Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 38 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#192.

युद्धनीति: (19.01.02, शनिवार, नक्षत्रलोक, कैस्पर क्लाउड)

कैस्पर जब श्वेत महल को देखने गया था, तो वारुणि कैस्पर को लेकर नक्षत्रलोक आ गई थी।

वारुणि ने कैस्पर को वहां एक ऐसा जीव दिखाया था, जो कि कैस्पर की ही शक्तियों से निर्मित था। उसके बाद कैस्पर ने बताया कि किस प्रकार, कैश्वर ने उसे किनारे कर के पूरे तिलिस्मा पर अधिकार कर लिया है।

कैस्पर ने वारुणि से किसी देवयुद्ध का भी जिक्र किया था, जिसमें वारुणि को एक निर्णायक भूमिका निभानी थी।

वारुणि ने भी कैस्पर से कहा था कि वह उस 3 आँख और 4 हाथ वाले विचित्र जीव के द्वारा, उस ग्रह के बारे में जानने की कोशिश करेगी, जिधर उस जीव ने अपने सिग्नल मॉडुलेटर यंत्र से मैसेज भेजा था।

इसलिये पिछली 4 दिन से वारुणि लगातार नक्षत्रशाला में काम कर रही थी। कल तो वह पूरी रात जागती रही थी।

वारुणि ने उस विचित्र जीव से मिले, सिग्नल मॉडुलेटर यंत्र की तरंग दैर्ध्य जांच ली थी। जिससे उसे, सिग्नल की दूरी और गति का पता चल गया था।

अब वारुणि ध्यान से उस जीव की, उस समय की फोटो का अध्ययन कर रही थी, जब उसे टूटी हुई ओजोन लेयर के पास से पकड़ा गया था। इस समय वारुणि ने अपने हाथों में पेंसिल और ज्यामिति के कुछ टूल्स पकड़ रखे थे।

कुछ ही देर में वारुणि ने, उस जीव के कोण का भी पता लगा लिया। अब बस उस जीव के शरीर के कोण, सिग्नल की गति और दूरी को ब्रह्मांड के मानचित्र में डालने की जरुरत थी।

अब वारुणि ने अपने सामने मौजूद एक बड़े से कम्प्यूटर पर, अपनी सभी गणनाओं को डाल दिया और ब्रह्मांड के मानचित्र में सर्च का बटन दबा दिया।

नक्षत्रलोक का आधुनिक कम्प्यूटर, तेजी से वारुणि की गणनाओं से खेलने लगा।

कुछ ही देर में उस कम्प्यूटर ने एक ग्रह का चित्र और उसकी पृथ्वी से दूरी के बारे में बताना शुरु कर दिया।

वारुणि के लिये यह नीला ग्रह बिल्कुल नया था, वह इसके बारे में कुछ नहीं जानती थी। फिर भी उस ग्रह को देख वारुणि के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थिरक उठी। आखिर उसकी रात भर की मेहनत का फल मिल गया था।

वारुणि ने इस समय घड़ी पर नजर डाली, घड़ी में इस समय सुबह का 8 बज रहा था।

“सुबह का 8 बज गया है, कैस्पर अवश्य ही उठ गया होगा। मुझे तुरंत उसको इस ग्रह के बारे में बताना चाहिये।" वारुणि ने मन ही मन सोचा और तुरंत नक्षत्रशाला से निकलकर कैस्पर के कक्ष की ओर चल दी।

वारुणि बिना दरवाजा खटखटाये, कैस्पर के कमरे में प्रवेश कर गई, पर वारुणि की आशा के विपरीत कैस्पर अभी भी सो रहा था।

वारुणि कक्ष में उपस्थित एक कुर्सी पर बैठ गई और सो रहे कैस्पर को देखने लगी।

सोते समय भी कैस्पर के चेहरे पर एक सौम्यता सी दिखाई दे रही थी।

वारुणि ना जाने ऐसे ही कितनी देर तक बैठी कैस्पर को निहारती रही। आखिरकार कैस्पर की आँख खुली।

वारुणि को अपने कमरे में देख कैस्पर हैरान हो गया।

"लगता है मैं कोई सपना देख रहा हूं आज सुबह-सुबह चाँद हमारे कमरे में क्यों आ गया?” कैस्पर ने बिस्तर से उठकर अंगड़ाई लेते हुए कहा।

“तुम्हारी चाँद की पिछली पूरी रात काली हो चुकी है और वह सुबह-सुबह ही तुम्हारे कमरे में आया था, पर अफसोस कि इस समय दोपहर हो चुकी है।” वारुणि ने मुस्कुराते हुए कैस्पर को बाथरुम की ओर धक्का देते हुए कहा- “अब चाँद चाहता है कि उसका दोस्त भी नहा-धोकर, उसके साथ एक नये ग्रह की सैर पर चले।"

“इसका मतलब कि चाँद ने रात भर में, उस नये ग्रह को ढूंढ ही लिया।” कैस्पर ने बाथरुम में प्रवेश करते हुए कहा- “तो फिर बस मैं नहाकर अभी आया। फिर दोनों साथ में चलेंगे, उस नये ग्रह की सैर पर।"

कैस्पर के बाथरुम में घुसने के बाद, वारुणि, विक्रम के ख्यालों में खो गई- “आज विक्रम को गायब हुए 6 दिन बीत गये हैं, पर उसकी कहीं से कोई खबर नहीं आई। उसने पिछले हजारों वर्षों में आज तक ऐसा कभी नहीं किया था। एक तो वह मेरे मानसिक तरंगों का भी जवाब नहीं दे रहा है। पता नहीं वह कहां और किस हाल में होगा?

कुछ देर के लिये ही सही पर विक्रम को याद कर, वारुणि का पूरा चेहरा उतर गया। अब वह सिर झुकाकर वहीं कमरे में बैठ गई।

कुछ देर बाद कैस्पर फ्रेश होकर बाथरुम से निकला। अब उसकी नजर वारुणि पर गई, जो कि वहीं कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी।

कैस्पर ने अपने कपड़े बदले और वारुणि के सामने जमीन पर बैठकर उसे देखने लगा।

लगभग 10 मिनट बाद ही वारुणि हड़बड़ा कर नींद से उठ गई। अब उसकी नजर सामने जमीन पर बैठकर उसे निहारते कैस्पर पर गई।

“ये तुम मेरी नकल क्यों कर रहे हो?” वारुणि ने उठकर कैस्पर का कान पकड़ते हुए कहा- “तुम मेरे नींद से जागने का कई घंटों तक इंतजार करती हो, तो मैंने सोचा कि मैं भी कुछ घंटे अपने चाँद को निहार लूं।"

"चल झूठे, मुझे अभी सोये हुए 10 मिनट भी नहीं बीता है। इतना सफेद झूठ बोलते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती।” वारुणि ने प्यार से कैस्पर को डांटते हुए कहा।

“आती है...कभी-कभी मुझे भी शर्म आती है, पर अब अपने चाँद के सामने क्या शर्माना?" कैस्पर ने वारुणि को खुश करते हुए कहा।

“तुम्हारी ऐसी ही हरकतें रहीं, तो सच मानो किसी दिन तुम्हें विक्रम बहुत मारेगा।” वारुणि ने हंसते हुए कहा।

"अरे मारने के लिये उसका मिलना भी तो जरुरी है।” कैस्पर ने अब सीरीयस होते हुए कहा- “विक्रम का कुछ पता चला क्या?" कैस्पर की बात सुन वारुणि ने धीरे से 'ना' में अपना सिर हिला दिया।

“अरे तो इसमें दुखी होने की क्या बात है?” कैस्पर ने वारुणि को जोर से हिलाते हुए कहा- “तुम्हारा ये दोस्त मैं ढूंढकर लाऊंगा उसे बस इसके लिये मुझे एक बार अपनी माँ से मिलना पड़ेगा। है ना। ....

“मैं भी मिलूंगी तुम्हारी माँ से।” वारुणि ने कहा।

"जरुर मिलाऊंगा। चलो अब पहले जरा उस ग्रह के बारे में जान लें, फिर मैं अपनी माँ से बात करुंगा।” कैस्पर ने कहा और फिर वारुणि के पीछे-पीछे नक्षत्रशाला की ओर चल दिया।

कुछ ही देर में दोनों नक्षत्रशाला में थे। वारुणि जिस प्रकार अपने कम्प्यूटर को छोड़ गई थी, उसका कम्प्यूटर उसी हालत में अभी भी पड़ा था।

अब कैस्पर की नजर कम्प्यूटर की स्क्रीन पर थी, जिस पर एक नीले रंग का ग्रह चमक रहा था। कम्प्यूटर उस ग्रह की पृथ्वी से दूरी 2.5 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर दिखा रहा था।

“इस ग्रह के बारे में तो मुझे भी कुछ नहीं पता?...और...और इस ग्रह की दूरी तो पृथ्वी से बहुत ज्यादा है।” कैस्पर ने स्क्रीन की ओर देखते हुए कहा- “इतनी दूरी तक सिग्नल भेजने वाला सिग्नल मॉडुलेटर, कैश्वर के पास आया कहां से?... इसका मतलब है कि अवश्य ही कोई ना कोई और इस समय कैश्वर के साथ है? जिसने उसे यह सिग्नल मॉडुलेटर दिया है...पर कौन?...जब कैश्वर मेरा कहना नहीं मान रहा, तो ऐसा कौन है पृथ्वी पर, जो कैश्वर को भी अपने इशारों पर नचा रहा है? इन सबके पीछे कुछ ना कुछ रहस्य तो अवश्य है? मुझे इसका पता लगाने के लिये, एक बार फिर से अराका पर जाना ही पड़ेगा, पर... पर मेरे गुप्त ऊर्जा द्वार को तो पहले ही कैश्वर बंद कर चुका है, फिर मैं तिलिस्मा के अंदर कैसे प्रविष्ठ हो सकता हूं?...अब मुझे सिर्फ माँ ही इस मुसीबत से बचा सकती हैं.... मुझे माँ को ही याद करना होगा। तुम भी मेरे साथ चल रही हो वारुणि।”

यह कहकर कैस्पर ने अपनी आँख बंद कर ली और वारुणि का हाथ पकड़कर माया को याद करने लगा

“माँ, मैं इस समय एक बहुत बड़ी मुश्किल में हूं, मुझे इस समय आपकी मदद की आवश्यकता है। मुझे अपने पास बुलाइये माँ।”

वारुणि समझ नहीं पा रही थी कि कैस्पर की माँ, किस प्रकार नक्षत्रलोक से उन्हें अपने पास बुलायेंगी, पर उसने कुछ कहा नहीं। वह अब बस आँख बंद किये कैस्पर को देख रही थी।

तभी वारुणि को हवा में एक ऊर्जा द्वार बनता दिखाई दिया। एक पल से भी कम समय में उस ऊर्जा द्वार ने कैस्पर और वारुणि को अपने अंदर खींच लिया।

वारुणि को अपना शरीर हवा में गिरता हुआ सा महसूस हो रहा था, परंतु चारो ओर तेज रोशनी की वजह से उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन ऐसी स्थिति में वारुणि ने कैस्पर का हाथ नहीं छोड़ा था।

कुछ ही देर में रोशनी कम होने लगी। अब वारुणि की आँखें देखने लायक हो गईं थीं।

वारुणि ने स्वयं को इस समय एक ऐसे कमरे में पाया, जिसमें कोई खिड़की नहीं थी, बस एक दरवाजा ही था। कैस्पर उसके बगल खड़ा था।

तभी दरवाजे से एक खूबसूरत स्त्री ने अंदर प्रवेश किया, जिसे देख वारूणि हैरान हो गई।

“आप????” वारुणि के मुंह से माया के लिये सम्मान भरे शब्द निकले- “आप कैस्पर की माँ हैं! आपका चित्र तो मैंने वेदालय में हर स्थान पर लगे देखा था।"

माया ने वारुणि को देख धीरे से अपना सिर हिलाया, पर कुछ कहा नहीं? तभी कैस्पर दौड़कर माया के गले से लग गया।

“क्यों रे, अब तू मैग्ना की जगह इससे विवाह करेगा क्या?" माया की आवाज वातावरण में गूंजी। माया की बात सुन वारुणि शर्मा गई।

“अरे नहीं माँ, ये मेरी बहुत अच्छी दोस्त है बस।"

तभी वारुणि ने आगे बढ़कर माया के चरण स्पर्श कर लिये। माया ने अपना हाथ उठाकर वारुणि को आशीर्वाद दिया- “जा जल्दी ही तुझे विक्रम मिल जाये।"

माया की बात सुनकर वारुणि हैरानी से कैस्पर को देखने लगी थी, क्यों कि अभी उन्होंने माया से विक्रम के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं था?

“अरे, इतना हैरान मत हो वारुणि, यह मेरी माँ हैं, यह भूत, भविष्य, वर्तमान सब जानती हैं, इनसे इस पृथ्वी पर कुछ भी छिपा नहीं है?" कैस्पर ने वारुणि से कहा“ बस तुम्हें इनकी आवाज वातावरण में सुनने की आदत डालनी पड़ेगी बस। क्यों कि यह किसी से भी बात नहीं करती हैं।"

“क्या तुम्हें पता है कैस्पर? कि माता ने ही हमारे वेदालय की रचना की थी और यह हमारे महागुरु नीलाभ की पत्नी हैं, इस हिसाब से यह हमारी गुरुमाता हुईं।" वारुणि ने प्रसन्नता से कहा।

माया ने अब कैस्पर और वारुणि को बैठने का इशारा किया।

“अच्छा किया कैस्पर कि तुमने मुझे याद कर लिया, अगर कुछ दिन तक तुम मुझे और याद नहीं करते, तो मैं स्वयं तुम्हें अपने पास बुला लेती।” माया ने कहा- “मुझे पता है कि तुम लोगों के मस्तिष्क में सैकड़ों प्रश्न घूम रहे हैं? इसलिये अब तुम एक-एक कर मुझसे सारे प्रश्न पूछ सकते हो। आज मैं भी बिना घुमाये-फिराये तुम्हें सबकुछ बता दूंगी क्यों कि सभी रहस्यों को खोलने का इससे बेहतर समय अब नहीं आयेगा।

“तो क्या माँ, आप जिस देवयुद्ध का ज़िक्र हमें बचपन से करती आई थीं, उसका समय अब आने वाला है?” कैस्पर ने माया से पूछा।

“हां, कैस्पर। वह देवयुद्ध अब बहुत निकट है। अगर उसे सही से संभाला नहीं गया, तो वह पूरी पृथ्वी का विनाश कर देगा।" माया ने कहा।

“कौन हैं, वह पृथ्वी के विनाशक, जिनके बारे में अभी हमें पता भी नहीं है?" वारुणि ने पूछा।

“वह एक नहीं है, बल्कि बहुत से हैं। कुछ पृथ्वी से सुदूर दूसरी आकाशगंगा से आये हैं, तो कुछ सैकड़ों वर्षों से पृथ्वी पर छिपे, उस विनाश का ताना-बाना बुन रहे हैं। हमारा कार्य उन सभी आसुरी शक्तियों को एक होने से रोकना है। अगर वह सब एक हो गये तो हमारी पृथ्वी का बचना असंभव है।" माया ने गंभीर शब्दों में कहा।

“पर हम उन्हें एक होने से किस प्रकार रोक सकते हैं? हम ना तो उनके बारे में जानते हैं? और ना ही उनकी शक्तियों के बारे में?...फिर इस प्रकार बिना जाने उन्हें रोक पाना असंभव है।" वारुणि ने कहा।

“इसी असंभव कार्य को तो तुम दोनों को संभव बनाना है। और...इसे संभव बनाने के लिये तुम्हें 3 कार्य करने होंगे। पहला कार्य तुम्हें सभी देवशक्ति धारकों को एक स्थान पर एकत्र करके, उन्हें सबकुछ बताकर एक माला में पिरोना होगा। बिना एकता की शक्ति के, तुम यह युद्ध कभी भी जीत नहीं सकते। दूसरा कार्य यह है कि तुम्हें सभी विनाशकों को एक साथ मिलने के पहले ही, एक-एक कर मारना शुरु करना होगा।

“अगर तुम ऐसा करने में सफल हो गये, तो देवयुद्ध से पहले ही हम अपने शत्रुओं की शक्ति को आधा कर सकते हैं। तीसरा कार्य तुम्हें कैसे भी ग्रीक देवताओं को अपनी ओर करना होगा? ये ध्यान रखना कि अगर वो हमारी ओर ना आयें, तो कम से कम हमारे शत्रुओं की ओर से भी युद्ध ना करें। क्यों कि अगर ग्रीक देवी -देवता भी उनकी ओर मिल गये, तब हम अपने शत्रुओं से नहीं जीत पायेंगे। इसके अलावा और कुछ छोटी -मोटी तैयारियां करनी होंगी, जो कि मैं समय-समय पर तुम्हें बताती रहूंगी।"

“पर माँ, इनमें से पहले 2 कार्य तब तक संभव नहीं हैं, जब तक कि हमें जानकारियां ना मिल जायें।" कैस्पर ने कहा।

“तुम जानकारियों की चिंता मत करो, मेरे पास सभी मित्रों और शत्रुओं की पूर्ण जानकारियां हैं।” माया ने यह कहकर अपना हाथ ऊपर की ओर उठाया।

माया के ऐसा करते ही हवा में एक पुस्तक प्रकट हो गई, जो कि हवा में तैरती हुई कैस्पर के हाथ में आ गई। कैस्पर ने उस पुस्तक को देखा, उसका नाम 'देवयुद्ध' था।

“यह पुस्तक मैंने तुम्हारे लिये ही लिखी है कैस्पर।" माया ने कहा- “इस पुस्तक में तुम्हें सभी शत्रुओं और मित्रों की जानकारियां मिल जायेंगी।"

कैस्पर ने उत्सुकतावश 'देवयुद्ध' का एक पृष्ठ खोलकर देखा। उस पृष्ठ पर एंड्रोनिका लिखा था।

“यह एंडोनिका क्या है माँ?” कैस्पर ने माया से पूछा।

"एंड्रोनिका, उस अंतरिक्ष यान का नाम है, जिसे तुम लोग उल्कापिंड समझ रहे हो।" माया ने कहा।

"तो क्या उस उल्कापिंड....म...मेरा मतलब है कि एंड्रोनिका में अंतरिक्ष के जीव भी हैं?” वारुणि ने आश्चर्य से पूछा।

“वही तो हमारे असली शत्रु हैं वारुणि।” माया ने कहा- “पृथ्वी के शत्रुओं को तो नियंत्रित करना सरल है, क्यों कि उन पर हमारी प्रकृति के नियम लागू होते हैं। पर उन दूसरे ग्रह से आये जीवों में, कुछ पर तो हमारी पृथ्वी के प्रकृति के नियम भी लागू नहीं होते, ऐसे में उन्हें मारना बहुत ही मुश्किल है।”

“गुरुमाता, हम इस पुस्तक को तो पढ़ लेंगे, पर मुझे थोड़ा सा और आपसे इन अंतरिक्ष के जीवों के बारे में जानना है? इनके पास ऐसी कौन सी शक्तियां हैं? जिन पर हमारी प्रकृति के नियम ही लागू नहीं होते।” वारुणि ने माया से पूछा।

“ठीक है वारुणि, तो बाकी पूरी जानकारी तुम लोग इस पुस्तक से पढ़ लेना। मैं तुम्हें सिर्फ उस अंतरिक्ष यान के बारे में बता देती हूं। वह अंतरिक्ष यान, हमारी पृथ्वी से 2.5 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर स्थित, फेरोना नामक एक नीले ग्रह से आया है। एंड्रोमेडा नामक इस अंतरिक्ष यान में कुल 15 जीव हैं, जो देखने में पृथ्वी वासियों जैसे ही हैं, बस उनके शरीर का रंग नीला है। यह सभी जीव अपने ग्रह के सबसे ताकतवर जीव हैं। इनका सम्मिलित नाम ‘एंड्रोवर्स पॉवर' है। ‘एंड्रोवर्स पॉवर' में अंग्रेजी के कुल 15 अक्षर होते हैं, जो कि इन सभी 15 जीवों के नाम के प्रथम अक्षर से मिलकर बने हैं।

“इन जीवों में कुल 10 पुरुष जीव हैं, जिन्हें 'एंड्रोवर्स' कहा जाता है। बाकी बचे 5 जीव, महिलाएं हैं, जिन्हें 'पॉवर' कहा जाता है। यानि इन सभी 15 जीवों को मिलाकर ही 'एंड्रोवर्स पॉवर' बनता है। इसमें यह बात ध्यान रखने वाली है कि इन जीवों की महिलाएं आपात स्थिति में ही बाहर निकलती हैं और वह अपने पुरुष जीवों से ज्यादा शक्तिशाली हैं। सभी 10 पुरुष जीवों ने अपनी ड्रेस पर क्रमशः A1 से लेकर A10 तक लिख रखा है और सभी महिला जीवों ने अपनी ड्रेस पर क्रमशः P1 से P5 तक लिख रखा है। मैंने इसके अगले पृष्ठ पर इन सभी के नाम और जानकारियां लिख रखीं हैं।"

माया की बात सुन, कैस्पर ने तुरंत पुस्तक का अगला पन्ना खोलकर देखा, उस पन्ने पर एक लिस्ट थी।

“इनमें से कुछ शक्तियों के बारे में तो हमने सुना तक नहीं है?" वारुणि ने पुस्तक में झांकते हुए कहा- “जैसे कि यह डार्क मैटर क्या है?"

