#194.
जलशक्ति: (19.01.2002, शनिवार, राक्षसताल, हिमालय)
व्योम और त्रिकाली, कलाट से आज्ञा ले, हिमालय आ गये थे। कलाट ने पहले से ही अपने गुरु भाई नीमा को व्योम और त्रिकाली के आने की सूचना दे दी थी।
नीमा ने व्योम और त्रिकाली को कुछ लोगों के साथ, राक्षसताल के पास भेज दिया था। वह लोग व्योम और त्रिकाली को राक्षसताल के पास छोड़ कर चले गये।
उन सभी के जाने के बाद व्योम और त्रिकाली ने अपना -अपना घोड़ा, राक्षसताल के पास ही एक पेड़ से बांध दिया।
"पत्नी जी, क्या ख्याल है अब आपका? राक्षसलोक चलने की तैयारी करें?" व्योम ने त्रिकाली की आँखों में आँखें डालते हुए कहा।
“अगर आप ऐसे हमें पुकारेंगे, तो फिर कुछ देर और रुकने की इच्छा जागृत हो जायेगी?” त्रिकाली ने व्योम के सुर से सुर मिलाते हुए कहा।
“एक बार विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से तुम्हारे माता पिता को छुड़ा लें, फिर जिंदगी भर तुम्हें पुकारते रहेंगे ऐसे ही।" व्योम ने त्रिकाली को यहां आने का कारण याद दिलाते हुए कहा।
“वैसे तुम्हें क्या लगता है व्योम? क्या हम अपने माता-पिता को छुड़ा पायेंगे?” त्रिकाली ने शक जाहिर करते हुए कहा- “क्यों कि विद्युम्ना के पास छल शक्ति है और छल शक्ति को जाने बिना, उससे जीतना बहुत मुश्किल होगा?”
“छल शक्ति तो तुम्हारे पास भी है।” व्योम ने त्रिकाली से मजा लेते हुए कहा- “देखो ना कैसे तुमने छल शक्ति का प्रयोग करके मुझसे शादी कर ली थी? अब जब तुम्हारी छल शक्ति को जीत लिया, तो विद्युम्ना की छल शक्ति से भी जीत ही जायेंगे।
“क्या बोला तुमने?” त्रिकाली ने व्योम को आँखें दिखाते हुए कहा- “छल से विवाह किया। हां किया छल से विवाह बताओ क्या कर लोगे? और वैसे भी मुझे देखकर तुम्हारी भी लार टपक रही थी। जब तुम रक्षा कवच मेरे गले में बांध रहे थे, तो मैंने भी तुम्हारे कांपते हाथों को महसूस कर लिया था। अब ये बात अलग है कि मैंने पहले बाजी मार ली।“
त्रिकाली की बात सुन एक पल के लिये व्योम की आँखों के सामने, जंगल वाला दृश्य उभर आया। उसे महसूस हो गया कि त्रिकाली कह तो सही ही रही है।
“अच्छा पत्नी जी, मेरी गलती मैं अपने शब्द....वापस लेता हूं। अब खुश।” व्योम ने हथियार डालते हुए कहा।
"हम्मममम अब सही किया तुमने। बस ऐसे ही व्यवहार करते रहना मेरे साथ। आखिर मैं एक राजकुमारी हूं।” त्रिकाली ने मुस्कुराते हुए कहा।
“अच्छा राजकुमारी जी, अब राक्षसलोक चलें,...जरा विद्युम्ना से भी मिल लिया जाये।” व्योम ने कहा।
लेकिन इससे पहले कि दोनों राक्षसताल में उतर पाते, वातावरण में एक तेज आवाज सुनाई दी।
“विद्युम्ना से मिलने के लिये कहीं जाने की जरुरत नहीं है, वह सर्वत्र व्याप्त है" यह आवाज सुन व्योम और त्रिकाली हंसी-मजाक भूलकर एकदम सचेत नजर आने लगे।
“सर्वत्र व्याप्त है, तो दिखाई क्यों नहीं देती।" व्योम ने तेज आवाज में कहा।
“चिंता मत करो बालक, मैं तुम्हें दिखाई भी दूंगी और सुनाई भी दूंगी। पहले जरा तुम्हारे यहां आने का औचित्य तो जान लें।” विद्युम्ना ने कहा।
“तुमने मेरे माता-पिता को पिछले 14 वर्षों से कैद करके रखा है, हम उन्हें छुड़ाने के लिये यहां आये हैं। व्योम ने कहा- “अब या तो उन्हें छोड़कर युद्ध को टाल दो? या फिर युद्ध के लिये तैयार हो जाओ?
