Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 47 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की

फाल्गुनी अब राजेश की ऑफिस जॉइन कर चुकी थी और शीला-मदन के पड़ोस में शिफ्ट भी हो चुकी थी.. पर मदन की उम्मीद अनुसार अब तक फाल्गुनी के साथ कुछ हो नहीं पाया था क्योंकि फाल्गुनी पूरा दिन ऑफिस में ही रहती थी और लौटती थी भी रात को देर से ही

जब मदन ने इस बारे में राजेश से कहा तो राजेश ने उसे समझाया की फिलहाल वो फाल्गुनी को काम समझा रहा है.. पिंटू के चले जाने के बाद, फाल्गुनी को उसके काम की जिम्मेदारी सौंपने के लिए यह जरूरी था..

कुक दिनों बाद शीला और मदन जब सुबह की सैर के लिए गार्डन गए तब उन्हें फाल्गुनी वहाँ जॉगिंग करते हुए मिल गई.. मौका पाकर दोनों ने फाल्गुनी को घर बुला लिया और तीनों के बीच धुआंधार चुदाई का दौर चला..

इस तरफ, बेंगलोर से आई हुई मौसम, वैशाली को साथ लेकर एक कैफै में पहुँच गई.. बातों बातों में दोनों को पता चला की दोनों ही अलग अलग कारणों की वजह से अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं थी..

मौसम और वैशाली कविता के घर जा पहुंचे.. और फिर वहाँ एक लेसबियन संभोग का दौर चला.. लंड की चाह में तड़प रही मौसम और वैशाली के लिए कविता ने अपना जुगाड़ लगाया


अब आगे

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दो तीन बार ऐसे प्रयास करने के बाद कविता की नींद खुली.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखों की पलकों पर किसी ने ढेर सारा वज़न रख दिया हो... मौसम और वैशाली ने उसे कंधों से उठाकर सोफ़े पर बैठाया और उसके चेहरे पर पानी छिड़क तब जाकी कविता की आँखें खुली


तीनों अब भी नंग-धड़ंग ही थी..

कविता ने मुश्किल से आँखें खोलते हुए कहा "यार तुम दोनों कर रही थी देखते देखते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला.. अब भी मेरा सिर घूम रहा है.. लगता है कुछ ज्यादा ही पी ली मैंने"

हँसते हुए मौसम ने कहा "हमने तो तुम्हारे जितनी पी भी नहीं, फिर भी हमें नशा हो गया दीदी.. बहोत मज़ा आया..!!"

कविता के अगल बगल में मौसम और वैशाली नग्नावस्था में बैठ गई.. अपने माथे को वैशाली के कंधे पर ढालकर कविता ने मदहोश आवाज में कहा "हम्म लगता है तुम दोनों ने बड़े मजे किए..!!"






वैशाली ने मुस्कुराकर कहा "हाँ कविता.. बहोत मज़ा आया.. पर फिर भी मन नहीं भरा.. लगता है एकाध सेशन और करना पड़ेगा.. क्यों मौसम.. तैयार है ना..!!"

मौसम हल्का सा शरमा गई और गर्दन हिलाकर हामी भरी..

वैशाली: "यार कविता.. तुम्हारे पास कोई डिल्डो पड़ा है क्या?? आमने सामने चूत घिस-घिसकर और चाटकर तो थक गए.. कुछ अंदर घुसाने को मिल जाता तो मज़ा आ जाता"

कविता: "मेरे पास कहाँ से आएगा डिल्डो?? मुझे तो पता भी नहीं की कहाँ मिलता है..!!"

वैशाली: "अब तो ऑनलाइन भी ऑर्डर कर सकते है"

कविता: "तो कर दे.. अभी मँगवा ले"

वैशाली: "अरे अभी ऑर्डर करूंगी तो आने में दो तीन दिन का वक्त जाएगा.. हमें तो अभी के अभी कोई जुगाड़ चाहिए.. यार क्या करेंगे?? और कुछ है जो लंड की कसर पूरी कर सकें??" वैशाली ने मौसम की ओर देखते हुए कहा पर उसके पास भी कोई जवाब नहीं था..

वैशाली की बात सुनकर, कविता के मन में आइडिया आया, उसने कहा "डिल्डो क्यों.. मैं असली लंड का ही जुगाड़ कर देती हूँ तुम दोनों के लिए"

कविता की बात सुनकर वैशाली और मौसम दोनों चोंक उठे..

मौसम: "दीदी.. तुमने अपना सेटिंग कर रखा है और बताया भी नहीं..!! हम दोनों ने हमारे सारे राज तुम्हें बता दिए.. पर तुम छुपी रुस्तम निकली"

वैशाली ने कविता के गालों पर चुटकी काटते हुए कहा "साली कविता, कब से लंड ले रही है?? बता तो सही"

कविता ने कहा "सच कहूँ तो सेटिंग जरूर हुआ है पर अब तक करवाने का मुझे ही मौका नहीं मिला"

वैशाली: "झूठ मत बोल.. हम कोई दूध पीती बच्चियाँ नहीं है"

कविता: "अरे बाबा सच बोल रही हूँ.. अब मेरी बात ध्यान से सुनो.. अगले एक दो घंटे में ही हमे सब कुछ निपटाना होगा.. फिर रात होते ही खाना बनाने वाली बाई आ जाएगी उससे पहले सब खत्म करना होगा..!! तुम दोनों मेरे बेडरूम में जाकर बैठो.. मैं फोन करती हूँ.. वो अभी आ जाएगा.. तुम दोनों मस्ती से अपनी प्यास बुझाना"

मौसम: "क्यों दीदी..!! आप शामिल नहीं होगी हमारे साथ?"

कविता: "मुझे ऐसे मिल-बांटकर खाने में मज़ा नहीं आएगा.. मैं तो तसल्ली से अकेले में चुदवाऊँगी उससे.. और वैसे भी.. तुम दोनों के निचोड़ देने के बाद तीसरी बार करने की ताकत नहीं बचेगी उस बेचारे में"

मौसम: "पर वो है कौन दीदी??" कविता ने जवाब नहीं दिया और मुसकुराती रही

वैशाली: "छोड़ न मौसम.. हम आम खाने से मतलब है, गुटलियाँ गिनने से नहीं.. चल अंदर चलते है" कहते हुए वैशाली ने मौसम की चूत में उंगली कर दी और खड़ी हो गई.. हँसते हँसते मौसम और वैशाली बेडरूम के अंदर चले गए..

जैसे ही बेडरूम का दरवाजा बंद हुआ, कविता ने फोन उठाया और अपनी माँ के घर फोन कर उनके नौकर बाबिल को, काम के बहाने अपने घर बुला लिया.. उसने अपनी टीशर्ट और शॉर्ट्स पहन ली और नौकर का इंतज़ार करने लगी

करीब दस मिनट के बाद टीशर्ट और पैन्ट पहन बाबिल आ पहुंचा.. उसे लग रहा था की कविता ने अपनी प्यास बुझाने बुलाया होगा..

घर के अंदर आते ही कविता ने बाबिल को अपने आगोश में लेकर उसका लंड दबा दिया... और उसके होंठ चूमने लगी.. बाबिल भी इसके लिए पहले से तैयार था और उसने अपने हाथ कविता के टीशर्ट के अंदर डालकर उसके स्तनों को मसलना शुरू कर दिया... उसका हाथ अब कविता की शॉर्ट्स में घुसने ही वाला था की कविता ने उसका हाथ पकड़कर रोक दिया... वह आश्चर्य से कविता की ओर देखने लगा

कविता: "आज तुझे मैंने मेरे लिए नहीं बल्कि मेरे दो मेहमानों के लिए बुलाया है.. वह दोनों अंदर बेडरूम में है.. अंदर जा और उनकी इच्छा पूरी कर" उसे लगभग धकेलते हुए कविता ने बेडरूम के अंदर भेजकर दरवाजा बंद कर दिया..

सहमा हुआ बाबिल बड़े से आलीशान बेडरूम के अंदर गया.. अंदर अपनी छोटी मालकिन मुस्कान को नंगे बदन किसी और लड़की के साथ लिपटे हुए देखकर वह चोंक उठा..!! इसके अतिरिक्त, उसकी मालकिन के ऊपर उसकी हम-उम्र सहेली झुकी हुई, उल्टी हो कर ६९ की पोज़िशन में सवार थी.. उसने देखा कि वैशाली की ज़ुबान मौसम की रसभरी चूत में लपलपा रही थी और अपना सिर एक तरफ तिरछा करके बाबिल ने देखा कि मौसम की ज़ुबान भी लोलुप्ता से वैशाली की चूत पर फिर रही थी.. वो खुद भी अपनी मालकिन, मौसम की माँ की चूत चाटने का शौकीन था, इसलिये चूत चाटने का मोह समझ सकता था - लेकिन वो उन दोनों लड़कियों के संबंध से जरूर चकित था.. बाबिल की आँखें पूरा रस ले रही थीं और उसका दिमाग उस कामुक नज़ारे में बह रहा था..

अब वो हक्काबक्का नौकर मुस्कुराया और उनके करीब बढ़ गया.. अपनी चुदाई में मशरूफ़ दोनों लड़कियों को उसकी मौजूदगी का एहसास नहीं हुआ.. बाबिल उनके और भी करीब आ गया.. उसके कानों में खून जोर से प्रवाहित हो रहा था.. एक-दूसरे की चूत में राल टपकाती हुई उन लड़कियों के सुड़कने की आवाज़ भी उसे सुनाई दी..

हालांकि उसे खुद से अपनी मालकिन के साथ चुदाई की पहल करने की छूट नहीं थी पर दो जवान चुदक्कड़ औरतें, जो एक दूसरे को भी चूसती और चोदती हों, ऐसी लड़कियों के सामने होने से बाबिल को काफी हिम्मत मिली.. बाबिल ने अपनी पैंट की ज़िप खोली और धीरे से आगे बढ़ते हुए उसने अपना लंड और गोटियाँ बाहर निकाल लीं.. वो एक अज्ञात डर और उत्तेजना से बूरी तरह काँप रहा था..






बाबिल आकर मौसम के पीछे खड़ा हो गया.. उसका लंड मौसम की झटकती हुई गाँड के ठीक ऊपर टॉर्च की तरह खड़ा था.. सुबह जब मौसम आई थी तो उसकी सुंदरता और उसका सुडौल जिस्म देख कर बाबिल का लंड खड़ा हो गया था पर उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इस सुंदरी को चोदने का मौका मिलेगा..

अब उसने वैशाली के ऊपर घूमे हुए सिर के दोनों तरफ अपने टाँगें रख कर झुकते हुए उसका दिल उत्तेजना से जोर से धड़क रहा था.. उसका लंड जब मौसम के चुतड़ से छुआ तो मौसम के चिकने चुतड़ उस दहकते लंड की गर्मी से तमतमा गये.. बाबिल ने उसे उसके कसमसाते चूतड़ों से पकड़ लिया..






मौसम ने चौंक कर अपनी सहेली की टाँगों के बीच में से अपना सिर उठाया तो उसका चेहरा वैशाली के चुत रस से सना हुआ था..

"बाबिलऽऽऽ???" मौसम जोर से किकियाई.. अपनी माँ के नौकर को देखकर मौसम की आश्चर्य की कोई सीमा न रही.. एक पल के लिए तो उसने अपने नंगे जिस्म को ढंकना चाहा.. पर फिर उसे एहसास हुआ.. की उसे कविता दीदी ने ही यहाँ भेजा है.. मतलब दीदी इसी जुगाड़ की बात कर रही थी.. ओह्ह.. मतलब शायद दीदी भी उसके साथ..!! खैर जो भी हो.. और अधिक सोचने जितना दिमाग मौसम का चल नहीं रहा था.. जो होगा देखा जाएगा.. फिलहाल तो एक मस्त लंड की दरकार थी, जो अब सामने ही था..

वैशाली ने भी अपनी आँखें खोलीं तो अपने चमकते चेहरे के ठीक ऊपर इस गोरे चिट्टे लड़के के गुलाबी टोपे वाले लंड और उसके बड़े टट्टों को झूलते हुए पाया.. उसने चौंक कर चींखना चाहा पर सिर्फ़ एक बे-अल्फ़ाज़ आवाज़ वैशाली के मुँह से निकल कर मौसम की चूत में ऊपर बुदबुदा कर रह गई..

अब बाबिल ने अपने लंड का सुपाड़ा मौसम की चूत में घुसा दिया और एक-दो पल रुक कर पूरा लंड अंदर ठाँस दिया.. मौसम की चूत पहले ही इतनी गीली थी कि बाबिल का लंड बहुत आराम से अंदर घुस गया.. उसने धूँआधार चुदाई शुरू कर दी.. उसका लंड मौसम की चूत में अंदर बाहर होता हुआ वैशाली के खुले होंठों में से गुजर रहा था और बाबिल के लंड से मौसम की चूत का रस चाटते हुए वैशाली ने उन दोनों को एक साथ चूसना शुरू कर दिया.. वैशाली की खुद की चूत पहले से ही काम रस झड़ती हुई मलाई छोड़ रही थी और वो इस वक़्त नतीजे की फ़िक्र करने के मूड में नहीं थी..






ना ही मौसम को कुछ फिक्र थी.. जैसे ही उसे बाबिल का लंड अपनी चूत में पिलता महसूस हुआ, वो मज़े से चिल्लाई और फिर से अपना खूबसूरत चेहरा वैशाली की रसभरी चूत पर झुका दिया और दोनों छोरों से मिल रहे मज़े से बदमस्त हो कर मज़े से वैशाली की चूत चाटने लगी..





जब बाबिल ने मौसम की चूत में ज़ोरदार झटके मारते हुए उसकी दिल के आकार जैसी गाँड ऊपर उठाई तो मौसम का सिर ऊपर नीचे झटकने लगा.. दूसरी तरफ मौसम झुक कर भुखमरी की तरह वैशाली की चूत में से बाहर बहते हुए रस को निगलने लगी.. चूत रस के ज़ायक़े और ख़ुशबू से मौसम की मस्ती और ज़्यादा परवान चढ़ गई और उसकी खुद की चूत भी झड़ कर बाबिल के लंड पर मलाईदार रस की बौंछार करने लगी.. बाबिल को मौसम की चूत पिघलती हुई महसूस हुई तो उसने मौसम को कुल्हों से पकड़ पीछे खींच कर अपना लंड जड़ तक उसकी चूत में पेल कर अपना खौलता हुआ वीर्य उसकी चूत में सैलाब की तरह बहा दिया..

बाबिल मौसम की चूत में किसी चुदक्कड़ गधे की तरह ही अपने वीर्य की पछाड़ के बाद पछाड़ छोड़ रहा था.. और दोनों लड़कियां ज्वालामुखी की तरह फूट कर झड़ती हुई चींख रही थीं.. बाबिल ने अपना लंड मौसम की चूत से निकाला तो मौसम ने अपनी चूत वैशाली की चेहरे पर झुका दी.. वैशाली लोलुप्ता से अपनी सहेली की मलाईदार कटोरी से बाबिल की वीर्य चाटने लगी..






मौसम की चूत से बहता वीर्य चाटकर मस्त हो कर वैशाली जोर से काँपने लगी.. बाबिल थक कर एक तरफ निढाल हो गया.. उसका लंड मौसम की चूत ने इस कदर निचोड़ा था कि वो बेजान सा हो कर बिल्कुल मुरझा गया था..

मौसम वैशाली के ऊपर से किनारे हटी तो अपने चूत-रस और बाबिल के वीर्य से सना वैशाली का चेहरा और खुला मुँह देख कर उसके दिल में एक ख्याल आया.. उसने अपने होंठ वैशाली के होंठ पर चिपका दिए और फ्रेंच किस करते हुए दोनों की ज़ुबानें आपस में गुत्थमगुत्था होने लगीं.. दोनों एक दूसरे की चूचियाँ सहला रही थीं






आखिरकार, वो सनसनीख़ेज़ चुदाई अपने अंजाम तक आ गई..

दूर बैठा बाबिल, इन दोनों लड़कियों की इन हरकतों को चाव से देख रहा था.. आज पहली बार उसने औरतों की सेक्स लीला देखी थी.. अब उन दोनों को एक दूसरे के जिस्मों से खिलवाड़ करता देख वह नए सिरे से गरमाने लगा था.. वह वैशाली के चरबीदार जिस्म, गदराई जांघों और बड़े स्तनों को देखते हुए बैठे बैठे अपने लंड को हिलाकर सख्त कर रहा था चूंकि उसे यकीन था की यह मोटी मैडम तो उसकी मालकिन से कई गुना ज्यादा चुदक्कड़ होगी.. और अब तक उसकी चुदाई तो बाकी ही थी...






