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- Dec 5, 2013
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जय आरती के ऊपर पीछे से छाड़ः हुआ अपना पूरा डैम लगा कर उसे छोड़ रहा था. पिछले 25-30 मिनट से उसने अलग अलग पोजीशन में आरती की अछि तरह से रेल बना राखी थी. अब तक तोह कोई भी लड़की कब की झाड़ जाती पर आरती तोह पूरा होने का नाम hi नहीं ले रही थी. जय और आरती पसीनो में टर्र हो चुके थे और आरती की कांपती हुई सिसकियाँ पूरे रूम में गूँज रही थी.
आरती - उन्न्नध्ह्हः…. उन्न्हठ्ह…. ममममममम
जय - भाभी जेईई…. अह्हह्ह्ह्ह…. आज ऐसा छोडूंगा न की भैया को भूल जाओगे….
जय ने आरती के गद्देदार गांड पर अपना भार डालते हुए हुए ज़ोर के झटके मारे. आरती का हाथ साइड में जय के हाथ को ढून्ढ रहा था, वह दर्द के मारे कुछ कास के पकड़ लेना चाहती थी. पर उसका अहंकार उसे जय को रोकने नहीं दे पा रहा था. उसे भी बहुत मज़ा आ रहा था जय की इस ताबड़ तोड़ चुदाई से.
आरती - उननननननहहह…. Ssssssssssss….. ईईईई…
जय कुछ पल के लिए रुका और उसने आरती की गांड पर एक ज़ोर का थप्पड़ लगाया, आरती की गांड अब तक पूरी लाल हो चुकी थी.
कुछ देर से आरती की उलटे जवाब भी बंद हो चुके थे, जैसे वह आखिर जय के आगे झुक गयी हो - ुघठ... भाभी जी.... अब कैसा लग रहा है... भैया ऐसे तोह नहीं करते होंगे...
आरती - ुह्ह्ह्ह... आह्ह्ह्णण... ाहहननन... जय और करो न.... और मैं तुम्हारी भाभी नहीं हूँ....
जय ने आरती के पीछे खींचते हुए पकड़ लिए और फिर से अंदर धक्के मारने लगा - तोह क्या बुलायु आपको, मेरी जानेमन?
आरती ने अपना मुँह बीएड की तरफ कर लिया, वह अपनी चीखे जय को नहीं सुनना चाहती थी. सच में जय ने जिस तरह से आज उसकी ली थी, आज तक उसके पति भी नहीं ली थी. इतना स्टैमिना की वह 30 मिनट से बस बिना रुके उसे चोदे जा रहा था.
जय ने आरती के बाल पकड़ते हुए कहा - बोलिये आरती जी....
आरती - Uhhhnnnn....mmmmm.... अह्ह्ह्ह.....
जय - लगता है भैया ने आपका छेड़ अछि तरह खोल दिया है इतने सालो में... चलिए फिर आपकी दूसरी गुफा भी टटोली जाये.... वहां तोह भैया शायद नहीं गए होंगे...
आरती एक डैम से काँप गयी, उसने कई बार गांड में सेक्स करने के बारे में सोचा था पर उसे खुद ये बोलते हुए शर्म सी आती थी, और उसका पति तोह खुद से वह करने से रहा था.
जय ने अपनी दो उंगलियां आरती के गांड में घुसा दी - उफ्फफ्फ्फ़.... काफी टाइट है... अब आएगा मज़ा...
आरती जय को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश करने लगी - जय... नहीं ... वहां नहीं...
जय - क्या हुआ... निकल गयी साड़ी हेकड़ी... अब तोह ये हो कर hi रहेगा...
जय ने अपने लुंड पर थोड़ा सा थूक लगाया और आरती की गांड में अपना लुंड घुसना शुरू किया. जय ने आरती के हाथों को कास के पकड़ लिया ताकि वह हिल न पाए. अब निकली थी आरती की असली चीखें...
आरती - अह्ह्ह्ह.... हरामजादे... हट जा... उफ्फ्फ....
जय ने अपना संयम बनाते हुए आरती की गांड में अपना लुंड और अंदर किया - आपके मुँह से गालियां शोभा नहीं देती .....
आरती - उफ्फ्फ्फ़... जय... बहनचोद... तेल तोह लगा ले...
जय को आरती के मुँह से गालियां सुनने में मज़ा आ रहा था और उसने धीरे धीरे अपनी रफ़्तार तेज़ करनी शुरू करि - अब तोह आपका hi तेल निकलूंगा...
आरती उसके आगे बिलकुल कमज़ोर पद गयी थी, और जैसे hi जय ने उसकी गांड में धक्के लगाने शुरू करे, उसकी ज़ोर ज़ोर की सिसकियाँ निकलने लगी.
आरती - ुह्ह्ह्हह्ह्णण.... मार दिया.... आअह्ह्ह्ह...
जय ने आरती के हाथों को छोड़ दिया और उसके बाल पकड़ते हुए पूरे डैम से उसकी गांड को छोड़ने लगा. आरती के हाथ तोह आज़ाद हो गए थे, पर अब उसे गांड में लुंड के घिसने से एक अलग सा hi मजा आ रहा था, जैसे उसने आज पहली बार सेक्स किया हो.
आरती आँखें बंद करके सिसकियाँ लेती रही - उन्न्नन... मममम.... हाँ.... उफ़....... आआअह्ह...
जय अपना लुंड अंदर बहार करता रहा और आरती की कमर और गांड भी अब आगे पीछे होने लग गयी थी. कुछ मिनट में उसने एक बार फिर आरती के अंदर विस्फोट कर दिया, इस बार उसकी गांड में अपना माल निकलते हुए. आरती हर जगह से बुरी तरह जय के सफ़ेद चिप चिप पानी से ढकी हुई थी.
जय ने कुछ सेकंड का ब्रेक लेते हुए आरती की गांड से अपना लुंड बहार निकाला - मज़ा आया न आरती जी.... सालो का एक्सपीरियंस आज काम आया... वैसे आप भी काम नहीं है... मुझे भी पूरा थका दिया...
आरती अपनी गांड को मसल रही थी, और तेज़ तेज़ सांसें ले रही थी, उसकी गांड में पहली बार लेने से बहुत बुरी तरह दर्द हो रहा था - ममममम.... आह्ह्ह्ह.....
जय - ज्यादा दर्द हो रहा है क्या... कोई नहीं पहली बार का दर्द था... अब तोह आपका मैं करेगा बार बार वहां करवाने का... भैया से न हो तोह मुझे बुला लेना...
