Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 104 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भैया के लिए खीर

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मंजू भाभी बुच्ची से बोलीं,

"हे तू चल, ये लेकर, इमरतिया अभी ऊपर होगी। अभी आधे घण्टे में मैं शीलवा के साथ अपन लोगों का खाना लेकर आती हूँ, हम लोगो को भी कोहबर में ही रात का खाना खाना होगा "

और बुच्ची थाली लेकर ऊपर, लेकिन देह अभी भी गिनगीना रही थी।

सबेरे तो इमरतिया भौजी ने भैया के सामने बैठा के मेरे हाथ से खाना खिलवाया था लेकिन अबकी तो गोद में बैठ के उनके खिलाऊंगी, बेचारे मन भी करता है उनका और सोझ भी बहुत हैं, लेकिन, ….“

सोच सोच के बुच्ची मुस्करा रही थी

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और कमरे में घुसते ही उसकी आँखे चौंधिया गयी,

इमरती भौजी क पेटीकोट ब्लाउज दोनों फर्श पे पड़ा था, तो मतलब वो भैया के साथ गपागप कर ली,....

और फिर उसकी आँखे फ़ैल गयी,

दोपहर में जाने के पहले बुच्ची भैया के सामने बोल गयी थी, "पहले भौजी,... और उसके बाद उसका नंबर". और अब भौजी का नंबर लग गया तो,.... फिर अब तो कोई बहाना भी नहीं,

बुच्ची कुछ सोच के मुस्करा पड़ी, लग जाय नंबर तो लग जाए, शीलवा कब से घोंट रही है, उसकी क्लास वालियों में से दो चार ही बुच्ची ऐसी कोरी बची हैं और उसके अपने गाँव में भी, लेकिन उसने कब से मन बना रखा था, लेगी तो भैया का ही। और भैया इतने लजाधुर हैं तो पहल तो बुच्चिए को करनी पड़ेगी। दुनो जनी लजायेंगे तो हो चुका , घपघप।

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ये तो इमरतिया भौजी ऐसे भौजी हैं की भैया क कुछ लाज कम की और फिर अब एक बार वो घोंट ली हैं तो बुच्ची क भी काइन क्लियर है लेकिन अब बुच्ची को ही भैय्या को उकसाना पड़ेगा।

और भैया एकदम उठ के बैठ गए, बस एक पतली सी तौलिया खींच के अपनी गोद में रख लिए, उसको ढंकने के लिए, खूंटा फिर से खड़ा था

बुच्ची बस मन ही मन मना रही थी, आज भैया के खुले खड़े, कड़े खूंटे पे बैठने को मिल जाए और भौजी कौन जो ननद की बिन बोली मन की बात न समझ जाए,

" हे छिनार, अरे हमरे देवर की गोद में बैठ के अपने हाथ से खिलाओ, ऐसे ननद नहीं हो "

इमरतिया ने न सिर्फ बोला बल्कि धक्का देके उसे सुरजू की गोद में,

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और भौजी वो भी इमरतिया जैसी हो, साथ ही साथ उसने सुरजू की गोद से वो तौलिया खींच दिया और ननद की स्कर्ट उठा दी,

भैय्या के मोटे डंडे और बहिनिया की कच्ची कोरी बिल की मुलाकात हो गयी,

नीचे बुच्ची की सहेली चुनिया ने हाथ पकड़ा था और कहारिन भौजी ने आराम से उसकी मोटी चड्ढी खींच के उतार दी थी, फिर इतनी भौजाई, किसने फाड़ी, किसके किसके बीच बंटी, लेकिन बुच्ची की बिलिया अब एकदम खुली थी और वो गीली पनियाई बिल अब सीधे खड़े, फड़फड़ाते सूरजु भैया के खूंटे पे

तबतक घिस्सा मार के, बुच्ची अपने भैया की गोद में बैठ चुकी थी और इमरतिया की बात का जवाब सीधे सुरजू को देते मुस्करा के आँख नचा के बोली,

" हे भैया, अपने हाथ से खिलाऊंगी, और तोहें अब आपन हाथ इस्तेमाल ये बहिनिया के रहते इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है "

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" और क्या बहिनिया तोर ठीक कह रही है लेकिन कल की लौंडिया, ....गिर पड़ेगी, कस के अपने हाथ से पकड़ लो इसे "

इमरतिया ने मुस्करा के सुरजू को ललकारा,

बुच्ची के आने के पहले ही दस बार वो समझा चुकी थी, अब लजाना छोड़े, बुच्ची के साथ खुल के मजा ले, वो कच्ची उम्र की लौंडिया खुल के बोलती है, मजे लेती है सुरजू पीछे रहा जाता है।

