Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

hotaks

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६ पृष्ठ १२०३

बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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यह कहानी सीक्वेल है, मेरी एक छोटी सी लेकिन खूब मज़ेदार और गरमागरम होली की कहानी, मज़ा पहली होली का ससुराल में, जी अभी उसकी लिंक भी दूंगी , उसके पहले पेज को रिपोस्ट भी करुँगी, लेकिन उसके पहले इस कहानी की हलकी सी रूपरेखा, जिस कहानी से जुडी है ये कहानी दो चार लाइनें उसके बारे में,

तो इस कहानी में, जुड़ाव बनाये रखने के लिए, पहली कहानी के दो चार प्रसंग, जिनसे छुटकी का और इस कहानी के जुड़े चरित्रों का जुड़ाव है वो पूर्वाभास के तौर पर दूंगी, जिससे छुटकी और उसके जीजा की होली, कैसे और क्यों आयी छुटकी अपनी दीदी के गाँव में , वो सब कुछ कुछ साफ़ हो जाए,

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हालांकि मैं तो चाहूंगी की इस होली में आप मूल कहानी को भी एक बार पढ़ लें, अगर पढ़ी हो तो भी तो थोड़ी फगुनाहट, होली का सुरूर चढ़ जाएगा, लेकिन चलिए मैं दो चार बातें उस कहानी के बारे में भी बात देती हूँ, जिस का यह सीक्वेल है.

मज़ा पहली होली का ससुराल में, शादी के बाद की मेरी पहली होली की कहानी है , इनकी भी। मेरी ससुराल में ननदों , ननदोई, देवरों और सास के साथ कैसी पहली होली हुयी और इनकी अपनी ससुराल में सालियों, सलहज, और सास के साथ कैसी होली पड़ी दोनों ही. चलिए पहले पात्र परिचय करा दूँ, फिर आगे की बात , तो ससुराल में मेरे ये है और इनकी दो बहनें , एक शादी शुदा जो होली में नन्दोई जी के साथ अपने मायके आयी थीं, मेरी ही समौरिया, और दूसरी छोटी ननद , जो मेरी छोटी बहन, छुटकी जैसी ही. देवर कोई नहीं है, लेकिन होली में तो सारा गाँव नयी भौजाई के लिए देवर हो जाता है, और मेरी जेठानी और सास। मायके में मेरी माँ, और दो छोटी बहने, मंझली जो बोर्ड का इम्तहान दे रही थी और छुटकी, उससे छोटी।

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तो पहले दिन की होली मैंने अपनी ससुराल में मनाई और उसी शाम को ट्रेन से हम लोग इनकी ससुराल को चल दिए, और अगली सुबह वहां मेरी दोनों छोटी बहने इनसे होली खेलने के लिया एकदम बौराई थीं, और मेरी सगी तो नहीं लेकिन सगी से बढ़कर, भाभी, इनकी सलहज भी अपने नन्दोई का साथ दे रही थी। तो ससुराल में पहले दिन ही इन्होने अपनी मंझली साली का नेवान कर दिया, रात में सास के साथ सफ़ेद पिचकारी वाली होली खेली, और अगले दिन छुटकी की दो सहेलियां आयी थीं, उन दोनों के साथ, ... छुटकी बहुत घबड़ा रही थी, लेकिन उसकी भाभी,... अपने नन्दोई के साथ मिलकर तो होली में किस साली की बचती है, अगर ननदोई सलहज एक साथ हो जाएँ तो उसकी भी नहीं बची.

ये चाह रहे थे की छुटकी हम लोगों के साथ चले, और इनके साथ मेरे नन्दोई भी, मैंने छुप के दोनों का पूरा प्रोग्राम सुना था. पर इनकी सास तो अपने दामाद से भी दो हाथ आगे थीं , वो खुद,... तो दो दिन एक रात जो ससुराल में इन्होने बितायी होली की मस्ती के साथ, और अगली रात को जो हम इनके गाँव लौटे तो साथ में इनकी छोटी साली भी,

बस तो ये कहानी उसी ट्रेन यात्रा से शुरू होती है,...

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तो आशा रहेगी, मुझे आपके साथ की, प्यार की दुलार की और आपके कमेंट्स की , जो हर कथा यात्रा के लिए पाथेय की तरह है,....

तो बस शुरू करती हूँ और सबसे पहले जिस कहानी का यह सीक्वेल है उसका पहला पन्ना , एक झलक के तौर पर,

Erotica - मजा पहली होली का ससुराल में

मजा पहली होली का, ससुराल में ( इस कहानी के सभी पात्र वयस्क हैं और सभी चित्र इंटरनेट से लिए गए हैं यदि किसी को कोई आपत्ति हो तो टिप्पणी कर सकता है। अंडर एज सेक्स न सिर्फ इस फोरम के नियमों के खिलाफ है बल्कि वैधानिक रूप से भी निषिद्ध है , और मैं वयक्तिगत रूप से भी इसे नहीं पसंद करती।) मुझे...

xforum.live

( इस कहानी के सभी पात्र वयस्क हैं और सभी चित्र इंटरनेट से लिए गए हैं यदि किसी को कोई आपत्ति हो तो टिप्पणी कर सकता है। अंडर एज सेक्स न सिर्फ इस फोरम के नियमों के खिलाफ है बल्कि वैधानिक रूप से भी निषिद्ध है , और मैं वयक्तिगत रूप से भी इसे नहीं पसंद करती।)

पूर्वाभास - पृष्ठ १ और २

भाग १ -पृष्ठ ५ छुटकी - होली, दीदी की ससुराल में

भाग २ पृष्ठ ८ छुटकी -बंधे हाथ, ट्रेन में

भाग ३ पृष्ठ १३ चाय चाय

भाग ४,
पृष्ठ १९ छुटकी का पिछवाड़ा और नन्दोई जी का इरादा

भाग ५ - पृष्ठ २२ गोलकुंडा पर चढ़ाई- चलती ट्रेन में

भाग ६ --पृष्ठ २९ -३० रात भर ट्रेन में, सटासट,...

भाग ७ पृष्ठ ३५ रेल में धक्क्म पेल

भाग ८ पृष्ठ ४० छुटकी पहुंच गयी जीजा के गाँव

भाग ९ -पृष्ठ ४६ मेरी सास

भाग १० --पृष्ठ ५० ननद, नन्दोई और छुटकी का पिछवाड़ा

भाग ११ - पृष्ठ ५३ सासू , ननदिया ( नैना ) का महाजाल

भाग १२ - पृष्ठ ५८ दो बहेलिये ( सासू और नैना ननदिया)

भाग १३ -पृष्ठ ६२ पूरा गाँव,... जीजा

भाग १४ पृष्ठ ६६ देवर मेरे

भाग १५ पृष्ठ ७२ चंदू देवर

भाग १६ -पृष्ठ ७७ फागुन का पहला दिन- देवर भौजाई

भाग १७ -पृष्ठ ८१ छुटकी - प्यार दुलार और,...

भाग १८ - पृष्ठ ८७ चुन्नू की पढ़ाई

भाग १९ - पृष्ठ ९१ ननदों भौजाइयों की रंगभरी कबड्डी

भाग २० -पृष्ठ ९३ छुटकी की हालचाल

भाग २१ - पृष्ठ ९९ छुटकी पर चढ़ाई -

भाग २२ पृष्ठ १०३ रात बाकी

भाग २३ पृष्ठ १०९ नई सुबह

भाग २४ पृष्ठ ११३ देवर भाभी की होली

भाग २५
पृष्ठ १२१ छोटा देवर - कैसे उतरी नथ चुन्नू की

भाग २६ पृष्ठ १२७ पिलानिंग - कच्ची ननदों की लेने की

भाग २७ पृष्ठ १३२ और छुटकी की होली

भाग २८ पृष्ठ १३६ - किस्सा इन्सेस्ट यानी भैया के बहिनिया पर चढ़ने का- उर्फ़ गीता और उसके भैया अरविन्द का

भाग २९ पृष्ठ - १४५ इन्सेस्ट का किस्सा -तड़पाओगे, तड़पा लो,... हम तड़प तड़प के भी

भाग ३० पृष्ठ १५२ किस्सा इन्सेस्ट का, भैया और बहिनी का -( अरविन्द -गीता ) दूध -मलाई

भाग ३१ पृष्ठ १६५ किस्सा इन्सेस्ट का,-रात बाकी बात बाकी

भाग ३२ पृष्ठ १७८ इन्सेस्ट गाथा अरविन्द और गीता,-सुबह सबेरे

भाग ३३ पृष्ठ २०० अरविन्द और गीता की इन्सेस्ट गाथा सांझ भई घर आये

भाग ३४ पष्ठ २१४ इन्सेस्ट कथा - चाची ने चांदनी रात में,...


