Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 39 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#199.

ओलंपस पर्वत: (21.01.2002, सोमवार, ग्रीक सभा, ओलंपस पर्वत)

ओलंपस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पूरी तरह से बादलों से ढकी नजर आ रही थी। उन बादलों के ऊपर एक विशाल महल बना था, जिसमें ग्रीक देओं का निवास स्थान था।

इस महल में प्रत्येक देव के लिये एक-एक भाग बना था। इस महल की रचना, युवा देओं ने टाइटन्स को हराने के बाद की थी। इसे बनाने का पूर्ण श्रेय हेफेस्टस को जाता था।

पूरी तरह से काले पत्थरों से निर्मित इस महल में सोने की नक्काशी की गई थी, जो कि इसके भव्यता को और निखार रहे थे।

इस महल के बीच एक सभागार थी, जिसमें सभी 12 ओलंपियन देवता बैठकर, विचार-विमर्श करते थे।

इस समय भी सभी सभागार में बैठे थे। आज बहुत दिन बाद सभी किसी कार्य के लिये एकत्रित हुए थे?

सभागार के बीचो बीच में जीयूष का सिंहासन था। अभी सब आज की सभा की शुरुआत करने ही जा रहे थे। कि तभी आर्टेमिस ने अपने हाथ को उठाकर कुछ कहने की इजाजत मांगी।

“कहो आर्टेमिस, तुम क्या कहना चाहती हो?" जीयूष ने आर्टेमिस से पूछा।

“पिताजी, कुछ दिन पहले किसी चमत्कारी शक्तिधारक स्त्री ने, मेरी प्राण से प्रिय हिरनी मेलाइट को चुरा लिया। मैं पिछले 7 दिनों से सभी के पीछे भाग रही हूं, पर कोई मुझे ना तो समय दे रहा है? और ना ही मेलाइट को ढूंढने में मदद कर रहा है। क्या मैं जान सकती हूं कि ऐसी क्या बात है, जो कोई भी मुझे मिल ही नहीं रहा?" आर्टेमिस ने कहा।

“देखो आर्टेमिस, मैं पोसाईडन के साथ मिलकर इस समय समुद्र की कुछ गतिविधियों में व्यस्त था। पर मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अब मेलाइट को ढूंढकर तुम्हारे हवाले कर दूंगा।” जीयूष ने आर्टेमिस को समझाते हुए कहा।

तभी एक होराई ने सभागार में आकर कहा- “देवता जीयूष, महल के द्वार पर इस समय 3 लोग खड़े हैं, जो आपसे मिलने के लिये कह रहे हैं।"

“ये हमारे महल के द्वार तक कौन सा मनुष्य पहुंच गया? ये हो क्या रहा है?" जीयूष ने गुस्साते हुए कहा

“जाओ, उन्हें लेकर आओ, मैं भी तो देखू कि ओलंपस पर्वत के इतने ऊंचे शिखर पर कोई कैसे पहुंच गया?"

जीयूष की आज्ञा मानकर वह होराई बाहर निकल गई। कुछ देर के बाद वह माया, कैस्पर और वारुणि को लेकर सभागार में प्रविष्ठ हुई और उन्हें वहीं छोड़कर वापस लौट गई।

पोसाईडन, कैस्पर को यहां देखकर हैरान हो गया।

“तुम यहां क्या कर रहे हो कैस्पर? तुम्हें तो मैंने तिलिस्मा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी थी।" पोसाईडन ने कैस्पर को देखते हुए कहा।

“आपका तिलिस्मा अब भी सुरक्षित है, वहां पर मेरा बनाया एक कम्प्यूटर सभी कुछ मेरी तरह ही संभाल रहा है।" कैस्पर ने पोसाईडन को देखते हुए कहा।

बहरहाल जो भी हो जीयूष ये तो समझ गया था कि पोसाईडन इनको जानता है।

"आप लोग यहां पर क्यों आये हैं? मैं यह जानना चाहता हूं।” जीयूष ने सभी की ओर देखते हुए पूछा।

तभी माया की आवाज पूरे वातावरण में गूंजी “देवता जीयूष को माया का अभिवादन स्वीकार हो।" जीयूष पूरे महल में गूंज रही आवाज को सुन आश्चर्य में पड़ गया।

“देवता जीयूष यह मेरी माता हैं, इनका नाम माया है, आप आश्चर्य व्यक्त मत करिये, ये सभी से ऐसे ही बात करती हैं।" कैस्पर ने कहा। जीयूष ने कैस्पर की बात सुन धीरे से अपना सिर हिला दिया।

“देवता जीयूष, मैं पूर्व दिशा में स्थित भारत देश से हूं। मुझे लगता है कि आप भी अवश्य भारत देश के देवों को जानते होंगे।” माया ने पुनः कहना आरंभ कर दिया- “मैं आपको इस समय पृथ्वी पर आये एक संकट के बारे में आगाह करने आई हूं। पृथ्वी पर कुछ बुरी शक्तियां पहले से ही उपस्थित थीं, जो एक भयानक युद्ध को शुरु करने जा रहीं थीं। तभी अटलांटिक महासागर में एक अंतरिक्ष के जीवों का यान भी आ गया। वह अंतरिक्ष के जीव, अपने पास ब्रह्मांड की अनोखी शक्तियां रखें हैं, कुछ ही समय बाद हमारा युद्ध शुरु हो जायेगा, मैं चाहती हूं कि ऐसी स्थिति में आप हमारा साथ दें।"

“भारत और ग्रीक देवताओं में बहुत सी समानताएं हैं, इसलिये एक बार हमने आपस में मिलकर यह चुनाव किया था कि हम कभी एक-दूसरे के कार्य में दखल नहीं देंगे। ऐसे में हम भला आपकी ओर से उन अंतरिक्ष के जीवों से क्यों लड़ें? हम तो उनसे मित्रता करके अपनी शक्तियों को और बढ़ा सकते हैं और हम भला ये कैसे भूल सकते हैं कि इससे पहले हमारे युद्ध में भी किसी भारतीय देवता ने हमारा साथ नहीं दिया था।” जीयूष ने कहा।

“मैं जानती थी कि आप हमारा साथ नहीं देंगे। भले ही वह अंतरिक्ष के जीव पूरी पृथ्वी को ही क्यों ना समाप्त कर दें? अरे जब पृथ्वी ही नहीं रहेगी, तो आपको देवता कौन कहेगा?" माया ने कहा- “कोई बात नहीं, हम स्वयं ही उन जीवों को समाप्त करने में सक्षम हैं। हम बस ये चाहते हैं, कि अगर आप हमारा साथ ना दें, तो आप उन अंतरिक्ष के जीवों का भी साथ ना दें।"

पर इससे पहले कि जीयूष कोई फैसला ले पाते, एरस अपने स्थान पर खड़ा हो गया और होता भी क्यों ना? आखिर वह युद्ध का देवता जो था।

"तुम इस प्रकार हमारी राजसभा में आकर हमें ही आज्ञा नहीं दे सकती।” एरस ने गुस्साते हुए कहा "लगता है कि तुम्हें हमारी राजसभा के नियम भी नहीं पता।"

"हमने आपकी राजसभा के नियम देख लिये हैं, परंतु जब आपके राजा से बात हो रही है, तो आप को भी बीच में आने का कोई अधिकार नहीं है?" वारुणि ने गुस्से में कहा।

“लगता है कि तुम लोग बिना शक्ति दिखाये नहीं मानोगे।” एरस ने गुस्से से कहा और अपने हाथों को वारुणि की ओर उठाया।

