Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 38 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

ससुरजी और उनके बड़े भैया ने नई नवेली दुल्हन का किया शानदार स्वागत :welcome:







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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की कविता की मदद करने के लिए शीला उसके घर पहुँच चुकी थी.. रमिलाबहन के घर फाल्गुनी से मुलाकात के बाद पीछा करने पर शीला को पता चला की फाल्गुनी और राजेश के बीच कुछ चक्कर चल रहा है..

शीला और कविता रसिक के खेत की ओर जाने के लिये निकले.. रास्ते में शीला ने कविता से पिंटू को पीयूष की कंपनी में लगवाने का काम सौंपा.. शीला की यही योजना थी, पिंटू और वैशाली को अपने रास्ते से हटाकर, अपनी पुरानी आजाद जिंदगी में लौटने का..

खेत पहुँचने पर रसिक, कविता को देखकर खुश हो गया और शीला को देखकर क्रोधित.. गुस्से में उसने शीला को लौट जाने के लिए कहा..

कविता के विनती करने पर शीला गाड़ी में वापिस जा बैठी और फिर खेत के उस कमरे में रसिक और कविता के बीच घमासान चुदाई का दौर शुरू हुआ..


अब आगे...

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करीब डेढ़ घंटा बीत चुका था कविता को गए हुए.. सूरज भी ढलते हुए शाम का आगाज दे रहा था.. शीला जानती थी की रसिक को चुदाई करने मे इतना वक्त तो लगता ही है.. शायद दोनों एक राउंड खतम करके दूसरे की तैयारी कर रहे होंगे..!!!

शीला अब बेहद बोर हो रही थी.. गाड़ी में बैठकर गाने सुनते सुनते वह ऊब चुकी थी.. वह गाड़ी से बाहर निकली और नजदीक के खेतों में सिर करने लगी.. फसल कट चुकी थी इसलिए सारे खेत वीरान थे और दूर दूर तक सब कुछ साफ नजर आ रहा था..

तब शीला का ध्यान थोड़े दूर बने एक छोटे से टीले पर गया.. वहाँ पर खेत-मजदूर जैसे दिखने वाले तीन लोग, बनियान और लूँगी पहने बैठे थे और छोटी सी पारदर्शक बोतल से कुछ पी रहे थे.. जाहीर सी बात थी की तीनों देसी ठर्रा पी रहे थे..

अचानक उनमें से एक की नजर शीला की ओर गई..!! ऐसी सुमसान जगह पर इतनी सुंदर गदराई औरत का होना कोई सामान्य बात तो थी नहीं.. उस आदमी ने अपने साथियों को यह बात बताई और अब तीनों टकटकी लगाकर शीला को देखने लगे

शीला को बड़ा ही अटपटा सा लगने लगा.. उसने अपनी नजर घुमाई और गाड़ी की ओर चलने लगी.. थोड़ी दूर चलते रहने के बाद उसने पीछे की और देखा.. वह तीनों दूर से उसके पीछे चले आ रहे थे.. अपना लंड खुजाते हुए..

इतना देखते ही शीला के तो होश ही उड़ गए..!!! तीनों की मंछा साफ थी, जो शीला को भलीभाँति समझ आ रही थी.. अब शीला का दिमाग तेजी से चलने लगा.. गाड़ी कुछ ही दूरी पर थी.. लेकिन वहाँ पहुँच कर भी शीला सुरक्षित नहीं थी.. क्योंकि गाड़ी के आसपास दूर दूर तक कोई नहीं था..

शीला ने अब अपनी दिशा बदली और वो रसिक के खेत की तरफ तेजी से चलने लगी.. वह तीनों भी अब शीला का पीछा करने लगे.. शीला की जान हलक तक आ गई.. वो अब लगभग भागने लगी थी.. उसकी सांसें फूलने लगी थी.. पीछे मुड़कर देखा तो वह तीनों भी अब तेजी से शीला की तरफ आ रहे थे और बीच का अंतर धीरे धीरे कम होता जा रहा था

अपना पूरा जोर लगाते हुए शीला ने दौड़ना शुरू कर दिया.. कुछ ही आगे जाते हुए रसिक का कमरा नजर आने लगा.. शीला ने और जोर लगाया और भागते हुए रसिक के कमरे तक पहुँच गई और दरवाजा खटखटाने लगी

काफी देर तक दरवाजा न खुलने पर शीला बावरी हो गई.. वो पागलों की तरह दस्तक देती ही रही..!! उसने देखा की वह तीनों लोग अब रुक चुके थे.. और दूर से शीला को दरवाजा खटखटाते हुए देख रहे थे

थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुला और कविता के साथ रसिक बाहर आया

कविता: "क्या हुआ भाभी?? आप इतनी हांफ क्यों रही हो?"

शीला ने अपना पसीना पोंछते हुए कहा "वो.. वो तो.. कुछ नहीं.. बस गाड़ी में अकेले बैठे बैठे डर लग रहा था.. शाम भी ढल चुकी है और कुछ ही देर में अंधेरा हो जाएगा.. हमें अब चलना चाहिए"

रसिक को शीला के पास खड़ा देख, वह तीनों उलटे पैर लौट गए.. यह देखकर शीला की जान में जान आई..!! लेकिन वो कविता को इस बारे में बताकर डराना नहीं चाहती थी

कविता: "मैं बस वापिस ही आ रही थी.. चलिए भाभी"

कविता ने शीला का हाथ पकड़ा और दोनों गाड़ी की तरफ जाने लगी.. रसिक दोनों को दूर तक जाते हुए देखता रहा

गाड़ी में पहुंचकर शीला ने चैन की सांस ली.. कविता ने गाड़ी स्टार्ट की और कुछ ही मिनटों में उनकी गाड़ी हाइवे पर दौड़ रही थी

कविता के चेहरे पर संतोष की झलक साफ नजर आ रही थी.. लंबे अवकाश के बाद जब पलंग-तोड़ चुदाई करने का मौका मिलें तब किसी भी औरत के चेहरे पर चमक आ ही जाती है

करीब आधे घंटे तक दोनों में से कोई कुछ भी नहीं बोला

शीला अब धीरे धीरे सामान्य हो रही थी.. अपने पुराने रंग में आते हुए उसने कविता से पूछा

शीला: "कैसा रहा कविता?"