भाग ३५ पृष्ठ २२५ फुलवा

भाग ३६ - पृष्ठ २३६ इन्सेस्ट किस्सा- मस्ती भैया बहिनी उर्फ़ गीता -अरविन्द की

भाग ३७ - पृष्ठ २५० इन्सेस्ट कथा - और माँ आ गयीं

भाग ३८ पृष्ठ २६० मेरे पास माँ है

भाग ३९ - पृष्ठ २७१ माँ, बेटा, बेटी और बरसात की रात

भाग ४० पृष्ठ २८६ इन्सेस्ट गाथा - गोलकुंडा पर चढ़ाई -भाई की माँ के सामने

भाग ४१ पृष्ठ ३०३ इन्सेस्ट कथा - मामला वल्दियत का उर्फ़ किस्से माँ के

भाग ४२ पृष्ठ ३१७ इन्सेस्ट कथा माँ के किस्से,

भाग ४३ पृष्ठ ३२९ इन्सेस्ट कथा- माँ के किस्से, मायके के

भाग ४४ पृष्ठ ३४१ रिश्तों में हसीन बदलाव उर्फ़ मेरे पास माँ है

भाग ४५ पृष्ठ ३४८ गीता चली स्कूल

भाग ४६ पृष्ठ ३६३ तीन सहेलियां खड़ी खड़ी, किस्से सुनाएँ घड़ी घड़ी

भाग ४७ पृष्ठ ३७५ रोपनी

भाग ४८ - पृष्ठ 394 रोपनी -फुलवा की ननद

भाग ४९ पृष्ठ ४२० मस्ती -माँ, अरविन्द और गीता की


भाग ५० पृष्ठ ४३५ माँ का नाइट स्कूल

भाग ५१ पृष्ठ ४५६ भैया के संग अमराई में

भाग ५२ पृष्ठ ४७९ गन्ने के खेत में भैया के संग


भाग ५३ - पृष्ठ ४९ ४ फुलवा की ननद

भाग ५४ पृष्ठ ५०६ स्वाद पिछवाड़े का

भाग ५५ पृष्ठ ५२१ माँ

भाग ५६ - पृष्ठ ५३६ - गीता और खेत खलिहान

भाग ५७- पृष्ठ ५४६ कुश्ती ननद भौजाई की -

भाग ५८ पृष्ठ ५५७ मंजू भाभी, मिश्राइन भाभी और स्ट्रेटजी

भाग ५९ पृष्ठ ५६७ कबड्डी ननद और भौजाई की

भाग ६० पृष्ठ ५७३ कबड्डी राउंड २

भाग ६१ पृष्ठ ५८१ कबड्डी राउंड ३

भाग ६२ पृष्ठ ६०५ कबड्डी फाइनल राउंड

भाग ६३ पृष्ठ ६१६ जीत गयी भौजाइयां

भाग ६४ पृष्ठ ६२४ ननदों की हार भाभियों की मस्ती

भाग ६५ पृष्ठ ६३२ भाभियाँ की जीत का जश्न

भाग ६६ पृष्ठ ६३९ ननदों संग मस्ती -मज़ा कच्ची कली रूपा का

भाग ६७ पृष्ठ ६४३ होलिका माई

भाग ६८ - पृष्ठ ६६२ हो गयी शाम घर की ओर

भाग ६९ पृष्ठ ६७३ पिलानिंग कल की , ननदों की

भाग ७० पृष्ठ ६८४ रेनू और कमल

भाग ७१ पृष्ठ ६९३ किस्सा रेनू और कमल का

भाग ७२ पृष्ठ ७०३ मेरा भाई मेरी जान--किस्से भैया बहिनिया के

भाग ७३ - पृष्ठ ७२१ किस्से भैया बहिनिया के

भाग ७४ पृष्ठ ७३२ मस्ती रेनू और कमल की,

भाग ७५ पृष्ठ ७४४ पठान टोले वाली

भाग ७६ - पृष्ठ ७४९ बुर्के वाली पठान टोले की

भाग ७७ पृष्ठ ७६५ इंटरवल के बाद ननदों की मस्ती

भाग ७८ पृष्ठ ७७९ चंदा का पिछवाड़ा और कमल का खूंटा

भाग ७९ - पृष्ठ ७९५ हिना और दूबे भाभी

भाग ८० पृष्ठ ८०७ चमेलिया -गुलबिया

भाग ८१ पृष्ठ ८१८ बारी भौजाइयों की

भाग ८२ पृष्ठ ८३० सुगना भौजी

भाग ८३ पृष्ठ ८४५ महुआ चुये

भाग ८४ पृष्ठ ८५८ ननद के भैया बने उनके सैंया-

भाग ८५ पृष्ठ ८७० इन्सेस्ट कथा -ननद के भैया बन गए सैंया -

भाग ८६ ----पृष्ठ ८८३ इन्सेस्ट कथा - सैंया बने नन्दोई

भाग ८७ - पृष्ठ ८९७ इन्सेस्ट कथा -इंटरवल और थोड़ा सा फ्लैश बैक

भाग ८८ पृष्ठ ९०९ - इन्सेस्ट कथा - मेरा मरद -मेरी ननद

भाग ८९ - पृष्ठ ९१९ - इन्सेस्ट कथा - इनकी माँ - मेरी सास

भाग ९०- पृष्ठ ९३३ - वह रात

भाग ९१ पृष्ठ ९४३ नया दिन नयी सुबह -सास बहू

भाग ९२ पृष्ठ ९५० ननद और आश्रम -

भाग ९३ पृष्ठ ९६३ नन्दोई सलहज और सास

भाग ९४--- पृष्ठ ९७१ मस्ती सास और सलहज के साथ -

भाग ९५ पृष्ठ ९९५ सास का पिछवाड़ा

भाग ९६ पृष्ठ १००५ ननद की सास, और सास का प्लान -

भाग ९७ पृष्ठ १०१० आज की रात

भाग ९८ पृष्ठ १०१६ अगली परेशानी - ननदोई जी,

भाग ९९ पृष्ठ १०२५ ननद की रात -ननदोई के संग

भाग १०० - पृष्ठ १०३५ ननद की बिदायी

भाग १०१ - पृष्ठ १०६७ मेरा मरद,

भाग १०२ - पृष्ठ १०७३ सुगना और उसके ससुर -सूरजबली सिंह

भाग १०३ पृष्ठ १०७६ इमरतिया

भाग १०४, पृष्ठ १०८१ , बुकवा ( उबटन ) और इमरतिया भौजी

भाग 105 पृष्ठ १०८६ कोहबर और ननद भौजाई ,

भाग १०६ - पृष्ठ, १०९५ रीत रस्म और गाने,

भाग १०७ पृष्ठ ११०० बुच्ची और चुनिया

भाग १०८ - पृष्ठ ११०७ खुल गया नाड़ा

भाग १०९ - पृष्ठ १११६ नाच गाना, मस्ती और सुरजू

भाग ११० पृष्ठ ११२७ नाच -चुनिया और बुच्ची

भाग १११ पृष्ठ ११३८ पंडित जी और बुच्ची की लिख गयी किस्मत

भाग ११२ - पृष्ठ ११४५ अगला दिन, बुच्ची और इमरतिया

भाग ११३ पृष्ठ ११७० हल्दी-चुमावन की रस्म

भाग ११४ पृष्ठ ११७७ हल्दी- बुच्ची और गप्पू

भाग -११५ पृष्ठ ११८८ बुच्ची, नेछु की रस्म और, किस्से बुच्ची की माई के

भाग ११६ पृष्ठ १२०३ बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ
 
पहला पन्ना- मज़ा पहली होली का ससुराल में,

( जिसका यह सीक्वेल है )

मजा पहली होली का, ससुराल में

( इस कहानी के सभी पात्र वयस्क हैं और सभी चित्र इंटरनेट से लिए गए हैं यदि किसी को कोई आपत्ति हो तो टिप्पणी कर सकता है। अंडर एज सेक्स न सिर्फ इस फोरम के नियमों के खिलाफ है बल्कि वैधानिक रूप से भी निषिद्ध है , और मैं वयक्तिगत रूप से भी इसे नहीं पसंद करती।)


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मुझे त्योहारों में बहुत मज़ा आता है, खास तौर से होली में.

