Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 36 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की राजेश और फाल्गुनी, स्व.सुबोधकांत के फार्महाउस पर कैसे गुलछर्रे उड़ा रहें है.. राजेश कविता के नरम जवान गोश्त का लुत्फ उठाने से थक नहीं रहा, वहीं फाल्गुनी को भी राजेश के रूप में सुबोधकांत का पर्याय मिल गया..

चिंतित मदन अपने मित्र इंस्पेक्टर तपन को पिंटू के हमलावरों के बारे में पूछता है.. इंस्पेक्टर को अब तक कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं लगा था.. मदन को चिंता इस बात को लेकर थी की वह अमरीका जाने वाला था.. कहीं उसकी गैर-मौजूदगी में कुछ उंच-नीच न हो जाए.. शीला मदन को हिम्मत देती है और अमरीका जाने के लिए मना लेती है.. अब एक महीने के लिए शीला घर पर अकेली है पर इस स्वतंत्रता का कोई फायदा नहीं जब वैशाली और पिंटू पड़ोस में रह रहे हो..!! शीला को लगा की अब अपनी योजना का अमल करने का समय आ चुका है..

अब आगे..

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अपने विशाल बेड पर, पतली सी पिंक नाइटी पहने हुए कविता हुस्न के जलवे बिखेर रही थी.. पहले के मुकाबले, कविता का बदन अब मांसल हो चुका था.. एशोआराम की ज़िंदगी व्यतीत कर रही कविता के नाजुक बदन के खास हिस्सों पर चर्बी की एक परत चढ़ गई थी.. और वह उसे और भी खूबसूरत बना रही थी





वह अपने मोबाइल के स्क्रीन पर उँगलियाँ फेरते हुए इंस्टाग्राम पर रील्स देख रही थी.. और पीयूष का बिस्तर पर आने का इंतज़ार भी..एक महीने से लंबा अरसा बीत चुका था जब वह दोनों हम-बिस्तर हुए थे.. काफी दिनों से अपनी जिस्म की आग को दबाकर बैठी कविता, आज अपनी मुनिया का शहद गिराने के पूरे मूड में थी..

खाना खाकर, बाथरूम मे शावर लेने गए पीयूष का इंतज़ार कर रही कविता की आँखें तब चमक उठी, जब अंदर से आ रही शावर की आवाज बंद हो गई.. अब तौलिया लपेटकर वह बाहर आएगा.. और जैसे ही वो बिस्तर पर बैठेगा, वो उसके शरीर से लिपट जाएगी.. ऐसे सुहाने ख्वाब देखते हुए कविता अपनी नाइटी से दिख रहे उरोजों को और उकसाकर बाहर दिखाने लगी..

जैसी उसकी अपेक्षा थी, बिल्कुल वैसा ही हुआ.. पीयूष तौलिया लपेटकर बाहर आया.. लेकिन बिस्तर की तरफ जाने के बदले, उसने वॉर्डरोब खोला और अंदर से एक टी-शर्ट और शॉर्ट्स निकालकर पहन ली.. फिर बगल में पड़ी बेग से अपना लेपटॉप बाहर निकाला और उसे गोद मे लेकर पालती मार कर बिस्तर पर बैठ गया..

मचलती हुई कविता धीरे धीरे सरककर उसके करीब आई.. लेपटॉप के स्क्रीन में खोए हुए पीयूष की गर्दन को हल्के से चूमकर उसने उसके कानों को पीछे से चाटना शुरू कर दिया






पीयूष ने बिना अपनी नजर हटाए कहा "क्या कर रही है यार.. !!! गुदगुदी हो रही है.. प्लीज मत कर!!"

उसकी बात को अनसुना कर कविता ने अपनी एक हथेली पीयूष के टी-शर्ट के अंदर डाल दी.. और उसकी छाती को सहलाने लगी.. पीयूष की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.. कविता ने अपनी हथेली टी-शर्ट से खींच ली.. अब उसका निशाना पीयूष की शॉर्ट्स में छुपे हुए उसके हथियार पर था..

