Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 37 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#182.

चैपटर-2

वसंत ऋतु: (तिलिस्मा 4.4)

सुयश सहित सभी लोग अब जमीन पर चमक रहे, ग्रीनलैंड के स्थान पर जाकर खड़े हो गये, जहां वसंत ऋतु से इनका सामना होना था।

सभी अब गायब होकर ग्रीनलैंड के एक स्थान पर पहुंच गये। परंतु उस स्थान पर नजर पड़ते ही, सभी बुरी तरह से हैरान हो गये।

वह एक बहुत सुंदर सी घाटी थी। उस स्थान पर पेड़, पर्वत, झील, परियां, तितली, झरना आदि सबकुछ था, जो कि एक प्रकृति की सुंदरता का कारक होता है, परंतु किसी भी चीज में कोई रंग नहीं था, यानि की सभी चीजें 70 के दशक के टेलीविजन की तरह ब्लैक एण्ड व्हाइट थीं।

इस स्थान को देख क्रिस्टी के मुंह से हंसी छूट गई।

“लगता है यह कैश्वर अब हमें किसी पुराने से टेलीविजन के अंदर ले आया है? जहां कि हर चीज का रंग उड़ गया है।” क्रिस्टी ने हंसते हुए कहा।

“मैं तो समझा था कि वसंत ऋतु में सबकुछ खुशनुमा होगा?” ऐलेक्स ने कहा- “पर यहां का तो अंदाज ही निराला लग रहा है।"

अब सबकी नजर उस बड़ी सी घाटी की ओर गई। सभी देखना चाहते थे कि वहां पर क्या-क्या है? और उस द्वार को किस प्रकार पार किया जा सकता है?

उस स्थान पर एक ओर 4 बड़े से ड्रम रखे थे। 3 ड्रम में लाल, नीला और पीला रंग था। एक ड्रम पूरी तरह से खाली था।

उस स्थान पर हवा में, एक 6 फुट का ड्रोन घूम रहा था, जिसके नीचे एक पिंजरा टंगा था और उस पिंजरे में एक परी बैठी थी, जिसने लाल रंग के वस्त्र पहन रखे थे। वह ड्रोन उस पिंजरे को लिये चारो ओर हवा में उड़ रहा था।

दूसरी ओर एक बड़ी सी चट्टान से, एक पानी का झरना गिर रहा था। उस झरने के पानी के एकत्र होने से, नीचे एक सुंदर परंतु छोटी सी झील बन गई थी।

उस झील के बीच में एक सफेद रंग का बड़ा सा लिली का फूल तैर रहा था। उस फूल के ऊपर दूसरा पिंजरा रखा था, जिसमें नीले रंग के वस्त्र पहने एक दूसरी परी बैठी थी।

तीसरा पिंजरा गायब होकर बार-बार अलग-अलग स्थानों पर दिखाई दे रहा था। तीसरे पिंजरे में पीले रंग के वस्त्र पहने एक परी बैठी थी।

चौथी परी किसी पिंजरे में नहीं थी, बल्कि हवा में उपस्थित 6 फुट ऊंचे, एक सफेद रंग के हीरे में बंद थी।

उस हीरे के नीचे एक संगमरमर के पत्थर का, 4 फुट का वर्गाकार टुकड़ा जमीन में लगा था। चौथी परी ने हरे रंग के वस्त्र पहने थे।

“यहां के माया जाल को तो देखकर ही समझ में आ रहा है, कि हमें यहां करना क्या है?" जेनिथ ने कहा।

“यह एक घाटी है, जिसके सारे रंगों के लिये ये 4 परियां जिम्मेदार हैं, परंतु किसी ने इन 4 परियों को अलग-अलग जगहों पर कैद कर दिया है?” सुयश ने कहा- “हमें इन सभी परियों को छुड़ाकर, प्रकृति के इन रंगों को भरना होगा।

“सही कहा आपने कैप्टेन।" तौफीक ने कहा- “और जैसे ही हम इन रंगों को प्रकृति में भर देंगे, स्वतः ही प्रकृति पर वसंत ऋतु का प्रभाव हो जायेगा।"

“तो फिर देर ना करते हुए इस द्वार को शुरु करते हैं।” सुयश ने कहा- “पहले लाल रंग का ड्रम रखा है, तो हम पहले लाल रंग की परी को छुड़ाने की कोशिश करते हैं।”

“पर कैप्टेन, हवा में उड़ रहे उस ड्रोन की गति बहुत ज्यादा है, ऐसे में हम उस ड्रोन तक कैसे पहुंच पायेंगे?" ऐलेक्स ने कहा।

ऐलेक्स की बात सुनकर सुयश ध्यान से उस ड्रोन की गति का अध्ययन करने लगा। उस ड्रोन की गति कम से कम 60 किलोमीटर प्रति घंटा के आस-पास थी। ऐसे में उसे पकड़ पाना इतना भी आसान नहीं था।

तभी सुयश की नजर एक ऊंची सी चट्टान की ओर गई। ड्रोन बार-बार घूमते हुए उस चट्टान के पास से गुजर रहा था।

उस चट्टान के नीचे की ओर झील का पानी था। यह देख सुयश के दिमाग में एक युक्ति आ गई।

"हममें से किसी को उस चट्टान पर जाकर खड़ा होना होगा?” सुयश ने चट्टान की ओर इशारा करते हुए कहा और जैसे ही ड्रोन नीचे से निकलेगा, चट्टान से कूदकर उस ड्रोन पर सवार होने की कोशिश करनी होगी। क्यों कि ड्रोन पर लगे पंखे, उसके प्लेटफार्म के नीचे हैं, इसलिए वह पंखे हमें, किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकते। मुझे तो यह तरीका ही आसान लगा क्यों कि अगर कोई नीचे गिर भी गया? तो नीचे झील का पानी होने की वजह से उसे चोट नहीं लगेगी।"

“ठीक है कैप्टेन, तो मैं चट्टान पर जाकर ड्रोन पर कूदने की कोशिश करती हूं।” क्रिस्टी ने स्वयं से आगे आते हुए कहा और सुयश की स्वीकृति पाकर उस चट्टान की ओर बढ़ गई।

कुछ ही पलों में क्रिस्टी चट्टान पर थी। अब क्रिस्टी की नजर पास आ रहे ड्रोन की ओर थी। कुछ देर तक क्रिस्टी ध्यान से ड्रोन को देखती रही और उसकी गति का पूर्ण अंदाजा लगा लेने के बाद, क्रिस्टी ने ड्रोन पर छलांग लगा दी।

एक पल के लिये ऐसा लगा मानो क्रिस्टी का शरीर, किसी सुपरगर्ल की भांति हवा में उड़ रहा हो।

पर जैसे ही ड्रोन इस बार चट्टान के समीप आया, उसकी गति अचानक से बढ़ गई और वह क्रिस्टी के नीचे से, उसे चिढ़ाता हुआ निकल गया।

एक पल के लिये क्रिस्टी की आँखों में आश्चर्य के भाव उभरे, परंतु इससे पहले कि क्रिस्टी ज्यादा आश्चर्य व्यक्त कर पाती, उसका शरीर ‘छपाक' की तेज आवाज करते हुए झील के पानी में आ गिरा।

क्रिस्टी ने पानी में एक डाइव मारी और झील से निकल कर बाहर आ गई।

क्रिस्टी ने सुयश से कुछ बोलने की कोशिश की, पर सुयश हाथ के इशारे से उसे रोकते हुए बोला- “कुछ बोलने की जरुरत नहीं है क्रिस्टी, हम सभी ने देखा कि कैसे ड्रोन की स्पीड एका एक तेज हो गई थी? अब यह साफ हो गया कि यह एक साधारण ड्रोन नहीं, बल्कि एक स्मार्ट ड्रोन है, जो अपने पर आ रहे खतरों को देख, अपने अंदर स्वयं बदलाव कर सकता है।....क्या अब किसी के पास इस ड्रोन को पकड़ने का कोई दूसरा तरीका है?"

"हां कैप्टेन।” इस बार ऐलेक्स ने अपना हाथ उठाते हुए कहा- “मुझे अभी-अभी यहां सामने की ओर कुछ अदृश्य सीढ़ियां बनी दिखाई दीं हैं, ड्रोन उन सीढ़ियों के नीचे से बार-बार निकल रहा है। जिस चट्टान से क्रिस्टी नीचे कूदी, वह चट्टान काफी ऊंचाई पर थी, जिससे क्रिस्टी को ड्रोन को पकड़ने के लिये, काफी पहले कूदना पड़ा था, पर उन सीढ़ियों और ड्रोन के बीच ज्यादा फासला नहीं है, इसलिये मुझे लगता है कि उन सीढ़ियों के माध्यम से आसानी से ड्रोन को पकड़ा जा सकता है?" यह कहकर ऐलेक्स ने एक दिशा की ओर इशारा करते हुए कहा।

“ठीक है ऐलेक्स, तुम भी कोशिश करके देख लो, हो सकता है कि इस तरीके से ही लाल परी के ड्रोन को पकड़ा जा सके?” सुयश ने ऐलेक्स को आज्ञा देते हुए कहा।

सुयश की बात सुन ऐलेक्स उन सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। कुछ ही देर में ऐलेक्स उन सीढ़ियों पर चढ़कर, एक ऐसे स्थान पर खड़ा हो गया, जिसके नीचे से ड्रोन बार-बार निकल रहा था।

शैफाली के सिवा बाकी किसी को, अदृश्य सीढ़ियां दिखाई नहीं दे रहीं थीं, पर ऐलक्स को वह सब, अब हवा में एक स्थान पर खड़े देख रहे थे।

ऐलेक्स ने भी क्रिस्टी की ही भांति, ड्रोन की गति का अवलोकन किया और एक बार जैसे ही ड्रोन सीढ़ियों के एक ओर से नीचे घुसा, ऐलेक्स उसकी गति देख दूसरी ओर की सीढ़ियों से उतर गया।

पर इस बार ड्रोन सीढ़ियों के नीचे कुछ पलों के लिये बहुत धीमा हो गया, जिसकी वजह से ऐलेक्स नीचे धरती पर आ गिरा।

चूंकि सीढ़ियों की ऊंचाई जमीन से ज्यादा नहीं थी और ऐलेक्स की त्वचा शक्ति भी अभी थोड़ी काम कर रही थी, इसलिये ऐलेक्स को चोट नहीं आई।

अब ऐलेक्स अपना मुंह लटकाकर, क्रिस्टी के बगल आकर खड़ा हो गया। ऐलेक्स ने अपना सिर क्रिस्टी के कंधे से टिका लिया।

“कोई बात नहीं शक्ति धारक, तुम दुखी मत हो, ऐसा सबके साथ होता है।" क्रिस्टी ने ऐलेक्स के सिर को बिना अपने कंधे से हटाए, उसे थपकी देते हुए कहा।

ऐलेक्स ने थपकी से भाव विभोर हो, भोलेपन से अपनी आँखें बंद कर ली। क्रिस्टी और ऐलेक्स को देख सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“यह प्लान भी फेल हो गया।” सुयश ने बारी-बारी सभी की ओर देखते हुए कहा- “क्या किसी के पास कोई और प्लान है?"

"हां कैप्टेन अंकल, इस बार मैं कोशिश करके देखना चाहती हूं।” शैफाली ने अपना हाथ खड़ा करते हुए कहा।

“क्या तुम्हारे दिमाग में कोई विशेष प्लान है शैफाली?" जेनिथ ने शैफाली की ओर देखते हुए पूछा।

"हां, पर मैं उस प्लान को बताने की जगह करके दिखाना चाहती हूं।” यह कहकर शैफाली उनके पास से हटकर आगे की ओर बढ़ गई।

सभी की नजर अब पूर्णतया शैफाली की ओर थीं।

शैफाली वहां से आगे बढ़कर उस स्थान पर जा पहुंची, जहां बहुत सी बड़ी-बड़ी तितलियां उड़ रहीं थीं।

कुछ देर तक शैफाली वहां खड़ी होकर उड़ती हुई तितलियों को यूं ही निहारती रही और फिर वह उछलकर एक तितली पर सवार हो गई।

सभी आश्चर्य से शैफाली के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन को देख रहे थे।

शैफाली ने कुछ ही देर में तितली पर अपने शरीर को पूरी तरह से संतुलित कर लिया। अब शैफाली ड्रोन के पीछे थी।

सभी को शैफाली का यह प्लान काफी अच्छा लगा। अब सभी को यह महसूस होने लगा था कि शैफाली जल्द ही उस लाल परी के ड्रोन को पकड़ लेगी।

शैफाली निरंतर ड्रोन के पास आती जा रही थी, परंतु जैसे ही शैफाली ने ड्रोन के बिल्कुल पास पहुंचकर, अपना हाथ ड्रोन की ओर बढ़ाया, वैसे ही अचानक ड्रोन की गति पहले से दुगनी हो गई।

अब शैफाली के लिये उस तितली पर बैठकर ड्रोन को पकड़ पाना अत्यंत ही मुश्किल हो गया। कुछ देर ऐसे ही प्रयास करने के बाद शैफाली हारकर तितली से उतरकर वापस सुयश के पास आ गई।

“यह ड्रोन तो कुछ ज्यादा ही स्मार्ट है? यह अपनी गति को घटा-बढ़ाकर हमें चकमा दे रहा है।” शैफाली ने मुंह लटकाते हुए कहा।

“नक्षत्रा, क्या तुम्हारे पास इस ड्रोन को पकड़ने का कोई प्लान है?" जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

"नहीं जेनिथ, मेरी समय को रोक देने वाली शक्ति अगर यहां काम करती? तो मैं आसानी से उस ड्रोन को पकड़ सकता था, पर अब तो मैं भी यहां मजबूर हूं।" नक्षत्रा ने कहा- “हां____, पर मैं तुम्हें एक सुझाव अवश्य दे सकता हूं।

"तो फिर कहो नक्षत्रा बताओ कि तुम्हारे पास क्या सुझाव है?" जेनिथ ने कहा।

“शायद तुम लोग हेफेस्टस की गुफा वाली घटना को भूल चुके हो, जिसमें तौफीक ने पत्थरों से निशाना लगा कर तेजी से हवा में उड़ रहे गोलों को मार गिराया था।" नक्षत्रा ने कहा।

“पर वह ड्रोन इतना स्मार्ट है कि वह तौफीक के पत्थरों से भी, अपनी गति को घटा या बढ़ाकर बच सकता है।" जेनिथ ने अपना शक जाहिर करते हुए कहा।

"जो तौफीक, हवा में उछाले गये 6 सिक्कों को, जमीन पर गिरने के पहले ही गोली से उड़ा सकता है, वह भला अपनी बुद्धि का प्रयोग कर इस ड्रोन को क्यों नहीं गिरा सकता?" नक्षत्रा के शब्दों में अतीत की यादें भी थीं, जिसे सुनकर एक पल के लिये जेनिथ विचलित हो गई।

“अतीत को भूलकर भावनाओं को नियंत्रित करो दोस्त। यह समय अतीत के सागर में मंथन करने का नहीं है, यह समय है, सभी भावनाओं को भुलाकर तिलिस्मा को पार करने का।” नक्षत्रा ने जेनिथ को समझाते हुए कहा।

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ ने धीरे से अपना सिर हिलाया और अपने चेहरे के बनते-बिगड़ते भावों को नियंत्रित कर लिया।

"तौफीक।” जेनिथ ने एक लंबे अंतराल के बाद तौफीक को संबोधित करते हुए कहा- “नक्षत्रा का कहना है कि तुम यह कार्य आसानी से कर सकते हो।

तौफीक का नाम लेते समय, एक बार को जेनिथ की जुबान लड़खड़ा गई, पर शीघ्र ही उसने स्वयं को नियंत्रित कर लिया।

“नक्षत्रा का?” तौफीक ने अर्थ भरी नजरों से जेनिथ की ओर देखते हुए पूछा।

"नहीं...म.....म....मेरा भी मानना है।" जेनिथ ने तौफीक के चेहरे से नजर हटाते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन तौफीक का चेहरा खुशी से चमकने लगा। अचानक ही उसमें एक गजब का विश्वास नजर आने लगा।

अब तौफीक ने ध्यान से उस ड्रोन को देखा और फिर जमीन से 6 पत्थर उठाकर अपने हाथ में पकड़ लिये। पत्थरों का आकार कंचे से थोड़ा सा ही ज्यादा था।

तौफीक अब लगातार उस ड्रोन को देख रहा था। कुछ देर, ड्रोन की गति का अध्ययन करने के बाद तौफीक की नजर ड्रोन के घूम रहे पंखों पर जम गई।

अब तौफीक ने बिजली की फुर्ती दिखाते हुए एकएक कर सभी पत्थर ड्रोन की ओर उछाल दिये।

तौफीक ने सभी पत्थरों की गति और स्थान को अलग-अलग रखा था।

जैसे ही पहला पत्थर ड्रोन के पास पहुंचा, ड्रोन ने एकाएक अपनी गति बढ़ा दी, पर तौफीक का फेंका हुआ दूसरा पत्थर उसी स्थान की ओर आ रहा था, यह देख ड्रोन ने इस बार अपनी गति को धीमे कर दिया।

बस इसी स्थान पर वह ड्रोन फंस गया, क्यों कि तौफीक का फेंका तीसरा पत्थर, उसी स्थान को केंद्र में रखकर फेंका गया था।

तीसरा पत्थर ड्रोन के एक पंखे पर जाकर लगा, जिसकी वजह से ड्रोन अनियंत्रित होकर, एक चट्टान से टकराकर नीचे आ गिरा।

ड्रोन को नीचे गिरता देख सभी ने तौफीक के नाम का जयकारा लगाया और उस ओर भाग लिये जहां ड्रोन गिरा था।

जेनिथ की आँखों में एक बार फिर तौफीक के लिये तारीफ के भाव उभरे।

इसी पल, बस एक क्षण के लिये तौफीक और जेनिथ की नजरें आपस में टकराईं और फिर जेनिथ ने अपना मुंह फेर लिया।

“अब समझ में आया जेनिथ कि मैंने तौफीक का रहस्य अभी किसी और से बताने को क्यों मना किया था?" नक्षत्रा ने कहा- “क्यों कि हमें इस तिलिस्म में तौफीक की जरुरत है।"

“पर तुम तो इतनी दूर का भविष्य नहीं देख पाते नक्षत्रा, फिर तुम्हें कैसे पता था कि हमें तौफीक की जरुरत इस तिलिस्म में पड़ने वाली है?" जेनिथ ने शक भरे अंदाज में नक्षत्रा से पूछा।

"मैं....मैं...भविष्य नहीं देख सकता ज़े ज़ेनिक्स मैंने तो बस ऐसे ही गणना की थी।" नक्षत्रा ने लड़खड़ाती जुबान में कहा।

"ये तुम मुझे ज़ेनिक्स क्यों कह रहे हो नक्षत्रा?" जेनिथ के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

"उप्स सॉरी 'ज़ेनिक्स' शब्द गलती से निकल गया।” इतना कह नक्षत्रा चुप हो गया। शायद वह समझ गया था कि इस समय कुछ ना ही बोलना उचित होगा।

नक्षत्रा को अचानक से चुप होते देख जेनिथ, उस ड्रोन की ओर बढ़ गई, जिधर सभी गये थे।

सुयश ने पत्थर मारकर पिंजरे का द्वार खोल दिया।

लाल परी अब निकलकर बाहर आ गई, पर उसने ना तो किसी की ओर देखा? और ना ही किसी से कुछ कहा? लाल परी चलती हुई, वहां रखे, लाल रंग से भरे ड्रम के पास पहुंची।

अचानक ही लाल परी के हाथों में एक पेंट करने वाली कूची दिखाई देने लगी। लाल परी ने अपनी कूची को पेंट से भरे ड्रम में डुबाया और बिजली की तेजी से उस घाटी में मौजूद हर लाल रंग की चीज को रंगना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में लाल परी ने घाटी में उपस्थित, लाल रंग के फलों और फूलों को रंग दिया।

रंगों का कार्य पूर्ण होने के बाद वह लाल परी हवा में कहीं गायब हो गई? अब सभी का ध्यान नीले रंग के वस्त्र पहने परी की ओर गया, जो कि झील के पानी में मौजूद सफेद लिली के फूल पर रखे एक पिंजरे में थी।

जारी रहेगा_____✍️
 
#183.