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पर कुछ चीजें त्योहारों में गड़बड़ है. जैसे, मेरे मायके में मेरी मम्मी और उनसे भी बढ़ के छोटी बहनें कह रही थीं

कि मैं अपनी पहली होली मायके में मनाऊँ. वैसे मेरी बहनों की असली दिलचस्पी तो अपने जीजा जी के साथ होली खेलने में थी.

परन्तु मेरे ससुराल के लोग कह रहे थे कि बहु की पहली होली ससुराल में हीं होनी चाहिये.

मैं बड़ी दुविधा में थी. पर त्योहारों में गड़बड़ से कई बार परेशानियां सुलझ भी जाती हैं. इस बार होली २ दिन पड़ी.

मेरी ससुराल में 17 मार्च को और मायके में 18 को.

मायके में जबर्दस्त होली होती है और वो भी दो दिन. तय हुआ कि मेरे घर से कोई आ के मुझे होली वाले दिन ले जाए और ‘ये’ होली वाले दिन सुबह पहुँच जायेंगे. मेरे मायके में तो मेरी दो छोटी बहनों नीता और रीतू के सिवाय कोई था नहीं.

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......

मैं फ्लैश बैक में चली गई.

सुहागरात के चार-पांच दिन के अंदर हीं, मेरे पिछवाड़े की... शुरुआत तो उन्होंने दो दिन के अंदर हीं कर दी थी.

सुहागरात के चार-पांच दिन के अंदर हीं, मेरे पिछवाड़े की... शुरुआत तो उन्होंने दो दिन के अंदर हीं कर दी थी.

मुझे अब तक याद है, उस दिन मैंने सलवार-सूट पहन रखा था, जो थोड़ा टाईट था और मेरे मम्मे और नितम्ब खूब उभर के दिख रहे थे. रानू ने मेरे चूतड़ों पे चिकोटी काट के चिढ़ाया,

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“भाभी लगता है आपके पिछवाड़े में काफी खुजली मच रही है. आज आपकी गांड़ बचने वाली नहीं है, अगर आपको इस ड्रेस में भैया ने देख लिया...”

“अरे तो डरती हूँ क्या तुम्हारे भैया से? जब से आई हूँ लगातार तो चालू रहते है, बाकी और कुछ तो अब बचा नहीं......

ये भी कब तक बचेगी?”


चूतड़ मटका के मैंने जवाब दिया.

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और तब तक ‘वो’ भी आ गए. उन्होंने एक हाथ से खूब कस के मेरे चूतड़ को दबोच लिया

और उनकी एक उंगली मेरे कसी सलवार में, गांड़ के क्रैक में घुस गई.

उनसे बचने के लिये मैं रजाई में घुस गई अपनी सास के बगल में.....

‘उनकी’ बगल में मेरी जेठानी और छोटी ननद बैठी थी. वह भी रजाई में मेरी बगल में घुस के बैठ गए

और अपना एक हाथ मेरे कंधे पे रख दिया.

छेड़-छाड़ सिर्फ कोई ‘उनकी’ जागीर तो थी नहीं. सासू के बगल में मैं थोड़ा सेफ भी महसूस कर रही थी

और रजाई के अंदर हाथ भी थोड़ा बोल्ड हो जाता है.

मैंने पजामे के ऊपर हाथ रखा तो उनका खूंटा पूरी तरह खड़ा था. मैंने शरारत से उसे हल्के से दबा दिया और उनकी ओर मुस्कुरा के देखा.

बेचारे.... चाह के भी..... अब मैंने और बोल्ड हो के हाथ उनके पजामे में डाल के सुपाड़े को खोल दिया. पूरी तरह फूला और गरम था. उसे सहलाते-सहलाते मैंने अपने लंबे नाख़ून से उनके पी-होलको छेड़ दिया.

जोश में आ के उन्होंने मेरे मम्मे कस के दबा दिए.

उनके चेहरे से उत्तेजना साफ़ दिख रही थी. वह उठ के बगल के कमरे में चले गए जो मेरी छोटी ननद का रीडिंग रूम था. बड़ी मुश्किल से मेरी ननद और जेठानी ने अपनी मुस्कान दबायी.

“जाइये-जाइये भाभी, अभी आपका बुलावा आ रहा होगा.”

शैतानी से मेरी छोटी ननद बोली.

हम दोनों का दिन-दहाड़े का ये काम तो सुहागरात के अगले दिन से हीं चालू हो गया था.

पहली बार तो मेरी जेठानी जबरदस्ती मुझे कमरे में दिन में कर आई और उसके बाद से तो मेरी ननदें और यहाँ तक की सासू जी भी.......बड़ा खुला मामला था मेरी ससुराल में......

एक बार तो मुझसे ज़रा सी देर हो गई तो मेरी सासू बोली,

“बहु, जाओ ना... बेचारा इंतज़ार कर रहा होगा...”

“ज़रा पानी ले आना...” तुरन्त हीं ‘उनकी’ आवाज सुनाई दी.

“जाओ, प्यासे की प्यास बुझाओ...”

मेरी जेठानी ने छेड़ा.

कमरे में पँहुचते हीं मैंने दरवाजा बंद कर दिया.

उनको छेड़ते हुए, दरवाजा बंद करते समय, मैंने उनको दिखा के सलवार से छलकते अपने भारी चूतड़ मटका दिए.

फिर क्या था.? पीछे आके उन्होंने मुझे कस के पकड़ लिया और दोनों हाथों से कस-कस के मेरे मम्मे दबाने लगे.

और ‘उनका’ पूरी तरह उत्तेजित हथियार भी मेरी गांड़ के दरार पे कस के रगड़ रहा था. लग रहा था, सलवार फाड़ के घुस जायेगा.

मैंने चारों ओर नज़र दौडाई. कमरे में कुर्सी-मेज़ के अलावा कुछ भी नहीं था. कोई गद्दा भी नहीं कि जमीन पे लेट के.

मैं अपने घुटनों के बल पे बैठ गई और उनके पजामे का नाड़ा खोल दिया. फनफ़ना कर उनका लंड बाहर आ गया.

सुपाड़ा अभी भी खुला था, पहाड़ी आलू की तरह बड़ा और लाल.

मैंने पहले तो उसे चूमा और फिर बिना हाथ लगाये अपने गुलाबी होठों के बीच ले चूसना शुरू कर दिया.

धीरे-धीरे मैं लॉलीपॉप की तरह उसे चूस रही थी और कुछ हीं देर में मेरी जीभ उनके पी-होल को छेड़ रही थी.

उन्होंने कस के मेरे सिर को पकड़ लिया. अब मेरा एक मेहन्दी लगा हाथ उनके लंड के बेस को पकड़ के हल्के से दबा रहा था और दूसरा उनके अंडकोष (Balls) को पकड़ के सहला और दबा रहा था. जोश में आके मेरा सिर पकड़ के वह अपना मोटा लंड अंदर-बाहर कर रहे थे.

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उनका आधे से ज्यादा लंड अब मेरे मुँह में था. सुपाड़ा हलक पे धक्के मार रहा था. जब मेरी जीभ उनके मोटे कड़े लंड को सहलाती और मेरे गुलाबी होठों को रगड़ते, घिसते वो अंदर जाता.... खूब मज़ा आ रहा था मुझे. मैं खूब कस-कस के चूस रही थी, चाट रही थी.

उस कमरे में मुझे चुदाई का कोई रास्ता तो दिख नहीं रहा था. इसलिए मैंने सोचा कि मुख-मैथुन कर के हीं काम चला लूं.

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पर उनका इरादा कुछ और हीं था.

“कुर्सी पकड़ के झुक जाओ...” वो बोले..

मैं झुक गई.

............................

तो कुछ ऐसे हुयी थी,इस कहानी की शुरुआत जिसका सीक्वेल मैं पेश कर रही हूँ, पर उसके पहले पूर्वाभास, उस कहानी के कुछ वो प्रसंग जहाँ छुटकी का जिक्र आया है, सभी नहीं बस कुछ, और अगर डिसजवाईंटेड लगे तो मैं मूल कहानी के पेज नंबर का सन्दर्भ भी साथ साथ देने की कोशिश करुँगी, जिससे सुधी पाठक पाठिकाओं को लिंक बैठाने में कोई मुश्किल ने हो.
 