शॉर्ट्स के ऊपर से ही उसने अपनी हथेली से टटोलकर उसके लंड को खोजने की कोशिश की जो फिलहाल सुस्त पड़ा हुआ था.. शॉर्ट्स के पतले कपड़े के ऊपर से उसने लंड को मुट्ठी में भरना चाहा और उसकी इस हरकत से पीयूष को टाइप करने में दिक्कत आने लगी






पीयूष ने परेशान होकर कहा "यार, प्लीज.. मुझे अपना काम करने देगी.. !!"

कविता ने मुस्कुरा कहा "तो पूरा दिन ऑफिस में क्या किया??"

पीयूष: "तुझे तो पता है कविता.. दिन के बारह घंटे, मैं बिना रुके काम करता रहता हूँ.. !!"

कविता: "तो फिर घर आकर भी काम करने की जरूरत क्यों पड़ती है?"

पीयूष: "अरे यार.. वह अमरीकन कंपनी वालों की सारी माथापच्ची रात को ही शुरू होती है.. तब उनका दिन जो होता है"

कविता: "तो कह दे उनको की मेरी भी पर्सनल लाइफ है.. अगर उनको काम हो तो वह तेरे टाइम पर तुझे कॉन्टेक्ट करें"

पीयूष: "ऐसा नहीं होता यार.. पता है..!! कितने पापड़ बेलने के बाद यह ऑर्डर मिला है..!! उसका पहला चरण तब शुरू होगा जब मैं और मदन भैया वहाँ जाएंगे.. उससे पहले बहोत सारी तैयारियां करनी है मुझे.. !!"

कविता अब रूठ गई और बोली "ऐसा भी क्या काम जो बीवी के लिए एक घंटे की फुरसत ना मिलें.. !!"

पीयूष: "बेकार की बात मत कर कविता.. कल रात ही तो हम डिनर पर बाहर गए थे.. और पिछले रविवार शॉपिंग पर भी तो लेकर गया था तुम्हें"

कविता: "मतलब पत्नी को खाना खिला दो और शॉपिंग करा दो.. तो हो गई तुम्हारी जिम्मेदारी पूरी??"

पीयूष: "यार तू गलत मतलब मत निकाल.. !!"

कविता: "तो क्या करूँ पीयूष.. !! दिन भर तू काम में इतना मशरूफ़ होता है की मुझसे फोन पर बात करने का टाइम भी नहीं होता.. देर रात घर पर आता है और खाना खाने के बाद तेरी हालत ऐसी हो जाती है की मुझे देखकर ही तरस आता है..!! सुबह उठकर वापिस वही रूटीन.. नाश्ता किया और ऑफिस को निकल गए..!! पहले तो रविवार के दिन तू थोड़ा फ्री रहता था.. लेकिन अब तो संडे को भी आधा दिन ऑफिस में होता है..मेरे लिए वक्त कब निकालेगा..!!"

पीयूष: "तो यह सब मैं किसके लिए कर रहा हूँ?"

कविता: "मैंने तो नहीं कहा था तुझे यह सब करने के लिए.. !!"

यह शब्द किसी भी महेनती पति का दिल तोड़ने के लिए काफी हैं.. उसकी मेहनत, त्याग और उसके समर्पण पर प्रश्नचिह्न लगना उसके लिए गहरी पीड़ा का कारण बनता है..

अगर पति पर्याप्त कमाई नहीं करता है, तो उसे अपनी आर्थिक असमर्थता के लिए बीवी ताने मारती हैं.. अगर वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपने परिवार को वह सब दे सके जो उनसे अपेक्षित है, तो यह कहा जाता है कि उसके पास अपनी पत्नी को देने के लिए समय नहीं है.. यह स्थिति पुरुष के लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से बड़ी ही कठिन हो जाती है..

इस स्थिति में, यह आवश्यक है कि पति-पत्नी एक-दूसरे की भूमिका, मेहनत और भावनाओं को समझें.. यह समझना जरूरी है कि रिश्ते को बनाए रखने के लिए सिर्फ आर्थिक स्थिरता ही नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति भी जरूरी है..