आखिर जब चुदाई की थकान से चूर होकर मौसम सो गई तब बाबिल वैशाली के पास आ गया और अपनी मुट्ठी अपने लंड की जड़ में कस दी जिससे उसके लंड का सुपाड़ा आलूबुखारे की तरह दमकने लगा.. वैशाली के लिए यह मुँह में पानी लाने वाला नज़ारा था.. वो आगे झुकी तो उसके लंबे बाल बाबिल के पेट और जाँघों पर गिर गये.. वैशाली ने अपनी ज़ुबान लंड के सुपाड़े पर फिराई..

"उम्म्म... यम्मी", वो बिल्ली की तरह घुरगुराई..

"हाँ... चूसो मैडम... उम्म...", बाबिल सिसका.. वैशाली उसका पूरा सुपाड़ा मुँह में ले कर चूसने लगी.. वैशाली की चुस्त और फुर्तीली ज़ुबान बाबिल के फूले हुए सुपाड़े पर फिसलने और सुड़कने लगी.. उसकी ज़ुबान बीच में कभी सुपाड़े की नोक पर फिरती और कभी उसके मूतने वाले छेद को टटोलती.. अपने मुँह में मौसम के चूत रस और बाबिल के वीर्य के मिश्रण का ज़ायका महसूस होते ही वैशाली की भूख और बढ़ गई.. जब वो उसके सुपाड़े के इर्द-गिर्द बहुत सारी राल निकालने लगी तो उसका थूक लंड की छड़ पे नीचे को बहने लगा.. वैशाली का सिर किसी लट्टू की तरह बाबिल के लंड पर घूम रहा था..






बाबिल की गाँड अकड़ गई और धक्के लगाती हुई लंड को वैशाली के मुँह में भोंकने लगी.. वैशाली जब चूसती तो उसके गाल अंदर को पिचक जाते और जब वो उसके लंड पर फूँकती तो गाल फूल जाते.. वैशाली लंड के सुपाड़े पर पर बहुत ज़्यादा मात्रा में राल निकाल रही थी और बाबिल के वीर्य से मिला हुआ वैशाली का बहुत सारा थूक नीचे बह रहा था.. वीर्य की गंध वैशाली को बड़ी ही लज़ीज़ लग रही थी..

बाबिल के लंड को चूसते हुए वैशाली के काले बालों का पर्दा बाबिल के लंड और टट्टों पर पड़ा हुआ था.. लंड के ज़ायके का मज़ा लेते वक्त वैशाली के मुँह से रिरियाने की आवाज़ निकल रई थी.. बाबिल के दाँत आपस में रगड़ रहे थे और उसका चेहरा उत्तेजना से ऐंठा हुआ था.. वैशाली का सिर तेजी से लंड पर ऊपर-नीचे डोलने लगा और वो और ज़्यादा लंड की छड़ अपने मुँह में लेने लगी.. उस मोटे और रसीले लंड पर ऊपर नीचे होती हुई वैशाली लंड पर अपने होंठ जकड़ कर चूस रही थी.. जब वो अपना सिर ऊपर लेती तो उस लंड पर अपना मुँह लपेट कर अपने होंठ कस कर पेंचकस की तरह मरोड़ती..

बाबिल सुअर की तरह घुरघुराता हुआ और अपना लंड ऊपर को ठेलता हुआ वैशाली के मुँह को ऐसे चोदने लगा जैसे कि कोई चूत हो..

"ऊम्मफ्फ", जब लंड का फूला हुआ सुपाड़ा वैशाली के गले में अटका तो वो गोंगियाने लगी.. वैशाली ने बाबिल का लंड तक़रीबन पूरा अपने मुँह में भर लिया था.. बाबिल के टट्टे वैशाली की ठुड्डी पर रगड़ रहे थे और वैशाली की नाक बाबिल की झाँटों में घुसी हुई थी.. वैशाली की साँस घुट रही थी लेकिन फिर भी उसने कुछ लम्हों के लिए लंड के सुपाड़े को अपने गले में अटकाये रखा और फिर उसने लंड को चुसते हुए बाहर को निकाला..






"ऊँम्म्म", वैशाली घुरगुराई और फिर से उस लंड पे अपने होंठ लपेट कर चूसने लगी..

बाबिल ने अपना लंड वैशाली के मुँह में लगातार चोदते हुए अपना वजन एक टाँग से दूसरी टाँग पर लिया.. बाबिल ने अपना एक हाथ वैशाली की गर्दन के पीछे रखा और उसका मुँह अपने लंड पर थाम कर अंदर-बाहर चोदने लगा.. उसके टट्टे ऊपर उछल-उछल कर वैशाली की ठुड्डी के नीचे थपेड़े मार रहे थे..

बाबिल के मूत वाले छेद से और भी ज़ायकेदार प्री-कम चूने लगी और वैशाली की ज़ुबान पर बह कर उसकी प्यास और भड़काने लगी.. वैशाली और भी जोर से लंड चूसने लगी और अपने मुँह में बाबिल को अपने टट्टे खाली करने को आमादा करने लगी.. वो उसकी गर्म मनी पीने के लिए बेक़रार हो रही थी.. वह बेतहाशा अपने दोनों स्तनों को मसल रही थी.. उसकी ज़ुबान भी उसकी क्लिट की तरह ही गर्म थी.. सिसकती हुई वो अपना मुँह बाबिल के लंबे-मोटे लंड पर ऊपर-नीचे डोलने लगी..

लेकिन तभी बाबिल ने अपना लंड वैशाली के होंठों से बाहर खींच लिया.. उसका सुपाड़ा एक डाट की तरह बाहर निकला.. वैशाली के होंठ चपत कर बंद हो गये पर वो फिर से अपने होंठ खोल कर अपनी ज़ुबान बाहर निकाले, पीछे हटते लंड पर फिराने लगी..

बाबिल को वैशाली से लंड चुसवाना अच्छा लग रहा था पर अब वो उसकी गदराई मांसल चूत चोदने के मूड में था.. वैशाली ने नज़रें उठा कर अपनी नशे में डूबी आँखों से बाबिल के चेहरे को देखा.. वो हैरान थी कि उसने अपना स्वादिष्ट लंड उसके मुँह से खींच लिया था.. ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी आदमी ने वैशाली के मुँह में झड़ने से पहले लंड बाहर निकाला हो.. उसने अपने होंठ अण्डे की तरह गोल खोल कर उन्हें चूत की शक़ल में फैला दिया और अपनी ज़ुबान कामुक्ता से फड़फड़ाती हुई उसे फिर उसके लंड को फिर अपने मुंह में डालने के लिए बुलाने लगी..

नशे में चूर वैशाली को बाबिल ने उसके कंधे से पकड़ कर धीरे से बिस्तर पर पीछे ढकेल दिया.. अगर वो उसके मुँह की जगह उसकी चूत चोदना चहता था तो वैशाली को कोई ऐतराज़ नहीं था क्योंकि उसे तो दोनों ही जगह से चुदवाने में बराबर मज़ा आता था.. जब तक उसे भरपूर चुदाई मिल रही हो उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी कि किस छेद से मिल रही थी..

अपने घुटने मोड़ कर और जाँघें फैला कर वैशाली पसर गई.. उसने अपनी कमर उचका कर अपनी रसीली चूत चुदाई के एंगल में मोड़ दी.. बाबिल उसकी टाँगों के बीच में झुक गया.. वो वैशाली के कामुक जिस्म का मुआयना कर रहा था.. अपने हाथों और घुटनों पर वजन डाल कर बाबिल ने अपने चूत्तड़ अंदर ढकेले और उसके लंड का फूला हुआ सुपाड़ा वैशाली की चूत के अंदर फिसल गया..






वैशाली मस्ती से कलकलाने लगी.. अपने लंड का सिर्फ सुपाड़ा वैशाली की चूत में रोक कर बाबिल लंड कि मांस-पेशियों को धड़काने लगा.. उसका सूजा हुआ सुपाड़ा चूत में धड़कता हुआ हिलकोरे मार रहा था..

पहले वैशाली का मुँह, चूत की तरह था और अब उसकी चूत, मुँह की तरह थी.. उसकी चूत के होंठ लंड के सुपाड़े को चूसने लगे और उसकी कड़क क्लिट उसकी जुबान की तरह लंड पर रगड़ने लगी.. बाबिल घुरघुराते हुए स्थिर हो गया.. वैशाली की चूत उसके लंड को सक्शन पंप की तरह अपनी गहराइयों में खींच रही थी.. बाबिल ठेल नहीं रहा था लेकिन वैशाली की चूत खुद से उसके लंड को अंदर घसीट रही थी..

बाबिल उत्तेजना से गुर्राया.. उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका लंड उसके शरीर से खींच कर उखाड़ा जा रहा था और वैशाली की चूत के शिकंजे में अंदर खिंचा जा रहा है.. अपनी चूत में आखिर तक उस लौड़े की ठोकर महसूस करती हुई वैशाली सिसकने लगी.. उसकी चूत फड़कते लंड से कोर तक भरी हुई थी.. वह नौकर किसी चोदू कुत्ते जैसे वहशी जोश से चोद रहा था, जोकि वैशाली की चूत को गहराइयों तक भरे हुए था

बाबिल का लंड वैशाली की चूत में धड़कने लगा तो वैशाली की चूत की दीवारें भी उसके लंड की रॉड पर हिलोरे मारने लगी.. वैशाली की चूत के होंठ लंड की जड़ पे चिपके हुए थे और लंड को ऐसे खींच रहे थे जैसे कि उस कड़क लंड को बाबिल के जिस्म से उखाड़ कर सोंखते हुए चूत की गहराइयों में और अंदर समा लेने की कोशिश कर रहे हों..

बाबिल के लंड का गर्म सुपाड़ा वैशाली को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि उसकी चूत में गरमागरम लोहे का ढेला ठूँसा हो.. उसके फड़कते लंड की रॉड ऐसे महसूस हो रही थी जैसे लोहे की गरम छड़ चूत की दीवरों को खोद रही हो.. उसका लंड इतना ज़्यादा गरम था कि वैशाली को लगा कि वो जरूर उसकी चूत को अंदर से जला रहा होगा पर उसकी खुद की चूत भी कम गरम नहीं थी.. वैशाली की चूत भी भट्टी की तरह उस लंड पर जल रही थी जैसे कि बाबिल का लंड तंदूर में सिक रहा हो..

वैशाली ने पहले हिलना शुरू किया.. बाबिल तो स्थिर था और वैशाली ने अपनी चूत उसके लंड पर दो-तीन इंच पीछे खींची और फिर वापिस लंड की जड़ तक ठाँस दी.. "चोद मुझे... चोद मुझे!" वैशाली मतवाली हो कर कराहने लगी..

बाबिल ने अपने घुटनों पर जोर दे कर अपना लंड इतना बाहर खींचा कि सिर्फ उसका सुपाड़ा चूत के अंदर था.. वैशाली की क्लिट उसके लंड पर धड़कने लगी.. बाबिल ऐसे ही कुछ पल रुका तो वैशाली की चूत के होंठ फिर से उसके लंड को अंदर खींचने के लिए जकड़ने लगे.. वैशाली के भरे-भरे चूत्तड़ पिस्टन की तरह हिल रहे थे उसकी ठोस गाँड बिस्तर पे मथ रही थी..

"पेल इसे मेरे अंदर... उफ्फ़!" वैशाली चिल्लाई.. महीनों से भूखी थी वह.. इसलिए अपनी चूत को लंड से भरने को बेक़रार हो रही थी.. उसे अपनी चूत अचानक खोखली लग रही थी.. "ठेल दे अपना पूरा मूसल अंदर तक!"

बाबिल ने हुँकार कर अपनी गाँड खिसकाई और वैशाली को एक धीरे पर लंबा सा झटका खिलाया.. उसका लंड चीरता हुआ उसकी धधकती चूत में अंदर तक धंस गया.. चूत के अंदर धंसी उसके लंड की रॉड ने वैशाली की गाँड को बिस्तर से ऊपर उठा दिया.. बाबिल ने एक बार फिर बाहर खींच कर इस तरह अपना लंड अंदर पेल दिया कि वैशाली की गाँड और ऊपर उठ गई और उसका लंड इस तरह नीचे की तरफ चूत पेल रहा था कि अंदर-बाहर होते हुए गरम लंड का हर हिस्सा वैशाली की चूत पर रगड़ खा रहा था..






वैशाली भी उतने ही जोश और ताकत से अपनी आगबबुला चूत ऊपर-नीचे चलाती हुई बाबिल के जंगली झटकों का जवाब दे रही थी.. उसकी चूत इतनी शिद्दत से लंड पर चिपक रही थी कि बाबिल को लंड बाहर खींचने के लिए हकीकत में जोर लगाना पड़ रहा था..

बाबिल का लंड वैशाली के चूत-रस से भीगा और चिपचिपाता और दहकता हुआ बाहर निकलता और फिर चूत में अंदर चोट मारता हुआ घुस जाता जिससे वैशाली के चूत-रस का फुव्वारा बाहर छूट जाता.. बाबिल के टट्टे भी चूत-रस से तरबतर थे.. वैशाली का पेट भी चूत के झाग से भर गया था और गरम चूत-रस उसकी जाँघों के नीचे और उसकी गाँड की दरार में बह रहा था.. जब भी उसकी चूत से रस का फव्वारा फूटता तो मोतियों जैसी बड़ी-बड़ी बूँदें उसकी चूत और दोनों टाँगों के बीच के तिकोण पर छपाक से गिरतीं..

चुदाई की लज़्ज़त और शराब के नशे से वैशाली मतवाली हुई जा रही थी.. उसने बाबिल से चिपकते हुए अपनी जाँघें बाबिल के चूत्तड़ों पर कस दीं.. वैशाली के पैरों की ऐड़ियाँ बाबिल की गाँड पर ढोल सा बजाने लगीं..

बाबिल लगातार चोद रहा था और जब भी उसका लंड चूत में ठँसता तो उसके टट्टे झूलते हुए वैशाली की झटकती गाँड पे टकराते.. साथ ही वैशाली की चूत से और रस बाहर चू जाता.. "आआआईईई... ओह्ह.. आँआँहहह मैं... मैं झड़ी!" वैशाली हांफते हुए कराह रही थी "ओह... चूतिये... मैं झड़ने वाली हूँ... तू भी झड़ जा.. मादरचोद.. आह्ह.. भर दे मेरी चूत अपने गरम, चोदू-रस से.. ऊई माँ..!!!!"

फिर बाबिल ने एक हैरत अंगेज़ काम किया.. उसने अपना लंड चूत से बाहर निकाल लिया!

वैशाली तड़पते हुए ज़ोर से चिल्लाई और यह सोच कर कि शायद गलती से निकल गया होगा, उसने अपना हाथ बढ़ा कर लंड पकड़ लिया और फिर से अपनी चूत में डालने की कोशिश करने लगी.. वो गरम चुदक्कड़ औरत झड़ने के कगार पर थी और उसे डर था कि लंड के वापस चूत में घुसने के पहले ही वो कहीं झड़ ना जाये..

बाबिल कुटिलता से मुस्कुराया.. बाबिल जानता था कि सिर्फ ऐसी ही हालत में वो अपनी मनमानी कर पाएगा.. वह खेल कर पाएगा जो उसे उसकी बूढ़ी मालकिन से सीखने मिला था .. शराब और चुदाई के मिलेजुले नशे में वो कुछ भी खुशी से करने को फुसलाई जा सकती थी..

बाबिल ने वैशाली के चूत्तड़ पकड़ कर उसे धीरे से पलट दिया.. जब वो वैशाली को बिस्तर पे पेट के बल पलट रहा था तो वो उसके हाथों में मछली की तरह फड़फड़ा रही थी.. फिर उसने वैशाली को जाँघों से पकड़ कर पीछे की ओर ऊपर खींचा जिससे वैशाली अपने घुटनों पे उठ कर झुक गई और उसकी गाँड बाबिल के लंड की ऊँचाई तक आ गई.. बाबिल भी ठीक वैशाली के पीछे झुका हुआ था.. बाबिल का लंड वैशाली की गाँड के घुमाव के ऊपर मिनार की तरह उठा हुआ था.. उसके लंड की रॉड वैशाली के चूत-रस से भीगी हुई चिपचिपा रही थी और उसके लंड का सुपाड़ा ऐसे दमक रहा था जैसे कि लाइट हाऊस के ऊपर लगा हेलोजेन बल्ब हो

वैशाली का सिर नीचे था और गाँड ऊपर हवा में थी.. उसका एक गाल बिस्तर पे सटा हुआ था और उसके लंबे काले बाल बिस्तर पर फैले हुए थे.. वैशाली की ठोस, झटकती गाँड और उसके मादक बड़े घड़े जैसे चूतड़.. उसकी इस पोज़िशन की अधिकतम ऊँचाई तक उठे हुए थे.. यह पोज़िशन वैशाली के लिए नई नहीं थी.. उसकी भारी चूचियाँ बिस्तर पर सपाट दबी हुई थीं और जब वो अपनी गाँड हिलाने लगी तो उसकी तराशी हुई जाँघें कसने और ढीली पड़ने लगीं और उसकी प्यारी गाँड कामुक्ता से ऊपर-नीचे होने लगी..