"नीली परी को कैद से आजाद कराना, सरल महसूस हो रहा है।" ऐलेक्स ने कहा- "इस तक तो पानी में तैर कर ही पहुंचा जा सकता है।'

ऐलेक्स की बात सुनकर क्रिस्टी के मुंह से हंसी छूट गई- “ब्वायफ्रेंड जी, लगता है आप कैश्वर को अभी ठीक तरह से समझे नहीं हैं? वो तिलिस्मा की कोई भी चीज को आसान नहीं करने वाला? विश्वास ना हो तो पानी में अपना पैर डालकर देख लो। अवश्य ही इस झील के पानी में कोई ना कोई जाल बिछा होगा?"

क्रिस्टी की बात सुनकर ऐलेक्स ने झील के पानी में अपना पैर डाला, परंतु ऐलेक्स का पैर पानी के अंदर नहीं गया। यह देख ऐलेक्स ने घूरकर क्रिस्टी की ओर देखा और पलटकर वापस आ गया।

"हम झील के पानी में तैरकर, अब नीली परी के पिंजरे तक नहीं पहुंच सकते।” ऐलेक्स ने मुंह बनाते हुए कहा- “मेरा पैर पानी के अंदर नहीं जा रहा है।"

ऐलेक्स की बात सुन क्रिस्टी ने अपनी जीभ निकालकर ऐलेक्स को चिढ़ा दिया।

"इसका मतलब वसंत ऋतु का यह भाग भी आसान नहीं होने वाला?” सुयश ने कहा- “चलो, अब सब लोग घूमकर देखो कि इस झील के पानी में प्रवेश कर नीली परी को कैसे छुड़ाया जा सकता है?"

सुयश की बात सुनकर सभी इधर-उधर बिखरकर कोई युक्ति ढूंढने की कोशिश करने लगे।

तभी तौफीक की नजर उस झरने की ओर गई, जिससे गिर रहे पानी से, झील बनी थी। अब तौफीक उस पहाड़ पर चढ़ने लगा।

कुछ देर में तौफीक उस झरने के उद्गम स्थल के पास पहुंच गया।

अब तौफीक की नजर उस झरने के पानी के बीच में पड़े, एक विशाल पत्थर पर थी, जिसके बीच में होने की वजह से झरने के पानी का मार्ग अवरुद्ध हो रहा था।

तौफीक ने जमीन पर बैठकर ध्यान से उस पत्थर को देखा, अब तौफीक की नजर उस बड़े पत्थर के नीचे मौजूद एक छोटे से पत्थर के टुकड़े पर गई।

यह छोटा पत्थर का टुकड़ा इस प्रकार रखा था कि यदि उसे हटा दिया जाता, तो वह बड़ा पत्थर लुढ़ककर झील के पानी में आ गिरता।

यह देखकर तौफीक ने ऊपर से ही चिल्ला कर कहा- “कैप्टेन, यहां पर एक चट्टान का टुकड़ा है, अगर हम उसे हटा दें, तो वह लुढ़ककर झील के पानी में गिरेगा। हो सकता है कि उससे झील का पानी का स्तर बढ़ जाये? और वह लिली का फूल तैरकर किनारे आ जाये?"

तौफीक की बात सुन सुयश ने तौफीक को चट्टान के हटाने का इशारा कर दिया। तौफीक ने सुयश का इशारा पाकर, बड़ी चट्टान के नीचे मौजूद छोटे पत्थर को, उसके स्थान से हटा दिया।

अब वह बड़ी चट्टान लुढ़कते हुए झील के पानी में जा गिरी। चट्टान के गिरने से, झील का बहुत सारा पानी चारो ओर फैल गया, परंतु लिली का फूल ज्यों का त्यों अपने स्थान पर अडिग तैरता रहा। यह देख तौफीक मायूस होकर पहाड़ से नीचे आ गया।

तभी जेनिथ की निगाह, तौफीक के द्वारा फेंकी गई चट्टान पर पड़ी, जो कि अब झील के पानी की सतह पर, किसी पत्ते की मानिंद तैर रहा था।

“कैप्टेन, यह पत्थर पानी के ऊपर तैर रहा है।" जेनिथ ने पत्थर की ओर इशारा करते हुए सुयश से कहा।

"इस पत्थर का रंग थोड़ा गाढ़ा है, जबकि यहां मौजूद बाकी पत्थर थोड़े हल्के रंग के हैं।” शैफाली ने कहा- “इसका मतलब इस रंग के पत्थर पानी पर तैरते हैं। अगर हमें ऐसे और भी पत्थर मिल जायें तो उन पत्थरों का पुल बनाकर हम उस पिंजरे तक पहुंच सकते हैं।"

शैफाली की बात सुनकर सभी का ध्यान अपने चारो ओर गया। कुछ ही देर में सभी को वहां मौजूद पत्थरों के बीच में 1 फुट के असंख्य गाढ़े पत्थर नजर आने लगे।

अब सभी उन पत्थरों को उठाकर झील के पानी में फेंकने लगे।

कुछ ही देर में सभी ने 2 मीटर लंबे एक पुल का निर्माण कर लिया।

“अब रुक जाओ।” सुयश ने सभी को रोकते हुए कहा- “पहले एक बार देख तो लें कि यह पुल हमारे शरीर का बोझ उठा भी सकता है कि नहीं? फिर बचे हुए पुल का निर्माण करेंगे।" सुयश की बात सभी को सही लगी।

अब क्रिस्टी ने उस पुल पर अपना पैर रखने की कोशिश की। पर क्रिस्टी के पैर के आगे बढ़ाते ही, सभी तैर रहे पत्थर अपने स्थान से इस प्रकार इधर-उधर होने लगे, जैसे कि वह क्रिस्टी का पैर ना होकर भगव..न वामन का पैर हो, और वह अपने एक पग में पृथ्वी मांगने जा रही हो।

“यह प्लान भी फेल है।” सुयश ने पत्थरों को देखते हुए कहा- “कैश्वर ने जानबूझकर हमारे आसपास ऐसी चीजें रखीं हैं, कि हम उसमें फंसकर अपना समय बर्बाद करते रहें। अब हमें कोई अन्य उपाय ही सोचना पड़ेगा?" सुयश की बात सुन सभी सोच में पड़ गये।

तभी शैफाली के चेहरे के आगे वही तितली आकर घूमने लगी, जिस पर बैठकर शैफाली ने ड्रोन को पकड़ने की कोशिश की थी।

शैफाली ने अपने हाथ से तितली को हटाने की कोशिश की, पर वह तितली शैफाली के चेहरे के सामने से नहीं हटी।

इस बार शैफाली ने घूरकर तितली को देखा, तभी उसके दिमाग में एक आइडिया आ गया। अब शैफाली बिना किसी को बताये अपने स्थान से उठी और उस तितली पर चढ़कर बैठ गई।

शैफाली के बैठते ही तितली हवा में उड़ी और शैफाली को लेकर लिली के फूल के पास पहुंच गई।

अब शैफाली ने किसी नट की भांति करतब दिखाते हुए, अपने दोनों पैर की कैंची बनाकर, उसे तितली के शरीर में फंसाया और तितली के शरीर से उल्टा लटककर हवा में झूलने लगी।

सभी मंत्रमुग्ध हो कर शैफाली के इस अद्भुत प्रयास को देख रहे थे। अब शैफाली के हाथ नीचे हवा में झूल रहे थे। तभी तितली लिली के फूल के ऊपर पहुंच गई। शैफाली की निगाह अब नीली परी के पिंजरे के ऊपर लगे हुक पर थी।

थोड़े ही प्रयास के बाद शैफाली ने उस हुक को अपने हाथ से पकड़ लिया। हुक को पकड़ते ही शैफाली ने अपने मुंह से एक अजीब सी ध्वनि निकाली।

इस ध्वनि को सुन तितली हवा में ऊपर उठ गई और इसी के साथ शैफाली सहित नीली परी का पिंजरा भी हवा में उठ गया।

पिंजरा अच्छा-खासा भारी था, पर इस समय शैफाली अपने शरीर की आंतरिक कोर का प्रयोग, मैग्ना की भांति कर रही थी इसलिये उसे कुछ खास परेशानी नहीं हुई? शैफाली ने वह पिंजरा सुयश के सामने रख दिया और स्वयं तितली से उतरकर नीचे आ गई।

“बहुत अच्छे शैफाली, क्या दिमाग लगाया है तुमने?” ऐलेक्स ने शैफाली की प्रशंसा करते हुए कहा।

अब सुयश ने इस पिंजरे का भी द्वार खोलकर नीली परी को बाहर निकाल दिया।

नीली परी ने बाहर निकलते ही, दूसरे ड्रम से नीले रंग को निकाल कर प्रकृति को रंग दिया। इसके बाद वह भी लाल परी की ही भांति हवा में गायब हो गई।

अब सबकी निगाहें पीली परी की ओर थीं, जिसका पिंजरा अनेक जगहों पर बार-बार प्रकट व अदृश्य हो रहा था।

“पीली परी का पिंजरा तो बहुत तेजी से अनेक स्थानों पर फ्लैश हो रहा है।" जेनिथ ने कहा- “और इसकी गति भी इतनी तेज है कि इसे पकड़ना लगभग नामुमकिन लग रहा है।

"सभी लोग अपने दिमाग के घोड़े को दौड़ाओ, अगर कैश्वर ने इस पहेली को हमारे सामने रखा है तो जरुर इसका हल हममें से किसी के पास होगा?” सुयश ने सभी को आशाओं से भरते हुए कहा- “हो सकता है कि इससे मिलती-जुलती कोई घटना हमारे दिमाग में हो? जो कि दिमाग के किसी कोने में धुंधली यादों के रुप में हो?"

सुयश की बात सुन, सभी पीली परी के पिंजरे को देखते हुए अपना दिमाग लगाने लगे।

शैफाली की तीक्ष्ण नजरें ध्यान से फ्लैश हो रहे पिंजरे का अवलोकन कर रहीं थीं। सभी को पिंजरे को इसी प्रकार देखते हुए, लगभग आधा घंटा बीत गया।

अब शैफाली को छोड़ सभी ने, थोड़ी देर के लिये अपनी नजरें पिंजरे से हटा लीं थीं।

शैफाली अब एक लकड़ी की सहायता से जमीन पर खिंचा कर, कुछ गणित की कैलकुलेशन कर रही थी।

शैफाली को यह करता देख सभी को समझ आ गया कि शैफाली को अवश्य ही कोई ना कोई क्लू मिल गया है?

कुछ ही देर में शैफाली ने लकड़ी से खिंचकर, एक छोटी सी तालिका तैयार कर ली और सभी को अपने पास बुला लिया।

सभी शैफाली के पास पहुंचकर, जमीन में बनी उस तालिका को देखने लगे, पर किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि शैफाली ने जमीन पर, अंकों की गणना कर यह क्या बनाया है? अब सभी तालिका को छोड़ शैफाली की ओर देखने लगे।

उन्हें अपनी ओर देखता पाकर शैफाली ने बोलना शुरु कर दिया।

“कैप्टेन अंकल, जब मैंने ध्यान से पीली परी के पिंजरे को देखना शुरु किया, तो मुझे पता चला कि वह पिंजरा गायब होकर सिर्फ 8 स्थानों पर ही प्रकट हो रहा है, पर उनके बीच का क्रम बिल्कुल भी समझ में नहीं आ रहा था। तब मैंने यह तालिका बनाकर पिंजरे के क्रम का आंकलन करने की कोशिश की। अब पहले मैंने उन 8 स्थानों को चिंहित कर, उन्हें 1 से लेकर 8 तक नंबर दे दिये। यानि अगर पिंजरा पहली जगह पर प्रकट हो रहा है तो मैंने तालिका के स्थान पर 1 लिख दिया। कुछ ही देर में मेरे सामने ये आंकड़े आ गये, जो कि मैंने इस तालिका में लिख रखे हैं।" यह कहकर शैफाली ने सबका ध्यान तालिका की ओर कराते हुए कहा।

"तलिका की पहली लाइन में पहला अंक गायब है और बाकी के सभी अंकों के बीच 1 स्थान का अंतराल है, उसी प्रकार दूसरी लाइन में शुरु के 2 अंक गायब हैं और प्रत्येक 2 अंको के बीच 2 स्थान का अंतराल है। वैसे ही तीसरी लाइन में 3, चौथी लाइन में 4, पांचवी लाइन में 5, छठी लाइन में 6 अंकों का अंतराल है। अब अगर सातवीं लाइन को देखते है, तो यहां प्रत्येक अंकों के बीच 7 अंकों का अंतराल है। अगर ध्यान से देखें तो यहां पर कुल 8 ही स्थान हैं, जिनमें से 7 अंक गायब हैं। अर्थात जब पिंजरा सातवीं लाइन के हिसाब से गायब होना शुरु होता है, तो वह एक ही स्थान पर लगातार 8 बार प्रकट होता है।

“इसी प्रकार आठवीं लाइन के हिसाब से वह पिंजरा 8 बार प्रकट ही नहीं होता है। तो इस प्रकार से कैश्वर ने एक शतरंज के बोर्ड के 64 खानों का प्रयोग करके इस पहेली का निर्माण किया है। यानि अब अगर हमें इस पिंजरे को पकड़ना है, तो सबसे सही समय हमें सातवीं लाइन में मिलेगा, जब वह पिंजरा एक ही स्थान पर 8 बार प्रकट होगा।" इतना कहकर शैफाली चुप होकर सभी को देखने लगी और अब सभी आँखें फाड़े शैफाली को देख रहे थे।

“यह इतने छोटे से दिमाग में इतना गणित आता कहां से है?” सुयश ने शैफाली के बालों पर हाथ फेरते हुए पूछा।

"क्या कैप्टेन अंकल, आपने ही तो कहा था कि दिमाग के सारे घोड़े खोल दो, और दिमाग के घोड़े मैं तभी खोलती थी, जब मैं किसी के साथ 'ब्लाइंड चेस' खेलती थी। बस शतरंज के उसी खेल से मैंने ये पहेली हल कर ली।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए भोलेपन से कहा।

(ब्लाइंड चेसः शतरंज के खेल का एक प्रकार, जिसे आँखों पर पट्टी बांधकर खेला जाता है। इस गेम में खेलने वाला अपने दिमाग में शतरंज के सभी 64 खानों को याद रखता है)

"चलो फिर अब सभी आठवें स्थान पर चल कर खड़े होते हैं।” ऐलेक्स ने कहा और क्रिस्टी का हाथ पकड़ ऐसे चल दिया, जैसे कि वह अपने गार्डन में टहल रहा हो।

सभी आठवें स्थान पर पहुंच गये और शैफाली के इशारे का इंतजार करने लगे। पिंजरे के फ्लैश होने का समय इतना कम था, कि पता होने के बाद भी शुरु के 2 बार में, कोई भी पिंजरे को छू भी नहीं पाया, पर आखिरकार तीसरी बार में क्रिस्टी के हाथ में पीली परी का पिंजरा आ ही गया।

इस पिंजरे का ताला भी तोड़कर, पीली परी को निकाल दिया गया।

पिछली दोनों परियों की भांति ही पीली परी ने भी पीले ड्रम से रंग लेकर प्रकृति के पीले रंग को भर दिया। इसके बाद वह पीली परी भी गायब हो गई।

अब सभी की नजर आखिरी वाली, हरी परी की ओर गई, जो कि हवा में स्थित एक हीरे के अंदर कैद थी।

“कैप्टेन, यह परी पिंजरे की जगह हीरे में कैद है।" तौफीक ने कहा- “और हीरा तो पृथ्वी की सबसे कठोर चीजों में शुमार है, तो फिर हम इस परी को उसमें से निकालेंगे कैसे?"

तौफीक की बात सुनकर सभी उस हीरे के पास आकर खड़े हो गये।

“अरे, इस हीरे के नीचे जमीन पर लगे पत्थर पर, तो एक इंद्रधनुष दिखाई दे रहा है।” ऐलेक्स ने नीचे की ओर देखते हुए कहा। ऐलेक्स की बात सुन सभी की निगाहें जमीन पर लगे, उस वर्गाकार सफेद पत्थर पर पड़ी।

“ऐलेक्स भैया, इस हीरे पर जब सूर्य की सफेद किरणें आकर पड़ रही हैं, तो वह इस हीरे के अंदर से प्रवेश होकर, इसके निचले सिरे से बाहर निकल रहीं हैं। वही सूर्य की किरणें अलग-अलग तरंग दैर्ध्य के कारण, हमें इंद्रधनुष के रंग में नीचे के पत्थर पर दिखाई दे रहीं हैं।

"एक मिनट इस इंद्रधनुष के रंग में कुछ गड़बड़ है।” जेनिथ ने नीचे देखते हुए कहा- “हां, इसमें हरा रंग उपलब्ध नहीं है, उसका स्थान खाली है।

“यह बात तो समझ से बाहर है।" शैफाली ने कहा- “सूर्य की किरणों से तो पूर्ण इंद्रधनुष दिखाई देना चाहिये था और इस समय हमें हरी परी को ही बाहर भी निकालना है....अवश्य ही इस द्वार से निकलने का रास्ता इसी पहेली में कहीं छिपा है?"

“दोस्तों, हम भूल रहे हैं कि 3 ड्रम के अंदर तो रंग था, परंतु एक ड्रम जिसमें हरा रंग होना चाहिये था, वह अभी भी खाली है। कहीं उसके खालीपन का संबन्ध इस पहेली से तो नहीं?" ऐलेक्स ने कहा।

“वह कोई बड़ी परेशानी नहीं है।” सुयश ने कहा“ नीले और पीले रंग को चौथे ड्रम में डालने पर हरा रंग बन जायेगा।...पर हरा रंग बनाने से समस्या हल नहीं होगी....अवश्य ही यहां कहीं पर और कुछ भी है? जो हमें अभी तक दिखाई नहीं दिया है। एक काम करो, सब लोग इधर-उधर बिखर कर कुछ भी संदिग्ध चीज ढूंढने की कोशिश करो?" सुयश की बात सुनकर सभी चारो ओर फैल गये।

कुछ मिनट बाद जेनिथ की आवाज सबको सुनाई दी- “कैप्टेन, मुझे इस चट्टान के पीछे से, यह एक फुट का कपड़े का घोड़ा मिला है। क्या इसमें कुछ हो सकता है?"

जेनिथ की आवाज सुन सभी जेनिथ के पास इकठ्ठा हो गये और उस हरे कपड़े से बने उस घोड़े को देखने लगे।

सुयश ने जेनिथ के हाथ से घोड़ा ले लिया और उसे उलट-पुलट कर देखने लगा।

“यह पूरा घोड़ा कपड़े का है, पर इसकी पूंछ असली जैसी लग रही है और इसका रंग भी हरा है, जो कि साधारणतया घोड़े के रंग से अलग है।” सुयश ने कहा“ और इसका हरे रंग में होना ये साबित करता है कि इस घोड़े का कहीं ना कहीं तो उपयोग होना है? क्या कोई इस घोड़े का सम्बन्ध अप्रत्यक्ष रुप से भी, किसी प्रकार उस पहेली से जोड़ पा रहा है?"

“हां कैप्टेन, यहां बात सूर्य की किरणों की हो रही है और कहते हैं कि सूर्य का रथ भी घोड़े ही खींचते हैं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि यही सूर्य का चौथा घोड़ा हो?" जेनिथ ने अपना तर्क देते हुए कहा।

सुयश को जेनिथ का तर्क बिल्कुल सटीक महसूस हुआ, तभी वह घोड़ा सुयश के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया।

जमीन पर गिरते ही अचानक वह घोड़ा बड़ा होकर सजीव हो गया और हिनहिनाकर सूर्य की ओर उड़ गया। यह देख सभी सकते की सी हालत में आ गये।

“कैप्टेन, लगता है कि जेनिथ का कहना सही था, वहीं सूर्य का चौथा घोड़ा था?” क्रिस्टी ने कहा- “पर अब तो वह घोड़ा आसमान में उड़ गया, अब हम उसे पकड़ेंगे कैसे?" तभी ऐलेक्स की निगाह जमीन पर गिरी घोड़े की पूंछ की ओर गई।

“कैप्टेन, भागते भूत की लंगोटी सुनी थी, पर भागते घोड़े की पूंछ कभी नहीं सुना था?” ऐलेक्स ने घोड़े की पूंछ को सुयश को देते हुए कहा- “घोड़ा तो उड़ गया, पर उसकी पूंछ तो यहीं पर रह गई।'

सुयश ने घोड़े की पूंछ को ध्यान से देखते हुए कहा“ अरे यह पूंछ तो बिल्कुल पेंटिंग की कूची की भांति लग रही है?" यह कह सुयश के दिमाग में एक विचार कौंधा, अब वह तुरंत उस खाली ड्रम की ओर भागा।

सुयश ने घोड़े की पूंछ को जेनिथ के हाथ में पकड़ाया और स्वयं नीले व पीले रंग की कुछ मात्रा खाली ड्रम में डालकर हरे रंग का निर्माण कर दिया।

हरा रंग बनते ही सुयश ने घोड़े की पूंछ को हरे रंग में डाला और उसमें रंग लगाकर हीरे की ओर भागा।

सभी आश्चर्य से सुयश की ओर देख रहे थे।

सुयश ने अब उस पूंछरुपी कूची से, पत्थर पर मौजूद इंद्रधनुष के हरे भाग को रंग दिया। सुयश के ऐसा करते ही इंद्रधनुष के हरे रंग से एक तेज रोशनी निकलकर हीरे से टकराई।

अब हीरा एक ओर से सूर्य की सफेद किरणों से गर्म हो रहा था और दूसरी ओर से इंद्रधनुष की हरी किरणों से ठंडा हो रहा था।

कुछ देर तक लगातार यही प्रक्रिया चलते रहने के बाद, अब हीरे में कुछ दरारें दिखाई देने लगीं थीं।

यह देख सुयश ने सभी को सचेत करते हुए कहा "सभी लोग सुरक्षित स्थान को ढूंढ लो, मुझे लग रहा है कि हीरा कभी भी फट सकता है? और हीरे के फटने पर हमें नहीं पता कि कैसी ऊर्जा निकलेगी?"

