Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 36 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#172.

चैपटर-12

ग्रीष्म ऋतु-2: (तिलिस्मा 4.2)

सुयश सहित सभी लोग 41 नंबर पर खड़े थे। 50 नंबर पर यूरेनस ग्रह चक्कर लगा रहा था।

41 से 50 के बीच बहुत ही गर्म सा कोई द्रव भरा हुआ नजर आ रहा था, जिसमें 41 वाली साइड एक नाव खड़ी थी।

“यह तो कोई आसान सा कार्य लग रहा है, क्यों कि हमें उस पार जाने के लिये पानी में एक बोट भी दी गई है।” ऐलेक्स ने कहा।

“तिलिस्मा में कोई कार्य आसान नहीं है।” क्रिस्टी ने उस बोट को देखते हुए कहा- “जरुर कैश्वर ने इस कार्य में भी कोई ना कोई पेंच डाल रखा होगा?”

तभी उस द्रव से धुंए की एक लकीर उठी और उसने हवा में एक नयी कविता लिख दी-

“जिसमें रहती उसी को खाए,

फिर भी नाव को पार लगाये।”

“अब इस पहेली का क्या मतलब हुआ?” जेनिथ ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

कुछ देर तक सभी इस पहेली का मतलब समझने की कोशिश करते रहे, परंतु जब काफी देर तक किसी को कुछ समझ में नहीं आया, तो तौफीक बोल उठा- “मुझे नहीं लगता कि हमें अभी इतना दिमाग लगाने की जरुरत है कैप्टेन....अगर हमारे सामने एक नाव खड़ी है, जो इस गर्म द्रव से बचाकर हमें उस पार पहुंचा सकती है, तो पहले हमें उसमें बैठकर उस पार पहुंचने की कोशिश करनी चाहिये, अगर हमें कोई परेशानी आती है, तब हमको इतना सोचना चाहिये, बिना पानी में उतरे, हम कुछ खास सोच नहीं पायेंगे, क्यों कि हमें पता ही नहीं है कि हमें सोचना क्या है?”

तौफीक की बात सभी को सही लगी, इसलिये सभी उतर कर नाव में बैठ गये।

नाव के दोनों ओर बैठने की लिये सीट लगीं थीं। सभी उन सीटों पर बैठ गये।

नाव में एक 2 फुट का धातु का पैन (किचन में कार्य में लाया जाने वाला एक बर्तन) रखा था, जिसे तौफीक ने चप्पू समझ हाथ में उठा लिया, पर जब तौफीक ने पैन को उस द्रव में डालकर नाव को चलाने की कोशिश की, तो वह पैन उस नाव को हिला भी नहीं पाया।

“कैप्टेन यह तो बहुत ही गाढ़ा द्रव है, हम इस अकेले पैन से इस नाव को नहीं चला सकते।” तौफीक ने सुयश को देखते हुए कहा- “ऊपर से यह गर्म बहुत दिख रहा है, ऐसे में हम इसमें हाथ भी नहीं डाल सकते, तो फिर हम इस नाव को चलायेंगे कैसे?”

“तुमने कहा तो था तौफीक कि नाव में बैठने के बाद ही हमें असली समस्या का पता चलेगा, लो अब पता चल गयी असली समस्या। असली समस्या इस नाव को चलाने की है।” सुयश ने कहा- “अब हमें एक बार फिर ध्यान से इस नाव को उस पहेली से मैच कराना होगा, तभी इस समस्या से हमें छुटकारा मिलेगा।”

“कैप्टेन अंकल, बाहर जो द्रव दिखाई दे रहा है, मैं बहुत देर से उसे पहचानने की कोशिश कर रही हूं, अब मुझे उसकी गंध से पता चल गया कि वह द्रव असल में मोम है।”

“मोम????” मोम शब्द सुनते ही अचानक से सुयश को झटका लगा, अब वह कुछ सोच में पड़ गया।

कुछ देर सोचते रहने के बाद सुयश नाव की सीट से खड़ा हुआ और ध्यान से उस नाव का अगला हिस्सा देखने लगा। नाव का अगला हिस्सा देखने के बाद सुयश ने तौफीक के हाथ से वह पैन ले लिया और उसे देखने लगा।

पैन को देखने के बाद अब सुयश के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई और वह बोला- “मिल गया इस पहेली का हल।”

सुयश की बात सुन सभी सुयश की ओर देखने लगे।

“इस पहेली की पहली पंक्ति हैं कि ‘जिसमें रहती उसी को खाए’ यानि की मोमबत्ती का धागा.....मोमबत्ती का धागा, जिसमें रहता है, उसी को खाता है, पहेली की दूसरी पंक्ति है “फिर भी नाव को पार लगाये’ यानि

की हम इस नाव को मोमबत्ती से चला सकते हैं।” सुयश ने कहा।

“मोमबत्ती से?” क्रिस्टी आश्चर्य से सुयश का चेहरा देखने लगी- “मोमबत्ती से नाव कैसे चलेगी कैप्टेन?”

“चलेगी।....लगता है कि तुमने अपने बचपन में ‘पॉप-पॉप बोट’ नहीं चलाई है क्रिस्टी।” सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा - “पॉप-पॉप बोट को हम मोमबत्ती के द्वारा भाप बनाकर चलाते थे।....रुको मैं तुम्हें यह करके दिखाता हूं।”

“मैं आपकी बात समझ गया कैप्टेन।” तौफीक ने सुयश को देखते हुए कहा- “मैंने बचपन में यह बोट चलाई है, पर आप यह बताइये कि हमारे पास ना तो यहां मोमबत्ती में लगाने वाला कोई धागा है और ना ही आग.... फिर हम मोमबत्ती बनायेंगे कैसे?”

“बताने की जगह मैं करके दिखाता हूं।” यह कहकर सुयश ने पैन को उस द्रव में डालकर उसे मोम से भर लिया।

मोम अभी गीला था, यह देखकर सुयश ने अपनी जेब से वह डोरी निकाल ली, जो खोपड़ी की माला में बंधी थी, उस डोरी को अभी तक सुयश ने फेंका नहीं था।

सुयश ने उस डोरी को उस पैन के एक किनारे पर द्रव में डाल दिया। कुछ ही देर में मोम सूख गया। अब वह पैन एक मोमबत्ती का रुप धारण कर चुका था।

सुयश ने अपने बैग से अब 2 पत्थरों को निकाला और उन्हें रगड़ कर उनसे आग बना ली। सुयश ने इस आग से मोमबत्ती रुपी पैन को जला लिया और उसे नाव के अगले भाग में रख दिया।

कुछ ही देर में नाव के पीछे मौजूद पाइप से ‘फट्-फट्’ की आवाज निकलने लगी और नाव सभी को लेकर दूसरी दिशा की ओर चल दी।

दूसरी दिशा से कुछ पहले ही सुयश ने पैन को नाव से हटा दिया, जिससे नाव उन सभी को दूसरी ओर पहुंचा कर बंद हो गई। सभी उतरकर 50 नंबर पर खड़े हो गये।

“वाह! यह कार्य तो कैप्टेन के रहते आसान बन गया।” क्रिस्टी ने सुयश की तारीफ करते हुए कहा- “पर ये बताइये कैप्टेन, कि आपने यह पत्थर कब अपने बैग में रख लिये। क्यों कि जब अलबर्ट सर ने हमें आग से बचाया था, उस समय तो हमारे पास कुछ जलाने के लिये था ही नहीं। तभी अलबर्ट सर ने अपने चश्में से आग जलाई थी।”

“बस उसी घटना के बाद से मुझे समझ आ गया था कि आग की जरुरत हमें कहीं भी पड़ सकती है, इसलिये मैंने रास्ते में एक जगह से यह 2 पत्थर उठा लिये थे।” सुयश ने कहा।

“पर कैप्टेन, नाव तो लकड़ी की थी, फिर आपके आग लगाने से वह जली क्यों नहीं?” जेनिथ ने पूछा।

“पूरी नाव लकड़ी की थी, पर नाव का आगे का ऊपरी हिस्सा टिन से बना था, पर वह टिन का रंग लकड़ी की भांति था, मैंने सबसे पहले यही तो चेक किया था और उस टिन के हिस्से से 2 पतली धातु की पाइप नाव के पिछले हिस्से की ओर जा रही थी। बस इसी को देख मैं पहेली का मतलब समझ गया था।” सुयश ने कहा।

“पर एक बात कमाल की है कैप्टेन।” ऐलेक्स ने कहा- “आपने जो खोपड़ी की माला का धागा अभी तक बचा कर रखा था, कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह तिलिस्मा में कहीं हमारे काम भी आ सकता है।”

“मैंने जबसे यह सुना था कि तिलिस्मा में कोई चमत्कारी शक्ति काम नहीं करेगी, तभी से हर छोटी से छोटी चीज को अपने बैग में जमा करना शुरु कर दिया था। क्यों कि मुझे पता है कि हर छोटी से छोटी चीज कभी तो काम आती है।” सुयश ने सभी को देखते हुए जवाब दिया।

“आप इतनी छोटी से छोटी चीज पर ध्यान कैसे दे लेते हैं कैप्टेन?” तौफीक ने सुयश से सवाल किया।

“सुयश, शायद इतनी छोटी से छोटी चीज पर कभी ध्यान नहीं देता, पर आर्यन ने तो अपनी जिंदगी के 10 बहुमूल्य वर्ष, वेदालय में यही सब तो किया था, माना कि अभी यादें थोड़ी धुंधली हैं, पर हैं तो मेरे ही दिमाग

में।” सुयश ने अतीत काल में एक डुबकी लगाते हुए जवाब दिया।

सभी अब 51 नंबर पर जाकर खड़े हो गये। 60 नंबर पर शनि ग्रह नाचता दिखाई दे रहा था।

51 से 60 के बीच में लावा फैला हुआ दिखाई दे रहा था। वहां पर पास में 2 लंबे से धातु के पतले खंभे रखे थे, जिनके ऊपर के सिरे पर लगभग, 4 फुट की ऊंचाई पर एक छोटा सा बेस बना था।

देखने पर वह खंभे किसी सर्कस के जोकर वाले खंभे दिख रहे थे, जो कि जोकर अपने पैर में बांधकर चलने के लिये प्रयोग में लाते हैं।

“यह खंभे तो स्टिल्ट वॉकिंग के लिये प्रयोग किये जाते हैं” जेनिथ ने कहा- “आज के समय में बहुत से देशों में स्टिल्ट वॉकिंग की प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं।”

एक बार फिर सभी को हवा में लावे से लिखी 2 पंक्तियां दिखाई दीं।

“आगे चलो तो मंजिल भागे,

उल्टा चलो आ जाओ आगे।”

“लगता है कि इस बार इन खंभों के माध्यम से हमें उस पार जाना होगा।” ऐलेक्स ने कहा- “अब ये कार्य हममें से कौन आसानी से कर सकता है?”

ऐलेक्स की बात सुनते ही सभी की निगाहें स्वतः ही क्रिस्टी की ओर चलीं गईं क्यों कि ऐसे कार्य में तो वही सिद्धहस्त थी।

सभी को अपनी ओर देखते पाकर क्रिस्टी ने उन खंभों को उठाकर उनके वजन का अंदाजा लगाया और एक खंभे को लावे में डालकर देखा। पता नहीं वह खंभा किस धातु का बना था? कि लावे में डालने पर भी उस खंभे का कुछ नहीं हुआ?

अब क्रिस्टी ने दूसरा खंभा भी लावे में डाल दिया और उछलकर एक खंभे पर अपना बांया पैर रख लिया, क्रिस्टी ने दूसरे खंभे को भी अपने हाथों से नहीं छोड़ा था।

एक खंभे पर अपने शरीर का बैंलेस बनाने के बाद क्रिस्टी ने अपना दाहिना पैर दूसरे खंभे पर रख दिया।

अब क्रिस्टी के दोनों पैर 2 खंभों पर थे और वह पूरी तरह से उन दोनों खंभों के सहारे खड़ी थी।

क्रिस्टी ने अब अपना बांया पैर धीरे से हवा में उठा कर उस खंभे को आगे बढ़ाया।

एक बार अच्छी तरह से बैंलेस बन जाने के बाद अब क्रिस्टी ने अपना दाहिना पैर हवा में उठाकर दाहिनी ओर वाले खंभे को भी आगे बढ़ाया। इस प्रकार क्रिस्टी किसी सर्कस के अभ्यस्त जोकर की तरह आगे बढ़ने लगी।

तभी क्रिस्टी को वह दोनों खंभे धीरे-धीरे गर्म होते हुए महसूस हुए, पर मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं थी इसलिये क्रिस्टी लगातार आगे बढ़ती रही।

अब क्रिस्टी की दूरी 60 नंबर से मात्र 15 फुट ही बची थी, क्रिस्टी ने फिर से अपने पैर को आगे बढ़ाया, क्रिस्टी के आगे बढ़ने के बाद अब उस दूरी को घट जाना चाहिये था, पर आश्चर्यजनक तरीके से वह दूरी घटी ही नहीं।

यह देख क्रिस्टी आश्चर्य से भर उठी। उसने फिर से अपना पैर आगे बढ़ाया, पर क्रिस्टी को एक बार फिर दूरी उतनी ही दिखाई दी।

“कैप्टेन, कुछ गड़बड़ है, मैं बार-बार आगे बढ़ रही हूं, पर मैं जितना आगे बढ़ती हूं, मेरे सामने की दूरी उतनी ही मुझसे दूर जा रही है।” क्रिस्टी ने घबरा कर कहा- “इधर मेरे हाथ में मौजूद खंभे भी लावे की वजह से लगातार गर्म होते जा रहे हैं, अगर यही कुछ देर तक चलता रहा तो मैं इस कार्य को पूरा नहीं कर पाऊंगी।”

“मुझे पहले ही पता था कि कुछ ना कुछ गड़बड़ तो होगी ही।” सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें उन कविता की पंक्तियों को ही ध्यान से समझना होगा, उन्हीं पंक्तियों में ही इस पहेली का राज छिपा होगा?”

“कैप्टेन इन कविता की पंक्तियों के हिसाब से तो मुझे इन खंभो के साथ उल्टा चलना होगा, पर उल्टा चलकर इन खंभों पर बैंलेस बनाना कैसे संभव है?” क्रिस्टी ने कहा।

“तुम कर सकती हो क्रिस्टी ” ऐलेक्स ने चीखकर क्रिस्टी का हौसला बढ़ाया- “तुम हममें से सबसे अलग हो इसी लिये तिलिस्मा ने तुम्हें चुना है, मुझे पता है कि तुम यह कर सकती हो। अब अपने डर को छोड़ो और जल्दी कोशिश करो, नहीं तो यह लावा तुम्हारे खंभे के द्वारा तुम्हारा हाथ जलाना शुरु कर देगा, फिर यह कार्य बिल्कुल असंभव हो जायेगा।”

क्रिस्टी ने ऐलेक्स के शब्दों को सुना और धीरे-धीरे अपना बैलेंस बनाकर मुड़ गयी।

अब क्रिस्टी की नजरें ऐलेक्स से मिलीं और क्रिस्टी के चेहरे पर एक विश्वास की झलक दिखने लगी।

क्रिस्टी ने धीरे-धीरे अपना एक कदम पीछे की ओर बढ़ाया, क्रिस्टी का यह प्रयास सफल रहा, अब क्रिस्टी की दूरी मात्र 10 फुट ही पीछे की ओर बची थी।

पर अब खंभे इतने ज्यादा गर्म हो गये थे कि क्रिस्टी का उसे पकड़े रह पाना असंभव हो गया। अतः क्रिस्टी ने उन खंभों को अपने हाथ से छोड़ दिया।

अब क्रिस्टी बिना किसी सपोर्ट के उन खंभों पर खड़ी थी। क्रिस्टी ने ऐलेक्स को देख नजरें मिलायीं और मुस्कुरा कर अपना शरीर पीछे की ओर गिरा दिया।

यह देख ऐलेक्स के मुंह से चीख निकल गई- “क्रिस्टी ऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!”

