सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी - Page 12 - SexBaba
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सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी

अपडेट 85

सुबह सुप्रिया की आँख खुली तोह इक़बाल धीरे से उसका सर अपने सीने से तकिये पर रख रहा था. शायद वह पूरी रात इक़बाल से चिपके हो सो गयी थी. उसे इस बात का एहसास hi नहीं हुआ. सुप्रिया ने तुरंत hi अपनी आँखें बंद कर ली, वह नहीं चाहती थी इक़बाल को पता चले की वह जगी हुई है.

इक़बाल बिना कोई आवाज़ किये बिस्तर से नीचे उतरा और अपने कपडे बदलने लगा. शायद वह सुबह की नमाज़ के लिए जहा रहा था. बहार अभी भी काफी अँधेरा hi था, पर सुप्रिया को इक़बाल के शरीर की छवि साफ़ दिखाई दे रही थी. उसका बड़ा लम्बा सा शरीर, चौड़ी छाती और मजबूत कंधे. इन्ही कन्धों का सहारा ले कर तोह वह कल रात सो गयी थी.

कल रात के बारे में सोचते hi उसकी आँखों में फिर से उदासी सी छाने लगी थी. ऐसा लग रहा था की जैसे उसकी जिंदगी का मक़सद hi ख़तम हो गया था. न विक्रम यहाँ आने वाला था, न वह अतुल या अपने घर वापस जा सकती थी, और उसकी शादी इक़बाल से हो चुकी थी.

इक़बाल कपडे बदल कर कमरे से बहार जा चूका था. सुप्रिया अभी भी बिस्तर पर पड़ी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी. आँखों से अभी आंसू तोह नहीं बह रहे थे, पर उसका दिमाग फिर से फटा जा रहा था. उसने विक्रम के लिए अतुल को छोड़ा, और विक्रम की वजह से वह यहाँ तक पहुंच गयी थी. अतुल उससे कितनी नफरत करता होगा, शायद उसने अपना नया जीवन बसने के बारे में सोचना शुरू कर दिया होगा. और विक्रम, वह तोह उसे एक महीने में hi भूल गया था.

सोचते सोचते कब जाने एक घंटा बीत गया था और बहार रौशनी होनी शुरू हो गयी थी. कुछ देर बाद इक़बाल वापस कमरे में आया, अब तोह वह कमरे का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा रहा था, जैसे कमरे में हर चीज़ पर अब उसका हक़ हो.

सुप्रिया को जगा हुआ देख, इक़बाल ने धीरे से कहा - आप जग गयी...

सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया और बिस्तर पर बैठ गयी. वह इक़बाल को देख कर कल रात के बारे में सोचने लगी. कैसे उसने उसे कास के पकड़ लिया था और अपना पैरो का भार भी उस पार दाल दिया था. सुप्रिया तोह शायद कुछ सोचने समझने की अवस्था में hi नहीं थी कल रात.

इक़बाल - आप नाहा के तैयार हो जाइये... और नाश्ता कर लीजिये... फिर मैं आपको कुछ दिखता हूँ...

इक़बाल को देख कर तोह ऐसा लग रहा था की जैसे कुछ हुआ hi नहीं था. बस उसने उसे मैडमजी कहना बंद कर दिया था, और शायद कल रात से hi कर दिया था. पिछले दो सालो से वह उसे मैडमजी hi कह कर बुलाता आया था. कितना अजीब सा था की वह अब इस शब्द का इस्तेमाल hi नहीं कर रहा था.

सुप्रिया बेमन से कड़ी हुई और अपने कपडे लेकर नीचे नहाने चली गयी. नीचे पहुंचते hi रुबीना ने उसका हाल चाल पुछा और हिना भी आज जल्दी जग गयी थी. सुप्रिया को उनके सामने अपनी झूठी मुस्कान कायम रखनी पद रही थी. पर अब क्यों? अब तोह ये सब एक ड्रामा नहीं हकीकत सी बन गया था.

सुप्रिया नाहा कर, तैयार हो कर घुसल खाने से बहार निकली. अपने गीले बालों को बंधे वह वापस ऊपर अपने कमरे की और चली गयी. उसे पता नहीं था की इक़बाल अभी भी वहीँ कमरे में अंदर था और उसे वहां देख कर वह एक पल के लिए छौंक सी गयी.

सुप्रिया - ओह सॉरी… मुझे पता नहीं था आप अंदर hi है…

इक़बाल - हाँ… पर इसमें माफ़ी की क्या बात है… मैं आपका hi इंतज़ार कर रहा था…

सुप्रिया - ाचा… इंतज़ार क्यों?

इक़बाल - बस आप देखती जाये...

इक़बाल अपने साथ जो थैला लाया था उसमे से सामान निकलने लगा. उसने 3-4 साड़ी निकाल कर बीएड पर रख दी. सुप्रिया वहीँ बीएड पर बैठी साड़ी को देखने लगी. जैसी साड़ी वह पहनती थी ये उनसे तोह हलकी hi थी, पर फिर भी देखने में अछि थी.

सुप्रिया ने हलके से कहा - ये सब क्या....

इक़बाल - ये सब.... मैं आपके लिए लाया हूँ....

सुप्रिया - पर क्यों?

इक़बाल - आपके पास यहाँ साड़ी नहीं है न... और आप साड़ी में बहुत अछि लगती हो... एक डैम किसी हीरोइन की तरह...

इक़बाल सुप्रिया की और देख रहा था. सुप्रिया ने अपनी आखें झुका ली, उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या बोले. क्या इक़बाल उसे इतनी गौर से देखा करता था जब वह लखनऊ में रहती थी? वह आखिर उससे चाहता क्या था.

उसे खोया हुआ देख इक़बाल ने एक डैम से पुछा - क्या हुआ? आपको अछि नहीं लगी साड़ी...

सुप्रिया ने साड़ी के कपडे को महसूस करते हुए कहा - नहीं काफी अछि है... पर ये लाने की क्या जरूरत थी... आपके यहाँ तोह कोई साड़ी पहनता भी नहीं... मैं अकेली इस पहने हुए कितनी अजीब सी लगूंगी...

इक़बाल - कोई नहीं आप घर में तोह पेहेन hi सकते हो... या फिर रात को बस इस कमरे में...

ये सुनते hi सुप्रिया एकदम से काँप सी उठी, और उसके आँखों के सामने एक दृशय सा दौड़ गया. मानो वह रात को साड़ी में सज्ज धज्ज के इक़बाल के सामने बैठी हो और इक़बाल उसे प्यार से निहार रहा हो. उसने जल्दी से अपने मैं से इस ख्याल को निकला.

इक़बाल - वैसे तोह इसका ब्लाउज बना हुआ है... पर अगर आपके नाप का न हो तोह आप भाभी को बोल देना, वह आपको रफ़ीक़ चाचा के यहाँ ले जाएँगी...

सुप्रिया को पिछली बार दर्ज़ी रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ जाना याद आ गया - नहीं... मुझे वह रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ नहीं जाना..

इक़बाल - कुछ कहा उन्होंने आपसे? कोई नहीं... आप मुझे नाप दे देना, मैं किसी और दर्ज़ी से सिल्वा दूंगा....

सुप्रिया - ारी नहीं... आप इतना परेशान मत हो... देख लेंगे... मैं नीचे चलती हूँ... भाभी मुझे ढून्ढ रही होंगी... और आपको भी तोह काम पर जाना होगा...

इक़बाल - हाँ... मुझे आपसे पूछना था...

सुप्रिया - हाँ कहिये न....

इक़बाल - आप ठीक तोह है न... कल रात आपको चक्कर आ गया था और फिर बाद में आप काफी उदास भी थी... शायद रो भी रही थी...

सुप्रिया एक डैम चुप सी हो गयी और नीचे की और देखने लगी - मैं क्या कहु अब.... ऐसा लग रहा है जैसे मैं कहीं की नहीं रही... कुछ समझ नहीं आ रहा...

इक़बाल - आप ऐसा कुछ मत सोचिये... अब सब ाचा hi होगा...

इक़बाल की आँखों में एक चमक सी थी जो सुप्रिया ने अब से पहले काम hi देखि थी. वह जल्दी से खड़ा हुआ और अलमारी से अपने कपडे लेकर नीचे नहाने की और चला गया. सुप्रिया भी साड़ियों को अलमारी में रख कर नीचे आ गयी. उसका मैं एक अजीब से गोते से खा रहा था और बेचैन सा हो रहा था. उसे अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं पता था, और अपने वर्त्तमान के बारे में भी.

सुप्रिया नीचे आ कर खुद से सब्जी ले कर, बैठक में बैठ कर सब्जी काटने लगी. उसे सामने घर का पूरा चौक दिख रहा था. कुछ hi देर बाद इक़बाल घुसल खाने से नाहा के निकला. उसने बस एक तौलिया अपने नीचे लपेटा हुआ था. उसका पूरा शरीर अभी भी भीगा सा हुआ था, और छाती के बाल चिपके हुए से थे.

सामने सुप्रिया को देख कर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी और सुप्रिया भी हल्का सा मुस्कुरा दी. इक़बाल जल्दी से ऊपर की और चला गया और सुप्रिया कुछ देर बाद रसोई में. अब तोह उसने रुबीना का रसोई के कामो में हाथ बताना शुरू कर दिया था. वह उससे ज्यादा काम तोह नहीं करवाती थी पर ऐसे hi थोड़ा बहुत.

रुबीना ने रसोई में आते hi सुप्रिया को सब्जी बनाते देखा - ारी... क्या कर रही हो तुम... आराम करो जाकर... कल hi तोह चक्कर खा कर गिरी थी...

सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी - मैं ठीक हूँ अब... कल रात आराम मिल गया था...

रुबीना - ाचा जी... लगता है इक़बाल ने काफी मालिश की रात को... सर की....

सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए - नहीं... मैं बस सो गयी थी... वह क्यों मालिश करते...

रुबीना - वह तोह तुम्हारे लिए कुछ भी करता... कल तोह इतना परेशान हो गया था.... ऐसा लग रहा कहीं गुस्से में हमें hi घर से निकाल न दे...

सुप्रिया झेपते हुए बोली - आप भी न... कुछ भी बोलती हो...

रुबीना हस्ते हुए - ाचा है... धीरे धीरे मुझसे इतना तोह खुल गयी हो की ये सब बोल पा रही हो... बस अब थोड़ा और खुल जायो...

रुबीना ने बहार की और झाँका, इक़बाल और अब्बास बहार नाश्ते के लिए बैठ गए थे.

सुप्रिया - भाभी.... मैं बनती हूँ... आप खाना परोस दो...

रुबीना - जैसा आपका हुकुम... पर आपके मियाँ जी को रहत नहीं मिलेगी...

रुबीना ने खाना ले जाकर परोसने लगी. इक़बाल खाना खाने लगा पर वह काम पर जाने से पहले एक बार सुप्रिया को देखना चाहता था. पर फिलहाल तोह उसे अपना मैं मॉस कर रखना पड़ा. कुछ देर बाद वह और अब्बास खाना खा कर कारखाने की और निकल गए.

सुप्रिया सुबह का काम निपटा कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. अकेले में आते हुए उसे फिर से उदासी ने घेर लिया. अपनी पिछली जिंदगी की यादें, आगे आने वाली दिनों की चिंता, सब उसे सत्ता सी रही थी. मैं हल्का करने के लिए उसने कमरे की कुण्डी लगा कर अलमारी में से साड़ी निकाल ली. वह एक साड़ी को हलके हलके छू रही थी. जैसे उसने पहले महसूस किया था, कपडा थोड़ा हल्का था.

कुछ देर ऐसे hi बैठी सोचती रही, वह सोच रही की वह साड़ी पेहेन कर देखे या नहीं, पर फिर उसने सोचा की कहीं भाभी ने उसे एकदम से बुला लिया तोह. बिस्तर पर लेटते hi उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे और वह कुछ देर के लिए सो गयी.

जब वह उठी तोह दिन हो गया था. वह अपने बिखरे हुए बालों को ठीक करके नीचे पहुंची. अम्मी जी हमेशा की तरह उसे गुस्से से hi घूर रही थी. वह इस घर में एक कैद छिड़िया की तरह महसूस कर रही थी. बस एक रुबीना और हिना का सहारा था, पर हिना तोह सुबह से hi घर पर नहीं थी.

किसी तरह से शाम हो आयी थी, और दिन ढलते ढलते सुप्रिया की उदासी और घबराहट बढ़ती जा रही थी. अँधेरा होने से थोड़ी देर पहले अब्बास और इक़बाल घर वापस आ गए. रात का खाना भी रुबीना ने hi परोसा, खासकर आज तोह उसने घोषत की कोई सब्जी बनायीं थी, जिससे सुप्रिया ने अपने आप को रसोई से दूर hi रखा.

इक़बाल खाना खा कर ऊपर पंहुचा तोह सुप्रिया और हिना कमरे में बैठे बात कर रहे थे.

हिना को अपने कमरे में देख, इक़बाल के चेहरे का रंग भी बदल गया - हिना... यहाँ क्या कर रही है... तेरी अम्मी तुझे बुला रही है...

हिना - अभी थोड़ी देर में जाती हूँ चाचू...

इक़बाल - जा न... खाना खा ले...

हिना - मैं तोह बस यहाँ चची का मैं hi बेहला रही थी, वह काफी उदास सी लग रही थी मुझे...

इक़बाल - मैं देख लूंगा... तू जल्दी से जाकर खाना खा ले....

हिना खड़े होते हुए बोली - ठीक है...

हिना जल्दी से कमरे से बहार निकल गयी और इक़बाल ने कमरे की कुण्डी लगा ली. सुप्रिया इक़बाल की हर हरकत को गौर से देख रही थी. उसने हिम्मत करते हुए पुछा - आपने हिना को जाने के लिए क्यों बोलै...

इक़बाल - बस... वह मुझे लगा वह आपको परेशान कर रही होगी... इसलिए...

सुप्रिया - नहीं.... वह तोह मेरा मैं बहलाने की hi कोशिश कर रही थी...

इक़बाल ने बिना किसी झिझक के अपनी शर्ट सुप्रिया के सामने उतार दी और खूटी पर टांग दी - कोई नहीं... नीचे जाकर खाना खा लेगी.... भाभी कब तक बैठी रहेंगी उसके इंतज़ार में...

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, शर्ट के अंदर उसकी छाती पर काफी बाल थे, और उसका शरीर शायद धुप से काफी काला हो चला था. इक़बाल को अपनी और देखते hi उसने दूसरी और मुँह कर लिया.

इक़बाल ने अलमारी खोलते हुए एक और शर्ट निकाली और उसे पेहेन्ने लगा. वह शर्ट को पेहेनते पेहेनते एकदम से बोलै - आप क्या सच में उदास थी....

सुप्रिया - हम्म्म... पता नहीं....

इक़बाल कुछ देर चुप रहा, पर उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ झलक रही था - आप मुझसे खुल कर बात कर सकती है...

सुप्रिया - हम्म्म... हाँ मुझे पता है... मैं बस विक्रम के बारे में hi...

विक्रम का नाम सुनते hi इक़बाल के चेहरा और भी सख्त सा हो गया - आपको अब उनके बारे में सोचना नहीं चाहिए...

सुप्रिया को उसकी बात थोड़ी सी अजीब सी लगी, वह उस पर हक़ सा जाता रहा था. पर वह छह कर भी उसे काट नहीं पायी - हाँ... पर सब भूलते भूलते वक़्त तोह लगता hi है न...

इक़बाल का चेहरा थोड़ा सा नरम हुआ - आप सही कह रही है... थोड़ा समय तोह लगता है... आपने वह साड़ी पेहेन कर देखि क्या आज?

सुप्रिया - उम्म्म... नहीं...

इक़बाल - कोई नहीं... आप कल पेहेन कर देख लेना... मैं बहुत ढून्ढ कर आपके लिए लाया था...

सुप्रिया - जी...

इक़बाल - आपने खाना खा लिया?

सुप्रिया - हाँ... मैंने थोड़ा जल्दी खा लिया था... वह आज घोषत बना था इसलिए...

इक़बाल - ाचा किया.... चलिए सो जाते है...

इक़बाल ने कमरे की बत्ती बंद कर दी और बिस्तर पर आ कर लेट गया. सुप्रिया भी चद्दर ोड कर लेट गयी, उसका मुँह इक़बाल की और नहीं था. वह अपनी आँखें बंद करके सोने की कोशिश कर रही थी.

तभी उसे महसूस हुआ की इक़बाल सरक कर उसके ठीक पीछे पहुंच गया था. सुप्रिया ने घबराते हुए पीछे मुद कर देखा.

