Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 2 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

पूर्वाभास ८ -

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छुटकी - कैसे फटी, जीजा संग कैसे फटी

पेज ३२ पोस्ट ३११ -३१३

मैं भी जोश में उनका शार्ट सरका के उनके मूसल चन्द को अपनी मुट्ठी में दबाती रगड़ती बोली-

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“अरे अभी असली टिकोरे वाली तो बची ही है, उसका भी तो…”

और मेरी बात काट के मेरे साये को कमर तक सरका के, मेरी बुर अपनी मुट्ठी में दबोचते बोले-

“उसकी तो ऐसी रगड़-रगड़ के लूंगा की, साल्ली जिंदगी भर याद करेगी अपनी पहली चुदाई।

फाड़ के रख दूंगा तेरी बहन की…”

और हम दोनों वैसे ही सो गए, दोपहरिया में अलसाये

पिछली रात भी मम्मी के साथ मस्ती में जागते बीती थी।

और जैसे ही हम सोते थे, इनके हाथ मेरे चूचियों पे, और मेरा इनके लण्ड पे, बस वैसे ही।

हम लोग सोते ही रहते अगर रितू भाभी आके नहीं जगातीं-

“जागो सोनेवालों जागो…”

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और इनके कान में जीभ से सुरसुरी करती बोलीं-

“अरे नन्दोई जी एक कच्ची कली, मस्त टिकोरों वाली,

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अपनी गुलाबी परी सम्हाले आपका इन्तजार कर रही है…”

और जब हम दोनों उठे, तो रितू भाभी ने न उन्हें अपना शार्ट ठीक करने दिया और न मुझे ब्लाउज।

नन्दोई सलहज में थोड़ी देर छेड़छाड़ चलती रही।

रितू भाभी उनके माँ बहनों का हाल लेती रही और वो रितू भाभी को गोद में खींचकर चोली के ऊपर से ही जोबन का रस कभी हाथों से कभी होंठों से।

और मौका पाकर मैंने ब्लाउज की बची खुची बटन बंद कर ली (चार में से दो तो उन्होंने तोड़ ही दी थीं),

साये का नाड़ा बाँध लिया और साड़ी बस लपेट ली।

(मुझे मालूम था, रितू भाभी हों तो ननद के देह पे कपड़े कितने देर टिकते थे, जैसे ये, उनके नन्दोई कपड़े के दुश्मन, वैसे ही उनकी सलहज)

तब तक रितू भाभी को उस मिशन की याद आई, जिसके लिए वो आई थीं, मिशन छुटकी। और उन्होंने अपने नन्दोई को ललकारा। शार्ट के ऊपर से ही उन्होंने नन्दोई के हथियार को जोर से दबाते मसलते कहा-

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“अरे नन्दोई जी, अपनी नहीं तो इसकी फिकर करो, बिचारा कितना भूखा है…”

और भाभी के दबाने मसलने से वो आधा सोया आधा जागा, पूरी तरह जग के फुफकारने लगा।

लेकिन इतने पर अगर वो छोड़ दें तो रितू भाभी कैसी,

शार्ट में अंदर हाथ डाल के एक झटके में रितू भाभी ने सुपाड़ा खोल दिया और उनके पेशाब के छेद पे अंगूठा लगा के, रगड़ने मसलने लगी। और साथ में उनकी बातें-

“बोल चाहिये छोटी साल्ली की कच्ची चूत… बहुत चिल्लाएगी, चीखेगी वो… लेकिन छोड़ना मत…

रगड़-रगड़ के फाड़ना, चीखने, चिल्लाने देना साल्ली को…”

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अब तो बिचारे उनका लण्ड एकदम पागल हो गया।

रितू भाभी मुठियाती रही, कभी पेल्हड़ भी सहला देती तो कभी उनके गाल पे हल्के से चुम्मी लेकर काट लेती।

सलहज हो तो रितू भाभी ऐसी।

थोड़ी देर में हम तीनों ऊपर छुटकी के कमरे में पहुँच गए।

वो लगता है बस इंतजार ही कर रही थी।

एक झीनी झीनी कम से कम दो साल पुरानी टाप और स्कर्ट में, उसके टिकोरे टाप फाड़ रहे थे,

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और स्कर्ट भी छोटी-छोटी किशोर गोरी-गोरी जांघों को दिखाती ज्यादा, छुपाती कम।

उसकी और उसके जीजा की आँखें चार हुई और दोनों मुश्कुराये।

उसके जीजा भी बस बनयान शार्ट्स में और, खूंटा पूरा तना, शार्ट्स को फाड़ता।

छुटकी को देखकर बल्की छुटकी के कच्चे टिकोरों को देखकर वो और बौरा गया।

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वो छुटकी के बगलमें ही बैठ गए, उससे सट कर।

और रितू भाभी मेरे बगल में बैठ गईं।

वो छुटकी को प्यासी नजरों से देख रहे थे, बल्की उनकी नजरें छुटकी के टीकोरों पे टिकी थीं।

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और छुटकी कुछ सहमी, कुछ डरी और कुछ हो जाय तो हो जाने दो के अंदाज में निगाहें झुकाये थी।

लेकिन बीच-बीच में जब उसकी निगाह इनसे चार होती, तो मुश्कुरा जाती।

रितू भाभी सोच रहीं थी कब खेल तमाशा शुरू हो।

और इस बीच भाभी की शरारती उंगलियों ने मेरे ब्लाउज की बची खुची बटनों को भी खोल दिया और उरोज मचलकर बाहर।

लेकिन जहाँ असली कबड्डी होनी थी वहां डेडलाक मचा था।

लेकिन छुटकी की चुदाई का रास्ता खोला, और किसने मम्मी ने।

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और उसे पक्का किया रितू भौजी ने।

नीचे से मम्मी ने आवाज दी-

“मैं जरा पड़ोस में जा रही हूँ, एक-डेढ़ घंटे में आऊँगी। दरवाजा बंद कर ले, छुटकी…”

छुटकी उतरकर नीचे जाती की उसके पहले मैंने उसे दस पांच काम बता दिए-

“सारे दरवाजे चेक कर लेना। मेरा कमरा भी अच्छी तरह बंद कर देना। आदि आदि…”

यानी अब 6-7 मिनट की छुट्टी।

और सबसे बड़ी बात, मम्मी हैं नहीं। दरवाजे सारे बंद।

तो अब छुटकी चाहे रोये, चाहे चिल्लाये, चाहे ये उसे दौड़ा दौड़ा के, चाहे ऊपर उसके कमरे में, चाहे नीचे खुले आँगन में चोदें, कोई उसकी चीख पुकार सुनने वाला नहीं था।

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हैं रितू भाभी तो वो तो खुद भौजाई का हक अदा करेंगी, उसकी टाँगें पकड़कर फैलाएंगी।

और मैं… मैं बहुत हुआ तो न्यूट्रल रहूंगी। और आखिर मेरा पति मेरा है।

जो उन्हें पसंद वो मुझे पसंद।

और रितू भाभी ने पहला शिकार मुझे ही बनाया। मुझे से बोलीं-

“है तेरे आँचल पे डिजाइन बड़ी अच्छी है, जरा खड़ी हो दिखा…”

और जैसे ही मैं खड़ी हुई उन्होंने आँचल पकड़कर खींचा और दूसरे हाथ से उन्होंने पेटीकोट में फँसी साड़ी निकाल दी।

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साड़ी मैंने वैसे ही बस लपेटी सी, थी।

और अगले पल सररर सररर, पूरी की पूरी साड़ी उनके हाथ में और मैं सिर्फ ब्लाउज साये में,

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और ब्लाउज के भी सारे बटन खुले।

रितू भाभी ने जोरदार आवाज लगायी, बाहर छत पे जाकर, नीचे आँगन में खड़ी छुटकी को-

“अरे छुटकी, सुन ये तेरी दीदी की साड़ी है, ले जरा ठीक से तहिया के रख देना…”

और जब वो नीचे, हँसती खिलखिलाती, छुटकी को साड़ी फेंक रही थीं, मौका मेरा था।

मैंने पहले तो साड़ी खींची और फिर दोनों हाथों से रितू भाभी के जोबन दबाते, चोली के बन्ध खोल दिए।

और अब हम दोनों खुले ब्लाउज में बिना साड़ी के थे।

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नीचे छुटकी हम लोगों का खेल तमाशा देखकर हँस रही थी।

और रितू भाभी की साड़ी नीचे फेंकते हुए मैंने उन्हीं का डायलाग दुहराया-

“अरे छुटकी, सुन ये तेरी भौजी की साड़ी है, ले जरा ठीक से तहिया के रख देना…”

हँसती, खिलखिलाती, छुटकी ने बोला-

“एकदम दीदी…”

और उसे कैच कर लिया।

रितू भाभी के ब्लाउज के कुछ बटन उनके नन्दोई के हाथ खेत रहे और कुछ मैंने तोड़ दिए।

हम दोनों वापस कमरे में थे, इनके सामने। मैंने पीछे से, रितू भाभी के गदराये, गब्बर जोबन दबोच लिए, (ब्लाउज की आड़ भी अब नहीं थी) और कस के रगड़ते मसलते चिढ़ाया-

“क्यों भाभी, भैया ऐसे ही दबाते हैं न…”

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हँसकर रितू भाभी बोली-

“अरे साफ-साफ क्यों नहीं बोलती, अपने भैया से दबवाने का मन कर रहा है, दबवा लो, चुदवा लो न खुद पता चल जाएगा। अरे सैयां से सैयां बदल लेओ ननदी, तुम मेरे सैयां से मजा ले लो ननद रानी और मैं तुम्हारे सैयां से…”

“नहीं भाभी, मेरे सैयां भी आपको मुबारक और मेरे भैया भी। एक आगे से एक पीछे से, एक साथ डबल मजा…”

उनके निपल जोर से पुल करते मैंने छेड़ा।

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लेकिन रितू भाभी से पार पाना इतना आसान नहीं था।

