Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 14 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

सब अपने अपने घर पहुँच गए.. मदन अब कोई नया बिजनेस ढूंढ रहा था.. और वैशाली अपना जीवनसाथी.. !!!

संजय के साथ जो कुछ भी हुआ उसके बाद, इंस्पेक्टर तपन के कहने पर मदन ने शहर के एक बड़े वकील के द्वारा वैशाली के तलाक का केस दाखिल करवा दिया था.. जब तक ये मामला शांति से निपट नहीं जाता तब तक मदन ने वैशाली को इंतज़ार करने की हिदायत दी हुई थी..

कविता के लौट जाने के बाद, वैशाली पीयूष की कंपनी बहोत मिस कर रही थी.. जब कविता नहीं थी तब दोनों ने साथ में बड़े मजे कीये थे.. पर अब कविता की हाज़री में वो पीयूष से दूर ही रहने लगी थी.. पीयूष को भी इस बात का अंदाजा लग चुका था इसलिए वो भी सब के सामने वैशाली से अंतर बनाकर रखता था

मौसम की शादी की तारीख तय हो चुकी थी.. दीपावली के पंद्रह दिन बाद का मुहूरत था.. सुबोधकान्त और रमिलाबहन शादी की तैयारियों में व्यस्त हो गए थे.. कविता भी, जब मौका मिलता, अपनी बहन की शादी के लिए शॉपिंग करने निकल पड़ती.. और लड़कियों/औरतों को शॉपिंग पसंद भी इतना होती है.. भूख प्यास सब भूल जाते है.. अरे, मोहल्ले में कोई चूड़ी बेचने वाला भी आवाज लगाएं तो सब काम छोड़कर उसे मधूमक्खियों की तरह घेर लेती है.. रोज दोपहर को खाने के बाद, कविता वैशाली को लेकर शॉपिंग के लिए निकल जाती थी.. बहन की शादी थी इसलिए कविता का उत्साहित होना लाज़मी भी था..

पिछले हफ्ते जब कविता मायके में थी तब वो घंटों पिंटू के साथ बातें करती थी.. पर घर लौटने के बाद वो सब बंद हो गया था.. बहोत मिस कर रही थी वो पिंटू को.. पीयूष मौसम को मिस कर रहा था.. पति और पत्नी दोनों के दिलों में उदासी छाई हुई थी.. और उसका असर उनके सहजीवन पर भी पड़ रहा था.. रात को बिस्तर पर लेटकर न कविता सेक्स को याद करती और ना पीयूष याद दिलाता.. कविता को पीयूष का लंड पकड़ने का मन भी नहीं हो रहा था.. और पीयूष, मौसम के साथ गुजारें उन हसीन लम्हों को याद करते हुए कविता के बगल में ही सो जाता.. मौसम अब पराई हो गई थी ये सदमा पीयूष बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था.. अंदर ही अंदर वो तरुण के प्रति ईर्ष्या से जल रहा था..

एक दिन शीला और मदन घर के बाहर बरामदे में झूले पर बैठे हुए थे.. वैशाली अंदर मोबाइल पर चैट कर रही थी.. पिंटू के साथ.. पिंटू अब जैसे उसके जीवन का हिस्सा बन चुका था.. ऑफिस में तो खैर वो दोनों ज्यादा बातें नहीं करते थे.. पर घर पहुँचने के बाद दोनों मोबाइल पर भरपूर चैट करते थे.. चैट पर भी पिंटू ने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था.. और उसकी इस बात ने वैशाली को बेहद आकर्षित किया था.. अक्सर कविता उसके सामने पिंटू को बहोत तारीफ करती रहती थी.. और वैशाली ने खुद भी यह अनुभव किया था..

वैशाली ने शीला को भी यह बता दिया था की पिंटू के साथ उसकी अच्छी पटती थी.. शीला और मदन को इस बात से कोई दिक्कत नहीं थी.. उल्टा शीला ने उसे हिदायत देते हुए कहा था की उसका जब भी पिंटू से मिलने का मन करें तब वो दोनों घर पर ही मिलें.. समाज की नज़रों में वैशाली अब भी संजय की पत्नी थी.. वो लोग बाहर कहीं मिलते तो लोग हजार बातें बनाते..

शीला और मदन आराम से झूले पर झूल रहे थे

शीला: "मदन, घर पर बैठे बैठे बोर हो गई मैं तो.. कहीं जाने का मन कर रहा है यार.. सिर्फ हम दोनों.. !!"

मदन समझ गया की शीला का भोसड़ा चुदने के लिए फड़फड़ा रहा था.. इसलिए बेचैन हो रही थी शीला.. लंड लेने के लिए तड़प रही थी.. कुछ करना पड़ेगा.. !! शीला चोदते वक्त इतनी आवाज़ें करती थी की वैशाली दूसरे कमरे में भी आराम से सुन पाती.. इसलिए काफी दिनों से चुदाई का कोई कार्यक्रम नहीं हुआ था

मदन: "सही कहा तूने.. राजेश से बात करते है.. साथ में दो तीन दिनों के लिए कहीं घूम आते है.. फ्रेश हो जाएंगे"

शीला: "पर घूमने जाएंगे तो वैशाली को भी साथ ले जाना पड़ेगा ना.. उसे छोड़कर नहीं जा सकते"

मदन: "फिर तो वही बात हो गई.. !! वैशाली साथ मे होंगी तो फिर क्या फायदा.. !!"

शीला: "हम्म कुछ करना पड़ेगा.. कोई ऐसी जगह ढूँढ़नी पड़ेगी जहां हम दोनों खुलकर मजे कर सकें"

मदन: "अरे शीला.. वो दूधवाले की बीवी हमारी कुछ मदद कर सकती है क्या? उसका घर मिल सकता है क्या?"

शीला: "हम्म.. बात तो तेरी सही है.. पर उससे कैसे कहूँ?? कुछ सेटिंग तो करना पड़ेगा यार.. मैं कुछ करती हूँ.. उसे एक बार घर मिलने बुलाती हूँ.. नहीं तो मैं ही उसके घर मिलने चली जाती हूँ" शीला और मदन दोनों की आँखों मे चमक आ गई.. रूखी के दूध भरे बबलों के बारे मे सोचते ही मदन की आँखों मे सांप लोटने लगे..

शीला: "मुझे पता ही की तुझे वो दूधवाले की बीवी क्यों याद आई.. पर उसके इतने बड़े बड़े है की तेरे हाथ मे भी नहीं आएंगे" मदन की जांघ पर चिमटी काटते हुए शीला ने शरारती अंदाज मे कहा

मदन: "अरे यार, ऐसा नहीं है.. तू किसी और जगह का जुगाड़ कर दे.. मुझे प्रॉब्लेम नहीं है" अपनी चोरी पकड़े जाने पर मदन ने सफाई दी "अरे हाँ शीला.. राजेश के घर पर हो सकता है क्या?"

शीला: "नहीं यार.. अभी अभी उनसे मित्रता हुई है.. ऐसी बातों के लिए उनसे घर मांगने मे झिझक होगी"

मदन: "तो फिर उस दूधवाले के घर के अलावा और कोई चारा नहीं है"

शीला: "देखती हूँ, क्या हो सकता है"

उस रात को, हवस हद से ज्यादा बढ़ जाने पर.. शीला और मदन ने अपनी आवाजों को रोककर चुदाई की.. बगल के कमरे मे वैशाली सो रही थी इसलिए दोनों को चुपचाप चोदना पड़ा.. बिलकुल मज़ा नहीं आया..!!

सुबह साढ़े पाँच बजे, रसिक की साइकिल की घंटी सुनकर, शीला की आँख खुल गई.. शीला उठकर बेडरूम से बाहर आई.. और बेडरूम का दरवाजा बंद कर दिया.. वो बाहर आई और मुख्य दरवाजा खोला.. रसिक सामने ही खड़ा था

रसिक: "पतीला नहीं लाई भाभी?? दूध कैसे लोगी?"

शीला: "रोज सिर्फ दूध ही देगा?? या और कुछ भी है तेरे पास देने के लिए??" शीला ने अपना गाउन ऊपर किया.. अंदर न ब्रा पहनी थी और ना ही पेन्टी.. अपना भोसड़ा दिखाते हुए वो बोली "इसमें दूध लेना है मुझे.. बोल, कब देगा?"

शीला के मदमस्त नंगे बबलों को दोनों हथेलियों से दबाते हुए रसिक ने कहा "मैं तो मार रहा हूँ देने के लिए भाभी.. आप कहो तो अभी घुसा दूँ"








शीला: "मेरी बात ध्यान से सुन.. आज अभी साढ़े दस बजे मैं तेरे घर आऊँगी.. रूखी को कहीं भेज देना एक घंटे के लिए.. किसी को पता नहीं लगना चाहिए.. तेरे माँ बाप तो आगे के कमरे मे रहेंगे.. मैं पीछे के रास्ते अंदर आ जाऊँगी.. तेरा घर तो काफी बड़ा है.. पीछे के कमरे मे करेंगे"

रसिक: "ठीक है भाभी" जाते जाते उसने शीला की निप्पलों को बारी बारी मुँह मे भरकर चूस लिया.. और शीला के हाथ मे अपना लोडा भी पकड़ा दिया.. खूँटे जैसे लंड को पकड़कर शीला थरथराने लगी.. रसिक चला गया








रोज पीयूष के साथ ऑफिस जाती वैशाली... आज पीयूष के चले जाने के बाद अकेले ही ऑफिस जाने निकली.. रास्ते मे उसने पिंटू को फोन किया.. ऑफिस मे तो सब की मौजूदगी के कारण खुलकर बात नहीं हो पाती थी.. काफी दिनों से कविता का भी फोन नहीं आया था इसलिए वैशाली से बातें करना पिंटू को बहोत अच्छा लगता था.. दोनों यहाँ वहाँ की बातें करते थे.. ऑफिस पहुँचने तक वैशाली पिंटू से बात करती रहती.. यह रोज का नित्याक्रम बन चुका था..

वैशाली के जाने के बाद साढ़े नौ बजे, मदन को बताकर, शीला रसिक के घर जाने के लिए तैयार हो गई.. मदन सोच रहा था की शीला घर का सेटिंग करने जा रही है.. हालांकि शीला तो खुद का सेटिंग करने निकली थी

मदन: "हाँ जाकर आ.. तू कहें तो मैं भी साथ चलूँ?"