कविता शरमा गई.. उसने जवाब नहीं दिया

शीला ने उसे कुहनी मारते हुए शरारती अंदाज में पूछा "अरे शरमा क्यों रही है..!!! बोल तो सही कैसा रहा रसिक के साथ?"

कविता ने मुस्कुराकर जवाब दिया "मुझ से ज्यादा आप बेहतर जानती हो रसिक के बारे में.. मज़ा आ गया भाभी.. ऐसा लगा जैसे जनम जनम की भूख संतुष्ट हो गई हो"

शीला ने लंबी सांस लेते हुए कहा "इस भूख का यही तो रोना है.. जब संतुष्ट हो जाते है तब लगता है जैसे हमेशा के लिए भूख शांत हो गई.. पर कुछ ही दिनों में फिर से रंग दिखाने लग जाती है"

कविता: "मैं आगे के बारे में सोचना नहीं चाहती.. बस आज की खुशी में ही जीना चाहती हूँ.. भविष्य का सोचकर अभी का मज़ा क्यों खराब करूँ? वाकई में बहोत मज़ा आया.. मेरा तो अंदर सारा छील गया है.. बाप रे..!!! कितना मोटा है रसिक का.. देखने में तो बड़ा है ही.. पर जब अंदर जाकर खुदाई करता है तब उसकी असली साइज़ का अंदाजा लगता है"

शीला: "हम्म.. तो आखिरकार तूने रसिक का अंदर ले ही लिया.. बड़ी कामिनी चीज है रसिक का लंड.. एक बार स्वाद लग जाए फिर कोई और पसंद ही नहीं आता"

कविता: "सही कहा आपने भाभी.. जहां तक पीयूष का लंड जाता है.. वहाँ तक तो इस कमीने की जीभ ही पहुँच जाती है.. फिर जब उसने अपना गधे जैसा अंदर डाला.. आहाहाहाहा क्या बताऊँ..!! इतना मज़ा आया की बात मत पूछो"

दोनों के बीच ऐसी ही बातों का सिलसिला चलता रहा और करीब दो घंटों के बाद वह कविता के घर पहुँच गए..

दोनों सफर के कारण थके हुए थे.. कविता तो ज्यादा ही थकी हुई थी.. रसिक के प्रहारों के कारण उसके अंग अंग में मीठा सा दर्द हो रहा था..

कविता की नौकरानी ने खाना तैयार कर दिया था.. दोनों ने बैठकर खाना खतम किया

कविता: "भाभी, मेरा तो पूरा शरीर दर्द कर रहा है.. सोच रही हूँ की गरम पानी से शावर ले लूँ.. आप बेडरूम मे रिलेक्स कीजिए तब तक मैं फ्रेश होकर आती हूँ.. फिर आराम से बातें करते करते सो जाएंगे"

शीला नाइटी पहनकर पीयूष-कविता के बेडरूम मे आई.. बिस्तर के सामने ६५ इंच का बड़ा सा टीवी लगा हुआ था.. शीला ने रिमोट हाथ में लिया और चेनल बदलते हुए कविता का इंतज़ार करने लगी

थोड़ी देर में कविता स्काइ-ब्लू कलर की पतली पारदर्शक नाइटी पहनकर बेडरूम मे आइ और शीला के बगल में लेट गई.. कविता के गले पर रसिक के काटने के निशान साफ नजर आ रहे थे.. शीला यह देखकर मुस्कुराई

शीला के बगल में लेटी हुई कविता उससे लिपट गई.. और शीला के गालों को चूमते हुए बोली

कविता: "आपने आज मेरी बहोत मदद की भाभी.. वहाँ अकेले जाने के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकती थी.. आप थे इसलिए मेरी हिम्मत हुई"

शीला और कविता बेडरूम में बिस्तर पर लेटे हुए फिल्म देख रही थीं.. कविता को नींद आने लगी थी और बातें करते करते उसकी आँखें धीरे धीरे ढलने लगी थी.. सोने से पहले कविता ने लाइट बंद करके नाइट लैम्प ऑन कर दिया.. शीला किसी दूसरे चैनल पर इंग्लिश फिल्म देखने लगी.. फिल्म में काफी खुलापन और चुदाई के सीन थे..