उन्होंने पलटा खाया, और अब हम दोनों अखाड़े के पहलवान के समान आमने सामने थे और वो अपनी बड़ी-बड़ी चूचियों से मेरी चूचियां जोर से रगड़ मसल रही थीं, और मैं भी उसी तरह से जवाब दे रही थी।

वो एक नदीदे बच्चे की तरह हम दोनों को देख रहे थे।

रितू भाभी, जोर-जोर से मेरी चूची पकड़कर मसल रही थी, रगड़ रही थी और अचानक उन्होंने मेरा साया भी उठा दिया।

मैं क्यों पीछे रहती, और अगले पल हम दोनों की चूत भी घिस्से पे घिस्से लगाने लगी।

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वो गाण्ड के शौकीन, मैं रितू भाभी की बड़ी-बड़ी गोल-गोल गाण्ड पकड़कर उन्हें दिखा-दिखाकर ललचा रही थी।

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बस उनके मुँह से लार नहीं टपक रही थी, खूंटा एकदम जबरदस्त तन्नाया खड़ा था, शार्ट से बाहर झांकता।

और तब तक गालियों की बारिश भी शुरू हो गई।

रितू भाभी ने उन्हें जोर से आँख मारी और घचाक से मेरी गाण्ड में उंगली पेलते हुई

- “छिनार, सातभतरी, तेरी सारी ननदों की गाण्ड मारूं, बुर चोदूं, क्या कचकचौवा गाण्ड है साल्ली…”

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मैंने भी गाली के जवाब में गाली शुरू कर दी।

“तेरे नन्दोई बहनचोद की बहन चोदूँ, भौजी तोहरो गाण्ड में खूब माल भरल हौ…”

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एक के जवाब में दो उंगली मैंने पेल दी, रितू भाभी की कसी-कसी गाण्ड में।

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“तेरी सास का भोंसड़ा मारू, ससुराल में अपनी ननदों के साथ खूब कबड्डी खेल के आई है, छिनाल…” ''

रितू भाभी ने जवाब दिया।

“अरे भौजी मेरी साली ननदें हैं, भाईचोद। एक के ऊपर दस-दस चढ़ते हैं, तेरे मादरचोद नन्दोई की माँ का भोंसड़ा, जिसमें गदहे घोड़े सब घुसते हैं…”

उनकी गाण्ड में गोल-गोल उंगली घुमाते मैं बोली।

इस लेस्बियन रेस्लिंग के साथ गालियों ने उनकी हालत और खराब कर दी।

गालियां हम दोनों दे रही थी लेकिन टारगेट उन्हीं की माँ बहने थी।

रितू भाभी ने जोर से मुझे आलिंगन में दबोच लिया था।

मैंने उनके कान में फुसफुसाया- “

अरे भौजी, हम दोनों टापलेस हो गए हैं और आपके नन्दोई अभी भी…”
 
पूर्वाभास ९ -

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छुटकी की फट गयी

पेज ३३ पोस्ट ३२७ -३२८

रितू भाभी ने अपनी मस्त चूचियां उनकी पीठ पे रगड़ते हुए, हल्के से उनका गाल काटा

और जैसे कोई मर्द किसी कच्ची कली के टिकोरों को पकड़कर दबोच ले, उनके दोनों टिट्स को पकड़कर मसल दिया।

उनके मुँह से चीख और सिसकारी दोनों निकल गई।

“क्या नन्दोई जी, लौंडिया की तरह सिसक रहे हो अभी दिलवाती हूँ, तुझे टिकोरों का मजा…”

और साथ ही शार्ट सरका के उन्होंने उनके मस्त खूंटे को बाहर निकाल लिया। एकदम मस्त कड़ियल, फुँफकारता,

“हे आज कोई रहमदिली मत दिखाना, कर देना खून खच्चर, चीखने चिल्लाने देना साली को, एक बार में हचक के पूरा 9” इंच ठेल देना…”

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भौजी उनके लण्ड को सहलाते और उकसा रही थीं। और फिर एक झटके में उन्होंने चमड़ा खोल दिया।

मोटा छोटे टमाटर ऐसा लाल, गुस्साया खूब कड़ा सुपाड़ा बाहर।

और मैं भौजी को याद दिलाती, उसके पहले उन्हें खुद याद आ गया।

(रितू भाभी पीछे पड़ी थीं की सूखे लण्ड से छुटकी की कच्ची चूत फाड़ी जाय,

लेकिन मेरे बहुत समझाने पे ये तय हुआ था की चलिए आज, तो ये वैसलीन लगा लेंगे, लेकिन रात में ट्रेन में सिर्फ थूक लगा के और,

उनके गाँव में जब उसकी गाण्ड फटेगी तो एकदम सूखी)

“अरे मेरी कच्ची ननद कैसे घोंट पाएगी ये मुट्ठी ऐसा सुपाड़ा, जरा वैसलीन तो लगा दूँ…”

रितू भाभी बोलीं और वैसलीन की शीशी उठाकर ले आई। और फिर सिर्फ उंगली की टिप वैसलीन से छुला के,

उन्होंने मुझे चिढ़ाते हुए दिखा के, सिर्फ उनके सुपाड़े पे पेशाब के छेद पे,

जैसे कोई बच्चे को नजर से बचाने केलिए टीका लगा दे, बस वैसे ही, वहां लगा दिया।

“भाभी ये फाउल है…”

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मैं चीखी लेकिन उन्होंने किसी दलबदलू नेता को भी मात देते हुए, पाला बदल लिया था और रितू भौजी का साथ दे रहे थे।

“क्यों?”

मुश्कुरा के वो बोले-

“अरे तुमने ही तो कहा था की आज वैसलीन लगा के, तो मेरी सलहज ने अपनी छोटी ननद का ख्याल करते हुए वैसलीन लगा तो दी है।

ये थोड़ी ही तय हुआ था की, कितने ग्राम लगाएंगे या कितना इंच लगाएंगे…”

“अच्छा चल तू कह रही है तो, तू भी क्या याद करेगी किस दिलदार से पाला पड़ा है…”

रितू भाभी हँसकर बोली और सुपाड़े के पेशाब के छेद पर लगे वैसलीन को फैला करके,

उन्होंने सुपाड़े के ऊपरी एक तिहाई भाग पे फैला दिया।

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मैं उनकी बदमाशी अच्छी तरह समझ रही थी। वो अपने नन्दोई को खुल के फेवर कर रही थीं।

किसी चिकने तेज धार वाले चाकू की तरह, अब उनका सुपाड़ा छुटकी की कसी चूत में घुस जाएगा, कम से कम उसका एक तिहाई हिस्सा, जहाँ तक वैसलीन लगा है, और फिर वो लाख अपने चूतड़ पटके, इनका सुपाड़ा निकल नहीं सकता

और उसके बाद तो जैसे कोई भोथरे चाकू से किसी मेमने को हलाल करे, बस एकदम उसी तरह से।

मैं कुछ बोलती, उसके पहले छुटकी के पैरों की आहट सुनाई पड़ी और रितू भाभी ने शेर को फिर से पिंजड़े में बंद कर दिया।

और हम दोनों ने अपने ब्लाउज को ठीक कर लिया (बटन तो दोनों की टूट चुकी थीं, हाँ बस चूची के ऊपर कर लिया)।

और छुटकी आई तो,

उसकी कसी-कसी छोटी स्कूल की टाप के नीचे दोनों छोटे-छोटे चूजे चोंच मार रहे थे।

वो कच्चे-कच्चे टिकोरे, जिसके न सिर्फ वो, बल्की मेरे नंदोई भी दीवाने थे, टाप के नीचे से साफ झलक रहे थे।

और उसे देखकर न सिर्फ मुँह सूख गया उनका, बल्की खड़ा खूंटा और तन के शार्ट के बाहर से झांकने लगा।

और अब मुँह सूखने की बारी छुटकी की थी।

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जान सूख गई थी, उसकी। उसे मालूम पड़ गया था कि अब थोड़ी देर में यहाँ क्या होने वाला था।

और ऊपर से रितू भाभी, उन्होंने शार्ट नीचे सरका दिया और रामपुरी 9” इंच के स्प्रिंग वाले चाकू की तरह, मोटा कड़ियल पगलाया लण्ड बाहर-

“क्यों लेगी इसे?”

मुट्ठी में उसे सहलाते, दबाते रितू भाभी ने पूछा।

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कितने अहसास एक साथ छुटकी के चेहरे पर से उतर गए।

1॰ लालच- मन कर रहा था बस गप्प से अंदर ले ले।

2॰ डर, और दहशत- क्या हालत होगी उस बिचारी की छोटी सी बिल की, जब ये कलाई ऐसा मोटा बालिश्त भर लम्बा, फाड़ता हुआ घुसेगा अंदर।

3॰ चाहत- कितना मजा आएगा, सुबह वो अपनी दो सहेलियों को देख चुकी थी, इसे घोंटते दोनों चीख चिल्ला रही थी लेकिन बाद में कितना मजा आया। और… और मंझली ने भी तो लिया था, इसे। एक ही साल तो बड़ी है वो।

4॰ घबड़ाहट- बहुत दर्द होगा, और खून भी निकलेगा। खून से बहुत डरती थी वो।

वो हिरणी की तरह डर के मेरी ओर मुड़ी, पर रितू भाभी की कोई ननद बच सके तो रितू भाभी कैसी।

उन्होंने उचक कर उसे पकड़कर पलंग पर खींच लिया-

“अरे छुटकी इससे डर लगता है, मुझसे तो नहीं…”

और प्यार से उसे अपने बाँहों में भींच लिया।

वो भी सिमटते हुए बोली-

“अरे भाभी, आपसे क्यों डरूँगी?”

