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#199.
ओलंपस पर्वत: (21.01.2002, सोमवार, ग्रीक सभा, ओलंपस पर्वत)
ओलंपस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पूरी तरह से बादलों से ढकी नजर आ रही थी। उन बादलों के ऊपर एक विशाल महल बना था, जिसमें ग्रीक देओं का निवास स्थान था।
इस महल में प्रत्येक देव के लिये एक-एक भाग बना था। इस महल की रचना, युवा देओं ने टाइटन्स को हराने के बाद की थी। इसे बनाने का पूर्ण श्रेय हेफेस्टस को जाता था।
पूरी तरह से काले पत्थरों से निर्मित इस महल में सोने की नक्काशी की गई थी, जो कि इसके भव्यता को और निखार रहे थे।
इस महल के बीच एक सभागार थी, जिसमें सभी 12 ओलंपियन देवता बैठकर, विचार-विमर्श करते थे।
इस समय भी सभी सभागार में बैठे थे। आज बहुत दिन बाद सभी किसी कार्य के लिये एकत्रित हुए थे?
सभागार के बीचो बीच में जीयूष का सिंहासन था। अभी सब आज की सभा की शुरुआत करने ही जा रहे थे। कि तभी आर्टेमिस ने अपने हाथ को उठाकर कुछ कहने की इजाजत मांगी।
“कहो आर्टेमिस, तुम क्या कहना चाहती हो?" जीयूष ने आर्टेमिस से पूछा।
“पिताजी, कुछ दिन पहले किसी चमत्कारी शक्तिधारक स्त्री ने, मेरी प्राण से प्रिय हिरनी मेलाइट को चुरा लिया। मैं पिछले 7 दिनों से सभी के पीछे भाग रही हूं, पर कोई मुझे ना तो समय दे रहा है? और ना ही मेलाइट को ढूंढने में मदद कर रहा है। क्या मैं जान सकती हूं कि ऐसी क्या बात है, जो कोई भी मुझे मिल ही नहीं रहा?" आर्टेमिस ने कहा।
“देखो आर्टेमिस, मैं पोसाईडन के साथ मिलकर इस समय समुद्र की कुछ गतिविधियों में व्यस्त था। पर मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अब मेलाइट को ढूंढकर तुम्हारे हवाले कर दूंगा।” जीयूष ने आर्टेमिस को समझाते हुए कहा।
तभी एक होराई ने सभागार में आकर कहा- “देवता जीयूष, महल के द्वार पर इस समय 3 लोग खड़े हैं, जो आपसे मिलने के लिये कह रहे हैं।"
“ये हमारे महल के द्वार तक कौन सा मनुष्य पहुंच गया? ये हो क्या रहा है?" जीयूष ने गुस्साते हुए कहा
“जाओ, उन्हें लेकर आओ, मैं भी तो देखू कि ओलंपस पर्वत के इतने ऊंचे शिखर पर कोई कैसे पहुंच गया?"
जीयूष की आज्ञा मानकर वह होराई बाहर निकल गई। कुछ देर के बाद वह माया, कैस्पर और वारुणि को लेकर सभागार में प्रविष्ठ हुई और उन्हें वहीं छोड़कर वापस लौट गई।
पोसाईडन, कैस्पर को यहां देखकर हैरान हो गया।
“तुम यहां क्या कर रहे हो कैस्पर? तुम्हें तो मैंने तिलिस्मा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी थी।" पोसाईडन ने कैस्पर को देखते हुए कहा।
“आपका तिलिस्मा अब भी सुरक्षित है, वहां पर मेरा बनाया एक कम्प्यूटर सभी कुछ मेरी तरह ही संभाल रहा है।" कैस्पर ने पोसाईडन को देखते हुए कहा।
बहरहाल जो भी हो जीयूष ये तो समझ गया था कि पोसाईडन इनको जानता है।
"आप लोग यहां पर क्यों आये हैं? मैं यह जानना चाहता हूं।” जीयूष ने सभी की ओर देखते हुए पूछा।
तभी माया की आवाज पूरे वातावरण में गूंजी “देवता जीयूष को माया का अभिवादन स्वीकार हो।" जीयूष पूरे महल में गूंज रही आवाज को सुन आश्चर्य में पड़ गया।
“देवता जीयूष यह मेरी माता हैं, इनका नाम माया है, आप आश्चर्य व्यक्त मत करिये, ये सभी से ऐसे ही बात करती हैं।" कैस्पर ने कहा। जीयूष ने कैस्पर की बात सुन धीरे से अपना सिर हिला दिया।