“हम युद्ध की शुरुआत नहीं करना चाहते, पर अगर तुम्हें युद्ध की ही भाषा समझ में आती है, तो फिर यही ठीक है।" अब वारुणि के हाथ में भी अस्त्र नजर आने लगा।

"रुक जाओ सब लोग।" माया ने चीखकर कहा “देवता जीयूष, शायद आपको पता नहीं है कि कैस्पर आपका ही पौत्र है।" माया की बात सुनकर वहां बैठे सभी लोग हैरान हो गये।

“यह आप क्या कह रही हो माँ?" माया के इस रहस्योद्घाटन से कैस्पर भी चकित हो गया।

“मैं सत्य कह रही हूं जीयूष।.... आपको मेरोन और सोफिया तो याद ही होगें।"

माया के इतना कहते ही, पोसाईडन अपने स्थान से खड़ा हो गया और कैस्पर की ओर अपना त्रिशूल उठाकर तान दिया।

पोसाईडन को ऐसा करते देख कैस्पर ने अपनी शक्ति से पोसाईडन के चारो ओर एक विशाल हीरा उत्पन्न कर दिया, जिसकी दीवारें ऊर्जा से निर्मित थीं।

अब पोसाईडन पूरी तरह से उस हीरे के अंदर फंस गया था।

“मैं आप लोगों के लिये शांति का प्रस्ताव लायी थी, पर ऐसा नहीं है कि हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते। हम कमजोर नहीं हैं जीयूष ना विश्वास हो तो मेरी शक्तियों को याद कर लो, इसी नन्हें कैस्पर के ऊपर, आपने बचपन में अपने थंडरबोल्ट का वार किया था ना....? फिर यह बच कैसे गया? और पोसाईडन तुम...तुमने भी तो ‘नाइट ओशन' जहाज को पूरा पलट दिया था, फिर भी कैस्पर और इसके माता-पिता कैसे बच गये? ये कभी सोचने की कोशिश की? 20,000 वर्षों से मैं तुम्हारे ही क्षेत्र में, तुम्हारे ही समुद्र में रहती हूं। आज तक जान पाये क्या? अरे तुम तो इस कैस्पर के बनाये, माया महल की सुरक्षा भी नहीं भेद पाये थे।"

माया के इतना बोलते ही जीयूष को कैस्पर के बचपन की घटना याद आ गई, यह सुन एरस, कैस्पर की ओर बढ़ा, तभी वारुणि ने अपनी वायु शक्ति से भंवर बनाकर, एरस को उसमें फंसा दिया।

यह देख हेरा के हाथ से 2 जहरीले सर्प निकलकर माया की ओर झपटे और उन्होंने माया के शरीर पर काट लिया, पर देखते ही देखते वह दोनों सर्प वहीं पिघलकर मर गये।

“ये बच्चों के खेल मुझ पर मत आजमाओ देवी हेरा, हम बचपन से ही इन जीवों से खेलते आये हैं और अगर मैंने अपना जहर यहां उगल दिया, तो ओलंपस पर्वत पर मौजूद आपका यह पूरा महल पिघल जायेगा।” माया ने क्रोधित होते हुए कहा।

तभी इतनी देर से शांत बैठा अपोलो अपने स्थान पर खड़ा हो गया। अपोलो ने अपने पैर को जमीन पर पटका, अपोलो की शक्ति से पूरा ओलंपस पर्वत कांप उठा।

मगर इससे पहले कि कोई कुछ और कर पाता, कि तभी महल की छत तोड़ता हुआ, हनुका सभागार में आकर कूदा।

आते ही उसने अपोलो के पैर पर गुरुत्व शक्ति का वार कर दिया। अब अपोलो का पैर जमीन पर चिपक सा गया। अब वह पूरी शक्ति लगाकर भी अपना पैर नहीं छुड़ा पा रहा था।

तभी एथेना गुस्से से अपने स्थान से खड़ी हो गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, तभी सभागार के दरवाजे से सर्पकन्या यूरेल और स्थेनो प्रकट हो गईं।

यूरेल और स्थेनों को देखकर सभी ने तुरंत अपनी नजरें नीचे कर लीं, नहीं तो सबको पत्थर का बन जाना था।

यूरेल और स्थेनो को वहां देख एथेना भय से थोड़ा पीछे हो गई क्यों कि उन दोनों के इस रुप के पीछे एथेना ही तो जिम्मेदार थी। उसी ने श्राप देकर तीनों बहनों को ऐसा बनाया था।

तभी माया फिर से बोल उठी- “देवता जीयूष, मैं फिर आपसे विनम्र निवेदन करती हूं कि आप हमारी बात को मानिये। हम यहां युद्ध करने नहीं बल्कि युद्ध को रोकने आये हैं। हम चाहते हैं कि आप उन अंतरिक्ष के जीवों का साथ ना दें बस.... इससे ज्यादा तो हमने आपसे कुछ नहीं कहा...फिर भला आप इतनी छोटी सी बात पर मान क्यों नहीं रहे?...जरा देखिये.....अपने पौत्र कैस्पर को...मैंने उसे कितनी विलक्षण शक्तियां दी हैं आगे चलकर वह आपका ही नाम रौशन करेगा। आप इस बात को समझने की कोशिश करिये और आप देवता पोसाईडन....उन अंतरिक्ष के जीवों ने आपके तो पूरे समुद्र को विषाक्त कर दिया है, सभी समुद्री जीव या तो मर रहे हैं या फिर विकृत हो रहे हैं और आप उन्हीं का साथ देना चाहते हैं।"

इस बार माया के शब्दों ने सभी पर गहरा असर किया था। अब जीयूष ने एक-एक कर सभी ओलंपियन देवता की ओर देखा और सभी की सहमति देख, शांत होकर अपने सिंहासन पर बैठ गये।

अब कैस्पर ने पोसाईडन के चारो ओर बना वह हीरा गायब कर दिया और हनुका ने अपोलो को गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुक्त कर दिया।

वारुणि ने भी अब एरस के पास बनी भंवर को हटा लिया। एरस, वारुणि को घूरता हुआ अपने सिंहासन पर जा बैठा।

माया ने स्थेनो और यूरेल को भी वहां से जाने का इशारा किया। उन दोनों के जाने के बाद जीयूष ने सबसे पहले सभी को बैठने के लिये कहा।

जो भी हो, अब वहां का वातावरण पूरी तरह से शांत था।

“ठीक है देवी माया, हममें से कोई आप दोनों के इस युद्ध में अब किसी भी ओर से भाग नहीं लेगा, यह मेरा आपसे वचन है।” जीयूष ने कहा और फिर प्यार से कैस्पर के सिर पर हाथ फेरा, शायद उनका पौत्र प्रेम अब जाग गया था।

जीयूष को ऐसा करते देख 'हेरा' थोड़ा सा कसमसाई, पर उसने कुछ कहा नहीं। कुछ भी हो हेरा कभी भी जीयूष के अन्य पुत्रों को पसंद नहीं करती थी।

“पिताजी, शायद इन्हीं लोगों ने मेरी मेलाइट को मुझसे छीना है।” आर्टेमिस ने फिर से खड़े होते हुए कहा “आप इनसे कहो कि कम से कम एक बार वह मुझे उससे मिलने दें, मैं देखना चाहती हूं कि वह खुश है या नहीं ?"