“तो चल मेरे साथ मजा ले न…”

हसंते हुए वो बोली।

बिचारी छुटकी को क्या मालूम, वो खुद फँस के बड़े शिकारी के चंगुल में जा रही है।

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फटनी तो उसकी है ही वो भी आज और अभी।

मैंने इशारे से 'उनको' अपने पास बुला लिया।

पलंग पर रितू भाभी और छुटकी थीं, अब।

और रितू भाभी की मांसल जांघों की सँडसी की गिरफत में छुटकी की टाँगें थी।

उन्होंने एक पल में छुटकी की टाँगें फैला दी, और अब वो बिचारी लाख कोशिश करे, उसकी टाँगें सिकुड़ नहीं सकती थी।

रितू भाभी के हाथों ने साथ-साथ, छुटकी के टाप को हटा फेंका और उसके बाद नंबर टीन ब्रा का था।

बिचारे वो ललचा रहे थे, अपनी किशोर साली की उठती हुई चूचियां देखने को, लेकिन वो अब रितू भाभी की गिरफ्त में थीं।

कभी वो दिखातीं, कभी छिपाती और कुछ देर अपने नंदोई को तड़पाने के बाद, उन्होंने नीचे से दोनों टिकोरों को पकड़कर और उभारा, और उन्हें ललचाते तड़पाते बोलीं-

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“क्यों नंदोई जी, मस्त हैं न मेरी छुटकी के टिकोरे… बस अभी-अभी उठना शुरू हुए हैं, दबाने में मस्त, चूसने में मस्त… बोलिए चाहिए?”

और सिर्फ यही नहीं साथ-साथ में उसके छोटे-छोटे उरोजों को वो हल्के-हल्के दबा रही थीं, मसल रहीं थीं,

ललछौहें निपल्स को मसल दे रही थीं, कभी चिकोटी काट लेती।

“हाँ हाँ भाभी… हाँ चाहिए, बहुत मस्त चूचियां उठान है…”

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तड़पते हुए वो बोले।

और उन्हें दिखाते हुए, रितू भाभी ने छुटकी के छोटे-छोटे निपल्स चूसने शुरू कर दिए।

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छुटकी भी मजे से सिसकियां भर रही थी। वो सिर्फ एक काटन की छोटी सी चड्ढी में थीं।

भाभी का एक हाथ उसकी चुन्मुनिया सहला रहा था, रगड़ रहा था। कुछ ही देर में वहां पानी का एक हल्का सा धब्बा दिखाई देने लगा।

छुटकी की कच्ची चूत पानी फेंक रही थी।

रितू भाभी ने उसकी चड्ढी भी खोलकर फेंक दी और एक बार फिर छुटकी की टाँगें, भाभी की कड़ी कठोर मसस्लस वाली पिंडलियों में फँसी फैली थी। भाभी ने उसकी गुलाबी गीली परी को ढक रखा था, और हथेली के बेस से उसकी क्लिट को हल्के-हल्के रगड़ रही थीं।

फिर हाथ हटाकर दोनों हाथ के अंगूठों से उसकी चूत के पपोटों को पूरी ताकत से खोलते हुए उन्होंने एक बार फिर अपने नंदोई को ललचाया।

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भाभी की पूरी ताकत के बाद भी, बुलबुल की चोंच जरा सी खुली और अंदर की गुलाबी मखमली गली के थोड़े-थोड़े दर्शन हुए।

मैं सोच के सिहर उठी।

अभी थोड़ी देर में इनका बियर कैन से भी मोटा लण्ड इसमें घुसेगा, कैसे लेगी बिचारी मेरी बहन।

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लेकिन रितू भाभी का इरादा पक्का था- “हे लेना है इस कच्ची कली का?”

“हाँ भाभी हाँ…”

वो मस्ती में पागल हो रहे थे।

“मेरी शर्त याद रखना…”

भाभी ने याद दिलाया।

“एकदम पक्का…” वो बोले।

छुटकी की कसी कच्ची सील तोड़ने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार हो जाते।

(मुझे बाद में पता चला की भाभी की शर्त ये थी, कि वो छुटकी को पूरे लण्ड से चोदेंगे और खूब हचक-हचक कर।

छुटकी चाहे जितना रोये चिल्लाएगी, न तो वो चोदने की रफ्तार कम करेंगे और न, उसे रोने चिल्लाने से रोकने की कोई कोशिश करेंगे)।

रितू भाभी ने अपनी सबसे छोटी उंगली की टिप अपनी ननद की चूत में पेल दी और गोल-गोल घुमाने लगीं।

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साथ में उनका दूसरा हाथ, छुटकी के टिकोरों को दबा मसल रहा था।

मस्ती में छुटकी ने आँखें बंद कर ली थी और बस सिसक रही थी, छोटे-छोटे चूतड़ पटक रही थी।

और रितू भाभी ने इशारा करके इन्हें बुला के अपने पास बैठा लिया और छुटकी की गीली चूत से निकली उंगली सीधे इनके मुँह में।

वो सपड़-सपड़ चूस रहे थे।

और रितू भाभी उस कच्ची कली पर चढ़ बैठीं।

उनकी शैतान उंगलियां, दुष्ट जीभ सब उसकी गुलाबी परी को चिढ़ाने, छेड़ने में लग गए।

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पहले तो रितू भाभी के प्यासे होंठों ने अपनी छोटी ननद की गुलाबी कसी चूत की पुत्तियों को कस-कस के चूसा, और फिर उसे दो फांक करके अपनी लम्बी, मोटी रसीली जीभ एक लण्ड की तरह पेल दी, और लगीं गोल-गोल घुमाने।

साथ में ही उनकी उंगलियां कभी भगोष्ठों को रगड़ देती, कभी मसल देतीं तो कभी अंगूठा जोर-जोर से क्लिट के ऊपर घूमता, रगड़ता, मसलता।

बिचारी छुटकी… भौजी के इस हमले को तो कितनी खेली खायी, ब्याहता ननदें नहीं झेल पातीं थी, वो तो बिचारी 9वीं में पढ़ने वाली कमसिन, सेक्स के खेल से अनजान कली थी।

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छुटकी की चूत पानी फेंक रही थी, लेकिन जब वो झड़ने के कगार पर होती तो रितू भाभी रुक जातीं और छुटकी मन मसोस कर रह जाती।

नहीं, नहीं, उई… लगता है छुटकी के होंठों पर वो साथ-साथ, अपनी मजे लूटी बुर रगड़ रही थीं।

किसी तरह वो बोली-

“भौजी, झड़ने दो न, बस, बस करो ना…”

लेकिन ननदों को तड़पाने में रितू भाभी का जवाब नहीं था।

उन्होंने पूरी ताकत से दोनों हाथों से उसकी कसी चूत को फैलाया, और लगीं, हचक-हचक कर जीभ से चूत चोदने।

छुटकी तड़प रही थी, चूतड़ पटक रही थी।

लेकिन रितू भाभी, सिर्फ ननद को नहीं नंदोई को भी तड़पा रही थीं।

एक हाथ से उन्होंने उनके शार्ट को कबका उतार के दूर फेंक दिया था।

और जोर-जोर से लण्ड मुठिया रही थीं, खुला सुपाड़ा पागल हो रहा था।

मैं भी छुटकी के मुँह के पास बैठी थीं।

और अब जब छुटकी रिरयाने लगी-

“भाभी, प्लीज कुछ करो न…”

तो रितू भाभी हँसकर बोली-

“अरे जीजू का इतना मोटा मुस्टंडा लण्ड है और साली झड़ने के लिए तड़प रही है। ले लो न जीजू का लण्ड…”

उन्होंने मुझे कुछ इशारा किया, और छुटकी की फैली चूत में इनका सुपाड़ा सटा दिया।

मैं भी भाभी का इशारा समझ गई थी, छुटकी का प्यार से सर सहलाते हुए उसका मुँह खुलवाया और अपनी मोटी, बड़ी-बड़ी चूची अंदर ठेल दी।

वो गों-गों करती रही।

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लेकिन मैं उसका पूरा मुँह भरकरके ही मानी, और साथ में उसकी दोनों कलाइयों को भी पकड़ लिया।

रितू भाभी, छुटकी की गीली पनियाई चूत को एक हाथ से फैला रही थीं और दूसरे हाथ से नंदोई के मस्त मोटे लण्ड को अंदर घुसेड़ रही थी साथ में ललकार रही थीं-

“पेल दो साले, साल्ली की फुद्दी में, फाड़ दो रज्जा इसकी चूत…”
 
पूर्वाभास १० -

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कली बन गयी फूल

पेज ३४ पोस्ट ३४१ -३४२

और वो भी दोनों हाथ से उसकी पतली कमर पकड़े हुए थे और उन्होंने करारा धक्का मारा, आधा सुपाड़ा अंदर।

हाथ मेरे कब्जे में थे और उसके मुँह में मेरी मोटी चूची घुसी हुई थी। बिचारी गों-गों करती रही, दर्द से बिलबिलाती रही।

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लेकिन ऐसे मौके पे वो दया माया दिखाने वालों में से नहीं थे। और दिखानी चाहिए भी नहीं (ये बात मुझसे बढ़कर कौन जानता था)

बल्की उससे उनका जोश और बढ़ जाता था। और यहाँ आग में घी डालने वाली, उनका जोश बढ़ाने वाली, रितू भाभी भी थीं।

अगला धक्का उन्होंने दूने जोर से मारा।

मेरे लाख जोर से पकड़ने के बावजूद उसकी एक कलाई छूट ही गई, इतनी जोर से छटपटा रही थी वो।

पानी के बाहर मछली की तरह तड़प रही थी, बिचारी छुटकी।

मैंने पूरी ताकत से अपनी चूची उसके मुँह में पेल रखी थी। तब भी उसके होंठों से चीखें, गों-गों की आवाज आ रही थी, वो जोर-जोर से अपने चूतड़ पटक रही थी।

उनका मोटा पहाड़ी आलू ऐसा सुपाड़ा अभी भी पूरा अंदर नहीं घुसा था। आलमोस्ट ¾ अंदर पैबस्त हो गया था, बाकी बाहर था।

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रितू भाभी ने ललकारा उन्हें-

“अरे नंदोई जी जरा जोर से धक्का मारो, कमर की सारी ताकत, क्या अपनी बहनों के साथ पूरी खर्च करके आये हो। कच्ची कली की चूत है कोई, मेरी नंनद की…”