“देवता जीयूष, मैं पूर्व दिशा में स्थित भारत देश से हूं। मुझे लगता है कि आप भी अवश्य भारत देश के देवों को जानते होंगे।” माया ने पुनः कहना आरंभ कर दिया- “मैं आपको इस समय पृथ्वी पर आये एक संकट के बारे में आगाह करने आई हूं। पृथ्वी पर कुछ बुरी शक्तियां पहले से ही उपस्थित थीं, जो एक भयानक युद्ध को शुरु करने जा रहीं थीं। तभी अटलांटिक महासागर में एक अंतरिक्ष के जीवों का यान भी आ गया। वह अंतरिक्ष के जीव, अपने पास ब्रह्मांड की अनोखी शक्तियां रखें हैं, कुछ ही समय बाद हमारा युद्ध शुरु हो जायेगा, मैं चाहती हूं कि ऐसी स्थिति में आप हमारा साथ दें।"
“भारत और ग्रीक देवताओं में बहुत सी समानताएं हैं, इसलिये एक बार हमने आपस में मिलकर यह चुनाव किया था कि हम कभी एक-दूसरे के कार्य में दखल नहीं देंगे। ऐसे में हम भला आपकी ओर से उन अंतरिक्ष के जीवों से क्यों लड़ें? हम तो उनसे मित्रता करके अपनी शक्तियों को और बढ़ा सकते हैं और हम भला ये कैसे भूल सकते हैं कि इससे पहले हमारे युद्ध में भी किसी भारतीय देवता ने हमारा साथ नहीं दिया था।” जीयूष ने कहा।
“मैं जानती थी कि आप हमारा साथ नहीं देंगे। भले ही वह अंतरिक्ष के जीव पूरी पृथ्वी को ही क्यों ना समाप्त कर दें? अरे जब पृथ्वी ही नहीं रहेगी, तो आपको देवता कौन कहेगा?" माया ने कहा- “कोई बात नहीं, हम स्वयं ही उन जीवों को समाप्त करने में सक्षम हैं। हम बस ये चाहते हैं, कि अगर आप हमारा साथ ना दें, तो आप उन अंतरिक्ष के जीवों का भी साथ ना दें।"
पर इससे पहले कि जीयूष कोई फैसला ले पाते, एरस अपने स्थान पर खड़ा हो गया और होता भी क्यों ना? आखिर वह युद्ध का देवता जो था।
"तुम इस प्रकार हमारी राजसभा में आकर हमें ही आज्ञा नहीं दे सकती।” एरस ने गुस्साते हुए कहा "लगता है कि तुम्हें हमारी राजसभा के नियम भी नहीं पता।"
"हमने आपकी राजसभा के नियम देख लिये हैं, परंतु जब आपके राजा से बात हो रही है, तो आप को भी बीच में आने का कोई अधिकार नहीं है?" वारुणि ने गुस्से में कहा।
“लगता है कि तुम लोग बिना शक्ति दिखाये नहीं मानोगे।” एरस ने गुस्से से कहा और अपने हाथों को वारुणि की ओर उठाया।
“हम युद्ध की शुरुआत नहीं करना चाहते, पर अगर तुम्हें युद्ध की ही भाषा समझ में आती है, तो फिर यही ठीक है।" अब वारुणि के हाथ में भी अस्त्र नजर आने लगा।
"रुक जाओ सब लोग।" माया ने चीखकर कहा “देवता जीयूष, शायद आपको पता नहीं है कि कैस्पर आपका ही पौत्र है।" माया की बात सुनकर वहां बैठे सभी लोग हैरान हो गये।
“यह आप क्या कह रही हो माँ?" माया के इस रहस्योद्घाटन से कैस्पर भी चकित हो गया।
“मैं सत्य कह रही हूं जीयूष।.... आपको मेरोन और सोफिया तो याद ही होगें।"
माया के इतना कहते ही, पोसाईडन अपने स्थान से खड़ा हो गया और कैस्पर की ओर अपना त्रिशूल उठाकर तान दिया।
पोसाईडन को ऐसा करते देख कैस्पर ने अपनी शक्ति से पोसाईडन के चारो ओर एक विशाल हीरा उत्पन्न कर दिया, जिसकी दीवारें ऊर्जा से निर्मित थीं।
अब पोसाईडन पूरी तरह से उस हीरे के अंदर फंस गया था।