एक क्षण के लिए तो वैशाली को लगा कि बाबिल उसकी गाँड मारने वाला है और वैशाली को इसमें कोई ऐतराज़ भी नहीं था पर बाबिल का एक हाथ उसकी चूत पर फिसल कर चूत की फाँकों को फैलाते हुए उसकी फड़कती क्लिट को रगड़ने लगा..

"हाँआँआँ... हाँआँआँ... ऐसे ही कुत्तिया बना कर चोद मुझे!" अपनी चूत में बाबिल का लौड़ा पिलवाने की तड़प में वैशाली गिड़गिड़ाने लगी.. बाबिल के चोदू-झटके की उम्मीद में वैशाली पीछे को झटकी..

वैशाली ने अपने कंधे के ऊपर से पीछे निगाह डाली और उसने बाबिल के लंड को अपनी गाँड के ऊपर लहराते हुए देखा.. इस नज़ारे से वैशाली की चूल फिर से इस कदर बढ़ गई कि किसी तरह की फ़िक्र या शर्मिंदगी के एहसास की कोई गुंजाईश बाकी नहीं रह गई थी..

"हाँआँआँ! मुझे कुत्तिया बना कर चोद!" वैशाली कराही..

बाबिल ने मुस्कुरा कर अपने लंड की नोक से उसकी दहकती चूत को छुआ और उसे वैशाली की क्लिट पर रगड़ने लगा.. वैशाली दुगनी मस्ती से कराहने लगी और उसने अपने चूत्तड़ बाबिल के लंड पर पीछे धकेल दिये..

बाबिल ने अपना फड़कता हुआ लंड पूरी ताकत से एक ही झटके में वैशाली की गाँड के नीचे उसकी पिघलती हुई चूत में ठाँस दिया.. उसका लंड अंदर फिसल गया और उसका सपाट पेट वैशाली के चूत्तड़ों से टकराया.. अपनी झुकी हुई जाँघों के बीच में से अपना हाथ पीछे ले जाकर वैशाली उसके टट्टे सहलाने लगी.. बाबिल अपना लंड वैशाली की चूत में अंदर तक पेल कर उसे घुमाता हुआ उसकी चूत को पीस रहा था..






फिर बाबिल ने पूरे जोश में अपना लंड वैशाली की चूत में आगे-पीछे पेलना शुरू कर दिया.. वैशाली कसमसाती हुई अपने चूत्तड़ पीछे ठेल रही थी और उसकी चूचियाँ भी जोर-जोर से झूल रही थी.. बाबिल कुत्ते की तरह वहशियाना जोश से वैशाली की चूत चोद रहा था और कुत्ते की तरह ही हाँफ रहा था.. वैशाली भी मस्ती और बेखुदी में ज़ोर-ज़ोर से सिसक रही थी, "आँहह... ओहह मॉयऽऽ गॉऽऽड ऊँहह...आँआँहहह...!"

बाबिल ने थोड़ा झुक कर जोर सा अपना लंड ऊपर की तरफ चूत में पेला जिससे वैशाली की गाँड हवा में ऊँची उठ गई और उसके घुटने भी बिस्तर उठ गये.. फिर अगला झटका बाबिल ने ऊपर से नीचे की तरफ दिया और फिर से वैशाली के घुटने और गाँड पहले वाली पोज़िशन में वापिस आ गये.. वैशाली का जिस्म स्प्रिंग की तरह बाबिल के नीचे कूद रहा था..

"ऊँऊँम्म्म.... मैं झड़ गईईईईई..!" वैशाली चिल्लाई..

बाबिल भी पीछे नहीं था.. उसका लंड फूल कर इतना बड़ा हो गया था कि वैशाली को लगा जैसे कुल्हों की हड्डियाँ अपने सॉकेट में से निकल जायेंगी.. वैशाली ने अपनी झूलती चूचियों के कटाव में से पीछे बाबिल के बड़े लंड को अपनी चूत में अंदर-बाहर होते हुए देखने की कोशिश की..

बाबिल जोर-जोर से चोदते हुए वैशाली की चूत को अपने लंड से भर रहा था और वैशाली को लज़्ज़त से.. वैशाली की चूत बाबिल के लंड पे पिघलती हुई इतना ज़्यादा रस बहा रही थी कि वो फुला हुआ लंड जब चूत की गहराइयों में धंसता तो छपाक-छपाक की आवाज़ आती थी..

जब बाबिल ने अपना लंड जड़ तक ठाँस दिया तो उसकी कमर आगे मुड़ गई और उसका सिर और कंधे पीछे झुक गये.. वैशाली को जब उबलता हुआ वीर्य अपनी चूत मे छूटता महसूस हुआ तो वो और भी जोर से कराहने लगी.. बाबिल का गाढ़ा वीर्य तेज सैलाब की तरह वैशाली की चूत में बह रहा था..






बाबिल के टट्टों को फिर से हाथ में पकड़ कर वैशाली निचोड़ने लगी जैसे कि उसके निचोड़ने से ज्यादा वीर्य निकलने की उम्मीद हो.. जैसे ही बाबिल अपना लंड उसकी चूत में अंदर पेलता तो वैशाली उसके टट्टे नीचे खींच देती और जब वो अपना लंड बाहर को खींचता तो वैशाली उसके टट्टे सहलाने लगती.. बाबिल का वीर्य किसी ज्वार-भाटे की तरह हिलोरे मारती हुई वैशाली की चूत में बह रही थी..





हर बार जब भी वैशाली को अपने अंदर, और वीर्य छूटता महसूस होता तो उसकी चुदक्कड़ चूत भी फिर से अपना रस छोड़ देती.. हाँफते हुए, बाबिल की रफ़्तार कम होने लगी..

वैशाली ने उसके लंड पे अपनी चूत आगे-पीछे चोदनी जारी रखी और उसके लंड को दुहती हुई वो अपने ओर्गैज़म के बाकी बचे लम्हों की लज़्ज़त लेने लगी.. वैशाली को लग रहा था जैसे कि उसकी चूत लंड पर पिघल रही हो.. खाली होने के बाद बाबिल ने कुछ पल अपना लंड चूत में ही रखा.. उसका वीर्य और वैशाली के चूत-रस का गाढ़ा और झागदार दूधिया सफ़ेद मिश्रण बाबिल के धंसे हुए लंड की जड़ के आसपास बाहर चूने लगा.. वैशाली की चूत के बाहर का हिस्सा और उसकी जाँघें चुदाई के लिसलिसे दलदल से सनी हुई थी..

जब आखिर में बाबिल ने अपना लंड वैशाली की चूत में से बाहर निकाला तो उसके लंड की छड़ इस तरह बाहर निकली जैसे तोप में गोला दागा हो.. वैशाली की चूत के होंठ फैल गये और उसकी चूत बाहर सरकते लंड पर सिकुड़ने लगी.. जब उसके लंड का सुपाड़ा चूत में से बाहर निकला तो वैशाली कि चूत में से वीर्य और चूत-रस का मिश्रण झागदर बाढ़ की तरह बह निकला..

संतुष्ट वैशाली मुस्कुराती हुई पेट के बल नीचे बिस्तर पर फिसल गई.. वह थक चुकी थी फिर भी उसने अपनी जाँघें फैला रखी थीं कि शायद बाबिल एक बार फिर चोदना चाहे.. परन्तु बाबिल बिस्तर से पीछे हट गया.. वैशाली ने उसे पीछे हटते सुना और साथ ही उसे कमरे के बाहर से कविता की पुकारने की आवाज़ भी सुनाई दी.. वैशाली ने पीछे मुड़ कर देखा कि बाबिल ने अपना मुर्झाया हुआ चोदू लंड अपनी पैंट में भर लिया था और उसे लंड के उभार के ऊपर ज़िप चढ़ाने में मुश्किल हो रही थी.. वैशाली अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी तरबतर चूत सहलाने लगी.. पास लेटी मौसम खर्राटे लगाते हुए अब भी सो रही थी

कपड़े बदल कर जा रहे बाबिल को वैशाली ने ५०० रुपये का नोट निकालकर थमा दिया.. और बोली "गज़ब का लंड है रे तेरा… वैसे तो गांड भी मरवानी थी तुझसे पर फिर कभी सही…"

बाबिल के जाने के बाद, वैशाली नंगी ही वहाँ बैठी रहीं.. पास पड़ी बोतल से उसने ग्लास में व्हिस्की डाली.. पीते पीते वह सोच रही थी.. आज तो बहुत मजा आया…मैं कभी नहीं भूलूंगी ये दिन…!!

तभी कविता ने कमरे में प्रवेश किया.. मुस्कुराते हुए उसने बड़े स्तनों वाली वैशाली को नंगे बदन बेड पर बैठे व्हिस्की पीते देखा.. और बोली "कैसा रहा वैशाली? मज़ा आया?"

वैशाली: "यार क्या बताऊँ..!! इतना मज़ा आया की बस पूछो मत.. मेरी बंझर धरती पर ऐसी बौछार हुई है की सब हरियाली हो गई..!! गजब का सेटिंग किया है तूने यार..!! वैसे तेरे पास ये लड़का था तो तूने अब तक कुछ किया नहीं यह मैं मान नहीं सकती.. सच सच बता"

बेड पर वैशाली के करीब बैठते हुए कविता ने कहा "सच कह रही हूँ यार.. एक दो बार सेटिंग हुआ था पर कोई न कोई आ टपकता था.. पर मुझे चिंता नहीं है.. यह खिलौना अब मेरे बस में ही है.. जब चाहूँ खेल सकती हूँ"

वैशाली: "तू उसे यहाँ बुलाती है तो तेरी मम्मी को शक नहीं होता?"

एक पल के लिए वैशाली की बात सुनकर कविता झेंप सी गई.. किस मुंह से बताती..!! जिस लंड से अभी वैशाली और मौसम चुदे थे.. वह लंड हररोज उसकी माँ की चूत को तृप्त करता है..

कविता: "मैं तो किसी न किसी काम का बहाना कर उसे बुला लेती हूँ.. इसलिए कोई प्रॉब्लेम नहीं होती"

हँसकर वैशाली ने कहा "चलो अच्छा है.. मस्त जुगाड़ हो गया तेरा.. अब मेरा भी जब मन करेगा मैं चली आऊँगी"

कविता: "हाँ, पर पहले बताकर आना.. पीयूष घर पर न हो तब"

वैशाली: "यार, तुझे रसिक की याद नहीं आती कभी?? मुझे तो हर रात उसके काले मूसल लंड की याद सताती है.. याद करके में उंगली करते हुए पानी निकालती हूँ तब जाकर नींद आती है"

कविता: "बाप रे..!! याद मत दिला उस राक्षस की.. मेरे तो प्राण गले में अटक गए थे जब उसने अपना घुसाया था.. पर हाँ.. उसका लंड था जबरदस्त..!!"

वैशाली: "कभी कभी तो मन करता है की सब कुछ छोड़कर उसके साथ रहने उसके खेत पर ही चली जाऊ"

कविता ने हँसकर कहा "काश... ज़िंदगी इतनी आसान होती की हम जो मर्जी कर पाते"

बाते करते करते वैशाली ने एक ओर पेग बनाया..

यह देख कविता ने कहा "वैशाली, बहुत पी ली है तूने.. याद है ना.. अभी तुझे घर भी जाना है.. चढ़ जाएगी"

वैशाली ने जवाब दिया "जिस पर चुदाई का नशा सवार हो…उस पर ये व्हिस्की क्या असर करेगी…"


कहते हुए वैशाली ने अपना गिलास उठाया और पूरा पी लिया.. फिर उसने अपनी सलवार-कमीज पहन ली और कविता को चूमकर जाने के लिए तैयार हो गई..

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भारत भ्रमण का आनंद लेती हुई विदेशी महिला











 
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हवस की प्यासी वैशाली और मौसम, कविता के घर लेस्बियन थ्रीसम के गुल खिलाने के बाद, अपनी दरारों में कुछ सख्त डालने की फिराक में थे की तभी कविता ने बढ़िया सा जुगाड़ लगाया.. अपनी माँ के नौकर बाबिल को बुला लिया..

बाबिल के मस्त हथियार से पहले मौसम ने और फिर वैशाली ने मन भरकर मजे लिए.. और फिर नशे में धूत वैशाली अपने घर जाने के लिए तैयार हुई

अब आगे...

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कविता ने उसे अपनी कार में पास के बस स्टॉप पर छोड़ दिया.. चूंकि वे विपरीत दिशा में रहते थे, वैशाली ने बस लेने पर जोर दिया.. कविता ने उसे घर छोड़ने की पेशकश की क्यूँकी वैशाली हल्का सा लड़खड़ा रही थी.. लेकिन वैशाली ने मना कर दिया..

सौभाग्य से, ऑफिस का समय खत्म हो गया था और बस में बहुत कम लोग थे.. सीट पर बैठे वैशाली थोड़ी देर पहले हुई उस घनघोर चुदाई को याद कर लुत्फ उठा रही थी.. उसकी कब आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला.. जब आँख खुली तो बस उसके घर से एक स्टॉप आगे निकल चुकी थी.. वैशाली ने तुरंत कंडक्टर को सूचित किया और बस रुकवाकर नीचे उतर गई.. वह अब उसके घर से लगभग एक किलोमीटर से अधिक दूर पहुँच गई थी..

जब वह उतरी, तब तक काफी अंधेरा हो चुका था.. उसने जो शराब थोड़ी देर पहले पी थी, अब उसे लग रहा था कि वह उसे चढ़ रही है.. वैशाली को अपने पैर थोड़े अस्थिर महसूस हुए.. चलने पर उसे अंदाजा हुआ की उसे किस हद तक शराब चढ़ चुकी थी.. घर पहुँचने में काफी देर हो चुकी थी.. घर जाकर खाना भी पकाना था.. इसलिए, उसने घुटने-ऊंची घास और पेड़ों और जंगली फूलों से घिरे कच्चे रास्ते से एक शॉर्ट कट लेने का फैसला किया..

हालांकि यह मिट्टी का रास्ता सुनसान था, फिर भी उसने इसका इस्तेमाल करना चुना, क्योंकि इससे आधे से अधिक दूरी बच जाती और वह जल्दी घर पहुँच पाती.. जैसे ही वह रास्ते पर टहल रही थी, उसे लगा जैसे उसकी टांगें अब उसका साथ नहीं दे सकतीं.. हर कदम पर वह लड़खड़ा रही थी.. उसके हाई-हील सेंडल्स पर संतुलन रखना मुश्किल होता जा रहा था.. सुमसान रास्ते पर असंतुलित कदम से चलते हुए उसने उसके हाथ उसके पर्स के चारों ओर कसकर भिंचे हुए थे..

जैसे इतनी समस्या काफी न थी, उसे पेशाब करने की तीव्र इच्छा महसूस हुई.. इतनी मात्रा में शराब पीने के बाद, यह तो होना ही था.. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी पेशाब की थैली प्रेशर से फट जाएगी.. वह एक मिनट के लिए थोड़ा लड़खड़ाई की घर जाकर ही करेगी.. पर अब वह अपनी इच्छा को और नियंत्रित नहीं कर सकी.. उसने जल्दी से अपने आसपास के वातावरण को देखा.. यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई नहीं है और चूंकि लगभग अंधेरा हो रहा था, उसने अपना नाडा ढीला किया.. सलवार को घुटनों तक नीचे खींच लिया और जमीन पर बैठ गई.. तभी उसे एहसास हुआ की उसने सलवार बिना पेन्टी की ही पहन ली थी.. पेन्टी शायद कविता के घर ही छूट गई थी..






उसने एक गहरी सांस ली, और फिर अपने भांप छोड़ते सुनहरे सैलाब को अपनी चूत की फांक से सुरररर की आवाज के साथ छोड़ दिया और तभी..!!! उसे अपने पीछे घास और सूखी पत्तियों की सरसराहट की आवाज सुनाई दी.. किसी के आने की आहट जैसी.. डर के मारे उसके पसीने छूट गए.. मूतते हुए उसने पीछे मूडकर देखा.. एक मध्यम आयु के मर्द को गंदे कपड़ों में लगभग १० मीटर दूर खड़े देखा.. बड़े ही चाव से वो वैशाली के चाँद जैसे गोरे नंगे चूतड़ों को ताड़ते हुए अपना लंड खुजा रहा था.. वह एकदम आवारा सा लग रहा था..

घबराते हुए वैशाली ने तुरंत अपनी सलवार ऊपर खींच ली और उठ खड़ी हुई.. उसके गर्म सुनहरे पेशाब की धार अब भी चल रही थी जिसे वह रोक नहीं सकी.. पेशाब उसकी जांघों पर बहते हुए, सलवार को भिगोते हुए पैरों से बहकर नीचे टपकने लगा.. उसकी पूरी सलवार पेशाब से गीली हो गई..