आरती अपनी गांड को पकडे हुए दर्द से करहा रही थी.
जय - आज आपकी बारी थी.... कल सुप्रिया की बारी होगी... आपको लगता है वह ये सब सेह पाएगी...
जैसे hi जय ने सुप्रिया का नाम लिया, आरती एकदम से होश से में आयी, जैसे उसने रीलीज़ किया हो की वह यहाँ आयी क्यों थी.
आरती - जय.... तुम्हे मैंने कहा था न... सुप्रिया को भूल जायो...
जय हस्ते हुए बोलै - उसे कैसे भूल सकता हूँ... उसी के चक्कर में तोह ये सब हुआ है... माना आप कमल हो... पर अभी उसका रास भी मुझे चखना है...
आरती अपना दर्द भूते हुए एकदम एकदम से बीएड से कड़ी हुई और अपना फ़ोन उठाते हुए उसने जय की नंगी फोटो खींचनी शुरू कर दी - मैं सुप्रिया को सब बता दूंगी... ये साड़ी फोटो दिखा दूंगी... फिर वह तुम्हारा असली रूप जान जाएगी...
जय को यकीं नहीं हो रहा था की आरती अभी भी एहि मान रही थी की वह और सुप्रिया लवर्स थे. पर वह कौन था आरती के इस ब्रह्म को दूर करने वाला - जैसा आप चाहे... दिखा देना उन्हें ये फोटोज...
जय ने पोज़ बनाते हुए अपना लुंड ठीक सामने कर दिया ताकि आरती और अचे से फोटो खींच पाए - पर अभी तोह वापस बीएड पर आइये न....
आरती का सर बुरी तरह झन्ना रहा था, उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी किसी बुरी सपने से जाएगी हो. उसने जय को देखा और फिर अपनी हालत को, उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की वह इतनी देर से जय के साथ बिना किसी शर्म के ये सब कर रही थी.
आरती को टेबल पर रखे जूस के गिलास दिखाई दिए - तुमने कुछ मिलाया था न जूस में.... जिससे मैं बहक गयी...
जय - ारी... ये तोह गलत बात है... सब कुछ हो जाने के बाद आप मुझे बदनाम कर रही है... आप ने hi तोह साड़ी शुरुवात की थी...
आरती के गाल बुरी तरह लाल हो गए - नहीं... वह तोह मैं बस तुम्हे आज़मा रही थी...
जय - तोह फिर कैसा लगा मैं आज़मा के... जॉब पक्की है मेरी?
आरती - अह्ह्ह... पता नहीं कोई आदमी चार चार बार झाड़ कर कैसे अपना लुंड खड़ा रख सकता है... तुमने भी कुछ लिया था न...
जय मुस्कुरा के बोलै - पांचवी बार करना है तोह बताइये... मैं तोह उसके लिए भी तैयार हूँ... सच में भैया है बहुत लकी.... एक तरफ पलंग तोड़ बीवी और दूसरी तरफ जवान सेक्सी बेहेन...
आरती ने दर्द के मारे सही से चला भी नहीं जा रहा था, पर उसने दर्द में कमरे में फैले अपने कपडे ढूंढ़ने शुरू कर दिए थे, और वह जय की बातों पर फोकस नहीं कर रही थी - मैं जा रही हूँ... और मुझे अब रोकने की कोशिश की न तोह ाचा नहीं होगा...
जय मुस्कुरा के बोलै - आप फिर मुझे गलत समझ रही है... आप आयी अपनी मर्ज़ी से थी... और जा भी अपनी मर्ज़ी से सकती है...
आरती दर्द से कराहती हुई फिर से बीएड पर लेट गयी. उसने अभी अपने कपडे पूरी तरह नहीं पहने थे और उसे बहुत दर्द हो रहा था. पर मैं के एक दबे हुए कोने में शायद वह चाहती थी की जय उसके साथ कुछ और करे.
जय ने उसकी गोरी नंगी पीठ पर उसके लम्बे बाल फैले हुए देखे और वह खुद को उसकी पीठ को अपने हाथों से मसलने से नहीं रोक पाया.
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दूसरी और बहार इक़बाल खड़ा आरती का इंतज़ार कर रहा था. आरती को अंदर गए हुए 2 घंटे हो चुके थे और इक़बाल इतनी देर से होटल पर नज़र बनाये रखा था. वहां बहुत सारे आदमी और औरत आ रहे थे, पर उन्हें देख कर इक़बाल को वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लग रहा था. काफी देर परेशान खड़े रहने के बाद, वह थोड़ा घबराते हुए होटल के अंदर घुसा और फ्रंट डेस्क पर खड़े आदमी से पुछा.
इक़बाल - यहाँ... 1-2 घंटे पहले एक मैडमजी आयी थी किसी से मिलने... आपने देखा क्या...
आदमी हस्ते हुए बोलै - यहाँ तोह बहुत साड़ी मैडमजी आती है... तुम कौनसी वाली की बात कर रहे हो...
इक़बाल - नहीं... वह यहाँ किसी दोस्त से मिलने आयी थी... साड़ी पहने हुई थी उन्होंने...
आदमी आँख मारते हुए बोलै - सब दोस्त से hi मिलने आती है यहाँ... पति से मिलने कौन आएगा... तुम कौन हो उसके? कहीं पति तोह नहीं हो?
इक़बाल - नहीं मैं तोह उन्हें यहाँ लेकर आया था...
आदमी - ाचा ड्राइवर है... परेशान क्यों होता है... आ जाएँगी जब खेल ख़तम हो जायेगा...
इक़बाल - मतलब?
आदमी ने थोड़ी धीमी आवाज़ में कहा - नया है क्या? तेरी मैडमजी छुड़वा रही होंगी किसी रूम में अपने आशिक़ से... आ जाएँगी...
इक़बाल गुस्सा होते हुए बोलै - क्या बकवास कर रहा है...
आदमी - तमीज में रह कर बात कर ले... गलत काम तुम्हारी मैडम करे... और गुस्सा तुम हम पर हो...
इक़बाल - मुझे जल्दी से बता वह किस रूम में होंगी...
आदमी को भी गुस्सा आ गया - चल बहार निकल यहाँ से... जब आएँगी तेरी मैडम तब पूछ लियो उनसे की किसके साथ ऐश कर रही थी...
होटल के गार्ड्स के इक़बाल को धक्का देते हो बहार किया. इक़बाल परेशान होता हुआ बहार निकला और उसने तुरंत सुप्रिया को कॉल लगाया. उसके पास तोह आरती का फ़ोन नंबर hi नहीं था जो वह उन्हें कॉल करता.