रितू भाभी की बात अधूरी रह गई।

उन्होंने छुटकी की कमर एक बार फिर जोर से पकड़ी और, हल्का सा लण्ड पीछे खींच के पूरे जोर से धक्का मारा।

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छुटकी की गों-गों की आवाज गूँज रही थी। उसके आँखों से शबनम उतरकर उसके गोरे गुलाबी गालों को गीला कर रही थी। दर्द से उसका पूरा चेहरा डूबा था।

और अब उनका मोटा सुपाड़ा पूरी तरह अंदर पैबस्त हो चुका था।

छुटकी की कच्ची कसी चूत ने उसे कस के दबोच रखा था, जैसे कब के बिछुड़े बालम मिले हों। लेकिन पिक्चर अभी काफी बाकी थी।

रितू भाभी ने मुझे इशारा किया की मैं उसके हाथ छोड़ दूँ और चूची उसके मुँह से निकाल लूँ।

और मैंने वैसा ही किया।

मैं उनका प्लान पूरी तरह समझ रही थी, अब छुटकी लाख चूतड़ पटके, ये मोटा सुपाड़ा टस्स से मस्स नहीं होने वाला था।

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अब बिचारी बिना चुदे नहीं बच सकती थी।

छुटकी हल्की हल्की कराह रही थी, लेकिन अब उसकी कुँवारी किशोर चूत को मोटे सुपाड़े की आदत सी पड़ गई थी।

और ये भी उसकी चूत छोड़कर उसके कच्चे टिकोरों के पीछे पड़ गए थे।

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थोड़ी देर तक उसे सहलाते रहे, दबाते रहे, मसलते रहे,

फिर होंठों के बीच लेकर हल्के-हल्के उन खटमिठिया कच्ची अमियों का स्वाद लेने लगे।

कभी निपल को फ्लिक करते और अचानक उन्होंने उसके बस आते उभरते, निपल्स को काट लिया।

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चीख निकल गई छुटकी की।

रितू भाभी कुछ उनके कान में फुसफुसा रही थीं, और उन्होंने छुटकी की टांगों को दुहरा कर दिया।

उनका एक हाथ अब उसके नितम्ब पे था और एक कमर पे। छुटकी की टाँगें, उनके कंधे पे फँसी थी।

उन्होंने थोड़ा लण्ड बाहर खींचा, छुटकी ने राहत की सांस ली, लेकिन उस बिचारी को क्या मालूम था कि असली हमला अभी बाकी था।

और फिर पूरी ताकत से खूब हचक के, जोर से पेल दिया।

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खूब जोर से चीख निकली- “ओह्ह्ह्ह… आह्ह… जान गई…”

झिल्ली फट चुकी थी।

खून की दोचार बूँदें बाहर चुहचुहा उठी थीं।

लेकिन अभी रुकने का समय नहीं था, दूसरा, तीसरा, चौथा, एक के बाद एक धक्का, वो मारते गए।

वो तड़पती रही, चीखती रही, चिल्लाती रही- “ओह्ह्ह… नहीं जीजू… रुक जाओ आह्ह्ह… जान गई… दीदी… ओह्ह्ह… छोड़ो आह्ह…”

लेकिन उनका बीयर कैन ऐसा मोटा लण्ड आधे से भी ज्यादा अब धंसा था।

जैसे कोई घुड़सवार, किसी बाँकी भागती, हिरणी का पीछा करे और उसे अपने भाले से बींध दे, और हिरणी लथपथ गिर पड़े, बार-बार अपनी गर्दन मोड़कर अपने शिकारी की ओर देखे, बस वही हालत छुटकी की थी।

थकी, निढाल, दर्द से डूबी और पूरी तरह फैली जांघों के बीच, खून खच्चर।

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एक बार तो मैं सहम गई, लेकिन रितू भाभी ने मुझे आँख मार के इशारा किया, अरे कच्ची कली की चूत फटी है, वो भी मूसल ऐसे लण्ड से।

ये तो होना ही था। अब नदी पार हो गई है, घबड़ाना मत।

और सच में, उन्होंने भी अब और चोदना छोड़कर, छुटकी के प्यारे-प्यारे गालों को चूमना शुरू किया,

उसके होंठों को अपने होंठों के बीच लेकर चूसने लगे,

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एक हाथ छुटकी की छोटी-छोटी चूची को दबा सहला रहा था

तो दूसरा हाथ उसका सर हल्के-हल्के सहला रहा था।

5-7 मिनट के बाद, उसने आँख खोल दी और टुकुर-टुकुर अपने जीजा की ओर देखकर हल्के से मुश्कुराया।

फिर उसने मुझे और रितू भाभी को देखा और, हल्के से उसकी आँखों में खुशी नाच रही थी।

मेरी और रितू भाभी की आँखों ने हाई फाइव किया।

उन्होंने प्यार से उसके होंठों के बीच अपनी जीभ पेल दी, और लगे उसका मुँह चोदने।

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वो भी जैसे लण्ड चूस रही हो, उनकी जीभ चूस रही थी।

अब बारी थी गीयर बदलने की,

लेकिन वो भी, हमसे ज्यादा उन्हें अपनी साली की चिंता थी।

वो सिर्फ आधे लण्ड से छुटकी की चूत चोदने लगे, वो भी बहुत हल्के-हल्के।

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दर्द उसे अभी भी हो रहा था, लेकिन मजा भी आ रहा था, कभी दर्द से कराहती तो कभी मजे से सिसकती।

लेकिन ये आधे लण्ड की चुदायी, न तो रितू भौजी को कबूल थी न मुझे।

बांस ऐसे लण्ड वाले जीजा का क्या फायदा अगर साल्ली, आधे तीहे लण्ड से चुदे।

जब तक बच्चेदानी पे धक्के पे धक्का न लगे, और दिन में तारे न नजर आएं तो चुदाई क्या?

रितू भाभी ने पीछे से उन्हें पकड़ा और उनके टिट्स को स्क्रैच करती हुई, इयर लोब्स काटती बोलीं-

“अरे नंदोई भड़ुवे, ये बाकी का आधा लण्ड क्या मेरी ननद की ननदों के लिए बचा रखा है?”

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“नहीं भौजी, आपकी ननद की सास के लिए…”

जवाब मैंने दिया।

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और साथ ही रितू भाभी की मंझली उंगली जो उनके पिछवाड़े को सहला रही थी, एक धक्के में हचक के पूरी तरह उनकी गाण्ड में।

असर ये हुआ की उन्होंने भी पूरी ताकत से धक्का मारा और बचा हुआ लण्ड, छुटकी की चूत में।

पूरा 9” इंच अंदर।

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वो बहुत जोर से चीखी, जैसे किसी ने चाकू मार दिया हो।

लेकिन मैंने तारीफ से उसकी ओर देखा, सुहागरात की पहली चुदाई में, जब इन्होने मेरी झिल्ली फाड़ी थी, मैं सिर्फ आठ इंच अंदर ले पायी थी। उस रात की तीसरी चुदाई में जाकर, जड़ तक इनका एक बालिश्त का घोंटा था मैंने,

और आज मेरी बहन ने पहली बार में ही।

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उसकी आँखों से फिर आंसू निकल रहे थे, वो दर्द से कराह रही थी

लेकिन मैं और रितू भाभी मुश्कुरा रहे थे, उसकी हिम्मत बढ़ा रहे थे।

ये भी बजाय लण्ड अंदर-बाहर करने के, जड़ तक घुसे बित्ते भर के लण्ड को दबा के, उसके बेस को उसकी चूत के पपोटों पे रगड़-रगड़ के मजा दे रहे थे। साथ में उनकी उंगलियां भी कभी क्लिट को छेड़तीं तो कभी टिकोरों को मसलतीं।

और जब उसके आंसू सूख गए, कराहें कम हो गई तो फिर हल्के-हल्के धक्के मारने उन्होंने शुरू कर दिए।

झूलेकर पेंग की तरह और… और अब छुटकी भी उनको बाहों में भींच रही थी, उनके चुम्बन का जवाब दे रही थी

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और बार-बार मजे से सिसक रही थी। धक्कों की रफ्तार धीरे-धीरे तेज हो गई।

और ऊपर से थी न रितू भाभी, उकसाने वाली-

“का हो नंदोई? अरे हचक के पेला सबसे लहुरी साली हौ…”

दर्द उसे अभी भी हो रहा था, लेकिन साथ में एक नया नया मजा भी आ रहा था।

जब वो उसे दुहरी करके पूरी ताकत से धक्का मारते तो सुपाड़ा सीधे बच्चेदानी से टकराता।

वो दर्द से कहर उठती, लेकिन साथ में मजे से सिहर भी उठती।

और अब उनके होंठों, उंगलियों का लण्ड के साथ मिलकर तिहरा हमला हो रहा था। मस्त कच्चे टिकोरों पर, जोश में आके फूली क्लिट पर, और चूत की हचक कर चुदाई तो हो ही रही थी।

छुटकी दो बार झड़ी।

पहली बार लण्ड के मजे से वो झड़ रही थी, तूफान में पत्ते की तरह वो काँप रही थी।

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और जैसे ही तूफान रुकता उसकी ओखली में मूसल फिर पूरी तेजी से चलने लगता।

20-25 मिनट फुल स्पीड चुदाई के बाद वो झड़े, छुटकी के पैर उनके कंधे पे थे, और लण्ड एकदम बच्चेदानी पर सटा,

जैसे लहर पर लहर आ रही, सफेद गाढ़ी थक्केदार मलाई।

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छुटकी मजे में बेहोश शिथिल पड़ी थी।

गाढ़ा, सफेद, चिपचिपा वीर्य निकलकर उसकी गोरी-गोरी जाँघों पर बह रहा था।

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और कुछ देर में वह भी, छुटकी के ऊपर निढाल, गिरे हुए, उसको अपनी देह से दबाये, बाँहों में भींचे,

वीर्य सरिता अभी भी अनवरत बह रही थी।

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पहले सम्भोग रस, फिर वीर्य रस और उसके बाद शांत रस। तूफान के बाद की शान्ति छायी थी।

