Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 45 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

पिछले अध्याय में आपने पढ़ा की..

ऑफिस में पीयूष और पिंटू के बीच काम को लेकर बातें हो रही है.. पीयूष बेंक लोन की राह देख रहा है और पिंटू सारे विक्रेताओं को पेमेंट के लिए समझाने में झुटा हुआ है.. काम के सिलसिले में पीयूष, पिंटू को बेंगलोर भेज रहा है..

उस रात जब पिंटू बेंगलोर जाने की तैयारी कर रहा था तब प्यास से झुँझती वैशाली उसे संभोग करने के लिए उकसाती है.. वैशाली के गदराए जिस्म पर पिंटू टूट तो पड़ता है पर उसे तब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है जब उसका हथियार तैयार होने से मना कर देता है

निराशा में डूबे पिंटू को वैशाली डॉक्टर के पास जाने की हिदायत देता है.. जिसे सुनकर पिंटू भड़क उठता है

अब आगे..

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बेंगलोर के कोरमंगला विस्तार के एक आलीशान अपार्टमेंट की २१ वी मंजिल पर अपने फ्लेट के बेडरूम में मौसम इंस्टाग्राम पर रील्स देख रही थी.. नवीनतम और अति-आधुनिक सुख सुविधाओं से लैज उस ४बीएचके फ्लेट में, बस मौसम और विशाल दो लोग ही रहते थे..!!

शादी के बाद, विशाल पीयूष की ऑफिस में नौकरी नहीं करना चाहता था क्योंकि अपने ही जीवनसाथी के अधीन काम करना उसे अजीब और असहज लग सकता था.. शायद वह खुद को एक अलग पहचान देना चाहता था और यह साबित करना भी कि उसकी सफलता उसकी मेहनत और काबिलियत का नतीजा है, न कि उसकी शादी या रिश्तेदारी के कारण.. ऑफिस में उसकी भूमिका और शादीशुदा जिंदगी के बीच वह एक सीमा-रेखा चाहता था.. शायद उसे डर भी होगा कि कहीं उसके सहकर्मी उसकी तरक्की को उसकी शादी की वजह से न जोड़ें.. इसके अलावा, उसे यह भी डर था कि ऑफिस में मौसम के नीचे काम करने से उसकी आजादी और आत्मसम्मान पर प्रभाव पड़ सकता है.. इसलिए, वह किसी नई जगह पर काम करना चाहता था, जहां वह अपनी मेहनत और क्षमता के आधार पर खुद को साबित कर सके

इस समस्या का निराकरण करने के लिए, पीयूष ने अपनी बेंगलोर वाली ब्रांच ऑफिस ही विशाल को सौंप दी.. अब वो उनका मुलाजिम नहीं था.. पर बराबरी का हिस्सेदार था.. विशाल को इस नई व्यवस्था से कोई आपत्ति नहीं थी.. वो मौसम को साथ बेंगलोर शिफ्ट हो गया था और दोनों मिलकर उस ऑफिस को चला रहे थे..

रील्स को बदलते हुए मोबाइल स्क्रीन पर उंगली चलाती मौसम, विशाल के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार कर रही थी..!! तभी उसके बगल में पड़े विशाल के फोन पर नोटिफिकेशन आया और अनायास ही उसकी नजर स्क्रीन पर पड़ी..!! वैसे तो मौसम कभी विशाल का मोबाइल चेक नहीं करती थी पर स्क्रीन पर फोरम का मेसेज आया देख, उसकी आँखें चार हो गई..!! फोरम वही लड़की थी जो मौसम के पापा की ऑफिस में जॉब करती थी और विशाल के बेहद करीब भी थी.. विशाल और फोरम एक दूसरे से प्यार करते थे पर आखिर विशाल ने मौसम से शादी करना तय किया था

उसने तुरंत विशाल का फोन अनलॉक किया और मेसेज पढ़ने लगी.. विशाल और फोरम के बीच सामान्य बातचीत ही थी..लेकिन मौसम को इस बात से धक्का पहुंचा की वह दोनों अब भी संपर्क में थे और विशाल ने उसे इस बात के बारे में कभी बताया भी नहीं..!!

अंग्रेजी गाना गुनगुनाते हुए विशाल बाथरूम से बाहर निकला.. तौलिए से बाल सुखाते हुए उसने मौसम की तरफ देखा.. मौसम के हाथ में उसका मोबाइल था और उसके चेहरे की रेखाएं तंग थी

मौसम: "विशाल, यह बताने की कृपा करोगे? की तुम आज भी फोरम से क्यों बात कर रहे हो?

विशाल ने झपट्टा मारकर मौसम के हाथ से अपना फोन छीनते हुए, गुस्से में कहा "क्या बकवास है, मौसम? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे फोन को बिना बताए चेक करने की? क्या तुम्हें मेरी प्राइवेसी की कोई रिस्पेक्ट नहीं है?"

आवाज़ ऊँची करते हुए मौसम: "प्राइवेसी? सच में? प्राइवेसी की बात करने से पहले तुम्हें यह बताना चाहिए था कि तुम अपनी पुरानी प्रेमिका से अब भी जुड़े हुए हो! और तुमने मुझे यह बताना जरूरी भी नहीं समझा..!!! तुमने मुझसे यह क्यों छुपाया?"

गुस्से से विशाल ने कहा "छुपाया कुछ नहीं है! अब तुमने मेसेज पढ़ ही लिए है तो इतना तो जान ही चुकी होगी की मैं बस उसका हाल जान रहा था.. दोस्तों के बीच जो नॉर्मल बातें होती है, वही है.. फोरम मेरी पुरानी दोस्त है, और हम सिर्फ सामान्य बातचीत कर रहे हैं..!! इसमें गलत क्या है? बिना वजह सुबह सुबह ड्रामा कर रही हो..!!!"

तीखे स्वर में मौसम ने कहा "मुझे मत समझाओ.. मैं कोई दूध-पीती बच्ची नहीं हूँ.. क्या मुझे नहीं पता की पुराने दोस्तों के बीच सब कुछ सामान्य से इंटीमेट होने में ज्यादा समय नहीं लगता..!!! और अगर नॉर्मल बातें ही कर रहे हो, और तुम्हारे दिल में कुछ भी गलत नहीं था तो तुमने मुझसे यह छुपाया क्यों?

चिल्लाते हुए विशाल ने कहा "तुम ओवररिएक्ट कर रही हो, मौसम..!!! हमारे बीच ऐसा कुछ भी गलत नहीं चल रहा है जैसा तुम सोच रही हो.. मुझे अपने दोस्तों से बात करने के लिए तुम्हारी परमिशन की जरूरत नहीं है.. और हाँ, आगे से मेरे फोन को चेक करने की गलती मत करना!.. मैं करता हूँ तुम्हारा मोबाईल चेक कभी??"

थोड़ी शांत होकर, मौसम ने तीखे स्वर में कहा "तो कर ना.. मैंने कभी मना किया है तुझे..!!! वैसे भी मेरा मोबाइल खुली किताब है.. किसी से छुपछुप कर बातें नहीं करती.."

विशाल: "तेरी बेतुकी बकवास सुनने का टाइम नहीं है मेरे पास.. बहोत काम है मुझे" शर्ट पहनते हुए विशाल ने कहा

गुस्साई मौसम ने तंज कसते हुए कहा "विशाल, तुम शायद भूल रहे हो कि तुम आज जो कुछ भी हो, बिजनेस पार्टनर हो, ऑफिस चला रहे हो, यह सब मेरे और मेरे परिवार की वजह से ही संभव हुआ है..!! बीजी होने की धौंस मुझे मत दिखाना"

गुस्से से लाल होते हुए विशाल ने कहा "क्या कहा? तुम्हारे और तुम्हारे परिवार की वजह से? मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह मेरी मेहनत और काबिलियत की वजह से है.. तुम्हें क्या लगता है.. अगर तुमसे शादी नहीं हुई होती तो मैं भूखा मर रहा होता..!! इस गलतफहमी में मत रहना मौसम.. हर बात में मेरी क्षमता पर सवाल उठाने के अलावा तुम करती ही क्या हो??"

आँखों में आँसू लिए मौसम ने कहा "ठीक है, विशाल.. अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारी सफलता में मेरा कोई योगदान नहीं है, तो न सही.. लेकिन यह बात याद रखना कि रिश्तों में ईमानदारी सबसे जरूरी है, और आज तुमने मेरा विश्वास तोड़ा है..!!"

गुस्से से विशाल ने कहा "मैंने कुछ नहीं तोड़ा है.. वाहियात सिरियलें देखकर तेरा दिमाग खराब हो गया है.. तु बस अपनी बात मनवाने के लिए मुझे गलत साबित करने पर तुली हुई है.. बहोत हुआ.. मुझे देर हो रही है.. मैं निकलता हूँ.. तुझे साथ ऑफिस आना हो तो पाँच मिनट में तैयार हो जा.. वरना यहीं पड़ी रहना.. आई डॉन्ट केर..!!"

विशाल तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करने बैठ गया.. कब से दोनों की नोक-झोंक सुन रही नौकरानी ने तुरंत नाश्ता परोस दिया.. हाथ में एक सेंडविच उठाकर विशाल चला गया और मौसम अपने बिस्तर पर पड़े रोती रही..!!

करीब एक घंटे तक बेडरूम में ही पड़े रहने के बाद, मौसम उठी और बाथरूम में जाकर तैयार हो गई.. हल्का सा नाश्ता करने के बाद, वह अपनी गाड़ी लेकर ऑफिस पहुंची.. कांच की दीवार के उस तरफ अपनी चेम्बर में बैठे विशाल की ओर बिना देखें वह मुख्य ऑफिस की ओर चल दी, जहां अन्य कर्मचारीओ की डेस्क थी..

वहीं पर पिंटू को देखकर सुखद आश्चर्य से मौसम ने कहा "पिंटू भैया.. आप कब आए?"

मौसम की ओर मुस्कुराकर देखते हुए पिंटू ने कहा " आज सुबह ही.. चार बजे की फ्लाइट थी.. यहाँ साढ़े छह बजे लेंड हो गया था.. पर एयरपोर्ट से सिटी में आते आते २ घंटे लग गए.. और यह तुम्हारे बेंगलोर का ट्राफिक.. बाप रे बाप..!! मैं तो टेकसी में ही सो गया..!! तुम बताओ.. कैसी हो?"

मौसम: "बस, सब ठीक ही है.. वहाँ सब कैसे है? तुम्हारे मम्मी पापा और वैशाली? बहोत टाइम हो गया वैशाली से बात किए हुए..!!"

पिंटू: "सब ठीक है.. और वैशाली भी तुम्हें बहोत याद करती है..!! कह रही थी की शादी के बाद मौसम तो जैसे हमें भूल ही गई..!! ऐसा तो क्या जादू कर दिया है विशाल ने तुम पर, जो हमारी याद भी नहीं आती..!!"

विशाल का जिक्र होते ही मौसम के चेहरे से मुस्कान ओझल हो गई.. लेकिन वह फिर से सहज हो गई.. उस एक क्षण के लिए चेहरे पर आया बदलाव पिंटू की नजर से बच न सका

मौसम ने हँसकर कहा "अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं है.. नया शहर.. नई ऑफिस.. सेट होने में कुछ महीने लग गए.. वरना मैं तो आप सब को बहोत याद करती हूँ.. शीला भाभी और मदन भैया के क्या हाल चाल?"

पिंटू: "सब बढ़िया है.. अब इतना समय हो गया है.. सब तुम्हें याद भी कर रहे है.. कुछ दिनों के लिए फ्रेश होने आ जाओ.. अब तो मैं और वैशाली भी यहीं है.. तुम आओ तो हम सब साथ कहीं घूमने जाने का प्लान बनाएंगे"

मौसम का चेहरा चमक उठा "हाँ अच्छा आइडिया है..!! वैसे भी यहाँ की भागदौड़ से ऊब चुकी हूँ.. कुछ दिन सब के साथ रहूँगी तो रिलेक्स हो जाऊँगी.. कविता दीदी भी काफी समय से पीछे पड़ी हुई है.. पर जब से जीजू ने यह नया ऑर्डर लिया है, तब से वर्कलोड बहोत बढ़ गया है.. और यह सब विशाल के बस की बात नहीं है"

जिस तरह मौसम विशाल का अवमूल्यन और अवहेलना करती जा रही थी, वह थोड़ा अटपटा तो लगा पिंटू को.. पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.. मियाँ-बीवी के बीच ऐसा कुछ न कुछ तो चलता ही रहता है.. पिंटू को पिछली रात की बेडरूम वाली घटना याद आ गई.. एक विचित्र सी शर्मिंदगी फिर से महसूस होने लगी.. पिंटू ने तुरंत उन सारे विचारों को दिमाग से निकाल दिया

पिंटू: "अब मटीरीअल तो एकाद दिन में पहुँच जाएगा.. एक बार प्रोडक्शन लाइन शुरू हो जाने के बाद उतना काम नहीं रहेगा.. और यहाँ का काम मैं हेंडल कर लूँगा.. तुम चिंता मत करो, सब हो जाएगा.. इत्मीनान से कुछ दिनों के लिए घर आ जाओ"

मौसम: "हाँ भैया.. अब तो मेरा भी बहोत ज़ोरों से मन हो गया है.. एक बार मटीरीअल आ जाएँ फिर मैं फ्लाइट बुक कर दूँगी"

पिंटू: "मैं वैशाली को भी बता देता हूँ इस बारे में"

मौसम ने उसे रोकते हुए कहा "मत बताना.. सबको सरप्राइज़ दूँगी"

पिंटू ने हँसकर जवाब दिया "ठीक है"

अपनी केबिन में जा रही मौसम को पीछे से देख रहा था पिंटू..!! न विशाल मौसम की ओर देख रहा था और न ही मौसम ने एक नजर उसकी तरफ देखा..!! उसकी बातों से भी यह प्रतीत हो रहा था की मौसम को विशाल की क्षमता पर भरोसा नही था..!! पिंटू ने भी यह गौर किया था की विशाल के काम करने के रवैये में नौसिखियापना था और जरूरी व्यावसायिक गंभीरता का अभाव भी था.. शायद पीयूष ने पूरी ऑफिस की जिम्मेदारी उसे देकर बड़ा जोखिम उठा लिया था.. हाँ, मौसम अपने काम की बड़ी पक्की थी और प्रोफेशनल सूझ-बुझ से भरपूर भी..!! शायद इसी लिए संतुलन बना हुआ था

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जिस्म में झुंझुनाहट.. अजीब सी तपिश.. छोटी छोटी बातों पर गुस्सा आना.. कविता जानती थी की इन सारे लक्षणों का असली कारण क्या था..!! शारीरिक असंतुष्टि अपना रंग दिखा रही थी..!! पर बेबस थी कविता..!! शरीर की आग बुझाने के लिए तत्पर होने के बावजूद कोई जरिया नजर नही आ रहा था.. पीयूष के पास तो समय ही नही था.. फाल्गुनी किसी शादी में मुंबई गई हुई थी.. रसिक के पास जाने जितनी हिम्मत नही हो रही थी.. न शीला थी और न फाल्गुनी करीब थी..!!

शारीरिक असंतोष से झूजती स्त्री, बड़ी ही जटिल और तनावपूर्ण मानसिक स्थिति से गुजरती है, वह खुद को अकेला और उपेक्षित महसूस करती है.. उसका पति अपने पेशेवर जीवन में इतना व्यस्त है कि उसे समय नहीं दे पा रहा है.. यह उपेक्षा का एहसास उसे भीतर से तोड़ रहा है.. वह चाहती है कि उसका पति उसकी भावनाओं और जरूरतों को समझे, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है.. उसकी शारीरिक इच्छाएं तीव्र हो रही हैं, और वह उन्हें नियंत्रित नहीं कर पा रही है.. यह उसके लिए एक प्रकार की यातना सी बन चुकी है.. वह चाहती तो है कि कोई उसके जिस्म को बेरहमी से रौंद दे, लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं है..वह निराश और हताश है क्योंकि उसके अन्य साथी भी उपलब्ध नहीं हैं.. यह निराशा उसे और अधिक बेचैन कर देती है.. वह खुद को असहाय महसूस करती है क्योंकि उसे कोई रास्ता नजर नही आ रहा है..

इस स्थिति में उसका आत्म-सम्मान भी प्रभावित होता है.. वह खुद को अयोग्य और अवांछित महसूस कर सकती है.. वह सोचती है कि क्या उसमें कोई कमी है जो उसके पति या अन्य लोग उसकी तरफ आकर्षित नहीं हो रहे हैं.. वह अपनी इच्छाओं को लेकर ग्लानि महसूस करती है.. समाज और संस्कृति के नियम उसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से रोकते हैं.. तो कुछ विकल्प चुनने की उसकी हिम्मत नही हो रही है..

शारीरिक इच्छाओं का दबाव उसे मानसिक रूप से तनावग्रस्त कर देता है.. वह चिड़चिड़ी और बेचैन हो जाती है.. वह खुद को शांत नहीं कर पाती और हर समय इसी विचार में डूबी रहती है.. बड़ी ही दयनीय स्थिति हो जाती है..!!

किसी चीज में मन नही लग रहा था उसका..!! न टीवी देखने में.. न मोबाइल चलाने में.. न किसी से बातें करने में.. एक बार के लिए तो उसका दिल किया की वह पिंटू को फोन करें.. बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप को रोका.. वह अपने पुराने प्रेमी पिंटू को बड़े अच्छे से जानती थी.. किसी भी सूरत में वो इस काम के लिए कविता का साथ नही देता..!!

कविता उठ खड़ी हुई और वॉशबेज़ीन के पास जाकर अपने चेहरे पर ठंडा पानी छिड़कने लगी.. थोड़ा अच्छा महसूस हुआ.. उसने अपने दृढ़ होकर, दिमाग से हवस भरे विचारों को दूर हटाना चाहा.. अपना ध्यान उन विचारों से दूर करने के लिए उसने सोचा की वो कुछ देर कहीं बाहर घूम आए.. शॉपिंग पर जाने का मन नही था.. अपनी माँ के घर भी नही जा सकती थी क्योंकि रमिलाबहन अपने बीमार भाई से मिलने दो दिनों के लिए दूसरे शहर गई थी

शरीर हवस से थरथरा रहा था.. पता ही नहीं चल रहा था की क्या करें..!! गाउन के ऊपर से ही अपने स्तनों को मसलते हुए वह सोफ़े पर आ बैठी.. पिलो पर सिर रखकर लेटते हुए उसने अपना गाउन कमर तक उठा लिया और पेन्टी को घुटनों तक सरका कर चूत को उजागर कर दिया.. अपनी उंगलियों से धीरे धीरे वह कभी दाने को सहलाती तो कभी बुर की फाँकों में उँगलियाँ फेरती.. जैसे ही आनंद की लहरें उठनी शुरू हुई, उसकी आँखें बंद हो गई






कविता को इस समय न कोई लाज थी न शर्म, उसकी आंखे बंद थी, ओठ भींचे हुए थे, उत्तेजना का अनुभव अपने चरम पर था.. कभी निचले ओठ से ऊपर वाले को काटती, कभी उपरी ओठ से निचले वाले को.. सांसे धौकनी की तरह चल रही थी.. चूत की दरार से निकलता गीलापन अब उंगलिया भिगो रहा था, कुछ बह कर जांघो की तरफ बढ़ चला था.. रसिक द्वारा चोदे जाने की कल्पना कर कर के खुद की चूत दोनों हाथो से रगड़े जा रही थी..