क्रिस्टी का शरीर अनियंत्रित हो कर पीछे की ओर गिरने लगा, पर....पर क्रिस्टी का शरीर लावे में नहीं बल्कि 60 नंबर पर जाकर गिरा क्यों कि क्रिस्टी की दूरी भी 10 फुट बची थी और जमीन से क्रिस्टी की ऊंचाई 11 फुट थी।

क्रिस्टी उठकर खड़ी हो गई और मुस्कुराकर ऐलेक्स की ओर देखने लगी। तभी लावे के ऊपर पुल बन गया और ऐलेक्स भागकर आकर क्रिस्टी से लिपट गया।

“यह तुमने क्या किया था पागल?” ऐलेक्स ने क्रिस्टी को गले से लगाते हुए कहा - “अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

“अरे कैसे हो जाता, मैंने पीछे की दूरी को भांप लिया था और जानबूझकर यह किया था।” क्रिस्टी ने कहा।

“चलो भाई, इन लोगों का मिलन तो चलता रहेगा, हम लोग 61 नंबर पर चलते हैं।” जेनिथ ने दोनों को देख मुस्कुरा कर कहा।

जेनिथ की बात सुनकर दोनों अलग हो गये, पर ऐलेक्स और क्रिस्टी की निगाहें अभी भी एक दूसरे की ओर ही थीं, और उन निगाहों में प्यार का अहसास भी था और दूसरे के प्रति चिंता भी।

कुछ देर बाद सभी 61 नंबर पर खड़े थे। 70 नंबर पर बृहस्पति ग्रह मौजूद था।

61 से 70 नंबर के बीच पूरे रास्ते में 12 इंच लंबे, नुकीले काँटे निकले थे और 61 नंबर के पास पतली लकड़ियों से निर्मित एक सप्तकोण टंगा था।

तभी हवा में फिर एक पहेली लिखी हुई उभरी-

“सात को अठ्ठारह में बांटें,

खत्म करें रास्ते के काँटे।”

“यह किन 7 को 18 में बांटने की बात कर रहा है?” जेनिथ ने दिमाग लगाते हुए कहा- “हम लोग भी नक्षत्रा को मिलाकर 7 ही हैं, कहीं यह हमें बांटने की बात तो नहीं कर रहा?”

“नहीं जेनिथ दीदी, वहां देखिये वह सप्तकोण भी 7 लकड़ी की एक बराबर तीलियों से बना है, मुझे लग रहा है कि कैश्वर इन्हीं तीलियों से कुछ करने को कह रहा है।” शैफाली ने जेनिथ को सप्तकोण दिखाते हुए कहा।

“अगर सप्तकोण की बात हो रही है, तो इसको बांटने के लिये तो इसे तोड़ना होगा।” ऐलेक्स ने कहा।

ऐलेक्स की बात सुन सुयश ने सप्तकोण को उतार लिया, पर जैसे ही सुयश ने सप्तकोण को उतारा, उसकी एक-एक तीलियां जमीन पर बिखर कर अलग हो गईं।

अब शैफाली ध्यान से उन तीलियों को देखने लगी। काफी देर तक देखते रहने के बाद शैफाली ने एक गहरी साँस भरी और जमीन से उठकर खड़ी हो गई।

“क्या हुआ शैफाली?” सुयश ने शैफाली को उठते देख पूछ लिया- “कुछ समझ में आया क्या?”

“कैप्टेन अंकल, मैं आपसे एक प्रश्न पूछती हूं, जो कि मैं अपने स्कूल में अपने सभी दोस्तो से पूछा करती थी।” शैफाली ने सुयश की बात का जवाब दिये बिना उल्टा एक सवाल ही कर दिया।

पर सुयश शैफाली के तर्कों से अच्छी तरह से परिचित था, इसलिये उसने मुस्कुराकर अपना सिर हां के अंदाज में हिला दिया।

सुयश को हां करते देख शैफाली ने बोलना शुरु कर दिया- “कैप्टेन, एक छत पर 30 कबूतर बैठे हैं। आपको उन सभी को 7 बार में उड़ाना है, शर्त यह है कि आपको हर बार विषम संख्या में ही कबूतर को उड़ाना होगा, तो क्या आप बता सकते है कि किस बार में कितने कबूतर आप उड़ायेंगे?”

शैफाली के प्रश्न को सुनकर सभी लोग कबूतर उड़ाने में लग गये, उधर शैफाली अपनी पहेली को सुलझाने लगी।

अजीब सा माहौल था, तिलिस्म के अंदर भी शैफाली ने सबको काम पकड़ा दिया था। लगभग 10 मिनट के बाद शैफाली की आँखें, किसी कारण से चमक उठीं।

उधर सभी अभी तक कबूतर उड़ाने में ही लगे थे।

“आप लोगों से नहीं हो पा रहा होगा, चलिये मैं आपको अपनी पहेली का उत्तर बताती हूं।” शैफाली के यह कहते ही, सभी कबूतर उड़ाना छोड़ शैफाली की ओर देखने लगे।

“कैप्टेन अंकल दरअसल मैंने आपसे जो प्रश्न किया था, उसका कोई उत्तर नहीं है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा - “असल में गणित में 7 विषम अंको के जोड़ का उत्तर कभी ‘सम’ हो ही नहीं सकता, जबकि 30 एक सम संख्या है।”

यह सुनकर ऐलेक्स ने शैफाली के कान पकड़ लिये- “शैतान लड़की ! जब इसका उत्तर था ही नहीं, तो तुमने हम लोगों से यह प्रश्न ही क्यों पूछा? हम लोग बेवकूफों की तरह से तबसे इसका उत्तर ढूंढ रहे हैं।”

“अरे मैं यही तो आप लोगों को समझाना चाह रही थी कि 7 लकड़ियों को कभी भी तोड़कर 18 में नहीं बांट सकते?” शैफाली ने ऐलेक्स के हाथों से अपना कान छुड़ाते हुए कहा।

“तो क्या कैश्वर भी हमें बेवकूफ बना रहा था?” तौफीक ने मुस्कुराते हुए शैफाली से पूछा।

“नहीं...वह हमें बेवकूफ नहीं बना रहा था, बस इस पहेली का उत्तर जरा अलग ढंग से देने के लिये कह रहा था।”

यह कहकर शैफाली ने उन 7 लकड़ियों से रोमन अंको में 18 लिख दिया। (रोमन अंक- XVIII)

इसी के साथ वहां बने काँटें जमीन में समा गये और सभी चलते हुए 70 नंबर को पार कर 71 पर आ गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#173.

पर सभी के चेहरे पर शैफाली की वजह से एक मुस्कान आ गयी थी।

80 नंबर पर ऐस्टेरोयड बेल्ट लिखा था और कुछ पत्थर हवा में नाच रहे थे। 71 से 80 नंबर के बीच में जमीन से लगभग 1 फुट ऊपर, मिट्टी के कण हवा में तैर रहे थे।

उस पूरे रास्ते में ऊपर छत भी बनी थी, जिस पर 1 फुट मोटी पानी की पर्त जमा थी। पर वह पानी जमीन पर गिरने की जगह ऊपर की छत से चिपका हुआ था।

मिट्टी के ऊपर पहेली की नयी पंक्तियां लिखी हुई थीं-

“नीचे मिट्टी ऊपर पानी,

संग मिलें तो बने कहानी।”

“ये कैश्वर तो पूरा कविता कार बन गया है।” ऐलेक्स ने कहा- “कविता मार-मार कर हमें आगे बढ़ा रहा है।”

“मुझे अभी तक तो इस कार्य में कोई खास खतरा नहीं दिख रहा है।” तौफीक ने कहा- “लेकिन पिछले कार्यों को देखते हुए, मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि यह कार्य भी इतनी आसानी से नहीं होगा।”

“कैप्टेन, क्या मैं आगे बढ़कर देखूं कि यहां कैसा खतरा है?” क्रिस्टी ने कहा।

सुयश ने कुछ ना होते देख क्रिस्टी को इशारा कर दिया। क्रिस्टी ने जैसे ही मिट्टी वाले भाग में कदम रखा, वह हवा में लहराती हुई ऊपर छत से जा चिपकी। क्रिस्टी अब पानी से पूरी तरह से भीग गई थी।

“कैप्टेन, इस पूरे क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण नहीं है।” क्रिस्टी ने जोर से आवाज लगाते हुए कहा- “और मैं यहां छत से आ चिपकी हूं, मैं अब स्वयं को छत से अलग भी नहीं कर पा रहीं हूं।”

“इन कविता की पंक्तियों से यह तो साफ है कि मिट्टी और पानी को आपस में मिलाना पड़ेगा, तभी कुछ संभव हो सकता है।” सुयश ने कहा।

“पर यह कैसे संभव है कैप्टेन?” जेनिथ ने कहा- “क्यों कि पानी, छत के गुरुत्वाकर्षण से बंधा है और मिट्टी जमीन पर है, ऐसे में दोनों को मिलाना कैसे संभव है?”

“क्रिस्टी, तुम अपने हाथों से पानी को जमीन की ओर फेंकने की कोशिश करके देखो।” सुयश ने क्रिस्टी को आवाज लगाकर कहा- “हो सकता है कि पानी जमीन तक पहुंच जाये?”

सुयश की बात सुन क्रिस्टी ने अपने हाथों की अंजुलि से, ऊपर का पानी नीचे जमीन की ओर फेंकने की कोशिश की, पर उसके द्वारा फेंके गये पानी का बहुत थोड़ा भाग ही नीचे हवा में तैर रही मिट्टी तक पहुंच

पाया और इतने थोड़े पानी को उस मिट्टी ने ऐसे सोख लिया, जैसे कि वह जन्म-जन्म से प्यासी हो।

पर जितनी मिट्टी ने पानी को सोखा, वह पानी मिट्टी में मिलकर जमीन पर ही रह गया।

उधर क्रिस्टी लगातार पानी को फेंकने की कोशिश कर रही थी, पर कुछ ही देर में क्रिस्टी के हाथ, अब उसका साथ छोड़ने लगे और क्रिस्टी ने थककर पानी फेंकना बंद कर दिया।

“तौफीक और ऐलेक्स तुम्हें भी वहां ऊपर क्रिस्टी की सहायता के लिये जाना पड़ेगा।” सुयश ने ऐलेक्स और तौफीक से कहा- “मुझे ऐसा लग रहा है कि जितनी मिट्टी, पानी से मिक्स हो जा रही है, उस पर जमीन की गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करने लगी है।”

सुयश की बात सुन ऐलेक्स और तौफीक भी मिट्टी के उस क्षेत्र में घुस कर क्रिस्टी के पास ऊपर जा पहुंचे।

अब ऐलेक्स और तौफीक ने भी पानी को अपने हाथों में भर-भर कर मिट्टी पर फेंकना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में मिट्टी का अधिकांश भाग जमीन के गुरुत्वाकर्षण के कारण, पानी से मिक्स होकर नीचे आ गया।

सुयश ने एक इशारे से अब ऐलेक्स और तौफीक को पानी फेंकने से मना कर दिया।

अब जमीन पर मिट्टी, पानी से मिक्स होने की वजह से, कीचड़ की मानिंद नजर आने लगी थी। यह देख सुयश ने अपना एक हाथ धीरे से मिट्टी वाले क्षेत्र में डाला।

सुयश को अपना हाथ हवा में उठता दिखाई दिया। अब सुयश ने वहां पड़ी कीचड़ को हाथ में उठा लिया।

कीचड़ के हाथ में उठाते ही सुयश का हाथ हवा में खिंचना बंद हो गया।

अब सुयश के पास दूसरी ओर जाने का एक तरीका मिल गया था। सुयश ने हाथ आगे बढ़ाकर धीरे-धीरे बहुत सी कीचड़ को अपनी ओर उठा कर रख लिया।

जब काफी कीचड़ इकठ्ठा हो गई, तो सुयश उस कीचड़ को अपने शरीर पर लगाने लगा।

सभी सुयश को यह करते देख रहे थे, पर सभी को सुयश का प्लान समझ आ गया था। कुछ ही देर में सुयश पूरा का पूरा कीचड़ से नहा गया। यह देख सुयश अब आगे बढ़कर मिट्टी वाले क्षेत्र में आ गया।

पर सुयश का शरीर साधारण तरीके से ही काम करता रहा। यह देख सुयश खुश हो गया क्यों कि आखिर उसका प्लान काम कर गया था।

सुयश अब धीरे-धीरे 80 नंबर की ओर बढ़ने लगा। कुछ ही देर में सुयश उस पार पहुंच गया।

सुयश के उस पार पहुंचते ही हवा में लटके ऐलेक्स, क्रिस्टी और तौफीक नीचे आ गिरे और मिट्टी वाला वह स्थान अब सामान्य काम करने लगा। सभी अब उस रास्ते को पार कर 80 नंबर पर आ गये।

तभी छत पर रुका पूरा पानी, एक बौछार की तरीके से सभी पर आकर गिरने लगा और इसी के साथ ऐलेक्स, क्रिस्टी, तौफीक और सुयश के शरीर पर लगी सारी कीचड़ उस पानी से धुल गई।

“ये कैश्वर इतना भी बुरा नहीं है, देखो हमारे नहाने की व्यवस्था भी कर दी उसने।” ऐलेक्स ने खुश होते हुए कहा।

सभी ऐलेक्स की बात सुनकर मुस्कुरा दिये। सभी अब आगे बढ़कर 81 नंबर पर आ गये।

81 नंबर पर 3 फुट का 1 तीर रखा था। 90 नंबर पर मंगल ग्रह था और 81 से 90 नंबर के बीच हवा में एक लाल रंग की गैस विद्यमान थी, जिसे देखने पर ही वह कोई खतरनाक गैस महसूस हो रही थी।

तभी उस लाल रंग की गैस ने हवा में एक पहेली लिखी।

“नहीं गिरे सिर से यह तीर,

चाहे जल जाये तेरा शरीर।”

“ये अब खतरनाक स्टेज है।” ऐलेक्स ने कविता को पढ़ने के बाद अपने होठों को गोल करते हुए कहा- “कविता की पंक्तियों से ही पता चल रहा है कि इस भाग को पार करने में बहुत मुश्किल आने वाली है।”

ऐलेक्स की बात से सभी सहमत थे।

“मुझे लगता है कि इस तीर को सिर पर रखकर इस क्षेत्र को पार करना होगा।” शैफाली ने कहा- “परंतु मुझे यह गैस जहरीली लग रही है और कविता की पंक्तियों में भी शरीर के जलने की बात की गई है।”