"हमारे ब्रह्मांड में करोड़ों सितारे हैं, जिन्हों ने ब्रह्मांड का बहुत सा हिस्सा घेर रखा है, परंतु हम जब भी ब्रह्मांड को देखते हैं, तो हमें ज्यादातर उसका काला भाग ही दिखाई देता है। ब्रह्मांड का वहीं काला भाग डार्क मैटर कहलाता है। पहले वैज्ञानिकों को इस काले भाग के बारे में कुछ नहीं पता था? उन्हें लगता था कि यह ब्रह्मांड का खाली स्थान है, पर ज्यादा खोज होने के बाद हमें इस डार्क मैटर का पता लगा। यह डार्क मैटर ब्रह्मांड के सभी ग्रहों के बीच संतुलन बनाये रखने का कार्य करता है। अगर साधारण भाषा में समझें, तो हम केवल उसी चीज को देख सकते हैं, जो या तो प्रकाश का उत्सर्जन, अवशोषण या फिर परावर्तित करता हो। परंतु डार्क मैटर इनमें से कुछ भी नहीं करता, इसलिये वह हमें दिखाई नहीं देता। डार्क मैटर, हमारी पृथ्वी की किसी भी प्राकृतिक चीज से प्रभावित नहीं होता? ना ही हवा, ना ही आग, पानी और किसी भी धातु से?" माया ने वारुणि को समझाते हुए कहा।

“अगर डार्क मैटर पर कुछ असर ही नहीं होता, तो ना तो वह हमें मार पायेगा और ना ही हम उसे।” वारुणि ने कहा।

“ऐसा नहीं है वारुणि, डार्क मैटर का द्रव्यमान यानि कि भार, बिल्कुल ना के बराबर होता है, इसलिये वह हमारे जीवन में, हमारे शरीर से पार होने के बाद भी हमारा कुछ नहीं कर पाता, परंतु अगर डार्को ने डार्क मैटर का द्रव्यमान बढ़ाकर हम पर वार किया, तो एक सेकेण्ड से भी कम समय में हमारा पूरा शरीर कणों में बिखरकर हवा में मिल जायेगा।" माया ने अपने ज्ञान का परिचय देते हुए कहा- “तभी तो मैं तुम लोगों को आने वाले खतरे से आगाह कर रही हूं, जिससे तुम लोग समय रहते ही उससे बचाव करने की तकनीक ढूंढ सको।"

“क्या ऐसे खतरनाक डार्क मैटर को किसी भी प्रकार से नियंत्रित किया जा सकता है?" वारुणि तो आज पूर्ण ज्ञान लेने के मूड में थी। ऐसा लग रहा था कि उसे माया के रुप में कोई खजाना मिल गया हो?

"गुरुत्वाकर्षण.....एक वहीं चीज है, जिससे डार्क मैटर आकर्षित होता है अब ये देखना तुम्हारा काम होगा कि तुम्हारे किस मित्र के पास गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है और उसे कब और कैसे डार्को के आगे करना है? ये ध्यान रखना कि समय से पहले दिव्यशक्तियों का प्रदर्शन सदैव हानिकारक होता है।" माया ने मुस्कुराते हुए वारुणि को गुरुमंत्र दिया।

अब वारुणि ने उस लिस्ट को देखते हुए फिर से पूछा- “गुरुमाता, यह सामान्य शक्ति क्या है? जो किसी 'रेने' के पास है?"

यह सुनकर माया मुस्कुरा दी- “रेने इस पूरे ग्रुप की कमांडर है, यह एंड्रोनिका से तभी निकलती है, जब सबकी शक्तियां विफल हो जाती हैं दरअसल सच कहें तो रेने के पास कोई शक्ति नहीं है, पर वह अपने सामने किसी भी शक्ति को रहने भी नहीं देती। मतलब अगर वह सामने हो तो किसी भी शत्रु की दिव्य शक्तियां काम नहीं करती हैं और ऐसे में वह सभी आसानी से जीत जाते हैं। बस अब इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बताने वाली वारुणि? इसके आगे तुम दोनों को स्वयं ही देखना होगा। और हां इसमें से एक जीव एलात्रा 2 दिन पहले मारा जा चुका है।” माया ने सभा का समापन करते हुए कहा।

“एक आखिरी चीज और बता दीजिये कि विक्रम ठीक तो है ना?" वारुणि ने आखिरी सवाल पूछते हुए कहा।

“हां, विक्रम ठीक है और वह तुमसे समय आने पर मिल जायेगा। परंतु धरा और मयूर को इन अंतरिक्ष के जीवों ने बंदी बना लिया है और अब वह एकएक कर बाकी लोगों पर भी हमला करेंगे।" माया ने कहा- “इसलिये तुम लोगों को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी और हां अभी तो मैं तुम दोनों को वापस नक्षत्रलोक भेज रही हूं, पर जल्दी ही मैं तुम्हें फिर से वापस बुलाऊंगी और फिर मैं तुम दोनों के साथ ओलंपस पर्वत चलूंगी, इससे पहले कि कोई दूसरी परेशानी बढ़े? हमें ग्रीक देवताओं से एक बार बात करनी ही पड़ेगी।”

यह कहकर माया ने अपना हाथ हिलाया, इसी के साथ कैस्पर और वारुणि, ऊर्जा द्वार से होते हुए पुनः नक्षत्रशाला में पहुंच गये, पर अब उनके चेहरे पर थोड़ी निश्चिंतता के भाव थे।

जारी रहेगा_____✍️
 
#193.

चैपटर-6

प्राणवायु: (तिलिस्मा 5.2)

सुयश सहित सभी लैक्राइमल पंक्टा से होते हुए नाक के अंदर पहुंच गये थे। सभी के सामने अब 2 लंबी सुरंगें दिखाई दे रहीं थीं।

“ये दोनों सुरंगें नाक के दोनों छेद लग रहे हैं?" क्रिस्टी ने कहा- “पर यहां पर इतना दम क्यों घुट रहा है? ऐसा लग रहा है कि जैसे यहां शुद्ध हवा है ही नहीं।"

"क्रिस्टी सही कह रही है, यहां पर शुद्ध हवा नहीं है, मेरा भी यहां पर दम घुट रहा है।” सुयश ने तेज-तेज साँस लेने की कोशिश करते हुए कहा।

"मुझे लग रहा है कि हम जहां खड़े हैं, इस नाक के दोनों छेद बुरी तरह से बंद हैं, जिसकी वजह से हम यहां पर साँस नहीं ले पा रहे हैं।" शैफाली ने कहा- “हमें जल्द से जल्द इस नाक के छेद को खोलना होगा, नहीं तो हमारा दम यहां पर घुट जायेगा।

“मैं इस जगह पर भी ठीक से साँस ले पा रहा हूं। ऐलेक्स ने कहा- “शायद यह मेरी वशीन्द्रिय शक्ति के कारण हो रहा है।"

"मुझे लगता है कि हमें बिना एक सेकेण्ड गंवाए, पहले इन नासट्रिल्स (नाक के दोनो छेद) को खोलना होगा।" जेनिथ ने भी गहरी-गहरी साँस लेते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन सभी, एक सुरंग के अंदर की ओर तेजी से चल दिये।

जब वह सुरंग के आखिरी छोर पर पहुंचे, तो उन्हें सुरंग के मुहाने पर, एक शटर लगा दिखाई दिया।

उस शटर को उठाने के लिये, एक हैंडिल की जरुरत थी, जो उनके पास नहीं था।

"कैप्टेन अंकल, बिना शटर के हैंडिल के हम नाक को नहीं खोल पायेंगे।” शैफाली ने इधर-उधर देखते हुए कहा- “मुझे लगता है कि शटर का हैंडिल आसपास ही कहीं होना चाहिये?"

शैफाली के साथ अब सभी तेजी से अपने आसपास देखने लगे। तभी जेनिथ को एक पत्थर के पीछे, एक छोटा सा धातु का डिब्बा पड़ा दिखाई दिया।

"शैफाली, यहां पर एक छोटा सा डिब्बा है, परंतु इस पर कोई 7 डिजिट वाला कोड लगा है।" कहते-कहते जेनिथ जमीन पर बैठ गई। उसकी साँस अब ज्यादा फूलने लगी थी।

जेनिथ की आवाज सुन सभी भागकर जेनिथ के पास आ गये।

“धत् तेरे की।” शैफाली ने गुस्साते हुए कहा- “इस बार कैश्वर ने 7 डिजिट का कोड दिया है, जिसे बिना उसका सही पासवर्ड जाने खोलना असंभव है और ऊपर से हमें साँस भी नहीं आ रही, ऐसे में इतने कम समय में कोड को ढूंढ पाना भी बहुत मुश्किल है।

शैफाली अब खतरे को पूरी तरह से भांप चुकी थी, इसलिये उसने कोड ढूंढने की जगह ऐलेक्स का हाथ पकड़ा और बोल उठी- “ऐलेक्स भैया, अब तुम ही हम सबकी आखिरी उम्मीद हो। अब मैं जो कह रही हूं, उसे आप ध्यान से सुनो। हम इतने कम समय में कोड को ढूंढ कर, इस लॉक को नहीं खोल पायेंगे, इसलिये हमें कोड ढूंढने की जगह पहले सभी के साँस लेने की व्यवस्था करनी होगी, नहीं तो हम सभी यहां पर मारे जायेंगे।

“अब अगर ऐसी स्थिति में हम नाक को नहीं खोल पा रहे हैं, तो कम से कम हमें मुंह को खोलना होगा। अगर कैश्वर के बनाये इस विशाल मानव का मुंह भी खुल गया, तो हमें साँस आने लगेगी। तो आप यहां से नाक के रास्ते मुंह में प्रवेश करो और कैसे भी करके इस मानव का मुंह खोल दो? लेकिन यह ध्यान रहे,.... कि आपके पास समय बहुत कम है।“ शैफाली ने यह कहकर ऐलेक्स को मुंह की ओर जाने का रास्ता बता दिया।

ऐलेक्स बिना देर किये, मुंह की ओर चल दिया। शैफाली के कहे अनुसार ऐलेक्स, जैसे ही एक रस्सी के सहारे नीचे उतरा, उसने स्वयं को उस विशाल कृत्रिम मानव के मुंह में पाया।

शैफाली सही कह रही थी, इस समय उस कृत्रिम मानव का मुंह भी बंद था।

“हे भगवान, इस राक्षस का मुंह अब कैसे खुलवाऊं?" ऐलेक्स मन ही मन बड़बड़ाया।

ऐलेक्स की नजरें अब तेजी से चारो ओर घूमने लगीं। पर ऐलेक्स को मुंह में कोई भी ऐसी चीज नहीं दिखाई दी, जिससे वह राक्षस का मुंह खुलवा सके।

धीरे-धीरे समय बीत रहा था और हर बीतते समय के साथ ऐलेक्स को अपने दोस्तों का ख्याल आ रहा था। उसे साफ महसूस हो रहा था कि उसके दोस्तों के प्राण संकट में हैं, उसे कुछ भी करके इस कृत्रिम मानव का मुंह खुलवाना ही होगा?

तभी ऐलेक्स की नजर उस कृत्रिम मानव के मुंह में स्थित एक दाँत की ओर गई। उस दाँत में एक जगह पर छोटा सा छेद दिखाई दे रहा था। यह देख ऐलेक्स की आँखों में खुशी साफ झलकने लगी।

“कैश्वर ने इतना बड़ा कृत्रिम मानव बनाया, पर उसे टूथपेस्ट नहीं दिया, अब देखो, इस बेचारे के दाँत में कीड़ा लग गया है।" यह सोच ऐलेक्स उस दाँत के पास पहुंचा और अपने जूते से दाँत के उसी स्थान पर तेज-तेज चोट मारने लगा।

ऐलेक्स का यह आइडिया काम कर गया। ऐलेक्स के चोट करने से उस कृत्रिम मानव के दाँत में दर्द होने लगा, जिससे वह मुंह खोलकर बुरी तरह से कराहने लगा।

यह देख ऐलेक्स पागलों की तरह से, उस स्थान पर कुछ चोट और मारने लगा। शायद ऐलेक्स उस कृत्रिम मानव को कैश्वर समझ अपनी भड़ास निकाल रहा था।

कुछ देर तक ऐसा करते रहने के बाद ऐलेक्स वापस नाक की ओर चल दिया। लेकिन उसने जाते-जाते भी ऐसा कर दिया था, कि कम से कम अब 2 घंटे तक उस कृत्रिम मानव ने अपना मुंह तो नहीं बंद करना था।

ऐलेक्स जब ऊपर नाक में पहुंचा, तब तक सभी ठीक नजर आने लगे थे।

ऐलक्स को देख क्रिस्टी ने दौड़कर ऐलेक्स को गले से लगा लिया। लगाती भी क्यों ना आखिर ऐलेक्स ने सभी की जान जो बचाई थी?

“इन दोनों का फिर शुरु हो गया।” जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा- “आप चलिये कैप्टेन, इससे पहले कि यह कृत्रिम मानव फिर से अपना मुंह बंद करे, हमें नाक के छेद को खोलना ही होगा।"

जेनिथ की बात सुन ऐलेक्स और क्रिस्टी हड़बड़ाकर अलग हो गये और सभी के साथ, नाक के उस स्थान पर कोड को ढूंढने लगे।

कुछ देर तक उस स्थान पर कोड ढूंढने के बाद, तौफीक को दोनों नाक के बीच की दीवार (सेप्टम) पर कुछ नंबर्स लिखे दिखाई दिये, जो कि काफी धुंधले होने की वजह से सही से नजर नहीं आ रहे थे।

तौफीक ने हाथ से उस जगह को साफ किया, अब वह अंक साफ दिखाई देने लगे थे।

“शैफाली, जरा यहां आकर देखो, मुझे कुछ नंबर मिले हैं यहां पर?" तौफीक ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा।

तौफीक की बात सुन सभी भागकर तौफीक के पास पहुंच गये। अब उनकी सबकी नजरें सेप्टम पर लिखे उन अंकों पर थी।

वहां 4 लाइनों में कुल 32 अंक लिखे थे

0100 1110

0100 1111

0101 0011

0100 0101

“यह अंक तो सिर्फ 0 और 1 हैं और वह भी 32 फिर भला ये कोड कैसे हो सकते हैं?” सुयश ने कहा- “हमें तो 7 अंकों की जरूरत है डिब्बे के लिये।"

"कैप्टेन अंकल, यह बाइनरी कोड हैं, मैं इसे सॉल्व कर सकती हूं।" शैफाली ने कहा।

“ये बाइनरी कोड क्या होते हैं?" जेनिथ ने पूछा।

“कंम्प्यूटर की भाषा को बाइनरी नंबर्स कहते हैं, बाइनरी का मतलब होता है- 2 नंबर्स से मिलकर बनाई गई संख्या। जैसे हम जो गणित पढ़ते हैं, उसे डेसिमल नंबर्स (यानि की 10 अंकों की भाषा) कहते हैं। हम जब अपने कंम्प्यूटर पर कोई बटन दबाते हैं, तो कंम्प्यूटर अपने अंदर इन्हीं 2 नंबर्स से सारी कैलकुलेशन करता है।" यह कहकर शैफाली उन 4 लाइनों को डीकोड करने लगी।

कुछ देर तक ऐसे ही कुछ करते रहने के बाद उसने 4 अंग्रेजी के अक्षर, उन 4 लाइनों से निकाल लिये।

“कैप्टेन अंकल, पहली लाइन का मतलब N था, दूसरी लाइन का मतलब O था, तीसरी लाइन का S और चौथी का E था। इस प्रकार इन 4 लाइनों से मिलकर जो शब्द बना, वह NOSE है।” शैफाली ने कहा।

“पर NOSE तो अंग्रेजी शब्द है, इसमें 7 डिजिट का कोड कहां है?” क्रिस्टी ने शैफाली से पूछा।

“अगर हम अंग्रेजी की पूरी वर्णमाला को गणित के अंकों में बदल दें तो N=14, O=15, S=19 और E-5, यानि कि अब हमारे सामने जो गणित के अंक हैं, वह हैं1415195 और यह 7 अंक ही हैं। इसका साफ मतलब है कि डिब्बे का पासवर्ड यही अंक होंगे?” शैफाली ने कुछ ही पलों में इतनी मुश्किल पहेली को हल कर दिया।

इसे देख सभी शैफाली के दिमाग का लोहा मान गये।

शैफाली ने अब इन अंकों को डिब्बे के लॉक पर लगा दिया। पासवर्ड लगाते ही डिब्बे का लॉक खुल गया। डिब्बे में शटर का लीवर रखा था।

तौफीक ने उस लीवर को डिब्बे से निकाल, शटर के किनारे पर फंसा दिया और फिर धीरे-धीरे उस लीवर को घुमाकर शटर खोलने लगा।

कुछ ही देर में पूरा शटर खुल गया, पर शटर के खुलते ही एक तेज बदबू ने अंदर की ओर प्रवेश किया, पर उस बदबू को ऐलेक्स के सिवा कोई दूसरा सूंघ नहीं पाया।

“कैप्टेन इस हवा में तो बहुत बदबू भरी है, लगता है यह कृत्रिम मानव किसी कूड़ा घर में बैठा है?” ऐलेक्स ने अपनी नाक बंद करते हुए कहा।

“पर हमें तो कोई दुर्गंध नहीं आ रही ऐलेक्स?" सुयश ने अपनी नाक पर जोर देते हुए कहा।

पर इससे पहले कि कोई और किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाता कि तभी नाक के छेद से हवा में तैरते, कुछ विशाल जीव भी अंदर आने लगे।

"सब अंदर की ओर भागो, नहीं तो यह विशाल जीव हमें खत्म कर देंगे।” सुयश ने चीखकर कहा- “हम इन्हें मार नहीं सकते।"