अगर इस हालत में उसे कोई भी पकड़ लेता तो उसके लिए बेहद शर्मनाक होता.. वो कंफ्यूज थी जो कुछ भी हो रहा है कौन शैतान उसके शरीर को छु रहा है, कौन है जो उसके अन्दर सेक्स की सोई इच्छा बार बार जगा रहा है, इस हद तक बढाये दे रहा है की वो सारी लाज शर्म छोड़ कर, खुले कमरे में पूरी तरह नंगी होकर खुद की चूत रगड़ रगड़ कर चुदाई के बारे में सोच रही है.. कितना गलत है ये ? लेकिन ये सब सोचते हुए भी उंगलिया चूत पर तेजी से चल रही थी.. जब कोई औरत को चुदाई में मजा आने लगता है तो वो चुतड उठा उठाकर साथ देने लगती है..

इसी तरह कविता बार बार चुतड ऊपर की तरफ उछाल रही थी.. वो ये सब नहीं करना चाहती थी लेकिन शरीर की वासना के आगे बेबस थी.. एक तरफ उसकी चूत से लगातार पानी बह रहा था दूसरी तरफ तो सही गलत के उधेड़बुन में खोयी हुई थी.. उसे होश ही नहीं था की वो कहाँ है, उसका दिमाग कही और था शरीर कही और था.. ऐसा लग रहा था एक शैतान उसके शरीर से खेल रहा है और उसके हाथ पैर सब उसी शैतान के कब्जे में है.. वो ये सब नहीं करना चाहती है लेकिन चूत के पतले ओठो पर नाच रही उंगलियों पर उसका कोई बस नहीं है..!! चूत की दरार से बहते पानी को रोकने में वो लाचार है.. वासना के कारन थिरकते चुतड को रोकने में असमर्थ है.. उसे पता है ये सब रोकने का अब कोई रास्ता नहीं है.. अगर वो अपने अन्दर की वासना को तृप्त करने के लिए कुछ नहीं करेगी तो वो जी नहीं पायेगी.. सिसकारियो के बीच उसने अपने एक उंगली चूत की दरार के बीच डाली, फिर दो चार बार अंदर बाहर करने के बाद, दो हाथो से चूत के दोनों ओठ फलाये.. और फिर से उंगली अन्दर घुसेड दी.. दूसरे हाथ से दाने को रगड़ना जारी रखा..






धीरे धीरे वो सोफे पर पूरी तरह लेट गयी.. दोनों जांघे ऊपर की तरह उठा दी और दो उंगलियों को कसी चूत के छेद में घुसेड के अन्दर बाहर करने लगी..

कविता की चूत की कसावट अब भी बिलकुल कुंवारी चूत की तरह थी.. दोनों उंगलिया को अन्दर डालने के लिए जोर लगाना पड़ रहा था.. चूत की कसी हुई मखमली दीवारे उंगलियों को कस के जकड ले रही थी.. उंगलियों की चुदाई उत्तेजना में चार चाँद लगा रही थी, इससे मिलने वाले चरम सुख की कोई सीमा नहीं थी.. मुहँ से सिसकारियो का सिलसिला लगातार चल रहा था, उगलियाँ के चूत में अन्दर बाहर होने से शरीर भी उसी अनुसार लय में आगे पीछे हो रहा था.. कविता अपनी उंगलियों से खुद को चोद कर अपनी वासना की आग बुझाने की कोशिश कर रही थी.. अब न कोई शर्म थी, न कोई हिचक थी, बस एक आग थी और उसे बुझाना था किसी भी तरह, उंगलिया अपनी चरम गति से चूत में आ जा रही थी और उसी के साथ दाने को भी अधिक ताकत और गति से रगड़ने का सिलसिला शुरू हो गया था..!!






अब लग रहा था जैसे चरम निकट ही है, एक तूफ़ान जो अन्दर धमाल मचाये हुआ था अब बस गुजर जाने को है.. अब न कोई कल्पना थी, न किसी की सोच.. बस वासना थी वासना थी और सिर्फ वासना ही थी.. कविता अब सोफे पर तेजी से उछालने लगी.. उसकी कमर जोर जोर के झटके खाने लगी.. उंगलिया जिस गहराई तक जा सकती थी, वहां तक जाकर अन्दर बाहर होने लगी.. पहले चूत में एक उंगली भी बड़ी मुश्किल से जा रही थी अब दो भी आराम से जा रही थी.. कविता का हाथ पूरी ताकत से अन्दर बाहर के झटके दे रहा था..

अचानक उसका पूरा शरीर अकड़ गया, सिसकारियो का न रुकने वाला सिलसिला शुरू हो गया, जांघे अपने आप खुलने बंद होने लगी, जबकि उसकी उँगलियाँ अभी भी चूत की गहराई में गोते लगाकर आ जा रही थी, दाना फूलकर दोगुने साइज़ का हो गया था लेकिन कविता ने उसे रगड़ना अभी भी बंद नहीं किया था.. दाने के रगड़ने से चूत के कोने कोने तक में उत्तेजना की सिहरन थी.. चूत की दीवारों में एक नया प्रकार का सेंसेशन होने लगा, कमर और जांघे अपने आप कापने लगी, कविता को पता चल गया अब अंत निकट है, ये वासना के तूफ़ान की अंतिम लहर है.. उसने चूत से उंगलियाँ निकाल ली, चूत रस तेजी से बाहर की तरफ बहने लगा.. सारा शरीर कापने लगा, उत्तेजना के चरम का अहसास ने उसके शरीर पर से बचा खुचा नियंत्रण भी ख़त्म कर दिया..






कमर अपने आप ही हिल रही थी, पैर काँप रहे थे, मुहँ से चरम की आहे निकल रही थी.. और फिर अंतिम झटके के साथ पुरे शरीर में कंपकपी दौड़ गयी और पूरा शरीर सोफे पर धडाम से ढेर हो दया..

कविता आनंद के सागर में गोते लगाते लगाते लगभग मूर्छा की हालत में पंहुच गयी.. धीरे धीरे सांसे काबू में आने लगी, चूत के दाना की सुजन कम होने लगी, स्तनों की कठोरता कम होने लगी.. अपनी उखड़ती सांसे संभाले कविता अपने आप के स्त्रीत्व को महसूस करने लगी, उसे अपने औरत होने का अहसास होने लगा.. उसने शरीर को ढीला छोड़ दिया.. उसने अपने ही चुचे और चूत का अहसाह पहली बार किया..उसके शरीर में होते हुए भी आज तक इनसे अनजान थी.. उसके दिमाग सेक्स को लेकर जो भी दुविधा थी दूर हो गयी.. अब वो खुद की सेक्स की चाह को दबाएगी नहीं.. वो खुद को एन्जॉय करेगी.. अपने स्त्रीत्व का पूर्ण आनंद लेगी.. उसने इतने साल दकियानुसी में काट दिए, जबकि अपनी मर्जी से मजे करना तो कोई अपराध नहीं है.. यही सोचते सोचते कब उसकी आंख लग गयी पता ही नहीं चला..!!

आधे घंटे बाद जब वह उठी, तो एक आनंददायी थकावट महसूस हो रही थी.. पर जिस्म अब भी पूर्णतः संतुष्ट नहीं हुआ था.. बल्कि ऐसा महसूस हो रहा था की सोफ़े पर हुए उस हस्तमैथुन के सत्र के बाद, उसकी चुदने की इच्छा और भी प्रबल हो गई थी

क्या करूँ..!!! कहाँ जाऊँ..!! कैसे बुझाऊँ इस आग को..?? कविता स्वयं से यह प्रश्न करती रही जिसका कोई उत्तर या हल दिमाग को सूझ नहीं रहा था..

तभी एक विचार, कविता के मन में बिजली की तरह कौंधा..!!!!

वह बेडरूम में गई कपड़े बदलने के लिए.. एक काले रंग की मिडी स्कर्ट.. जो स्लीवलेस थी और जिसकी लंबाई घुटनों से नीचे तक जाती थी.. वह पहन ली.. बालों को हल्के से ब्रश किया.. परफ्यूम छिड़का.. और हाईहील वाले सेंडल पहनकर घर से बाहर निकली

मंजिल करीब ही थी.. उसे अपनी माँ के घर तक ही पहुंचना था.. उसका दिल तेजी से धडक रहा था.. वासना के हाथों मजबूर वह अपने कदमों को रोक नहीं पा रही थी.. उल्टा उसका हर कदम पहले कदम से ज्यादा तेज होता जा रहा था

वह अपने घर पहुंची.. लोहे के दरवाजे का किवाड़ खोलकर कम्पाउंड में दाखिल हुई.. हल्के पैरों से चलते हुए उसने डोरबेल बजाई.. एकाध मिनट के बाद दरवाजा खुला.. रमिलाबहन का नेपाली नौकर, बड़े ही आश्चर्य से कविता की ओर देखता रहा..

आज कविता ने उसे पहली बार ठीक से मुआयना करते हुए देखा.. करीब 5 फिट 4 इंच जितनी हाइट थी.. एकदम गोरा.. गुलाबी गाल.. मध्यम शरीर और चेहरे पर अब भी दाढ़ी या मूँछ के हल्के से निशान भी नहीं नजर आ रहे थे.. त्वचा एकदम चिकनी.. बालों का स्टाइल कोरियन जैसा.. हेंडसम सा लड़का था वो.. उसने एक पुरानी सी टीशर्ट और शॉर्ट्स पहन रखी थी

थोड़ी देर तक चुपचाप तांकते रहने के बाद उस नौकर ने कहा "मालकिन तो नहीं है"

उद्दंडता से कविता ने जवाब दिया "पता है मुझे" कहते हुए उसने दरवाजे के साथ साथ उस लड़के को एक तरफ धकेल दिया और अंदर प्रवेश किया..

लड़का असमंजस में खड़ा रहा.. कविता बेडरूम की तरफ चल दी तब उसने विमूढ़ अवस्था में दरवाजा बंद किया और गुड्डों की तरह ड्रॉइंग रूम में ही खड़ा रहा.. पिछली बार जब उसका कविता से मिलना हुआ था तब की याद आते ही वह कांप उठा.. कविता ने उसे अपनी माँ को चोदते हुए रंगेहाथों पकड़ा था और पुलिस को सौंप देने की धमकी भी दी थी.. तब से उसे कविता से बड़ा डर लग रहा था

कविता अंदर जाकर बिस्तर पर पैर फैलाकर लेट गई.. किसी साम्राज्ञी की तरह.. हाथों के नीचे तकिये का सहारा लेकर उसने ड्रॉइंग रूम की ओर देखा और आवाज लगाई "कोई ओर भी आने वाला है क्या?"

कविता की आवाज सुनकर वह लड़का हड़बड़ाते हुए अंदर आया और कविता के सामने नजरें झुकाकर खड़ा हो गया.. कविता ने उसे सिर से लेकर पैर तक बड़े ध्यान से देखा

"क्या नाम है तेरा..??" कविता ने रुक्षता से पूछा

थूक निगलते हुए उस लड़के की जुबान मुश्किल से चली, उसने कहा "जी.. मेरा नाम बाबिल है.. बाबिल थापा"

शॉर्ट्स के नीचे दिख रही उसकी गोरी बालरहित टांगों को देखते हुए कविता ने कहा "हम्म.. क्या कर रहा था अभी घर में?"

घबराते हुए उसने जवाब दिया "जी कुछ नहीं.. सफाई अभी खतम हुई.. अपने लिए खाना बना रहा था"

बिस्तर पर लेटी कविता ने अचानक ही अपना मिडी-स्कर्ट घुटनों के ऊपर तक इस तरह ऊपर कर दिया की जिससे उसकी जांघें स्पष्ट नजर आयें.. लड़के ने बड़े ही ताज्जुब से एक पल के लिए कविता की उजागर हुई जांघों की तरफ देखा और फिर से नजरें झुका ली..

कविता का इरादा स्पष्ट था.. आज वो इस जवान नौकर को अपनी हवस का शिकार बनाने वाली थी..!! यह लड़का इतना कच्चा सा लग रहा था की कविता को यकीन था की यह थोड़ी ही देर की हरकत से झड़ जाएगा.. इसे एक बार झड़वाकर फिर चुदवाना पड़ेगा.. वरना मज़ा नहीं आएगा..

कविता बड़ी ही प्लैनिंग के साथ आगे बढ़ रही थी.. अपनी जांघें खोलने के बाद उसने झुककर अपने डीप-नेक गले से दिख रही स्तनों की बीच की दरार को उभारकर दिखाने लगी.. पर वह लड़का तो अभी भी नजरें झुकाएं खड़ा था

"मेरे सामने देख..!!" कविता ने आदेशात्मक आवाज में कहा

लड़के ने नजरें उठाई.. कविता का यह मादक स्वरूप देखकर वह हिल गया.. पसीने छूटने लगे.. वह फिर से नजरें झुका लेना चाहता था पर कविता की बात का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं थी उसकी

कविता ने उंगलियों से इशारा करते हुए उसे बिस्तर पर बुलाया.. लड़के की सिट्टी पीट्टी गूम हो रही थी.. पर कविता की बात मानने के अलावा उसके पास ओर कोई चारा भी तो नहीं था..!!

वह आकर बेड के कोने पर दुबककर बैठ गया.. कविता उसके करीब आई.. लड़के को गिरहबान से पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचकर उसके बालों को सूंघने लगी.. नथुनों को खींचकर गहरी सांस लेते हुए, आँख बंद कर कविता जैसे खो सी गई थी..

कांपते हुए स्वर में उस लड़के ने पूछा "आपके लिए पानी लेकर आऊँ?"

बाबिल की आवाज सुनकर कविता की चेतना लौटी और उसने बाबिल को गौर से देखा, उसके अन्दर एक झुनझुनी झंकार जैसी लहर दौड़ गयी जब उसने उस जवान नौकर की तरफ देखा, दिल की धड़कने तेज हो गयी थी, सांसों की गति बढ़ गयी थी, पेट में लहरे सी उठने लगी थी, सीने पर विराजमान दोनों उन्नत चोटियाँ हर साँस के साथ उठने गिरने लगी थी.. उस नौकर ने रमिलबहन के साथ जो हरकत की थी इसलिए उसे बाबिल पर बहुत गुस्सा होना चाहिए, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ऐसा कुछ नहीं था, उसे खुद ही यकींन नहीं हो रहा था की आखिर वो बाबिल से गुस्सा क्यों नहीं है.. बजाय उस पर गुस्सा करने के कविता ने प्यार से उसकी तरफ हाथ बढाया, उसके चेहरे को सहलाया, उसके बालो में उँगलियाँ फेरने लगी..

कविता ने अपने सूखते होंठों पर जीभ फिराते हुए बाबिल को अपने नजदीक खींचा.. उस लड़के को यकीन ही नहीं हो रहा था, कि कविता उसके साथ क्या करने जा रही थी.. ऐसा लग रहा था ये कविता नहीं बल्कि कोई आत्मा उसके शरीर में घुसकर उसके शरीर को चला रही है.. वह हैरान था, कविता उसको इतने मादक तरीके से कैसे देख सकती है..

हल्की मादक कराह के साथ कविता ने बाबिल का चेहरा बिलकुल अपने सामने किया, उसकी आँखों में हल्का आश्चर्य था, इससे पहले की वो बाबिल की आंखे और पढ़ पाती, कविता ने अपने भीग चुके होठो को उस लड़के के होंठों पर रख दिया, धीरे से साँस लेते हुए कविता ने अपने होंठ खोलकर अपनी जीभ को उसके दांतों के बीच से होते हुए मुंह की तरफ ठेल दिया.. लड़के को एक झटका सा लगा, कविता उसको किस कर रही है वो भी अपनी जीभ उसके मुंह में डालकर..!!






दोनों के मुंह की लार एक में मिलने लगी.. कविता अपनी जबान से लड़के की जबान चूस रही थी चूम रही थी.. उसकी मस्त स्तनों से भरी पूरी छाती, बाबिल के सीने से टकरा रही थी| वो कविता के दोनों स्तनों का भरपूर कसाव दबाव अपने सीने पर महसूस कर पा रहा था, कविता की सांसे तेज चल रही और उसका पूरा शरीर उत्तेजना के कारण कांप रहा था.. बाबिल ने भी अपने हाथ कविता की कमर पर रख दिए और हलके हलके सहलाते हुए पीठ पर ऊपर बांहों तक ले जाने लगा, थोड़ी देर के बाद सहलाने में कसाव बढ़ गया, पीठ पर ऊपर की तरफ हाथ जाते ही कविता को कसने की कोशिश करने लगा.. जिससे पहले से ही सीने से रगड़ रहे कुचल रहे कविता के सुदृढ़ स्तन और कसकर उस लड़के के सीने से रगड़ने लगे..





बाबिल के शरीर की कंपकपी बता रही थी की उसकी उत्तेजना बहुत बढ़ गयी है, कविता को उस नौकर की कंपकपी से उसकी उत्तेजना पता लग रही थी, उसे पता था वो जो कर रही है वो पाप है, घोर पाप, विक्षिप्त क्रिया है, कामरोगी की लालसा है फिर भी कविता ही उस लड़के को उत्तेजित कर रही थी और बदले में बाबिल की हरकतों से उसकी उत्तेजना और बढ़ रही थी.. ये सब जानते हुए भी वो खुद को रोक नहीं पा रही थी..

कविता का शरीर, अपने अन्दर की छिपी हुई वासना और हवस का समंदर बाहर निकालने को आतुर था.. उसे पता था यह खतरनाक हो सकता था.. इस लड़के के अपनी माँ से गहरे जिस्मानी संबंधों के चलते यह अंदेशा था की आज की घटना के बारे में वह उन्हें जरूर बता देगा.. लेकिन फिर भी वो खुद को रोक पाने में असमर्थ थी..!!