इक़बाल ने हलके से कहा - कल रात.... मुझे बड़ी अछि नींद आयी थी... आप मुझ पर अपना सर रख कर सो गयी थी...

इक़बाल ने सुप्रिया के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी और खींचा

सुप्रिया - हाँ.... वह बस... कल मैं काफी परेशान थी... और शायद आपको भी परेशान कर दिया...

इक़बाल - इसमें परेशानी कैसी... मैंने कहा न... मुझे बहुत hi अछि नींद आयी थी...

इक़बाल के दोनों हाथ सुप्रिया के कंधो पर थे - लाइए मैं आपके कंधे दबा देता हूँ... आप थोड़ा ाचा महसूस करेंगी.

इक़बाल ने सुप्रिया के जवाब का इंतज़ार नहीं किया और वह अपनी उँगलियों से सुप्रिया के कंधो को दबाने लगा. उसकी कुछ उंगलियां सुप्रिया की कुर्ती पर थी और कुछ उसके जिस्म पर. इक़बाल के छूटे hi सुप्रिया की सांस रुक सी गयी और वह इक़बाल के सख्त हाथों को अपने कोमल जिस्म पर चलते महसूस करने लगी.

सुप्रिया ने अपने कंधे हलके से उचकाए और इक़बाल के हाथ सुप्रिया की गर्दन पर पहुंच गए थे.

इक़बाल - बहुत hi नाज़ुक सा जिस्म है आपका...

सुप्रिया - उह्ह्ह.... रहने दीजिये न...

इक़बाल के हाथ सुप्रिया के बालों में घुस गए थे और वह उसकी गर्दन के ऊपर के हिस्से को हलके हलके मसल रहा था - ाचा लगेगा आपको.... कल आप मेरी मालिश कर देना...

सुप्रिया - Uhhhhh....mmmmmm....

सुप्रिया की हलकी हलकी सिसकियाँ इक़बाल का हौसला और बढ़ाये जा रही थी और उसने अपने हाथ का दबाव बड़ा दिया.

सुप्रिया की ज़ोर की सिसकी निकली - अह्ह्ह्हह्हह... मममममममम.....

इक़बाल - घबराइए नहीं.... ाचा लगेगा....

सुप्रिया मुद कर बिस्तर पर लेट गयी और इक़बाल ने उचक कर अपने हाथ सुप्रिया की पीठ पर रख दिए थे.

इक़बाल - काश आपने आज साड़ी पहनी होती... तोह मैं और अचे से मालिश कर पाटा...

सुप्रिया - उह्ह्ह..... मममम.... इक़बाल हाथ हटाइये न....

इक़बाल - क्या हुआ... दर्द हो रहा है क्या...

सुप्रिया - नहीं... बस थोड़ा अजीब सा लग रहा है... आप मुझे ऐसे छू रहे है तोह...

इक़बाल ने बिना झिझके अपना पूरा हाथ सुप्रिया की नंगी पीठ पर रख दिया - इसमें क्या हर्ज़ है... अब तोह तुम मेरी बीवी हो, और मैं तुम्हारा शौहर... क्या मैं तुम्हे छू भी नहीं सकता…

ये सुनते hi सुप्रिया की आवाज़ उसके गले में hi रह गयी, और वह बुरी तरह काँप उठी. क्या वह सच में इक़बाल की बीवी थी अब. दो hi दिन में मैडमजी से आप और आप से तुम पर उतर आया था. पता नहीं आगे क्या होने वाला था.
 
अपडेट 86

इक़बाल ने फिर से धीरे से सुप्रिया की पीठ को सहलाया, जिससे सुप्रिया का बदन काँप सा उठा. अभी अभी इक़बाल क्या कह गया था.

सुप्रिया - इक़बाल जी... ये आप क्या कह रहे है... मैं तोह आपकी मैडम जी हूँ न...

इक़बाल ने अपने दोनों हाथ सुप्रिया के कंधो पर रखे पर अपना मुँह उसके पास लेकर आया - आप मेरी मैडमजी हो.... और आप मेरी सब कुछ हो... मैं आपसे सच कहु तोह, आप मुझे बोहोत ज्यादा पसंद है... और वैसे तोह अब आप मेरी बीवी भी हैं... आपने भी इस शादी को कबूल किया था...

इक़बाल ने सुप्रिया के कंधे पर हाथ रखते हुए उसे अपनी और मोड़ा. सुप्रिया ने इक़बाल की शकल की और देखा, आज उसमे एक अलग सी चमक और भूक दिखाई दे रही थी. सुप्रिया ने जल्दी से अपनी आँखें झुका ली.

सुप्रिया का गाला बुरी तरह सूख रहा था - हाँ... पर वह तोह... मैंने नहीं सोचा था की हम दोनों ऐसे एक दुसरे के साथ... वह तोह बस विक्रम के आने तक...

इक़बाल - पर वह तोह अब आने वाला नहीं है... उसने आपको छोड़ दिया.... और मैं आपको बेइंतेहा चाहता हूँ... हमारी शादी को एक महीना होने को आया है, और आप मेरे साथ पूरी तरह मेहफ़ूज़ रही है... आप मानती है ये बात या नहीं...

सुप्रिया ने सर झुकाये हुए धीरे से कहा - हाँ....

इक़बाल - आप मेरी बीवी है... आप पर मेरा पूरा हक़ है... पर फिर भी मैंने आप के साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं की...

सुप्रिया उसके मुँह से ये सुनते hi घबरा सी गयी, क्या वह उसके साथ ज़बरदस्ती करने के बार्ने में सोच रहा था. सुप्रिया को परेशान होता देख इक़बाल ने अपना हाथ उसकी बाहों पर रखा और हलके से मसलने लगा.

इक़बाल - आप डरिये नहीं... मैं आपको बोहोत खुश रखूँगा... आप अब मेरी है... आप सबको भूल जाइये... और मैं भी उनको भूल जायूँगा... मुझे पता है आप भी मेरे बारे में सोचती है...

सुप्रिया के होंठ कुछ बोलने के लिए खुले और फिर बंद हो गए. इक़बाल ने उसे खींच कर अपने पास कर लिया था और वह इक़बाल के बिलकुल सात के लेती हुई थी. इक़बाल का एक हाथ उसके दुसरे हाथ पर था.

इक़बाल आज अपने मैं की बात बोले जा रहा था- पूरे गाँव में बातें चलती है आपके और मेरे बारे में... पर मैं उस ध्यान नहीं देता... मेरे लिए बस आप hi सब कुछ हैं... जब से मैंने आपको पहली बार देखा था, आप मुझे तभी से बोहोत अछि लगती थी... कभी सोचा नहीं था की आप मुझे मिल सकेंगी...

इक़बाल सुप्रिया के सुन्दर चेहरे को घूरे जा रहा था, और उसकी सांसें तेज़ हो गयी थी. उसे पता था की वह इस समय अपने आप पर कैसे काबू किये हुए था. सुप्रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था और वह उसका पूरा शरीर बेचैन सा हो रहा था.

इक़बाल ने सुप्रिया को ऊपर से नीचे तक देखा, वह किसी हूर से काम नहीं थी, और उसकी चुप्पी उसे आगे बढ़ने का इशारा कर रही थी. कौन औरत किसी आदमी को आगे बढ़ने के लिए बोलेगी.

इक़बाल सुप्रिया की और झुका और अपना मुँह उसकी गर्दन और बालों में लगा दिया और वहां चूमने लगा. उसका भार थोड़ा सा सुप्रिया के ऊपर आ गया था, और सुप्रिया उसकी बाहों को पकड़ते हुए हलके हलके आहें लेने लगी. सुप्रिया की हलकी हलकी आवाज़ इक़बाल को और पागल कर रही थी, और वह और अचे से सुप्रिया के ऊपर आते हुए उसकी गर्दन और गालों को चूमने लगा.

इक़बाल - मैडमजी... आप मेरी हो अब...

सुप्रिया ने धीरे से कहा - आप मुझे सुप्रिया बुला सकते हो....

ये सुनते hi इक़बाल की चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी - सुप्रिया.... मेरी सुप्रिया...

इक़बाल ने अपने हाथ सुप्रिया के हाथों के नीचे फसते हुए उसे कास के पकड़ लिया और उसके गालों को ताबड़ तोड़ चूमने लगा. सुप्रिया उसकी दादी को अपने मुलायम गालों पर महसूस कर पा रही थी, और उसके मुँह से आती हलकी हलकी बांस को भी, पर अब जो हरी झंडी उसने इक़बाल को दिखा दी थी, उसके बाद उसे रोकना नामुमकिन था.

इक़बाल के होंठ सुप्रिया के होंठों को चूमते चूमते उसके होंठों के पास पहुंच गए. वह एक पल के लिए रुका, जैसे सोच रहा हो की वह कबसे इसका इंतज़ार कर रहा था. उसकी आँखें सुप्रिया की आँखों से मिली और सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली. इक़बाल ने झट से अपने होंठ सुप्रिया के होंठों पर रख दिए और उन्हें बुरी तरह चूमने और चूसने लगा.

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इक़बाल - ममममम..... ममममम... आह्ह्ह्ह..... बोहोत सुन्दर होंठ है आपके.... मैं इन्हे अचे से चूसना चाहता हूँ...

इक़बाल फिर से सुप्रिया के होंठों को चूसने लगा. कभी उसके ऊपर के होंठ को और कभी उसके नीचे के होंठ को. सुप्रिया उसके मुँह में एक अजीब सा स्वाद महसूस कर रही थी, जो शायद उसके खाने का था. उसे बोहोत बेचैनी हो रही थी, पर वह उसे अपने ऊपर से हटा नहीं पा रही थी.

इक़बाल ने होंठ चूसते चूसते अपनी जीब सुप्रिया के मुँह में घुसा दी और उसके दांतों पर फेरने लगा. वह उसके जिस्म के हर हिस्से को अचे से महसूस करना चाहता था. सुप्रिया के मम्मी उसकी छाती के नीचे दबे हुए थे, उसका दूसरा हाथ सुप्रिया के बालों में था. उसने सुप्रिया के बालों को कास के अपने हाथों में जकड़ा.

सुप्रिया की बाल खींचते hi उसकी हलकी सी चीख निकल गयी - अह्ह्ह्हह.....

इक़बाल के पेअर सुप्रिया के पैरो के ऊपर थे और उसका लुंड कड़क हो चूका था. उसने सुप्रिया के मम्मो की और झाँक कर देखा तोह उसकी चूचियां भी तन गयी थी, और उसकी कुर्ती के बहार से उनकी शेप साफ़ दिखाई दे रही थी. वह बोहोत गरम सा महसूस कर रहा था और उसका नीचे का हिस्सा सुप्रिया की पयजामि से रगड़ रहा था.

इक़बाल - सुप्रिया.... तुम बस मेरी हो अब.... बस मेरी....

इक़बाल के सुप्रिया की जीब चूसते हुए अपने होंठ में दबा ली. उसने सुप्रिया की जीब को अपने दांतों से हलके से दबा के उसके मुँह से बहार निकाला और फिर उसे अपने होंठों से चूसने लगा. सुप्रिया उसे रोक नहीं पा रही थी और वह आगे बड़ा जा रहा था.

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इक़बाल - मैंने आपको कहा था न... आपको एक असली मर्द की जरूरत थी अपनी जिंदगी में.... और अब आपको वह मर्द मिल गया है...

सुप्रिया ने अपने हाथ इक़बाल की बाहों पर रख दिए, वह उसे पूरे जोश से अपने आप को चूमते हुए महसूस कर पा रही थी. वह धीरे धीरे बेकाबू सा हो चला था, और शायद साथ में वह भी.

इक़बाल एक सेकंड के लिए ऊपर हुआ और उसने अपनी शर्ट उतार कर फेर दी. वह सुप्रिया के बदन को अपने बदन से महसूस करना चाहता था. उसने शर्ट उतारते hi फिर से सुप्रिया को बुरी तरह से चूमना शुरू कर दिया. उसके नरम नरम गुलाबी होंठ उसे पागल कर रहे थे.

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सुप्रिया की मेहँदी भरी उंगलियां इक़बाल के हाथों में गड सी रही थी, और ये इक़बाल को और भी उत्तेजित कर रहा था. उसने अपने एक हाथ से सुप्रिया के बालों को उसके चेहरे के ऊपर से हटाया और वह उसके चेहरे की हर तरफ बुरी तरह टूट पड़ा.

सुप्रिया हलकी हलकी सिसकियाँ ले रही थी. उसने इतने वक़्त से ऐसा कुछ नहीं किया था और आज उससे उम्र में 15-20 साल बड़ा आदमी, जो एक महीने पहले तक उसका वॉचमन था उसके होंठ का स्वाद चख रहा था. कितना अजीब सा लग रहा था उसे. पर सच तोह ये भी था की वह अब उसका पति था, और वह उसे कुछ करने से कैसे मन कर सकती थी. सही तोह कहा था उसने, वह चाहता तोह अब तक कबका सुप्रिया के साथ जबरदस्ती सब कुछ कर सकता था.

इक़बाल के ऊपर सुप्रिया का नशा सा छद्ध रहा था - अब से तुम बस मेरी हो.... और किसी के बारे में खयालो में मत सोचना.... बस मेरी बन के रहना हमेशा के लिए...

इक़बाल ने अपना हाथ सुप्रिया के बालों से हटाया और अपने दोनों हाथ उसके बड़े बड़े मम्मो पर रखते हुए उन्हें ज़ोर से दबाना शुरू किया. इक़बाल सुप्रिया के ऊपर बैठ गया था और उसके ममो को ज़ोर ज़ोर से राउंड रहा था.

सुप्रिया की चीखें निकलना शुरू हो गयी थी - अनननहहह.... उफ्फ्फ्फ़.... इक़बाल..... आह्ह्ह्ह... आराम से...

पर इक़बाल ने एक बार फिर उसके मम्मो को ज़ोर से दबा दिया - इक़बाल नहीं... इक़बाल जी बोलो... मुझे ाचा लगता है जब तुम मुझे इज़्ज़त से बुलाती हो...

सुप्रिया - अह्ह्ह्ह... इक़बाल जी....

इक़बाल - ये हुई न बात...

इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को हलके से ऊपर किया और उसके पेट को नंगा उघाड़ दिया. सुप्रिया अपनी कुर्ती को नीचे करने की कोशिश कर रही थी पर इक़बाल ने अपना मुँह जल्दी से उसके पेट पर लगा दिया और वहां चूमने लगा. सुप्रिया के सफ़ेद गोर मखमली से पेट पर वह अपना खुदरा सा चेहरा रगड़ रहा था. आज उसे ये पेट छूने को मिल hi गया था. सुप्रिया के हाथ इक़बाल के बालों में थे, उसे रोकने की कोशिश करते हुए.

इक़बाल - ममममम.... अह्ह्ह.... क्या पेट क्या तुम्हारा.... मममम....

इक़बाल ने उसके पेट पर चुम्बन की बारिश लगा दी. और एकदम से उसकी नाभि में अपनी जीब घुसा दी, जिससे सुप्रिया भी पागल सी हो गयी. वह उसके पेट को अचे से चाट रहा था, बेशक hi वहां थोड़ा पसीना भी था, पर इक़बाल को इस सब से क्या फरक पड़ता था.

सुप्रिया ने अपनी कमर ऊपर उचकाई जैसे इक़बाल को अपने ऊपर से हटाना चाहती हो, पर सच में उसे भी बोहोत मज़ा आ रहा था - अह्ह्ह्ह..... उफ्फ्फ्फ़... नहीं वहां नहीं प्लीज....

जैसे hi सुप्रिया अपना हाथ इक़बाल के मुँह के पास लायी, इक़बाल ने उसके हाथ को झटक दिया - ये करने दो मुझे... मुझे लड़कियों का ये हिस्सा बोहोत ाचा लगता है... और तुम्हारा तोह हद्द से ज्यादा नरम है....

इक़बाल ने फिर से उसके पेट में अपनी जीब लगी दी और उसकी नाभि के बहार अचे से चाटने लगा. उसने अपने दोनों हाथों से सुप्रिया की कमर को पकड़ लिया ताकि वह हिल न सके. उसकी उंगलियां सुप्रिया की कमर में गड्ड रही थी.

सुप्रिया - अह्ह्ह्ह.... ममममम.....

इक़बाल - काश तुमने साड़ी पेहेन ली होती आज... कितना मज़ा आता साड़ी में तुम्हारे साथ ये सब करते हुए....