त्रिकाली, व्योम के मुंह से ‘अपने माता-पिता' शब्द सुनकर खुश हो गई।
“मेरे पास तो बहुत से लोग कैद हैं, तुम अपने माता पिता का नाम बताओ बालक।"
विद्युम्ना, व्योम को बालक कह कर संबोधित कर रही थी, पर व्योम ने इस बात का बुरा नहीं माना। उसे पता था कि विद्युम्ना की आयु हजारों वर्ष की है।
"मेरा नाम व्योम और मेरी पत्निका नाम त्रिकाली है, हमारे माता-पिता का नाम त्रिशाल और कलिका है। उन्हें 14 वर्ष पहले तुमने छल से हराया था।” व्योम ने कहा।
“त्रिशाल और कलिका हां याद आया। उनके पास तो देवशक्ति थी। पर तुम लोग तो खाली हाथ आये हो। ऐसे में मुझे कैसे हराओगे?” विद्युम्ना ने कहा।
व्योम तुरंत विद्युम्ना के जाल को समझ गया। वह जान गया कि बात करके विद्युम्ना उनकी शक्तियों का पता लगाना चाहती है, इसलिये व्योम ने भी विद्युम्ना को उसी के अंदाज में उत्तर दिया।
"माना कि हमारे पास कोई भी देवशक्ति नहीं है। लेकिन हमारे पास विश्वास की शक्ति है, जो तुम पर अवश्य ही भारी पड़ेगी।"
“हाSSS...हाऽऽ...हाऽऽऽऽऽ... विश्वास की शक्ति तुम तो बहुत मनोरंजक हो व्योम....तुम्हारे साथ खेलने में तो बहुत मजा आयेगा।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम मुझे मूर्ख समझते हो कि तुम कुछ भी कहोगे और मैं मान लूंगी मैं मान नहीं लूंगी, बल्कि तुम्हारी जान लूंगी।
व्योम समझ गया कि विद्युम्ना बहुत चालाक है इसलिये वह और भी ज्यादा सतर्क नजर आने लगा।
“देखो व्योम, मुझे भविष्य में त्रिशाल और कलिका की जरुरत है, इसी लिये मैंने उन्हें बंदी बना कर रखा है। अब अगर तुम उन्हें ले जाना चाहते हो, तो तुम्हें मुझसे युद्ध करना होगा। क्या तुम युद्ध के लिये तैयार हो?” विद्युम्ना ने कहा।
“मैंने सुना है कि राक्षस बहुत ही नियमों के अंतगर्त युद्ध करते हैं। तो क्या आप युद्ध से पहले किसी प्रकार के नियम को बताना चाहेंगी?" व्योम ने अपना पाशा फेंका।
व्योम के शब्द सुन विद्युम्ना खुश हो गई। “तुमने बिल्कुल सही सुना है। राक्षस हमेशा से नियमों को मानने वाले रहे हैं, बस देवता ही छल से उन्हें मार देते हैं। इसलिये बताओ व्योम की तुम किस प्रकार के नियम बनाना चाहते हो?” विद्युम्ना ने कहा।
“मैं चाहता हूं कि हम दोनों का युद्ध कुछ चरणों में हो....वह कितने चरण में होगा, यह आप बतायेंगी?" व्योम ने कहा।
“ठीक है व्योम, हमारा युद्ध 3 चरणों में होगा। जो भी इन 3 चरणों में हार गया? उसे अपनी पराजय स्वीकार कर, प्रतिद्वंन्दी की बात माननी होगी। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है?” विद्युम्ना ने युद्ध के नियम बनाते हुए कहा।
“हां, मुझे यह नियम मंजूर हैं, परंतु शुरु के 2 चरणों में मेरी पत्नी इस युद्ध का हिस्सा नहीं रहेगी।” व्योम ने अपना दिमाग लगाते हुए कहा। यह सुन विद्युम्ना सोच में पड़ गई।
"इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है?" व्योम, विद्युम्ना को सोचने का मौका नहीं देना चाहता था, इसलिये तुरंत ही बोल उठा- “आप के पास तो बहुत सी दिव्य शक्तियां होंगी, हो सकता है कि उन शक्तियों के माध्यम से आप मुझे पहले ही चरण में पराजित कर दें।"
“ठीक है, मुझे तुम्हारी ये शर्त स्वीकार है।” विद्युम्ना ने कहा।
उधर त्रिकाली, व्योम की बात सुनकर समझ गई कि व्योम अभी विद्युम्ना को, त्रिकाली की शक्तियां नहीं दिखाना चाहता, जिससे विद्युम्ना पहले ही कहीं उसकी काट ना कर ले? इसलिये व्योम के इस निर्णय से त्रिकाली को कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
व्योम ने सबसे पहले त्रिकाली को दूर एक चट्टान के पास भेज दिया और फिर विद्युम्ना से बोला- “ठीक है, तो तुम स्त्री हो इसलिये पहला प्रहार तुम ही करो।"
अब व्योम के सामने 500 फुट की विद्युम्ना नजर आने लगी, उसका सिर आसमान को छू रहा था।
विद्युम्ना ने अपना यह रुप व्योम को डराने के लिये रखा था, पर विद्युम्ना का इससे मिलता-जुलता रुप व्योम पहले से ही महवृक्ष में देख चुका था, इसलिये उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ?
"तो फिर लो व्योम, मेरे पहले वार ‘जलकंटिका' से बचो, यह तुम्हारे शरीर का सारा जल समाप्त कर देगा और तुम बिना पानी के यहीं तड़प कर मर जाओगे।" यह कहकर विद्युम्ना ने अपने त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया।
विद्युम्ना के ऐसा करते ही त्रिसर्पमुखी दंड से एक चमकीली रोशनी निकली और इसी के साथ व्योम को अपना पूरा शरीर सूखता हुआ सा महसूस हुआ।
विद्युम्ना की इस पहली शक्ति की काट ही व्योम के पास नहीं थी।
धीरे-धीरे व्योम के शरीर से पानी खत्म होता जा रहा था, तभी व्योम को अपने मन में एक स्त्री की आवाज सुनाई दी-“तुम मेरा आहवान करो पुत्र, मैं तुम्हें इस संकट से बचा सकती हूं।" व्योम अपने मन में आ रही इस आवाज को सुनकर आश्चर्य में पड़ गया।
“पर आप कौन हो? और मेरे मन में कैसे बोल रही हो?" व्योम ने अपने मन में सोचते हुए पूछा।
“मैं देवी गंगा हूं पुत्र, जिस दिन तुम पंचशूल को उठाकर मृत्यु को प्राप्त हो गये थे, उस दिन मेरी पहली बूंद ने ही तुम्हें नवजीवन प्रदान किया था। मेरी ही बूंद की गुरुत्व शक्ति से तुम गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होते हो। मेरी वह पहली बूंद अभी भी तुम्हारे शरीर में है, उससे तुम अपनी शरीर की ही कमी नहीं, वरन पूरी पृथ्वी की प्यास बुझा सकते हो। इसलिये देर ना करो पुत्र और मेरा आहवान करो।" पतित पावनी देवी ने कहा।
गंगा की बात सुन व्योम का भ्रम दूर हो गया, वह अभी तक अपनी गुरुत्वशक्ति को, पंचशूल की ही शक्ति समझ रहा था।
अब व्योम ने मन ही मन देवी गंगा का स्मरण किया “हे माँ गंगा, मेरे शरीर की जल की पूर्ति को पूर्ण करो।"
व्योम के इतना बोलते ही, व्योम को अपने मुंह के अंदर एक मीठी सी बूंद का अहसास हुआ और उस बूंद ने पलक झपकते ही व्योम के शरीर में हुई पानी की कमी को पूर्ण कर दिया।
अब व्योम विद्युम्ना के सामने खड़ा होकर मुस्कुरा रहा था।
