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सुप्रिया एक बस में बुर्का पहने बैठी थी. बहार से उसका चेहरा नहीं दिख रहा था था पर उसके चेहरे पर दहशत साफ़ झलक रही थी. और आखिर क्यों न झलके, पिछले एक घंटा उसके लिए किसी भनायक मूवी के दृश्यों से काम नहीं था. सुप्रिया सोचने लगी की वह आज यहाँ तक कैसे पहुंची थी.
विक्रम के कॉल करने के 15 मिनट बाद hi इक़बाल वहां मंदिर में उनके पास पहुंच गया था. जैसे hi इक़बाल वहां पंहुचा विक्रम उसे साड़ी सिचुएशन समझने लगा. सुप्रिया के दिमाग ने तोह काम करना hi बंद कर दिया था और उसे सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग क्या बात कर रहे थे और आगे क्या होगा.
इक़बाल - सब्जी… भागना क्यों… आने दो जिसको आना है, मैं सब को देख लूंगा… मैडमजी के लिए तोह मैं किसी से भी भीड़ जायूँगा…
विक्रम - इक़बाल मुझे कोई शक नहीं इस बात का, पर 10 मुस्टंडो के आगे हम दोनों hi नहीं टिक पाएंगे. और उसके बाद वह सुप्रिया का क्या हाल करेंगे, तुम भी समझ सकते हो... मैं अपने लिए नहीं कह रहा, बस सुप्रिया के खातिर इस वक़्त यहाँ से निकल जाना hi बेहतर है...
इक़बाल के चेहरे पर उलझन और चिंता साफ़ दिख रही थी - पर सब्जी... वहां hi क्यों जाना? और आपको वहां के बारे में पता भी कैसे चला...
विक्रम ने उसके सवाल को अनसुना करते हुए पूछा - तुमने किसी और से तोह वहां का ज़िक्र नहीं किया न?
इक़बाल सीरियस होते हुए बोलै - नहीं सब्जी... कभी भी नहीं...
विक्रम - तोह बस फिर वही परफेक्ट जगह है. बस कुछ महीनो की बात है... जैसे hi सारा मामला ठंडा पड़ता है, मैं वहां आकर सुप्रिया को ले जायूँगा...
इक़बाल - सब्जी पर....
विक्रम - तुम hi मुझे बताया... क्या वहां कोई बहार वाला आकर तुम्हारी मर्ज़ी के बिना सुप्रिया को ले जा सकता है?
इक़बाल - नहीं सब्जी... वह तोह मुमकिन hi नहीं है...
विक्रम - तोह फिर सोच क्या रहे हो, तुम सुप्रिया को लेकर वहां निकलो... (विक्रम ने सुप्रिया की और देख कर उसे पुकारा) सुप्रिया... सुप्रिया सुनो...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया, जैसे किसी बुरे सपने से जाएगी हो - हाँ....
विक्रम - सुप्रिया... अपना फ़ोन दो मुझे... इक़बाल तुम भी अपने फ़ोन की सिम निकाल कर मुझे दो...
विक्रम सुप्रिया का फ़ोन लेकर उसके फ़ोन की सिम निकलने लगा और इक़बाल ने भी उसे अपने फ़ोन की सिम दे दी - मैं नहीं चाहता की तुम लोग वहां ट्रेस हो... इक़बाल तुम गाडी में वेट करो मैं 2 मं में सुप्रिया को लेकर आता हूँ...
इक़बाल - जी सब्जी...
विक्रम सुप्रिया के साथ अकेला वहां रह गया था, विक्रम ने प्यार से उसके दोनों गालो को पकड़ा - सुप्रिया... ी क्नोव ये तुम्हे अभी मुश्किल लग रहा होगा, पर इस समय तुम्हारा यहाँ से निकलना काफी ज़रूरी है...
सुप्रिया की आखें नाम थी, और होंठ काँप रहे थे - मुझे तोह कुछ समझ hi नहीं आ रहा... ये सब क्या हो रहा है... मैं ऐसे कैसे यहाँ से निकल जायु...
विक्रम - ट्रस्ट में सुप्रिया... मैंने भी नहीं सोचा था हम इस हालत में होंगे... पर अभी ये सब बात करने का फायदा नहीं है... हम जितनी देर करेंगे ईशा के लोगो को उतना hi टाइम मिलेगा तुम तक पहुंचने के लिए...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया - आप आ जायेंगे न... जैसे hi सब ठीक होगा?
विक्रम - हाँ बिलकुल... ये भी कोई पूछने की बात है...
सुप्रिया - और अतुल और बाकी सब? अगर ईशा ने उन्हें कुछ कर दिया तोह...
विक्रम - वह सब मैं संभल लूंगा... उसके लिए मेरा अभी घर पहुंचना बहुत ज़रूरी है...
सुप्रिया - और वहां कोई गड़बड़ हो गयी तोह मैं कैसे सम्भालूंगी?
विक्रम - बस जैसी भी सिचुएशन हो तुम बस उस हिसाब से अपने आप को एडजस्ट करती जाना... बाकी सब इक़बाल संभल लेगा... प्रॉमिस करो तुम घबरायोगी नहीं?
सुप्रिया ने धीरे से कहा - प्रॉमिस...
विक्रम - चलो अब अपने ासु पोचो और अपने आपको सम्भालो...
सुप्रिया और विक्रम बहार चलते हुए आये और सुप्रिया सिर्फ अपने हैंड बैग के साथ गाडी में बैठ गयी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज वह दुबारा विदा हो रही हो. जैसे hi वह गाडी में बैठी इक़बाल ने फर्राटे से गाडी चलनी शुरू कर दी.
सुप्रिया पीछे की सीट पर परेशान बैठी थी, तभी उसे कुछ सूझा - इक़बाल... एक बार आप विक्रम के ऑफिस की तरफ ले लेंगे क्या?
इक़बाल - मैडमजी पर... सब्जी ने बोलै है की सीधा लखनऊ से बहार निकलने के लिए...
सुप्रिया ने उससे प्यार से रिक्वेस्ट किया - बस एक बार... प्लीज...
इक़बाल - ठीक है मैडमजी... जैसा आप कहे...
इक़बाल ने गाडी मोड़ते हुए विक्रम के ऑफिस की तरफ कर ली. सुप्रिया बस वहां पहुंच कर अतुल से बात करना चाहती थी, और उसे जो कुछ हुआ उसके बारे में बताना चाहती थी. ऐसी अचानक गायब होने से पता नहीं अतुल उसके बारे में क्या सोचने वाला था. कुछ hi देर में गाडी विक्रम के ऑफिस के पास पहुंच रही थी, वहां पहले से नीचे काफी भीड़ इखट्टा थी.
भीड़ देख कर इक़बाल के माथे पर बल पड़ता जा रहा था - मैडमजी यहाँ कुछ गड़बड़ है... गाडी मोड़ लू क्या?
सुप्रिया - नहीं बस... थोड़ा सा और पास...
इक़बाल ने गाडी को थोड़ा और पास किया, और सुप्रिया ने अपना सर खिड़की से बहार निकल कर भीड़ में देखना शुरू किया. उसे वहां अतुल दिख गया! 4-5 हट्टे काटते लोग उसे पकड़ कर घेरे खड़े थे. और ऑफिस के बाकी लोग ये सब तमाशा देख रहे थे. थोड़ी देर पर दिशा भी कड़ी थी.
दिशा की नज़र भी सुप्रिया पर पड़ी, और वह तेज़ कदमो से उसकी और आयी.
जैसे hi दिशा उसकी खिड़की तक पहुंची, सुप्रिया के रुंधे हुए गले से थोड़ी सी आवाज़ निकली - दिशा... ये सब क्या... अतुल...
दिशा - सुप्रिया तुम बताया... ये सब क्या हो रहा है... ऐसा लग रहा है वह लोग तुम्हे ढून्ढ रहे है... क्या हुआ है?
शायद इतनी भीड़ में भी किसी ने दिशा को सुप्रिया से बात करते हुए देख लिया और उसकी और इशारा किया. वह 4-5 लोग अतुल को छोड़ते हुए उनकी गाडी की और चिल्लाते हुए झपटे.
आदमी - वह रही... वह रही... रोक उसे...
इक़बाल भी ज़ोर से चिल्लाया - मैडमजी!!! ये इसी तरफ आ रहे है... हमे निकलना होगा...
इक़बाल ने जल्दी से गाडी को रिवर्स में चलाया, और थोड़ा पीछे होते hi गाडी को उडाता हुआ वहां से निकलने लगा. सुप्रिया ने पीछे पलट कर देखा, कुछ लोग एक दूसरी गाडी में उनका पीछा करने लगे थे.
इक़बाल गुस्से और तनाव में बोलै - मैंने बोलै था न, यहाँ आना सही नहीं होगा...
सुप्रिया इक़बाल की ये हालत देख कर बुरी तरह घबरा गयी थी - अब क्या करेंगे इक़बाल...
इक़बाल अपनी आवाज़ में थोड़ी नरमी लाया - आप घबरायो नहीं...
इक़बाल एक के बाद एक मोड़ लेता हुआ वहां से तेज़ी से निकलने लगा. सुप्रिया को अब पीछे आती हुई गाडी तोह नहीं दिख रही थी, पर उसे पता था की वह ज्यादा दूर नहीं होंगे. थोड़ी देर बाद इक़बाल ने गाडी एक जगह लगायी.
सुप्रिया - यहाँ क्यों गाडी रोक दी...
इक़बाल - मैडमजी.. उन्हें इस गाडी का नंबर दिख गया है... हमे इसे यहीं छोड़ना होगा...
सुप्रिया - अब आगे क्या?
इक़बाल ने गाडी की डिक्की खोली और उसमे से एक काला बुर्का निकला - मैडमजी आप ये पेहेन लो... आपकी लाल साड़ी किसी का भी ध्यान खींच लेगी अपनी और. सुप्रिया ने जल्दी से काला बुर्का अपने कपड़ो के ऊपर डाला, वह ऊपर से नीचे तक इसमें धक् गयी थी, बस बहार से उसकी आँखें नज़र आ रही थी.
इक़बाल - और अपनी चप्पल भी उतार कर ये जूती पेहेन लीजिये... आपकी चप्पल कुछ ज्यादा hi चमकीली है...
सुप्रिया - ये मेरे आएगी भी?
इक़बाल - तरय तोह करिये....
इक़बाल ने झुक कर सुप्रिया को जूती पहननी शुरू करि, वह बड़ी मुश्किल से सुप्रिया के पैरो में फांसी. सुप्रिया बुर्क़े को सही से संभल नहीं पा रही थी, और वह बार बार उसकी आँखों पा आ रहा था- मुझे इसमें कुछ भी नहीं दिख रहा...
इक़बाल - आप बस मेरा हाथ पकड़ लो...
इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ कास के पकड़ लिया और वह उसे कहीं ले जाने लगा. सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग कहाँ जा रहे थे. सुप्रिया बस इक़बाल का हाथ पकडे उसे साथ खींची जा रही थी, उसे इक़बाल पर पूरा भरोसा था.
कुछ hi देर में उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी बस अड्डे पर हो, और इक़बाल ने उसे धीरे से कहा - ये इस बस में छेड़ना है हमे, आप पहले छाड़िये..
सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था पर इक़बाल ने उसकी कमर पकड़ते हुए उसे बस में ऊपर छडा दिया और फिर उसके पीछे आते हुए उसे एक खिड़की वाली सीट पर बिठा दिया और वह उसके साथ में बैठ गया. सुप्रिया को बुर्क़े की जाली से बस हल्का फुल्का hi दिख रहा था, बस जल्दी hi खचाखच भर गयी थी.