नींद में कविता ने एक घुटना ऊपर उठाया तो अनायास ही उसकी रेश्मी नाइटी फ़िसल कर घुटने के ऊपर तक सरक गई.. टीवी और मंद लाइट की रोशनी में उसकी दूधिया रंग की जाँघ चमक रही थी.. अब शीला का ध्यान फिल्म में ना होकर कविता के जिस्म पर था और रह-रह कर उसकी नज़र कविता के गोरे जिस्म पर टिक जाती थी.. कविता की खूबसूरत जाँघें उसे मादक लग रही थी.. कुछ तो फिल्म के चुदाई सीन का असर था और कुछ कविता की खूबसूरती का.. शीला बेहद चुदासी हो रही थी और आज वो कविता के साथ अपनी आग बुझाने वाली थी और उसे भी खुश करना चाहती थी..कविता उसका इतना बड़ा काम जो करने वाली थी

शीला ने टीवी बंद किया और वहीं कविता के पास सो गई.. थोड़ी देर तक बिना कोई हरकत किये वो लेटी रही.. फिर उसने अपना हाथ कविता के उठे हुए घुटने वाली जाँघ पर रख दिया.. हाथ रख कर वो ऐसे ही लेटी रही, एक दम स्थिर.. जब कविता ने कोई हरकत नहीं की, तो शीला ने अपने हाथ को कविता की जाँघ पर फिराना शुरू कर दिया.. हाथ भी इतना हल्का कि सिर्फ़ उंगलियाँ ही कविता को छू रही थी, हथेली बिल्कुल भी नहीं.. फिर उसने हल्के हाथों से कविता की नाइटी को पूरा ऊपर कर दिया.. अब कविता की पैंटी भी साफ़ नज़र आ रही थी.. शीला की उंगलियाँ अब कविता के घुटनों से होती हुई उसकी पैंटी तक जाती और फिर वापस ऊपर घुटनों पर आ जाती..

यही सब तकरीबन दो-तीन मिनट तक चलता रहा.. जब कविता ने कोई हरकत नहीं की, तो शीला ने कविता की पैंटी को छूना शुरू कर दिया लेकिन तरीका वही था.. घुटनों से पैंटी तक उंगलियाँ परेड कर रही थी.. अब शीला धीरे से उठी और उसने अपनी नाइटी और ब्रा उतार दी, और सिर्फ़ पैंटी में कविता के पास बैठ गई.. कविता की नाइटी में आगे कि तरफ़ बटन लगे हुए थे.. शीला ने बिल्कुल हल्के हाथों से बटन खोल दिये.. फिर नाइटी को हटाया तो कविता के गोरे चिट्टे मम्मे नज़र आने लगे.. अब शीला के दोनों हाथ मसरूफ हो गये थे.. उसके एक हाथ की उंगलियाँ कविता की जाँघ और दूसरे हाथ की उंगलियाँ कविता के मम्मों को सहला रही थी.. उसकी उंगलियाँ अब कविता को किसी मोर-पंख की तरह लग रही थीं.. कविता अब जाग चुकी थी और उसे बड़ा अच्छा लग रहा था, इसलिये बिना हरकत लेटी रही.. वो भी इस खेल को रोकना नहीं चाहती थी..

अब शीला ने झुककर कविता की चुची को किस किया.. फिर उठी और कविता की टाँगों के बीच जाकर बैठ गई.. कविता को अपनी जाँघ पर गर्म हवा महसूस हो रही थी.. वो समझ गई कि शीला की साँसें हैं.. शीला कविता की जाँघ को अपने होंठों से छू रही थी, बिल्कुल उसी तरह जैसे वो अपनी उंगलियाँ फिरा रही थी.. अब वही साँसें कविता को अपनी पैंटी पर महसूस होने लगीं, लेकिन उसे नीचे दिखायी नहीं दे रहा था.. वैसे भी उसने अभी तक आँखें नहीं खोली थी..






अब शीला ने अपनी ज़ुबान बाहर निकाली और उसे कविता की पतली सी पैंटी में से झाँक रही गरमागरम चूत की दरार पर टिका दी.. कुछ देर ऐसे ही उसने अपनी जीभ को पैंटी पर ऊपर-नीचे फिराया.. कविता की पैंटी शीला के थूक से और चूत से निकाल रहे पानी से भीगने लगी थी.. अचानक शीला ने कविता की थाँग पैंटी को साइड में किया और कविता की नंगी चूत पर अपने होंठ रख दिये.. कविता से और बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने अपनी गाँड उठा दी, और दोनों हाथों से शीला के सिर को पकड़ कर उसका मुँह अपनी चूत से चिपका लिया.. शीला की तो दिल की मुराद पूरी हो गई थी! अब कोई डर नहीं था! वो जानती थी कि अब कविता सब कुछ करने को तैयार है - और आज की रात रंगीन होने वाली थी..





शीला ने अपना मुँह उठाया और कविता की पैंटी को दोनों हाथों में पकड़ कर खींचने लगी.. कविता ने भी अपनी गाँड उठा कर उसकी मदद की.. फिर कविता ने अपनी नाइटी भी उतार फेंकी और शीला से लिपट गई.. शीला ने भी अपनी पैंटी उतारी और अब दोनों बिल्कुल नंगी एक दूसरे के होंठ चूस रही थीं.. दोनों के मम्मे एक दूसरे से उलझ रहे थे.. दोनों ने एक दूसरे की टाँगों में अपनी टाँगें कैंची की तरह फंसा रखी थीं और शीला अपनी कमर को झटका देकर कविता की चूत पर अपनी चूत लगा रही थी, जैसे कि उसे चोद रही हो.. कविता भी चुदाई के नशे में चूर हो चुकी थी और उसने शीला की चूत में एक उंगली घुसा दी.. अब शीला ने कविता को नीचे गिरा दिया और उसके ऊपर चढ़ गई.. शीला ने कविता के मम्मों को चूसना शुरू किया.. उसके हाथ कविता के जिस्म से खेल रहे थे..