शीला: "पागल है क्या?? तेरी मौजूदगी मे रूखी से ऐसी बात भला कैसे पूछूँ?"

मदन: "ठीक है.. तू अकेली ही चली जा.. बेस्ट ऑफ लक"

घर से बाहर निकलते निकलते शीला को हंसी आ रही थी.. अब मदन को क्या कहें?? बाहर चुदवाने जा रही बीवी को ये बेवकूफ "बेस्ट ऑफ लक" कह रहा था..

वो फटाफट चलते चलते रसिक के घर की ओर जाने लगी.. रास्ते मे उसने एक कॉल किया.. कॉल खतम करके वो मुसकुराते हुए चल पड़ी.. रसिक के घर पहुंचकर.. वो पीछे के रास्ते चुपके से चली गई.. और दरवाजा खटखटाने लगी.. रसिक ने दरवाजा खोला और शीला को हाथ से पकड़कर अंदर खींच लिया.. और दरवाजा बंद कर उसे दबोच लिया

रसिक की बाहों मे शीला का बदन हवस से तपने लगा... जानबूझकर आज वो बिना ब्रा पहने आई थी.. रसिक के हाथ और उसके बबलों के बीच कुछ नहीं आना चाहिए..

"सब सलामत है ना.. !! कोई आ तो नहीं जाएगा?" शीला ने कहा

"चिंता मत कीजिए.. पीछे के कमरे मे कोई नहीं आता" रसिक ने शीला के बबलों को रौंदना शुरू कर दिया

रसिक का हाथ स्तनों पर फिरते ही शीला की जवानी उछलने लगी..

"यार तू ऊपर सहला रहा है और नीचे से मेरा पानी छूटना शुरू हो गया.. आह रसिक" पाजामे के ऊपर से रसिक का लंड पकड़ते हुए शीला ने कहा "ये तो तैयार ही खड़ा है"






"अरे भाभी, सुबह से.. जब से आपने घर आने का कहा.. तब से ये तैयार है.. !! पर आप एक मिनट रुकिए भाभी" शीला का हाथ अपने लंड से हटाते हुए रसिक खड़ा हो गया

"अब क्या है यार? सारी तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए तुझे.. इसलिए तो पहले से बताया था.. " चूत की खुजली से परेशान शीला ने कहा

रसिक छोटी से खिड़की को बंद कर रहा था.. पीछे से उसकी विशाल पीठ को देखकर शीला सोच रही थी की.. इसके पूर्वज जरूर असुर योनि से होंगे.. तभी ये इतना हट्टा-कट्टा राक्षस जैसा है.. साला जब ऊपर चढ़ता है तब पूरा जिस्म छील जाता है..

रसिक ने खटिया के सामने एक टेबल लगा दिया और उसपर नाश्ते की डिश सजा दी.. अगर कोई आ भी जाएँ तो दिखाने के लिए..

"अब सब ठीक है.. आप जैसे मर्जी करवा लीजिए.. कोई दिक्कत नहीं होगी"

रसिक की लंगोट मे हाथ डालकर उसके मूसल जैसे लंड को पकड़ते ही शीला के बदन मे सुरसुरी होने लगी.. मदन ने एक बार एक ब्लू फिल्म दिखाई थी जिसमे लड़कियां घोड़े के लंड से खेल रही थी.. घोड़े के चार पैरों के बीच बैठकर.. लड़किया उस विकराल तीन फुट लंबे लंड से विकृति पूर्वक खेल रही थी.. रसिक का लंड पकड़ते ही शीला को वो सीन की याद आ गई.. आँखें बंद कर वो रसिक के लंड को सहलाती रही..

"आह्ह भाभी, जल्दी कीजिए.. बाहर भी निकालिए इसे.. कब तक खेलती रहोगी" रसिक ने बेचैन होकर कहा






शीला ने लंगोट से रसिक के लंड को बाहर निकाला.. आह्ह.. देखते ही शीला सिहर उठी.. विकराल अजगर जैसा रसिक का दमदार लंड.. टमाटर जितना बड़ा सुपाड़ा.. और लंड की फुली हुई नसें.. शीला की कलाई जितना मोटा था रसिक का लंड.. !! शीला की चूत ने रस और गंध छोड़ना शुरू कर दिया था.. जबरदस्त उत्तेजित हो गई थी वो.. उसके स्तन एकदम सख्त हो गए थे.. निप्पलें तनकर खड़ी हो गई थी..





दोनों हाथों से लंड को जड़ से पकड़कर.. शीला ने अपने मुंह मे डाल दीया... आँखें बंद कर उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उस ब्लू फिल्म की हीरोइन की तरह वो भी घोड़े का लंड चूस रही है.. वो तब तक चूसती रही जब तक की उसका मुंह दर्द नहीं करने लगा.. रसिक के आँड़ भी अंडे की साइज़ के थे.. शीला उसके लंड और आँड पर टूट पड़ी थी.. कभी लंड को चूमती.. तो कभी आँड़ों को मुंह मे भरकर चूसती.. वैसे तो शीला को मदन का लंड चूसने मे भी मज़ा आता था.. पर रसिक के मूसल की बात ही निराली थी..





शीला की चूत अब बगावत पर उतर आई थी.. इतनी तेज खुजली हो रही थी इस लंड को देखकर.. शीला ने ब्लाउस के हुक खोल दीये.. और अपने नारियल जैसे स्तनों को मुक्त कर दिया.. अत्यंत उत्तेजित होकर उसने अपने दोनों चुचे रसिक के लंड पर रगड़ दीये.. शीला के स्तनों से रगड़ खाकर रसिक का लंड लोहे के गरम सरिये जैसा हो गया था.. शीला ने अपने दोनों विराट स्तनों के बीच रसिक का लंड दबा दिया.. शीला की छातियों का नरम नरम स्पर्श मिलते ही रसिक का लोडा भी फुदकने लगा.. शीला के नखरे रसिक को पागल बना रहे थे..





वो खड़े खड़े.. शीला के दूध जैसे गोरे बबलों को देख रहा था.. दीवार पर अपना सर टीकाकर बैठी शीला का घाघरा पूर्णतः ऊपर की तरफ उठ चुका था.. और शीला जितना हो सकें उतना पैर चौड़े कर.. अपनी भोस खुजाते हुए रसिक के लंड को प्यार करती रही.. उत्तेजित होकर जब रसिक बेकाबू हो जाता तब वो शीला के मुंह को ही चूत समझकर अपने लंड को बड़ी ही ताकत से अंदर धकेल देता.. पीछे दीवार और आगे लंड का आक्रामक हमला.. शीला की हवस संतुष्ट कर सकें उतना लंड उसके मुंह के अंदर दाखिल हो रहा था और रसिक के बड़े बड़े अंडकोश, शीला की ठुड्डी से टकरा रहे थे.. रसिक की धीरज अब जवाब दे रही थी..





पागलों की तरह रसिक का लंड चूस रही शीला को रसिक ने झुककर कहा "बस भाभी.. आप ऐसे ही चूसती रही तो मेरा निकल जाएगा.. और अंदर डालने का मौका ही नहीं मिलेगा.. "

जैसे रसिक की बात सुनी ही न हो वैसे शीला लंड चूसती ही रही.. काफी देर तक चूसने के बाद जब उसका मन तृप्त हुआ तभी उसने मुंह से लंड निकाला.. और रसिक की जांघों के बीच से उठ खड़ी हुई..

शीला के बिखरे हुए बाल.. हवस टपकाती लाल लाल आँखें.. गाल पर चिपका हुआ रसिक का थोड़ा सा वीर्य..!! जबरदस्त लग रही थी शीला..!! रसिक अब शीला के मदमस्त उरोजों पर टूट पड़ा.. और उसके दोनों स्तनों को बेरहमी से मसल दिया.. एक के बाद एक दोनों स्तनों की निप्पलों को चूसते हुए रसिक ने शीला पर धाबा मोल दिया.. एक इंच लंबी निप्पल को काटते ही शीला की सिसकियाँ निकलने लगी.. रसिक शीला को जितना दर्द पहुंचाता उतना ही शीला और हिंसक हो रही थी.. रसिक के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर शीला निचोड़ने लगी.. शीला के मांसल गोलों को रसिक जितनी बेरहमी से दबाता.. शीला की उत्तेजना घटने के बजाए और भड़क जाती..

एक दूसरे की बाहों में बाहें डालकर.. जितना हो सकता था उतनी आक्रामकता से एक दूसरे से शरीर का घर्षण कर रहें थे दोनों.. शीला ने अपना घाघरा उठाकर रसिक के लंड को अपनी चिपचिपी बुर पर रगड़ना शुरू कर दिया.. चूत की गर्मी का एहसास अपने लंड के सुपाड़े पर होते ही रसिक का लोडा शीला की मुठ्ठी मे ठुमकने लगा..






शीला: "ओह्ह रसिक.. अब और नहीं रहा जाता.. जल्दी से मुझे खटिया पर पटककर चोद दें.. जरा भी रहम मत करना.. मर रही हूँ तेरे लंड से चुदने के लिए!! आज तो फाड़ ही डाल मेरी गुफा.. जल्दी जल्दी कर.. आह्ह.. !!"

रसिक: "हाँ भाभी... आपका बदन देखकर मेरा लोडा अब इतना तन चुका है की अब इसे बिना चोदे चैन नहीं मिलने वाला.. पर मैं दरवाजे की कुंडी ठीक से चेक कर लूँ.. कहीं रूखी बेवक्त न टपक पड़े"

रसिक दरवाजे की कुंडी चेक करने गया पर बेचारे नादान रसिक को कहाँ पता था की...

शीला ने रूखी को अपने घर भेजा था.. मदन के पास..!!! ताकि मदन उसके दूध भरे बबलों का लुत्फ उठा सकें.. और जब तक शीला का मिसकॉल नहीं जाता तब तक वो वापिस लौटने वाली नहीं थी.. वैसे शीला को मदन के साथ सेक्स करने मे उतनी दिक्कत नहीं थी.. रात को वैशाली की मौजूदगी के कारण कंट्रोल रखना पड़ता था.. पर दिन भर तो वैशाली ऑफिस रहती थी.. उस समय दोनों चाहें उतना चोद सकते थे.. लेकिन शीला चाहती ही थी की इसी बहाने रसिक के मूसल से ठुकवा सकें.. और मदन भी रूखी के दूध भरे स्तनों को देखकर होश खो बैठा था.. मदन की हवस को ही सीढ़ी बनाते हुए शीला रसिक के लंड तक पहुँच गई थी.. मदन उसी विश्वास में था की इतनी सुंदर, मॉडर्न और सम्पूर्ण संतुष्ट शीला, किसी मामूली से दूधवाले से थोड़े ही चुदवाएगी.. !! पर ऐसा गलत आत्मविश्वास कभी नहीं रखना चाहिए.. स्त्री कभी भी, कुछ भी कर सकती है

मदन बेचारे को कहाँ पता था की जब वो विदेश में मेरी के बबले चूस रहा था तब शीला रसिक के साथ रंगरेलियाँ मना रही थी.. !!