सुरजू ने हाथ कमर पे लगाया लेकिन इमरतिया ने पकड़ के सीधे गोल गोल चूँचियों पे ,

" एकदम बुरबक हो का, अरे बिधना इतना बड़ा बड़ा गोल गोल लड़की की देह में बनाये हैं पकड़ने के लिए और तू "

और ये करने के पहले बुच्ची का टॉप भी उठा दिया,

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अब सुरजू के दोनों हाथ बुच्ची के बस जस्ट आ रहे उभारो पे, एकदम रुई के फाहे जैसे, उसे लग रहा था किसी ने दोनों हाथो में हवा मिठाई आ गयी हो, वो बस हिम्मत कर के छू रहा था और नीचे अब बुच्ची के खुले छोटे छोटे चूतड़ों से रगड़ के उसका खूंटा एकदम करवट ले रहा था और ऊपर से बुच्ची और डबल मीनिंग डायलॉग बोल के

" भैया पूरा खोल न मुंह, अरे जैसा हमार भौजी लोग बड़ा बड़ा खोलती हैं, क्यों भौजी "

इमरतिया को चिढ़ाती बुच्ची बोली और ये भी बता दिया की उसे मालूम चल गया की इमरतिया भौजी ने उसके भैया का अभी थोड़ी देर पहले ही घोंटा है।

सुरजू ने मुंह खोल दिया, पर इमरतिया क्यों मौका छोड़ती, वो भी बुच्ची की तरह सुरजू के ही पीछे पड़ी थी।

"अरे हमार ननद इतने प्यार से दे रही है, और तुम लेने में पीछे हट रहे हो, नाक मत कटाना ले लो आज मन भर के "

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बुच्ची और उनके भैया - सोने की थाली में जोबना परोसे

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और पहल भी बुच्ची ने ही की, कौर भैया के मुंह में डालने के चक्कर में थोड़ा सा और वो सरकी, एक बार में खुले मुंह में कौर डाला और सरकने से खूंटा उसके भैया का बुच्ची की अगली दरार के मुंह पे,

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मस्ती से बुच्ची के निचले होंठ पहले से ही गीले थे और अब पहली बार मर्द के खूंटे की रगड़ लगी,.... तो एकदम गिनगीना गए, फड़कने लगे।

बुच्ची की देह में एक नया नशा छा गया, मजाक की, चिढ़ाने और छेड़ने की बात अलग है,... लेकिन भाई का खूंटा वो भी एकदम सीधे सीधे बहन की बिल पे,.... उसकी ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे लेकिन हिम्मत कर के उसने सुरजू को उकसाना छेड़ना जारी रखा, और अबकी इमरतिया को जवाब दिया

" अरे भौजी, आज क्यों,… रोज, जब भैया का मन करे,.... हाँ अब आपके देवर का ही मन न करे तो बात अलग है " और जैसे मुंह बना के उदास सी हो गयी।

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सच में ननद की जात ही छिनार की जात है।

' मन क्यों नहीं करता, बुच्ची मन तो बहुत करता है, "

सुरजू के मन से अब मन की बात निकल गयी और भौजी ने कैच कर लिया।

" अरे मन करता है तो लो न कस के, अब यहाँ और कौन है मैं हूँ, बुच्ची है और तुम हो "

इमरतिया ने ललकारा और आँख से घुरा भी जैसे कह रही हो यही साले सिखाया था इत्ती देर से,

और सुरजू के दोनों हाथ, अब बुच्ची के छोटे छोटे जुबना कस कस के मसलने, रगड़ने लगे, कभी दबाते, कभी कुचलते।

ताकत की तो कमी न थी और थोड़ी देर पहले ही इमरतिया के बड़े बड़े जोबन का रस ले लेकर काफी कुछ वो सीख चुका था। बस रस ले ले कर बुच्ची की जस्ट आती हुयी कच्ची कच्ची चूँची और नीचे से अब खूंटा भी एकदम खड़ा बार बार बुच्ची की बुर में डंक मार रहा था. और बुरिया भी ऐसी की जहाँ अभी साल भर भी नहीं हुए थे झांटे आते, एकदम टाइट, ढंग से सहेलियों की भौजाइयों की ऊँगली भी अभी नहीं गयी थी, दोनों फांके एकदम चिपकी।