कुछ सोच जेनिथ ने अपना हाथ धीरे से उस गैस वाले हिस्से में डालकर देखा। परंतु जैसे ही जेनिथ का हाथ उस गैस के हिस्से में पहुंचा, उसका हाथ बुरी तरह जल गया।

“आह!” जेनिथ ने कराहते हुए अपना हाथ तुरंत अंदर कर लिया।

नक्षत्रा ने तुरंत जेनिथ के जले हुए हाथ को सही कर दिया, पर उस एक पल के अहसास ने ही जेनिथ की जान निकाल दी थी।

“यह गैस बहुत खतरनाक है, हममें से इसे कोई नहीं पार कर सकता।” सुयश ने सभी को देखते हुए कहा।

“मैं पार कर सकती हूं।” जेनिथ ने अपने दाँत को भींचते हुए कहा- “और यकीन मानिये, कैश्वर ने यह भाग मुझे और नक्षत्रा को ध्यान में रखकर ही बनाया है।”

“जेनिथ, माना कि नक्षत्रा ने तुम्हें तुरंत सही कर दिया, पर उस एक पल के लिये मैंने तुम्हारे चेहरे पर दर्द को महसूस किया था, तिलिस्म के इस भाग को पार करने में तुम्हें नर्क से भी भयानक दर्द का सामना करना पड़ेगा और यह दर्द असहनीय हो सकता है।” सुयश ने दर्द भरे स्वर में जेनिथ की ओर देखते हुए कहा।

“कैप्टेन, हमारे पास और कोई चारा भी नहीं है। अगर मैंने इस भाग को पार करने की कोशिश नहीं की, तो हममें से कोई भी इस तिलिस्म से कभी नहीं निकल पायेगा....इसलिये मुझे एक बार कोशिश तो करनी ही

होगी....भले ही मुझे कितने भी दर्द का सामना क्यों न करना पड़े और वैसे भी ईश्वर ने सिर्फ स्त्री को ही असहनीय दर्द से लड़ने की शक्ति दी है।

आपको पता है कैप्टेन कि एक आदमी का शरीर सिर्फ 45 डेल का दर्द सह सकता है, जबकि एक स्त्री का शरीर, बच्चे के जन्म के समय 57 डेल का दर्द सहता है, जो कि शरीर की 20 हड्डियों के टूटने के बराबर होता है। तो आज मैं भी तैयार हूं, इस असहनीय दर्द को सहने के लिये।” (‘डेल’ दर्द मापने की एक इकाई है, जिसे डोलोरी मीटर यंत्र के द्वारा मापा जाता है)

सभी आश्चर्य से जेनिथ का मुंह देख रहे थे, उनके पास जेनिथ से कुछ कहने के लिये शब्द ही नहीं थे, वह बस जेनिथ की हिम्मत को महसूस करने की कोशिश कर रहे थे।

“नक्षत्रा क्या तुम तैयार हो?” जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

“मैं तो हमेशा से तैयार हूं, पर तुम्हारी इन भावनाओं का मेरे पास भी कोई जवाब नहीं है, मुझे भी समझ नहीं आ रहा कि मैं तुम्हें क्या कहूं....मैं आज मान गया कि इस समूचे ब्रह्मांड में जितने भी जीव हैं, मनुष्य उन सबसे भावनाओं के मामले में सर्वश्रेष्ठ है। आज मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मैंने तुम्हें चुना।” नक्षत्रा ने कहा- “चलो जेनिथ, ये तुम्हारी ही नहीं, मेरी भी परीक्षा है, मुझे भी आज यह देखना है कि मैं किस गति से तुम्हारे शरीर को सही कर सकता हूं।”

यह सुन जेनिथ उस गैस वाले क्षेत्र में उतर गई। जेनिथ के उस क्षेत्र में उतरते ही गैस ने जेनिथ के पूरे शरीर को जलाना शुरु कर दिया।

एक असहनीय दर्द जेनिथ के शरीर में दौड़ गया। एक पल को तो जेनिथ का शरीर डगमगा भी गया, पर तुरंत ही जेनिथ ने अपने दाँतों को पूरी ताकत से भींचकर आगे बढ़ गयी।

जेनिथ के शरीर से खाल झूलने लगी, उसका चेहरा भी बुरी तरह से जल गया। नक्षत्रा पूरी ताकत से जेनिथ के शरीर के जख्मों को भरने की कोशिश कर रहा था, पर गैस का कहर निरंतर जारी था।

जेनिथ के कदम लड़खड़ा रहे थे, पर वह हार नहीं मान रही थी। सुयश और क्रिस्टी तो यह दृश्य देख ही नहीं पा रहे थे, उन्होंने अपना चेहरा दूसरी दिशा में कर लिया।

इस समय सभी की आँखों में जेनिथ के लिये आँसू थे, यहां तक कि तौफीक की भी.....पता नहीं क्यों आज तौफीक को बहुत बुरा महसूस हो रहा था, एक पल में उसे यह जलन अपने शरीर पर महसूस हो रही थी।

तौफीक को अफसोस था कि क्या यह वही लड़की है? जिसके द्वारा वह अपना बदला लेने आया था, उसे अपने पर धिक्कार हो रहा था।

जेनिथ के शरीर पर अब कई जगह पर हड्डियां भी नजर आने लगीं थीं, पर पता नहीं कैसा जुनून था ? कैसा यह बलिदान था कि जेनिथ रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

यह भी भला था कि उस गैस का जेनिथ के कपड़े पर कोई असर नहीं हुआ था।

अब बस 4 कदम की ही दूरी बची थी, पर अब जेनिथ के शरीर पर मूर्छा हावी होने लगी। यह 4 कदम की दूरी भी उसे मीलों बराबर की लगने लगी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता कि जेनिथ लहराकर वही गैस के क्षेत्र में गिर गई।

यह देख ऐलेक्स, शैफाली और तौफीक के मुंह से चीख निकल गई। इनकी चीखें सुनकर क्रिस्टी और सुयश भी भागकर आगे की ओर आ गये।

जेनिथ का शरीर उस गैस के क्षेत्र में सुलग रहाकोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा हो जायेगा कि तभी एक चमत्कार हो गया।

ना जाने कहां से एक शक्तिशाली योद्धा वहां प्रकट हो गया, जिसने कि बैंगनी रंग की धातु की एक पोशाक पहन रखी थी।

उसके हाथों की मसल्स दूर से ही चमक रहे थे, उसके चेहरे पर देवताओं सा तेज था। उसने सिर पर एक सुनहरे रंग का पट्टी नुमा मुकुट भी लगा रखा था, जिसके बीच में एक कालें रंग की मणि लगी हुई थी। उस योद्धा के बाल सुनहरे थे।

सभी बिना पलकें झपकाये उस योद्धा को देख रहे थे। उस योद्धा ने जेनिथ का शरीर गैस वाले क्षेत्र से उठा कर 90 नंबर पर रखा और इसी के साथ हवा में कहीं गायब हो गया।

“वो कौन था कैप्टेन?” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा- “कैश्वर ने तो कहा था कि तिलिस्मा में हमारी कोई मदद नहीं कर सकता, फिर वह योद्धा यहां कैसे आ पहुंचा? और फिर जेनिथ को बचाकर गायब भी हो गया।”

“मुझे भी इसका कोई आइडिया नहीं है तौफीक?” सुयश ने ना में सिर हिलाते हुए कहा- “पर वह जो भी था, हमारे लिये तो ईश्वर के ही समान था क्यों कि उसने जेनिथ की जान बचाई है।

उधर जेनिथ के उस पार पहुंचते ही 81 से 90 के बीच की गैस स्वतः कहीं गायब हो गई।

अब सभी भागकर जेनिथ के पास पहुंच गये। नक्षत्रा अभी भी जेनिथ के शरीर को तेजी से सही कर रहा था। यह देख सभी जेनिथ से कुछ दूर खड़े हो गये।

आखिरकार लगभग 7 से 8 मिनट के अंदर नक्षत्रा ने जेनिथ को पूरी तरह से सही कर दिया। थोड़ी देर के बाद जेनिथ होश में भी आ गई।

वह आश्चर्य से सभी को देख रही थी- “मैं बच कैसे गई? मैं तो गैस का वह क्षेत्र पार नहीं कर पायी थी।”

जेनिथ की बात सुन क्रिस्टी ने कुछ देर पहले घटी पूरी घटना जेनिथ को अक्षरशः सुना दी।

यह सुन जेनिथ भी आश्चर्य में आ गई।

“नक्षत्रा क्या तुमने देखा उस रहस्यमयी योद्धा को?” जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

“नहीं जेनिथ, मैं तो उस समय पूरी ताकत से तुम्हें सही करने में लगा था इसलिये मैंने उस योद्धा को नहीं देखा।” नक्षत्रा ने कहा।

“चलो वह जो भी था, उसका बहुत-बहुत शुक्रिया बोलो, क्यों कि हम लोगों ने तो तुम्हें गैस में गिरते देख, तुम्हारे जीने की आस छोड़ दी थी, पर पता नहीं कहां से वह योद्धा आ गया?” सुयश ने जेनिथ से कहा- “चलो दोस्तों कुल मिलाकर सब कुछ अच्छा हुआ...अब आगे बढ़कर पृथ्वी को गति देते हैं।”

यह कहकर सुयश आगे बढ़कर 91 पर जाकर खड़ा हो गया। 100 नंबर पर अब रुकी हुई पृथ्वी साफ नजर आ रही थी, पर इस बार रास्ते में कुछ भी नहीं था।

“कैप्टेन इस 91 से 100 के बीच का रास्ता तो बिल्कुल साफ है, यहां तो कुछ भी नहीं है।” ऐलेक्स ने कहा।

काफी देर तक इधर-उधर देखने के बाद क्रिस्टी ने धीरे से अपना कदम 92 पर बढ़ाया, पर वह आगे जा नहीं सकी।

“कैप्टेन आगे कोई अदृश्य दीवार है, जो हमें आगे नहीं बढ़ने दे रही।” क्रिस्टी ने कहा।

तभी दीवार पर भाप से एक पहेली लिख गई-

“साँसों की ताकत पहचानो,

शब्दों से तुम लिखना जानो।”

“साँसों की ताकत? इसका मतलब समझ में नहीं आया?” तौफीक ने कहा।

“कैप्टेन अंकल, यहां का मौसम कुछ ठंडा है, देखिये हमारे बोलने पर हमारे मुंह से भाप निकल रही है।” शैफाली ने सुयश से कहा- “कहीं हमारे मुंह से निकली भाप ही तो हमारी साँसों की ताकत नहीं?”

“हो भी सकता है।” सुयश ने कहा - “पर हम अपने मुंह से निकली भाप पर क्या लिख सकते हैं?”

शैफाली ने कुछ सोच सामने की अदृश्य दीवार पर अपने मुंह से निकली भाप को मारा, अदृश्य दीवार पर किसी शीशे की तरह से भाप की पर्त चढ़ गई।

अब शैफाली ने कुछ सोच उस पर 92 लिख दिया, ऐसा करते ही शैफाली अब अदृश्य दीवार को पार कर 92 पर आ गई।

यह देख सभी ने ऐसा किया, अब सभी 92 नंबर पर थे। आगे एक और अदृश्य दीवार थी।

इस बार शैफाली ने सीधे 100 नंबर अपने मुंह से निकली भाप से लिख दिया और इसी के साथ वह सीधे 100 नंबर पर पृथ्वी के पास पहुंच गई।

शैफाली को वहां पहुंचते देख बाकी सभी ने भी वैसा ही किया। अब सभी 100 नंबर पर थे और आगे अब कोई भी अदृश्य दीवार मौजूद नहीं थी।

सुयश ने अब आगे बढ़कर पृथ्वी को अपने हाथों से घुमाने की कोशिश की, पर पृथ्वी अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई।

“अब इसे आगे कैसे घुमाना है?” सुयश ने पृथ्वी को देखते हुए कहा।

सभी अब चारो ओर देखने लगे, पर आसपास ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया, जिसके द्वारा वह पृथ्वी को घुमा सकें।

बहुत देर तक किसी को कुछ समझ नहीं आया, तभी शैफाली को अब भी सबके मुंह से भाप निकलती दिखाई दी।

यह देख शैफाली ने अपने मुंह से फिर से भाप छोड़ी और हवा में बिखरी उस भाप पर अंग्रेजी में ‘अर्थ रोटेशन’ लिख दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही पृथ्वी ने नाचना शुरु कर दिया और इसी के साथ सभी फिर से पृथ्वी के ग्लोब के पास पहुंच गये।

“कैप्टेन, हमने 2 ऋतुओं को पार कर लिया, अब 2 ऋतुएं और बचीं हैं, तो हमें कुछ देर आराम करना है, या फिर मैं न्यूजीलैंड का फ्लैग लगा दूं, पृथ्वी के ग्लोब में।” ऐलेक्स ने सुयश की ओर देखकर पूछा।

“हम तिलिस्मा में हैं, यहां हमें थकान का अनुभव तो हो नहीं रहा। ऊपर से यहां का 1 दिन बाहर के 7 दिन के बराबर है, तो जितनी जल्दी हम यहां से निकल जाएं, उतना ही अच्छा है। ज्यादा देर करने में कहीं ऐसा ना हो जाये कि जब हम बाहर निकलें तो 50 वर्ष बीत चुके हों और हमारे जानने वाले सभी लोग बूढ़े हो चुके हों।” सुयश ने हंसते हुए कहा।

सुयश की बात सुन ऐलेक्स ने नीला फ्लैग उठाकर न्यूजीलैंड वाले स्थान पर लगा दिया।

हर बार की तरह जमीन पर बने न्यूजीलैंड का मानचित्र बड़ा होकर चमकने लगा। यह देख सभी एक-एक कर उस मानचित्र पर जाकर खड़े हो गये।

फिर रोशनी का एक झमाका हुआ और सभी अपने स्थान से गायब हो गये।

जारी रहेगा______✍️
 
#174.

दिव्य पुरुष: (17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी

पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।

हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।

चैपटर-13

शीत ऋतु-1: (तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।

दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”

जारी रहेगा_______:writing:
 
#175.

“पर कैसे? समुद्री घोड़ा तो अपना काम करके वापस झील में चला गया है।” सुयश ने कहा- “अब इतने बर्फ जैसे पानी में जाकर कौन उसे ढूंढ पायेगा?”