रसिक के सामने ही अपनी चूत खुजाते हुए शीला खटिया पर बैठ गई और अपने सारे वस्त्र उतार दीये.. कपड़े उसने संभालकर खटिया के बगल में इस तरह रखें की जरूरत पड़ने पर वो तुरंत उन्हें पहन सकें.. शीला के पीछे पीछे रसिक आया.. सामने से चलकर आ रहें रसिक की दोनों जांघों के बीच झूल रहें विकराल लोडे को देखकर.. किसी भी स्त्री की नियत बिगड़ सकती थी.. ऐसा मोटा और तगड़ा था उसका लंड.. शीला को नंगी बैठें देख.. रसिक उत्तेजित सांड की तरह बेकाबू हो गया.. और शीला के सामने अपनी बनियान उतार दी.. चौड़े कंधे.. काले घुँघराले बालों से भरी हुई छाती.. देहाती श्याम रंग.. अलमस्त काया.. और साढ़े छह फिट की ऊंचाई.. बड़ी बड़ी मूछें.. कान में चांदी की बाली.. कम से कम 90 किलो वज़न था रसिक का.. !!

शीला: "बाप रे, रसिक.. !! कितना बड़ा है ये तेरा.. !! किसी जवान लड़की के छेद में अगर तू ये तेरा लंड डालेगा तो उस बेचारी की वहीं जान निकल जाएगी.. "

रसिक को अपनी ओर आते देख.. शीला खटिया पर टांगें फैलाकर लेट गई.. उसने खुद ही अपने चूतड़ों के नीचे तकिया सटाकर रख दिया.. आज वो हफ्तों की भूख शांत करने आई थी..!!

धीरे धीरे रसिक शीला के करीब आया.. और खटिया के कोने पर बैठ गया.. शीला की मांसल गदराई जांघों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा "कितनी चिकनी है आपकी जांघें, भाभी। इसपर तो मैं अपना लंड रगड़कर ही पानी गिरा सकता हूँ.. " कहते हुए शीला की भोस तक अपना हाथ ले गया.. शीला के पैर तो पहले से ही चौड़े थे.. इसलिए उसके भोसड़े तक पहुँचने में रसिक को जरा भी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा






खुरदरे हाथों का स्पर्श शीला को और उत्तेजित कर गया.. वो नीचे से अपने चूतड़ उठाकर गोल गोल घुमाने लगी.. "सहलाना बंद कर रसिक.. अंदर चीटीयां काट रही है मुझे.. डाल दे तेरा लंड अंदर.. आह्ह मर गई.. !!"

शीला रूखी के बारे में सोचने लगी.. कितनी किस्मत वाली है वोह.. रोज ऐसे तगड़े लंड से चुदना नसीब हो रहा था उसे.. फिर भी कमीनी जीवा के लंड के पीछे पागल थी.. मायके और ससुराल दोनों में उसके पास उत्कृष्ट कक्षा के तगड़े लंड उपलब्ध थे..

रसिक ने शीला की दोनों जांघों के बीच पोजीशन ले ली.. जिस तरह लड़ाकू विमान टेक-ऑफ के लिए तैयार होते है, बिल्कुल वैसे ही.. रसिक का लंड, शीला की भोसड़े की गंध सूंघकर हिलोरे लेने लगा था..

रसिक ने दोनों हाथों को शीला के घुटनों पर रख दिया.. और दोनों पैरों को अपने कंधे पर ले लिया.. भोसड़े पर लंड टेककर अंदर डालने की कोशिश की.. पर उस तरह लंड अंदर घुस नहीं पा रहा था.. आखिर शीला ने अपने एक हाथ से स्तन मसलते हुए दूसरे हाथ से रसिक के लंड को हाथ में लिया और अपने गरम भांप छोड़ रहे सुराख पर रख दिया.. हल्के से गांड उचकते ही रसिक का सुपाड़ा अंदर घुस गया.. "अब मार धक्के.. जोर से.. फाड़ दे इसे.. आह्ह"






अब रसिक भी कहाँ पीछे हटने वाला था.. !! उसने दबाकर एक जोरदार धक्का लगाया.. और शीला के भोसड़े को चीरते हुए उसका लंड बच्चेदानी के मुख पर जाकर टकराया..

"ऊईईई माँ... मर गई.. ओह्ह रसिक.. अपना लोडा बाहर निकाल और फिर से इसी तरह एक और धक्का लगा.. आह्ह मज़ा आ गया.. जरा जोर से.. !!" शीला की उत्तेजना बेकाबू हो रही थी.. "कौन जाने क्या खाकर तुझे तेरी माँ ने पैदा किया था.. कितना खूंखार लंड है रे तेरा... अब चोद डाल.. अपनी माँ की चूत समझ कर चोद दे मुझे.. !!"

रसिक ने शीला के पैरों को छोड़ दिया.. और शीला ने उसके कंधों पर दोनों पैरों से कुंडली मार दी.. रसिक ने शीला के दोनों बबलों को अपने हाथों से दबाते हुए.. अपनी अलमस्त काया का पूरा 90 किलो वजन एक साथ ही शीला के ऊपर थोप दिया.. नौ इंच का लंड और नब्बे किलो का वज़न.. बड़े आराम से झेल रही थी शीला.. !!

रसिक के वजनदार धक्कों को शीला ने बड़ी ही आसानी से झेल लिया.. पर खटिया के पैर इसे बर्दाश्त न कर पाएं.. कड़ाके की आवाज के साथ खटिया टूट गई.. "अरे अरे अरे... !!" कहते हुए रसिक शीला को संभालने गया.. पर आखिर न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की जीत हुई.. काबिल शीला ने इस स्थिति में भी रसिक का लंड बाहर निकलने नहीं दिया.. उसने अपने भोसड़े की मांसपेशियों के बीच रसिक के लोडे को ऐसा दबोच रखा था की उसके बाहर निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी..

टूटी हुई खटिया से उठने की कोशिश कर रहें रसिक को शीला ने अपनी बाहों में भरते हुए.. उसके पसीने से तर कंधों पर काटते हुए कहा "उठ मत.. चालू ही रख.. इसी स्थिति में धक्के लगाना शुरू कर दे.. मज़ा आ रहा है यार.. "

रसिक ने फिर आव देखा न ताव.. धनाधन धक्के लगाना शुरू कर दिया.. उसके प्रत्येक प्रहार से शीला की भूख और खुजली कुछ कुछ संतुष्ट हो रही थी.. रसिक के कूल्हों को अपने नाखूनों से कुरेदते हुए शीला उसे अपने जिस्म से और सख्ती से दबा रही थी.. रसिक बिना रुकें, शीला को पूरे जोश से चोद रहा था और शीला नीचे तृप्ति के महासागर में गोते लगा रही थी.. शीला भी पसीने से तरबतर हो गई थी जीवन के इस सर्वोच्च आनंद को महसूस करते हुए.. रसिक के पसीने की गंध शीला की हवस को ओर भड़का रही थी..







टूटी हुई खटिया में चोदना असुविधाजनक तो था ही.. पर जब इच्छाशक्ति प्रबल हो तब कोई भी समस्या ज्यादा देर तक टिक नहीं पाती..

"आहहह रसिक.. लगा जोर से शॉट.. मार डाल मुझे.. ओह्ह आह्ह.. शाबाश.. और जोर से.. ऊईई माँ.. आह्ह अहह.. स्पीड बढ़ा.. मैं झड़ने वाली हूँ.. आ.. आ.. आ.. आ.. आ.... !!" शीला के स्खलन की अंतिम क्षणों में रसिक भी थककर चूर हो गया.. उसके विकराल लंड ने वीर्य की गरम गरम पिचकारी जब बुर के अंदर तक छोड़ी.. तब शीला ने अपने नाखून रसिक की पीठ पर गाड़ दीये.. रसिक की पीठ पर ऐसे निशान बन गए थे जैसे किसी खूंखार शेरनी ने अपना पंजा मार दिया हो.. !!








शीला के बबले रसिक की छाती के बोझ तले दबकर चपटे हो गए थे.. बबलों की चर्बी का अतिरिक्त हिस्सा.. दोनों बगलों से बाहर झलक रहा था.. टूटी हुई खटिया में.. पैर फैलाकर लेटी शीला तभी शांत हुई जब उसका भोसड़ा पूर्णतः तृप्त हो गया.. रसिक को अपनी बाहों में भींचकर शीला तेजी से हांफने लगी.. बिखरे हुए बाल.. आँखों में तृप्ति के भाव के साथ शीला पड़ी रही.. और उसके ऊपर रसिक ऐसे गिरा हुआ था जैसे एनकाउंटर में मारे गए किसी गुंडे की लावारिस लाश हो..

थोड़ी देर तक दोनों उसी स्थिति में पड़े रहे.. शीला के तकियों जैसे स्तनों पर से उठने का भला कीसे मन होगा.. !! लेकिन रसिक उस स्थिति में भी समय को लेकर चौकन्ना था..

"अब आप मुझे छोड़िए तो मैं खड़ा हो सकूँ.. वैसे मज़ा आ गया आज तो भाभी.. ये रूखी पता नहीं अब तक क्यों नहीं लौटी?? अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था.. !! वैसे देखने जाएँ तो अच्छा ही हुआ की वो अब तक नहीं लौटी.. वरना हमारे रंग में भंग पड़ता.. !!"

शीला: "हाँ हाँ उठ जा.. और अपने लोडे को बाहर निकाल.. अंदर एकदम फिट हो गया है.. कुत्तों की तरह.. तू भी कपड़े पहन ले और मैं भी तैयार हो जाती.. फिर कोई आ जाएँ तो भी प्रॉब्लेम नहीं होगा.. "

दोनों ने उठकर कपड़े पहने

रसिक: "अब इस टूटी हुई खटिया का क्या करूँ? घर में ये एक ही खटिया है.. रूखी तो ये देखकर ही मेरी जान निकाल देगी.. शाम तक इसे ठीक कराना ही होगा.. बेकार में खर्चा हो गया मेरा.. !!"