"रुक जाओ।” तभी शैफाली की आवाज सभी को सुनाई दी- “सब लोग कसकर कोई ना कोई चीज पकड़ लें, मैं इन जीवों को अभी बाहर निकालती हूं।" यह कहकर शैफाली ने नाक की दीवारों पर, अपने हाथ फिराकर धीरे-धीरे गुदगुदी करनी शुरु कर दी।

शैफाली के ऐसा करते ही, कृत्रिम मानव को बहुत तेज छींक आ गई और उसके फेफड़े से 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा बाहर निकली।

इस तेज हवा ने सभी जीवों को उड़ाकर नाक के बाहर निकाल दिया।

“वाह, क्या दिमाग लगाया है शैफाली ने?" जेनिथ ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा।

“वह सभी वायरस थे, जो नाक में बदबू के साथ प्रवेश कर रहे थे।" शैफाली ने कहा।

अब सभी शैफाली का इशारा पाकर अंदर की ओर चल पड़े। वह सभी नाक के अंदरी भाग में पहुंच गये थे।

यह एक विशाल कमरा था, जहां छत की ओर ऊपर एक टूथब्रश के आकार का झाड़ी नुमा पेड़ दिखाई दिया, जिसकी लताएं कमरे में कुछ ऊंचाई पर हवा में झूल रहीं थीं। वह लताएं, एक-दो नहीं बल्कि लाखों की संख्या में थीं।

“ऊपर मौजूद पेड़‘ओला फैक्ट्री बल्ब' है और नीचे लटक रही पेड़ की लताएं‘ओला फैक्ट्री नर्वस्' हैं, जब नाक में कोई भी गंध आती है, तो वह ओला फैक्ट्री नर्वस् के द्वारा सेंस करके, ओला फैक्ट्री बल्ब तक जाती हैं। ओला फैक्ट्री बल्ब इस गंध को इलेक्ट्रानिक सिग्नल के द्वारा, मस्तिष्क तक भेज देता है और मस्तिष्क उन इलेक्ट्रानिक सिग्नल को पहचान कर, हमें बता देते हैं कि वह गंध, किस चीज की है? इन्ही करोड़ों नर्वस के कारण, एक इंसानी शरीर 10,000 से भी ज्यादा गंध की पहचान कर सकता है।” शैफाली ने अपने ज्ञान का परिचय देते हुए कहा।

"हमारा शरीर कितना जटिल है, पता नहीं ईश्वर ने इसे किस प्रकार बनाया होगा?” क्रिस्टी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

“ईश्वर ने हमारे शरीर को इस प्रकार बनाया है कि हमारे शरीर के सभी अंग, स्वयं का कार्य समझकर अपने आप में स्वयं बदलाव कर सकते हैं।" शैफाली ने कहा" इस प्रकार ये शरीर एक बार में नहीं बना, बल्कि करोड़ों बार स्वयं से परिवर्तित होकर इस आकार में आया है।

तभी सुयश ने भटक चुके यात्रियों को वापस गंतव्य की ओर लाते हुए कहा- “क्या अब हम वापस अपने कार्य के बारे में सोच सकते हैं।"

सुयश की बात सुन ऐलेक्स बोल उठा- “शैफाली ये बताओ कि जब नाक के अंदर हवा आयी, तो मुझे तो बदबू साफ महसूस हुई, पर तुममें से किसी को भी वो गंध महसूस नहीं हुई? ऐसा क्यों?"

“आपकी वशीन्द्रिय शक्ति की वजह से आप पर यहां के वातावरण का कोई असर नहीं हो रहा है।" शैफाली ने कहा- “आपने देखा नहीं कि नाक बंद होने के बाद भी आपको साँस लेने में किसी भी प्रकार से कोई परेशानी नहीं हो रही थी। लेकिन हमको बदबू का ना सूंघा पाना, ये बताता है कि इस कृत्रिम मानव की ओला फैक्ट्री में कोई परेशानी है, जिससे यह इलेक्ट्रानिक सिग्नल को मस्तिष्क तक नहीं भेज पा रहा है।

मुझे लगता है कि यही हमारा अगला कार्य भी है ओला फैक्ट्री बल्ब को सही करने का।....और इस कार्य को पूरा करने के लिये, हमें किसी प्रकार से ऊपर मौजूद उस पेड़ तक पहुंचना होगा।"

“पर कैसे?" क्रिस्टी ने कहा- “वह पेड़ की लताएं तो हमसे काफी ऊंचाई पर हैं, हम वहां तक पहुंचेगे कैसे?"

“पहुंच सकते हैं।” शैफाली ने कहा- “ऊपर की ओर देखो, छत के पास कुछ गोले हवा में तैर रहे हैं। यह गोले अवश्य ही हवा में मौजूद नन्हें कण हैं, जो नाक का द्वार खुलने पर अंदर घुसे थे। तो बस हमें फिर से इस कृत्रिम मानव के साँस अंदर खींचने का इंतजार करना होगा। जैसे ही हवा अंदर आयेगी, हवा के दबाव से यह कण नीचे की ओर आ जायेंगे, जो कि कुछ देर बाद फिर से ऊपर की ओर चले जायेंगे। हमें इन्हीं कणों के ऊपर बैठकर पेड़ की लताओं तक पहुंचना होगा।"

शैफाली के शब्द सुनकर सभी कृत्रिम मानव के साँस लेने का इंतजार करने लगे।

सभी ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़ा, कुछ ही देर में कृत्रिम मानव ने साँस लेना शुरु कर दिया और इसी के साथ हवा में मौजूद कण हवा के दबाव से नीचे की ओर आने लगे।

कणों को नीचे आता देख सभी एक-एक कर, अलग-अलग कणों पर बैठ गये। बाहर से आयी हवा गले के पृष्ठ भाग से होती हुई फेफड़ों की ओर चली गई।

जैसे ही उस स्थान पर हवा का दबाव थोड़ा कम हुआ, वह कण सभी को लेकर ऊपर की ओर जाने लगे।

लताओं तक पहुंचते ही सभी ने एक-एक कर लताओं को पकड़ लिया और उस पर चढ़कर पेड़ के ऊपर की ओर आ गये।

पेड़ के ऊपर की ओर बहुत से तीर, हवा में ऐसे लटक रहे थे, जैसे कि वह तीर ना होकर इस पेड़ के फल हों।

उस ब्रशनुमा पेड़ के ऊपर आगे बढ़ने पर, सभी को एक स्थान पर, एक रबरबैंड के समान कोई छल्ला पेड़ के ऊपर, कसकर चिपका दिखाई दिया।

“यह छल्ला ही है असली परेशानी।” शैफाली ने छल्ले को देखते हुए कहा- “यह इतनी कसकर ओला फैक्ट्री बल्ब को जकड़े है कि इससे सिग्नल निकल ही नहीं सकते। हमें किसी भी प्रकार से इस छल्ले को यहां से हटाना होगा?"

शैफाली की बात सुन तौफीक अपनी जेब से चाकू निकालकर, उस रबरबैंड के छल्ले को काटने की कोशिश करने लगा।

पर 5 मिनट की कोशिश के बाद ही तौफीक समझ गया कि यह छल्ला इस चाकू से नहीं कटने वाला।

अब तौफीक उठकर शैफाली की ओर देखने लगा। पर शैफाली इस समय गहन सोच में पड़ी थी।

“कैप्टेन अंकल, हमारे पास इस रबरबैंड को काटने का हथियार नहीं है और बिना इसको हटाए इलेक्ट्रानिक सिग्नल आगे भी नहीं जायेंगे, पर अगर हम सब मिलकर अपनी पूरी ताकत लगाएं, तो इस रबरबैंड के छल्ले को थोड़ा आगे की ओर खींच सकते हैं। ऐसी स्थिति में चाहे कुछ देर के लिये ही सही, पर ओला फैक्ट्री बल्ब अपने सिग्नल आगे भेजने में सफल हो जायेगा। हो सकता है कि उसके सिग्नल भेजते ही इस द्वार का कार्य समाप्त हो जाये? हां पर हमें एक चीज का ध्यान अवश्य रखना है कि ओला फैक्ट्री बल्ब के सिग्नल कहीं उस पर लटके तीर ना हों। अगर ऐसा हुआ, तो वह बहुत तेजी से हमारी ओर आयेंगे, इसलिये हमको उन तीरों से पहले से ही सावधान रहना होगा।“

सभी ने सहमति से सिर हिलाया और घूमकर इस प्रकार खड़े हो गये, जिससे उन्हें पेड़ पर लटके तीर साफ दिखाई दे रहे थे।

अब सभी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर एक साथ, उस रबरबैंड को अपनी ओर खींचना शुरु कर दिया।

उन सभी के सम्मिलित प्रयासों से रबर का छल्ला थोड़ा सा खिंचकर उनकी ओर आ गया।

इसी के साथ ही उस पेड़ पर लटका एक तीर तेजी से उनकी ओर लपका, परंतु शैफाली के द्वारा पहले से ही सावधान किये जाने की वजह से, किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ।

पर उस तीर का निशाना वह लोग नहीं बल्कि वह रबर का छल्ला था। तीर तेजी से आकर रबर के छल्ले से टकराया और उसे काटता हुआ, दूसरी ओर चला गया। यह देख सभी खुशी से भर उठे।

“शैफाली ने सही कहा था कि शरीर अपना उपचार स्वयं से करना जानता है।” सुयश ने कहा।

तभी पेड़ पर लटके अन्य कई तीर हवा में होते हुए एक दिशा की ओर चले गए।

“ओला फैक्ट्री बल्ब से इलेक्ट्रानिक सिग्नल जाने लगे हैं, पर फिर भी यह द्वार पार नहीं हुआ, इसका मतलब हमें स्वयं भी उन सिग्नल के सहारे आगे तक जाना होगा।" शैफाली ने कहा।

अब तीरों का छूटना बंद हो गया था और पेड़ पर नये तीर उग आये थे।

"हम सभी को एक-एक तीर पकड़कर उससे लटकना होगा।” शैफाली ने कहा- “जैसे ही ओला फैक्ट्री बल्ब दोबारा से सिग्नल भेजेगा, हम उस तीर को पकड़कर आगे की ओर चले जायेंगे।"

शैफाली की बात सुन, सभी एक-एक तीर पकड़कर लटक गए। उन्हें सिग्नल के लिये ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा, कुछ देर बाद ही सभी तीर से लटके हुए आगे की ओर जा रहे थे।

आगे एक स्थान पर उन्हें एक विशाल दीवार दिखाई दी, जिसमें असंख्य सुराख नजर आ रहे थे।

सभी तीर उस सुराख से ही अंदर जा रहे थे। उस सुराख के आगे जमीन पर एक बड़ा सा प्लेटफार्म बना था।

"हमें आगे आने वाले उस प्लेटफार्म पर ही कूदना होगा।” सुयश ने सभी से चिल्लाकर कहा- “अगर हम दीवार से टकराए, तो हमें गंभीर चोट आ सकती है।"

अब सभी उस प्लेटफार्म के पास पहुंचकर एक-एक कर उस पर कूद गये।

उस प्लेटफार्म के दूसरी ओर एक द्वार था, जिस पर लिखा था- “तिलिस्मा द्वार संख्या 5.3"

सभी समझ गये कि यह द्वार पार हो चुका है। अतः सभी धीरे-धीरे उस द्वार के पार निकल गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#194.

जलशक्ति: (19.01.2002, शनिवार, राक्षसताल, हिमालय)

व्योम और त्रिकाली, कलाट से आज्ञा ले, हिमालय आ गये थे। कलाट ने पहले से ही अपने गुरु भाई नीमा को व्योम और त्रिकाली के आने की सूचना दे दी थी।

नीमा ने व्योम और त्रिकाली को कुछ लोगों के साथ, राक्षसताल के पास भेज दिया था। वह लोग व्योम और त्रिकाली को राक्षसताल के पास छोड़ कर चले गये।

उन सभी के जाने के बाद व्योम और त्रिकाली ने अपना -अपना घोड़ा, राक्षसताल के पास ही एक पेड़ से बांध दिया।

"पत्नी जी, क्या ख्याल है अब आपका? राक्षसलोक चलने की तैयारी करें?" व्योम ने त्रिकाली की आँखों में आँखें डालते हुए कहा।

“अगर आप ऐसे हमें पुकारेंगे, तो फिर कुछ देर और रुकने की इच्छा जागृत हो जायेगी?” त्रिकाली ने व्योम के सुर से सुर मिलाते हुए कहा।

“एक बार विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से तुम्हारे माता पिता को छुड़ा लें, फिर जिंदगी भर तुम्हें पुकारते रहेंगे ऐसे ही।" व्योम ने त्रिकाली को यहां आने का कारण याद दिलाते हुए कहा।

“वैसे तुम्हें क्या लगता है व्योम? क्या हम अपने माता-पिता को छुड़ा पायेंगे?” त्रिकाली ने शक जाहिर करते हुए कहा- “क्यों कि विद्युम्ना के पास छल शक्ति है और छल शक्ति को जाने बिना, उससे जीतना बहुत मुश्किल होगा?”

“छल शक्ति तो तुम्हारे पास भी है।” व्योम ने त्रिकाली से मजा लेते हुए कहा- “देखो ना कैसे तुमने छल शक्ति का प्रयोग करके मुझसे शादी कर ली थी? अब जब तुम्हारी छल शक्ति को जीत लिया, तो विद्युम्ना की छल शक्ति से भी जीत ही जायेंगे।

“क्या बोला तुमने?” त्रिकाली ने व्योम को आँखें दिखाते हुए कहा- “छल से विवाह किया। हां किया छल से विवाह बताओ क्या कर लोगे? और वैसे भी मुझे देखकर तुम्हारी भी लार टपक रही थी। जब तुम रक्षा कवच मेरे गले में बांध रहे थे, तो मैंने भी तुम्हारे कांपते हाथों को महसूस कर लिया था। अब ये बात अलग है कि मैंने पहले बाजी मार ली।“

त्रिकाली की बात सुन एक पल के लिये व्योम की आँखों के सामने, जंगल वाला दृश्य उभर आया। उसे महसूस हो गया कि त्रिकाली कह तो सही ही रही है।

“अच्छा पत्नी जी, मेरी गलती मैं अपने शब्द....वापस लेता हूं। अब खुश।” व्योम ने हथियार डालते हुए कहा।

"हम्मममम अब सही किया तुमने। बस ऐसे ही व्यवहार करते रहना मेरे साथ। आखिर मैं एक राजकुमारी हूं।” त्रिकाली ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा राजकुमारी जी, अब राक्षसलोक चलें,...जरा विद्युम्ना से भी मिल लिया जाये।” व्योम ने कहा।

लेकिन इससे पहले कि दोनों राक्षसताल में उतर पाते, वातावरण में एक तेज आवाज सुनाई दी।

“विद्युम्ना से मिलने के लिये कहीं जाने की जरुरत नहीं है, वह सर्वत्र व्याप्त है" यह आवाज सुन व्योम और त्रिकाली हंसी-मजाक भूलकर एकदम सचेत नजर आने लगे।

“सर्वत्र व्याप्त है, तो दिखाई क्यों नहीं देती।" व्योम ने तेज आवाज में कहा।

“चिंता मत करो बालक, मैं तुम्हें दिखाई भी दूंगी और सुनाई भी दूंगी। पहले जरा तुम्हारे यहां आने का औचित्य तो जान लें।” विद्युम्ना ने कहा।

“तुमने मेरे माता-पिता को पिछले 14 वर्षों से कैद करके रखा है, हम उन्हें छुड़ाने के लिये यहां आये हैं। व्योम ने कहा- “अब या तो उन्हें छोड़कर युद्ध को टाल दो? या फिर युद्ध के लिये तैयार हो जाओ?

त्रिकाली, व्योम के मुंह से ‘अपने माता-पिता' शब्द सुनकर खुश हो गई।

“मेरे पास तो बहुत से लोग कैद हैं, तुम अपने माता पिता का नाम बताओ बालक।"

विद्युम्ना, व्योम को बालक कह कर संबोधित कर रही थी, पर व्योम ने इस बात का बुरा नहीं माना। उसे पता था कि विद्युम्ना की आयु हजारों वर्ष की है।

"मेरा नाम व्योम और मेरी पत्निका नाम त्रिकाली है, हमारे माता-पिता का नाम त्रिशाल और कलिका है। उन्हें 14 वर्ष पहले तुमने छल से हराया था।” व्योम ने कहा।

“त्रिशाल और कलिका हां याद आया। उनके पास तो देवशक्ति थी। पर तुम लोग तो खाली हाथ आये हो। ऐसे में मुझे कैसे हराओगे?” विद्युम्ना ने कहा।

व्योम तुरंत विद्युम्ना के जाल को समझ गया। वह जान गया कि बात करके विद्युम्ना उनकी शक्तियों का पता लगाना चाहती है, इसलिये व्योम ने भी विद्युम्ना को उसी के अंदाज में उत्तर दिया।

"माना कि हमारे पास कोई भी देवशक्ति नहीं है। लेकिन हमारे पास विश्वास की शक्ति है, जो तुम पर अवश्य ही भारी पड़ेगी।"

“हाSSS...हाऽऽ...हाऽऽऽऽऽ... विश्वास की शक्ति तुम तो बहुत मनोरंजक हो व्योम....तुम्हारे साथ खेलने में तो बहुत मजा आयेगा।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम मुझे मूर्ख समझते हो कि तुम कुछ भी कहोगे और मैं मान लूंगी मैं मान नहीं लूंगी, बल्कि तुम्हारी जान लूंगी।

व्योम समझ गया कि विद्युम्ना बहुत चालाक है इसलिये वह और भी ज्यादा सतर्क नजर आने लगा।

“देखो व्योम, मुझे भविष्य में त्रिशाल और कलिका की जरुरत है, इसी लिये मैंने उन्हें बंदी बना कर रखा है। अब अगर तुम उन्हें ले जाना चाहते हो, तो तुम्हें मुझसे युद्ध करना होगा। क्या तुम युद्ध के लिये तैयार हो?” विद्युम्ना ने कहा।

“मैंने सुना है कि राक्षस बहुत ही नियमों के अंतगर्त युद्ध करते हैं। तो क्या आप युद्ध से पहले किसी प्रकार के नियम को बताना चाहेंगी?" व्योम ने अपना पाशा फेंका।

व्योम के शब्द सुन विद्युम्ना खुश हो गई। “तुमने बिल्कुल सही सुना है। राक्षस हमेशा से नियमों को मानने वाले रहे हैं, बस देवता ही छल से उन्हें मार देते हैं। इसलिये बताओ व्योम की तुम किस प्रकार के नियम बनाना चाहते हो?” विद्युम्ना ने कहा।

“मैं चाहता हूं कि हम दोनों का युद्ध कुछ चरणों में हो....वह कितने चरण में होगा, यह आप बतायेंगी?" व्योम ने कहा।

“ठीक है व्योम, हमारा युद्ध 3 चरणों में होगा। जो भी इन 3 चरणों में हार गया? उसे अपनी पराजय स्वीकार कर, प्रतिद्वंन्दी की बात माननी होगी। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है?” विद्युम्ना ने युद्ध के नियम बनाते हुए कहा।

“हां, मुझे यह नियम मंजूर हैं, परंतु शुरु के 2 चरणों में मेरी पत्नी इस युद्ध का हिस्सा नहीं रहेगी।” व्योम ने अपना दिमाग लगाते हुए कहा। यह सुन विद्युम्ना सोच में पड़ गई।

"इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है?" व्योम, विद्युम्ना को सोचने का मौका नहीं देना चाहता था, इसलिये तुरंत ही बोल उठा- “आप के पास तो बहुत सी दिव्य शक्तियां होंगी, हो सकता है कि उन शक्तियों के माध्यम से आप मुझे पहले ही चरण में पराजित कर दें।"

“ठीक है, मुझे तुम्हारी ये शर्त स्वीकार है।” विद्युम्ना ने कहा।

उधर त्रिकाली, व्योम की बात सुनकर समझ गई कि व्योम अभी विद्युम्ना को, त्रिकाली की शक्तियां नहीं दिखाना चाहता, जिससे विद्युम्ना पहले ही कहीं उसकी काट ना कर ले? इसलिये व्योम के इस निर्णय से त्रिकाली को कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

व्योम ने सबसे पहले त्रिकाली को दूर एक चट्टान के पास भेज दिया और फिर विद्युम्ना से बोला- “ठीक है, तो तुम स्त्री हो इसलिये पहला प्रहार तुम ही करो।"

अब व्योम के सामने 500 फुट की विद्युम्ना नजर आने लगी, उसका सिर आसमान को छू रहा था।

विद्युम्ना ने अपना यह रुप व्योम को डराने के लिये रखा था, पर विद्युम्ना का इससे मिलता-जुलता रुप व्योम पहले से ही महवृक्ष में देख चुका था, इसलिये उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ?