“मैं स्वयं जाऊंगी।” शैफाली ने दृढ़ता से कहा- “मैं इसके पहले भी पेंग्विन के पीछे बर्फ में गई थी, उस समय मुझ पर बर्फ की ठंडक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।”

यह सुनकर सुयश ने अपना सिर हिलाकर शैफाली को झील के अंदर जाने की इजाजत दे दी।

सुयश की इजाजत मिलते ही शैफाली ने अपने जूते बाहर उतारे और उसी रास्ते से झील के अंदर दाखिल हो गई, जिस रास्ते से वह समुद्री घोड़ा बाहर आया था।

सच में शैफाली को बर्फ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह आसानी से इतने ठंडे पानी में तैर रही थी।

झील में प्रवेश करते ही शैफाली ने एक डुबकी मारी और पानी के अंदर अपनी नजरें घुमाना शुरु कर दिया। शैफाली को अब कुछ दूरी पर एक खूबसूरत परी की एक मूर्ति दिखाई दी।

यह मूर्ति पानी में एक स्थान पर खड़ी थी। यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी।

परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी। उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था।

उस परी के चारो ओर कुछ जलपरियां, अपने हाथ में त्रिशूल लेकर घूम रहीं थीं।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस जलपरी की रक्षा कर रहीं हों या फिर उसकी परिक्रमा लगा रहीं हों। पर उन्होंने शैफाली से कुछ नहीं कहा।

“यह तो पानी के नीचे भी कोई तिलिस्म बना है?” शैफाली ने अपने मन में सोचा- “लगता है उस परी के हाथ में जो राजदण्ड है, उसमें अवश्य ही इस द्वार का कोई राज है, पर पहले मुझे वह कार्य कर लेना चाहिये, जिसके लिये मैं इस स्थान पर आयी हूं।”

अब शैफाली परी को छोड़कर उस समुद्री घोड़े को ढूंढने लगी। कुछ ही देर में शैफाली की निगाह में वह समुद्री घोड़ा आ गया, जो कि मिसगर्न मछली के बीच छिपकर पानी में तैर रहा था।

शैफाली उस समुद्री घोड़े की ओर बढ़ गयी। समुद्री घोड़े के पास पहुंचकर शैफाली ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर शैफाली के आगे बढ़ते ही वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

पहले प्रयास में शैफाली नाकाम रही। शैफाली ने फिर से पानी में आगे बढ़कर उस समुद्री घोड़े को पकड़ने की कोशिश की, पर इस बार भी वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

अब यह सिलसिला शुरु हो गया था, जब भी शैफाली आगे बढ़ती, वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो जाता।

यह देख शैफाली ने तेजी से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।

तभी शैफाली की नजर उस समुद्री घोड़े के आगे-पीछे घूम रही मिस गर्न मछली की ओर गई।

अब शैफाली के दिमाग में एक आइडिया आ गया था। शैफाली इस बार ध्यान से समुद्री घोड़े को देखती रही, जैसे ही एक मिसगर्न मछली, उस समुद्री घोड़े के ठीक पीछे पहुंची, शैफाली ने ठीक उसी समय पर, समुद्री घोड़े की ओर छलांग लगा दी।

हर बार की तरह इस बार भी समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे जाने के लिये बढ़ा, पर वह पीछे जा नहीं पाया और मिसगर्न मछली से टकराकर वहीं रह गया।

तभी शैफाली ने झपटते हुए उस समुद्री घोड़े को पकड़ लिया। अब शैफाली ने उसकी आँखों को देखा।

समुद्री घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशा में थीं, जिसे शैफाली ने अपने हाथों से सही कर दिया और इसके बाद उस समुद्री घोड़े को वहीं झील के पानी में छोड़, वह झील की सतह की ओर चल दी।

झील की सतह पर सभी बेसब्री से शैफाली के आने का इंतजार कर रहे थे। पानी से शैफाली का चेहरा निकलते देख सभी खुश हो गये।

शैफाली ने अपना सिर हिलाकर सभी को काम पूरा होने की खबर दे दी।

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी ने एक नजर ऐलेक्स की ओर डाली, ऐलेक्स अब अपने रुप में तो वापस आ गया था, पर वह अब भी बर्फ की

मूर्ति बना दिखाई दे रहा था।

“ये ऐलेक्स तो अब बर्फ का बन गया, अब इसे बर्फ से कैसे सही करें?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए कहा- “हो ना हो इस सेन्टौर में ही कोई चक्कर है, इसी की वजह से ऐलेक्स अभी तक सही नहीं हुआ है।” यह कहकर क्रिस्टी उस सेन्टौर के पास जाकर उसकी मूर्ति को जगह-जगह से हिलाकर देखने लगी।

क्रिस्टी से किसी को ऐसी आशा नहीं थी, इसलिये सभी उसे ऐसा करने से रोकने के लिये भागे।

सभी जानते थे कि क्रिस्टी की एक गलत हरकत उन्हें हमेशा के लिये इस तिलिस्म में कैद कर सकती है।

तभी क्रिस्टी के मूर्ति के हिलाने की वजह से सेन्टौर के हाथ में पकड़ा कंटक जमीन पर गिर गया और इसी के साथ सबके सामने एक मुसीबत और खड़ी हो गई।

सेन्टौर जीवित हो गया था और सबको खूनी नजरों से देख रहा था।

“हो गया काम तमाम, बड़ी मुश्किल से अभी उस समुद्री घोड़े से बचे थे, अब यह सेन्टौर जाग गया।” तौफीक ने क्रिस्टी पर नाराज होते हुए कहा।

क्रिस्टी एक पल में ही अपनी गलती को समझ गयी, पर अब क्या हो सकता था? तभी उस सेन्टौर ने अपने पैर को बर्फ की जमीन पर जोर से पटका, उसके ऐसा करने से एक जोर की आवाज हुई और इसी के साथ झील में मौजूद मिसगर्न मछलियां तेजी से गति करने लगीं।

यह देख शैफाली ने चीखकर सबको आगाह करते हुए कहा- “सब लोग सावधान हो जाओ, भूकंप आने वाला है।” तभी पूरी बर्फ की धरती हिलने लगी और बर्फ के उस हिस्से में मौजूद ऊंची चट्टानें गिरना शुरु हो गईं।

सभी किसी प्रकार उन चट्टानों से बचने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक बड़ी चट्टान ऐलेक्स की ओर गिरने लगी, यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।

इतने कम समय में कोई भी ऐलेक्स को बचा नहीं सकता था। जोर से गड़गड़ाती वह चट्टान ऐलेक्स के ऊपर आकर गिरी, पर तभी एक चमत्कार हुआ, वह भारी चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराकर उसमें

समा गई।

“यह बर्फ की चट्टान ऐलेक्स के शरीर के अंदर कैसे चली गई।” जेनिथ ने आश्चर्य से ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।

तभी एक और चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराई, इसका हस्र भी पहले वाली चट्टान के जैसा हुआ, वह चट्टान भी ऐलेक्स के शरीर में समा गई।

यह देख सुयश ने सबसे चिल्लाकर कहा- “सभी लोग ऐलेक्स के शरीर की ओट में छिप जाओ, नहीं तो यह गिरती हुई चट्टानें हमें पीस देंगी।”

सुयश की बात सुन सभी ऐलेक्स की ओर भागे और उसके पीछे जाकर छिप गये।

ऐलेक्स के आसपास बहुत सी चट्टानें गिर रहीं थीं, परंतु समय पर सुयश का दिमाग काम करने की वजह से सभी सुरक्षित थे।

उधर जोर-जोर से सेन्टौर के पैर पटकने की वजह से झील की बहुत सी मछलियां उछलकर झील के बाहर आ गईं थीं।

“कैप्टेन, हमें जल्द से जल्द इस सेन्टौर का इलाज करना होगा, नहीं तो यह हमें चुटकियों में मसल देगा।” क्रिस्टी ने गुस्साये हुए सेन्टौर की ओर देखते हुए कहा।

तभी तौफीक की निगाह सेन्टौर के गिरे अस्त्र कंटक पर गई। उसे देखकर तौफीक बोला- “अगर सेन्टौर का यह अस्त्र भी हमारे हाथ लग जाये तो कुछ देर तक तो इससे बचा ही जा सकता है? पर वह भी कमबख्त बिल्कुल उसके बगल में ही गिरा पड़ा है।”

तौफीक की बात सुन शैफाली की आँखें सिकुड़ गईं- “कैप्टेन अंकल, कंटक तो सेन्टौर के बगल में ही गिरा पड़ा है, तो फिर यह सेन्टौर उसे उठा क्यों नहीं रहा? उसे उठाने के बाद तो यह और विनाश कर सकता है।”

“इसी कंटक के इसके हाथ से निकलने के बाद ही तो यह जिंदा हुआ था।” क्रिस्टी ने कहा।

“इसका मतलब यदि हम इस कंटक को दोबारा से इसके हाथ में पकड़ा दें, तो यह सेन्टौर फिर से बर्फ का बन सकता है।” शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “तौफीक, तुम इस सेन्टौर का ध्यान भटकाकर उसे दूसरी दिशा में ले जाओ, तब तक मैं इस कंटक को उठा लूंगा।”

सुयश की बात सुनकर तौफीक ने अपना सिर हिलाया और ऐलेक्स की ओ से बाहर निकल, सेन्टौर से कुछ दूरी पर जाकर दौड़ने लगा।

सामने तौफीक को दौड़ते देख सेन्टौर तौफीक की ओर चल दिया। जैसे ही सेन्टौर का चेहरा दूसरी ओर हुआ, सुयश तेजी से कंटक की ओर भागा।

एक पल में ही सुयश कंटक के पास पहुंच गया, मगर जैसे ही सुयश ने कंटक को उठाया, वह भी बर्फ की मूर्ति में परिवर्तित हो गया।

यह देख शैफाली और तौफीक दोनों ही आश्चर्य से भर उठे। अब दोनों के पास कोई और तरीका नहीं बचा था।

सूर्यपुत्र: (30 वर्ष पहले.....जनवरी,1972, प्रातः काल, अयोध्या, भारत)

“दादा जी, आप हमेशा बंदूक लेकर क्यों चलते हो?” नन्हें सुयश ने अपने दादा सूर्य नारायण सिंह को सम्बोधित करते हुए पूछा- “क्या आपको बहुत डर लगता है?”

सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

“नहीं हमें डर नहीं लगता, यह हम अपने वंश की शान के लिये, अपने साथ लेकर चलते हैं। हम सूर्यवंशी राजपूत हैं, मेरे दादा जी तो हाथ में तलवार लेकर चलते थे। अंग्रेज भी उन्हें देख थर-थर कांपते थे, पर अब

समय बदलने के साथ तलवारों का चलन खत्म हो गया और तलवारों का स्थान इस अग्नि मारक बंदूक ने ले लिया।”

सुयश से बात करते-करते सूर्य नारायण सिंह, घर के आंगन में खड़ी एक खुली जीप में बैठ गये और सुयश को उन्होंने अपने बगल में बैठा लिया।

“मैं जब बड़ा होऊंगा, तो अपने हाथ में तलवार ही लेकर चलूंगा, बंदूक तो डाकू लोग चलाते हैं।” नन्हें सुयश ने अपने दिल के उद्गार प्रकट किये।

“अच्छा-अच्छा छोटे युवराज, आप तलवार लेकर ही चलना, पर वादा करो कि कुलदेवता के मंदिर में पूजा के समय, आज आप मुझे तंग नहीं करोगे।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आपको नहीं परेशान करुंगा, पर आप भी वादा करो कि वापस आने के बाद आप मुझे कैम्पा कोला पिलाओगे।” सुयश ने अपनी जुबान से चटकारा लगाते हुए कहा।

“ठीक है, मैं वादा करता हूं।” सूर्य नारायण सिंह ने अपनी हथेली को सुयश की नन्हीं हथेली से टकराते हुए कहा।

तभी दूसरी जीप में कुछ महिलाएं पूजा की थाली और कुछ पूजा की सामग्री लेकर बैठने लगीं।

“अरे अभय, तुम अपनी जीप चलाओ, बाकी लोग पीछे से आते रहेंगे। अगर हम थोड़ा जल्दी भी मंदिर पहुंच गये, तो कोई परेशानी की बात नहीं।” सूर्य नारायण सिंह ने जीप के ड्राइवर से कहा।

“जी मालिक।” सूर्य नारायण सिंह की बात सुन ड्राइवर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

“अच्छा दादा जी, आप ये बताओ कि आज आप रात को मुझे कौन सी कहानी सुनाओगे?” सुयश ने अपने दादा जी से पूछा।

“मैं....मैं आज तुम्हारी सबसे प्रिय यति और उड़ने वाले घोड़े की कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के गाल खींचते हुए कहा।

“नहीं दादा जी आज मुझे भगवान सूर्य की कहानी सुननी है।....वह कहानी सुने बहुत दिन बीत गये।” सुयश ने अपने दिमाग के कोनों को खंगालते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आज तुम्हें अपने कुल -देवता भग…न सूर्य की ही कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

रास्ते भर सुयश ऐसे ही अपने दादा जी से कुछ ना कुछ पूछता रहा। आधा घंटे के ड्राइव के बाद आखिर कुलदेवता का मंदिर आ ही गया।

अभय ने जीप को मंदिर के प्रांगण के बाहर ही रोक दिया। सूर्य मंदिर एक पर्वत की चोटी पर बना था। सुयश अपने दादा जी के साथ मंदिर के प्रांगण में आ गया।

मंदिर के मुख्य द्वार पर 7 घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्यदेव की मूर्ति लगी थी। शिखर पर सूर्य के मुख की ज्वाला उगलती आकृति बनी थी।

“अरे दादा जी यह आकृति तो बिल्कुल वैसी ही है, जैसी आपके दाहिने हाथ की कलाई पर बनी है।” सुयश ने आश्चर्य से दादा जी की कलाई देखते हुए कहा।

“हां बेटा, यह हमारे कुलदेवता का चिन्ह है, जिसे मैंने अपनी कलाई पर बनवा लिया था। क्या यह चिन्ह आपको पसंद है?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश से पूछा।

“हां दादा जी मुझे यह चिन्ह बहुत पसंद है, मैं एक दिन यही चिन्ह अपनी पूरी पीठ पर बनवाऊंगा।” सुयश ने दादा जी के हाथ पर बने सूर्य चिन्ह को अपनी नन्हीं हथेली से सहलाते हुए कहा।

“ठीक है, जब तुम बड़े होकर कलेक्टर बन जाओगे, तो मैं यह सूर्य चिन्ह तुम्हारे पीठ पर बनवा दूंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने चारो ओर फैले पर्वतों को देखते हुए कहा।

“कलेक्टर? ये कलेक्टर क्या होता है दादा जी?” सुयश ने पूछा।

“कलेक्टर पूरे जिले का सबसे बड़ा ऑफिसर होता है।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश की ओर देखते हुए जवाब दिया।

“नहीं-नहीं दादा जी, मैं कलेक्टर नहीं बनूंगा, मैं तो एक बहुत बड़े से पानी के जहाज का कप्तान बनूंगा और समुद्र की विशाल लहरों में अपना जहाज लेकर घूमूंगा।” सुयश ने अपनी कल्पना को उड़ान देते हुए कहा।

“अरे वाह, छोटे युवराज, आपकी सोच तो कमाल की है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपनी गोद में उठा लिया और चलते हुए मंदिर के प्रांगण के किनारे आ गये।

उस स्थान से उगते हुए सूर्यदेव बिल्कुल साफ नजर आ रहे थे। सूर्य की लालिमा प्रकाश का रुप ले, संपूर्ण आभा मंडल को दैदीप्यमान कर रही थी।

तभी मंदिर का एक पंडित अपने हाथ में 2 तांबे के लोटे में, जल लेकर आ गया। एक तांबे का लोटा थोड़ा छोटा था, जो कि निश्चित ही सुयश के लिये था।

“चलो बेटा, अब सूर्य को अर्घ्य दो, पर ध्यान रहे, यह पात्र तुम्हारे दोनों हाथों में सिर से ऊपर की ऊंचाई पर होना चाहिये और जल की धार टूटनी नहीं चाहिये। इस प्रकार करने से सूर्य की पहली जीवन दायिनी किरण स्वच्छ जल को पारकर हमारे शरीर से टकराती है और हमें सभी प्रकार के रोग से मुक्त करती है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने छोटा लोटा सुयश की ओर पकड़ा दिया और बड़े लोटे से स्वयं सूर्य को अर्घ्य देने लगे।