सुप्रिया - इक़बाल जी... रुकिए न... अहह....

इक़बाल - अब बोहोत दिन रुक लिए... आज सब हो जाने दो... मुझसे अब और रुका नहीं जा रहा....

सुरपिया - उईईई... आह्ह्ह्ह.....

इक़बाल ने हलके से सुप्रिया के पेट पर काटा और और उसका गोरा जिस्म अपने मुँह में भर लिया. वह अगले 5-10 मिनट ऐसे hi उसके पेट से खेलता रहा. बीच बीच में इक़बाल के हाथ सुप्रिया के मम्मो को दबोच लेते और उन्हें ज़ोर से दबा देते. सुप्रिया बस आहें भरने के इलावा कुछ नहीं कर पा रही थी.

कुछ देर बाद इक़बाल ने सुप्रिया की और देखते हुए कहा - तुमने तोह मेरे लुंड और सब कुछ देखा हुआ है... पर मैंने अब तक तुम्हारा कुछ नहीं देखा है

इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ खींचते हुए उस बिस्तर पर सीधे बिठाया और उसकी कुर्ती को ऊपर करने लगा. सुप्रिया का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, उसे पता था की इक़बाल उसके मम्मी देखते hi पागल होने वाला था. इक़बाल ने जैसे hi सुप्रिया की तंग कुर्ती उतारी, कुर्ती के साथ साथ सुप्रिया की ब्रा भी ऊपर खींच गयी और सुप्रिया ऊपर से पूरी नंगी हो गयी.

सुप्रिया ज़ोर से चिल्लाई - उफ्फफ्फ्फ़.......

और उसने जल्दी से अपने हाथ से अपने मम्मी ढकने की कोशिश करि. वह तुरंत hi उलटी हो कर बिस्तर पर लेट गयी. पर पीछे से इक़बाल उसके ऊपर आ गया और उसकी गोरी नंगी पीठ को चूमने लगा.

इक़बाल - मममममम.... तुम तोह हर जगह से इतनी गोरी हो.... बस तुम्हे हर जगह से चूमता hi जायु.

इक़बाल सुप्रिया के ऊपर लेटते हुए उसकी गर्दन और पीठ पर चूमने लगा. उसका सब्र का बाँध टूटे जा रहा था, वह सुप्रिया के मम्मो को छूना चाहता था.

वह अपने हाथ सुप्रिया के पीठ के साइड में लाया, सुप्रिया ने अपना जिस्म बीएड से कास के सत्ता रखा था पर इक़बाल ने अपने हाथ उसके नीचे घुसते हुए उसके मम्मो पर रख दिए. वहां हाथ रखते हुए वह जैसे जन्नत में पहुंच गया था. इतने गोल, इतने मुलायम....

सुप्रिया का मुँह खुल गया और वह तेज़ तेज़ सांसें लेने लगी - इक़बाल जी.... छोड़िये मुझे... आठ....

इक़बाल - सुप्रियाआ..... अब मत रोको मुझे... उफ्फ्फ....

वह अपनी उंगलियां उसके मम्मो पर चलने लगा, उनकी चूचियों को अपनी उँगलियों से दबाते हुए उसे मजा सा आ रहा था. सुप्रिया उसे हटाने के लिए थोड़ा सा ऊपर उठी, पर इक़बाल ने उसके मम्मो को नहीं छोड़ा, वह उसकी पीठ के ऊपर छडा रहा और उसके मम्मो को दबाने लगा.

उसने सुप्रिया का चेहरा अपनी और किया और उसके होंठों को चूमने लगा. वह अब उसकी थी, सिर्फ उसकी.

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सुप्रिया की गोर गोर मम्मो पर इक़बाल के काले हाथ रुक hi नहीं रहे थे. वह उनसे अचे से खेल रहा था, कभी उसकी चूचियों को दबाते हुए, कभी उनको अपनी उँगलियों में फसा के, और बस उसके मम्मो को अछि तरह निचोड़ कर.

सुप्रिया की हालत भी ख़राब होती जा रही थी और वह अपनी पंतय को गीला होते महसूस कर पा रही थी. साथ hi एक अलग सी जलन सी शुरू हो गयी थी नीचे.

सुप्रिया - इक़बाल जी... आराम सी... उफ्फ्फ... दर्द हो रहा है...

इक़बाल - अभी कहाँ है दर्द हो रहा है... अभी तोह दर्द शुरू भी नहीं हुआ...

इक़बाल ने सुप्रिया की गर्दन पकड़ते हुए उसके गले को चूमा. सुप्रिया नीचे की और झुक गयी और इक़बाल उसके पीछे चूमता हुआ उसके ऊपर hi रहा. इक़बाल ठीक सुप्रिया से सत्ता हुआ था, और उसका लुंड उसके पायजामा में उभरा हुआ सुप्रिया की गांड से टकरा रहा था. उसके लुंड के बारे में सोचते hi सुप्रिया काँप गयी, वह उतना बड़ा लुंड तोह कभी नहीं झेल पायेगी, उसे ये अभी की अभी सब रोकना होगा.

सुप्रिया - इक़बाल जी... मैं बोहोत थक गयी हु... प्लीज मुझे सोने दे न....

इक़बाल - अभी तोह कुछ हुआ भी नहीं है.... आज की रात तोह जागना hi पड़ेगा... तुम कल सो जाना.... मैं भाभी से बोल दूंगा...

इक़बाल ने अपना हाथ सुप्रिया की गांड पर रखते हुए उसकी गांड को सहलाया. इक़बाल ने सुप्रिया की पयजामि के नाड़े को खोलते हुए उसकी पयजामि को नीचे सरकाया.

सुप्रिया का डर बढ़ता जा रहा था - इक़बाल जी... आपका बोहोत बड़ा है... मैं नहीं ले पयूंगी उसे अंदर...

ये सुन कर इक़बाल के शरीर में एक सरसरी सी उठ गयी. सुप्रिया उसका लुंड लेने के बारे में सोचने लगी थी. उसने उसे दिलासा देते हुए कहा - जो होना है वह तोह होगा hi. डरने से कुछ नहीं होगा... सब हो जायेगा... मुझ पर छोड़ दो... मुझे पता अब तक तुमने जो लुंड लिए होंगे वह मेरे जैसे नहीं होंगे... पर आज के बाद मेरे इलावा किसी और का तुम चाहोगी भी नहीं... पर उसमे अभी वक़्त है... पहले इधर तोह आयो...

इक़बाल ने झटका देते हुए सुप्रिया को घुमा दिया और उसके गुलाबी भूरे चूचे इक़बाल की आँखों के सामने आ गए. इक़बाल उन्हें देखते hi और भी उतावला सा हो गया, और उसने तुरंत अपने हाथ उन पर रखते हुए उन्हें ज़ोर ज़ोर से मसलना शुरू किया. अब वह रुक नहीं रहा था और न hi कोई झिझक थी. बस एक आग सी थी जो बढ़ती जा रही थी.

इक़बाल सुप्रिया के मम्मो को अपनी मुट्ठी में भर के ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. आज वह इन्हे छोड़ने नहीं वाला था. सुप्रिया अपनी चीख पर काबू करने की कोशिश कर रही थी पर उसके मुँह से तेज़ तेज़ आवाज़ें निकालनी शुरू हो गयी थी.

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कुछ देर उसके मम्मो को अपने हाथों से कुचलने के बाद, इक़बाल ने अपना मुँह सुप्रिया के मम्मो के बीच में घुसाया और वहां चाटने लगा. सुप्रिया के हाथ इक़बाल के बालों में थे और उसने अपनी आँखें बंद कर ली. नोचने से तोह ाचा ये चुसवाना था.

सुप्रिया - Siiiiiiiiiiiiiiiii.... आह्ह्ह्ह....

इक़बाल ने अपने होठ उसके चूचो पर रखते हुए उन्हें चूसना शुरू किया - ममममम..... आअह्ह्ह्ह.... मममममम.... कमल की चीज़ हो तुम.... कैसा नामर्द पति था तुम्हारा जो तुम्हे खुश नहीं रख पाया....

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सुप्रिया उसकी इन गन्दी बातों से और भी उत्तेजित होती जा रही थी. उसकी छूट बुरी तरह फड़क रही थी. इक़बाल ने उसके चूचे पर ज़ोर के काटा, और सुप्रिया चिल्ला उठी. आज तोह शायद घर में सबको पता चल गया होगा की वह लोग कुछ कर रहे थे.

इक़बाल ने उसके चूची को अपने दांत से हल्का सा काँटा और फिर से चूसने लगा. उसे यकीं नहीं हो रहा था की ये सब आज उसका हो hi गया था.

सुप्रिया - अह्ह्ह्ह.... नहीं.... काटो नहीं वहां पर... बहुत दर्द होता है..

इक़बाल - सुप्रिया... मुझे मज़ा आता है ऐसे काटने में... थोड़ा दर्द सेह लो मेरे लिए.... ममममम… कोई नहीं जब तुम मेरा लुंड मुँह में लोगी तोह तुम भी काट लेना उसे थोड़ा सा…

सुप्रिया का पूरा शरीर पसीने में भीगने लगा था. इक़बाल ने तोह सब कुछ सोच रखा था की वह उसके साथ क्या क्या करने वाला था. उसका जवाब देने के लिए वह कुछ बोल hi नहीं पायी.

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इक़बाल ने भी उसके जवाब का इंतज़ार नहीं किया और वह फिर से उसकी चूचियों को काटने लगा. वह अपनी होठों से उसके निप्पल्स को खींच रहा था, और सुप्रिया दर्द के मारे बुरी तरह झटपटा रही थी. अतुल ने कभी उसके साथ ऐसा कुछ नहीं किया था. और विक्रम, उसके बारे में तोह वह सोचना भी नहीं चाहती थी. आज उसकी वजह से तोह वह यहाँ इक़बाल के नीचे लेती थी.

सुप्रिया दर्द में कराहते हुए अपने हाथ से अपनी लाल चूचियों को मसलने लगी. अभी तोह ये रात उसके लिए बोहोत hi लम्बी जाने वाली थी.
 
अपडेट 87

सुप्रिया इक़बाल के भार के नीचे दबी हुई थी और ज़ोर ज़ोर से आहें भर रही थी. उसके मम्मी इक़बाल की बाल बरी छाती से चिपके हुए थे, और धीरे धीरे इक़बाल का जंगलीपन बढ़ता जा रहा था.

वह कभी सुप्रिया के चूचे चूसता, कभी बाल पकड़ते हुए उसके होंठ. सुप्रिया बस उसे अपने साथ सब करते जाने दे रही थी. अब तोह जैसे उसे उसकी इज़ाज़त की भी जरूरत नहीं थी, उस पर उसका पूरा अधिकार हो गया था.

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इक़बाल जंगलियों की तरह सुप्रिया पर टूट रहा था, उसका कोमल सा बदन उसे बेहद उत्तेजित कर चूका था. पर आज उसकी मैडमजी उसके नीचे थी, और वह इस रात को अपने और उनके लिए यादगार बनाना चाहता था.

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इक़बाल ने फिर से सुप्रिया के मम्मो को ज़ोर से अपनी मुट्ठी से दबाया, उसका नाख़ून सुप्रिया के सख्त चूचे पर जा कर लगा.

सुप्रिया उसका दर्द महसूस करते हुए ज़ोर से चिल्लाई - अह्ह्ह्हह.... ोुछहहह.... उईईई... अह्ह्ह्ह... इक़बाल जी...

इक़बाल को जैसे कोई फरक hi नहीं पड़ा और वह वहां नोचता गया.

सुप्रिया ने किसी तरह से अपना हाथ इक़बाल के नीचे से निकाला और अपनी चूची रगड़ी - इक़बाल जी.... आराम से... वहां काट गया है शायद...

इक़बाल ने तुरंत उसका हाथ हटा दिया - मुझे देखने दो...

इक़बाल ने अपना मुँह वहां लगा दिया और उसकी चूची को अचे से चूसने लगा. ऐसी चूची और मम्मी उसने शायद आज तक नहीं चूसे थे. इतने नरम और मुलायम, बिलकुल रुई की गेंद की तरह, पर साथ hi एकदम सख्त बनावट. इक़बाल ने सुप्रिया के मम्मो से थोड़ा सा ऊपर ज़ोर से काटा, जिससे सुप्रिया उछाल सी पड़ी, और इक़बाल को अपने ऊपर से हटते हुए बीएड पर बैठ गयी.

सुप्रिया ने नीचे अपने बूब्स की तरफ देखा, वह बुरी तरह लाल हो चुके थे, और जगह जगह काटने के निशाँ थे. इक़बाल का जंगलीपन वह और नहीं सेहेन कर पा रही थी.

सुप्रिया दूसरी तरफ मुँह करके पलट गयी और अपने जिस्म को सहलाने लगी - इक़बाल जी प्लीज... बोहोत दर्द हो रहा hai...aahhh...

इक़बाल को उसकी इस हरकत पर बोहोत गुस्सा आ रहा था, और उसने उसने पीछे से आते हुए उसके मम्मी कास के पकड़ लिए - सुप्रिया.... मुझे बार बार बोलना ाचा नहीं लगता... तुम मेरी औरत हो... और मुझे तुम्हारे मुँह से ना नहीं सुन्नी है...

इक़बाल ने ज़ोर से उसके मम्मो को बीचे दिया. सुप्रिया दर्द में करहा रही थी पर पीछे से इक़बाल उसे कास के पकड़ा हुआ था.

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इक़बाल दांत भीचते हुए बोलै - पूरी दुनिया मुझे कुछ नहीं समझती... पर मैं चाहता हूँ मेरी बीवी मेरी इज़्ज़त करे...

सुप्रिया के मम्मी ज़ोर से डाब रहे थे - अह्ह्ह..... आह्ह्ह्ह...

चाहे उसे कितना दर्द हो रहा था, उसकी छूट बुरी तरह काँप रही थी, और उसका दिमाग उसका साथ छोड़ सा रहा था. इक़बाल ने अपना एक हाथ सुप्रिया के पेट पर रखा और वहां ज़ोर से नोचने लगा. सुप्रिया की चीख बाद रही थी.

इक़बाल ने उसे एक पल के लिए छोड़ा और खड़ा हो कर अपना अंडरवियर उतारने लगा. सुप्रिया की घबराई हुई आँखों ने पीछे मुद कर देखा, इक़बाल का बड़ा मोटा सा कला लुंड बहार लटका हुआ था. उसे देखते hi सुप्रिया की तोह जान hi निकल गयी. जिस तरह से उस पर नसे चढ़ी हुई थी देख कर पता चल रहा था की इक़बाल कितना गरम था इस समय.

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इक़बाल ने अपना एक साथ सुप्रिया के सर पर रखा - माफ़ करना अगर मैंने थोड़ा दर्द कर दिया हो तोह... पर धीरे धीरे तुम्हे भी ये सब बोहोत ाचा लगेगा... अब लो ज़रा इसको अपने होठों से गीला कर दो...

इक़बाल ने सुप्रिया को अपने लुंड की तरफ इशारा किया. सुप्रिया तोह इस समय कुछ बोलने की हालत में hi नहीं थी. इक़बाल पिछले एक घंटे से उस पर चड्ढा हुआ उसके जिसमे के हर हिस्से को बुरी तरह राउंड रहा था, उसका अंग अंग बुरी तरह दर्द करने लगा था.

इक़बाल - अब ये मत कहना की तुमने कभी मुँह में नहीं लिया है... कौन पति और आशिक़ ऐसी खूबसूरत लड़की को मुँह में लिया बिना जाने देगा... और अगर देगा तोह बोहोत बड़ा गांडू hi होगा.

सुप्रिया - इक़बाल जी... सच मानिये... मुझे ये बिलकुल ाचा नहीं लगता...

इक़बाल - सुप्रिया... याद न तुम्हे, मैंने कैसे चुसवाया था उस चूतिये को अपना लुंड... मैं आपके साथ ऐसा नहीं करना चाहता... ये पूरी तरह गरम है... अगर इसे तुम्हारे मुँह से रहत नहीं मिली तोह तुम्हारी छूट में hi कुछ ज्यादा गर्मी कर देगा... तुम देख लो अब क्या चाहती हो...

सुप्रिया समझ गयी की इक़बाल राहुल की बात कर रहा था. उसे याद था की उसने किस तरह से राहुल के मुँह में अपना लुंड घुसेड़ दिया था. वह गिड़गिड़ाते हुए बोली - इक़बाल जी सच में... मैं इसे मुँह में नहीं ले पायूँगी... ये मेरे मुँह में नहीं जा पायेगा...