"तो फिर लो व्योम, मेरे पहले वार ‘जलकंटिका' से बचो, यह तुम्हारे शरीर का सारा जल समाप्त कर देगा और तुम बिना पानी के यहीं तड़प कर मर जाओगे।" यह कहकर विद्युम्ना ने अपने त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया।

विद्युम्ना के ऐसा करते ही त्रिसर्पमुखी दंड से एक चमकीली रोशनी निकली और इसी के साथ व्योम को अपना पूरा शरीर सूखता हुआ सा महसूस हुआ।

विद्युम्ना की इस पहली शक्ति की काट ही व्योम के पास नहीं थी।

धीरे-धीरे व्योम के शरीर से पानी खत्म होता जा रहा था, तभी व्योम को अपने मन में एक स्त्री की आवाज सुनाई दी-“तुम मेरा आहवान करो पुत्र, मैं तुम्हें इस संकट से बचा सकती हूं।" व्योम अपने मन में आ रही इस आवाज को सुनकर आश्चर्य में पड़ गया।

“पर आप कौन हो? और मेरे मन में कैसे बोल रही हो?" व्योम ने अपने मन में सोचते हुए पूछा।

“मैं देवी गंगा हूं पुत्र, जिस दिन तुम पंचशूल को उठाकर मृत्यु को प्राप्त हो गये थे, उस दिन मेरी पहली बूंद ने ही तुम्हें नवजीवन प्रदान किया था। मेरी ही बूंद की गुरुत्व शक्ति से तुम गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होते हो। मेरी वह पहली बूंद अभी भी तुम्हारे शरीर में है, उससे तुम अपनी शरीर की ही कमी नहीं, वरन पूरी पृथ्वी की प्यास बुझा सकते हो। इसलिये देर ना करो पुत्र और मेरा आहवान करो।" पतित पावनी देवी ने कहा।

गंगा की बात सुन व्योम का भ्रम दूर हो गया, वह अभी तक अपनी गुरुत्वशक्ति को, पंचशूल की ही शक्ति समझ रहा था।

अब व्योम ने मन ही मन देवी गंगा का स्मरण किया “हे माँ गंगा, मेरे शरीर की जल की पूर्ति को पूर्ण करो।"

व्योम के इतना बोलते ही, व्योम को अपने मुंह के अंदर एक मीठी सी बूंद का अहसास हुआ और उस बूंद ने पलक झपकते ही व्योम के शरीर में हुई पानी की कमी को पूर्ण कर दिया।

अब व्योम विद्युम्ना के सामने खड़ा होकर मुस्कुरा रहा था।

विद्युम्ना काफी देर तक व्योम के जमीन पर गिरने का इंतजार करती रही, पर जब 10 मिनट के बाद भी व्योम खड़ा मुस्कुराता दिखाई दिया, तो विद्युम्ना की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं।

"लगता है कि आपका, यह सर्पदंड ठीक से काम नहीं कर रहा? आप इसे बेचकर, अपने बुढ़ापे के लिये एक लाठी खरीद लो।” व्योम ने विद्युम्ना का मजाक उड़ाते हुए कहा।

“तुमने किस शक्ति का प्रयोग किया व्योम, जो जलकंटिका से बच गये?” विद्युम्ना ने अपना दिमाग लगाते हुए व्योम से पूछा, पर महावृक्ष ने पहले ही व्योम को ज्ञान दे दिया था। इसलिये व्योम ने गोल-मोल जवाब दिया।

"मेरे पास ‘जलगटका' शक्ति है, जिससे मैं अपने शरीर में जल गटक सकता हूं।” व्योम ने बिल्कुल गंभीरता से जवाब दिया।

विद्युम्ना, व्योम के जवाब को समझ नहीं पाई। वैसे यह शक्ति तो त्रिकाली के लिये भी नई थी। वह भी आश्चर्य से व्योम को देख रही थी, पर वह मन ही मन बहुत खुश थी।

“अब आप कोई दूसरी शक्ति का प्रयोग कर सकती हो?" व्योम ने विद्युम्ना से कहा।

यह सुन विद्युम्ना ने जोर से गर्जना की- “जल में वास करने वाले शेषनाग प्रकट हो।"

विद्युम्ना के इतना बोलते ही राक्षसताल के बगल में स्थित, मानसरोवर झील से महाविशाल शेषनाग निकला।

शेषनाग को देख त्रिकाली बहुत ज्यादा डर गई। पर वह ऐसी हालत में भी कुछ कर नहीं सकती थी, इसलिये चुपचाप व्योम को देखती रही।

"मुझे कैसे याद किया विद्युम्ना? बताओ मुझे क्या करना है?" शेषनाग ने अपने सातों फन को हवा में लहराते हुए कहा।

“जरा इस व्योम नाम के मनुष्य को अपनी शक्तियों से परिचित कराइये शेषनाग।” विद्युम्ना ने कहा।

विद्युम्ना की बात सुन शेषनाग ने अपनी जहर भरी फुकार व्योम के ऊपर मार दी। किसी को पता नहीं था कि व्योम अपनी साँस को 25 मिनट तक रोक सकने में सक्षम था।

व्योम ने शेषनाग की फुंकार से बचने के लिये अपनी साँस रोक ली। अब शेषनाग की फुंकार ने व्योम के शरीर को जलाना शुरु कर दिया, पर सूर्य की शक्ति ने तेजी से व्योम के शरीर को सही करना शुरु कर दिया।

जब 5 मिनट तक भी व्योम पर शेषनाग की फुंकार को कोई असर नहीं हुआ, तो शेषनाग के सामने एक दिव्यास्त्र नजर आने लगा।

अब व्योम को खतरा महसूस होने लगा, इसलिये उसने पंचशूल को याद कर लिया।

आसमान में एक बिजली सी कड़की और व्योम के हाथ में पंचशूल नजर आने लगा।

व्योम के हाथ में पंचशूल देख विद्युम्ना की साँस रुक गई। “महाशक्ति !!!!” विद्युम्ना मन ही मन बुदबुदाई।

उस पंचशूल को देख शेषनाग भी पंचशूल को हाथ जोड़, वापस मानसरोवर में समा गया।

“तुमने मुझसे झूठ कहा था कि तुम मानव हो...पंचशूल को सूर्यपुत्र के सिवा कोई भी नहीं उठा सकता?” विद्युम्ना ने गुस्से भरी नजरों से व्योम को देखते हुए कहा।

“मैं मनुष्य ही हूं। मैं कोई देवपुत्र नहीं हूं? आपको अवश्य ही भ्रम हुआ है।” व्योम ने कहा- “लगता है कि पंचशूल को देखने के बाद अब आप हार मानने ही वाली हो?"

"कभी नहीं।...इस त्रिसर्पमुखी दंड के मेरे पास रहते मुझे कोई भी नहीं हरा सकता।” विद्युम्ना ने गुस्से में कहा- “जल के देवता, देवराज इंद्र प्रकट हो और इस मनुष्य को अपनी देव शक्तियों की अनुभूति कराओ।"

विद्युम्ना एक के बाद एक देवताओं को बुलाये ही चली जा रही थी। अब विद्युम्ना की पुकार सुन आसमान में इंद्र का चेहरा दिखाई देने लगा।

इंद्र ने क्रोध से आसमान की ओर देखा। इंद्र के ऐसा करते ही आसमान में घनघोर बादल दिखाई देने लगे और मूसलाधार बारिश शुरु हो गई।

कुछ ही देर में आसपास का पूरा क्षेत्र जलमग्न होने लगा, यह देख व्योम ने अपने हाथ में पकड़े पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचाना शुरु कर दिया।

पंचशूल के नाचने की गति इतनी ज्यादा थी कि उससे तेज हवा चलने लगी। कुछ ही देर में वह हवाएं इतनी तेज हो गईं कि उसके प्रवाह में सारे बादल उड़कर दूर चले गये।

अब व्योम ने अपने आसपास नजर डाली। कुछ ही देर में व्योम के आसपास बहुत सारा पानी भर गया था।

यह देख व्योम ने अपने पंचशूल को बर्फ पर पटका। व्योम के पंचशूल पटकते ही, बर्फ में एक बड़ी सी दरार उत्पन्न हो गई, उस दरार से होकर सारा पानी भूमि में समा गया।

यह देख इंद्र का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब इंद्र के हाथ में उनका सबसे प्रिय अस्त्र वज्र दिखाई देने लगा।

वज्र से निकली बिजली, तेज रोशनी और ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे।

इंद्र ने एक बार घूरकर व्योम को देखा और इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, इंद्र ने अपना वज्र व्योम पर फेंक कर मार दिया।

यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, वह जानती थी कि इंद्र के वज्र की काट पृथ्वी पर नहीं है।

इंद्र का वज्र तेज रोशनी बिखेरता व्योम की ओर लपका, लेकिन तभी अचानक सूर्य से तीव्र किरणें निकलीं और उन किरणों ने व्योम के आगे, ढाल नुमा एक सुनहरा रक्षा कवच बना दिया। इंद्र का वज्र तेजी से आकर उस सुरक्षा कवच से टकराया और उसमें विलीन हो गया।

यह देख इंद्र ने सूर्य की ओर देखा, जैसे कि वह पूछना चाह रहे हों कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?

“पुत्र व्योम, मैं सूर्यदेव बोल रहा हूं, मैंने एक असुर के अंत के लिये ये पंचशूल महादेव से प्राप्त किया था। चूंकि अब यह तुम्हारे पास है, इसलिये तुम्हारी रक्षा मेरे लिये सर्वोपरि है।” व्योम के मन में इस बार सूर्यदेव की आवाज सुनाई दी।

उधर आसमान में देवराज इंद्र भी अब गायब हो गये थे। व्योम, एक के बाद एक तरह से विद्युम्ना को चकित किये जा रहा था और त्रिकाली को आश्चर्यचकित।

त्रिकाली को नहीं पता था कि व्योम के पास कितनी शक्तियां हैं? पर अब त्रिकाली को अपने माता-पिता को छुड़ाने का अहसास हो चला था।

“क्या आपके पास कोई और शक्ति है विद्युम्ना, या अब आप अपनी पराजय स्वीकार करती हो?" व्योम ने मुस्कुराते हुए कहा।

“लगता है तुम्हें अपनी शक्तियों पर कुछ ज्यादा ही घमंड हो चला है व्योम? इसीलिये तुम इस प्रकार की बातें कर रहे हो।” विद्युम्ना ने आशा के विपरीत मुस्कुराकर कहा- “लो अब मेरे जलचक्र से बचो। यह जलचक्र तुम्हारी सारी स्मृतियों को विलोप कर देगा। मुझे देखना है कि यदि तुम्हें अपनी शक्तियां याद ही ना आयें, तो तुम क्या करते हो?"

यह कहकर विद्युम्ना ने फिर अपने त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया, इस बार उस दंड के एक सर्पमुख से, पानी का चक्र निकला, जो कि हवा में तेजी से नाच रहा था।

वह जलचक्र अब व्योम के सिर के पास पहुंच कर, उसके सिर के चारो ओर तेजी से घूमने लगा।

"हे ईश्वर, व्योम की मदद करना।” इस शक्ति को देख त्रिकाली थोड़ा घबरा गई- “क्यों कि अगर व्योम सच में अपनी स्मृतियां खो बैठा, फिर तो वह मुझे भी भूल जायेगा।"

जलचक्र से जल की कुछ बूंदें निकलकर व्योम के सिर पर भी गिर रहीं थीं। कुछ देर बाद जलचक्र अपने स्थान से गायब हो गया।

अब व्योम अपने आसपास अजीब सी नजरों से घूर रहा था। यह देख त्रिकाली की साँसे रुकने सी लगीं।

“मैं कौन हूं? और मैं यहां क्या कर रहा हूं?” व्योम ने विद्युम्ना को देखते हुए कहा। व्योम की यह बात सुन विद्युम्ना के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

अब विद्युम्ना अपने शरीर के आकार को छोटा कर, सामान्य आकार में आ गई।

“तुम्हारा नाम कराल है, तुम राक्षस कुल में जन्मे हो और मैं तुम्हारी महारानी हूं।” विद्युम्ना ने व्योम को झूठ बोलते हुए कहा।

"तो मेरे लिये क्या आदेश है महारानी?” व्योम ने कहा।

“तुम अब यह पंचशूल नागलोक में रखकर, पाताल में जाकर सदा के लिये सो जाओ।” विद्युम्ना ने कहा।

“पर मैं तो सिर्फ अपनी पत्नि की बात मानता हूं महारानी, तो यही बात आप उनसे मुझे कहला दीजिये।" व्योम ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा।

व्योम के शब्दों से त्रिकाली खुशी से झूम उठी, वह जान गई कि व्योम की स्मृतियां नहीं गई हैं।

उधर व्योम की बात सुन विद्युम्ना की आँखें सोचने वाले अंदाज में सिकुड़ गईं- “जलचक्र तुम्हारी स्मृति क्यों नहीं छीन पाया? ऐसा तो सिर्फ वहीं कर सकता है, जो इस जन्म में एक बार मरकर जीवित हुआ हो।"

“मैं तो अपनी पत्नी पर हर रोज मरता हूं, हो सकता है जलचक्र इसी बात को समझ गया हो।” व्योम ने मुस्कुराते हुए कहा।

“ठीक है व्योम,....अगर तुम रोज मरते हो, तो आज भी जरुर मरोगे ब्रह्मकलश का ब्रह्मजल तुम्हारी ये इच्छा जरुर पूरी करेगा।” यह कहकर विद्युम्ना ने एक बार फिर त्रिसर्पमुखी दंड को हवा में लहराया, इस बार उस त्रिसर्पमुखी दंड से जल की कुछ बूंदें निकलकर व्योम पर आकर गिरी और इसी के साथ व्योम को अपनी आत्मा अपने शरीर से निकलती हुई महसूस हुई।

व्योम समझ गया कि यह विद्युम्ना की सबसे शक्तिशाली जलशक्ति है, पर वह इस शक्ति के समक्ष कुछ नहीं कर पा रहा था।

कुछ ही देर में ब्रह्मजल ने व्योम के शरीर से उसकी आत्मा को खींचकर बाहर कर दिया।

यह देख विद्युम्ना अठ्ठास करने लगी- “हाऽऽऽ...हाऽऽऽऽ...हाऽऽऽऽ...अब तुम्हारी आत्मा को मैं सदा सदा के लिये राक्षसलोक का प्रहरी बना दूंगी, जो हर आने जाने वाले को मेरी शक्ति का अहसास कराता रहेगा व्योम।"

उधर व्योम की आत्मा, उसके शरीर से निकलते ही व्योम का शरीर लहराकर वहीं जमीन पर गिर गया।

तभी व्योम को अपनी आत्मा, वापस अपने शरीर में जाती हुई महसूस हुई।

जैसे व्योम के शरीर में उसकी आत्मा ने प्रवेश किया, उसे माँ गंगा की आवाज सुनाई दी- “मेरे अलावा मेरे पुत्र को मुक्ति देने का अधिकार किसी के पास नहीं है।.......उठो व्योम और इस विद्युम्ना को अपने पंचशूल की शक्ति से परिचित कराओ।”

माँ गंगा की आवाज सुन व्योम उठकर खड़ा हो गया। व्योम को फिर से खड़ा होते देख, पहली बार विद्युम्ना की आँखों में आश्चर्य के साथ-साथ, भय की भी हल्की सी झलक दिखाई दी।

पर....पर...त्रिकाली की आँखों से खुशी का सैलाब निकल उठा। उसे अब अपने व्योम पर गर्व महसूस हो रहा था, जो कि इस प्रकार खड़ा होकर देवशक्तियों को भी पराजित कर रहा था।

“बस अब बहुत हुआ विद्युम्ना अब अगर तुमने इस प्रथम चरण में अपनी पराजय स्वीकार नहीं की, तो मैं अपनी पंचशूल से, इस पूरे राक्षसताल का जल सदा सदा के लिये सुखा देता हूं।” यह कहकर व्योम ने एक गर्जना की और अपने पंचशूल को उठाकर, उसका मुंह राक्षसताल की ओर कर दिया।

लेकिन इससे पहले कि व्योम कुछ भी कर पाता, विद्युम्ना ने चीखकर उसे रोक दिया।

“रुक जाओ व्योम, चूंकि तुम्हारे पास असीमित देवशक्तियां हैं, इसलिये मैं इस प्रथम चरण में अपनी पराजय स्वीकार करती हूं। अब तुम इस राक्षसताल में प्रवेश कर सकते हो। पर यह ध्यान रखना व्योम, कि अभी इस युद्ध का सिर्फ प्रथम चरण पूर्ण हुआ है। हार-जीत का निर्णय अभी भी बाकी है तो फिर जल्द ही अगले चरण में मिलते हैं व्योम।" यह कहकर विद्युम्ना वहां से गायब हो गई।

व्योम को जीता देखकर, त्रिकाली चट्टान से उतरी और दौड़कर व्योम के गले से लग गई।

"इस युद्ध में तुमने तो कई बार मेरी जान ही सुखा दी थी व्योम...और.... और क्या कह रहे थे विद्युम्ना को कि मैं सिर्फ अपनी पत्नी की ही बात मानता हूं और और वो क्या था? हां...मैं रोज-रोज अपनी...पत्नी पर मरता हूं ...यह तुम इतने भारी -भारी संवाद कैसे कर लेते हो?"

“जैसे ही तुम्हारा चेहरा मेरे सामने आता है, मुझमें अभिनय करने की एक अद्भुत शक्ति आ जाती है।” व्योम ने त्रिकाली को चिढ़ाते हुए कहा।

“अच्छा तो तुम इतनी देर से अभिनय कर रहे थे।" "त्रिकाली ने प्यार से व्योम के कान पकड़ते हुए कहा “इसका मतलब तुम सच में मुझसे प्यार नहीं करते?...बस रोज अभिनय ही करते हो।"

कुछ इस प्रकार से व्योम और त्रिकाली की नोंक-झोंक शुरु हो गई थी और इस महायुद्ध के प्रथम चरण का अध्याय समाप्त हो चुका था।

या यूं कहें कि द्वितीय अध्याय का प्रारंभ होने वाल था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#195.

चैपटर-7

श्रवणेन्द्रिय: (तिलिस्मा 5.31)

सभी ने जैसे ही नाक के द्वार को पार किया, उन्होंने अपने आपको एक बड़े से पहाड़ के अंदर पाया, जो कि अंदर से खोखला था।

उस पहाड़ की दीवारों पर अजीब सी आड़ी-टेढ़ी रेखाएं बनी थीं। कुछ आगे उन्हें एक सुरंग जाती हुई दिखाई दे रही थी। सभी सुरंग में आगे की ओर चल दिये।

सुरंग में कुछ आगे जाने पर सभी को दीवारों पर बहुत से वाद्य यंत्र टंगे दिखाई दिये। उसे देख ऐलेक्स ने वहां टंगे गिटार के तार को खींचकर छोड़ दिया।

ऐलेक्स को लगा था कि गिटार की मधुर संगीत चारो ओर गूंज उठेगी, पर ऐलेक्स के इस हरकत के बाद भी किसी को कोई भी आवाज सुनाई नहीं दी?