सुप्रिया आगे वाली सीट की रेलिंग को पकड़ कर कास के बैठी हुई थी, इक़बाल उससे ठीक सत्ता हुआ साथ में बैठा था. बस अब चलने को शुरू hi हुई थी की एक डैम से बहार कुछ शोर शराबा हुआ. 2-3 लोग कंडक्टर को धक्का देते हुए बस में छडे और इधर उधर देखने लगे.
कंडक्टर - क्या है ये सब
सुप्रिया के कानो में एक आदमी की आवाज़ आयी - ए... किसी लाल साड़ी वाली लड़की को देखा है यहाँ...
कंडक्टर - जो है तुम्हारे सामने है न...
आदमी ने एक और लाल साड़ी वाली औरत को देखते हुए कहा - ये वाली नहीं... थोड़ी जवान सी...
कंडक्टर - और तोह कोई नहीं...
आदमी ने सुप्रिया की और घूर कर देखा, सुप्रिया ने अपनी आँखें नीचे कर ली - और ये जो बुर्क़े वाली हैं? अपने बुर्क़े ऊपर करो...
शायद बस में सुप्रिया के इलावा भी 2-3 और औरते थी जिन्होंने बुर्का पहना हुआ था.
ये सुनते hi एक और आदमी बोल पड़ा - ये क्या बदतमीज़ी है... तुम हमारी औरतो के बुर्क़े उतारोगे...
ये सुन कर और भी लोग भड़क गए थे - हाँ.. अभी बुलायो हवलदार ko...haan हाँ... धक्के मारो इन्हे नीचे...
आदमी सब को भड़कते देख थोड़ा पीछे हट गया - ाचा ठीक है… अपना नंबर कंडक्टर को दे रहा हूँ, किसी के पास भी कोई खबर हो तोह इस नंबर पर कॉल करना… दस हज़ार इनाम मिलेगा…
वह आदमी कंडक्टर को अपना नंबर देने के बाद बस से नीचे उतर गए और बस चलने लगी. पर सुप्रिया का दिल अभी भी तेज़ तेज़ धड़क रहा था. अगर आज उसका बुर्का नीचे हो जाता तोह शायद.....
सुप्रिया ने पाया की टेंशन के मारे उसने इक़बाल का हाथ कास के पकड़ा हुआ था. इक़बाल उससे धीरे से फुसफुसाया - आप घबराये नहीं... बस हम निकल hi गए है यहाँ से...
सुप्रिया ने अपने हाथ की पकड़ ढीली करि, उसके हाथ पसीने से भरा हुआ था. बस अब फुल स्पीड चलने लगी थी और कुछ 15-20 मिनट बाद हाईवे की सड़क तक पहुंच गयी थी. सुप्रिया की आँखों में अभी भी दहशत सी hi थी, पर इतनी साड़ी भाग दौड़ के बाद वह बुरी तरह थक चुकी थी और उसकी आँखें बंद होने लगी थी.
धीरे धीरे उसका सर इक़बाल के कंधे पर लटक गया और उसकी आँख लग गयी.
पर सपने में उसे आराम कहाँ था. 5-7 मर्दो ने उसे घेरा हुआ है, और उसके हाथ और पेअर पकडे हुए है. कोई उसकी चूचियां चूस रहा है तोह कोई उसकी गांड दबा रहा था. सारे मर्दो ने अपने लुंड बहार निकाले हुए थे और वह उसके शरीर के अलग अलग हिस्सों पर छू रहे थे. एक एक करके सबने अपने लुंड उसके मुँह में डालने शुरू किये. और फिर एक मोटा सा लुंड उसके छेड़ में तेजी से घुस गया.
सुप्रिया चीखती हुई जाएगी, उसका चेहरा पसीनो से टर्र था. इक़बाल ने सुप्रिया को पकड़ते हुए पुछा - आप ठीक हो न...
सुप्रिया तेज़ सांस लेते हुए बोली - हाँ... कुछ नहीं... बस सपना था.. थोड़ी पानी मिलेगा क्या?
इक़बाल - हाँ बस अभी जैसी hi गाडी रूकती है... मैं पानी लेता हूँ...
साथ बैठे आदमी ने इक़बाल से पुछा हुआ - क्या हुआ? सब ठीक है....
इक़बाल - जी जी... बस आदत नहीं है इसको बस में सफर की... थोड़ा जी ख़राब है...
एक और औरत हस्ते हुए बोली - ाचा... हवाई जवाज में बैठे है क्या तेरी जोरू...
इक़बाल हस्ते हुए बोलै - हाँ अम्मा... एहि समाज लो... हवाई जहाज में hi बैठे है...
सब लोग हसने लगे पर सुप्रिया तोह जैसे अपनी उलझनों में खोयी हुई थी. उसने बुर्क़े की जाली से बहार की और देखा, बहार अब कोई शहर नहीं बल्कि जंगल सा था. अँधेरा भी होता जा रहा था. इतना अफरा तफरी में उसे तोह ये भी नहीं पुछा था की वह जा कहाँ रही थी.
बस में गाने चल रहे थे, शायद उसकी हालत पर हस्ते हुए:
भरम भाप के
शर्म धाप के
करम नाप के
भागा रे
करम नाप के
सुप्रिया ने अपना दिमाग बंद करने की कोशिश करि पर वह बंद hi नहीं हो रहा था. वह इक़बाल की और हुई और उससे हलके से पुछा - हम लोग कहाँ पहुंचने वाले है?
इक़बाल - बस अभी बरैली रुकेगी ये बस...
सुप्रिया - हम बरैली जा रहे है क्या?
इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरे गाँव जा रहे है... गाँव के नाम से आप परेशान मत होना... अब गाँव क्या और शहर क्या, सब कुछ मिल hi जाता है वहां भी...
सुप्रिया - बरैली से कितनी दूर है आपका गाँव?
इक़बाल - वहां से दो ढाई घंटे और आगे है... आप थक गए हो तोह रात कहीं रुक जायेंगे और फिर सुबह निकल लेंगे...
सुप्रिया - नहीं... मैं नहीं थकी...
इक़बाल - रात हो चली है... मेरा ख्याल से इतनी रात को वहां पहुंचना भी ठीक नहीं होगा... कहीं रुक hi लेंगे...
सुप्रिया - जैसा आप ठीक समझे...
लगभग 15-20 मिनट बाद बस रुकी और सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतर गए थे. अब सुप्रिया को शायद बुर्क़े से पहले से थोड़ा बेहतर दिखने लगा था. वह खुद से नीचे उतर पायी पर नीचे उतरने में उसका बुर्का थोड़ा सा ऊपर हो गया और उसकी लाल साड़ी चमक गयी.
एक औरत की आवाज़ आयी - आई.. इसने बुर्क़े के नीचे साड़ी पहनी है...
सुप्रिया बुरी तरह सकपका सी गयी और उसने जल्दी से अपना बुर्का नीचे किया.
इक़बाल - हाँ वह हमारे यहाँ पेहेनते है...
औरत - कहीं ये वह तोह नहीं जिसे वह लोग ढून्ढ रहे थे...
इक़बाल - अम्मा सठिया गयी हो क्या... चलो अपने काम से काम रखो..
इक़बाल ने फिर से सुप्रिया का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने साथ लेते हुए चलने लगा - आप घबराये नहीं... कुछ नहीं होगा...
आते जाते लोग बुर्का पहने हुए भी सुप्रिया को घूर रहे थे और कुछ तोह फब्तियां भी कास रहे थे - बुर्क़े के नीचे क्या है, बुर्क़े के नीचे… दिन में छुपायो, रात को दिखायो… हाथ इतने गोर गोर है, चूचियां कैसी होंगी इसकी… रात को तोह सब ऊपर से नीचे तक उतर जाता होगा…
ये सब सुन कर सुप्रिया की तोह हालत ख़राब होती जा रही थी और इक़बाल भी सिचुएशन को समझता हुआ किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू रख रहा था, उन सब लोगो की बातों की नज़र अंदाज़ करते हुए.
कुछ देर चलने के बाद वह लोग किसी बिल्डिंग के अंदर घुसे, शायद बस अड्डे के पास hi कोई सस्ता सा होटल था.
इक़बाल - एक रात के लिए कमरा चाहिए....
आदमी - 200 रूपए...
इक़बाल - हाँ... ये लो...
आदमी ने बुर्क़े में सुप्रिया की और देखते हुए कहा - मिया बीवी हो?
इक़बाल ने रूखी सी आवाज़ में कहा - हाँ....
आदमी - कहाँ जा रहे हो...
इक़बाल - आप से मतलब?
आदमी - ारी आजकल बड़े किस्से होते है न... भगा के ले जाते है बुर्क़े में...
इक़बाल - हम आपको वैसे लगते है क्या...
आदमी - नहीं नहीं... पर हमे तोह पूछना होता है न... आधार कार्ड वैगेरा कुछ है...
इक़बाल - आधार कार्ड कौन साथ में लेकर चलता है....
आदमी - हम्म्म... चलिए अपनी बेगम से बुलवा दीजिये ताकि हमे तस्सली हो जाए...
सुप्रिया ने सिचुएशन को समझते हुए अपनी आवाज़ थोड़ी कड़क करते हुए बोली - ये क्या तमाशा लगा रखा है... आपको मिया बीवी को कमरा देने में दिक्कत है तोह हम कहीं और चले जाते है... चलिए जी...
आदमी घबराहे हुए बोलै - ारी नहीं नहीं... बस वह मोहतरमा एक काण्ड हो गया था पीछे कहीं पर... कोई लड़की भगा लाया था... आप ये लीजिये कमरे की चाबी...
इक़बाल ने कमरे की चाबी ली और वह दोनों एक कमरे की और हो लिए. कमरे में घुसते hi इक़बाल ने लॉक लगाया और सुप्रिया ने अपने सर से बुर्का हटाया. इतना खराब सा कमरा होने के बावजूद उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने सालो बाद सांस ली हो.
सुप्रिया ने गहरी सांस ली - उफ्फ्फ... ऐसा लग रहा था जैसा दम घुट रहा हो अंदर...
इक़बाल ने एक पल के लिए सुप्रिया के मासूम से चेहरे की और देखा और फिर अपनी आँखें नीचे कर ली - आप आराम कीजिये... मैं कमरे में hi खाना ले ायूँगा…
सुप्रिया - पर इतना खर्चा कैसे...
इक़बाल - आप इस सब के बारे में मत सोचिये...
सुप्रिया ने कमरे में अंदर आकर देखा, कमरे में एक hi डबल बीएड था, उसकी भी चद्दर मैली सी थी. उसे तोह काफी महंगे महंगे होटल्स में ठहरने की आदत पद चुकी थी, और ये तोह... पर जो भी था, उसे फिलहाल तोह इसी में एडजस्ट करना पड़ेगा.
इक़बाल - मैं बहार से खाना लेकर आता हूँ… आप इतने हाथ मुँह धो लीजिये…
सुप्रिया एक डैम से घबरा सी गयी - यहाँ अकेले आपके बिना? होटल वाले कमरे में खाना नहीं पंहुचा सकते क्या?