“वह पूरी तरह से खुश है।” हनुका ने मेलाइट की दी अंगूठी, आर्टेमिस को देते हुए कहा- “उसने आपको देने के लिये मुझे यह अंगूठी भी दी थी। कृपया इसे आप स्वीकार करें।" आर्टेमिस ने आश्चर्य से उस अंगूठी को देखते हुए हनुका के हाथों से ले लिया।

इस अंगूठी को मेलाइट को आर्टेमिस ने ही दिया था और उससे कहा था- “कि जब भी तुम्हें कोई पसंद आ जाये, तो मुझे छोड़कर उसके पास चली जाना और ऐसी स्थिति में यह अंगूठी तुम मुझे वापस कर देना। मैं समझ जाऊंगी कि तुम वहां खुश हो। यह अंगूठी तुम्हारी इच्छा के बिना कोई तुम्हारी उंगली से निकाल नहीं पायेगा।"

अब आर्टेमिस थोड़ा शांत दिखने लगी थी।

तभी माया ने एक बार फिर जीयूष को संबोधित करते हुए कहा- “अब मैं चाहती हूं कि आप कैस्पर के माता-पिता, सोफिया और मेरोन को भी अपनी कैद से आजाद कर दें।"

कैस्पर के लिये यह भी एक रहस्य से कम नहीं था। उसे लगता था कि उसके माता-पिता मर चुके हैं।

“क्षमा चाहता हूं देवी माया, पर मेरोन और सोफिया को मेरे भाई ‘हेडिस' ने 'अंडरवर्ल्ड' में बंद करके रखा है और वह मेरी बात भी नहीं मानता, इसलिये कैस्पर को वहां जाकर, उन्हें स्वयं स्वतंत्र कराना होगा। हां अगर इसे कार्य के लिये कैस्पर को किसी मदद की जरुरत हुई, तो मैं उसकी मदद जरुर करुंगा।” जीयूष ने कहा।

“ठीक है देवता जीयूष, तो अब हमें आज्ञा दीजिये, इस देवयुद्ध के बाद मैं पुनः आकर एक बार आपसे फिर मिलूंगी।" यह कहकर माया ने सभी को अपने साथ लिया और वहां से निकल गई।

जारी रहेगा_____✍️
 
#200.

रहस्यमय सनूरा: (22.01.02, मंगलवार, सीनोर महल, अराका द्वीप)

रोजर अपने कमरे में बैठा, 5 दिन पहले हुए युद्ध के बारे में सोच रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सुर्वया का कैसे शुक्रिया अदा करे? अगर उस दिन सुर्वया ने उसके प्राण नहीं बचाये होते, तो वह तो मारा गया था।

रोजर को मेलाइट का व्यक्तित्व भी समझ नहीं आ रहा था। कभी वह बहुत प्यार से बात करती, तो कभी डांटने लगती, पर जो भी हो रोजर के दिल में मेलाइट के लिये कुछ तो था, वह जब भी मेलाइट के पास होता, तो खुश हो जाता था।

रोजर को मेलाइट की शैतानियों से भी प्यार था, पर जब से उसे पता चला कि मेलाइट का संबंध देवी आर्टेमिस से है, वह मेलाइट से थोड़ा डरा-डरा सा रहता था।

फिर रोजर अपनी इस नई और अजीब सी जिंदगी के बारे में सोचने लगा कि कहां वह न्यूयार्क का रहने वाला इंसान, इस रहस्यमय द्वीप पर आ गया और उसके बाद से उसने इतनी विचित्र चीजें देखीं, कि उसका भूत-प्रेत, आत्मा, ईश्वर सब पर विश्वास हो गया।

अब वह विज्ञान की बातें छोड़, भगवान की बातें करने लगा था और करता भी क्यों ना?...कभी वह स्वयं सुनहरे मानव में परिवर्तित हो जा रहा था, तो कभी उसकी नाभि से सुनहरी रोशनी निकलने लग रही थी।

रोजर अपने ख्यालों के झंझावात में ऐसे ही उलझा था कि तभी उसके कक्ष में मेलाइट ने प्रवेश किया।

मेलाइट को अपने कक्ष में आया देख, रोजर तुरंत मेलाइट के सम्मान में अपने बिस्तर से खड़ा हो गया।

“और क्या हो रहा है रोजी? आई मीन रोजर?" मेलाइट ने आते ही रोजर को छेड़ना शुरु कर दिया- “मेरे बारे में सोच रहे हो क्या?"

रोजर, इस प्रकार मेलाइट को बोलते देख एका एक घबरा सा गया, क्यों कि सच में ही कुछ देर पहले वह मेलाइट के बारे में ही सोच रहा था।

“वो....मैं मैं... वो वो मैं...।” रोजर ने कुछ कहने की कोशिश की, पर उसके गले से मारे डर के आवाज ही नहीं निकली।

"ये क्या बकरी की तरह मैं...मैं... लगा रखा है...अरे बनना ही है, तो हिरण बनो, बकरी भी कोई जानवर होता है?” मेलाइट ने फिर से रोजर को डांटा।

“मैं इस समय अपनी जिंदगी के बारे में सोच रहा था।" रोजर ने दबे-दबे से स्वर में कहा।

“मेरे रहते अब तुम क्यों अपनी जिंदगी के बारे में सोच रहे थे?” मेलाइट ने रोजर को आँख मारते हुए कहा।

मेलाइट को आँख मारते देख रोजर सकपकाकर इधर-उधर देखने लगा।

“अच्छा ये बताओ कि वह सुनहरी रोशनी तुम्हारे शरीर से निकलना बंद हुई कि नहीं?” मेलाइट ने रोजर को घबराते देख विषय को बदलते हुए कहा।

“अभी तो बंद है, पर आप आई हो तो वह भी आ ही जायेगी।” रोजर ने पीछे वाले शब्द धीरे से बुदबुदाकर कहे।

“अच्छा रोजर, तुम ये बताओ कि तुम्हें कौन सा शहर पसंद है?” मेलाइट ने रोजर के बिस्तर पर बैठते हुए पूछा।

“कोई भी शहर हो, बस जंगल ना हो....मुझे जंगल बिल्कुल पसंद नहीं।” मेलाइट को अपने बिस्तर पर बैठते देख, रोजर अपने बिस्तर से उठकर, सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया।

"तुम्हारी पसंद या ना पसंद से क्या होता है? अब तो ईश्वर ने तुम्हारी जिंदगी में जंगल और हिरणी ही लिखा है।” मेलाइट ने अपने मन में कहा।

तभी वहां सुर्वया और सनूरा भी आ गये।

“ये दोनों लोग अकेले-अकेले क्या कर रहे हो?" सुर्वया ने मुस्कुराते हुए मेलाइट की ओर देखा।

“ये कहां कुछ कर रहा है? जो भी कर रही हूं, मैं ही कर रही हूं।” मेलाइट ने भी सुर्वया को देख मुस्कुराकर कहा।

सुर्वया एक पल में मेलाइट का मतलब समझ गई, पर उसने रोजर के सामने कुछ कहा नहीं।

अब सुर्वया और सनूरा भी किसी पक्की सहेलियों की तरह, मेलाइट के साथ बिस्तर पर बैठ गईं।

“मैं बाहर जाऊं क्या?" सभी को आराम से बैठा देखकर रोजर ने पूछ लिया।

“क्यों, तुम्हें क्यों बाहर जाना है?” मेलाइट ने रोजर को घूरते हुए पूछा।

“अरे, आप लोग जब एक साथ होते हो, तो मुझे वहां कहां बैठाते हो?” रोजर ने किसी छोटे बच्चे की तरह से कंप्लेन करते हुए कहा।