उस आदमी पर नजर जमाए हुए वह लड़खड़ाते अपना संतुलन बनाए रखने की नाकाम कोशिश कर रही थी और साथ ही अपने सलवार का नाडा बांध रही थी.. वह आदमी चलते चलते उसके करीब आ पहुंचा.. वैशाली ने आगे बढ़ना चाह पर उसकी चाल लड़खड़ा गई

"ऐसे लड़खड़ाती हुई कहाँ चली, छमिया… जरा अपनी चिकनी बुर के दर्शन तो करवाती जा.." आदमी ने पीछे से अपना हाथ उसके कंधे पर रखते हुए कहा.. वैशाली की तो जैसे जान ही हलक में अटक गई..!!

वह चीखीं "मुझे जाने दो.. दूर रहो मुझसे"

तभी वह आदमी उस पर झपटते हुए बोला "साली… नखरा करती है… नशे में ज्यादा फुदक रही है… अभी तेरा नशा उतारता हूं… रंडी… कुतिया"… उसने फुफकार मारी, वैशाली को अपने पास खींच लिया और उसको दोनों हाथों से दबोचते उसके मुंह को चूमा.. वैशाली डरी हुई भी थी और उत्तेजित भी..

"मुझे छोड़ दो..." वह बड़ी घबराहट के साथ संघर्ष करने और विरोध करने लगी, लेकिन पता नहीं उसके विरोध में वह जोर नहीं था..

"छोड़ दूं या चोद दूं…" आदमी ने उसका मजाक उड़ाया और उसे पास के पेड़ की तरफ धक्का देते हुए धकेल दिया और फिर उसे कसकर गले लगा लिया.. एक हाथ से उसने उग्रता से उसके स्तनों को दबोचकर मसल दिया.. उसकी कमीज खोलने की उत्सुकता में, उसने आंशिक रूप से इसे लगभग फाड़ ही दिया.. यहां तक कि उसके अब उजागर हुए स्तनों को मसलने के लिए उसकी ब्रा भी फाड़ दी..






वह नीचे झुका और उसके सख्त निपल्स को चूसने काटने लगा.. "साली… कुतिया… देख रे.. तेरे चूचक कैसे सख्त बन गए हैं… तुझे तो मजा आ रहा है, फिर भी झूठा नखरा दिखाती है…" कहते हुए उसने वैशाली के पैरों से उसकी पेशाब से भीगी सलवार को खींचते हुए चीर दिया.. पता नहीं क्यों, वैशाली चाहकर भी उसका सामना नहीं कर पा रही थी.. उसे ताज्जुब इस बात का था की इतनी डरी हुई होने के बावजूद.. इस गंदे आवारा से इतनी घिन आने के बावजूद.. वह खुद को उत्तेजित होते हुए महसूस कर रही थी..!!

आदमी ने अपनी पतलून और जांघिये को अपने टखनों तक नीचे खींच लिया.. वैशाली ने डरते हुए उसके लंड को देखा.. उसका लंड लगभग उसकी कलाइ जितना मोटा था, एक फुट से अधिक लंबा था.. काला और फुली हुई नसों से भरा हुआ.. वह विकराल लंड उसकी जांघों के बीच लटक रहा था.. यह अब तक का सबसे बड़ा लंड था जो उसने देखा था..!! रसिक के लंड से भी अधिक मोटा, लंबा और विकराल..!!






डर के मारे उसने अपने थूक को निगल लिया, और सामने खड़ी समस्या के लिए खुद को तैयार करने लगी.. वह जानती थी की जल्द ही शायद उसे उस गधे जैसे लंड को अपनी चूत में लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा..!! वैशाली उसे चाहती भी थी और उससे डरती भी थी, और दोनों के संयोजन ने उसे विरोधाभासी भावनाओं से बिल्कुल सुलगा दिया था.. उसके हाथ मोटे और काले थे, उसके होंठ फटे और दरारों वाले थे, वह आदमी अपनी उंगलियां और मुंह वैशाली की कोमल त्वचा पर रगड़ रहा था.. उसने वैशाली के नंगे चमकते कंधों और विशाल स्तनों को चूमना चाटना शुरू कर दिया.. फिर उसके स्तनों को इतना कसकर निचोड़ा कि वैशाली दर्द के मारे कराह उठी





वैशाली ने सोचा की अगर उसने इतनी शराब न पी होती तो अभी इस आदमी का ठीक से सामना कर पाती.. लेकिन वह खुद को उत्तेजित पाकर आश्चर्यचकित भी थी.. उस आदमी का जबरदस्त लंड देखकर शायद उसका ईमान डगमगा गया था.. और इसीलिए वह उसका उचित सामना नहीं कर रही थी.. शायद..!!

वह शख्स अपने फटे होंठों को वैशाली की सख्त निप्पलस पर रगड़ने लगा.. उसकी गरम साँसों की लहरें ने वैशाली के बड़े बड़े स्तनों को झिलमिला दिया.. फिर उसने अपनी हथेलियों में स्तनों को पकड़ लिया और इतनी उग्रता से निप्पलों को खींचने लगा जैसे दूध दुह रहा हो..!! फिर अपनी उंगलियों को लचीले स्तनों में गड़ाते हुए, निपल्स को होंठों से चुटकी काटी और अपने मजबूत दांतों के बीच दबाकर चूसने लगा..






वैशाली ने अपने हाथ उसके कंधों पर रख दिए ताकि वह अपनी हाई हील्स पर संतुलन बनाए रख सके, और अपनी आँखें बंद कर लीं, अपना सिर इधर-उधर घुमाते हुए.. फुफकारते हुए, अपने दर्द करते स्तनों को उसके चेहरे पर धकेलते हुए.. अब वह कराह रही थी.. डर का स्थान अब कामुकता ने ले लिया था और अब घबराने की जगह वह हवस से उबलने लगी थी

उस आदमी ने चूसते हुए वैशाली की निप्पलस को काटना शुरू कर दिया.. वैशाली मीठे दर्द से धीरे धीरे कराहने लगी.. तभी उस आदमी ने वैशाली को पकड़कर हाथों और घुटनों के बल चार पैरों पर कर दिया..

"आज तो तेरी गांड ही मारूंगा…" दरिंदगी भरी आवाज में वह बोला.. वैशाली की फट गई.. वैसे तो उसे अपनी गाँड़ में लेना पसंद था पर उस आदमी के असामान्य लंड को अपनी अवैध दरार में लेने की वह सपने भी नहीं सोच सकती थी..

"ओह प्लीज नहीं!!!! चाहो तो आगे जितना मर्जी डाल लो.. पर पीछे में इतना बड़ा नहीं ले पाऊँगी.. मर जाऊंगी मैं… फट जाएगी मेरी… " वह कराह कर बोली पर तब तक उसने अपने गाँड़ के रक्षाहीन छिद् पर उस आदमी के लंड के कठोर रबड़ जैसे सिरे को महसूस किया.. उसका खून जम गया.. वह पूरी तरह से सुन्न पड़ गई..अत्यंत पीड़ादायक अनुभव के लिए खुद को तैयार करने की नाकाम कोशिश करने लगी..

वह आदमी अपना लंड अंदर घुसेड़ता गया.. सूखे छेद में उसका अखरोट जैसा सुपाड़ा ही अब तक मुश्किल से धंसा था.. वह अपनी पूरी ताकत और तनाव के साथ लंड को वैशाली की गूँदाज गांड में डालने की कोशिश कर रहा था.. वैशाली को इतना दर्द हो रहा था मानो किसी ने गांड में गोली मार दी हो.. उस आदमी ने एक तेज धक्का दिया और वैशाली की रीढ़ की हड्डी को ऊपर उठाते हुए आखिरकार अपने लंड के मोटे सिरे के साथ एक इंच लंड अंदर डालने में कामयाब रहा,






वैशाली को इतना दर्द हो रहा था की वो चीख भी नहीं पा रही थी... एक पल के लिए उसे लगा की उसका शरीर बीच में से चीर देगा यह लंड..!! वह तीव्र पीड़ा से पूरी तरह से स्तब्ध थी और तेजी से हांफ रही थी.. बिना वैशाली के दर्द की दरकार किए.. उस आदमी ने अपने लंड का वैशाली की गांड में डालकर जोर से धकेला, आधे से ज्यादा लंड अंदर घुस गया..

वैशाली दर्द में चीख उठी.. "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!!!!!!" उसकी गाँड़ का छेद अभी भी सूखा था और चिकना होता भी तो इतना बड़ा लंड अंदर लेने की स्थिति में तो हरगिज नहीं था..

" प्लीज रुक जाओ ... रुक जाओ, प्लीज ... ऊई माँ ..." उसने कर्कश आवाज में कहा, मुश्किल से उसकी आवाज निकल पा रही थी

लेकिन वह आदमी को वैशाली के दर्द की कोई परवाह न थी.. पूरी ज़िंदगी काली, गंदी और कुरूप औरतों को चोदने के बाद.. जो उपहार उसे मिला था.. उसे वह कतई छोड़ने के मूड में नहीं था..

एक या दो पल अपनी ताकत जुटाने के बाद, उसने फिर से अपने लंड को धक्का दिया.. और वैशाली की तंग, अडिग म्यान में जबरन धकेल दिया.. निर्दयतापूर्वक वह आगे बढ़ता रहा.. वैशाली को गांड में इतनी जलन हो रही थी जैसे किसी ने लोहे का गरम रॉड घुसेड़ दिया हो..!!! पौने से अधिक लंड अंदर डालकर वह आदमी विजयी भाव से वैशाली के छटपटाते हुए नितंबों को देखता रहा.. अब उसने उसकी गांड चोदनी शुरू कर दी, अपने लंड को लगभग पूरे रास्ते बाहर निकालकर और वापस अंदर धकेलकर.. और केवल एक या दो बार नहीं, बल्कि बार-बार जारी रखा.. वह धक्के लगाता रहा और वैशाली चीखती रही..

वैशाली उसके लंड के कठोर मांस के हर इंच को अंदर फिसलते और फिर बाहर, फिर वापस अंदर और वापस बाहर महसूस कर सकती थी.. दर्द उसके पूरे शरीर में तरंगित हो गया, हर धक्के के साथ उसकी गांड के छेद से शुरू होकर पूरे रास्ते ऊपर तक यात्रा करते हुए उसके दिमाग तक पहुँच रहा था.. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका लंड उसके गले तक पहुँच रहा हो..

दर्द के मारे वैशाली की कमर थोड़ा झुक गई.. जिससे उस आदमी को चोदने में अधिक आसानी हो गई.. झुकने के कारण दर्द कम हो रहा था और उस आदमी के विशाल लंड को अब थोड़े आराम से अंदर ले पा रही थी.. पता नहीं कब दर्द ने इच्छा का स्वरूप धारण कर लिया... उस आदमी की उंगलियां उसके कूल्हों पकड़े हुए थी और उसे आगे-पीछे खींचते हुए उसके कठोर, फैलते हुए लंड को एक शक्तिशाली पिस्टन की तरह गांड में अंदर-बाहर कर रही थी..






"उउउग्ग्ग्ह्ह! मर गई बाप रे!" वैशाली कराह उठी.. वह खुद के मन पर काबू गंवा बैठी थी.. आदमी ने अपने लंड को उसकी रबड़ जैसी गांड में लंबे और कठोर धक्कों के साथ अंदर-बाहर चोदना जारी रखा.. वह अपने-नितंबों को अंदर लुढ़का रही थी और आगे पीछे हो रहे लंड के धक्कों से लय बनाने की कोशिश कर रही थी.. वैशाली की चूत से तरल पदार्थ इतनी मात्रा में बह रहा था कि उसकी जांघों पर रस की धाराएँ बहती हुई नजर आ रही थी.. वह एक जंगली जानवर की तरह थी जब वह अपने कूल्हों के चारों ओर काम कर रही थी

वह आदमी जंगलियों की तरह उसकी गांड में अंदर-बाहर चोद रहा था, गति और तीव्र हो रही थी, उसका बड़ा लंड नजदीक लग रहे स्खलन के साथ और भी बड़ा होता हुआ प्रतीत हो रहा था.. वैशाली अपने नितंबों को पीछे की ओर धकेलते हुए असंगत आवाजें निकाल रही थी.. और उसे टूटे शब्दों में विनती कर रही थी कि वह यह चुदाई खत्म करें और उसे अपने वीर्य से भर दे.. उसके काले बाल उसके सिर के चारों ओर ढीले से लटक रहे थे, हिल रहे थे.. हर धक्के के साथ उसके बड़े बड़े स्तन उसकी छाती के नीचे जेली की तरह आगे पीछे लटक रहे थे..

गाँड़ में पड़ रहे हर कठोर स्ट्रोक के साथ उस आदमी की चोदने की ताकत उसके शरीर के माध्यम से होते हुए उसके लंड के सिरे तक जाती हुई प्रतीत हो रही थी.. वैशाली के चौड़ी फैली गांड को अपने लंड से चोदते हुए.. उसके जुड़वां अंडकोष आगे की ओर झूलते हुए जांघों के बीच से वैशाली की खुली चूत के टीले से.. थप थप की आवाज करते हुए टकरा रहे थे.. वैशाली अपनी झुकी हुई मुद्रा में चीखती और ऐंठती रही, उस आदमी से विनती करती कि वह अब उसकी गांड से लंड बाहर निकाल लें..






आदमी ने वैसा ही किया जैसा वह चाहती थी, उसने वैशाली के कूल्हों को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया और उसके लंड ने अंडकोष से जमा हुए वीर्य को पिचकारी की तरह छोड़ दिया.. वैशाली की गांड के अंदर गहराई तक जलते हुई गर्म वीर्य को शूट करना शुरू कर दिया..

"ऊऊऊह! ऊऊऊह्ह! मेरी गांड… बहुत जल रहा है!" वह चीखी, उसका चेहरा जुनून से बेतरह विकृत हो गया.. आदमी ने आखिरकार अपने कूल्हों को आगे की ओर झटका दिया और एक लंबी कराह के साथ अपने वीर्य को उसके चौड़े फैले हुए गुदा में पंप करता रहा.. उसके विशाल लंड की नोक से वीर्य की फुहार छोड़ता रहा.. प्रत्येक गर्म विस्फोट वैशाली की गांड को जैसे पिघला रहा था.. वीर्य स्खलन के कारण गांड के अंदर चिकनाहट फैल गई और दर्द में काफी गिरावट आई.. वह आदमी धक्के लगाए ही जा रहा था..

अब उसने अपना स्खलन खत्म किया, और विजयी मुस्कान के साथ वह सीधा खड़ा हो गया और अपने लंड को वैशाली की गांड की गहराई से खींच लिया.. वैशाली की जान में जान आई... वह बेहद ही थकावट की स्थिति में थी.. वह मुड़ी और देखा कि काले नाग जैसा लंड वीर्य से सना हुआ था और झड़ने के बावजूद अब भी खड़ा था...






पता नहीं क्या हुआ पर वैशाली घुटनों के बल ही उसके लंड की तरफ मुड़ी.. जैसे उसकी इच्छाओं ने उसके मस्तिष्क को नियंत्रित कर रखा था.. घूमकर वो उस स्थिति में आ गई की उस आदमी का लंड चेहरे के बिल्कुल सामने आ जाए.. अब उसने अपना मुंह खोला और लंड को अपनी जीभ पर रख दिया, चिपचिपे लंड का कुछ हिस्सा उसके मुंह में धकेल दिया.. वैशाली ने विशाल काले गंदे लंड को निगलने के लिए अपना मुंह पूरा खोल दिया..

वैशाली की इच्छा को भांप कर उस आदमी ने अपना लंड हल्के से धकेला, और लंड वैशाली के मुंह में सरपट घुसता हुआ उसके कंठ तक पहुँच गया.. और तब तक धकेलता रहा जब तक की लंड के पूरे बारह इंच अंदर प्रवेश न कर गए.. वैशाली का दम घुटने लगा.. उसने आधा लंड बाहर निकाला और आधा मुंह में रहने दिया ताकि सांस लेने मे आसानी हो.. फिर अपने होंठों को लंड के चारों ओर कसकर लपेट लिया और लंड पर लगा वीर्य वैशाली ने अपने होंठों से साफ कर दिया..






धीरे धीरे वह लंड वैशाली के मुंह के अंदर सिकुड़ता महसूस हुआ... लेकिन वह अब भी तेजी से चूसे जा रही थी.. उस आशा में के वह फिर से सख्त हो..

लेकिन हवस का जोश उतरते हुए वह आदमी सतर्क हो गया.. उसने वैशाली को हल्का सा धक्का देते हुए अपना लंड उसके मुंह से निकाला और जल्दी से अपनी पतलून पहन कर जल्दबाजी में चला गया.. पूरा सत्र केवल १५-२० मिनट चला होगा..