इक़बाल - मैडमजी ये वैसा होटल नहीं है… मुझे लेकर hi आना होंगे… आप बेफिक्र रहिये मैं शुद्ध शाकाहारी खाना लेऊँगा…
सुप्रिया को खाने की चिंता नहीं थी, बस यहाँ अकेले रुकने की. कहीं इक़बाल के जाते hi कोई आ गया तोह? पर उसने किसी तरह से साहस बाँधा - ठीक है, पर आप जल्दी आना…
इक़बाल - बस यूँ गया और यूँ आया… आप कमरा बंद कर लेना और मेरे इलावा किसी के लिए मत खोलना…
सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया और इक़बाल के जाते hi कमरे का लॉक लगा दिया. अपने आप को अकेला पा कर वह बाथरूम में गयी, वह सुबह से अब तक टॉयलेट नहीं गयी थी. थोड़ी देर बाद वह अपना चेहरा धो कर बीएड पर बैठी थी. उसकी आँखें भरी हो चली थी, पूरे दिन की मानसिक और शारीरिक लड़ाई ने उसे थका दिया था.
पर तभी दरवाज़े पर ज़ोर ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आयी. सुप्रिया की आँख खुली और वह घबरा सी गयी. वह अपने आप को दरवाज़े के पास लायी, इस दरवाज़े में बहार की और देखने के लिए कोई ऑय होल नहीं था.
वह सोच hi रही थी की वह क्या करे की उसे बहार से इक़बाल की आवाज़ आयी - मैडमजी… मैं हूँ… खोलिये…
सुप्रिया ने रहत की सांस ली और इक़बाल के लिए दरवाज़ा खोल दिया. इक़बाल के हाथ में 2 प्लास्टिक बैग थे जिसके अंदर नेवसपपेर और प्लास्टिक की थैली में खाना पैक्ड था. और साथ hi पानी की बोतल भी.
इक़बाल को देख कर सुप्रिया ने चैन की सांस ली - काफी टाइम लग गया आपको…
इक़बाल - हाँ… थोड़ी भीड़ ज्यादा थी वहां… ये लीजिये, मैं आपके लिए ले आया हूँ…
सुप्रिया - आइये साथ में खा लेते है न…
इक़बाल - नहीं नहीं.. पहले आप खा ले… फिर मैं बाद में खा लूंगा…
सुप्रिया - आपने भी तोह सुबह से कुछ नहीं खाया है... साथ में कहते है नहीं तोह मैं भी नहीं खा रही...
इक़बाल सुप्रिया के इस लहज़े से थोड़ा सा हैरान हो गया, पर उसे अच्छा भी लगा - आप भी न... बिलकुल बच्चों की तरह ज़िद्द कर रही है... ाचा चलिए...
सुप्रिया - ज़िद्द नहीं है... बस जैसे आपको मेरी फ़िक्र है उसी तरह मुझे आपकी...
इक़बाल मुस्कुराते हुए बोलै - ठीक है... आपकी बात मान ली...
दोनों बिस्तर पर बैठ गए और इक़बाल ने नेवसपपेर को फैलते हुए खाना उस पर रख दिया. सुप्रिया और इक़बाल एक दुसरे के आमने सामने बैठे खाना खाने लगे. सुप्रिया को इतनी तेज़ भूक लगी थी की वह बिना कुछ कहे बस चुप चाप खाना खाये जा रही थी. एक hi प्लेट पर कहते हुए, बीच बीच में उनकी उंगलियां छु जाती, और सुप्रिया झट से अपना हाथ पीछे खींच लेती.
इक़बाल की नज़र कभी सुप्रिया के चेहरे की तरफ, कभी उसके खुले हुए बालों पर टिक जाती जो उसके गलो से लटक रहे थे. एक पल को इक़बाल के होठों पर हलकी सी मुस्कान आ गयी, पर उसने तुरंत hi अपना ध्यान प्लेट की तरफ कर लिया. सुप्रिया भी khate-khate जैसे उसकी नज़रों को अपने ऊपर महसूस कर पा रही थी.
सुप्रिया - क्या हुआ... आप रुक क्यों गए... खाइये न...
इक़बाल - कैसा लगा खाना आपको?
सुप्रिया - बहुत ाचा... आपको ाचा नहीं लगा क्या?
इक़बाल - आपको ाचा लगा तोह मुझे कैसे पसंद न आता...
अब सुप्रिया का पेट थोड़ा भर गया था और उसे फिर से आगे की चिंता सताने लगी थी - यहाँ से अब आगे कहाँ जायेंगे? आपका गाँव कहाँ है?
इक़बाल - आपने अमरोहा का नाम सुना है?
सुप्रिया ने दिमाग पर ज़ोर डाला - शायद... पक्का नहीं पता...
इक़बाल - दिल्ली से बहुत दूर नहीं है... बस उसी के पास मेरा गाँव है.. अब वैसे शायद उसे गाँव नहीं छोटा शहर hi कहेंगे...
सुप्रिया - वहां आप क्या बोलेंगे... मैं कौन हु?
इक़बाल - वहीँ सोच रहा हूँ... कुछ समझ hi नहीं आ रहा... मेरे ख्याल से तोह हमे वहां जाना hi नहीं चाहिए...
सुप्रिया थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली - क्यों आपको अपनी बीवी से डर लगता है, कहीं उन्हें कुछ ऐसा वैसा न लगे...
इक़बाल एक पल के लिए रुक गया और निगाहें नीचे कर ली - मैडमजी... शायद मैं आपको पहले खुल के नहीं बता पाया... वह वहां नहीं है?
सुप्रिया - तोह कहाँ है? अपने मायके गयी हैं क्या?
इक़बाल - नहीं... अब वह बस मेरी यादों में है... उसे गुज़रे हुए सालों हो चुके है और मैं तभी के बाद से कभी घर नहीं गया...
सुप्रिया एकदम से चौंकते हुए बोली - क्या!!?? पर आपने तोह कहा था...
इक़बाल - वह मेरे लिए तोह अभी भी वहीँ है...
सुप्रिया इक़बाल की आँखों में देख रही थी, जहाँ एक तूफ़ान सा आया हुआ था - कितने साल हो गए इस बात को?
इक़बाल - एहि कोई 20 साल...
सुप्रिया चौंक गयी - ओह्ह्ह.... बीस साल! वह तोह लगभग एक पूरी ज़िन्दगी हो जाती है... आप तभी से घर नहीं गए?
इक़बाल - जी हाँ... मेरे ख्याल से आपको वहां ले जाना सही नहीं होगा...
सुप्रिया - पर विक्रम ने कहा था...
इक़बाल की आवाज़ थोड़ी ुचि हो गयी - पर आप hi बताइये... वहां जा कर क्या बोलेंगे... आप मेरी हो कौन? मैं अपनी मालकिन को अपने साथ भगा लाया?
सुप्रिया एक डैम छुप पद गयी थी, फिर वह सोचते हुए बोली - आप ऐसा कीजिये... आप मुझे यहीं छोड़ कर अपने घर निकल जाइये... मैं सब मैनेज कर लुंगी अकेली...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरा वह मतलब नहीं था... मैं तोह बस आपके बारे में hi सोच रहा था...
सुप्रिया - मुझे भी समझ नहीं आ रहा मैं कहाँ जायु... मैं सोच रही हु की एक कॉल अपने घर झाँसी लगा लू क्या?
इक़बाल - सब्जी ने बोलै था की वह लोग वहां भी पहुंच गए होंगे... मेरे ख्याल से ये करना सही नहीं होगा...
सुप्रिया की हालत फिर से रोने वाली हो गयी थी - तोह आप hi बताइये मैं क्या करू? इससे तोह
इक़बाल - आप घबराइए नहीं, जब तक आप मेरे साथ है, मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा... आप रोइये नहीं...
सुप्रिया ने अपने आप को संभाला और बिस्तर से नेवसपपेर और खाने की पन्नियों को समेटने लगी.
इक़बाल - ारी. आप ये सब छोड़िये... आप बस आराम कीजिये...
सुप्रिया - नहीं... इसमें क्या...
इक़बाल - आप काफी थक गयी होंगी... आप यहाँ ऊपर बिस्तर पर सो जाइये... मैं नीचे एक चद्दर बिछा कर सो जायूँगा...
सुप्रिया - ारी नहीं... ज़मीन पर कैसे सोयेंगे आप... मैं सो जाती हूँ नीचे...
इक़बाल - मैडमजी... आप मेरी बात मानिये... मुझे आदत है सख्त ज़मीन पर सोने की... मुझे ऐसे नींद नहीं आने वाली इस गद्दे पर...
सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल की और देखा. उसे ाचा नहीं लग रहा था की इक़बाल इस तरह ज़मीन पर सोयेगा, पर साथ hi उन दोनों का इस छोटे से डबल बीएड पर सोना भी तोह कितना अजीब सा होगा. उसने न चाहते हुए भी हाँ में सर हिलाया.
थोड़ी देर बाद कमरे की लाइट बंद थी, सुप्रिया बिस्तर पर कम्बल ोड कर लेती थी, और इक़बाल ज़मीन पर नीचे. सुप्रिया को नींद नहीं आ रही थी, उसके दिमाग में एहि चल रहा था की इस समय विक्रम और अतुल कैसे होंगे, पता नहीं सब लोग उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. वह कैसे यहाँ फास गयी थी इस जंजाल में. और आगे का रास्ता भी कुछ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था.
सुप्रिया ने बीएड से नीचे झाँका तोह इक़बाल उससे पीठ करके लेता हुआ था. वह उसके लिए कितना कुछ कर रहा था, बिना झिझके अपना सब कुछ छोड़ कर उस यहाँ तक ले आया था. और अभी भी उसके आराम के लिए अपने आराम का त्याग कर रहा था. वह न होता तोह शायद वह अब तक कबकी उन लोगो के हाथ लग गयी होती.
सुप्रिया अपने खयालो से झूझती हुई जाने कब सो गयी. और शायद रात को hi सपने में उसे आगे का रास्ता थोड़ा सा समझ आया.
सुप्रिया जब उठी तोह सुबह हो चुकी थी और कमरे में बहार से रौशनी आ रही थी. सुप्रिया हड़बड़ा कर कड़ी हुई. इक़बाल अब नीचे नहीं लेता हुआ था, और उसने कमरे में इधर उधर देखा, वह वहां नहीं था. सुप्रिया थोड़ा सा घबराई पर फिर सुबह के सारे काम निपटताने के लिए वह बाथरूम में घुसी.
जब वह बहार निकली तोह इक़बाल जादुई तरीके से वापिस आ चूका था और बिस्तर पर बैठा हुआ था - गुड मॉर्निंग मैडमजी...
सुप्रिया ने मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया - गुड मॉर्निंग... कहाँ चले गए थे आप...
इक़बाल - बस नाश्ता लेने गया था... ये लीजिये गरम गरम समोसे और जलेबी...
सुप्रिया ने हलकी सी शिकायत भरी आवाज़ में कहा - आप मुझे जगा सकते थे जाने से पहले...
इक़बाल - बस मैं नहीं किया आपको जगाने का... आप सोती हुई इतनी अछि लग रही थी न...
सुप्रिया के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ गयी - शुक्रिया...
वह बिस्तर पर बैठी और एक जलेबी उठा कर खाने लगी. कल से वह एक hi जोड़ी कपड़ो में थी, और उसके पास और कुछ भी नहीं था. पर वह लोग यहाँ ज्यादा समय नहीं रुक सकते थे.
सुप्रिया ने खाते खाते कहा - इक़बाल... मैंने सोचा है... हमे आपके घर hi चलना चाहिए...