सुप्रिया ने इक़बाल का फ़ोन आते देख जल्दी से उठाया - क्या हुआ इक़बाल, सब ठीक?
इक़बाल - मैडमजी... आपकी भाभी को लेकर आया था यहाँ... कुछ ठीक नहीं लग रहा मुझे यहाँ....
सुप्रिया - मतलब? हो कहाँ तुम? भाभी तोह अपनी दोस्त से मिलने जा रही थी न...
इक़बाल - जी. वहीँ लेकर आया था... पर ये होटल कुछ गलत सा लग रहा है... आप कॉल करो उन्हें एक बार... वह ठीक तोह है न...
सुप्रिया ने झट से इक़बाल का कॉल कट किया और आरती को फ़ोन लगाया. आरती का फ़ोन साइलेंट पर था और उसके कपड़ो के बीच में कहीं दबा हुआ था तोह उसे पता hi नहीं चला. सुप्रिया ने 2-3 बार तरय किया, और उसके चेहरे पर परेशानी बढ़ती जा रही थी.
सुप्रिया ने फिर से इक़बाल को कॉल लगाया - इक़बाल... तुम मुझे एड्रेस भेजो... मैं आ रही हूँ वहां...
इक़बाल - नहीं मैडमजी आप क्यों आएँगी यहाँ...
सुप्रिया - जल्दी से मुझे एड्रेस भेजो... बहस का टाइम नहीं है...
सुप्रिया जल्दी से ऑफिस से निकली, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था की क्या हुआ होगा. अगर वहां कुछ गड़बड़ हुई थी, क्या वह अतुल को भी फ़ोन करके बुला ले. नहीं अगर सच में कुछ गड़बड़ हुई तोह अतुल शायद कुछ न कर पाए.
सुप्रिया ने विक्रम को कॉल लगाया, और हड़बड़ाते हुए बोली - विक्रम... आप फ्री है क्या...
विक्रम - सुप्रिया... क्या हुआ... तुम काफी परेशान साउंड कर रही हो...
सुप्रिया - मेरी भाभी... वह किसी से मिलने गयी थी... पर वहां शायद कुछ गड़बड़ हो गयी है...
विक्रम - कैसी गड़बड़...
सुप्रिया - पता नहीं मुझे... बस काफी डर लग रहा है... आप आ सकते है क्या...
विक्रम अपने ऑफिस में था और आज का दिन उसके लिए काफी बिजी था, पर सुप्रिया के लिए तोह वह कुछ भी कर सकता था - मैं पहुँचता हूँ वहां... तुम मुझे एड्रेस भेजो...
सुप्रिया ने विक्रम को एड्रेस भेजा, और जैसे hi विक्रम ने वह एड्रेस देखा वह अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ. इस होटल में वह जय के साथ कई बार जा चूका था. उसे ये जगह काफी गन्दी सी लगती थी, पर जय को यहाँ लड़कियों को छोड़ने में बहुत मज़ा आता था. क्या ये बस इत्तेफाक था की सुप्रिया इसी जगह पर जा रही थी.
विक्रम ने तुरंत जय को कॉल लगाया पर जय भी अपना फ़ोन नहीं उठा रहा था. जरूर कुछ तोह गड़बड़ थी. विक्रम तुरंत hi अपने ऑफिस से निकला और होटल संतूर की तरफ जल्दी से ड्राइव करते हुए पंहुचा. अगर सुप्रिया अपने ऑफिस से वहां जा रही थी, तोह शायद वह ज्यादा नज़दीक था उस जगह के.
विक्रम वहां जल्द hi पहुंच गया और उसने वहां बहार इक़बाल को खड़े देखा. वह उससे बस एक बार पहले मिला था, पर उसने उसे पहचान लिया.
विक्रम - इक़बाल... क्या हुआ....
इक़बाल शायद विक्रम को नहीं पहचान पाया था - सिरजी... आप...
विक्रम - मैं सुप्रिया का फ्रेंड... उसने मुझे यहाँ बुलाया है... क्या मामला है...
इक़बाल - जी वह सुप्रिया की भाभी अंदर गयी थी होटल के... दोस्त से मिलने... पर ये लोग कह रहे है की.... और मुझे भी बहार निकाल दिया...
विक्रम - तुम आयो मेरे साथ....
विक्रम जल्दी से होटल के अंदर घुसा, और इक़बाल उसके ठीक पीछे. इक़बाल को देखते hi गार्ड फिर से उसे धक्का देने को हुए पर इस बार इक़बाल ने दोनों गार्ड्स को एक एक मुक्का मार कर गिरा दिया.
रिसेप्शन पर खड़ा आदम ज़ोर के चिल्लाया - ये क्या कर रहा है...
पर विक्रम ने उसे हाथ दिखा कर रोका - सुनो. जय है क्या यहाँ?
आदमी विक्रम को देख कर एकदम से रुका - सर आप....
विक्रम ने एक कड़क आवाज़ में उससे कहा - मैंने कुछ पुछा न तुमसे...
आदमी अटकते हुए बोलै - सर.... हाँ ... रूम 405...
विक्रम - उनके साथ कौन है...
आदमी - कोई लेडीज थी... साड़ी पहने हुए... पहले नहीं देखा उन्हें यहाँ...
इक़बाल एकदम से बोलै - यही तोह पुछा था तुझसे पहले.... जरूर वह सुप्रिया की भाभी होंगी...
विक्रम जल्दी से रूम की तरफ चल दिया और इक़बाल उसके ठीक पीछे पीछे. विक्रम ने इक़बाल की तरफ पलट कर देखा, उसने अपनी मुट्ठी कास के बाँध राखी थी और उसके चेहरे पर एक अलग hi गुस्सा था. विक्रम इक़बाल को इतने गुस्से में देख कर बोलै - इक़बाल सुनो... मुझे ये हैंडल करने दो... तुम यहीं रुको...
इक़बाल - पर सिरजी...
विक्रम - मुझे हैंडल करने दो ये... सब ठीक होगा...
इक़बाल के फ़ोन पर तभी सुप्रिया का कॉल आने लगा - मैडमजी....
सुप्रिया - कहाँ हो इक़बाल.... मैं यहाँ पहुंच गयी...
इक़बाल - मैं आता हूँ आपको लेने... यहाँ ऊपर है... रूम 405 की तरफ जा रहे है..