“मैं आप लोगों के लिये शांति का प्रस्ताव लायी थी, पर ऐसा नहीं है कि हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते। हम कमजोर नहीं हैं जीयूष ना विश्वास हो तो मेरी शक्तियों को याद कर लो, इसी नन्हें कैस्पर के ऊपर, आपने बचपन में अपने थंडरबोल्ट का वार किया था ना....? फिर यह बच कैसे गया? और पोसाईडन तुम...तुमने भी तो ‘नाइट ओशन' जहाज को पूरा पलट दिया था, फिर भी कैस्पर और इसके माता-पिता कैसे बच गये? ये कभी सोचने की कोशिश की? 20,000 वर्षों से मैं तुम्हारे ही क्षेत्र में, तुम्हारे ही समुद्र में रहती हूं। आज तक जान पाये क्या? अरे तुम तो इस कैस्पर के बनाये, माया महल की सुरक्षा भी नहीं भेद पाये थे।"
माया के इतना बोलते ही जीयूष को कैस्पर के बचपन की घटना याद आ गई, यह सुन एरस, कैस्पर की ओर बढ़ा, तभी वारुणि ने अपनी वायु शक्ति से भंवर बनाकर, एरस को उसमें फंसा दिया।
यह देख हेरा के हाथ से 2 जहरीले सर्प निकलकर माया की ओर झपटे और उन्होंने माया के शरीर पर काट लिया, पर देखते ही देखते वह दोनों सर्प वहीं पिघलकर मर गये।
“ये बच्चों के खेल मुझ पर मत आजमाओ देवी हेरा, हम बचपन से ही इन जीवों से खेलते आये हैं और अगर मैंने अपना जहर यहां उगल दिया, तो ओलंपस पर्वत पर मौजूद आपका यह पूरा महल पिघल जायेगा।” माया ने क्रोधित होते हुए कहा।
तभी इतनी देर से शांत बैठा अपोलो अपने स्थान पर खड़ा हो गया। अपोलो ने अपने पैर को जमीन पर पटका, अपोलो की शक्ति से पूरा ओलंपस पर्वत कांप उठा।
मगर इससे पहले कि कोई कुछ और कर पाता, कि तभी महल की छत तोड़ता हुआ, हनुका सभागार में आकर कूदा।
आते ही उसने अपोलो के पैर पर गुरुत्व शक्ति का वार कर दिया। अब अपोलो का पैर जमीन पर चिपक सा गया। अब वह पूरी शक्ति लगाकर भी अपना पैर नहीं छुड़ा पा रहा था।
तभी एथेना गुस्से से अपने स्थान से खड़ी हो गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, तभी सभागार के दरवाजे से सर्पकन्या यूरेल और स्थेनो प्रकट हो गईं।
यूरेल और स्थेनों को देखकर सभी ने तुरंत अपनी नजरें नीचे कर लीं, नहीं तो सबको पत्थर का बन जाना था।
यूरेल और स्थेनो को वहां देख एथेना भय से थोड़ा पीछे हो गई क्यों कि उन दोनों के इस रुप के पीछे एथेना ही तो जिम्मेदार थी। उसी ने श्राप देकर तीनों बहनों को ऐसा बनाया था।
तभी माया फिर से बोल उठी- “देवता जीयूष, मैं फिर आपसे विनम्र निवेदन करती हूं कि आप हमारी बात को मानिये। हम यहां युद्ध करने नहीं बल्कि युद्ध को रोकने आये हैं। हम चाहते हैं कि आप उन अंतरिक्ष के जीवों का साथ ना दें बस.... इससे ज्यादा तो हमने आपसे कुछ नहीं कहा...फिर भला आप इतनी छोटी सी बात पर मान क्यों नहीं रहे?...जरा देखिये.....अपने पौत्र कैस्पर को...मैंने उसे कितनी विलक्षण शक्तियां दी हैं आगे चलकर वह आपका ही नाम रौशन करेगा। आप इस बात को समझने की कोशिश करिये और आप देवता पोसाईडन....उन अंतरिक्ष के जीवों ने आपके तो पूरे समुद्र को विषाक्त कर दिया है, सभी समुद्री जीव या तो मर रहे हैं या फिर विकृत हो रहे हैं और आप उन्हीं का साथ देना चाहते हैं।"
इस बार माया के शब्दों ने सभी पर गहरा असर किया था। अब जीयूष ने एक-एक कर सभी ओलंपियन देवता की ओर देखा और सभी की सहमति देख, शांत होकर अपने सिंहासन पर बैठ गये।
अब कैस्पर ने पोसाईडन के चारो ओर बना वह हीरा गायब कर दिया और हनुका ने अपोलो को गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त कर दिया।