सुयश की बात सुन सभी एक ऊंची सी चट्टान के पीछे छिप गये।

तभी ‘खनाक' की एक तेज आवाज के साथ हीरा टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गया।

कुछ देर बाद जब हीरे की ऊर्जा वातावरण से समाप्त हो गई, तो सभी ने झांककर उस स्थान की ओर देखा, जहां वह हीरा टूटा था।

अब वहां हरी परी खड़ी नजर आ रही थी।:dazed:

हरी परी ने नीले और पीले रंग के ड्रम से बाकी बचा पेंट भी हरे ड्रम में मिला दिया और उससे प्रकृति के आखिरी और सबसे खूबसूरत रंग को भर दिया। इसी के साथ वह परी भी गायब हो गई।

तभी सबको उस वर्गाकार पत्थर में अंदर की ओर जाता हुआ एक द्वार दिखाई दिया।

सभी समझ गये कि यही तिलिस्मा का अगला द्वार है। सभी अब उस द्वार के रास्ते से आगे की ओर चल दिये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#184.

पंचमुख महानदेव: (17.01.2002, गुरुवार, रुद्रलोक, हिमालय)

हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।

नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।

कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।

हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।

महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।

देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।

“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।

"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'

यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।

चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।

कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।

कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।

नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।

तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।

उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।

“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।

नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"

“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।

“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।

तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।

इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।

चैपटर-3

ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)

पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।

वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।

कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।

यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।

डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।

डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।

कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।

गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।

आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।

विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।

सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।

इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।

कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।

“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।

“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।

"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"

“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।

"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।

“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।

गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।

“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।

तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"

अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।

“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।

"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"

गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।

“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।

“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।

“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।

"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।

ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।

“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।

“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।

गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।

“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।

"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।

“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।

ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।

ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।

“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।

"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।

“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।

यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।

ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।

“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।

“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।

“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।

“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।

गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।

अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।

चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।

“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।

“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।

उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।

यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।

जारी रहेगा_____✍️
 
#185.

“ब्लैकून के इस भाग में क्या है पिताजी?” ओरस ने पूछा।

"ब्लैकून का यह भाग ब्रह्मांड की सभी घटनाओं का संरक्षण करता है, इसलिये इसे संरक्षिका कहते हैं।" गिरोट ने कहा- “यानि की यहां से तुम, ब्रह्मांड की अतीत में बीती हुई किसी भी घटना को देख सकते हो, परंतु इस काँच के केबिन में प्रवेश करने के लिये, तुम्हें देवता नोवान से आज्ञा मांगनी होगी और वह आज्ञा तभी देंगे, जब उन्हें तुम्हारा कार्य उचित लगेगा?" यह कह गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के तीसरे भाग में आ गया।

तीसरे भाग में अलग-अलग रंगों से निर्मित, मकड़ी के जाले के समान, पूरा जाल बिछा था, हर ओर बस विभिन्न रंगों का जाल ही दिखाई दे रहा था। उस जाल से तीव्र रोशनी निकल रही थी और वह जाल धीरे-धीरे हवा में घूम भी रहा था।

"यह कौन सा भाग है पिताजी? यह तो अत्यंत विचित्र और जटिल लग रहा है।" ओरस ने कहा।

“यह ब्लैकून का तीसरा भाग है। इसमें दिखाई दे रहा यह जाल, असल में आकाशगंगाओं का मानचित्र है। हमारी आँखों से जितना ‘दृश्य ब्रह्मांड' दिखाई देता है, यह उसका कृत्रिम रुप है। इस भाग से हमें ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह की जानकारी और दूरी का पता चलता है।"

इसके बाद गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के चौथे भाग में पहुंच गया। ब्लैकून के चौथे भाग में हर ओर बड़ी-बड़ी घिरनियां लगी हुईं थीं, ऐसा लग रहा था कि जैसे वह किसी विशाल घड़ी के अंदर खड़े हों।

चारो ओर की दीवारों पर, ब्रह्मांड के अलग-अलग दृश्य नजर आ रहे थे। उन सभी घिरनियों के बीच, हवा में एक आरामदायक कुर्सी लगी हुई थी, वह कुर्सी नीले रंग की किरणों से निर्मित लग रही थी। उस कुर्सी के दोनों ओर के हत्थों में असंख्य बटन लगे थे।

“यह क्या है पिताजी? यह तो कोई बहुत ही आधुनिक सी चीज लग रही है?” ओरस ने मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते हुए कहा।

“यही तो है हमारा नया अविष्कार- समयचक्र। ओरस ने अपना सीना फुलाते हुए, अभिमान से कहा“ यह किसी को भी आकाशगंगा के एक कोने से दूसरे कोने तक, एक क्षण में पहुंचा सकता है।"

“पर आकाशगंगा तो बहुत बड़ा है पिताजी, फिर यह इतनी तेजी से कैसे कार्य करेगा? इतनी तेज तो ब्रह्मांड की कोई भी चीज नहीं चल सकती।” ओरस ने कहा।

“यह ब्लैक होल के सिद्धांतो पर कार्य करती है पुत्र। और ब्लैक होल के अंदर समय का कोई अस्तित्व नहीं होता, इसलिये यह समय को रोककर, यात्रा करने वाले को दूसरी आकाशगंगा में पहुंचा सकती है।” ओरस ने कहा।

“अरे वाह! फिर तो यह बहुत अच्छी चीज है, मैं तो बड़ा होकर इससे पूरा ब्रह्मांड घूमूंगा।” ओरस खुश होते हुए, अपने हाथ में पकड़े, छोटे से यान को लेकर, समयचक्र की कुर्सी पर जा बैठा।

“अरे-अरे, अभी नहीं बैठो इस पर, अभी तो तुम्हें इसे चलाना भी नहीं आता।” गिरोट ने कहा- “पहले तुम्हें ज़ेनिक्स से इसके सारे कंट्रोल्स सीखने होंगे, तभी तुम इसे चलाने योग्य हो पाआगे।"

यह सुनकर ओरस उस समयचक्र की कुर्सी से उतरकर नीचे आ गया, पर ओरस के हाथ में पकड़ा वह छोटा सा यान उस कुर्सी पर ही रह गया।

ओरस ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। अब ओरस की निगाह, काँच के पारदर्शी गोले में बंद सैकड़ों यंत्रों पर गई।

ओरस की निगाह एक विचित्र से हथियार पर जाकर रुक गई, जो कि एक आधुनिक गन की तरह से दिखाई दे रहा था।

“यह हथियार कैसा है पिताजी?" ओरस ने गिरोट से पूछा।

“इस हथियार को ज़ेप्टोनाइजर कहते हैं पुत्र।" गिरोट ने कहा- “यह किसी भी वस्तु को उसके मूल आकार से अरबों गुना छोटा कर देता है। इसे ब्लैक होल की शक्ति से निर्मित किया गया है। चूंकि ज़ेप्टो, आकार की बहुत छोटी इकाई है, इसलिये मैंने इसका नाम ज़ेप्टो नाइजर रखा।"

तभी अचानक दोनों को ब्लैकून के बाहर से कोई शोर सा सुनाई दिया।

शोर सुनकर गिरोट घबरा गया, उसने तुरंत ज़ेप्टो नाइजर को हाथ में पकड़ा और ओरस को साथ लेकर, तेजी से ब्लैकून के बाहर की ओर भागा।

जब गिरोट ब्लैकून के बाहर निकला, तो उसने देखा कि कुछ अंतरिक्ष यान, उसके ग्रह की ऊपरी वायुमण्डल में दिखाई दे रहे हैं, जो कि तेजी से उसके महल की ओर बढ़ रहे थे।

अब गिरोट हाथ में ज़ेप्टोनाइजर लिये, अपनी ओर भागकर आते कुछ अपने ही सैनिकों को देखने लगा।

इधर जहां एक ओर गिरोट की नजर, घबरा कर भाग रहे, डेल्फानो के लोगों पर थी, वहीं नन्हे ओरस की निगाह अपने हाथ की ओर गई।

ओरस का यान इस समय उसके हाथ में नहीं था। तभी ओरस को याद आया, कि वह यान तो समयचक्र वाली कुर्सी पर ही रह गया।

यह याद कर ओरस ने एक बार अपने पिता की ओर देखा और फिर उन्हें व्यस्त देख वापस ब्लैकून की ओर भागा।

इस चीख-पुकार और भगदड़ के माहौल में गिरोट ने यह ध्यान नहीं दिया कि ओरस, वापस ब्लैकून में जा चुका है। तभी गिरोट को एक अंतरिक्ष यान अपनी ओर आता हुआ दिखाई दिया।

यह देखकर घबराकर गिरोट ने ज़ेप्टो नाइजर को उठाया और उसका मुंह ब्लैकून की ओर कर दिया।

अब गिरोट ने ज़ेप्टोनाइजर को ज़ेप्टोमीटर पर सेट किया और उसका बटन दबा दिया।

ज़ेप्टो नाइजर से एक तेज गोल तरंगें निकलकर, ब्लैकून की ओर झपटीं। जैसे ही वह गोलाकार तरंगें ब्लैकून से टकराईं, पूरा का पूरा ब्लैकून, एक कंचे के आकार में बदल गया। अब वह देखने में एक काले मोती के समान नजर आ रहा था।

गिरोट ने भागकर ब्लैकून को उठा लिया। तभी अचानक से गिरोट को ओरस का ध्यान आया। अब वह पागलों की तरह से इधर-उधर ओरस को ढूंढने लगा, पर ओरस उसे कहीं नजर नहीं आया।

गिरोट ने तुरंत अपने हाथ में पहने चौड़े से कड़े पर लगा एक बटन दबा दिया।

"ओरस_____, तुम कहां हो? जवाब दो ओरस।” गिरोट ने अपने हाथ के कड़े को अपने मुंह के पास ले जाते हुए कहा। शायद वह कड़ा गिरोट और ओरस के बीच संपर्क का कोई यंत्र था।

“ओरस तुम मेरी बात सुन रहे हो? जल्दी जवाब दो ओरस, यह बहुत ही संकट की घड़ी है, तुम्हें तुरंत मेरे पास आना होगा।” गिरोट लगातार उस यंत्र पर चीखकर ओरस को पुकार रहा था।

“हां पिताजी, मैं आपकी आवाज सुन रहा हूं।” तभी ओरस की आवाज उस यंत्र से सुनाई दी- “मैं इस समय ब्लैकून में हूं। मैं यहां अपना यान लेने आया था, पर.....पर पता नहीं क्यों ज़ेनिक्स अब ब्लैकून का दरवाजा नहीं खोल रही है?"

यह सुनते ही गिरोट पर मानों बिजली सी गिर गई। अब वह कभी अपने हाथ में पकड़े, कंचे के आकार के ब्लैकून को देख रहा था, तो कभी अपने दूसरे हाथ में पहने कड़े को, जिससे आती ओरस की आवाज, अब गिरोट को पूरी तरह से विचलित कर रही थी।

“हे मेरे देवता नोवान, क्या समय वापस दोहराया जा रहा है? क्या फिर से वही सब होगा? जो सदियों पहले मेरे साथ हुआ था...नहीं-नहीं देवता, मैं अपने पुत्र के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा। मैं...मैं उसे वापस पृथ्वी पर भेज दूंगा। पृथ्वी के माहौल में रहकर, वह अवश्य ही....डेल्फानो को भूल जायेगा...पर ....पर उसे पृथ्वी पर भेजने से, समय कई आयामों में उलझ सकता है? परंतु अब मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं है देवता नोवान उसकी रक्षा करेंगे।

गिरोट, विचलित होकर अपने आप से ही बोले जा रहा था, पर गिरोट की सभी आवाजें ओरस को साफ सुनाई दे रहीं थीं।

“ओरस...ओरस, तुम तुरंत जाकर समयचक्र की कुर्सी पर बैठ जाओ और जैसा मैं कहता हूं, वैसा ही करो। जल्दी.....हमारे पास समय बहुत कम है।” गिरोट ने कड़े पर चीखकर कहा।

गिरोट की बात सुन ओरस ब्लैकून के मुख्य द्वार से समयचक्र की ओर भागा।

कुछ ही देर में ओरस समयचक्र की कुर्सी पर जा कर बैठ गया- “जी पिताजी, मैं समयचक्र की कुर्सी पर बैठ गया हूं। अब बताइये मुझे क्या करना है?"

“अब अपने दाहिने हत्थे पर लगे, नीले बटन को दबाओ और अपने हाथ में पहने कड़े को उस बटन के पास ले जाओ।” गिरोट ने कहा।

ओरस ने तुरंत गिरोट के आदेश का पालन किया। खतरा भांपकर इस समय नन्हा ओरस, बिल्कुल किसी बड़े की तरह अपने पिता के आदेश का पालन कर रहा था।

"ज़ेनिक्स, क्या तुम मेरी बात सुन रही हो?” गिरोट ने कहा।

गिरोट की बात सुनते ही, ओरस को अपने सामने एक नीले रंग के कंप्यूटराइज़्ड जाल से बनी हुई, एक स्त्री की आकृति दिखने लगी, जो कि शत-प्रतिशत ज़ेनिक्स थी।

"हां गिरोट, मैं आपकी बातों को ध्यान से सुन रहीं हूं।” ज़ेनिक्स ने कहा।

“ठीक है, तो ज़ेनिक्स, अभी तत्काल प्रभाव से, मैं अपने सारे अधिकारों को युवराज ओरस को देता हूं। आज से और अभी से तुम ओरस को उसी तरह से सहयोग करोगी, जैसे कि तुमने मेरा किया है। तुम उसे पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान दोगी, पर यह ध्यान रहे कि तुम्हें युवराज की आयु के हिसाब से ही अपने लेवल को सेट करना होगा और जब तक युवराज ओरस अपनी निश्चित आयु पूरी ना कर लें, तब तक तुम्हें पूरे ब्लैकून को सुरक्षित रखना होगा। अब तुम तुरंत युवराज ओरस को लेकर पृथ्वी पर चली जाओ और अब जब तक ओरस अपनी निश्चित आयु को पूरी नहीं करता, तब तक तुम्हें, उसे समयचक्र का प्रयोग करने से रोकना

होगा। ध्यान रहे ज़ेनिक्स...पृथ्वी और सन् 1982....और आगे तुम्हें पता है कि तुम्हें क्या करना है?"

तभी गिरोट के सामने एक यान आकर रुका और उसमें से कुछ अंतरिक्ष के नीले जीवों ने निकलकर गिरोट को चारो ओर से घेर लिया, पर फिर भी गिरोट जल्दी-जल्दी बोलता जा रहा था।

शायद गिरोट को पता था कि इसके बाद, समयचक्र के निर्माता को कभी समय नहीं मिलेगा।

"जेनिक्स.....संरक्षिका का ध्यान रखना और समय आने पर उसका रहस्य ओरस को बता देना।.....अब तुम तुरंत निकल जाओ यहां से।” यह कहकर गिरोट ने अपने उस हाथ की मुठ्ठी बंद कर ली, जिस हाथ में उसने ब्लैकून को पकड़ रखा था।

तभी उन जीवों के कमांडर ने अपनी तीर जैसी पूंछ को हवा में लहराते हुए कहा- “गिरोट....डेल्फानो के राजा...समयचक्र के निर्माता... बताओ समयचक्र कहां है? और तुम अभी किस से बात कर रहे थे?"

यह कहते हुए उस जीव ने अपने हाथ में पकड़ी विचित्र सी गन का मुंह गिरोट की ओर कर दिया।

“समयचक्र समयचक्र मेरे महल में है।" गिरोट ने साफ झूठ बोलते हुए कहा- “तुम मेरे साथ महल में चलो, मैं तुम्हें समयचक्र दे देता हूं।"

“तुम्हें तो सही से झूठ बोलना भी नहीं आता गिरोट....तुम्हें क्या लगा कि तुम मुझे धोखा दे दोगे?...मुझे सब पता है, समयचक्र तुम्हारे ब्लैकून नाम की प्रयोगशाला में है। बताओ कहां है तुम्हारी प्रयोगशाला?" जीवों के उस कमांडर ने कहा।

उसकी बात सुन गिरोट ने अपनी मुठ्ठी को और कस कर बंद कर लिया।

“क्या है तुम्हारे उस हाथ की मुठ्ठी में?” कमांडर ने गिरोट के हाथ की ओर देखते हुए कहा- “कहीं इसमें ब्लैकून की चाबी तो नहीं ? इसके हाथ की मुठ्ठी खोलो।" कमांडर ने सैनिक जीवों की ओर इशारा करते हुए कहा।

तुरंत कुछ सैनिक जीव, गिरोट की ओर बढ़े। एक जीव ने गिरोट के हाथ से ज़ेप्टो नाइजर छीन ली और कुछ जीव गिरोट का वह हाथ खुलवाने लगे।

कुछ ही देर में उन जीवों ने अपनी पूरी ताकत लगाकर, गिरोट की मुठ्ठी खोल ली, पर गिरोट की हथेली में कुछ भी नहीं था।

यह देखकर गिरोट ने राहत की साँस ली। वह समझ गया कि ज़ेनिक्स, ओरस को लेकर पृथ्वी की ओर जा चुकी है। अब गिरोट के चेहरे पर एक शांति भरी मुस्कान थी, अब उसे अपने मरने की भी कोई चिंता नहीं थी।

गिरोट के चेहरे की मुस्कान कमांडर को नागवार गुजरी और उसने गुस्से में अपनी गन उठा कर गिरोट पर किरणों का वार कर दिया।

एक पल में ही गिरोट का शरीर राख में बदलकर वातावरण में मिल गया। अब वह सदा-सदा के लिये कई रहस्यों को अपने सीने में दबाकर प्रकृति में समाहित हो चुका था।

एक शांति प्रिय ग्रह के राजा का हस्र दुखद हुआ था। अब कमांडर के आदेश पर सभी जीव डेल्फानों को बर्बाद करने में लग गये।

जारी रहेगा______✍️
 
#186.