इक़बाल - मैडमजी आप समझ क्यों नहीं रहे हो...
सुप्रिया - एक तोह आप मुझे मैडमजी बोलना बंद करिये आप... कोई भी सुनेगा तोह उसे कितना अजीब लगेगा... आप मुझे सुप्रिया बुला सकते हो...
इक़बाल - मैडमजी...
सुप्रिया ने उसे टोकते हुए कहा - फिर से वही...
इक़बाल - मैं कोशिश करूँगा... एकदम से तोह शायद नहीं हो पायेगा...
सुप्रिया - हाँ... पूरी कोशिश करनी पड़ेगी... चलिए अब बस यहाँ से निकलते है... सीधे आपके गाँव...
इक़बाल - मेरे ख्याल से हम लोग दिल्ली चलते है... वहीँ कहीं छुप जायेंगे...
सुप्रिया - ाचा यहाँ से तोह बहार निकलते है न...
इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया और कुछ देर बाद सुप्रिया ने फिर से अपनी लाल साड़ी के ऊपर वह कला बुर्का दाल लिया था और वह दोनों कमरे से बहार निकल गए. इक़बाल थोड़ा आगे आगे और सुप्रिया उसके पीछे.
जैसी hi वह होटल के रिसेप्शन पर पहुंचे, उन्होंने देखा की 2 हट्टे काटते आदमी रिसेप्शन पर खड़े आदमी से तेज़ आवाज़ में बात कर रहे थे.
आदमी उसे अपने फ़ोन पर एक फोटो दिखते हुए - गौर से देख, देखा है इसे?
रिसेप्शन वाला आदमी - नहीं देखा भाई... बता तोह दिया...
आदमी - मेरा नंबर नोट कर, और कुछ भी अलग सा लगे तोह मुझे कॉल करियो...
आदमी ने मुद के इक़बाल की और देखा, जैसे उसे उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा हो. सुप्रिया ने भी उस आदमी की और देखा, ये वही आदमी था जो बस में उसे ढून्ढ रहा था. उसे देखते hi सुप्रिया की हालत ख़राब हो गयी और उसने अपनी मुट्ठी कास के बीच ली. उसने अपनी सांस बिलकुल रोक ली जैसे वह इंसान उसे उसकी साँसों से hi पहचान लेगा.
वह आदमी इक़बाल को एक नज़र देखते हुए वहां से बहार निकल गया. इक़बाल ने होटल वाले को पेमेंट करि और वह दोनों होटल से बहार आ गए.
सुप्रिया ने फुसफुसाते हुए कहा - ये लोग यहाँ तक कैसे पहुंच गए?
इक़बाल - पता नहीं मैडमजी...
सुप्रिया धीमी आवाज़ में पर गुस्से में बड़बड़ायी - मैंने कहा न मुझे मैडमजी मत बुलायो...
इक़बाल - जी...
सुप्रिया - बस हमे आपके घर की तरफ hi चलना चाहिए... हम लोग वहीँ सेफ रहेंगे...
इक़बाल - मुझे भी ऐसे hi लगता है... पर वहां...
सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... वहां मैं देख लुंगी सब...
इक़बाल और सुप्रिया फिर से एक बार बस अड्डे की तरफ चल पड़े. वह दोनों अमरोहा की और जाती हुई एक बस में छडे और इस बार सुप्रिया अपने खयालो में नहीं खोयी हुई थी बल्कि काफी सतर्क थी. बुर्क़े के अंदर से hi सब कुछ ध्यान से देखती हुई.
बस ने जल्दी hi चलना शुरू कर दिया और लगभग दो ढाई घंटे बाद इक़बाल ने बस कंडक्टर को बीच रास्ते बस रोकने के लिए कहा. सुप्रिया देख रही थी की यहाँ कोई बस स्टेशन तोह नहीं था पर शायद एहि उसके घर के सबसे पास की जगह थी.
सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतरे. इक़बाल ने वहीँ पास में एक रिक्शा वाले से बात करि और वह दोनों उस रिक्शा में बैठ गया. रिक्शा काफी सकदी सी थी, तोह वह दोनों एक दुसरे से चिपक कर बैठे थे. रिक्शा चलते हुए काफी हिल रही थी और सुप्रिया को ऐसा लग रहा था की कहीं वह गिर न जाये. उसने अपना एक हाथ पीछे ले जाते हुए लड़की के फत्ते को कास के पकड़ लिया.
रिक्शा वाला - बाबूजी... किसके घर जा रहे हो...
इक़बाल धीरे से बोलै - नक़वी साहब के यहाँ...
रिक्शा वाला - जी बाबूजी... आप उनके रिश्तेदार हो?
इक़बाल धीरे से बुदबुदाया - काका की आँखें ख़राब हो गयी है शायद...
रिक्शा वाला - कुछ कहा क्या?
इक़बाल - नहीं नहीं... चलिए...
रिक्शा पतली पतली गलियों के बीच में से होती हुई जा रही थी. ज्यादातर घर यहाँ पक्के hi थे, और वैसे नहीं जैसे सुप्रिया ने गाँव के नाम से सोचे थे. बस सड़क काफी ख़राब थी, बल्कि थी hi नहीं. लोग अपने घरो के बहार खड़े उन्हें hi घूर रहे थे, और कुछ बच्चे रिक्शा के साथ साथ चलते हुए सुप्रिया के बुर्क़े को छू रहे थे. इक़बाल ने उन्हें दांत के भगाया.
कुछ hi देर बाद रिक्शा एक बड़े से घर के सामने रुकी. शायद ये गाँव के सबसे बड़े घरो में से था. सुप्रिया को लगा की शायद वह गलत जगह आ गए है, इक़बाल का घर तोह इतना बड़ा नहीं हो सकता था.
पर इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे वहीँ उतारा और रिक्शा वाले के पैसे दिए. सुप्रिया बहार से उस घर को देखने लगी. बड़ी, ऊँची, मजबूत दीवारें चरों और से घर को घेरे हुए थी, और उनका रंग हल्का पीला, धुप में सुनहरी तरह चमक रहा था. बहार के मैं दरवाज़ा किसी मजबूत लकड़ी से बना हुआ बड़ा और भरी था, जिस पर नकाशी के पैटर्न्स उकेरे हुए थे.
इक़बाल ने दरवाज़े पर हलके से खटखटाया और दरवाज़ा अपने आप hi खुल गया. इक़बाल ने कुछ कदम अंदर लिए और सुप्रिया भी उसके पीछे पीछे अंदर हो ली. अंदर कदम रखते hi एक विशाल सा आँगन दिखाई दिया. ानगर में पेड़ पौधे और फूल लगे हुए थे. घर की दीवारों पर जालीदार खिड़कियां थी. सुप्रिया को एकदम से लगा जैसे एक खिड़की में से कोई झाँक रहा हो.
इक़बाल ने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया और कुण्डी लगा ली. और तभी एक बड़ी उम्र की औरत आँगन में बहार आयी और ज़ोर से बोली - कौन.....
इक़बाल - अम्मा जी... मैं...
उस औरत के कदम इक़बाल को देखते hi रुक से गए और उसका रंग उड़ गया, जैसे किसी भूत को देख लिया हो. फिर वह अपने आप को संभालती हुई इक़बाल की और दौड़ी - इक़बाल.... इक़बाल... तू आ गया... बीटा...
वह इक़बाल के सीने से चिपक गयी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. उसने आवाज़ सुन कर अंदर से दो और औरते बहार आयी. एक थोड़ी बड़ी, पर अम्मा जी से छोटी, और एक बहुत hi जवान सी प्यारी सी लड़की. सुप्रिया उन सब को बारी बारी देख रही थी. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने तोह इक़बाल से पुछा भी नहीं था की उसके घर में कौन कौन है.
अम्मी जी - रब्बू देख... देख कौन आया... हिना देख... तेरा चाचा आ गया...
शायद उस जवान सी लड़की का नाम हिना था, वह भी भागी भागी इक़बाल की तरफ गयी - चाचू....
इक़बाल की आँखों से भी आंसू बह रहे थे - ारी हिना... इतनी बड़ी हो गयी तू तोह... कितने साल की हो गयी... पहचान में hi नहीं आ रही...
हिना - आप तोह हम सबको भूल hi गए थे न.... अभी बस कुछ दिन पहले तोह मेरा उनीस्वा जन्मदिन गया है...
वह दोनों इक़बाल को घेरे खड़े थे और अम्मा जी उसके चेहरे को हाथ लगा कर छु रही थी, जैसे वह सच हो या कोई सपना. शायद किसी की नज़र सही से सुप्रिया पर पड़ी नहीं थी, सिवाए उस तीसरे औरत के.
अम्मी जी - रुबीना तू भी तोह मिल ले... तेरा देवर आ गया.
रुबीना - अम्मी जी... पर ये कौन है इसके साथ...
अम्मा जी का ध्यान अब जाकर बुर्का ओढे सुप्रिया पर गया - हाँ भाई... ये कौन है... किसको ले आया साथ में...
हिना सुप्रिया के पास पहुंच कर कड़ी हुई और उसे बारीकी से देखने लगी.
अम्मी जी - चुप क्यों कड़ी है... बोल... हिना, ज़रा इसका बुर्का ऊपर कर...
इससे पहले की हिना उसका बुर्का ऊपर करती, सुप्रिया ने खुद hi उसे ऊपर कर दिया और तीनो लोग उसकी सुन्दर प्यारी मासूम सी शकल को देखते रह गए थे. बुर्का हट्टे hi अंदर उसकी लाल साड़ी भी चमक रही थी. रुबीना और अम्मा जी एक डैम दांग खड़े सुप्रिया की और देख रहे थे.
अम्मी जी भड़कते हुए बोली - किसको ये ले आया... ये तोह हमारे यहाँ की लग भी नहीं रही है...
इससे पहले इक़बाल कुछ कहता उसकी भाभी ने उसे काट दिया - बोलो भी... इतना सालो बाद आये हो, और अपने साथ ये किसी उठा लाये...
अम्मी - कौन है ये चिनार... ये कोई रंडी बाजार तोह है नहीं की किसी को भी उठा लायो...
ये सब सुनते hi सुप्रिया की आँखें नीचे झुकी हुई थी, पता नहीं इक़बाल ने कुछ सोचा था या नहीं, या फिर उसे hi कुछ बोलना पड़ेगा.
इक़बाल - अम्मी जी कुछ भी बोलते हो आप....
अम्मी - ारी तोह बता न... तेरा भाई इसे काट के फेंक देगा... तुझे पता तोह है...
हिना जो सुप्रिया के पास कड़ी उसे बारीकी से देख रही थी, बोल पड़ी - चाचू... कहीं ये मेरी नयी चची तोह नहीं?
इक़बाल जल्दी से बोलै - नहीं नहीं...
पर सुप्रिया ने उसे बीच में रोकते हुए अपनी कांपती हुई आवाज़ में कहा - जी... मैं आपकी नयी.... चची hi हूँ...
इक़बाल ने एकदम से झटके से पलट कर सुप्रिया की और देखा, उसे तोह अब तक नहीं पता था वह क्या बोलने वाला था, पर मैडमजी ये क्या बोल बैठी थी.
अम्मी ने सुप्रिया को घूरा और फिर इक़बाल की और देखा - चची!!! चची है ये इसकी!! तूने फिर से... लाहौल!!!
अम्मी अपना सर पकड़ते हुए धम्म से आँगन में बिछी हुई एक चारपाई पर बैठ गयी.