पूर्वाभास 1

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छुटकी

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“अरे तो इसमें क्या? कल होली भी है और रिश्ता भी.”

बोतल अब उनके पास थी. मुझे भी कोई ऐतराज नहीं था. मेरा कोई सगा देवर था नही, फिर नंदोई जी भी बहुत रसीले थे.

“तेरे तो मज़े हैं यार....कल यहाँ होली और परसों ससुराल में...कैसी हैं तेरी सालियाँ?”

नंदोई जी अब पूरे रंग में थे.

‘इन्होंने’ बोला

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“बड़ी वाली बोर्ड का इम्तहान दे रही है है और दूसरी थोड़ी छोटी है...(मेरी छोटी ननद का नाम ले के बोले) ...उसके बराबर होगी.”

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“अरे तब तो चोदने लायक वो भी हो गई है.” हँस के नंदोई जी बोले.

अबतक ‘इन्होंने’ और नंदोई ने मिल के उसे ८-१० घूंट पिला हीं दिया था. वो भी अब शर्म-लिहाज खो चुका था.

“अरे हाँ...साले साहब से हीं पूछिये ना उनकी बहनों का हाल. इनसे अच्छा कौन बताएगा?” ‘ये’ बोले.

“बोल साल्ले... बड़ी वाली की चूचियाँ कितनी बड़ी हैं?”

वो...वो उमर में मुझसे एक साल बड़ी है और उसकी...उसकी अच्छी है....थोड़ी..दीदी के इतनी तो नहीं... दीदी से थोड़ी छोटी....”

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हाथ के इशारे से उसने बताया.

मैं शर्मा गई...लेकिन अच्छा भी लगा सुन के कि मेरा ममेरा भाई मेरे उभारों पे नज़र रखता है.

“अरे तब तो बड़ा मज़ा आयेगा तुझे उसके जोबन दबा-दबा के रंग लगाने में...”

नंदोई ‘इनसे’ बोले और फिर मेरे भाई से पूछा,

“और छुटकी की?”

“वो उसकी...उसकी अभी...”

नंदोई बेताब हो रहे थे. वो बोले,

“अरे साफ-साफ बता, उसकी चूचियाँ अभी आयी हैं कि नहीं?”

“आयीं तो है बस अभी..... लेकिन उभर रही हैं... छोटी है बहुत....”

वो बेचारा बोला.

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“अरे उसी में तो असली मज़ा है...चूचियाँ उठान में...मींजने में, पकड़ के पेलने में... चूतड़ कैसे हैं?”

“चूतड़ तो दोनों सालियों के बड़े सेक्सी हैं... बड़ी के उभरे-उभरे और छुटकी के कमसिन लौण्डों जैसे... मैंने पहले तय कर लिया है कि होली में अगर दोनों साल्लियों की कच-कचा के गांड़ ना मारी.”

“हे तुम जब होली से लौट के आओगे तो अपनी एक साली को साथ ले आना...उसी छुटकी को...फिर यहाँ तो रंग पंचमी को और जबरदस्त होली होती है. उसमें जम के होली खेलेंगे साल्ली के साथ.”

आधी से ज्यादा बोतल खाली हो गई थी और दोनों नशे के सुरूर में थे. थोड़ा बहुत मेरे भाई को भी चढ़ चुकी थी.

“एकदम जीजा... ये अच्छा आइडिया दिया आपने. बड़ी वाली का तो बोर्ड का इम्तिहान है, लेकिन छुटकी,... पंद्रह दिन के लिये ले आयेंगे उसको.”

“अभी वो छोटी है.”

वो फिर जैसे किसी रिकार्ड की सुई अटक गई हो बोला.

“अरे क्या छोटी-छोटी लगा रखी है? उस कच्ची कली की कसी फुद्दी को पूरा भोंसड़ा बना के पंद्रह दिन बाद भेजेंगे यहाँ से, चाहे तो तुम फ्रॉक उठा के खुद देख लेना.”

बोतल मेज पे रखते ‘ये’ बोले.

“और क्या... जो अभी शर्मा रही होगी ना...जब जायेगी तो मुँह से फूल की जगह गालियाँ झड़ेंगी, रंडी को भी मात कर देगी वो साल्ली....”

नंदोई बोले.

मैं समझ गई कि अब ज्यादा चढ़ गई है दोनों को, फिर उन लोगों की बातें सुन के मेरा भी मन करने लगा था. मैं अंदर गई और बोली, “चलिए खाने के लिये देर हो रही है!”

वो तीनों खाना खा रहे थे लेकिन खाने के साथ-साथ... ननदों ने जम के मेरे भाई को गालियां सुनाई, खास कर छोटी ननद ने.

मैंने भी नंदोई को नहीं बख्शा और खाना परसने के साथ में जान-बूझ के उनके सामने आँचल ढुलका देती...कभी कस के झुक के दोनों जोबन लो कट चोली से... नंदोई की हालत खराब थी.

जब मैं हाथ धुलाने के लिये उन्हें ले गई तब मेरे चूतड़ कुछ ज्यादा हीं मटक रहे थे, मैं आगे-आगे और वो मेरे पीछे-पीछे... मुझे पता थी उनकी हालत. और जब वो झुके तो मैंने उनकी मांग में चुटकी से गुलाल सिंदूर की तरह डाल दिया और बोली,

“सदा सुहागन रहो, बुरा ना मानो होली है.”

( पेज २ पोस्ट २०)
 
पूर्वाभास -२

( 'ये' अपनी ससुराल में ) पेज ११ -पोस्ट १०२

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छुटकी

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छुटकी , मेरी सबसे छोटी बहन। सबसे छोटी हम तीन बहनो में , लेकिन सबसे नटखट।

एक छोटी सी पुरानी फ्राक में ( होली के दिन वैसे ही पुराने कपडे पहने जाते हैं , लेकिन उसका असर कई बार खतरनाक हो जाता है ), जो कई जगहो पे घिस भी गयी थी और टाइट भी।

उसको देख के तो उसके जीजा को जैसे मूठ मार गयी। एक दम ठिठक गए।

और बात भी तो थी।

लड़कियों पे जब जवानी आती है न तो झट से आ जाती है , बस वही छुटकी के साथ हो रहा था। चेहरा , आँखे उनमें तो भोलापन और शरारत थी लेकि देह जवानी ने दस्तक कब की दे दी है , उसकी चुगली कर रहीथी।

और उसके जीजा कि निगाहें बस वहीँ चिपकी थी।

उसके कच्चे टिकोरे , अब बड़े हो गए थे , कच्ची हरी अमिया की तरह और टाइट फ्राक से उछल , छलक रहे थे। कमर तो उसकी पतली थी ही , लेकिन अब हिप्स भरे भरे , पर तब भी छोटे , ब्वायिश।

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लेकिन वो तो थे ही इस तरह के चूतड़ के शौक़ीन।

मुझे उनकी और उनके नंदोई से हुयी बात याद आगयी , जब उन्होंने बोला था कि वो छुटकी को ले आयेंगे और फिर दोनों मिल के लेंगे।

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और अब उसके बड़े बड़े टिकोरों को देख के उनके इरादे पक्के हो गए थे।

"कच्चे टिकोरों को दबाने , नोचने , मसलने का मजा ही अलग है। एकदम खटमिठवा स्वाद ,…

और दूसरे , जो लौंडिया , इस उम्र में , चूंचिया उठान में दबवाने मिंजवाने लगती है , उसे के एक तो जोबन बहुत जल्दी खूब गद्दर हो जाते हैं और दूसरे , वो कभी को मसलने मिसवाने से मना नहीं करती , चाहे गाँव का मेला हो या शहर की बस हो।

और फिर सारे लौंडो के बीच सबसे पापुलर हो जाती है। और अगर इसी उमर में उसे दो तीन बार रगड़ के चोद दो न , भले बहुत परपराएगी उसकी , बिलबिलाएगी , चीखेगी , लेकिन एक बार जो लंड की आदत लग गयी न , तो फिर पूरी जिंदगी बुर में चींटे काटेंगे , वो भी लाल वाले।

कभी , किसी को मना नहीं करेगी। खुद टांग खोल देगी। "