विद्युम्ना काफी देर तक व्योम के जमीन पर गिरने का इंतजार करती रही, पर जब 10 मिनट के बाद भी व्योम खड़ा मुस्कुराता दिखाई दिया, तो विद्युम्ना की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं।
"लगता है कि आपका, यह सर्पदंड ठीक से काम नहीं कर रहा? आप इसे बेचकर, अपने बुढ़ापे के लिये एक लाठी खरीद लो।” व्योम ने विद्युम्ना का मजाक उड़ाते हुए कहा।
“तुमने किस शक्ति का प्रयोग किया व्योम, जो जलकंटिका से बच गये?” विद्युम्ना ने अपना दिमाग लगाते हुए व्योम से पूछा, पर महावृक्ष ने पहले ही व्योम को ज्ञान दे दिया था। इसलिये व्योम ने गोल-मोल जवाब दिया।
"मेरे पास ‘जलगटका' शक्ति है, जिससे मैं अपने शरीर में जल गटक सकता हूं।” व्योम ने बिल्कुल गंभीरता से जवाब दिया।
विद्युम्ना, व्योम के जवाब को समझ नहीं पाई। वैसे यह शक्ति तो त्रिकाली के लिये भी नई थी। वह भी आश्चर्य से व्योम को देख रही थी, पर वह मन ही मन बहुत खुश थी।
“अब आप कोई दूसरी शक्ति का प्रयोग कर सकती हो?" व्योम ने विद्युम्ना से कहा।
यह सुन विद्युम्ना ने जोर से गर्जना की- “जल में वास करने वाले शेषनाग प्रकट हो।"
विद्युम्ना के इतना बोलते ही राक्षसताल के बगल में स्थित, मानसरोवर झील से महाविशाल शेषनाग निकला।
शेषनाग को देख त्रिकाली बहुत ज्यादा डर गई। पर वह ऐसी हालत में भी कुछ कर नहीं सकती थी, इसलिये चुपचाप व्योम को देखती रही।
"मुझे कैसे याद किया विद्युम्ना? बताओ मुझे क्या करना है?" शेषनाग ने अपने सातों फन को हवा में लहराते हुए कहा।
“जरा इस व्योम नाम के मनुष्य को अपनी शक्तियों से परिचित कराइये शेषनाग।” विद्युम्ना ने कहा।
विद्युम्ना की बात सुन शेषनाग ने अपनी जहर भरी फुकार व्योम के ऊपर मार दी। किसी को पता नहीं था कि व्योम अपनी साँस को 25 मिनट तक रोक सकने में सक्षम था।
व्योम ने शेषनाग की फुंकार से बचने के लिये अपनी साँस रोक ली। अब शेषनाग की फुंकार ने व्योम के शरीर को जलाना शुरु कर दिया, पर सूर्य की शक्ति ने तेजी से व्योम के शरीर को सही करना शुरु कर दिया।
जब 5 मिनट तक भी व्योम पर शेषनाग की फुंकार को कोई असर नहीं हुआ, तो शेषनाग के सामने एक दिव्यास्त्र नजर आने लगा।
अब व्योम को खतरा महसूस होने लगा, इसलिये उसने पंचशूल को याद कर लिया।
आसमान में एक बिजली सी कड़की और व्योम के हाथ में पंचशूल नजर आने लगा।
व्योम के हाथ में पंचशूल देख विद्युम्ना की साँस रुक गई। “महाशक्ति !!!!” विद्युम्ना मन ही मन बुदबुदाई।
उस पंचशूल को देख शेषनाग भी पंचशूल को हाथ जोड़, वापस मानसरोवर में समा गया।
“तुमने मुझसे झूठ कहा था कि तुम मानव हो...पंचशूल को सूर्यपुत्र के सिवा कोई भी नहीं उठा सकता?” विद्युम्ना ने गुस्से भरी नजरों से व्योम को देखते हुए कहा।
“मैं मनुष्य ही हूं। मैं कोई देवपुत्र नहीं हूं? आपको अवश्य ही भ्रम हुआ है।” व्योम ने कहा- “लगता है कि पंचशूल को देखने के बाद अब आप हार मानने ही वाली हो?"