वारुणि ने भी अब एरस के पास बनी भंवर को हटा लिया। एरस, वारुणि को घूरता हुआ अपने सिंहासन पर जा बैठा।
माया ने स्थेनो और यूरेल को भी वहां से जाने का इशारा किया। उन दोनों के जाने के बाद जीयूष ने सबसे पहले सभी को बैठने के लिये कहा।
जो भी हो, अब वहां का वातावरण पूरी तरह से शांत था।
“ठीक है देवी माया, हममें से कोई आप दोनों के इस युद्ध में अब किसी भी ओर से भाग नहीं लेगा, यह मेरा आपसे वचन है।” जीयूष ने कहा और फिर प्यार से कैस्पर के सिर पर हाथ फेरा, शायद उनका पौत्र प्रेम अब जाग गया था।
जीयूष को ऐसा करते देख 'हेरा' थोड़ा सा कसमसाई, पर उसने कुछ कहा नहीं। कुछ भी हो हेरा कभी भी जीयूष के अन्य पुत्रों को पसंद नहीं करती थी।
“पिताजी, शायद इन्हीं लोगों ने मेरी मेलाइट को मुझसे छीना है।” आर्टेमिस ने फिर से खड़े होते हुए कहा “आप इनसे कहो कि कम से कम एक बार वह मुझे उससे मिलने दें, मैं देखना चाहती हूं कि वह खुश है या नहीं ?"
“वह पूरी तरह से खुश है।” हनुका ने मेलाइट की दी अंगूठी, आर्टेमिस को देते हुए कहा- “उसने आपको देने के लिये मुझे यह अंगूठी भी दी थी। कृपया इसे आप स्वीकार करें।" आर्टेमिस ने आश्चर्य से उस अंगूठी को देखते हुए हनुका के हाथों से ले लिया।
इस अंगूठी को मेलाइट को आर्टेमिस ने ही दिया था और उससे कहा था- “कि जब भी तुम्हें कोई पसंद आ जाये, तो मुझे छोड़कर उसके पास चली जाना और ऐसी स्थिति में यह अंगूठी तुम मुझे वापस कर देना। मैं समझ जाऊंगी कि तुम वहां खुश हो। यह अंगूठी तुम्हारी इच्छा के बिना कोई तुम्हारी उंगली से निकाल नहीं पायेगा।"
अब आर्टेमिस थोड़ा शांत दिखने लगी थी।
तभी माया ने एक बार फिर जीयूष को संबोधित करते हुए कहा- “अब मैं चाहती हूं कि आप कैस्पर के माता-पिता, सोफिया और मेरोन को भी अपनी कैद से आजाद कर दें।"
कैस्पर के लिये यह भी एक रहस्य से कम नहीं था। उसे लगता था कि उसके माता-पिता मर चुके हैं।
“क्षमा चाहता हूं देवी माया, पर मेरोन और सोफिया को मेरे भाई ‘हेडिस' ने 'अंडरवर्ल्ड' में बंद करके रखा है और वह मेरी बात भी नहीं मानता, इसलिये कैस्पर को वहां जाकर, उन्हें स्वयं स्वतंत्र कराना होगा। हां अगर इसे कार्य के लिये कैस्पर को किसी मदद की जरुरत हुई, तो मैं उसकी मदद जरुर करुंगा।” जीयूष ने कहा।
“ठीक है देवता जीयूष, तो अब हमें आज्ञा दीजिये, इस देवयुद्ध के बाद मैं पुनः आकर एक बार आपसे फिर मिलूंगी।" यह कहकर माया ने सभी को अपने साथ लिया और वहां से निकल गई।
जारी रहेगा_____
ओलंपस पर्वत: (21.01.2002, सोमवार, ग्रीक सभा, ओलंपस पर्वत)
ओलंपस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पूरी तरह से बादलों से ढकी नजर आ रही थी। उन बादलों के ऊपर एक विशाल महल बना था, जिसमें ग्रीक देओं का निवास स्थान था।
इस महल में प्रत्येक देव के लिये एक-एक भाग बना था। इस महल की रचना, युवा देओं ने टाइटन्स को हराने के बाद की थी। इसे बनाने का पूर्ण श्रेय हेफेस्टस को जाता था।
पूरी तरह से काले पत्थरों से निर्मित इस महल में सोने की नक्काशी की गई थी, जो कि इसके भव्यता को और निखार रहे थे।
इस महल के बीच एक सभागार थी, जिसमें सभी 12 ओलंपियन देवता बैठकर, विचार-विमर्श करते थे।
इस समय भी सभी सभागार में बैठे थे। आज बहुत दिन बाद सभी किसी कार्य के लिये एकत्रित हुए थे?