कविता अपने मम्मे चुसवाने के बाद शीला के ऊपर आ गई और नीचे उतरती चली गई.. शीला के मम्मों को चूसकर उसकी नाभि से होते हुए उसकी ज़ुबान शीला की चूत में घुस गई.. शीला भी अपनी गाँड उठा-उठा कर कविता का साथ दे रही थी.. काफी देर तक शीला की चूत चूसने के बाद कविता शीला के पास आ कर लेट गई और उसके होंठ चूसने लगी..

अब शीला ने कविता के मम्मों को दबाया और उन्हें अपने मुँह में ले लिया - शीला का एक हाथ कविता के मम्मों पर और दूसरा उसकी चूत पर था.. उसकी उंगलियाँ कविता की चूत के अंदर खलबली मचा रही थी.. कविता एक दम निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी और उसके मुँह से अजीब-अजीब आवाज़ें आने लगी.. तभी शीला नीचे की तरफ़ गई और कविता की चूत को चूसना शुरू कर दिया.. अपने दोनों हाथों से उसने चूत को फैलाया और उसमें दिख रहे दाने को मुँह में ले लिया और उस पर जीभ रगड़-रगड़ कर चूसने लगी..






कविता तो जैसे पागल हो रही थी.. उसकी गाँड ज़ोर-ज़ोर से ऊपर उठती और एक आवाज़ के सथ बेड पर गिर जाती, जैसे कि वो अपनी गाँड को बिस्तर पर पटक रही हो.. फिर उसने अचानक शीला के सिर को पकड़ा और अपनी चूत में और अंदर ढकेल दिया.. उसकी गाँड तो जैसे हवा में तैर रही थी और शीला लगभग बैठी हुई उसकी चूत खा रही थी.. वो समझ गई कि अब कविता झड़ने वाली है और उसने तेज़ी से अपना मुँह हटाया और दो उंगलियाँ कविता की चूत के एक दम अंदर तक घुसेड़ दी..

उंगलियों के दो तीन ज़बरदस्त झटकों के बाद कविता की चूत से जैसे नाला बह निकला.. पूरा बिस्तर उसके पानी से गीला हो गया..






शीला ने एक बार फिर अपनी टाँगें कविता की टाँगों में कैंची की तरह डाल कर अपनी चूत को कविता की चूत पर रख दिया और ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगी, जैसे कि वो कविता को चोद रही हो.. दोनों कि चूत एक दूसरे से रगड़ रही थी और शीला कविता के ऊपर चढ़ कर उसकी चुदाई कर रही थी..





कविता का भी बुरा हाल था और वो अपनी गाँड उठा-उठा कर शीला का साथ दे रही थी.. तभी शीला ने ज़ोर से आवाज़ निकाली और कविता की चूत पर दबाव बढ़ा दिया.. फिर तीन चार ज़ोरदार भारी भरकम धक्के मार कर वो शाँत हो गई.. उसकी चूत का सारा पानी अब कविता की चूत को नहला रहा था.. फिर दोनों उसी हालत में नंगी सो गईं..





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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की शीला आखिर कविता को लेकर रसिक के खेत पहुँच ही गई.. रसिक के मना करने पर केवल कविता ही कमरे में गई और शीला दूर गाड़ी के पास इंतज़ार करती रही.. उस दौरान कुछ गंवार लफंगे मर्द शीला का पीछा करने लगे.. घबराकर शीला तेजी से रसिक के खेत की ओर गई.. गनीमत थी की एन मौके पर रसिक बाहर आ गया और वो पीछा करने वाले उलटे पाँव लौट गए.. संतुष्ट होकर कविता शीला के साथ वापिस लौटी.. रात को साथ सोते वक्त, शीला ने कविता के संग भरपूर मजे किए..

अब आगे...

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राजेश के आगोश में लेटी हुई नंगी फाल्गुनी उसकी छाती के बाल से खेल रही थी.. पिछले आधे घंटे से चल रही धुआंधार चुदाई अभी अभी खतम हुई थी.. दोनों उसकी थकान उतार रहे थे.. फाल्गुनी के मस्त चूचियों की निप्पल से अटखेलियाँ करते हुए राजेश उसे चूम रहा था

"पता है.. आज शीला भाभी आई थी" राजेश के मुरझाए लंड को अपनी उंगलियों पर लेते हुए फाल्गुनी ने कहा





"शीला यहाँ..!! क्या करने आई है वो?" राजेश ने चोंककर पूछा

"वो तो पता नहीं.. कविता दीदी के घर रुकी हुई है.. आज मैं मौसम की मम्मी से मिलने गई तब वहाँ आई थी.. ऐसे शक की निगाहों से देख रही थी मुझे..!! मैं तो वहाँ से तुरंत खड़ी होकर निकल गई" फाल्गुनी ने कहा

"शीला का कोई टेंशन मत लो.. उसे पता भी चला, तो मैं संभाल लूँगा" राजेश ने बड़े ही इत्मीनान से कहा

"पर अंकल, अब इस तरह मिलना मुश्किल होता जा रहा है.. कितनी बार बहाने बनाऊँ मम्मी के सामने? मैं आप से कह रही हूँ की मुझे वो कोर्स जॉइन कर लेने दीजिए.. ताकि मैं पी.जी. में जाकर रह सकूँ और हम दोनों जब मर्जी आराम से मिल सके" फाल्गुनी ने कहा

"अरे फाल्गुनी, मैंने तुझसे कहा तो है.. मैंने कुछ सोचकर रखा है.. ऐसा सेटिंग हो जाएगा की तुम्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी" राजेश ने कहा

"सोचा है.. सोचा है.. कहते रहते हो.. पर क्या सोचा है, ये क्यूँ नहीं बताते?" फाल्गुनी ने नाराज होते हुए कहा

राजेश ने मुस्कुराकर जवाब दिया "मैं तुम्हें अपनी कंपनी में नौकरी देना चाहता हूँ.. तेरे रहने का भी इंतेजाम कर दूंगा.. फिर कोई टेंशन नहीं.. न घर की और न मम्मी पापा की.. हम जब चाहे साथ रह सकेंगे और जहां चाहे मिल भी सकेंगे"

फाल्गुनी को अपने सुने पर विश्वास नहीं हो रहा था "क्या सच में..!! ऐसा हो सकता है..!!"