विक्रम जल्दी से रूम की तरफ बड़ा और इक़बाल नीचे सुप्रिया को लेने. विक्रम ने रूम के बहार पहुंच कर ज़ोर के खटखआया. कुछ देर दरवाज़ा नहीं खुला तोह एक बार फिर.
अंदर से जय की आवाज़ है - कौन है बे साला... बहार दो नॉट डिस्टर्ब का बोर्ड लगा है न...
जय ने एक तौलिया लपेटे हुए दरवाज़ा खोला और विक्रम को वहां देख कर वह चौंक गया - दोस्त! तुम यहाँ? इतनी दूर बैठे भी तुमने यहाँ की खुसबू सूंघ ली...
विक्रम - जय तू यहाँ क्या कर रहा है... तेरे साथ अंदर कौन है?
जय - आयो... तुम भी देखो...
विक्रम कमरे के अंदर आया और उसने देखा अंदर एक जवान औरत जल्दी जल्दी अपने कपडे पेहेन रही थी. उसके चेहरे पर डर साफ़ था. विक्रम ने अपनी आखें आरती से हटा ली और कहा - आप सुप्रिया की भाभी हैं?
आरती इस तरह किसी और अनजान आदमी को कमरे में देख कर बुरी तरह काँप रही थी. और ये आदमी सुप्रिया को भी जानता था, उफ्फ्फ पता नहीं वह कहाँ फास गयी थी. आरती ने हलके से अपना सर हिलाया.
विक्रम ने एकदम से जय को दीवार की तरफ धकेला और उस पर ज़ोर से चिल्लाया - तुझे पता है तू ये क्या कर रहा है... ये सुप्रिया की भाभी हैं...
जय हस्ते हुए बोलै - तोह? क्या हुआ... तूने बोलै था न सुप्रिया से दूर रहने के लिए... उनकी भाभी के बारे में तोह कुछ नहीं कहा था न...
विक्रम ने जय को एक ज़ोर का घुसा मारा उसके पेट पर - हरामीपन की हद्द होती है जय...
जय वापस नहीं लड़ रहा था - तू भी ले ले मज़े... किसने रोका है... मैंने कोई जबरदस्ती नहीं की... इनको भी बहुत मज़ा आया था...
विक्रम ने जय को एक मार कर ज़मीन पर नीचे गिरा दिया. आरती कमरे के एक कोने में कड़ी ज़मीन की और देखने के इलावा कुछ नहीं कर पा रही थी...
जय - अह्ह्ह... अब ये सब करना भी गलत है तेरे लिए... तूने जो किया उसी को वजह से मुझे ये सब करना पड़ा...
विक्रम - मैंने क्या किया?!!!
जय - इतना सालो की दोस्ती के बाद भी तूने एक लड़की की लिए मुझसे झूठ बोलै... जबकि तू उसके साथ सो रहा था...
विक्रम - मैं सुप्रिया से प्यार करता हूँ समझा... और उसकी फॅमिली मेरी फॅमिली जैसी है... तुझे ये सब करने से पहले दर बार सोच लेना चाहिए था.
विक्रम के नीचे गिरे हुए जय को किक किया. इस बीच सुप्रिया और इक़बाल भी बहार आ गए थे और सुप्रिया जल्दी से रूम में घुसती आरती के गले लगी.
सुप्रिया - भाभी!!! आप ठीक तोह है न....
सुप्रिया को वहां देख कर आरती बुरी तरह चौंक गयी और उसने भी सुप्रिया को गले लगा लिया. आरती की आँखों से आंसू बहने लगे थे.
विक्रम - सुप्रिया... तुम भाभी को लेकर जायो... मैं यहाँ सब सॉर्ट आउट कर लूंगा...
सुप्रिया रूम में सिचुएशन को समझने की कोशिश कर रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जय वहां क्या कर रहा था? उसके और भाभी के बीच क्या हुआ था? और विक्रम जय को क्यों मार रहा था?
विक्रम ने सुप्रिया को फिर से बोलै - सुप्रिया... जायो तुम यहाँ से...
पर बीच में जय बोल पड़ा - सुप्रिया जी... जाने से पहले सब सच तोह जान कर जाइये...
सुप्रिया - कौनसा सच?
जय - विक्रम का सच... और क्या...
विक्रम ने जय को एक और मारा और सुप्रिया की और घूर कर देखा - सुप्रिया... मैंने कहा न तुम जायो यहाँ से भाभी को लेकर...
सुप्रिया जय की बात सुने बिना नहीं जाना चाहती थी - विक्रम... नहीं... उसे बोलने दो....
जय को विक्रम की लात घुसो से दर्द हो रहा था पर अभी उसे सुप्रिया को सब सच बताना था - पूछो अपने विक्रम से.... कितनी लड़कियों के साथ हमने ये सब किया है इस होटल में... और सिर्फ इस होटल में नहीं, और पता नहीं कहाँ कहाँ....
विक्रम - सुप्रिया तुम इसकी बातों पर ध्यान मत दो...
जय - पूछ के तोह देखो....
सुप्रिया ने विक्रम की और देखा, जैसे उससे पूछ रही हो की क्या ये सच है. विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया.
जय के चेहरे पर अभी भी थोड़ी सी मुस्कान थी - और ये भी तोह पूछो की इसका आपके लिए क्या प्लान था. कैसे इसने आपको धीरे धीरे सेट किया...
सुप्रिया के पैरो टेल ज़मीन खिसक गयी थी, उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की जय ये सब क्या बोल रहा था विक्रम के बारे में.
सुप्रिया के मुँह से हलके से निकला - विक्रम....
विक्रम - सुप्रिया... सुनो... ी कैन एक्सप्लेन....
जय - सुप्रिया जी... और भी बहुत कुछ है बताने के लिए... आज जो हुआ उसके बारे में भी... और फिर आपकी भी तोह कुछ कहानियां है बताने के लिए...
सुप्रिया के हाथ पेअर बिलकुल जाम पद गए थे. आरती ने सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए खींचा - सुप्रिया... चलो... हमे यहाँ से जल्दी से निकल जाना चाहिए...
आरती सुप्रिया को कमरे से बहार खींचती हुई ले गयी, और इक़बाल उन दोनों के साथ वहां से निकल गया. विक्रम कुछ पल के लिए होटल के रूम में खड़ा रह गया था, जब वह ऑफिस से निकला था, उसे अंदाज़ा भी नहीं था की यहाँ कुछ ऐसा हो जायेगा. जय सरक कर बीएड पर आ गया था और मुस्कुराता हुआ विक्रम की और देख रहा था.