सुप्रिया एक बस में बुर्का पहने बैठी थी. बहार से उसका चेहरा नहीं दिख रहा था था पर उसके चेहरे पर दहशत साफ़ झलक रही थी. और आखिर क्यों न झलके, पिछले एक घंटा उसके लिए किसी भनायक मूवी के दृश्यों से काम नहीं था. सुप्रिया सोचने लगी की वह आज यहाँ तक कैसे पहुंची थी.
विक्रम के कॉल करने के 15 मिनट बाद hi इक़बाल वहां मंदिर में उनके पास पहुंच गया था. जैसे hi इक़बाल वहां पंहुचा विक्रम उसे साड़ी सिचुएशन समझने लगा. सुप्रिया के दिमाग ने तोह काम करना hi बंद कर दिया था और उसे सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग क्या बात कर रहे थे और आगे क्या होगा.
इक़बाल - सब्जी… भागना क्यों… आने दो जिसको आना है, मैं सब को देख लूंगा… मैडमजी के लिए तोह मैं किसी से भी भीड़ जायूँगा…
विक्रम - इक़बाल मुझे कोई शक नहीं इस बात का, पर 10 मुस्टंडो के आगे हम दोनों hi नहीं टिक पाएंगे. और उसके बाद वह सुप्रिया का क्या हाल करेंगे, तुम भी समझ सकते हो... मैं अपने लिए नहीं कह रहा, बस सुप्रिया के खातिर इस वक़्त यहाँ से निकल जाना hi बेहतर है...
इक़बाल के चेहरे पर उलझन और चिंता साफ़ दिख रही थी - पर सब्जी... वहां hi क्यों जाना? और आपको वहां के बारे में पता भी कैसे चला...
विक्रम ने उसके सवाल को अनसुना करते हुए पूछा - तुमने किसी और से तोह वहां का ज़िक्र नहीं किया न?
इक़बाल सीरियस होते हुए बोलै - नहीं सब्जी... कभी भी नहीं...
विक्रम - तोह बस फिर वही परफेक्ट जगह है. बस कुछ महीनो की बात है... जैसे hi सारा मामला ठंडा पड़ता है, मैं वहां आकर सुप्रिया को ले जायूँगा...
इक़बाल - सब्जी पर....
विक्रम - तुम hi मुझे बताया... क्या वहां कोई बहार वाला आकर तुम्हारी मर्ज़ी के बिना सुप्रिया को ले जा सकता है?
इक़बाल - नहीं सब्जी... वह तोह मुमकिन hi नहीं है...
विक्रम - तोह फिर सोच क्या रहे हो, तुम सुप्रिया को लेकर वहां निकलो... (विक्रम ने सुप्रिया की और देख कर उसे पुकारा) सुप्रिया... सुप्रिया सुनो...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया, जैसे किसी बुरे सपने से जाएगी हो - हाँ....
विक्रम - सुप्रिया... अपना फ़ोन दो मुझे... इक़बाल तुम भी अपने फ़ोन की सिम निकाल कर मुझे दो...
विक्रम सुप्रिया का फ़ोन लेकर उसके फ़ोन की सिम निकलने लगा और इक़बाल ने भी उसे अपने फ़ोन की सिम दे दी - मैं नहीं चाहता की तुम लोग वहां ट्रेस हो... इक़बाल तुम गाडी में वेट करो मैं 2 मं में सुप्रिया को लेकर आता हूँ...
इक़बाल - जी सब्जी...
विक्रम सुप्रिया के साथ अकेला वहां रह गया था, विक्रम ने प्यार से उसके दोनों गालो को पकड़ा - सुप्रिया... ी क्नोव ये तुम्हे अभी मुश्किल लग रहा होगा, पर इस समय तुम्हारा यहाँ से निकलना काफी ज़रूरी है...
सुप्रिया की आखें नाम थी, और होंठ काँप रहे थे - मुझे तोह कुछ समझ hi नहीं आ रहा... ये सब क्या हो रहा है... मैं ऐसे कैसे यहाँ से निकल जायु...
विक्रम - ट्रस्ट में सुप्रिया... मैंने भी नहीं सोचा था हम इस हालत में होंगे... पर अभी ये सब बात करने का फायदा नहीं है... हम जितनी देर करेंगे ईशा के लोगो को उतना hi टाइम मिलेगा तुम तक पहुंचने के लिए...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया - आप आ जायेंगे न... जैसे hi सब ठीक होगा?
विक्रम - हाँ बिलकुल... ये भी कोई पूछने की बात है...
सुप्रिया - और अतुल और बाकी सब? अगर ईशा ने उन्हें कुछ कर दिया तोह...
विक्रम - वह सब मैं संभल लूंगा... उसके लिए मेरा अभी घर पहुंचना बहुत ज़रूरी है...
सुप्रिया - और वहां कोई गड़बड़ हो गयी तोह मैं कैसे सम्भालूंगी?
विक्रम - बस जैसी भी सिचुएशन हो तुम बस उस हिसाब से अपने आप को एडजस्ट करती जाना... बाकी सब इक़बाल संभल लेगा... प्रॉमिस करो तुम घबरायोगी नहीं?
सुप्रिया ने धीरे से कहा - प्रॉमिस...
विक्रम - चलो अब अपने ासु पोचो और अपने आपको सम्भालो...
सुप्रिया और विक्रम बहार चलते हुए आये और सुप्रिया सिर्फ अपने हैंड बैग के साथ गाडी में बैठ गयी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज वह दुबारा विदा हो रही हो. जैसे hi वह गाडी में बैठी इक़बाल ने फर्राटे से गाडी चलनी शुरू कर दी.
सुप्रिया पीछे की सीट पर परेशान बैठी थी, तभी उसे कुछ सूझा - इक़बाल... एक बार आप विक्रम के ऑफिस की तरफ ले लेंगे क्या?
इक़बाल - मैडमजी पर... सब्जी ने बोलै है की सीधा लखनऊ से बहार निकलने के लिए...
सुप्रिया ने उससे प्यार से रिक्वेस्ट किया - बस एक बार... प्लीज...
इक़बाल - ठीक है मैडमजी... जैसा आप कहे...
इक़बाल ने गाडी मोड़ते हुए विक्रम के ऑफिस की तरफ कर ली. सुप्रिया बस वहां पहुंच कर अतुल से बात करना चाहती थी, और उसे जो कुछ हुआ उसके बारे में बताना चाहती थी. ऐसी अचानक गायब होने से पता नहीं अतुल उसके बारे में क्या सोचने वाला था. कुछ hi देर में गाडी विक्रम के ऑफिस के पास पहुंच रही थी, वहां पहले से नीचे काफी भीड़ इखट्टा थी.
भीड़ देख कर इक़बाल के माथे पर बल पड़ता जा रहा था - मैडमजी यहाँ कुछ गड़बड़ है... गाडी मोड़ लू क्या?
सुप्रिया - नहीं बस... थोड़ा सा और पास...
इक़बाल ने गाडी को थोड़ा और पास किया, और सुप्रिया ने अपना सर खिड़की से बहार निकल कर भीड़ में देखना शुरू किया. उसे वहां अतुल दिख गया! 4-5 हट्टे काटते लोग उसे पकड़ कर घेरे खड़े थे. और ऑफिस के बाकी लोग ये सब तमाशा देख रहे थे. थोड़ी देर पर दिशा भी कड़ी थी.
दिशा की नज़र भी सुप्रिया पर पड़ी, और वह तेज़ कदमो से उसकी और आयी.
जैसे hi दिशा उसकी खिड़की तक पहुंची, सुप्रिया के रुंधे हुए गले से थोड़ी सी आवाज़ निकली - दिशा... ये सब क्या... अतुल...
दिशा - सुप्रिया तुम बताया... ये सब क्या हो रहा है... ऐसा लग रहा है वह लोग तुम्हे ढून्ढ रहे है... क्या हुआ है?
शायद इतनी भीड़ में भी किसी ने दिशा को सुप्रिया से बात करते हुए देख लिया और उसकी और इशारा किया. वह 4-5 लोग अतुल को छोड़ते हुए उनकी गाडी की और चिल्लाते हुए झपटे.
आदमी - वह रही... वह रही... रोक उसे...
इक़बाल भी ज़ोर से चिल्लाया - मैडमजी!!! ये इसी तरफ आ रहे है... हमे निकलना होगा...
इक़बाल ने जल्दी से गाडी को रिवर्स में चलाया, और थोड़ा पीछे होते hi गाडी को उडाता हुआ वहां से निकलने लगा. सुप्रिया ने पीछे पलट कर देखा, कुछ लोग एक दूसरी गाडी में उनका पीछा करने लगे थे.
इक़बाल गुस्से और तनाव में बोलै - मैंने बोलै था न, यहाँ आना सही नहीं होगा...
सुप्रिया इक़बाल की ये हालत देख कर बुरी तरह घबरा गयी थी - अब क्या करेंगे इक़बाल...
इक़बाल अपनी आवाज़ में थोड़ी नरमी लाया - आप घबरायो नहीं...
इक़बाल एक के बाद एक मोड़ लेता हुआ वहां से तेज़ी से निकलने लगा. सुप्रिया को अब पीछे आती हुई गाडी तोह नहीं दिख रही थी, पर उसे पता था की वह ज्यादा दूर नहीं होंगे. थोड़ी देर बाद इक़बाल ने गाडी एक जगह लगायी.
सुप्रिया - यहाँ क्यों गाडी रोक दी...
इक़बाल - मैडमजी.. उन्हें इस गाडी का नंबर दिख गया है... हमे इसे यहीं छोड़ना होगा...
सुप्रिया - अब आगे क्या?
इक़बाल ने गाडी की डिक्की खोली और उसमे से एक काला बुर्का निकला - मैडमजी आप ये पेहेन लो... आपकी लाल साड़ी किसी का भी ध्यान खींच लेगी अपनी और. सुप्रिया ने जल्दी से काला बुर्का अपने कपड़ो के ऊपर डाला, वह ऊपर से नीचे तक इसमें धक् गयी थी, बस बहार से उसकी आँखें नज़र आ रही थी.
इक़बाल - और अपनी चप्पल भी उतार कर ये जूती पेहेन लीजिये... आपकी चप्पल कुछ ज्यादा hi चमकीली है...
सुप्रिया - ये मेरे आएगी भी?
इक़बाल - तरय तोह करिये....
इक़बाल ने झुक कर सुप्रिया को जूती पहननी शुरू करि, वह बड़ी मुश्किल से सुप्रिया के पैरो में फांसी. सुप्रिया बुर्क़े को सही से संभल नहीं पा रही थी, और वह बार बार उसकी आँखों पा आ रहा था- मुझे इसमें कुछ भी नहीं दिख रहा...
इक़बाल - आप बस मेरा हाथ पकड़ लो...
इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ कास के पकड़ लिया और वह उसे कहीं ले जाने लगा. सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग कहाँ जा रहे थे. सुप्रिया बस इक़बाल का हाथ पकडे उसे साथ खींची जा रही थी, उसे इक़बाल पर पूरा भरोसा था.
कुछ hi देर में उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी बस अड्डे पर हो, और इक़बाल ने उसे धीरे से कहा - ये इस बस में छेड़ना है हमे, आप पहले छाड़िये..
सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था पर इक़बाल ने उसकी कमर पकड़ते हुए उसे बस में ऊपर छडा दिया और फिर उसके पीछे आते हुए उसे एक खिड़की वाली सीट पर बिठा दिया और वह उसके साथ में बैठ गया. सुप्रिया को बुर्क़े की जाली से बस हल्का फुल्का hi दिख रहा था, बस जल्दी hi खचाखच भर गयी थी.