लेकिन इमरतिया को अब इतने में मजा नहीं आ रहा था, उसने सुरजू को बगल में रखी तेल की कटोरी की ओर,.... और ननद की बुर की ओर इशारा किया,

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बस

सुरजू की हथेली अब बुच्ची की जांघ के बीच सीधे बिलिया पे और बुच्ची ने पूरी ताकत से जाँघे फैला दी जिससे पूरी हथेली सीधे रगड़ रगड़ .भाभियों, सहेलियों ने तो बहुत चुनमुनिया को रगड़ा था, दुलार किया था राजदुलारी का लेकिन पहले बार गुलाबो पर किसी मरद का हाथ पड़ा था, वो भी भाई का, जिसका खूंटा घोंटने के लिए बुच्ची खुद बेचैन थी।

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सिसकते हुए वो भैया को खाना खिला रही थी लेकिन इमरतिया बोली,

अरे बुच्ची अब खीर और सीधे सकोरे से, भैया का मुंह लगाय के

और सुरजू से बोली, और जुठ कर के थोड़ा बहिनिया के लिए छोड़ देना,

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सकोरे को जैसे मुंह सुरजू ने लगाया,

इमरतिया ने खुद सुरजू का हाथ पकड़ के पहले दो उंगलिया तेल के कटोरे में डुबोई और फिर बुच्ची की बिल में

अब सुरजू को उसके आगे बताने की जरूरत नहीं थी। इमरतिया ने दस बार बताई थी बुच्ची के आने के पहले, 'ऊँगली जरूर करना, जो लड़की आज ऊँगली घोंटेंगी, कल लंड जरूर घोंटेंगी "

गच्चाक

पूरी ताकत से ऊँगली पेल दी, पहलवान का हाथ गच्च से दो पोर अंदर चला गया। लेकिन सूरजु को भी कसी चूत का मतलब समझ में आया, तेल में चुपड़ी थी,तेल टपक रहा था तब भी पूरी कलाई का जोर लगाने के बाद घुमा घुमा के, एक ऊँगली किसी तरह घुसी और बुच्ची ने खुद अपनी जाँघे फैला ली, इमरतिया भौजी सही कह रही है, बिना पूरा जोर लगाए इस बिल में लंड नहीं घुसने वाला, लेकिन बिना घुसाए अब वो छोड़ेगा भी नहीं।

और बुच्ची की सिसकी निकल गयी।

ओह्ह भैया ओह्ह्ह बदमाश नहीं हाँ ओह्ह

लेकिन थी वो भी बदमाश,

एक हाथ से सकोरे को पकडे दूसरे हाथ से सीधे भैया के मस्ताए लंड को पकड़ लिया और अपनी बिल के ऊपर,....

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सुपाड़ा पागल हो रहा था, उस दर्जा नौ वाली टीनेजर की कच्ची कसी फांको पे रगड़ रहा था, धक्के मार रहा था।

खाना ख़तम हो गया था, लेकिन देह की जो भूख सूरजु और बुच्ची के मन और तन में लग गयी थी वो इतनी जल्दी नहीं ख़तम होने वाली थी।

जैसे एक बार इंसान का गोश्त खाकर शेर आदमखोर हो जाता है उसी तरह लंड भी एक बार चूत का मजा पाकर, उसके बिना रह नहीं पाता।

और फिर बुच्ची जैसी कच्ची कली जो अभी कैशोर्य का दरवाजा खटखटा रही थी, उसकी कच्ची चूत में पहले तो तेल लगी ऊँगली और फिर मोटा सुपाड़ा दोनों फांको के बीच फंसा, धंसा, कसमसाता, बस सूरजु सोच रहे थे बस एक बार मौका मिल जाए, बिन फाड़े छोडूंगा नहीं और उससे बढ़कर उन्हें बुच्ची में अपनी पांच छह दिन बाद मिलने वाली दुलहिनिया नजर आ रही थी।

बुच्ची से मुश्किल से साल भर ही तो बड़ी होगी, ऐसी ही कसी कसी उसकी भी होगी, लेकिन जो ट्रिक भौजी ने सिखाई थी, माई भी तो बोली थीं, दो चार गाँव न सही लेकिन अपने गाँव में तो जरूर चीख सुनाई देगी, बहुत मजा आएगा, और दुलहिनिया को सोचते हुए बहिनिया की बिल में रगड़ घिस रगड़ घिस

और बुच्ची की बुर में आग लग गयी थी,

बस वह यही सोच रही थी, चाहे कितना दर्द हो, भले बुर खून का आंसू रोये, फट के चिथड़ा हो जाए, लेकिन अपने भैया का, सूरजु भैया के वो लेगी जरूर अपने अंदर