अब रात हो गई थी और वैशाली उस सुनसान मिट्टी के रास्ते पर अधनंगी बैठी थी.. उसका शरीर सफेद चांदनी में चमक रहा था.. अजीब बात थी की उसे न तो शर्म महसूस हुई, न अपराधबोध, न घृणा, अब केवल पूर्ण तृप्ति का एहसास हो रहा था.. वह बहुत थक चुकी थी.. उठने का मन ही नहीं कर रहा था.. जी कर रहा था की खुले आसमान की नीचे वहीं सो जाए.. आखिरकार उसने ताकत जुटाई और पैरों पर लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों के चिथड़े इकट्ठा करना शुरू कर दिया...

उसके बाद उसने अपनी कमीज और सलवार के फटे हुए अवशेषों को, जो उसके पेशाब की बदबू से भरे हुए थे, अपने नंगे शरीर के चारों ओर खींच लिए.. गनीमत थी की उसका दुपट्टा कहीं से फटा नहीं था.. वही दुपट्टे से उसने चारों और से खुद को और फटे वस्त्रों को ढँक लिया..

जैसे तैसे वह अपने घर पहुंची... अपनी चाबी से ताला खोला.. सास और ससुर अपने कमरे में थे और पिंटू घर पर था नहीं.. वह भागकर बाथरूम में घुस गई.. फटे कपड़ों को फेंकने के लिए एक थैली में भर लिया और शावर की नीचे खड़ी हो गई.. ठंडे पाने के बौछार ने उसके शरीर के दर्द और जलन को शांत किया.. शरीर के दर्द और जलन को उसे उतनी परवाह न थी क्योंकि उसकी हवस और इच्छाएं आज पूर्णतः संतुष्ट हो चुकी थी


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कविता के घर, मौसम के साथ, वैशाली ने नौकर के साथ भरपूर संभोग आनंद का मज़ा लिया.. शराब और सेक्स का दौर ऐसा चला की तीनों को वक्त का पता ही नहीं चला..

आखिर में जब सब खत्म हुआ तब वैशाली अपने घर जाने के लिए निकली.. हालांकि कविता ने उसे अपनी गाड़ी में घर छोड़ देने की पेशकश की पर वैशाली ने कहा की वह सीटी बस से चली जाएगी.. कविता उसे बस स्टॉप तक छोड़ आई..

बस से उतरकर वैशाली अपने घर की ओर जा रही थी.. बहोत शराब पी रखी थी जिसके चलते वह अब भी लड़खड़ा रही थी.. अधिक तेज पेशाब लगने पर घर पहुँचने के लिए उसने छोटे सुमसान रास्ते को चुना ताकि जल्दी पहुंचा जा सके.. पर अब जब बर्दाश्त न हुआ तब वह घनी झाड़ियों के बीच मूतने बैठ गई..

उस सुमसान माहोल में एक अनजान शख्स ने उसे देख लिया और मौके का फायदा उठाकर उसने वैशाली को बुरी तरह रौंदते हुए चोद दिया..

जैसे तैसे कर वैशाली अपने फटेहाल वस्त्रों में घर पहुंची..

अब आगे..

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वैशाली शावर के ठंडे पानी के नीचे खड़ी थी, पर अब पानी उसकी आँखों से बह रही गर्म धारा को ठंडा नहीं कर पा रहा था.. शरीर की सारी जलन शांत हो चुकी थी, लेकिन अब एक नई, गहरी, अन्दरूनी पीड़ा उभर रही थी.. अचानक, शारीरिक संतुष्टि का जो भ्रम था, वह टूट गया.. जैसे कोई नशा उतर गया हो.. उसकी टाँगें काँपने लगीं.. वह दीवार से सहारा लेकर फिसलती हुई बैठ गई, और शावर का पानी उसके सिर पर बरसता रहा..





एक ठंडी सिहरन उसकी रीढ़ से होती हुई मस्तिष्क तक पहुँची.. उसकी आँखों के सामने अँधेरे झाड़ियों, उस आदमी की झलक, उसकी अपनी विवशता की तस्वीरें तैरने लगीं.. उसने अपना मुँह बंद किया ताकि कोई रोने की आवाज न निकले.. सिसकियाँ उसके सीने में ही दबकर रह गईं, जैसे कोई चाकू उसे भीतर ही भीतर काट रहा हो..

"नहीं... यह संतुष्टि नहीं थी... यह तो... हिंसा थी.." विचार आया तो वह सहम गई.. उसने अपने हाथों को देखा.. वे काँप रहे थे.. उसने अपने शरीर पर नज़र दौड़ाई.. जहाँ-जहाँ पकड़ के निशान थे, वे अब उभर कर लाल हो रहे थे.. एक गहरा अपमान, एक भयानक मलिनता उसे लग रही थी.. शावर के पानी से धुलकर भी वह स्वयं को गंदा महसूस कर रही थी.. उसकी अपनी प्यास का जो चित्र उसने अपने मन में बनाया था, वह टूटकर चकनाचूर हो गया था.. यह उसकी इच्छा की पूर्ति नहीं, उसकी इच्छा का हनन था..

वह उठी, शावर बंद किया, और एक तौलिए से खुद को रगड़ने लगी.. पर रगड़ने से वह भावनात्मक जलन दूर नहीं हो रही थी.. बाथरूम का शीशा धुँधला हो चुका था.. उसने अपना चेहरा देखा.. आँखें सूजी हुई, चेहरा विह्वल.. उसने खुद से पूछा, "अगर पिंटू घर पर होता तो...? अगर सासू माँ ने दरवाज़ा खोल दिया होता तो...? क्या मैं उनसे नजरें मिला पाती?"

उसने वह फटे कपड़ों वाली थैली देखी, जो कूड़ेदान के पास पड़ी थी.. उसमें उसकी गरिमा के भी टुकड़े थे.. उसे एक तीव्र वमन का अहसास हुआ.. उसने मुँह पर हाथ रख लिया.. उसके दिमाग में अब एक ही बात गूँज रही थी "चोर की दाढ़ी में तिनका.." समाज क्या कहेगा? "सेक्स में रुचि रखने वाली औरत... रात को देर से घर लौटी... तो हुआ ही होगा.." उसे अपनी ही पुरानी सोच पर गुस्सा आ रहा था.. उसे अपने पति पर गुस्सा आ रहा था, जो उसकी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे थे.. पर सबसे ज़्यादा गुस्सा उस आदमी पर था, और उस पल में... खुद पर भी.. उसकी आँखों में आँसू नहीं, एक सूनापन था..!!

वह बाथरूम से निकली.. घर सुनसान था.. रोशनी चुभ रही थी.. उसने सभी लाइटें बंद कर दीं और अँधेरे में ही अपने कमरे की ओर बढ़ी.. दरवाज़ा बंद करके वह बिस्तर पर गिर पड़ी.. शरीर अब दर्द कर रहा था.. मांसपेशियों में खिंचाव, जननांगों और जोड़ों में पीड़ा.. पर मन का दर्द उससे कहीं ज़्यादा गहरा था.. वह एक अजीब-सी उलझन में थी.. एक तरफ, उसका शरीर लंबे अरसे बाद मिलें संतोषदायक शारीरिक संपर्क के बाद आराम की स्थिति में था (भले ही वह जबरदस्ती थी), तो दूसरी तरफ, उसकी आत्मा चीख रही थी, जल रही थी..!!

उसने चादर ओढ़ ली.. उसमें सिमटकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी.. यह रोना उसकी अधूरी इच्छाओं का नहीं, उसकी टूटी हुई अस्मिता का, उसके खोए हुए अधिकार का, और उस भयानक विडंबना का था जिसमें उसकी शारीरिक भूख को एक हिंसक कृत्य से तृप्त होने का झूठा आवरण मिल गया था..

वह सोचने लगी, क्या वह कभी अपने पति को यह बता पाएगी? नहीं.. क्या वह कभी कविता या मौसम को यह बता पाएगी? कदापि नहीं.. यह रहस्य उसके भीतर ही दफन रहेगा.. इस विचार ने उसे और अधिक अकेला कर दिया.. वह एक कैदी बन गई थी.. अपने शरीर, अपनी इच्छाओं, और अब इस सामाजिक डर की कैद में.. उस रात, वैशाली का शरीर तो बिस्तर पर था, पर उसकी आत्मा, अभी भी उन झाड़ियों के पीछे, फटे कपड़ों और अपमान के बीच, खड़ी थी.. और शायद, वहाँ से वह कभी लौटकर नहीं आ पाएगी..!! ऐसा लग रहा था..


और फिर, इस अकेलेपन के बीच, एक तीखी याद ने उसके सीने में चाकू-सा घोंप दिया.. उसे अपनी मम्मी शीला की याद आ गई. शीला का चेहरा.. नरम हाथ.. आत्मीय सुरक्षा की वह गंध जो उसकी माँ की साड़ी में समाई रहती थी.. बचपन में जब भी वह डरती या चोट खाती, माँ का आँचल ही उसका पनाहगाह होता था.. आज, इस उम्र में, इस भयानक स्थिति में, फिर से उसकी आत्मा उसी आँचल की तलाश में थी..

एक सिसकी उसके गले से निकल पड़ी.. पर यह रोना नहीं था.. यह एक अधर में फँसी हुई पुकार थी.. उसने अपने हाथों से मुँह ढक लिया, कमरे के बीचों-बीच खड़ी हुई, अपने ही घर में एक अनाथ की तरह.. सास-ससुर का कमरा सिर्फ कुछ कदमों की दूरी पर था, पर वह दूरी एक पहाड़ जैसी लग रही थी.. वहाँ जाकर सहारा माँगना... यह सम्भव नहीं था.. उनकी नज़रों में वह संदेह की वस्तु बन जाती..

उसे पिंटू का भी ख़याल आया.. उसका पति.. जो बेंगलोर में था.. एक क्षण के लिए उसके मन में उसे फोन करने का विचार कौंधा.. पर अगले ही पल उसकी कल्पना में पिंटू का चेहरा आया.. उसकी आँखों में नपुंसकता से उपजी पहले से मौजूद हीनभावना, और उस पर यह नया आघात.. नहीं.. वह यह बोझ उस पर नहीं डाल सकती थी.. यह सच उसे तोड़ देगा.. और शायद... शायद उनके रिश्ते की आख़िरी बची हुई डोर भी टूट जाएगी..!!

यही सोचते-सोचते उसे एक रास्ता दिखाई दिया.. सास-ससुर जो उसकी ननद के घर जाने वाले थे, कल चले जाएँगे.. घर खाली होगा.. यह खालीपन अभी से उसे डरा रहा था, लेकिन अगर मम्मी यहाँ आ जाए...? माँ का होना.. बिना कुछ बताए, बिना कुछ समझाए, बस उसका होना.. वही पुरानी, परिचित सुरक्षा.. माँ के सामने न तो उसे अपनी यौन इच्छाओं को छुपाना होगा, न ही इस हमले की शर्म को ढकना होगा.. माँ सिर्फ अपनी बेटी को देखेगी, जो घायल है.. बस..!!

उसने फोन उठाया.. नंबर डायल करने से पहले उसकी उँगलियाँ फिर से काँप उठीं.. अब काँप रही थीं.. शायद मम्मी का ख़याल ही उसकी भावनाओं के बाँध को तोड़ रहा था.. फोन बजने लगा.. हर घंटी के साथ उसका गला भीर-भीरा होता जा रहा था..

"हैलो?" फोन के दूसरी ओर से शीला की नींद में डूबी, परिचित आवाज़ आई..

वैशाली ने गहरी साँस लेने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ में एक फड़कन थी जिसे वह छुपा नहीं पाई.. "मम्मी... मैं हूँ.."

"वैशाली? इतनी रात गए? सब ठीक तो है न?" शीला की आवाज़ में तुरंत चिंता घुल गई.. एक माँ ही अपनी बेटी की आवाज़ की हर हल्की सी दरार को पहचान सकती है..

"हाँ... हाँ, माँ, सब ठीक है.." वैशाली ने जल्दी से कहा, "बस... तुम्हारी याद आ रही थी.. सास-ससुर कल ननद के यहाँ जा रहे हैं.. पिंटू भी टूर पर है.. अकेलापन लग रहा है.. कुछ दिन... कुछ दिन रहने आ जाओ न?"

चुप्पी.. फिर शीला की आवाज़ आई, नरम और समझदार, "कल ही सुबह की बस पकड़ती हूँ.. तू चिंता मत कर बेटा.. सो जा.."


फोन कटा.. वैशाली ने फोन छोड़ दिया.. उस एक छोटे से वार्तालाप ने उसके भीतर के बाँध को तोड़ दिया.. वह बिस्तर पर गिर पड़ी और चीख़ की तरह एक लम्बी, दर्द से भरी सिसकी निकल पड़ी.. आँसू नहीं रुक रहे थे.. यह रोना उस हिंसा के लिए नहीं था, न ही उसकी अधूरी इच्छाओं के लिए.. यह रोना उस भारी अकेलेपन को तोड़ने के लिए था, जो अब सहारे की एक किरण दिखाई देने पर फूट निकला था.. वह माँ के आने का इंतज़ार करते हुए, उसी अकेलेपन के बीच, थककर सो गई.. उसकी आँखों के कोनों में आँसू सूखे, और चेहरे पर वह सुन्न अभिव्यक्ति अब एक गहरी, दर्द भरी थकान में बदल चुकी थी..

वैशाली का फोन रखकर शीला ने एक लंबी सांस भरी.. वह नंगे बदन अपने बेड पर करवट लेकर लेटी हुई थी.. उसके बड़े बड़े स्तन और मांसल पेट, बेड पर टिकाए थे.. बगल में लेटे हुए राजेश का लंड नीचे से उसके भोसड़े में घुसा हुआ था.. वही दूसरे कमरे में मदन फाल्गुनी को घोड़ी बनाकर धनाधन शॉट मार रहा था







राजेश: "कहाँ जाने की बात कर रही थी?"

शीला: "वैशाली के घर.. उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही..!!"

राजेश को जैसे उन बातों को कोई इन्टरेस्ट नहीं था.. उसने अपना एक हाथ आगे ले जाकर शीला के खरबूजे जैसे एक स्तन को पकड़ा और मजबूती से लंड को शीला के चूतड़ों के बीच उसके भोसड़े में धकेलना चाहा.. लेकिन शीला का मन चुदाई से उठ चुका था.. बेटी एक एक कॉल ने उसे अंदर से हिलाकर रख दिया था.. वैशाली के विचारों से लिप्त मन को वह फिर से संभोग में सक्रिय कर ही नहीं पा रही थी..

शीला ने राजेश को अपने शरीर से दूर धकेलते हुए कहा "जाने दे राजेश.. अब नहीं करना मुझे.."

ताज्जुब में डूबे राजेश का लंड पुचच की आवाज से शीला की चूत से बाहर निकल गया.. शीला बेड से उठी और अपना गाउन उठाकर बाथरूम में चली गई.. वहीं राजेश बेमन से अपने लंड को हिलाकर खुद को शांत करने लगा..






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इस तरफ, वैशाली के जाने के बाद, कविता ने बाबिल को ताबड़तोड़ अपनी माँ के घर भेज दिया.. और बिस्तर पर लेटी मौसम के नंगे शरीर पर चादर डालकर खुद भी उसके बगल में लेट गई..

दोनों एकाद घंटे तक सोते रहे.. कविता की आँख तब खुली जब उसका मोबाइल बजा.. बड़ी मुश्किल से उसने आँखें खोली और स्क्रीन की तरफ देखा.. पीयूष का फोन था.. उसने कहा की वह कल सुबह वापिस लौट रहा था..

कविता ने फोन बेड पर रखा और वापिस सोने ही जा रही थी की तभी मौसम की आँख, फोन की आवाज के कारण खुल चुकी थी..

शराब के नशे में धूत आवाज में मौसम ने पूछा "कौन था दीदी?"

"तेरे जीजू थे.. कल वापिस आ रहे है" कविता ने जवाब दिया..

मौसम कविता के करीब आई और उससे लिपट गई

बड़े ही नखरीले अंदाज में मौसम ने कहा "दीदी, बहोत मज़ा आया आज तो.. बड़ा कमाल का सेटिंग किया है तुमने..!! पर कहीं मम्मी को कुछ पता तो नहीं चल जाता होगा ना..!!"

"मम्मी को पता चल भी जाए तो क्या..!!" बोलने के बाद कविता को एहसास हुआ की नशे में उसने क्या बोल दिया..!!

एकदम से मौसम का माथा ठनका.. "मतलब??"

मौसम का सवाल सुनकर कविता की नींद पूरी तरह टूट गई है.. वह बैठ जाती है.. मौसम भी करवट बदलकर उसकी तरफ देख रही है.. हवा में एक भारी सन्नाटा और सच का बोझ है..

मौसम की आवाज में एक तीक्ष्ण, साफ़ जिज्ञासा थी "मतलब, दीदी? तुम्हारे कहने का मतलब क्या है? 'मम्मी को पता चल भी जाए तो क्या?'... ये कैसी बात है?"