यह देख शैफाली ने कुछ कहा। शैफाली के होंठ चलते तो सभी को दिखाई दिये, पर आवाज सिर्फ और सिर्फ ऐलेक्स को ही सुनाई दी- “मुझे लग रहा है कि कैश्वर ने यह द्वार मनुष्य के कान की संरचना के आधार पर बनाया है?"

जब शैफाली को स्वयं अपनी आवाज सुनाई नहीं दी, तो उसने घबराकर दोबारा बोलने की कोशिश की, पर इस बार भी वही हुआ, जो पहले हुआ था।

इस बार एक-एक कर सभी ने बोलने की कोशिश की, पर ऐलेक्स के सिवा सबके सुनने की शक्ति खत्म हो गई थी।

शैफाली ने इशारे से सबको समझाया कि “यह कान है और शायद इस कान की श्रवणशक्ति चली गई है, इसी वजह से हमें सुनाई नहीं दे रहा है।"

सब समझ गये कि यह द्वार बहुत मुश्किल होने वाला है क्यों कि जिस शैफाली को कान के बारे में सबकुछ पता था, उसे कोई दूसरा सुन नहीं सकता था।

अब सभी मुंह लटकाकर धीरे-धीरे और आगे बढ़ने लगे। गुफा जिस स्थान पर खत्म हो रही थी, वहां दीवार पर एक छेद दिखाई दे रहा था।

शैफाली ने उस छेद में अपना सिर डालकर आगे झांककर देखा। उस छेद के सामने 5 मीटर की दूरी पर दूसरी दीवार थी और उस दीवार में भी एक छेद था।

दोनों दीवार के बीच के हिस्से में एक छोटा सा तालाब दिखाई दे रहा था। तभी शैफाली की नजर अपने बांई ओर गई।

शैफाली को अपनी बांई ओर की दीवार में एक द्वार बना दिखाई दिया। शैफाली ने सबको वहीं रुकने का इशारा किया और स्वयं उस द्वार की ओर चल दी।

शैफाली ने उस द्वार को धीरे से खोलकर देखा। दूसरी ओर थोड़ी दूरी पर रोशनी सी दिखाई दे रही थी। शैफाली उस रोशनी की ओर आगे बढ़ गई।

जैसे-जैसे शैफाली उस रोशनी के पास पहुंच रही थी, उसके कानों में तेज स्वर सुनाई दे रहा था।

इस अजीब से स्वर को सुनकर शैफाली हैरान हो गई क्यों कि ये स्वर एक भीड़ का था। शैफाली ने धीरे से रोशनी के पास पहुंचकर बाहर की ओर झांका। बाहर उसे एक बहुत भीड़ भरी जगह दिखाई दी।

शैफाली अब पूरी तरह से रोशनी से बाहर आ गई। वह किसी यूरोपियन देश का एक मेला लग रहा था, जहां पर बच्चे, बूढ़े, जवान सभी घूम कर आनन्द उठा रहे थे।

यह देख शैफाली सोच में पड़ गई। तभी एक बूढ़ा शैफाली के पास आकर बोला- “क्या तुम्हें मेला घूमना है बच्ची?”

उसकी बात सुन शैफाली घबरा कर 1 कदम पीछे हो गई- “नहीं-नहीं मुझे कहीं नहीं घूमना?"

उसकी बात सुन बूढ़े ने शैफाली को घूरा और फिर वहां से चला गया।

तभी शैफाली के दिमाग में एक विचार कौंधा। अब वह पलट कर वापस उसी द्वार से होते हुए सभी के पास आ गई।

शैफाली ने हाथ के इशारे से सभी को, उसके पीछे आने को कहा। किसी की समझ में नहीं आया कि शैफाली उन्हें कहां लेकर जा रही है? पर सभी उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

कुछ ही देर में शैफाली सबको लेकर उस मेले में पहुंच गई।

उस स्थान को देख सभी हैरत में पड़ गये। उन्हें समझ नहीं आया कि तिलिस्मा के बीच में यह मेला कहां से आ गया? बहरहाल जो भी हो, सभी को अब सुनाई देने लगा था।

शैफाली सबको लेकर एक ऐसे स्थान पर पहुंच गई, जहां शोर थोड़ा कम था।

“यह सब क्या है शैफाली?” सुयश ने आश्चर्य से शैफाली को देखते हुए पूछा- “क्या तुम्हें कुछ भी समझ में आ रहा है?"

“जी कैप्टेन अंकल, मुझे सब समझ में आ रहा है।" शैफाली ने शांत लहजे में कहा- “पहले हम जहां थे, वह तिलिस्मा का अगला द्वार है, जो कि एक कान के रुप में बनाया गया है। हम जिस सुरंग से होकर छेद के पास तक पहुंचे, उसे 'ऑडिटरी कैनल' कहते हैं। उसके बाद जहां दीवार में छेद था, वहां पर एक 'टिम्पैनिक मेम्ब्रेन' होना चाहिये था? पर वो वहां नहीं था। टिम्पैनिक मेम्ब्रेन को हम ‘ईयरड्रम' भी कहते हैं। ईयरड्रम का कार्य, कानों के अंदर आने वाली ध्वनि को बढ़ाकर आगे भेजना होता है। ईयरड्रम के बाद तीन छोटी हड्डियां हो ती हैं-मैलियस, इंकस और स्टपीज।” इन तीनों हड्डियों का काम ध्वनि को कान के आंतरिक भाग में भेजना होता है।

"पर यह तीन हड्डियां भी अपने स्थान पर नहीं हैं। फिर आता है कान का

आंतरिक भाग, जहां एक समुद्री खोल की भांति संरचना होती है, जिसे 'काकलिया' कहते हैं। काकलिया का कार्य ध्वनि को तरंगों में बदलकर मस्तिष्क तक भेजना होता है। वह भी अपने स्थान पर नहीं है।........ अब अगर हम सरल शब्दों में कहें, तो कान के अंदर के कुछ भाग, अपने स्थान से गायब हैं, हमें उन कान के भागों को ढूंढकर उनकी जगह पर लगाना होगा, नहीं तो यह द्वार नहीं पार होगा। अब मुझे लगता है कि कैश्वर ने कान के उन भागों को इस मेले में कहीं छिपा रखा है, हमें इस पूरे मेले में से कान के उन भागों को ढूंढकर उन्हें कान में लगाना पड़ेगा।"

“हे भगवान, इतना साधारण कार्य?" ऐलेक्स ने गुस्साते हुए कहा- “ये कैश्वर क्या हमको 'कोलंबस' समझता है? जो हर बार एक नयी दुनिया की खोज करने भेज देता है। अरे 24 वर्ष तक ढूंढने के बाद तो मुझे एक गर्लफ्रेंड मिली है, अब इतने छोटे कान के भाग को कहां ढूंढू?”

“ऐलेक्स सही कह रहा है, इतने बड़े मेले से कान के कुछ भागों को ढूंढ पाना तो बहुत ही असंभव कार्य है?" सुयश ने शैफाली को देखते हुए कहा- “और वह भी तब, जबकि हमको उसकी सही संरचना के बारे में भी नहीं पता है।”

“देखिये कैप्टेन अंकल, ढूंढना तो हमें पड़ेगा ही। क्यों कि हमारे पास दूसरा कोई ऑप्शन है भी नहीं?" शैफाली ने कहा- “पर मैं इस कार्य को थोड़ा आसान बना सकती हूं। देखिये हमें कुल 6 चीजें ढूंढनी हैं, तो हम 2-2 लोगों की टीम बना लेते हैं, इस प्रकार से हम 3 गुना कम समय में ही सारी चीजें ढूंढ लेंगे। अब रही बात उन 6 चीजों की आकृति की, तो वह मैं बता देती हूं देखिये पहली चीज ईयरड्रम है, जो एक लाउड स्पीकर की भांति होता है। दूसरी चीज मैलियस हड्डी है, जो एक..... हथौड़े के जैसी होती है। तीसरी चीज इंकस हड्डी, जो कि निहाई के जैसी होती है...निहाई तो आप लोगों को याद ही होगा, जो हमें हेफेस्टस की गुफा में मिला था, जिस पर हथौड़े की चोट करके हथियार बनाया जाता है।

“चौथी चीज स्टपीज हड्डी है, जो कि घोड़े की रकाब जैसी होती है। घोड़े की रकाब वह चीज होती है, जिसमें हम पैर फंसाकर घोड़े के ऊपर चढ़ते हैं। पांचवी चीज काकलिया है, जो पानी में रहने वाले ‘स्नेल' की तरह होती है और छठी चीज नर्वस् है, जो कि रस्सी के समान होती है। यानि की हमें अब कान के किसी भी भाग को ढूंढने की जगह इन 6 चीजों को ढूंढना होगा? मुझे पूरा विश्वास है कि कैश्वर ने इतने बड़े मेले में इन 6 चीजों के जैसी दूसरी कोई चीज नहीं रखी होगी? और अगर ऐसा है तो हथौड़ा और निहाई दोनों ही चीजें मेले में मौजूद किसी भी लोहार के पास मिल जायेगी। इसी प्रकार घोड़े की रकाब व रस्सी किसी अस्तबल में या फिर किसी घुड़सवार के पास से मिलेगी। अब बची बाकी की 2 चीजें लाउडस्पीकर और स्नेल। तो यह दोनों चीजें शायद किसी मछली बेचने वाले स्टॉल पर मिल सकती हैं।" इतना कहकर शैफाली चुप हो गई।

सभी अब आश्चर्य से शैफाली को देख रहे थे। इतने कठिन कार्य को शैफाली ने चुटकियों में आसान बना दिया था।

"तो फिर टीम बना लेते हैं।” जेनिथ ने कहा।

“मैं तो कैप्टेन अंकल के साथ रहूंगी।” शैफाली ने पहले ही घोषणा कर दी। यह देख ऐलेक्स ने तुरंत क्रिस्टी का हाथ थाम लिया। अब जेनिथ के पास तौफीक के सिवा कोई भी विकल्प नहीं बचा था।

जेनिथ तौफीक के साथ जाना नहीं चाहती थी, पर वह सभी को यह भी दिखाना नहीं चाहती थी कि तौफीक और उसके बीच कुछ भी मतभेद है, इसलिये उसने किसी से कुछ नहीं बोला?

पर तौफीक की नजरें लगातार जेनिथ की ओर थीं, शायद वह इस परिणाम सुन जेनिथ के चेहरे का रिएक्शन देखना चाहता था।

"तो टीम तो बन गईं, अब जरा ये भी निर्णय ले लो कि किसे क्या ढूंढना है?” ऐलेक्स ने कहा।

"हम लाउडस्पीकर और स्नेल ढूंढेंगे।” जेनिथ ने इस बार बिना देर किये अपना निर्णय सुनाया। उसने सोचा कि लाउडस्पीकर को ढूंढना सबसे आसान है क्यों कि जहां भी मेले में तेज आवाज सुनाई दे, उधर ही बढ़ जाना है।

अब सुयश ने क्रिस्टी और ऐलेक्स की ओर देखा, शायद वह उन्हें चुनाव का पहले मौका देना चाहता था।

“ठीक है, तो हम हथौड़ा और निहाई ढूंढेगे।” क्रिस्टी ने अपना फैसला सुनाया।

“ठीक है दोस्तों, तो फिर मैं और शैफाली घोड़े की रकाब और रस्सी लायेंगे।” सुयश ने कहा- “ठीक है दोस्तों...तो फिर निकलते हैं यहां से। अब जिसे भी पहले जो चीज मिल गई, वह इसी स्थान पर आकर हमारे आने का इंतजार करेगा।"

सुयश की बात सुन तीनों टीमें अलग-अलग दिशा में चल पड़ीं।

क्रिस्टी और ऐलेक्स पूर्व दिशा की ओर चल दिये थे। ऐलेक्स क्रिस्टी का हाथ थामे ऐसे चल रहा था, जैसे वह अपनी गर्लफ्रेंड को मेला घुमाने लाया हो।

"क्रिस्टी!” ऐलेक्स ने क्रिस्टी की ओर देखते हुए कहा- “क्यों ना हम इसी तिलिस्म के मेले में ही हमेशा के लिये रह जाएं? ना कोई परेशानी, ना झंझट बस आराम से सदियों तक, हम एक-दूसरे के हाथ में हाथ डाले यूं ही घूमते रहें।

"हां तुम्हारा ख्याल सही है। यहां तुम्हें नौकरी भी नहीं ढूंढनी होगी....ना खाना...ना पीना ना थकान ना कोई मेहनत...बस मक्कारी की जिंदगी जीते हुए, एक पिंजरे का आनन्द इन नकली लोगों के साथ उठाते रहेंगे।" क्रिस्टी ने कटाक्ष करते हुए कहा।

“ये तुमने मेरी बेइज्जती की है या फिर मुझे सजेशन दे रही थी?” ऐलेक्स ने पलकें झपकाते हुए क्रिस्टी को हंसाने की कोशिश की।

"बेइज्जती की थी।” क्रिस्टी ने सपाट स्वर में कहा।

“फिर ठीक है वैसे भी मुझे बेइज्जती का ज्यादा इक्सपीरियंस है।” ऐलेक्स ने मुंह लटकाते हुए कहा।

“अले...अले...मेला छोता छा ब्वायफ्रेंड गुच्छा हो गया क्या?” क्रिस्टी ने ऐलेक्स को मनाने की कोशिश करते हुए कहा।

इस समय बहुत से लोग ऐलेक्स और क्रिस्टी के बगल से निकल रहे थे, पर उन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह तो बस अपनी ही दुनिया में खोये हुए थे।

ऐलेक्स गुस्सा नहीं हुआ था, पर उसे क्रिस्टी का यूं मनाना अच्छा लग रहा था, इसलिये वह गुस्सा होने का नाटक करने लगा।

क्रिस्टी ने ऐलेक्स के चेहरे को अपने दोनों हाथों से पकड़ा और ऐलेक्स से आँखें मिलाते हुए कहा- “मुझे माफ कर दो...मैंने जानबूझकर नहीं कहा था, मुझे क्या मालूम कि तुम्हें उन दोनो कमीने जैक और जॉनी की याद आ जायेगी?"

ऐलेक्स ने क्रिस्टी की आँखों में देखा और फिर मुस्कुरा दिया- “तुमसे गुस्सा होकर कहां जाऊंगा? पूरी जिंदगी में एक तुम ही तो हो, जिसे मैंने दिल से चाहा। तुम तो अगर मुझे गोली भी मार देती, तो मैं हंसते-हंसते मर जाता।”

ऐलेक्स के ये शब्द सुनकर, क्रिस्टी की आँखों में मोती से झलकने लगे। पता नहीं क्यों अचानक वह बहुत इमोशनल नजर आने लगी।

“क्या हुआ क्रिस्टी?” ऐलेक्स ने क्रिस्टी के चेहरे पर ढुलक आये मोती को पोंछते हुए कहा- “ये अचानक तुम्हें क्या हो गया?"

“पता नहीं...बस वो वक्त याद आ गया, जब युगाका की वजह से तुम मुझसे बिछड़ गये थे।” क्रिस्टी ने अपने अहसासों को थामने की कोशिश करते हुए कहा “वह कुछ दिन मेरी जिंदगी के सबसे बेकार दिनों में से थे। ऐसा लगता था कि जैसे किसी ने मेरे शरीर से मेरी रुह ही निकाल ली हो।"

"वह तो बीती बातें थीं, उनको याद करके इस समय क्यों उदास हो रही हो? अब तो मैं तुम्हारे पास में हूं।" ऐलेक्स ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा।

“शायद आज बहुत दिनों के बाद तुम्हारे साथ अकेले हूं, इसलिये अंजाने में ही जज्बात उमड़ रहे हैं...पर सच में मैं तुम्हें अब कभी खोना नहीं चाहती।” क्रिस्टी ने भावुक होते हुए कहा- “आई लव यू ऐलेक्स।...मुझे छोड़कर अब कभी भी कहीं मत जाना।"

"कहीं नहीं जाऊंगा।" ऐलेक्स ने कहा।

“कमीने, आई लव यू टू क्यों नहीं बोला?” क्रिस्टी ने अपनी कोहनी को ऐलेक्स के पेट में मारते हुए कहा।

“उसे बोलने की जरुरत नहीं है, उसे तुम मेरी आँखों में हमेशा पढ़ सकती हो।” ऐलेक्स ने अपना चेहरा क्रिस्टी की ओर ले जाते हुए कहा।

"लोहार!” तभी क्रिस्टी ने एका एक टॉपिक चेंज करते हुए कहा।

"क्या यार अच्छे-खासे प्यार के बीच में, यह लोहार कहां से आ गया?" ऐलेक्स ने अपने एक हाथ का मुक्का बना अपने दूसरे हाथ पर मारते हुए कहा।

"वो देखो, उसके पास हथौड़ा और निहाई दोनों ही हैं।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स की ओर इशारा करते हुए कहा।

"चलो फिर, चलकर देखते हैं कि वह हमें यह दोनों चीजें कैसे देता है?" ऐलेक्स यह कहकर लोहार की ओर बढ़ गया।

लोहार उम्र में थोड़ा बड़ा दिख रहा था, इसलिये ऐलेक्स ने उसे सम्मान देते हुए कहा- “बाबा, हमें यह हथौड़ा और निहाई चाहिये। हमें इसकी बहुत जरुरत है।"

लोहार ने एक नजर ऐलेक्स और क्रिस्टी को ऊपर से नीचे की ओर देखा, फिर बोला- “अगर ये दोनों चीजें तुम्हें दे दूंगा, तो मैं औजार किस चीज से बनाऊंगा?"

“आप कोई दूसरा काम कर लेना, इतना बड़ा मेला है आपको तो कोई भी काम मिल जायेगा?” क्रिस्टी ने कहा।

“दे दूंगा तुम लोगों को ये दोनों चीज, पर तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।” लोहार ने कहा।

“पर हमारे पास आपको देने के लिये कुछ भी नहीं है।" ऐलेक्स ने कहा।

“देने के लिये कुछ नहीं है तो चोरी करो, डाका डालो। इस काम में तो तुम एक्सपर्ट हो ना?” लोहार ने मुस्कुराते हुए कहा।

अब ऐलेक्स आश्चर्य से उस लोहार का चेहरा देखने लगा। क्रिस्टी के भी चेहरे पर आश्चर्य नजर आने लगा।

पता नहीं क्यों अब उन्हें लगने लगा था? कि यह टास्क उतना आसान नहीं है, जितना उन्होंने सोचा था?