इक़बाल - मैं डालता हु न... आयो इधर...

इक़बाल ने हलके से सुप्रिया के बाल पकड़ते हुए उसे नीचे खींचा और अपना लुंड उसके मुँह के ठीक सामने ले आया - कभी देखा है आपने इससे बड़ा...

सुप्रिया के ठीक सामने इक़बाल का बड़ा सा लुंड थिरक रहा था, उसने अपना थूक अंदर गतका और इक़बाल की तरफ ऊपर देखा. इक़बाल के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ झलक रही थी, उसकी मैडमजी अब उसका लुंड चूसने वाली थी. सुप्रिया ने हलके से न में सर हिलाया. इक़बाल उसका मुँह अपने लुंड के और करीब ले आया और उसके बाल पकड़ते हुए आगे का हिस्सा मुँह में घुसा दिया.

लुंड घुसते hi सुप्रिया का मुँह और होंठ छोड़े होते गए और इक़बाल के लुंड का आगे का हिस्सा उसके दांतो पर घिसने लगा. सुप्रिया ने अपने दांत खोलने की कोशिश करि पर उसका मुँह इक़बाल के लुंड के लिए छोटा था और लुंड दांतों के बीच अटक के रह गया था.

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सुप्रिया के होंठों को अपने लुंड पर महसूस करते hi इक़बाल के मुँह से एक ज़ोर की ाःह्ह्णण निकली. उसकी प्यारी मैडमजी का मुँह आज उसके लुंड तक पहुंच hi गया था. वह आज उसके मुँह को जैम के छोड़ने वाला था.

सुप्रिया को इक़बाल के लुंड से बदबू से आती रही थी और उसने एक डैम से अपना मुँह पीछे कर लिया.

इक़बाल हस्ते हुए बोलै - क्या हुआ... मुँह में नहीं घुसा...

सुप्रिया - नहीं इक़बाल जी.... नहीं जा रहा अंदर....

इक़बाल - कोई नहीं... पहले इसे अचे से चाटो ज़रा.... ताकि ये अंदर फिसल सके...

सुप्रिया ने तरस भरा मुँह बना के इक़बाल की तरफ ऊपर देखा, और इक़बाल ने उसकी थोड़ी पर अपनी ऊँगली रखते हुए उसे प्यार से पुचकारा.

इक़बाल - मैंने तुमसे भी छोटे मुँह चोदे है... तुम्हारे में तोह आराम से आएगा... चलो अब चाटो इसे. इक़बाल ने हलके से सुप्रिया का गाल दबाया और उसकी जीब खुद बा खुद बहार आ गयी. इक़बाल ने तुरंत hi अपना लुंड उसकी जीब के सामने लगा दिया. और सुप्रिया की थूक भरी जीब से इक़बाल का लुंड गीला होना शुरू हो गया.

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इक़बाल के तड़पते हुए हाथ सुप्रिया के बालों पर कास रहे थे - ममममम.... आह्ह्ह्हह... अचे से पूरा चूस लीजिये मैडमजी... ाचा लगेगा मुझे...

सुप्रिया देख रही थी की इक़बाल की टोन कभी तोह सॉफ्ट हो जाती और कभी एक डैम से कड़क और रफ़. उसे डर सा लग रहा था इस समय इक़बाल से.

इक़बाल ने अपना लुंड अपने हाथ में पकड़ते हुए सुप्रिया की जीब पर फेरना शुरू किया - चलिए... आप पकड़िए इसे... अचे से होगा फिर....

इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए अपने लुंड पर लगा दिया. उसका लुंड इतना मोटा था की सुप्रिया की मुट्ठी भी पूरी बंद नहीं हो रही थी. इक़बाल अपने लुंड को उसके जीब और होंठों की तरफ धकेल रहा था. सुप्रिया कोशिश कर रही थी की उसका थूक बहार न निकले क्यूंकि जैसे hi उसका थूक इक़बाल के लुंड पर लगता वह एक नमकीन सा गन्दा सा स्वाद महसूस करती.

इक़बाल उतावला होता जा रहा था - गीला करो न इसे जल्दी से.... नहीं तोह मुँह में ऐसे hi ठूस दूंगा...

इक़बाल ने ज़ोर से सुप्रिया के बाल खींचे और सुप्रिया की चाटने की गति बाद गयी. अब तोह वह इक़बाल के पूरे लुंड का स्वाद महसूस कर पा रही थी. इक़बाल ने सुप्रिया को बिस्तर की तरफ धकेला और वह पीछे की और लेट गयी. इक़बाल अपना लुंड लेकर उसके मुँह के ऊपर आ गया था.

इक़बाल - मेरे तत्तो को भी चूसो अचे से.... करो करो... सब सीखना पड़ेगा क्या...

सुप्रिया की घबराहट बढ़ती जा रही थी, इक़बाल उस पर कोई रहम नहीं दिखा रहा था. उसने अपना एक टाटा अपने हाथ में लेकर सुप्रिया के होंठों के बीच में ठूस दिया.

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सुप्रिया के होंठों के बीच में इक़बाल के तत्तो की खाल और कुछ बाल थे. जैसे hi बाल उसके जीब में लगे उसे खासी सी आ गयी और वह पीछे हो गयी.

इक़बाल गुर्राते हुए बोलै - गरम करके ठंडा मत कर... जल्दी से चूस अचे से...

सुप्रिया एकदम से हक्की बक्की सी रह गयी. इक़बाल ने सुप्रिया का सर पकड़ा और अपना लुंड उसके होंठों के बीच फिर से घुसना शुरू किया. इस बार इक़बाल का गीला लुंड उसके होंठों के बीच घुस आ रहा था और दांतों के बीच निकलता हुआ थोड़ा अंदर चला गया था. सुप्रिया का मुँह ऐसे खींचने से बोहोत ज्यादा दर्द कर रहा था, और उसने कास के इक़बाल के पैरो को पकड़ लिया.

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इक़बाल अब और ज़ोर से लुंड को अंदर धक्का दे रहा था - अह्ह्ह्हह.... बस थोड़ा सा और.. ममममम.....

इक़बाल ने सुप्रिया के मुँह और अपने लुंड के बीच में एक ऊँगली घुसाई और लुंड को अपने हाथ से थोड़ा सा और अंदर धकेला - मममममम.... आपका मुँह.... कमल है.... मज़ा आ रहा है....

सुप्रिया की आँखें फैट कर बड़ी हो रही थी, वह उसका लुंड अपने मुँह में नहीं झेल पा रही थी और इधर उसने तोह एक ऊँगली घुसा के उसका मुँह और भी बड़ा कर दिया था.

इक़बाल बेरहमी से लुंड अंदर धकेलता गया. उसका एक हाथ सुप्रिया की चूची को नोचते हुए खींच रहा था, जिससे सुप्रिया की गर्मी बढ़ती जा रही थी.

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सुप्रिया ने हलके से मुँह से आवाज़ निकालनी चाही पर इक़बाल का लुंड कोई भी आवाज़ निकालनी की जगह नहीं छोड़ रहा था. वह किसी तरह से अपनी नाक से सांस ले रही थी पर हर सांस में इक़बाल के लुंड की बदबू थी. उसे इक़बाल का लुंड अपने गले तक पहुँचता हुआ महसूस हुआ. उसे ऐसा लगा वह अभी उलटी कर देगी.

इक़बाल को जैसे hi उसका गाला महसूस हुआ, उसे लगा उसने फ़तेह हासिल कर ली हो. उसे सुप्रिया की ये हालत देख कर एक अजीब सा मज़ा आ रहा था. सुप्रिया ने तड़पते हुए इक़बाल की और देखा, उससे अपनी आखों से गुहार लगते हुए की वह उसका भी दर्द समझे.
 
प्रीती - यस ी एकनॉलेज योर फीडबैक. िफ़ ी हद मोरे टाइम ी वोउल्ड हैवे दोने आईटी स्लिंगटली डिफरेंटली. बूत ी वास् रनिंग आउट ऑफ़ टाइम एंड पीपल वेरे गेटिंग इम्पॉटेंट अस वेल. ी वास् कोंस्तांतली अस्केद की 10-15 अपडेट हो गए है विथाउट सेक्स, लेटस गेट आईटी दोने. विथ फेस्टिवल सीजन टाइम विल बे वैरी शार्ट एंड ी डिडन्ट वांट पीपल तो लूज़ इंटरेस्ट इन थे स्टोरी विथ ान अपडेट एव्री 1-2 वीक्स. आईटी वास् ा बिट सुद्दीन बूत ी विल तरय तो फिक्स सम ऑफ़ आईटी इन फ्यूचर उपदटेस, बूत व्हाट इस दोने इस दोने.

ी ऍम ok विथ आईटी बीइंग ा ड्रीम सीक्वेंस अस वेल एंड वे गेट बैक तो थे ओल्ड स्लो पेस वन्स अगेन. ी वांट तो आल्सो व्रिठे अबाउट इतर चरक्टेर्स इन थिस स्टोरी सो प्लीज डोंट लूज़ इंटरेस्ट.

एडिट - एक्चुअली यस, ी विल मार्क आईटी अस ा ड्रीम सीक्वेंस अस थे लास्ट 2 उपदटेस दो नॉट अलाइन विथ हाउ ी वास् राइटिंग थे स्टोरी. अपोलोजिज़ िफ़ थिस चेंज विल अपसेट समवन, बूत होपफ़ुल्ली आल्सो गावे सम इरोटिक सीन्स विथाउट दिसृप्तिंग थे स्टोरी. थे विल आल्सो मेक सुप्रिया थिंक अबाउट थिंग्स शी हसन्त थॉट अबाउट सो फार.
 
अपडेट 88

सुप्रिया एक डैम से चीखती हुई जगी. उसने जल्दी से अपना हाथ अपने मुँह पर लगाया जो दर्द कर रहा था, और फिर अपनी छाती पर जहाँ खरोचों के निशाँ थे. पर जब उसने वहां छुआ तोह वह हैरान रह गयी, वहां ऐसा कुछ नहीं था. वह भरी सासें लेते हुए पसीने में टर्र सब कुछ समझने की कोशिश कर रही थी. अभी कुछ पल तक तोह इक़बाल उसके मुँह में अपना लुंड ठूस रहा था और उस पर बेरहमी से चड्ढा हुआ था, और अब वह उसके बराबर में गहरी नींद में सोया पड़ा था.

सुप्रिया ने फिरसे अपने मम्मो को छुआ, उसे ऐसा लग रहा था की उसका पूरा शरीर दर्द कर रहा हो. क्या इक़बाल और उसके बीच सब हो गया था या ये कोई सपना था? उसने महसूस किया की उसकी पंतय हलकी सी गीली हो राखी थी. धीरे धीरे उसके मुँह का दर्द गायब होना शुरू हो गया था. शायद ये सब उसका सपना hi था. क्यूंकि इक़बाल तोह अभी भी बीएड पर अपने कोने में सो रहा था. सुप्रिया ने अपनी भारी साँसों को थमने की कोशिश की.

शायद वह कुछ ज्यादा hi स्ट्रेस में थी. इक़बाल का उसे बताना की विक्रम नहीं आने वाला था, और फिर उसके लिए वह साड़ियां लाना, और रुबीना भाभी का बार बार सेक्स करने पर ज़ोर डालना, शायद इसी सब ने उसे ये सपना देखने के लिए मज़बूर कर दिया था. वह अपने दिमाग पर ज़ोर दाल कर सोचने लगी की कल रात हुआ क्या था. उसे सब याद आने लगा.

भाभी ने उसे पहले hi बता दिया था की घर में घोषत बनेगा, और उन्होंने उसके लिए पहले से hi अलग से खाना निकाल दिया था. वह जल्दी खाना खा का ऊपर अपने कमरे में आ गयी थी, और बिस्तर पर लेटते hi शायद उसे नींद आ गयी थी. उसे याद भी नहीं की कब इक़बाल आया था बस याद था तोह ये बेफज़ूल का सपना. की की… इक़बाल उसके साथ क्या क्या कर रहा था. और इतनी बेरहमी से… नहीं इक़बाल उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता था. उसने तोह हमेशा उसे हर मुसीबत से बचाया hi था.

सुप्रिया ने अपने माथे पर आते हुए पसीनो को पोछा. कितनी सच सा लग रहा था ये सपना. इक़बाल जिस तरह से उसके साथ वह सब कर रहा था, सुप्रिया सोचते hi बुरी तरह काँप उठी. पर शुक्र है ये सब बस एक सपना hi था, नहीं तोह पता नहीं वह क्या hi करती.

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, वह शायद कुछ ज्यादा hi गहरी नींद में सो रहा था जो उसे सुप्रिया की चीख सुनाई नहीं दी. सुप्रिया फिर से बिस्तर पर लेट गयी और उसके चेहरे की टेंशन थोड़ी काम हुई. पता नहीं वह क्या hi सोचने लगी थी. पर सच तोह ये भी था की वह अब इक़बाल की बीवी थी, चाहे उसने ये उससे सच में न कहा हो, बस सपने में कहा हो. अगर उसने उससे उसका शौहर होने का हक़ मांग किया तोह? क्या वह उसे इंकार कर पायेगी? और अगर किया तोह इक़बाल क्या करेगा?

उसने अपने दिमाग से ये ख्याल निकालने की कोशिश करि और आँखें बंद कर ली. अभी तोह शायद पूरी रात बाकी थी, और वह अपनी रात काली नहीं करना चाहती थी. कुछ देर बाद वह फिर से सो गयी थी पर इस बार उसके दिमाग में ऐसे सपने नहीं आ रहे थे.

सुबह जब वह उठी तोह शायद उसे उठने में थोड़ी देर हो गयी थी क्यूंकि इक़बाल तोह बिस्तर या कमरे में नहीं था. सुप्रिया जल्दी से कड़ी हुई और उसने घडी में टाइम देखा. 9 बज गए थे! उफ्फ्फ वह इतनी देर तक कैसे सो गयी थी. पता नहीं सब क्या सोच रहे होंगे. वह जल्दी से कड़ी हुई और कमरे में लगे छोटे से आईने में देख कर अपने बाल ठीक करने लगी. उसने अपनी चुन्नी उठायी और जल्दी से नीचे की और भागी.

वह जल्दी से रसोई में पहुंची जहाँ आज हिना रुबीना के साथ कड़ी उसका हाथ बता रही थी.

सुप्रिया रसोई में घुसते hi हड़बड़ाते हुए बोली - भाभी… पता नहीं कैसे मेरी आँख hi नहीं खुली… सॉरी… मैं वह…

रुबीना मुस्कुराते हुए बोली - कोई नहीं… हो जाता है… लगता है रात सही से सोई नहीं… हिना जा तू ज़रा कपडे सूखा दे…

हिना काफी नाराज़ सी लग रही थी और वो मुँह बनाते हुए रसोई से जल्दी से बहार निकली, उसे वैसे भी घर का काम करना ज़रा भी ाचा नहीं लगता था, पर आज वह कुछ ज्यादा hi रूठी हुई लग रही थी.

सुप्रिया ने उसे जाते देख पुछा - इसे क्या हुआ आज?

रुबीना - उसे छोडो, उसका तोह कुछ न कुछ लगा hi रहता है… तुम ये बताया की कल रात क्या हुआ?

सुप्रिया रात के बारे में सोचते hi सकपका सी गयी, जैसे रुबीना उसके सपने के बारे में पूछ रही हो - कल रात…..

रुबीना - हाँ… कल रात… तुम्हारी चीख की आवाज़ आयी थी… पर बस एक बार…

सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए - आपको सुनाई दी थी वह?

रुबीना हस्ते हुए - हाँ बन्नो… मैं घोड़े बेच के नहीं सोती… क्या हुआ था? इक़बाल ने नीचे ऊँगली घुसा दी थी क्या..

सुप्रिया एकदम से बोल पड़ी - नहीं नहीं… की… आप ऐसे क्यों बोल रहे हो… नीचे कौन ऊँगली डालता है ऐसे…

रुबीना की हसी बाद गयी - हाहाहा… क्यों तुमने कभी अपने नीचे ऊँगली नहीं की है क्या? और जब मर्द करे तोह और भी मज़ा आता है…

सुप्रिया ने मुँह बनाते हुए कहा - उफ़… आप भी न… पता नहीं क्या क्या सोच लेती है…

रुबीना - अब और क्या सोचती? तुम एक hi बार ज़ोर से चीखी तोह मुझे लगा ऊँगली hi डाली होगी… क्यूंकि अगर बड़ा वाला औज़ार डाला होता तोह चीख सिर्फ एक बार नहीं आती… है न?