यह बात सुन तीनों ने आपस में एक दूसरे की ओर देखा और फिर तीनों जोर से हंस दीं। उन्हें हंसता हुआ देख अब रोजर और ज्यादा नर्वस दिखाई देने लगा।

“अरे नहीं नहीं रोजर, ऐसी कोई बात नहीं है, वह बस मेलाइट तुम्हारे साथ कुछ ज्यादा ही मजाक करती है बस....।” सनूरा ने कहा- “पर आज से हम सभी ध्यान रखेंगे कि बात करते समय तुम्हें भी बुला लिया करेंगे।"

सनूरा की बात सुन, रोजर ने डरते-डरते मेलाइट की ओर देखा, पर मेलाइट से नजर मिलते ही मेलाइट ने फिर नाक सिकोड़ कर रोजर को चिढ़ाया।

पर इस बार रोजर घबराने की जगह मुस्कुराने लगा। उसे मुस्कुराता देख मेलाइट के चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कुराहट आ गई।

तभी सुर्वया ने सनूरा से कहा- “अरे याद आया सनूरा, उस दिन तुम अपनी कहानी सुनाने जा रही थी? फिर महल पर हमला होने की वजह से तुम उठकर चली गई थी तो अगर तुम चाहो, तो इस समय अपनी कहानी सुना सकती हो?"

यह सुन मेलाइट भी पालथी मारकर बिस्तर पर बैठ गई और सनूरा की ओर देखने लगी।

“ठीक है, मैं सुनाती हूं अपनी कहानी।” यह कहकर सनूरा ने अपनी कहानी को सुनाना शुरु कर दिया- “यह आज से लगभग 600 वर्ष पहले की बात है, उस समय मैं मात्र 18 वर्ष की थी।"

"600 वर्ष पहले 18 वर्ष की थी।” रोजर ने अपनी आँखें फाड़ते हुए कहा- “तो अभी आपकी उम्र उप्स...सॉरी माफ कर दीजिये...मैं भूल गया था कि किसी लड़की से उसकी उम्र नहीं पूछी जाती?"

"ओए उप्स...यहां हम सबमें सनूरा ही सबसे छोटी है और भूलकर भी हम लोगों से हमारी उम्र के बारे में पूछना भी मत।” मेलाइट ने नकली का गुस्सा दिखाते हुए रोजर से कहा- “हां सनूरा आप कहानी को जारी रखिये।"

मेलाइट की बात सुन सनूरा ने फिर से बोलना शुरु कर दिया- “सभी अराका वासियों की औसत उम्र 800 वर्ष की होती है।....हां तो मैं कह रही थी कि मेरे माता पिता बचपन में ही गुजर गये थे, इसलिये मेरा पालन पोषण मेरे चाचा ने किया था। एक दिन मैं सीनोर के जंगल में अकेले ही विचरण कर रही थी कि तभी मैंने देखा, कि कुछ जंगली कुत्ते एक छोटी सी बिल्ली पर हमला कर रहे हैं। मुझसे उन कुत्तों का यह व्यवहार देखा नहीं गया। इसलिये मैंने अपने पास पड़े पत्थरों को उठाकर उन कुत्तों पर मारना शुरु कर दिया। कुत्ते मेरे हमले से डरकर भाग गये।

"कुत्तों के जाने के बाद, मैंने उस बिल्ली को अपने हाथ में उठा लिया। वह बिल्ली कुत्तों के हमले से जख्मी हो गई थी, इसलिये मैंने जंगल से कुछ औषधि ढूंढकर उसे बिल्ली के जख्मों पर लगा दिया। मैं जब उस बिल्ली को हाथ में लेकर जंगल से बाहर निकली, तो उसी समय मुझे सीनोर के राजा मुफासा दिखाई दिये। मुफासा ने मेरे हाथ में थमी बिल्ली को मुझसे ले लिया। बाद में मुझे पता चला कि वह राजा मुफासा की पालतू और सबसे प्यारी बिल्ली थी।

“मुफासा मेरे द्वारा बिल्ली की जान बचाने से अत्यंत प्रसन्न हो गये। उन्होंने मुझसे मेरे माता-पिता के बारे में पूछा, तो मैंने उन्हें बता दिया कि मेरे माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। राजा मुफासा मुझे लेकर सीनोर महल आ गये। उन्होंने मुझे वहीं रहने को कहा। मेरे लिये एकदम से झोपड़ी से निकलकर महलों में आना एक अलग अनुभव था।

"उस समय के सीनोर के कानून के हिसाब से राजा मुफासा को 600 वर्षों तक सीनोर पर राज्य करना था, इन 600 वर्षों में राजा अपना पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकते थे। इसलिये राजा मुफासा मुझे अपनी बेटी की तरह से रखने लगे। कुछ ही दिन में मैं उनकी सबसे चहेती बन गई। उस समय मुझे युद्धाभ्यास देखने का बहुत शौक था, इसलिये मैं छिप-छिपकर सैनिकों का युद्धाभ्यास देखती और बाद में अपने कमरे में आकर, छिपकर अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखने लगी।

"एक दिन राजा मुफासा ने मुझे तलवार चलाते देख लिया। वह मेरी शस्त्रकला से बहुत प्रभावित हो गये। उन्होंने कहा कि 1 महीने के बाद सीनोर के नये सेनापति का चुनाव होना है, तो अगर मैं चाहूं तो उसमें भाग ले सकती हूं। परंतु सेनापति के उस चुनाव के लिये, एक प्रतियोगिता का आयोजन होना था, जिसमें एक विशाल भालू को सिर्फ तलवार व भालों की मदद से मारना था। वह भालू बहुत ही खतरनाक था और अब तक सैकड़ों लोगों को मार चुका था। मैंने राजा मुफासा का मेरे प्रतिविश्वास देखकर, एक महीने तक अलग-अलग प्रकार से दिन रात तलवार और भाले का अभ्यास किया। आखिरकार प्रतियोगिता का वह दिन भी आ गया।

“महल के विशाल क्रीड़ास्थल पर प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। मुझसे पहले लगभग 12 सीनोर के बलशाली योद्वाओं ने उस भालू को मारने का प्रयास किया। पर एक-एक कर वह सभी उस खतरनाक भालू के द्वारा मारे गये। अब मेरा नंबर था। मुफासा क्रीड़ा स्थल के सबसे ऊंचे स्थान पर बैठकर मेरा युद्ध देख रहे थे। मैंने अपने भाले से भालू पर हमला कर दिया। हम दोनों का युद्ध लगभग आधा घंटा तक चला। मैं और भालू दोनों ही बुरी तरह से जख्मी हो गये थे, पर दोनों ही हार मानने को तैयार नहीं थे।

"अंततः जब मैं थककर गिर गई, तो भालू ने मुझ पर छलांग लगा दी। वह खतरनाक भालू, बस मुझ पर गिरने ही वाला था कि मैंने अपने हाथ में पकड़े भाले को खड़ा कर दिया। हवा में कूदा भालू, सीधा उस भाले के ऊपर गिरा। भाला, भालू के सिर के आरपार हो गया और वह मारा गया। भालू के मरने पर दर्शकदीर्घा में तेज शोर गूंजा, पर मैं उस शोर को सुनने के लायक नहीं थी, मैं उस समय जख्मी हालत में बेहोश हो गई थी। राजा मुफासा मुझे क्रीड़ा स्थल से वापस महल ले आये। वैद्य ने मेरे जिंदा बचने की आस छोड़ दी थी।