सुयश ने भी अपने दादा जी को देखते हुए ठीक उसी प्रकार से किया, जैसा कि दादा जी ने कहा था।

तभी दूसरी जीप भी आ गई। यह देखकर सूर्य नारायण सिंह ने सूर्य को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन लोगों की ओर बढ़ गये।

सूर्य नारायण सिंह ने अभय को सुयश का ध्यान रखने के कार्य पर लगा दिया।

दादा जी के जाने के बाद नन्हें सुयश ने भगवान सूर्य को देखा, सूर्य की लालिमा सुयश को बहुत भली लग रही थी।

धीरे-धीरे सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था, पर सुयश अभी भी अपनी नजरें सूर्य से नहीं हटा रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे सूर्य से सुयश का कोई बहुत गहरा रिश्ता हो।

तभी अचानक सुयश को सूर्य, बैंगनी रंग का होता दिखाई दिया। यह देख सुयश अचकचा गया, पर तभी सुयश को अपनी नाक पर बैठी एक नीले रंग की खूबसूरत सी तितली दिखाई दी।

उसी तितली के पंखों की वजह से सुयश को सूर्य का रंग बदलता हुआ दिखा था।

सुयश ने अपने हाथों से उस तितली को पकड़ने की कोशिश की, पर वह तितली सुयश की नाक से उड़कर दूर चली गई।

उस तितली का रंग इतना प्यारा था, कि सुयश का ध्यान अब तितली की ओर आकृष्ट हो गया था।

सुयश अब मंदिर के प्रांगण में तितली के पीछे-पीछे भागकर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा।

उधर अभय को जीप में रखा एक पूजा का सामान याद आ गया, उसने एक बार सुयश को खेलते हुए देखा और फिर बाहर जीप में रखें सामान को लाने के लिये चला गया।

सुयश अभी भी तितली के पीछे-पीछे भाग रहा था। तितली कभी एक स्थान पर बैठती, तो कभी दूसरे स्थान पर।

इस बार तितली मंदिर के प्रांगण के किनारे लगे एक छोटे से पेड़ की शाख पर जा बैठी।

सुयश अपना हाथ बढ़कार तितली को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पर वह पेड़ की डाल सुयश के नन्हें हाथों से थोड़ा दूर थी, इसलिये सुयश ने अपना एक पैर मंदिर के प्रांगण की रेलिंग से बाहर निकाल लिया।

पर इससे पहले कि सुयश उस नीले रंग की तितली को पकड़ पाता, उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे की ओर गिरने लगा।

सुयश के मुंह से चीख निकल गई। तभी सूर्य की किरणों की चमक बढ़ गई और सुयश, बिना किसी सहारे के हवा में झूलने लगा।

उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सूर्य की किरणों से बने झूले पर बैठा हो।

नन्हें सुयश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सुयश को अपने सामने एक दिव्य प्रकाशपुंज स्वरुप एक पुरुष दिखाई दिया।

उसे देख सुयश ने पूछ ही लिया- “आप कौन हो?”

“मैं सूर्यदेव हूं।” सूर्यदेव ने कहा- “मैंने ही तुम्हें इस ऊंचे पर्वत से गिरने से बचाया है।”

“आपने मुझे क्यों बचाया?” सुयश के शब्दों में एक बालरस झलक रहा था।

“क्यों कि मैंने तुम्हें अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया है, फिर भला मैं तुम्हें मरने कैसे देता?” सूर्यदेव ने कहा।

“आप इतनी जल्दी उतनी ऊंचाई से मेरे पास कैसे आ गये?” सुयश ने सूर्यदेव की ओर देखते हुए पूछा।

“क्यों कि मेरी किरणों से तेज चलने वाली चीज अभी इस ब्रह्मांड में नहीं है।....अपना ध्यान रखना सुयश।” सूर्यदेव ने कहा और सुयश को उठाकर, मंदिर के प्रांगण के बाहर लगी घनी झाड़ियों पर बैठा दिया। इसी के साथ सूर्यदेव हवा में कहीं गायब हो गये।

उधर अभय जैसे ही मंदिर के प्रांगण में पहुंचा, उसे सुयश कहीं दिखाई नहीं दिया। घबराकर अभय ने मंदिर के प्रांगण के किनारे जाकर नीचे की ओर देखा।

नीचे की ओर देखते ही अभय की जान सूख गई क्यों कि सुयश इस समय नीचे एक झाड़ी में फंसा दिखाई दे रहा था।

अभय ने घबरा कर अपने चारो ओर देखा, पर उसे आसपास कोई नजर नहीं आया, यह देख अभय ने जल्दी से नीचे लटककर, सुयश का एक हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।

सुयश को सही सलामत देख अभय की जान में जान आयी, पर उसे यही डर था कि कहीं सुयश, सूर्य नारायण सिंह को यह सारी बात बता ना दे।

“देखो बेटा, तुम यह बात किसी को बताना नहीं, मैं तुम्हें ढेर सारी टॉफियां दूंगा।” अभय ने सुयश को फुसलाते हुए कहा।

टॉफियों की बात सुन सुयश तुरंत मान गया। 2 घंटे के बाद सभी पूजा करके वापस घर की ओर चल दिये।

“तुम्हें भगवान सूर्यदेव कैसे लगे सुयश?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपने से चिपटाते हुए पूछा।

“अच्छे लगे, पर जब उन्होंने मुझे गोद में उठाया, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुयश ने भोलेपन से कहा।

“अच्छा, तो भगवान सूर्य ने तुम्हें गोद में उठाकर क्या कहा?” सूर्य नारायण सिंह ने हंसते हुए पूछा।

“उन्होंने कहा कि वो मुझे ढेर सारी टॉफियां देंगे।.....नहीं-नहीं....ये तो अभय अंकल ने कहा था.....उन्होने कहा था.... उन्होने कहा था...... क्या दादा जी आपने तो सब भुलवा दिया?” सुयश ने कहा और दादा जी के सीने से चिपक गया।

“शैतान बच्चा, 2 मिनट में कहानियां बनाकर सुनाने लगता है।” सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह मुस्कुराए और फिर से सुयश के सिर पर हाथ फेरने लगे।

सुयश अब दादा जी से ऐसे चिपका था, जैसे कि वह सूर्य नारायण सिंह ना होकर साक्षात सूर्यदेव हों।

जारी रहेगा_____✍️
 
#176.

आर्केडिया: (17.01.02, गुरुवार, 12:30, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका वेदांत रहस्यम् पढ़कर इतना ज्यादा विचलित हो गई, कि 2 दिन तक तो वो अपने कमरे से बाहर भी नहीं आई, पर उसने अब दृढ़ निश्चय कर लिया था, और वह निश्चय था आर्यन और आकृति के पुत्र को ढूंढने का।

तभी शलाका को जेम्स का ध्यान आया। जेम्स को उसने अपने पास तो रख लिया था, पर 2 दिन से शलाका उससे मिली नहीं थी। यह सोच शलाका अपने कमरे से निकली और जेम्स के कमरे की ओर आ गई।

जेम्स अभी भी उसी कमरे में था, जिसमें वह पहले विल्मर के साथ रह रहा था।

शलाका को आता देख जेम्स उठकर खड़ा होने लगा। शलाका ने जेम्स को बैठने का इशारा किया और स्वयं एक कुर्सी लेकर उस पर बैठ गई।

“हां जेम्स, आज से तुम्हारा काम शुरु, पर तुम पहले अगर कुछ जानना चाहते हो, तो वह बता दो, फिर मैं तुम्हें समझाती हूं कि तुम्हें यहां पर अब काम क्या करना है?” शलाका ने जेम्स की ओर देखते हए कहा।

“मैं सबसे पहले आपके और आपके भाईयों के बारे में सब कुछ जानना चाहता हूं।” जेम्स ने कहा।

“ठीक है, तो मैं शुरु से बताती हूं।” शलाका ने कहा- “एक बार ग्रीक देवता पोसाईडन ने धरती पर स्वर्ग बनाने की कल्पना की और एक खूबसूरत लड़की क्लीटो से शादी कर ली। पोसाइडन ने क्लीटो को

अटलांटिस के निर्माण के लिये काला मोती और एक तिलिस्मी अंगूठी दी। काला मोती ब्रह्मांड के सप्त तत्वों पर भी नियंत्रण कर सकता था। परंतु उस काले मोती को सिर्फ वही नियंत्रित कर सकता था, जिसके पास पोसाइडन की दी हुई तिलिस्मी अंगूठी हो। क्लीटो ने उस तिलिस्मी अंगूठी की सहायता से काले मोती को नियंत्रित कर, अटलांटिस का निर्माण किया। धीरे-धीरे क्लीटो ने 10 पुत्रों को जन्म दिया।

“समय आने पर क्लीटो ने अपने सबसे बड़े पुत्र ‘एटलस‘ को अटलांटिस का राजा बना दिया। एक बार पोसाइडन को किसी बात पर क्लीटो के चरित्र पर शक हो गया। उसने क्रोधित हो कर क्लीटो से अपनी तिलिस्मी अंगूठी छीन ली। क्लीटो ने बिना तिलिस्मी अंगूठी के जैसे ही काला मोती को अपने हाथ में उठाया, वह पत्थर की बन गई। इसके बाद पोसाइडन ने एक कृत्रिम द्वीप अराका का निर्माण करवा कर पत्थर बनी क्लीटो को काला मोती सहित एक तिलिस्म में डाल दिया। पोसाईडन ने तिलिस्म का निर्माण इस प्रकार करवाया था कि उस तिलिस्म को कोई देवपुत्री ही तोड़ सकती थी।

“पोसाइडन को पता था कि एटलस की अगली सात पीढ़ियों में अभी कोई पुत्री जन्म नहीं लेने वाली। पोसाईडन ने अटलांटिस को भी समुद्र में डुबो दिया। अब उस परिवार की केवल एक सदस्य ही बची थी और वह थी एटलस की पत्नी ‘लीडिया‘, जो कि गर्भवती होने के कारण अपने माँ के घर ‘एरियन आकाशगंगा ‘ पर मौजूद थी। सब कुछ खत्म होने के बाद जब लीडिया अटलांटिस पहुंची तो वहां सिर्फ सामरा और सीनोर जाति के कुछ योद्वा ही बचे थे और बचा था तो बस अराका द्वीप....जो पानी पर तैरने की वजह से इस खतरनाक दुर्घटना से बच गया था।

“लीडिया अब सामरा और सीनोर के साथ अराका पर रहने लगी। हजारों साल बाद एटलस के परिवार में

एक लड़की का जन्म हुआ। जिसका नाम ‘ऐलेना‘ रखा गया। बड़ी होने पर ऐलेना की शादी ‘एरियन आकाशगंगा‘ के एक महान योद्वा ‘आर्गस‘ के साथ हुई। अब फिर सभी तिलस्मी अंगूठी को ढूंढने लगे। समय धीरे-धीरे बीतता गया पर ऐलेना को तिलिस्मी अंगूठी नहीं मिली। कुछ समय बाद ऐलेना ने भी एक-एक कर 8 बच्चों को जन्म दिया। जिनमें 7 लड़के थे और एक आखिरी सबसे छोटी लड़की थी, जो कि मैं थी। मेरी माँ ने सभी को बताया कि उनके 7 पुत्रों के पास देवताओं की सप्त शक्ति है”

“तो आपके भाइयों के पास देवताओं की सप्त शक्ति है।” जेम्स ने पूछा।

“नहीं, मेरे भाइयों के पास असल में कोई शक्ति नहीं है। यह झूठ मेरी माँ ऐलेना के द्वारा फैलाया गया था। उन्होंने ऐसा इसलिये किया था कि कहीं उनके पुत्रों को शक्ति हीन जानकर सामरा और सीनोर राज्य के लोग उनके विरुद्ध ना हो जायें और इसी भ्रम को बनाये रखने के लिये उन्होंने अराका पर जगह-जगह मेरे भाइयों की वीरता की कहानियां, चित्रों के माध्यम से सभी ओर बनवा दी थीं। अगर सामरा व सीनोर राज्य उनके विरुद्ध हो जाते तो उनके पास रहने को भी जगह ना बचती।” शलाका ने कहा।

“क्यों----?....वह अपने पति आर्गस के घर ‘एरियन आकाशगंगा’ में जा सकती थीं।” जेम्स ने कहा।

“नहीं जा सकती थीं। मेरे पिता हमेशा से चाहते थे, कि मेरी माँ अपने सभी बच्चों के साथ एरियन आकाशगंगा में चल कर रहें। पर मेरी माँ मेरे जन्म के बाद भी, मेरी नानी लीडिया को छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं। इसी लिये मेरे पिता आर्गस ने हम सभी से, सभी प्रकार के सम्पर्क तोड़ लिये थे। अब हमारे पास अपने पिता की याद के लिये, इस आर्केडिया यान के अलावा कुछ नहीं था।” शलाका ने कहा।

“क्याऽऽऽऽ? यह एक अंतरिक्ष यान है?” जेम्स ने आश्चर्य से भरते हुए कहा।

“हां, यह एक अंतरिक्ष यान है, इसका नाम आर्केडिया है, यह हमारे पिता की आखिरी निशानी है।” शलाका ने उदास होते हुए कहा।

“मेरे पिता के जाने के बाद जब मैं 10 वर्ष की हो गई, तो मेरी माँ ने मुझे वेदालय जाकर पढ़ाई करने को कहा। वेदालय उस समय पृथ्वी का सबसे रहस्यमयी विद्यालय था, जिसमें अनेकों देव शक्तियां भरीं थीं। मेरी माँ ने मुझे इसलिये वहां भेजा, जिससे कि मैं सप्त शक्तियों का ज्ञान अर्जित कर क्लीटो को आजाद करा सकूं। पर वेदालय में पढ़ाई करते समय मुझे आर्यन से प्यार हो गया। मैंने अपनी माँ को बिना बताए आर्यन से विवाह कर लिया।” शलाका ने कहा।

“वेदालय में और कौन-कौन थे? और वह कैसा विद्यालय था?” जेम्स ने पूछा।

जेम्स की बात सुन शलाका ने जेम्स को जल्दी-जल्दी वेदालय की थोड़ी सी जानकारी दे दी।

“तो क्या पढ़ाई पूरी करने के बाद आपको कोई शक्ति मिली?” जेम्स ने उत्सुकता वश पूछ लिया।

“हां, जब शक्तियों का चयन करने की बात आयी, तो थोड़ी सी परेशानी हुई। क्यों कि मेरी माँ चाहती थीं कि मैं जल शक्ति का चुनाव करुं, और उस जलशक्ति से फिर से अटलांटिस का निर्माण करुं। पर मुझे पूरी जिंदगी आर्यन के साथ रहना था और चूंकि आर्यन ने सूर्य शक्ति का चुनाव किया था, इसलिये मैंने अग्नि शक्ति का चुनाव किया।”

“अगर वेदालय की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद सभी को शक्तियां मिलीं, तो फिर आकृति को क्यों नहीं मिलीं ?” जेम्स ने कहा।