राजेश: "हाँ क्यों नहीं.. देख, यहाँ बार-बार आना जाना लंबे समय तक मुमकिन नहीं होगा.. एक बार पीयूष वापिस लौट आया, तो यहाँ आने का मेरे पास कोई बहाना भी नहीं बचेगा.. तूम वहाँ रहोगी तो पूरा दिन हम ऑफिस में साथ रह पाएंगे..कोई रोक-टोंक नहीं और यहाँ किसी को शक भी नहीं होगा"

थोड़े से चिंतित स्वर में फाल्गुनी ने कहा "दूसरे शहर भेजने के लिए मम्मी पापा मानेंगे भी या नहीं, यह भी एक सवाल है"

राजेश: "अरे, आजकल तो लड़कियां शहर से दूर रहकर पढ़ती भी है और नौकरी भी करती है.. तू मनाएगी तो वो मान जाएंगे"

फाल्गुनी: "हाँ, मनाना तो पड़ेगा, लेकिन आप कुछ दिन रुक जाइए.. मम्मी की तबीयत अभी ठीक नहीं चल रही है.. वो थोड़ा सा संभल जाएँ फिर मैं बात करती हूँ"

फाल्गुनी से लिपटकर उसके स्तन दबाते हुए राजेश ने कहा "ओके जान.. जैसा तुम ठीक समझो"





फाल्गुनी के कठोर उरोजों की छुअन राजेश के शरीर में बिजली की तरंग पैदा कर रही थी.. उसके निप्पल तन कर उसकी छाती में चुभ रहे थे.. राजेश ने उसकी छातियों पर अपना हाथ लगाया और सहलाया.. उसके दोनों स्तनों के बीच की जगह पर चुम्बन ले लिया..





राजेश ने फाल्गुनी की निप्पलों को उँगलियों से सहलाया और फिर मुँह झुका कर एक निप्पल को मुँह में भर लिया.. फाल्गुनी के मुँह से आहहह निकली.. राजेश ने उसकी निप्पल को चुसना शुरु कर दिया..

फाल्गुनी भी उत्तेजना के कारण कांप सी रही थी उसके हाथ राजेश की छाती पर घुम रहे थे.. राजेश ने उसके दूसरे निप्पल को मुँह में ले कर चुसना शुरु कर दिया और फिर उसके पुरे उरोज को मुँह में भर लिया.. फाल्गुनी का काँपना बढ़ गया.. उसने सिहरते हुए राजेश के बाल पकड़ लिए





राजेश ने अपना उभरा हुआ लंड उस की जाँघों के बीच रगड़ना शुरू कर दिया.. लंड अब उसकी उभरी हुयी डबलरोटी जैसी चूत पर दस्तक देने लगा था.. राजेश अब फाल्गुनी की दोनों जांघों के बीच बैठ गया और धीरे से अपना मुंह उसकी चूत के बिल्कुल करीब ले गया.. लाल गुलाबी चूत का संकुचन उसमें से प्रवाही बहा रहा था.. राजेश ने उस हल्के बालों से ढ़की चूत को चुम लिया.. वहाँ नमी थी और चूत के द्रव्य का खारा स्वाद उसकी जीभ को मिल गया.. फाल्गुनी की मुनिया को ऊपर से नीचे तक जीभ से चाटते हुए चूत के दोनों फलकों को खोल कर अपनी जीभ उन के अंदर डाल दी.. इस से फाल्गुनी के शरीर में एक तेज तरंग सी उठी.. राजेश ने अब जोर-जोर से चाटना शुरु कर दिया.. फाल्गुनी अपनी आँखें बंद कर के लेटी हुई थी..





अब अपना मुंह चूत से हटाते हुए राजेश उसकी जाँघों के बीच बैठ गया.. अपने ६ इंच के कठोर लंड को उसकी नाजुक चूत के मुख पर रख कर नीचे ऊपर किया और फिर लिंग के सुपाड़े को हाथ से पकड़ कर योनिद्वार पर रख कर दबाया.. फाल्गुनी की चिपचिपी चूत का मुँह बहुत कसा हुआ था.. लंड का सुपाड़े उस मुलायम चूत में एक धक्का देते ही अंदर घुस गया..





फाल्गुनी की चूत बहुत कसी हुई थी और उसकी मांसपेशियों का कसाव, राजेश अपने लंड पर महसूस कर पा रहा था.. कसी हुई चूत राजेश के लंड को मथ सा रही थी.. अपने कुल्हों को ऊपर उठा कर राजेश ने जोर से धक्का दिया और वो फाल्गुनी की मुनिया में पुरा समा गया..

राजेश ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये और धनाधन पेलने लगा.. फाल्गुनी के दोनों स्तनों को दबाते हुए उसने धक्कें लगाने शुरु कर दिये.. कसी हुई चूत में लंड बहुत कस कर जा रहा था उस पर बहुत घर्षण भी हो रहा था.. फाल्गुनी के हाथ राजेश के कुल्हों पर आ गये थे.. अब वह भी अपने कुल्हों को उठा कर उसका साथ देने लगी.. दोनों धीरे-धीरे संभोग में लगे रहे.. कुछ ही देर में ही दोनों पसीने से नहा गये थे..