“इसलिये राजा मुफासा सभी को अपने कक्ष से बाहर निकालकर, एक गुप्त रास्ते के द्वारा मुझे एक बिल्ली वाली गुफा में ले गये, जहां एक बिल्ली वाली देवी की मूर्ति थी। उस मूर्ति के हाथ में एक सुनहरा पात्र था, जिसमें दिव्य जल भरा था। राजा मुफासा ने मुझे वह दिव्य जल पिला दिया। उस दिव्य जल को पीते ही मैं तुरंत सही हो गई।

"बाद में राजा मुफासा ने मुझे बताया कि वह बिल्ली वाली देवी मिश्र की कोई देवी हैं, जिनसे एक बार मुफासा मिला था, तभी देवी ने खुश होकर, वह प्रतिमा और वह सुनहरा पात्र मुफासा को दिया था। उस पात्र के अंदर उपस्थित दिव्य जल की विशेषता यह थी कि उसे पीने वाले व्यक्ति की उम्र, 50 वर्ष तक कम हो जाती। इस प्रकार वह कभी भी बूढ़ा नहीं होता। उस दिव्य जल को एक बार पीने के बाद, पात्र उसे 25 वर्षों में दोबारा भर देता था। इस दिव्य पात्र और जल के बारे में मुफासा ने आज तक किसी को नहीं बताया था और ना ही किसी को उस गुप्त रास्ते का पता था। कुछ समय के बाद उसी दिव्य जल की वजह से मुझमें बिल्ली में परिवर्तित होने की शक्तियां आ गई।

“इस प्रकार मैंने सीनोर राज्य के सेनापति का कार्यभार संभाल लिया और हर 50 वर्ष बाद, उस दिव्य जल का सेवन करते हुए, सीनोर की सेवा करती रही। सैकड़ों वर्षों के बाद जब वीनस और लुफासा का जन्म हुआ, तो एक बार महामंत्री मकोटा ने मुझे मिश्र में एक कार्य हेतु भेजा।

"जब मैं वह कार्य करके वापस लौटी, तो मुझे पता चला कि सामरा राज्य के राजा कलाट ने हमारे राजा मुफासा और रानी कागोशी को मार डाला है। बस उसके बाद से ही मैं कलाट की मृत्यु की कामना करते हुए जी रही हूं।" इतना कहकर सनूरा चुप हो गई, पर कहानी के बाद उसके चेहरे पर उदासी छा गई, शायद उसे मुफासा और कागोशी की याद आ गई थी।

“तो क्या उस दिव्य जल का सेवन लुफासा भी करता है?” मेलाइट ने सनूरा से पूछा।

"नहीं, मैंने उसे आज तक दिव्य जल के बारे में नहीं बताया और उसका सेवन करने के लिये किसी की भी उम्र कम से कम 50 वर्ष के ऊपर तो होनी ही चाहिये। जबकि लुफासा अभी मात्र 25 वर्ष का ही है। जब समय आयेगा तो मैं उसे उस दिव्य जल के बारे में बता दूंगी।” सनूरा ने कहा।

"तो फिर आपने हमें उसका रहस्य क्यों बताया?" रोजर ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“क्यों कि अब आप लोग बिल्कुल अपने से लगने लगे हो।” सनूरा ने कहा।

“बिल्कुल ठीक....3 सच्ची सहेली, 2 दोस्त और 1 पहेली।” रोजर ने धीरे से कहा, फिर भी रोजर की बात को सभी ने सुन लिया।

रोजर की बात सुन फिर सभी के मुंह से एक जोर का ठहाका फूट पड़ा। और रोजर वह तो बस पहेली को सुलझाने में लगा था।

चैपटर-9

अनोखा जादूगर: (तिलिस्मा 5.33)

शैफाली और सुयश पश्चिम दिशा की ओर निकले थे। बहुत दिनों बाद अपने आसपास इतनी भीड़ देखकर दोनों ही खुश हो रहे थे।

शैफाली की निगाह तेजी से मेले में चारो ओर घूम रही थी। तभी शैफाली को एक जगह पर काफी भीड़ दिखाई दी।

“कैप्टेन अंकल, उस ओर काफी ज्यादा भीड़ दिखाई दे रही है। मुझे लगता है कि हमें उधर चलकर देखना चाहिये।” शैफाली ने सुयश को भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा।

सुयश ने धीरे से सिर हिलाया और शैफाली के साथ, भीड़ की ओर बढ़ गया। भीड़ को चीरते हुए दोनों आगे की ओर आ गये।

आगे एक बड़ा सा टेंट लगा था, जिस पर एक काला मोती बना था।

काला मोती के बगल एक जादूगर की तस्वीर बनी थी। पूरी भीड़ उसी जादूगर का जादू देखने के लिये भीड़ लगाये हुई थी।

“कैप्टेन अंकल, मुझे लगता है कि हमें इस जादूगर का जादू देखना चाहिये? क्यों कि यहां पर काला मोती का फोटो भी बना है। कैश्वर ने जरुर यहां कुछ विशेष बना रखा होगा?" शैफाली ने ने कहा।

“तुम ठीक कह रही हो शैफाली। मुझे भी यह जगह कुछ रहस्यमई सी लग रही है? हमें एक बार अंदर चलना ही होगा।” सुयश ने शैफाली की ओर देखते हुए कहा।

यह कहकर सुयश ने शैफाली का हाथ पकड़ा और शैफाली को लेकर टेंट के अंदर प्रवेश कर गया।

अंदर से टेंट बहुत विशाल था। टेंट में आगे की ओर एक बड़ा सा स्टेज बना था। सुयश को आगे की तीसरी लाइन में 2 कुर्सियां खाली दिखाई दीं। वह शैफाली को लेकर उन्हीं कुर्सियों पर जाकर बैठ गया।

यह जगह बिल्कुल किसी मेले में लगाए गए जादूगर के शो की ही तरह लग रही थी। उसे देखकर ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था, कि यह जगह तिलिस्मा के अंदर की है।

कुछ ही देर में एक तेज आवाज के साथ एक जादूगर स्टेज पर प्रकट हुआ।

जादूगर के शरीर पर एक लाल और काले रंग की ड्रेस थी। उसके सिर पर भी जादूगरों की भांति ही एक बड़ी सी टोपी थी।

कुछ देर हल्के-फुल्के जादू दिखाने के बाद, जादूगर ने स्टेज पर एक बड़ा सा काला मोती मंगवाया।

काला मोती एक छोटे से प्लेटफार्म पर था, जिसमें पहिये लगे थे।

"दोस्तों अब मैं आपके सामने पेश करने जा रहा हूं, अपने जादू का एक महान खेल, जो आपको अवश्य ही पसंद आयेगा।” जादूगर ने कहा- “पर उसके लिये मुझे आप लोगों में से एक दर्शक की जरुरत है।' यह कहकर जादूगर ने चारो ओर देखा और शैफाली की ओर इशारा करते हुए उसे स्टेज पर आने को कहा।

शैफाली अपनी जगह से खड़ी हुई। तभी सुयश ने शैफाली का हाथ दबा कर उसे सतर्क रहने का इशारा किया। अब शैफाली स्टेज पर खड़े जादूगर के सामने पहुंच गई।

“आपका नाम क्या है बच्ची?” जादूगर ने शैफाली से पूछा।

“शैफाली।"

"तो दोस्तों अब शुरु करते हैं, जादू का यह खेल।' यह कहकर जादूगर ने शैफाली को अपनी आँख बंद करने को कहा। शैफाली ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