"कभी नहीं।...इस त्रिसर्पमुखी दंड के मेरे पास रहते मुझे कोई भी नहीं हरा सकता।” विद्युम्ना ने गुस्से में कहा- “जल के देवता, देवराज इंद्र प्रकट हो और इस मनुष्य को अपनी देव शक्तियों की अनुभूति कराओ।"
विद्युम्ना एक के बाद एक देवताओं को बुलाये ही चली जा रही थी। अब विद्युम्ना की पुकार सुन आसमान में इंद्र का चेहरा दिखाई देने लगा।
इंद्र ने क्रोध से आसमान की ओर देखा। इंद्र के ऐसा करते ही आसमान में घनघोर बादल दिखाई देने लगे और मूसलाधार बारिश शुरु हो गई।
कुछ ही देर में आसपास का पूरा क्षेत्र जलमग्न होने लगा, यह देख व्योम ने अपने हाथ में पकड़े पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचाना शुरु कर दिया।
पंचशूल के नाचने की गति इतनी ज्यादा थी कि उससे तेज हवा चलने लगी। कुछ ही देर में वह हवाएं इतनी तेज हो गईं कि उसके प्रवाह में सारे बादल उड़कर दूर चले गये।
अब व्योम ने अपने आसपास नजर डाली। कुछ ही देर में व्योम के आसपास बहुत सारा पानी भर गया था।
यह देख व्योम ने अपने पंचशूल को बर्फ पर पटका। व्योम के पंचशूल पटकते ही, बर्फ में एक बड़ी सी दरार उत्पन्न हो गई, उस दरार से होकर सारा पानी भूमि में समा गया।
यह देख इंद्र का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब इंद्र के हाथ में उनका सबसे प्रिय अस्त्र वज्र दिखाई देने लगा।
वज्र से निकली बिजली, तेज रोशनी और ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे।
इंद्र ने एक बार घूरकर व्योम को देखा और इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, इंद्र ने अपना वज्र व्योम पर फेंक कर मार दिया।
यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, वह जानती थी कि इंद्र के वज्र की काट पृथ्वी पर नहीं है।
इंद्र का वज्र तेज रोशनी बिखेरता व्योम की ओर लपका, लेकिन तभी अचानक सूर्य से तीव्र किरणें निकलीं और उन किरणों ने व्योम के आगे, ढाल नुमा एक सुनहरा रक्षा कवच बना दिया। इंद्र का वज्र तेजी से आकर उस सुरक्षा कवच से टकराया और उसमें विलीन हो गया।
यह देख इंद्र ने सूर्य की ओर देखा, जैसे कि वह पूछना चाह रहे हों कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?
“पुत्र व्योम, मैं सूर्यदेव बोल रहा हूं, मैंने एक असुर के अंत के लिये ये पंचशूल महादेव से प्राप्त किया था। चूंकि अब यह तुम्हारे पास है, इसलिये तुम्हारी रक्षा मेरे लिये सर्वोपरि है।” व्योम के मन में इस बार सूर्यदेव की आवाज सुनाई दी।
उधर आसमान में देवराज इंद्र भी अब गायब हो गये थे। व्योम, एक के बाद एक तरह से विद्युम्ना को चकित किये जा रहा था और त्रिकाली को आश्चर्यचकित।
त्रिकाली को नहीं पता था कि व्योम के पास कितनी शक्तियां हैं? पर अब त्रिकाली को अपने माता-पिता को छुड़ाने का अहसास हो चला था।
“क्या आपके पास कोई और शक्ति है विद्युम्ना, या अब आप अपनी पराजय स्वीकार करती हो?" व्योम ने मुस्कुराते हुए कहा।
“लगता है तुम्हें अपनी शक्तियों पर कुछ ज्यादा ही घमंड हो चला है व्योम? इसीलिये तुम इस प्रकार की बातें कर रहे हो।” विद्युम्ना ने आशा के विपरीत मुस्कुराकर कहा- “लो अब मेरे जलचक्र से बचो। यह जलचक्र तुम्हारी सारी स्मृतियों को विलोप कर देगा। मुझे देखना है कि यदि तुम्हें अपनी शक्तियां याद ही ना आयें, तो तुम क्या करते हो?"