कविता के अन्दर वासना का समन्दर हिलोरे मार रहा था ऐसे में वह कहाँ से खुद को रोक पाती..!!! उसने बाबिल के होंठों से होंठ हटा लिए, अपने चेहरे को उसके गालो पर रगड़ने लगी, उसके कानो में फूंक मारने लगी.. इसी बीच बाबिल का एक हाथ कविता के स्तन को मसलने दोनों के चिपके शरीरो के बीच से फिसलता हुआ कविता की छाती तक पंहुच गया, जिसे कविता ने लाल रंग की ब्रा में ढक रखा था.. कविता चाहकर भी विरोध नहीं कर पाई..!!!

कविता को पता भी नहीं चला की कब वह लड़का उसका दूसरा हाथ पकड़ कर धीरे धीरे खिसकाते हुए नीचे ले गया और अपनी दोनों जांघो के बीच बिलकुल उस जगह पर जाकर रख दिया है जहाँ उसके खड़े लंड की वजह से शॉर्ट्स के अन्दर तम्बू तन गया है.. क्या कविता को पता था की उसका एक हाथ,पेंट के ऊपर से बाबिल के तन चुके लंड को सहला रहा है..!!!!






दूसरी तरफ कविता की कमर के आस पास एक नयी झुनझुनी दौड़ गयी जब नौकर का वो हाथ जो अब तक कविता के आकर्षक स्तनों को मसल रहा था.. कुचल रहा था, नीचे घुटने के पास से स्कर्ट खिसकाते हुए मखमली नरम जांघ पर हाथ फेरते हुए आगे कमर की तरफ बढ़ने लगा.. बाबिल ने स्कर्ट ऊपर की तरफ उड़ेल दी, कविता की झीनी पारदर्शी पैंटी दिखने लगी.. उस लड़के को यकीन नहीं हो रहा था की कविता इस तरह की पैंटी पहनती होगी..!! अब तक तो उसने सिर्फ रमिलाबहन की कच्छेनुमा चड्डियाँ ही देखी थी..

पैंटी भी इतनी छोटी थी की बमुश्किल ही कविता की चिकनी चूत को ढक पा रही थी.. पैंटी देखते ही रक्त का प्रवाह लंड की तरफ और तेज हो गया.. बाबिल की उत्तेजना और जोश का कोई ठिकाना नहीं था, उसका शरीर पर से काबू हटने लगा था.. उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था की ये सब वो अपनी मालकिन की बेटी के साथ कर रहा है और वो करने भी दे रही है..!! उसने इस तरह की पैंटी कभी नहीं देखी थी.. कविता की गोरी चिकनी जांघो के बीच पहने देखा, उसका अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं रहा.. इधर उधर दिमाग दौड़ाने की बजाय उसने कविता के स्तनों को मसलना शुरू किया, जबकि कविता का एक हाथ उसके खड़े लंड से बने चड्डी के तम्बू पर आराम कर रहा था.. उसके लंड में खून का दौरान और तेज हो गया था..

बाबिल का, कविता के कपडे उतारकर उसकी गोल चिकनी नरम गुदाज गोरी जांघो और नितम्बो को देखने की कल्पना मात्र से रोमांच की उत्तेजना पर पंहुच गया.. ये सब कुछ उसकी उम्मीदों से बहुत अधिक था, जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की थी.. पता नहीं इतना रोमांच और उत्तेजना वो सहन भी कर पायेगा या नहीं.. उसका लंड इतना ज्यादा कड़ा हो चूका था की उसे लग रहा था कि अगर अन्दर का दहकता लावा बाहर नहीं निकाला, अगर उसने अभी नहीं चोदा तो कही उसका लंड चड्डी में ही ना फट जाये.. बाबिल का दिमाग सातवे आसमान पर था..!!

कविता ने अपने अन्दर की सारी ताकत इकट्ठी की और बाबिल को खुद से दूर धकेला.. उसके बाद नीचे की तरफ अपने शरीर को देखने लगी.. कमर के नीचे वो पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी बस वो छोटी सी झीनी पारदर्शी पैंटी ही थी जो उसकी चूत और उसके चारो ओर के हल्के बालो को ढक पा रही थी.. बाकि उसके पैरो से लेकर जांघो और कमर तक कुछ भी उसके तन पर नहीं था.. स्कर्ट खिसक के नाभि तक पंहुच गयी थी.. उसके बाद कविता की नजर बाबिल की पेंट की तरफ गयी, पेंट के अन्दर के तने लंड के कारण बने उभार को देखकर उसकी साँस अटक गयी.. नहीं ये सच नहीं हो सकता, ये सब रियल नहीं है, ये मै कोई सपना देख रही है, ये सब सच नहीं है..अपने आप से कह रही थी कविता..!!

कविता के इस तरह अलग होने से बाबिल झुंझला गया - कविता बाबिल का झुन्झुलाहट साफ साफ देख रही थी, गलती बाबिल की नहीं थी, वही तो उसको यहाँ तक लायी थी, अब बीच में कैसे छोड़ सकती है..!! चड्डी के अन्दर खड़े लंड की तरफ देखकर उसको बाबिल पर दया आ गयी, और सोचने लगी.. अभी अगर इस जवान लड़के के खड़े लंड को शांत नहीं किया तो वो पागल हो जाएगा.. पता नहीं कितने ख्याल उसके दिमाग में आये और निकल गए.. असल में यह कविता की हवस ही थी जो उसे यहाँ तक खींच लाई थी और अब वह अपराध भावना से बचने के लिए उस लड़के पर दया का दिखावा ही कर रही थी

वह अब बाबिल की चड्डी उतारने लगी.. उतारते उतारते उसने वह पतली चड्डी लगभग फाड़ ही डाली और अपने अन्दर के कामुक मादक आहों को दबाने की कोशिश करने लगी.. कविता के हाथ उसके लंड तक पंहुच गया था उसने लंड को कसकर पकड़ लिया..






उसने महसूस किया की लड़के का लंड पकड़ते ही उसकी कमर में उत्तेजना के कारण झटके लगने शुरू हो गए थे, एक हाथ से गरम, खून से भरे मांस के गरम अंग, लोहे की तरह सख्त हो चुके गोरे गुलाबी लोड़े को कसकर पकड़ा, दुसरे हाथ से अपने स्तनों को मसलने लगी.. लड़के का लंड ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन पत्थर की तरह कठोर हो चूका था.. उस नौकर लड़के के दुविधा भरे चेहरे को देखकर उसने लंड को जड़ से पकड़कर जोर से ऊपर नीचे किया और एक हल्की चिकोटी भी काट ली.. बाबिल के चहरे पर उत्तेजना और संशय दोनों ही नजर आ रहे थे.. कविता ने जीभ से अपने होंठों को गीला किया और तेज खून के बहाव के चलते कांप रहे लोहे की तरह सख्त हो चुके लंड को भूखी नजरो से देखने लगी

उसने लड़के के लंड से खेलना शुरू कर दिया, लंड की खाल को धीरे धीरे ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया.. कविता की उंगलियों की मालिश से उसे बड़ा अच्छा महसूस हो रहा था, इतना अच्छा उसे आज तक किसी दूसरी चीज से नहीं हुआ था, आज तक वह बस रमिलाबहन के बूढ़े भोसड़े को ही चोदता आया था.. कविता के कोमल हाथो से उसके लंड पर लग रहे झटके से जैसे छटपटाने लगा..






कविता ने फुर्ती से पास के ड्रोअर से मॉइस्चराइज़र क्रीम की बोतल निकाली और लड़के के लंड पर उड़ेल दी.. क्रीम लगाते हुए वह उसके लंड के चारो और तेजी से हाथ ऊपर नीचे करने लगी.. कविता के हाथ नीचे जाते ही क्रीम से सना सुपाड़ा चमकने लगता और ऊपर आते ही अपनी ही खाल में घुस कर कही गुम सा हो जाता.. क्रीम लगाने से अब हाथ आसानी से लंड पर फिसल रहे थे..





वह लड़का सीत्कार भरते हुए बोला "आह्ह दीदी..!!"

"दीदी" शब्द सुनकर एक कामोत्तेजक कंपकपी कविता के पुरे शरीर में दौड़ गयी.. जैसे जैसे कविता लड़के के खड़े लंड पर झटको को स्निग्ध और लयदार करती उसी तरह बाबिल की कमर साथ देते हुए झटके मारती रही.. धीरे धीरे कविता ने स्ट्रोक्स की रफ़्तार बढ़ा दी, बीच बीच में वह अपने सूख रहे होंठों पर अपनी जुबान फेरती रही.. अब उसने लंड पर हथेली की कसावट और तेज कर दी थी और अपनी पूरी स्पीड से लंड की खाल को ऊपर नीचे कर रही थी.. तभी लंड के सुपाड़े पर उसे वीर्य के निकलने से पहले निकलने वाली कुछ बूंदे नजर आई..!! उन चिपचिपी बूंदों को उंगली से लेकर चाट लिया कविता ने..!!






कविता ने हाथो के ऊपर नीचे करने की स्पीड कम कर दी.. और फिर कलात्मक तरीके से उंगलियाँ लंड पर फिराने लगी.. हवस की आग में जलती कविता की अतृप्त कामवासना उससे कुछ नए खेल खिलवाना चाहती थी जो उसकी चेतना को खत्मकर सही गलत सबका भेद मिटा दे.. बस रह जाये तो वासना वासना और वासना..!!! उसे कभी भी इस तरह से जीवन में नहीं सोचा था..

वो जानती थी की वो जो करने जा रही है उसके परिणाम भयानक हो सकते है, लेकिन वो वासना के हाथो मजबूर थी.. जो विचार एक बार दिमाग में आ गया अब उससे पीछे हट पाना उसके लिए बहुत मुश्किल था..नया विचार बड़ा रोमांचकारी, कामुक वासनायुक्त और उत्तेजना लाने वाला था..

कविता के कलात्मक जादुई झटके लगाने से बाबिल बार बार आनंद में गोते लगाकर कराह रहा था और उसकी कमर भी बार बार झटका दे रही थी.. कविता ने थोडा सा क्रीम लंड के सुपाडे पर लगाया और धीरे धीरे उंगलियों से सहलाने लगी , सुपाड़े को क्रीम से नहलाकर उंगलियों से उसकी मालिश करने लगी.. इतने प्यार और जादुई तरीके से लंड की मालिश होने से बाबिल आनंद की सागर में गोते लगाने लगा, लेकिन कविता ने उसके चेहरे की शर्म साफ़ पढ़ ली.. लड़का काफी जवान था.. चुदाई के मामले में नौसिखिया था.. और कविता से डरता भी था.. कविता के सामने उसके हाथो द्वारा, खुद को झड़ते हुए देखना उसे बड़ा शर्मिंदगी भरा लगा..






अब कविता ने लंड पकड़कर मुहँ में ले लिया और कसे होंठों के साथ पूरा अन्दर लेती चली गयी..अब तक उसने जीतने भी लंड देखें थे.. फिर वो पीयूष का हो.. पिंटू का या रसिक का.. उन सब में यह सब से अनोखा था..!! गोरा चिट्टा लंड.. सख्त होने पर 5 इंच जितनी लंबाई.. दो उंगलियों जितनी चौड़ाई.. और सब से मजेदार था उसका चेरी जैसा लाल गुलाबी सुपाड़ा.. जो बड़े कंचे के आकार का था.. उसके नीचे अंडकोश की छोटी सी थैली..!! देखकर ही प्यार आ गया था कविता को





पहले जहाँ सिर्फ सुपाडे से खेल रही थी अब पूरा लंड मुहँ में लेकर चोद रही थी.. कविता ने बाबिल से इशारे में अपनी कमर हिलाने को कहा, बाबिल कमर को जोर जोर के झटके देने लगा| कविता के कसे होंठों से गुजरता हुआ लंड पूरा का पूरा मुहँ में समा जाता और फिर एक झटके में बाहर आ जाता.. लेकिन अब कविता के मुहँ और बाबिल के लंड के बीच में उसका हाथ था जिससे वो ज्यादा तेज धक्के को नियंत्रित कर सकती थी.. उसने अपने हाथ की उंगली और अंगूठे से एक छल्ला सा लंड की जड़ में बना लिया था.. इससे वह लंड के इधर उधर भागने या तिरछा हो जाने को रोक सकती थी..

जब वह लड़का नितम्बो को जोर जोर से उछालने लगा तो कविता ने अपने ओठो का कसाव थोडा कम कर दिया, और लंड की जड़ से अपने हाथ का घेराव हटा लिया ताकि लंड आसानी से पूरा का पूरा मुहँ में चला जाये और उसे मुहँ चोदने का भरपूर आनंद मिले.. दुनिया का कोई भी लंड हो वो औरत के किसी भी छेद में पूरा का पूरा समा जाने को आतुर होता है और ये बात कविता अच्छी तरह से जानती थी.. बार बार कविता को अहसाह हो रहा था की फड़कता गरम लंड उसके नरम नरम गुनगुने गीले मुहँ में ठेला जा रहा है.. वह लड़का कमर को जोर जोर हिलाने से पूरी तरह से फड़कता सुपाडा जीभ की पूरी लम्बाई तय करके मुहँ के आखिरी छोर गले तक जा रहा है..






वासना की उत्तेजना की प्रबलता के कारण कविता ने अपनी आँखे बंद कर ली, वो भी उसकी कमर से लय मिलाकर अपना सर लंड पर ऊपर नीचे करने लगी.. अब लंड जिस अधिकतम गहराई तक मुहँ में जा सकता था जा रहा था.. लंड के अन्दर जाते ही कविता अपने जीभ लंड पर फेरने लगती.. इससे लंड गीला हो जाता था और आसानी से अन्दर बाहर हो रहा था.. कमरे में बस लंड चूसने और लड़के की कराहने की आवाजे ही सुनाई पड़ रही थी..

कविता ने अपना सारा संकोच शर्म हया सब किनारे रख दिया था, उसका सिर्फ एक ही मकसद था लड़के का लंड चूस कर उसे झड़ा देना.. ताकि लंड दोबारा खड़ा होने पर वह लंबी अवधि तक चोद सकें.. उसने अपना शरीर और आत्मा सब कुछ बस लंड चूसने में झोक दिया था, दिल आत्मा मन शरीर सब कुछ लगाकर वो बस लंड अपने मुहँ की गहराई तक ले रही थी..

अब तो बस उसका एक ही मकसद था लड़के के सख्त फूले लंड को मुहँ से चोद चोद के उसको अपने मुहँ में झड्वाना.. हालांकि कविता को वीर्य मुंह में लेना पसंद तो नहीं था.. पर पता नहीं क्यों, आज इस क्यूट से गोरे लंड को देखकर उसका मन कर गया.. वह उसकी मलाई को अपने मुहँ में लेना चाहती थी और उसकी एक बूँद भी बेकार नहीं जाने देना चाहती थी.. उसे बाबिल की पूरी मलाई अपने मुहँ के अन्दर ही चाहिए, आखिर बूंद तक.. उसने अपना पूरा ध्यान इस पर लगाया की जब बाबिल झाड़ेगा तो उसे भरपूर आनंद मिलना चाहिए..

उसने गलगलाकर अपना गला ठीक करने की कोशिश की लेकिन लड़के की चुदाई के चलते ठीक से साफ नहीं कर पाई.. लंड पर उसके होंठों का कसाव अभी भी उतना ही तगड़ा था, उसके होंठों को चीरते हुए लंड बार बार कविता के मुहँ में गले तक आ जा रहा था.. इतने सलीके से इतनी गहराई तक अपने जीवन में बाबिल शायद ही किसी लड़की का मुहँ चोद पाए, वैसे भी नौसखिये लडको का शादीशुदा या अनुभवी औरतो को चोदना ज्यादा पसंद होता है, क्योंकि वो सब सिखाती बताती है और उनके नखरे भी नहीं होते, और नए लंड को भरपूर सुख भी देती है..

कविता काफी देर से बेड पर झुके हुए लंड चूस रही थी इसलिए उसकी गर्दन और कंधे दर्द करने लगे थे लेकिन उसको इसकी कोई परवाह ही नहीं थी.. वो लंड को और ज्यादा कसकर पकड़कर आक्रामक तरीके से चूसने लगी, ऐसा लग रहा था जैसे सालो से इस लंड की भूखी हो..

उधर वासना के जूनून में डूबी कविता भी उत्तेजना में कुछ बडबडा रही थी लेकिन पता नहीं वो क्या बोल रही थी.. बाबिल ने इसी बीच देखा की कविता की स्कर्ट अभी भी एक तरफ से कमर पर पलटी पड़ी है, जिससे उनकी पैंटी साफ साफ दिख रही है.. उनकी झीनी पारदर्शी पैंटी से उनकी चूत के ऊपर के काले बालो की एक झलक मिल रही है.. वासना से भरे भूखे आदमी की तरह कविता के कसमसाते नितम्बो को देखकर बाबिल ने अपने लंड के धक्के कविता के नरम गीले मुहँ में और तेज कर दिए.. फिर खुद को न रोक पाते हुए उसने कापते हुए एक हाथ कविता के नितम्ब की तरफ बढ़ाया..

कविता के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी जब बाबिल ने उसके गोलाकार ठोस मांसल चुतड पर एक हलकी चपत मरी और फिर पुरे हाथ में उसके बड़े से गोल चूतड़ को भरने की असफल कोशिश करने लगा.. उसके बाद उसने स्कर्ट को ऊपर की ओर और ज्यादा पलट दिया अब जांघो के बीच में उसकी पैंटी के अलावा कुछ नहीं था.. कविता ने फूले हुए लंड को चूसते चूसते बीच में एक लम्बी साँस ली, और एक पल को ठहर सी गयी, जब उसे अहसाह हुआ की बाबिल की उंगलियाँ उसके चुतड की दरार के बीच नाच रही है.. उसने खुद को पूरी तरह से परिस्थितियों पर छोड़ दिया, जो हो रहा था उसने होने दिया, जब बाबिल की उंगलियाँ उसकी जांघो के बीच जाकर नाचने लगी, तो उसके शरीर की वासना का जंगलीपन जाग उठा..

कविता ने लंड चूसने के रफ़्तार और बढ़ा दी.. इस तरह का कामुक समर्पण और काम पीड़ा उसके अन्दर भी है, उसे तो पता ही नहीं था..!! अब उसके मांसल गोरा शरीर का एक एक इंच चूमने, चटवाने, सहलाने, कुचलने, मसलें और रगड़े जाने के लिए बेताबी से मचलने लगा था.. लंड चूसने के बदले उसके शरीर को अब कुछ चाहिए, बाबिल को झाड़ने के अलावा अब उसकी इच्छा होने लगी की उसको भी तृप्ति मिले.. वो भी चरम को प्राप्त करे.. उसके शरीर का रोम रोम अब उसके खुद के झड़ने की मांग करने लगा.. उसने लंड को और ज्यादा आक्रामक तरीके से मुहँ में लेना शुरू कर दिया. इससे उसके मुहँ में चोट भी लग सकती थी लेकिन उसे परवाह ही नहीं थी..