शीला ने तुरंत अपने पर्स से सौ सौ की तीन नोट निकालकर रसिक को थमा दी.. थोड़े से संकोच के साथ, रसिक ने पैसे ले लिए..

रसिक: "शुक्रिया भाभी.. वैसे आज आपके साथ जो मज़ा आया.. ऐसा मज़ा मुझे रूखी के साथ कभी नहीं आता है.. समझ में नहीं आ रहा की रूखी कहाँ मर गई?? कमीनी किसी ओर के साथ तो खटिया नहीं तोड़ रही होगी??"

शीला खिलखिलाकर हंस पड़ी "सब तेरे जैसे थोड़े ही होते है.. चल अब मैं चलती हूँ.. ज्यादा देर बैठूँगी तो फिर से मन हो जाएगा"

रसिक: "अरे भाभी, थोड़ी देर बैठिए ना.. जी करता है की पूरा दिन आपके सामने बैठकर देखता ही रहूँ.. कितनी सुंदर हो आप"

शीला: "ज्यादा रोमेन्टीक मत बन.. ऐसा तो क्या देख लिया तूने मेरे अंदर?"

रसिक: "एक बात कहूँ.. ?? जब हम कर रहे थे.. तब आपने कहा था की अगर मैं अपना ये लंड किसी जवान खूबसूरत लड़की के अंदर घुसा दूँ तो वो मर जाएगी.. उसी से याद आया.. मेरा बहोत मन कर रहा है.. किसी फेशनेबल जवान लड़की को चोदने का.. आप मेरी कुछ मदद करो ना.. !!"

शीला: "साले, मुझे क्या दलाल समझ रखा है तूने?? और तेरा रूप-रंग तो देख.. !! तुझे नंगा देखकर लड़कियां वहीं बेहोश हो जाएगी.. !!"

रसिक: "क्या भाभी आप भी.. !!!"

शीला: "तेरे लिए तो रूखी की गुफा ही ठीक है.. कागज की कश्ती जैसी नाजुक चूतें, तेरा ये मूसल बर्दाश्त ही नहीं कर पाएगी"

शीला के बबलों को दबाते हुए रसिक ने फिर से विनती की.. "कुछ कीजिए ना भाभी, प्लीज"

शीला: "अरे यार.. तू तो मेरे गले ही पड़ गया.. मैं कहाँ से लाऊँ तेरे लिए जवान फेशनेबल लड़की?? और मिल भी जाएँ तो मैं क्या कहूँ उसे?? की जा इस दूधवाले से चुद जा.. !! नहीं भाई नहीं.. मुझसे ये नहीं होगा"

रसिक: "आप को कहीं ढूँढने नहीं जाना है भाभी... आपको तो सिर्फ मुझे मदद करनी है"

शीला: "अच्छा... तूने ढूंढ भी ली है.. !! बता.. कौन है वो अभागी लड़की??"

कमर पर हाथ रखकर जबरदस्त स्टाइल में खड़ी थी शीला.. जिसे देखकर अच्छे से अच्छे मर्दों को छक्के छूट जाएँ..

रसिक: "भाभी.. अगर आप मुझे सहयोग दें तो बगल के चिमन काका के घर ही मेरा काम हो सकता है"

शीला: "मतलब?? तू कविता की बात कर रहा है??" चोंक उठी वो..

कविता से शीला बराबर परिचित थी.. उतना ही नहीं.. वो रसिक और कविता दोनों के शारीरिक भूगोल से भी वाकिफ थी.. इन दोनों के उम्र से लेकर लंड-चूत के नाप तक.. किसी भी चीज में कोई समानता नहीं थी.. ये तो ऐसा हाल होता जैसे किसी कुत्तिया पर गधा चढ़ने की बात कर रहा हो.. शीला की आँखों के सामने.. फटी हुई चूत के साथ.. लहू-लुहान लेटी हुई बेहोश कविता का द्रश्य आ गया.. बाहर खड़ी हुई एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ी भी दिखाई देने लगी.. शीला ने अगर थोड़ी ओर कल्पना की होती तो उसे रसिक की गिरफ़्तारी समेत और कई द्रश्य भी नजर आ जाते

कांप उठी शीला.. क्योंकि वो अच्छे से जानती थी.. कविता की तितली जैसी शोख चंचल काया.. रसिक नाम का सांड.. एक ही पल में रौंद देगा.. रसिक की बात सुनकर.. शीला का दिमाग.. कंप्यूटर से भी तेज चलने लगा.. वो सोचने लगी.. जब मैं कलकत्ता गई थी तब तो कहीं रसिक ने कविता के ऊपर नजर नहीं डाली होगी.. !! अनुमौसी भी रसिक के लंड की दीवानी है.. कहीं अपना भोसड़ा मरवाने के चक्कर में.. मौसी ने कविता का सौदा तो नहीं कर दिया रसिक के साथ.. !! नहीं नहीं.. ऐसा तो नहीं हुआ होगा.. वरना रसिक मुझे ये सब क्यों बताता.. !! सीधा मौसी के साथ ही कविता का सेटिंग कर लेता..

"क्या सोच रही हो भाभी? मेरी बात का बुरा लगा क्या आपको??" चुपचाप बैठकर सोच रही शीला को देखकर रसिक ने पूछा

शीला: "ऐसा कुछ नहीं है रसिक.. कविता का सेटिंग तो मैं नहीं करवा सकती.. पर अगर कोई नए जमाने की मॉडर्न लड़की का कॉन्टेक्ट होगा तो तुझसे मिलवा दूँगी जरूर.. अभी तो ऐसा कोई मेरे ध्यान में नहीं है.. शहर की लड़कियों को मॉडर्न हेंडसम रोमियो टाइप लड़के पसंद होते है.. उन्हें देसी नारियल के पानी से ज्यादा कोक और पेप्सी पसंद होती है.. शुद्ध घी का हलवा खाने से उनका फिगर खराब हो जाता है पर पीत्ज़ा, बर्गर इत्यादि खाने में उन्हें कोई हर्ज नहीं होता.. सब औरतें या लड़कियां मेरे जैसी नहीं होती.. की जिन्हें असली मर्द की परख हो.. अगर तू भी क्लीनशेव होकर मॉडर्न कपड़े पहन ले तो वो लड़कियां तेरे पीछे भागेगी.. हट्टा-कट्टा तो तू है ही.. आजकल दंभ और दिखावे का ज़माना है.. तेरे पास फूटी कौड़ी भी न हो तो चलेगा पर तुझे दिखावा ऐसा करना होगा की जैसे तू करोड़पति हो.. आज कल तो जहर भी अच्छे पेकिंग में डालकर बेच सकते है.. केसर युक्त गुटखा की तरह.. !!"

रसिक: "अरे भाभी.. मैं ठहरा दूधवाला.. अब सूट-बूट पहनकर दूध बेचने निकलूँगा तो कौन खरीदेगा?? ये तो बस एक मेरी ख्वाहिश थी जो मैंने आप को बताई.. वरना मैं कौन सा यहाँ मरा जा रहा हूँ.. और आप तो हो ही मेरे पास.. आप भी मॉडर्न ही हो.. पर कविता का गन्ने जैसा पतला शरीर देखता हूँ तो मन में खयाल आता है की ऐसी लड़की को चोदने में कितना मज़ा आएगा.. !! लंड घुसाने पर कैसे छटपटाएगी.. !!!"

शीला: "मैं समझ सकती हूँ तेरी बात रसिक.. तेरे लोडे में इतनी ताकत है की कोई भी तेरा लेकर छटपटाएगी..!! पर जरा कविता की चूत के बारे में तो सोच.. तू अंदर डालेगा तो बेचारी की फट के फ्लावर बन जाएगी.. मुश्किल से पच्चीस की है कविता.. तेरे जैसा लंड उसने सपने भी देखा नहीं होगा.. उसकी उम्र या अनुभव अधिक होने दे.. वो खुद-ब-खुद चलकर तेरे पास आएगी.. उसके साथ अच्छे संबंध रख.. अभी तो नहीं पर भविष्य में जरूर कुछ होगा.. " आश्वासन देते हुए शीला ने कहा

"वैसे तूने कभी कविता से इस बारे में कुछ बात की है क्या?" शीला का नार्को टेस्ट शुरू हो गया

"नहीं भाभी.. ऐसा तो कुछ नहीं कहा मैंने"

शीला: "तो फिर कविता तेरे दिमाग में कैसे आ गई एकदम से??"

रसिक: "कविता दूध लेते वक्त काफी मज़ाक मस्ती करती है मेरे साथ.. इसलिए मुझे लगा की....!!"

शीला: "रसिक, कविता ऐसी नहीं है.. कोई भी लड़की या स्त्री ऐसी नहीं होती.. जब तक वह खुद असन्तुष्ट हो... मज़ाक करने का मतलब ये नहीं होता की लड़की कुछ भी करने को तैयार है"

रसिक: "वैसे देखने जाए तो पुरुष भी ऐसा सब हालात के मारे ही तो करता है.. मैं आप से जिद नहीं कर रहा भाभी.. पर कभी कविता सामने से खुद अगर ऐसी कोई बात छेड़ें.. तो आप मुझे जरूर याद करना.. !!"

शीला: "पागलों जैसी बातें मत कर.. कविता कभी इस बात के लिए राजी नहीं होगी... और अगर राजी हो भी गई तो तेरा ये गधे जैसा लंड लेने की उसकी क्षमता ही नहीं है.. दो-तीन धक्कों में तो उसकी चूत फट जाएगी.. और तू फंस जाएगा.. गलती से भी ऐसा कुछ मत करना.. किस्मत में होगा तो वो सामने से आएगी.. पर अगर तू जबरदस्ती करने गया और कुछ उंच-नीच हो गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.. !! चल अब मैं चलती हूँ"


आखिरी बार सलाह देकर शीला खड़ी हो गई.. रसिक को एक किस करते हुए वो निकल गई.. घड़ी में देखा तो चालीस मिनट बीत चुके थे.. उतनी देर भी नहीं हुई थी.. वो तृप्त और खुश होते हुए घर पहुंची.. घर का दरवाजा बंद था.. और बाहर किसी की चप्पल पड़ी हुई थी.. शीला ने दरवाजा खटखटाया.. काफी देर के बाद मदन ने दरवाजा खोला.. मदन का हाल बेहाल था.. अस्त-व्यस्त बाल.. सिलवटों वाले कपड़े.. लाल चेहरा.. शीला बिना कुछ कहें घर के अंदर आ गई.. उसने अंदर जाकर बेडरूम में देखा तो बिस्तर पर रूखी बैठी हुई थी.. उसका रंग-रूप और हावभाव देखकर ये साफ प्रतीत हो रहा था की मदन के साथ गुलछर्रे उड़ा चुकी थी.. बिखरा हुआ बिस्तर इस बात की गँवाही दे रहा था..
 