सुप्रिया - ऐसा कुछ नहीं हुआ था… बस एक अजीब सा सपना आया था…

रुबीना - आईये लुओ… ये क्या बात हुई… चलो सपने में तोह कोई ऊँगली से कुछ ज्यादा hi दाल रहा होगा…

सुप्रिया ने शर्म से अपना मुँह झुका लिया और वह सामने रखे एक कूटनी के मूसल को हाथ में उठा लिया. वह बस अब इस टॉपिक को बदलना चाहती थी - बताइये ना..... क्या काम करना है मुझे…

रुबीना - हाहाहा… रहने दो… सब हो गया है…

तभी हिना गुस्से में भुनभुनाते वापिस रसोई की तरफ आयी - ये ाचा है, मुझे काम पर लगा दिया बहार… और यहाँ आप दोनों कहि कहि कर रहे हो… वह भी मेरे बिना… ऐसा लग रहा है जैसे घर की बहु मैं हु और आप दोनों माँ बेटी…

रुबीना की हसी रुक hi नहीं रही थी - ः ये बात तोह सच है... तू कहाँ मेरी बेटी है...

हिना की शकल रोने वाली हो गयी थी, सुप्रिया ने अपना हाथ हिना के कंधे पर रखते हुए कहा - आप ऐसे न सतायो इसे... ाचा बता तोह सही... क्या हुआ?

हिना रोटी हुई आवाज़ में बोली - चची... मुझे कॉलेज जाना है... वहीँ अपनी पड़े पूरी करनी है... पर अम्मी मान hi नहीं रही है...

रुबीना - सुप्रिया तुम इसकी बातों में न hi आयो तोह बेहतर है... तेरे अब्बू कभी नहीं मैंने वाले...

हिना भड़कते हुए बोली - पर क्यों! अब तोह नाज़ भी जा रही है...

रुबीना - तू सब समझती तोह है... फिर क्यों बार बार पूछती है... एक तोह कॉलेज कोई पास में नहीं है... एक डेड घंटे दूर है, वहां आएगी जाएगी कैसे? दूसरा तेरे अब्बू लड़कियों के इस तरह घर से बहार निकलने के सख्त खिलाफ है. वह तोह नाज़ के जाने पर भी खुश नहीं है.

हिना का गुस्सा बढ़ता जा रहा था - चलो शुक्र है उनकी नाज़ के घर तोह नहीं चलती न, नहीं तोह उसे भी कैद कर लेते...

शोर शराबा सुन कर अपने कमरे में से अम्मी जी भी निकल आयी थी - देखो ज़रा कैसे कैंची की तरह जुबान चल रही है इसकी... बिलकुल अपनी माँ पर गयी है...

रुबीना ने तिरछी आखों से अम्मी जी को घूरा, जैसे उन्हें चुप होने का इशारा कर रही हो.

अम्मी जी - मैं कह रही हु न, इससे पहले ये लड़की हाथ से निकल जाये, इसका जल्दी से निकाह करा दो...

हिना का गुस्सा काम नहीं हो रहा था - हाँ बस निकाह करा दो... और फिर बच्चे करा दो... इंतज़ार क्यों कर रहे हो....

अम्मी जी भी भड़क गयी - कैसी बेहया सी हो रही है आज... अपनी चची के साथ बैठ कर ये सब सीखी है क्या?

रुबीना - अम्मी जी... क्या बोल रहे हो आप भी... सुप्रिया की तोह आवाज़ भी नहीं निकलती किसी के आगे... उसे क्यों इस बेगैरत लड़की की बातों के बीच में दाल रहे हो...

रुबीना ने तेज़ आवाज़ में हिना के और देख कर कहा - हिना! बस! बोहोत हो गया तमाशा, जायो अपने कमरे में जायो...

हिना पेअर पटकते हुए अपने कमरे में चली गयी, उसके रोने की आवाज़ आ रही थी. सुप्रिया वहां कड़ी कड़ी देख रही थी की कुछ hi मिनट में हसी का माहौल कैसे सबके लिए गुस्से में तब्दील हो गया. अम्मी जी भी भुनभुनाते हुए अपने कमरे में चली गयी और रुबीना भी थोड़ा गुस्से में बर्तनो को पटक कर मांजने लगी.

सुप्रिया उसके पीछे hi कड़ी थी. वह कुछ देर के बात हिम्मत करके बोली - भाभी... मैं एक बात बोलू?

रुबीना झल्लाते हुए बोली - हाँ... तुम भी बोलो... तुम क्यों पीछे रहो...

उनकी टोन सुनकर सुप्रिया थोड़ी घबरा सी गयी, अब तक इतने दिनों में रुबीना उससे इस तरह गुस्से में नहीं बोली थी. सुप्रिया ने गहरी सांस ली और फिर से बोली - भाभी... आप कहे तोह मैं इस बारे में पूछ कर देखु आज रात?

रुबीना को कुछ समझ नहीं आया - किस्से? क्या पूछना है?

सुप्रिया को समझ नहीं आ रहा था वह अब्बास को क्या बुलाये - भैया से.... हिना के कॉलेज जाने के बारे में...

रुबीना एक डैम से पलटी, उसके चेहरे पर परेशानी साफ़ थी - नहीं नहीं.... तुम क्यों इस पचड़े में पद रही हो.... कल तक सब ठीक हो जायेगा... इसको तोह ऐसे दौरे पड़ते रहते है...

सुप्रिया - पर भाभी हिना भी कुछ गलत तोह नहीं मांग रही न... और मुझे नहीं लगता की आप इतनी पुराणी सोच रखती हो...

रुबीना के चेहरे की शिकन बाद गयी - मेरी सोच की किसको परवाह है... न तोह हिना को और न hi उसके अब्बू को... मैं कह रही हु न, तुम इस सब में न hi पदों तोह ाचा है...

सुप्रिया कुछ आगे बोल hi नहीं पायी और बाकी दिन ऐसे hi निकल गया. वह कुछ देर के लिए हिना के कमरे में भी गयी, पर हिना तोह मुँह फुला कर बैठी हुई थी.

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उसे देख कर सुप्रिया को फिर से अपने पुराने दिनों की याद आ गयी. उसका दिल कह रहा था की वह हिना की मदद करने के लिए कुछ करे, बूत दिमाग कह रहा था की उसे अपनी टांग इस मामले में नहीं अडानी चाहिए.

_____________________________

शाम हुई और इक़बाल और अब्बास घर वापस आ गए थे. रुबीना और सुप्रिया रसोई में खाना बना चुकी थी और उन्होंने खाना परोस दिया. दोनों भाई चुप चाप बैठ कर खाना खा रहे थे.

तभी इक़बाल ने पुछा - आज हिना नहीं दिख रही... उसकी आवाज़ भी सुनाई नहीं दी... कहीं गयी है क्या?

अब्बास ने रुबीना को घूरा - इस वक़्त??? इस वक़्त कहाँ जाएगी...

रुबीना ने रूखी सी आवाज़ में कहा - नहीं वह अपने कमरे में है...

इक़बाल - क्या हुआ, पड़े कर रही है क्या...

ये सुन कर रुबीना का मुँह सा बन गया, शायद वह हिना के हक़ में कुछ बोलना चाहती थी, पर उसकी हिम्मत hi नहीं हुई. सुप्रिया ने बारीकी सी रुबीना का चेहरा पड़ने की कोशिश करा, और जैसे hi उनकी नज़रे मिली, रुबीना ने अपनी नज़रें झुका ली.

सुप्रिया ने एक गहरी सांस ली, वह पहली बार अब्बास के सामने कुछ बोलने वाली थी - उम्म्म... एक बात करनी थी आपसे भाई जान...

अब्बास ने चौंकते हुए सुप्रिया की और देखा - मुझसे?? कहो...

इक़बाल का हाथ का निवाला भी उसके हाथ में रह गया था, और वह सुप्रिया को गौर से देख रहा था. पता नहीं सुप्रिया क्या hi बोलने वाली थी.

रुबीना बीच में बोली - कुछ नहीं कहना इसे.... रहने दो...

अब्बास - बोलने दो इसे... मैंने तोह कभी इसकी आवाज़ भी नहीं सुनी... बोलो सुप्रिया... क्या बोलना चाहती हो...

सुप्रिया ने घबराते हुए कहा - जी वह... मुझे हिना के बारे में कुछ बात करनी थी...

अब्बास - हिना के बारे में?

रुबीना ने अपनी आँखें नीचे कर ली, वह भी शायद घबराई हुई सी थी.

सुप्रिया - जी... उसकी पड़े को लेकर... वह घर पर पद तोह रही है... पर अकेले में कितनी hi पड़े हो पाती है, आप भी जानते है... आप अगर उसे कॉलेज जाने दे तोह उसकी पड़े अचे से पूरी हो जाएगी...

अब्बास का चेहरा एक डैम से काफी कठोर सा हो गया था - पद लिख कर क्या करेगी... उसकी शादी hi करनी है हमें...

सुप्रिया - वह पड़े में काफी अछि है... मुझे बता रही थी की क्लास में सबसे ज्यादा नंबर आते थे उसके... अभी पद लिया तोह पद लेगी फिर बाद में तोह... पड़े लिखे कभी बेकार तोह जाती नहीं है... उसे आगे मदद hi करेगी...

अब्बास ने मुँह बनाते हुए कहा - वह सब तोह ठीक है... पर गाँव से बहार इतनी दूर अकेले आना जाना... लड़कियों के लिए सही नहीं है... और पता नहीं उस कॉलेज में कैसे लड़के पड़ते है...

रुबीना की आँखें थोड़ी सी ऊपर उठी. अब्बास ने सुप्रिया को चुप नहीं करा दिया था, वह उससे इस बारे में बात कर रहा था.

सुप्रिया की आवाज़ में भी थोड़ा सा उत्साह बाद गया था - अकेले नहीं जाएगी... सुबह इक़बाल छोड़ आएंगे उसे... और दिन में ले भी आएंगे... और रही बात कॉलेज की तोह वह बस लड़कियों का कॉलेज है... वहां कोई लड़के नहीं पड़ते...

अब्बास ने इक़बाल की और घूर कर देखा, जैसे उससे पूछ रहे हो की वह क्या सोचता था. इक़बाल की सुप्रिया की और देखा और सुप्रिया ने अपना चेहरा हल्का सा टेड़ा करके उसकी और देखा, ताकि वह पसीज जाये.

इक़बाल ने धीरे से कहा - भाई जान... अगर आपकी इज़ाज़त हो तोह मैं हिना को छोड़ और ले ायूँगा....

अब्बास ने आखिर में रुबीना की और देखा - तुम्हारी क्या सोच है?

रुबीना थोड़ी हैरान सी हो गयी की अब्बास उससे पूछ रहा था - जी... हाँ मेरे ख्याल से उसे जाने देते है... उसका बोहोत मैं है... और उसने कभी किसी चीज़ के लिए ऐसे ज़िद्द भी नहीं की है...

अब्बास - लगता है सारे मिले हुए हो......

सुप्रिया अपनी सांस रोक कर अब्बास के फैसले का इंतज़ार कर रही थी.

अब्बास - ठीक है... पर उसे बोल देना की बस वहां पड़े करने जाएगी... और पड़े करके सीधा घर... अगर मुझे पता चला की ऐसा नहीं है तोह उसी दिन साड़ी पड़े रुकवा दूंगा... और इस बीच उसके लिए लड़का देखना शुरू करो...

रुबीना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी, और वह हड़बड़ाते हुए बोली - जी.... शुक्रिया... शुक्रिया...

अब्बास वहां से खड़ा होते हुए ऊपर की और जाने लगा. इक़बाल ने सुप्रिया की और देखा, वह बेहद hi खुश लग रही थी और उसने रुबीना को गले लगा लिया. इक़बाल के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गयी और वह उन्हें वहां छोड़ कर ऊपर की और अपने कमरे में आ गया.

लगभग आधे घंटे बाद सुप्रिया चहकते हुए ऊपर कमरे में पहुंची. उसकी शकल पर ख़ुशी साफ़ झलक रही थी.

सुप्रिया ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और एकदम से बोलना शुरू हो गयी - आपको पता है, बोहोत hi खुश हो गयी थी हिना... जैसे पता नहीं क्या hi मिल गया हो उसे... और आपका भी बोहोत बोहोत शुक्रिया की आपने हाँ कर दी... रुबीना भाभी को तोह यकीं hi नहीं हो रहा था की अब्बास भाई जान ने हाँ कर दी....

इक़बाल बिस्तर पर बैठा हुआ सुप्रिया को बोलते सुन रहा था, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे वह इसी घर की सदस्य हो. उसे ये सब देख कर बोहोत ाचा सा लग रहा था, आज शायद वह पहली बार इतनी खुल कर इक़बाल के सामने कुछ बोल रही थी.

इक़बाल उसे देख कर खोया सा हुआ था और सुप्रिया बोले hi जा रही थी. सुप्रिया भी शायद अपने कल रात के भयानक से सपने को भूल गयी थी, उसे लग रहा था पता नहीं उसने क्या hi हासिल कर लिया था आज.

सुप्रिया बोलते बोलते इक़बाल के पास आ कर कड़ी हो गयी थी, उसकी आवाज़ ने एकदम से इक़बाल को अपनी सोच से जगाया - आपने सुना भी मैंने क्या कहा?

इक़बाल मुस्कुराते हुए बोलै - जी मैडमजी... आपने आज इतनी हिम्मत दिखा कर हिना के लिए भाई जान से बात कर ली... मुझे तोह यकीन hi नहीं हुआ...

सुप्रिया एक पल के लिए छुप सी हो गयी. इक़बाल के मुँह से मैडमजी सुनते hi सुप्रिया भी जैसे फिर से अपनी पुराणी जिंदगी में वापिस पहुंच गयी थी. ये उसका पति या घर नहीं था, वह तोह बस यहाँ किसी तरह से पहुंच गयी थी.

सुप्रिया - हाँ तोह... वह मेरी भी तोह...

सुप्रिया बीच में hi छुप हो गयी. हिना उसकी थी कौन? वह क्या थी की हिना की? पता नहीं वह हिना के कॉलेज जाने पर इतना खुश क्यों हो रही थी.

इक़बाल ने शायद उसके मैं के भाव पद लिए - आपकी और उसकी काफी अछि बोल चाल हो गयी है न पिछले एक महीने से...

सुप्रिया ने इक़बाल से दूसरी और चेहरा फेर लिया - हाँ शायद....

इक़बाल - अब उसके दाखिले वैगेरा का सारा काम आप hi देख लेना... हम लोगो को तोह इस सब की कोई जानकारी नहीं है...

इक़बाल की नार्मल सी बात सुनकर सुप्रिया थोड़ी सी सहज हुई - हाँ, मैं उसकी दोस्त नाज़ से बात करती हु कल... फिर वहां जाना पड़ेगा एक बार...

इक़बाल - जी... आप बता देना... मैं ले चलूँगा....

सुप्रिया - शुक्रिया... आप सो जाइये... आप थक गए होंगे...

इक़बाल - आपको इस तरह खुश देख कर आज बोहोत ाचा सा लग रहा है... बिलकुल थकान महसूस नहीं हो रही...

सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी. कल रात का सपना अभी भी उसके मैं को परेशान सा कर रहा था. इक़बाल सरक कर बीएड के एक कोने में लेट गया. सुप्रिया ने अपने ओढ़नी चद्दर को झांकता और बीएड पर अपनी साइड फैलाया. वह कमरे के बत्ती बंद करने गयी और उसे बंद करके बीएड पर लेट गयी.

कमरे में बिलकुल सन्नाटा था, और वह और इक़बाल बीएड के दो अलग अलग छोर पर लेते हुए थे. ये छुपी कितनी अजीब सी थी, इक़बाल की और से ज़रा भी हरकत नहीं हो रही थी. सुप्रिया ने अपना सर हिलाते हुए अपने आप को धिक्कार लगायी. पता नहीं वह भी क्या क्या नहीं सोचने लग गयी थी कल रात. कुछ भी तोह नहीं था ऐसा. पर कुछ न होकर भी वह क्यों इस घर का हिस्सा बनती जा रही थी.

_________________________________________

अगले दो दिन, हिना और सुप्रिया बिलकुल उत्साहित होकर कॉलेज के लिए सारे कागजहत तैयार कर रहे थे. नाज़ से बात करके उन्हें पता चला की कॉलेज का सेशन अभी कुछ hi हफ्ते पहले शुरू हुआ था, और नाज़ ने काफी पहले hi अपना एडमिशन फॉर्म भर दिया था.