उधर बाबिल की उंगलिया जांघो के अन्दर घुस कर उसकी पैंटी से नीचे की तरफ जांघो को सहला रही थी.. वो कमर के नीचे पूरी तरह से नंगी थी, कपड़ो के नाम पर एक छोटी सी झीनी सी पैंटी थी जो बड़ी मुश्किल से उसके चूतडो के आधे हिस्से को ढक पा रही थी थी इसके अलावा उसकी चिकनी गीली हो चुकी चूत को ढके हुए थे जिस पर के काले बाल इधर उधर से बाहर झांक रहे थे, इसके अलावा पैंटी के हल्की पारदर्शी होने के कारण उसकी चूत के बाल पैंटी के ऊपर से भी दिख रहे थे..

कविता पूरी गति से बाबिल को लंड को चूस रही थी, उसका हाथ और होंठ लंड पर ऊपर नीचे तेजी से हो रहे थे, और उधर बाबिल की उंगलिया कविता की पैंटी की इलास्टिक पार करके, चूत के हल्के जंगल में विचरण कर रही थी.. जैसे जैसे वो कविता की चूत के बाल सहला रह था वैसे वैसे चूत की फांक उत्तेजना से कम्पित होने लगी..

उसके बाद एक तेज सिसकारी कविता के मुहँ से निकली, लड़के की एक उंगली ने चूत के गीले हो चुके ओठ पर से गुजरते हुए, ठोस खून से भरे लाल, उत्तेजना से फडकते, कली नुमा चूत के दाने को छु लिया.. कविता के नितम्ब अपने आप ही हिलने लगे, उसको गोरी चिकनी गूँदाज जांघे कापने लगी.. कविता ने महसूस किया की लड़के का दूसरा हाथ धीरे धीरे पैंटी की इलास्टिक को पकड़कर नीचे खीच रहा है.. उसने चूतडो पर आधी दूर तक पैंटी खिसका भी दी है..

जब लड़के की बीच वाली उंगली, कविता के चूतडो की दारार को सहलाती हुई गांड के छेद में घुसी तो कविता के शरीर में पहले से भी ज्यादा तेज सिहरन दौड़ गयी.. वह अब पागलो की तरह लंड चूसने लगी.. और उत्तेजना के मारे लंड पर दांत भी गड़ाने लगी, फिर और जोरदार तरीके से लंड को चूसने लगी..






कविता जिस तरह से लंड पर पूरी तरह झुककर तेजी से बेतहाशा मुहँ में पूरा का पूरा ले रही थी, इससे लड़के की कराहने की आवाज और बढ़ गयी.. कराहते हुए लड़के ने एक बार फिर अपना ध्यान कविता के लगभग नंगे हो चुके चुतड और नाजुक कली जैसी चूत की तरफ लगाया.. उसकी उंगली गांड के छेद से हटकर चूत पर आ गयी और नीचे से ऊपर की तरफ चूत के ओठो को रगड़ने लगी.. उंगली रगड़ते रगड़ते चूत के फूले दाने के पास तक जाती और फिर नीचे आ जाती.. कभी कभी दाने को भी छु लेती और तभी कविता के पुरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती..

इसके बाद बाबिल ने कविता के चूत की फांक को अलग करते हुए, अपना अंगूठा कविता की गरम गीली मखमली गुलाबी चूत के अन्दर घुसा दी.. उस लड़के का पूरा शरीर, कविता की चूत के स्पर्श से रोमांचित हो गया.. इधर कविता ने भी लंड चूसने में कोई कोर कसर बाकि नहीं रखी..






बाबिल: "ओह ओह्ह ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्ह दीदी..!!!!"

बाबिल ने अपने अब तक के जीवन में ऐसा कुछ कभी अनुभव नहीं किया था.. उसे पता था अब कभी भी कविता चाची के लंड चूसते मुहँ के अन्दर उसके अन्दर उबल रहे गरम लावे की शूटिंग शुरू हो सकती है.. उसके लंड पर कविता के जीभ और होंठों का गीला नरम स्पर्श उसके चरम आनंद की अनुभूति करा रहा था.. अब उसका नियंत्रण कभी भी टूट सकता है वो कभी भी दीदी के मुहँ में झड़ना शुरू कर सकता है.. !!

बाबिल की टांगे तनने लगी.. चूतड़ सिकुड़ने लगे, अब उसका खुद को काबू में रखना असंभव था, फिर भी कविता की चूत से खेलने के लालच में उसने खुद को थोड़ी देर और रोकने की नाकाम कोशिश की.. जितना देर वो खुद को रोक लेगा उतनी ही ज्यादा देर वो कविता की चूत से खेल पायेगा..

लेकिन कविता अपनी पूरी स्पीड से लंड को चूस रही थी, इसलिए उसका अब ज्यादा देर तक रुक पाना असंभव था.. इतनी भयानक तीव्र उत्तेजना, इस नाजुक से लड़के से संभाले नहीं संभल रही थी.. उसे यह एहसास होने लगा था.. अब गरम सफ़ेद गाढ़ा लावा, बस निकलने ही वाला है और दुनिया में कोई भी तरीका ऐसा नहीं था, जो इसे रोक सके.. अब उसे झड़ना ही है,

कविता ने महसूस किया की लड़के का शरीर अकड़ने लगा है और वो भी बेतहाशा तरीके से चूस चूस के थक चुकी थी इसलिए जल्दी से फ्री होना चाहती थी, उसको भी अब जल्दी मची थी और उसे पता था अब बाबिल को झड़ने में बस कुछ ही सेकंड बचे है..एक बार यह झड़ जाए तो उसे दोबारा तैयार कर.. उससे चुदवाकर अपनी आग बुझानी थी..

उसने भी अपनी जांघे और कुल्हे जोर जोर से झटकने शुरू कर दिए, वो चूत में घुसी बाबिल की उंगली के इर्द गिर्द अपनी कमर और कुल्हे हिलाने लगी , ताकि उसकी गीली चिकनी मखमली चूत भी साथ में झड जाये..

बाबिल- ओह ओह्ह्ह ओह्ह्ह्ह मै झड़ने वाला हूँ दीदी, आपके मुहँ में झड़ने वाला हूँ.. ओ माँ ओह्ह्ह..!!"

बाबिल का कुल्हा पहले ऊपर उठा फिर नीचे गिरा.. कविता समझ गयी ये क्या करना चाहता है.. उसे कोई अनुभव नहीं था इसलिये उसके साथ ये सब कभी हुआ नहीं.. वह नौसखियो की तरह इधर उधर हिल रहा था, लेकिन कविता ने कठोरता से उसका लंड थामे रखा और मुहँ में गले की गहराई तक ले जा कर पूरा अन्दर लेती रही.. लंड रस मुहँ में लेने को लेकर उसने फैसला कर लिया था और वो ये करके रहेगी.. वो चाहती थी की वह लड़का सिर्फ और सिर्फ उसके मुंह में झड़े..

काम उत्तेजना के चरम पर बैठे बाबिल ने बेदर्दी से अपना लंड कविता के मुहँ में पेल दिया, उसका लार से सना फुला हुआ लंड कविता के होंठों को चीरता हुआ कविता के मुंह में घुसता चला गया और जब तक कविता के होंठ, लंड की जड़ तक नहीं पंहुच गए, लंड सरसराता हुआ मुँह में जाता रहा.. लड़के ने एक लम्बी कराह ली, उसने अपने लंड को पूरी तरह कविता के हवाले कर दिया और खुद की उंगली और ज्यादा तेजी से कविता की चूत में अन्दर बाहर करने लगा.. उसे अपनी गोलियों में फट रहे ज्वालामुखी की आग साफ़ महसूस होने लगी.. लग रहा था गरम धधकते लावे की एक तेज लहर उसके गोलियों को छोड़कर आगे की तरफ निकल पड़ी थी..!!!

तभी कविता ने अपने गीले मुहँ में बाबिल के सफ़ेद गाढे लंड रस की गरम ताजा बूँद महसूस की, जिसे वो तुरंत ही गटक गयी, ताकि दम घुटने की कोई गुंजाईश न रहे और लंड अपनी गहराई तक जाकर पूरा समाये और झड़ता रहे..वीर्य का स्वाद उसे पिछले की अनुभवों के मुकाबले काफी अनोखा और अच्छा लग रहा था






जिस तरह लड़का इस समय झड रहा था बिलकुल इसी तरह की संवेदना और करंट कविता भी अपनी कमर के आसपास महसूस कर रही थी जहाँ वो लड़का तेजी से अपनी उंगली कविता की चिकनी गीली चूत में अन्दर बाहर कर रहा था..

कविता की चूत में भी झड़ना शुरू होने का कम्पन महसूस होने लगा था, एक गुदगुदी भरी कंपकपी से उसकी चूत की दीवारे झनझनाने लगी थी.. उसका पूरा शरीर अकड़ा पड़ा था..वह भी बाबिल के लंड पर क्रूर से क्रूरतम होती जा रही थी जिसके कारण लड़के के नितम्ब तेजी से हिल रहे थे.. कांप रहे थे.. कविता के होंठों की सख्ती चरम पर थी और लंड रस के मुहँ मे झड़ने से, लंड को उसकी जड़ तक मुहँ में निगलने से कविता के मुहँ से बस गलगल्लाने की आवाज ही आ रही थी..

लंड से निकलती हर बूँद को कविता अपने मुहँ में लेकर निगलती जा रही थी, अब तक तीन-चार पिचकारियाँ छूट चुकी थी और कविता झट से लंड रस को निगलकर उसके लंड को अपने सख्त होंठों से जकडे हुए, उस पर अपनी जीभ तेजी से फिर रही थी.. लड़के के परम आनंद की सीमा नहीं थी, झड़ते लंड पर गीले मुहँ में जब लगातार गीली खुरदरी जीभ आपके लंड को अपने आगोश में लेकर सहलाये तो भला कौन नहीं काम आनंद से पागल हो जायेगा..!!! लड़के ने चार पांच बार और अपने कुल्हो को तेज झटका दिया और इसी के साथ उसके लंड रस की बची आखिरी चार पांच किश्तें भी कविता के मुहँ में जा गिरी.. कविता का पूरा मुहँ वीर्य रस से भर गया..!!






लड़के ने अब कविता की चूत में अपनी पूरी उंगली घुसा दी और ठहर गया.. कविता का कुल्हा जोर से कांपा, मुहँ से लम्बी सिसकारी भरी आह निकली और कुछ देर तक कविता का पूरे शरीर में कंपकपी होती रही, वह लड़का कविता का कम्पन महसूस कर सकता था और कविता का अकड़ा शरीर निढाल होने लगा.. वह भी हांफते हुए बिस्तर पर निढाल हो गया,





कविता ने अपनी आंखे बंद कर ली और उस लड़के की नाभि पर अपना सर टिका दिया, उसकी सांसे भी उखड़ रही थी.. कविता और बाबिल दोनों की ही आनंद की चरम सीमा पर पंहुचने से आंखे बंद थी..

दोनों कुछ देर अपनी सांसे काबू में आने का इंतज़ार करते रहे, थोड़ी देर बाद कविता ने धीरे से आंखे खोली, कामवासना के कारण गायब हो गयी उसकी मन की चेतना लौटने लगी, चुसाई के इस लम्बे थकावट भरे सेशन ने कविता को पूरी तरह थका डाला था.. थोड़े से आराम भरे अंतराल के बाद, वह उस लड़के के लंड को फिर से जागृत करना चाहती थी ताकि वह तसल्ली से अपनी चूत मरवाकर संतुष्ट हो सकें..

वह लड़का अपने सिकुड़ते लंड की तरफ देखता हुआ, जिसमे से लंड रस वीर्य की एक आध बूँद अभी भी निकल रही थी..






वह दोनों बेड पर काफी देर तक पड़े रहे.. उनकी तंद्रा तब टूटी जब दरवाजे की घंटी बजी

घंटी की आवाज सुनते ही लड़का उछलकर खड़ा हो गया.. और अधनंगी कविता के सामने देखने लगा.. कविता भी जागृत होकर अपने कपड़े ठीक करते हुए बोली "जाकर देख, कौन है..!! और हाँ, सीधे दरवाजा मत खोल देना.. पहले खिड़की से देख की कौन है.. फिर मुझे बता"

लड़का सहमति में सिर हिलाते हुए उठा और ड्रॉइंगरूम की तरफ जाने लगा..

कविता को यह असमय रुकावट बिल्कुल पसंद नहीं आई.. वो बस अब फिर से उस लड़के का लंड तैयार करने ही जा रही थी ताकि उस जवान लड़के के साथ मस्त संभोग हो सकें.. तभी यह कमबख्त डोरबेल बज गई..!!

आपने नसीब को कोस रही कविता, बाबिल के आने का इंतज़ार कर ही रही थी की तब.. वह लड़का दौड़ा दौड़ा अंदर आया.. उसकी सांसें फूल रही थी

"दीदी.. मालकिन आ गई..!!" मारे डर के थरथराते हुए उसने कहा

"क्या??" कविता की चीख गले में ही अटक गई..!! मम्मी तो एक दिन बाद आने वाली थी.. अभी कैसे आ गई?? पर सोचने का समय नहीं था.. वह लड़का भी असमंजस में कविता की ओर देख रहा था की आगे क्या करें..

कविता तुरंत खड़ी हुई, अपने कपड़े ठीक किए, पर्स उठाया और बोली "मैं पीछे के रास्ते से निकल रही हूँ.. मेरे जाने के बाद ही दरवाजा खोलना.. और हाँ, अगर मम्मी को कुछ भी बताया तो तेरी खैर नहीं.. याद रखना!!!"

बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए, कविता किचन की तरफ भागी और पीछे का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई.. चुपके से वह गराज वाले रास्ते से आगे का द्रश्य देखने लगी.. हाथ में बेग लिए रमिलाबहन दरवाजा खुलने का इंतज़ार कर रही थी.. बाबिल ने दरवाजा खोला.. रमिलाबहन ने बड़े ही स्नेह से उसके सामने देखते हुए एक मुस्कान दी.. उसके गाल पर हाथ थपथपाया और घर के अंदर प्रवेश किया.. दरवाजा बंद हो गया


कविता की बड़ी ही इच्छा थी की वह पीछे के रास्ते जाकर अंदर के माहौल को देखें.. पर किसी तरह उसने अपनी इस इच्छा को नियंत्रित किया और बाहर निकलकर अपने घर की ओर चल दी

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रसोईघर में जवान देवर को मुख-मैथुन का आनंद देती भाभीजी



 
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बेंगलोर के निवासस्थान पर, मौसम और विशाल के बीच कहासुनी हो जाती है.. दरअसल मौसम इस बात को लेकर भड़क जाती है की विशाल अब भी अपनी पुरानी दोस्त फोरम से मेसेज का आदान-प्रदान करता है और इस बात का उसने कभी जिक्र तक नहीं किया.. इस बात को लेकर मौसम विशाल को काफी खरी-खोटी सुनाती है और विशाल गुस्से में ऑफिस के लिए निकल जाता है

ऑफिस में मौसम को पिंटू मिलता है जो काम के सिलसिले में बेंगलोर आया हुआ था.. बातों बातों में पिंटू उसे अपने शहर आने का न्योता देता है और मौसम मान जाती है..

दूसरी और, जिस्मानी प्यास से झुँझ रही कविता, अपनी माँ के नौकर का सहारा लेने का फैसला करती है.. उसकी माँ शहर से बाहर थी उस बात का फायदा उठाते हुए वह उनके घर पहुँच गई.. उस नौकर लड़के को दबोचकर वह भोगने की तैयारी में ही थी तब अचानक कविता की माँ आ जाती है और कविता चुपके से, पीछे के रास्ते, भाग जाती है..

अब आगे..

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एक सप्ताह का समय बीत गया.. पीयूष अमरीकन ऑर्डर की तैयारियों में गले तक डूबा हुआ था.. सप्लाइअर से मटीरीअल आ चुका था.. अब उसे जल्द से जल्द प्रोडक्शन लाइन पर पहुंचाने की दरकार थी.. कर्णाटक के एस.ई.ज़ेड में, जहां उनकी उत्पादन सुविधा थी, वहाँ तक सारा माल पहुंचा दिया गया था.. अब आगे का काम देखने की जिम्मेदारी विशाल की थी, जो बेंगलोर ऑफिस से, यह सारा काम देख रहा था.. पता नहीं क्यों पर पीयूष को बार बार ऐसा लगता रहता था की विशाल अपनी पूरी काबिलियत से काम नहीं कर रहा था.. उसका व्यवहार काफी बेफिक्र सा.. लापरवाह सा लगता था..!! रिश्तेदार होने के नाते, पीयूष उसे ज्यादा कुछ कह भी नहीं पाता था.. गनीमत थी की वहाँ मौसम की मौजूदगी के कारण, काफी कुछ संभल जाता था

पीयूष अपने लेपटॉप के स्क्रीन में ऐसा खोया हुआ था की उसे पता ही नहीं चला की कब वैशाली उसके सामने आकर बैठ गई.. वैशाली बड़े ध्यान से पीयूष की ओर देख रही थी... पीयूष का चेहरा तनावग्रस्त और चिंतित नजर आ रहा था.. पता नहीं क्यों, पीयूष को देखकर आज वैशाली को पुराने दिनों की बहोत याद आ रही थी.. काफी देर तक बैठे रहने के बाद, जब पीयूष का ध्यान उसकी ओर नहीं गया तब वैशाली ने सोचा की उसे ही कुछ पहल करनी होगी..

शरारती मुस्कान के साथ वैशाली ने कहा "मेरी जगह अभी कविता यहाँ होती तो देखकर कहती की.. काश वो यह लेपटॉप होती..!!"

अब पीयूष का ध्यान एकदम से वैशाली की ओर गया और वो झेंप गया..

पीयूष: "तुम कब आई वैशाली?"

हँसकर वैशाली ने कहा "इस दुनिया में आए हुए तो काफी साल हो गए.. हाँ, तुम्हारी केबिन में आए हुए सिर्फ बीस मिनट ही हुए है अभी"

यह सुनकर पीयूष हंस पड़ा और बोला "तेरी मज़ाक करने की पुरानी आदत गई नहीं अभी.. बचपन से तू वैसी ही है"

वैशाली ने फ़ीरकी लेते हुए कहा "मैं तो वैसे ही हूँ.. बस तुम बदल गए हो..पूरा दिन बस काम में डूबे रहते हो.. घर पर जाकर भी कविता के सामने लेपटॉप खोलकर ही बैठा रहता है क्या..!!"