सुप्रिया आगे वाली सीट की रेलिंग को पकड़ कर कास के बैठी हुई थी, इक़बाल उससे ठीक सत्ता हुआ साथ में बैठा था. बस अब चलने को शुरू hi हुई थी की एक डैम से बहार कुछ शोर शराबा हुआ. 2-3 लोग कंडक्टर को धक्का देते हुए बस में छडे और इधर उधर देखने लगे.
कंडक्टर - क्या है ये सब
सुप्रिया के कानो में एक आदमी की आवाज़ आयी - ए... किसी लाल साड़ी वाली लड़की को देखा है यहाँ...
कंडक्टर - जो है तुम्हारे सामने है न...
आदमी ने एक और लाल साड़ी वाली औरत को देखते हुए कहा - ये वाली नहीं... थोड़ी जवान सी...
कंडक्टर - और तोह कोई नहीं...
आदमी ने सुप्रिया की और घूर कर देखा, सुप्रिया ने अपनी आँखें नीचे कर ली - और ये जो बुर्क़े वाली हैं? अपने बुर्क़े ऊपर करो...
शायद बस में सुप्रिया के इलावा भी 2-3 और औरते थी जिन्होंने बुर्का पहना हुआ था.
ये सुनते hi एक और आदमी बोल पड़ा - ये क्या बदतमीज़ी है... तुम हमारी औरतो के बुर्क़े उतारोगे...
ये सुन कर और भी लोग भड़क गए थे - हाँ.. अभी बुलायो हवलदार ko...haan हाँ... धक्के मारो इन्हे नीचे...
आदमी सब को भड़कते देख थोड़ा पीछे हट गया - ाचा ठीक है… अपना नंबर कंडक्टर को दे रहा हूँ, किसी के पास भी कोई खबर हो तोह इस नंबर पर कॉल करना… दस हज़ार इनाम मिलेगा…
वह आदमी कंडक्टर को अपना नंबर देने के बाद बस से नीचे उतर गए और बस चलने लगी. पर सुप्रिया का दिल अभी भी तेज़ तेज़ धड़क रहा था. अगर आज उसका बुर्का नीचे हो जाता तोह शायद.....
सुप्रिया ने पाया की टेंशन के मारे उसने इक़बाल का हाथ कास के पकड़ा हुआ था. इक़बाल उससे धीरे से फुसफुसाया - आप घबराये नहीं... बस हम निकल hi गए है यहाँ से...
सुप्रिया ने अपने हाथ की पकड़ ढीली करि, उसके हाथ पसीने से भरा हुआ था. बस अब फुल स्पीड चलने लगी थी और कुछ 15-20 मिनट बाद हाईवे की सड़क तक पहुंच गयी थी. सुप्रिया की आँखों में अभी भी दहशत सी hi थी, पर इतनी साड़ी भाग दौड़ के बाद वह बुरी तरह थक चुकी थी और उसकी आँखें बंद होने लगी थी.
धीरे धीरे उसका सर इक़बाल के कंधे पर लटक गया और उसकी आँख लग गयी.
पर सपने में उसे आराम कहाँ था. 5-7 मर्दो ने उसे घेरा हुआ है, और उसके हाथ और पेअर पकडे हुए है. कोई उसकी चूचियां चूस रहा है तोह कोई उसकी गांड दबा रहा था. सारे मर्दो ने अपने लुंड बहार निकाले हुए थे और वह उसके शरीर के अलग अलग हिस्सों पर छू रहे थे. एक एक करके सबने अपने लुंड उसके मुँह में डालने शुरू किये. और फिर एक मोटा सा लुंड उसके छेड़ में तेजी से घुस गया.
सुप्रिया चीखती हुई जाएगी, उसका चेहरा पसीनो से टर्र था. इक़बाल ने सुप्रिया को पकड़ते हुए पुछा - आप ठीक हो न...
सुप्रिया तेज़ सांस लेते हुए बोली - हाँ... कुछ नहीं... बस सपना था.. थोड़ी पानी मिलेगा क्या?
इक़बाल - हाँ बस अभी जैसी hi गाडी रूकती है... मैं पानी लेता हूँ...
साथ बैठे आदमी ने इक़बाल से पुछा हुआ - क्या हुआ? सब ठीक है....
इक़बाल - जी जी... बस आदत नहीं है इसको बस में सफर की... थोड़ा जी ख़राब है...
एक और औरत हस्ते हुए बोली - ाचा... हवाई जवाज में बैठे है क्या तेरी जोरू...
इक़बाल हस्ते हुए बोलै - हाँ अम्मा... एहि समाज लो... हवाई जहाज में hi बैठे है...
सब लोग हसने लगे पर सुप्रिया तोह जैसे अपनी उलझनों में खोयी हुई थी. उसने बुर्क़े की जाली से बहार की और देखा, बहार अब कोई शहर नहीं बल्कि जंगल सा था. अँधेरा भी होता जा रहा था. इतना अफरा तफरी में उसे तोह ये भी नहीं पुछा था की वह जा कहाँ रही थी.
बस में गाने चल रहे थे, शायद उसकी हालत पर हस्ते हुए:
भरम भाप के
शर्म धाप के
करम नाप के
भागा रे
करम नाप के
सुप्रिया ने अपना दिमाग बंद करने की कोशिश करि पर वह बंद hi नहीं हो रहा था. वह इक़बाल की और हुई और उससे हलके से पुछा - हम लोग कहाँ पहुंचने वाले है?
इक़बाल - बस अभी बरैली रुकेगी ये बस...
सुप्रिया - हम बरैली जा रहे है क्या?
इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरे गाँव जा रहे है... गाँव के नाम से आप परेशान मत होना... अब गाँव क्या और शहर क्या, सब कुछ मिल hi जाता है वहां भी...
सुप्रिया - बरैली से कितनी दूर है आपका गाँव?
इक़बाल - वहां से दो ढाई घंटे और आगे है... आप थक गए हो तोह रात कहीं रुक जायेंगे और फिर सुबह निकल लेंगे...
सुप्रिया - नहीं... मैं नहीं थकी...
इक़बाल - रात हो चली है... मेरा ख्याल से इतनी रात को वहां पहुंचना भी ठीक नहीं होगा... कहीं रुक hi लेंगे...
सुप्रिया - जैसा आप ठीक समझे...
लगभग 15-20 मिनट बाद बस रुकी और सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतर गए थे. अब सुप्रिया को शायद बुर्क़े से पहले से थोड़ा बेहतर दिखने लगा था. वह खुद से नीचे उतर पायी पर नीचे उतरने में उसका बुर्का थोड़ा सा ऊपर हो गया और उसकी लाल साड़ी चमक गयी.
एक औरत की आवाज़ आयी - आई.. इसने बुर्क़े के नीचे साड़ी पहनी है...
सुप्रिया बुरी तरह सकपका सी गयी और उसने जल्दी से अपना बुर्का नीचे किया.
इक़बाल - हाँ वह हमारे यहाँ पेहेनते है...
औरत - कहीं ये वह तोह नहीं जिसे वह लोग ढून्ढ रहे थे...
इक़बाल - अम्मा सठिया गयी हो क्या... चलो अपने काम से काम रखो..
इक़बाल ने फिर से सुप्रिया का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने साथ लेते हुए चलने लगा - आप घबराये नहीं... कुछ नहीं होगा...
आते जाते लोग बुर्का पहने हुए भी सुप्रिया को घूर रहे थे और कुछ तोह फब्तियां भी कास रहे थे - बुर्क़े के नीचे क्या है, बुर्क़े के नीचे… दिन में छुपायो, रात को दिखायो… हाथ इतने गोर गोर है, चूचियां कैसी होंगी इसकी… रात को तोह सब ऊपर से नीचे तक उतर जाता होगा…
ये सब सुन कर सुप्रिया की तोह हालत ख़राब होती जा रही थी और इक़बाल भी सिचुएशन को समझता हुआ किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू रख रहा था, उन सब लोगो की बातों की नज़र अंदाज़ करते हुए.
कुछ देर चलने के बाद वह लोग किसी बिल्डिंग के अंदर घुसे, शायद बस अड्डे के पास hi कोई सस्ता सा होटल था.
इक़बाल - एक रात के लिए कमरा चाहिए....
आदमी - 200 रूपए...
इक़बाल - हाँ... ये लो...
आदमी ने बुर्क़े में सुप्रिया की और देखते हुए कहा - मिया बीवी हो?
इक़बाल ने रूखी सी आवाज़ में कहा - हाँ....
आदमी - कहाँ जा रहे हो...
इक़बाल - आप से मतलब?
आदमी - ारी आजकल बड़े किस्से होते है न... भगा के ले जाते है बुर्क़े में...
इक़बाल - हम आपको वैसे लगते है क्या...
आदमी - नहीं नहीं... पर हमे तोह पूछना होता है न... आधार कार्ड वैगेरा कुछ है...
इक़बाल - आधार कार्ड कौन साथ में लेकर चलता है....
आदमी - हम्म्म... चलिए अपनी बेगम से बुलवा दीजिये ताकि हमे तस्सली हो जाए...
सुप्रिया ने सिचुएशन को समझते हुए अपनी आवाज़ थोड़ी कड़क करते हुए बोली - ये क्या तमाशा लगा रखा है... आपको मिया बीवी को कमरा देने में दिक्कत है तोह हम कहीं और चले जाते है... चलिए जी...
आदमी घबराहे हुए बोलै - ारी नहीं नहीं... बस वह मोहतरमा एक काण्ड हो गया था पीछे कहीं पर... कोई लड़की भगा लाया था... आप ये लीजिये कमरे की चाबी...
इक़बाल ने कमरे की चाबी ली और वह दोनों एक कमरे की और हो लिए. कमरे में घुसते hi इक़बाल ने लॉक लगाया और सुप्रिया ने अपने सर से बुर्का हटाया. इतना खराब सा कमरा होने के बावजूद उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने सालो बाद सांस ली हो.
सुप्रिया ने गहरी सांस ली - उफ्फ्फ... ऐसा लग रहा था जैसा दम घुट रहा हो अंदर...
इक़बाल ने एक पल के लिए सुप्रिया के मासूम से चेहरे की और देखा और फिर अपनी आँखें नीचे कर ली - आप आराम कीजिये... मैं कमरे में hi खाना ले ायूँगा…
सुप्रिया - पर इतना खर्चा कैसे...
इक़बाल - आप इस सब के बारे में मत सोचिये...
सुप्रिया ने कमरे में अंदर आकर देखा, कमरे में एक hi डबल बीएड था, उसकी भी चद्दर मैली सी थी. उसे तोह काफी महंगे महंगे होटल्स में ठहरने की आदत पद चुकी थी, और ये तोह... पर जो भी था, उसे फिलहाल तोह इसी में एडजस्ट करना पड़ेगा.
इक़बाल - मैं बहार से खाना लेकर आता हूँ… आप इतने हाथ मुँह धो लीजिये…
सुप्रिया एक डैम से घबरा सी गयी - यहाँ अकेले आपके बिना? होटल वाले कमरे में खाना नहीं पंहुचा सकते क्या?