लगभग दस-बारह मिनट तक दोनों संभोग में लगे रहे.. फाल्गुनी का सारा शरीर सनसना सा गया.. राजेश जब झड़ने की कगार पर आ गया तो उसने अपना लंड चूत से बाहर निकाल लिया और हिलाते हुए फाल्गुनी के बबलों पर ही स्खलित होने लगा.. लंड से निकल कर गर्म वीर्य फाल्गुनी की कमर पर गिर रहा था.. फाल्गुनी की चूत से भी पानी रिस रहा था.. थककर राजेश उस की बगल में लेट गया.. यही हालत फाल्गुनी की भी थी..







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दूसरी सुबह शीला और कविता, सोफ़े पर बैठ के गरम चाय की चुस्कीयां ले रहे थे

कविता: "भाभी, मज़ा आ गया कल तो.. पूरा शरीर हल्का हल्का सा लग रहा है"

शीला ने हँसते हुए कहा "रसिक के मूसल से सर्विसिंग हो जाए तो अच्छे अच्छों के शरीर हल्के पड़ जाते है"

कविता ने शरमाते हुए कहा "मुझे तो कल रात आप के साथ भी बड़ा मज़ा आया.. काश हम साथ में रहते होते तो कितना मज़ा आता"

शीला: "तो आजा वापिस अपने पुराने घर.."

एक लंबी सांस भरते हुए कविता ने कहा "अब वो पुराने दिन तो वापिस आने से रहे.. यहाँ इतना सब कुछ छोड़कर वहाँ आना अब तो मुमकिन नहीं है"

शीला: "हम्म.. बात तो तेरी सही है"

तभी शीला का फोन बजा.. वैशाली का फोन था

शीला ने फोन उठाकर कहा "हाँ बेटा.. कैसी है तू? पिंटू की तबीयत कैसी है?"

आगे वैशाली ने जो कहा वो सुनकर शीला के चेहरे से नूर उड़ गया.. चिंता और डर की शिकन से उसका चेहरा मुरझा सा गया

कविता अचंभित होकर शीला के बदलते हावभाव को देख रही है

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. कुछ नहीं होगा.. मैं थोड़ी देर में निकालकर वहाँ पहुँचती हूँ.. और पापा को भी फोन कर देती हूँ.. सब ठीक हो जाएगा"

शीला ने फोन रख दिया

कविता ने बड़े ही चिंतित स्वर में कहा "क्या हुआ भाभी?"

शीला: "पिंटू के फोन पर उस इंस्पेक्टर तपन देसाई का फोन आया था.. जिन हमलावरों ने पिंटू पर हमला किया था उनकी शिनाख्त हो चुकी है.. पुलिस ने सारे सीसीटीवी फुटेज छान मारे.. आगे जाकर हाइवे पर जब दोनों ने अपने मास्क उतारे तब उनके चेहरे सीसीटीवी में नजर आ गए.. वो संजय और हाफ़िज़ थे जिन्होंने हमला किया था"

कविता ने चोंककर कहा "संजय मतलब?? वैशाली का पुराना पति??? और ये हाफ़िज़ कौन है?"

शीला: "उसका साथी.. ड्राइवर है.. संजय के सभी कारनामों मे उसके साथ होता है!!"

कविता: "तो क्या पुलिस वालों ने उन्हें पकड़ लिया?"

शीला: "नहीं.. इतने दिनों बाद जाकर सिर्फ पहचान ही हो पाई है.. अब वो उन्हें पकड़ने की कारवाई भी करेंगे"

कविता: "बाप रे..!! बड़ा ही कमीना निकला ये संजय तो.. तलाक हो जाने के बाद भी वैशाली को तंग करने पीछे पड़ा हुआ है.. जल्द से जल्द पकड़ा जाए तो अच्छा है.. कहीं उसने फिर से कुछ कर दिया तो??"

शीला: "ऐसा कुछ नहीं होने दूँगी.. पर अब वैशाली और पिंटू का वहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है.. मैं अच्छे से जानती हूँ उस हरामखोर संजय को.. वो कमीना कुछ भी कर सकता है..!!"

कविता ने घबराते हुए कहा "तो फिर अब क्या होगा भाभी?"

शीला: "देख कविता.. अब मैंने तुझे जो बात कही थी पिंटू की नौकरी के बारे में.. वो अब जल्द से जल्द करना होगा.. तू हो सके उतना जल्दी पीयूष से बात कर.. पिंटू अपना शहर बदल ले और यहाँ आ जाए उसी में उसकी भलाई है.. और यहाँ तो उसका घर भी है..!! बस इतना काम कर दे मेरा तू"

कविता: "आप जरा भी चिंता मत कीजिए भाभी.. मैं आज ही पीयूष से व्हाट्सएप्प पर बात करती हूँ"

शीला: "मुझे भी मदन को फोन करके यह सब बताना पड़ेगा.. मैं अभी निकलती हूँ.. बस पकड़कर जल्दी से घर पहुँच जाती हूँ.. वैशाली बेचारी अकेले अकेले डर के मारे परेशान हो रही होगी"

कविता: "आप कहो तो मैं आकर आपको छोड़ दूँ?"

शीला: "नहीं.. मैं बस से चली जाऊँगी.. तू बस पीयूष से बात कर और इस मामले को जल्दी से जल्दी निपटा.."