“पढ़ाई खत्म होने के बाद बाकी के 5 जोड़ों को एक ही तरह की शक्ति दी गई। पर पूरे 10 वर्षों के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रतियोगिताएं जीतने वाले जोड़े को 2 शक्तियां मिलनी थीं। अंत में सर्वश्रेष्ठ विजेता आर्यन के साथ मैं और आकृति दोनों खड़े थे, पर अपने जोड़े के चुनाव का अधिकार आर्यन के पास था। इसलिये आर्यन में मुझे अपने जोड़े के तौर पर चुना। आकृति को ना चुने जाने की वजह से उसे कोई देवशक्ति नहीं मिली। इसलिये वह नाराज होकर वहां से चली गई। इसके बाद सभी को अमृतपान करने का अवसर मिला, पर मेरे और आर्यन के विवाह की बात सुन हमें अमृतपान नहीं कराया गया।

“इसलिये वेदालय से निकलने के बाद आर्यन हम दोनों के लिये ब्रह्मलोक से अमृत लाने चला गया। जब वह अमृत लेकर लौटा, तो आकृति ने मेरा वेश धारण कर आर्यन को धोखा दिया और अमृत की एक बूंद भी पीली। जिससे क्रोधित होकर आर्यन ने अपने और आकृति के बच्चे को एक काँच के अष्टकोण में बंद कर, कहीं धरती में छिपा दिया और स्वयं अपनी मृत्यु का वरण कर लिया। जिस समय आर्यन ने मृत्यु का वरण किया, ठीक उससे कुछ पहले मेरी माँ की मृत्यु हो जाने की वजह से मैं आर्यन से कुछ दिनों के लिये दूर चली गई थी जिसका अर्थ आर्यन ने यह निकाला कि मैं उसे छोड़कर कहीं चली गई। जब मैं लौटकर आयी, तो आर्यन मुझे कहीं नहीं मिला।

“मैंने महागुरु नीलाभ से जब उसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि आर्यन अब मर चुका है और वह 5,000 वर्षों के बाद दूसरा जन्म लेकर फिर से आयेगा। अब मेरी आयु मात्र 2000 वर्ष की ही थी, तो भला मैं आर्यन का 5,000 वर्ष तक इंतजार कैसे करती। अतः मैंने अपने भाइयों के साथ 5,000 वर्ष की शीतनिद्रा का विचार बनाया और अपने यान आर्केडिया में आकर सो गई। मुझे पता था कि पृथ्वी के कुछ लोगों के पास ऐसी दिव्यशक्ति है कि वह जमीन पर मौजूद किसी भी जीव को ढूंढ सकते हैं इसलिये मैंने अपने आर्केडिया को बर्फ के नीचे दबा दिया। मुझे पता था कि अंटार्कटिका में कोई नहीं रहता, इसलिये यह जगह मेरे यान के लिये सबसे सुरक्षित थी।”

इतना कहकर शलाका चुप हो गई, पर उसकी आँखों में अब लाल डोरे तैरने लगे थे।

यह देख जेम्स ने तुरंत टॉपिक को बदलते हुए कहा।

“आप मुझे कुछ काम बताने वालीं थीं?”

“अरे हां...आओ मेरे साथ।” यह कहकर शलाका जेम्स को लेकर एक दिशा की ओर चल दी।

कुछ आगे जाने के बाद शलाका ने आर्केडिया का एक द्वार खोला, जो कि शायद उस यान का कंट्रोल रुम था।

“घबराओ नहीं, यह आर्केडिया का असली कंट्रोल रुम नहीं है, यहां सिर्फ एक वीडियो गेम की तरह आर्केडिया को चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है।” यह कहकर शलाका ने एक स्क्रीन को ऑन कर दिया और ऊपर लगी एक अलमारी खोल, एक किताब निकालकर जेम्स के हाथों में पकड़ा दी।

“यह है आर्केडिया को चलाने के कंट्रोल्स की किताब। तुम पहले इसे पढ़कर वीडियो गेम पर ट्रेनिंग लो। जब तुम यह चलाना सीख जाओ, तो मुझे बताना। तब मैं तुम्हें दूसरा कार्य दूंगी।”

“मतलब कि एक दिन मुझे सच का अंतरिक्ष यान उड़ाने को मिलेगा?” जेम्स ने खुश होते हुए कहा।

“पहले सीख जाओ, फिर सोचेंगे... अच्छा अब मैं चलती हूं...और हां, यह एक छोटा सा यंत्र है, जिसके द्वारा तुम कभी भी मुझसे संम्पर्क कर सकते हो।”

यह कहकर शलाका ने एक छोटा सा बटन जैसा लाल रंग का यंत्र जेम्स के हवाले किया और वहां से निकलकर चली गई।

जेम्स अब काफी उत्तेजित दिख रहा था, वह अब बटनों से खेलने लगा।

चैपटर-14

शीत ऋतु-2: (तिलिस्मा 4.3)

तौफीक सेन्टौर से लगातार बचने की कोशिश कर रहा था। क्रिस्टी, शैफाली और जेनिथ, ऐलेक्स की बर्फ की मूर्ति के पीछे छिपे भागते हुए तौफीक को देख रहे थे।

सुयश भी कंटक को हाथ में पकड़े बर्फ की मूर्ति बन चुका था। इसलिये किसी और की कंटक उठाने की इच्छा नहीं थी और बिना कंटक इस दैत्याकार सेन्टौर को हराना मुश्किल लग रहा था।

तौफीक अब थकना शुरु हो गया था, यह देख अब क्रिस्टी मैदान में आ गई, वह सेन्टौर के पास जाकर उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करने लगी।

ऐसा पहली बार हुआ था कि इन्हें तिलिस्मा में गाइड करने के लिये कप्तान ही नहीं था।

तभी शैफाली को बर्फ पर कुछ दूरी पर पड़ी 1 मिसगर्न मछली दिखाई दी, जो पानी के वजह से मर गई थी।

शैफाली ने दौड़कर उस मछली को उठा लिया और तौफीक की ओर देखकर चीख कर कहा- “तौफीक अंकल, जरा अपना चाकू मेरी ओर फेंकिये।”

तौफीक ने शैफाली की आवाज सुन अपनी जेब से चाकू निकाला और शैफाली की ओर उछाल दिया।

शैफाली ने जमीन पर गिरे चाकू को उठाकर, उससे मिसगर्न मछली को बीच से फाड़ डाला।

उसके बाद उस मछली की खाल अलगकर, जैसे ही अपने हाथ के पास ले गई, वह मछली की खाल शैफाली के हाथों में किसी दस्ताने की तरह से फिट हो गई।

यह देख शैफाली और जेनिथ के चेहरे पर मुस्कान आ गई। शैफाली ने अब आगे बढ़कर कंटक को सुयश के हाथ से ले लिया।

मछली की खाल से बने दस्ताने की वजह से, शैफाली सफलता पूर्वक कंटक को उठाने में सफल हो गई, उधर सुयश के हाथ से कंटक निकलते ही, वह भी अपने असली रुप में आ गया।

सुयश ने पहले शैफाली के हाथ में पहने दस्ताने को देखा और फिर उसके हाथ में पकड़े कंटक को।

एक पल में ही सुयश सारी कहानी समझ गया।

उधर अब शैफाली ने ध्यान से सेन्टौर की ओर देखा और फिर कंटक को लेकर उसकी ओर चल दी।

सेन्टौर से कुछ दूर पहले ही शैफाली रुक गई।

शैफाली ने सेन्टौर पर चिल्लाते हुए एक बर्फ का छोटा सा टुकड़ा उसके चेहरे पर फेंक कर मारा।

उस छोटे टुकड़े से सेन्टौर का कुछ नहीं हुआ, पर अब उसका ध्यान शैफाली की ओर हो गया था।

शैफाली ने अब एक पत्थर का टुकड़ा उठा कर सेन्टौर की ओर फेंका। सेन्टौर ने हंसते हुए पत्थर के टुकड़े को रास्तें में ही, हाथ से पकड़कर दूर फेंक दिया।

अब शैफाली ने पास पड़ी एक मृत, मिसगर्न मछली को सेन्टौर की ओर फेंक दिया।

सेन्टौर ने फिर पुनरावृति करते हुए, उस मछली को भी हाथ से पकड़कर दूर फेंक दिया।

अब सेन्टौर चलता हुआ शैफाली के पास पहुंच गया। सभी साँस रोके शैफाली और सेन्टौर को देख रहे थे।

तभी शैफाली ने इस बार कंटक को सेन्टौर की ओर उछाल दिया और इसी के साथ सेन्टौर शैफाली के बिछाये जाल में फंस गया।

कंटक को हाथ से पकड़ते ही सेन्टौर फिर से बर्फ में बदल गया। यह देख सभी खुश हो गये।

“चलो, यह मुसीबत तो खत्म हो गई, पर अभी ऐलेक्स का क्या करना है? और तिलिस्मा के इस स्थान से निकलने का द्वार किधर है?” क्रिस्टी ने शैफाली की ओर देखते हुए कहा।

“इस द्वार का कुछ भाग नीचे झील में भी है, मुझे लगता है कि झील में मौजूद, परी के हाथ में पकड़े राजदण्ड से ही ऐलेक्स सही होगा।” शैफाली ने कहा- “पर इस द्वार का वो हिस्सा मुझे अकेले ही पार करना होगा क्यों कि झील के पानी में हममें से और कोई ज्यादा देर तक नहीं रह सकता।” यह कहकर शैफाली ने सभी को झील के नीचे मौजूद, तिलिस्मा के उस भाग के बारे में बता दिया जो कि उसने कुछ देर पहले ही देखा था।

इसके बाद शैफाली समय को बचाते हुए, तुरंत ही उस झील के जल में कूद गई। एक छोटी सी डाइव के बाद शैफाली उस स्थान पर पहुंच गई, जहां वह परी की मूर्ति खड़ी थी।

पर जैसे ही शैफाली ने मूर्ति की ओर बढ़ने की कोशिश की, त्रिशूल वाली जलपरियों ने शैफाली पर हमला कर दिया। यह देख शैफाली परी की मूर्ति से दूर हट गई।

“बिना किसी अस्त्र के मैं इन जलपरियों का मुकाबला नहीं कर सकती। मुझे कुछ और ही सोचना पड़ेगा?” यह सोच शैफाली ने अपनी नजरें चारो ओर दौड़ाईं, पर उसे आसपास लगे कुछ लाल रंग के फूलों के सिवा कुछ नजर नहीं आया।

अब शैफाली परेशान होकर आसपास तैरने लगी। तभी शैफाली को झील की तली में एक मूंगे की दीवार के पीछे लिखे कुछ शब्द दिखाई दिये।

शैफाली ने उत्सुकता वश मूंगे की दीवार को अपने हाथों से साफ कर दिया।

अब वहां लिखे शब्द बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे थे-

“भौंरा जब बन जाये भंवर,

थिरक उठेंगे हिम के स्वर”

“ये कैसी पहेली है?” इस पानी में भौंरा कहां से आयेगा?” अब शैफाली अपनी नजरें चारो ओर घुमाने लगी।

तभी उसकी नजरें उन फूलों पर जाकर टिक गई, जिनका रंग और आकार पानी से मैच नहीं कर रहा था।

“भौंरा तो फूलों के पास ही पाया जाता है, अब अगर फूल यहां हैं, तो अवश्य ही भौंरा भी कहीं ना कहीं होगा ?” अब शैफाली एक-एक फूलों को ध्यान से देखने लगी।

“यह क्या? यहां लगे सभी फूल खिले हुए हैं, जबकि उसी के आकार के एक फूल ने अपनी पंखुड़ियों को बंद कर रखा है।”

शैफाली ने अब उस बंद फूल की पंखुड़ियों को अपने हाथों से खोलना शुरु कर दिया।

अभी शैफाली ने 5 से 6 पंखुड़ियां ही खोली थीं कि तभी उन पंखुड़ियों के बीच से एक काले रंग का बड़ा भौंरा निकला और उस परी की मूर्ति के पास पहुंचकर तेजी से चारो ओर चक्कर लगाने लगा।

भौंरे के नाचने की गति बढ़ती जा रही थी और इसी के साथ उस स्थान पर पानी में एक भंवर बनती जा रही थी। यह देख शैफाली उस भंवर से थोड़ा दूर हट गई।

कुछ ही देर में भंवर ने सभी जलपरियों को अपनी चपेट में ले लिया।

वह जलपरियां कहां जाकर गिरीं, कुछ पता नहीं चला, पर कुछ देर बाद जब भंवर शांत हुई, तो झील के पानी में वह परी जीवित खड़ी थी और उसके आसपास का पानी, परी की पोशाक के समान बैंगनी हो गया था।

यह देख शैफाली उस परी के पास पहुंच गई। परी अब बहुत ध्यान से शैफाली को देख रही थी।

शैफाली को ऐसा लगा कि जैसे वह परी कुछ कहना चाह रही हो, पर पानी की वजह से कुछ कह नहीं पा रही हो, इसलिये शैफाली ने उस परी को अपने पीछे आने का इशारा किया और स्वयं झील की सतह के ऊपर की ओर चल दी।

शैफाली के साथ किसी परी को झील के पानी से निकलता देख सभी ने उन्हें घेर लिया। परी इतने सारे लोगों को अपने पास देख काफी उत्साहित हो गई।

“शायद तुम पानी में कुछ कहना चाह रही थी, पर कह नहीं पा रही थी।....क्या तुम हमारी भाषा समझ सकती हो?” शैफाली ने परी से कहा।

पर परी ने जवाब देने की जगह, शैफाली को देखते हुए उसे छूना शुरु कर दिया।

वह कभी शैफाली के बाल को तो कभी शैफाली चेहरे को छूकर देख रही थी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह शैफाली को छूकर कुछ महसूस करना चाह रही हो।

शैफाली को परी से कुछ पॉजिटिव फीलिंग आती दिखी, अब शैफाली से रहा नहीं गया और शैफाली ने उस परी से पूछ ही लिया- “ये तुम मुझे छूकर क्यों देख रही हो?”

“दरअसल मैंने कभी इंसान को महसूस नहीं किया, इसलिये ऐसा कर रहीं हूं।” परी ने कहा।

“क्या मतलब! क्या तुम कैश्वर की बनाई रचना नहीं हो?” शैफाली ने आश्चर्य से कहा।

“कौन कैश्वर? मैं किसी कैश्वर को नहीं जानती, मुझे तो बस इतना पता है कि मुझे इन जलपरियों ने मूर्ति बनाकर, इस झील में कैद कर दिया था और मैं आपकी वजह से आज इस जगह से निकल आयी।” परी ने कहा।

जारी रहेगा_____✍️
 
#177.

“शैफाली, पहले क्या तुम मुझे बताओगी कि यह सब क्या हो रहा है?” सुयश ने बीच में ही शैफाली को टोकते हुए कहा।

शैफाली ने जल्दी-जल्दी झील के अंदर की सारी घटना सुयश सहित सभी को सुना दी। इसके बाद वह फिर परी की ओर घूम गई।

“क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारा नाम क्या है? और तुम यहां कैद होने से पहले कहां रहती थी?” शैफाली ने फिर परी से एक सवाल कर दिया।

“मेरा नाम...मेरा नाम मुझे याद नहीं आ रहा। यहां तक कि मुझे यह भी याद नहीं कि मैं कहां रहती थी, बस मुझे इतना पता है कि मेरे पास हिम के स्वर हैं और उनके द्वारा मैं जादू कर सकती हूं।” परी ने कहा।

“हिम के स्वर?” तभी शैफाली को कविता की दूसरी पंक्ति याद आ गई- “थिरक उठेंगे हिम के स्वर।”

यह सोच शैफाली ने उस परी से कहा- “जरा हमें भी तो हिम के स्वर का जादू दिखाओ। हम तो देखें कि तुममें कितनी प्रतिभा है?”