सभागार के बीचो बीच में जीयूष का सिंहासन था। अभी सब आज की सभा की शुरुआत करने ही जा रहे थे। कि तभी आर्टेमिस ने अपने हाथ को उठाकर कुछ कहने की इजाजत मांगी।
“कहो आर्टेमिस, तुम क्या कहना चाहती हो?" जीयूष ने आर्टेमिस से पूछा।
“पिताजी, कुछ दिन पहले किसी चमत्कारी शक्तिधारक स्त्री ने, मेरी प्राण से प्रिय हिरनी मेलाइट को चुरा लिया। मैं पिछले 7 दिनों से सभी के पीछे भाग रही हूं, पर कोई मुझे ना तो समय दे रहा है? और ना ही मेलाइट को ढूंढने में मदद कर रहा है। क्या मैं जान सकती हूं कि ऐसी क्या बात है, जो कोई भी मुझे मिल ही नहीं रहा?" आर्टेमिस ने कहा।
“देखो आर्टेमिस, मैं पोसाईडन के साथ मिलकर इस समय समुद्र की कुछ गतिविधियों में व्यस्त था। पर मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अब मेलाइट को ढूंढकर तुम्हारे हवाले कर दूंगा।” जीयूष ने आर्टेमिस को समझाते हुए कहा।
तभी एक होराई ने सभागार में आकर कहा- “देवता जीयूष, महल के द्वार पर इस समय 3 लोग खड़े हैं, जो आपसे मिलने के लिये कह रहे हैं।"
“ये हमारे महल के द्वार तक कौन सा मनुष्य पहुंच गया? ये हो क्या रहा है?" जीयूष ने गुस्साते हुए कहा
“जाओ, उन्हें लेकर आओ, मैं भी तो देखू कि ओलंपस पर्वत के इतने ऊंचे शिखर पर कोई कैसे पहुंच गया?"
जीयूष की आज्ञा मानकर वह होराई बाहर निकल गई। कुछ देर के बाद वह माया, कैस्पर और वारुणि को लेकर सभागार में प्रविष्ठ हुई और उन्हें वहीं छोड़कर वापस लौट गई।
पोसाईडन, कैस्पर को यहां देखकर हैरान हो गया।
“तुम यहां क्या कर रहे हो कैस्पर? तुम्हें तो मैंने तिलिस्मा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी थी।" पोसाईडन ने कैस्पर को देखते हुए कहा।
“आपका तिलिस्मा अब भी सुरक्षित है, वहां पर मेरा बनाया एक कम्प्यूटर सभी कुछ मेरी तरह ही संभाल रहा है।" कैस्पर ने पोसाईडन को देखते हुए कहा।
बहरहाल जो भी हो जीयूष ये तो समझ गया था कि पोसाईडन इनको जानता है।
"आप लोग यहां पर क्यों आये हैं? मैं यह जानना चाहता हूं।” जीयूष ने सभी की ओर देखते हुए पूछा।
तभी माया की आवाज पूरे वातावरण में गूंजी “देवता जीयूष को माया का अभिवादन स्वीकार हो।" जीयूष पूरे महल में गूंज रही आवाज को सुन आश्चर्य में पड़ गया।
“देवता जीयूष यह मेरी माता हैं, इनका नाम माया है, आप आश्चर्य व्यक्त मत करिये, ये सभी से ऐसे ही बात करती हैं।" कैस्पर ने कहा। जीयूष ने कैस्पर की बात सुन धीरे से अपना सिर हिला दिया।
“देवता जीयूष, मैं पूर्व दिशा में स्थित भारत देश से हूं। मुझे लगता है कि आप भी अवश्य भारत देश के देवों को जानते होंगे।” माया ने पुनः कहना आरंभ कर दिया- “मैं आपको इस समय पृथ्वी पर आये एक संकट के बारे में आगाह करने आई हूं। पृथ्वी पर कुछ बुरी शक्तियां पहले से ही उपस्थित थीं, जो एक भयानक युद्ध को शुरु करने जा रहीं थीं। तभी अटलांटिक महासागर में एक अंतरिक्ष के जीवों का यान भी आ गया। वह अंतरिक्ष के जीव, अपने पास ब्रह्मांड की अनोखी शक्तियां रखें हैं, कुछ ही समय बाद हमारा युद्ध शुरु हो जायेगा, मैं चाहती हूं कि ऐसी स्थिति में आप हमारा साथ दें।"