कविता: "आप चिंता मत कीजिए भाभी.. सब कुछ हो जाएगा.. पीयूष को मैं कैसे भी मना लूँगी"

शीला फटाफट तैयार हुई और बस अड्डे जाने के लिए निकल गई.. जो पहली बस मिली उसमे बैठ गई.. करीब साढ़े तीन घंटों के सफर के बाद वह पहुँच गई.. आनन फानन में ऑटो पकड़कर वो घर आई.. अपने घर जाने के बजाय वो सीधे वैशाली के घर गई

शीला को देखते ही वैशाली उससे लिपट गई..

शीला: "चिंता मत कर बेटा.. अब मैं आ गई हूँ.. कुछ नहीं होने दूँगी"

वैशाली: "कैसे गंदे आदमी से पाला पड़ गया है..!! तलाक के बाद भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा"

तभी पिंटू बाहर आया

शीला: "अब कैसी तबीयत है तुम्हारी?"

पिंटू के गले और हाथ पर पट्टियाँ बंधी हुई थी

पिंटू: "ठीक है.. कल डॉक्टर को दिखाकर आए.. अब सिर्फ एक और बार ड्रेसिंग होगा फिर पट्टियाँ खुल जाएगी"

शीला: "तुम अभी आराम करो और किसी भी बात की कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है"

पिंटू: "अब पुलिसवाले जल्द से जल्द उन्हें पकड़ ले तो अच्छा है"

शीला: "पकड़े जाएंगे.. इंस्पेक्टर मदन का दोस्त है.. मैंने आते आते मदन से बात कर ली है.. वो उनके दोस्त से बात कर रहे है.. मदन ने यह भी कहा की वो जल्दी ही वापिस लौट आएगा.. उनका काम लगभग खतम होने को है"

वैशाली: "मम्मी, मुझे तो बहोत डर लग रहा है.. वो कहीं फिर से यहाँ न आ जाएँ"

शीला: "तू टेंशन मत ले.. मैंने कुछ सोचा है इस बारे में.. वो काम हो गया तो तुम्हें फिर कभी चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी"

वैशाली और पिंटू को दिलासा देकर शीला अपने घर चली आई.. घर आकर वह बैठे बैठे आगे के बारे में सोचने लगी.. वो सोच रही थी की जल्द से जल्द पिंटू की नौकरी पीयूष की कंपनी में लग जाएँ तो काफी सारी समस्याएं हल हो सकती थी.. वह दोनों सलामत हो जाएंगे और यहाँ शीला अपनी पुरानी ज़िंदगी में वापिस लौट सकती थी.. शीला को लग रहा था जैसे उसका दिमाग ही काम न कर रहा हो.. और उसकी वजह भी उसे पता थी.. उसकी चुत भोग मांग रही थी.. जब काफी दिन तक अच्छी चुदाई न हुई हो तो शीला का दिमाग काम करना बंद कर देता था

फिलहाल शीला के कामुक भोसड़े को तृप्त कर सकें ऐसा एक ही विकल्प था.. और वो था रसिक..!! पर वो अब शीला से दूरी बनाए हुए थे.. बेरुखी से बात करता था.. शीला को लगता नहीं था की उसके बुलाने से वो आएगा..

फिर भी शीला ने उसे कॉल किया.. रसिक ने उठाया नहीं.. अगले एक घंटे में शीला ने १० से १२ बार कॉल किया पर रसिक ने एक बार भी नहीं उठाया.. शीला थक गई.. सफर और तनाव के चलते उसकी आँखें बंद होने लगी थी

शीला बेडरूम में पहुंची और बिस्तर पर लेट गई.. कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला..!! शाम के करीब ७ बजे उसकी आँख खुली..!! वह उठकर वॉश-बेज़ीन की ओर गई और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया..!! अच्छी खासी नींद लेने के बाद उसे काफी ताज़ा महसूस हो रहा था..

किचन में जाकर अपने लिए एक गरम कडक चाय का प्याला बना लाई वो.. और सोफ़े पर बैठकर आराम से चुसकियाँ लेने लगी.. थकान उतर चुकी थी और अब नए सिरे से उसके भोसड़े में सुरसुरी होना शुरू हो गया था..

शीला ने अपना ध्यान भटकाने की नाकाम कोशिशें की.. फोन पर सहेलियों से गप्पे लड़ाएं.. टीवी देखा.. पर कहीं मन लग नहीं रहा था..!! जैसे शरीर के किसी हिस्से में दर्द हो तो मन घूम-फिर कर वहीं जाकर अटकता है.. बिल्कुल वैसे ही.. शीला का मन उसकी बुदबुदाती हुई चूत पर ही जाकर रुक जाता था.. बहोत कोशिश की शीला ने अपने गुप्तांग को समझाने की.. पर सब कुछ निरर्थक था.. और यह शीला भी जानती थी..!! शीला का भोसड़ा.. जंगल के उस दानव की तरह था जो एक बार जाग जाए तो बिना भोग लिए मानता नहीं है..





जैसे तैसे करके शीला ने कुछ घंटे निकाले.. वैशाली के घर जाकर रात का खाना भी खा लिया.. वापिस आई तब तक दस बज चुके थे.. घर बंद कर बैठी शीला फिर से टीवी देखने लगी.. करीब एक घंटे तक वो चैनल बदलती रही.. एक अंग्रेजी एक्शन मूवी उसे दिलचस्प लगी.. वह काफी देर तक मूवी देखती रही.. फिल्म के एक द्रश्य में नायक एक लड़की के साथ संभोगरत होते दिखाया गया.. इतना गरमा-गरम सीन था की देखते ही शीला अपनी जांघें रगड़ने लग गई.. उसने तुरंत टीवी बंद कर दिया और सोफ़े पर ही लेट गई..