कविता का जिक्र होते ही पीयूष के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई.. उसे एकदम से एहसास हुआ की अब वह फिर से उसे वक्त नहीं दे पा रहा है.. और उसकी बेरुखी की वजह से कविता भी उससे दूरी बनाए रखने लगी है.. बुरा लग रहा था पीयूष को पर उसे इस बात की भी शिकायत रहती थी की कविता उसके काम के बोझ के बहाने का स्वीकार नहीं करती थी.. कभी कभी पीयूष का मन रोमेन्टीक हो जाता तो कविता उसे नकार देती.. यह कहते हुए की उसका मूड नहीं है.. जब की पीयूष अच्छी तरह जानता था की बात मूड की नहीं थी, पर जब कविता का मन हो तब वो सहयोग नहीं दे पाता था, उस बात का बदला ले रही थी..

वैशाली ने पीयूष के चेहरे के सामने चुटकी बजाते हुए कहा "कहाँ खो गए एकदम से?"

अपने सिर को झटकाकर कविता के विचारों को दूर करते हुए पीयूष ने फिर से चेहरे पर मुस्कुराहट धारण कर ली..

पीयूष: "अरे कुछ नहीं यार.. ऐसे ही बस.. काम का थोड़ा ज्यादा ही टेंशन रहता है आजकल"

वैशाली: "टेंशन लो या न लो.. काम अपने हिसाब से चलता ही रहता है.. ज्यादा लोड लेने पर अगर दिल पर असर हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे"

पीयूष: "मेरे दिल को कहाँ कुछ होने वाला है..!! तुम जो खयाल रख रही हो उसका"

सुनकर वैशाली के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई.. उसने नजरें झुका ली.. शायद उसके मज़ाक का गलत अर्थ निकाल लिया पीयूष ने

वह कुछ बोली नहीं और आँखें चुराकर बैठी रही..

अचानक पीयूष उठा.. और चलकर वैशाली की कुर्सी के पीछे खड़ा हो गया.. और दोनों हाथों को वैशाली की गर्दन के इर्दगिर्द लपेटकर उसके माथे को चूम लिया..






इस हमले से वैशाली सहम गई.. उसने तुरंत ही अपने आप को पीयूष की गिरफ्त से छुड़ाया.. और कुर्सी से खड़ी हो गई

वैशाली ने थोड़े तीखे स्वर में कहा "यह क्या कर रहे हो पीयूष?"

पीयूष: "भड़कती क्यों है यार..!! हम दोनों के बीच ऐसी दूरी कब से होने लगी? याद है वो पुराने दिन..!!"

वैशाली ने थोड़े गुस्से से कहा "तब की बात ओर थी.. अब मेरी शादी हो चुकी है..!!"

पिंटू: "और जब हम वो सब कर रहे थे तब मेरी भी तो शादी हो रखी थी कविता से..!! उस बात से तो तुम्हें कभी कोई दिक्कत नहीं हुई..!!"

वैशाली चुप हो गई.. उसके पास कोई जवाब नहीं था पीयूष के इस तर्क का..!! क्योंकि वह जानती थी की पीयूष सही कह रहा था..

कुछ पलों तक वैशाली की ओर से कोई प्रतिक्रिया न आने पर, पीयूष ने उसे उसकी मर्जी समझते हुए, फिर से उसकी कमर में हाथ डालकर उसे करीब खींचना चाहा.. वैशाली का जिस्म पीयूष की छाती से जा टकराया.. यू-डी-कलोन की मादक खुशबू ने एक पल के लिए वैशाली के ईमान को डगमगा दिया.. उसकी आँखें बंद हो गई..!! पीयूष उसके कानों के नीचे गर्दन पर चूमने लगा..






पीयूष के होंठों का गर्दन पर स्पर्श होते ही सिहर उठी वैशाली..!! कई हफ्तों से.. बल्कि कुछ महीनों से.. उसके अंदर धधक रहा हवस का शैतान जैसे अंगड़ाई लेकर जाग उठा था.. पिंटू की कमजोरी को लेकर वह मन ही मन तड़प रही थी.. बिना सेक्स के उसका जीवन वैसे ही था जैसे जल बिन मछली का..!! फिर भी वह अब तक अपने आप पर संयम रखे हुए थी क्योंकि वह अब किसी भी सूरत में पिंटू की नज़रों से गिरना नहीं चाहती थी..!! शादी के कुछ दिन पहले राजेश सर की केबिन में रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद जो खेल हुआ था, उसके बाद वह इतना तो समझ ही चुकी थी..!!

लेकिन जैसे शेर बिना शिकार और मधुमक्खी बिना पुष्परस, वैसे ही वैशाली भी बिना शारीरिक सुख के, लंबे समय तक रहने की आदि नहीं थी..शादी के बाद वैसे तो पिंटू के साथ सब ठीक ही चल रहा था लेकिन जब से वह दोनों इस शहर में शिफ्ट हुए थे, पिंटू ने पीयूष की कंपनी जॉइन की थी और काम का बोझ बढ़ता चला गया था.. उसके बाद ही समस्या आ खड़ी हुई थी.. हो सकता है की काम के तनाव के चलते ऐसा हो रहा हो..!! पर वैशाली को दुख इस बात से था की पिंटू इसे एक समस्या मानने को तैयार ही नहीं था..!! ऊपर से जिस तरह वह उस रात वह बेरुखी और गुस्से से पेश आया था इससे वैशाली के दिल को बहोत चोट पहुंची थी..!!

पीयूष का हाथ, वैशाली के बड़े बड़े उरोजों को सहला रहा था.. उसकी गर्म सांसें वैशाली को अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी..!! ऐसी कश्मकश में थी वैशाली.. दिमाग उसे वहाँ से चले जाने के लिए कह रहा था लेकिन उसका शरीर नियंत्रण में नहीं था.. उसका जिस्म भोग मांग रहा था जो वह पिछले की हफ्तों से उसे दे नहीं पाई थी..!!

तभी केबिन के दरवाजे पर दस्तक पड़ी.. और दोनों एकदम सहम गए..!! पीयूष एकदम से वैशाली से दूर हो गया और अपने कपड़े ठीक करने लगा.. वैशाली ने टेबल से अपनी फ़ाइल उठाई तभी चपरासी ने दरवाजा खोला और अंदर आकर कहा

"साहब, आप से कोई मिलने आया है"

इससे पहले की पीयूष कोई प्रतिक्रिया देता, वैशाली उल्टे पाँव वहाँ से भाग गई..!! पीयूष ने अपनी टाई का नॉट ठीक किया और अपनी कुर्सी पर धम्म से बैठ गया...!!

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शाम ढल रही थी.. हाइवे पर गाड़ी सरपट भाग रही थी.. कार के काले शीशों के पीछे क्या चल रहा था वह किसी को नजर नहीं आ रहा था..

अंदर एसी के ठंडी हवा ने माहोल को जमा रखा था.. म्यूजिक सिस्टम पर रोमेन्टीक संगीत मध्यम आवाज पर गूंज रहा था.. उस गाने के बोल पर अपने होंठ हिलाते हुए मदन स्टियरिंग पर पकड़ बनाए गाड़ी को तेजी से भगा रहा था.. और पीछे वाली सीट पर..!!

राजेश अपनी शॉर्ट्स को घुटनों तक उतारे हुए बैठा था.. सलवार कमीज पहने साथ बैठी शीला झुककर राजेश के लंड को मुंह में लेकर.. ऊपर नीचे होते हुए चूस रही थी.. और राजेश अपनी आँखें बंद कर इस अनोखे माहोल का आनंद ले रहा था..!!






जब से रेणुका प्रेग्नन्ट हुई थी तब से इन चारों के बीच चल रहा अदला बदली का खेल बंद हो गया था..!! पिंटू और वैशाली के शिफ्ट हो जाने के बाद, राजेश अब अक्सर मदन-शीला के घर रातें बिताता था.. उनकी रातें तो रंगीन हो जाती थी पर मदन बिना साथी के.. उन दोनों की चुदाई देखते हुए तड़पता रहता था.. हालांकि राजेश ने उसे फाल्गुनी के बारे में बताया था और कहा भी था की वह जल्द ही मदन का उसके साथ कोई जुगाड़ सेट कर देगा.. पर उस बात को भी काफी अरसा बीत गया और मदन अपनी धीरज गंवा रहा था.. शीला तो पहले ही दोनों से वचन ले चुकी थी, की जब भी वह दोनों रंगेलियाँ मनाने जाएँ तब वह भी साथ चलेगी..!! इतनी जबरदस्त संभोग-लीला से शीला अछूती कैसे रह जाती..!!

आखिर वह दिन आ गया.. फाल्गुनी ने फार्महाउस पर सब इंतेजाम कर दिया था.. राजेश की गाड़ी में वह तीनों वहीं जा रहे थे.. इस ढाई घंटे के सफर के दौरान भी शीला के नशीले जिस्म का मज़ा उठाने से राजेश चुका नहीं.. गाड़ी उनके शहर से बाहर निकलते ही, वह शीला के साथ पिछली सीट पर चला गया और दोनों के गुलछर्रे शुरू हो गए..!!

राजेश के लंड का सुपाड़ा, शीला की लार से सनकर चमक रहा था..चूस चूसकर शीला का जबड़ा दर्द कर रहा था और वह सीट पर अपनी पीठ टीकाकर आराम कर रही थी.. कमीज में उभरते हुए उसके गदराए बबलों को राजेश ने कपड़ों के ऊपर से ही मसलकर रख दिया.. रियर व्यू मिरर से दोनों के बीच हो रही इस मस्ती को देखकर मदन मुस्कुरा रहा था.. उसे यह देखकर कोई फरक नहीं पड़ रहा था.. वह तो केवल फाल्गुनी के नरम जवान गोश्त के सपने देखते हुए तेजी से गाड़ी चला रहा था.. उसका दिल कर रहा था की वह जल्द से जल्द वहाँ पहुँच जाएँ और फाल्गुनी की जवानी लुत्फ उठायें..

शीला के विशाल मम्मों को कपड़ों के ऊपर से ही अपने दांतों से काटते हुए, कमीज के अंदर हाथ डालने लगा राजेश.. उसकी इस बेकरारी को देखकर शीला मुस्कुराने लगी.. उसने हल्के से राजेश को अपनी छातियों से दूर किया.. और दोनों हाथों से अपनी कमीज ऊपर उठाते हुए उतारने लगी..






शीशे में से शीला को कमीज उतारते हुए देख मदन ने कहा "यार, बिना कपड़े उतारे तुम दोनों का नहीं हो सकता क्या..!! ऐसे खुले रोड पर ही तुम दोनों शुरू हो गए..!!"

आँख मारते हुए शीला ने कहा "कभी पन्नी के अंदर रखे रसगुल्ले को बाहर से चूसकर देखा है क्या?? ऐसे थोड़े ही मज़ा आता है..!!"

मदन ने परेशान होते हुए कहा "अरे वो सब समझता हूँ मैं.. पर कहीं किसी ने देख लिया तो..!!"

तब तक शीला अपनी कमीज उतार चुकी थी.. उसकी बड़ी से ब्रा भी उन मदमस्त बबलों को पूरी तरह सहारा दे नहीं पा रहे थे.. ब्रा को फाड़ने की धमकी देते हुए स्तनों की चर्बी इर्दगिर्द नजर आ रही थी.. शीला अपना हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोलने लगी तब राजेश ने कहा "कुछ नहीं होगा यार मदन.. तू बेकार टेंशन ले रहा है.. इतना अंधेरा हो चला है.. गाड़ी १०० की स्पीड पर भाग रही है.. और तो और शीशे पर काली परत भी चढ़ी हुई है.. किसी को घंटा कुछ नजर नहीं आएगा..!!"

मदन: "तुम दोनों की जो मर्जी में आए वो करो.. !!" कहते हुए उसने वापिस ड्राइविंग पर अपना ध्यान केंद्रित किया

ब्रा खुलते ही शीला के दोनों स्तन ऐसे मुक्त होकर झूलने लगे जैसे पिंजरे से दो खरगोश छूटकर बाहर गश्त लगा रहे हो..!! गोरे गोरे चरबीदार स्तन.. करीब तीन से चार किलो एक स्तन का वज़न होगा..!! दोनों स्तनों को खुला देख राजेश उनपर टूट ही पड़ा.. दबाते और चूसते हुए उसने अपना सिर शीला की गोदी में रख दिया.. और छोटे शिशु की तरह, शीला की निप्पलों को मुंह में लेकर चूसने लगा..!!






कार की बंद केबिन में शीला की सिसकियाँ गूंज रही थी..!! एक निप्पल राजेश के मुंह में देकर, दूसरी निप्पल को अपनी उंगलियों से दबाते हुए शीला आह्ह आह्ह कर रही थी.. उसकी गोदी में लेटे राजेश को अपनी गर्दन पर शीला के भोसड़े की गर्मी महसूस हो रही थी.. वह जानता था की इन हरकतों से शीला गरम हो जाएगी और उसकी आखिरी संतुष्टि सिर्फ संभोग से ही हो पाएगी.. जो की गाड़ी की संकरी जगह में करना मुश्किल था.. पर उसका अंदाजा यह था की तब तक तो वह सब फार्महाउस पर पहुँच जाएंगे.. फिर तो सब अपनी मर्जी के मालिक थे..!! जितनी चाहे.. जिससे चाहे.. चुदाई कर सकते थे..!!

अपने दोनों स्तनों को बारी बारी राजेश के मुंह में ठूँसते हुए शीला ने उसका लंड पकड़ लिया.. और हौले हौले ऊपर नीचे करते हुए हिलाने लगी..






मुंह से निप्पल निकालकर राजेश ने कहा "यार शीला.. जरा धीरे धीरे.. वरना मेरा यहीं छूट जाएगा.. अभी दो दिन पहले ही नए सीटकवर लगवाए है.. खराब हो जाएंगे"

शीला ने हँसकर कहा "तो फिर रोक के रख अपनी पिचकारी को"

राजेश: "तेरे हाथ में आने के बाद अच्छे अच्छों की पिचकारी छूट जाती है.. ऐसे ही हिलाते रहेगी तो मेरे ढक्कन को भी खुलने में देर नहीं लगेगी.. इसलिए कह रहा हूँ.. और मुझे अभी खाली कर देगी.. तो वहाँ फार्महाउस पर जाकर हम दोनों क्या गुल्ली-डंडा खेलेंगे?"

शीला हंस पड़ी और बोली "हाँ क्यों नहीं.. तेरी गुल्ली अगर डंडा बनी रही तो उससे खेल लूँगी..!! नहीं तो मुझे नया डंडा ढूँढने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा"

मदन ने गुस्से से कहा "अब तुम दोनों चुपचाप अपना काम खत्म करोगे?? मुझे डिस्टर्ब हो रहा है.. और वैसे भी अगली दस मिनट में हम शहर में प्रवेश करेंगे.. उससे पहले अपनी सारी लीला समेट लो दोनों..!!"

मदन की बात सुनते ही राजेश ने दोनों हथेलियों से शीला के बड़े बड़े वक्षों को दबा दिया.. और उन दोनों के बीच अपना चेहरा छुपा दिया.. शीला ने उसके लंड पर हाथों से आखिरी ठुमका मारा और राजेश उसकी गोदी से खड़ा हो गया..!!








राजेश ने तुरंत अपनी शॉर्ट्स ऊपर चढ़ा ली पर शीला अब भी टॉपलेस अवस्था में बैठी रही..!!

राजेश ने आँख मारते हुए कहा "ऐसे ही बैठे रहने का इरादा है क्या??"

शीला: "अब मैं सोच रही थी की वहाँ पहुंचकर भी कपड़े तो उतारने ही है.. अब फिर से इन दोनों को दबाकर ब्रा पहनूँ.. कमीज चढ़ाऊँ.. उससे अच्छा ऐसे ही चली आती हूँ"

मदन चिल्ला उठा "बकवास बंद कर और कपड़े पहन ले.. शहर का ट्राफिक शुरू हो गया है"

शीला ने मुस्कुराकर कहा "मज़ाक कर रही थी यार.. भड़कता क्यों है?? और वैसे भी मेरा यह खजाना इतनी आसानी से पब्लिक को दिखा थोड़ी ना दूँगी..!!"

जब तक शीला ने ब्रा और कमीज पहनी तब तक गूगल मेप्स के दिखाए हुए रास्ते मदन ने गाड़ी एक बड़े से फार्महाउस के गेट पर रोक दी...

अंगड़ाई लेकर अपनी कमर को सीधी करते हुए मदन गाड़ी से बाहर निकला और उसके पीछे पीछे राजेश और शीला भी बाहर आए.. उस शानदार फार्महाउस को देखकर मदन और शीला की आँखें चकाचौंध हो गई






मदन ने राजेश से कहा "कुछ भी कहो राजेश.. इस सुबोधकांत ने बहोत माल बनाया होगा"

राजेश ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा "उसका असली माल जो अंदर बैठा है, उसके मुकाबले तो ये कुछ भी नहीं है..!!"

शीला ने राजेश के कूल्हें पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहा "अब तुम दोनों ऐसे ही फार्महाउस को देखकर अपनी गांड जलाते रहोगे या अंदर जाने का प्रबंध भी करोगे?? दरवाजा तो बंद है, कैसे जाएंगे? फाल्गुनी अंदर हो तो जल्दी फोन कर उसे बुला.. मुझे बाथरूम जाना है"

राजेश ने तुरंत फोन निकाला और फाल्गुनी का नंबर डायल किया.. कुछ ही क्षणों में, टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहने हुए अपनी गांड मटकाते जब फाल्गुनी दरवाजा खोलने आई तब मदन की आँखें उसके चूतड़ों पर चिपक ही गई..!! ऐसा नहीं था की उसने फाल्गुनी को पहले देखा नहीं था.. पर इस नजर से पहली बार देख रहा था.. उसे इस बात से ताज्जुब हो रहा था की इतनी नशीली जवानी पर उसकी नजर आज से पहले पड़ी कैसे नहीं??

"आ गए आप लोग..!! कैसा रहा सफर?" लोहे के बड़े दरवाजे का ताला खोलते हुए फाल्गुनी ने प्यारी सी मुस्कान देते हुए कहा

"वो सब छोड़, बाथरूम कहाँ है, ये बता" शीला से उसके मूत्रपिंड का दबाव बर्दाश्त नहीं हो रहा था..