तभी शैफाली को अपने आसपास कुछ शोर की आवाजें सुनाई दीं, शैफाली ने घबराकर अपनी आँखें खोल दीं।

आँखें खोलते ही शैफाली घबरा गई, इस समय वह एक कमरे में थी, जो कि तेजी से हिल-डुल रहा था।

“यह कौन सी जगह है? और मैं यहां कैसे आ पहुंची?" शैफाली ने अजीब सी निगाहों से कमरे के चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी शैफाली को कमरे में रखी एक टेबल पर एक फोटो दिखाई दी, जिसमें वह 1 आदमी और 1 औरत के साथ खड़ी थी।

अब शैफाली के दिमाग को एक झटका लगा “क्या क्या ये मेरे मॉम-डैड हैं?" तभी दूसरे कमरे से एक औरत तेजी से निकलकर उस कमरे में आई।

“ये क्या शैफाली, तुमने अभी तक लाइफ जैकेट नहीं पहनी? क्या तुम्हें पता नहीं कि ‘सुप्रीम’ डूबने वाला है? चलो जल्दी करो।" यह कहकर मारथा, वहां पड़ा एक लाइफ जैकेट शैफाली को पहनाने लगी।.... पर शैफाली तो सिर्फ डबडबाई आँखों से मारथा को ही निहार रही थी।

एक पल में ही शैफाली को समझ आ गया कि इस समय वह कहां है? वह तेजी से मारथा से लिपट गई

'मॉमऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ।"

मारथ को लगा कि शैफाली डर की वजह से ऐसे कर रही है, इसलिये उसने भी शैफाली को कसकर अपने शरीर से चिपका लिया।

"डर मत मेरी बच्ची, तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम्हारे पापा गए हैं और लाइफ जैकेट लाने के लिये। वो बस आते ही होंगे।” मारथा ने भरी-भरी आँखों से कहा- “तुम तो बहुत बहादुर और टैलेंटेड हो। देखना एक दिन तुम हमारा नाम बहुत रोशन करोगी, मुझे पता है। बस तुम ये गणित के चक्कर में अपने दिमाग पर ज्यादा जोर मत डाला करो।

शैफाली ने फिर से मारथा का चेहरा देखा और उसके चेहरे को बेतहाशा चूमने लगी।

“अरे-अरे ये ब्रूनो जैसी हरकत क्यों कर रही हो?" मारथा ने शैफाली के चेहरे पर ढुलक आये आँसुओं को पोंछते हुए कहा।

“ब्रूनो....ब्रूनो कहां है मॉम?” मारथा के शब्द सुन, शैफाली को अचानक से ब्रूनो की याद आ गई।

“वह तुम्हारे डैड के साथ बाहर गया है, वह बस आते ही होंगे।” अभी मारथा ने इतना ही कहा था कि तभी एक तेज बिजली गिरने की आवाज सुनाई दी।

शायद वह बिजली सुप्रीम के ही किसी भाग में गिरी थी। एक पल के लिये सुप्रीम पूरा का पूरा डगमगा गया।

बिजली की तेज आवाज सुन मारथा ने शैफाली को फिर से अपनी बाहों में भर लिया- “हे मेरे ईश्वर....हम सबकी रक्षा करना।"

“मुझे कुछ नहीं होगा मॉम, मुझको लेकर आप बिल्कुल भी मत घबराइये।” शैफाली ने मारथा को देखते हुए कहा- “देखिये, अब तो मुझे दिखाई भी देने लगा है। मैं आपको देख सकती हूं मॉम।"

शैफाली की बात सुन मारथा आश्चर्य से शैफाली को देखने लगी।

“यह कैसे संभव हुआ?” अब मारथा सबकुछ छोड़ बस शैफाली की आँख को ही देख रही थी।

“बहुत लंबी कहानी है मॉम। बाद में बताऊंगी, पर पहले यहां से बचने के बारे में सोचते हैं।” यह कह शैफाली अपने आसपास मौजूद सामान को देखने लगी।

तभी ‘धड़ाक' की आवाज के साथ कमरे का दरवाजा खुला और माइकल व ब्रूनो कमरे के अंदर दाखिल हुए। ब्रूनो सीधे आकर शैफाली से लिपट गया और उसे गिराकर उसका मुंह चाटने लगा।

शैफाली भी ब्रूनो से कसकर लिपट गई।

“ये इन दोनों को क्या हो गया? यह तो ऐसे मिल रहे हैं, जैसे कि वर्षों बाद मिलें हों, जबकि अभी कुछ देर पहले ही साथ में थे।” माइकल ने मारथा को देखते हुए कहा।

“उन दोनों को छोड़ो, पहले ये बताओ कि और लाइफ जैकेट नहीं मिले क्या?” मारथा ने माइकल से पूछा।

“नहीं...चारो ओर भगदड़ मची हुई है। कोई किसी की सुन नहीं रहा? सब बस अपनी जान बचाने के पीछे लगे हैं।” माइकल ने अपना चेहरा झुकाते हुए कहा- सुप्रीम अब नहीं बचेगा। वह कई जगह से क्षतिग्रस्त भी हो गया है।...पर तुम चिंता ना करो, मैं तुम लोगों को बचाने के लिये कुछ ना कुछ करता हूं।" यह कहकर माइकल कमरे में रखे सामान को देखने लगा। उसकी नजर अब अपने हार्स पोलो खेलने वाले डिब्बे पर थी।

(हार्स पोलोः एक तरह का गेम, जिसमें घोड़े पर बैठकर हॉकी जैसी स्टिक से पोलो खेला जाता है।)

माइकल ने बिना देर किये उस डिब्बे के सामान को वहीं कमरे में पलट दिया। उस डिब्बे में घोड़े की रकाब, रस्सी और अन्य घुड़सवारी के सामान थे। माइकल ने जल्दी-जल्दी कुछ सामान को उठाया और मारथा व शैफाली का हाथ पकड़ जहाज के डेक की ओर भागा। ब्रूनो उनके पीछे-पीछे ही था।

शैफाली तो सबकुछ छोड़ बस माइकल के हाथ को देख रही थी। वह चाहती थी काश कुछ देर के लिये समय यहीं रुक जाये।

पर समय भला कब किसी के लिये रुका है? वह तो सदैव गतिमान रहना ही अपनी श्रेष्ठता समझता है।

अब सभी भागकर सुप्रीम के डेक पर पहुंच गये। तभी सुप्रीम का एक बड़ा सा हिस्सा टूटकर समुद्र में जा गिरा। इस हिस्से के टूटने से सुप्रीम को एक तेज झटका भी लगा था।

तभी माइकल को पानी में तैर रहा लकड़ी का एक बड़ा सा तख्ता दिखाई दिया। उधर सुप्रीम के डेक पर लगी आग धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी। समय बहुत कम था।

माइकल ने पीछे से आ रही आग को देखा और बिना देर किये, शैफाली के हाथ में रस्सी और कुछ सामान पकड़कर, उसे समुद्र की ओर धक्का दे दिया। शैफाली को पानी में गिरते देख, ब्रूनो ने भी पानी में छलांग लगा दी।

शैफाली का पूरा शरीर हवा में था। यह देख शैफाली के मुंह से बहुत तेज आवाज निकली- “मां !"