जय आरती के ऊपर पीछे से छाड़ः हुआ अपना पूरा डैम लगा कर उसे छोड़ रहा था. पिछले 25-30 मिनट से उसने अलग अलग पोजीशन में आरती की अछि तरह से रेल बना राखी थी. अब तक तोह कोई भी लड़की कब की झाड़ जाती पर आरती तोह पूरा होने का नाम hi नहीं ले रही थी. जय और आरती पसीनो में टर्र हो चुके थे और आरती की कांपती हुई सिसकियाँ पूरे रूम में गूँज रही थी.
आरती - उन्न्नध्ह्हः…. उन्न्हठ्ह…. ममममममम
जय - भाभी जेईई…. अह्हह्ह्ह्ह…. आज ऐसा छोडूंगा न की भैया को भूल जाओगे….
जय ने आरती के गद्देदार गांड पर अपना भार डालते हुए हुए ज़ोर के झटके मारे. आरती का हाथ साइड में जय के हाथ को ढून्ढ रहा था, वह दर्द के मारे कुछ कास के पकड़ लेना चाहती थी. पर उसका अहंकार उसे जय को रोकने नहीं दे पा रहा था. उसे भी बहुत मज़ा आ रहा था जय की इस ताबड़ तोड़ चुदाई से.
आरती - उननननननहहह…. Ssssssssssss….. ईईईई…
जय कुछ पल के लिए रुका और उसने आरती की गांड पर एक ज़ोर का थप्पड़ लगाया, आरती की गांड अब तक पूरी लाल हो चुकी थी.
कुछ देर से आरती की उलटे जवाब भी बंद हो चुके थे, जैसे वह आखिर जय के आगे झुक गयी हो - ुघठ... भाभी जी.... अब कैसा लग रहा है... भैया ऐसे तोह नहीं करते होंगे...
आरती - ुह्ह्ह्ह... आह्ह्ह्णण... ाहहननन... जय और करो न.... और मैं तुम्हारी भाभी नहीं हूँ....
जय ने आरती के पीछे खींचते हुए पकड़ लिए और फिर से अंदर धक्के मारने लगा - तोह क्या बुलायु आपको, मेरी जानेमन?
आरती ने अपना मुँह बीएड की तरफ कर लिया, वह अपनी चीखे जय को नहीं सुनना चाहती थी. सच में जय ने जिस तरह से आज उसकी ली थी, आज तक उसके पति भी नहीं ली थी. इतना स्टैमिना की वह 30 मिनट से बस बिना रुके उसे चोदे जा रहा था.
जय ने आरती के बाल पकड़ते हुए कहा - बोलिये आरती जी....
आरती - Uhhhnnnn....mmmmm.... अह्ह्ह्ह.....
जय - लगता है भैया ने आपका छेड़ अछि तरह खोल दिया है इतने सालो में... चलिए फिर आपकी दूसरी गुफा भी टटोली जाये.... वहां तोह भैया शायद नहीं गए होंगे...
आरती एक डैम से काँप गयी, उसने कई बार गांड में सेक्स करने के बारे में सोचा था पर उसे खुद ये बोलते हुए शर्म सी आती थी, और उसका पति तोह खुद से वह करने से रहा था.
जय ने अपनी दो उंगलियां आरती के गांड में घुसा दी - उफ्फफ्फ्फ़.... काफी टाइट है... अब आएगा मज़ा...
आरती जय को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश करने लगी - जय... नहीं ... वहां नहीं...
जय - क्या हुआ... निकल गयी साड़ी हेकड़ी... अब तोह ये हो कर hi रहेगा...
जय ने अपने लुंड पर थोड़ा सा थूक लगाया और आरती की गांड में अपना लुंड घुसना शुरू किया. जय ने आरती के हाथों को कास के पकड़ लिया ताकि वह हिल न पाए. अब निकली थी आरती की असली चीखें...
आरती - अह्ह्ह्ह.... हरामजादे... हट जा... उफ्फ्फ....
जय ने अपना संयम बनाते हुए आरती की गांड में अपना लुंड और अंदर किया - आपके मुँह से गालियां शोभा नहीं देती .....
आरती - उफ्फ्फ्फ़... जय... बहनचोद... तेल तोह लगा ले...
जय को आरती के मुँह से गालियां सुनने में मज़ा आ रहा था और उसने धीरे धीरे अपनी रफ़्तार तेज़ करनी शुरू करि - अब तोह आपका hi तेल निकलूंगा...
आरती उसके आगे बिलकुल कमज़ोर पद गयी थी, और जैसे hi जय ने उसकी गांड में धक्के लगाने शुरू करे, उसकी ज़ोर ज़ोर की सिसकियाँ निकलने लगी.
आरती - ुह्ह्ह्हह्ह्णण.... मार दिया.... आअह्ह्ह्ह...
जय ने आरती के हाथों को छोड़ दिया और उसके बाल पकड़ते हुए पूरे डैम से उसकी गांड को छोड़ने लगा. आरती के हाथ तोह आज़ाद हो गए थे, पर अब उसे गांड में लुंड के घिसने से एक अलग सा hi मजा आ रहा था, जैसे उसने आज पहली बार सेक्स किया हो.
आरती आँखें बंद करके सिसकियाँ लेती रही - उन्न्नन... मममम.... हाँ.... उफ़....... आआअह्ह...
जय अपना लुंड अंदर बहार करता रहा और आरती की कमर और गांड भी अब आगे पीछे होने लग गयी थी. कुछ मिनट में उसने एक बार फिर आरती के अंदर विस्फोट कर दिया, इस बार उसकी गांड में अपना माल निकलते हुए. आरती हर जगह से बुरी तरह जय के सफ़ेद चिप चिप पानी से ढकी हुई थी.
जय ने कुछ सेकंड का ब्रेक लेते हुए आरती की गांड से अपना लुंड बहार निकाला - मज़ा आया न आरती जी.... सालो का एक्सपीरियंस आज काम आया... वैसे आप भी काम नहीं है... मुझे भी पूरा थका दिया...
आरती अपनी गांड को मसल रही थी, और तेज़ तेज़ सांसें ले रही थी, उसकी गांड में पहली बार लेने से बहुत बुरी तरह दर्द हो रहा था - ममममम.... आह्ह्ह्ह.....
जय - ज्यादा दर्द हो रहा है क्या... कोई नहीं पहली बार का दर्द था... अब तोह आपका मैं करेगा बार बार वहां करवाने का... भैया से न हो तोह मुझे बुला लेना...