"ड्रॉइंग रूम की दाईं तरफ" कविता का वाक्य खतम भी नहीं हुआ और शीला अपनी दोनों जांघों के बीच हाथ दबाते हुए अंदर की तरफ भागी

शीला का यह हाल देखकर तीनों हंस पड़े..!!

कंपाउंड के बड़े से दरवाजे को बंद करते हुए तीनों अंदर आए..!! विस्मित नज़रों से मदन चारों ओर देख रहा था.. हर कोने से समृद्धि की झलक नजर आ रही थी.. बाहर बना गार्डन.. बीच में संगेमर्मर का फव्वारा जिसके बीचोंबीच एक सुंदर नग्न सुवक्र स्त्री की मूर्ति थी.. जिसकी निप्पलों से पानी बहते हुए नीचे गिर रहा था..!! घटादार आम के पेड़ों से घिरा हुआ एक एकर का विस्तार.. और थोड़े ही दूर बना एक छोटा वैभवशाली बंगला..


राजेश फाल्गुनी के साथ उस घर के तरफ जाने लगा और मदन भी यंत्रवत उनके पीछे पीछे चल रहा था.. उसने देखा की राजेश अपनी हथेली से फाल्गुनी के चूतड़ों को सहला रहा था.. गोरी गोरी.. वेक्स की हुई चमकती टांगें.. मटकते नितंब.. पतली कमर.. सुराहीदार गर्दन और ब्राउन हाइलाइट्स वाले बाल जो फाल्गुनी के कंधों तक पहुँच रहे थे.. मदन बस उसे पीछे से देखता ही रह गया..!!

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पीयूष और वैशाली के बीच ऑफिस में बातचीत हो रही थी.. कुछ पुरानी बातों को याद कर पीयूष शरारती हो उठा.. उसने वैशाली के करीब आने की कोशिश की.. प्यासी वैशाली भी सिहर उठी और दोनों के बीच बात आगे बढ़ने ही वाली थी की तब.. चपरासी के दरवाजा खटखटाने पर वह सिलसिला वहीं रुक गया..

दूसरी तरफ... आखिर वह घड़ी आ ही गई जब राजेश, शीला और मदन को लेकर, फाल्गुनी से मिलने, स्व. सुबोधकांत के फार्महाउस की ओर चल पड़ता है.. मदन गाड़ी चला रहा था और पीछे की सीट पर शीला और राजेश अपनी लीलाएँ शुरू कर देते है.. मदन को उनकी हरकतों में कोई दिलचस्पी नहीं थी.. उसे तो बस, फाल्गुनी का नरम गोश्त ही नजर आ रहा था

तीनों फार्महाउस पर पहुंचते है

अब आगे..

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कंपाउंड के बड़े से दरवाजे को बंद करते हुए तीनों अंदर आए..!! विस्मित नज़रों से मदन चारों ओर देख रहा था.. हर कोने से समृद्धि की झलक नजर आ रही थी.. बाहर बना गार्डन.. बीच में संगेमर्मर का फव्वारा जिसके बीचोंबीच एक सुंदर नग्न सुवक्र स्त्री की मूर्ति थी.. जिसकी निप्पलों से पानी बहते हुए नीचे गिर रहा था..!! घटादार आम के पेड़ों से घिरा हुआ एक एकर का विस्तार.. और थोड़े ही दूर बना एक वैभवशाली बंगला, जिसकी बनावट में पोर्तुगीज़ व यूरोपियन स्टाइल की झलक थी..







राजेश फाल्गुनी के साथ उस बंगले की तरफ जाने लगा और मदन भी यंत्रवत उनके पीछे पीछे चल रहा था.. उसने देखा की राजेश अपनी हथेली से फाल्गुनी के चूतड़ों को सहला रहा था.. गोरी गोरी.. वेक्स की हुई चमकती टांगें.. मटकते नितंब.. पतली कमर.. सुराहीदार गर्दन और ब्राउन हाइलाइट्स वाले बाल जो फाल्गुनी के कंधों तक पहुँच रहे थे.. मदन बस उसे पीछे से देखता ही रह गया..!!





जैसे ही वह तीनों अंदर गए.. फाल्गुनी ने मुख्य दरवाजा बंद कर लिया और बोली "वेलकम मदन अंकल..!! आप पहली बार आए यहाँ.. पानी लेकर आऊँ आपके लिए?"

सामने के टेबल पर पड़ी व्हिस्की की बोतल देखकर ही मदन की आँखें चमक उठी "पानी तो नहीं पर आइसक्यूब और ग्लास लेकर आ..!! गला सूख रहा है"

फाल्गुनी मुस्कुराते हुए केबिनेट से ग्लास निकालकर, फ्रिज से बर्फ लेने गई तब राजेश ने कहा "चार ग्लास लेकर आना.. सब साथ पियेंगे"

ड्रॉइंग रूम में ए.सी. पहले से ही चल रहा था इसलिए अच्छी खासी ठंड फैल चुकी थी.. जो कुछ गर्माहट आ रही थी वो फाल्गुनी के सेक्सी जवान बदन से ही आ रही थी.. मदन और राजेश कुर्सियाँ खिंचकर, पैर पसारते हुए बैठ गए.. और फाल्गुनी टेबल पर ग्लास और आइसक्यूब का बॉक्स रखकर, थोड़ा सा नाश्ता निकालने के लिए प्लेटफ़ॉर्म की तरफ गई..

मदन की आँखें उसके बदन को कब से निहार रही थी और यह फाल्गुनी के ध्यान में भी था.. हालांकि राजेश ने यहाँ क्या होने वाला था उसके बारे में पहले ही जिक्र कर दिया था पर फिर भी फाल्गुनी को थोड़ा अटपटा सा लग रहा था.. मौसम के साथ जब वह कविता के घर वेकेशन में गई थी तब उनका हररोज मदन के घर आना जाना होता रहा था.. मदन की छवि उसके मन में केवल वैशाली के पिता के रूप में ही थी.. आज उसका नया ही रूप दिखने वाला था जिसे लेकर फाल्गुनी रोमांचित भी थी और घबराई हुई भी..

"अरे यार.. तुम लोग तो आते ही शुरू हो गए.." व्हिस्की की बोतल से पेग बनाते हुए राजेश को देखकर.. बाथरूम से बहार आई शीला ने कहा

"यार शीला.. आज हम सब मजे करने इकठ्ठा हुए है.. कोई लिमिट नहीं.. कोई परहेज नहीं.. बस मजे करने है..और शुरुआत करने का इससे बेहतर कोई ओर तरीका हो तो बता" राजेश ने एक ग्लास मदन को देते हुए शीला के सामने मुस्कुराते हुए कहा

"तरीका तो है.. इससे सौ गुना बेहतर" राजेश के लंड को शॉर्ट्स के ऊपर से दबाते हुए शीला ने कहा






"थोड़ा रंग जमने दे.. हम दोनों तो पहले ही गरम होकर आए है.. मदन और फाल्गुनी को भी हमारे रंग में रंग जाने दे.. फिर मज़ा आएगा"

शीला ने अपना दुपट्टा हटाकर सोफ़े पर फेंका और अपना ग्लास उठाकर बैठ गई.. और तब तक फाल्गुनी भी नाश्ते की प्लेटस लेकर आ पहुंची

"अरे वाह फाल्गुनी, तूने तो बढ़िया इंतेजाम कर रखा है" शीला ने खुश होते हुए कहा

"मैं तो रेस्टोरेंट से खाना भी पेक करवा कर ले आई हूँ.. जब भूख लगेगी तब माइक्रोवेव में गरम कर लेंगे.. क्या है की यह फार्महाउस मार्केट से दूर है.. ज़ोमेटो-स्वीगी कुछ नहीं आता यहाँ.. हमें कहीं बाहर जाने की जरूरत ही न पड़े इसलिए सब तैयारी कर रखी है" फाल्गुनी ने कहा

"और मेरे लिए तुम भी तैयार होकर बैठी हो.. हैं ना..!!" फाल्गुनी को खींचकर अपनी गोद में बैठाते हुए राजेश ने कहा

फाल्गुनी शरमा गई.. अब तक वो मदन और शीला के सामने सहज होने से हिचकिचा रही थी.. राजेश ने टीशर्ट के ऊपर से उसके स्तनों को मजबूती से रगड़ते हुए गालों को चूम लिया तो फाल्गुनी हड़बड़ा कर खड़ी हो गई..






"अगर भूख लगी हो तो मैं खाना गरम कर दूँ?" राजेश के चंगुल से छूटकर फाल्गुनी ने कहा

"मेरी जान.. गरम तो हम पहले से होकर ही आए है.. और फिलहाल अभी एक ही चीज की भूख है" राजेश ने फिर से फाल्गुनी को दबोचने की कोशिश की

शीला: "साले.. पूरे रास्ते गरम मुझे करता रहा और अब गर्मी निकालने की बारी आई तब फाल्गुनी को गोद में बैठा रहा है..!!"

राजेश ने फाल्गुनी को छोड़ दिया.. और अपना ग्लास खत्म कर टेबल पर रख दिया.. चलते हुए वह शीला के पास आया और उसके करीब बैठकर जांघों को सहलाने लग गया

"थोड़ी देर बैठकर दो-दो पेग लगाते है.. थोड़ा माहोल बन जाए फिर आगे की सोचेंगे.. चलो, सब अपने अपने ग्लास खत्म करो.. मैं सब के लिए दूसरा पेग बनाता हूँ" मदन ने कहा.. उसकी नजर अपने शिकार फाल्गुनी पर थी और वो देख रहा था की वह अब भी थोड़ा सा हिचकिचा रही थी.. वह चाहता था की शराब पीने के बाद फाल्गुनी थोड़ा सा खुलकर पेश आए..!!

राजेश अपना ग्लास पहले ही खत्म कर चुका था.. मदन की बात सुनते ही शीला ने बोटम्स-अप करते हुए अपना ग्लास खत्म कर दिया.. एक फाल्गुनी ही बची थी जो धीरे धीरे घूंट लगा रही थी.. राजेश शीला के नशीले बदन में उलझा हुआ था तब मदन फाल्गुनी के करीब आया और उसके कंधे पर हाथ रख दिया

"तुमने तो अभी आधा ग्लास भी पूरा नहीं किया" बातचीत शुरू करने के इरादे से मदन ने कहा

"मुझे इतनी जल्दी जल्दी पीने की आदत नहीं है, अंकल" फाल्गुनी ने जवाब दिया

"हर नई चीज की ऐसे ही शुरुआत होती है.. एक बार ट्राय करने पर.. चलो एक घूंट में खत्म करो अपना ड्रिंक" मदन का इशारा समझ गई फाल्गुनी.. उसके कहने पर एक ही घूंट में बाकी का ड्रिंक पीने की कोशिश करने पर तेजी से खाँसने लगी वो

खाँसती हुई फाल्गुनी की पीठ सहलाते हुए.. टीशर्ट के अंदर ब्रा की पट्टी से मदन की उँगलियाँ रगड़ खा गई..!! मदन के लंड में एक अजीब सी हलचल हो गई.. उसकी बेटी से भी कम उम्र थी फाल्गुनी की.. और इतनी सी उम्र में ही यह लड़की सुबोधकांत और राजेश दोनों को लपेट चुकी थी.. विश्वास नहीं हो रहा था मदन को..

पीठ पर हाथ सहलाते हुए मदन की हथेली अब थोड़ा सा नीचे फाल्गुनी की शॉर्ट्स तक पहुँच गया.. उसने अपना हाथ अंदर घुसाने की कोशिश की तो महीन सी पेन्टी का कपड़ा महसूस हुआ.. वो पेन्टी के अंदर हाथ डालने ही वाला था की...

"अंकल, अब दूसरा पेग बना दीजिए" फाल्गुनी ने मदन से कहा.. मदन समझ नहीं पाया की वो वाकई दूसरा पेग पीना चाहती थी या फिर चड्डी में अंदर घुसते उसके हाथ को रोकने के लिए उसने कहा था..

उसने अपना हाथ खींच लिया और फाल्गुनी के हाथ से ग्लास लेकर टेबल की तरफ गया.. टेबल की उस तरफ सोफ़े पर राजेश ने शीला को पूरा लेटा दिया था और खुद उस पर चढ़कर उसके शरीर से अपना जिस्म रगड़ रहा था.. दोनों ने अब तक अपने कपड़े उतारे नहीं थे..

उनकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए मदन अपना और फाल्गुनी का पेग बनाने लगा.. फाल्गुनी चकित होकर राजेश और शीला के बीच चल रहे उस खेल को देखती ही रही..!!

दोनों ग्लास में शराब भरकर मदन फाल्गुनी की तरफ आया.. राजेश-शीला की तरफ अचंभित होकर देख रही फाल्गुनी को देखकर उसे बड़ा मज़ा आया.. फाल्गुनी की तेज होती साँसों को वह देख पा रहा था.. "लड़की अब गरम हो रही है" उसने मन ही मन सोचा.. अपनी कुर्सी को करीब खींचकर वो फाल्गुनी के बिल्कुल बगल में बैठ गया और उसके हाथों में एक ग्लास थमा दिया..

ग्लास से एक सीप लेकर फाल्गुनी अब भी शीला और राजेश की तरफ देख रही थी.. खेल को अगले पड़ाव पर ले जाने के इरादे से मदन ने फाल्गुनी के कंधे पर हाथ रखते हुए अपनी ओर खींचा.. फाल्गुनी ने मदन को हल्के से धकेलते हुए खुद को उससे दूर कर दिया

"क्या हुआ फाल्गुनी?" ताज्जुब से मदन ने पूछा

"कुछ नहीं अंकल.. बस ऐसा लग रहा है की सब कुछ बहोत जल्दी जल्दी हो रहा है.. मुझे धीरे-धीरे आगे बढ़ने में ही मज़ा आता है.. एक काम करते है.. मैं म्यूज़िक चला देती हूँ.. सब मिलकर डांस करते है.. बहोत मज़ा आएगा" कहते हुए वह उठ खड़ी हुई और म्यूज़िक सिस्टम की ओर चल दी..

मदन का मुंह उतर गया.. उसे न तो डांस आता था और ना ही पसंद था.. पर फिलहाल फाल्गुनी के ताल से ताल मिलाने के अलावा ओर कोई चारा भी तो नहीं था..!!






म्यूज़िक चलाकर फाल्गुनी अपनी कमर मटकाते हुए मदन की ओर आई.. कुछ पल के लिए तो मदन को पता भी नहीं चला की कैसी प्रतिक्रिया दें..!! फाल्गुनी ने मदन का हाथ पकड़कर उसे कुर्सी से खड़ा किया और उसका हाथ पकड़कर अपनी कमर पर रख दिया.. अब वह एक एक स्टेप लेते हुए मदन का मार्गदर्शन कर रही थी.. धीरे धीरे मदन को भी मज़ा आने लगा.. टाइट टीशर्ट से दिख रही दोनों स्तनों के बीच की रेखा को ताड़ते हुए.. मदन भी ताल मिलाते हुए नाचने लगा

जैसे ही मदन ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर फाल्गुनी को नजदीक पाया, उसकी कमर में हाथ डालकर उसके और करीब आ गया.. उसने भी अपनी बाहे फाल्गुनी पर डाल दी और वह दोनों बिलकुल करीब होकर नाचने लगे.. उसकी मुलायम कमर को जैसे ही मदन के हाथ स्पर्श करने लगे, वो और भी पास आ गयी.. अब उसका एक हाथ उसके नितम्बों पर था और उसके वक्ष मदन के सीने से सटे हुए थे..

उसके गालों के पास अपने गाल लाकर मदन ने उसके कानों में कहा, "फाल्गुनी, आज तुम वाकई बहुत सुन्दर और प्यारी लग रही हो.."

"ओह, मदन अंकल, थैंक यू, वैसे आप भी बड़े प्यारे हो," उसने धीमी आवाज़ में कहा..

अब मदन की गर्म साँसे उसकी गर्दन, गाल और कंधों से टकराने लगी.. वो मदन के और पास आ गयी, अब तो उसके स्तन और कठोर स्तनाग्र मुझे छूने लगे..

"फाल्गुनी, मेरे साथ नाचते हुए अच्छा लग रहा हैं न तुम्हे?"

"हां अंकल, आई एम एनजोइंग .."

अब मदन ने अपने गालों से उसके गोरे गालों को स्पर्श किया.. फाल्गुनी के मुँह से एक आह निकली..

उसने नज़र घुमाकर देखा तो राजेश और शीला एक दुसरे से लिपट कर मस्त थे.. राजेश शीला के गालों पर और गर्दन पर चुम्बन किये जा रहा था और शीला अपने भरे हुए स्तन उसकी छाती पर दबा रही थी.. देखकर फाल्गुनी स्तब्ध रह गई.. हालांकि राजेश ने उसे बताया था की वह दोनों कपल्स अपने पार्टनर्स की अदला-बदली का खेल खेलते आए है, उसके लिए यह पहला मौका था की एक पत्नी को अपने पति के सामने ही किसी गैर मर्द से संबंध बनाते हुए देख रही हो

"वो दोनों...." फाल्गुनी आगे कुछ कह पाती उसके पहले मदन ने कह दिया, "उनको एन्जॉय करने दो, हम भी एन्जॉय करेंगे!"

फाल्गुनी ने कहा "आप को अटपटा सा नहीं लगता!! आपकी बीवी किसी पराये मर्द के साथ और वो भी आपकी आँखों के सामने"

मदन ने मुस्कुराकर जवाब दिया "देख फाल्गुनी, जब यह खेल खेलते हुए तुम्हें सालों का अनुभव हो जाएगा तब तुम्हें महसूस होगा की सेक्स को जितना खुलकर इन्जॉय करो उतना ही ज्यादा मज़ा आता है.. और मेरा मानना है की अगर सब की सहमति हो तो ऐसा करने में कुछ भी गलत नहीं है"

मदन ने फाल्गुनी के गर्दन को हलके से चूमा, और अब वो मुझसे पूरी तरह लिपट गयी.. दोनों डांस करते करते एक दूसरे की बाहों में आ गए थे..

"फाल्गु, तुम्हे अच्छा लग रहा हैं न?

"हां अंकल, आप बड़े हॉट हो.."

"तुम भी बहुत हॉट और सेक्सी हो फाल्गु.."

न जाने मदन ने फाल्गुनी को फाल्गु नाम से क्यों पुकारा, मगर वो उसे अच्छा लगने लगा..

अब मदन के दोनो हाथ उसकी पीठ और कमर पर फिर रहे थे और मदन ने हिम्मत करके उसके गालों को चूमना शुरू किया..

"आह अंकल, कितना अच्छा लग रहा हैं, उफ्फ़.."