शैफाली के यह कहते ही उस परी ने अपने हाथ में पकड़े राजदण्ड को हवा में हिलाया। परी के ऐसा करते ही, उसके राजदण्ड में आगे लगे बैंगनी मोती से, कुछ किरणें हवा में निकलीं और इसी के साथ हवा में एक बैंगनी रंग की तितली प्रकट हो गई।

वह तितली जैसे-जैसे अपने पंख हिला रही थी, वातावरण में गुलाबी रंग के अजीब से फाहे फैलते जा रहे थे।

इसी के साथ बर्फ से अजीब से मधुर स्वर निकल कर वातावरण में गूंजने लगे।

जैसे ही वह स्वर ऐलेक्स के कानों में पड़े, ऐलेक्स के शरीर की बर्फ पिघलने लगी। कुछ ही देर में ऐलेक्स बिल्कुल सही हो गया।

जैसे ही ऐलेक्स सही हुआ, वह परी चीख उठी- “मुझे बचा लो...मुझे कुछ हो रहा है, मैं मरना नहीं चाहती, मैं यहां से बाहर जाना चाहती हूं।”

तभी परी का शरीर हवा में धुंआ बनकर उड़ गया, अब बस हवा में उसकी चीखें बचीं थीं।

वातावरण से भी अब बैंगनी रंग पूरी तरह से गायब हो चुका था।

शैफाली को छोड़ किसी की समझ में नहीं आया कि उस परी के साथ क्या हुआ? और वह गायब होकर कहां चली गई।

परी को गायब होता देख, शैफाली की पेशानी पर बल पड़ गये। अब उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आनें लगीं।

यह देख सुयश ने शैफाली से पूछ लिया- “ये परी अचानक से कहां गायब हो गई? उसे उसका अतीत याद क्यों नहीं आ रहा था? और तुम्हारे चेहरे पर यह चिंता की लकीरें क्यों हैं शैफाली?”

“कैप्टेन अंकल, कुछ तो गलत हो रहा है तिलिस्मा में?...जो मुझे चिंता में डाल रहा है” शैफाली ने चिंतित स्वर में कहा- “दरअसल यह परी कैश्वर का ही बनाया हुआ तिलिस्मा का एक प्रोजेक्ट थी, जो कि अपना

कार्य समाप्त करके स्वतः गायब हो जाती, पर जाने कैसे इस परी को ये महसूस होने लगा, कि वह एक जीवित परी है और इसने अपने कार्य को अपनी कहानी बना लिया। ऐसा तभी हो सकता है, जबकि कैश्वर के बनाये इन प्राणियों में अपने आप भावनाएं आ जाएं।

“अगर इन प्राणियों में भावनाएं आ गईं, तो यह अपना कार्य करना छोड़ एक स्वतंत्र प्राणी की भांति जीने को सोचने लगेंगे और यह स्थिति पूरी पृथ्वी के लिये खतरनाक हो जायेगी। क्यों कि यह काल्पनिक प्राणी, तब जीवित प्राणियों से युद्ध करना शुरु कर देंगे और पृथ्वी का जीवनचक्र खराब कर देंगे। मुझे नहीं पता कि अभी ये भावना एक ही प्राणी में थी या फिर सभी में आ गई है। क्यों कि अगर यह भावना सभी तिलिस्मा के प्राणियों में आ गई, तो वह प्राणी नियमों के विरुद्ध जाकर हमें इस तिलिस्मा को पार नहीं करने देंगे, क्यों कि हमारे द्वार पार करते ही वह स्वतः खत्म हो जायेंगे।”

“मुझे तो लगता है कि कैश्वर को ईश्वर बनने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है, इसलिये वह जान बूझकर सभी प्राणियों में भावनाएं डाल रहा है, जिससे हम इस तिलिस्मा को पार नहीं कर सकें।” सुयश ने गुस्साते हुए कहा।

“चलो, फिलहाल इस द्वार को पार करते हैं फिर आगे की बाद में सोचेंगे।” तौफीक ने सबको याद दिलाते हुए कहा।

“इस द्वार की सभी चीजें तो समाप्त हो गईं, फिर भी अभी तक हमें यहां से निकलने का दरवाजा क्यों नहीं मिला?” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी शैफाली की नजर जमीन पर गिरी, एक लाल रंग की गोल सी वस्तु पर गई, जो कि एक कंचे के समान था।

शैफाली ने आगे बढ़कर उसे ध्यान से देखा। वह कंचा नहीं बल्कि उसी मिसगर्न मछली की आँख थी, जिसकी खाल से शैफाली ने दस्ताने बनाये थे।

“जब सबकुछ गायब हो गया, तो यह आँख अभी तक क्यों गायब नहीं हुई?” यह सोच शैफाली ने आगे बढ़कर उस मछली की आँख को उठा लिया।

पर जैसे ही शैफाली ने उस आँख को जमीन से उठाया, उस आँख का आकार तेजी से बढ़ने लगा।

यह देख शैफाली ने घबराकर उस मछली की आँख को अपने हाथों से छोड़ दिया।

जमीन पर गिरते ही वह आँख फिर से सामान्य आकार की हो गई। शैफाली ने दोबारा से उसे उठाने की कोशिश की, परंतु फिर से वह आँख बड़ी होने लगी। शैफाली ने दोबारा उस आँख को जमीन पर छोड़ दिया।

यह देख ऐलेक्स ने गुस्साते हुए उस मछली की आँख को उठाकर ऊपर आसमान में उछाल दिया- “अरे फेंको इसे...यह मछली की नहीं, बल्कि शैतान की आँख है।”

अब वह मछली की आँख तेजी से आसमान की ओर जा रही थी और हर अगले पल में आकार में दुगनी होती जा रही थी।

कुछ ही देर में वह आँख अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच गई। परंतु अब उसका आकार किसी ग्रह के बराबर हो गया था और अब वह सब पर गिरने के लिये नीचे आ रही थी।

“हे भगवान ये क्या बला है?” क्रिस्टी ने गुर्राते हुए कहा- “अब यह मछली की आँख, हम सबकी माँ की आँख करने वाली है।”

किसी के पास ना तो बचने का कोई उपाय था और ना ही छिपने की जगह। कुछ ही पलों में वह मंगल ग्रह के समान मछली की आँख उन सब पर आ गिरी।

सभी की आँखें डर के मारे बंद हो गईं और उनके मुंह से चीख निकल गई। जब सबकी आँखें खुलीं तो वह वापस पृथ्वी के ग्लोब वाले स्थान पर थे।

“वह तिलिस्मा के उस भाग से बाहर निकलने का द्वार था?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “भगवान बचाये ऐसे द्वार से....मुझे तो लगा कि अब हम सबका काम खत्म हो गया।”

“चलो दोस्तों, अब तिलिस्मा के चौथे भाग के आखिरी द्वार की ओर चलते है, जहां हमें ग्रीनलैंड जाकर वसंत ऋतु की बाधा को दूर करना है।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी पृथ्वी के ग्लोब की ओर एक बार फिर से बढ़ गये।

विद्युम्ना का रहस्य: (2 दिन पहले...... 15.01.02, मंगलवार, 07:30, महावृक्ष, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम, त्रिकाली, युगाका और कलाट महावृक्ष के सामने खड़े थे।

“हे महावृक्ष हमारे परिवार की नयी अमरबेल को आपके आशीर्वाद की जरुरत है। अतः नये वर-वधू को अपने आशीर्वाद से कृतार्थ करें।” कलाट ने महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“महाशक्ति के रक्षक को हम पहले ही आशीर्वाद दे चुके है कलाट।” महावृक्ष की आवाज वातवरण में गूंजी- “अब तो बस इनके प्रेम की परीक्षा का समय है।”

“परीक्षा ? कैसी परीक्षा महावृक्ष?” युगाका ने आश्चर्य से महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“ठीक वैसी ही, जैसी मैंने बचपन में तुम्हारी परीक्षा ली थी।” महावृक्ष ने कहा।

युगाका अपनी बचपन की परीक्षा को याद कर सिहर उठा, अचानक से उसे अपने शरीर के जलने का अहसास याद आ गया।

“हम किसी भी प्रकार की परीक्षा देने को सहर्ष तैयार है महावृक्ष।” व्योम ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ, इस विषम परीक्षा के लिये।” अचानक महावृक्ष की आवाज बहुत तेज हो गई।

ऐसा लगा जैसे महावृक्ष बहुत क्रोध में आ गया हो। अचानक से व्योम और त्रिकाली के सामने से कलाट और युगाका गायब हो गये और महावृक्ष ने अपने शरीर को विकराल कर लिया।

अब व्योम और त्रिकाली को अपना शरीर हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया।

इसी के साथ व्योम और त्रिकाली महावृक्ष की कोटर से होते हुए उसके अंदर समा गये। अंदर इतनी तीव्र रोशनी थी कि दोनों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगी, अब त्रिकाली और व्योम ने अपने चारो ओर देखा, उनके सामने आसमान में विशाल रुप में विद्युम्ना के चेहरा दिख रहा था।

नीचे जमीन पर, एक काँच की ट्यूब में त्रिशाल और कलिका बंद थे। उस काँच की ट्यूब के सामने 3 व्यक्ति खड़े थे। एक व्यक्ति जल से निर्मित एक जलमानव लग रहा था।

दूसरा व्यक्ति एक 20 फुट का शक्तिशाली दानव था, जिसने अपने हाथ में कुल्हाड़ा पकड़ रखा था और तीसरा व्यक्ति एक मरियल सा सुकड़ी हड्डी वाला एक बालक था।

“हा ऽऽऽ हा ऽऽऽऽ हा ऽऽऽऽ तो तुम दोनों आये हो विद्युम्ना का विनाश करने।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “जब 2 दिव्य शक्तियों के पास होने के बावजूद भी तुम्हारे माता-पिता मेरा कुछ नहीं कर पाये, तो तुम बच्चे लोग क्या कर पाओगे?”

“यह हम सीधे विद्युम्ना के पास कैसे पहुंच गये? महावृक्ष तो हमारी परीक्षा लेने जा रहे थे।” व्योम ने फुसफुसा कर त्रिकाली से पूछा।

“मुझे भी नहीं पता, पर महावृक्ष कुछ भी कर सकते हैं?” त्रिकाली ने व्योम के समीप जाते हुए कहा।

“तो आओ, जो काम कल करना था, वह आज ही करते हैं।” व्योम ने अपने दाँत भींचते हुए कहा और इसी के साथ व्योम के हाथ में पंचशूल प्रकट हो गया।

त्रिकाली के भी दोनों हाथ बर्फ से भर गये।

“मेरे पास महादेव की दी हुई त्रिशक्ति की ताकत है, जिसे तुम कभी परास्त नहीं कर सकते व्योम।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम्हें पहले मेरी जल शक्ति से टकराना होगा।”

इतना कहते ही विद्युम्ना की आँखों से एक तरंग निकली और इसी के साथ जलमानव, एक छोटी सी झील के ऊपर खड़ा दिखाई देने लगा।

“तुम्हें इस जलमानव से इस झील के ऊपर ही लड़ना होगा व्योम। इस जलमानव की शक्ति जल ही है और तुम्हें इसे हराना भी जल के ही ऊपर होगा।” विद्युम्ना ने कहा।

यह देख व्योम उछलकर जल की सतह पर जा खड़ा हुआ- “ठीक है, तो फिर मैं इसे जल के ऊपर ही परास्त करुंगा।”

त्रिकाली हैरानी से व्योम को जल के ऊपर चलते हुए देख रही थी, त्रिकाली को व्योम की इस शक्ति के बारे में कुछ नहीं पता था।

यह व्योम की गुरुत्व शक्ति का कमाल था, जिसकी वजह से वह जल की सतह पर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो खड़ा था।

जलमानव ने व्योम को जल के ऊपर आते देख, व्योम पर जल की बूंदों से प्रहार किया। उन बूंदों के शरीर पर पड़ते ही व्योम का शरीर कई जगह से जल गया, पर पंचशूल ने तुरंत ही व्योम के शरीर को सही कर दिया।

अब व्योम ने पंचशूल को फेंककर, जलमानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। पर जलमानव का सिर तुरंत से वापस जुड़ गया। यह देख व्योम ने इस बार पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचा कर फेंका।

पंचशूल ने पंखे की तरह से घूमते हुए जलमानव के शरीर के असंख्य टुकड़े कर झील में दूर-दूर तक फेंक दिये। पर कुछ ही देर में झील के जल ने सभी टुकड़ों को जोड़कर जलमानव को फिर से खड़ा कर दिया।

यह देख व्योम ने त्रिकाली को एक इशारा किया। इस बार जैसे ही जलमानव पूरी तरह से जुड़ा, त्रिकाली ने अपनी बर्फ की शक्तियों से जलमानव को पूरा का पूरा जमा दिया।

जलमानव को जमते देख व्योम ने एक बार फिर पंचशूल का उपयोग कर जलमानव के टुकड़े कर दिये, पर जैसे ही वह सभी बर्फ के टुकड़े पानी के सम्पर्क में आये, वह फिर से पिघलकर जलमानव का रुप लेने

लगे।

अब व्योम को यह मुसीबत थोड़ी बड़ी दिखने लगी थी। इस बार जैसे ही जलमानव सही हुआ, व्योम ने अपने पंचशूल से ऊर्जा का एक तेज प्रहार जलमानव पर किया।

इस ऊर्जा ने अग्नि के रुप में जलमानव को पिघलाकर पूर्णतया भाप में परिवर्तित कर दिया।

अब वह भाप झील के पानी से मिक्स नहीं हो सकती थी, यह देख व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

उसने मान लिया कि जलमानव अब खत्म हो गया। पर कहते हैं ना, कि जो सोचो, वह चीज उस हिसाब से होती नहीं है और यह कहावत यहां पूरी तरी के से चरितार्थ हो रही थी।

हवा में तैर रहे उन भाप के कणों ने आपस में मिलकर एक बादल का रुप ले लिया और बारिश बनकर वापस झील के पानी में मिल गये।

यह देख विद्युम्ना की हंसी फिर से वातावरण में गूंज गई- “यह जलमानव महा…देव की शक्ति से निर्मित है व्योम, यह इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगा।”

जलमानव एक बार फिर जल की सतह पर खड़ा हो गया था।

इस बार व्योम ने अपना बांया हाथ जलमानव की ओर कर हवा में लहराया, पर व्योम के इस प्रहार से जलमानव को कुछ होता दिखाई नहीं दिया? अब एक बार फिर व्योम ने त्रिकाली की ओर देखकर मदद मांगी।

त्रिकाली ने फिर से जलमानव के शरीर को बर्फ में विभक्त कर दिया। इस बार व्योम ने आगे बढ़कर एक प्रचण्ड घूंसा उस जलमानव के सिर पर मार दिया।

जलमानव हर बार की तरह फिर खण्ड-खण्ड हो बिखर गया। पर इस बार जलमानव का शरीर पानी से नहीं मिला, वह बर्फ के सारे टुकड़े अब जल की सतह से कुछ ऊपर हवा में तैर रहे थे।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह कौन सी शक्ति है व्योम?”