आखिरी बार सलाह देकर शीला खड़ी हो गई.. रसिक को एक किस करते हुए वो निकल गई.. घड़ी में देखा तो चालीस मिनट बीत चुके थे.. उतनी देर भी नहीं हुई थी.. वो तृप्त और खुश होते हुए घर पहुंची.. घर का दरवाजा बंद था.. और बाहर किसी की चप्पल पड़ी हुई थी.. शीला ने दरवाजा खटखटाया.. काफी देर के बाद मदन ने दरवाजा खोला.. मदन का हाल बेहाल था..

अस्त-व्यस्त बाल.. सिलवटों वाले कपड़े.. लाल चेहरा.. शीला बिना कुछ कहें घर के अंदर आ गई.. उसने अंदर जाकर बेडरूम में देखा तो बिस्तर पर रूखी बैठी हुई थी.. उसका रंग-रूप और हावभाव देखकर ये साफ प्रतीत हो रहा था की मदन के साथ गुलछर्रे उड़ा चुकी थी.. बिखरा हुआ बिस्तर इस बात की गँवाही दे रहा था..




"ये क्या है रूखी?" शीला ने गुस्सा करते हुए कहा

"कुछ नहीं भाभी.. मैं तो आप से मिलने आई थी.. पर आप बाहर गई हुई थी इसलिए भैया ने मुझे यहाँ बैठने को कहा.. मैं तो आपका इंतज़ार कर रही थी" रूखी ने जवाब दिया

"तो क्या ये तेरे भैया ने तुझे बिस्तर पर बैठने को कहा था?? और वो भी ब्लाउस के तीन हुक खोलकर??" शीला ने लाल आँख करते हुए मदन की तरफ देखा


वैसे ये शीला का ही प्रपंच था.. रूखी को उसने ही फोन कर यहाँ घर पर बुलाया था.. उसे पक्का यकीन था की रूखी को अकेले पाकर मदन अपने आप को रोक नहीं पाएगा.. और रूखी भी जनम जनम की भूखी थी.. वो जानबूझकर गुस्सा इसलिए जता रही थी ताकि मदन उसके नियंत्रण मे रहे.. दूसरा, जितनी देर तक मदन रूखी के साथ उलझा रहता, उतनी ही ज्यादा देर तक उसे रसिक के मजेदार लंड से चुदने का समय मिलता..



"अरे भाभी, मैं तो सोफ़े पर ही बैठी थी.. पर भैया ने मुझे अंदर बुला लिया.. मैंने सोचा उन्हें कुछ काम होगा.. मुझे कहाँ पता था की भैया मेरे साथ ऐसा कुछ करेंगे.. " रूखी ने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए सफाई दी

शीला ने क्रोधित होकर मदन के सामने देखा.. मदन चुपचाप नजरें झुकाएं खड़ा था.. रूखी जल्दबाजी में ब्लाउस के बटन बंद करने गई.. पर बड़े बड़े.. दूध भरे स्तनों को ताकत से ब्लाउस में बंद करते हुए उसकी दोनों निप्पलों से दूध टपक पड़ा.. जिसे देखकर मदन के मुंह से सिसकी निकल गई.. आह्ह!!

शीला रूखी के मदमस्त स्तनों को देखती ही रही.. मदन भी स्तब्ध होकर देख रहा था.. पीले रंग के पतले ब्लाउस की कटोरियों का आगे का हिस्सा दूध निकलने के कारण गीला हो रखा था.. और ब्लाउस गीला होकर पारदर्शक हो गया था.. रूखी की निप्पल ब्लाउस में से भी साफ नजर आने लगी थी.. स्तन को नीचे से दबा रही रूखी.. ढंकने के चक्कर में और दूध बहा रही थी..






"रहने दे रूखी.. अब क्यों छुपा रही है.. जो देखना था वो तो मदन ने सब कुछ देख ही लिया है.. और मैंने भी.. !! अब छुपाने का कोई मतलब नहीं है" शीला ने रूखी से कहा

यह सुनते ही रूखी ने अपने निरर्थक प्रयत्नों पर रोक लगा दी.. और ब्लाउस के हुक को छोड़ दिया.. उसी के साथ.. उसके दोनों स्तन लटक गए.. दो भव्य स्तनों और निप्पलों के ऊपर लगी दूध की बूंदों का सौन्दर्य देखकर जो होना था वहीं हुआ..

रुखी का ये रूप देखकर शीला भी अचंभित हो गई.. वो समझ गई की इसमें बेचारे मदन की कोई गलती नहीं थी.. यह सीन देखकर मिट्टी का पुतला भी उत्तेजित हो जाता.. !!

मदन से रहा नहीं गया.. और शीला की मौजूदगी में ही.. उसकी जरा भी परवाह कीये बगैर.. वो रूखी के करीब गया.. और उसकी एक निप्पल को मुंह में भरकर.. छोटे बच्चे की तरह दूध चूसने लगा..






"ओह्ह भैया.. छोड़ भी दीजिए.. अरे भाभी, आप भैया को कुछ कहिए ना.. !! ये क्या कर रहे हो भैया.. !! भाभी गुस्सा करेगी.. छोड़ दो मुझे.. आह्ह" शीला के सामने ही मदन की इन हरकतों से रूखी शर्म से लाल हो गई.. और मदन को अपने शरीर से दूर धकेलने की कोशिश करने लगी..

पर मदन इस मौके को छोड़ने वाला नहीं था.. वो जानता था की शीला चाहें जितना गुस्सा कर लें.. अभी ये सब देखकर उसकी चूत में चुनचुनी होना शुरू हो जाएगी.. और जैसे मैं रूखी के बबले देखकर तड़प रहा हूँ.. वैसे ही वो लंड लेने के लिए तड़पने लगेगी.. !! और हुआ भी वैसा ही.. शीला आगे बढ़ी और ऐसे खड़ी हो गई जिससे उसे सारा द्रश्य आराम से नजर आए.. तीरछी नज़रों से शीला की ओर देखकर रूखी मुस्करा रही थी और मदन दोनों हाथों से उसके स्तन को दबाकर दूध निकाल रहा था..






शीला बेडरूम से बाहर आई और तसल्ली कर ली की मुख्य दरवाजा ठीक से लॉक था.. और बेडरूम में चली आई.. फिर रूखी को आँख मारते हुए उसने विजयी मुद्रा में अंगूठा दिखाकर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी.. और रूखी के सामने ही अपने घाघरे के ऊपर से भोसड़े को खुजाते हुए.. अपने ब्लाउस के तमाम हुक खोल दीये.. और उन दोनों के साथ शरीक हो गई..

मदन के पास शीला की तरफ देखने का भी समय नहीं था.. रूखी के स्तनों को पच-पच की आवाज के साथ चूस रहें मदन की पेंट से शीला ने उसका लंड बाहर निकाला और चूसने लगी.. उसके लंड के स्वाद से वो पिछले तीस साल से परिचित थी.. पर आज उसका स्वाद कुछ अलग ही था.. वो समझ गई की उसके लंड पर रूखी के मदमस्त भोसड़े का शहद लगा हुआ था.. इसलिए स्वाद अलग लग रहा था.. रूखी ने मदन के लंड की तरफ नजर भी नहीं डाली.. ये देखकर ही शीला समझ गई की उसके आने से पहले चुदाई का एक राउन्ड हो चुका था.. मदन की कामुकता को वो बखूबी जानती थी..

शीला को शामिल हुआ देख मदन जोश में आ गया.. और टेंशन-मुक्त होकर उसने रूखी के बदन को सहलाना शुरू कर दिया.. बिस्तर पर लेट चुकी रूखी की दोनों टांगें खोल दी शीला ने.. भरपूर झांटों के जंगल में छुपी हुई चूत खुल गई.. मदन इतना उत्तेजित था की उसे रूखी के अलावा और कुछ नजर ही नहीं आ रहा था.. उसके लंड की सख्ती देखकर ही पता चलता था की आज उसका सुरूर कुछ अलग ही था..

शीला ने मदन को खड़ा किया और रूखी की फैली हुई जांघों के बीच बिठा दिया.. और वो खुद रूखी के मुंह पर अपनी चूत लगाते हुए.. मदन के सामने मुंह रखकर बैठ गई.. मदन ने रूखी की दोनों जांघों को चौड़ा किया.. और एक ही धक्के में अपना पूरा लंड उसके गीले गुलिस्तान में डाल दिया..










धक्के लगाते हुए वो शीला को चूम रहा था.. रूखी नीचे से गांड उछाल उछालकर चुदवा रही थी.. और शीला रूखी से अपनी चूत चटवा रही थी.. मदन के लंड ने रूखी को तृप्त करके ही दम लिया.. और संतोष के भाव रूखी के चेहरे पर छलक उठें.. शीला भी अपना भोसड़ा रगड़ते हुए झड़ गई.. और शीला रूखी के ऊपर से उतर गई..

रूखी अब धीरे से खड़ी हुई.. और कपड़े पहनने लगी.. तैयार होकर वो चुपचाप चली गई.. शीला या मदन से बिना कुछ बात किए.. मदन का लंड मुरझाने के बाद उसे खयाल आया की अब शीला का क्या करें?? आज से पहले दोनों के बीच ऐसी स्थिति नहीं आई थी.. उसे पता था की शीला उसकी कोई सफाई सुनने वाली नहीं थी.. दूध भरे बबलों के प्रति उसका जुनून शीला जानती थी.. पर अब शीला क्या कहेगी वो उसके इंतज़ार में था.. शीला भी मदन की ओर तीखी नज़रों से देख रही थी..