अराका युद्ध: (17.01.02, गुरुवार, सीनोर राज्य का समुद्र तट, अराका द्वीप)

मेलाइट और सुर्वया ने जैसे ही सनूरा को अपनी कहानी सुनाने को कहा, तभी महल में किसी बड़े ढोल की आवाज सुनाई देने लगी थी।

सुर्वया ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखकर बताया कि सीनोर राज्य के समुद्र तट पर, समुद्र की लहरों पर कोई विशालकाय चीज खड़ी है।

सुर्वया के शब्द सुन सनूरा तेजी से बाहर की ओर भागी। सनूरा को बाहर जाते देख मेलाइट और सुर्वया ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर वह भी सनूरा के पीछे भाग लीं। आखिर वह सब अब एक अच्छी दोस्त थीं।

सनूरा जैसे महल के बाहर वाले प्रांगण में पहुंची, उसे घबराया हुआ लुफासा एक ओर से आता दिखाई दिया। महल की मीनारों पर मौजूद प्रहरी, अभी भी बड़ा सा ढोल बजा रहा था।

“सुर्वया ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि हमारे समुद्र तट पर कोई विशाल आकृति खड़ी है। वह क्या है? वह तो वहां पहुंचने पर ही पता चलेगा।” सनूरा ने लुफासा से कहा।

तभी लुफासा के सामने एक विशाल रथ आकर खड़ा हो गया, जिसे 4 तेंदुए खींच रहे थे।

“सनूरा, तुम सबको लेकर समुद्र तट पर पहुंचो, मैं आसमान से तुम सब पर नजर रखे हूं।” लुफासा ने सनूरा से कहा- “लेकिन ध्यान रखना, जब तक हो सके, हमें किसी भी युद्ध को टालना है।" यह कहकर लुफासा ने एक बार सुर्वया, मेलाइट ओर रोजर की ओर देखा और फिर एक विशाल चील में परिवर्तित होकर आसमान में उड़ गया।

लुफासा के जाते ही सनूरा रथ पर बैठ गई। सनूरा को रथ पर बैठते देख मेलाइट, सुर्वया और रोजर भी रथ पर बैठ गये। इस समय रोजर ने पूरे कपड़े पहन रखे थे।

“क्या लगता है आप लोगों को? समुद्र तट पर किस प्रकार का खतरा होगा?” मेलाइट ने सुर्वया से पूछा।

लेकिन इससे पहले कि सुर्वया कोई जवाब दे पाती, उसे रोजर की बुदबुदाती आवाज सुनाई दी- “आपसे बड़ा तो नहीं ही होगा।"

“तुमने मुझे खतरा कहा?” अब मेलाइट अचानक से रोजर की ओर ही घूम गई।

“न...न...नहीं तो। मैनें ऐसा कब कहा।” रोजर ने घबराते हुए कहा।

“तुम भूल रहे हो रोजर कि मैं एक हिरनी हूं, मेरे कान बहुत तेज होते हैं।” मेलाइट ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।

“पर मैंने तो सुना था कि बिल्ली के कान तेज होते हैं।” रोजर ने बात को बदलते हुए कहा।

“रोजर का कहना ठीक है, बिल्ली के कान ही सबसे तेज होते हैं।” सनूरा ने बिल्ली के परिवार का पक्ष लेते हुए कहा।

"हां-हां ठीक है, पर हिरनी के भी होते हैं।” मेलाइट ने सनूरा को बीच में पड़ते देख सरेंडर करते हुए कहा।

"मेरे हिसाब से सिंह के कान सबसे तेज होते हैं। अब सुर्वया ने भी अपने लोक का हवाला देते हुए कहा।

“क्या दोस्तों? हम इस समय समुद्र तट की ओर जा रहे हैं, जहां पर कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है और आप लोग हिरन, शेर और बिल्ली के कान पर लगे हुए हो।" रोजर ने मुस्कुराते हुए कहा।'

रोजर की बात सुन मेलाइट को याद आया कि वह तो कोई और ही बात कर रहे थे, पर रोजर ने ही उन सभी का ध्यान भंग कर दिया था।

अब मेलाइट ने घूरकर रोजर की ओर देखा। मेलाइट को घूरते देख रोजर ने सटपटा कर अपनी नजरें दूसरी ओर कर लीं। यह देख मेलाइट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

तभी सनूरा को समुद्र तट का किनारा दिखाई देने लगा, जहां पर लहरों के ऊपर, एक विशाल अंतरिक्ष यान खड़ा दिखाई दे रहा था, पर अभी दूरी अधिक होने के कारण वह सनूरा के अलावा और किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।

उस अंतरिक्ष यान को देख, सनूरा ने अपने पास से 3 लाल रंग की बिंदियां निकालकर मेलाइट, सुर्वया और रोजर की ओर बढ़ा दिया।

"तुम तीनों इन बिंदियों को अपने गले पर चिपकालो, इससे अराका द्वीप का सुरक्षा घेरा, तुम्हें अंदर या बाहर जाने पर रोकेगा नहीं।"

तीनों ने जल्दी से अपने-अपने गले पर उन बिंदियों को चिपका लिया।

कुछ ही देर में चारो सीनोर के समुद्र तट पर खड़े, उस अंतरिक्ष यान को निहार रहे थे।

सनूरा ने धीरे से सिर उठाकर ऊपर आसमान की ओर देखा, उसे लुफासा उस अंतरिक्ष यान की ओर जाता दिखाई दिया।

समुद्र की लहरों पर खड़ा अंतरिक्ष यान लगभग 100 मीटर बड़ा, काले रंग का यान था। उसका आकार बिल्कुल गोल था, उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह ज्वालामुखी से निकले लावे से निर्मित हो।

उस अंतरिक्ष यान पर अजीब सी आड़ी-तिरछी धारियां बनी हुई थीं।

उस अंतरिक्ष यान पर कुल 10 मनुष्य की तरह दिखने वाले जीव खड़े थे, जिनका शरीर हल्की सी नीली रंगत वाला था और उन सभी ने एक ही तरह की, गाढ़े नीले रंग की ड्रेस पहन रखी थी।

हर ड्रेस के बीच में एक सुनहरे रंग का गोला बना था, जिस पर A1 से लेकर A10 तक लिखा हुआ था। वह सभी अंतरिक्ष यान के ऊपर एक क्रमबद्ध तरी के से खड़े थे।

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उधर इन सबसे दूर सीनोर राज्य में बने पिरामिड के अंदर, एक बड़ी सी स्क्रीन पर, यह पूरा दृश्य, वहां खड़े मकोटा, वुल्फा और जैगन देख रहे थे।

इस समय जैगन का आकार एक साधारण मनुष्य के बराबर ही था। शायद उसके पास अपने आकार को घटाने और बढ़ाने की भी विशेषता थी।

“यह तो कोई अंतरिक्ष के जीव हैं? जो अराका वासियों से लड़ने के लिये आये हैं।” वुल्फा ने कहा “क्या हमें भी इस युद्ध का हिस्सा बनना चाहिये मांत्रिक?"

“हां-हां बनना चाहिये।” मकोटा के बोलने के पहले ही जैगन बोल उठा- “बहुत दिन हो गये युद्ध किये हुए... पहले मुझे भेजो, मैं इन सबको काटकर खा जाऊंगा।

“मूर्ख मत बनो जैगन।” मकोटा ने जैगन को समझाते हुए कहा- “हमें पहले यहीं से बैठकर इस युद्ध को देखना चाहिये। पता तो चले कि लुफासा जैसे मूर्ख ने और किस-किस को सीनोर में छिपा कर रखा है?"

मकोटा का इशारा इस समय मेलाइट, रोजर व सुर्वया की ओर था, जो उसके लिये बिल्कुल नये थे।

“और अगर उन अंतरिक्ष के जीवों के पास कोई खतरनाक शक्ति हुई? तो हम उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर, अपना लक्ष्य भी तो पूरा कर सकते हैं?” मकोटा के शब्दों में लोमड़ी सी मक्कारी झलक रही थी-

“पर एक चीज समझ में नहीं आई कि यह पूरी पृथ्वी को छोड़कर यहां अराका पर लेने क्या आये हैं?"

“मुझे लगता है कि युद्ध शुरु होने के बाद हमें काफी जानकारी अपने आप मिल जायेगी।” वुल्फा ने कहा “वह देखिये, अब उनमें से 1 जीव, पानी पर चलता हुआ, उन लोगों की ओर ही बढ़ रहा है।"

..............................

1 जीव को अपनी ओर बढ़ता देख, सनूरा ने सभी को सावधान होने का इशारा कर दिया।

1 उस जीव के गोले पर, A10 लिखा था। वह जीव पानी पर चलता हुआ, सनूरा के सामने आ पहुंचा।

“तुम में से इस द्वीप का कमांडर कौन है?” उस जीव ने साफ अंग्रेजी बोलते हुए कहा। उसे अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते देख सनूरा सहित सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

“मैं हूं इस द्वीप की कमांडर। मेरा नाम सनूरा है। सनूरा ने कहा- “तुम लोग कौन हो? और तुम्हारे यहां आने का क्या उद्देश्य है?"

“मेरा नाम एलात्रा है, मैं और मेरे बाकी 9 साथी, पृथ्वी से 2.5 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर, एण्ड्रोवर्स आकाशगंगा के फेरोना ग्रह से आये हैं। हमें पृथ्वी पर हमारे एक दुश्मन की तलाश है, जो कि इस द्वीप पर ही कहीं छिपकर बैठा है। अगर तुमने बिना किसी शर्त, उसे हमे सौंप दिया, तो हम बिना युद्ध किये इस ग्रह से चले जायेंगे।" एलात्रा ने कहा।

“पर हमारे द्वीप पर कोई भी परग्रह वासी नहीं छिपा है। तुम पता नहीं किसकी बातें कर रहे हो?” सनूरा ने एलात्रा को समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

“उसका नाम ओरस है...वह अंतरिक्ष के एक ग्रह डेल्फानो का राजकुमार है और हमारे सिग्नल के अनुसार वह 3 दिन पहले तक इसी द्वीप पर था। पता नहीं कैसे अचानक ही उसके सिग्नल आने बंद हो गये? इसी लिये हमको यहां आना पड़ा। ...अब अगर तुम लोग उसके बारे में कुछ नहीं बताओगे? तो विवश होकर हमें आपस में युद्ध करना ही पड़ेगा।

“अच्छा ठीक है एलात्रा, तुम हमें कुछ दिन का समय दे दो, हम उस ओरस को ढूंढकर, तुम्हें जल्दी ही सौंप देंगे।” सनूरा ने दिमाग लगाते हुए, एक बार फिर युद्ध को टालने की कोशिश की।

यह सुनकर एलात्रा ने अपने अंतरिक्ष यान से संपर्क करते हुए किसी से कहा- “कमांडर रेने, इस द्वीप का कमांडर, ओरस को हमें सौंपने के लिये कुछ समय मांग रहा है? आप बताइये कि हमें क्या करना है?"

कुछ क्षण रुकने के बाद दूसरी ओर से आवाज आई“ ठीक है, तुम इन्हें 3 दिन का समय देकर वापस अपने अंतरिक्ष यान पर आ जाओ।

"जी......कमांडर।” एलात्रा ने रेने से कहा।

"हमारे कमांडर ने आप लोगों को 3 दिन का समय देने को कहा है। हम 3 दिन बाद फिर से वापस आयेंगे। एलात्रा ने सनूरा से कहा और फिर पलटकर अपने अंतरिक्ष यान की ओर चल दिया।

मकोटा से यह समझौता देखा नहीं गया, उसने पिरामिड से बैठे-बैठे ही, अपने हाथ में पकड़ी सर्प के समान, छड़ी को हवा में लहराया।

उसके ऐसा करते ही मकोटा की छड़ी से एक लाल रंग की किरण निकली और हवा में ऊंची उठती हुई, समुद्र तट पर मौजूद एलात्रा से कुछ दूरी पर जाकर गिरी। एक तरह से मकोटा ने युद्ध का बिगुल बजा दिया था।

अब एलात्रा पीछे पलटा और सनूरा को घूरने लगा। इससे पहले कि सनूरा एलात्रा को कुछ समझा पाती, अंतरिक्ष यान से 3 और जीव कूदकर अराका की ओर चल दिये।

अब सनूरा के पास किसी को भी समझाने का समय नहीं था, अब तो हराने या हारने का समय था।

मेलाइट, सुर्वया और रोजर भी किसी भी हमले से निपटने के लिये तैयार हो गये थे। सुर्वया के हाथ में अचानक से तीर-धनुष दिखाई देने लगा।

“क्या कोई मुझे भी किसी प्रकार का हथियार देगा?" रोजर ने धीमें स्वर में बोलते हुए कहा।

"हां, मैं देती हूं।” यह कहकर मेलाइट ने रोजर की शर्ट एक झटके से फाड़कर फेंक दी- “यही है तुम्हारा हथियार।"

रोजर अब बिना शर्ट के उस युद्ध के मैदान में खड़ा था, पर उसकी नाभि से निकल रही तेज रोशनी एलात्रा का ध्यान बार-बार उधर ही ले जा रही थी।

रोजर को समझ ही नहीं आया कि मेलाइट ने ऐसा क्यों किया? वह तो बस अभी अंतरिक्ष यान की ओर से, पास आ रहे जीवों को देख रहा था।

तभी एलात्रा ने अपने हाथ हवा में उठाये और अपना पहला वार सनूरा पर कर दिया।

एलात्रा के हाथ से तेज बिजली की लहर निकली और सनूरा की ओर बढ़ी, पर सनूरा पहले से ही इसके लिये तैयार थी, उसने एक ओर झुककर उस वार को बचाया।

बिजली की वो लहर, सनूरा के पीछे मौजूद एक पेड़ पर जाकर गिरी, पेड़ अब धू-धू करके जलने लगा। यह देखकर सनूरा समझ गई, कि इस एलात्रा के अगले वार से बचना होगा।

तभी मेलाइट आगे बढ़ी और एलात्रा के सामने जाकर खड़ी हो गई।

अब मेलाइट ने सबसे चीखकर कहा- “तुम लोग बाकी के जीवों पर ध्यान दो, मैं इस एलात्रा से निपटती हूं।" यह कहकर मेलाइट ने अपने सिर को तेजी से दांये बांये हिलाया।

अब वह बैल के बराबर की एक सुनहरी हिरनी में परिवर्तित हो गई। उस सुनहरी हिरनी की सींगें, और पैर सोने के थे। एलात्रा एकाएक मेलाइट के इस रुप परिवर्तन को समझ नहीं पाया।

तभी मेलाइट ने बिजली की फुर्ती से एलात्रा के पेट में अपनी सींगें घुसा दीं। एलात्रा के शरीर से नीले रंग का खून निकलकर, समुद्र के पानी में मिक्स होने लगा।

उधर A2 नंबर का जीव, जिसका नाम नीडो था, सनूरा की ओर बढ़ा। नीडो ने अपने दोनों हाथों को आगे किया, जिससे बहुत से छोटे-छोटे धारदार सितारे निकलकर सनूरा की ओर लपके।

सनूरा ने तुरंत अपने हाथों से ताली बजाई, जिससे वह एक विशाल बिल्ली में परिवर्तित हो गई।

अब सनूरा की स्पीड देखने लायक थी। उसने उछलकर, हवा में ही अपने शरीर का एक कोण बनाया और सभी सितारों से आसानी से बच गई।

अब सनूरा ने उछलकर नीडो के शरीर पर अपना पंजा मारा। नीडो के सीने पर मौजूद उसकी ड्रेस, कुछ मांस और खून लिये अब सनूरा के पंजों में फंसी थी। अब नीडो सनूरा से सावधान हो गया था।

तीसरे जीव A9 का नाम सलोहा था। सलोहा ने जैसे ही एलात्रा और नीडो का खून से सना शरीर देखा, उसने तुरंत अपने शरीर को एक ‘मरकरी' की तरह के द्रव फार्म में बना लिया। सलोहा को आगे बढ़ता देख सुर्वया ने उस पर तीरों की बौछार कर दी।

पर सुर्वया के चलाये हुए सारे तीर सलोहा के पार जा रहे थे, उन तीरों का उस पर कोई भी असर नहीं हो रहा था।

यह देख सुर्वया ने अपने मन में कोई मंत्र पढ़ा, जिससे उसके धनुष पर एक आग के समान तीर दिखाई देने लगा, सुर्वया ने वह तीर भी सलोहा पर फेंक कर मार दिया।

इस तीर के लगते ही सलोहा का शरीर, पूरी तरह से आग की लपटों के बीच घिर गया।

यह देख सुर्वया की नजर चौथे जीव A3 पर गई, जिसका नाम डार्को था, पर सबकी आशा के विपरीत डार्को, आराम से पानी पर खड़े होकर उस युद्ध को देख रहा था।

डार्को जैसा ही हाल रोजर का भी था, उसे तो कुछ पता ही नहीं था कि युद्ध करना कैसे है? वह भी डरी-डरी निगाहों से चारो ओर हो रहे इस घमासान को देख रहा था।

उधर मेलाइट, एलात्रा को अपनी सींघों में फंसाकर इधर-उधर पटक रही थी। एलात्रा को संभलने का भी मौका नहीं मिल पा रहा था।

उधर नीडो ने अब अपने हाथों से सितारे फेंकने बंद कर दिये थे, उसे पता चल गया था कि उन सितारों से, वह सनूरा रुपी बिल्ली का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा? इसलिये इस बार उसने अपनी चाल बदल दी।

नीडो ने एक बार फिर अपना हाथ सनूरा की ओर उठाया, सनूरा को लगा कि नीडो फिर से सितारे फेंकने जा रहा है, इसलिये उसने हवा में छलांग लगा दी, पर इस बार सनूरा के ठीक सामने हवा में एक जोर का धमाका हुआ, जिसके कारण सनूरा, नीचे जमीन पर गिर गई।

सनूरा का बिल्ली वाला शरीर इस धमाके से कई जगह पर जख्मी हो गया था, पर सनूरा किसी भी चीज की परवाह किये बिना फिर से खड़ी हो गई।

यह देख सुर्वया ने इस बार नीडो पर तीरों की बौछार कर दी। नीडो का सारा ध्यान सनूरा की ओर था, इसलिये वह सुर्वया के तीरों से बच नही पाया।

कम से कम 8 से 10 तीर नीडो के शरीर में जाकर घुस गये। जिसकी वजह से नीडो वहीं पानी पर गिर गया।

तभी सलोहा ने सुर्वया का ध्यान दूसरी ओर देख, अपने द्रव्य रुपी शरीर से सुर्वया को पूरी तरह से जकड़ लिया।

यह देख मेलाइट ने एलात्रा को वहीं नीडो के पास जमीन पर पटका और सुर्वया की ओर तेजी से दौड़ पड़ी।

मेलाइट ने सुर्वया के पास पहुंचकर अपनी सोने की सींगें, सलोहा के द्रव्य वाले शरीर से छुआ दिया।

मेलाइट के सींगों से छूते ही सलोहा को अपने शरीर में एक तेज गर्मी का अहसास हुआ और वह पूरा का पूरा पिघलकर सुर्वया के पास जमीन पर गिर गया। अब सुर्वया फिर से आजाद हो गई थी।

तभी नीचे गिरे पड़े घायल नीडो ने अपना मुंह जोर से खोल दिया। उसके मुंह से एक छोटा सा सूर्य के समान गोला निकला और उसने वहां के वातावरण में तेज गर्मी पैदा कर दी।

उस गर्मी ने एक सेकेण्ड में ही सबके पसीने छुड़ा दिये। अंतरिक्ष के उन जीवों पर इस गर्मी का कोई असर नहीं हो रहा था।

अब सभी सीनोरवासी युद्ध करना छोड़, उस गर्मी से बचने के लिये इधर-उधर छिपने की जगह ढूंढने लगे।

पर जाने क्यों रोजर को इस भयानक गर्मी का बिल्कुल भी अहसास नहीं हा रहा था, यह देख रोजर उस हवा में नाच रहे छोटे से सूर्य के और पास पहुंच गया।

जैसे ही रोजर उस सूर्य के पास पहुंचा, वह सूर्य छोटा होकर रोजर की नाभि में समा गया। यह देखकर अंतरिक्ष के जीव क्या सभी अराका वासी भी हैरान हो गये।

सबसे ज्यादा हैरानी तो स्वयं रोजर को हो रही थी।

तभी घायल पड़े एलात्रा ने, अपने हाथ को हवा में जोर से उठाया, उसके ऐसा करते ही आसमान में तेज बिजली कड़कने लगी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, एक बिजली रोजर पर आकर गिरी।

रोजर का शरीर हवा में उछला और एक पल में निष्प्राण हो गया। यह देख जैसे मेलाइट का खून खौल गया, उसने अपने आकार को थोड़ा और बड़ा कर लिया और पूरे आसमान की बिजली को अपनी सींघों में सोख लिया।

अब मेलाइट की खूंखार निगाहें सिर्फ और सिर्फ एलात्रा पर थीं। इससे पहले कि एलात्रा अपने बचाव में कुछ कर पाता, मेलाइट ने अपनी सींघों में भरी पूरी बिजली को उल्टा एलात्रा पर ही मार दिया।

शायद आज पहली बार एलात्रा को, अपनी ही दवा का स्वाद अनुभव करना पड़ रहा था। कड़कड़ाती हुई वह बिजली एलात्रा पर जाकर गिरी। जिसकी वजह से एलात्रा पूरा स्वाहा हो गया। उसके शरीर का कण-कण जलकर हवा में बिखर गया।

अब इतनी देर से वहां खड़े तमाशा देख रहे डार्को की आँखें जल उठीं, वह अपने हाथ उठाकर हमला करने ही जा रहा था कि तभी समुद्र की लहरों के बीच से एक विशाल व्हेल हवा में उछली और उसे गपक कर पानी के अंदर चली गई।

जी हां, वह कोई और नहीं बल्कि लुफासा था। लुफासा अब किसी को कोई भी मौका नहीं देना चाहता था।