शायद शैफाली 'मॉम' बोलना चाहती थी, पर मुंह में पानी चले जाने से उसके मुंह से सिर्फ 'मां' शब्द ही निकला।

पर इस 'मां' शब्द ने वहां से हजारों किलोमीटर दूर, तपस्या में लीन माया की आँखें खोल दी थी।

जारी रहेगा_____✍️
 
तो देवियों और सज्जनो, जैसा की मैंने कहा था की आज hi 200 व अपडेट पोस्ट करूँगा, सो कर दिया है, सो प्लीज don't फॉरगेट तो गिव लाइक्स एंड कमैंट्स :प्रे:
 
कब से स्टार्ट कर रहा है? Bill gates ?
 
:writing:Agla अपडेट मंडे को
 
अगल अपडेट अभी :डिक्लेअर:
 
#201.

उधर शैफाली पानी के अंदर डूबती जा रही थी, पता नहीं क्यों वह पानी में ठीक से तैर नहीं पा रही थी?

शैफाली को लगा कि शायद अब वह जीवित नहीं बचेगी, कि तभी शैफाली को पानी में एक बड़ा सा साया दिखाई दिया, जो तेजी से उसकी ओर ही आ रहा था।

एक पल में शैफाली ने उस साये को पहचान लिया, वह डेंगो था। विशाल डेंगो.... मैग्ना की सवारी डेंगो।

डेंगो ने शैफाली के शरीर को उठाया और उसे लकड़ी के तख्ते पर चढ़ा दिया।

शैफाली अपनी आँखें खोलकर डेंगो को देख रही थी। तभी एका एक डेंगो का आकार बदल गया। अब वह ब्रूनो के रुप में नजर आने लगा था।

ब्रूनो अब शैफाली के तख्ते को खींचकर डूब रहे सुप्रीम से दूर ले जाने लगा। तभी शैफाली की नजर अपने हाथ पर गई। उसके हाथ में घोड़े की रकाब और रस्सी नजर आ रही थी।

अब अचानक शैफाली को तिलिस्मा का द्वार याद आ गया। तभी एक तेज गड़गड़ाहट की आवाज के साथ सुप्रीम वहीं पानी में डूब गया।

तेज गड़गड़ाहट से शैफाली ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

शैफाली ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो उसे वह गड़गड़ाहट की आवाज तालियों की दिखी, जो कि जादूगर के जादू से खुश होकर वहां बैठे लोग बजा रहे थे। शैफाली यह देखकर हैरान रह गई।

तभी उसकी नजर अपने हाथ में थमी रस्सी और घोड़े की रकाब की ओर गई।

“उम्मीद करता हूं शैफाली, कि तुम्हें मेरे जादू से बहुत मजा आया

होगा?” यह कहकर जादूगर ने शैफाली को अपनी कुर्सी की ओर जाने का इशारा किया।

शैफाली, रकाब और रस्सी को उठाये अपनी कुर्सी की ओर बढ़ गई, पर इस समय उसके दिमाग में बहुत उथल-पुथल चल रही थी।

“क्या उसने जो कुछ भी अभी देखा, वह सब असली था? क्या ब्रूनो ही डेंगो था? क्या माइकल और मारथा मर गये या फिर वह जिंदा थे?” ऐसे ही ना जाने कितने प्रश्न शैफाली के दिमाग में घूम रहे थे। शैफाली अब सुयश के पास आकर बैठ गई थी।

“यह घोड़े की रकाब और रस्सी तुम्हें कहां से मिली?” सुयश ने शैफाली के हाथ में पकड़ी वस्तुओं को आश्चर्य से देखते हुए कहा।

शैफाली ने धीरे-धीरे सुयश को पूरी कहानी सुना दी।

सुप्रीम की बात सुन तो एक बार सुयश भी विचलित हो गया, पर तुरंत ही उसने स्वयं को नियंत्रित कर लिया, लेकिन शैफाली की बातें सुनकर सुयश भी हैरान हो गया था।

जादूगर को शो अब खत्म हो चुका था। भीड़ के साथ-साथ अब सुयश और शैफाली भी उस टेंट से बाहर आ गये।

चूंकि उन्हें दोनों चीजें मिल गई थीं, इसलिये वह दोनों अब वापस उस स्थान की ओर चल पड़े, जहां से निकलकर वह इस मेले में आये थे।

सुयश और शैफाली जब उस स्थान पर पहुंचे, तो क्रिस्टी और जेनिथ पहले से ही उस जगह पर खड़े थे।

पर उन दोनों के लटके चेहरे देख सुयश समझ गया कि अवश्य ही कोई गड़बड़ हुई है।

तभी सुयश का ध्यान ऐलेक्स और तौफीक की ओर गया, उन्हें वहां ना देख सुयश ने घबराकर पूछा।

“ये ऐलेक्स और तौफीक कहां हैं? कहीं दिखाई नहीं दे रहे?” सुयश ने घबराए हुए शब्दों में पूछा।

सुयश की बात सुन क्रिस्टी और जेनिथ ने पूरी कहानी सुयश और शैफाली को सुना दी। दोनों की कहानी सुन एक पल के लिये सुयश और शैफाली के कदमों तले से जमीन निकल गई।

क्रिस्टी की आँखें तो रो-रोकर लाल हो गईं थीं।

“यह तो बहुत बुरा हुआ।” सुयश ने अपना सिर झुकाते हुए कहा- “मुझे लग रहा था कि वह दोनों हमारे साथ ही तिलिस्मा तोड़कर ही बाहर निकलेंगे।"

ऐलेक्स और तौफीक की मौत की खबर सुनकर शैफाली की आंखों से भी आंसू निकलने लगे।

उसे रोता देख जेनिथ ने उसे अपने गले से लगा लिया। पर इस समय उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि वह शैफाली से क्या कहे?

काफी देर तक यही हालात बने रहे, फिर सभी अपनी जगह पर शांत होकर खड़े हो गये।

“अब सबकी बातें समाप्त हो गई हों, तो जरा मुझ पर भी ध्यान दे लीजिये।” हवा में घूम रही सुनहरी रेत ने कहा।

सभी की बातों के चक्कर में क्रिस्टी उस हवा में घूम रही रेत को तो भूल ही गई थी, जो कि उसकी पेंसिल से बाहर निकली थी।

अब क्रिस्टी ने जल्दी-जल्दी सुयश को उस सुनहरी रेत की कहानी सुना दी।

पूरी कहानी सुनने के बाद सुयश पलटकर हवा में घूम रही उस सुनहरी रेत को देखने लगा।

“आप कौन हो? उस पेंसिल की रेत में क्या कर रहे थे? और मुझे कैसे जानते हो?” सुयश ने आश्चर्य से हवा में घूम रही, उस रेत को देखते हुए कहा।

“मुझे अपने बारे में आपको कुछ बताने की जरुरत नहीं पड़ेगी? आप सबकुछ अपने आप समझ जाओगे दोस्त। लेकिन उससे पहले आप मुझे, इस रेत को आपके शरीर में मिलाने की आज्ञा दीजिये?" रेत ने कहा।

“मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं कि आप क्या कह रहे हो? और जब तक मैं इस रेत के बारे में जानूंगा नहीं, तब तक आपको आज्ञा कैसे दे सकता हूं? मेरा मतलब कि मुझे पता होना चाहिये कि इस रेत में आखिर है क्या? और यह तुम मेरे शरीर में क्यों मिलाना चाहते हो?" सुयश के चेहरे पर इस समय ना समझने वाले भाव थे।

“ये आपकी ही स्मृतियां हैं आर्यन। जिसे आपने मुझे आज ही के लिये संभाल कर रखने को कहा था।' रेत ने कहा- “मैं जैसे ही यह स्मृतियां आपके शरीर में मिलाऊंगा? आपको स्वयमेव ही सबकुछ याद आ जायेगा।