काफी देर तक शीला कुछ नहीं बोली.. फिर मदन की तरफ उसका पतलून फेंकते हुए कहा "ले मदन.. कम से कम पेंट तो पहन ले.. अभी कविता या अनुमौसी मे से कोई आ गया तो उनको देखकर ये तेरी लुल्ली फिर से खड़ी हो जाएगी.. और वो ये सोचेंगे की इसका ऐसा हाल मुझे चोदकर हुआ है.. मेरी चुदाई हुई भी है या नहीं वो उन्हें कहाँ पता चलेगा.. !!"

मदन ने चुपचाप पेंट पहन लिया और धीमे से बोला "सॉरी यार.. पर मुझे ये पता नहीं चला की गुस्सा होने के बावजूद तू हमारे साथ शामिल कैसे हो गई?"

शीला गुस्से से कांपते हुए बोली: "मेरी गांड मरवाने शामिल हुई मैं.. !!! साले चूतिये.. तू और रूखी मजे उड़ाओ.. तो मैं क्या क्या खड़े खड़े देखती रहती.. ?? गुस्सा तो ऐसा आ रहा था.. मन कर रहा था की रसिक को अभी के अभी यहाँ बुलाऊँ.. और तेरे सामने ही उससे मेरा भोसड़ा फड़वा लूँ.. पर हम दोनों की लड़ाई में.. ओह आई एम सॉरी..!! अब तो रूखी भी शामिल हो चुकी है.. हम तीनों की लड़ाई में.. बेकार में रसिक से क्यों चुदवाऊँ.. !! मुझे कोई अपनी मर्जी का मर्द मिलने दे.. फिर देखना.. तेरी आँखों के सामने अगर मैंने अपनी चूत न मरवाई.. तो मेरा नाम बदल देना.. !!"

मदन: "शीलु मेरी जान... यार मुझसे गलती हो गई.. अगर मेरा विश्वास करे तो एक बात कहूँ.. ?? उस रूखी ने आकर मेरे सामने ऐसे ऐसे नखरे कीये.. जैसे मेरा तपोभंग करने आई हो.. झुक झुककर अपने बबले दिखा रही थी.. मैं कितना कंट्रोल करता यार.. !!"

शीला: "तू वहाँ विदेश में जब अपनी मकान-मालकिन के बबले चूस रहा था तब यहाँ मुझे देखकर कितने मर्द अपने लंड खुजाते थे.. तो क्या मैं उन सब के सामने टांगें फैलाकर चुद जाती.. !! एक बार तो एक सांड हमारे घर के बाहर खड़ा था.. इतना बड़ा लंड था उसका.. तो क्या मैं उसके नीचे सो जाती??" शीला जब बोलने बैठती तब कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता था..

मदन: "अरे यार तुम औरत हो.. औरतों में तो कंट्रोल होता है.. मर्द ही कंट्रोल नहीं कर सकते"

शीला: "कुछ भी हो मदन.. पर तूने जो कुछ भी किया वो ठीक नहीं किया.. अभी के अभी मेरी चूत ठंडी करनी है मुझे.. बता कैसे करेगा?? तू तो पिचकारी मारकर शांत हो गया.. उस रूखी की चूत में.. अब मैं क्या करूँ??"

मदन: "आई एम सॉरी यार.. अब छोड़ ना.. वो है ही ऐसी की देखकर लंड तैयार हो गया मेरा.. ऊपर से उसके दूध भरे बबलों की लालच.. तुझे तो पता है मेरी कमजोरी.. "

शीला जानबूझकर गुस्सा कर रही थी और मदन के मजे ले रही थी.. उसी वक्त दस्तक देकर कविता ने घर में प्रवेश किया..

"कैसे हो मदन भैया?" कोयल सी मीठी आवाज में कविता ने कहा

"अरे कविता.. आजा अंदर.. ये देख तेरी भाभी कब से क्लास ले रही है मेरी.. " मदन ने कहा.. कविता के आने से उसने राहत की सांस ली

कविता: "क्या हो गया भाभी? क्यूँ डांट रही हो भैया को?"

शीला ने मुंह बिगाड़कर कहा "अपने भैया से ही पूछ...!!"

मदन: "अरे ऐसी कोई खास बात नहीं है.. बेकार में तू बात का बतंगड़ बना रही है"

कविता: "अरे पर कोई मुझे बताएगा की आखिर बात क्या है?"

शीला और मदन दोनों चुप हो गए.. क्या बताते?? की मदन रूखी के बबले चूसते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया.. ??

शीला: "कुछ नहीं है कविता.. ये तो मियां-बीवी की रोज की नोंकझोंक है.. तू बता.. कैसे आना हुआ? कैसी चल रही ही मौसम की शादी की तैयारी?" बोलते बोलते शीला किचन में गई और कविता उसके पीछे पीछे

कविता: "बस चल रही है तैयारी.. मौसम की शादी के लिए पापा ने आपको और भैया को एक हफ्ते पहले से आने के लिए कहा है" फिर अचानक कविता ने कहा "एक मिनट भाभी... आज सुबह सुबह ही रोमांस का मुड़ बन गया था क्या?"

शीला: "क्यों?"

कविता धीरे से शीला के कान में कुछ फुसफुसाई

शीला: "नहीं रे नहीं.. ऐसा तो कुछ नहीं हुआ..पर क्यों पूछा??"

कविता: "आपके पेटीकोट के पीछे ये जो धब्बा है.. देखकर ही पता चलता है.. झूठ क्यों बोल रही हो भाभी.. आप के जितना अनुभव भले ही ना हो.. पर इतना तो मैं समझ ही सकती हूँ की ऐसे धब्बे कब बन जाते है कपड़ों पर"

चोंककर शीला ने अपने पीछे हाथ लगाकर देखा.. गिलेपन का एहसास होते ही वो शरमा गई.. रसिक के लोडे की दमदार पिचकारी से निकला वीर्य.. रह रहकर उसकी चूत से रिसकर पेटीकोट को गीला कर रहा था.. अच्छा हुआ जब वो मदन से झगड़ रही थी तब मदन का ध्यान नहीं गया..

शीला ने कविता को अपने करीब खींचा और उसके कान में कहा "ये धब्बा तुम्हारे भैया की वजह से नहीं बना है"

कविता चोंककर जोर से बोली "क्या??????" आँखें फटी की फटी रह गई उसकी.. और अपने चेहरे को शर्म के मारे हाथों से ढँकते हुए वो बोली "तो फिर किसका है?"

शीला: "वो मैं नहीं बता सकती.. टॉप सीक्रेट है.. जैसे तेरे और पिंटू का सीक्रेट है ना.. वैसा ही कुछ.. "

कविता: "अरे वाह भाभी.. आपने तो पहले कभी बताया ही नहीं.. बताइए ना.. कौन है वो?"

शीला: "अभी चुप मर.. फिर कभी बताऊँगी"

कविता ने शीला के पीछे जाकर फिर से वो धब्बा देखते हुए कहा "इतना बड़ा धब्बा?? मेरे कपड़ों पर तो बस छोटा सा दाग ही होता है.. आप तो जैसे पानी के पोखर में बैठकर आई हो इतना गीला हो गया है.. "

शीला ने कुहनी तक हाथ दिखाकर इशारा करते हुए कहा "इतना बड़ा है उसका.. देखा है कभी इतना बड़ा लंड??" फिर अपने दोनों हथेलियों को जोड़कर बोली "इतना सारा निकला था.. तभी तो बड़ा धब्बा बना हुआ है.. थोड़ी सी पिचकारी से कभी ऐसा धब्बा थोड़े ही बनता है"

"बाप रे भाभी.. क्या आप भी.. !!" "लंड" शब्द सुनकर कविता का गोरा मुखड़ा शर्म से लाल लाल हो गया.. इतना बड़ा लंड कैसे हो सकता है??

अचानक कविता के हावभाव बदल गए.. उसे वो मनहूस रात याद आ गई जब उसकी सास ने आइसक्रीम में दवाई मिलाकर उसे बेहोश करने की कोशिश की थी.. और रसिक के साथ उसके जिस्म का सौदा कर दिया था.. और रसिक ने उसकी चूचियाँ भी दबा दी थी.. आज तक पीयूष और पिंटू के अलावा किसी ने उसके नंगे जिस्म को हाथ नहीं लगाया था.. रसिक का लंड जब उसने देखा तब उसका दिल बैठ गया था.. कितना बड़ा था.. !!! बाप रे बाप.. !! वो शीला को कहना चाहती थी की.. हाँ.. उतना बड़ा लंड मैंने देखा है.. पर फिर आगे क्या बताती?

शीला: "क्या हुआ? चुप क्यों हो गई?? यही सोच रही है ना की इतना बड़ा लंड कैसे हो सकता है.. !! अरे भाई.. तुम आजकल की लड़कियों ने दुनिया देखी ही कहाँ है.. !! गाँव के देसी घी की ताकत का तुम्हें अंदाजा भी नहीं है"

कविता: "भाभी... !! आपने कितनों के देख रखे है??"

शीला: "चुप कर.. अब तू मेरी तहकीकात मत कर.. बात मेरी नहीं हो रही अभी.. बात बड़े लंड की हो रही है.. " मदन घर में मौजूद था इसलिए दोनों चुपके चुपके बात कर रही थी

शीला बड़े लंड का विवरण दे रही थी.. और कविता को शीला के प्रत्येक शब्द सुनकर रसिक का डरावना लंड याद आ रहा था.. देसी घी?? कविता सोच में पड़ गई.. उसकी सास भी रसिक के प्यार में पागल थी.. अब शीला भाभी भी वहीं भाषा में बात कर रही थी.. सासु माँ तो प्यार में ऐसी पागल हो गई थी की मेरे जिस्म का ही सौदा कर बैठी थी रसिक के साथ.. इस बुढ़ापे में इतनी नीच हरकत करने के लिए वो तैयार हो गई.. मतलब कुछ तो खास बात होगी उसमें..

शीला: "तेरे भैया जब बाहर जाए.. तब ये बात याद दिलाना मुझे.. अभी ज्यादा बात करना ठीक नहीं होगा.. !!"

कविता और शीला किचन में बातें कर रही थी उस वक्त.. मदन को राजेश का फोन आया.. बात करने के बाद.. फोन कट करने से पहले उसने राजेश से कहा "मैं शीला को पूछकर अभी दो मिनट में बताता हूँ"

मदन: "शीला, राजेश बिजनेस के काम से चार दिनों के लिए बेंगलोर जा रहा है.. अकेला ही है और मुझे साथ ले जाना चाहता है.. अगर तुझे प्रॉब्लेम न हो तो मैं चला जाऊँ उसके साथ?"