लुफासा ने डार्को को अपने दाँतों में कसकर दबाया और समुद्र की गहराई के अंदर छलांग लगा दी।

उधर नीडो और सलोहा मेलाइट का विकराल रुप देख धीरे-धीरे पीछे की ओर खिसकने लगे थे।

अब मेलाइट ने अपना रुप परिवर्तित कर लिया। अब वह फिर से स्त्री रुप में आ गई और रोजर का शरीर अपनी बांहों में भरकर जोर-जोर से रोने लगी।

सनूरा को पता था कि खतरा अभी टला नहीं इसलिये वह मेलाइट के पास पहुंच तो गई थी, पर उसकी निगाहें अभी भी नीडो और सलोहा की ओर थीं।

सुर्वया से मेलाइट का इस प्रकार रोना देखा नहीं जा रहा था। तभी सुर्वया की निगाह अंतरिक्ष यान से निकलकर आ रहे 4 और योद्धाओं पर पड़ी।

यह देख सुर्वया का दिमाग पूरी तरह से खराब हो गया। अब उसने अपने वस्त्रों में छिपाई एक डिबिया को निकाल लिया और उसका ढक्कन खोलकर तेज आवाज में चिल्लाई- “सिंहराज, मुझे शुभार्जना की आवश्यकता है।”

सुर्वया के ऐसा बोलते ही उस डिबिया से, एक सुनहरे रंग का धुंआ निकलकर वातावरण में फैलने लगा।

धीरे-धीरे उस सुनहरे धुंए ने अराका के पूरे आकाश को ढंक लिया।

अब अंतरिक्ष यान से निकले जीव, द्वीप को छोड़ उस धुंए को देखने लगे।

तभी उस धुंए ने एक विशाल सिंह का अवतार धारण कर लिया, जिसके मुंह का ही आकार अराका द्वीप से भी बड़ा था।

अब उन अंतरिक्ष के जीवों ने नीडो और सलोहा को उठाया और धीरे-धीरे अपने अंतरिक्ष यान की ओर वापस जाने लगे।

तभी उस महाकाय सिंह ने एक भयानक गर्जना की। उस गर्जना की ध्वनि तरंगें इतनी ज्यादा शक्तिशाली थीं, कि उस सिंह की गर्जना मात्र से ही, पूरा का पूरा अंतरिक्ष यान 20 मीटर तक पीछे खिसक गया।

पर सिंहराज की महा गर्जना का एक असर और हुआ, मरा पड़ा रोजर अचानक से उठकर बैठ गया।

उधर अंतरिक्ष यान के सारे जीव अपने यान में बैठकर, वहां से तुरंत भाग गये।

इधर मेलाइट ने जैसे ही रोजर को उठते देखा, उसने तुरंत अपने आँसू पोंछ लिये और खुश हो ते हुए कहा- “थैंक गॉड कि तुम जिंदा हो।"

रोजर अब अचकचाकर अपने शरीर को देखने लगा, जो कि अब भी मेलाइट की गोद में था।

“अरे वाह, काश ऐसा मरना रोज-रोज हो।" रोजर ने खुश होकर कहा।

रोजर की बात सुन मेलाइट ने रोजर के शरीर को धीरे से जमीन पर रखा और शर्माकर उस जगह से उधर चल दी, जिधर सुर्वया खड़ी थी।

उधर महाकाय सिंहराज का शरीर वापस धुंए में बदलकर उस डिबिया में समा गया।

मेलाइट ने अब सुर्वया को गले से लगा लिया “मुझे पता है कि रोजर को तुमने ही शुभार्जना का प्रयोग कर बचाया है। मैं तुम्हारा यह अहसान पूरी जिंदगी नहीं भूलूंगी सुर्वया।

"चल-चल, मैंने तुम्हारे लिये नहीं बचाया उस ‘कोई और' को। मुझे तो बस कुछ दिन और तुम दोनों का नाटक देखना है। सच में बहुत मजा आता है।” सुर्वया ने किसी बेस्ट सहेली की तरह मेलाइट से मजा लेते हुए कहा- “चलो अब अपनी 'नाभिकीय टॉर्च' को लेकर महल चलते हैं।"

सुर्वया ने 'नाभिकीय टॉर्च' कहकर रोजर का एक नया नामकरण कर दिया था, पर जो भी हो यह नाम रोजर पर बिल्कुल फिट बैठ रहा था।

उधर लुफासा भी डार्को को कहीं पानी में पटककर वापस आ गया था। अतः सभी वापस महल की ओर चल पड़े।

सभी के चेहरे इस समय खुशी से जगमगा रहे थे क्यों कि उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा था और उन्होंने अपने एक शत्रु एलात्रा को मार दिया था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#187.

चैपटर-4

अद्भुत नेत्र: (तिलिस्मा 5.11)

वसंत ऋतु को पार करने के बाद सभी जिस द्वार में प्रवेश किये, वह उन्हें लेकर एक बड़े से नाव के आकार वाले कमरे में पहुंच गया।

यह कमरा लगभग 5,000 वर्ग फुट में निर्मित था, इसकी छत की ऊंचाई भी बहुत ज्यादा थी।

कमरे की जमीन सफेद पत्थरों से बनी थी, जिसके बीच एक 10 मीटर त्रिज्या का नीला गोला और उस नीले गोले के बीच, 2 मीटर त्रिज्या का काला गोला बना था।

उस काले गोले के बीच में, काँच की पारदर्शी लिफ्ट लगी थी, जो कि उस काले गोले से, नीचे की ओर ले जाने के लिये थी। परंतु लिफ्ट पर किसी भी प्रकार का कोई बटन नहीं था।

कमरे की छत पर, लिफ्ट के ठीक ऊपर की ओर एक गोल ढक्कन लगा था।

“यह कमरा तो देखने में बहुत ही अजीब सा लग रहा है?" ऐलेक्स ने कहा।

“सही कह रहे हो ऐलेक्स भैया, इस कमरे का डिजाइन किसी नाव के समान है” शैफाली ने कमरे को देखते हुए कहा- “और इसकी जमीन भी थोड़ी उभरी हुई लग रही है।"

“पर इस कमरे में उस काँच की लिफ्ट के सिवा तो कुछ है ही नहीं?" जेनिथ ने कहा- “शायद उस लिफ्ट से हमें नीचे की ओर कहीं जाना है। पर उस लिफ्ट पर कहीं भी बटन नहीं है, पता नहीं यह कैसे चलती होगी?" यह कहकर जेनिथ उस लिफ्ट की ओर बढ़ी, परंतु अचानक पैर में कुछ चिपचिपा सा अहसास होने की वजह से वह चलते-चलते रुक गई और नीचे जमीन की ओर देखने लगी।

“दोस्तों, यहां जमीन पर कुछ चिपचिपा पदार्थ भी है, जरा ध्यान से आना, कहीं यह पदार्थ भी किसी प्रकार की मुसीबत ना हो?” जेनिथ ने सभी को सावधान करते हुए कहा और लिफ्ट की ओर आगे बढ़ गई।

लेकिन इससे पहले कि जेनिथ और आगे बढ़कर लिफ्ट के पास पहुंचती, तभी ऊपर छत पर लगा ढक्कन तेजी से खुला और उसमें से एक प्रकाश की किरण आकर लिफ्ट से टकराई।

प्रकाश की किरण टकराते ही, लिफ्ट का दरवाजा 2 सेकेण्ड के लिये खुला और फिर बंद होकर लिफ्ट, एक तेज आवाज करती हुई, जमीन के नीचे चली गई।

अब लिफ्ट के स्थान पर एक अंतहीन गोल गड्ढा दिखाई दे रहा था। अब ऊपर का ढक्कन पुनः बंद हो गया था।

जेनिथ ने धीरे से उस गड्ढे में झांक कर देखा। तभी जेनिथ को लिफ्ट वापस आती दिखाई दी। लिफ्ट को वापस आते देख जेनिथ थोड़ा पीछे हट गई। लिफ्ट पहले की तरह अपने स्थान पर वापस आकर रुक गई।

अब जेनिथ की नजर सुयश की ओर गई, जो कि बहुत देर से इस पूरे स्थान को देखकर कुछ सोच रहा था।

जेनिथ को अपनी ओर देखते पाकर आखिर सुयश बोल उठा- “यह पूरा कमरा किसी मानव के नेत्र के समान प्रतीत हो रहा है। जरा सभी लोग जमीन की ओर देखो, इसकी नाव सी सफेद आकृति, आँख के सफेद भाग की तरह प्रतीत हो रही है। इस सफेद भाग के बीच का नीला गोला, आँख की ‘आइरिश' और काला गोला, आँख की ‘प्यूपिल' लग रहा है। छत के ऊपर की ओर लगा ढक्कन, शायद पलकों का काम कर रहा है। जब पलकें खुलती हैं, तो उसमें से दृश्य तरंगे निकलकर उस लिफ्ट पर गिरती हैं। शायद वह लिफ्ट उन दृश्य तरंगों को लेकर मस्तिष्क तक जाती हो?"

सुयश के शब्दों को सुन सभी ने पहली बार उस कमरे को महसूस करके देखा। अब सभी सुयश की बात से सहमत थे।

"हम आपकी बात से सहमत हैं कैप्टेन।" क्रिस्टी ने कहा- “पर यह नहीं समझ आ रहा कि हमें इस आँख में करना क्या है?"

“पर कैप्टेन, जमीन पर बिखरा यह चिपचिपा पदार्थ कैसा है?” जेनिथ ने सुयश से पूछा- “आँख में तो ऐसा नहीं होता।"

"शायद यह चिपचिपा पदार्थ ही हमारी परेशानी है?" शैफाली ने कहा- “क्यों कि आँख में अगर किसी भी प्रकार का कोई कण या पदार्थ गिरता है, तो आँख स्वतः आँसू बनाकर उस कण या पदार्थ को बाहर निकाल देती है।

“अब समझ में आ गया।” ऐलेक्स ने खुशी से चीखते हुए कहा- “इस आँख में आंसुओं का निर्माण नहीं हो रहा। हमें आंसुओं का निर्माण करके इस चिपचिपे पदार्थ को समाप्त करना है।

“वाह मेरे अराका के शेर, तुमने तो पूरी पहेली ही हल कर दी।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स से मजा लेते हुए कहा “पर जरा यह बताओगे कि हम आँसुओं का निर्माण कैसे करेंगे?"

क्रिस्टी की बात सुन, ऐलेक्स अपना सिर खुजाकर ऊपर की ओर देखने लगा।

“आँसुओं का निर्माण, आँखों के ऊपर बने 'लैक्राईमल ग्लैंड' में होता है।" शैफाली ने कहा- “वहीं से आँसू हमारी आँख में प्रवेश करते है और ‘लैक्राइमल पंक्टा' से होते हुए नाक के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। जब आँसू ज्यादा मात्रा में बनते हैं, तो वह ओवरफ्लो होकर हमारी आँखों से बाहर निकलने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को हम रोना कहते हैं। शैफाली ने सरल भाषा में सभी को समझाते हुए कहा।

"तो इसका मतलब पहले हमें लैक्राईमल ग्लैंड तक पहुंचना होगा, उसके बाद ही हम जान पायेंगे कि वहां परेशानी क्या है?" जेनिथ ने कहा- “पर हम लैक्राईमल ग्लैंड तक जायेंगे कैसे?"

“यहां से तो लैक्राईमल ग्लैंड तक जाने का कोई रास्ता नहीं है। अब हमें वहां तक पहुंचने के लिये, पहले छत के ढक्कन खुलने का इंतजार करना होगा। जैसे ही ढक्कन खुलेगा, हम बारी-बारी से लिफ्ट के द्वारा नीचे जायेंगे और फिर वहां से किसी भी प्रकार से मस्तिष्क तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। अगर हम मस्तिष्क तक पहुंचने में सफल हो गये, तो वहां से कहीं भी जाया जा सकता है।” शैफाली ने सभी को अपना प्लान बताते हुए कहा।

"मुझे लगता है कि इस द्वार के लिये, हमें सिर्फ शैफाली की बातें सुननी चाहिये। क्यों कि उसे ही आँख की सबसे अच्छी जानकारी है।” सुयश ने कहा।

सुयश की बात सुन, सभी ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दे दी। अब सभी आकर लिफ्ट के पास खड़े हो गये। सभी को वहां खड़े-खड़े आधा घंटा बीत गया, पर ऊपर की छत का ढक्कन नहीं खुला।

“कैप्टेन, यह छत का ढक्कन क्यों नहीं खुल रहा? क्रिस्टी ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि यह इंसान सो रहा है, इसी लिये उसकी पलकें अभी नहीं झपक रहीं हैं।” सुयश ने तथ्य देते हुए कहा।

तभी छत की ऊपर लगा ढक्कन खुलने की तेज आवाज सुनाई दी। यह देख सुयश ने पहले तौफीक को नीचे जाने का इशारा किया। सुयश का इशारा पाकर, तौफीक बिल्कुल तैयार हो गया।

अब छत के ढक्कन से तेज रोशनी निकलकर, लिफ्ट के ऊपर गिरी और इसी के साथ लिफ्ट का दरवाजा 2 सेकेण्ड के लिये खुला।

तौफीक के लिये लिफ्ट में प्रवेश करने के लिये इतना समय काफी था। लिफ्ट तौफीक को लेकर नीचे की ओर चली गई।

धीरे-धीरे, एक-एक करके सभी उस लिफ्ट के माध्यम से नीचे की ओर आ गये। अब नीचे उन्हें एक बड़ा सा गोल पारदर्शी पर्दा दिखाई दिया, जिससे होकर प्रकाश अंदर की ओर जा रहा था।

“यह लेंस है, हमारी दृश्य तरंगे इससे होकर ही अपना चित्र रेटिना पर दर्शाती हैं।" शैफाली ने लेंस को देखते हुए कहा- “हमें इस लेंस के पार जाना होगा। यह कहकर शैफाली ने लेंस को अपने हाथों से छूकर देखा, पर वह उसे ठोस दिखाई दिया।

"हम ऐसे इसके पार नहीं जा सकते, इसके पार जाने के लिये कोई ना कोई दूसरा उपाय सोचना होगा?" शैफाली ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“क्या हम फिर से प्रकाश के द्वारा उस पार नहीं जा सकते?" सुयश ने शैफाली से सवाल करते हुए पूछा।

“नहीं !” शैफाली ने समझाते हुए कहा- “इसको हम इस प्रकार समझ सकते हैं, कि जिस प्रकार पारदर्शी काँच के दूसरी ओर प्रकाश के सिवा कुछ भी नहीं जा सकता, ठीक उसी प्रकार इस लेंस के पार हम प्रकाश मे माध्यम से नहीं जा सकते।... लेकिन अभी भी हमारे पास दूसरी ओर जाने का एक तरीका है।... जब भी हल्का प्रकाश हमारी आँख पर पड़ता है, तो हमारी आँख में मौजूद लेंस अपने आकार को बढ़ा देता है और जब भी कोई तेज प्रकाश, हमारी आँखों पर पड़ता है, तो हमारी आँखों का लेंस सिकुड़कर छोटा हो जाता है। तो हमें बस इस लेंस के किनारे पहुंचकर किसी तेज प्रकाश के आने का इंतजार करना होगा। जैसे ही तेज प्रकाश आँखों पर पड़ेगा, लेंस अपने आपको ‘प्यूपिल' के हिसाब के संतुलित कर अपना आकार सिकोड़ेगा और ऐसी स्थिति में हम लेंस के किनारे से होकर दूसरी ओर जा पायेंगे।"

शैफाली का ज्ञान कई लोगों के सिर के ऊपर से निकल गया, पर उन्हें इतना समझ में आया कि तेज प्रकाश में लेंस के किनारे से, दूसरी ओर जाने का रास्ता बन जायेगा। अतः सभी लेंस के एक किनारे पर आकर खड़े हो गये।

सभी को ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ देर बाद ही आँख से तेज रोशनी प्यूपिल को पारकर लेंस पर आकर पड़ी। अब लेंस ने अपने आकार को सिकोड़ना शुरु कर दिया।

जैसे ही लेंस के किनारे से एक व्यक्ति के निकलने के बराबर जगह हो गई, शैफाली सहित सभी उस जगह से निकलकर लेंस व रेटिना के बीच वाले स्थान पर पहुंच गये।

उस स्थान का आकार काफी बड़ा था। वहां का वातावरण हल्के गुलाबी रंग का था। वहां की गोलाकार दीवारें किसी फिल्मस्क्रीन के पर्दे की भांति अत्यंत चमकीली थीं। बीच के स्थान पर अनेक लाल और नीले रंग के मोटे, परंतु खोखले पाइप हवा में लहरा रहे थे।

"हमें इन पाइपों के अंदर तो नहीं घुसना है ना?" ऐलेक्स ने घबराकर शैफाली की ओर देखते हुए पूछा।

"नहीं, ये पाइप असल में 'ऑप्टिकल नर्वस्' हैं।" शैफाली ने कहा- “यही नर्वस् रेटिना पर बने चित्रों को देखकर, मस्तिष्क तक इलेक्ट्रानिक सिग्नल भेजते हैं। अब हमें सिर्फ ये देखना है कि कैश्वर की बनाई यह कृत्रिम आँख, किस प्रकार से मस्तिष्क तक सिग्नल भेजती है? हमें बस उस सिग्नल का पीछा करना होगा।"

"हे भगवान, हमारी आँख इतनी कठिनता से हमें चित्र दिखाती है, यह तो हमें पता ही नहीं था।” क्रिस्टी ने आश्चर्य से आँखें फाड़कर रेटिना को देखते हुए कहा।

“मुझे इस बात का अच्छी तरह से अहसास है।" शैफाली ने आह भरते हुए कहा- “मैंने तो 13 वर्ष तक अपनी आँखों से कुछ देखा ही नहीं?" यह सुन सुयश ने शैफाली के सिर पर हाथ फेरा, जो कि अपनेपन का अहसास लिये था।

तभी रेटिना की चमक कुछ कम होती दिखाई दी।

“दोस्तों तैयार हो जाओ, अब ऑप्टिकल नर्वस् मस्तिष्क को सिग्नल भेजने ही वाला है।" शैफाली ने सबको सावधान करते हुए कहा।

तभी उन पाइपों से 4 फुट के जुगनू निकलने शुरु हो गये, जो कि अपने पंखों के सहारे तेजी से उड़ रहे थे।

उन जुगनुओं से तेज रोशनी भी, कुछ समय अंतराल में चमक रही थी।

किसी को भी पाइपों से जुगनू के निकलने की तो आशा कतई नहीं थी, इसलिये सभी विस्मित होकर उन जुगनुओं को देखने लगे।

तभी सभी को शैफाली की आवाज सुनाई दी- “यही जुगनू इलेक्ट्रानिक तरंगों का रुप हैं, हमें किसी भी प्रकार से इन पर बैठना होगा? यही हमें मस्तिष्क तक ले जा सकते हैं।" यह कहकर शैफाली ने एक पाइप को उछलकर पकड़ लिया और उससे जुगनू निकलने का इंतजार करती रही।

जैसे ही पाइप से जुगनू निकलता दिखा, शैफाली उस जुगनू पर कूदकर सवार हो गई। जुगनू अब शैफाली को लेकर हवा में उड़ने लगा।

शैफाली को इस प्रकार करते देख, क्रिस्टी ने भी उछलकर एक पाइप को पकड़ा और एक जुगनू पर सवार हो गई।

इस प्रकार एक-एक कर जेनिथ को छोड़ सभी जुगनुओं पर बैठ गये। जेनिथ जुगनू तो छोड़ो, पाइप को भी पकड़ते ही नीचे गिर जा रही थी।

“कैप्टेन, जेनिथ जुगनू पर नहीं बैठ पा रही है।' ऐलेक्स ने चीखकर कहा- “हमें जेनिथ की मदद करनी होगी।"

लेकिन इससे पहले कि कोई जेनिथ की मदद कर पाता, तभी रेटिना के बीच से एक द्वार खुला और सभी जुगनू उस द्वार से होते हुए बाहर की ओर निकल गये।

अब जेनिथ के हाथ पैर फूलने लगे। उसे नहीं पता था कि अगर वह कुछ देर तक इस रेटिना के द्वार से बाहर नहीं निकली, तो उसके साथ क्या होगा?

“नक्षत्रा !” जेनिथ ने घबराकर नक्षत्रा को पुकारा “क्या तुम मेरी किसी भी प्रकार से मदद कर सकते हो?"