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ख़तम हो गया था, खाने की थाली इमरतिया ने उठा ली थी। लेकिन खीर का सकोरा अभी भी बुच्ची पकडे थी

लेकिन तभी झटके से दरवाजा खुला और मंजू भाभी और शीला अंदर, ये बोलने के लिए की कोहबर वालियों का खाना वो लोग ले के आयी है, बुच्ची और इमरतिया भी आ जाएँ। लेकिन सुरजू को देख के मंजू भाभी ने देवर को हड़काया
 
खीर -बहन के लिए

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" अरे थोड़ सी जुठ खीर बहन के लिए छोड़ दे लालची, उसका नेग होता है भाई का जूठा खाने का "

और बुच्ची खड़ी हो गयी, स्कर्ट ने खुली मजे से फड़फड़ाती पागल गीली, चाशनी में भीगी बिल को ढंक लिया, और सुरजू ने भी रजाई कमर के ऊपर कर ली। लेकिन देखने वालों ने सब देख लिया।

मंजू भाभी की तेज निगाह ने ताखे में रखे छलकते, लबलबा रहे सकोरे को देख लिया और इमरतिया को देख के मुस्कराने लगी। देवर का माल है समझ गयी और बुच्ची से बोलीं

" घबड़ा मत तेरी खीर में भी मलाई डाल के अभी बराबर कर देती हूँ "

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पर बुच्ची अभी अपने कपडे सम्हालने में, थाली पकड़ने में फंसी थी और इमरतिया को दिखा के वो माल मलाई खीर के सकोरे में मंजू भाभी ने डाल दी,

" अरे तू पहले खा ले खीर,.... बाकी मैं समेट लुंगी "

और सकोरे को मुंह लगाके बुच्ची सब गड़प कर गयी, बची खुची खीर मलाई चाट गयी और मंजू भाभी के साथ कोहबर वाले कमरे में

"बस मैं आती हूँ अभी " इमरतिया बोली , उसके जिम्मे एक काम अभी बचा था।

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इमरतिया की आँखे चमक रही थीं, जो उसने सोचा था उसका आठ आने का काम तो हो गया था, सूरजु देवर के साथ और बाकी भी जल्द ही हो जाएगा।

दो चार दिन पहले तक जो औरतों लड़कियों की छाया से दूर रहता था, लंगोटे का पक्का, चूत से भूत की तरह डरता था अब खुद चूत का भूत बन गया था।

और सिर्फ इमरतिया ही नहीं, बड़की ठकुराइन, सुरुजू की माई भी यही चाहती थीं, और इमरतिया से उनका कुछ ढंका छिपा तो था नहीं, दोनों एक दूसरे से पूरी तरह खुले, हर मामले में, तो इसलिए ही बड़की ठकुराइन ने यह काम अपने दुलरुवा का इमरतिया के जिम्मे सौंपा था और सुरुजू को बोल भी दिया था,

' चुप चाप भौजी की कुल बात मानो । "

और वो बात मानने में अगर इतना मजा मिलता हो तो सूरजु काहें पीछे रहते,

इमरतिया कुछ कर रही थी, और बीच बीच में अपने देवर को देख के मुस्करा रही थी, और सुरुजू भी कभी झेंप जाता कभी मुस्करा देता, खूंटा अभी भी फनफनाया, बस एक पतले से गमछे से ढंका,

और इमरतिया भी उस फनफनाते नाग को देख रही थी, मुस्करा रही थी।

बहुत उसने भी घोंटे थे, उसके मरद का भी जबरदस्त था, फिर ससुरारी में देवर नन्दोई,

सूरजु के नवासे, बड़की ठकुराइन के मायके जब जाती तो कउनो दिन नागा नहीं होता, लेकिन लम्बाई में कउनो इससे १८-१९ भी नहीं होगा, और हल्का। इमरतिया ने अपने बित्ते से खुद नापा था, बित्ता छोटा पड़ गया था, लेकिन उससे भी खतरनाक थी मोटाई। कलाई से कम क्या होगा और जिस नंबर की वो चूड़ी पहनती थी उसके हिसाब से ढाई इंच से तो ज्यादा ही, तीन के आसपास, मोटका बैगन मात।

कटोरी भर कडुवा तेल अपनी बुर को पिला के उसके ऊपर चढ़ी थी, फिर भी जाड़े में पसीना छूट गया, खाली सुपाड़ा घोंटने में दस मिनट लग गया। और कुछ सोच के इमरतिया और मुस्करायी।