हवस की गर्मी उसकी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी.. वह लेटे लेटे अपने विराट स्तनों को दोनों हाथों से मसल रही थी.. उसने अपनी साड़ी और पेटीकोट कमर तक उठा लिए और पेन्टी में हाथ डालकर चूत की दरार में उँगलियाँ रगड़ने लगी.. इतना चिपचिपा प्रवाही द्रवित हो रहा था की पेन्टी बदलने की नोबत आ चुकी थी..





काफी देर तक शीला अपने भोसड़े को उंगलियों से कुरेदकर शांत करने की कोशिश करती रही.. पर उसकी भूख शांत होने के बजाय और भड़क गई.. वासना की आग में झुलसते हुए शीला बावरी सी हो गई.. क्या करूँ.. क्या करूँ..!!! उसने अपने आप से पूछा.. अभी उसका हाल ऐसा था की अगर वैशाली घर पर नहीं होती तो वो पिंटू को पकड़कर उससे चुदवा लेती.. मदन अमरीका था.. राजेश वहाँ फाल्गुनी की फुद्दी का नाप ले रहा था.. रघु या जीवा को घर पर बुलाना मुमकिन नहीं था.. शीला पागल सी हुए जा रही थी..!!!

शीला ने एक कठिन निर्णय लिया.. वह उठी और बाथरूम में घुसी.. चूत के रस से लिप्त पेन्टी उतारकर उसने अपना भोसड़ा पानी और साबुन से अच्छी तरह धोया.. नई पेन्टी पहनी और एक छोटे सी बेग में एक जोड़ी कपड़े और अपना पर्स लेकर निकल पड़ी

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उम्र की दीवारें: आकर्षण, अनुभव और जिम्मेदारी का संगम

मानवीय आकर्षण की प्रकृति जटिल है, और कभी-कभी व्यक्ति अपने से काफी अधिक अधिक उम्र के व्यक्ति के प्रति आकर्षित हो जाता है। यह किसी युवा कॉलेजियन लड़के का किसी भाभी के प्रति या फिर किसी नौजवान लड़की के प्रौढ़ उम्र के पुरुष के प्रति होता देखा जाता है। यह प्रक्रिया मनोविज्ञान, सामाजिक गतिशीलता और व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित होती है।

फ्रायड के 'इलेक्ट्रा' या 'ओडिपस कॉम्प्लेक्स' जैसे सिद्धांतों के अनुसार, कुछ लोग अपने माता-पिता जैसी छवि वाले बड़े व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होते हैं। यह सुरक्षा, देखभाल और मार्गदर्शन की इच्छा से जुड़ा हो सकता है। वरिष्ठ व्यक्ति में जीवन का अनुभव, आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन होता है, जो युवा साथी को सुरक्षित महसूस कराता है। आर्थिक और सामाजिक स्थिरता भी एक आकर्षण का कारण बन सकती है। कुछ युवा वरिष्ठ साथी को 'रहस्यमय' या 'विश्वासपात्र' मानते हैं, जो उन्हें जीवन के नए आयाम दिखा सकता है। कभी-कभी यह आकर्षण समाज के नियमों को चुनौती देने की इच्छा से भी जुड़ा होता है। वहीं दूसरी ओर, उस वरिष्ठ व्यक्ति को अपने से छोटे व्यक्ति का आकर्षण पाना कई बार आत्म-सम्मान को बढ़ाता है और व्यक्ति को युवा महसूस कराता है। कभी-कभी उम्रदराज व्यक्ति को अपने जीवन में भावनात्मक खालीपन महसूस होता है, जिसे युवा साथी से भरने की कोशिश की जाती है। दोनों पक्ष एक-दूसरे से जीवन के अलग-अलग दृष्टिकोण सीख सकते हैं। अनुभव और ताजगी का मेल कई बार संबंध को संतुलित और रोचक बना सकता है।

ऐसे संबंधों से जुड़े कुछ लाभ इनका कारण हो सकते है.. जैसे, वरिष्ठ साथी जीवन के उतार-चढ़ाव को बेहतर समझते हैं और भावनात्मक संतुलन प्रदान कर सकते हैं। उनके जीवन की स्थिरता और संसाधनों की उपलब्धता जीवन को सुगम बना सकती है। युवा साथी को जीवन के विभिन्न पहलुओं में अनुभवी मार्गदर्शन मिलता है।

हालांकि, इन संबंधों की कुछ विषमताएँ भी है। समाज अक्सर बड़े आयु-अंतर वाले रिश्तों को संदेह की दृष्टि से देखता है, जिससे मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। एक की सेवानिवृत्ति की योजना हो सकती है, जबकि दूसरा अभी करियर के प्रारंभिक चरण में हो। वरिष्ठ साथी का प्रभुत्व या नियंत्रण रिश्ते को असमान बना सकता है। उम्र के साथ शारीरिक क्षमताओं में अंतर साझे जीवन को प्रभावित कर सकता है।

यदि दोनों व्यक्ति परस्पर सम्मान, ईमानदारी और भावनात्मक समझ के साथ संबंध बनाएँ, तो आयु अंतर एक बाधा नहीं रह जाता। हालाँकि, ऐसे संबंधों में संवाद, स्पष्टता और यथार्थवादी अपेक्षाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रेम की कोई उम्र नहीं होती, परंतु जीवन की व्यावहारिकताओं को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता।











































 
एक गरम चाय की प्याली हो..

और उसको पिलाने वाली हो..

चाहे गोरी हो या काली हो...


सीने से लगाने वाली हो...













 
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