मैं और रितू भाभी एक दूसरे को देखकर मुश्कुरा रहे थे, काम हो गया था।

कली अब फूल बन चुकी थी।

उसके जीवन में बसंत आ गया था,

और अभी तो ये बस शुरुवात थी।
 
पूर्वाभास ११ -

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साली चली - जीजू के गाँव

पेज ३५ पोस्ट ३४४ -३४५

कुछ देर हम लोग और काम में लगे रहे, तब तक मिश्रायिन भाभी आ गईं।

मिश्रायिन भाभी, सब भौजाइयों की लीडर थीं।

मम्मी से दो चार साल ही छोटी, 32-33 साल के आस-पास और मम्मी की तरह की फिगर वाली, दीर्घ नितम्बा, भरे-भरे चोली फाड़ उरोजों वाली थीं, मिश्रायिन भाभी।

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रिश्ते में भले ही बहू लगें, लेकिन थीं वो मम्मी की पक्की सहेली।

किचेन के काम में उन्होंने हम लोगों का हाथ बटाना शुरू कर दिया, और छुटकी के बारे में पूछा।

जवाब उन्हें सामने से मिल गया, जहाँ सीढ़ी से छुटकी उतर रही थी।

और उसे देखकर कोई नौसिखिया भी समझ लेती, की हचक के चुदी है बिचारी।

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एक भी कदम उसका सीधे नहीं पड़ रहा था।

एक ओर से रीतू भाभी और दूसरी ओर से ये उसे कसकर पकड़े हुए थे।

हर कदम पर कहर रही थी। उसके गालों पे दाँतों के निशान साफ दिख रहे थे।

टाप के ऊपर के दो बटन दिख रहे थे, और किशोर जस्ट उभरती उठती गोलाइयां न सिर्फ झाँक रही थीं, बल्की खुलकर दिख रही थीं और उनपर लगे दांत और नाखून के निशान भी।

लेकिन यहाँ तो मिश्रायिन भौजी ऐसी खेली खायी, घाट-घाट का पानी पी हुई, अनुभवी महिला थीं।

उन्होंने ऊपर से नीचे तक अपनी छुटकी ननद को देखा, जो अब उनकी बिरादरी में आ गई थी।

जिसकी सोन चिरैया फुर्र-फुर्र कर उड़ चुकी थी, बुलबुल ने चारा गटक लिया था।

और उनकी निगाह ने जैसे सहला दुलरा दिया हो, अपनी प्यारी दुलारी कुँवारी छोटी ननद को।

छुटकी शर्मा गई।

उसके गुलाबी लाजवन्ती गाल पे मिश्रायिन भाभी ने जोर से चिकोटी काटी, और पूछा-

“क्यों जा रही हो आज, अपने जीजा के साथ…”

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वो और शर्मा गई, जैसे वो समझ गई हो उसकी दीदी की ससुराल में क्या होना है?

लेकिन जवाब भौजी के नंदोई ने दिया, वो भी उदास स्वर में-

“अरे क्या भाभी, जा रही है लेकिन 15-20 दिन के बाद वापस आ जाएगी…”

“जबकी उसके दो हफ्ते बाद, गर्मी की दो महीने की छुट्टियां शुरू हो जाएँगी…”

छुटकी ने भी अपना दुःख जाहिर किया।

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“अरे गरमी की छुट्टी का मजा तो गाँव में ही, हमारी अपनी इतनी बड़ी आम की बाग है, खूब गझिन,

जहाँ दिन में रात हो जाय, लंगड़ा, दसहरी, सब कुछ, लेकिन अब इसको तो लौटना ही है…” '

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भौजी के नंदोई का उदास स्वर चालू था।

“लेकिन काहे को लौटोगी, नंदोई जी सही तो कह रहे हैं,

अबकी गर्मी छुट्टी का मजा दीदी की ससुराल में ही लो न, दीदी का भी तुम्हारे मन लगा रहेगा…”

मिश्रायिन भाभी ने कहा।

“मन तो मेरा भी यही कर रहा है, लेकिन…”

छुटकी उदास मन से बोली।

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और बात पूरी की, मम्मी ने- “

अरे आना तो पड़ेगा ही बिचारी को, आखिर सालाना इम्तहान है…”

मिश्रायिन भाभी मुश्कुराईं और फिर, प्यार से छुटकी का गाल सहला के पूछीं-

“तेरा क्या मन कर रहा है, जीजू के साथ गर्मी छुट्टी बिताने का, या फिर लौटकर आने का…”

छुटकी को तो अभी इतना मस्त जो नया-नया मजा मिला था, वो यहाँ लौट कर आने पर कहाँ मिलने वाला था, उसके मुँह से दिल की बात निकल ही गई-

“वहीं गर्मी की छुट्टी बिताने का…”

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“तो रहो न, क्यों लौट रही है 10 दिन के लिए…” मुश्कुराहट रोकती हुई, मिश्रायिन भाभी बोलीं।

“अरे तो इम्तहान कौन देगा मेरा?” झुंझलाते हुए छुटकी बोली।

“तो मत देना ना…”

मिश्रायिन भाभी बोलीं। फिर हँसकर उसे गले लगाते बोली-

“अरे बुद्धू, मैं किस दिन काम आऊँगी। तेरे छमाही में बहुत अच्छे नंबर थे, मुझे मालूम हैं, बस उसी के बेसिस पर, सप्लीमेंट्री आ जायेगी। मेरी गारंटी…”

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मिश्रायिन भाभी छुटकी के स्कूल की वाइस प्रिंसिपल थी और उनके ‘वो’ मैंनेजिंग कमेटी के सेक्रेटरी भी थे, किसकी हिम्मत थी उनकी बात टालती।

मारे खुशी छुटकी उनसे चिपक गई।

और उससे भी ज्यादा खुश हो रहे थे, ‘वो’ उसके जीजू।

और साथ में मैं, जिसमें उनकी खुशी, उसमें मेरी खुशी।

और तभी मंझली भी आ गई।

उसका बोर्ड का इम्तहान कल ही था।

तय ये हुआ की बोर्ड का इम्तहान खत्म करके, वो भी मेरे पास आ जायेगी, और फिर पूरी गर्मी की छुट्टी, दोनों बहने वहीं गाँव में बिताएंगी, मेरे साथ।

मैं मम्मी के साथ किचेन में लग गई।

बस दो घंटे बचे थे, हमें निकलने में।

आधे पौन घंटे में हम लोगों ने खाने का काम आलमोस्ट कर लिया।

मिश्रायिन भाभी और रीतू भाभी, नयी बछेड़ी, छुटकी को कबड्डी के दांव पेंच सिखा रही थीं।

आखिर भाभियां थीं- “नाम मत डुबोना हमारा…”

रीतू भाभी उसके टिकोरे मसलते बोलीं।

“अरे भाभी निचोड़ के रख दूंगी…” हँसते हुए छुटकी बोली।

और फिर मिश्रायिन भाभी पिछवाड़े के दरवाजे के गुर सिखाने में जुट गईं।

मम्मी मुझसे बोलीं-

“जरा मैं छुटकी के कपड़े सामान चेक कर लूँ…”

और मैं ऊपर छुटकी के कमरे की ओर चल दी।

उसके कपड़ों में से मैंने उसकी ब्रा और पैंटी निकाल के वापस बाहर कर दी।

सिवाय एक सेट के।

ये उन्हीं का इंस्ट्रकशन था की, मैं उसकी ब्रा पैंटी निकाल दूँ।

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बात सही थी, गाँव में ये सब कौन पहनता है।

फिर उनका और नंदोई जी का फायदा,

जब चाहा, पकड़ा, निहुराया, सटाया

और चोद दिया।

कुछ शरारत और की मैंने, उसके टाप की ऊपर की दो बटनें मैंने तोड़ दी,

अरे जब तक बहन के खुले-खुले जोबन, पूरे गाँव में आग न लगाएं, तो मजा क्या?

मिश्रायिन भाभी चली गई थीं और रीतू भाभी, मम्मी के साथ मिलकर टेबल लगा रही थीं।

;;;;

छुटकी तैयार हो रही थी, ट्रेन के टाइम में एक घण्टा बचा था।



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मंझली और रीतू भाभी हम लोगों को स्टेशन तक छोड़ने आये।

और हम सब जब ट्रेन में बैठ गए तो उन दोनों ने आँख नचाकर, मुश्कुराकर पूछा-

“क्यों जीजू, मजा आया ससुराल में पहली होली का…”

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गाड़ी चलने के पहले टीटी आया, वही जो परसों रात में ट्रेन में था, और उसने वही बात बोली-

“फर्स्ट क्लास में आज कोई और पैसेंजर नहीं है, आप लोगों के सिवाय। आप डिब्बे का ही दरवाजा अंदर से बंद कर लीजिये,

मुझे और डिब्बे भी चेक करने हैं…”

मुश्कुराते हुए उन्होंने हामी भरी।

कनखियों से मैंने देखा, ₹100 के दो नोट इनके हाथ से उनके हाथ पास हुए, आते हुए से दुगुने…

और क्यों नहीं माल भी तो दुगुने थे।

कच्चे टिकोरों वाली साली,

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रात भर रेल गाड़ी में सटासट-सटासट, गपागप-गपागप।

बस, यह थी ‘इनके’ ससुराल में पहली होली के दो दिनों की कहानी।
 
और इसके आगे की कहानी अगली पोस्टों में-

छुटकी -होली दीदी की ससुराल में

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होली की अग्रिम शुभकामनाएं

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तो अब शुरू होती है,

छुटकी - होली, दीदी की ससुराल में

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छुटकी - होली, दीदी की ससुराल में

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छुटकी,

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स्टेशन पर सब लोग छोड़ने आये थे , उनकी सलहज , रीतू भाभी , ... उनकी मंझली साली , दसवीं वाली ... बेचारी अभी भी सम्हल सम्हल कर चल रही थी , पिछवाड़े तेज चिलख उठ रही थी उसको , और रीतू भाभी अपनी ननद की ये हालत देख कर , मुश्किल से अपनी हंसी दबा पा रही थीं , पता उन्हें भी था और मुझे भी , मैं तो जब छत पर के कमरे से छुटकी का सामान लाने गयी थी तो मैंने हल्के से देखा भी था , मंझली निहुरी हुयी थी , कुतिया बनी दुछत्ती पर , और ये पीछे से चढ़े हुए ,

" नहीं जीजू उधर नहीं , पीछे नहीं , प्लीज आगे कर लीजिये न बहुत दर्द हो रहा है "

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मैं समझ गयी , अगर लड़के दर्द का ख्याल करें न तो न तो किसी लड़की की गाँड़ मारी जाय न किसी चिकने लौंडे की गाँड़ ,... और ऊपर से वहां न तो कडुआ तेल था न वैसलीन , सिर्फ थूक लगा के ये अपनी मंझली साली की गाँड़ मारने के चक्कर में पड़े थे , दसवें में पढ़ने वाली लड़की ,कितनी कसी होगी आप सोच सकते हैं , ...