बुच्ची, असल कच्ची कली , और वो कैसे घोंटेंगी? लेकिन घोंटना तो पड़ेगा, ...और वो भी जड़ तक, आखिर दूल्हे की बहन है , भौजी की ननद

लेकिन बुच्ची आज जैसे गर्मायी थी अब बिना चुदे न वो रह पाएगी न उसे बिना चोदे उसका भाई।

पर मंजू भाभी ने जो इमरतिया से बुच्ची को देख के कहा था, " छटल छिनार, और वो भी नयकी दुलहिनिया के आने के पहले " ,

और छिनार का मतलब जो लौंडिया एक साथ न सही लेकिन एक दिन में कम से कम छह मरद के आगे टांग फैलावे, और बियाहे के घर में लौंडन की कौन कमी, सूरजु के ननिहाल, मंजू भौजी के ससुराल से ही आधे दर्जन से ऊपर लौंडे, बुच्ची को देख के छुंछिया रहे थे, फिर इमरतिया के नाऊ टोला में एक से के कड़क लौंडे थे, चमरौटी भरौटी, अहिराना, अरे जब एक बार दूकान खुल जाएगी तो हर तरह के गहकी आएंगे, बुच्ची बबुनी के,

लेकिन पहले सूरजु देवर का नंबर लगेगा और वो भी तीनो छेद पे, और एक बार नहीं कई बार, स्साली चिंचियायेगी, गांड पटकेगी, मिर्च लगेगी पिछवाड़े, लेकिन इमरतिया अपने हाथ से अपने देवर का लौंड़ा बुच्चिया की कसी कच्ची गांड़ में सटायेगी, और पहलवान तो है ही उसका देवर, एक धक्के में मोटा सुपाड़ा अंदर,

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बुच्चिया को जब सुरुजू चोदेगा, आधे टाइम उसके मन में उसकी दुल्हनिया रहेगी, और आज भी जब उसका खूंटा खाते समय, बुच्ची की कच्ची बुर में धक्के मार रहा था, इमरतिया अपने देवर के चेहरे के भाव देख के समझ गयी थी, सूरजु के मन में उसकी आने वाली दुलहिनिया की बिल है।

और हचक हचक के दर्जा नौ वाली की चूत, गांड़ दोनों फाड़ने के बाद, जब दुलहिनिया मिलेगी तो सुरुजू के मन में पक्का रहेगा, की जब दर्जा नौ वाली ने इतने मजे से घोंटा है तो ये दर्जा दस वाली तो और आसानी से घोंटेंगी, और कुछ नखड़े कर रही है तो बस ये उसके मायकेवालियों ने सीखा के भेजा है, बस थोड़ा जबरदस्ती की जरूरत है।

इमरतिया को मालूम था मरद असली चोदू तब होता है जब हर औरत हो या लड़की, उस में उस को चूत नजर आती है और वो चोदने के लिए तैयार माल, सूरजु के देह में ताकत बहुत थी, और औजार भी गजब था, बस थोड़ी बहुत झिझक थी और उसकी सोच बदलने की जरूरत थी, तो उसके लिए इमरतिया थी न।

इमरतिया का काम ख़तम हो गया था, ऊपर से कोहबर से मंजू भाभी और बुच्ची दोनों ने साथ साथ गोहार लगाई थी की खाना ठंडा हो रहा है तो इमरतिया ने इशारे से सुरुजू को अपनी ओर बुलाया, और धीरे से बोली,

" अभिन थोड़ी देर में बगल में गाना नाच शुरू होगा "

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गाना नाच

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इमरतिया ने इशारे से सुरुजू को अपनी ओर बुलाया, और धीरे से बोली,

" अभिन थोड़ी देर में बगल में गाना नाच शुरू होगा "

सूरजु थोड़ा मुस्करा के थोड़ा उदास हो के उसी तरह धीमे से फुसफुसाते बोला, " तो हमें कौन देखे सुने के मिली, बाहर से कुण्डी लग जाई और सबेरे खुली। "

इमरतिया खुल के हंसी।

सच में होता यही था। इसी लिए रात के गाने का प्रोग्राम छत पर, मरद लड़के सब नीचे, और सीढ़ी का दरवाजा बंद , खाली सांकल ही नहीं ताला भी।