इक़बाल - मैडमजी ये वैसा होटल नहीं है… मुझे लेकर hi आना होंगे… आप बेफिक्र रहिये मैं शुद्ध शाकाहारी खाना लेऊँगा…
सुप्रिया को खाने की चिंता नहीं थी, बस यहाँ अकेले रुकने की. कहीं इक़बाल के जाते hi कोई आ गया तोह? पर उसने किसी तरह से साहस बाँधा - ठीक है, पर आप जल्दी आना…
इक़बाल - बस यूँ गया और यूँ आया… आप कमरा बंद कर लेना और मेरे इलावा किसी के लिए मत खोलना…
सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया और इक़बाल के जाते hi कमरे का लॉक लगा दिया. अपने आप को अकेला पा कर वह बाथरूम में गयी, वह सुबह से अब तक टॉयलेट नहीं गयी थी. थोड़ी देर बाद वह अपना चेहरा धो कर बीएड पर बैठी थी. उसकी आँखें भरी हो चली थी, पूरे दिन की मानसिक और शारीरिक लड़ाई ने उसे थका दिया था.
पर तभी दरवाज़े पर ज़ोर ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आयी. सुप्रिया की आँख खुली और वह घबरा सी गयी. वह अपने आप को दरवाज़े के पास लायी, इस दरवाज़े में बहार की और देखने के लिए कोई ऑय होल नहीं था.
वह सोच hi रही थी की वह क्या करे की उसे बहार से इक़बाल की आवाज़ आयी - मैडमजी… मैं हूँ… खोलिये…
सुप्रिया ने रहत की सांस ली और इक़बाल के लिए दरवाज़ा खोल दिया. इक़बाल के हाथ में 2 प्लास्टिक बैग थे जिसके अंदर नेवसपपेर और प्लास्टिक की थैली में खाना पैक्ड था. और साथ hi पानी की बोतल भी.
इक़बाल को देख कर सुप्रिया ने चैन की सांस ली - काफी टाइम लग गया आपको…
इक़बाल - हाँ… थोड़ी भीड़ ज्यादा थी वहां… ये लीजिये, मैं आपके लिए ले आया हूँ…
सुप्रिया - आइये साथ में खा लेते है न…
इक़बाल - नहीं नहीं.. पहले आप खा ले… फिर मैं बाद में खा लूंगा…
सुप्रिया - आपने भी तोह सुबह से कुछ नहीं खाया है... साथ में कहते है नहीं तोह मैं भी नहीं खा रही...
इक़बाल सुप्रिया के इस लहज़े से थोड़ा सा हैरान हो गया, पर उसे अच्छा भी लगा - आप भी न... बिलकुल बच्चों की तरह ज़िद्द कर रही है... ाचा चलिए...
सुप्रिया - ज़िद्द नहीं है... बस जैसे आपको मेरी फ़िक्र है उसी तरह मुझे आपकी...
इक़बाल मुस्कुराते हुए बोलै - ठीक है... आपकी बात मान ली...
दोनों बिस्तर पर बैठ गए और इक़बाल ने नेवसपपेर को फैलते हुए खाना उस पर रख दिया. सुप्रिया और इक़बाल एक दुसरे के आमने सामने बैठे खाना खाने लगे. सुप्रिया को इतनी तेज़ भूक लगी थी की वह बिना कुछ कहे बस चुप चाप खाना खाये जा रही थी. एक hi प्लेट पर कहते हुए, बीच बीच में उनकी उंगलियां छु जाती, और सुप्रिया झट से अपना हाथ पीछे खींच लेती.
इक़बाल की नज़र कभी सुप्रिया के चेहरे की तरफ, कभी उसके खुले हुए बालों पर टिक जाती जो उसके गलो से लटक रहे थे. एक पल को इक़बाल के होठों पर हलकी सी मुस्कान आ गयी, पर उसने तुरंत hi अपना ध्यान प्लेट की तरफ कर लिया. सुप्रिया भी khate-khate जैसे उसकी नज़रों को अपने ऊपर महसूस कर पा रही थी.
सुप्रिया - क्या हुआ... आप रुक क्यों गए... खाइये न...
इक़बाल - कैसा लगा खाना आपको?
सुप्रिया - बहुत ाचा... आपको ाचा नहीं लगा क्या?
इक़बाल - आपको ाचा लगा तोह मुझे कैसे पसंद न आता...
अब सुप्रिया का पेट थोड़ा भर गया था और उसे फिर से आगे की चिंता सताने लगी थी - यहाँ से अब आगे कहाँ जायेंगे? आपका गाँव कहाँ है?
इक़बाल - आपने अमरोहा का नाम सुना है?
सुप्रिया ने दिमाग पर ज़ोर डाला - शायद... पक्का नहीं पता...
इक़बाल - दिल्ली से बहुत दूर नहीं है... बस उसी के पास मेरा गाँव है.. अब वैसे शायद उसे गाँव नहीं छोटा शहर hi कहेंगे...
सुप्रिया - वहां आप क्या बोलेंगे... मैं कौन हु?
इक़बाल - वहीँ सोच रहा हूँ... कुछ समझ hi नहीं आ रहा... मेरे ख्याल से तोह हमे वहां जाना hi नहीं चाहिए...
सुप्रिया थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली - क्यों आपको अपनी बीवी से डर लगता है, कहीं उन्हें कुछ ऐसा वैसा न लगे...
इक़बाल एक पल के लिए रुक गया और निगाहें नीचे कर ली - मैडमजी... शायद मैं आपको पहले खुल के नहीं बता पाया... वह वहां नहीं है?
सुप्रिया - तोह कहाँ है? अपने मायके गयी हैं क्या?
इक़बाल - नहीं... अब वह बस मेरी यादों में है... उसे गुज़रे हुए सालों हो चुके है और मैं तभी के बाद से कभी घर नहीं गया...
सुप्रिया एकदम से चौंकते हुए बोली - क्या!!?? पर आपने तोह कहा था...
इक़बाल - वह मेरे लिए तोह अभी भी वहीँ है...
सुप्रिया इक़बाल की आँखों में देख रही थी, जहाँ एक तूफ़ान सा आया हुआ था - कितने साल हो गए इस बात को?
इक़बाल - एहि कोई 20 साल...
सुप्रिया चौंक गयी - ओह्ह्ह.... बीस साल! वह तोह लगभग एक पूरी ज़िन्दगी हो जाती है... आप तभी से घर नहीं गए?
इक़बाल - जी हाँ... मेरे ख्याल से आपको वहां ले जाना सही नहीं होगा...
सुप्रिया - पर विक्रम ने कहा था...
इक़बाल की आवाज़ थोड़ी ुचि हो गयी - पर आप hi बताइये... वहां जा कर क्या बोलेंगे... आप मेरी हो कौन? मैं अपनी मालकिन को अपने साथ भगा लाया?
सुप्रिया एक डैम छुप पद गयी थी, फिर वह सोचते हुए बोली - आप ऐसा कीजिये... आप मुझे यहीं छोड़ कर अपने घर निकल जाइये... मैं सब मैनेज कर लुंगी अकेली...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरा वह मतलब नहीं था... मैं तोह बस आपके बारे में hi सोच रहा था...
सुप्रिया - मुझे भी समझ नहीं आ रहा मैं कहाँ जायु... मैं सोच रही हु की एक कॉल अपने घर झाँसी लगा लू क्या?
इक़बाल - सब्जी ने बोलै था की वह लोग वहां भी पहुंच गए होंगे... मेरे ख्याल से ये करना सही नहीं होगा...
सुप्रिया की हालत फिर से रोने वाली हो गयी थी - तोह आप hi बताइये मैं क्या करू? इससे तोह
इक़बाल - आप घबराइए नहीं, जब तक आप मेरे साथ है, मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा... आप रोइये नहीं...
सुप्रिया ने अपने आप को संभाला और बिस्तर से नेवसपपेर और खाने की पन्नियों को समेटने लगी.
इक़बाल - ारी. आप ये सब छोड़िये... आप बस आराम कीजिये...
सुप्रिया - नहीं... इसमें क्या...
इक़बाल - आप काफी थक गयी होंगी... आप यहाँ ऊपर बिस्तर पर सो जाइये... मैं नीचे एक चद्दर बिछा कर सो जायूँगा...
सुप्रिया - ारी नहीं... ज़मीन पर कैसे सोयेंगे आप... मैं सो जाती हूँ नीचे...
इक़बाल - मैडमजी... आप मेरी बात मानिये... मुझे आदत है सख्त ज़मीन पर सोने की... मुझे ऐसे नींद नहीं आने वाली इस गद्दे पर...
सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल की और देखा. उसे ाचा नहीं लग रहा था की इक़बाल इस तरह ज़मीन पर सोयेगा, पर साथ hi उन दोनों का इस छोटे से डबल बीएड पर सोना भी तोह कितना अजीब सा होगा. उसने न चाहते हुए भी हाँ में सर हिलाया.
थोड़ी देर बाद कमरे की लाइट बंद थी, सुप्रिया बिस्तर पर कम्बल ोड कर लेती थी, और इक़बाल ज़मीन पर नीचे. सुप्रिया को नींद नहीं आ रही थी, उसके दिमाग में एहि चल रहा था की इस समय विक्रम और अतुल कैसे होंगे, पता नहीं सब लोग उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. वह कैसे यहाँ फास गयी थी इस जंजाल में. और आगे का रास्ता भी कुछ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था.
सुप्रिया ने बीएड से नीचे झाँका तोह इक़बाल उससे पीठ करके लेता हुआ था. वह उसके लिए कितना कुछ कर रहा था, बिना झिझके अपना सब कुछ छोड़ कर उस यहाँ तक ले आया था. और अभी भी उसके आराम के लिए अपने आराम का त्याग कर रहा था. वह न होता तोह शायद वह अब तक कबकी उन लोगो के हाथ लग गयी होती.
सुप्रिया अपने खयालो से झूझती हुई जाने कब सो गयी. और शायद रात को hi सपने में उसे आगे का रास्ता थोड़ा सा समझ आया.
सुप्रिया जब उठी तोह सुबह हो चुकी थी और कमरे में बहार से रौशनी आ रही थी. सुप्रिया हड़बड़ा कर कड़ी हुई. इक़बाल अब नीचे नहीं लेता हुआ था, और उसने कमरे में इधर उधर देखा, वह वहां नहीं था. सुप्रिया थोड़ा सा घबराई पर फिर सुबह के सारे काम निपटताने के लिए वह बाथरूम में घुसी.
जब वह बहार निकली तोह इक़बाल जादुई तरीके से वापिस आ चूका था और बिस्तर पर बैठा हुआ था - गुड मॉर्निंग मैडमजी...
सुप्रिया ने मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया - गुड मॉर्निंग... कहाँ चले गए थे आप...
इक़बाल - बस नाश्ता लेने गया था... ये लीजिये गरम गरम समोसे और जलेबी...
सुप्रिया ने हलकी सी शिकायत भरी आवाज़ में कहा - आप मुझे जगा सकते थे जाने से पहले...
इक़बाल - बस मैं नहीं किया आपको जगाने का... आप सोती हुई इतनी अछि लग रही थी न...
सुप्रिया के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ गयी - शुक्रिया...
वह बिस्तर पर बैठी और एक जलेबी उठा कर खाने लगी. कल से वह एक hi जोड़ी कपड़ो में थी, और उसके पास और कुछ भी नहीं था. पर वह लोग यहाँ ज्यादा समय नहीं रुक सकते थे.
सुप्रिया ने खाते खाते कहा - इक़बाल... मैंने सोचा है... हमे आपके घर hi चलना चाहिए...