“क्या तुम मेरे बारे में सब-कुछ जानते हो?” ऐलेक्स ने लोहार की ओर देखते हुए पूछा।

“पता नहीं...मुझे तो जितना बोलने को कहा गया है, मैं तो बस उतना ही बोलता हूं?” लोहार ने कहा।

“अब कुछ भी कहने और बोलने का कोई मतलब नहीं है, सीधे-सीधे बताओ कि तुम्हें इस हथौड़े और निहाई के बदले में क्या चाहिये?” क्रिस्टी ने गुस्साते हुए कहा।

“तुम इसकी कीमत दे पाओगी?” लोहार ने क्रिस्टी की ओर देखते हुए कहा- “सोच लो इसकी कीमत बहुत बड़ी है।

"सोच लिया हमारा यहां से निकलना सबसे ज्यादा जरुरी है।” क्रिस्टी ने अपने दाँत भींचते हुए कहा "तुम सिर्फ इसकी कीमत बताओ और ये बताओ कि हम उसे कैसे चुका सकते हैं? बाकी सब हम पर छोड़ दो।"

"मुझे इन चीजों के बदले डॉलर से भरा बैग चाहिये।” लोहार ने अजीब से अंदाज में दोनों को देखते हुए कहा।

"क्याऽऽऽऽ?” ऐलेक्स और क्रिस्टी के चेहरे पर अब और आश्चर्य के भाव आ गये।

“पर हम इस जगह पर डॉलर का बैग कहां से लायेंगे?” क्रिस्टी ने उलझे-उलझे स्वर में कहा।

“वो सामने तुम्हारे ही डैड ‘डेरिक जोंस' हैं ना, जो इस समय नोटों से भरा बैग लेकर बैंक में जा रहे हैं?" लोहार ने क्रिस्टी को एक ओर इशारा करते हुए कहा “तुम्हें बस वही बैग लेकर आना है।"

लोहार के शब्द सुन क्रिस्टी के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। वह डरते-डरते पीछे घूमी, पर पीछे नजर पड़ते ही उसके दिमाग में धमाके से होने लगे।

जारी रहेगा_____✍️
 
#196.

पीछे सच में उसके डैड थे, जो सड़क के दूसरी ओर स्थित बैंक में रुपयों से भरा बैग लेकर जा रहे थे।

क्रिस्टी को अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? क्रिस्टी के पापा अब बैंक में दाखिल हो चुके थे।

क्रिस्टी ने अपने चारो ओर देखा। उसके आसपास से पूरा मेला गायब हो चुका था और वह इस समय बैंक के सामने एक फुटपाथ पर खड़ी थी।

क्रिस्टी ने अब घबराकर पीछे की ओर देखा, पर पीछे का दृश्य भी बदल चुका था, अब ना तो वहां कोई लोहार था और ना ही ऐलेक्स?

क्रिस्टी समझ गई कि यह भी कैश्वर का फैलाया कोई मायाजाल ही है, जिसमें वह उसके दिमाग के साथ खेल रहा है।

क्रिस्टी जानती थी कि यह सब सच नहीं है और वह बिना बैग के वापस भी नहीं जा सकती। अतः वह धीरे धीरे बैंक की ओर बढ़ गई।

क्रिस्टी ने बैंक के दरवाजे पर कदम रखा, पर जाने क्यों इस समय उसके पैर कांप रहे थे? जैसे ही वह दरवाजे को क्रास करके बैंक के अंदर पहुंची, उसे एक नकाबपोश लुटेरे ने कवर कर लिया।

“बिना आवाज किये चुपचाप अंदर आ जाओ।" नकाबपोश ने गुर्राकर कहा।

क्रिस्टी एक मिनट से भी कम समय में उसकी आवाज पहचान गई, वह जॉनी था। तभी क्रिस्टी की आँखें बैंक के अंदर की ओर गईं, अंदर 2 और लुटेरे अलग-अलग जगहों पर खड़े थे। तीनों ने चेहरे पर नकाब पहन रखा था।

पर क्रिस्टी एक-एक करके बाकी दोनों को भी पहचान गई, वह जैक और ऐलेक्स थे, जिनमें से जैक कैश काउंटर पर खड़ा था और ऐलेक्स ने वहां खड़े लोगों को गन की नोक पर ले रखा था।

जॉनी, क्रिस्टी को धक्का देते हुए अंदर की ओर ले आया और क्रिस्टी को भी सभी के साथ भीड़ में खड़ा कर दिया।

तभी क्रिस्टी की आँखें अपने डैड पर गईं, जो कि उसी भीड़ में खड़े अपने नोटों का बैग, अपने शरीर की आड़ में छिपाने की कोशिश कर रहे थे। तभी डेरिक की नजर भी क्रिस्टी पर पड़ गई। अब वह आश्चर्य से क्रिस्टी को देखने लगे।

“तुम...तुम यहां क्या कर रही हो क्रिस्टी?” डेरिक ने धीमी आवाज में पूछा।

“आप...आप...मुझसे बात कर सकते हैं?" अपने डैड को बोलते देख क्रिस्टी के होंठ कंपकंपाने लगे। अब वह बिल्कुल भूल चुकी थी कि वह इस समय तिलिस्मा में मौजूद है।

क्रिस्टी की आँखों से अब लगातार आँसू बह रहे थे, वह इतना ज्यादा भावुक लग रही थी कि उसे इस समय स्वयं को संभालना बिल्कुल मुश्किल लग रहा था।

"ऐ लड़की, ये रोने का नाटक बंद करो।" ऐलेक्स ने अपनी गन को क्रिस्टी की ओर करते हुए कहा।

ऐलेक्स की आवाज सुन क्रिस्टी एक झटके से मुड़ गई। अब उसकी नजरें ऐलेक्स के चेहरे की ओर थीं। पर उसकी आँखों में गुस्से के नहीं बल्कि प्यार के भाव और खुशी के भाव थे।

वह ऐलेक्स को चीख-चीखकर बताना चाहती थी कि उसे उसके डैड मिल गये। वह ऐलेक्स को अपने डैड से मिलवाना चाहती थी, परंतु समय की नजाकत समझ वह बिल्कुल शांत रही।

क्रिस्टी को अपनी ओर घूरता देख ऐलेक्स ने एक, दूसरे व्यक्ति को पीछे धकेलते हुए कहा- “पीछे हटो, तुम्हें पता नहीं कि हम कितने खतरनाक हैं?"

"तुम्हारी गन में गोली भी है?” क्रिस्टी ने अब नार्मल होते हुए ऐलेक्स से पूछा।

"चलाकर दिखाऊं क्या?” ऐलेक्स ने गुर्राकर कहा, पर क्रिस्टी की बात सुन, अब वह थोड़ा नर्वस दिखने लगा था।

तभी ऐलेक्स की बात सुन डेरिक आगे आ गये“ नहीं-नहीं मेरी बेटी को कुछ मत कहना...ये ... ये अब कुछ नहीं बोलेगी। यह कहकर डेरिक ने क्रिस्टी को पीछे खींच लिया।

तभी तेज आवाज सुन जैक भी उधर आगया। उसके हाथ में भी गन थी।

“क्या हुआ कोई परेशान कर रहा है क्या?” जैक ने ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।

ऐलेक्स ने क्रिस्टी की ओर देखा और फिर जैक को जवाब दिया- “नहीं।"

"तो फिर ये बूढ़ा तेज आवाज में क्यों बोल रहा था?" जैक ने गुर्राते हुए कहा।

उधर जॉनी ने कैश काउंटर पर अब जैक की जगह ले ली थी। तभी जैक की निगाह डेरिक के हाथ में थमे, बैग पर गई।

"इस बैग में क्या है?” जैक ने तेज आवाज में पूछा।

"क...क कुछ नहीं, ऑफिस के पेपर हैं। डेरिक ने डरते-डरते जवाब दिया, पर अब वो उस बैग को छिपाने का भरसक प्रयास करने लगा।

उन्हें बैग को छिपाता देख, जैक ने डेरिक के हाथ से बैग को छीनने की कोशिश की, पर डेरिक ने अपने बैग को इस प्रकार पकड़ रखा था, कि जैक को एक हाथ से बैग छीनने में परेशानी हो रही थी।

अब जैक और डेरिक के बीच खींचा-तानी शुरु हो गई थी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, कि वह क्या करे?

तभी जैक ने बैग को ना पाते देख, गुस्साकर डेरिक पर गन तान दी। अब क्रिस्टी के लिये बर्दाश्त कर पाना बिल्कुल मुश्किल था।

उसे पता था कि ऐलेक्स की गन में गोलियां नहीं हैं, अतः वह जोर से हवा में उछली और उसने जैक के हाथ में पकड़ी गन पर लात मार दी। जैक की गन हवा में उछलकर दूर जा गिरी।

उधर जॉनी ने कैश काउंटर से नोटों से भरा बैग ले लिया था।

"सब निकलो यहां से। हमारा काम हो चुका है।' जॉनी ने कहा और बैंक के बाहर की ओर भागा।

तभी जैक ने जॉनी के हाथ से उसकी गन छीनी और डेरिक की ओर करके गोली चला दी।

“धांयऽऽऽऽ”...एक तेज आवाज वातावरण में गूंजी और गोली सीधा डेरिक के सीने में लगी। डेरिक उछलकर वहीं गिर गया।

यह देख क्रिस्टी ने गुस्सा कर जैक की गिरी हुई गन को उठाया और पलटकर जैक पर गोली चला दी "बास्टर्डऽऽऽऽऽऽ”

पर.....पर.....गोली और जैक के बीच, जाने कैसे ऐलेक्स आ गया? गोली सीधा ऐलेक्स की पीठ पर लगी और वह लहराकर वहीं जमीन पर गिर गया।

यह देख क्रिस्टी का गला सूख गया। एक ओर उसके डैड का शरीर जमीन पर गिरा था और दूसरी ओर ऐलेक्स का।

दोनों ही क्रिस्टी को निहार रहे थे। पर क्रिस्टी के ऊपर तो जैसे दोहरा वार हुआ था, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह पहले किधर जाए?

क्रिस्टी को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे किसी ने उसकी जान ही निकाल ली हो।

कुछ देर के बाद क्रिस्टी धीरे से उठी और ऐलेक्स को देखते हुए अपने डैड की ओर बढ़ गई।

डेरिक के शरीर में अभी भी थोड़ी जान बची हुई थी। क्रिस्टी ने डेरिक का सिर अपनी गोद में रख लिया।

"क्रिस्टी बेटा, मेरा सफर बस अब यहीं तक था। तुमने मुझे बचाने की बहुत कोशिश की, पर मुझे पता है कि जिंदगी में हमेशा कामयाबी नहीं मिलती। मेरे लिये कभी भी परेशान मत होना और वो करना जो तुम्हारा दिल करे। ध्यान रखना मैं तुम्हें हमेशा आसमान से देखता रहूंगा। अब ये बैग तुम अपने पास रख लो, यह तुम्हें बहुत काम आयेगा।" यह कहकर डेरिक का सिर क्रिस्टी की गोद में ढुलक गया।

अब क्रिस्टी की आँख से लगातार आँसू निकल रहे थे। वह आज जी भरकर रो लेना चाहती थी। क्रिस्टी काफी देर तक अपने डैड का सिर, अपनी गोद में लिये रोती रही।

तभी उसका ध्यान ऐलेक्स की ओर गया। क्रिस्टी ने पलटकर ऐलेक्स की ओर देखा, पर ऐलेक्स मर चुका था और बैंक में आ चुकी पुलिस ऐलेक्स के शव को एक पॉली बैग में रख रहे थे। क्रिस्टी की नजर एक आखिरी बार ऐलेक्स के चेहरे पर पड़ी, तभी एक पुलिस वाले ने पॉली बैग की चेन को बंद कर दिया।

तभी क्रिस्टी को याद आया कि वह तिलिस्मा में है। वह समझ गई कि ऐलेक्स कोई सच में थोड़े ही मरा है।

यह सोच क्रिस्टी ने आखिरी बार अपने डैड का माथा चूमा और उनकी पलकें बंद कर, नोटों से भरा बैग लेकर बैंक से बाहर आ गई। अब क्रिस्टी धीरे-धीरे नार्मल होने लगी थी।

“बाप रे, बहुत ही खतरनाक अहसास था। यह कैश्वर पता नहीं क्या-क्या करवायेगा, हम लोगों से भी ना?" क्रिस्टी अपने होंठों ही होंठों में बड़बड़ाई और बैंक के सामने, उस ओर चल दी, जहां से वह अभी बैंक में आयी थी।

क्रिस्टी ने सड़क को पार किया और फुटपाथ पर आकर खड़ी हो गई। तभी उसे पीछे से आवाज सुनाई दी- “ले आई बैग को?"

यह आवाज लोहार की ही थी, जिसे सुनकर क्रिस्टी ने पलटकर पीछे की ओर देखा। पीछे लोहार ही था, जो कि अपनी दुकान में बैठा था।

तभी क्रिस्टी को मेले की आवाज पुनः सुनाई देने लगी। क्रिस्टी ने पलटकर अपने चारो ओर देखा। अब वह फिर से मेले में आ गई थी और उसके पीछे दिखने वाला बैंक अपनी जगह से गायब था।

क्रिस्टी ने अपने हाथ में पकड़ा बैग लोहार के हवाले कर दिया। बैग के मिलते ही लोहार ने हथौड़ा और निहाई क्रिस्टी को दे दिया और पलटकर एक दिशा में जाने लगा।

उसे ऐसे जाता देख क्रिस्टी ने पीछे से पुकारकर उसे रोक दिया- “अरे-अरे आप ऐसे कहां जा रहे हो? ऐलेक्स कहां यह तो बता दो?"

.“ऐलेक्स?... क्या तुम ऐलेक्स की बात कर रही हो?” लोहार ने हैरान होते हुए कहा- “पर ऐलेक्स को तो तुमने ही बैंक में गोली मार दी थी ना?"

“क्याऽऽऽऽऽऽऽ?” यह सुनकर क्रिस्टी पर मानो बिजली ही गिर गई।

“अब जब तुमने भूतकाल में जाकर ऐलेक्स को मार दिया तो इस समय में ऐलेक्स कहां से आयेगा?" लोहार ने कहा- “मरे हुए कभी वापस नहीं आते मैडम। मैंने आपसे पहले ही कहा था कि इस हथौड़े और निहाई की कीमत तुम दे नहीं पाओगी। पर तुमने ही मुझसे इसे देने को कहा था। अब इसमें मेरी तो कोई गलती नहीं है ना?" यह कहकर लोहार एक दिशा की ओर चला गया।

लोहार की बात सुन क्रिस्टी का दिमाग सांय-सांय करने लगा। वह वही जमीन पर बैठ गई और तेज आवाज में चीख-चीखकर रोने लगी। पर उस मेले में घूम रहे किसी भी व्यक्ति ने क्रिस्टी को सांत्वना नहीं दी।

क्रिस्टी को महसूस हो रहा था कि जैसे उसकी पूरी दुनिया ही बिखर गई हो। वह अब जीना ही नहीं चाहती थी।

तभी आसमान में जोर से बादल गरजे और तेज बारिश शुरु हो गई। लग रहा था कि कैश्वर से भी क्रिस्टी के आँसू देखे नहीं गये, इसलिये उसने बारिश की बूंदों में, क्रिस्टी के आँसुओं को मिला दिया।

“यह मैंने क्या कर दिया जिसे सबसे ज्यादा चाहा,...उसे ही अपने हाथों से गोली मार दी और उसके बाद उसके आखिरी समय में उसके पास ना जाकर अपने डैड के पास चली गई।

वो डैड के पास जो वर्षों पहले ही मर चुके थे। यह मुझसे क्या हो गया? मैंने...अपने ही हाथों से अपनी पूरी जिंदगी तबाह कर ली....मुझे अब जीने का कोई हक नहीं...मुझे अब मर जाना चाहिये हां हां...मर जाना चाहिये।"

क्रिस्टी अब इतना नकारात्मक हो गई थी कि उसने अपना जीवन खत्म करने के बारे में ही सोच लिया।

उसने अपने चारो ओर देखा, पर उसे स्वयं को खत्म करने के लिये कुछ दिखाई नहीं दिया।

तभी क्रिस्टी को अपनी जेब में एक चुभन का अहसास हुआ। क्रिस्टी ने अपनी जेब से चुभने वाली चीज को बाहर निकाल लिया।

वह चीज काँच की वहीं पेंसिल थी, जो क्रिस्टी को रेतमानव को मारने के बाद नदी से मिली थी। पेंसिल में मौजूद सुनहरी रेत अभी भी पेंसिल के अंदर घूम रही थी।

क्रिस्टी भरे मन से उस पेंसिल को देखने लगी, यह पेंसिल उसकी वीरता के पदक स्वरुप था।

अचानक क्रिस्टी के चेहरे के भाव गुस्से से भर गये- “अब क्या फायदा इस पेंसिल का? ना तो मैं अपने पिता को बचा पाई और ना ही ऐलेक्स को...ऐसी वीरता के प्रदर्शन का क्या फायदा?" यह सोच क्रिस्टी ने गुस्साकर उस पेंसिल को एक पत्थर पर मारकर तोड़ दिया।

पेंसिल के टूटते ही उसमें मौजूद रेत पेंसिल से निकलकर, क्रिस्टी के सामने हवा में घूमने लगी।

यह देख क्रिस्टी सब कुछ भूल आश्चर्य से हवा में नाच रही उस रेत को देखने लगी।

तभी उस रेत से आवाज आई- “तुम वो क्रिस्टी तो नहीं दिखाई देती? जो इतनी कठिनाइयों को पार कर तिलिस्मा में इस स्थान पर पहुंची हो।"

“कौन हो तुम? और इस पेंसिल में क्या कर रहे थे?" क्रिस्टी ने सुनहरी रेत को घूरते हुए पूछा।

“मैं कौन हूं? और इस पेंसिल में क्या कर रहा था? यह जानने के लिये तुम्हें सुयश के पास चलना होगा।" सुनहरी रेत से आवाज उभरी।

"तुम कैप्टेन को भी जानते हो?” अब क्रिस्टी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आये।

“मैं सबको जानता हूं....सबकुछ जानता हूं और यकीन मानों मैं कुछ भी कर सकता हूं पर इससे पहले कि कैश्वर को मेरे यहां होने का अहसास हो, मुझे लेकर सुयश के पास चलो...वही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब देगा।" सुनहरी रेत के बातें, उसी की तरह रहस्य से भरी थीं।

यह देख ना जाने क्यों क्रिस्टी का उस शक्ति पर थोड़ा विश्वास बढ़ा और वह हथौड़ा व निहाई लेकर उस दिशा की ओर चल दी, जिधर से वह आई थी।

अब सुनहरी रेत क्रिस्टी के पीछे-पीछे हवा में घूमती हुई चल पड़ी।

पर ऐलेक्स के प्रति उसके दिल में उठ रही टीस अभी समाप्त नहीं हुई थी।

जारी रहेगा_____✍️
 
#197.

शक्तिशाली हनुका: (20.01.2002, रविवार, सीनोर राज्य, अराका द्वीप)

हनुका नीलाभ की आज्ञा मानकर माया की खोज में निकल पड़ा था। उसे सबकुछ सही लग रहा था, बस नीलाभ का रक्त भैरवी की डिबिया देना समझ नहीं आया था।

रक्त भैरवी की डिबिया को सिर्फ आपातकाल में ही खोला जाता था और अभी तक सिर्फ एक ऐसी आपातकाल की स्थिति आई थी, जब देवता और दैत्यों में युद्ध हुआ था। इसीलिये हनुका सोच-सोच कर परेशान था।

फिलहाल वह उड़ता हुआ अराका द्वीप के ऊपर आ गया था। इसी द्वीप पर उसने माया की शक्तियों से बनी एक अदृश्य दीवार देखी थी।

हनुका अब सीनोर राज्य की ऊपर मौजूद अदृश्य दीवार के पर खड़ा था।

ऐसा नहीं था कि हनुका इस दीवार को पार नहीं कर सकता था, पर पिछली बार उसने इस दीवार को पार करने की कोशिश नहीं की थी।

इस बार हनुका ने ब्रह्देव का नमन किया और उस अदृश्य दीवार के पार निकल गया।

अब हनुका सीनोर राज्य के पास बनी गोंजालो की मूर्ति के पास खड़ा था। हनुका की नजर अब चारो ओर फिर रही थी।

उधर मकोटा का सेवक वुल्फा, पिरामिड में बैठा कम्प्यूटर पर कुछ देख रहा था कि तभी उसे कम्प्यूटर पर पिरामिड के पास कुछ हलचल दिखाई दी। यह देख वुल्फा ने उस स्थान के कैमरे को स्टार्ट कर दिया।

अब वुल्फा को गोंजालो की मूर्ति के पास हनुका खड़ा दिखाई दिया। एक हिमालयन यति को देखकर वुल्फा आश्चर्य में पड़ गया।

उसने कभी ऐसा जीव नहीं देखा था, इसलिये वुल्फा ने पास रखी ध्वनि तरंगे फेंकने वाली, गन को हाथ में उठाया और पिरामिड से निकलकर उस स्थान की ओर चल दिया, जिधर उसने हनुका को घूमते देखा था।

उधर हनुका ध्यान से गोंजालो की मूर्ति को देख रहा था।

"बड़ा ही विचित्र जीव लग रहा है।” हनुका ने मन ही मन सोचते हुए कहा- “ऐसी विचित्र मूर्ति तो कोई शैतान ही अपने महल के बाहर लगाता है, इसका मतलब इस द्वीप पर राक्षस, दैत्य या शैतान रहते हैं। हां याद आया, पिछली बार भी इसी द्वीप के एक मायावी दैत्य ने गुरुत्व शक्ति चुराने की कोशिश की थी.... पर अगर यहां दैत्य रहते हैं, तो उनके पास माता की शक्तियां कहां से आईं?...मुझे इस रहस्य को पता करना ही होगा?"