हाँ दूल्हे से उतनी लाज शर्म नहीं होती थी, उसी का नाम ले ले के तो सब बहिन महतारी गरियाई जाती थीं/ लेकिन ये बात भी सही थी की उसके कमरे के बाहर भी कुण्डी लगा दी जाती थी, थोड़ा बहुत आवाज सुनाई दे तो दे,

लेकिन देखने का कोई सवाल नहीं था और इसलिए भी की शायद ही किसी की साडी ब्लाउज बचती, और ज्यादा जोश हो तो बात उसके आगे भी बढ़ जाती, भौजाइयां ननदों की शलवार का नाड़ा पहले खोलती थीं।

गाल पे कस के चिकोटी काटते इमरतिया बोली,

" अरे हमरे देवर, तोहार ये भौजी काहें को है, कुल दिखाई देगा, तोहार बहिन महतारी सब का भोंसड़ा, लेकिन मैं बत्ती बंद करके जाउंगी और बत्ती खोलना मत, और ये देखो "

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इमरतिया ने बत्ती बंद की, और एक पतला सा काला कागज़ जो उसने खिड़की पे चिपका रखा था, उसे उचाड़ दिया, बस कई छोटे छोटे छेद, जैसे बच्चे बचपन में आँख लगा के ध्यान से बाइस्कोप देखते हैं, सूरजु ने आँख लगा लिया और उस पार का पूरा इलाका दिख रहा था, एक एक आवाज साफ़ आ रही थी जैसे उसी के कमरे में कोई बोल रहा हो, अभी इंतजाम हो रहा था, फर्श पे दरी बिछ रही थी, एक भौजी नीचे से ढोलक ले आयी थीं।

वो जोर से मुस्कराया और इमरतिया ने फिर कागज चिपका दिया और आगे की हिदायत दे दी,

" हे अपनी बहिन महतारी क देख देख के अगर ये टनटना जाए तो मुट्ठ मत मारने लग जाना और इस मोटू को खोल के रखना, "

लेकिन सूरजु भी अब चालाक हो गए थे, भौजी से बोले, " और भौजी, अगर तोहें, हमरी रसीली भौजी को देख के टनटना जाए तो

" तो अगली बार जैसे मिलूंगी चोद लेना और अगली बार मैं ऊपर नहीं चढूँगी तुम चढ़ के पेलना, ....जैसे हमारी ननद बुच्ची को चोदोगे , "

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इमरतिया बोली, और झुक के खड़े खूंटे को कस के दबोच लिया और प्यार से मसल दिया ,और निकलते हुए बत्ती बंद कर दी।

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छुटकी -होली दीदी की ससुराल में

भाग १०८ - खुल गया नाड़ा पृष्ठ ११०७

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छुटकी -होली दीदी की ससुराल में

भाग १०९ - नाच गाना, मस्ती और सुरजू

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रतजगे की मस्ती,

इमरतिया को मालूम था मरद असली चोदू तब होता है जब हर औरत हो या लड़की, उस में उस को चूत नजर आती है और वो चोदने के लिए तैयार माल, सूरजु के देह में ताकत बहुत थी, और औजार भी गजब था, बस थोड़ी बहुत झिझक थी और उसकी सोच बदलने की जरूरत थी,

तो उसके लिए इमरतिया थी न।

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और जहाँ ज्यादतर बबुआने के लौंडो के सामने परेशानी रहती है की जितना जल्दी गर्माता है उससे ज्यादा जल्दी ठंडा होता है,

वहां सूरजबली सिंह की परेशानी दूसरी थी, न उनके औजार में कोई कमी, अबतक इमरतिया ने वैसा औजार घोंटना तो कौन कहे उसके बारे में सुना भी नहीं था और न कोई जल्दी बाजी, तीन चार बार खूब खेली खायी औरत का भी पानी निकाल के झड़ें, गोर सुन्दर देह, कसरत और अखाड़े क सधी, देख के लगता है दस हाथी क जोर होगा, लेकिन परेशानी दूसरी थी।

गाँव क कुल लौंडन का सिखाई पढ़ाई, घर में गाँव में हो जाती है, कउनो भौजाई, काम करने वाली, नहीं तो खेत में कटाई बुवाई वाली, मुर्गा के फड़फड़ाने के पहले नाडा खोल के स्वाद दे देती थीं, उसके बाद तो लौंडा खुद जहाँ बुर की महक सूंघा,... पीछे पीछे,