“भारत और ग्रीक देवताओं में बहुत सी समानताएं हैं, इसलिये एक बार हमने आपस में मिलकर यह चुनाव किया था कि हम कभी एक-दूसरे के कार्य में दखल नहीं देंगे। ऐसे में हम भला आपकी ओर से उन अंतरिक्ष के जीवों से क्यों लड़ें? हम तो उनसे मित्रता करके अपनी शक्तियों को और बढ़ा सकते हैं और हम भला ये कैसे भूल सकते हैं कि इससे पहले हमारे युद्ध में भी किसी भारतीय देवता ने हमारा साथ नहीं दिया था।” जीयूष ने कहा।
“मैं जानती थी कि आप हमारा साथ नहीं देंगे। भले ही वह अंतरिक्ष के जीव पूरी पृथ्वी को ही क्यों ना समाप्त कर दें? अरे जब पृथ्वी ही नहीं रहेगी, तो आपको देवता कौन कहेगा?" माया ने कहा- “कोई बात नहीं, हम स्वयं ही उन जीवों को समाप्त करने में सक्षम हैं। हम बस ये चाहते हैं, कि अगर आप हमारा साथ ना दें, तो आप उन अंतरिक्ष के जीवों का भी साथ ना दें।"
पर इससे पहले कि जीयूष कोई फैसला ले पाते, एरस अपने स्थान पर खड़ा हो गया और होता भी क्यों ना? आखिर वह युद्ध का देवता जो था।
"तुम इस प्रकार हमारी राजसभा में आकर हमें ही आज्ञा नहीं दे सकती।” एरस ने गुस्साते हुए कहा "लगता है कि तुम्हें हमारी राजसभा के नियम भी नहीं पता।"
"हमने आपकी राजसभा के नियम देख लिये हैं, परंतु जब आपके राजा से बात हो रही है, तो आप को भी बीच में आने का कोई अधिकार नहीं है?" वारुणि ने गुस्से में कहा।
“लगता है कि तुम लोग बिना शक्ति दिखाये नहीं मानोगे।” एरस ने गुस्से से कहा और अपने हाथों को वारुणि की ओर उठाया।
“हम युद्ध की शुरुआत नहीं करना चाहते, पर अगर तुम्हें युद्ध की ही भाषा समझ में आती है, तो फिर यही ठीक है।" अब वारुणि के हाथ में भी अस्त्र नजर आने लगा।
"रुक जाओ सब लोग।" माया ने चीखकर कहा “देवता जीयूष, शायद आपको पता नहीं है कि कैस्पर आपका ही पौत्र है।" माया की बात सुनकर वहां बैठे सभी लोग हैरान हो गये।
“यह आप क्या कह रही हो माँ?" माया के इस रहस्योद्घाटन से कैस्पर भी चकित हो गया।
“मैं सत्य कह रही हूं जीयूष।.... आपको मेरोन और सोफिया तो याद ही होगें।"
माया के इतना कहते ही, पोसाईडन अपने स्थान से खड़ा हो गया और कैस्पर की ओर अपना त्रिशूल उठाकर तान दिया।
पोसाईडन को ऐसा करते देख कैस्पर ने अपनी शक्ति से पोसाईडन के चारो ओर एक विशाल हीरा उत्पन्न कर दिया, जिसकी दीवारें ऊर्जा से निर्मित थीं।
अब पोसाईडन पूरी तरह से उस हीरे के अंदर फंस गया था।