अभी हनुका सोच ही रहा था, कि तभी उसके पीछे से आई एक आवाज ने उसे हैरान कर दिया- “कौन हो तुम? और यहां किस लिये आये हो? और तुमने हमारी सुरक्षा दीवार को कैसे पार किया?"

हनुका आवाज सुनकर पीछे पलटा। हनुका के पीछे हाथ मे गन लिये वुल्फा खड़ा था।

"मैं सही सोच रहा था, यह मायावी दैत्यों का द्वीप है...अब इस दैत्य को देखो, मुंह भेड़िये का और शरीर मनुष्य का।” हनुका वुल्फा को देखकर सोच में पड़ गया।

इधर वुल्फा और हनुका आमने-सामने थे, उधर ऊपर आसमान में लुफासा एक पक्षी बनकर उड़ रहा था।

उसने हनुका को अदृश्य दीवार पर उतरते ही देख लिया था, पर अब वह हनुका की शक्ति से परिचित था, इसलिये उससे दूरी बनाकर सिर्फ उस नजर रख रहा था।

सच कहें तो लुफासा चाहता था कि हनुका का युद्ध वुल्फा से हो जाये। वह स्वयं वुल्फा से परेशान हो चुका था और उसे पता था कि हनुका चुटकियों में इस वुल्फा को मसल सकता है, इसलिये लुफासा ने इस बात की खबर मकोटा को भी नहीं दी।

“क्या सोच रहे हो?" वुल्फा ने दोबारा से पूछा “क्या तुम्हें मेरी भाषा समझ में आ रही है?"

“भाषा तो समझ में आ रही है, पर आपका चेहरा समझ में नहीं आ रहा।....क्या आप बता सकते हो कि आप किस प्रजाति के दैत्य हो?" हनुका ने वुल्फा से उल्टा सवाल कर दिया।

“मैं कोई दैत्य नहीं हूं मैं इस द्वीप का वासी हूं..पर तुमने अभी मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।" वुल्फा ने गन से हनुका को डराते हुए कहा- “कौन हो तुम? और यहां पर क्यों आये हो?"

“मेरा नाम हनुका है, मैं यहां अपनी माता की खोज में आया हूं।” हनुका ने वुल्फा से कहा- “वह अदृश्य दीवार मेरी माता की ही शक्तियों से बना है।"

“यहां तुम्हारी कोई माता नहीं रहती और वह अदृश्य दीवार तो यहां पर हजारों वर्षों से है, लगता है कि तुम मुझे बेवकूफ समझते हो तुम्हें दूसरे ढंग से समझाना पड़ेगा।" यह कहकर वुल्फा ने अपने हाथ में पकड़ी गन का मुंह हनुका की ओर कर, उसका बटन दबा दिया।

गन से शक्तिशाली ध्वनि तरंगें निकलीं, जिसकी वजह से हनुका का पूरा शरीर झनझना उठा।

उन ध्वनि तरंगों ने हनुका के कान पर बहुत ज्यादा असर डाला।

अगर और कोई होता, तो शायद ही इस एक वार के बाद उठ पाता, पर वह हनुका था....महा शक्तिशाली हनुका।

हनुका अब उठकर खड़ा हो गया था। ध्वनि तरंगों के इस वार ने हनुका के क्रोध को बढ़ा दिया था।

"दुष्ट भेड़िये के बच्चे, लगता है तुम पर दया करना बेकार है...तुम सच में ही कोई दैत्य हो?" यह कहकर हनुका ने पास पड़ी एक बड़ी सी चट्टान को अपने हाथों में उठा लिया।

हनुका की असीम शक्ति देख वुल्फा घबरा गया, उसने घबराहट में उस गन की पॉवर बढ़ाकर, उससे हनुका के हाथ में पकड़ी चट्टान पर वार कर दिया।

हनुका के हाथ में पकड़ी चट्टान, ध्वनि तरंगों के वार से चूर-चूर हो कर हवा में बिखर गई।

हनुका समझ गया कि उसे इन तरंगों के वार से अब बचना होगा, उसलिये हनुका ने आगे बढ़कर एक जोरदा

घूसा, वुल्फा के पेट में जड़ दिया।

हनुका के शक्तिशाली वार से, वुल्फा हवा में उड़ता हुआ, एक पेड़ से जा टकराया। इस शक्तिशाली प्रहार से पेड़ भी उखड़कर दूर जा गिरा।

अब वुल्फा के हाथ से उसकी गन छूटकर दूर जा गिरी।

अब वुल्फा भी क्रोधित दिखने लगा, उसने अब एक विशाल भेड़िये का रुप धारण कर लिया और उछलकर हनुका का हाथ, अपने जबड़े से काटने की कोशिश करने लगा।

पर वुल्फा के दाँत, हनुका के शरीर की खाल पर कोई असर नहीं डाल पा रहे थे। इसलिये वुल्फा ने एक तेज उछाल भरी। अब उसका निशाना हनुका की आँखें थीं।

हनुका एक पल में ही, वुल्फा के आक्रमण का अभिप्राय समझ गया, उसने तुरंत अपने शरीर को अत्यंत छोटा कर दिया और वुल्फा के नीचे से होता हुआ, उसके पीछे पहुंच गया।

अब हनुका ने अपने शरीर को अत्यंत विकराल कर लिया और इससे पहले कि आश्चर्यचकित वुल्फा, हनुका को कोई और नुकसान पहुंचा पाता, हनुका ने उसे अपने विकराल पैरों तले कुचलकर मार डाला।

मरते ही हनुका अपने वास्तविक रुप में आ गया। वुल्फा को मरते देख, लुफासा बहुत खुश हो गया।

उधर हनुका ने वुल्फा के शरीर को हिला डुला कर देखा, पर जब उसमें कोई हरकत होती नहीं दिखाई दी, तो हनुका ने एक जोर की हुंकार भरी और अपने सामने मौजूद गोंजालो की प्रतिमा को भी तोड़ डाला।

अब हनुका वहां से सीनोर महल की ओर चल दिया। हनुका को सीनोर महल की ओर जाते देख, लुफासा सभी को सावधान करने के लिये तेजी से महल की ओर उड़ने लगा।

लुफासा ने महल में प्रवेश करते ही ढोल को बजाना शुरु कर दिया।

ढोल की आवाज सुनकर, सनूरा, मेलाइट, रोजर और सुर्वया फिर से भागकर महल के प्रांगण में पहुंच गये।

सभी इस समय घबराए हुए लग रहे थे, उन्हें लगा कि फिर अंतरिक्ष के जीवों ने उन पर आक्रमण कर दिया।

“क्या हुआ लुफासा? तुम इस प्रकार ढोल क्यों बजा रहे हो? क्या फिर कोई खतरा हमारी ओर बढ़ रहा है?" सनूरा ने चिल्ला कर मीनार पर खड़े, ढोल बजाते हुए लुफासा से पूछा।

लुफासा सभी को आया देख, ढोल बजाना बंद कर दिया और चीखकर बोला- “एक खतरनाक हिमालयन यति, इसी ओर आ रहा है। वह बहुत ही ज्यादा खतरनाक है। उसने वुल्फा को भी मार डाला।

वुल्फा के मरने का समाचार तो सनूरा के लिये भी खुशी भरा था, पर यह समय खुशी प्रकट करने का नहीं था।

“हिमालयन यति!" सुर्वया ने आश्चर्य से पूछा- “मैं उस हिमालयन यति को देखना चाहती हूं लुफासा।"

लुफासा ने सुर्वया की बात सुनकर, एक बड़े से पक्षी का आकार धारण किया और सुर्वया को अपने पंजों में उठाकर, कुछ ही पलों में मीनार पर पहुंचा दिया।

अब सुर्वया की निगाहें, सामने वाले रास्ते पर थी। कुछ ही देर में क्रोधित हनुका उसे सामने से आता हुआ दिखाई दिया।

हनुका को सीनोर राज्य में देख सुर्वया हैरान रह गई।

“आप लोग घबराइये नहीं...ये महाबली हनुका हैं, मैं इन्हें जानती हूं। यह हमारे शत्रु नहीं हो सकते? अवश्य ही इनके मन में कुछ संदेह उत्पन्न हुआ है, इसी लिये ये यहां पर आये हैं।” सुर्वया ने कहा- “आप लोग महल का द्वार खोल दीजिये और मुझे इनसे बात करने दीजिये।"

वैसे तो लुफासा को हनुका पर भरोसा नहीं था, पर वह पिछले युद्ध में सुर्वया की शक्तियों को भी देख चुका था, इसलिये उसने अपने सैनिकों से द्वार खोलने को कहा और स्वयं सुर्वया को लेकर मीनार के नीचे आ गया।

उधर क्रोध से झूमता हुआ हनुका, अपने सामने एक महल को देख, महल के समीप आ गया।

तभी महल का विशाल द्वार खुलने लगा और हनुका को सामने खड़ी सुर्वया दिखाई दी।

सुर्वया को वहां देख हनुका भी हैरान हो गया क्यों कि वह सुर्वया को अच्छी तरह से जानता था। अब हनुका का क्रोध बिल्कुल शांत हो गया।

“महाबली हनुका को सुर्वया का प्रणाम।” सुर्वया ने हाथ जोड़कर, झुककर हनुका को प्रणाम किया।

“सिंहलोक की राजकुमारी सुर्वया को हनुका का प्रणाम।” हनुका ने भी सुर्वया की तरह ही झुकते हुए प्रणाम किया- “आप यहां क्या कर रहीं हैं राजकुमारी? मैंने तो सुना था कि आप अपने महल से बहुत लंबे समय से गायब हैं।"

"महाबली, इस समय आप अराका द्वीप के, सीनोर राज्य के महल में हैं। हमें आपके आतिथ्य का एक मौका दीजिये, फिर हम सभी बैठकर आराम से बात करेंगे। सुर्वया ने सभी का हनुका से परिचय कराते हुए कहा।"

पर जैसे ही हनुका ने लुफासा को देखा, उसने अपने नाक पर जोर डालकर, लुफासा की गंध को सूंघते हुए कहा- “यह तो वही मायावी राक्षस है, जिसने पवित्र शिव मंदिर से गुरुत्व शक्ति चुराने की चेष्टा की थी। क्या ये महल इसी का है?"

हनुका के शब्द सुनते ही लुफासा को तो जैसे साँप सूंघ गया हो, उसी नहीं लग रहा था कि हनुका उसे इस रुप में पहचान पायेगा।

“आप अंदर चलिये महाबली, फिर आपको सब बता देंगे।” सुर्वया ने कहा- “और यहां पर आपका कोई भी शत्रु नहीं है, इसलिये बिल्कुल निश्चिंत रहें।"

सुर्वया के शब्द सुन हनुका बिल्कुल शांत दिखाई देने लगा। अब जाकर लुफासा की जान में जान आई।

सभी लुफासा को लेकर महल के अतिथि कक्ष में आ गये।

सुर्वया ने सबको पहले ही बता दिया था कि हनुका को अलग-अलग प्रकार के भोजन का स्वाद लेना बहुत पसंद है, बस ये ध्यान रखना कि सारा खाना शाकाहारी होना चाहिये।

सुर्वया की बात सुन लुफासा ने महल के सबसे अच्छे खाना बनाने वालों को खाना बनाने में लगा दिया।

कुछ ही देर बाद हनुका के सामने अलग-अलग प्रकार के सैकड़ों व्यंजन परोस दिये गये।

अपने सामने इतने प्रकार का खाना देखकर हनुका खुश हो गया। पेट भर कर खाने के बाद हनुका अब बिल्कुल शांत नजर आ रहा था।

यह देख खाली पड़ी थालियों को हनुका के सामने से हटा दिया गया और सभी आकर हनुका के पास बैठ गये।

“अब बताइये महाबली, कि आप हिमालय से इतनी दूर इस द्वीप पर क्या कर रहे हैं?” सुर्वया ने कहा।

“पहले आप मुझे यहां घट रही सारी घटनाओं के बारे में बताओ, फिर मैं आपको अपने यहां आने का प्रयोजन बताता हूं।” हनुका ने सुर्वया को देखते हुए कहा।

हनुका की बात सुन, सुर्वया ने पहले अपने बारे में, फिर लुफासा के बारे में सबकुछ बता दिया और उनसे लुफासा के उस कृत्य को, मजबूरी का नाम बताकर क्षमा भी मांग ली।

अब हनुका को लुफासा से कोई परेशानी नहीं थी। अब हनुका ने सुर्वया से माया के बारे में और उस अदृश्य दीवार में बारे में सबकुछ बता दिया।

“अच्छा तो आप माता माया को ढूंढते हुए यहां पर आये हैं।” सुर्वया ने कहा- “अगर मैं आपको माता का पता बता दूं तो क्या बाद में आप हमारी मदद करेंगे?"

“अवश्य करुंगा राजकुमारी।” हनुका ने कहा- “पर मेरा एक बार माता से मिलना बहुत आवश्यक है।"

“ठीक है फिर मैं अपनी दिव्यदृष्टि से माता को ढूंढती हूं।” यह कहकर सुर्वया ने अपनी आँख बंद कर लीं। कुछ देर ऐसी ही अवस्था में रहने के बाद सुर्वया ने अपनी आँखें खोल लीं।

"इस समय माता, ओलंपस पर्वत पर हैं, उनके सामने बहुत से ग्रीक देवता बैठे हैं और उनके साथ वारुणि भी है।"

“ओलंपस पर्वत!” इस बार मेलाइट ने हैरान होते हुए कहा।

"तो फिर मुझे भी तुरंत ओलंपस पर्वत की ओर जाना होगा।” हनुका ने कहा- “पर वह है किस दिशा में?"

तभी मेलाइट ने अपने हाथ से एक अंगूठी निकालकर हनुका को देते हुए कहा- “आप यह अंगूठी ले जाओ, यह आपको ओलंपस पर्वत का दिशा ज्ञान देगा। पर जब आप वहां पहुंच जाओ, तो यह अंगूठी वहां उपस्थित, देवी आर्टेमिस को दे देना। वह इस अंगूठी को पाकर मेरी कुशलता के बारे में जान जायेंगी।"

हनुका ने मेलाइट के हाथ से अंगूठी ले ली और सबसे विदा लेकर महल की छत पर आ गया।

“आप परेशान मत होना राजकुमारी, मैं माता से मिलकर आपकी मदद के लिये अवश्य आऊंगा।” हनुका ने सुर्वया को देखते हुए कहा और पवन वेग से उड़कर हवा में गायब हो गया।

हनुका को अपनी ओर मिलते देख लुफासा का भी चेहरा चमक उठा था।

एक तरफ जहां मकोटा की शक्ति कम हुई थी, वहीं लुफासा की शक्ति बढ़ गई थी।

जारी रहेगा_____✍️
 
#198.

चैपटर-8

खतरनाक पिरान्हा: (तिलिस्मा 5.32)

जेनिथ और तौफीक उत्तर दिशा की ओर चल दिये थे। उन्हें लाउडस्पीकर और स्नेल ढूंढना था।

दोनों मेले में इधर-उधर देखते चले जा रहे थे कि तभी नक्षत्रा ने जेनिथ से पूछा- “क्या हुआ दोस्त? क्या दुश्मन के साथ अच्छा महसूस नहीं कर रही हो?"

“मैं तौफीक के साथ नहीं आना चाहती थी नक्षत्रा।' जेनिथ ने कहा- “अब मैं कितना भी कोशिश कर लूं, फिर भी मुझे, इससे बात करना ही होगा और इससे बात करने के बाद मैं शायद स्वयं पर नियंत्रण ना रख पाऊं। जिसकी वजह से यह कार्य प्रभावित हो सकता है।"

“क्या सच में इस समय तुम्हें कार्य की चिंता है जेनिथ?" नक्षत्रा ने रहस्य भरे स्वर में कहा।

“तुम मेरा दिमाग पढ़ने की कोशिश मत करो नक्षत्रा।" जेनिथ ने कहा- “बिना किसी की इजाजत उसका दिमाग पढ़ना गलत बात होती है।"

“मैं तो तुम्हारे दिमाग को समझने की कोशिश कर रहा हूं जेनिथ।” नक्षत्रा ने कहा- “जिससे सही समय पर तुम्हें सही राय दे पाऊं और सच कहूं तो तुम्हारे दिमाग के किसी कोने में अभी भी तौफीक के लिये प्यार है? चाहे तुम उसे प्रकट करो या ना करो?"