अब मदन ने सोचा.. यही मौका है.. और उसका चेहरा उठाकर उसके रसीले होठों पर अपने होंठ रख दिए..

फाल्गुनी ने भी अब मदन के चुम्बन का जवाब दिया और मदन के होठों को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी.. मदन ने उसे बाहोंमे जकड लिया और मदन के हाथ उसके मिनी स्कर्ट को उठाकर उसकी नितम्बों की गोलाईयाँ नापने लगे.. धीरे धीरे वह दोनों राजेश और शीला से दूर गए और फिर दोनों की जीभ का आपस में प्यार शुरू हुआ..

फाल्गुनी को चूमते हुए अब मदन ने एक हाथ उसके कड़े स्तनों पर रखके उसे सहलाने लगा..

"शीला आंटी के मुकाबले मेरे आपको छोटे लगते होंगे, हैं न अंकल?"

"नहीं फाल्गु, मुझे बहुत सेक्सी और मस्त लगते हैं ये.."

"ओह, आह, मदन, यू आर सो स्वीट..!!"

"फाल्गु डार्लिंग, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, और सेक्सी भी.. आह, कितने कठोर और प्यारे मम्मे हैं तुम्हारे, आहहह.."

मदन और फाल्गु ऐसे ही सहलाते और चूमते हुए कुछ देर तक उत्तेजित होते रहे.. उसका दिल जोरों से धड़क रहा था.. फाल्गुनी भी अब मदन को अंकल कहने के बजाए नाम से बुलाने लगी थी

"मैंने आज तक कभी ऐसा महसूस नहीं किया हैं, मदन, मतलब सेक्स की बात नहीं कर रही.... ऐसा ग्रुप में करना.. मेरे लिए पहली बार है" फाल्गुनी ने कहा..

अब मदन और फाल्गुनी दोनों एक दुसरे को सहलाते और चूमते हुए मदहोश हो गए थे.. मदन का कड़क लंड उसकी चूत पर दब रहा था.. मदन ने देखा की फाल्गुनी भी अब अपनी चूत उसके लोडे पर दबा रही थी, जैसे की चोदने का संकेत दे रही हो.. मगर वह बहुत सावधानी से काम ले रहा था क्योंकि फाल्गुनी बेहद नाजुक थी..


ऐसे ही मस्ती का दौर चलता गया.. अब राजेश और शीला भी उठकर, इन दोनों के साथ डांस करने लगे..

कुछ देर बाद, वह चारो एक साथ सोफ़े पर बैठे हुए थे.. मदन से करीब आने के बाद, फाल्गुनी बहुत खुश लग रही थी और उसके चेहरे पर कोई अपराध की भावना बिलकुल नहीं थी.. क्योंकी मदन-शीला और राजेश काफी स्वाभाविक लग रहे थे, इसलिए मदन के साथ मस्ती करके उसे भी मज़ा आने लगा था..

हँसते हुए राजेश ने कहा, "यार मदन, बड़ा मज़ा आया शीला के साथ रोमांटिक डांस करते हुए.. क्या शीला, तुम्हे कैसे लगा?"

"मुझे तो रोमांटिक डांस हमेशा ही अच्छा लगता हैं, और तुम तो हो भी इतने हैंडसम!" खिलखिलाते हुए शीला ने कहा..

"हां यार, मुझे और फाल्गु को, मतलब फाल्गुनी को भी बड़ा मज़ा आया.. वो भी बहुत अच्छी डांसर है," मदन ने सहज भाव से कह दिया..

"तुम भी कुछ बताओ फाल्गुनी, तुम्हे कैसा लगा," राजेश उसकी आंखों में आँखे डाल कह रहा था..

"ओह राजेश अंकल, मुझे इतना मज़ा आज तक कभी नहीं आया था.. मदन अंकल ने मेरा बहुत अच्छा ख़याल रखा, वो बहुत ही अच्छे डांसिंग पार्टनर हैं.."

फिर मदन फाल्गुनी के और राजेश शीला के कमर में हाथ डालकर बैठ गया और शराब का दौर एक बार और हुआ.. अब फाल्गुनी को काफी चढ़ चुकी थी.. भूख लग रही थी.... इसलिए चारों ने साथ बैठकर खाना खाया

खाना खाने के बाद फाल्गुनी उठी और कहा "मैं नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.... शराब कुछ ज्यादा ही चढ़ गई है.... मैं पंद्रह मिनट मे तैयार होकर आती हूँ, ठीक है मेरे प्यारे मदन अंकल"

मदन ने मुस्कुराते हुए कहा "आराम से फ्रेश होकर आ जाओ स्वीटी.... मैं इंतज़ार करूंगा"

राजेश: "अरे यार, मेरे एक विदेश के क्लाइंट के साथ ऑनलाइन मीटिंग है.... हमारी रात होती है तब उनका सवेरा होता है.... मैं फटाफट वो निपटा लेटा हूँ" कहते हुए उसने अपनी उतारी हुई टी-शर्ट पहन ली और दरवाजा खोलकर बाहर गार्डेन मे चला गया

अब शीला और मदन अकेले थे

"क्या क्या किया तुमने अपनी फाल्गु, ओह सॉरी फाल्गुनी के साथ?" मदन की बाहों मे आते हुए शीला ने पूछा..

"कुछ ज्यादा नहीं, बस किस किया और गले लगाया.. थोड़ा उसकी गांड पर हाथ फिरा लिया, बस.. और राजेश ने तुम्हारे साथ क्या क्या किया मेरी जान?"

"खड़े खड़े और नाचते हुए जो कुछ कर सकता था, सब कुछ किया सालें ने.. तेरे सामने ही तो थे हम दोनों.. पर तेरी नजर फाल्गुनी से हटे तब हम दिखें न.. बार बार उन रातों को याद कर रहा था जब वो मुझे आकर हमारे ही घर में चोदता था.. फिर से चोदने के लिए बेताब हैं साला.."

"यार, फाल्गु की गोरी गोरी जाँघे मस्त दिख रही थी.. उन्हें चूमूंगा और फिर उसकी चूत चाटूँगा," शीला के बबलों को मसलते हुए मदन कह रहा था..

शीला और मदन एक दूसरे के जिस्मों से खेलते रहे और शराब के जाम पर जाम खाली करते गए

तभी फाल्गुनी पारदर्शक गाउन पहनकर बाहर आई.... जिसकी लंबाई मुश्किल से उसकी चूत को ढँक रही थी.... उसकी वेक्स की हुई चिकनी गोरी जांघें मस्त लग रही थी

फाल्गुनी की गोरी गोरी जांघें देखकर मदन का लंड उसे सलामी देने लगा..

"यार आज कुछ ज्यादा ही गर्मी हैं," कहकर मदन ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और फिर बोला "लगता है राजेश को आने मे देर लगेगी.... तब तक हम तीनों तो शुरुआत करें"

शीला: "हाँ, यह भी सही है.. चलो अंदर बेडरूम मे चलते है"

तीनों अंदर वाले बेडरूम मे गए जहां मदन ने फाल्गुनी को खींचकर "ओह फाल्गु, तुम कितनी स्वीट और सेक्सी हो," कहते हुए उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया..

फाल्गु को चूमते और सहलाते हुए मदन ने उसको स्तनों को मसलना शुरू किया.. अब मदन पलटकर ऊपर आ गया और फाल्गु को नीचे लिटा दिया..








"ओह फाल्गु, कितने मस्त हैं तुम्हारे ये मम्मे," मदन उसके निप्पल्स को चूसते हुए बोला..

अब शीला मदन की पीठ और गांड पर अपने बड़े बड़े स्तनों का स्पर्श करके मदन को और भी उत्तेजित कर रही थी.. मदन को बीचमें लिटाकर शीला और फाल्गु मदन के एक एक निप्पल को चाटने लगी..






मदन दोनों की पीठ पर हाथ फिराकर बोले जा रहा था, "आह, कितना अच्छे से चूस रही हो दोनों.. ओह शीला रानी, कितना मज़ा आ रहा है आज तो! ओ फाल्गु, जब से तुम्हारे साथ डांस किया था तबसे तुम्हे चोदने की इच्छा हो रही हैं, आह...."

शीला नीचे सरककर मदन के लौड़े के मुँहमें लेकर प्यार से चूसने लगी और मदन ने फाल्गु को ऊपर की तरफ खींचकर फिरसे उसके स्तनों को बारी बारी पीने लगा.. उसके मुख से गर्म साँसे और आहे निकल रही थी..








"आह, मदन, ऐसे ही चूसे जाओ.. मेरे यह बूब्स चूसो, कितना मज़ा आ रहा हैं, आह, आज तो बहुत कुछ नया नया करने को मिल रहा है!"

फाल्गुनी के स्तनों को मसलते हुए मदन ने उठकर उसको पीठ के बल लिटा दिया और उसकी जाँघे खोलकर उसकी गुलाबी योनि चाटने लगा.. शीला फाल्गुनी का एक स्तन मुँह में लेकर चूसने लगी.. जैसे ही फाल्गुनी को पता चला की मदन उसकी चूत चाट रहा है और सेक्सी शीला आंटी उसके बबलों को चूस रही हैं, फाल्गुनी के मुँहसे एक जबरदस्त आह निकली..








उसने शीला को अपने बूब्स पर दबा दिया और चिल्लाने लगी, "ओह, आह, मदन, शीला, तुम दोनों कितने हॉट हो, चाटो मुझे.. वहाँ नीचे... आह..., ऐसे ही, ओह माय गॉड, तुम कितनी हॉट और सेक्सी हो, आह, मदन, चाटो वहीँ पर, आह , हाँ मेरा दाना भी चूसते रहो, ऐसे ही...."

चूत चाटने के साथ मदन ने पहले एक और फिर दो उंगलिया उसकी चूत में डालकर अंदर बाहर करना शुरू कर दिया.. अब तो फाल्गुनी और भी ज्यादा उत्तेजित हो गयी..






"ओहहऽऽऽ........ आहहहऽऽ........ ओह, माय गाडऽऽऽ...... येसऽऽऽ........ मदन, चोदो मुझे, ओह, याऽऽऽऽ......ओह, फक शीला, येसऽऽऽ.........."

शीला ने अपना दायाँ स्तन फाल्गु के मुँह मे दिया और वो जोर-जोर से चूसने लगी.. तभी मदन ने फाल्गु की टाँगे खोलकर उसकी चूत पर अपने लंड का सुपाड़ा रगड़ा.. रसदार चिपचिपे छेद में जल्दी से लौड़े को अंदर घुसाया और फाल्गु को चोदने लग गया..






फाल्गु चिल्लाती रह गयी, "ओह फक, मदन! फक मीऽऽऽ...... फक मी हार्ड, और जोर से , आह...... ओहह येससऽऽ...... आय ऍम सो वेट, ओह मदन, कम इनसाइड मी.. उफ्फ़..!!"

लगातार दस मिनट तक फाल्गुनी को चोदने के बाद मदन ने शीला को नीचे लिटाया और उसकी गीली और रसीली बुर चोदने लगा.. उस वक़्त शीला ने खींचकर फाल्गुनी को अपने मुँह पर बिठा दिया और शीला अपनी जीभ और होठों से फाल्गु की चूत और दाना चाटती और चूसती रही.. शीला को चोदते हुए मदन, शीला के मुंह पर सवार फाल्गुनी को चूमे जा रहा था..






आखिर जब मदन झड़ने को तैयार था, तब मदन ने फाल्गु से पूंछा, "मेरा वीर्य मुँह में लोगी क्या, फाल्गु डार्लिंग?"

वो उठकर करीब आयी और अपना मुँह खोलकर मदन के लंड के सामने आ गयी.. जैसे ही मदन ने पिचकारी मारी, उसने सारा वीर्य अंदर ले लिया..






उतने में शीला ने फाल्गु को होंठ चूसते हुए थोड़ा वीर्य चाट लिया.. अब दोनों मिलकर बारी बारी मदन के लंड को चाटती और चूसती गयी.. वीर्य की आखरी बूँद तक पी डाली..





मदन खत्म होकर बिस्तर पर ढेर हो गया और तभी राजेश की एंट्री हुई

राजेश: "यार तुम लोग तो मेरे बगैर ही शुरू हो गए!!"

शीला: "क्या करते.. तुझे चुदाई से ज्यादा अपने काम मे इन्टरेस्ट था तो हम कब तक तेरा इंतज़ार करते रहते..!! वैसे ज्यादा देर नहीं हुई, हमारा तवा तो अब भी एकदम गरम ही है, क्यों फाल्गुनी, तू तैयार है ना..!!"

फाल्गुनी कुछ बोलती उससे पहले राजेश ने अपनी टीशर्ट और शॉर्ट्स उतार दी और नंगा हो गया....

राजेश: "लगता है, अभी के लिए मदन का काम तमाम हो गया है.. हम तीनों बगल वाले कमरे मे चलते है.. मदन को आराम करने दो.."

राजेश ने फाल्गुनी को अपनी गोद मे उठा लिया और शीला के साथ तीनों बगल वाले कमरे मे आ गए

उस बेडरूम मे जाते ही, राजेश ने फाल्गुनी को बेड पर लेटा दिया और शीला को कंधों से दबाते हुए नीचे फर्श पर बिठाकर अपना लोडा उसके मुंह मे दे दिया.. शीला ने बिना वक्त गँवाए राजेश का लंड चूसना शुरू कर दिया.. बिस्तर पर लेटी हुई कमसिन फाल्गुनी की गुलाबी तनी हुई निप्पलों को राजेश मसल रहा था और फाल्गुनी बेड पर ही मचल रही थी






चूस चूस कर शीला ने एक ही मिनट में राजेश का लंड, खंबे जैसा सख्त कर दिया.. उसकी लार से लसलसित लंड बल्ब के प्रकाश में चमक रहा था..

अब राजेश बेड पर आ गया.. उसने फाल्गुनी की जांघें खोली और अपनी लपलपाती जीभ उस नाजुक मुनिया पर चलाने लगा.. शीला फाल्गुनी के बगल मे आकर लेट गई






जैसे ही राजेश की जीभ और होंठ फाल्गुनी की चूत और क्लिटोरिस को छेड़ने लगे, फाल्गुनी जोर से आहे भरने लगी और उसने बगल में लेटी हुई शीला का हाथ पकड़ लिया..

फाल्गुनी ने हाँफते हुए कहा, "आप ऐसे चाट रहे हो, मुझे सुबोध अंकल की याद आ जाती है, बड़ा मजा आता हैं आह आह......"

शीला: "सुबोधकान्त भी ऐसे ही चाटते थे तेरी?"

फाल्गुनी ने कहा "हाँ आंटी, जबरदस्त चाटते थे, शुरू शुरू में जब तक हमने पूरी चुदाई शुरू नहीं की थी तब वो चाटकर ही मेरा पानी निकाल देते थे"

राजेश फाल्गुनी की चूत की गुलाबी परतों को चाटते हुए शीला के मम्मों को मसल रहा था






शीला फाल्गुनी की कडक स्तनों को सहला रही थी और वो भी मदहोश हो जा रही थी.. फाल्गुनी अपने छूताड़ उछाल उछालकर अपनी चूत को राजेश के होंठों से दबा रही थी

राजेश: "शीला, तुम भी इसकी रसीली चूत को चाटकर देखो तुम्हें भी बहुत मजा आएगा!"

यह सुनते ही शीला फट से उठी और फाल्गुनी की जांघों के बीच जगह ले ली.. राजेश बेड से उठा और अपना लंड फाल्गुनी के मुख की ओर ले गया.. अपने सुपाड़े को फाल्गुनी के होंठों पर रगड़ते ही फाल्गुनी ने उसके लंड को मुठ्ठी में पकड़कर चूसना शुरू कर दिया

अनुभवी शीला की जीभ, फाल्गुनी की चूत के अंदरूनी हिस्सों में घुसकर ऐसे चाट रही थी की एक ही मिनट मे फाल्गुनी ने अपना पानी शीला के मुंह मे छोड़ दिया.. राजेश का लंड चूसते हुए सिहर रही थी फाल्गुनी






अब राजेश से और रहा नहीं गया.. उसने शीला को फाल्गुनी की चूत से हटाया और खुद बैठ गया.. अपने सुपाड़े को उस गीली दरार पर एक दो बार रगड़कर उसने हल्के से धक्का दिया और फाल्गुनी की सिसकियों के बीच उसने पूरा लंड उसकी चूत मे दे मारा....

राजेश अब धक्के पर धक्का लगा रहा था उस टाइट चूत में....

शीला की अंगीठी भी अब फिर से गरम हो चली थी.. राजेश फाल्गुनी को चोदता रहे और वो बैठे बैठे देखती रहें ऐसा तो हो नहीं सकता.. वो अब बेड पर खड़ी हो गई और कराह रही फाल्गुनी के चेहरे के दोनों तरफ अपने पैर जमा लिए..






अपने चूतड़ों को नीचे लाते हुए उसने अपना गरम भोसड़ा फाल्गुनी के होंठों पर रख दिया

फाल्गुनी ने इससे पहले मौसम और वैशाली की चूत को ही चाटा था.. ऐसे अनुभवी भोसड़े को इतने करीब से देखने का यह पहला मौका था उसके लिए.. बड़े ही कौतूहल से वो इस विराट गुफा के दर्शन कर रही थी की तब शीला ने उसके सर को पकड़कर अपने भोसड़े को फाल्गुनी के होंठों पर रगड़ना शुरू कर दिया

नीचे के छेद मे राजेश धनाधान शॉट लगा रहा था और ऊपर शीला अपने भोसड़े से उसका दम घोंट रही थी.. फाल्गुनी को बड़ा मज़ा आ रहा था..






राजेश अब पूरी ताकत से धक्के पर धक्के लगा रहा था और फाल्गुनी भी अपनी गांड उछाल उछाल कर उसका जोश बढ़ा रही थी..

अपना भोसड़ा चटवाते हुए शीला अब बेहद गरम हो गई थी और वो जानती थी की अनुभवहीन फाल्गुनी चाटकर उसे स्खलित नहीं कर पाएगी.. अब उसकी गुफा भी लंड का भोग मांग रही थी

शीला अब फाल्गुनी के शरीर से नीचे उतरी और उसके बगल में फिर से लेट गई.. अब उसने राजेश को हाथों से अपनी ओर खींचा.. राजेश समझ गया की शीला क्या चाहती थी.. फाल्गुनी की चूत मे एक आखिरी धक्का लगाकर उसने अपना लंड पुच से बाहर निकाल लिया

राजेश शीला के भोसड़े को पेलता उससे पहले शीला ने उसे अपने ऊपर खींच लिया और फाल्गुनी के चूत रस से गीले लोड़े को अपने दोनों महाकाय बबलों के बीच दबा दिया..