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लेकिन सूरजु के लिए गाँव क कुल औरत लड़कियां सब कोई बहन कोई काकी, यहाँ तक की भौजाई सब भी, पठान टोला की सैयदायिन भौजी एतना खुल के मजाक के करती हैं,बिना बहन महतारी की गारी के बात नहीं, लेकिन बस मुस्किया के रह जाते हैं, और गाँव का भौजाई भी, छेड़ेंगी तो इनकी निगाह गोड़े से ऊपर नहीं, हाँ खाली इमरतिया को चोरी चोरी सुरु से और ये बात न खाली इमरतिया को मालूम थी बलि सूरजु सिंह की माई को भी,

तो बस वही सूरजु की धड़क खोलने का इंतजाम कर रही थी इमरतिया,

ससुर कौन लौंडा होगा जो रतजगा में औरतों क नाच गाना सुनने देखने के लिए नहीं परेशान होगा,

लेकिन असली रतजगा तो बरात के जाने के बाद होता था, जब एकदम खुल के मस्ती, बियाह से लेकर बच्चा पैदा होने तक सब होता था, पर मरद लौंडे तो बरात में, नहीं तो कहीं गारी वारि शुरू हुयी और ससुर भसुर मंडराने लगे तो लम्बा घूंघट, तो केकर पेटीकोट उलटा जाएगा, और असली मजा तो मुंह दिखाई साफ़ साफ़ बोले तो बुर दिखाई का होता था,

लेकिन बड़की ठकुराइन का इंतजाम,

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बोलीं की जितना मस्ती बरात जाने के बाद रतजगा में होती है, उससे दस गुना रोज होगी

और मर्दों लौंडो का इंतजाम भी पक्का, जितने लौंडे हैं, सब आँगन के उधर पक्के वाले हिस्से में जो दालान है, चार पांच बड़े बड़े कमरे है उसमे उनके सोने का इंतजाम, खाना आठ बजे के पहले, और साढ़े आठ बजे दोनों आंगन के बीच में दरवाजा बंद, ताला बंद, और नौ बजे के पहले घर क कुल लड़की मेहरारू, छते पे, और मंजू भाभी क जिम्मेदारी छत पे भी ताला बंद, तो बस आस पास भी कउनो मर्द क परछाई भी नहीं पड़ेंगी, करा मस्ती खुल के सब जने, ननद भौजाई, सास पतोह, .....बड़की ठकुराइन के बेटवा क बियाह याद रही

एक बार सब लोग आ जाए तो, और छत में बड़का बरामदा में तिरपाल लगा था कउनो आंगन से भी बड़ा, ये कमरा कोहबर सब जोड़ के,

और गाने के लिए सूरजु क माई बोलीं थीं मुन्ना बहू से जो सबसे चटक खुल के गाने वाली हो, तगड़ी हो देह की, मस्ती करने में एकदम आगे

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अहिरौटी, भरौटी, कहारौटी, कउनो टोला बचना नहीं चाहिए, पहले से बता देना की रतजगा से ज्यादा मस्ती होगी लेकिन नौ बजे के पहले सब पहुँच जाएँ

तो बस अगर आज सूरजु अपनी बहनियों की रगड़ाई देखेंगे, और वैसे भी दूल्हे की बहन महतारी सब से ज्यादा गरियाई जाती हैं तो जो बात इमरतिया चाहती थी, की सूरजु कउनो लौंडिया को देखें औरत को देखे तो बस ये सोचे की स्साली चोदने में केतना मजा देगी और जब औरतों को लड़कियों को खुल के मस्ती करते देखंगे तो खुद उनकी झिझक चली जायेगी।

तो बस मोटा सूजा लेकर इमरतिया ने खिड़की में दस पांच छेद कर दिए थे,

दूल्हे की कोठरी में तो अंधियार रहेगा तो बाहर से कुछ पता नहीं चलेगा और अंदर से सूरजु अपनी माई बहिन की रगड़ाई खुल्ले आम देखेंगे।

तो बस खूंटा फड़फड़ायेगा, झिझक ख़तम होगी और इमरतिया सोचती थी की सूरजु को बारात जाने के पहले कम से कम आठ दस पे, आठ दस बार नहीं, आठ दस लड़कियों औरतों पे चढ़ा दे तो तरह तरह क बुर क मजा लेना सीख जायेंगे तो एक तो दुलहिनिया के साथ कउनो हिचक नहीं होगी, रगड़ के पेलेंगे, दूसरे एक बार बियाहे के पहले जो मरद को दस बारह बुर का स्वाद लग गया, वो बियाहे के बाद भी किसी एक के पेटीकोट के नाड़े से नहीं बंधा रहेगा, सांड की तरह सबका खेत चरेगा।