नक्षत्रा के शब्दों ने जेनिथ को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया।

“पता नहीं है ऐसा क्यों है नक्षत्रा? मेरा दिल, मेरे दिमाग के विपरीत क्यों सोच रहा है? मैं स्वयं भी नहीं समझ पा रही हूं इन भावों को।” जेनिथ ने उलझन भरे शब्दों में कहा।

“देखो जेनिथ, तुमने एक लंबा समय तौफीक की अच्छी यादों में बिताया है, जबकि उसके खराब होने का पता तुम्हें अभी कुछ दिन पहले ही लगा है। तो सीधी सी बात है, अच्छी स्मृतियां इस समय बुरी स्मृतियों पर हावी हो रहीं हैं और यह तब तक ऐसे ही चलती रहेंगी, जब तक तौफीक के सामने, यह रहस्य ना खुल जाये कि तुम्हें उसके बारे में सबकुछ पता है। वैसे अगर तुम्हें तौफीक का सही रुप देखना है, तो आज देख सकती हो, क्यों कि रहस्य जानने के बाद आज पहली बार तुम तौफीक के साथ अकेली हो।” नक्षत्रा ने कहा।

जेनिथ को लगा कि नक्षत्रा सही कह रहा है, बार-बार हो रहे इस उलझन को अब सुलझाना बहुत जरुरी था। लेकिन इससे पहले कि जेनिथ तौफीक से कुछ पूछ पाती, तौफीक ने ही जेनिथ से सवाल कर लिया

"जेनिथ, आज हम अकेले हैं, इसलिये मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूं? कुछ ऐसा...जो मैं दूसरों के साथ होने की वजह से कभी पूछ नहीं पाया।"

“पूछो।”

“तुम्हें एकदम से हो क्या गया? तुमने अचानक से मुझसे बात करना बंद कर दिया और तुम्हारा व्यवहार भी मेरे प्रति कुछ बदला-बदला सा लग रहा है मुझे। तौफीक ने एक स्थान पर रुकते हुए कहा।

यह सुन अचानक जेनिथ का चेहरा सपाट हो गया।

“मैं तुम्हारे बारे में सबकुछ जान गई हूं तौफीक।' जेनिथ ने बदले-बदले से स्वर में कहा- “मैं स्वयं किसी और के सामने तुमसे बात नहीं करना चाहती थी और इसी पल का इंतजार कर रही थी।"

"सबकुछ मतलब?” तौफीक के चेहरे के भाव भी परिवर्तित हो गए।

“सबकुछ मतलब मेरे डैड का तुम्हें फंसाना....तुम्हारा मुझसे बदला लेने के लिये लॉरेन का मेरे पास भेजना लॉरेन को मारना फिर लैब इंचार्ज थॉमस को मारना सबकुछ।” जेनिथ ने तौफीक की आँखों में आँखें डालते हुए कहा।

यह सुन तौफीक के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये।

“कैसे? यह कैसे संभव हुआ? और वह भी इस जंगल में।” तौफीक ने पूछा।

“सभी की तरह मुझे भी मायावन में एक शक्ति मिली, जिसने समय को पीछे कर मुझे सबकुछ दिखाया। उसी से मुझे तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया।" जेनिथ बोल तो रही थी, परंतु पूरी तरह से सतर्क भी थी।

“फिर तुम्हें क्या लगा कि मैंने सही किया या गलत?” तौफीक ने पूछा।

"सही का तो प्रश्न ही नहीं उठता हर हाल में गलत किया मेरे साथ भी और लॉरेन के साथ भी।" जेनिथ ने गुस्से में कहा।

"फिर तुमने मेरे बारे में कैप्टेन को कुछ बताया क्यों नहीं?" तौफीक के चेहरे पर उलझन के भाव दिखाई दिये।

“क्यों कि मैं तुम्हारे नेचर को सही से समझ ही नहीं पा रही थी।” जेनिथ ने कहा- “मुझे पता चल गया कि मेरे डैड ने देश से गद्दारी की थी। पर तुम उनके साथ ना मिलकर, लगातार देश की सेवा करते रहे। यहां तुम्हारा नेचर एक देशभक्त का दिखाई देता है। मेरे डैड ने तुम्हें देशद्रोह के इल्जाम में फंसा दिया, यहां तुमने उनसे बदला लेने का सोचा। इस स्थान पर मुझे मेरे डैड ही गलत लगे, इसलिये तुम्हारा ये सब करना मुझे गलत नहीं लगता।

"लेकिन जब तुमने लॉरेन और थॉमस को मारा, तो फिर तुम गलत दिखाई देने लगे। फिर तुमने इस जंगल में आकर एक नहीं बल्कि अनेकों बार हम सबकी जान बचाई। अब यहां तुम मुझे फिर से सही दिखने लगे।...बस यही वजह थी कि मैंने कैप्टेन से तुम्हारे बारे में नहीं बताया। मेरे दिमाग में स्वयं तुम्हारे लिये बहुत सी उलझन थी, जिसे मैं आज तक खुद भी समझ नहीं पा रही थी।"

“मैं गलत इंसान नहीं था, पर तुम्हारे डैड ने जैसा मेरे साथ किया। उस पर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं इसी बात पर उन्हें सबसे ज्यादा दर्द पहुंचाना चाहता था। इसी लिये मैं तुम्हारे पीछे यहां पर आया था। पर यहां आने के बाद तुम्हारा नेचर देखकर मुझे तुमसे प्यार हो गया। यही बात लॉरेन को पता चल गई थी, इसलिये वह तुमसे सारी बातें बता देना चाहती थी। मुझे लगा कि अगर उसने सबकुछ तुम्हें बता दिया, तो तुम मुझसे दूर चली जाओगी, इसलिये मैंने लॉरेन को मार दिया। आर्थर भी मेरा राज जान गया था, इसलिये मुझे उसे भी मारना पड़ा। पर इसके बाद जब हम मायावन में पहुंचे, तो मुझे मेरी गलती का अहसास हो गया।

“उसके बाद मैंने कभी भी किसी को मारने की कोशिश नहीं की, बल्कि लोगों को बचाया ही है।...अब इसके बाद मुझे तुमसे सिर्फ एक ही चीज कहनी है जेनिथ...जैक और जॉनी ने भी किसी को मारा था, पर कैप्टेन ने उन्हें माफ कर दिया था। यहां तक कि क्रिस्टी ने भी अपना बदला लेने के लिये जैक को आग में धकेल दिया था, कैप्टेन ने उसे भी कुछ नहीं कहा...जानती हो क्यों?...क्यों कि अब हमारी सारी बातें, सारे बदले... इन सबका कोई महत्व नहीं....बचा है हमने इस मायावन में ऐसी-ऐसी चीजें देख ली हैं कि अब हमारी दुनिया, हमारे विचार सबकुछ बदल गये हैं। इसलिये हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैं अब जिंदगी की एक नई शुरुआत करना चाहता हूं।

“सुनकर अच्छा लगा तौफीक कि तुमने अपनी गलती मानी और एक नयी जिंदगी की शुरुआत करने जा रहे हो..पर इस नई जिंदगी में मैं तुम्हारा कभी भी साथ नहीं दे सकती ...हां एक बात का वचन अवश्य देती हूं, कि मैं तुम्हारे “सुप्रीम” के रहस्य को कभी भी कैप्टेन या किसी और के सामने नहीं बताऊंगी। सबके साथ आज मैंने भी यही समझ लिया कि सुप्रीम का कातिल सुप्रीम के साथ ही मर चुका है।...और अच्छा लगा कि तुमने मुझसे बात किया क्यों कि अब मेरे दिमाग पर छाई धुंध पूरी तरह से साफ हो चुकी है।“ यह कहकर जेनिथ ने अपने बदन को ढीला कर एक जोर से साँस छोड़ी- “अब सबकुछ साफ हो गया है, तो थोड़ा काम पर भी ध्यान दे लें।"

तौफीक ने धीरे से अपना सिर हिलाया और इस प्रकार से जेनिथ को देखा जैसे कोई चकोर पंछी आसमान में मौजूद चाँद को देखता है। अब दोनों आगे की ओर बढ़ गये।

"तो फाइनली...अब तुम सिंगल हो।” नक्षत्रा ने जेनिथ से कहा।

“हां नक्षत्रा, थैंक यू सो मच, तुम्हारे कारण ही आज मुझे, बहुत दिनों के बाद हल्का महसूस हो रहा है।' जेनिथ ने कहा।

“तो फिर अब मैं तुम्हारे लिये रिश्ता ढूंढना शुरु करुं?" नक्षत्रा ने हंसते हुए कहा।

"इस जंगल में?" जेनिथ ने कहा।

"हां...इस जंगल में भी युगाका जैसे सुंदर लड़के, अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते घूम रहे हैं...बस वैसा ही कोई लड़का देखकर तुम्हारी सेटिंग करवा दूंगा। नक्षत्रा ने जेनिथ से मजा लेते हुए कहा।

“युगाका...ईयू....वो तो अपने घमंड में ही घूमता रहता है...कोई और हो तो बताओ।" जेनिथ ने भी मजा लेते हुए कहा।

“तुम्हें कैसा लड़का चाहिये?..मुझे बता दो...मैं ढूंढता रहूंगा।"

"तुम्हारे जैसा...जो बिना कहे मेरे अहसास को समझ सके...जिससे मेरे विचार मिलते हों...जो एक दोस्त की तरह मेरे साथ रहे और मुझे खूब प्यार करे।” जेनिथ ने अपनी डिमांड रखते हुए कहा।

“फिर तो लड़का दूसरी आकाशगंगा का ही ठीक रहेगा। पृथ्वी पर ये वैराइटी मिलना बहुत मुश्किल है।" नक्षत्रा ने कहा।

“हां...हां...तो मुझे कौन सी जल्दी है। तब तक तो तुम मेरे साथ हो ही। ढूंढते रहना आराम से।” जेनिथ ने कहा और आगे की ओर बढ़ गई।

तभी तौफीक को एक जगह पर, मेले में मछलियों की प्रदर्शनी दिखाई दी। यह देख तौफीक ने जेनिथ को उधर चलने का इशारा किया।

जेनिथ तौफीक के साथ उस दिशा में आ गई। वहां एक बड़ा सा द्वार बना था और उस द्वार पर लिखा था- “फिशवर्ल्ड"।

फिशवर्ल्ड के आगे की ओर एक लाउडस्पीकर लगा था, जिससे काफी तेज आवाजें वातावरण में गूंज रहीं थीं। बहुत से लोग एक-एक करके फिशवर्ल्ड के दरवाजे में प्रवेश कर रहे थे।

"तौफीक लाउडस्पीकर तो यहीं पर है। हो सकता है कि स्नेल भी यहीं पर हो?” जेनिथ ने कहा- “हमें अंदर चलकर देखना होगा और लाउडस्पीकर को भी हम वापसी में उठा लेंगे।'

तौफीक ने जेनिथ की बात सुन धीरे से अपना सिर हिलाया और जेनिथ को ले उस दरवाजे में प्रवेश कर गया।

दरवाजे के अंदर एक लंबी सी सुरंग थी, जिसके दोनों ओर काँच की दीवारें थीं। उन दीवारों के पार अलग-अलग प्रकार की बहुत सी मछलियां घूम रहीं थीं।

सभी लोग उन मछलियों को देखते हुए आगे की ओर बढ़ रहे थे।

जेनिथ और तौफीक की निगाहें भी अब फिशटैंक में चारो ओर घूम रही थी। कुछ आगे बढ़ने के बाद ही जेनिथ को, एक फिशटैंक के अंदर स्नेल दिखाई दिया, पर वह नकली था और उसके आसपास सैकड़ों की संख्या में पिरान्हा मछलियां घूम रहीं थीं, जो कि बीच-बीच में दर्शकों के सामने अपने दाँतों का विज्ञापन भी दे रहीं थीं।

“यह स्नेल तो फिशटैंक के अंदर है और ऊपर से इस फिशटैंक में पिरान्हा मछलियां हैं, जो अपने खतरनाक स्वभाव के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।” जेनिथ ने कहा- “ऐसे में हम इस फिशटैंक से स्नेल को कैसे निकाल पायेंगे?

“तुम सही कह रही हो जेनिथ। इस फिशटैंक से स्नेल को निकालना बहुत ही मुश्किल है, पर फिर भी हमें किसी ना किसी प्रकार से यह करना ही होगा? इसके बिना तिलिस्मा का यह द्वार नहीं पार होगा।" तौफीक ने कहा- “चलो इस फिशटैंक के दूसरी ओर चलकर, इसके अंदर घुसने का दरवाजा ढूंढते हैं।" यह कहकर तौफीक, जेनिथ के साथ उस फिशटैंक के पीछे की ओर चल दिया।

पीछे की ओर छत पर जाने के लिये सीढ़ियां बनी थीं। जेनिथ और तौफीक सीढ़ियां चढ़कर फिशवर्ल्ड के ऊपरी हिस्से में आ गये। छत के उस हिस्से की पूरी जमीन काँच की ही बनी थी। जहां से फिशटैंक में नीचे जाने के लिये ढक्कन लगे थे।

शायद इन्हीं ढक्कनों को हटाकर सभी मछलियों को खाना दिया जाता था। उन ढक्कनों के नीचे लोहे की सीढ़ियां भी लगीं थीं।

कुछ ही देर में तौफीक और जेनिथ, उस फिशटैंक के पास पहुंच गये, जिसके अंदर स्नेल था।

तौफीक ने उस फिशटैंक का ढक्कन खोल दिया। ढक्कन के खुलते ही सभी पिरान्हा मछलियां खुले ढक्कन के पास आकर खड़ी हो गईं। शायद उन्हें लगा कि उनके लिये खाना आया है?

"हममें से किसी ना किसी को तो इस फिशटैंक में उतरना ही होगा? बिना उतरे हम स्नेल को नहीं पा सकेंगे।" जेनिथ ने कहा।

“ठीक है, फिर मैं पानी में उतरूंगा।” तौफीक़ ने कहा।

"नहीं तौफीक, मेरे घावों को नक्षत्रा ठीक कर सकता है, इसलिये पानी में मुझे उतरना होगा।” जेनिथ ने कहा।

"देखो जेनिथ ये पिरान्हा मछलियां हैं। माना कि वह इस जगह पर बहुत ज्यादा संख्या में नहीं हैं, पर फिर भी इनके आक्रमण करने का तरीका बहुत तेज और खतरनाक होता है। मुझे नहीं लगता कि इतनी तेजी से नक्षत्रा तुम्हें ठीक कर पायेगा? इसलिये मुझे ही फिशटैंक में उतरने दो।” तौफीक ने जिद करते हुए कहा- “मेरे अब जीने या मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कम से कम इसी बहाने कुछ पाप तो कम होंगे?"

"तौफीक सही कह रहा है जेनिथ।” नक्षत्रा ने कहा “मुझे भी लगता है कि पिरान्हा से बचना इतना आसान नहीं होने वाला...और फिर एक आखिरी बार तौफीक की परीक्षा भी लेकर देख लो, कि उसने अभी कुछ देर पहले जो बोला था, वह सही था या फिर बस उसने अपने बचने के लिये बोला था।'

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ ने कुछ नहीं कहा, वह बस इधर-उधर देखने लगी।

तभी जेनिथ की नजर, एक बड़े से लकड़ी के डिब्बे के पीछे बंधे एक जंगली सुअर पर गई, जो कि बेहोशी की हालत में वहां पड़ा था। यह देख जेनिथ उस सुअर के पास जा पहुंची।

जेनिथ ने सुअर को खोला और उसे घसीटते हुए लेकर, फिशटैंक के ढक्कन के पास आ गई।

तौफीक ध्यान से जेनिथ की ओर देख रहा था। उसे समझ आ गया था कि जेनिथ क्या करना चाहती है?

“देखो तौफीक, तुम अपनी श्रेष्ठता कई बार सिद्ध कर चुके हो। अब जरुरी नहीं है कि हर बार तुम अपने आप को साबित करो। हमें इस तिलिस्मा को तोड़ने के लिये, सभी की जरुरत है, इसलिये अब मैं कैप्टेन सुयश की तरह सोचते हुए, रिस्क लिये बिना इस कार्य को अंजाम देने के बारे में सोच रही हूं।”

जेनिथ ने इस बार नक्षत्रा को आश्चर्य में डाल दिया क्यों कि इस बार जेनिथ बिना सोचे हुए बोल रही थी।

नक्षत्रा समझ ही नहीं पा रहा था कि जेनिथ क्या करने जा रही है? तभी जेनिथ ने उस जंगली सुअर को फिशटैंक में धकेल दिया।

सुअर के फिशटैंक में गिरते ही सभी पिरान्हा मछलियां उस सुअर की ओर झपटीं। बस इसी समय बिना कुछ सोचे समझे जेनिथ ने फिशटैंक में छलांग लगा दी।

एक पल के लिये तो नक्षत्रा को भी कुछ समझ में नहीं आया, पर फिर नक्षत्रा ने अपने दिमाग को नियंत्रित कर पूरी तरह से जेनिथ पर ध्यान देना शुरु कर दिया।

जेनिथ ने पानी में तेज डाइव मारी और उस फिशटैंक की तली की ओर चल दी। सभी पिरान्हा मछलियों का ध्यान इस समय पूरी तरह से सुअर पर था, वह तेजी से सुअर को नोच रहीं थीं।

फिशटैंक काफी बड़ा था, पर जेनिथ किस कुशल तैराक की भांति 10 सेकेण्ड में ही फिशटैंक की तली में पहुंच गई।

जेनिथ ने स्नेल को अपने हाथ में उठाया और वापसी के लिये पलटी। पर पलटते ही उसकी साँस अटक गई।

इन 10 सेकेण्ड में सभी पिरान्हा मछलियों ने सुअर को खत्म कर दिया था और अब वह सभी उसके पीछे खड़ी खूनी नजरों से जेनिथ को निहार रही थीं।

तौफीक ने भी इस दृश्य को ऊपर से देखा और बिना कुछ सोचे समझे फिशटैंक के अंदर कूद गया।

अंदर कूदते ही तौफीक ने अपनी जेब से चाकू निकालकर अपने हाथों में ले लिया था। और इससे पहले की कोई और कुछ समझ पाता, तौफीक ने चाकू से अपना हाथ एक जगह से काट लिया।

हाथ के कटते ही फिशटैंक में तौफीक का खून फैलने लगा। और इसी के साथ खून की गंध पाकर सभी पिरान्हा मछलियां जेनिथ को छोड़ तौफीक पर टूट पड़ीं।

यह देख जेनिथ सकते की सी हालत में आ गई। एक पल के लिये उसे समझ में नहीं आया कि अब उसे ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिये?

तभी तौफीक ने आखिरी बार हाथ हिलाकर जेनिथ को फिशटैंक से बाहर जाने को कहा। पर जेनिथ जैसे मूर्ति बन गई थी। वह बस तौफीक को ही निहारे जा रही थी।

इससे पहले कि कोई और दुर्घटना घटती, जेनिथ का शरीर अपने आप हवा में उछला और पानी के ढक्कन से होता हुआ बाहर आकर गिरा।

बाहर आते ही जेनिथ ने पलटकर अपने पीछे की ओर देखा, पर उसे कोई नजर नहीं आया? अब जेनिथ की निगाह तौफीक की ओर गई, पर....पर अब उस स्थान पर तौफीक का कंकाल नजर आ रहा था।

खूनी मछलियों ने तौफीक के माँस का एक-एक टुकड़ा खा लिया था। जेनिथ लगातार अब पानी में तैर रही तौफीक की हड्डियों को देख रही थी।

यह नजारा देख जेनिथ बिल्कुल स्थिर हो गई, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह इस घटना को कैसे व्यक्त करे? एक पल के लिये ही सही पर जेनिथ के दिल में तौफीक के लिये बहुत सम्मान के भाव आ रहे थे।

“अपने आपको नियंत्रित करो जेनिथ। तौफीक अब मर चुका है।” नक्षत्रा ने जेनिथ से कहा- “उसने अपना बलिदान देकर तुम्हें बचा लिया है। अब तुम उसका बलिदान व्यर्थ ना जाने दो और यह स्नेल लेकर वापस तिलिस्मा की ओर बढ़ो।"

नक्षत्रा के शब्द सुन जेनिथ को जैसे होश आया। वह उठकर खड़ी हो गई और धीरे-धीरे वापसी की ओर चल दी।

पर उसके कदमों की लड़खड़ाहट साफ देखी जा सकती थी।

वैसे तो उसे पिछले कुछ समय से, तौफीक से प्यार नहीं नफरत थी, पर जाने क्यों आज उसे तौफीक के लिये बहुत बुरा लग रहा था। वह तौफीक के लिये रोना चाहती थी, फिर भी रो नहीं पा रही थी।

उधर डेल्फानो का युवराज ओरस उर्फ नक्षत्रा, जेनिथ के लॉकेट रुपी, विशाल ब्लैकून की एक प्रयोगशाला में अपना सिर पकड़े बैठा था।

वह तो कुछ भी समझ नहीं पा रहा था? वह इस समय अपने आप से ही बड़बड़ाकर बात कर रहा था _

“कैसे हैं यह मनुष्य? और कैसी हैं इनकी भावनाएं? इनकी भावनाएं तो बहुत ही पवित्र हैं और इस तिलिस्मा...से ज्यादा उलझी हुई हैं। क्या…क्या मैं इनकी भावनाओं को कभी पूरी तरह से समझ पाऊंगा? क्यों कि इसको समझे बिना, मैं ब्रह्मांड के रहस्य को कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाऊंगा?"

यह सोच ओरस अपनी जगह से उठा और एक मशीन के पास पहुंचकर, अपने इन अनुभवों को उसमें रिकार्ड करने लगा।

जारी रहेगा_____✍️
 
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