शीला: "कब जाना है?? तू यार एन मौके पर ऐसे प्रोग्राम बनाएगा तो कैसे चलेगा?? फिर मैं यहाँ चार दिन तक क्या करूँ?"

कविता खिलखिलाकर हंस पड़ी.. "चार दिन तक क्या करूँ" इस वाक्य का सही अर्थ वो समझ रही थी

मदन: "अरे यार.. तू गुस्सा मत कर.. मैं मना कर देता हूँ राजेश को.. " थोड़ी नाराजगी के साथ मदन ने कहा

कविता: "अरे भाभी.. प्लान बन रहा है तो जाने दो भैया को.. राजेश सर की कंपनी भी है.. क्या आप भी.. !!"

शीला: "अरे वाह.. बड़ी तरफदारी कर रही है अपने भैया की.." कविता का कान खींचते हुए शीला ने कहा

कविता: "वो इसलिए की अगर मदन भैया नहीं गए.. तो राजेश सर जरूर पीयूष को अपने साथ बेंगलोर ले जाएंगे.. फिर चार दिन तक मैं क्या करूँ??" हँसते हुए कविता ने कहा

शीला: "कमीनी.. एक नंबर की चैप्टर है तू.. ठीक है.. तू कह रही है इसलिए जाने देती हूँ.. वरना इन पतियों को ज्यादा छूट देनी नहीं चाहिए.. वरना साले हमारी आँखों के सामने ही इनकी रास-लीला शुरू हो जाएगी"

मदन ने तुरंत फॉन पर राजेश को बता दिया की वो साथ चलेगा.. राजेश ने मदन को चार बजे उसकी ऑफिस पर पहुँचने के लिए कहा

तुरंत ही मदन ने पेकिंग शुरू कर दी.. कुछ जरूरी सामान लेने वो बाहर गया

कृत्रिम क्रोध के साथ शीला ने कहा "कविता, अब तू मेरे साथ ही रहेगी.. तूने मुझे अकेला कर दिया.. अब मैं भी तुझे पीयूष के साथ नहीं रहने दूँगी.. मेरा उपवास होगा तो तुझे भी खाने नहीं दूँगी मैं.. !!"

कविता: "कोई बात नहीं भाभी.. मैं मम्मीजी को बताकर आती हूँ की आज आपके साथ ही खाना खाऊँगी.. मैं आई दो मिनट में"

कविता गई.. कमर तक लटक रही चोटी को हिलाते हुए.. अपनी पतली कमर मटकाते जा रही कविता को पीछे से देखती रही शीला.. और सोच रही थी.. हे भगवान.. इस पतली सी लड़की पर अगर रसिक चढ़ेगा तो इसका क्या हाल होगा?? कविता की चोटी जितनी लंबी है उतना ही लंबा लोडा है रसिक का..

कविता जल्दी जल्दी घर गई और तुरंत वापिस लौट आई.. दरवाजा अंदर से लॉक करके सोफ़े पर बैठ गई.. खाना तैयार था और दोनों मदन के आने का इंतज़ार करने लगे..

शीला: "दरवाजा क्यों बंद किया?? मदन अभी आता ही होगा? शेविंग क्रीम लेने ही तो गया है"

कविता: "हमारी बातें डिस्टर्ब न हो इसलिए मैंने दरवाजा बंद कर दिया है.. मदन भैया आएंगे तब खोल देंगे.. "

शीला वापिस बड़े लंड की बात शुरू करेगी इस इंतज़ार में कविता थोड़ी देर बैठी रही.. फिर बात की शुरुआत करने के लिए उसने कहा

कविता: "भाभी, मौसम की सगाई के दिन आप बहोत सुंदर लग रही थी"

शीला: "हाँ और तू भी बहोत प्यारी लग रही थी.. जब पिंटू के साथ खड़ी थी"

कविता: "क्या सच में?? हम दोनों की जोड़ी इतनी सुंदर लगती है भाभी?"

शीला: "हाँ बहोत ही अच्छी लग रही थी.. पीयूष से तलाक लेकर पिंटू से शादी कर ले"

कविता ने एक गहरी सांस छोड़ी.. और चुप हो गई

कविता: "रेणुका जी और राजेश सर की जोड़ी भी बहोत मस्त लग रही थी.. हैं ना भाभी?"

शीला: "अरे तेरी बात से मुझे याद आया.. राजेश बिजनेस टूर पर जा रहा है तो रेणुका भी घर पर अकेली होगी.. उसके घर ही चली जाती हूँ.. पर.. फिर वैशाली अकेली हो जाएगी.. रेणुका को ही यहाँ बुला लेती हूँ"

कविता बैठे बैठे टीवी देख रही थी तब शीला ने रेणुका के मोबाइल पर कॉल लगाया.. रेणुका ने तुरंत उठाया

रेणुका: "हाई शीला.. मैं तुझे ही याद कर रही थी.. कितने दिन हो गए हमें मिलें हुए.. तू तो मुझे भूल ही गई है"

शीला: "नहीं यार.. भूल गई होती तो फोन क्यों करती तुझे.. !! बोल क्या कर रही है? अकेली है?"

रेणुका: "दिन के समय तो मैं अकेली ही होती हूँ.. क्यों पूछा.. ?? कोई आया है क्या??" रेणुका का इशारा रसिक की तरफ था

शीला: "नहीं यार.. वैसे कल तेरा क्या प्रोग्राम है?"

रेणुका: "कुछ खास नहीं.. राजेश के साथ मूवी देखने जाने का प्लान है"

शीला: "क्यों?? राजेश बेंगलोर नहीं जाने वाला?? मदन को तो उसने कॉल किया था की वो चार दिनों के लिए जा रहा है और मदन भी उसके साथ जाने वाला है.. अभी खाना खाकर मदन निकलने ही वाला है"

तभी घर की डोरबेल बजी..

रेणुका से बातें करते हुए शीला ने दरवाजा खोला.. मदन के अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया.. बातें करते करते शीला ने खाना परोसा.. और फिर मदन ने खाना फटाफट खतम किया और अपना बेग लेकर तुरंत निकल गया

शीला: "मतलब तुझे पता ही नहीं है की राजेश बेंगलोर जाने वाला है??"

रेणुका: "वैसे तो मुझे बताकर जाता है.. पर हो सकता है की कोई अर्जेंट काम निकल आया हो" रेणुका काफी मुक्त विचारों वाली थी.. उसे राजेश पर पूरा भरोसा था..

दोनों की बातें चल रही थी तब रेणुका के बेडरूम में किसी ओर मोबाइल की रिंग सुनाई दी

रेणुका: "अरे, राजेश अपना दूसरा मोबाइल घर पर ही भूल गया है.. किसी का कॉल आ रहा है.. तू फोन चालू रख.. " रेणुका ने दूसरे फोन पर बात करते हुए कहा "ओके, थेंकस.. मैं उन्हें बता दूँगी" कहते हुए दूसरा फोन कट कर दिया

रेणुका: "शीला.. यार मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा है"

शीला: "क्यों?? क्या हुआ?"

रेणुका: "एक काम कर.. तू मेरे घर आजा.. फिर सब बताती हूँ"

शीला: "अरे यार.. मैं अभी कविता के साथ हूँ.. और शाम को वैशाली भी घर आ जाएगी.. मैं नहीं आ सकती"

रेणुका: "कविता शाम तक थोड़े ही तेरे साथ रहेगी.. !! वो तो पीयूष के आते ही घुस जाएगी उसकी बाहों में.. सर्दी कितनी है.. !! सब को अपना अपना हीटर याद आ जाता है रात को.. तू एक काम कर.. कविता को निपटाकर घर भेज दें.. और तू यहाँ चली आ.. मैं पिंटू को फोन करके बता देती हूँ को वो शाम को वैशाली को यहाँ छोड़ जाएँ.. तीनों साथ डिनर करेंगे.. !!"

शीला: "ठीक है.. मैं एक घंटे में फोन करती हूँ.. तब तक देख.. शायद राजेश तुझे फोन करें.. !!"

रेणुका: "ओके.. ठीक है.. बाय.. मैं इंतज़ार करूंगी तेरा.. !!"

रेणुका ने फोन रख दिया..

कविता और शीला ने एकाध घंटे तक काफी बातें की.. कविता के सवालों में.. देसी घी और बड़े लंड का बार बार जिक्र होता था.. उसकी तमाम बातें कामअग्नि को भड़काने वाली थी..पेट्रोल से आग बुझाने की कोशिश कर रही थी कविता... ऊपर से शीला की गरम बातें उसे और उत्तेजित कर रही थी.. कविता के चेहरे के खुमार को देखकर मन ही मन खुश हो रही थी शीला.. कविता के सवालों का जवाब देते देते शीला भी गरम हो गई थी..

कविता: "भाभी, अब तो मदन भैया भी चले गए.. मैं दरवाजा बंद कर देती हूँ.. अब सारी बातें विस्तार से बताइए मुझे.. मुझे सुनने में बहोत मज़ा आ रहा है"

शीला: "तू अभी नादान है कविता.. तेरी उम्र की थी तब मैं भी ऐसी ही थी.. मैंने खुद ही सेक्स के सारे पाठ पढ़ें.. और ऐसी माहिर हो गई की आज भी मदन को खुश रख पाती हूँ.. हम औरतें पति की खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार होते है.. उनको पूरा संतोष मिलें.. उनका दिल ना दुखें.. इसका पूरा पूरा ध्यान रखते है.. पर क्या हम अपनी खुशी के लिए भी कभी जीते है क्या?? सब कुछ वहीं करते है जो पति को पसंद हो.. एक बात बता.. तू पीयूष का लंड चूसती है क्या??"

शीला के इस अचानक सवाल से कविता शर्म से पानी पानी हो गई

"हाँ भाभी.. " कविता ने सिर्फ इतना ही कहा

"कितनी देर तक?"

"थोड़ी देर के लिए ही भाभी"

शीला: "क्यों? ज्यादा देर तक क्यों नहीं चूसती?"

"अच्छा नहीं लगता भाभी.. मुंह दुखने लगता है"

शीला: "मैं तेरे भैया का लंड तब तक चूसती हूँ जब तक की वो हाथ जोड़कर बाहर निकालने के लिए विनती न करें.. ऐसी चुसाई करो तो पति खुश होगा ही होगा.. अरे खुश क्या होगा.. हमारा गुलाम बन कर रहेगा.. अगर ठीक से चूसना आता हो तो.. !! अच्छा.. ये बता.. तुझे अपनी चूत चटवाने में मज़ा आता है?"