बीच बीच में हिना नाज़ पर भड़क जाती क्यूंकि नाज़ ने ये साड़ी बातें हिना से छुपाई थी. फिर नाज़ अपनी सफाई में बताने की कोशिश करती की उसकी अम्मी ने उसे साफ़ बोलै था की अगर गाँव में किसी को इस बारे में पता चल गया तोह वह उसके अब्बा को भड़काना शुरू कर देंगे. उन दोनों की कछार कछार के बीच में सुप्रिया एडमिशन के लिए साड़ी चीज़ इखट्टा करने में लगी थी.

सुप्रिया ने रुबीना के फ़ोन से कॉलेज में फ़ोन करके जानकारी लेने की कोशिश करि पर उन लोगो ने बोल दिया था की वह वहां आकर साड़ी बात करे. उन्होंने एडमिशन के लिए न hi हाँ किया और न hi ना. सुप्रिया बार बार हिना को समझने की कोशिश कर रही थी की हो सकता था की उसका एडमिशन अब हो भी न, क्यूंकि एडमिशन का वक़्त निकल चूका था. लेकिन हिना और नाज़ अपनी ख़ुशी में इतनी डूबी हुई थी की उन्होंने सुप्रिया की बात पर ज़्यादा ध्यान hi नहीं दिया.

सारे कागज़ मिल गए थे सिवाए हिना के बिरथ सर्टिफिकेट के. रुबीना ने पूरा घर छान मारा पर वह उसे कहीं नहीं मिल रहा था. पर उसकी 12तह की मार्कशीट में उसकी डेट ऑफ़ बिरथ लिखी हुई थी, शायद उसी से काम चल जाये.

रुबीना - चलो अब नहीं मिल रहा है तोह इसी से काम चला लो. मुझे तोह अब याद भी नहीं है की था भी या नहीं...

हिना - अम्मी आप भी न... मेरा सारा सामान कितनी लापरवाही से रखा था... मुझे याद है जब ज़ीनत को बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए बिरथ सर्टिफिकेट चाहिए था तब तोह आपकी बड़ी जल्दी मिल गया था...

रुबीना - ाचा न बाबा... गलती हो मुझसे... पर तू फिक्र मत कर... जब तेरी शादी होगी न उससे पहले मैं ढून्ढ दूंगी...

सुप्रिया - चलिए आप लोग अब लड़ना बंद कीजिये... बस अब कल सुबह जाने के लिए तैयार रहना आप दोनों...

रुबीना ने चौंकते हुए कहा - दोनों मतलब?

सुप्रिया - इक़बाल आप दोनों को ले जायेंगे कल... वहां जाकर ये अपना एडमिशन करा लेगी...

हिना - चची मैं कैसे अकेले सब करा लुंगी... मैं आपकी तरह इतनी होशियार थोड़ी न हु...

रुबीना - हाँ... इसने तोह करा लिया... और मैं वहां जाकर क्या hi करुँगी... ऐसा करो तुम इसके साथ चली जायो सुप्रिया.... तुम अचे से बात कर लोगी...

हिना खुश होते हुए बोली - हाँ... ये बढ़िया रहेगा... आप चलिए मेरे साथ....

सुप्रिया - ारी पर तुम्हारा इतना बड़ा दिन है... तुम्हारी अम्मी को वहां होना चाहिए न...

हिना - अम्मी ने कहा न की उनसे नहीं होगा... मुझे तोह आपको hi साथ लेकर जाना है... आप उनसे बेहतर संभल लोगी सब...

सुप्रिया ने रुबीना की और देखा, हिना की बात सुनकर रुबीना का मुँह थोड़ा सा उतर गया था.

सुप्रिया - ऐसा नहीं है... तुम्हारी अम्मी भी बोहोत होशियार है... मुझसे भी कहीं ज्यादा... कितना लड़ी थी वह तुम्हारे अब्बू से तुम्हारे एडमिशन के लिए, और तुम ऐसे बोल रही हु उनसे...

हिना सफाई देते हुए बोली - पर वह भी तोह मुझे बोल रही थी...

रुबीना बीच में बोल पड़ी - सुप्रिया... तुम मेरी फिक्र मत करो... सच तोह एहि है की तुम ये काम मुझसे बेहतर कर लोगी... और वैसे भी तुम दोनों पतली पतली लड़किया तोह आराम से इक़बाल के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ जाओगे... मैं गयी तोह ये नहीं बैठ पायेगी...

सुप्रिया - मोटरसाइकिल पर?

रुबीना - हाँ... और क्या... वही खतरा जो बहार कड़ी रहती है...

सुप्रिया - पर हम तीनो कैसे...

हिना - हो जायेगा चची... मैं और नाज़ तोह कई बार उसके भाई के पीछे बैठ कर जाते है... ओह्ह्ह... अम्मी के सामने नहीं बोलना चाहिए था...

रुबीना ने उसे घूर कर देखा - रहने दे... मुझे तेरी साड़ी हरकते पता है.... खैर... चलो फिर तय हुआ कल का मामला...

सुप्रिया थोड़ी एक्ससिटेड थी और थोड़ी नर्वस भी. रुबीना ने उस पर इस काम की जिम्मेदारी दाल दी थी, पता नहीं कल क्या होने वाला था. वहां जाकर कहीं हिना को निराशा का सामना करना पड़ा तोह वह कितना शर्मिंदा सा महसूस करेगी.

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अगले दिन सुबह hi हिना तैयार हो कर कड़ी हो गयी थी. एक सफ़ेद कुर्ती और गुलाबी दुपट्टे में वह एक खिली हुई सी काली लग रही थी.

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सुप्रिया भी एक लाल सलवार सूट में तैयार होकर नीचे आ गयी थी. वह बेहद hi खूबसूरत लग रही थी, और शायद उसकी टेंशन थोड़ी काम होने की वजह से उसके गाल आज फिर से थोड़े भरे हुए से लग रहे थे. बिलकुल पहले की तरह.

इक़बाल तोह उसे बस देखता hi रह गया था. हिना भी उसे देख पर उसके पास आ गयी थी.

रुबीना ने उसे देखते हुए कहा - आज तोह दोनों चची बेटी इतनी सज के तैयार हुई है... जैसी किसी की शादी में जा रही हो...

हिना - मेरा एडमिशन है... सजेंगे नहीं...

रुबीना - ाचा ठीक है... ये ताबीज़ रख लो दोनों... नज़र नहीं लगेगी... और सुनो सुप्रिया.. ये मेरे कड़े है... हाथ में दाल लो... हाथ सुने अचे नहीं लगते...

रुबीना ने अपने हाथों से सुप्रिया को कड़े पहना दिए और वह दोनों घर के बहार की तरफ जाने लगे.

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इक़बाल पहले hi मोटरसाइकिल तक पहुंच गया था और वह उसकी सीट को साफ़ कर रहा था. ये मोटरसाइकिल काफी पुराणी सी थी, और उसकी सीट काफी घिसी हुई सी हो राखी थी.

इक़बाल कोशिश कर रहा था की वह सुप्रिया की और न hi देखा, कहीं वह उसे देखते हुए न पकड़ ले. वह बाइक पर बैठते हुए बोलै - चल हिना बैठ जा मेरे पीछे... और चची तेरे पीछे बैठ जाएँगी...

हिना - नहीं नहीं.... मैं बीच में नहीं बैठूंगी... मेरे कपडे ख़राब हो जायेंगे...

रुबीना - लाहौल.... अब ये क्या नया ड्रामा है... बैठ जा न...

हिना - ारी नहीं... वैसे भी चची को आदत भी तोह नहीं है ऐसे तीन लोगो के साथ बैठने की, उनको पीछे बिठाया और वह गिर गयी तोह? आप लोगो तोह मुझे hi कोसोगे न.... उनको बीच में बिठाते है ताकि वह मेहफ़ूज़ रहे...

रुबीना - बात तोह तेरी ठीक है...

सुप्रिया - नहीं ये क्या ठीक है... मैं बैठ जयुंगी पीछे... नहीं गिरूँगी... पक्का...

रुबीना ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा - देख लो अब तुम लोग... कहीं देर न हो जाये...

इक़बाल आखिर बोल पड़ा और उसकी आवाज़ बेहद कड़क थी - सुप्रिया... तुम बैठ जायो न बीच में...

सुप्रिया इक़बाल के मुँह से अपना नाम इस तरह पहली बार सुनकर थोड़ा हैरान सी हो गयी. पर अब सबके सामने तोह वह उसे मैडमजी नहीं बुलाता न. पता नहीं क्यों उसे फिर से अपने सपने की याद आने लगी और कैसे वह उसमे उसे सुप्रिया कह कर बुला रहा था.

रुबीना भी इक़बाल की बात सुन कर मुस्कुरा पड़ी - लो जी... अब तोह तुम्हारे शौहर ने भी बोल दिया है... काम से काम उनकी बात तोह मत टालो...

भाभी के मजाक से सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए और वह घर के बहार खड़े हो कर और तमाशा नहीं करना चाहती थी. उसने अपने हाथ हलके से इक़बाल के कंधे पर रखे और उसके पीछे बाइक के दोनों और पेअर करके बैठ गयी. उसके और इक़बाल के बीच बस थोड़ा सा hi गैप था. पर उसके बाद तुरंत hi हिना सुप्रिया के पीछे आ बैठी और उसने सुप्रिया को थोड़ा आगे धकेला.

हिना - चची... आगे हो न...

हिना ने जैसे hi सुप्रिया को आगे धकेला उसके मम्मी इक़बाल की पीठ पर जाकर टकराये और उसका पूरा जिस्म इक़बाल के जिस्म से चिपक गया. उसके मुँह से हलकी सी आह्हः भी निकल गयी.

रुबीना सब बारीकी से देख रही थी, और उसे सारा माज़रा देख कर हसी सी आ गयी - लगता है ये सफर तोह बड़ा मजेदार होने वाला है...

सुप्रिया ने मुस्कुराते हुए पर गुस्से में रुबीना को घूरा. फिर उसने पीछे देखते हुए हिना से पुछा - सब ले लिया न?

हिना - जी चची... चलो भी अब....

इक़बाल ने बाइक शुरू कर दी, और गाँव की उबड़ खाबड़ सड़क पर सुप्रिया का अंग अंग हिलते हुए इक़बाल की पीठ से टकराने लगे, जैसे आज सुप्रिया खुद hi अपने जिस्म को उससे दबवा रही हो. सुप्रिया सोचने लगी, उफ्फ्फ्फ़ ये एक घंटे का सफर ऐसे कैसे कटेगा.
 
अपडेट 89

सुप्रिया हिना और इक़बाल के बीच में पिचि हुई बैठी थी. पीछे से हिना ने उसकी कमर पर हाथ रखा हुआ था और आगे से उसकी छाती इक़बाल की पीठ को छू रही थी. अभी तोह वह गाँव से बहार भी नहीं निकले थे और रास्ते में इतने झटके लग चुके थे की सुप्रिया की चूचियां इक़बाल से टकराते टकराते दर्द करने लगी थी. शायद उसका मानसिक समय दूर नहीं था, उस समय पर उसके बूब्स कुछ ज्यादा hi सेंसिटिव हो जाते थे.

इक़बाल अपनी पुराणी मोटरसाइकिल के शीशे से चोरी छुपे सुप्रिया को निहार रहा था. इतनी सुन्दर जो लग रही थी आज उसकी मैडमजी. लखनऊ में एक दो बार पहले भी वह उसके साथ बाइक पर बैठी थी, पर उस समय वह इतने नज़दीक नहीं थे. न hi फासले में और न hi रिश्ते में. पर अब तोह वह दोनों एक दुसरे के बेहद नज़दीक आ चुके थे.

काश इस वक़्त हिना उसके साथ न होती तोह वह इतने फर्राटे से इस बाइक को कहीं अकेले में दौड़ा लेता. नहीं नहीं, अकेले में क्यों, वह क्यों ऐसा सोच रहा था. जब भी सुप्रिया का जिस्म उसके जिस्म से छूटा, तोह पता नहीं उसे क्या hi हो जाता था. उनके खुले सिल्की बाल बाइक की गति से हवा में लहरा रहे थे और उनका प्यारे सा चेहरा आज तोह कुछ अलग hi चमक रहा था. उनके बारे में सोचते hi उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा था.

दूसरी तरफ सुप्रिया इतने दिनों बाद घर से बहार निकली थी, बल्कि इक़बाल से उसकी शादी के बाद पहली बार hi वह बहार निकली थी. इक़बाल से शादी के बाद पहली बार… अभी अभी में कितनी आसानी से उसने ये सोच लिया जैसे इसमें कुछ अटपटा hi न हो. इक़बाल और उसकी शादी... जो अब तक बस नाम की hi थी. वह उसी मस्जिद के सामने से हो कर निकले जहाँ उसे उस गधे का लुंड पकड़ना पड़ा था… की की... वह सोचते hi सुप्रिया थरथरा उठी.

गाँव की गलियों से निकलते हुए हर मोड़ पर लोग इक़बाल और उन दोनों को घूर रहे थे. कुछ तोह दुआ सलाम भी कर रहे थे, और इक़बाल वापस उन्हें सलाम कर देता.

जैसे hi बाइक गाँव के बाजार से होकर निकली, सुप्रिया ने देखा की जिस आदमी की दूकान से रुबीना ने उसे ब्रा पंतय दिलाई थी वह आदमी अपनी दूकान का शटर खोल रहा था. क्या नाम था उसका… जुनैद… हाँ शायद जुनैद hi तोह था. वह सड़क पर सामने hi खड़ा था और इक़बाल ने बाइक की स्पीड धीरे कर दी.

जुनैद - सलाम इक़बाल चाचू… कहाँ चल दी सवारी सुबह सुबह…

इक़बाल - वालेकुम… बस किसी काम से जा रहा था…

जुनैद ने मुस्कुराते हुए हिना की तरफ देखा - ाचा... इस पगली का एडमिशन करने…

हिना छिड़ते हुए बोली - तुम्हे कैसे पता… नाज़ ने बताया?

इक़बाल ने हिना को टोकते हुए कहा - वह तुमसे बड़ा है न हिना… आप करके बोलो उसे…

हिना ने अपनी नाक सिकोड़ी - इतना भी बड़ा नहीं है…

जुनैद हस्ते हुए - ारी कोई नहीं… बोल ले जो बोलना है… हाँ तेरी दोस्त के पेट में कोई बात कहाँ पचती है…

हिना ने सर झटक कर बोलै - ाचा काम करने जा रहे है, तभी तुम काळा बिलोते की तरह रास्ता काटने आ गए...

जुनैद ने उसकी बात को हसी में ताल दिया, और फिर सुप्रिया की तरफ देख कर मुस्कुराया - आदाब चची जान… कैसे है आप... पहचाना... मैं आपके भतीजे जैसे hi हूँ...

सुप्रिया ने हलके से आदाब का इशारा किया - मैं ठीक हूँ... आप कैसे है...

जुनैद - बढ़िया... आपकी शादी में देखा था आपको... और अब देख रहा हूँ… आप घर से बहार hi नहीं निकलती शायद...

सुप्रिया - हाँ वह.... बस घर में बोहोत काम होते है...

जुनैद - हाँ वह तोह है... आपको देख कर कोई कह नहीं सकता की शादी का रंग आप पर छडा न हो… बेफिज़ूल hi गाँव में अफ़्वहें उड़ती रहती है...

सुप्रिया को उसकी बात समझ नहीं आयी, पता नहीं वह कौन सी अफवाहों की बात कर रहा था. उसने इक़बाल की और देखा, जिसके चेहरे पर जुनैद की बातों से बढ़ती चिद्द दिख रही थी.

जुनैद को भी वह दिख गया था - अगर मेरी बात बुरी लगी हो तोह अपना भतीजा मान कर गुस्ताखी माफ़ करना...

इक़बाल - चल जुनैद… हमे अभी चलना चाहिए… देरी हो जाएगी...

जुनैद ने उन्हें फिर से मुस्कुराते हुए सलाम किया और इक़बाल अपनी बाइक वहां से चलते हुए आगे निकल गया. हिना अपना मुँह सुप्रिया के कान के पास लेट हुए बोली - चची… ये जुनैद मुझे बिलकुल भी ाचा नहीं लगता… पता नहीं क्या क्या बोलता रहता है...

तेज़ बाइक पर सुप्रिया को हिना की आवाज़ साफ़ तोह सुनाई नहीं दे रही थी, पर वह समझ गयी थी वह जुनैद के बारे में कुछ बोल रही थी.