बस मैं दबे पाँव बिना कुछ भी आवाज किये नीचे छुटकी का समान ले कर आ गयी ,

मिश्राइन भाभी ने बल्कि पूछा भी पाहुन नहीं दिख रहे हैं मैंने बहाना बना दिया , बस तैयार हो रहे हैं , आ ही रहे हैं।

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हम लोगो के एकदम चलने का टाइम हो गया तब पहले सहारा लेकर धीरे धीरे मंझली ऊपर से उतरी , और पीछे पीछे वो ,...

और मंझली के चलने के अंदाज से सभी समझ गए पिछवाड़े कुदाल कस के चली है।

छुटकी बहुत खुश थी ,

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आखिर उसे अपने जीजू के साथ चलने का मौका मिल गया , और फिर उससे बढ़कर उसे आठ दस दिन के बाद आना नहीं पड़ेगा , मिश्राइन भाभी ने अपने सलहज होने का हक पूरी तरह अदा कर दिया , नन्दोई का फायदा करा कर ,... इनका मुंह उतरा था छुटकी चल तो रही थी , लेकिन उसे आठ दस दिन बाद आना पड़ता , नौवीं का सालाना का इम्तहान बाकी था ,

बस उन्होंने अपने नन्दोई की परेशानी समझ भी ली , सुलझा भी दी। वो छुटकी के स्कूल की वाइसप्रिंसिपल थी और मिश्राजी मैनेजर , बस। उन्होंने फैसला सुना दिया , छुटकी को।

" ... तो मत आओ न , अरे ऐसे जीजू के पास जाने का मौक़ा थोड़े मिलता है , अरे तेरा छमाही में अच्छे नंबर थे बस उसी के ऊपर , ... कम्पार्टमेंटल ,... अब जुलाई में स्कूल खुलेगा तभी , तीन चार महीने दीदी जीजा के पास रहो ,... "

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ये बताना मुश्किल था की छुटकी ज्यादा खुश थी या छुटकी के जीजू।

और अब वो अपने जीजू के पास चिपकी लिबरा रही थी,इतरा रही थी , मंझली को चिढ़ा रही थी , एकदम भूल कर की अभी चार पांच घंटे पहले इन्ही इसके जीजू ने कितनी बेरहमी से फाड़ी थी ,... और कितना जोर जोर से वो चीख चिल्ला रही थी।

" जीजू आपने आज बहुत तंग किया अभी तक ,... " वो अपने जीजू से शिकायत कर रही थी की उसके जीजू की सलहज ने अपनी ननद का छुटकी का गाल कस के चिकोटी काटी ,

" अरे जीजू ने तंग किया की ढीली किया , अभी तो जा रही हो न आज रात में ट्रेन में तेरी बची खुची भी ढीली कर देंगे , ... प्यार से करवाना , ... "

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स्टेशन पर ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी , अभी तो होली की छुट्टिया हीं चल रही थी , कौन होली के बीच में जाता , और जब ट्रेन आयी तो वो भी आलमोस्ट खाली , फर्स्ट क्लास के चार बर्थ वाले में हम लोगों का रिजर्वेशन था , हम लोगों का स्टेशन छोटा सा था तो दो मिनट में ही ट्रेन चलने लगी।

लेकिन तभी उसके पहले टीटी आया , वही जो हम लोगों के आते समय था और जिसको उन्होंने १०० रुपये की टिप दी थी

उनको देखते ही जोर से मुस्कराया , बोला लगता है होली जबरदस्त हुयी है।

सच में १० -१२ कोट तक तो मैंने गिना था उसके बाद मैंने भी छोड़ दिया , सबसे तगड़ी तो मोहल्ले की भाभियाँ , इनकी सलहजें , ... महीने भर की कालिख इकट्ठा की थी और एक इंच भी इनके देह की बची नहीं होगी , जहाँ वो कालिख नहीं पोती गयी होगी , बल्कि मिश्राइन औरदूबे भाभी ने पिछवाड़े दो पोर तक अंदर ऊँगली कर के भी , उसके बाद आज उनकी सालियों ने लीला , रीमा छुटकी और रीतू भाभी ने ,... पिछवाड़े के गड़हे में , वार्निश पेण्ट , पके रंग लाल नीला बैगनी और रीतू भाभी ने तो इनकी सालियों से , छुटकी की दोनों सहेलियों से , सीधे उनके चर्म दंड पर सुनहला पेण्ट ,...

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" अरे ससुराल में आये थे ऐसे बच के चले जाते , ... महीने भर तक तो लगेगा रंग छुड़ाने में , " उनके बगल में बैठी हंसती खिलखलाती छुटकी बोली।

उसका भी तो चेहरा क्या पूरी देह पर अभी भी रंगों के निशान,.... जीजा के साथ भौजाइयों ने भी

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लेकिन ये तो सीधे मुद्दे पर आये ,

" रास्ते में कोई और पैंसेजर तो नहीं आएगा ,... " उन्होंने पूछा।

" नहीं नहीं अभी तो होली की ,... आप के कोच में आप ही लोग है और आप का स्टेशन भी सुबह आठ बजे आएगा , और आज ट्रेन में कोई और टीटी नहीं है , मुझे ही सारे डिब्बे चेक करने है , एक ओर का डिब्बा मैंने बंद कर दिया है , आप दूसरी ओर का बंद कर दें "

इतनी जोर से इनकी मुस्कराहट फैली और बाहर निकलने के साथ ही अबकी २०० का नोट इनके हाथ से टीटी के जेब में चला गया।

मुझे मंझली और छुटकी का स्टेशन पर , एक दूसरे को चिढ़ाना याद आ रहा था, पहले तो छुटकी खूब मंझली को चिढ़ा रही थी,

"देख जीजू मुझे ज्यादा चाहते हैं तभी तो मुझे अपने साथ ले जा रहे हैं, तू यहाँ बैठ के किताबों से कुश्ती लड़ना और मैं वाहन जीजा के साथ गाँव में खूब मस्ती,... और अब तो इम्तहान देने भी नहीं लौटना है, मुझे बस वहीँ दीदी के गाँव, जीजू के साथ रोज मस्ती,... "

लेकिन मंझली भी तो मेरी बहन थी, वो चढ़ गयी, बोली,...

" अरे जीजू ने तो तेरे सिर्फ आगे, मेरे तो आगे पीछे दोनों ओर, अभी शाम को खूब दर्द हुआ लेकिन साली कौन जो जीजू के लिए थोड़ा बहुत दर्द न बर्दास्त करे, ...तो सोच ले,... मैं बड़ी हूँ , इसलिए मेरे आगे पीछे दोनों , और तेरे तो सिर्फ एक ओर "

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गनीमत था उसी समय ट्रेन के आने की सीटी सुनाई दी लेकिन मैं जानती थी छुटकी को , अब उसके मन में भी,....

और उसे क्या मालूम था, उसके पिछवाड़े पर तो उसके जीजू के जीजू का नाम लिखा था, जो पिछवाड़े के मामले में अपने साले से भी दो हाथ आगे थे, और किंकी भी नम्बरी, मैं भूल नहीं सकती की होली के दिन दहाड़े कैसे उन्होंने मेरे पिछवाड़े चढ़ाई की, वो भी अपनी पत्नी और मेरी ननद के सामने, साथ में उनका एक दोस्त भी था,

ये अभी भी केबिन के बाहर थे , सब दरवाजे कोच के अच्छी तरह बंद करने, और कपडे चेंज करने, और मैं एक बार फिर से यादों में खो गयी, नन्दोई जी ने रगड़ाई तो मेरी बहुत की पर मजा भी बहुत आया,

फ्लैश बैक
 
फ्लैश बैक -----नंदोई दो सलहज एक

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मैं, बड़ी ननद और नंदोई जी बचे|

कसरती देह, लंबा तगड़ा शरीर और सबसे बढ़ के लंबा और खूब मोटा लंड, जो अभी भी हल्का हल्का तन्नाया था|

तब तक एक और आदमी आया...ननद ने बताया कि ये उनके जीजा लगते हैं इसलिए वो भी मेरे नंदोई लगेंगे| हँस के मैंने चिढ़ाया,

“अरे ननद एक और नंदोई दो...बड़ी नाइंसाफी है|”

“अरे भाभी, आप हैं ना मुकाबला करने के लिए मेरी ओर से...” वो बोली|

“आज तो होली हमलोग अपनी सलहज से खेलने आए हैं|” दोनों एक साथ बोले|

मैंने रंग से जवाब दिया, पास रखी रंग की बाल्टी उठा के सीधे दोनों पर एक साथ और दोनों नंदोई रंग से सराबोर हो गये|

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दूसरी बाल्टी का निशाना मैंने सीधे उनके खूंटे पे...पर तब तक वो दोनों भी संभल गए थे| एक ने मुझे पीछे से पकड़ा और दूसरे ने पहले गालों पे, फिर मेरी लपेटी, देह से चिपकी साड़ी के ऊपर से हीं मेरे जोबन पे रंग लगाना शुरू कर दिया|

“अरे एक साथ दोनों डालियेगा क्या?” मैंने हँस के पूछा|

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“मन मन भावे...अरे भाभी मन की बात जुबान पे आ गई| साफ साफ क्यों नहीं कहती कि एक साथ आगे पीछे दोनों ओर का मजा लेना चाहती हैं|”

ननद ने हँस के चिढ़ाया|

“हम दोनों तैयार हैं|” दोनों साथ साथ बोले|

“आगे वाली तेरी, पीछे वाली मेरी..”