ये बात इन्होने ही मुझे एक दिन समझायी थी।

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उनकी निगाह अभी भी छुटकी के खटमिठवा टिकोरों पे ही अटकी थीं , की छुटकी ही आगे बढ़ी और उनके आँख के आगे चुटकी बजाते बोली ,

" क्या हो गया , जीजा जी , मैं वहीँ हूँ , आपकी सबसे छोटी साली , छुटकी। पहचान नहीं रहे हैं "

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और छुटकी ने उन्हें खुद अंकवार में भीच लिया।

उन्होंने भी उसे खूब कस के अपनी बाहों में भीचते हुए , पहले तो गाल सहलाये , और फिर हथेली वहीँ पहुँच गयी , जहाँ थोड़ी देर पहले नदीदी निगाहें चिपकी थी। और बोले ,

" अरे तू बड़ी हो गयी है , बल्कि बड़ा हो गया है "

और हलके से फ्राक फाड़ते टिकोरों को दबा दिया।

मैं एक पल के लिए डर गयी। कहीं वो बिचक ना जाए , या कुछ उल्टा सीधा बोल न दे , होली की शुरुआत ही गड़बड़ हो जायेगी।

लेकिन छुटकी बिना उनका हाथ हटाये , बस बोली ,

" धत्त , जीजू "

उसके गोरे गुलाबी गाल शर्म से लाल हो रहे थे।

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उठते उभारों को उन्होंने जोर से दबाया और उसके कान में होंठ लगा के पुछा ,

" हे सच बता , इन टिकोरों का स्वाद तो किसी ने चखा तो नहीं। "

" धत्त जीजू , उम्हह , हटिये ,… नहीं , आप भी न , छुआ भी नहीं "

और छुटकी ने खुद उनके हाथो के ऊपर अपने हाथ रख दिए।

" मैं चख लूँ , मुझे तो मना नहीं करेगी "

और उनके होंठ फ्राक के ऊपर से ही सीधे टिकोरों के नोक पे , और हलके से कचाक से उन्होंने काट लिया।

जीजा साली की होली शुरू हो गयी थी।

बिना छुड़ाने की कोशिश किये , छुटकी ने हलकी से सी सिसकारी भरी और बोली ,

" आप तो मेरे जीजा हैं , इकलौते जीजा। आप का इत्ता इंतज़ार कर रही थी मैं। "

तब तक अंदर से माँ की आवाज आयी ,

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" अरे जीजा को अंदर भी घुसने देगी या बाहर ही खड़ा रखेगी। "

" अरे किसकी हिम्मत है जो मुझे अंदर घुसने से रोके, वो भी ससुराल में " .

द्विअर्थी डायलाग बोलने में तो ये सबसे आगे थे।

छुटकी ने अटैची पकड़ी , और हम तीनो अंदर आँगन में।

और ये फिर कैच कर लिए गए स्लिप में।

उनकी मझली साली के द्वारा।

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पूर्वाभास - ३

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(पेज ११ पोस्ट १०४)

छुटकी- (साली संग होली )

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औरतों का प्राइवेट रूम बेड रूम के अलावा कोई होता है तो वो उनका किचेन , जहाँ वो मन की बातें कर सकती हैं। के

मम्मी ने एक एक बात कुरेद के पूछी।

फिर मैंने मम्मी से अपने मन की बात पूछी ,

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"मम्मी मैं सोच रही हूँ छुटकी को ,… "

" क्या हुआ छुटकी को। ।"

मम्मी ने इनके लिए नाश्ता निकालते पुछा।

" मैं सोच रही थी , .... मेरे समझ में नहीं आ रहा था की कैसे कहूं कि मम्मी हाँ कर दें और इनके मन कि मुराद और नंदोई जी से किया इनका वायदा पूरा हो जाया।

फिर मम्मी बोली ,

" कहानी मत बना बोल न "

" मैं सोच रही थी कि जब हम लौटेंगे तो छुटकी को भी अपने साथ ले चलूँ , आखिर अभी तो उस कि छुट्टियां ही हैं और वहाँ मेरा भी मन लगा रहेगा। "

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मैंने रुकते रुकते बोला /

" अरे यही तो मैं भी सोच रही थी लेकिन सोच नहीं पा रही थी कैसे कहूं तेरी नयी नयी ससुराल , और फिर दामाद जी जाने क्या सोचें। बात ये है की , मंझली के बोर्ड के इम्तहान है और छुटकी है चुलबुली। उसको तंग करती रहेगी। और अगर मंझली या मैंने कुछ बोल दिया तो मुंह फुला के बैठ जायेगी। और मैं भी अपने काम में बीजी रहती हूँ , इसलिए "

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" अरे मम्मी , आप भी न , मैं बोल दूंगी न इनसे। मेरी आज तक कोई बात टाली है इन्होने , और फिर उनकी सबसे छोटी साली है , १५-२० दिन के बाद मंझली के इम्तहान ख़तम हो जायेंगे तो वापस भेज दूंगी। "

अपनी खुशी छिपाते मैं बोली।

" अरे तेरी छोटी बहन है जब चाहे तब भेजना। इसका स्कूल तो एक महीने के बाद ही खुलेगा। "

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मम्मी बोली।

तब तक बाहर से जीजा सालियों की छेड़खानी , होली की शुरुआत की आवाज आ रही थी। और मेरे लिए बुलावा भी।

वो दोनों चाह रही थी की मैं भी होली के खेल में उनके साथ शामिल हो जाऊं। मैंने साफ बरज दिया।

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पूर्वाभास - ४

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पेज १२ पोस्ट ११७, ११८

छुटकी के टिकोरे

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बस आँगन में छुटकी बची , और उसके जीजू।

छुटकी छोटी थी लेकिन अब बच्ची नहीं थी , और वो देख रही थी की जीजू के हाथ मझली के साथ कहाँ सैर सपाटा कर रहे थे।

और अगले ही पल उसके किशोर गाल जीजू के हाथ में थे।

छुटकी कुछ रंग से लाल हो रही थी , कुछ लाज से।

लेकिन लालची हाथ जो एक साली का जोबन रस ले चुके , दूसरी को क्यों छोड़ते।

और उन्होंने छोड़ा भी नहीं।

लेकिन गलती छुटकी की थी , बल्कि उसकी पुरानी घिसी हुयी टाइट फ्राक की , जैसे उनका हाथ घुसा ,…

चररररर चरररररर,.... फ्राक का ऊपरी हिस्सा फट गया।

और छुटकी के टिकोरे , … एक टिकोरा आलमोस्ट बाहर
,

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चररररर चरररररर,.... फ्राक का ऊपरी हिस्सा फट गया।

और छुटकी के टिकोरे , … एक टिकोरा आलमोस्ट बाहर ,

इसी के लिए तो वो तड़प रहे थे ,और सिर्फ वही क्यों , मेरे नंदोई भी.

भोर की लालिमा की तरह , ललछौहाँ , बस एक गुलाबी सी आभा।

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लेकिन उभार आ चुके थे , अच्छे खासे , वही चूंचिया उठान के दिलकश उभार जिसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते है।

और उठती चूंचियो की घुन्डियाँ भी,

एक पल तो उन्हें लगा की कही छुटकी नाराज न हो जाय , लेकिन फिर सामने एक किशोरी की जवानी के दस्तक दे रहे जोबन दिख जायं तो फिर तो सब डर निकल जाता है।

और वहीँ आंगन में , उन्होंने उन मस्त टिकोरों का रस लेना शुरु कर दिया।

पहले झिझक के हलके हलके सहलाया , दबाया फिर जोर जोर से मसलने रगड़ने लगे।

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छुटकी कुछ सिसकी , कुछ चीखी , कुछ हाथ पैर चलाये ,

लेकिन उनके पकड़ के आगे मैं नहीं बची , मझली नहीं बची , तो उस कि क्या बिसात थी।

उनकी शैतान उँगलियों ने अब उसके छोटे छोटे निपल्स से खेलना शुरू कर दिया और दूसरा हाथ फ्राक उठा के सीधे , उस कच्ची कली के भरते हुए नितम्बो पे मसलने , मजे लेने लगा.