“मैं तुम्हारा हौसला बढ़ाने के सिवा कुछ नहीं कर सकता जेनिथ। यह एक फिजिकल कार्य है, इसे तुम्हें स्वयं ही पूरा करना होगा।” नक्षत्रा ने अपने हथियार डालते हुए कहा।

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ पुनः से कोशिश करने लगी। तभी अचानक जेनिथ के शरीर को एक झटका लगा और वह उछलकर एक जुगनू पर सवार हो गई।

जेनिथ को ऐसा लगा कि जैसे किसी ने उसके शरीर को उठाकर जुगनू की ओर फेंक दिया हो।

जेनिथ ने डरकर जुगनू के शरीर को कसकर पकड़ लिया, पर वह यह नहीं जान पायी कि उसका शरीर जुगनू तक पहुंचा कैसे?

“यह कैसे हुआ नक्षत्रा? मैं अपने आप जुगनू तक कैसे पहुंच गई?” जेनिथ ने आश्चर्य से नक्षत्रा से पूछा।

“क्षमा चाहता हूं जेनिथ, इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है, पर मुझे लगता है कि कोई ना कोई इस तिलिस्म में भी तुम्हारी मदद कर रहा है। अब वह कौन है? यह मुझे भी नहीं पता।

जेनिथ का जुगनू उड़कर रेटिना के द्वार की ओर चल दिया, पर अब जेनिथ की आँखें सोचने के अंदाज में सिकुड़ गईं थीं।

पता नहीं क्यों इस बार उसे नक्षत्रा पर कुछ शक सा होने लगा था? उसे लग रहा था कि उसे किसी प्रकार से नक्षत्रा ही बार-बार बचा रहा है? पर वह उसे बता क्यों नहीं रहा था? यह जेनिथ को नहीं समझ आ रहा था ?

जारी रहेगा_____✍️
 
#188.

दिव्य बालक: (18.01.02, शुक्रवार, आर्केडिया यान, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका को युद्ध के बारे में पता चल चुका था, वह जानती थी कि यदि युद्ध हुआ, तो उसका परिणाम किसी भी पक्ष में जा सकता है और ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के लिये खतरनाक था।

अतः शलाका ने सबसे पहले अपने सभी भाइयों को सुरक्षित करते हुए, अपने पिता के घर एरियन आकाश -गंगा में भेज दिया था। अब आर्केडिया यान पर सिर्फ शलाका और जेम्स ही बचे थे।

जेम्स को भी शलाका ने आर्केडिया के कंट्रोल्स सीखने के कार्य पर लगा दिया था। अतः अब शलाका थोड़ा निश्चिंत लगने लगी थी।

चूंकि आर्केडिया पिछले 5,000 वर्षों से अटार्कटिका की बर्फ के नीचे दबा था, इसलिये शलाका ने पूरी रात जागकर आर्केडिया के सभी तकनीकी प्रणाली को दुरुस्त कर लिया था।

अब शलाका को आर्यन और आकृति के पुत्र की याद आ गई, जो कि अष्टकोण में बंद भारत के किसी अवन्ती राज्य के, उज्जैनी नगर में जमीन के नीचे सो रहा था।

शलाका कुछ देर आराम करके, अब आर्यन के पुत्र की खोज में जाना चाहती थी। इसलिये शलाका ने एक नजर जेम्स के कमरे पर मारी।

इस समय जेम्स भी सो रहा था। उसे सोते देख शलाका अपने कमरे में आ गई और बिस्तर पर लेट गई।

तभी शलाका की आँखों के आगे आर्यन के पुत्र की मोहक छवि नजर आने लगी। ना जाने कितनी ही देर तक शलाका उस पुत्र के ख्यालों में खोई रही।

अंततः उसे नींद आ ही गई। कुछ ही देर में शलाका गहरी नींद के घोड़ों पर सवार हो, सपनों की दुनिया में चली गई। अब आर्केडिया में चारो ओर सन्नाटा छा गया था।

लगभग आधे घंटे के बाद शलाका के कमरे का दरवाजा बिना आवाज के धीरे से खुला और एक साया दबे पाँव अंदर दाखिल हुआ।

कमरे में ज्यादा उजाला नहीं था, पर फिर भी उस साये के चेहरे पर एक दबी मुस्कान दिखाई दे रही थी।

वह साया काफी देर तक ऐसे ही खड़ा, सो रही शलाका को देखता रहा, फिर वह दबे पाँव कमरे के अंदर आ गया।

उस साये के चलने पर बिल्कुल भी आवाज नहीं हो रही थी। अब वह साया धीरे से शलाका के सामने रखी एक कुर्सी पर बैठ गया।

अब उस साये के हाथ में एक कागज और एक पेन दिखाई देने लगा था। उस साये के हाथ अब कागज पर तेजी से चलने लगे। शायद वह कुछ चित्रकारी कर रहा था।

काफी देर तक चित्रकारी करने के बाद, उस बेखौफ साये ने उस कागज को शलाका के सिरहाने रख दिया।

कागज रखने के बाद उस साये ने एक बार फिर प्यार भरी नजरों से शलाका को देखा और वापस उसी प्रकार कमरे से निकल गया, जिस प्रकार वह अंदर आया था।

इस घटना के लगभग 5 घंटे के बाद शलाका की आँख खुली। अब उसकी नींद पूरी हो गई थी। शलाका बिस्तर से उठी और एक जोर की अंगड़ाई ली। नींद पूरी हो जाने के बाद, अब उसे काफी फ्रेश महसूस होने लगा था।

तभी शलाका की नजर, अपने सिरहाने रखे उस कागज के टुकड़े पर पड़ी। शलाका ने आश्चर्य से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर आगे बढ़कर उसे उठा लिया।

पर जैसे ही शलाका की नजर उस पर बनी आकृति पर गई, वह आश्चर्य से भर उठी।

कागज के टुकड़े पर, बहुत ही सुंदर 3 डी के अक्षरों में अंग्रेजी भाषा का S लिखा था, उस S के आगे एक सुंदर सा डिजाइन किया हुआ दिल बना था, जिसके चारो ओर से किरणें निकल रहीं थीं। उस कागज को देख शलाका की आँखें सिकुड़ गईं।

“यह कागज का टुकड़ा मेरे कमरे में कैसे आया?" शलाका ने दिमाग लगाते हुए सोचना शुरु कर दिया- “कहीं, मेरे सोते समय जेम्स तो नहीं आया था मेरे कमरे में?...नहीं-नहीं जेम्स की इतनी हिम्मत नहीं होगी। तो फिर और कौन हो सकता है? और सबसे बड़ी बात की वह आर्केडिया के अंदर घुसा कैसे? और...और यह S अक्षर तो मेरे नाम का पहला अक्षर है, जो कि....काफी प्यार से लिखा गया लग रहा है? इसके आगे बना दिल भी प्यार का ही संकेत दे रहा है।...पर ऐसा कौन हो सकता है?"

काफी देर तक सोचते रहने के बाद भी जब शलाका को उस कागज के टुकड़े का रहस्य समझ में नहीं आया, तो वह उसे लेकर जेम्स के कमरे की ओर बढ़ गई।

जेम्स इस समय अपने कमरे में नहीं था। इसलिये शलाका आर्केडिया के ट्रेनिंग रुम की ओर बढ़ गई।

जेम्स ट्रेनिंग रुम में ही था, वह अब भी पूरी तन्मयता से वीडियो गेम के द्वारा आर्केडिया के कंट्रोल्स को सीखने की कोशिश कर रहा था। शलाका को ट्रेनिंग रुम में आता देख जेम्स ने गेम को 'फ्रीज' कर दिया।

"तो कैसी चल रही है तुम्हारी ट्रेनिंग?” शलाका ने जेम्स की आँखों में झांकते हुए पूछा।

“बहुत अच्छी...मुझे लग रहा है कि मैं जल्दी ही इसे पूरी तरह से चलाना सीख लूंगा।” जेम्स ने मुस्कुराते हुए कहा।

“वेरी गुड।” शलाका ने जेम्स की तारीफ करते हुए कहा- “मुझे पहले ही पता था कि तुम इसे जल्दी ही सीख लोगे। अच्छा जेम्स, क्या तुम इस कागज के बारे में कुछ जानते हो?" शलाका ने जेम्स के चेहरे के सामने वह कागज का टुकड़ा, हवा में लहराते हुए पूछा।

जेम्स ने ध्यान से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर बोला- “अरे वाह! आपकी तो चित्रकारी भी अच्छी है।"

“यह मेरा बनाया हुआ नहीं है जेम्स।” शलाका ने ध्यान से जेम्स के चेहरे को पढ़ते हुए कहा।

"तो फिर यह जिसने भी बनाया है, उसकी चित्रकारी बहुत अच्छी है और इसने जो दिल के चारो ओर सूर्य की किरणें बनाई हैं, वह तो लाजवाब है।"

शलाका ने जेम्स की बात सुन एक बार फिर उस कागज के टुकड़े को देखा, जेम्स सही कह रहा था, दिल के चारो ओर सूर्य के प्रकाश को ही दर्शाया गया था।

“मैं सही सोच रही थी, जेम्स को इसके बारे में कुछ भी नहीं पता?” शलाका स्वयं को समझाते हुए सोच रही थी- “परंतु दिल पर बनी ये सूर्य की किरणें...कहीं सुयश तो नहीं.... नहीं-नहीं मैं भी क्या सोचने लगी? सुयश तो इस समय तिलिस्मा में है...वह भला यहां.. सुयश तो नहीं कैसे आ सकता है?....फिर...फिर और कौन ऐसा है? जो मुझे प्यार करता है और उसके बारे में मुझे भी नहीं पता है। लेकिन एक बात तो तय है कि वह जो भी है, बहुत हिम्मत वाला है, नहीं तो मेरे कमरे में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं करता।”

“आप क्या सोचने लगीं?" तभी जेम्स ने शलाका को कुछ ना बोलते देख पूछ लिया।

“नही-नहीं...कुछ नहीं....मैं तो बस अपने भाइयों के बारे में सोच रही थी।” शलाका ने बात को बदलते हुए कहा- “अच्छा, अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, हम लोग, कुछ ही देर में भारत जाने वाले हैं।"

“येऽऽऽ!” जेम्स खुशी से चीख उठा- “यानि कि मेरा पहला मिशन आज से ही शुरु होगा।"

“आज से नहीं, बल्कि अभी से...अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। मैं तुम्हारे कमरे में लगभग 1 घंटे के बाद आती हूं।" यह कहकर शलाका जेम्स के कमरे से बाहर निकल गई। वह कागज का टुकड़ा अभी भी

शलाका के हाथ में था।

"लगता है कि मुझे अब आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु करना पड़ेगा, जिससे आज जैसी कोई घटना ना घटने पाये।" यह सोच शलाका चलती हुई, अपने कमरे के एक किनारे गई और हवा में हाथ हिलाया।

उसके ऐसा करते ही हवा में एक बड़ा सा आयताकार डिब्बा प्रकट हुआ, उस डिब्बे का आकार किसी क्रिकेट की किट के समान था।

शलाका ने उस डिब्बे को खींचकर खोल दिया और उसमें मौजूद बहुत सारे इलेक्ट्रानिक यंत्रों को देखने लगी। अब उसने कुछ यंत्र उठाकर एक छोटे से बैग में रख लिये और उस डिब्बे को वापस से गायब

कर दिया।

अब शलाका ने अपने बैग में कुछ और जरुरत की चीजें डालीं। अब वह बैग भी शलाका की तरह से तैयार हो गया था।

आज का दिन शलाका के लिये आश्चर्य से भरा दिख रहा था। जो भी हो, पर आज की घटना ने शलाका का दिमाग हिला दिया था। बहरहाल लगभग 1 घंटे के बाद शलाका फिर से जेम्स के कमरे में पहुंची।

शलाका का तैयार किया हुआ बैग इस समय शलाका के हाथ में था। इस समय जेम्स पूरी तरह से तैयार खड़ा था। उसने आगे बढ़कर शलाका के हाथ से बैग ले लिया।

शलाका ने जेम्स को अपने पीछे आने का इशारा किया और स्वयं एक दिशा की ओर चल दी।

जेम्स शलाका के साथ-साथ चलने लगा। शलाका जेम्स को लेकर एक विशाल कमरे में पहुंच गई, पर जेम्स को इस कमरे में कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि शलाका इस कमरे में क्यों आई है? लेकिन थोड़ी ही देर बाद जेम्स को अपना जवाब मिलना शुरु हो गया।

शलाका कमरे के बीचो-बीच में पहुंची और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये।

अब शलाका के हाथों में नीले रंग का एक ऊर्जा जाल आ गया। उस ऊर्जा जाल को देखकर महसूस हो रहा था कि शलाका ने अपने हाथों में, कोई हल्के नीले रंग के पारदर्शी दस्ताने पहने हों।

शलाका ने अब अपने दस्तानों से, हवा में एक जगह अपनी उंगली दबाई। शलाका के ऐसा करते ही पूरा कमरा एक दूधिया रोशनी से भर गया और जिस स्थान पर शलाका खड़ी थी, उस स्थान पर 2 कुर्सियां प्रकट हो गईं।

जेम्स आश्चर्य भरी नजरों से इस अद्भुत तकनीक को देख रहा था। शलाका अब उनमें से एक कुर्सी पर बैठ गई और जेम्स को दूसरी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

शलाका का इशारा पाकर जेम्स दूसरी कुर्सी पर आकर बैठ गया। जेम्स अब स्वयं को किसी ‘एस्ट्रोनॉट' से कम नहीं समझ रहा था।

अब शलाका के सामने एक बड़ी सी चमकीली स्क्रीन प्रकट हो गई। शलाका ने उस स्क्रीन पर लगे एक लाल रंग के बटन को दबा दिया।

शलाका के ऐसा करते ही हवा में किसी लड़की का विशालकाय चेहरा उभरा, जो कि देखने पर ही कोई कम्प्यूटर प्रोग्राम के समान प्रतीत हो रही थी।

“शलाका को आर्ची का प्रणाम।” उस कम्प्यूटर वाली लड़की ने कहा- “इस बार तो बहुत लंबे अंतराल के बाद आपने मुझे जगाया।"

"हां आर्ची...इसलिये सबसे पहले आर्केडिया यान के सारे कंट्रोल्स चेक करो।” शलाका ने कहा।

“जो आज्ञा।” यह कहकर आर्ची, आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स को चेक करने लगी।

"आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स सही काम कर रहे हैं। कुछ देर के बाद आर्ची ने कहा- “अब मैं आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु कर देती हूं।"

यह कहकर आर्ची ने पता नहीं क्या किया? कि पूरे यान में कुछ देर तक खट-पट की आवाजें आती रहीं।

“सुरक्षा तंत्र भी शुरु हो चुका है। अब बताइये कि मुझे और क्या करना है?" आर्ची ने कहा।

“सबसे पहले इस पृथ्वी पर, हवा में घूम रहे सभी सिग्नल्स का ठीक से अध्ययन करो और पृथ्वी का सारा लेटेस्ट डेटा अपने प्रोग्राम में डाल लो, जिससे तुम्हारे पास की सभी जानकारियां अपडेट हो जायें। हां... पृथ्वी की बाहरी कक्षा में घूम रहे सभी सेटेलाइट को स्कैन करना मत भूलना।” शलाका ने आर्ची को अगला आदेश दिया।

यह आदेश सुन जेम्स की आँखें खुली की खुली रह गईं। वह पृथ्वी पर अगले 50 वर्षों तक भी ऐसी तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था।

लगभग 10 मिनट के बाद फिर से आर्ची की आवाज उभरी- “पृथ्वी का सारा तकनीकी डेटा, मैंने अपने स्टोर में अपडेट कर लिया है।"

“ओ.के. तो अब सबसे पहले मुझे ये बताओ कि भारत में अवन्ती राज्य कहां है? मुझे उसके एक शहर उज्जैनी में जाना है।” शलाका ने कहा।

"भारत में अब राजाओं की परंपरा समाप्त हो चुकी है और अवन्ती राज्य का उज्जैनी शहर, अब उज्जैन नाम से विख्यात है, जो कि भारत के एक राज्य मध्य प्रदेश में स्थित है।" आर्ची ने कहा।

“अब मुझे ये बताओ कि तुम उज्जैन में कहां लैंड कर सकती हो?” शलाका ने कहा।

“उज्जैन शहर, म…देव के एक मंदिर महा…लेश्वर के लिये प्रसिद्ध है। महा…लेश्वर मंदिर के बगल एक रुद्र सागर नाम की झील है। वहां हम आसानी से अपना यान उतार सकते हैं। दूसरा विकल्प क्षिप्रा नदी का है, जो शहर से कुछ दूरी पर है।” आर्ची ने अपना कम्प्यूटर खंगालते हुए कहा।

“ठीक है तो पहले आर्केडिया को अदृश्य तरंगों से इस प्रकार अदृश्य कर दो कि कोई रेडार भी उसे ना ढूंढ पाये और फिर उज्जैन की ओर चलो और हां....जेम्स को अच्छी तरह से देख लो, यह आज से हमारे साथ काम करेगा, इसलिये आपातकाल को छोड़, अब तुम्हें इसके आदेश भी मानने पड़ेंगे।” शलाका ने आर्ची को आदेश देते हुए कहा।

"जो आज्ञा शलाका और आर्केडिया पर आपका स्वागत है जेम्स।" यह कहकर आर्ची ने आर्केडिया को अदृश्य किया और उसे अटलांटिक की बर्फ से निकालकर, भारत की ओर लेकर चल दी।

“यह यान तो ऑटोमेटिक है। फिर आप मुझे इसका कंट्रोल क्यों सिखा रहीं थीं?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“भले ही आज तुम्हें आर्केडिया को चलाना ना हो, पर उसे चलाना आना जरुरी है। हम एक कम्प्यूटर पर एक हद तक ही निर्भर हो सकते हैं।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा।

"वैसे यह आर्केडिया कब तक भारत पहुंच जायेगा?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

लेकिन इससे पहले कि शलाका कुछ जवाब दे पाती, यान में आर्ची की आवाज सुनाई दी- “हम कुछ ही देर में उज्जैन पहुंचने वाले हैं।"

"इतनी तेज स्पीड?” जेम्स तो आर्ची की बात सुन हैरान हो गया।

“जेम्स, तुम भूल रहे हो कि यह यान यहां से कई प्रकाशवर्ष दूर भी जाता है, ऐसे में अगर इसकी स्पीड इतनी तेज ना होती, तो यह भला उतनी दूर कैसे जा पाता।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा- “लो अब यह इलेक्ट्रानिक यंत्र अपने गले के पास लगा लो।"

यह कहते हुए शलाका ने अपने बैग से 2 छोटे से इलेक्ट्रानिक यंत्र निकाले और उसमें से एक जेम्स की ओर बढ़ा दिया।

“यह कैसा यंत्र है?” जेम्स ने पूछा।

"इस यंत्र को गले से लगाने के बाद हमारा संपर्क हमेशा आर्ची से बना रहेगा और इस यंत्र की मदद से आर्ची, इस यान में रहकर भी, बहुत प्रकार से हमारी मदद कर सकती है।" अब शलाका जल्दी-जल्दी जेम्स को अष्टकोण और उस दिव्य बालक के बारे में बताने लगी।

कुछ ही देर में अदृश्य आर्केडिया, उज्जैन के रुद्र सागर में उतर गया। ना जाने कैसी तकनीक थी कि आर्केडिया के झील में उतरने के बाद भी पानी ऊपर नहीं उछला।

जारी रहेगा_____✍️
 
#189.

भारत में इस समय दोपहर के 4 बज रहे थे। शलाका और जेम्स, आर्केडिया के गुप्त द्वार से बाहर निकले और रुद्र सागर के पानी को चीरते हुए, झील की सतह के ऊपर आ गये।

"आर्ची, मेरे और जेम्स के कपड़े, भारत की परंपरा के हिसाब से कर दो।” शलाका ने झील के बाहर निकलते ही आर्ची को आदेश दिया। शलाका के इतना कहते ही जेम्स और उसके कपडे तुरंत बदल गये।

यह देख जेम्स ने आश्चर्य से पूछा- “क्या आर्ची वहां से कपड़े भी चेंज कर सकती है?"