नंदोई ने टुकड़ा लगाया|

तब तक गिरे हुए रंग पे फिसल के मेरे छोटे (जो बाद में आये थे और जिसे ननद ने जीजा कहा था) नंदोई गिरे और उन्हें पकड़े पकड़े उनके ऊपर मैं गिरी| रंग से सराबोर|

नंदोई ने मेरी साड़ी खींच के मुझे वस्त्रहीन कर दिया| लेकिन अबकी ननद ने मेरा साथ दिया| मेरे नीचे दबे छोटे नंदोई का पजामा खींच के उनको भी मेरी हालत में ला दिया| (कुरता बनियान तो दोनों का हमलोग पहले हीं फाड़ के टॉपलेस कर चुके थे और नंदोई ने मेरी ननद को भी... तो अब हम चारो एक हालत में थे|)

क्या लंड था, खूब मोटा, एक बालिश्त सा लंबा और एकदम खड़ा|

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ननद ने अपने हाथों में लगा रंग सीधे उनके लंड पे कस-कस के पोत दिया|

मैं क्यों पीछे रहती, मेरे मुँह के पास नंदोई जी का मोटा लंड था|

मैंने दोनों हाथों से कस-कस के लाल पक्का रंग पोत दिया| खड़ा तो वो पहले से हीं था, मेरा हाथ लग के वो लोहे का रॉड हो गया, लाल रंग का| मेरे नीचे दबे नंदोई मेरी चूत और चूचि दोनों पे रंग लगा रहे थे|

“अरे चूत के बाहर तो बहुत लगा चुके, जरा अंदर भी तो लगा दो मेरी प्यारी भाभी जान को|” ननद ने ललकारा|

“अरे चूत क्या, मैं तो सीधे बच्चेदानी तक रंग दूंगा, याद रहेगी ये पहली होली गाँव की|” वो बोले|

जब तक मैं संभलूं संभलूं, उन्होंने मेरी पतली कमर को पकड़ के उठा लिया और मेरी चूत सीधे उनके सुपाड़े से रगड़ खा रही थी|

ननद ने झुक के पुत्तियों को फैलाया और नंदोई ने ऊपर से कन्धों को पकड़ के कस के धक्का दिया और एक बार में हीं गचाक से आधे से ज्यादा लंड अंदर|

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मैंने भी कमर का जोर से लगाया और जब मेरी कसी गुलाबी चूत में वो मोटा हलब्बी लंड घुसा तो होली का असली मजा आ गया|

मेरे हाथ का रंग तो खत्म हो गया था...जमीन पे गिरे लाल रंग को मैंने हाथ में लिया और कस-कस के पक्के लाल रंग को नंदोई के लंड पे पोत के बोलने लगी,

“अरे नंदोई राजा, ये रंग इतना पक्का है जब अपने मायके जाके मेरी इस छिनाल ननद की दर छिनाल हरामजादी, गदहा चोदी ननदों से, अपनी रंडी बहनों से चुसवाओगे ना हफ्ते भर तब भी ये लाल का लाल रहेगा| चाहे अपनी बहनों के बुर में डालना या अम्मा के भोंसड़े में|”

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तब तक जमीन पे लेटे मुझे चोद रहे नंदोई ने कस के मुझे अपनी बाँहों में भींच लिया और अब एकदम उनकी छाती पे लेटी मैं कस के चिपकी हुई थी| मेरी टाँगे उनकी कमर के दोनों ओर फैली, चूतड़ भी कस के फैले हुए|

अचानक पीछे से नंदोई ने मेरी गांड़ के छेद पे सुपाड़ा लगा दिया|

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नीचे से नंदोई ने कस के बाँहों में जकड़ रखा था और ननद भी कस के अपनी उँगलियों से मेरी गांड़ का छेद फैला के उनका सुपाड़ा सेंटर कर दिया|

नंदोई ने कस के जो मेरे चूतड़ पकड़ के पेला तो झटाक से मेरी कसी गांड़ फाड़ता, फैलाता सुपाड़ा अंदर| मैं तिलमिलाती रही, छटपटाती रही लेकिन,

“अरे भाभी आप कह रही थीं ना दोनों ओर से मजा लेने का, तो ले लो ना एक साथ दो दो लंड|”

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ननद ने मुझे छेड़ा|

“अरे तेरी सास ने गदहे से चुदवाया था या घोड़े से जो तुझे ऐसे लंड वाला मर्द मिला| ओह लगता है, अरे एक मिनट रुक न नंदोई राजा, अरे तेरी सलहज की कसी गांड़ है, तेरी अम्मा की ४ बच्चों जनी भोंसड़ा नहीं जो इस तरह पेल रहे हो...रुक रुक फट गई, ओह|”

मैं दर्द में गालियाँ दे रही थी|

पर रुकने वाला कौन था?

एक चूचि मेरी गांड़ मारते नंदोई ने पकड़ी और दूसरी चूत चोदते छोटे नंदोई ने, इतने कस-कस के मींजना शुरू किया कि मैं गांड़ का दर्द भूल गई|

थोड़ी हीं देर में जब लंड गांड़ में पूरी तरह घुस चुका था तो उसे अंदर का नेचुरल लुब्रिकेंट भी मिल गया, फिर तो गपागप गपागप...मेरी चूत और गांड़ दोनों हीं लंड लील रही थी|

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कभी एक निकालता दूसरा डालता और दूसरा निकालता तो पहला डालता, और कभी दोनों एक साथ निकाल के एक साथ सुपाड़े से पूरे जड़ तक एक धक्के में पेल देते|

एक बार में जड़ तक लंड गांड़ में उतर जाता, गांड़ भी लंड को कस के दबोच रही थी|

खूब घर्षण भी हो रहा था, कोई चिकनाई भी नहीं थी सिवाय गांड़ के अंदर के मसाले के| मैं सिसक रही थी, तड़प रही थी, मजे ले रही थी| साथ में मेरी साल्ली छिनाल ननद भी मौके का फायदा उठा के मेरी खड़ी मस्त क्लिट को फड़का रही थी, नोच रही थी|

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खूब हचक के गांड़ मारने के बाद नंदोई एक पल के लिए रुके|

मूसल अभी भी आधे से ज्यादा अंदर हीं था|

उन्होंने लंड के बेस को पकड़ के कस-कस के उसे मथानी की तरह घुमाना शुरू कर दिया|

थोड़ी हीं देर में मेरे पेट में हलचल सी शुरू हो गई| (रात में खूब कस के सास ननद ने खिलाया था और सुबह से 'फ्रेश' भी नहीं हुई थी|) उमड़ घुमड़...और लंड भी अब फचाक फचाक की आवाज के साथ गांड़ के अंदर बाहर...तीन तरफा हमले से मैं दो तीन बार झड़ गई, उसके बाद मेरे नीचे लेटे नंदोई मेरी बुर में झड़े|

उनका लंड निकलते हीं मेरी ननद की उंगलियाँ मेरी चूत में...

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और उनके सफेद मक्खन को ले के सीधे मेरे मुँह में, चेहरे पे अच्छी तरह फेसियल कर दिया| लेकिन नंदोई अभी भी कस-कस के गांड़ मार रहे थे...बल्कि साथ साथ मथ रहे थे|

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और जब उन्होंने झड़ना शुरू किया तो पलट के मुझे पीठ के बल लिटा के लंड, गांड़ से निकाल के 'सीधे' मेरे मुँह पे|

मैंने जबरन मुँह भींच लिया लेकिन दोनों नंदोइयों ने एक साथ कस के मेरा गाल जो दबाया तो मुँह खुल गया|

फिर तो उन्होंने सीधे मुँह में लंड ठेल दिया|

मुझे बड़ा ऐसा...ऐसा लग रहा था लेकिन उन्होंने कस के मेरा सिर पकड़ रखा था और दूसरे नंदोई ने मुँह भींच रखा था| धीरे धीरे कर के पूरा लंड घुसेड़ दिया मेरे मुँह में...उनके लंड में...लिथड़ा...लिथड़ा..

वो बोले,

“अरे सलहज रानी गांड़ में तो गपाक गपाक ले रही थी तो मुँह में लेने में क्यों झिझक रही हो?”

“भाभी एक नंदोई ने तो जो बुर में सफेद मक्खन डाला वो तो आपने मजे ले के गटक लिया तो इस मक्खन में क्या खराबी है? अरे एक बार स्वाद लग गया न तो फिर ढूंढती फिरियेगा, फिर आपके हीं तो गांड़ का माल है| जरा चख के तो देखिए|”

ननद ने छेड़ा और फिर नंदोइयों को ललकारा,

“अरे आज होली के दिन सलहज को नया स्वाद लगा देना, छोड़ना मत चाहे जितना ये चूतड़ पटके...”

मैं आँख बंद कर के चाट चूट रही थी|

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कोई रास्ता भी नहीं था| लेकिन अब धीरे धीरे मेरे मुँह को भी और एक...| नए ढंग की वासना मेरे ऊपर सवार हो रही थी| लेकिन मेरी ननद को मेरी बंद आँख भी नहीं कबूल थी|

उसने कस के मेरे निप्पल पिंच किये और साथ में नंदोई ने बाल खींचे,

“अरे बोल रही थी ना कि मेरे लंड को लाल रंग का कर दिया कि मेरी बहनें चूसेंगी तब भी इसका रंग लाल हीं रहेगा ना, तो देख छिनाल, तेरी गांड़ से निकल के किस रंग का हो गया है?”

वास्तव में लाल रंग तो कहीं दिख हीं नहीं रहा था| वो पूरी तरह मेरी गांड़ के रस से लिपटा...