और आगे से जैसे ही हाथ दोनों जांघो के बीच में पहुंचा , छुटकी कि सिसकियाँ तेज हो गयीं।

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और मंझली भी दोनों हाथों में पेंट पोते, अपनी स्कर्ट में रंगो के पाउच लटकाये , फिर से रंग स्थल पे पहुँच गयी थी।

लेकिन जीजू तो छुटकी के साथ ,

उसने मुड़ के मेरी ओर देखा ,

मैं चौखट पे बैठ के अपने 'उन की ' सालियों के साथ होली का नजारा ले रही थी।

मैंने मंझली को उसके जीजू के कमर के नीचे की ओर इशारा किया , उसने हामी में सर हिलाया , मुस्करायी और चालु हो गयी।

" इनके 'दोनों हाथ तो फंसे थे ही , एक छुटकी के टिकोरों पे और दूसरा उसकी रेशमी जाँघों के बीच।

बस मंझली को मौका मिल गया। उसके दोनों हाथ जीजू के पिछवाड़े , पैंट में घुस गए। आखिर थी तो मेरी ही बहन।

उसे कौन सिखाने की जरूरत थी।

थोड़ी देर तक तो उसने नितम्बो पे हाथ रगड़ा ,लगाया और फिर एक ऊँगली , पिछवाड़े के सेंटर में।

अब दोनों सालियाँ आगे पीछे और वो सैंडविच बने ,

छुटकी को भी मौका मिला गया और उसने अपने छोटे छोटे हाथो से उनके हाथों को अपने उरोजों और जांघो के बीच दबोच लिया।

बस। अब वो मंझली के हाथ हटा भी नहीं सकते थे।

मंझली के दोनों हाथ उनके पैंट के अंदर थे। आ

खिर थोड़ी ही देर पहले तो उसकी जीजू पैंटी के अंदर हाथ डाल के उसकी चुनमुनिया रगड़ रहे थे , कच्ची चूत में ऊँगली कर रहे थे , वो भला क्यों मौका छोड़ देती।

बस उसका एक हाथ जीजा के गोल मटोल नितम्बो की हाल ले रहा था तो दूसरे ने आगे खूंटे को रंगना रगड़ना शुरू किया।

खूंटा तो पहले ही तना था , छुटकी के छोटे छोटे चूतड़ो पे रगड़ते हुए ,और अब जब साली का हाथ पड़ा तो एकदम फुंफकारने लगा।

पूरे बित्ते भर का हो गया। मंझली ने एक और शरारत की , आखिर शरारत पे सिर्फ उसके जीजू कि ही मोनोपोली तो थी नही।

उसने एक झटके से चमड़ा पकड़ के खीच दिया और , सुपाड़ा बाहर।





पता नहीं जिपर उन्होंने खोला , छुटकी से खुलवाया या मंझली ने मस्ती की।

रंग पेंट में लीपा पुता चरम दंड बाहर था और मंझली अब खुल के उसके बेस पे पकड़ के रंग लगा रही थी , कभी मुठिया रही थी।

उन्होंने छुटकी का हाथ पकड़ के उसपे लगाया , थोड़ी देर तक वो झिझकती रही , न न करती रही , फिर उसने भी अपने जीजू के लंड को ,

आब आगे से छुटकी हलके सुपाड़े को दबा रही थी अपनी नाजुक उँगलियों से और पीछे से मंझली।

किसी भी जीजा के औजार को होली के दिन उसकी दो किशोर सालियाँ मिल के एक साथ रंग लगाएं तो कैसा लगेगा ?

उनकी तो होली हो गयी , लेकिन टिकोरे का मजा लेना उन्होंने अभी भी नहीं छोड़ा।

पर रंग में भंग पड़ा ,

या कहूं मंझली ने नाटक का दूसरा अंक शुरू कर दिया देह की होली का।
 
पूर्वाभास - ५

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पेज १४ -१६ पोस्ट १३३ और १४५

छुटकी -भाभी -जीजा संग होली

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लेकिन तभी एक गड़बड़ हो गयी। मुझे बचाने मेरी छोटी बहन छुटकी आ गयी और वो पकड़ ली गयी।

दी तीन भाभियों ने उसे ले जा के आंगन में जहाँ खूब रंग बह रहा था वहाँ लिटा दिया और सबसे पह्ले मिश्राइन भाभी ने नंबर लगाया।

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जीजा तो तब भी कुँवारी सालियों से कुछ झिझकते हैं , सोचते हैं ,

लेकिन भाभियाँ तो कुँवारी रसभीनी ननदों को देख के और बौरा जाती हैं , और इस बार भी वही हुआ।

तीन तीन भाभियाँ एक साथ छुटकी पे ,

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कुछ ही देर में उसके दोनों टिकोरे , और गुलाबी परी फ्राक से बाहर थे और भाभियों के हाथ में ,

लेकिन मिश्राइन भाभी , जो भाभियों में सबसे प्रौढ़ा थीं , उन्होंने असली मोर्चा खोला ,

" अरे होलियों के दिन ननद को बुर का स्वाद न चखाया तो क्या मजा। "

उन्होंने साडी साया , अपना उठाया , कमर में लपेटा और सीधे छुटकी के ऊपर ,

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मुझे अपनी ससुराल की होली याद आगयी ,

मेरी जेठानी ने एक कच्ची कली का , जो छुटकी से भी छोटी लग रही थी , न सिर्फ चूत चटवाई थी बल्कि 'सुनहला शरबत 'भी पिलाया था , और खुद अपनी सगी छोटी ननद को जो इस छुटकी की ही समौरिया ही होगी , को चूत चटाई थी और , ' सुनहला शरबत ' भी पिलाया था।

छुटकी थोडा इधर उधर कर रही थी ,

लेकन एक भाभी ने दोनों हाथो से उसका सर जोर से पकड़ लिया और अब वो मिश्राइन भाभी कि जाँघों के बीच फँसी , दबी , किकिया रही थी।

लेकिन वो अभी भी मुंह खोलने में नखड़े कर रही थी। बस , मिश्राइन भाभी ने जोर से उसके नथुने दबा दिए ,

" बोल छिनार खोलेगी मुंह की नहीं , खोल साली , "

और थोड़ी देर में जैसे ही उसने मुंह खोला अपनि रसीली खेली खायी बुर उन्होंने छुटकी के खुले मुंह पे चिपका दी और लगी रगड़ने।

किसी और भाभी ने कुछ बोला कि अकेले अकेले नयी बछेड़ी पे सवारी कर रही हो तो वो हंस के बोली ,

" अरे तब तक तुम इसकी रस् मलायी का रस निकालो , मेरे बाद तुम भी चटवा लेना। "

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वो भाभी बस अपनी गदोरियों से छुटकी की चूत जोर जोर से रगड़ने लगी। और छुटकी की चूत भी थोड़ी देर में पानी फेंकने लगी।

कुछ देर छुटकी के मुंह पे अपनी बुर रगड़ के , मिश्राइन भाभी शांत हो के बैठ गयी और छुटकी से बोलीं

" सन मैं ननदो को बस पांच मिनट का टाइम देती हूँ पानी निकालने के लिए , तू नयी है चल छह मिनट ले ले। लेकिन एक मिनट भी ज्यादा लगा न , तो कुहनी तक हाथ गांड में पेल दूंगी , चाहे फटे चाहे जो हो। और अब मैं कुछ नहीं करुँगी , तू चाट चूस , चाहे जो कर।

थोड़ी ही देर में छुटकी , लप लप भाभी की बुर चाट रही थी , जीभ पूरी ऊपर से नीचे तक सपड़ सपड़, और दोनों होंठो को बुर में लगा के पूरी ताकत से चूसने लगी।

मैं तारीफ से उसे देख रही थी , और छः नहीं बल्कि पांच मिनट में ही मिश्राइन भाभी को झाड़ दिया।

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लेकिन उससे भी उसे छुट्टी नहीं मिली।

अब मिश्राइन भाभी उचक के थोड़ी और सरक गयी थीं और उससे अपनी गांड चटवा रही थीं।

मेरी हालत भी ख़राब थी , मेरी छिनार भौजाइयां , मुझे झाड़ने के कगार पे ले जा के छोड़ दे रही थीं , रीतू भाभी तो क्या कोई मर्द गांड मारेगा , जिस तरहसे उनकी उंगलिया अंदर बाहर हो रही थीं।

मिश्राइन भाभी ने छुटकी को गांड चटाते , वहीँ से आवाज लगायी ,

" अरे रीतू , ननद को मन्जन कराया की नहीं "

बस इशारा बहुत था , रीतू भाभी की उंगलिया अब मेरी गांड में , करोचते हुए चम्मच की तरह ,