कविता: "बहोत मज़ा आता है भाभी.. इतना मज़ा आता है की उसके अंदर डालने से पहले ही मैं झड़ जाती हूँ.. सिर्फ चटवाकर ही मैं पूरी संतुष्ट हो जाती हूँ"

शीला: "अच्छा.. मान ले अगर पीयूष को चाटना पसंद न हो.. तो??"

कविता: "पर उसे तो बहोत पसंद है भाभी.. मुझे इन सब चीजों के बारे में कहाँ पता ही था?? शादी करके आई तब मुझे सिर्फ किस और बूब्स दबाने के अलावा और कुछ पता नहीं था"

शीला: "झूठ मत बोल.. शादी के पहले पिंटू के साथ कुछ नहीं किया था क्या?? उसका देखा तो होगा ही तूने.. !!"

कविता: "देखने में और चूसने में फरक होता है ना भाभी.. !! मेरा पिंटू तो इतना अच्छा है की मेरी कितनी मिन्नतों बाद उसने मुझे अपना लंड दिखाया था.. मैं जबरदस्ती उसका हाथ अपने बूब्स पर रख दूँ तभी वो दबाता था"

शीला: "क्यों भला.. !! उसका खड़ा नहीं होता है क्या?? पिंटू को तुझे चोदने का मन नहीं करता था क्या? तेरे जैसी सुंदर लड़की अकेले में मिल जाएँ तो अच्छे अच्छों की नियत खराब हो जाएँ"

कविता: "खड़ा भी होता था.. और पत्थर जैसा सख्त भी हो जाता था.. कभी कभी मैं जिद करके पेंट के ऊपर से उसका पकड़ लेती थी तब पता चलता था की कितना टाइट हो जाता उसका लंड.. पर थोड़ी देर सहलाने के बाद वो मेरा हाथ हटा देता था"

शीला: "अजीब बात है.. !! मैंने आज तक ऐसा मर्द नहीं देखा.. जो इतने टाइट माल को चोदने से अपने आप को रोक सकें.. !!"

कविता: "मैं भी वहीं कहती थी उसे भाभी.. तो वो बोलता.. की मेरी शादी हो जाएँ उसके बाद हम सब कुछ करेंगे.. वो चाहता था की मुझे पहली बार मेरा पति ही चोदे.. मेरा बहोत मन था की मैं अपना सील पिंटू से तुड़वाऊँ.. पर वो माना ही नहीं.. !!"

शीला: "तूने पहली बार पिंटू का लंड देखा तब कैसा महसूस हुआ था? शादी के आखिरी हफ्ते तक उसने तुझे अपना लंड क्यों नहीं दिखाया?"

कविता: "वो तो दिखाना चाहता ही नहीं था.. पर हमारी किसी बात को लेकर शर्त लगी थी जो मैं जीत गई और बदले में मैंने उसे अपना लंड दिखाने के लिए कहा"

शीला: "पागल.. सिर्फ लंड देखने के लिए क्यों कहा? चुदवा ही लेती.. !!"

कविता: "तब मेरे दिमाग में नहीं आई ये बात.. वरना मज़ा आ जाता भाभी.. "

बात करते करते शीला खड़ी हुई और कविता के करीब आई.. कविता की छाती से उसका पल्लू हटा दिया.. ब्लाउस में कैद अमरूद जैसे उसके स्तनों को पकड़ते हुए.. झुककर उसने अत्यंत कामुकता से कविता के लाल होंठों को चूम लिया..






शीला: "सिर्फ बातें करते करते हम कितनी गरम हो गई.. !! सच बता.. नीचे गीला हो रहा है या नहीं?"

कविता: "ओह भाभी.. जरा जोर से दबाइए ना.. हाँ.. नीचे गीली हो गई है मेरी.. और चूल भी मच रही है.. आपने चाटने की बात की और मेरी वो.. नीचे पानी छोड़ने लगी.. आह्ह.. अभी कोई आकर चाटने को तैयार हो तो मैं अभी अपनी टांगें फैलाकर लेट जाऊँ.."

शीला: "जैसा मन तुझे अभी कर रहा है.. पुरुषों को चौबीसों घंटे होता रहता है.. की काश कोई आकर उनका लंड चूसें.. इसलिए.. लंड चूसने के लिए कभी खुद का मूड नहीं देखना चाहिए.. बस सहूलियत देखनी चाहिए.. उनकी इच्छा तो हमेशा होगी.. और हमारा मूड कभी नहीं होगा.. समझी?? मरने की हालत में पड़े हुए मर्द का लंड अगर कोई चूस ले तो वो तब भी मना नहीं करेगा.. बल्कि बच जाएगा"

कविता ने शीला के खरबूजे जैसे स्तनों पर चेहरा रख दिया.. और उसकी गदराई कमर को दोनों हाथों से लपेट लिया.. शीला के विशाल स्तनों पर अपना गाल रगड़ने लगी कविता

शीला: "जब हमें पता है की हमारे पति को इससे खुशी मिलती है.. फिर उन्हें क्यों उस सुख से वंचित रखना.. !!"

कविता: "पता नहीं भाभी.. पर मुझे लंड चूसना ज्यादा पसंद नहीं है.. हाँ चूत चटवाना बहोत अच्छा लगता है"

शीला ने धीरे से अपने ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना एक स्तन बाहर निकाला.. और कविता के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा "ले कविता.. चूस ले इसे.. देख.. बातें करते हुए कितने सख्त हो गए है ये.. मैं जब भी गर्म हो जाती है तब ये सख्त पत्थर जैसे हो जाते है.. मदन होता तो दोनों हाथों से मसल मसलकर इन्हें ढीले कर देता.. आज यह जिम्मेदारी तेरी है.. चल अब तू मदन बन जा.. और इन्हें मसल दे.. फट रही है छातियाँ मेरी.. आह्ह.. जल्दी जल्दी कर यार.. !!"

कविता के मुंह में निप्पल देकर शीला ने बात आगे बढ़ाई..








शीला: "कविता, अभी तू नाजुक है.. तेरी चूत सिर्फ पीयूष का लंड अंदर ले सकें उतनी ही चौड़ी हुई होगी.. पर तुझे पता है.. सब लंड एक जैसे नहीं होते.. अलग अलग रंग.. अलग अलग साइज़.. अलग अलग मोटाई होती है सब की"

शीला की एक इंच लंबी निप्पल को मुंह से निकालकर कविता ने कहा "हाँ भाभी, पीयूष कभी कभी तीन तीन उँगलियाँ एक साथ डाल देता है..तब दर्द होता है.. मैं मुश्किल से दो उँगलियाँ ही अंदर ले पाती हूँ.. पिंटू और पीयूष के लंड की साइज़ एक सी है.. !!"

शीला: "मेरे छेद में तो मदन चार उँगलियाँ डाल दे तो भी कम पड़ जाती है मुझे.. आह्ह कविता.. मोटा तगड़ा लंड अंदर डलवाने में जो मज़ा आता है.. वो मैं बता नहीं सकती.. अंदर ऐसे घुसता है.. चूत की दीवारों से रगड़ खाता हुआ.. आह्ह.. दिल गार्डन गार्डन हो जाता है"

"दर्द नहीं होता आपको??" कविता ने फिर से निप्पल मुंह में लेकर चूसते हुए कहा

शीला ने कविता के सर को अपने स्तनों से दबाते हुए कहा "अरे मेरी जान.. उसी में तो असली मज़ा आता है.. उस दुख में जो सुख है वो ओर किसी में नहीं.. चल अब नीचे भी थोड़ा सा सहला दें.. " कविता का हाथ पकड़कर शीला ने अपने घाघरे के अंदर डालकर.. भोसड़े पर दबा दिया..






"ओह्ह भाभी.. कितनी गरम है आपकी तो.. !! बाप रे.. !!" शीला के भोसड़े के वर्टिकल होंठों पर लगे चिपचिपे प्रवाही को हथेली से पूरी भोस पर रगड़ते हुए कविता ने कहा

"बस बस.. ओर नहीं कविता.. फिर मेरा मन हो गया तो लंड कहाँ से लाएंगे?? प्लीज रहने दे.. !!" शीला ने सिसकते हुए कहा

कविता को बेहद उत्तेजित करने के बाद शीला ने कहा "कविता, अब मुझे रेणुका के घर जाना होगा.. तू अपने घर जा और मैं रेणुका के घर के लिए निकलती हूँ.. इस बारे में हम कभी विस्तार से बात करेंगे.. जब किसी दिन पीयूष और मदन दोनों न हों, तब तू रात को सोने आ जान.. सब समझूँगी.. ठीक है.. !!"

कविता को गर्म करके मजधार में छोड़ दिया शीला ने.. और मन ही मन खुश होते हुए वो कपड़े बदलने गई.. कविता के सामने ही वो कपड़े बदल रही थी.. जब शीला अपने सारे कपड़े उतारकर मादरजात नंगी हो गई तब उसे देखकर कविता का गला सूखने लगा.. बेड के कोने पर एक पैर टिकाकर शीला ने कविता की आँखों के सामने ही.. अपना भोसड़ा दबा दिया.. और तेजी से उंगलियों को अंदर बाहर करते हुए.. भोसड़े का सारा पानी अपनी हथेली में ले लिया..








और फिर कविता के पल्लू से उसे पोंछ दिया.. और कपड़े पहन लिए.. चूत की असन्तुष्ट भूख से परेशान होते हुए कविता अपने घर चली गई.. अच्छा तो शीला को भी नहीं लगा था.. कविता को यूं गर्म कर छोड़ देना.. पर अभी उसकी चूत को ठंडा करने का समय नहीं था.. फिलहाल रेणुका के घर जल्दी पहुंचना जरूरी था.. अगर जल्दी न होती तो वो कविता की चूत को ठंडा जरूर कर देती..

कविता के जाने के बाद, शीला ने वैशाली को फोन कर बता दिया की वो रेणुका के घर जा रही है और उसे भी शाम को ऑफिस से छूटकर वहीं पहुंचना है..



शीला तैयार होकर, अपना पर्स लेकर निकल पड़ी, रेणुका के घर जाने के लिए..
 
Back
Top