मोटरसाइकिल चलते चलते गाँव से थोड़ा बहार की और आ गयी थी. अक्टूबर का महीना चल रहा था तोह हवा में थोड़ा सी ठंडक होने लगी थी. सुप्रिया के हाथ के बाल ठण्ड से कांपते हुए खड़े हो रहे थे. हिना ने फिर से उसे पीछे से थोड़ा सा आगे धकेला, वह सुप्रिया से बिलकुल चिपकी पड़ी थी, और सुप्रिया आगे इक़बाल से. सुप्रिया की जाँघे थोड़ी सी और छोड़ी होते हुए इक़बाल की पंत से चिपक गयी. न जाने क्यों इस तरह ठण्ड में किसी से चिपके रहने में एक अजीब सी रहत मिल रही थी.

कुछ देर बाद, ठण्ड में भी सुप्रिया को पसीने आने शुरू हो गए थे. अभी तोह शायद 40-45 मिनट का और रास्ता बचा था. उसने घर पर बिना सोचे समझे बोल तोह दिया था की इक़बाल हिना को रोज़ वहां छोड़ देंगे और ले भी आएंगे, पर अब उसे समझ आ रहा था की इक़बाल को कितनी दूर हिना को रोज़ लाना लेजाना पड़ेगा. पता नहीं इक़बाल ये सब रोज़ कैसे करेंगे, और अभी तोह ठण्ड और बढ़ेगी hi.

अब रोड थोड़ी सी बेहतर होने लगी थी, पर सुप्रिया फिर भी इक़बाल से चिपकी हुई थी. उसके हाथ इक़बाल के कंधो को कास के पकडे हुए थे, और अब तोह जाने अनजाने उसकी गर्दन पर लिपट hi गए थे. सुप्रिया ने अपना सर भी इक़बाल की पीठ पर टिका दिया था. इक़बाल को भी अपनी मैडमजी के इस तरह बैठने से बड़ा मज़ा आ रहा था. एक अलग hi गर्माहट और सुकून सा मिल रहा था पीछे से, जैसे उसकी पूरी दुनिया उसके साथ हो.

रास्ते भर में ऐसा कुछ ख़ास देखने के लिए नहीं था, बस वह लोग शायद धीरे धीरे अमरोहा के नज़दीक पहुंच रहे थे. कुछ टाइम बाद, सुप्रिया ने अपनी आँखें हलकी सी बंद कर्ली, और उसे एक छोटी सी झपकी आ गयी. वहां पहुंच कर जब हिना ने उसे हलके से हिलाया तोह उसकी आँख खुली. सुप्रिया ने अपना सर इक़बाल की पीठ से हटाया जो अभी भी आराम से बाइक रोक कर खड़ा था.

सुप्रिया हड़बड़ाते हुए बोली - क्या हुआ… हम पहुंच गए क्या?

हिना हस्ते हुए - चची लगता है आपको चाचू की पीठ पर सर रख कर बड़ी अछि नींद आयी है… रात को भी ऐसे hi सोती हो क्या?

सुप्रिया ने उसके हाथ पर हलके से मारा - चल बदमाश लड़की… कुछ भी बोलती है… तेरा एडमिशन करने आयी हु न… ज्यादा बोली तोह ऐसे hi वापस चली जयुंगी.

हिना ने जल्दी से अपने कान पकड़ लिए - ारी बाबा मजाक था न… सॉरी सॉरी….

सुप्रिया - हम्म्म्म … ये हुई न बात…

वह दोनों बाइक से उतरे और इक़बाल ने बाइक तो कॉलेज के बहार साइड में लगा दिया. सुप्रिया इधर उधर देखने लगी, बहुत बड़ा कॉलेज तोह नहीं था, पर किसी बड़े पुराने कॉलेज जैसा लग रहा था. उसे ये जगह देख कर अपने झाँसी के कॉलेज की याद आ गयी.

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बहार एक बड़ा सा लोहे का गेट था जिसके आस पास काफी साड़ी लडकियां कड़ी थी और आस पास काफी चहल पहल सी थी. लड़कियों का कॉलेज होने की वजह से काफी लड़के भी आस पास मंडरा से रहे थे.

इक़बाल ने भी बाइक लगा कर इधर उधर का मुयाना किया. बहार लड़को को लडकियां ताड़ते देख उसे ाचा तोह नहीं लगा था पर फिलहाल वह सुप्रिया और हिना के आगे कुछ बोलना नहीं चाहता था.

सुप्रिया - चलिए इक़बाल जी… अंदर चलते है…

इक़बाल जी बोलते hi फिर से सुप्रिया के मैं में एक अजीब सी बिजली सी दौड़ी. उसे अपने मैं के ऊपर संयम की डोरी बांधे रखना सीखना पड़ेगा शायद.

इक़बाल - मैडम… मेरा मतलब सुप्रिया… तुम लोग जायो न अंदर… मैं क्या करूँगा अंदर आकर…

हिना के सामने शायद उसने बात संभल ली थी, पता नहीं हिना ने उसे मैडम बोलते सुना या नहीं. और सुना तोह पता नहीं वह क्या सोच रही होगी.

सुप्रिया - आप भी एडमिशन के काम में मदद करेंगे… और क्या?

इक़बाल - अब मैं आप जितना पड़ा लिखा तोह हूँ नहीं तोह क्या hi मदद करूँगा अंदर जाकर… वैसे भी लड़कियों का कॉलेज है, मुझे थोड़ा अजीब भी लगेगा अंदर जाना…

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, जो आदमी किसी से भी लड़ने से नहीं डरता था, वह लड़कियों के कॉलेज में जाने के नाम से बुरी तरह घबराया हुआ था.

इक़बाल - हम सबको आप पर भरोसा है… आप अचे से बात कर लोगे… आप जायो इसे लेकर.. इतने मैं यहाँ बहार का हाल चाल पता करता हूँ…

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया और हिना को साथ लेकर अंदर की और चल दी. उसके मैं में भी थोड़ी घबराहट थी पर वह हिना के सामने कमज़ोर नहीं पड़ना चाहती थी.

हिना ने रास्ते में कहा - चची... एक बात बोलू... मुझे बड़ा ाचा लगता है की चाचू आपको इतनी प्यार से आप आप करके बोलते है...

सुप्रिया ने हलके से कहा - ाचा...

हिना - हाँ... मैंने गाँव में किसी के शौहर को ऐसे बोलते नहीं सुना... काश मेरा शौहर भी मुझे ऐसे hi प्यार और इज़्ज़त से आप करके बुलाये...

सुप्रिया ने उसके सर पर हल्का सा हाथ मारा - पहले जो यहाँ करने आयी है वह तोह कर ले... या अभी घर चल कर पहले तेरे लिए वैसे शौहर ढूंढे...

हिना मुस्कुराती हुई चुप हो गयी.

अंदर आकर उन्होंने कुछ लड़कियों से एडमिशन ऑफिस का रास्ता पुछा. वैसे तोह बहार से hi एक खिड़की थी पर वह फिलहाल बंद थी. वह दोनों कॉलेज के अंदर के रास्ते से ऑफिस में पहुंचे. अंदर ज्यादा लोग नहीं थे, 2-3 महिलाएं और एक नौजवान सा आदमी.

सुप्रिया उन औरतो में से एक के काउंटर के पास पहुंची और अपना गाला साफ़ करते हुए उसका ध्यान अपनी और खींचने की कोशिश करने लगी - ुहंममम… मैडम…

पर वह औरत सामने कड़ी सुप्रिया पर कोई ध्यान नहीं दे रही थी.

सुप्रिया ने फिर से उसे आवाज़ दी, इस बार थोड़ा और तेज़ - मैडम सुनिए ज़रा…

औरत - बोलो… क्या काम है… तुम दोनों को अभी क्लास में नहीं होना चाहिए…

सुप्रिया को ाचा भी लगा की उस औरत को लग रहा था की वह भी एक स्टूडेंट hi है पर साथ hi अजीब सा भी - नहीं मैडम वह… एडमिशन के बारे में बात करनी है…

औरत - प्रणव से जा कर बात करो…

सुप्रिया - प्रणव कौन?

औरत ने तिरछी आखों से सुप्रिया की और देखा - इस कमरे में हम में से प्रणव कौन हो सकता है?

सुप्रिया ने कमरे के एंट्रेंस के पास बैठी उस नौजवान आदमी की तरफ देखा. शायद वो hi प्रणव था. पर ये औरत साफ़ साफ़ भी तोह बोल सकती थी.

सुप्रिया वापस उस काउंटर की तरफ चल पड़ी और हिना उसके ठीक पीछे पीछे. सुप्रिया ने वहां पहुंच कर कुछ बोलना hi चाहा था की वह आदमी बोल पड़ा.

प्रणव - एडमिशन का समय निकल चूका है… अब नहीं हो सकता एडमिशन…

सुप्रिया ने खीजते हुए कहा - पर हमने तोह अभी कुछ बोलै भी नहीं आपसे…

प्रणव - आप वही है न जिसने 2 दिन पहले फ़ोन किया था और ढेर सारे सवाल पूछ रही थी… अभी आपको वहां सरला ma’am से भी एडमिशन के बारे में पूछते सुना.

सुप्रिया - हाँ पर आपने तोह कहा था न की आकर बात कर लो…

प्रणव - मैंने ऐसा नहीं कहा था, मैंने ये कहा था की फ़ोन पर एडमिशन नहीं होता… और एडमिशन का टाइम निकल चूका है…

इस आदमी की बात सुनकर सुप्रिया की खीज बढ़ती जा रही थी - पर आपने मन भी तोह नहीं किया था फ़ोन पर…

प्रणव - आपने सही से सुनी हो मेरी बात तब तोह याद होगी न आपको…

हिना ने हलके से सुप्रिया का हाथ खींचा. सुप्रिया ने उसकी शकल की और देखा तोह काफी मायूस सी लग रही थी, जैसे अभी रोने लगेगी. उसकी शकल देख सुप्रिया में जैसे लड़ने की हिम्मत सी आ गयी.

सुप्रिया - आप इसकी 12तह की मार्कशीट तोह देखो… बोहोत hi होनहार लड़की है…

प्रणव - वह सब ठीक है पर कॉलेज सेशन शुरू हुए एक महीना होने को आया है… अब ऐसे बीच में कैसे एडमिशन कर दे…

सुप्रिया को लगने लगा था की ये आदमी उनकी मदद नहीं करने वाला था - मुझे आपके कॉलेज के प्रिंसिपल से मिलना है… उनका ऑफिस कहाँ है..

प्रणव - आप उनसे नहीं मिल सकती… आपको उसके लिए अपॉइंटमेंट चाहिए होगी…

सुप्रिया गुस्से में कापने लगी थी - हम लोग इतनी दूर से आये है.. उनसे मिल कर hi जायेंगे…

सुप्रिया को एकदम याद आया की इस ऑफिस के रास्ते में hi शायद उनका ऑफिस भी पड़ा था. वह हिना को खींचते हुए बहार की तरफ जल्दी से ले चली.

हिना की बिखरी हुई सी आवाज़ बहार आयी - छाछठीई… अब क्या करेंगे… ये तोह मन कर रहे है…

सुप्रिया ने गुस्से में कहा - अभी रुक न… सब ठीक हो जायेगा..

उसने बोल तोह दिया था पर उसे नहीं पता था की सब ठीक होगा की नहीं. वह जल्दी से प्रिंसिपल के ऑफिस की तरफ बड़ी और उसने देखा की प्रणव भी उसके जल्दी से उसके पीछे पीछे आ रहा था.

सुप्रिया ने वहां पहुंचते hi दरवाज़े पर हलके से नॉक किया और दरवाज़ा खोल दिया. उनकी किस्मत अछि थी की प्रिंसिपल सर वहीँ अंदर hi बैठे थे.

प्रणव जल्दी से पीछे से आया और ज़ोर से बोलै - आप ऐसे अंदर नहीं जा सकती… मैंने बोलै न आपको…

सुप्रिया ने उसे गुस्से में घूरा - मुझे बस पांच मिनट चाहिए… इतना समय तोह वह निकाल hi सकते हैं न…

उन दोनों के बीच बहस शुरू हो गयी थी और उनके आस पास लोग िक्कहट्टा होने शुरू हो गए थे. ये देख कर प्रिंसिपल भी खड़ा हो कर बहार की और आ गया.

प्रिंसिपल - प्रणव ये सब क्या चल रहा है…

प्रणव - सर… मैं इन्हे कबसे समझा रहा हूँ की वह आपके ऑफिस में ऐसे नहीं जा सकती और ये मुझसे बेकार hi बहस कर रही है…

सुप्रिया ने प्रिंसिपल सर की और देखते हुए कहा - सर मुझे बस आपके 5 मिनट चाहिए…

प्रिंसिपल का चेहरा काफी सीरियस था - किस काम के लिए…

प्रणव - सर कोई काम वाम नहीं है… लेट एडमिशन केस है… और सीट भी तोह फुल है… मैंने मन कर दिया है...

प्रिंसिपल ने सुप्रिया की तरफ देखते हुए नरमी से कहा - देखिये... कॉलेज का सेशन शुरू हो चूका है... आप अगले साल एडमिशन का फॉर्म भर सकती है…

पर सुप्रिया हार माने के मूड में नहीं थी - सर प्लीज आप एक बार इसकी मार्कशीट तोह देखिये… बोहोत hi मेधावी लड़की है… बड़ी मुश्किल से इसके अब्बू को मनाया है, अगर इस साल इसका एडमिशन नहीं हुआ तोह फिर शायद ये कभी कॉलेज न जा पाए…

प्रिंसिपल ने दोनों की और देखा. हिना की शकल तोह रोने वाली हो गयी थी, और गुस्से और झुंझुलात में सुप्रिया के गाल टमाटर की तरह लाल हो चुके थे. उसने सिचुएशन को समझते हुए कहा - ठीक है आप आइये मेरे ऑफिस में…

प्रणव पीछे से बोलै - पर सर…

प्रिंसिपल - प्रणव कोई नहीं… मुझे हैंडल करने दो…

सुप्रिया ने अंदर जाते हुए पीछे मुद कर प्रणव को घूर कर देखा. इस आदमी की वजह से इतना तमाशा हो गया था आज.

अंदर पहुंच कर प्रिंसिपल ने सुप्रिया और हिना को बैठने के लिए कहा. सुप्रिया ने बैठते hi प्रिंसिपल को हिना की मार्कशीट दी और प्रिंसिपल उसे देखते हुए हिना से कुछ सवाल करने लगा. सुप्रिया ने हलके से हिना की पीठ पर हाथ रख कर उसे हौसला दिया और फिर धीरे धीरे हिना की आवाज़ बहार निकलने लगी.

कुछ देर सवाल जवाब के बाद प्रिंसिपल के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी थी - वैरी गुड… आप तोह बोहोत hi होशियार लड़की है... शायद स्कालरशिप लायक भी… आप इतना क्यों घबरा रही थी…

हिना - बस वह बहार जो कुछ हुआ उससे…

प्रिंसिपल ने सुप्रिया की और देखते हुए कहा - पर आपकी बेहेन…. या दोस्त… वह फाइट कर रही थी न आपके लिए…

हिना - जी…

हिना शायद उन्हें टोकना नहीं चाहती थी की सुप्रिया दरअसल उसकी चची थी.

प्रिंसिपल - वैसे तोह मैं बीच सेशन में लेट एडमिशन नहीं लेता हु, और क्लास भी पूरी भरी हुई है… पर आपकी पारिवारिक स्तिथति को समझते हुए मैं आपका एडमिशन मंजूर कर देता हु…

सुप्रिया और हिना दोनों hi एकदम से बोहोत खुश हो गयी - थैंक यू सर!! बोहोत बोहोत शुक्रिया...

प्रिंसिपल - No प्रॉब्लम... मुझे यकीं है की आप हमारे कॉलेज की शान बढ़ाएंगी...

हिना के चेहरे की मुस्कराहट बोहोत ज्यादा बाद गयी थी.

प्रिंसिपल ने फिर सुप्रिया की और देखा - और आप मिस… आपको एडमिशन नहीं चाहिए…

सुप्रिया मुस्कुराते हुए बोली - नहीं सर… मैं शायद लगती छोटी हु पर मैंने तोह कबका कॉलेज पसौत कर लिया था…

प्रिंसिपल हस्ते हुए - वह तोह मैंने आपके बोलने के अंदाज़ से hi समझ गया था. आप काफी पड़ी लिखी लगती है… काफी कॉन्फिडेंस भी है आप में...