पति को चाहिए कि वह अपनी दिनचर्या में संतुलन बनाए और अपनी पत्नी के लिए समय निकाले.. वहीं पत्नी को भी पति के प्रयासों को सराहना चाहिए और उसके प्रति सम्मान और समझ का भाव रखना चाहिए.. तभी दोनों के बीच एक सशक्त और संतुलित रिश्ता कायम रह सकता है

गुस्से में आकर पीयूष ने अपना लेपटॉप साइड मे रख दिया

पीयूष: "तो क्या करूँ? बिजनेस बंद कर दूँ और पूरा दिन तेरे सामने बैठा रहूँ??"

कविता: "मैंने ऐसा तो नहीं कहा"

पीयूष ने अपना माथा पीटते हुए गुस्से से कहा "तो क्या चाहती है तू??"

पीयूष का रौद्र स्वरूप देखकर, एक पल के लिए सहम गई कविता..!!

फिर उसने हिम्मत जुटाते हुए कहा "बस थोड़ा सा वक्त बीता मेरे साथ.. मेरे भी अरमान है.. मेरी भी तो जरूरतें है.. पहले तो हमारी हर रात कितनी रंगीन होती थी.. !! जॉब से आकर बस सिर्फ तुम मेरे होकर रहते थे.. देर रात तक हमारी मस्तियाँ चलती रहती थी.. कितना मज़ा आता था.. !!" कहते हुए कविता पीयूष के गाल को चाटते हुए उसके लंड को सहलाने लगी.. पीयूष का जिस्म भी अब प्रतिक्रिया दे रहा था.. उसका सुस्त लंड धीरे धीरे रक्त से भरने लगा था.. !!

तभी पीयूष के मोबाइल की रिंग बजी..पीयूष बात करते हुए कमरे से बाहर निकल गया.. करीब पाँच मिनट बाद जब वह लौटा तब कविता को लगा की जहां दोनों ने फॉरप्ले छोड़ा था वहीं से शुरुआत करेंगे

लेकिन पीयूष ने आकर कहा "क्लाइंट का फोन था.. अभी उनकी सारी लोकेशन के लोग ऑनलाइन है और वह लोग विडिओ कॉल पर बातचीत करना चाहते है.. मैं बगल वाले कमरे मे जाता हूँ.. तू सो जा.. कॉल लंबा चलेगा और मुझे देर हो जाएगी" कहते हुए उसने लेपटॉप उठाया और बिना कविता की तरफ देखें, कमरे का दरवाजा बंद करता हुआ चला गया

स्तब्ध हो गई कविता..!! कितनी मशक्कत के बाद पीयूष वापिस लाइन पर आया था और उसे समय देने लगा था..सब ठीक चल रहा था की तभी यह अमरीकन कंपनी का ऑर्डर आते ही पीयूष वापिस बिजी हो गया..!! काफी समय से जिस्म की आग से झुलस रही कविता, आज पूरा मन बनाकर तैयार बैठी थी की किसी भी तरह पीयूष को पटाएगी और अपनी भूख शांत करेगी.. लेकिन किस्मत को यह मंजूर न था.. जिस बेरुखी से पीयूष ने उसे सो जाने के लिए कहा.. उससे यह साफ प्रतीत हो रहा था की आज रात तो कुछ होने वाला नहीं है..

एक गहरी सांस छोड़कर कविता करवट बदलकर सोने की कोशिश करने लगी.. हवस की आग में जल रहे शरीर को समझाने की नाकाम कोशिश करते हुए वह सोच रही थी.. की शीला भाभी जो भी कर रही थी वह सही था.. जब पति के पास समय न हो या तो वो लंबे अरसे के लिए मौजूद न हो तब पत्नियों को वफादारी का चोला त्याग कर खुद का कोई जुगाड़ तलाशना ही चाहिए.. !!

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा.. सोच रही थी कविता.. और जो कुछ भी करना था उसमें शीला भाभी के अलावा और कोई उसकी मदद न कर पाता..

दूसरे दिन शीला भाभी को कॉल करने का मन बनाकर कविता सो गई..

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कुछ ही दिनों बाद, पीयूष और मदन अमरीका जाने के लिए निकले.. राजेश मदन को पीयूष के शहर तक छोड़ने भी गया.. मदन के मना करने के बावजूद.. राजेश को तो बस फाल्गुनी से मिलना था.. और उसके नशीले जिस्म का लुत्फ उठाना था..