“मैं आप लोगों के लिये शांति का प्रस्ताव लायी थी, पर ऐसा नहीं है कि हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते। हम कमजोर नहीं हैं जीयूष ना विश्वास हो तो मेरी शक्तियों को याद कर लो, इसी नन्हें कैस्पर के ऊपर, आपने बचपन में अपने थंडरबोल्ट का वार किया था ना....? फिर यह बच कैसे गया? और पोसाईडन तुम...तुमने भी तो ‘नाइट ओशन' जहाज को पूरा पलट दिया था, फिर भी कैस्पर और इसके माता-पिता कैसे बच गये? ये कभी सोचने की कोशिश की? 20,000 वर्षों से मैं तुम्हारे ही क्षेत्र में, तुम्हारे ही समुद्र में रहती हूं। आज तक जान पाये क्या? अरे तुम तो इस कैस्पर के बनाये, माया महल की सुरक्षा भी नहीं भेद पाये थे।"
माया के इतना बोलते ही जीयूष को कैस्पर के बचपन की घटना याद आ गई, यह सुन एरस, कैस्पर की ओर बढ़ा, तभी वारुणि ने अपनी वायु शक्ति से भंवर बनाकर, एरस को उसमें फंसा दिया।
यह देख हेरा के हाथ से 2 जहरीले सर्प निकलकर माया की ओर झपटे और उन्होंने माया के शरीर पर काट लिया, पर देखते ही देखते वह दोनों सर्प वहीं पिघलकर मर गये।
“ये बच्चों के खेल मुझ पर मत आजमाओ देवी हेरा, हम बचपन से ही इन जीवों से खेलते आये हैं और अगर मैंने अपना जहर यहां उगल दिया, तो ओलंपस पर्वत पर मौजूद आपका यह पूरा महल पिघल जायेगा।” माया ने क्रोधित होते हुए कहा।
तभी इतनी देर से शांत बैठा अपोलो अपने स्थान पर खड़ा हो गया। अपोलो ने अपने पैर को जमीन पर पटका, अपोलो की शक्ति से पूरा ओलंपस पर्वत कांप उठा।
मगर इससे पहले कि कोई कुछ और कर पाता, कि तभी महल की छत तोड़ता हुआ, हनुका सभागार में आकर कूदा।
आते ही उसने अपोलो के पैर पर गुरुत्व शक्ति का वार कर दिया। अब अपोलो का पैर जमीन पर चिपक सा गया। अब वह पूरी शक्ति लगाकर भी अपना पैर नहीं छुड़ा पा रहा था।
तभी एथेना गुस्से से अपने स्थान से खड़ी हो गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, तभी सभागार के दरवाजे से सर्पकन्या यूरेल और स्थेनो प्रकट हो गईं।
यूरेल और स्थेनों को देखकर सभी ने तुरंत अपनी नजरें नीचे कर लीं, नहीं तो सबको पत्थर का बन जाना था।
यूरेल और स्थेनो को वहां देख एथेना भय से थोड़ा पीछे हो गई क्यों कि उन दोनों के इस रुप के पीछे एथेना ही तो जिम्मेदार थी। उसी ने श्राप देकर तीनों बहनों को ऐसा बनाया था।
तभी माया फिर से बोल उठी- “देवता जीयूष, मैं फिर आपसे विनम्र निवेदन करती हूं कि आप हमारी बात को मानिये। हम यहां युद्ध करने नहीं बल्कि युद्ध को रोकने आये हैं। हम चाहते हैं कि आप उन अंतरिक्ष के जीवों का साथ ना दें बस.... इससे ज्यादा तो हमने आपसे कुछ नहीं कहा...फिर भला आप इतनी छोटी सी बात पर मान क्यों नहीं रहे?...जरा देखिये.....अपने पौत्र कैस्पर को...मैंने उसे कितनी विलक्षण शक्तियां दी हैं आगे चलकर वह आपका ही नाम रौशन करेगा। आप इस बात को समझने की कोशिश करिये और आप देवता पोसाईडन....उन अंतरिक्ष के जीवों ने आपके तो पूरे समुद्र को विषाक्त कर दिया है, सभी समुद्री जीव या तो मर रहे हैं या फिर विकृत हो रहे हैं और आप उन्हीं का साथ देना चाहते हैं।"