आरती अपनी गांड को पकडे हुए दर्द से करहा रही थी.
जय - आज आपकी बारी थी.... कल सुप्रिया की बारी होगी... आपको लगता है वह ये सब सेह पाएगी...
जैसे hi जय ने सुप्रिया का नाम लिया, आरती एकदम से होश से में आयी, जैसे उसने रीलीज़ किया हो की वह यहाँ आयी क्यों थी.
आरती - जय.... तुम्हे मैंने कहा था न... सुप्रिया को भूल जायो...
जय हस्ते हुए बोलै - उसे कैसे भूल सकता हूँ... उसी के चक्कर में तोह ये सब हुआ है... माना आप कमल हो... पर अभी उसका रास भी मुझे चखना है...
आरती अपना दर्द भूते हुए एकदम एकदम से बीएड से कड़ी हुई और अपना फ़ोन उठाते हुए उसने जय की नंगी फोटो खींचनी शुरू कर दी - मैं सुप्रिया को सब बता दूंगी... ये साड़ी फोटो दिखा दूंगी... फिर वह तुम्हारा असली रूप जान जाएगी...
जय को यकीं नहीं हो रहा था की आरती अभी भी एहि मान रही थी की वह और सुप्रिया लवर्स थे. पर वह कौन था आरती के इस ब्रह्म को दूर करने वाला - जैसा आप चाहे... दिखा देना उन्हें ये फोटोज...
जय ने पोज़ बनाते हुए अपना लुंड ठीक सामने कर दिया ताकि आरती और अचे से फोटो खींच पाए - पर अभी तोह वापस बीएड पर आइये न....
आरती का सर बुरी तरह झन्ना रहा था, उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी किसी बुरी सपने से जाएगी हो. उसने जय को देखा और फिर अपनी हालत को, उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की वह इतनी देर से जय के साथ बिना किसी शर्म के ये सब कर रही थी.
आरती को टेबल पर रखे जूस के गिलास दिखाई दिए - तुमने कुछ मिलाया था न जूस में.... जिससे मैं बहक गयी...
जय - ारी... ये तोह गलत बात है... सब कुछ हो जाने के बाद आप मुझे बदनाम कर रही है... आप ने hi तोह साड़ी शुरुवात की थी...
आरती के गाल बुरी तरह लाल हो गए - नहीं... वह तोह मैं बस तुम्हे आज़मा रही थी...
जय - तोह फिर कैसा लगा मैं आज़मा के... जॉब पक्की है मेरी?
आरती - अह्ह्ह... पता नहीं कोई आदमी चार चार बार झाड़ कर कैसे अपना लुंड खड़ा रख सकता है... तुमने भी कुछ लिया था न...
जय मुस्कुरा के बोलै - पांचवी बार करना है तोह बताइये... मैं तोह उसके लिए भी तैयार हूँ... सच में भैया है बहुत लकी.... एक तरफ पलंग तोड़ बीवी और दूसरी तरफ जवान सेक्सी बेहेन...
आरती ने दर्द के मारे सही से चला भी नहीं जा रहा था, पर उसने दर्द में कमरे में फैले अपने कपडे ढूंढ़ने शुरू कर दिए थे, और वह जय की बातों पर फोकस नहीं कर रही थी - मैं जा रही हूँ... और मुझे अब रोकने की कोशिश की न तोह ाचा नहीं होगा...
जय मुस्कुरा के बोलै - आप फिर मुझे गलत समझ रही है... आप आयी अपनी मर्ज़ी से थी... और जा भी अपनी मर्ज़ी से सकती है...
आरती दर्द से कराहती हुई फिर से बीएड पर लेट गयी. उसने अभी अपने कपडे पूरी तरह नहीं पहने थे और उसे बहुत दर्द हो रहा था. पर मैं के एक दबे हुए कोने में शायद वह चाहती थी की जय उसके साथ कुछ और करे.
जय ने उसकी गोरी नंगी पीठ पर उसके लम्बे बाल फैले हुए देखे और वह खुद को उसकी पीठ को अपने हाथों से मसलने से नहीं रोक पाया.
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दूसरी और बहार इक़बाल खड़ा आरती का इंतज़ार कर रहा था. आरती को अंदर गए हुए 2 घंटे हो चुके थे और इक़बाल इतनी देर से होटल पर नज़र बनाये रखा था. वहां बहुत सारे आदमी और औरत आ रहे थे, पर उन्हें देख कर इक़बाल को वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लग रहा था. काफी देर परेशान खड़े रहने के बाद, वह थोड़ा घबराते हुए होटल के अंदर घुसा और फ्रंट डेस्क पर खड़े आदमी से पुछा.
इक़बाल - यहाँ... 1-2 घंटे पहले एक मैडमजी आयी थी किसी से मिलने... आपने देखा क्या...
आदमी हस्ते हुए बोलै - यहाँ तोह बहुत साड़ी मैडमजी आती है... तुम कौनसी वाली की बात कर रहे हो...
इक़बाल - नहीं... वह यहाँ किसी दोस्त से मिलने आयी थी... साड़ी पहने हुई थी उन्होंने...
आदमी आँख मारते हुए बोलै - सब दोस्त से hi मिलने आती है यहाँ... पति से मिलने कौन आएगा... तुम कौन हो उसके? कहीं पति तोह नहीं हो?
इक़बाल - नहीं मैं तोह उन्हें यहाँ लेकर आया था...
आदमी - ाचा ड्राइवर है... परेशान क्यों होता है... आ जाएँगी जब खेल ख़तम हो जायेगा...
इक़बाल - मतलब?
आदमी ने थोड़ी धीमी आवाज़ में कहा - नया है क्या? तेरी मैडमजी छुड़वा रही होंगी किसी रूम में अपने आशिक़ से... आ जाएँगी...
इक़बाल गुस्सा होते हुए बोलै - क्या बकवास कर रहा है...
आदमी - तमीज में रह कर बात कर ले... गलत काम तुम्हारी मैडम करे... और गुस्सा तुम हम पर हो...
इक़बाल - मुझे जल्दी से बता वह किस रूम में होंगी...
आदमी को भी गुस्सा आ गया - चल बहार निकल यहाँ से... जब आएँगी तेरी मैडम तब पूछ लियो उनसे की किसके साथ ऐश कर रही थी...
होटल के गार्ड्स के इक़बाल को धक्का देते हो बहार किया. इक़बाल परेशान होता हुआ बहार निकला और उसने तुरंत सुप्रिया को कॉल लगाया. उसके पास तोह आरती का फ़ोन नंबर hi नहीं था जो वह उन्हें कॉल करता.