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गांड की सारी भीतरी दिवालो पे और जब उन्होंने ऊँगली निकाली , बाकी दोनों भाभियों ने जोर से मेरे गाल दबाये और मेरा मुंह खुल गया।

रीतू भाभी की उंगली सीधे मुंह के अंदर , दांतो पे, ऊपर नीचे।

और चार पांच मिनट 'मन्जन ' कराने के बाद जो बचा खुचा था , सीधे मेरे गालों पे और बोलीं

" रूप निखर आया है मेरी ननद का , हल्दी और चन्दन से "

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तीन चार भाभियाँ मेरे साथ थी , तीन छुटकी के साथ ,

और बाकी की मम्मी के पास ,… आखिर सास बहु की होली भी तो ,… (और मैं अपने ससुराल में देख ही चुकी थी , मेरी मम्मी कौन सी कम थी। )

देर तक ये होली चलती रही , बस मुझे ये लगा रहा था की इन का ध्यान मेरी और छुटकी के चक्कर में ,

अभी ' इनकी ' ओर नहीं गया।

लेकिन रानू को याद आ गया और वो बोल पड़ी ,

" हे नंदोई को कही अपने बुर में छिपा रखा है क्या "

तो दूसरी जो छुटकी के पास थी बोली ,

"अरे पहले उनकी साली कि बुर चेक करो ,"

लेकिन तब तक वो सीढ़ियों से आ गए और , मुझे और छुटकी को छोड़ सारी भाभियाँ बस उनके पीछे ,...

और उनकी जम के रगड़ाई शुरू हो गयी।

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क्या रगड़ाई हुयी 'उनकी '.

मेरी जो मेरी ससुराल में 'दुरगत ' हुयी थी , वो कुछ नहीं थी इसके आगे।

कपड़ों के जो चिथड़े हुए वो तो कुछ नहीं , हाँ पैंट उतारने का काम रीतू भाभी ने किया , आखिर सबसे छोटी सलहज जो थीं।

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लेकिन मिश्राइन भाभी से ले के रीतू भाभी तक ने ,

मेरी ससुराल और उनकी मायकेवालियों को 'उन्ही ' से एक से एक गालियां दिलवायीं।

कोई 'अंग ' नहीं बचा होगा , देह का एक एक इंच नहीं जहाँ कालिख और पेंट के दो चार कोट न चढ़े हों ,

रंगो की तो गिनती नहीं।

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वो सिर्फ एक छोटी से चड्ढी में थे और , भाभियों की शैतानियों से खूंटा एकदम तना हुआ।

अब ये हुआ की चड्ढी कौन उतारेगा , वस्त्र हरण का आखिरी भाग।

और मिश्राइन भाभी ने फैसला सूना दिया ,

" ये काम सिर्फ छोटी साली का है '

छुटकी कुछ शर्मायी , कुछ घबड़ायी। लेकिन रीतू भाभी ने पकड़ कर आगे कर दिया ,

और वो भी ,आखिर बहन तो मेरी ही थी।

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इस शैतान ने पहले तो रंग बिरंगी चड्ढी के ऊपर अपने कोमल किशोर हाथ रगड़ रगड़ के ,

अपने जीजू के खूंटे की हालत और खऱाब कर दी ,

फिर एक झटके में चड्ढी नीचे और लम्बा मोटा उनका बित्ते भर का खूंटा बाहर ,जैसे बटन दबाने से स्प्रिंग वाला चाक़ू निकल जाए।

सारी भाभियों के मुंह से सिसकारी निकल गयी।

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रानू भाभी ने मेरे कान में कहा ,

" बिन्नो तेरी किस्मत तो बड़ी जबरदस्त है। "

मेरी मुस्कराहट ने हामी भरी।

तब तक सारी भाभियाँ अपनी सबसे छोटी ननद , छुटकी के पीछे पड़ गयीं थी।

रीतू भाभी ने उससे लंड का सुपाड़ा खुलवाया , एकदम मोटा लाल टमाटर जैसा।

" खाली मुठियाने से छोटी साली का काम पूरा नहीं होता , चल मुंह खोल के घोंट पूरा। "

मिश्राइन भाभी ने हुकुम सुनाया।

और हुकुम तो हुकुम , और अंजाम देने का काम रीतू भाभी का।

"चल मुंह खोल , बोल आआआ , जैसे खूब बड़ा सा लड्डू खाना है एक बार में "

रीतू भाभी बोलीं।

छुटकी कुछ हिचकिचा रही थी , लेकिन मिश्राइन भाभी बोलीं ,

" मुंह में नहीं लेना है , तो चूत और गांड दोनों में लेना होगा , अभी हमारे सामने "

छुटकी के गाल दो भाभियो ने दबा दिए , उसने चिड़िया की चोंच की तरह खोल दिया मुंह और रीतू भाभी ने अपने नंदोई का लंड , अपनी छोटी ननद के कुंवारे मुंह में डाल दिया और 'उनसे' बोलीं

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" अरे नंदोई जी , होली के दिन कुँवारी साली मिल रही छोड़ो मत , हचक के लो। साल भर नया नया माल मिलेगा। '

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था , सुहागरात के दिन जिस सुपाड़े को घोंटने , चूसने में मेरी हालत खराब हो गयी थी , वो छुटकी ने घोंट लिया।

रीतू भाभी लंड पकड़ के ठेल रही थीं , वो भी कस के अपनी छोटी साली का सर पकड़े थे।

छुटकी गों गों करती रही , लेकिन वो और रीतू भाभी मिल के ठेलते रहे। आधा लंड तो घुसेड़ ही दिया होगा।

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५-१० मिनट चूसने के बाद ही छुटकी को भाभियों ने छोड़ा।

और उसके बाद मंझली का नंबर , उसने चूसा, मजे ले के चाटा और करीब ३/४ घोंट गयी।

तब तक किसी भाभी को याद आया की ' उन्हें ' लेके बाहर भी जाना है।

फिर उनका श्रृंगार शुरू हुआ , साडी ,चोली , ब्रा , महावर , मेंहदी , नथ , काजल , बिंदी, लिपस्टिक ,

कानों में झुमके , चूड़ियाँ , पाजेब।

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देख के कोई कह नहीं सकता था की नयी बहु नहीं है 'वो '
 
पूर्वाभास -६

पेज २२ -पोस्ट २१५

सास -दामाद और छुटकी का प्रोग्राम

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छुटकी

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" मम्मी , छुटकी तो अभी छोटी है ,.. अभी तो वो ,... "

मैंने अपना ऑब्जेक्शन लगाया।

मेरी बात को एकदम इग्नोर करके मम्मी ने सीधे अपने दामाद से पूछा ,

" किस क्लास में थी वो जब उसकी फटी थी ,... "

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और उनके जवाब के बाद मम्मी ने मुझसे पूछा

" और ये तेरी बहन , छुटकी किस क्लास में पढ़ती है ,... "

मैं समझ गयी थी , फिर भी बोली ,

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जवाब तो मैंने दे दिया लेकिन मैं समझ गयी इसका मतलब फैसला हो चुका है अब बेचारी छुटकी की गांड की लिख दी गयी है।

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आने के पहले ही मैंने सुना था जो ये ननदोई जी मेरे ममेरे भाई से कह रहे थे ,... छुटकी के बारे में ,...

एक तो इन्होने ननदोई जी से वायदा कर लिया था की छुटकीके पिछवाड़े की सील ननदोई जी ही खोलेंगे ,...

और लम्बाई में तो नहीं लेकिन मोटाई में ननदोई जी का इनसे भी २० था ,...

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और दूसरे मेरे भाई से इन्होने साफ़ साफ़ बोल दिया था की

तेरी वो छुटकी बहन आएगी कोरी लेकिन जब जायेगी तो उसकी गांड का छेद रंडी के भोंसडे से भी ज्यादाचौड़ा हो जाएगा ,

और उसके मुंह से गालियां झड़ेंगी।


इनके मन की बात हो गयी थी और इस ख़ुशी में अपनी सास की गांड मारते मारते एक झटके में तीन उँगलियाँ उन्होंने सास की बिल में ठेल दिया ,

साथ में अंगूठा मम्मी की क्लिट पर ,...

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मम्मी झड़ने के कगार पर , लेकिन तभी इन्होने कुछ बोल दिया की मम्मी एकदम अलफ़ , इतना गुस्से में मैंने उन्हें कभी देखा नहीं था ,...