“आगे-आगे देखते रहो....अभी वह बहुत कुछ कर सकती है।” शलाका ने मुस्कुराकर अपने शरीर पर पहने कपड़े को देखा और फिर महा…लेश्वर मंदिर की ओर बढ़ गई।

इस समय जेम्स और शलाका ने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी।

जेम्स के लिये ये सभी कुछ बहुत अनोखा था। उसे तो यह लग रहा था कि शलाका कहीं भी जाने के लिये अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करेगी, पर जेम्स की सोच से बिल्कुल उल्टा हो रहा था, शलाका पूरी तरह से विज्ञान की शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

शलाका चलते हुए अब मंदि..र के प्रांगण में आ गई। शलाका ने जिस तरह का मं..दिर वेदांत रहस्यम् में देखा था, यह उससे बिल्कुल अलग था। बस देव का शि….वलिंग वहीं था।

इस समय मं..दिर के पट बंद थे। शलाका ने बाहर से हाथ जोड़कर देव का नमन किया और जेम्स को लेकर उस दिशा की ओर चल दी, जिधर उसने, वह लकड़ी का मकान देखा था।

इस समय उस स्थान पर सबकुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा था। अब वहां पर बहुत से मकान बन चुके थे, पर शलाका को उस मकान की मंदिर से दूरी और उसका कोण याद था, इसलिये वह बिना कहीं रुके आगे बढ़ रही थी।

अब शलाका एक स्थान पर जाकर रुक गई। उसके सामने एक पक्का और काफी अच्छा मकान बना था।

शलाका ने एक बार फिर पलटकर मं..दिर के प्रांगण को देखा और उस मकान की दूरी और उसके कोण का फिर से अंदाजा लगाया।

अब वह पूरी तरह से संतुष्ट थी कि यह वही मकान है। शलाका जेम्स को लेकर उस मकान के बाहर पहुंच गई।

मकान के बाहर एक नेम प्लेट लगी थी, जिस पर हिंदी भाषा में लिखा था- “शारदा भवन।"

पर जेम्स, उस भाषा को पढ़ नहीं पा रहा था।

“आर्ची, हमें हिंदी भाषा का ज्ञान चाहिये।” शलाका ने आर्ची से कहा।

“भेज दिया, आप चेक कर सकती हैं।” आर्ची ने बिना देर लगाये शलाका और जेम्स के दिमाग में हिंदी भाषा का ज्ञान डाल दिया।

आर्ची के हर एक कार्य पर जेम्स हैरान हो रहा था। अब जेम्स की नजर दोबारा से नेम प्लेट पर गई, पर अब वह साफ-साफ हिंदी भाषा को पढ़ ले रहा था।

अब शलाका ने उस घर पर लगी घंटी पर अपनी उंगली रख दी। अंदर कहीं एक मधुर स्वरलहरी गूंजी।

कुछ देर के बाद एक लगभग 35 वर्षीय महिला ने दरवाजा खोला।

अपने सामने कुछ अजनबियों को देख, उसने पूछ लिया- "कौन हैं आप लोग और आपको किससे मिलना है?"

“जी, हमें इस घर के बारे में कुछ पूछना है? क्या हम अंदर आ सकते हैं?” शलाका ने बिल्कुल साफ हिंदी बोलते हुए कहा।

वह महिला एक विदेशी को इतनी साफ हिंदी बोलते देख खुश हो गई और उन्हें अंदर आने का इशारा किया।

शलाका और जेम्स घर के अंदर आ गये। घर अंदर से काफी सजा हुआ था। उस महिला ने दोनों को सोफे पर बैठने का इशारा किया और स्वयं सामने वाले सोफे पर बैठ गई।

“जी अब बताइये कि आप क्या कह रहीं थीं?” उस महिला ने शलाका से पूछा।

“जी क्षमा चाहती हूं, पर मैं कुछ भी बोलने से पहले आपका परिचय जानना चाहती हूं।” शलाका ने विनम्र शब्दों में निवेदन करते हुए पूछा।

"मेरा नाम शारदा है, मैं ही इस घर की मालकिन हूं।" शारदा ने कहा।

"शारदा जी आज से 30 वर्ष पहले इस मकान में हमारे पिताजी रहते थे। उन्हों ने अपना कुछ सामान, इस घर के तहखाने में रखा था, जिसका पता हमें कुछ दिनों पहले चला है, इसलिये हम यहां आये हैं।” शलाका ने साफ झूठ बोलते हुए कहा।

“जी, पर हमने तो यह मकान, सिर्फ 9 वर्ष पहले ही खरीदा है और इसमें कोई भी तहखाना नहीं है। इसके पहले तो इस मकान में शर्मा जी रहते थे, जो कि अपना सब कुछ बेचकर यहां से हमेशा-हमेशा के लिये अमेरिका चले गये।” शारदा ने कहा- “पर क्या मैं पूछ सकती हूं कि ऐसा क्या था यहां? जिसे आप 30 वर्ष बाद ढूंढने यहां आये हैं?”

“जी, वह काँच का एक अष्टकोण था, जो कि हमारे पिता की आखिरी निशानी था।” शलाका ने अभिनय करते हुए कहा- “पर अब तो उसका मिलना बिल्कुल असंभव ही है।"

शलाका का चेहरा रोने वाले अंदाज में बन गया, जिसे देख शारदा बोल उठी- “आप परेशान मत होइये, मैं आपको शर्मा जी का पता और फोन नंबर दे देती हूं। आप एक बार उनसे पूछ कर देख लीजिये, हो सकता है कि उन्हें कुछ पता हो उस अष्टकोण के बारे में?"

“ठीक है, आप उनका ही पता दे दीजिये, मैं उनसे मिलकर पूछ लूंगी।” शलाका ने खड़े होते हुए कहा" वैसे क्या मैं आपका अंदर वाला कमरा, एक बार देख सकती हूं?"

"हां पर इतने वर्षों के बाद अब उस कमरे में क्या मिलेगा आपको?" शारदा ने आश्चर्य से शलाका को देखते हुए कहा।

"मेरी माँ की यादें...वह उसी कमरे में रहती थीं।" अब तो शलाका ने झूठ बोलने की हद ही कर दी।

जेम्स, शलाका के अद्वितीय अभिनय को देख मन ही मन मुस्कुरा रहा था, पर वह अब भी सबके सामने अपने भावों को सामान्य किये शांति से बैठा था।

“जी हां आप अंदर वाला कमरा देख सकती हैं।” शारदा ने शलाका को अंदर जाने की इजाजत दे दी और उठकर स्वयं भी शलाका के साथ चलने लगीं।

एक सेकेण्ड से भी कम समय में, शलाका ने जेम्स को गहरे अंदाज में देखा।

जेम्स समझ गया कि शलाका नहीं चाहती कि शारदा उसके पीछे-पीछे उस कमरे में जाये, इसलिये वह तुरंत बोल उठा- “आप घर में अकेली ही रहती हैं क्या? मेरा मतलब है कि भाई साहब कहां काम करते हैं?" जेम्स को बोलता देख शारदा वापस से सोफे पर बैठ गई।

“मेरे पति का कपड़ों का व्यापार है, वह इस सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते हैं, इसलिये पूरा घर मुझे ही संभालना पड़ता है।"

शलाका, शारदा को बातों में फंसा देखकर तुरंत अंदर के कमरे में पहुंच गई। शलाका ने उस कमरे के कोण को देख महसूस कर लिया कि यह वही कमरा था, जिसमें उसने आर्यन को उस दिव्य बालक को छिपाते हुए देखा था।

“आर्ची, तुरंत मेरी आँखों में पृथ्वी से धातु ढूंढने वाला स्कैनर डालो।” शलाका ने आर्ची से कहा।

आर्ची ने तुरंत शलाका की आँख में स्कैनर डाल दिया। अब शलाका तेजी से पूरे कमरे की जमीन को स्कैन करके, उसके नीचे देखने लगी।

पर पूरे कमरे को स्कैन करने के बाद भी उसे जमीन में किसी प्रकार का धातु का कोई टुकड़ा नहीं दिखाई दिया।

“यहां पर अमरत्व की धातु वाली शीशी नहीं है, इसका साफ मतलब है कि किसी ने उस अष्टकोण से उस दिव्य बालक को निकाल लिया है?...अब...अब तो...शारदा से नंबर लेकर, एक बार शर्मा से भी बात करनी होगी, हो सकता है कि उसे अष्टकोण का पता हो?" यह सोच शलाका ने अपने चेहरे पर फिर से रोने वाले भाव लाये और वापस जेम्स के पास आ गई।

"अच्छा शारदा जी, आप वो शर्मा जी का पता और नंबर दे दीजिये....मैं एक बार उनसे बात करके भी देख लेती हूं।” शलाका ने शारदा की ओर देखते हुए कहा "वैसे शर्मा जी के घर में कौन-कौन है?"

"कौन...कौन....क्या? बस 3 ही लोग हैं उनके परिवार में शर्मा जी, उनकी पत्नि गायत्री और उनका बेटा देवोम।" शारदा ने पास की टेबल पर रखी अपनी डायरी उठाई और उसके पन्ने पलटकर शर्मा जी का नंबर ढूंढने लगी।

"उनके और बच्चे नहीं हैं क्या?" जेम्स ने शारदा को देखते हुए पूछा।

"और बच्चे?....अरे 50 वर्ष की उम्र में तो उन्हें बेटा हुआ था...अब उसके बाद और बच्चे कहां से आते?" शारदा ने एक पन्ने पर शर्मा जी का पता लिखते हुए कहा।

शारदा की बात सुन, इस बार शलाका का माथा ठनका।

"इस उम्र में बेटा?” शलाका ने आश्चर्यचकित होने का अभिनय किया।

"हां...कुछ लोग तो कहते हैं कि उनके बुढ़ापे को देख ईश्वर ने ही उनकी सुन ली...पर जो भी कहो....देवोम है बहुत कमाल का? बिल्कुल देवताओं सा तेज है उसके चेहरे पर इसीलिये तो शर्मा जी ने उसका नाम देवोम रखा था।...किसी ने सही कहा है, ईश्वर की माया अपरम्पार है।"

यह कहकर शारदा ने एक कागज शलाका की ओर बढ़ दिया, इस कागज में लिखा था “महेन्द्र शर्मा, 127B, 6 स्ट्रीट, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका” इसके बाद एक फोन नंबर दिया हुआ था।

"जी आपके सहयोग के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।” यह कहकर, शलाका ने वह कागज का टुकड़ा शारदा से ले लिया और जेम्स के साथ बाहर की ओर निकल गई।

जाने क्यों शलाका को विश्वास हो चला था कि देवोम ही वह दिव्य बालक है? अब वह तेजी से वापस रुद्र सागर की ओर चल दी।

“क्या अब हम न्यूयार्क जायेंगे?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“हां ! हम न्यूयार्क जायेंगे, पर अभी नहीं। अभी मुझे कुछ और काम निपटाने हैं। इसलिये पहले हमें वापस अंटार्कटिका चलना होगा।” शलाका ने अपना सिर हिलाते हुए कहा- “वैसे जब तक मैं उस दिव्य बालक को ढूंढ नहीं लेती, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी?"

“शलाका !" जेम्स ने एक जगह रुकते हुए कहा “आप तो देवी हो। हो सकता है कि आपको भूख ना लगती हो?"

जेम्स की बात सुन शलाका एक झटके से रुकी और पलटकर जेम्स को देखने लगी। फिर मुस्कुराकर, एक पास वाले रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गई।

जेम्स भी मुस्कुराकर शलाका के पीछे चल दिया।

जारी रहेगा_____✍️
 
#190.

चैपटर-5

अश्रुधारा: (तिलिस्मा 5.12)

सभी रेटिना के द्वार के दूसरी ओर पहुंच गये थे, परंतु सभी ने देख लिया था कि जेनिथ जुगनू पर नहीं बैठ पा रही है।

लेकिन इस समय जेनिथ की मदद करने के लिये, कोई भी जुगनू को पीछे लेकर नहीं जा सकता था, क्यों कि जुगनू स्वयं की इच्छा से काम कर रहे थे।

अब रेटिना का द्वार धीरे-धीरे बंद होने लगा था। सभी के चेहरे पर चिंता के भाव साफ झलक रहे थे। पर इससे पहले कि रेटिना का द्वार पूरी तरह से बंद हो पाता, कि तभी जेनिथ के जुगनू ने अंदर प्रवेश किया।

जेनिथ को देख सभी खुश हो गये। अब सभी के जुगनू तेजी से एक चमकीली सुरंग के रास्ते से गुजर रहे थे।

कुछ ही देर में सभी को काफी दूर एक बड़ी सी मशीन दिखाई दी, जिसका ऊपरी हिस्सा किसी दिमाग की भांति महसूस हो रहा था।

उस मशीन के निचले सिरे पर, एक कंम्प्यूटर स्क्रीन लगी हुई थी, जो कि एक टाइपिंग पैड से जुड़ी हुई थी।

उस मशीन के दिमाग वाले स्थान पर एक बड़ा सा सुराख बना था। सभी जुगनू उसी सुराख में प्रविष्ठ हो रहे थे।

यह देखकर शैफाली ने सभी से चीखकर कहा- "हमें उस सुराख में, जुगनू के घुसने के पहले ही जुगनू से कूदना होगा।"

सभी ने शैफाली की बात सुन सहमति से सिर हिला दिया। चूंकि शैफाली का जुगनू सबसे आगे था, इसलिये जैसे ही ब्रेन मशीन के पास पहुंची, वह जुगनू से कूद कर जमीन पर आ गई।

शैफाली को कूदते देख सभी ने एक-एक कर, अपने-अपने जुगनू से छलांग लगा दी।

सभी जुगनू अब उस ब्रेन मशीन में समा गये और शैफाली सहित सभी लोग उस ब्रेन मशीन के सामने खड़े होकर उसे निहार रहे थे।

“कैप्टेन, यह तो किसी प्रकार की विज्ञान की दुनिया लग रही है?” क्रिस्टी ने सभी ओर देखते हुए कहा- “और उधर देखिये कैप्टेन, उस ओर किसी प्रकार का रेलवे प्लेटफार्म दिखाई दे रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे हम किसी रेलवे स्टेशन पर हैं?"

लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ और बोल पाता, उस पूरे वातावरण में एक स्त्री के स्वर में अनाउन्समेंट सुनाई देने लगा- “अश्रुधारा जाने वाली ट्रेन, कुछ ही देर में प्लेटफार्म पर आ रही है, कृपया टिकट लेकर अपनी सीट को सुरक्षित कर लें।”

“यह सब क्या हो रहा है शैफाली?" जेनिथ ने शैफाली से पूछा- “तुम्हें कुछ समझ में आ रहा

है?"

"हां !" शैफाली ने अपना सिर हां के अंदाज में हिलाते हुए कहा- “अश्रुधारा मतलब आँसू की बूंद। शायद आने वाली ट्रेन हमें लैक्राईमल ग्लैंड तक ले जायेगी? पर यह टिकट का झंझट नहीं समझ आया? पता नहीं ये टिकट मिलेगा कहां से?"

"मुझे लगता है कि हमें ट्रेन का टिकट इस ब्रेन मशीन से ही मिलेगा।” सुयश ने कहा और ध्यान से उस ब्रेन मशीन को देखने लगा।

तभी सुयश को ब्रेन मशीन के की-बोर्ड पर एक साउन्ड का विकल्प दिखाई दिया। सुयश ने उस साउन्ड के बटन को प्रेस कर दिया।

उस बटन को प्रेस करते ही वातावरण में एक पुरुष की आवाज गूंजी- “ब्रेन सेंटर पर आपका स्वागत है। अगर आप अश्रुधारा की ओर जाना चाहते हैं, तो कृपया 1 दबाएं।" सुयश ने यह सुन की-बोर्ड पर लगा 1 नंबर का बटन दबा दिया।

“अब आप यात्रियों की संख्या सुनिश्चित करें।" मशीन से आवाज आई। सुयश ने इस बार की-बोर्ड पर लगे 6 नंबर के बटन को दबा दिया।

"आपकी संख्या 6 है, इसलिये आपको 12 मुद्रा, मशीन के अंदर डालनी होगी।"

मुद्रा का नाम सुनते ही सुयश सकते की सी हालत में आ गया और पीछे मुड़कर सभी की ओर देखने लगा।

“लगता है कि कार्य में कहीं मुद्राएं भी छिपी हुई थीं, जो हममें से किसी को दिखाई नहीं दी।” शैफाली ने मुंह बनाते हुए कहा- “अब बिना मुद्रा के यह मशीन हमें आगे जाने नहीं देगी और हम पीछे जाकर मुद्रा ढूंढ भी नहीं सकते।”

"तो सीधे तौर पर बोलते हैं कि हम पूरी तरह से अब इस मशीन में फंस चुके हैं।” ऐलेक्स ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।

तभी मशीन के अंदर से पुनः आवाज आई- “अगर आपके पास 12 मुद्रा नहीं हैं, तो आपको मेरे 12 आसान सवालों का जवाब देना होगा। अगर आपने उचित उत्तर दिया तो आप अपनी अपनी योग्यता सिद्ध कर टिकट को प्राप्त कर सकेंगे और अगर आपने एक भी प्रश्न का गलत उत्तर दिया, तो आप हमेशा के लिये इसी स्थान पर फंस जायेंगे। अगर आप प्रश्नों का विकल्प चुनना चाहते हैं, तो 1 दबाएं। अगर आप प्रश्नों का विकल्प नहीं चुनना चाहते हैं, तो 2 दबाकर मुझे आराम से सोने का मौका दें।"

"ये लो, अब इस मशीन को भी सोना है।” ऐलेक्स ने हंसते हुए कहा।

ब्रेन मशीन की बात सुन सुयश ने सभी की ओर ऐसे देखा, जैसे कि वह पूछना चाह रहा हो कि अब हमें क्या करना चाहिये?

“मेरे हिसाब से हमें प्रश्नों का विकल्प चुन लेना चाहिये।” तौफीक ने कहा- “इसमें बचने के कुछ चांस हैं, पर यदि हमने विकल्प नहीं चुना, तो फिर पता नहीं आगे क्या होगा?"

सभी ने तौफीक की बात पर सहमति जताई, इसलिये सुयश ने की-बोर्ड पर लगे 1 नंबर के बटन को दबा दिया।

“प्रश्नों का विकल्प चुनने के लिये धन्यवाद। अब हम आपके समक्ष 12 प्रश्नों को एक-एक कर रखेंगे। हर प्रश्न के लिये आपके पास सिर्फ 30 सेकेण्ड का समय रहेगा। आपको अपना जवाब मशीन के की-बोर्ड पर लिखकर देना होगा। तो पहला प्रश्न है:-

“दुनिया भर की करता सैर, बिना धरा पर रखे पैर।" इसी के साथ 30 सेकेण्ड का समय ब्रेन मशीन की स्क्रीन पर दिखाई देने लगा।

किसी को भी ब्रेन मशीन के द्वारा पहेलियां पूछने का अंदाजा नहीं था, ऊपर से समय की बंदिश। इसलिये सभी थोड़ा हड़बड़ा गये।

धीरे-धीरे समय बीत रहा था और सभी तेजी से उस पहेली में उलझे थे कि तभी शैफाली ने तेजी से कहा “सूर्य।"

शैफाली की बात सुन सुयश ने जल्दी से की-बोर्ड पर सूर्य टाइप कर दिया। जैसे ही सुयश ने सूर्य लिखकर ‘इन्टर' का बटन दबाया, मशीन के ऊपर लगी हरी बत्ती जल उठी, जो कि इस बात का द्योतक थी, कि शैफाली के द्वारा बताया गया उत्तर सही था।

“ये एक बार कैश्वर मुझे मिल जाये बस।" ऐलेक्स ने मुंह बनाते हुए कहा- “पूरी बेइज्जती ही करके मानेगा गर्लफ्रेंड के सामने।" ऐलेक्स के शब्द सुन क्रिस्टी सहित सभी जोर से हंस दिये।

तभी ब्रेन मशीन ने दूसरा सवाल कर दिया:-

"ऐसा क्या है, जो YEAR में एक बा र और WEEK में 2 बार आता है?"

“ये क्या प्रश्न हुआ?” ऐलेक्स ने मुंह बनाते हुए कहा- “जब कोई चीज WEEK में 2 बार आयेगी, तो वह YEAR में 1 बार कैसे आ सकती है?"