सुप्रिया ने इक़बाल का फ़ोन आते देख जल्दी से उठाया - क्या हुआ इक़बाल, सब ठीक?
इक़बाल - मैडमजी... आपकी भाभी को लेकर आया था यहाँ... कुछ ठीक नहीं लग रहा मुझे यहाँ....
सुप्रिया - मतलब? हो कहाँ तुम? भाभी तोह अपनी दोस्त से मिलने जा रही थी न...
इक़बाल - जी. वहीँ लेकर आया था... पर ये होटल कुछ गलत सा लग रहा है... आप कॉल करो उन्हें एक बार... वह ठीक तोह है न...
सुप्रिया ने झट से इक़बाल का कॉल कट किया और आरती को फ़ोन लगाया. आरती का फ़ोन साइलेंट पर था और उसके कपड़ो के बीच में कहीं दबा हुआ था तोह उसे पता hi नहीं चला. सुप्रिया ने 2-3 बार तरय किया, और उसके चेहरे पर परेशानी बढ़ती जा रही थी.
सुप्रिया ने फिर से इक़बाल को कॉल लगाया - इक़बाल... तुम मुझे एड्रेस भेजो... मैं आ रही हूँ वहां...
इक़बाल - नहीं मैडमजी आप क्यों आएँगी यहाँ...
सुप्रिया - जल्दी से मुझे एड्रेस भेजो... बहस का टाइम नहीं है...
सुप्रिया जल्दी से ऑफिस से निकली, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था की क्या हुआ होगा. अगर वहां कुछ गड़बड़ हुई थी, क्या वह अतुल को भी फ़ोन करके बुला ले. नहीं अगर सच में कुछ गड़बड़ हुई तोह अतुल शायद कुछ न कर पाए.
सुप्रिया ने विक्रम को कॉल लगाया, और हड़बड़ाते हुए बोली - विक्रम... आप फ्री है क्या...
विक्रम - सुप्रिया... क्या हुआ... तुम काफी परेशान साउंड कर रही हो...
सुप्रिया - मेरी भाभी... वह किसी से मिलने गयी थी... पर वहां शायद कुछ गड़बड़ हो गयी है...
विक्रम - कैसी गड़बड़...
सुप्रिया - पता नहीं मुझे... बस काफी डर लग रहा है... आप आ सकते है क्या...
विक्रम अपने ऑफिस में था और आज का दिन उसके लिए काफी बिजी था, पर सुप्रिया के लिए तोह वह कुछ भी कर सकता था - मैं पहुँचता हूँ वहां... तुम मुझे एड्रेस भेजो...
सुप्रिया ने विक्रम को एड्रेस भेजा, और जैसे hi विक्रम ने वह एड्रेस देखा वह अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ. इस होटल में वह जय के साथ कई बार जा चूका था. उसे ये जगह काफी गन्दी सी लगती थी, पर जय को यहाँ लड़कियों को छोड़ने में बहुत मज़ा आता था. क्या ये बस इत्तेफाक था की सुप्रिया इसी जगह पर जा रही थी.
विक्रम ने तुरंत जय को कॉल लगाया पर जय भी अपना फ़ोन नहीं उठा रहा था. जरूर कुछ तोह गड़बड़ थी. विक्रम तुरंत hi अपने ऑफिस से निकला और होटल संतूर की तरफ जल्दी से ड्राइव करते हुए पंहुचा. अगर सुप्रिया अपने ऑफिस से वहां जा रही थी, तोह शायद वह ज्यादा नज़दीक था उस जगह के.
विक्रम वहां जल्द hi पहुंच गया और उसने वहां बहार इक़बाल को खड़े देखा. वह उससे बस एक बार पहले मिला था, पर उसने उसे पहचान लिया.
विक्रम - इक़बाल... क्या हुआ....
इक़बाल शायद विक्रम को नहीं पहचान पाया था - सिरजी... आप...
विक्रम - मैं सुप्रिया का फ्रेंड... उसने मुझे यहाँ बुलाया है... क्या मामला है...
इक़बाल - जी वह सुप्रिया की भाभी अंदर गयी थी होटल के... दोस्त से मिलने... पर ये लोग कह रहे है की.... और मुझे भी बहार निकाल दिया...
विक्रम - तुम आयो मेरे साथ....
विक्रम जल्दी से होटल के अंदर घुसा, और इक़बाल उसके ठीक पीछे. इक़बाल को देखते hi गार्ड फिर से उसे धक्का देने को हुए पर इस बार इक़बाल ने दोनों गार्ड्स को एक एक मुक्का मार कर गिरा दिया.
रिसेप्शन पर खड़ा आदम ज़ोर के चिल्लाया - ये क्या कर रहा है...
पर विक्रम ने उसे हाथ दिखा कर रोका - सुनो. जय है क्या यहाँ?
आदमी विक्रम को देख कर एकदम से रुका - सर आप....
विक्रम ने एक कड़क आवाज़ में उससे कहा - मैंने कुछ पुछा न तुमसे...
आदमी अटकते हुए बोलै - सर.... हाँ ... रूम 405...
विक्रम - उनके साथ कौन है...
आदमी - कोई लेडीज थी... साड़ी पहने हुए... पहले नहीं देखा उन्हें यहाँ...
इक़बाल एकदम से बोलै - यही तोह पुछा था तुझसे पहले.... जरूर वह सुप्रिया की भाभी होंगी...
विक्रम जल्दी से रूम की तरफ चल दिया और इक़बाल उसके ठीक पीछे पीछे. विक्रम ने इक़बाल की तरफ पलट कर देखा, उसने अपनी मुट्ठी कास के बाँध राखी थी और उसके चेहरे पर एक अलग hi गुस्सा था. विक्रम इक़बाल को इतने गुस्से में देख कर बोलै - इक़बाल सुनो... मुझे ये हैंडल करने दो... तुम यहीं रुको...
इक़बाल - पर सिरजी...
विक्रम - मुझे हैंडल करने दो ये... सब ठीक होगा...
इक़बाल के फ़ोन पर तभी सुप्रिया का कॉल आने लगा - मैडमजी....
सुप्रिया - कहाँ हो इक़बाल.... मैं यहाँ पहुंच गयी...
इक़बाल - मैं आता हूँ आपको लेने... यहाँ ऊपर है... रूम 405 की तरफ जा रहे है..