तो बस रात भर नाच गाना देखने का इंतजाम इमरतिया ने कर दिया।

इमरतिया का काम ख़तम हो गया था, ऊपर से कोहबर से मंजू भाभी और बुच्ची दोनों ने साथ साथ गोहार लगाई थी की खाना ठंडा हो रहा है तो इमरतिया ने इशारे से सुरुजू को अपनी ओर बुलाया, और धीरे से बोली,

" अभिन थोड़ी देर में बगल में गाना नाच शुरू होगा "

सुरुजू सिंह से जैसे इमरतिया ने बोला, की रतजगा का गौनही देखने का इंतजाम कर दिया है, बस आधे पौन घंटे में खेल शुरू होगा, बस चुप्पे मार के पड़े रहें, बत्ती बंद, और जो जो छेद बनाई थी भौजी बस, कागजवा हटा के, पूरा बरमदा दिखेगा।

भौजी तो वो जो बिना कहे देवर क मन क बात जान ले और पूरा कर दे, ओह मामले में तो इमरतिया भौजी असल भौजी थीं, अच्छा हुआ माई उन्ही के जिम्मे की, कैसे कैसे उनका मन कर रहा था, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ रही थी, वही झिझक, लाज, कहूं भौजी कुछ, लेकिन इमरतिया भौजी खुदे उनके खूंटा पे चढ़ के, वो सोच रहे थे कैसे सटायेंगे, कैसे धसाएंगे, कहीं फिसल के बाहर, फिर अंदाज से छेद क अंदाज कैसे लगेगा, आज तक मेहरारुन से तो दस हाथ दूर रहते थे, लेकिन खड़ा तो अपने आप हो गया, भौजी के हाथ का असर, और कैसे भौजी चढ़ के गप्प से ले लीं,

और जब वो घबड़ा रहे थे की झड़ न जाएँ तो कैसे खुल के बहिन महतारी कुल गरियाया, भौजी ने और हटने नहीं दिया, ओकरे कितने देर बाद तक, और जब पानी निकरा तो

ओह्ह अइसन मजा तो बड़ी बड़ी से कुश्ती जीते थे तो भी नहीं आया, और बोल के गयी हैं, कल फिर, और अबकी सुरुजू ऊपर रहेंगे, जैसे बुच्चीको पेलेंगे एकदम वैसे,

बुच्चियो खूब मस्त है, और कैसे भौजी ओके, सूरजु क मलाई खीर में मिलाई के खिलाई दी और वो भी सूरजु को देख के, दिखा के गटक कर गयी, एक एक बूँद जैसे अपने बिलियों में वैसे ही कुल मलाई घोंटेंगी, एक बूँद भी बाहर नहीं निकलने देगी,

और अब बस थोड़ी देर में गाँव में कउनो लौंडा,मरद ऐसा नहीं था जो छुप छुप के गाना ये औरतों का खेला नहीं देखना चाहता था, लेकिन कभी हो नहीं पाता था, अक्सर रतजगा बरात के जाने के बाद ही होता था, तीन दिन की बरात, दो रात घर, गाँव से दूर, तो घर के मरद लौंडे तो सब बरात में, एकाध बूढ़ पुरनिया कोई बचते तो उनकी खटिया वैसे ही घर के बाहर, और उन की भी जो भौजाइयां लगती, जा के नाक वाक् पकड़ के चूड़ी खनका के चेक कर लेतीं, और एक बार तो एक बुजुर्ग बाहर खटिया पड़ी, कंबल वंबल ओढ़े, लेकिन एक दो औरतों को शक हुआ की बुढऊ बहाना बना के मजे ले रहे हैं, और चार पांच जवनको को इशारा किया की ससुर के अपने, और वो सब उनकी बँसखटिया पकड़ के उठा के गाँव के बाहर घूर के पास रख आयीं,

लेकिन सूरजु को याद आया,

याद आया क्या हरदम याद आता था, एक बार उन्होंने कुछ कुछ देखा था खोइया का मजा, अपने ननिहाल में,

माई उनकी साल में चार पांच बार तो मायके का चक्कर लगा के आती थीं और साथ में सूरजु भी, न सगा मामा, न मौसी, और साथ में सूरजु भी। लेकिन गाँव में सगे तो सभी हो जाते है, चचेरे मामा लोगों की, पट्टीदारी में ही कमी नहीं थी, और वो सगे से बढ़कर और सूरजु का खूब लाड दुलार, आधा टाइम तो उन्ही मामा मामी के यहाँ,
 
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