अब शीला अकेली थी.. उसका दिमाग अब अपनी योजना को अमल में लाने के लिए मेहनत कर रहा था.. शीला सोच समझकर पासे फेंकना चाहती थी..

झूले पर बैठे बैठे सोच रही शीला का विचारभंग तब हुआ जब उसके मोबाइल की रिंग बजी

रेणुका का फोन था

शीला: "हाय मेरी जान..!! आज बड़े दिनों बाद याद किया.. !!"

रेणुका: "मैंने याद तो किया.. तू तो मुझे भूल ही गई"

शीला: "अरे नहीं यार..!! तुझे तो पता ही होगा की पिछले दिनों क्या हुआ.. पिंटू पर हमला होने के बाद लाइफ इतनी डिस्टर्ब सी रही है.. की तुझे फोन करना याद ही नहीं आया"

रेणुका: "हाँ यार.. मुझे पूरी बात बताई राजेश ने.. !! बहोत बुरा हुआ पिंटू के साथ.. फिर कुछ पता चला की कौन लोग थे वो??"

शीला: "नहीं यार.. पुलिस अब भी तहकीकात कर रही है.. !!"

रेणुका: "हम्म.. और बता..!! बाकी सब कैसा चल रहा है?? अब तो मदन भी चला गया.. तो तूने अपने पुराने यार रसिक को घर पर ही बुला लिया होगा"

शीला ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा "मेरे ऐसे नसीब कहाँ.. !! तुझे तो पता है.. पिंटू और वैशाली अब मेरे पड़ोस में ही रहते है.. उनके रहते कुछ भी कर पाना नामुमकिन सा है"

रेणुका: "हाँ यार.. पिंटू से तो तुझे संभलकर ही चलना होगा..!!"

शीला: "वही तो.. ना रसिक को घर बुला पा रही हूँ और ना ही राजेश को.. !! सोच रही थी की कुछ दिन तेरे यहाँ रहने आ जाऊँ"

रेणुका: "मुझे कोई दिक्कत नहीं है अगर तू आती है तो.. वैसे भी मेरी दुकान अभी बंद ही पड़ी है.. उसी बहाने तू और राजेश मजे कर सकोगे.. पर तू आकर करेगी भी क्या.. !!! राजेश तो हफ्ते के आधे दिन अब शहर से बाहर होता है.. पीयूष के अमरीका जाने के बाद, उसके बिजनेस का ध्यान रखने के लिए"

सुनकर शीला थोड़ी सी चोंक उठी.. पीयूष ने अपना बिजनेस राजेश को संभालने के लिए दिया है.. !! वैसे दोनों के संबंध काफी अच्छे थे पर फिर भी शीला को यह बात थोड़ी अटपटी सी जरूर लगी

शीला: "क्या बात कर रही है.. !! मतलब राजेश वहीं पड़ा रहता है क्या?"

रेणुका: "हाँ वैसा ही समझ.. हफ्ते में तीन चार दिन तो वो वहीं रहता है.. कभी रात को घर आता है तो कभी दूसरी सुबह को"

शीला: "उसकी नामौजूदगी में तुझे कुछ काम पड़े तो बेझिझक कॉल कर देना"

रेणुका: "ठीक है.. कभी फ्री हो तो शाम को चली आना.. बैठकर बातें करेंगे.. और कुछ तो फिलहाल हो नहीं सकता.. !!"

शीला: "ओके.. रखती हूँ फोन"

फोन काटकर शीला सोच में डूब गई.. पीयूष की गैरमौजूदगी में राजेश वहाँ जाकर उसका बिजनेस संभालता है.. यह बात उसे कुछ हजम नहीं हो रही थी..

शीला उठकर अंदर चली आई.. टीवी पर बेकार सी कोई सीरियल देखते हुए वो समय बीता रही थी..

तभी शीला का फोन एक बार और बजा.. इस बार कविता का फोन था

कविता: "कैसी हो भाभी?"

शीला: "अरे वाह कविता.. बड़े दिनों बाद याद किया"

कविता: "अब काम ही कुछ ऐसा है की आपके अलावा और कोई मदद नहीं कर सकता.. इसलिए आपको याद करना पड़ा"

शीला का दिमाग चाचा चौधरी की तरह चलने लगा.. जो योजना वह सोच रही थी उसमें कविता का किरदार काफी महत्वपूर्ण था

शीला ने हँसकर कहा "तेरे लिए तो मैं हमेशा हाजिर हूँ.. बता क्या प्रॉब्लेम है?"