विक्रम जल्दी से रूम की तरफ बड़ा और इक़बाल नीचे सुप्रिया को लेने. विक्रम ने रूम के बहार पहुंच कर ज़ोर के खटखआया. कुछ देर दरवाज़ा नहीं खुला तोह एक बार फिर.
अंदर से जय की आवाज़ है - कौन है बे साला... बहार दो नॉट डिस्टर्ब का बोर्ड लगा है न...
जय ने एक तौलिया लपेटे हुए दरवाज़ा खोला और विक्रम को वहां देख कर वह चौंक गया - दोस्त! तुम यहाँ? इतनी दूर बैठे भी तुमने यहाँ की खुसबू सूंघ ली...
विक्रम - जय तू यहाँ क्या कर रहा है... तेरे साथ अंदर कौन है?
जय - आयो... तुम भी देखो...
विक्रम कमरे के अंदर आया और उसने देखा अंदर एक जवान औरत जल्दी जल्दी अपने कपडे पेहेन रही थी. उसके चेहरे पर डर साफ़ था. विक्रम ने अपनी आखें आरती से हटा ली और कहा - आप सुप्रिया की भाभी हैं?
आरती इस तरह किसी और अनजान आदमी को कमरे में देख कर बुरी तरह काँप रही थी. और ये आदमी सुप्रिया को भी जानता था, उफ्फ्फ पता नहीं वह कहाँ फास गयी थी. आरती ने हलके से अपना सर हिलाया.
विक्रम ने एकदम से जय को दीवार की तरफ धकेला और उस पर ज़ोर से चिल्लाया - तुझे पता है तू ये क्या कर रहा है... ये सुप्रिया की भाभी हैं...
जय हस्ते हुए बोलै - तोह? क्या हुआ... तूने बोलै था न सुप्रिया से दूर रहने के लिए... उनकी भाभी के बारे में तोह कुछ नहीं कहा था न...
विक्रम ने जय को एक ज़ोर का घुसा मारा उसके पेट पर - हरामीपन की हद्द होती है जय...
जय वापस नहीं लड़ रहा था - तू भी ले ले मज़े... किसने रोका है... मैंने कोई जबरदस्ती नहीं की... इनको भी बहुत मज़ा आया था...
विक्रम ने जय को एक मार कर ज़मीन पर नीचे गिरा दिया. आरती कमरे के एक कोने में कड़ी ज़मीन की और देखने के इलावा कुछ नहीं कर पा रही थी...
जय - अह्ह्ह... अब ये सब करना भी गलत है तेरे लिए... तूने जो किया उसी को वजह से मुझे ये सब करना पड़ा...
विक्रम - मैंने क्या किया?!!!
जय - इतना सालो की दोस्ती के बाद भी तूने एक लड़की की लिए मुझसे झूठ बोलै... जबकि तू उसके साथ सो रहा था...
विक्रम - मैं सुप्रिया से प्यार करता हूँ समझा... और उसकी फॅमिली मेरी फॅमिली जैसी है... तुझे ये सब करने से पहले दर बार सोच लेना चाहिए था.
विक्रम के नीचे गिरे हुए जय को किक किया. इस बीच सुप्रिया और इक़बाल भी बहार आ गए थे और सुप्रिया जल्दी से रूम में घुसती आरती के गले लगी.
सुप्रिया - भाभी!!! आप ठीक तोह है न....
सुप्रिया को वहां देख कर आरती बुरी तरह चौंक गयी और उसने भी सुप्रिया को गले लगा लिया. आरती की आँखों से आंसू बहने लगे थे.
विक्रम - सुप्रिया... तुम भाभी को लेकर जायो... मैं यहाँ सब सॉर्ट आउट कर लूंगा...
सुप्रिया रूम में सिचुएशन को समझने की कोशिश कर रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जय वहां क्या कर रहा था? उसके और भाभी के बीच क्या हुआ था? और विक्रम जय को क्यों मार रहा था?
विक्रम ने सुप्रिया को फिर से बोलै - सुप्रिया... जायो तुम यहाँ से...
पर बीच में जय बोल पड़ा - सुप्रिया जी... जाने से पहले सब सच तोह जान कर जाइये...
सुप्रिया - कौनसा सच?
जय - विक्रम का सच... और क्या...
विक्रम ने जय को एक और मारा और सुप्रिया की और घूर कर देखा - सुप्रिया... मैंने कहा न तुम जायो यहाँ से भाभी को लेकर...
सुप्रिया जय की बात सुने बिना नहीं जाना चाहती थी - विक्रम... नहीं... उसे बोलने दो....
जय को विक्रम की लात घुसो से दर्द हो रहा था पर अभी उसे सुप्रिया को सब सच बताना था - पूछो अपने विक्रम से.... कितनी लड़कियों के साथ हमने ये सब किया है इस होटल में... और सिर्फ इस होटल में नहीं, और पता नहीं कहाँ कहाँ....
विक्रम - सुप्रिया तुम इसकी बातों पर ध्यान मत दो...
जय - पूछ के तोह देखो....
सुप्रिया ने विक्रम की और देखा, जैसे उससे पूछ रही हो की क्या ये सच है. विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया.
जय के चेहरे पर अभी भी थोड़ी सी मुस्कान थी - और ये भी तोह पूछो की इसका आपके लिए क्या प्लान था. कैसे इसने आपको धीरे धीरे सेट किया...
सुप्रिया के पैरो टेल ज़मीन खिसक गयी थी, उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की जय ये सब क्या बोल रहा था विक्रम के बारे में.
सुप्रिया के मुँह से हलके से निकला - विक्रम....
विक्रम - सुप्रिया... सुनो... ी कैन एक्सप्लेन....
जय - सुप्रिया जी... और भी बहुत कुछ है बताने के लिए... आज जो हुआ उसके बारे में भी... और फिर आपकी भी तोह कुछ कहानियां है बताने के लिए...
सुप्रिया के हाथ पेअर बिलकुल जाम पद गए थे. आरती ने सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए खींचा - सुप्रिया... चलो... हमे यहाँ से जल्दी से निकल जाना चाहिए...
आरती सुप्रिया को कमरे से बहार खींचती हुई ले गयी, और इक़बाल उन दोनों के साथ वहां से निकल गया. विक्रम कुछ पल के लिए होटल के रूम में खड़ा रह गया था, जब वह ऑफिस से निकला था, उसे अंदाज़ा भी नहीं था की यहाँ कुछ ऐसा हो जायेगा. जय सरक कर बीएड पर आ गया था और मुस्कुराता हुआ विक्रम की और देख रहा था.