“चल जब तक चाट चूट के इसे साफ नहीं कर देती, फिर से लाल रंग का ये तेरे मुँह से नहीं निकलेगा| चल चाट चूस कस-कस के..ले ले गांड़ का मजा|”

वो कस के ठेलते बोले|
 
फ्लैश बैक नए मजे होली के

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“चल जब तक चाट चूट के इसे साफ नहीं कर देती, फिर से लाल रंग का ये तेरे मुँह से नहीं निकलेगा| चल चाट चूस कस-कस के..ले ले गांड़ का मजा|”

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वो कस के ठेलते बोले|

तब तक छोटे नंदोई का लंड भी फिर से खड़ा हो गया था| मेरी ननद ने कुछ बोलना चाहा तो उन्होंने उसे पकड़ के निहुरा दिया और बोले,

“चल अब तू भी गांड़ मरा, बहुत बोल रही है ना..”

और मुझसे कहा कि मैं उसकी गांड़ फैलाने में मदद करूँ|

मुझे तो मौका मिल गया| पूरी ताकत से जो मैंने उसकी चियारी तो...क्या होल था? गांड़ का छेद पूरा खुला खुला| तब तक नंदोई ने मेरे मुँह से लंड निकाल लिया था|

उनका इशारा पाके मैंने मुँह में थूक का गोला बना के ननद की खुली गांड़ में कस के थूक के बोला,

“क्यों मुझे बहुत बोल रही थी ना छिनाल, ले अब अपनी गांड़ में लंड घोंट| नंदोई जी एक बार में हीं पूरा पेल देना इसकी गांड़ में|”

उन्होंने वही किया|

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हचाक हचाक...और थोड़ी देर में उसकी गांड़ से भी गांड़ का...

अब मुझे कोई...घिन नहीं लग रही थी| बल्कि मैं मजे से देख रही थी| लेकिन एक बात मुझे समझ में नहीं आ रही थी कि ननद बजाय चीखने के अभी भी क्यों मुस्कुरा रही थीं|

वो मुझे थोड़ी देर में हीं समझ में आ गया, जब उन्होंने उनकी गांड़ से अपना...लिथड़ा लंड निकाल के सीधे...जब तक मैं समझूं संभलूं मेरे मुँह में घुसेड़ दिया|

मैं मुँह भले बना रही थी...लेकिन अब थोड़ा बहुत मुझे भी...और मैं ये समझ भी गई थी कि बिना चाटे चूटे छुटकारा भी नहीं मिलने वाला| ओं ओं मैं करती रही लेकिन उन्होंने पूरे जड़ तक लंड पेल दिया|

“अरे भाभी अपनी गांड़ के मसाले का बहुत मजा ले लिया, अब जरा मेरी गांड़ के...का भी तो मजा चखो, बोलो कौन ज्यादा मसालेदार है? जरा प्यार से चख के बताना|”

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ननद ने छेड़ा|

तब तक नंदोई ने बोला,

“अरे ज्यादा मत बोल, अभी तेरी गांड़ को मैं मजा चखाता हूँ| सलहज जी जरा फैलाना तो कस के अपनी ननद की गांड़|”

मैं ये मौका क्यों चूकती|

वैसे मेरी ननद के चूतड़ थे भी बड़े मस्त, गोल गोल गुदाज और बड़े बड़े|

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मैंने दोनों हाथों से पूरे ताकत से उसे फैलाया| पूरा छेद और उसके का माल...सब दिख रहा था|

नंदोई ने दो उंगली एक साथ घुसेड़ी कि ननद की चीख निकल गई| लेकिन वो इतनी आसानी से थोड़ी हीं रुकने वाले थे|

उसके बाद तीन उंगली, सिर्फ अंगूठा और छोटी उंगली बाहर थी और तीनों उंगली सटासट सटासट...

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अंदर बाहर,

मैंने चूत की फिस्टिंग की बात सुनी थी लेकिन इस तरह गांड़ में तीन उंगली एक साथ...

मैं सोच भी नहीं सकती थी| एक पल के लिए तो गांड़ से निकले मेरे मुँह में जड़ तक घुसे लंड को भी भूल कर मैं देखती रही| वो कराह रही थी, उनके आँखों से दर्द साफ साफ झलक रहा था|

पल भर के लिए जब मेरे मुँह से लंड बाहर निकला तो मुझसे रहा नहीं गया,

“अरे चूत मरानो, मेरे बहन चोद सैंया की रखैल, पंच भतारी, बहुत बोल रही थी ना मेरी गांड़ के बारे में...क्या हाल है तेरी गांड़ का? अगर अभी मजा ना आ रहा हो तो तेरे भैया को बुला लूं| जरा कुहनी तक हाथ डाल के इसकी गांड़ का मजा दो इसे| इस कुत्ता चोद को इससे कम में मजा हीं नहीं आता|”

मैं बोले जा रही थी और उंगलियाँ क्या लगभग पूरा हाथ उनकी गांड़ में...तब तक वो लसलसा हाथ गांड़ से निकाल के...उन्होंने एक झटके में पूरा मेरे मुँह में डाल दिया और बोले,

“अरे बहुत बोलती है, ले चूस गांड़ का रस...अरे कुहनी तक तो तुम दोनों की गांड़ और भोंसड़े में डालूँगा तब आयेगा ना होली का मजा| लेकिन इसके पहले मजा दूं जरा चूस चाट के मेरा हाथ साफ तो कर सटासट|”

मैं गों गों करती रही लेकिन पूरा हाथ अंदर डाल के उन्होंने चटवा के हीं दम लिया|

“अरे चटनी चटाने से मेरी प्यारी भाभी की भूख थोड़े हीं मिटेगी| ले भाभी सीधे गांड़ से हीं|”

वो मेरे ऊपर आ गयी और बड़ी अदा से मुझे अपनी गांड़ का छेद फैला के दिखाते हुए बोलीं|

“अरे तू क्या चटाएगी...? सुबह तेरी छोटी बहन को मैं सीधे अपनी बुर से होली का...गरमा गरम खारा शरबत पिला चुकी हूँ| सारी की सारी सुनहली धार एक एक बूंद घोंट गई तेरी बहना|”

खीज के मैंने भी सुना दिया|

“अरे तो जो भाभी रानी आपको सुबह से हमलोग शरबत पिला रहे थे उसमें आप क्या समझती हैं...क्या था? आपकी सास से लेके...ननद तक, लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मैं तो अपनी प्यारी भाभी को होली के मौके पे, सीधे बुर और गांड़ से हीं...तो लीजिए ना|”

और वो मेरे मुँह के ठीक उपर अपनी गांड़ का छेद कर के बैठ गईं|

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लेकिन मैंने तय कर लिया था कि लाख कुछ हो जाय अबकी मैं मुँह नहीं खोलूंगी| पहले तो उसने मेरे होंठों पे अपनी गांड़ का छेद रगड़ा, फिर कहती रही कि सिर्फ जरा सा, बस होली के नाम के लिए, लेकिन मैं टस से मस ना हुई|

फिर तो उस छिनाल ने कस के मेरी नाक दबा दी| मेरे दोनों हाथ दोनों नंदोइयों के कब्जे में थे और मैं हिल डुल नहीं पा रही थी| यहाँ तक की मेरी नथ भी चुभने लगी|

थोड़ी देर में मेरी साँस फूलने लगी, चेहरा लाल होने लगा, आँखें बाहर की ओर|

“क्यों आ रहा है मजा, मत खोल मुँह...”

वो चिढ़ा के बोली और सच में इतना कस के उसने अपनी गांड़ से मेरे होंठों को दबा रखा था कि मैं चाह के भी मुँह नहीं खोल पा रही थी|

“ले भाभी देती हूँ तुझे एक मौका, तू भी क्या याद करेगी...किसी ननद से पाला पड़ा था|”

और उसने चूतड़ ऊपर उठा के अपनी गांड़ का छेद दोनों हाथों से पूरा फैला दिया|

“ऊईई उईईईई...|”

मैं कस के चीखी| नंदोई ने दोनों निप्पल्स को कस के पिंच करते हुए मोड़ दिया था| मेरे खुले होंठों पे अपनी फैली गांड़ का छेद रख के फिर वो कस के बैठ गई और एक बार फिर से मेरी नाक उसकी उँगलियों के बीच| अब गांड़ का छेद सीधे मेरे मुँह में| वो हँस के बोली,

“भाभी बस अब अगर तुम्हारी जीभ रुकी तो...अरे खुल के इस नए स्वाद का मजा लो|

अरे पहले आपकी चूत को जब तक लंड का मजा नहीं मिला था, चुदाई के नाम से बिदकती थीं, लेकिन जब सुहागरात को मेरे भैया ने हचक हचक के चोद चोद के चूत फाड़ दी तो एक मिनट इस साली चूत को लंड के बिना नहीं रहा जाता|

पहले गांड़ मरवाने के नाम से भाभी तेरी गांड़ फटती थी, अब तेरी गांड़ में हरदम चींटी काटती रहती है, अब गांड़ को ऐसा लंड का स्वाद लगा कि...तो जैसे वो स्वाद भैया ने लगाए तो ये स्वाद आज उनकी बहना लगा रही है| सच भाभी ससुराल की ये पहली होली और ये स्वाद आप कभी नहीं भूलेंगी|”

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तब तक मेरी दोनों चूचियाँ, मेरे नंदोइयों के कब्जे में थी|

वो रंग लगा रहे थे, चूचि की रगड़ाई मसलाई भी कर रहे थे| दोनों चूचियों के बाद दोनों छेद पे भी...नंदोई ने तो गांड़ का मजा पहले हीं ले लिया था तो वो अब बुर में और छोटे नंदोई गांड़ में...मैं फिर सैंडविच बन गई थी|

लेकिन सबसे ज्यादा तो मेरी ननद मेरे मुँह में...झड़ने के साथ दोनों ने फिर मेरा फेसियल किया मेरी चूचियों पे...

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और ननद ने पता नहीं क्या लगाया था कि अब 'जो भी' मेरी देह से लगता था...वो बस चिपक जाता था| घंटे भर मेरी दुरगत कर के हीं उन तीनों ने छोड़ा|
 
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