“यह गुरुत्वाकर्षण को मुक्त करने वाली शक्ति है, अब इस शक्ति के माध्यम से यह बर्फ के टुकड़े पानी से कभी नहीं मिल सकते, यह इसी प्रकार से हवा में घूमते रहेंगे।” व्योम ने कहा- “अब दूसरी शक्ति को भेजो विद्युम्ना....मैं आज सभी को हराकर त्रिकाली के माता-पिता को यहां से ले जाऊंगा।”

यह देख विद्युम्ना ने उस दानव को अब व्योम से लड़ने के लिये भेज दिया - “यह मेरी बल शक्ति है, इसके बराबर का बल दुनिया में किसी के पास नहीं है और इस पर तुम्हारे पंचशूल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके सामने तुम्हारा पंचशूल मात्र एक साधारण अस्त्र की तरह है। परंतु तुम्हें इससे जल पर नहीं, जमीन पर लड़ना होगा।”

उस दानव ने अब व्योम पर अपने कुल्हाड़े से आक्रमण कर दिया। व्योम ने उस दानव का वार अपने पंचशूल पर रोक लिया। अब व्योम ने पंचशूल को हवा में नचाते हुए दानव पर वार कर दिया, पर उस वार को दानव ने आसानी से बचा लिया।

अब व्योम और दानव के बीच युद्ध शुरु हो गया था। कभी लगता कि व्योम दानव पर भारी पड़ रहा है, तो कभी दानव व्योम पर भारी पड़ते दिखाई देता।

त्रिकाली मात्र दर्शक बनी उस युद्ध को निहार रही थी। लगभग आधा घंटा ऐसे ही लड़ते रहने के बाद, व्योम समझ गया कि उस दानव को ऐसे नहीं हराया जा सकता।

“अवश्य ही इस दानव के पास कोई ऐसी चमत्कारी शक्ति है? जो यह प्रयोग कर रहा है, पर मुझे वह दिखाई नहीं दे रही है” व्योम अपने मन ही मन में बड़बड़ाया- “विद्युम्ना इस दानव को ‘बल’ कह कर सम्बोधित कर रही थी, कहीं इसके नाम में ही तो कोई रहस्य नहीं छिपा?”

यह सोच अब व्योम लड़ते हुए उस दानव को ध्यान से देखने लगा। कुछ ही देर में व्योम ने उस दानव की एक आदत को पकड़ लिया और वह आदत थी कि कुछ देर लड़ने के बाद वह दानव अपने पैर को जमीन पर मार रहा था।

“यह बार-बार अपने पैर को जमीन पर मार रहा है, कहीं ये पृथ्वी से कोई शक्ति तो नहीं ले रहा।“ अब व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी।

व्योम को मुस्कुराते देख त्रिकाली ने कहा- “दिमाग खराब हो गया है क्या? यह तुम मुस्कुराकर क्यों लड़ रहे हो ?”

“क्या तुम न्यूटन को जानती हो?” व्योम ने लड़ते-लड़तें अजीब सा सवाल त्रिकाली से कर लिया।

त्रिकाली ने ‘ना’ में अपना सिर हिला दिया। यह देख व्योम ने उस दानव पर अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रयोग कर दिया।

अब उस दानव के पैर जमीन को छोड़ हवा में लहराने लगे। अब वह दानव बहुत कोशिश करने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

तभी व्योम ने इस बार उछलकर एक जोर का मुक्का उस दानव के सिर पर मारा, दानव तुरंत वहीं गिर कर बेहोश हो गया।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह तुमने कैसे किया व्योम?”

“पृथ्वी के एक महान वैज्ञानिक ने कहा था कि बल हमेशा द्रव्यमान (भार) और उसके त्वरण (गति) पर निर्भर होता है। यानि की अगर हमारा वजन जितना ज्यादा हो, हम अपनी गति से उतना बल उत्पन्न कर सकते हैं, तो बस मैंने उन्हीं वैज्ञानिक के कथनों को विचार करते हुए, अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से इस दानव के भार को ही समाप्त कर दिया। अब जब किसी का भार ही नहीं बचा, तो उसमें बल कहां से आयेगा? और एक बलरहित दानव को मारने में ज्यादा समय तो लगना नहीं था।”

“बहुत अच्छे।” विद्युम्ना ने व्योम की तारीफ करते हुए कहा- “अब जरा मेरी तीसरी शक्ति से भी निपट लो।”

अब व्योम की नजर विद्युम्ना की तीसरी शक्ति की ओर गई। उस दुबले-पतले बालक को देख व्योम के चेहरे पर हंसी आ गयी- “ये भी लड़ेगा क्या?”

तभी वह बालक धीरे-धीरे व्योम की ओर बढ़ने लगा। व्योम पहले देखना चाहता था कि यह बालक कैसा है? इसलिये व्योम ने उसे कुछ नहीं कहा।

पास आकर उस बालक ने अपना जोर का घूंसा व्योम के पेट में मारा, पर व्योम को उस बालक का घूंसा गुदगुदी के समान महसूस हुआ।

बालक ने अपना मुंह बनाकर, दुखी भाव से विद्युम्ना की ओर देखा और फिर एक बार जोर का हाथ लहरा कर अपना घूंसा व्योम के पेट में मारा, बालक के इस वार से व्योम हवा में उड़ता हुआ 100 फुट से भी

ज्यादा दूर गिरा।

व्योम का पूरा शरीर दर्द से कराह उठा। व्योम को अब अपनी गलती का अहसास हो रहा था। व्योम धीरे से उठकर खड़ा हो गया।

उसने अब अपनी निगाह उस बालक पर डाली, पर तब तक बालक ने त्रिकाली को पकड़कर एक काँच के आदमकद बर्तन में डाल दिया, जो कि हवा में उल्टा लटका था और उस बर्तन का ढक्कन बंद था।

अब त्रिशाल, कलिका और त्रिकाली, तीनो अलग-अलग काँच के बर्तन में हवा में टंगे थे। उनके नीचे जमीन पर एक चाकुओं का बिस्तर सा बना था।

साफ दिख रहा था कि अगर कोई भी उस काँच के बर्तन से गिरा, तो वह सीधे उन धारदार चाकुओं पर गिरेगा।

“कैसा लगा व्योम मेरी छल शक्ति का कमाल?” विद्युम्ना ने कहा- “अब इन तीनों काँच के बर्तनों का बटन मेरे पास है। मैं तीनों बर्तनों का ढक्कन एक साथ खोलूंगी। मेरे ढक्कन खोलते ही तीनों एक साथ इन चाकुओं पर गिरेंगे। अब तुम इन तीनों में से किसी एक को ही बचा सकते हो। और मुझे जानना है कि तुम इन तीनों में से किसे बचाते हो?”

व्योम के पास समय नहीं था सोचने का। अतः उसने एक पल में अपना निर्णय ले लिया।

व्योम अब तेजी से उन चाकुओं की ओर भागा। उसे भागते देख विद्युम्ना ने अपने हाथ में पकड़े यंत्र का बटन दबा दिया।

बटन के दबते ही तीनों शरीर हवा में लहराकर नीचे की ओर जाने लगे। इसी के साथ व्योम किसी को भी बचाने की जगह, उन चाकुओं पर स्वयं लेट गया।

तीनों शरीर व्योम के ऊपर आकर गिरे। अब तीनों लोग तो बच गये थे, पर उनके भार की वजह से सारे चाकू व्योम के शरीर में घुस गये।

यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और त्रिकाली की आँखें बंद हो गईं, जब त्रिकाली की आँखें खुलीं, तो वह और व्योम दोनों ही सकुशल हालत में महावृक्ष के सामने खड़े थे और उनके बगल कलाट और युगाका वैसे ही खड़े थे, जैसा कि वह लोग उन्हें छोड़ कर गये थे।

व्योम और त्रिकाली हैरानी से अपने चारो ओर त्रिशाल व कलिका को ढूंढने लगे।

तभी वातावरण में महावृक्ष की आवाज गूंजी- “कलाट, मेरी परीक्षा पूर्ण हुई, अब व्योम और त्रिकाली विद्युम्ना से टकराने के लिये तैयार हैं।”

“क्या मतलब? क्या यह सिर्फ परीक्षा थी?” व्योम ने उलझे-उलझे से स्वर में पूछा।

“हां व्योम।” महावृक्ष ने कहा- “ये विद्युम्ना, उसकी शक्तियां और त्रिकाली के माता-पिता सब मेरे द्वारा फैलाया भ्रमजाल था। मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था, कि विद्युम्ना कितनी खतरनाक हो सकती है? मैंने अपने भ्रमजाल का निर्माण ठीक उसी प्रकार किया था, जैसे कि विद्युम्ना अपने भ्रमन्तिका का करती है। मुझे ये नहीं पता कि उसकी जल, बल और छल की शक्ति किस प्रकार होगी? पर मैंने तुम्हें अपने भ्रमजाल के माध्यम से समझाना चाहा है कि वह शक्तियां किसी भी प्रकार से हो सकती हैं? इसलिये तुम्हें हर कदम पर सावधान रहना होगा। ......अब तुम यह बताओ व्योम, कि तुम्हें मेरे भ्रमजाल से क्या सीखने को मिला?”

“मैंने सीखा कि शत्रु के चेहरे और उसके शरीर की काया देखकर, उसकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगाना चाहिये। छल शक्ति ने मुझे इसी कारण पराजित किया था क्यों कि मैंने उसके शरीर को देखकर उसकी शक्तियों का गलत आंकलन किया था।” व्योम ने कहा।

“बिल्कुल सही व्योम...पर तुमने भ्रमजाल में एक और गलती की थी, जो तुम्हें अभी तक समझ में नहीं आयी?” महावृक्ष ने कहा- “तुम्हें अपनी शक्तियों के बारे में शत्रु को कभी नहीं बताना है, भले ही वह तुम्हारी कितनी भी तारीफ करते हुए पूछे। दरअसल विद्युम्ना की सबसे खास बात यही है, वह पहले लोगों को शब्दजाल से भ्रमित कर, या फिर उनकी किसी प्रकार से परीक्षा ले, उनकी शक्तियों के बारे में जान जाती है और फिर उनके शक्तियों को देखकर ही वह नये भ्रमन्ति का का निर्माण करती है। तो एक बात हमेशा ध्यान रखना, जब तक तुम उसके सामने ना पहुंच जाओ, तब तक अपनी, किसी एक शक्ति का प्रयोग मत करना, वहीं शक्ति अंत में तुम्हें विजय दिलायेगी।”

“जी महावृक्ष, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा।” व्योम ने हाथ जोड़कर महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा।

“तुमने तो देख ही लिया कलाट कि व्योम ने अंतिम समय में किसी एक को ना बचाकर, सभी को बचाने का प्रयत्न किया और यह एक महाशक्ति धारक की सबसे बड़ी निशानी है। त्रिकाली का चयन उत्तम है।” महावृक्ष ने कलाट की ओर देखते हुए कहा।

“जी महावृक्ष, अब आज्ञा दीजिये। त्रिकाली और व्योम को आज ही हिमालय की ओर प्रस्थान करना है।” कलाट ने महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा और सभी को लेकर सामरा राज्य के महल की ओर चल दिया।

रास्ते भर त्रिकाली के कानों में महा वृक्ष के कहे शब्द गूंज रहे थे- “त्रिकाली का चयन उत्तम है।“

अब वह धीरे-धीरे मुस्कुराकर बीच-बीच में कनखियों से व्योम को देख ले रही थी।

जारी रहेगा_____✍️
 
#178.

काली बिल्ली: (5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।

यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।

नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।

प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-

“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................

“कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,

लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,

जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।

दोस्तों आप सबके सपोर्ट और रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
 
“अद्भुत दिव्यास्त्र"

दोस्तों सर्वप्रथम मैं आप सभी का दिल से आभारी हूं कि आपने इतने कम समय में, मेरे जैसे एक नये लेखक को इतना सारा प्यार दिया।

मैं आशा करता हूं, अपने नेत्रों की कृपा दृष्टि से अभिसिंचित कर मुझे उत्साहित करते रहेंगे।

दोस्तों आज से 200 वर्ष पहले तक सभी लोग देवताओं पर विश्वास करते थे, उन्हें मानते थे और उनकी हृदय से पूजा करते थे।

पर जैसे-जैसे विज्ञान अपने पाँव पसारता गया, ईश्वर की तस्वीर लोगों के समक्ष धुंधली होती चली गई।

बहुत से मनुष्यों को लगने लगा कि इस ब्रह्मांड में ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है, वह सभी तो एक जैविक रचना हैं।

उधर हमारे कुछ धर्मगुरुओं के द्वारा गढ़े गए, झूठे मिथकों ने हमारे अविश्वास को और भी बढ़ा दिया।

हमारे मस्तिष्क में ईश्वर के लिये गलत धारणाएं बनने लगीं। हमें सभी ईश्वरीय कथाएं कपोल-कल्पित लगने लगीं।

विज्ञान का पर्दा हमारी आँखों पर पड़ जाने के बाद, हमने ये भी नहीं सोचा कि क्या हम अभी तक सप्त तत्व को समझ पायें हैं? अग्नि क्या है? क्या जल मात्र एक तत्व है? क्या हवा के कण सिर्फ वायुमण्डल में घूमने के लिये बने हैं? क्या धरती के मूल सिद्धान्तों को हम पूर्णतया समझ चुके हैं? क्या ध्वनि हमारी श्रवणेन्द्रिय में घूमने वाली एक ऊर्जा मात्र है? प्रकाश और आकाश के बारे में तो बात ही क्या करना ? उनकी तो जानकारी भी हमारे पास नगण्य है।

हम अभी आत्मा और मानव शरीर को पूर्णतया नहीं समझे हैं ईश्वर पर प्रश्नचिंह कैसे उठा सकते हैं? क्या कुछ भद्रजनों के द्वारा लिखी गई, काल्पनिक कहानियों से, हम ईश्वर के अस्तित्व को नकार सकते हैं? इस अनन्त ब्रह्मांड के आकार के आगे, हम एक धूल के कण जितने बड़े भी नहीं हैं।

इसलिये हे विज्ञान के पुजारियों, झूठी कहानियों पर विश्वास मत करो.......परंतु ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती भी मत दो....... वह निराकार है........वह ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है.......उसको ढूंढने के लिये हमको अपने धर्मस्थलों पर जाने की जरुरत नहीं है, उसे ढूंढने के लिये तो हमारा मन और विश्वास ही काफी है।

तो फिर इंतजार किजिए अगले आध्याय का, जो कि बोहोत जल्द शुरु हो रहा है।

तो दोस्तों इन शब्दों के साथ मैं अपना यह लेख यहीं समाप्त करूंगा।

आपका दोस्त "राज शर्मा"
 
#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।

माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।

“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।

“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।

उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#181.

नटखट हनुका: (20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।

तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।

कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"

“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर

सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे

शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।

जारी रहेगा………✍️
 
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