इक़बाल - मैडमजी आप समझ क्यों नहीं रहे हो...
सुप्रिया - एक तोह आप मुझे मैडमजी बोलना बंद करिये आप... कोई भी सुनेगा तोह उसे कितना अजीब लगेगा... आप मुझे सुप्रिया बुला सकते हो...
इक़बाल - मैडमजी...
सुप्रिया ने उसे टोकते हुए कहा - फिर से वही...
इक़बाल - मैं कोशिश करूँगा... एकदम से तोह शायद नहीं हो पायेगा...
सुप्रिया - हाँ... पूरी कोशिश करनी पड़ेगी... चलिए अब बस यहाँ से निकलते है... सीधे आपके गाँव...
इक़बाल - मेरे ख्याल से हम लोग दिल्ली चलते है... वहीँ कहीं छुप जायेंगे...
सुप्रिया - ाचा यहाँ से तोह बहार निकलते है न...
इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया और कुछ देर बाद सुप्रिया ने फिर से अपनी लाल साड़ी के ऊपर वह कला बुर्का दाल लिया था और वह दोनों कमरे से बहार निकल गए. इक़बाल थोड़ा आगे आगे और सुप्रिया उसके पीछे.
जैसी hi वह होटल के रिसेप्शन पर पहुंचे, उन्होंने देखा की 2 हट्टे काटते आदमी रिसेप्शन पर खड़े आदमी से तेज़ आवाज़ में बात कर रहे थे.
आदमी उसे अपने फ़ोन पर एक फोटो दिखते हुए - गौर से देख, देखा है इसे?
रिसेप्शन वाला आदमी - नहीं देखा भाई... बता तोह दिया...
आदमी - मेरा नंबर नोट कर, और कुछ भी अलग सा लगे तोह मुझे कॉल करियो...
आदमी ने मुद के इक़बाल की और देखा, जैसे उसे उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा हो. सुप्रिया ने भी उस आदमी की और देखा, ये वही आदमी था जो बस में उसे ढून्ढ रहा था. उसे देखते hi सुप्रिया की हालत ख़राब हो गयी और उसने अपनी मुट्ठी कास के बीच ली. उसने अपनी सांस बिलकुल रोक ली जैसे वह इंसान उसे उसकी साँसों से hi पहचान लेगा.
वह आदमी इक़बाल को एक नज़र देखते हुए वहां से बहार निकल गया. इक़बाल ने होटल वाले को पेमेंट करि और वह दोनों होटल से बहार आ गए.
सुप्रिया ने फुसफुसाते हुए कहा - ये लोग यहाँ तक कैसे पहुंच गए?
इक़बाल - पता नहीं मैडमजी...
सुप्रिया धीमी आवाज़ में पर गुस्से में बड़बड़ायी - मैंने कहा न मुझे मैडमजी मत बुलायो...
इक़बाल - जी...
सुप्रिया - बस हमे आपके घर की तरफ hi चलना चाहिए... हम लोग वहीँ सेफ रहेंगे...
इक़बाल - मुझे भी ऐसे hi लगता है... पर वहां...
सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... वहां मैं देख लुंगी सब...
इक़बाल और सुप्रिया फिर से एक बार बस अड्डे की तरफ चल पड़े. वह दोनों अमरोहा की और जाती हुई एक बस में छडे और इस बार सुप्रिया अपने खयालो में नहीं खोयी हुई थी बल्कि काफी सतर्क थी. बुर्क़े के अंदर से hi सब कुछ ध्यान से देखती हुई.
बस ने जल्दी hi चलना शुरू कर दिया और लगभग दो ढाई घंटे बाद इक़बाल ने बस कंडक्टर को बीच रास्ते बस रोकने के लिए कहा. सुप्रिया देख रही थी की यहाँ कोई बस स्टेशन तोह नहीं था पर शायद एहि उसके घर के सबसे पास की जगह थी.
सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतरे. इक़बाल ने वहीँ पास में एक रिक्शा वाले से बात करि और वह दोनों उस रिक्शा में बैठ गया. रिक्शा काफी सकदी सी थी, तोह वह दोनों एक दुसरे से चिपक कर बैठे थे. रिक्शा चलते हुए काफी हिल रही थी और सुप्रिया को ऐसा लग रहा था की कहीं वह गिर न जाये. उसने अपना एक हाथ पीछे ले जाते हुए लड़की के फत्ते को कास के पकड़ लिया.
रिक्शा वाला - बाबूजी... किसके घर जा रहे हो...
इक़बाल धीरे से बोलै - नक़वी साहब के यहाँ...
रिक्शा वाला - जी बाबूजी... आप उनके रिश्तेदार हो?
इक़बाल धीरे से बुदबुदाया - काका की आँखें ख़राब हो गयी है शायद...
रिक्शा वाला - कुछ कहा क्या?
इक़बाल - नहीं नहीं... चलिए...
रिक्शा पतली पतली गलियों के बीच में से होती हुई जा रही थी. ज्यादातर घर यहाँ पक्के hi थे, और वैसे नहीं जैसे सुप्रिया ने गाँव के नाम से सोचे थे. बस सड़क काफी ख़राब थी, बल्कि थी hi नहीं. लोग अपने घरो के बहार खड़े उन्हें hi घूर रहे थे, और कुछ बच्चे रिक्शा के साथ साथ चलते हुए सुप्रिया के बुर्क़े को छू रहे थे. इक़बाल ने उन्हें दांत के भगाया.
कुछ hi देर बाद रिक्शा एक बड़े से घर के सामने रुकी. शायद ये गाँव के सबसे बड़े घरो में से था. सुप्रिया को लगा की शायद वह गलत जगह आ गए है, इक़बाल का घर तोह इतना बड़ा नहीं हो सकता था.
पर इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे वहीँ उतारा और रिक्शा वाले के पैसे दिए. सुप्रिया बहार से उस घर को देखने लगी. बड़ी, ऊँची, मजबूत दीवारें चरों और से घर को घेरे हुए थी, और उनका रंग हल्का पीला, धुप में सुनहरी तरह चमक रहा था. बहार के मैं दरवाज़ा किसी मजबूत लकड़ी से बना हुआ बड़ा और भरी था, जिस पर नकाशी के पैटर्न्स उकेरे हुए थे.
इक़बाल ने दरवाज़े पर हलके से खटखटाया और दरवाज़ा अपने आप hi खुल गया. इक़बाल ने कुछ कदम अंदर लिए और सुप्रिया भी उसके पीछे पीछे अंदर हो ली. अंदर कदम रखते hi एक विशाल सा आँगन दिखाई दिया. ानगर में पेड़ पौधे और फूल लगे हुए थे. घर की दीवारों पर जालीदार खिड़कियां थी. सुप्रिया को एकदम से लगा जैसे एक खिड़की में से कोई झाँक रहा हो.
इक़बाल ने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया और कुण्डी लगा ली. और तभी एक बड़ी उम्र की औरत आँगन में बहार आयी और ज़ोर से बोली - कौन.....
इक़बाल - अम्मा जी... मैं...
उस औरत के कदम इक़बाल को देखते hi रुक से गए और उसका रंग उड़ गया, जैसे किसी भूत को देख लिया हो. फिर वह अपने आप को संभालती हुई इक़बाल की और दौड़ी - इक़बाल.... इक़बाल... तू आ गया... बीटा...
वह इक़बाल के सीने से चिपक गयी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. उसने आवाज़ सुन कर अंदर से दो और औरते बहार आयी. एक थोड़ी बड़ी, पर अम्मा जी से छोटी, और एक बहुत hi जवान सी प्यारी सी लड़की. सुप्रिया उन सब को बारी बारी देख रही थी. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने तोह इक़बाल से पुछा भी नहीं था की उसके घर में कौन कौन है.
अम्मी जी - रब्बू देख... देख कौन आया... हिना देख... तेरा चाचा आ गया...
शायद उस जवान सी लड़की का नाम हिना था, वह भी भागी भागी इक़बाल की तरफ गयी - चाचू....
इक़बाल की आँखों से भी आंसू बह रहे थे - ारी हिना... इतनी बड़ी हो गयी तू तोह... कितने साल की हो गयी... पहचान में hi नहीं आ रही...
हिना - आप तोह हम सबको भूल hi गए थे न.... अभी बस कुछ दिन पहले तोह मेरा उनीस्वा जन्मदिन गया है...
वह दोनों इक़बाल को घेरे खड़े थे और अम्मा जी उसके चेहरे को हाथ लगा कर छु रही थी, जैसे वह सच हो या कोई सपना. शायद किसी की नज़र सही से सुप्रिया पर पड़ी नहीं थी, सिवाए उस तीसरे औरत के.
अम्मी जी - रुबीना तू भी तोह मिल ले... तेरा देवर आ गया.
रुबीना - अम्मी जी... पर ये कौन है इसके साथ...
अम्मा जी का ध्यान अब जाकर बुर्का ओढे सुप्रिया पर गया - हाँ भाई... ये कौन है... किसको ले आया साथ में...
हिना सुप्रिया के पास पहुंच कर कड़ी हुई और उसे बारीकी से देखने लगी.
अम्मी जी - चुप क्यों कड़ी है... बोल... हिना, ज़रा इसका बुर्का ऊपर कर...
इससे पहले की हिना उसका बुर्का ऊपर करती, सुप्रिया ने खुद hi उसे ऊपर कर दिया और तीनो लोग उसकी सुन्दर प्यारी मासूम सी शकल को देखते रह गए थे. बुर्का हट्टे hi अंदर उसकी लाल साड़ी भी चमक रही थी. रुबीना और अम्मा जी एक डैम दांग खड़े सुप्रिया की और देख रहे थे.
अम्मी जी भड़कते हुए बोली - किसको ये ले आया... ये तोह हमारे यहाँ की लग भी नहीं रही है...
इससे पहले इक़बाल कुछ कहता उसकी भाभी ने उसे काट दिया - बोलो भी... इतना सालो बाद आये हो, और अपने साथ ये किसी उठा लाये...
अम्मी - कौन है ये चिनार... ये कोई रंडी बाजार तोह है नहीं की किसी को भी उठा लायो...
ये सब सुनते hi सुप्रिया की आँखें नीचे झुकी हुई थी, पता नहीं इक़बाल ने कुछ सोचा था या नहीं, या फिर उसे hi कुछ बोलना पड़ेगा.
इक़बाल - अम्मी जी कुछ भी बोलते हो आप....
अम्मी - ारी तोह बता न... तेरा भाई इसे काट के फेंक देगा... तुझे पता तोह है...
हिना जो सुप्रिया के पास कड़ी उसे बारीकी से देख रही थी, बोल पड़ी - चाचू... कहीं ये मेरी नयी चची तोह नहीं?
इक़बाल जल्दी से बोलै - नहीं नहीं...
पर सुप्रिया ने उसे बीच में रोकते हुए अपनी कांपती हुई आवाज़ में कहा - जी... मैं आपकी नयी.... चची hi हूँ...
इक़बाल ने एकदम से झटके से पलट कर सुप्रिया की और देखा, उसे तोह अब तक नहीं पता था वह क्या बोलने वाला था, पर मैडमजी ये क्या बोल बैठी थी.
अम्मी ने सुप्रिया को घूरा और फिर इक़बाल की और देखा - चची!!! चची है ये इसकी!! तूने फिर से... लाहौल!!!
अम्मी अपना सर पकड़ते हुए धम्म से आँगन में बिछी हुई एक चारपाई पर बैठ गयी.