राजेश को इशारा मिल गया और वो शीला के थनों को चोदने लगा.. फाल्गुनी बड़े ही अचरज से यह द्रश्य देखने लगी.. हालांकि उसने इस बारे में सुना तो था पर कभी प्रयोग नहीं कर पाई थी.. ऐसे स्तन-संभोग के लिए शीला आंटी जैसे बड़े स्तन जो नहीं थे उसके पास..!!!

शीला के मांसल गोलों के बीच लंड घुसाकर राजेश को बड़ा मज़ा आ रहा था

तभी मदन ने कमरे मे प्रवेश किया.. वह नंगे बदन ही बिस्तर के पास आया और यहाँ का द्रश्य देखकर उसका सुस्त लोडा फिर से तन्नाने लगा

उसने राजेश और शीला की ओर देखा और बगल मे जांघें फैलाएं लेटी फाल्गुनी की ओर देखते ही उससे रहा नहीं गया

परोसी हुई थाली जैसी फाल्गुनी की चूत पर मदन ने तुरंत अपना सुपाड़ा रख दिया.. एक धक्के मे ही उसकी गीली मुनिया मे मदन का लोडा घुस गया..

इस तरफ राजेश शीला के बबले चोद रहा था और दूसरी तरफ मदन, फाल्गुनी की चूत में पंप पर पंप लगाए जा रहा था.. उन दोनों की चुदाई देखते हुए शीला अपनी तीन उँगलियाँ अपने भोसड़े मे पेले जा रही थी








जब शीला से और रहा न गया तब उसने राजेश को इशारे से अपने नीचे वाले छेद की खातिरदारी करने को कहा

राजेश नीचे की ओर गया और लंड पेलने से पहले उसने अपनी जीभ से उस गदराए भोसड़े का स्वाद लिया.... लसलसित गरम भोसड़ा हवस भरी भांप छोड़ रहा था.. अपनी उंगलियों को शीला की चूतरस से गीला करके उसने अपने लंड को चिपचिपा कर दिया.. और फिर शीला की अंगीठी में अपना लकड़ीनुमा लंड घुसेड़ दिया

फाल्गुनी और शीला अगल-बगल मे लेटी हुई थी और दोनों मर्द मिशनरी ढंग से उन्हें पेले जा रहे थे॥ बड़ा ही अनोखा द्रश्य था..!!






फाल्गुनी के मस्त स्तनों को दबाते हुए मदन का शरीर अकड़ने लगा.. और कुछ ही देर मे उसके लंड ने वीर्य की पिचकारी से उस नाजुक बाला की कमसिन चूत को पावन कर दिया.. झड़ने के बाद वो फाल्गुनी की छाती पर ढेर हो गया तब राजेश अब भी शीला के भोसड़े में शॉट पर शॉट लगा रहा था और शीला भी चुदते हुए अपने दाने को खुद ही रगड़ रही थी





एक चीख के साथ शीला झड़ी.. उसकी जांघें थरथराने लगी.. वह अपनी निप्पलों को जोर जोर से खींचने लगी और साथ ही अपनी मुठ्ठियों को बिस्तर पर पटकने लगी.. शीला की हरकतें देखकर, राजेश से और बर्दाश्त न हुआ और उसने भी शीला की परम गुफा मे अपना वीर्य अर्पण कर दिया..





इस संभोग से शीला इतनी थक गई की वो बिना कुछ साफ किए, वहीं बेड पर ढेर हो गई और एक मिनट में खर्राटे मारने लगी

शीला की नींद खराब न हो इसलिए तीनों बगल वाले बेडरूम मे चले गए और चुदाई की थकान उतारने लगे..

आधे घंटे तक आराम करने के बाद राजेश ने कहा

राजेश: "चल यार मदन.. एक एक पेग हो जाए.. मेरी तो सारी उतर गई..

राजेश और मदन के साथ फाल्गुनी भी उठ खड़ी हुई

तीनों ड्रॉइंगरूम के पास बने टेबल पर पहुंचे.. मदन ने तीनों के लिए एक ड्रिंक बनाया और सब को एक एक ग्लास दिया.. राजेश तो बोटम्स-अप करके एक घूंट में पूरा ड्रिंक पी गया

मदन: "क्या कर रहा है यार!!"

राजेश: "मुझे तो आदत है ऐसे पीने की"

फाल्गुनी: "मैं भी ट्राय करती हूँ"

इससे पहले के मदन या राजेश उसे रोकते, फाल्गुनी ने पूरा ड्रिंक अपने हलक के नीचे उतार दिया.. एक पल के लिए तो उसकी सांस अटक गई.. फिर वो बेतहाशा खाँसने लगी.. मदन तुरंत उसके लिए पानी लेकर आया.. दो घूंट पानी पीने के बाद अब फाल्गुनी को कुछ अच्छा लग रहा था

राजेश ने हँसते हुए कहा "कौआ चला हंस की चाल और अपनी चाल ही भूल बैठा"

फाल्गुनी ने नाराज होने की एक्टिंग करते हुए कहा "मैं आपको कौए जैसी दिखती हूँ क्या..!!"

मदन ने प्यार से उसके गालों को सहलाते हुए कहा "अरे नहीं नहीं.. तू तो कोयल है कोयल"

राजेश दूसरा ड्रिंक बनाने लगा और मदन पीछे से फाल्गुनी के चूतड़ों के बीच की दरार पर अपना लंड रगड़ते हुए उसकी गर्दन पर चूमने लगा

करीब ५ मिनट बाद मदन ने फाल्गुनी को अपनी गोदी में उठा लिया.. फाल्गुनी ने भी मदन को कमर पर अपने पैरों को नागिन की तरह लपेट लिया..

अब मदन फाल्गुनी को सोफे पर ले आया जहां उसने फाल्गुनी को अपना लंड डाले हुए ही सोफे पर गिरा दिया और चूत में लंड अंदर बाहर करना जारी रखा.. मदन इस बार बड़े ही आराम से फाल्गुनी के बदन का लुत्फ उठाना चाहता था.. फाल्गुनी को कुछ देर चोदने के बाद मदन ने लंड डाले हुए ही फाल्गुनी को अपने ऊपर ले लिया और वह सोफे पर बैठ गया.. फाल्गुनी उसके उपर बैठ गई और मदन के होंठों को चूसने लगी..








मदन उसकी गोरी चिकनी पीठ पर हाथ घुमा रहा था..

तभी राजेश बेडरूम से बाहर आया और फाल्गुनी के करीब आकर खड़ा हो गया.. उसने फाल्गुनी के चूतड़ पर एक हल्की सी चपत लगाई.. मदन के लंड पर उछल रही फाल्गुनी ने पलटकर राजेश की ओर देखा और बोली "यह क्या कर रहे हो?"

राजेश ने मुस्कुराते हुए अपना लंड फाल्गुनी की गांड के छेद पर रखते हुए कहा "क्यों..!! एक ही तरफ से मजे लोगी?" और उसने फाल्गुनी की गांड के सुराख पर लन्ड रख कर अंदर दबाया.. अभी सुपाड़े का अग्र भाग अंदर गया भी नहीं था कि फाल्गुनी दर्द से मिमियाने लगी....






फाल्गुनी ने राजेश को रुकने के लिए कहा..

राजेश: "यार ये पहली बार थोड़े ले रही हो.. !! हम पहले भी कर चुके है पीछे.... आज अचानक क्यों दर्द होने लगा?"

फाल्गुनी: "अंकल, इससे पहले हमने पीछे किया तब आगे कुछ घुसा हुआ नहीं था.... आप अभी मेरा हाल तो देखिए....!! मदन अंकल का लंड जड़ तक अंदर घुसा हुआ है.... इसलिए पीछे डालने पर दर्द हो रहा है"

राजेश: "देख फाल्गुनी, कोई भी चीज पहली बार करने पर दर्द तो होता ही है.... इतना अनुभव तो अब तुझे भी है.... मैं थोड़ा आराम से डालता हूँ....!!"

राजेश ने सुपाड़ा बाहर खींच लिया और अपने थूक से उसे गीला कर दिया....

राजेश: "मदन, तू कुछ देर के लिए धक्के लगाना बंद कर.... ताकि मैं इसके पीछे डाल सकूँ.... !! एक बार मेरा घुस जाएँ बाद में हम दोनों एक साथ धक्के लगाएंगे...... आह्ह फिर देखना.... कितना मज़ा आएगा फाल्गुनी.... !!"

मदन ने धक्के लगाना बंद कर दिया.... फाल्गुनी के चूतड़ स्थिर होते ही राजेश ने अपना गीला सुपाड़ा फाल्गुनी की गांड के छेद पर रख दिया और एक धक्का लगाया

फाल्गुनी दर्द से कराह उठी "ऊईईई माँ.... बाहर निकाल लीजिए अंकल.... बहुत दुख रहा है"

लेकिन अब वो कहां रुकने वाला था…!! उसने दो-तीन बार धीरे-धीरे करके अपना लंड फाल्गुनी की गांड में पूरी तरह डाल ही दिया.. अब फाल्गुनी की दोनों तरफ से चुदाई शुरू हो गई.. शुरुआती दर्द के बाद, फाल्गुनी की गांड अब आदि हो गई और वह पतली लड़की बड़े मजे से दो दो लंड लेते हुए सेंडविच मुद्रा में चुदवाने लगी..

राजेश-मदन दोनों के ही लंड उसकी गांड और चूत में थे..






मदन फाल्गुनी को नीचे से पेलता … उधर राजेश गांड में पूरे जोर से अपना लन्ड देता.. इस डबल चुदाई में अब फाल्गुनी को बहुत ही मजा आने लगा था और वो दोनों का साथ दे रही थी.. दोनों फाल्गुनी के शरीर पर अपने हाथ भी चला रहे थे.. राजेश ने उसकी गांड, कमर, और पीठ पर हाथ जमाए रखा था.. उधर मदन ने फाल्गुनी के चेहरे और स्तनों पर अपना हाथ दबा रखा था..

राजेश पूरे जोश में था, वह पूरे जोर से फाल्गुनी की गांड में अपना लन्ड पेल रहा था.. १० मिनट की घनघोर चुदाई के बाद दोनों हल्का हल्का हांफने लगे थे,

फाल्गुनी की गुलाबी चूत बहने लगी थी, उनके लंड पूरी तरह गीले हो गए थे..

राजेश और मदन दोनों ने आपस में कहा- "चलो अब जल्दी निकालते हैं.." और दोनों पूरी ताकत से मेरी चूत और गांड मारने लगे.. फाल्गुनी भी दोनों का पूरी तरह साथ दे रही थी, दोनों को उकसाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थी..






अब फाल्गुनी के मुंह से सिसकियों की आवाज़े आने लगी थी- आह आह आह..!

मदन ने अब फाल्गुनी के होंठों को अपने दांतों से पकड़ लिया और चूसने लगा.. उधर राजेश फाल्गुनी के बालों को पकड़ कर खींचते हुए चोदे जा रहा था.. फाल्गुनी के बूब्स पूरी तरह मदन की छाती से दब गए थे और वे दोनों इसी तरह फाल्गुनी को चोद रहे थे..

आखिर १५-२० धक्कों के बाद सब से पहले राजेश ने फाल्गुनी की गांड को अपने गुनगुने वीर्य से गीला कर दिया तो थोड़ी ही देर में मदन ने फाल्गुनी की बच्चेदानी पर अपने वीर्य का अभिषेक कर दिया..






दोनों ने हंसते हुए फाल्गुनी को सेंडविच बनाकर अपने सीने से लगा लिया..

फाल्गुनी पीछे हाथ करते हुए राजेश के सर को सहला रही थी, दूसरे हाथ से मदन के सर को! कुछ देर बाद जब वो भी थोड़ा नॉर्मल हुई.. दोनों मर्दों के लंड धीरे धीरे सिकुड़ कर उसकी चूत और गांड से निकल गए..

फिर फाल्गुनी ने दोनों के गालों पर एक-एक किस करते हुए कहा "मैं फ्रेश होकर आती हूँ.."

वो बाथरूम चली गई फ्रेश होने के लिए.. वापिस लौटकर वो दोनों के बीच जाकर बैठ गई.. तीनों ने एक एक पेग शराब और पी.. फाल्गुनी ने म्यूज़िक चला दिया और वह तीनों संगीत के ताल पर झूमते हुए शराब पी रहे थे..

फाल्गुनी ने केवल एक टी-शर्ट पहन रखा था.. नीचे न ब्रा थी और ना ही पेन्टी.. केवल एक टाइट टी-शर्ट..

राजेश ने मदन से कहा- "मदन … उठा इसे और ले चल बेडरूम में!"

मदन ने फाल्गुनी को झुक कर उठा लिया.. उसने फाल्गुनी को कंधे पर टांग रखा था.. मदन फाल्गुनी को लेकर बेडरूम की ओर निकल पड़ा.. राजेश भी पीछे पीछे आ गया.. बेड के पास जाकर मदन ने फाल्गुनी को उतारा.. फाल्गुनी जल्दी से मदन से दूर हुई..

उधर राजेश भी बेड तक आ चुका था..

राजेश पीछे आकर बैठ गया और पीछे से फाल्गुनी की पीठ को सहलाते हुए उसने उसकी टी-शर्ट को उतार दिया और उसकी नंगी गोरी पीठ को चाटने लगा.. तीनों नंगे ही बेड पर थे..

फाल्गुनी को बेड पर बिठाकर दोनों उसके दायें बाएं बैठ गए.. मदन फाल्गुनी के चेहरे पर किस करते हुए अपने दोनों हाथों से फाल्गुनी के बूब्स को जोर-जोर से दबाने में लग गया.. फाल्गुनी अपने मुंह से सिसकारियां निकाल रही थी..

राजेश थोड़ा पीछे होकर टिक कर बैठ गया और फाल्गुनी को इशारा करते हुए कहा "इसे मुंह मे लेकर खड़ा कर फाल्गुनी.... तुझे चोदते हुए मेरा तो जी ही नहीं भर रहा.."

फाल्गुनी ने पलटकर राजेश की तरफ अपना मुंह कर लिया और डॉगी स्टाइल में राजेश के लंड को जीभ से चाटने लगी.. कुछ ही पल में राजेश के लन्ड को अपने मुंह में ले लिया.. राजेश अपने हाथों को फाल्गुनी के सर पर रख कर अपना लंड फाल्गुनी के मुंह में अंदर बाहर कर रहा था..

उधर मदन ने भी पीछे से फाल्गुनी की गांड पकड़ते हुए उसकी पीठ चूम लिया और अपना लंड उसकी गांड में डाल दिया.. एक बार अच्छी तरह गांड ठुकाई हो जाने के कारण, वह छेद फेला हुआ था.. थोड़ी कोशिश के बाद मदन को लंड उसकी गांड के छेद के अंदर घुसाने मे सफलता मिल गई और वो अंदर बाहर करने लगा..

दोनों मर्द दो दो बार झड़ चुके थे इसलिए इस राउंड में दोनों को टाइम भी काफी लगना था.. मदन फाल्गुनी की गांड मारे जा रहा था लेकिन उसका निकलने का नाम नहीं ले रहा था.. काफी देर बाद मदन की स्पीड बढ़ने लगी.. लेकिन उसने तभी अपने आप को रोक लिया और लंड को गांड से बाहर निकाल लिया..

मदन: "राजेश, तुम लेट जाओ! फाल्गुनी, अब तुम राजेश के लंड पर बैठ जाओ"

राजेश लेट गया और उसने फाल्गुनी को उठा कर खड़ा किया और अपने लंड पर बैठा दिया.. अब फाल्गुनी राजेश के लंड के ऊपर थी और हल्का हल्का कूद रही थी..

उधर मदन ने फाल्गुनी के चेहरे को पकड़कर अपना लंड फाल्गुनी के मुंह में देने की कोशिश करते ही फाल्गुनी ने अपना चेहरा पीछे की ओर खींच लिया..

फाल्गुनी: "छीईई.. अंकल.. अभी आपने पीछे डाला था.. मैं ऐसे मुंह मे नहीं लूँगी.. इसे धोकर आइए.."

मदन के पास और कोई चारा नहीं था.. वो उठकर बाथरूम मे गया और साबुन से रगड़कर अपना लंड धोकर वापिस आया.. वापिस आकर वो बेड पर चढ़ा और फाल्गुनी के मुंह मे अपना लंड दे दिया.. राजेश के लंड पर धीरे धीरे ऊपर नीचे करते हुए वो मदन का लंड चूसने लगी

काफी देर तक दोनों ने इसी पोजीशन में फाल्गुनी की चूत और मुंह की चुदाई की.. इस दौरान फाल्गुनी का एक बार पानी भी बह चुका था..

मदन ने फाल्गुनी के बालों को खोलते हुए लंड मुंह में देना जारी रखा.. काफी देर बाद मदन ने पीछे से फाल्गुनी को राजेश के ऊपर से उठाकर बिस्तर पर लेटा दिया.. फिर वह सामने से फाल्गुनी के ऊपर आकर उसकी चूत मारने मे लग गया..

फाल्गुनी अब बहुत थक रही थी लेकिन फिर भी वो पूरे जोश से उसके साथ दे रही थी.. शराब का सुरूर भी था.. काफी देर की चुदाई के बाद मदन की स्पीड थोड़ा कम होने लगी तो राजेश उसे हटा कर खुद चढ़ गया और उसकी चूत को पेलने लगा..उधर मदन लेट कर फाल्गुनी के स्तनों को चूसने में लगा हुआ था.. साथ ही साथ वह फाल्गुनी के होंठों को चूसे जा रहा था, काटे जा रहा था..

उसी पोजीशन में काफी देर चुदाई करने के बाद फाल्गुनी अब मदन के ऊपर आकर उसके लंड पर बैठ गई और राजेश उसकी गांड में लंड डालकर पीछे से शुरू हो गया.. इस बार बहुत देर तक दोनों ने फाल्गुनी की गांड और चूत का बाजा बजाया..

अब फाल्गुनी की थकान हद से ज्यादा बढ़ गई थी.. लंड पर उछलते हुए और गांड मरवा मरवाकर वो जबरदस्त थक चुकी थी..

फाल्गुनी: "अब आप दोनों बस भी करो.. मन न भरा हो तो मैं शीला आंटी को जगाकर आती हूँ"

लेकिन दोनों अपनी चुदाई में लगे थे.. कुछ ही देर में दोनों ने अपना अपना वीर्य उसकी गांड और चूत में फिर से उंडेल दिया..


फाल्गुनी अपना अगवाडा पिछवाड़ा साफ करके आई और फिर तीनों एक बेड पर सो गए

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