कविता एक लंबी सांस लेती है.. वह अपनी चादर समेटती है, जैसे खुद को सहारा दे रही हो.. उसकी आँखों में एक उदास स्वीकार है.. वह जानती है कि अब पीछे हटना नामुमकिन है..

कविता: "मौसम... कभी-कभी जिंदगी, हमारी सोच से कहीं ज़्यादा जटिल हो जाती है.. और लोग... हमारे अपने लोग... उस सही-गलत के दायरे से बाहर नज़र आने लगते हैं.."

मौसम बेड पर बैठकर, पीठ सीधी करते हुए बोली "तुम बात को घुमा रही हो.. सीधे-सीधे बताओ.. मम्मी और बाबिल... उनके बीच क्या चल रहा है? "

कविता सीधे मौसम की आँखों में देखते हुए बोली: "हाँ.. तू जैसा समझ रही है, बिल्कुल वैसा ही है.. मम्मी... और बाबिल... उनके रिश्ते में सिर्फ़ नौकर-मालिक का फ़र्क़ नहीं रहा.. वो... दोनों..!!!" आगे के शब्द कविता बोल न पाई

मौसम की सांस रुक सी गई.. उसका चेहरा विस्मय, घृणा और एक अकल्पनीय दुख से विकृत हो गया.. वह कुछ बोल नहीं पी, सिर्फ़ सिर हिलाती है, 'नहीं नहीं नहीं' कहते हुए..

कांपती हुई आवाज में मौसम ने कहा "ये... ये नहीं हो सकता.. मम्मी ऐसा गंदा काम कर ही नहीं सकती.. तुम नशे में हो, दीदी! मम्मी? हमारी मम्मी? वो... वो ऐसा कैसे कर सकती हैं? ये तो पाप है! समाज क्या कहेगा? पापा की यादों का क्या?"

कविता ने धीमी लेकिन दृढ़ कहा "उस हिसाब से देखने जाए तो तूने भी तो आज एक गैर मर्द से सेक्स किया.. क्या वो पाप नहीं नहीं? समाज जानेगा तो क्या आरती उतारेगा तेरी?? तुझे विशाल का खयाल नहीं आया?? फिर मम्मी के लिए अलग नापदंड क्यों? पहले मैं भी यही सब सोचती थी, मौसम.. जब पहली बार मुझे पता चला, तो मैंने तो सोचा दुनिया ही खत्म हो गई.. मुझे उनसे नफ़रत हो गई थी.. लेकिन.. फिर.."

मौसम ने कटाक्ष करते हुए कहा "लेकिन क्या दीदी? ऐसा कोई 'लेकिन' होता भी है क्या? वो नौकर उनके बेटे की उम्र का है! ये तो... कितनी गिरी हुई बात है..!!"

अब कविता की आवाज कुछ तेज हो गई "सुन..!!! बस एक पल के लिए अपने दिल और दिमाग़ की आवाज़ को थोड़ा शांत कर, और सुन.. पापा को गुज़रे हुए कई साल हो गए.. मम्मी अकेली है.. हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में इतनी मशरूफ़ हैं कि उनके अकेलेपन का, उनकी चुप्पी का अंदाज़ा भी नहीं लगा पाते.. हम 'समाज' की बात करते हैं, पर क्या समाज ने उनके अकेलेपन में उनका साथ दिया? क्या समाज उनकी रातों की नींद देखने आता है? उनकी तनहाई को भरता है?

मौसम चुप रहती है, लेकिन उसका विरोध अब भी चेहरे पर था

कविता ने अब थोड़ी नरम आवाज में कहा "मैं यह नहीं कह रही कि ये सही है.. मैं यह भी नहीं कह रही कि मुझे ये स्वीकार है.. मैं तो बस... समझने की कोशिश कर रही हूँ.. मम्मी भी इंसान है, मौसम.. सिर्फ़ हमारी 'माँ' ही नहीं.. एक औरत है.. जिसके अपने सपने, अपनी ज़रूरतें, अपनी कमज़ोरियाँ हैं.. शारीरिक ज़रूरतें कोई गन्दी चीज़ नहीं हैं.. वो प्राकृतिक हैं.. पापा के जाने के बाद, उनकी दुनिया सिर्फ़ हम दो बेटियों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी.. और फिर हम भी चले गए... उस खालीपन में, उस तनहाई में... बाबिल शायद उनके लिए सिर्फ़ एक शरीर नहीं, बल्कि एक साथ होने का एहसास लेकर आया.. कोई है जो उनकी बात सुनता है, जो उनके करीब है.. उनकी जरूरतों को संतुष्ट करता है..!!"

मौसम की आँखें नम हो गई "पर... पर ये तो धोखा है.. पापा का धोखा.. और ये ठीक नहीं है.. तुम आज रात जो कुछ हुआ उसका बहाना बना रही हो? जैसे हमने किया, वैसे ही मम्मी...? नहीं, दीदी, ये अलग है! हम तो अभी जवान है.. और मम्मी की उम्र तो देखो..!! ऐसा करना शोभा देता है क्या उनको?"

कविता: "जो हमने किया और जो मम्मी कर रही है.. उसमें फाँसला केवल उम्र का ही तो है..!! मैं बहाना नहीं बना रही.. और तुलना भी नहीं कर रही.. हर स्थिति अलग होती है.. मैं तुमसे या मम्मी से ये नहीं कहूँगी कि जो कर रही हो वह सही है.. मैं बस इतना कह रही हूँ कि... जज करने से पहले थोड़ा महसूस करने की कोशिश करो.. उनकी ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियाँ, उनका दर्द, उनकी इच्छाएँ... क्या सब कुछ खत्म हो जाता है एक उम्र या एक ताज़ के बाद? क्या हमारी मम्मी की अपनी कोई पहचान नहीं रहनी चाहिए, सिर्फ़ विधवा और मम्मी के लेबल से आगे?"

मौसम और कविता के बीच एक लंबी चुप्पी छाई रही.. कमरे में सिर्फ़ दोनों की सांसों की आवाज़ आ रही थी

मौसम ने रूंधी हुई आवाज़ में कहा "मुझे... मुझे समझ नहीं आ रहा, दीदी.. मेरा दिल और दिमाग, दोनों लड़ रहे हैं.. एक तरफ़ वो मेरी मम्मी है, जिनकी मैं बहोत इज्ज़त करती हूँ... और दूसरी तरफ़ ये सच... सोचकर ही मुझे घिन आ रही है..!!"

कविता, मौसम के पास सरककर, उसका हाथ थामते हुए बोली "और मैं तुमसे कह रही हूँ, तुम्हारा ये एहसास पूरी तरह जायज़ है.. मैं भी वहीं से गुज़री हूँ.. पर कभी-कभी, प्यार सिर्फ़ गले लगाने या ख्याल रखने में नहीं होता.. प्यार कभी-कभी.. किसी की अंतरंग तलाश, उसकी निजी गलतियों, उसकी मानवीय कमज़ोरियों को... न समझ सको, तो भी उसे स्वीकार करने का नाम भी होता है..!! माँ ने हमारी परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी.. क्या अब.. उनकी इस एक गुप्त, अकेली पीड़ा के लिए, हम उन्हें पूरी तरह खारिज कर दें?"

मौसम ने सिर झुकाए हुए कहा "नहीं... खारिज तो नहीं कर सकते.. पर मैं उनकी आँखों में आँखें डालकर कैसे देखूँगी अब?"

कविता: "वक्त लगेगा.. मुझे भी लगा था.. पर आज.. आज रात जो हुआ, उसने मुझे एक अजीब तरह से ये एहसास दिलाया है कि हम सब.. अपनी-अपनी ज़रूरतों, अपनी-अपनी तड़प के शिकार हैं.. विशाल तुम्हें धोखा दे रहा है.. ऐसा तुम्हें लगता है.. पीयूष के बीजी रहने के कारण मैं भी कुछ खालीपन महसूस करती हूँ.. और माँ.. वो तो हमसे भी ज़्यादा अकेली हैं.. शायद इसलिए मैंने तुम्हें ये राज़ बताया.. क्योंकि आज के बाद, हम दोनों एक दूसरे को जज करने की हैसियत में नहीं रहे.. हम दोनों.. और हमारी मम्मी भी.. सिर्फ़ इंसान हैं, मौसम.. जो गलतियाँ करते हैं, तलाशते हैं, टूटते हैं, और फिर से जीने की कोशिश करते हैं.."

मौसम कविता के कंधे पर सिर रख देती है और धीरे-धीरे रोने लगती है.. यह रोना क्रोध, भ्रम, बेवफाई के दर्द और एक नई, कठिन समझ के बीच का रोना था.. कविता उसे सहलाती है.. दोनों बहनें उस भारी सच के नीचे दबे हुए हैं, लेकिन अब वो अकेली नहीं हैं.. यह संवाद तो खत्म होता है, लेकिन उनके बीच की यह नई, जटिल और कहीं अधिक वास्तविक समझ की यह तो केवल एक शुरुआत थी..

मन हल्का होने पर कविता करवट लेकर सो गई.. पर मौसम की आँखों से नींद गायब हो चुकी थी.. उसकी दीदी की बातों पर अब भी उसका मन यकीन नहीं कर पा रहा था..

वह बेड से उठी और कपड़े पहनकर बेडरूम से बाहर निकली.. उसने अपनी मम्मी को कॉल किया यह बताने के लिए की वह आज की रात दीदी के घर ही सोने वाली थी..

करीब आधे घंटे तक मौसम शून्यमनस्क होकर सोफ़े पर बैठी रही.. और फिर उठकर घर से बाहर आई.. धीरे से कविता के घर का दरवाजा बंद किया और अपने घर की ओर निकल गई

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रमिलाबहन ने बाबिल के हाथों को छोड़ कर अपनी एक बाजू को उसकी कमर में डालते हुए बाबिल को अपनी तरफ खींचा, जिससे बाबिल जो कि अपनी अधखुली आँखों से रमिलाबहन की चूचियों को देख रहा था.. वो होश में आया और अपनी आँखों को ऊपर करके रमिलाबहन की तरफ देखने लगा..

बदले में रमिलाबहन ने एक प्यार भरी मुस्कान के साथ उसके सर पर हाथ ले जाकर उसके बालों को सहलाते हुए उसके चेहरे को अपनी चूचियों से सटा लिया.. बाबिल के लिए ये सीधा-सीधा संकेत था..

बाबिल के दहकते हुए होंठ रमिलाबहन की बड़ी बड़ी लेकिन कुछ ढली हुई चूचियों के ऊपर वाले हिस्से पर जा लगे और अपनी चूचियों पर बाबिल के होंठों को पा कर रमिलाबहन के बदन में करेंट सा दौड़ गया..

‘आह बाबिल…’ कहते हुए उसने बाबिल को और अपने से सटा लिया..

बाबिल भी अब पूरे जोश में था.. रमिलाबहन अपनी चूचियों को ऊपर-नीचे करने लगी, जिससे बाबिल के होंठ रमिलाबहन के चूचियों पर रगड़ खाने लगे..






रमिलाबहन की साँसें अब बहुत तेज चल रही थीं..

अचानक से बाबिल ने अपना हाथ रमिलाबहन की जांघ पर रख दिया, बाबिल को उस समय बहुत बड़ा झटका लगा, रमिलाबहन का पेटीकोट उसकी जाँघों से काफ़ी ऊपर चढ़ा हुआ था..

बाबिल का हाथ जांघ पर पड़ते ही रमिलाबहन के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई ‘हाय.. बाबिल..’

रमिलाबहन की मादक सिसकी सुनकर बाबिल को जैसे होश आया..

उसने अपना हाथ उसकी जांघ से हटा लिया, इससे पहले के बाबिल अपना हाथ पीछे करता.. रमिलाबहन ने बाबिल का हाथ पकड़ अपनी दोनों जाँघों के बीच में दबा लिया..






बाबिल को ऐसे लगा मानो उसका हाथ किसी दहक रही भट्टी के अन्दर चला गया हो, इतनी गरम जगह तो और कहीं हो नहीं सकती..

बाबिल भी अब रमिलाबहन के रंग में रंगने लगा था.. कविता के घर मौसम और वैशाली को चोदने के बाद वह थोड़ा थका हुआ तो था.. पर अब उसका लंड शॉर्ट्स में पूरी तरह से तन चुका था और उसको पता भी नहीं चला कि कब उसका लंड चड्डी के कपड़े को हटा करके बाहर आ चुका था और रमिलाबहन की चूत पर पेटीकोट के ऊपर से रगड़ खाने लगा..






रमिलाबहन की चूत में मानो आग लग गई हो, अब उससे बर्दाश्त करना मुश्किल होता जा रहा था..

रमिलाबहन ने बाबिल के हाथ को जो कि उसने अपनी जाँघों में दबा रखा था, उससे बाहर निकाल दिया और अपनी ऊपर वाली टाँग को उठा कर बाबिल की कमर पर रख कर अपना पेटीकोट कमर तक उठा दिया..

तभी दरवाजे के बाहर...!!

पर्स से अपने घर की चाबी लगाकर मौसम ने मुख्य द्वार को धीरे से खोला.. यह एहतियात बरतते हुए की जरा सी भी आवाज न हो.. अंदर आकर उसने चुपके से दरवाजे को लॉक किया.. ड्रॉइंग रूम में अंधेरा छाया हुआ था पर रमिलाबहन के कमरे के अधखुले दरवाजे से हल्की सी रोशनी नजर आ रही थी.. हालांकि मौसम को अपनी दीदी कविता से पता तो चल ही चुका था और वह जानती थी की अंदर क्या हो रहा होगा.. फिर भी वह अपनी आँखों से देखकर तसल्ली करना चाहती थी..

किसी बिल्ली की तरह दबे पाँव वह रमिलाबहन के बेडरूम की तरफ आई और हल्के से खुले दरवाजे से नजर आ रहे द्रश्य को छुपकर देखने लगी.. अंदर जो चल रहा था वह उसकी अपेक्षा अनुसार ही था पर फिर भी.. अपनी सुशील संस्कारी माँ को नंगे बदन.. टांगें फैलाएँ हुई.. उनके बेटे की उम्र के लड़के के साथ संभोग-रत देखकर.. उसका खून जम सा गया.. आश्चर्य से जबड़ा लटक गया.. आँखों के किनारों पर नमी आ गई..






माँ का वह रूप... वह दृश्य... उन आकृतियों की छाया अब भी आँखों के सामने नाच रही है.. मौसम के मन में एक ठंडी, भारी बेजानता छा गई है, जैसे शरीर के भीतर का सब कुछ जमकर पत्थर हो गया हो..

"यह क्या कर रही है मम्मी?"

यह प्रश्न बार-बार उसके मस्तिष्क में गूँज रहा है, हर बार एक नए आघात के साथ.. वही हाथ जो प्रतिदिन सुबह पूजा के फूल चढ़ाते थे, वही हाथ जो उसके सिर पर स्नेह से फेरते थे, आज वे... नहीं, यह सोच भी नहीं पा रही है मौसम..

एक ओर संस्कारी, सुशील, धार्मिक माँ का चित्र.. सफ़ेद साड़ी में, हाथ में माला, पापा की तस्वीर के आगे दीपक जलाते हुए.. दूसरी ओर यह दृश्य... ये दोनों छवियाँ एक-दूसरे से टकरा रही थी और हर टक्कर में मौसम की पहचान, उसकी नैतिक दुनिया, उसका बचपन.. सबकुछ चूर-चूर हो रहा था..

वह माँ जो उसे "लाज-शर्म" के पाठ पढ़ाती थी, आज वही...

वह माँ जो नौकर से "दूरी" बनाने की सीख देती थी, आज...

वह धर्म, वह संस्कार, वह सभ्यता - ये सब क्या थे? सिर्फ़ दिखावा? एक मुखौटा?

"क्या सारा जीवन एक झूठ था? क्या मम्मी की वह शुद्ध, पवित्र छवि मेरी कल्पना मात्र थी? या फिर... क्या मैं कुछ गलत समझ रही हूँ?"

मौसम के मन में क्रोध भी उमड़ रहा था.. नौकर बाबिल के प्रति, माँ के प्रति, और शायद स्वयं के प्रति भी कि वह इस स्थिति में असहाय थी.. साथ ही एक गहरी शर्म का भाव था, जैसे उसने स्वयं कुछ गलत किया हो.. एक अपराध-बोध कि उसे यह नहीं देखना चाहिए था"..

अब आगे क्या होगा? क्या वह कभी मम्मी की आँखों में देख पाएगी? क्या अब उनके साथ रोज़ जैसा सामान्य जीवन जीना संभव हो पाएगा? क्या इस घटना को कभी भुलाया जा सकेगा? या यह उसके और उसकी मम्मी के बीच हमेशा एक अदृश्य दीवार बनकर रहेगा? क्या वह भी कविता दीदी की तरह इस वास्तविकता का स्वीकार कभी कर पाएगी?