"उत्तर है 'E' अल्फा बेट।" शैफाली ने दोबारा से कहा- “यह YEAR में 1 बार और WEEK में 2 बार आती है।

“वाह!” ऐलेक्स ने शैफाली की प्रशंसा करते हुए कहा- “तुम बताना शैफाली कि तुमने किस स्कूल से पढ़ाई की है, मैं ऑस्ट्रेलिया चलकर, उसी स्कूल में एडमिशन लूंगा।

“बस एक बार ऑस्ट्रेलिया पहुंच जाओ, फिर मैं तुम्हें घर में ट्यूशन दूंगी।" क्रिस्टी ने ऐलेक्स के गाल पर एक हल्के से चपत लगाते हुए कहा।

उधर सुयश ने मशी न पर लगे 'E' बटन को दबा दिया था। फिर से हरी बत्ती ने जलकर, उत्तर के सही होने की पुष्टि की।

अब मशीन ने तीसरा प्रश्न पूछ लिया:- “कमरे में बैठी इक रानी, सिर पर आग, बदन में पानी।"

सुयश को यह उत्तर किसी से पूछने की जरुरत नहीं पड़ी, क्यों कि इस प्रश्न का उत्तर उसे स्वयं पता था।

इसलिये उसने की-बोर्ड पर 'मोमबत्ती' लिख दिया। उत्तर बिल्कुल सही था।

“मुझे लगा कि इस प्रश्न का उत्तर 'क्रिस्टी' होगा। ऐलेक्स ने एक बार फिर क्रिस्टी को छेड़ा- "इसके भी सिर पर आग रहती है।"

“सिर्फ सिर पर।” क्रिस्टी ने इठलाते हुए ऐलेक्स का हाथ पकड़ते हुए कहा।

ऐलेक्स क्रिस्टी को ऐसे करता देख हाथ छुड़ाकर, शैफाली के पीछे जाकर छिप गया- “गंदी लड़की!"

कुछ भी हो, पर इस तिलिस्मा में क्रिस्टी और ऐलेक्स की वजह से माहौल हमेशा हल्का रहता था। सभी इनकी चुहलबाजियों से हमेशा हंसते रहते थे।

तभी ब्रेन मशीन ने चौथा प्रश्न कर लिया "ENGLISH में कितने अक्षर होते हैं?"

"26 अक्षर! ये मुझे आता है।” ऐलेक्स ने खुशी से चिल्ला कर कहा। पर सुयश ने 26 की-बोर्ड पर टाइप नहीं किया, वह तो इस सोच में था कि ब्रेन मशीन ने इतना आसान प्रश्न पूछा क्यों?

"7 अक्षर।" तभी शैफाली ने जवाब दिया- "ब्रेन मशीन ने हमसे ‘ENGLISH भाषा' के अक्षर नहीं पूछे हैं, वह सिर्फ ‘ENGLISH शब्द' में कितने अक्षर होते हैं? यह पूछ रहा है।”

शैफाली का तर्क सुनकर सुयश मुस्कुरा दिया, उसने शैफाली के कहे अनुसार की-बोर्ड पर 7 अंक टाइप कर दिया।

7 टाइप करते ही एक बार फिर मशीन पर लगी हरी बत्ती जल उठी। अब ब्रेन मशीन ने सभी से पांचवां प्रश्न कर लिया।

“सागर की बूंद सी है, मेरी जलधारा, भावों की नाव पर निवास है हमारा।"

सभी तेजी से इस प्रश्न के उत्तर के बारे में सोचने लगे कि तभी प्लेटफार्म पर ट्रेन ने सीटी बजाते हुए प्रवेश किया। एक बार के लिये सभी की नजर प्रश्न से हटकर ट्रेन की ओर चली गई।

बड़ी ही विचित्र ट्रेन थी। ट्रेन के इंजन पर बड़ी सी आँख बनी थी और उस पर लिखा था- 'नेत्र एक्सप्रेस'। इंजन के पीछे एक ही डिब्बा था, जिसकी आकृति बिल्कुल नाव के समान थी।

उस नाव को पारदर्शी काँच से ढका गया था, जिसकी वजह से वह ट्रेन काफी आकर्षक लग रही थी। अंदर बैठने के लिये कुर्सियां और मेज दिखाई दे रहे थे, जो उसकी भव्यता को चार चाँद लगा रहे थे।

"दोस्तों हमारा समय तेजी से बीत रहा है, हमारे पास अब बस 12 सेकेण्ड ही बचे हैं।” सुयश ने सबका ध्यान ट्रेन से अपनी ओर कराते हुए कहा।

“आँसू।” जेनिथ ने अभी भी ट्रेन की ओर देखते हुए कहा- “पांचवे प्रश्न का उत्तर आँसू है, क्यों कि आँसू में भी समुद्र के पानी के समान नमक पाया जाता है और वह आँख में रहती है, जिसका आकार भी नाव के समान ही होता है।"

सुयश ने जेनिथ की बात सुन की-बोर्ड पर जल्दी से आँसू टाइप कर दिया। हरी बत्ती एक बार पुनः जल उठी।

अब सबका ध्यान ट्रेन से हटकर प्रश्नों की ओर आ गया था। तभी 'ब्रेन मशीन' ने छठा प्रश्न कर दिया

“चार कोनों का नगर बना, चार कुएं बिन पानी, कुछ सैनिक के घेरे में, छिपी हुई एक रानी।"

इस प्रश्न का उत्तर क्रिस्टी को पहले से ही पता था, इसलिये उसने झट से बोल दिया- “कैरमबोर्ड"

सुयश ने यह उत्तर भी मशीन को बता दिया। हर बार की तरह यह उत्तर भी सही था। अब 'ब्रेन मशीन' ने सातवां प्रश्न कर दिया “अमेरिका और यूरोप के बीच में क्या है?"

“अब कैस्पर पगला गया है। कितने आसान प्रश्न पूछ रहा है?” ऐलेक्स ने हंसते हुए कहा- “अरे इसका उत्तर है समुद्र।"

“नहीं, इस प्रश्न का उत्तर समुद्र नहीं हो सकता। सुयश ने सोचते हुए कहा- “ऐसे बच्चों जैसे प्रश्न कैश्वर हमारे लिये नहीं बनाएगा।"

अब सुयश शैफाली की ओर देखने लगा, जो कि अब भी कुछ सोच रही थी। समय तेजी से बीत रहा था, पर समुद्र के सिवा किसी को कोई भी दूसरा उत्तर समझ नहीं आ रहा था।

अब सिर्फ 7 सेकेण्ड बचे थे। घड़ी की सुई लगातार आगे बढती जा रही थी। “6.....5......4.......3...." तभी शैफाली ने चीखकर कहा- “उत्तर है 'और'।"

सुयश इस चीज को समझ नहीं पाया, पर उसने जल्दी से इस उत्तर को की-बोर्ड पर टाइप कर दिया और ऊपर लगी हरी बत्ती की ओर देखने लगा।

तभी हरी बत्ती पुनः जल उठी।

“ब्रेन मशीन जानबूझकर हमसे पेचीदा प्रश्न पूछ रहा है, जिसका उत्तर हमें सामान्य सा लगे, पर वह गलत हो। जैसे उसने इस प्रश्न में कहीं ये नहीं पूछा कि अमेरिका और यूरोप देश के बीच क्या है? उसने यह पूछा कि अमेरिका और यूरोप के बीच क्या है। अब अमेरिका और यूरोप शब्द के बीच तो 'और' ही है ना।"

शैफाली का लॉजिक सुन सभी ब्रेन मशीन से और भी सतर्क हो गये।

अब ब्रेन मशीन ने आठवां प्रश्न कर दिया-

“एक किले के 2 हैं द्वार, उसमें सैनिक भरे अपार, टकरायें जब दीवारों से, खत्म करें अपना संसार।

धीरे-धीरे ब्रेन मशीन की पहेलियां कठिन होती जा रहीं थीं। इस प्रश्न का उत्तर पहले से किसी को नहीं पता था, इसलिये सभी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।

स्क्रीन पर समय एक बार फिर शुरु हो चुका था। इस बार इस प्रश्न का जवाब सूझा तौफीक को "माचिस"

तौफीक के शब्द सुन सभी को स्वयं पर हंसी आ गई, क्यों कि इस पहेली का उत्तर ज्यादा कठिन नहीं था, पर किसी को समझ नहीं आ रहा था।

सुयश ने इस उत्तर को भी मशीन को बता दिया, यह उत्तर भी सही था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#191.

एक बार फिर से ब्रेन मशीन ने अगला प्रश्न कर लिया, पर इस बार प्रश्न को पूछने की जगह पर वह प्रश्न स्क्रीन पर दिखाई दिया

A+T+8=?

इस प्रश्न को देख सभी ने तुरंत अंग्रेजी के अक्षरों को नंबरों से मैच कराते हुए, A को 1 मानकर और T को 20 मानकर उत्तर 29 बता दिया, पर सुयश ने जैसे ही शैफाली की ओर देखा, तो शैफाली ने सुयश को उत्तर 88 बताया।

अब सभी फिर से आश्चर्य से शैफाली की ओर देख रहे थे क्यों कि इस प्रकार के प्रश्न तो सभी ने पहले से कर रखे थे, पर उन्हें शैफाली के उत्तर का लॉजिक समझ में नहीं आ रहा था।

अभी कुछ समय बाकी था इसलिये शैफाली ने उन्हें समझाया- “हमें A और T को गणित के नंबरों से नहीं मिलाना, बल्कि उसे उच्चारण पर ध्यान देना है। इस प्रकार से A का उच्चारण ‘ए' और T का उच्चारण 'टी' होगा, तो अगर इन सभी को जोड़ें, तो पूरा उच्चारण होगा- एटीएट। यानि की '88"

सुयश ने जल्दी से मशीन पर 88 टाइप कर दिया, पर शैफाली का लॉजिक सुनकर सभी को अपने ऊपर हंसी आ गई।

अब सभी पुनः अगले प्रश्न के लिये ऊपर मशीन की ओर देखने लगे। अब ब्रेन मशीन ने दसवां प्रश्न पूछा

“जन्म हुआ रात में, सुबह हुआ जवान, एक दिन के जीवन में सबको बांटा ज्ञान।"

“यह प्रश्न कुछ पेचीदा लग रहा है?” क्रिस्टी ने कहा- “ऐसा कौन हो सकता है, जो एक रात में ही जवान हो जाए?"

"हमें ब्रेन मशीन के शब्दों पर नहीं, बल्कि उन शब्दों के सार पर ध्यान देना होगा।” सुयश ने क्रिस्टी को देखते हुए कहा- “क्यों कि पिछले सभी प्रश्न मशीन ने इसी प्रकार से पूछे हैं।”

आखिरकार शैफाली ने इस प्रश्न को भी हल कर ही लिया- “कैप्टेन अंकल, इस प्रश्न का उत्तर है न्यूजपेपर।”

सुयश ने उत्तर सुनकर मुस्कुरा कर शैफाली की ओर देखा और फिर स्क्रीन पर इस शब्द को टाइप कर दिया। पुनः उत्तर सही था।

अब बस 2 प्रश्न ही बचे थे। तभी ब्रेन मशीन ने ग्यारहवां प्रश्न पूछ लिया-

"सुबह में चार पैर, दोपहर में दो, शाम को तीन पैर, फिर जाता है सो।"

“यह कैसा प्रश्न है?” इस बार शैफाली भी चकरा गई- “इस प्रकार की कोई जीवित चीज तो पृथ्वी पर नहीं हो सकती?"

अब जब शैफाली ही इस पहेली को नहीं समझ पा रही थी तो बाकी के लोगों का मोरल तो वैसे ही डाउन हो गया।

पर सुयश अभी भी सोचता जा रहा था। वक्त का पहिया धीरे-धीरे अपने कदमों को आगे की ओर बढ़ा रहा था, पर सुयश का दिमाग इस समय वक्त के पहिये से थोड़ा सा तेज चल रहा था, क्यों कि अब उसके चेहरे पर एक मुस्कान दिखाई देने लगी, जो इस बात का द्योतक थी कि सुयश को इस प्रश्न का उत्तर मिल गया है।

चूंकि समय ज्यादा नहीं बचा था, इसलिये सुयश ने पहले उत्तर को, की-बोर्ड पर टाइप कर इन्टर का बटन दबा दिया और फिर बिना हरी लाइट को देखे घूम कर सबको उत्तर समझाने लगा।

"उत्तर था मनुष्य....यहां बचपन को सुबह के समान माना गया है और बचपन में बालक अपने हाथों व घुटनों के बल चलता है, यानि की अपने 4 पैरों पर। फिर जवानी में यानि दोपहर में 2 पैरों पर चलता है और बाद में बुढ़ापे में यानि की शाम को, डंडे का सहारा लेकर तीन पैरों पर चलता है। इसके बाद उसके सोने का मतलब मृत्यु से था।"

इस वास्तव में यह प्रश्न अत्यंत कठिन था, क्यों कि प्रश्न का सार बहुत ही दुष्कर था।

सबको समझाने के बाद सुयश ने पीछे पलटकर मशीन की ओर देखा। मशीन पर हरी बत्ती ही जल रही थी। अब मात्र एक प्रश्न बचा था।

तभी वह आखिरी प्रश्न भी ब्रेन मशीन ने पूछ लिया, पर यह आखिरी प्रश्न एक बार फिर मशीन की स्क्रीन पर चमकने लगा।

पर भलाई ये थी कि इस बार टाइमर नहीं चल रहा था। स्क्रीन पर इस समय कुछ नंबर दिखाई दे रहे थे-1, 3, 5, 7, 9, 11, 13, 15

और लिखा था- ऊपर दिये किन्हीं 3 नंबरों को इस प्रकार जोड़ो कि उत्तर 30 आये और नीचे उन तीन डिजिट की जगह खाली थी। _+_+_ = 30

“इम्पासिबल!" शैफाली ने देखते ही बोल दिया “कैप्टेन अंकल, आपको याद होगा कि मैंने आपसे एक बार इसी तिलिस्मा में 30 कबूतरों को उड़ाने वाला प्रश्न पूछा था, जिसका कोई उत्तर नहीं था, यह प्रश्न भी उसी प्रकार से है। ध्यान से देखिये, ऊपर लिखे सभी नंबर 'विषम' हैं और गणित का नियम ये कहता है कि किसी भी तीन विषम संख्याओं को जोड़कर, कभी भी एक 'सम' संख्या नहीं बनाई जा सकती है। इसलिये मेरे हिसाब से इस प्रश्न का उत्तर संभव ही नहीं है।"

“ध्यान से सोचो शैफाली, शायद हर प्रश्न की ही भांति कैश्वर ने इस प्रश्न में भी कोई ट्रिक लगा रखी हो?" सुयश ने कहा- “और यह बात ध्यान रखना कि अगर तुम इस गणित के प्रश्न को हल नहीं कर पाई, तो हममें से कोई भी नहीं कर पायेगा? सोचो तिलिस्मा में कैश्वर हमें कभी भी ऐसी कोई पहेली नहीं देगा, जिसका कि कोई उत्तर ही ना हो? और ये भी ध्यान रखो कि यह प्रश्न अत्यंत कठिन है, इसीलिये कैश्वर ने इस प्रश्न में टाइमर नहीं रखा है। इसलिये तुम्हारे पास इस प्रश्न को सोचने के लिये पर्याप्त समय है।"

सुयश के इतने शब्द ही, शैफाली के दिमाग में नयी ऊर्जा का संचार कर गये, उसने फिर से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।

काफी देर तक सोचने के बाद भी शैफाली को उत्तर समझ में नहीं आया, इसलिये वह अब ब्रेन मशीन की स्क्रीन के पास आकर देखने लगी।

कुछ सोच शैफाली ने स्क्रीन के ऊपर लिखे गणित के अंको को हाथ से छुआ। वह स्क्रीन टच स्क्रीन की भांति काम कर रही थी।

यह देख शैफाली ने सभी अंकों को हाथ लगाकर देखना शुरु कर दिया, पर जैसे ही शैफाली ने 9 अंक को हाथ लगाया, वह तुरंत घूमकर 6 में बदल गया।

यह देख शैफाली के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

अब उसने पहले अंक की जगह 11, दूसरे अंक की जगह 13 को उठाकर रख दिया। तीसरे अंक की जगह शैफाली ने जैसे ही 9 को 6 बनाकर रखा, तुरंत ब्रेन मशीन की हरी बत्ती जल उठी। 11 + 13 + 6 = 30

अब मशीन के एक स्थान से 6 टिकट निकल आये, जिसे शैफाली ने अपने हाथों में पकड़ा और सभी के साथ भागकर ट्रेन के पास पहुंच गई।

ट्रेन के द्वार पर एक स्कैनर लगा था, उस स्कैनर में टिकट को स्कैन करते ही ट्रेन का दरवाजा खुल गया।

सभी अंदर प्रवेश करके, एक ओर लगी 6 कुर्सियों पर बैठ गये।

"कैप्टेन अगर हमारे साथ शैफाली ना होती, तो इस द्वार को नहीं पार किया जा सकता था?" तौफीक ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा।

"कैश्वर ने सभी द्वार को किसी ना किसी की क्षमताओं को देखकर बनाया है, तो फिर यदि हममें से एक भी हमारे साथ ना होता, तो पूरा तिलिस्मा ही पार नहीं किया जा सकता था।” सुयश ने कहा- “और शायद यह विधि का विधान है, यानि हमारा इस तिलिस्मा में प्रवेश करना, एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि ये समझो कि हम तिलिस्मा तोड़ने के लिये ही पैदा हुए हैं।"

सभी बातें कर रहे थे और उधर शैफाली ट्रेन से बाहर की ओर देख रही थी, पर ट्रेन की गति इतनी तेज थी कि शैफाली को कुछ नजर नहीं आ रहा था।

कुछ ही देर में ट्रेन एक स्टेशन पर जा कर रुकी। सभी ट्रेन से उतरकर नीचे आ गये।

नीचे प्लेटफार्म पर एक ओर लिखा हुआ था अश्रुधारा स्टेशन।"

जैसे ही सभी ट्रेन से उतरे, ट्रेन अपनी जगह से आगे चली गई। तभी सुयश की नजर स्टेशन के बाहर निकलने वाले द्वार की ओर गई।

सुयश ने इशारे से सभी को उस दिशा में चलने के लिये कहा।

स्टेशन के उस द्वार से निकलने के बाद, सभी एक ऐसे स्थान पर पहुंच गये, जहां कि एक बहुत सुंदर स्वीमिंग पूल बना था। स्वीमिंग पूल का पानी काफी साफ दिख रहा था।

शैफाली ने आगे बढ़कर उस स्वीमिंग पूल के पानी को थोड़ा सा अपनी अंजली में लिया और मुंह से लगा कर देखा।

“यही है लैक्राइमल ग्लैंड।” शैफाली ने कहा- “यह आँसुओं का स्वीमिंग पूल है, इस पानी में नमक की काफी ज्यादा मात्रा है। इसका मतलब इसके अंदर से, कोई ना कोई पाइप आँखों तक अवश्य जाता होगा? पर यह पता लगाने के लिये मुझे इसके अंदर जाना होगा।"

यह कहकर शैफाली ने सुयश की ओर देखा। सुयश ने धीरे से अपना सिर हिलाकर शैफाली को स्वीमिंग पूल के अंदर जाने की आज्ञा दे दी।

अब शैफाली ने बिना देर किये, स्वीमिंग पूल में छलांग लगा दी। शैफाली तैरती हुई स्वीमिंग पूल के तली की ओर बढ़ी, जहां एक 5 फुट मोटा पाइप उसे दिखाई दिया। शैफाली बिना डरे उस पाइप में प्रवेश कर गई।

पाइप के अंत में शैफाली को एक ढक्कन सा लगा दिखाई दिया, जो कि बंद था। शैफाली ने उस ढक्कन को पकड़ कर उठा दिया। ढक्कन हटते ही स्वीमिंग पूल का सारा पानी एक बहाव के साथ पाइप से होकर नीचे की ओर जाने लगा।

शैफाली भी उस पानी के साथ बहकर, आँखों की कोर वाले उसी स्थान पर पहुंच गई, जहां से उसने इस द्वार की शुरुआत की थी।

चूंकि आँसुओं का बहाव बहुत तेज था, इसलिये शैफाली ने एक खंभे को जोर से पकड़ रखा था।

कुछ ही देर में सभी आँसू आँखों की कोर से बाहर निकल गये।

तभी शैफाली को उसी रास्ते से सुयश सहित सभी आते दिखाई दिये।

अब कार्निया पर जमा चिपचिपा पदार्थ पूरी तरह से साफ हो गया था।

"इस द्वार का सारा कार्य तो समाप्त हो गया, फिर इससे बाहर निकलने का दरवाजा कहां है?" ऐलेक्स ने कहा।

तभी शैफाली की निगाह आँख की कोर से जुड़ी 'लैक्राइमल पंक्टा' की ओर गई। जहां पर एक द्वार दिखाई दे रहा था, जिस पर 5.2 लिखा हुआ था।

"मुझे लगता है कि हमें इस द्वार से नाक की ओर जाना होगा?" शैफाली ने कहा- “वही हमारा तिलिस्मा का अगला द्वार है।"

"हे भगवान! अब आँख के बाद नाक में जाना होगा।” ऐलेक्स ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा- “तेरा बेड़ा गर्क हो कैश्वर तुझे कोई और द्वार ना मिला, तिलिस्मा में बनाने को।”

सभी अब शैफाली के साथ उस द्वार की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
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