उन्होंने मम्मी से सिर्फ यह कह दिया था की हम लोग छुटकी को अपने साथ ले जायँ , अभी उसकी छुट्टी चल रही है , कुछ दिन बाद वापस आ जायेगी।

बस मम्मी एकदम आग बबूला , सब प्यार व्यार एक पल में ख़तम ,

गुस्से से उन्हें देखते बोलीं , ...

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छुटकी कौन लगती है तुम्हारी ,...

मैं भी एकदम सकते में आ गयी , ... कुछ समझ में नहीं आ रही थी बात ,... और वो भी , एक पल के लिए सहम गए

मैं इनके पीछे खड़ी अपने जोबन से इनके पीठ पर , ... लेकिन मैं भी रुक गयी

फिर धीमे से बोले ,

" मम्मी , मेरी साली ,... "

मम्मी अभी भी उसी तरह गुस्से में ,... बोलीं ,...

" तो ,... स्साली है न तुम्हारी "

" हाँ ,... " हलके से वो बोले।

" तूने मेरी इस बेटी की ली थी , इसकी गांड मारी थी तो मुझसे पूछा था क्या ,...

"
मेरी ओर इशारा कर के , उन्होंने उसी मूड में पूछा।

न उनकी समझ में आ रहा था न मेरी , लेकिन मम्मी ने अचानक खिंच के अपनी ओर कर लिया और कस के अपने दामाद के होंठ चूमती बोलीं ,

" तू रंडी का जना एकदम बेवकूफ है , ... अरे साली है तेरी , तो मुझसे क्यों पूछता है , ले जाओ न जो करना हो करो। अगर आगे से समझ ले , भँड़वे के जाने पैदायशी गंडुवे तूने कभी भी मेरी किसी बेटी के लिए मुझसे पुछा , कुछ भी ,...

और सिर्फ मुझसे नहीं , मेरी इस बेटी से भी पूछने की भी कोई जरुरत नहीं है ,

न ही उस छुटकी से ,...


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समझ गए ,... अगर गलती से भी तुमने पूछ लिया न ,...

मेरा हाथ देख रहे हो , चूड़ी और कंगन सहित तेरी गांड में , कोहनी तक पेल दूंगी ,

तेरी वो छिनार माँ खालीभरौटी , चमरौटी में चुदवाती रहती थी , कुछ सिखाया नहीं तुझे। अरे न ससुराल में कुछ पूछा जाता है , न ससुराल वालियों से ,

ले जाओ न ,... और एक तरह सेअच्छा भी है , यहाँ मंझली के हाईस्कूल के इम्तहान है उसे ही तंग करेगी , वहां रहेगी तो कुछ उसका भी मन ,...
"

मारे ख़ुशी के उन्होंने वो हचक हचक के अपनी सास की गांड मारनी शुरू की और साथ में तीन उँगलियों से सास की बुर भी वो चोद रहे थे हचाहच ,...

लेकिन झड़ने के पहले मम्मी ने एक बात और दामाद को बता दी ,

" सुन लो कच्ची कली , चीखेगी चिल्लायेगी ,... खासतौर पर पिछवाड़े डालोगे तो ,... लेकिन मेरी बात गाँठ बाँध लो , ".....

गलती से मेरे मुंह से निकल गया ,

" मुंह बंद करना चाहिए , चीख निकलने न पाए , "

एकदम नहीं ,.... मम्मी ने मेरी बात काट दी।

" चीखने चिल्लाने दो , टेसू बहाने दो , गाल पर नमकीन नमकीन आंसू बहे तो बहने दो ,... अरे बाद में यही तो याद रहताहै पहली बार कितना दर्द हुआ है कैसे कस के फटी थी , ... और यही कह के उसे चिढ़ा सकते हो ,.. और एक बात कभी एकबार में नहीं ,...कितना भी दर्द हो रहा हो ,... कम से कम एक बार और ,...

फिर हरदम के लिए दर्द , धड़क निकल जायेगी। "


मम्मी ने बात पूरी की।

सास -दामाद के विचार एकदम मिलते थे।

और फिर जो मेरे साजन ने हचक के गांड मारी , मम्मी की बुर तीन तीन ऊँगली से चोद चोद कर ,...

कुछ देर में जब मम्मी झड़ी तो साथ में वो भी ,

और सब मलाई , कटोरी भर से भी ज्यादा और सब मम्मी की गांड में ,

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और हम तीनों वैसे ही निढाल , उनका खूंटा मम्मी के पिछवाड़े ही धंसा पड़ा रहा ,...

और हम तीनों वैसे ही ,...

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सुबह के पहले एक राउंड और उनका हुआ, मम्मी के साथ।
 
पूर्वाभास ७ -

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छुटकी - रीतू भाभी और,...

पेज २४ पोस्ट २३८

मैं, रीतू भाभी और वो किचेन में चाय पी रहे थे की रीतू भाभी ने छुटकी के ‘उद्द्घाटन’ की बात छेड़ दी।

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और बातों-बातों में उन्होंने ये बात मान ली की, कल जब उन्होंने छुटकी के साथ ट्राई किया था तो एकदम सूखे, सिर्फ थूक लगा के।

फिर तो मैं चढ़ गयी उनके ऊपर अपनी छोटी बहन की ओर से-



“अरे यार , एकदम कच्ची कली। ठीक से ऊँगली भी नहीं गयी होगी मेरी बहन की चुनमुनिया में , एकदम कच्ची कोरी , कसी । अच्छी तरह से वैसलीन लगा के ट्राई करते, दर्द तो हुआ ही होगा, और ऊपर से तुम्हारा मूसल भी, धमधूसर है…”


मैंने बोला।

लेककन रीतू भाभी भी अपनी नन्दोई की ओर से ही बोलीं -

“अरे यार जब तक पहली चुदायी में चरपराय नहीं , चीख चिल्लाहट न हो , , गोरे-गोरे गाल पे टप-टप आंसू न टपकें,

तीन दिन तक लौंडिया , टाँगे फैला के न चले तो पहली चुदाई क्या…”


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बहुत बहस हुई।

किर ये तय हुआ की आज तिझरिया को, खाने के एक दो घंटे बाद, नंबर लगेगा।

मैंने लाख मना किया लेककन उनकी और रीतू भाभी की जिद की मैं भी वहां रहूं , मेरे सामने वो अपनी सबसे छोटी स्साली की सील तोड़ेंगे।

और मुझे मानना पड़ा।

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हाूँ बस रीतू भाभी इतना मान गयीीं की उनके सुपाड़े पे,

लेकिन सिर्फ सुपाड़े पे वैसलीन लगेगी और वो भी रीतू भाभी अपने हाथ से लगाएंगी , जिससे ज्यादा न लगे।


रीतू भाभी का मानना था की बस एक बार सुपाड़ा घुस जाय,

फिर तो उनकी छुटकी ननदिया , मेरी सबसे छोटी बहन ,

वो लाख चूतड़ पटके लण्ड तो पूरा घोटना ही होगा साल्ली को।

लेकिन उसके बदले रितु भाभी भी न , एकदम पक्की भौजाई , ....

उन्होंने दो शतें और रख दी,

आगे से नो वैसलीन।


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आज रात जब छुटकी हमारे साथ जायेगी ट्रेन में तो बस ज्यादा से ज्यादा थूक,

और जब छुटकी के पिछवाड़े का बाजा बजेगा, उस किशोरी का,


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तो बस.... एकदम सूखे।

वो तैयार होने चले गए. घंटे भर में उनकी सालियाँ जो आने वाली थी,

छुटकी की सहेलियां , होली खेलने।

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और रीतू भाभी अपनी छोटी ननद की सहायता करने चली गयीं पिछवाड़े बगीचे में, होली की तैयारी करने के लिए।

मम्मी तैयार होकर किचेन में आ गयी थीीं और हम दोनों ने मिल के घण्टे भर में खाने का काम निपटा लिया दस बज गए थे।

और हंसती खिलखिलाती , धड़-धड़ाती दो उठती जवानियाँ , कच्ची कलियाँ , कच्चे टिकोरों वाली किशोरियां आ गयीं अबीर और गुलाल की तरह,रंगो की छरछराती पिचकारी की तरह, छुटकी की सहेलियां ‘उनकी’ सालियाँ

रीमा और लाली।
 
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