रेत की बात सुन सुयश कुछ देर तक सोचता रहा और फिर बोल उठा- “ठीक है मैं आपको आज्ञा देता हूं इस रेत को अपने शरीर में मिलाने की।"

सुयश की बात सुनते ही रेत हवा में तेजी से नाचने लगी और धीरे-धीरे सुयश के शरीर में प्रवेश कर गई।

जैसे ही रेत ने सुयश के शरीर में प्रवेश किया, सुयश के शरीर के आसपास एक तेज चमक बिखर गई। सुयश को अपने दिमाग में अनगिनत आवाजें सुनाई देने लगीं।

लगभग 1 मिनट तक सुयश का हाल ऐसे ही रहा, फिर वह धीरे-धीरे नार्मल होने लगा। अब सुयश के चेहरे पर प्रकाश सा तेज दिखाई देने लगा था।

तभी उसके मुंह से एक शब्द निकला "इद्रांक्ष।"

“आपने बिल्कुल सही पहचाना।” हवा में वही रेत वाली आवाज उभरी।

“अब कोई हमें भी बता दो, कि यह क्या हो रहा है?" शैफाली ने कहा।

“मुझे आर्यन की सभी स्मृतियां और शक्तियां प्राप्त हो गईं शैफाली।” सुयश ने कहा- “दरअसल यह जो दिखाई नहीं दे रहा है, इसका नाम इद्रांक्ष है। यह एक यक्ष है, जिसे मुझे मारने के लिये देवराज इंद्र ने तब भेजा था, जब मैं ब्रह्मकलश लेने के लिये जा रहा था। पर कुछ परिस्थितियों के बदल जाने के बाद, यह मेरा दोस्त बन गया था और मेरे साथ ही रहने लगा था। जब मैंने आर्यन के रुप में अपने प्राण त्यागने के बारे में सोचा, तो मुझे भविष्य के बारे में जानने की इच्छा हुई। ब्रह्मदेव के वरदान स्वरुप मैं एक बार कभी भी भविष्य को देख सकता था। मैंने उसी शक्ति का प्रयोग कर भविष्य को देखा, जिसमें मुझे सुयश दिखाई

दिया, जो कि मेरा ही स्वरुप था। मुझे पता था कि मैं दूसरे जन्म में अपनी उन शक्तियों का प्रयोग नहीं कर पाता क्यों कि मुझे कुछ याद ही नहीं रहता? इसलिये मैंने अपनी स्मृतियों की सुरक्षा का भार इद्रांक्ष के कंधों पर डाला। इद्रांक्ष ने मेरे मरने के बाद मेरी स्मृतियों को, भूमि की रेत से खींचकर इस काँच की पेंसिल में डाल दिया और स्वयं इसकी रक्षा करने लगा। इद्रांक्ष को जब तक कोई उस पेंसिल से स्वतंत्र नहीं करता, तब तक यह मुझे स्मृतियां वापस नहीं कर सकता था।" यह कहकर सुयश चुप हो गया।

“अगर यह आपका दोस्त था, तो उस दिन रेत मानव बनकर हम पर हमला क्यों कर रहा था?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“वह रेत मानव मैं नहीं था, वह मेरी शक्तियों से बना रेत मानव था, जो तुममें से किसी को भी नहीं पहचानता था। वह तो बस तुम लोगों से पेंसिल का बचाव कर रहा था।” इद्रांक्ष ने कहा- “पर जो हुआ अच्छा ही हुआ, नहीं तो कैश्वर मुझे देखकर, तिलिस्मा को और ज्यादा खतरनाक बना देता।"

"क्या आप अपनी शक्तियों से इस तिलिस्म के सभी द्वार को तोड़ सकते हो?" जेनिथ ने इद्रांक्ष से पूछा।

“ये कैश्वर की कंम्प्यूटर शक्ति से नहीं, बल्कि कैस्पर की ब्रह्मशक्ति से बना तिलिस्म है, जिसे तोड़ने का अधिकार, देवताओं या चमत्कारी शक्ति वालों के पास नहीं है।” इद्रांक्ष ने कहा- “अब मुझे इस तिलिस्मा से बाहर जाने की आज्ञा दो दोस्त? मैं आपको इस तिलिस्मा के बाद ही मिलूंगा।”

“पर तुम इस तिलिस्मा से बाहर कैसे जाओगे?" शैफाली ने हैरान होते हुए कहा।

"मेरे पास इस तिलिस्मा से बाहर जाने की शक्ति है।" इद्रांक्ष ने कहा।

“तो फिर क्या तुम मेरा एक काम कर सकते हो?" शैफाली ने इद्रांक्ष से कहा।

"हां-हां जरुर....बताओ क्या काम करना है मैग्ना?” इद्रांक्ष ने शैफाली को मैग्ना कहकर संबोधित किया।

“आपको मेरा एक संदेश कैस्पर तक पहुंचाना होगा।” शैफाली ने धीमी आवाज में कहा- “आपको कैस्पर से कहना होगा कि-

“सप्तअश्व हैं आसमान में, दिव्य अस्त्रों से बना त्रिशूल, समय की झिरों से झांके हैं, पंचकिरण के अद्भुत फूल।”

शैफाली की ये कविता वहां खड़े किसी की भी समझ में नही आयी। वैसे तो कैश्वर ने बहुत सी पहेलियों का निर्माण किया था, पर अब पहेली को हल करने की बारी कैश्वर की थी।

“ठीक है मैग्ना, मैं तुम्हारा ये संदेश कैस्पर तक अवश्य पहुंचा दूंगा।” इद्रांक्ष ने कहा- “अब जाने से पहले मुझे एक स्वयं से किया हुआ वादा पूरा करना होगा और वह वादा था कि जो कोई भी मुझे इस पेंसिल से स्वतंत्र करेगा, मैं उसकी कोई एक इच्छा पूरी करुंगा।....तो क्रिस्टी तुम कोई भी एक वरदान मुझसे मांग सकती हो? पर तुम्हें वह वरदान अपने मन में मांगना होगा और इसके पूरा होने के पहले, तुम्हें इस वरदान के बारे में किसी को कुछ नहीं बताना, नहीं तो ये वरदान फलीभूत नहीं होगा।”

यह सुन क्रिस्टी के चेहरे पर एक चमक आ गई। क्रिस्टी ने अपने दोनों हाथों को बांधकर, आँख बंद कर इद्रांक्ष से कोई विश मांगी।

क्रिस्टी लगभग 5 मिनट तक ऐसे ही आँख बंद किये रही, शायद वह मन ही मन इद्रांक्ष से कोई बात कर रही थी।

5 मिनट के बाद क्रिस्टी ने अपनी आँखें खोल दी, पर अब उसके चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी।

क्रिस्टी को वरदान देने के बाद इंद्राक्ष हवा में कहीं गायब हो गया।

"चलो दोस्तों, अब चलकर इस द्वार को पार कर लिया जाये।” क्रिस्टी ने खुशी भरे स्वर में कहा।

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी उस रोशनी वाले द्वार से होकर अंदर की ओर आ गये।

शैफाली ने एक-एक कर कान के सभी भागों को उसके सही स्थान से जोड़ दिया।

कान के उन भागों को जोड़ते ही सभी को उस स्थान पर आवाज सुनाई देने लगी।

तभी उन्हें सामने एक दरवाजा दिखाई दिया, जिस पर एक जीभ बनी थी और उस पर लिखा था- “तिलिस्मा 5.4"

सभी उस द्वार से अंदर की ओर प्रवेश कर गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
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