यह कहकर विद्युम्ना ने फिर अपने त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया, इस बार उस दंड के एक सर्पमुख से, पानी का चक्र निकला, जो कि हवा में तेजी से नाच रहा था।
वह जलचक्र अब व्योम के सिर के पास पहुंच कर, उसके सिर के चारो ओर तेजी से घूमने लगा।
"हे ईश्वर, व्योम की मदद करना।” इस शक्ति को देख त्रिकाली थोड़ा घबरा गई- “क्यों कि अगर व्योम सच में अपनी स्मृतियां खो बैठा, फिर तो वह मुझे भी भूल जायेगा।"
जलचक्र से जल की कुछ बूंदें निकलकर व्योम के सिर पर भी गिर रहीं थीं। कुछ देर बाद जलचक्र अपने स्थान से गायब हो गया।
अब व्योम अपने आसपास अजीब सी नजरों से घूर रहा था। यह देख त्रिकाली की साँसे रुकने सी लगीं।
“मैं कौन हूं? और मैं यहां क्या कर रहा हूं?” व्योम ने विद्युम्ना को देखते हुए कहा। व्योम की यह बात सुन विद्युम्ना के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
अब विद्युम्ना अपने शरीर के आकार को छोटा कर, सामान्य आकार में आ गई।
“तुम्हारा नाम कराल है, तुम राक्षस कुल में जन्मे हो और मैं तुम्हारी महारानी हूं।” विद्युम्ना ने व्योम को झूठ बोलते हुए कहा।
"तो मेरे लिये क्या आदेश है महारानी?” व्योम ने कहा।
“तुम अब यह पंचशूल नागलोक में रखकर, पाताल में जाकर सदा के लिये सो जाओ।” विद्युम्ना ने कहा।
“पर मैं तो सिर्फ अपनी पत्नि की बात मानता हूं महारानी, तो यही बात आप उनसे मुझे कहला दीजिये।" व्योम ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा।
व्योम के शब्दों से त्रिकाली खुशी से झूम उठी, वह जान गई कि व्योम की स्मृतियां नहीं गई हैं।
उधर व्योम की बात सुन विद्युम्ना की आँखें सोचने वाले अंदाज में सिकुड़ गईं- “जलचक्र तुम्हारी स्मृति क्यों नहीं छीन पाया? ऐसा तो सिर्फ वहीं कर सकता है, जो इस जन्म में एक बार मरकर जीवित हुआ हो।"
“मैं तो अपनी पत्नी पर हर रोज मरता हूं, हो सकता है जलचक्र इसी बात को समझ गया हो।” व्योम ने मुस्कुराते हुए कहा।
“ठीक है व्योम,....अगर तुम रोज मरते हो, तो आज भी जरुर मरोगे ब्रह्मकलश का ब्रह्मजल तुम्हारी ये इच्छा जरुर पूरी करेगा।” यह कहकर विद्युम्ना ने एक बार फिर त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया, इस बार उस त्रिसर्पमुखी दंड से जल की कुछ बूंदें निकलकर व्योम पर आकर गिरी और इसी के साथ व्योम को अपनी आत्मा अपने शरीर से निकलती हुई महसूस हुई।
व्योम समझ गया कि यह विद्युम्ना की सबसे शक्तिशाली जलशक्ति है, पर वह इस शक्ति के समक्ष कुछ नहीं कर पा रहा था।
कुछ ही देर में ब्रह्मजल ने व्योम के शरीर से उसकी आत्मा को खींचकर बाहर कर दिया।
यह देख विद्युम्ना अठ्ठास करने लगी- “हाऽऽऽ...हाऽऽऽऽ...हाऽऽऽऽ...अब तुम्हारी आत्मा को मैं सदा सदा के लिये राक्षसलोक का प्रहरी बना दूंगी, जो हर आने जाने वाले को मेरी शक्ति का अहसास कराता रहेगा व्योम।"
