहा, लेकिन शीला ने उसके हाथ हटा दिए.. "मैं करूंगी जैसा मैं चाहूं..." उसने कहा और फिर पियूष के अंडकोषों को चाटने लगी..





पियूष कराह उठा जब शीला ने एक हाथ से उसके लंड को मसलना शुरू किया और दूसरे से उसके अंडकोषों को निचोड़ा.. शीला ने फिर से पियूष के लंड को अपने मुंह में ले लिया, इस बार और गहराई तक जाते हुए.. पियूष का सिर बिस्तर में धंस गया जब शीला ने अपने गले से उसके लंड को निगलने की कोशिश की.. बारिश की बूंदें शीला की पीठ पर गिर रही थीं, लेकिन वह अपने काम में पूरी तरह मग्न थी..

अचानक शीला ने रुक कर पियूष के लंड को छोड़ दिया.. "ये खेल लंबा चलाना है..." वह हंसी और पियूष के ऊपर सवार हो गई.. उसने अपने भोसड़े को पियूष के लंड पर रगड़ा, फिर धीरे से उस पर बैठ गई.. पियूष की आंखें फैल गईं जब शीला की गर्म और गीली चूत ने उसके लंड को चारों तरफ से घेर लिया.. शीला ने अपने हाथों से अपने स्तनों को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी.. "ओह... हाँ... यही वो लंड है जिसका मैं इतने सालों से बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी..." वह कराही..

पियूष ने शीला के कूल्हों को पकड़ा और उसे और तेजी से ऊपर-नीचे करने में मदद की.. शीला का सिर पीछे की ओर झुक गया जब उसकी चूत की गहराइयों में पियूष का लंड घुसता चला गया.. "और... और गहरा... ओह भगवान..." शीला चिल्लाई.. पियूष ने बैठने की मुद्रा में आकर शीला को अपनी बाहों में भर लिया और उसके स्तनों को चूसना शुरू कर दिया.. शीला के नाखून पियूष की पीठ में घुस गए जब उसने एक जोरदार धक्का दिया..

बारिश की बूंदें अब पूरी ताकत से गिर रही थीं, दोनों के शरीर पूरी तरह भीग चुके थे.. शीला ने पियूष के कंधों पर अपने पैरों को लपेट लिया और अपनी चूत को उसके लंड पर और तेजी से रगड़ने लगी.. "मैं... मेरा निकलने वाला है..." वह हांफते हुए बोली.. पियूष ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर आ गया.. उसने शीला के पैरों को कंधों पर रखा और एक बार फिर उसकी चूत में घुस गया.. शीला की आँखें पलकों से चिपक गईं जब पियूष ने तेज गति से धक्के देना शुरू किया..





"आह्ह... साले... मेरी चूत फाड़ दी... ओह्ह..." शीला की चीखें बारिश में खो गईं.. पियूष ने शीला के स्तनों को जोर से मसलते हुए उसकी गहरी चूत में अपने लंड को और अंदर धकेला.. शीला का बदन तेजी से कांपने लगा जब उसका ऑर्गेज़्म नजदीक आया.. पियूष ने भी अपनी सांसें तेज कर ली थीं, वह जानता था कि वह ज्यादा देर तक नहीं रोक पाएगा..

शीला ने अचानक पियूष को धक्का देकर उलट दिया और खुद उसके ऊपर सवार हो गई.. "मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे अंदर झड़ो..." वह गुर्राई और अपनी चूत को पियूष के लंड पर तेजी से घुमाने लगी.. पियूष के हाथ शीला के कूल्हों पर चिपक गए जब उसने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया.. शीला की आँखें फटी की फटी रह गईं जब उसने पियूष के गर्म वीर्य को अपनी चूत की गहराइयों में महसूस किया..





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