इस बार माया के शब्दों ने सभी पर गहरा असर किया था। अब जीयूष ने एक-एक कर सभी ओलंपियन देवता की ओर देखा और सभी की सहमति देख, शांत होकर अपने सिंहासन पर बैठ गये।
अब कैस्पर ने पोसाईडन के चारो ओर बना वह हीरा गायब कर दिया और हनुका ने अपोलो को गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त कर दिया।
वारुणि ने भी अब एरस के पास बनी भंवर को हटा लिया। एरस, वारुणि को घूरता हुआ अपने सिंहासन पर जा बैठा।
माया ने स्थेनो और यूरेल को भी वहां से जाने का इशारा किया। उन दोनों के जाने के बाद जीयूष ने सबसे पहले सभी को बैठने के लिये कहा।
जो भी हो, अब वहां का वातावरण पूरी तरह से शांत था।
“ठीक है देवी माया, हममें से कोई आप दोनों के इस युद्ध में अब किसी भी ओर से भाग नहीं लेगा, यह मेरा आपसे वचन है।” जीयूष ने कहा और फिर प्यार से कैस्पर के सिर पर हाथ फेरा, शायद उनका पौत्र प्रेम अब जाग गया था।
जीयूष को ऐसा करते देख 'हेरा' थोड़ा सा कसमसाई, पर उसने कुछ कहा नहीं। कुछ भी हो हेरा कभी भी जीयूष के अन्य पुत्रों को पसंद नहीं करती थी।
“पिताजी, शायद इन्हीं लोगों ने मेरी मेलाइट को मुझसे छीना है।” आर्टेमिस ने फिर से खड़े होते हुए कहा “आप इनसे कहो कि कम से कम एक बार वह मुझे उससे मिलने दें, मैं देखना चाहती हूं कि वह खुश है या नहीं ?"
“वह पूरी तरह से खुश है।” हनुका ने मेलाइट की दी अंगूठी, आर्टेमिस को देते हुए कहा- “उसने आपको देने के लिये मुझे यह अंगूठी भी दी थी। कृपया इसे आप स्वीकार करें।" आर्टेमिस ने आश्चर्य से उस अंगूठी को देखते हुए हनुका के हाथों से ले लिया।
इस अंगूठी को मेलाइट को आर्टेमिस ने ही दिया था और उससे कहा था- “कि जब भी तुम्हें कोई पसंद आ जाये, तो मुझे छोड़कर उसके पास चली जाना और ऐसी स्थिति में यह अंगूठी तुम मुझे वापस कर देना। मैं समझ जाऊंगी कि तुम वहां खुश हो। यह अंगूठी तुम्हारी इच्छा के बिना कोई तुम्हारी उंगली से निकाल नहीं पायेगा।"
अब आर्टेमिस थोड़ा शांत दिखने लगी थी।
तभी माया ने एक बार फिर जीयूष को संबोधित करते हुए कहा- “अब मैं चाहती हूं कि आप कैस्पर के माता-पिता, सोफिया और मेरोन को भी अपनी कैद से आजाद कर दें।"
कैस्पर के लिये यह भी एक रहस्य से कम नहीं था। उसे लगता था कि उसके माता-पिता मर चुके हैं।
“क्षमा चाहता हूं देवी माया, पर मेरोन और सोफिया को मेरे भाई ‘हेडिस' ने 'अंडरवर्ल्ड' में बंद करके रखा है और वह मेरी बात भी नहीं मानता, इसलिये कैस्पर को वहां जाकर, उन्हें स्वयं स्वतंत्र कराना होगा। हां अगर इसे कार्य के लिये कैस्पर को किसी मदद की जरुरत हुई, तो मैं उसकी मदद जरुर करुंगा।” जीयूष ने कहा।
“ठीक है देवता जीयूष, तो अब हमें आज्ञा दीजिये, इस देवयुद्ध के बाद मैं पुनः आकर एक बार आपसे फिर मिलूंगी।" यह कहकर माया ने सभी को अपने साथ लिया और वहां से निकल गई।
जारी रहेगा_____