उधर व्योम की आत्मा, उसके शरीर से निकलते ही व्योम का शरीर लहराकर वहीं जमीन पर गिर गया।
तभी व्योम को अपनी आत्मा, वापस अपने शरीर में जाती हुई महसूस हुई।
जैसे व्योम के शरीर में उसकी आत्मा ने प्रवेश किया, उसे माँ गंगा की आवाज सुनाई दी- “मेरे अलावा मेरे पुत्र को मुक्ति देने का अधिकार किसी के पास नहीं है।.......उठो व्योम और इस विद्युम्ना को अपने पंचशूल की शक्ति से परिचित कराओ।”
माँ गंगा की आवाज सुन व्योम उठकर खड़ा हो गया। व्योम को फिर से खड़ा होते देख, पहली बार विद्युम्ना की आँखों में आश्चर्य के साथ-साथ, भय की भी हल्की सी झलक दिखाई दी।
पर....पर...त्रिकाली की आँखों से खुशी का सैलाब निकल उठा। उसे अब अपने व्योम पर गर्व महसूस हो रहा था, जो कि इस प्रकार खड़ा होकर देवशक्तियों को भी पराजित कर रहा था।
“बस अब बहुत हुआ विद्युम्ना अब अगर तुमने इस प्रथम चरण में अपनी पराजय स्वीकार नहीं की, तो मैं अपनी पंचशूल से, इस पूरे राक्षसताल का जल सदा सदा के लिये सुखा देता हूं।” यह कहकर व्योम ने एक गर्जना की और अपने पंचशूल को उठाकर, उसका मुंह राक्षसताल की ओर कर दिया।
लेकिन इससे पहले कि व्योम कुछ भी कर पाता, विद्युम्ना ने चीखकर उसे रोक दिया।
“रुक जाओ व्योम, चूंकि तुम्हारे पास असीमित देवशक्तियां हैं, इसलिये मैं इस प्रथम चरण में अपनी पराजय स्वीकार करती हूं। अब तुम इस राक्षसताल में प्रवेश कर सकते हो। पर यह ध्यान रखना व्योम, कि अभी इस युद्ध का सिर्फ प्रथम चरण पूर्ण हुआ है। हार-जीत का निर्णय अभी भी बाकी है तो फिर जल्द ही अगले चरण में मिलते हैं व्योम।" यह कहकर विद्युम्ना वहां से गायब हो गई।
व्योम को जीता देखकर, त्रिकाली चट्टान से उतरी और दौड़कर व्योम के गले से लग गई।
"इस युद्ध में तुमने तो कई बार मेरी जान ही सुखा दी थी व्योम...और.... और क्या कह रहे थे विद्युम्ना को कि मैं सिर्फ अपनी पत्नी की ही बात मानता हूं और और वो क्या था? हां...मैं रोज-रोज अपनी...पत्नी पर मरता हूं ...यह तुम इतने भारी -भारी संवाद कैसे कर लेते हो?"
“जैसे ही तुम्हारा चेहरा मेरे सामने आता है, मुझमें अभिनय करने की एक अद्भुत शक्ति आ जाती है।” व्योम ने त्रिकाली को चिढ़ाते हुए कहा।
“अच्छा तो तुम इतनी देर से अभिनय कर रहे थे।" "त्रिकाली ने प्यार से व्योम के कान पकड़ते हुए कहा “इसका मतलब तुम सच में मुझसे प्यार नहीं करते?...बस रोज अभिनय ही करते हो।"
कुछ इस प्रकार से व्योम और त्रिकाली की नोंक-झोंक शुरु हो गई थी और इस महायुद्ध के प्रथम चरण का अध्याय समाप्त हो चुका था।
या यूं कहें कि द्वितीय अध्याय का प्रारंभ होने वाल था।
जारी रहेगा_____