मौसम के हाथ-पैर सुन्न हो रहे थे.. वह एक तरफ़ तो उस दृश्य को मन से मिटाना चाहती है, दूसरी तरफ़ वह बार-बार उसे याद करके स्वयं को और पीड़ित कर रही थी.. यह उसकी पहचान का संकट था - एक बेटी का, एक संस्कारों में पली व्यक्ति का, और एक ऐसे व्यक्ति का जिसकी दुनिया अचानक उलट गई थी..

उसके भीतर का बचपन मर गया था इस एक पल में.. और अब वह जो कुछ भी था.. उसके टूटे हुए विश्वासों, ध्वस्त आदर्शों और एक अदृश्य घाव के साथ जीने को विवश थी..

शून्यमनस्क होकर मौसम ने फिर से अपनी निगाहें अंदर चल रहे भीषण कामयुद्ध पर डाली..

बाबिल अपने तगड़े लंड का मोटा सुपाड़ा सीधा रमिलाबहन की चूत की बूढ़ी फांकों पर रगड़ रहा था… उसकी आँखें मदहोशी के आलम में बंद हो गई थी.. बाबिल के हाथ-पैर कामुकता के कारण कांप रहे थे..


रमिलाबहन की चूत की फांकों ने बाबिल के लंड के सुपाड़े को चूम कर स्वागत किया और सुपाड़े के चारों तरफ फ़ैल गईं..

‘ऊंह ओह बाबिल..’ मादक सिसकी भरते हुए रमिलाबहन ने उसे और ज़ोर से अपने से चिपका लिया और अपनी कमर को धीरे आगे की तरफ करते हुए बाबिल के लंड पर अपनी चूत दबाने लगी, बाबिल के लंड का सुपाड़ा अब सीधा रमिलाबहन की चूत पर टिका हुआ था..

बाबिल अपने लंड के सुपाड़े पर रमिलाबहन की चूत से बह रहे गरम लिसलिसे पानी को महसूस करके और उत्तेजित हो गया और उसने भी अपनी कमर को आगे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया..

बाबिल के लंड का सुपाड़ा रमिलाबहन की चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुसने लगा..






रमिलाबहन को बाबिल के मोटे लंड का सुपाड़ा अपनी चूत की दीवारों पर रगड़ ख़ाता हुआ महसूस हुआ, तो वो पागलों की तरह बाबिल के चेहरे पर चुम्बनों की बारिश करने लगी..

रमिलाबहन: "ओह्ह.. बाबिल मेरे राजा… ओह उम्ह्ह ओह.. मेरी जान.. हाँ चोद डाल मुझे.. बहोत प्यासी है. ये तेरी मालकिन.. ओह.. बाबिल.."

यह कहते हुए रमिलाबहन ने बाबिल को बाँहों में भरते हुए अपने ऊपर खींच लिया..

इस द्रश्य को देख रही मौसम का शरीर अब एक अजीब सी भावना से गुजर रहा था.. घृणा का भाव घटता जा रहा था और अंदर चल रहे संभोग को देखकर उसकी रगों का खून तेजी से दौड़ने लगा था.. मौसम को पता भी नहीं चला की कब उसकी एक हथेली कमर पर बंधे स्कर्ट के अंदर होते हुए पेन्टी को खिसकाकर चूत को मसलने लगा था.. उसे आश्चर्य इस बात का था की अपनी माँ को चुदते हुए देखकर उसकी चूत कैसे इतनी गीली हो गई..!!!






रमिलाबहन और बाबिल के बीच चल रही खींचा-तानी में उसकी शॉर्ट्स बदन से अलग हो गई..

अब बाबिल का सारा वजन उनके ऊपर आ चुका था..

रमिलाबहन ने बाबिल की कमर को दोनों तरफ से पकड़ कर अपनी विशाल गांड को ऊपर की तरफ उछाला.. उम्र के हिसाब से अब भी उनके अंदर काफी ताकत थी.. शायद उनकी भड़की हुई वासना ने उन्हे यह ताकत दी थी

बाबिल का मोटा लंड रमिलाबहन की अनुभवी चूत में रगड़ ख़ाता हुआ आधे से ज्यादा अन्दर चला गया.. रमिलाबहन की आँखें मस्ती में बंद हो गईं.. अपने होंठों को दाँतों से दबाते हुए उसने अपनी टाँगों को फैला लिया, ताकि बाबिल आराम से उसकी चूत में अपना लंड अन्दर-बाहर कर सके..

अपनी माँ के भोसड़े के छल्ले में अंदर बाहर हो रहे नौकर के लंड को देखते हुए मौसम ने अपनी एक उंगली चूत के अंदर डाल दी.. यह कल्पना करते हुए की बाबिल का मोटा लंड उसके अंदर घुस रहा हो..

रमिलाबहन का बदन पूरा ऐंठ चुका था.. बाबिल को उनकी चूत अपने लंड पर कसी हुई महसूस हो रही थी..

अब बाबिल वासना के सागर में गोते खा रहा था, पर रमिलाबहन की चूत जिस हिसाब से पानी छोड़ रही थी.. उससे बाबिल का लंड बिना किसी दिक्कत के अन्दर-बाहर करता जा रहा था..

रमिलाबहन: "ओह बेटा हाँ.. डाल दे धीरे-धीरे पूरा अन्दर कर दे… ओह सी ओह..!!"

बाबिल का लंड पूरा का पूरा रमिलाबहन की चूत में समा गया..

रमिलाबहन की चूत के छेद का छल्ला पूरी तरह फैला हुआ था और रमिलाबहन अपनी आँखें बंद किए हुए सिसकियाँ भर रही थी..






बाबिल के लंड की सख्ती को महसूस करके, उनकी चूत लगातार पानी बहा रही थी..

बाबिल ने रमिलाबहन के कामुक चेहरे की ओर देखा, बाबिल का लंड जड़ तक रमिलाबहन की चूत में समाया हुआ था.. वैसे तो वो आज दो जवान चूतों को पेलकर आया था पर मालकिन की अनुभवी भोसड़े का वह अब आदि हो चुका था..

रमिलाबहन ने भी अपनी अधखुली आँखों से बाबिल की आँखों में देखा, जैसे कह रही हो ‘अब रुक क्यों गए?’ बाबिल ने धीरे-धीरे अपनी बड़ी गांड को ऊपर की ओर उठाना चालू किया..

उसका लंड रमिलाबहन की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ बाहर आने लगा.. जिससे रमिलाबहन के रोम-रोम में मस्ती की लहर दौड़ गई और उसकी आँखें एक बार फिर से बंद हो गईं.. रमिलाबहन अपनी चूत पर होने वाले पहले प्रहार के लिए अपने आप को जैसे तैयार कर रही थी..

तेज चलती साँसों के साथ हिलती हुई बड़ी-बड़ी चूचियाँ, जिसे देख कर बाबिल पागल हुआ जा रहा था..

अपने लंड को सुपाड़े तक बाहर निकाल कर बाबिल एक पल के लिए रुका..

जैसे वो भी पहले झटके के तैयारी कर रहा हो..

रमिलाबहन जिसने कि बाबिल की कमर को दोनों हाथों से कस कर पकड़ा हुआ था..

उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी, उसके हाथ उसकी कमर पर काँप रहे थे और अपनी टाँगों को घुटनों से मोड़ कर जितना हो सकता था, ऊपर उठा लिया..

बाबिल एक पल के लिए और रुका और फिर अपनी गांड को पूरी रफ़्तार के साथ आगे की तरफ धकेला.. पूरे कमरे में ‘ठाप’ की ज़ोर से आवाज़ गूँज उठी..

‘ऊंहह ओह बाबिल..’ रमिलाबहन ने अपने होंठों को भींचते हुए कहा..

बाबिल का लंड पूरी रफ़्तार से एक बार उनकी चूत की गहराईयों में खो चुका था..

बाबिल के मुँह से भी ‘आहह’ निकल गई..

रमिलाबहन ने उसे अपने ऊपर खींच कर अपने से चिपका लिया, बाबिल भी पूरी मस्ती में आ चुका था..

उसने एक बार फिर अपने लंड को सुपाड़े तक बाहर निकाला और फिर अपनी गांड को पूरी रफ़्तार से धक्का देते हुए, अपने लंड को रमिलाबहन की चूत की गहराईयों में उतार दिया, ‘ओह जुग-जुग जियो मेरे लाल....’ रमिलाबहन की ऐसी बातें बाबिल को और जोश दिला रही थीं..

रमिलाबहन भी बाबिल के लंड की नसों को अपनी चूत में फुला हुआ साफ़ महसूस कर पा रही थी..

बाबिल के इन दो जबरदस्त धक्कों ने उनकी चूत में और सरसराहट बढ़ा दी..

उन्हें डर था कि कहीं बाबिल जोश में आकर जल्दी ना झड़ बैठे और उन्हें यूँ ही सुलगता हुआ न छोड़ दे..

बाबिल की रफ़्तार को कम करने के लिए.. उन्हों ने अपनी टाँगों को उसकी कमर पर कस लिया और अपने दोनों हाथों से अपने ब्लाउज के बटन खोल कर अपनी ४० साइज़ के चूचियों को आज़ाद कर दिया..






आज तो बाबिल की किस्मत उस पर मेहरबान हो गई थी.. पहले मौसम और वैशाली के गदराए जिस्मों को रौंदा और अब मालकिन के अनुभवी सागर में गोते लगा रहा था..

रमिलाबहन की चर्बीदार बड़ी बड़ी चूचियों को देख बाबिल से रहा नहीं गया और पलक झपकते ही रमिलाबहन की बाईं चूची को जितना हो सकता था, मुँह में भर लिया..

अपनी निप्पल पर बाबिल की गरम जीभ और लार को महसूस करते ही… उसके बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई.. उन्हों ने अपनी बाँहों को बाबिल के पीठ पर कस लिया..

बाबिल उनकी निप्पलें चूसते हुए पूरी रफ़्तार से अपने लंड को उनकी चूत के अन्दर-बाहर करने लगा और रमिलाबहन अपनी गांड को बिस्तर से ऊपर उठाए हुए उसके धक्कों की रफ़्तार को कम करने की कोशिश करने लगी..

रमिलाबहन: "ओह्ह रुक ज़ाआअ.. बाबिल धीरे-धीरे उफफफफफ्फ़ तू सुन ना… मेरी बात.. ओह्ह कितना मोटा है रे.. तेरा मूसल ओह.. धीरे-धीरे हाँ.. बेटा ऐसे हीई धीरे-धीरे चोद दे अपनी मालकिन को.. ओह्ह बेटा आराम से.. पहले मेरी इन चूचियों को जी भर कर चूस.. ओह्ह बेटा.. मैं कहीं भागी थोड़ी जा रही हूँ.. बेटा ओह्ह धीरे..!!"

रमिलाबहन ने दोनों के ऊपर रज़ाई खींच ली, ‘आह्ह… बेटा ले चूस ले बेटा....’ और ये कहते हुए उसने बाबिल के सिर को अपनी चूचियों पर दबा दिया..

बाबिल भी जैसे इसी पल का इंतजार कर रहा था.. उसने भी फिर से उनकी चूची के निप्पल को मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से उनकी चूची को चूसते हुए, धीरे-धीरे अपने लंड को चूत में अन्दर-बाहर करने लगा..

बाबिल का दूसरा हाथ अब रमिलाबहन की दूसरी चूची पर आकर उसे मसलने लगा था.. बाबिल की इस हरकत से रमिलाबहन के होंठों पर कामुक मुस्कान फ़ैल गई..

रमिलाबहन: "हाँ मेरे सोना.. मसल दे मेरे चूचियों को ओह राजा…आा.. मैं तो कब.. से ओह्ह… धीरे.. बेटा ओह तेरे लंड को अपनी फुद्दी में लेने के लिए तड़प रही थी…ओह्ह आह्ह.. आह्ह.. धीरेए बाबिल ओह.."

रमिलाबहन की चूत से निकल रहे कामरस से बाबिल का लंड पूरी तरह भीग कर चिकना हो गया था और बिना किसी रोक-टोक के चूत में अन्दर-बाहर हो रहा था..






बाबिल ने अपने होंठों को उनकी निप्पल से हटाया और उनकी गर्दन को चाटते हुए उसके गालों पर चुम्बन करने लगा..

रमिलाबहन ने भी दोनों हाथों से बाबिल के सर को पकड़ लिया और उसके बालों को सहलाने लगी..

"सीईईईईई ओह.. बाबिल चोद मुझे ओह.. ओह हाँ चोद बेटा ज़ोर से चोद ओह्ह डाल दे अपना पूरा लंड ओह.."

रमिलाबहन अब पूरी तरह गरम हो चुकी थी और झड़ने के करीब पहुँच रही थी.. उन्हों ने अपने पैरों को.. जो बाबिल की कमर के चारों ओर कस रखे थे.. उन्हें हटा कर अपनी जाँघों को पूरा खोल लिया और अपनी गांड को ऊपर की ओर उछालने लगी..

बाबिल का लंड ‘फच-फच’ की आवाज़ के साथ रमिलाबहन की चूत में अन्दर-बाहर होने लगा..

रज़ाई में गरमी इस कदर बढ़ गई थी कि दोनों पसीने से तर हो गए..

रमिलाबहन ने रज़ाई को एक तरफ पटक दिया और बाबिल के सर को पकड़ कर अपने होंठों को उसके होंठों पर लगा दिया..

बाबिल भी अब कहाँ रुकने वाला था..

जैसे ही रमिलाबहन ने अपने होंठों को उसके होंठों पर रखा, उसने रमिलाबहन के दोनों होंठों को चूसना शुरू कर दिया… नीचे अपनी कमर को पूरी रफ़्तार से हिलाते हुए, बाबिल अपना लंड रमिलाबहन की चूत में अन्दर-बाहर करता जा रहा था और रमिलाबहन भी अपनी गांड को बिस्तर से ऊपर उठा कर बाबिल का लंड अपनी चूत में ले रही थी..

फिर तो जैसे रमिलाबहन की चूत से सैलाब उमड़ पड़ा..उनका पूरा बदन अकड़ गया और उन्हों ने अपने नाख़ून बाबिल की पीठ में गढ़ा दिए..

बाबिल का लंड भी और टिक नहीं पाया और एक के बाद एक वीर्य की बौछार कर अपनी मालकिन की चूत की पुरानी दीवारों को भिगोने लगा..








और इसी के साथ मौसम की चूत की दीवारों ने भी भरपूर मात्रा में योनि-रस छोड़ दिया..

वासना का तूफ़ान अब ठंडा पड़ चुका था… पर अब भी दोनों एक-दूसरे के होंठों को चूस रहे थे.. और मौसम अपने अस्तव्यस्त कपड़े ठीक कर रही थी

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वैशाली, जो एक हिंसक यौन हमले का शिकार हुई, शारीरिक और भावनात्मक रूप से टूटी हुई है.. वह अपने पति और समाज के डर से इस घटना को किसी को बता नहीं पाती और अकेलेपन में घुटती रहती है.. अंततः, वह सहारे के लिए अपनी माँ शीला को बुलाती है..

दूसरी ओर, कविता अपनी बहन मौसम को बाबिल और उनकी माँ रमिला के संबंधों के बारे में बताती है.. मौसम को यह सच स्वीकार करना बहुत कठिन लगता है.. वह छिपकर अपनी माँ और बाबिल को यौन संबंध बनाते हुए देखती है, जिससे उसकी दुनिया हिल जाती है.. विरोधाभास यह है कि यह दृश्य देखकर उसे घृणा के साथ-साथ यौन उत्तेजना भी महसूस होती है..

कहानी इन पात्रों के आंतरिक संघर्ष, टूटे विश्वास, सामाजिक बंधनों और मानवीय कमजोरियों के चित्रण के साथ आगे बढ़ती है, जहाँ हर कोई अपनी इच्छाओं और वास्तविकताओं के बीच फँसा हुआ है..

अब आगे..


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दूसरी सुबह शीला वैशाली के घर पहुँच गई.. पिंटू बेंगलोर गया हुआ था और वैशाली के सास-ससुर अपनी बेटी के घर एक हफ्ते के लिए गए थे.. दोनों माँ-बेटी ने अकेले में ढेर सारा वक्त साथ गुजारा.. शीला को देखते ही वैशाली अपने साथ घटी उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को जैसे भूल ही गई.. अपनी माँ के साथ रहकर उसमें नई शक्ति का संचार हुआ.. बस एक ही दिन मे वह नॉर्मल हो गई..

तीसरे दिन की सुबह.. बेड पर लेटी वैशाली अपने मोबाइल पर इंस्टाग्राम की रील्स देख रही थी.. शीला के आने पर उसने कुछ दिनों के लिए ऑफिस से छुट्टी ले ली थी ताकि वह अपनी माँ के साथ समय बीता सकें.. शीला रसोईघर में खाना पका रही थी..