कविता ने अपनी कहानी सुनाई.. पीयूष की बेरुखी.. उसका समय न दे पाना.. शारीरिक संबंध के प्रति निरुत्साह..!!

शीला ने काफी देर सोचकर कहा "समझ गई मैं.. पिछली बार के बाद मुझे लगा था की पीयूष सुधर जाएगा.. खैर.. बता कैसे मदद करूँ तेरी?"

कविता: "भाभी, बहोत मन हो रहा है.. एक बार फिर रसिक के खेत पर जाना है.. आप यहाँ आइए न.. फिर हम दोनों साथ चलेंगे"

सोच में पड़ गई शीला.. !! पिंटू पर हमले के बाद जब उसने रसिक पर गलत इल्जाम लगाया था तब से रसिक उससे नाराज चल रहा था.. ऐसी सूरत में वो कैसे उसे मनाएगी?? पर कविता के पीछे लट्टू रसिक मान जाएगा उसमें भी कोई शक नहीं था

शीला: "ठीक है कविता.. जाएंगे हम दोनों.. मैं जल्द ही कुछ प्लान करती हूँ"

कविता: "ऐसा नहीं भाभी.. आप आज ही निकलकर आ जाइए.. मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा"

शीला: "यार, अभी शाम हो रही है.. निकलते निकलते रात हो जाएगी.. और रात को सब लोकल बसें ही मिलती है.. जो मुझे सुबह पहुंचाएगी"

कविता: "वो मैं कुछ नहीं जानती भाभी.. आप कुछ भी करो पर आज रात को निकलो"

शीला ने सोचा, अगर कविता से काम निकलवाना हो तो उसे अभी अपने उपकार के बोझ तले दबाना होगा..

शीला: "ठीक है बाबा.. तेरा काम हो और मैं मना करूँ ऐसा कभी हो सकता है क्या? मैं रात की बस लेकर सुबह तक पहुँच जाऊँगी.. पर याद रखना कविता.. मैं तेरा यह काम कर रही हूँ तो तुझे भी मेरा एक काम करना होगा"

कविता: "कौन सा काम भाभी?"

शीला: "वो सब कल आकर बताऊँगी.. अभी फोन रख.. मुझे घर के काम भी निपटाने है और फिर पेकिंग करके बस अड्डे भी पहुंचना है"

कविता: "ठीक है भाभी.. जल्दी आइएगा.. मैं इंतज़ार करूंगी"

शीला ने फोन रख दिया..

फटाफट खाना बनाया और खाकर तैयार होने लगी.. कितने दिन रहना पड़ेगा उसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल था.. फिर भी उसने तीन दिनों के लिए पेकिंग कर दी

वैशाली को उसने बताया की वह कुछ दिनों के लिए कविता के घर जा रही है.. बाहर आकर उसने ऑटो पकड़ी और बस-स्टेशन पहुँच गई.. बस का रेज़र्वैशन करने के बाद, वो बस में पहुँची तो उसने देखा की उसकी सीट काफी पीछे थी और उस सीट के पीछे सिर्फ़ एक ही कतार और थी.. उसके पास एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी हुई थी.. उम्र कोई साठ के करीब थी.. शीला ने सीट बदलने के लिये कंडक्टर से काफी मशक्कत की मगर उसे वही सीट पर बैठना पड़ा.. शीला उसके पास जाकर बैठ गई.. खिड़की के पास वाली सीट भी नहीं मिली.. अच्छा हुआ सिर्फ़ पतली वाली साड़ी ही पहन कर आ गई, उसने सोचा, नहीं तो तो गर्मी से दम निकल जाता..

कविता को लेकर रसिक के खेत पर जाने के बारे में सोचकर ही वो मस्तिया रही थी.. उसकी चूत और गाँड रसिक का लंड खाने के लिये बिल्कुल तैयार थी.. बस चल चुकी थी.. करीब एक घंटे बाद बस रुकी थी चाय नाश्ते के लिये और फिर पंद्रह-बीस मिनट में चल दी..


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