स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए कुछ उत्तेजक रील्स को देखकर वैशाली की फुद्दी कुलबुलाने लग गई.. कविता के घर चार दिन पहले हुई उस घमासान चुदाई का नशा तो कब का उतर चुका था.. रजाई ओढ़े लेटी वैशाली का हाथ उसकी शॉर्ट्स के अंदर चला गया.. और वह कपड़ों के ऊपर से ही अपनी मुनिया सहलाने लगी.. अपनी माँ शीला की तरह वैशाली भी अत्याधिक कामुक स्त्री थी.. देह-सुख का जितना आनंद लेती उतनी ही उसकी भूख अधिक तीव्र होती जाती थी








आप जानते ही होंगे, इंस्टाग्राम आपकी गतिविधियों, जैसे रील्स देखने के समय और इंटरैक्शन को ट्रैक करता है.. फिर उस डेटा के आधार पर एल्गोरिदम आपको समान या संबंधित विषयों की और अधिक रील्स दिखाता रहता है.. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ.. एक के बाद एक अर्धनग्न जिस्मों के अंतरंग यौन संबंधों वाली रील्स देखकर वैशाली बेहद गरमा गई.. उसकी उँगलियाँ अब चूत की गीली परतों को कुरेदने लग गई

जब जिस्म की हवस काबू से बाहर हो गई तब वैशाली बिस्तर से उठी.. उसने चुपके से किचन में नजर डाली.. शीला किसी से फोन पर बात करते हुए खाना बना रही थी.. वैशाली चुपके से अपने बाथरूम में गई, शावर ऑन कर दिया ताकि पानी की आवाज में उसकी आवाज दब जाएँ.. और बरस रहे पानी से थोड़े दूर कमोड पर जाकर बैठ गई

उसने तुरंत कविता को फोन मिलाया

कविता: "हाँ वैशाली, बता, कैसे याद किया?"

वैशाली: "यार, पॉइंट पर ही आती हूँ.. आज दोपहर तेरे घर पर उस नौकर को बुला सकती है क्या? में दोपहर में ऑफिस के काम का बहाना बनाकर तेरे घर चली आऊँगी"

कविता के चेहरे पर कुटिल सी मुस्कान आ गई, वह बोली "आय हाय, बड़ी तड़प रही है.. चार ही दिनों में फिर से आग लग गई नीचे..!!"

वैशाली ने ईमानदारी से कहा "मेरी फितरत तो तू जानती ही है कविता.. मुझे तो दिन में एक बार भी कम पड़ता है.. हाँ, जब तक संयम रख सकती हूँ तब तक ठीक है, पर एक बार जो शुरू हो गई फिर.."

कविता: "समझ गई यार.. पर सुन.. मेरे घर फिलहाल में उसे नहीं बुला सकती.. पीयूष लौट चुका है.. वैसे तो वो ऑफिस है पर उसका कुछ ठिकाना नहीं.. कब आ टपके..!!"

वैशाली: "मैं एक काम करती हूँ.. पीयूष को काम के बहाने फोन कर उसका शिड्यूल जान लेती हूँ.. फिर तो कोई दिक्कत नहीं है ना..!!"

कविता अब थोड़ी गंभीर हो गई.. हालांकि वह वैशाली की मदद करना चाहती थी और उसका खुद का भी मन था.. पर वह इतना बड़ा खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी.. हाँ, पीयूष शहर में न होता तो और बात थी

कविता: "सॉरी वैशाली... नहीं हो पाएगा यार.. बहोत रिस्क है"

वैशाली निराश हो गई

कविता: "एक काम हो सकता है.. मैं उसे तेरे घर भेज देती हूँ.. तेरा घर तो फिलहाल खाली ही है.. फिर तू आराम से उसके मजे ले पाएगी"

वैशाली थोड़ी चिढ़ सी गई, और बोली "क्या बचकानी बातें कर रही है..!! भूल गई, मम्मी आई हुई है..!!"

कविता: "अरे हाँ, यह तो मैं भूल ही गई.. तो फिर तू शीला भाभी को किसी बहाने दो-तीन घंटों के लिए बाहर क्यों नहीं भेज देती..!!"

वैशाली ने परेशान स्वर में कहा "इतना आसान थोड़े ही है.. तू तो जानती है मम्मी को, मेरा चेहरा देखकर एक ही सेकंड में सब भांप लेगी"

एक लंबी सांस छोड़कर कविता ने कहा "फिर तो कुछ नहीं हो सकता यार..!!"

वैशाली सोच में पड़ गई.. हवस उसके सिर पर चढ़कर नंगा नाच कर रही थी.. आज इस प्यास को बुझाएँ बिना चैन नहीं पड़ने वाला

वैशाली: "ठीक है, मैं कुछ सोचती हूँ.. और फिर तुझे बताती हूँ" वैशाली ने फोन रख दिया

बिस्तर पर फोन पटककर वह गहरी सोच में पड़ गई.. क्या बहाना बनाउ..!! उसके उपजाऊ दिमाग में एक सुझाव आया

वह तुरंत भागी कीचेन की ओर.. रोटियाँ शेक रही शीला की बगल में जाकर बोली

"मम्मी, कुछ मदद करू आपकी?'

शीला ने बिना उसकी तरफ मुड़े रोटियाँ बनाना जारी रखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा "जब तक मैं यहाँ हूँ, तुझे यह सब करने की कोई जरूरत नहीं.. रोज तो तू ऑफिस के काम के साथ साथ घर का काम भी संभालती ही है.. अब कुछ दिन आराम ही कर लें"

वैशाली: "मैं दरअसल आपसे कहने आई थी की मुझे ऑफिस जाना पड़ेगा कुछ घंटों के लिए"

अब शीला ने वैशाली की ओर रुख किया और पूछा "पर तू तो छुट्टी ले चुकी है ना..!! फिर ऐसा कौन सा काम आन पड़ा?"

शीला की आँखों में आँखें डालकर झूठ बोलने की ताकत थी नहीं वैशाली में.. वह जानती थी की उसकी माँ की माइक्रोस्कोप जैसी नजर से सच को छुपाना कितना मुश्किल है..!! वह पलटकर धुले हुए बर्तनों को एक के बाद एक शेल्फ पर रखते हुए बात करने लगी "असल में मेरा एक कंसाइनमेंट जाना है आज.. अर्जेंट है इसलिए मुझे जाना पड़ेगा"

शीला: "किसी ओर को बोल दे करने के लिए.. ऐसा हो तो मैं बात करू क्या पीयूष से??"

वैशाली ने थोड़ा हड़बड़ाकर कहा "उसकी कोई जरूरत नहीं है मम्मी, वैसे भी, पीयूष ऐसे कामों में उलझता नहीं है.. उसे तो इस बारे में शायद ज्यादा मालूम भी नहीं होगी.. चूंकि इस कस्टमर को पहले से मैंने हेंडल किया है, इसलिए मैं चाहती हूँ की मटीरीअल भेजने से पहले पूरी तसल्ली कर लूँ"

शीला ने हथियार डाल दिए.. "ठीक है, जैसा तुझे ठीक लगें.. वैसे कब तक वापिस लौटेगी?"

वैशाली: "कुछ कह नहीं सकते.. पर कम से कम दो-तीन घंटे तो लग ही जाएगी"

शीला ने एक गहरी सांस छोड़कर कहा "ठीक है फिर.. जाकर आ ऑफिस"

वैशाली: "अरे मम्मी, मैं तो आपको बताना ही भूल गई.. प्रदर्शन मैदान पर हेंडलूम साड़ियों की सेल लगी है.. ऑफिस में मेरी कलीग बता रही थी की बहोत ही बढ़िया साड़ियाँ है.. और दाम भी एकदम वाजिब है.. आप वहाँ क्यों नहीं हो आती?"

शॉपिंग का नाम सुनकर शीला की आँखों में चमक आ गई, उसने कहा "ऐसी बात है तो जरूर चलते है.. पर कल जाएंगे.. तू भी चलना मेरे साथ"

वैशाली ने थोड़ी घबराहट के साथ कहा "नहीं मम्मी, आज प्रदर्शनी का आखिरी दिन है.. और वैसे भी, मैं साड़ियाँ कहाँ पहनती ही हूँ..!! शादी के समय आपने जो साड़ियाँ दी थी वह भी वैसी की वैसी पेक पड़ी हुई है.. आप ही हो आइए.. ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा"

शीला ने कुछ सोचकर कहा "साड़ी नहीं तो कुछ और.. मुझे कुछ तो लेना है तेरे लिए.. एक काम कर.. ऑफिस का काम निपटाकर तू सीधे वहीं आ जाना..!!"

वैशाली: "हाँ यह भी ठीक है.. आपको मेरे लिए कुछ पसंद आ जाएँ तो विडिओ कॉल कर लेना.. मैं सिलेक्ट कर लूँगी"

शीला ने बड़बड़ाते हुए कहा "हाथ में पकड़कर कपड़ों की जो परख होती है वो फोन पर देखकर कैसे पता चलेगा..!!! ये आजकल की जनरेशन भी ना..!! सबकुछ घर बैठे ही चाहिए.. चल, ठीक है, मैं तुझे फोन करूंगी अगर कुछ पसंद आया तो"

वैशाली पीछे से ही शीला को लिपट गई और उसके गालों को चूमते हुए बोली "थैंक यू मम्मी"

शीला को थोड़ा सा अटपटा जरूर लगा.. उसके साड़ियों के सेल में जाने पर वैशाली इतनी खुश क्यों हो रही है..!! पर शीला ने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया

बाथरूम में जाकर हाथ-मुंह धोकर शीला सेल मे जाने के लिए तैयार हो गई.. बाहर आकर देखा तो वैशाली उन्हीं कपड़ों में बैठी थी और फोन पर मेसेज कर रही थी

शीला ने थोड़े आश्चर्य के साथ कहा "तू अब तक तैयार नहीं हुई?? ऑफिस नहीं जाना क्या? फिर चल मेरे साथ"

वैशाली: "अरे नहीं नहीं मम्मी.. मुझे ऑफिस जाना ही है.. बस मटीरीअल के वेरहाउस पहुंचते ही निकलूँगी" इतना कहकर वैशाली फिर से कविता को मेसेज करने लग गई की अब रास्ता साफ है और वो बाबिल को उसके घर भेज सकती है.. साथ ही उसने अपना अड्रेस भी व्हाट्सप्प कर दिया ताकि कविता बाबिल को दे सकें

मेसेज करने में व्यस्त वैसाली का अचानक ध्यान गया की शीला वहीं खड़ी खड़ी उसे तांक रही थी और उसकी हर हरकत को बारीकी से निहार रही थी.. वैशाली समझ गई.. मम्मी को यकीन दिलाने के लिए उसे तैयार होना ही पड़ेगा.. उसने फोन सोफ़े पर रखा और कपड़े पहनने अंदर चली गई

उसके जाने के बाद शीला ने वैशाली का फोन उठाया पर उसपर फिंगरप्रिन्ट लॉक लगा हुआ था इसलिए शीला उसे खोल न पाई.. फिर उसे लगा की वह बेकार ही वैशाली पर शक कर रही है.. और कहीं वैशाली बाहर आ गई और फोन उसके हाथों में दे दिया तो बुरा मान जाएगी.. नहीं पीढ़ी की अपने फोन के प्रति आसक्ति और सनक से वह भलीभाँति वाकिफ थी

उसने फोन रख दिया.. और बैठे बैठे वैशाली के तैयार होने का इंतज़ार करने लगी

वैशाली ने बेडरूम का दरवाजा आधा खोलकर, अपनी ब्रा के हुक को पकड़े हुए बाहर गर्दन निकाली.. बाहर शीला को सोफ़े पर बैठे देखकर उसने कहा "आप अभी गई नहीं मम्मी?"

शीला: "सोचा साथ में ही निकलते है"

वैशाली: "मुझे थोड़ा वक्त लगेगा.. एक बार मटीरीअल पहुँचने का फोन आने पर मैं निकलूँगी.. आप जाइए, वरना सेल मे पहुँचने में देरी हो गई तो अच्छी साड़ियाँ निकल जाएगी"

"ठीक है.." कहते हुए शीला ने अपना पर्स उठाया

"और हाँ माँ.. ऑटो लेकर ही जाना.. बस के चक्कर में मत रहना.. उनका कोई ठिकाना नहीं होता" वैशाली ने सलाह देते हुए कहा

"ओके, कहते हुए शीला ने घर का मुख्य दरवाजा खोला और चली गई..

शीला के जाते ही वैशाली ने चैन की सांस ली.. उसने तुरंत कविता को फोन किया..

कविता: "भेज दिया मैंने उसे.. ऑटो में आ रहा है.. और सुन... तेरे घर के बाहर वाले बागीचे पर जाकर उसका इंतज़ार करना.. वैसे तो मैंने तेरा पूरा पता दिया है.. पर घर ढूँढने शायद उसे वक्त लगे और तेरा उतना टाइम खराब होगा इसलिए"

वैशाली ने खुश होकर कहा "मैं अभी जाती हूँ.. और उसे लेकर आती हूँ"

वैशाली ने फोन कट किया.. शीला के सामने दिखावा करने के लिए जो ऑफिस के कपड़े पहने थे उसे बदलकर घर के आरामदायक कपड़े पहन लिए.. और अपने पिंक फ्लिप-फ्लॉप पहनकर बागीचे की ओर चल पड़ी..

उसके घर से बागीचा करीब २०० मीटर की दूरी पर ही था.. कुछ देर के इंतज़ार के बाद एक ऑटो वहाँ आकर रुकी.. और बाबिल उतरा.. आँखों ही आँखों में इशारा कर उसने बाबिल को अपने पीछे आने के लिए कहा.. घर के दरवाजे तक पहुंचकर उसने आजू बाजू देखकर तसल्ली कर ली की कोई देख तो नहीं रहा..!! दरवाजा खोलकर चुपके से उसने बाबिल को अंदर लिया और दरवाजा बंद कर दिया..

आह्ह..!! अब मज़ा आएगा.. वैशाली ने सोचा..!! उसने एक नजर बाबिल की ओर देखा.. मैली सी टी-शर्ट और ट्रेक पेंट पहने खड़ा.. गोरा गुलाबी सा वह नेपाली लड़का.. वैशाली को तो पहली ही बार में पसंद आ गया था..

ज्यादा वक्त न गँवाते हुए वह उसे अपने बेडरूम मे ले गई.. बेडरूम में जाकर बाबिल वहीं गुड्डे के तरह खड़ा हो गया.. वैशाली की फितरत को तो वो उस दिन कविता के घर ही भांप गया था.. पहल तो वैशाल की तरफ से ही होना तय था..

वैशाली ने बड़ी ही शरारती नज़रों से बाबिल की ओर देखा.. और एक मदहोश अंगड़ाई लेकर उसने अपना टॉप उतार दिया... उसके बड़े बड़े स्तन जो लाल रंग की जालीदार ब्रा में कैद थे.. बाबिल की तरफ धुंडीयां तानकर तांकने लगे.. बाबिल हक्काबका होकर वैशाली के गदराए यौवन को देखता रहा..

"अपने हाथों से पकड़कर दबा इन्हें" वैशाली ने उसे आमंत्रित करते हुए कहा

इस पर जब बाबिल की हिम्मत न हुई तो वैशाली ने अपने दोनों हाथों से पकड़कर बाबिल का मुंह अपनी लंबी क्लीवेज पर दबा दिया..






आह्ह..!! परफ्यूम और पसीने की मिश्रित गंध से सने स्तनों के बीच अपना मुंह दबा पाकर बाबिल के तो वारे न्यारे हो गए.. उसने अपनी दोनों हथेलियों को वैशाली के मांसपिंडों पर दबाया.. इतने नरम और गरम..!!! उफ्फ़..!! धीरे धीरे उसने स्तनों का मर्दन शुरू किया और वैशाली मदहोश होकर.. आँखें बंद कर आनंद लेने लगी..

एक ही पल में वैशाली का हाथ बाबिल के ट्रेकपेंट के ऊपर से ही उसके मस्त लंड को सहलाने लग गया.. इससे पहले की बाबिल संभल पाता, वैशाली ने एक झटके में उसका पेंट, जांघिये समेट घुटनों तक उतार दिया.. और बाबिल के तने हुए हथियार के सामने उकड़ूँ अवस्था में बैठ गई






प्यारे गुलाबी लंड की मोटाई को अपनी मुठ्ठी में पकड़कर, उभरी हुई नसों को वह बेतहाशा चाटने लगी.. बाबिल के तो जैसे होश ही उड़ गए.. चमकते हुए गुलाबी टोपे के मूत्र-छेद पर अपनी जीभ की नोक से चाटना शुरू कर वैशाली ने कुछ ही पलों में उस लंबे लंड को अपने कंठ तक उतार दिया..!!







तभी दोनों को चौंकाते हुए दरवाजे की घंटी बजी

टिंग टॉंग..!!!

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