अपनी तारीफ से सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो रहे थे, उसे अपनी पड़े के बारे में जैसे सब याद आने लगा - थैंक यू सर... हाँ मैंने B.Com किया हुआ है... और का भी आधा पास किया हुआ है...

प्रिंसिपल - वैरी गुड... आपने कभी पड़ने के बारे में सोचा है?

सुप्रिया सोचते हुए बोली - नहीं सर.... सोचा तोह नहीं... पर क्यों?

प्रिंसिपल - आप जैसी कॉंफिडेंट एडुकेटेड यंग लेडी यहाँ के स्टूडेंट्स के लिए काफी अछि रोले मॉडल बन सकती हैं… वैसे भी हमे यहाँ अमरोहा में अचे शिक्षकों की हमेशा कमी hi रहती है... आप अगर यहाँ असिस्टेंट टीचर बनना चाहे तोह मैं इस बारे में सोच सकता हु…

सुप्रिया उनकी बात सुनकर एक पल के लिए एक्ससिटेड सी हो गयी पर उसे शायद अपनी फिलहाल की जिंदगी की हकीकत पता थी - शायद अभी तोह नहीं... पर मैं सोचूंगी इस बारे में… आपका बोहोत बोहोत धन्यवाद की आपने मुझे इस लायक समझा...

प्रिंसिपल मुस्कुराता हुआ बोली- मैं भी एक टीचर हु… एक अचे स्टूडेंट को बोहोत जल्दी पहचान लेता हु… एनीवे आप सोच कर मुझे कभी भी बता सकती है… आप ये नोट प्रणव को दे दे… और एडमिशन का बाकी सब काम वह संभल लेगा…

प्रणव का नाम सुनकर सुप्रिया हिचकिचाते हुए बोली - सर… प्रणव… कोई और नहीं कर सकता क्या ये काम?

प्रिंसिपल - प्रणव से कोई प्रॉब्लम? ाचा बहार जो हुआ... वह तोह बस अपना काम hi कर रहा था न… थोड़ा अजीब है, पर वैसे बोहोत hi ाचा लड़का है. उसकी आदत है रूल्स को एकदम अचे से फॉलो करने की… अनुशाशन भी तोह जरूरी होता है न…

सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया - जी…

हिना और सुप्रिया प्रिंसिपल सर को फिर से थैंक यू बोल कर कमरे से बहार निकल गए. अभी तोह उन्हें एक बार फिर उस प्रणव का सामना करना था. सुप्रिया अपना मैं मारते हुए फिर से उसके ऑफिस की तरफ गयी.

वहां पहुंचने तक सुप्रिया के चेहरे की मुस्कान गायब हो गयी थी. प्रणव ने भी उन्हें आते देख अपना मुँह दूसरी और कर लिया था.

सुप्रिया ने पास आकर रूखी आवाज़ में कहा - सुनिए… ये प्रिंसिपल सर ने आपके लिए दिया है…

प्रणव ने उनके हाथ से कागज़ लिया और उसे पड़ने लगा. जो कुछ लिखा था शायद उसे ाचा तोह नहीं लगा था पर वह भी शायद विवश था अब. उसने एक फॉर्म निकाल कर सुप्रिया के सामने किया - ये फॉर्म भर दीजिये... और हज़ार रूपए एडमिशन फी भर दीजिये...

फी सुनकर हिना एक डैम से बोल पड़ी - हज़ार रूपए!!!

सुप्रिया ने उसे चुप कराया - शहहह... तू क्यों परेशान होती है... मैं देख लुंगी न...

सुप्रिया ने फॉर्म भरना शुरू किया. उसने कल hi कॉलेज की वेबसाइट पर साड़ी फी वैगेरा देख ली थी और इक़बाल से कुछ पैसे अपने पास रख लिए थे. पता नहीं इक़बाल पैसो का इंतज़ाम कहाँ से करता था, पर अब तक उसने सुप्रिया को एक बार भी किसी चीज़ के लिए न नहीं किया था. उन दोनों ने रुबीना और अब्बास को कॉलेज के पैसो के बारे में बताना सही नहीं समझा, कहीं वह पैसो का नाम सुनकर उसकी पड़े न रोक दे.

सुप्रिया ने जल्दी से फॉर्म भर करके प्रणव के और सरकाया और साथ hi एडमिशन फी के पैसे भी. इस बीच हिना के फ़ोन पर इक़बाल का फ़ोन कॉल आने लगा तोह वह ऑफिस से बहार हो कर इक़बाल से बात करने लग गयी. सुप्रिया बस छुप चाप काउंटर के सामने गुस्से में हाथ पर हाथ रख कर कड़ी थी.

प्रणव भी चुप चाप फॉर्म चेक कर रहा था. उसने थोड़ी देर बाद कहा - डाक्यूमेंट्स दीजिये...

सुप्रिया ने डाक्यूमेंट्स उसके आगे बड़ा दिए.

प्रणव ने उसकी और देखा - फोटोकॉपी?

सुप्रिया - वहां गाँव में कोई फोटोकॉपी मशीन नहीं है... वह आपके पीछे मशीन है न... आप निकल लो उसमे फोटोकॉपी...

प्रणव बोलने को hi हुआ था की ये रूल्स के खिलाफ है पर उसे ऊपर सुप्रिया का तमतमाया हुआ सा चेहरा दिखाई दिया. उसे ये जॉब करते हुए अभी एक साल hi हुआ था, पर वह अपना काम पूरी निष्ठां से करता था. पर अब अगर वह इस औरत को बहार जाकर फोटोकॉपी करवाने के लिए बोलोगे तोह कहीं वह फिर से तमाशा न बना दे.

उसने गहरी सांस ली और फोटोकॉपी मशीन के पास जाकर डाक्यूमेंट्स की कॉपी बनाने लगा. उसे ये करते देख सुप्रिया के चेहरे की शिकन थोड़ी काम हुई थी, उसे लगा नहीं था की ये इतनी आसानी से इस काम के लिए मान जायेगा.

उसे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए जहाँ कॉलेज के ऑफिस के लोग स्टूडेंट्स को इस काम के लिए बहार दौड़ते थे. तब उसके दोस्त उसकी मोहकता को आगे करके उन लोगो से काम निकलवाते थे. तब कितनी बुद्धू थी न वह, शायद बिलकुल हिना की तरह.

फोटोकॉपी करने के बाद प्रणव वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया. सुप्रिया अभी भी छुप कड़ी थी, और बारीकी से प्रणव को काम करता देख रही थी.

प्रणव ने छुपी को तोड़ते हुए अचानक से कहा - आप सच में हिना की चची हो?

सुप्रिया उसका सवाल सुन कर छौंक गयी - क्या???

प्रणव ने ऑफिस के बहार फ़ोन पर बात कर रही हिना की तरफ इशारा किया - वह लड़की, हिना hi नाम भरा है न उसका आपने फॉर्म पर, आप उसकी चची हो? वह आपको चची बुला रही थी न...

सुप्रिया की तय्यारी छड्ड गयी - आपको क्या लेना देना उससे?

प्रणव नीचे देखते हुए धीरे से हस्ते हुए बड़बड़ाया - कुछ नहीं.... बस पहली बार बाल विवाह का केस देख रहा हूँ शायद... या आपकी त्वचा से आपकी उम्र का पता नहीं चलता...

उसकी बात सुनकर सुप्रिया के अंदर गुस्सा फिर से बाद गया, इसकी इतनी हिम्मत, पता नहीं ये ऐसे कैसे बोल सकता था. अभी जाकर प्रिंसिपल से इसकी कंप्लेंट करती हूँ.

पर तभी प्रणव ने फॉर्म का एक टुकड़ा स्टाम्प करके उसे वापस दिया - ये लीजिये हो गया हिना जी का एडमिशन... बीकॉम में.... ये किताबो की लिस्ट है जो कोर्स में है. यहाँ से थोड़ी दूर hi एक पुराणी किताबो की दुकान है, मैं उसका एड्रेस लिख देता हूँ... आप वहां से ले ले...

सुप्रिया भड़कते हुए बोली - आपको लगता है हम लोग नयी किताबे नहीं खरीद सकते?

प्रणव ने हैरान होते हुए ऊपर देखा - मैंने ऐसा कब कहा... पर अगर पुराणी किताबे सस्ती मिल जाएँगी तोह वह नहीं लेनी चाहिए... मैं तोह वही hi खरीदता... आप हर बात में लड़ना क्यों चाहती है...

सुप्रिया ने उसके हाथ से फॉर्म और किताबो की लिस्ट खींची और सर झटकते हुए ऑफिस से बहार निकल गयी. वह इस आदमी से और बहस नहीं कर सकती थी.

सुप्रिया ने हिना की और देखा, जैसे पूछ रही हो की और कितनी फ़ोन पर बात करेगी. हिना ने जल्दी से फ़ोन कॉल कट किया.

सुप्रिया - किस्से बात कर रही थी?

हिना - पहले चाचू से, फिर अम्मी से, और फिर नाज़ से...

सुप्रिया अपना सर हिलाते हुए चलती रही, क्या करे वह इस लड़की का. अब उसे रुबीना की झुंझुलाहट समझ आ रही थी. वह दोनों चलते चलते बहार की और आ गए. इक़बाल वहीँ मोटरसाइकिल के पास खड़ा था. उन दोनों को आता देख उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी.

हिना भी खुश होती हुई अपने चाचू के पास पहुंची - चाचू.... हो गया मेरा एडमिशन... मैंने आपको बताया न फ़ोन पर... चची ने कैसे उस आदमी को हड़का दिया था, और फिर प्रिंसिपल से बात करके एडमिशन करवा दिया.

इक़बाल मुस्कुराता हुआ बोलै - हाँ... तूने फ़ोन पर सब बता तोह दिया था... पर फिर बता दे...

हिना फिर से पूरी कहानी सुनाने लग गयी और सुप्रिया वहां कड़ी है रही थी. इक़बाल उसे हस्ते हुए उसकी और देख रहा था, और सुप्रिया ने अपना चेहरा उसे छुपाने के लिए दूसरी साइड कर दिया. क्या कमाल लग रही थी उसकी मैडमजी.

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कुछ देर बाद सुप्रिया ने हिना की बात बीच में रोकते हुए कहा - चलो अभी ये किताबे भी लेनी है... फिर घर भी चलना है... तुम्हारे चाचू को काम पर भी तोह जाना है...

पता नहीं क्यों वह इक़बाल का नाम भी ले पा रही थी हिना के सामने.

इक़बाल - जी... बताइये कहाँ चलना है किताबे लेने...

सुप्रिया ने प्रणव का दिया हुआ कागज़ खोला. किताबो की एक लम्बी लिस्ट थी, हर किताब काम से काम 300-400 रूपए की तोह पड़ेगी. बोहोत सारे पैसे खर्च हो जायेंगे. साइड में hi एक एड्रेस लिखा हुआ था, शायद उस सेकंड हैंड किताबो की दूकान का.

सुप्रिया ने कुछ पल सोचा और फिर वह एड्रेस इक़बाल के सामने कर दिया - यहाँ जाना है हमे...

इक़बाल - हाँ चलिए न... मैं रास्ता पूछ लेता हूँ किसे से...

सुप्रिया ने हिना की और देखा - इस बार मैं बीच में नहीं बैठने वाली...

हिना ने सुप्रिया को मज़ाक में हलकी सी टक्कर दी - क्यों? आते वक़्त तोह बड़े इत्मीनान से सोते हुए आयी थी आप... फिर से वही मज़ा ले लो न...

सुप्रिया ने हिना का कान पकड़ लिया - बड़ी जुबां खुल रही है आज तुम्हारी... मैं तोह सबसे आगे भी बैठ कर इस बाइक को चली सकती हु..

हिना - अह्ह्ह... हाँ तोह सही है न... फिर चाचू को आपके पीछे hi बिठायूंगी... क्या पता आपको और भी ाचा लगे...

सुप्रिया के गाल शर्म से बुरी तरह लाल हो गए थे. आज शायद ख़ुशी के मारे वह कुछ ज्यादा hi बोल रही थी. या फिर अपनी अम्मी से शायद बहुत कुछ सीख गयी थी ये लड़की.

इस बीच इक़बाल बाइक पर बैठ कर उसे शुरू कर चूका था. सुप्रिया जल्दी से उसके पीछे बैठी और हिना सुप्रिया के. हिना ने अपना एक हाथ सुप्रिया के हाथ पर रखा. इक़बाल रास्ता पूछते पूछते पास hi की उस दूकान तक पंहुचा. अभी शायद थोड़ी देर पहले hi दूकान खुली थी और कोई भी ग्राहक नहीं था.

वहां काफी किताबे तोह एक ढेर में hi बहार फुटपाथ पर राखी हुई थी. सुप्रिया और हिना आराम से बैठ कर किताबे छटने लगे. कुछ किताबे बहार मिल गयी और कुछ अंदर. आखिर में एक किताब छोड़ कर बाकी सब मिल hi गयी

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दुकानदार ने जब किताबो का टोटल किया तोह पोरे 1100 का टोटल था. इक़बाल अपनी जेब से पैसे निकाल गईं रहा था. हिना तोह अभी भी किताबे देखने में hi व्यस्त थी, पर सुप्रिया की नज़रे इक़बाल पर तिकी थी. वह किस तरह से एक एक नोट को गईं रहा था, शायद पूरे 1100 तोह नहीं बन रहे थे.

इक़बाल सुप्रिया से धीरे से बोलै - मैडमजी मेरे पास तोह अभी सिर्फ हज़ार रूपए hi है... कोई किताब छोड़ दे क्या... बाद में आकर ले जायेंगे...

अपनी पुराणी जिंदगी में सुप्रिया को इस तरह से पैसो की तंगी का अंदाजा भी नहीं था. बचपन से उसने तोह जिस चीज़ पर हाथ रखा था उसे उसके माँ बाप ने दिलाया था, और अतुल से शादी के बाद भी कुछ खरीदने से पहले सोचा नहीं.

सुप्रिया ने सोचा की शायद उसे यहाँ आपने मोहकता और मधुर आवाज़ का इस्तेमाल करना पड़े - आप मुझे पैसे दो, मैं बात करती हु...

सुप्रिया बिल लेकर दूकानदार की और गयी - अंकल... अंकल... सुनिए...

अंकल - जी बीटा... बोलिये...

सुप्रिया ने अपनी आवाज़ को एकदम नरम बनाया - अंकल... आप प्लीज ये 1100 की बुक्स आप 800 में फाइनल कर दीजिये न...

अंकल - नहीं बेटाजी... इतना मार्जिन नहीं होता... हम तोह वैसे भी सस्ते में hi बेच रहे है...

सुप्रिया ने अपनी बड़ी बड़ी आँखों से अंकल की और प्यार से देखा - प्लीज अंकल... थोड़ा तोह एडजस्ट कीजिये न... वैसे भी अभी तोह कॉलेज का सेशन भी शुरू हो चूका है तोह इतने बच्चे नहीं आते होंगे...

अंकल का दिल पसीज रहा था - ारी बेटी... चकककक... चलो आप इतना बोल रहे हो तोह ठीक है 1000 दे दो..

सुप्रिया अभी भी मोल भाव कर रही थी - 950 में दोने करते है न... अभी तोह फर्स्ट ईयर की बुक्स है... बाकी सालो की भी आपकी hi दूकान से लेनी है न...

अंकल ने मुँह बनाते हुए है - आप भी न बोहोत ज़िद्दी हो... चलिए ठीक है बोनी का टाइम है... आप 950 दे दो...

सुप्रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी - थैंक यू अंकल जी!!!

अंकल ने किताबे एक पॉलीथिन की बैग में डाली और वह उसे लेकर बहार आ गयी. उसने वापस 50 रूपए का नोट इक़बाल के हाथ में थमाया - ये लीजिये...

इक़बाल ये देख कर हैरान सा हो गया - ारी ये कैसे कर दिया मैडमजी आपने...

सुप्रिया मुस्कुराते हुए बोली - बस... लड़कियों का कमल होता है... आप नहीं समझेंगे...

इक़बाल - ये बात तोह सच है आपकी... मैं नहीं समझूंगा...

सुप्रिया एक डैम छुप हो गयी और वह और इक़बाल एक दुसरे के पास hi खड़े थे. उन्हें शायद समझ नहीं आ रहा था वह एक दुसरे से क्या बोले. तभी हिना भी दूकान से बहार आ गयी.

हिना - वह एक किताब नहीं मिली....

सुप्रिया - मिल जाएगी... इतना परेशान क्यों हो रही है...

हिना - हम्म्म... ारी वह देखो वहां... समोसे जलेबी.... और वह भी अभी अभी ताल के निकाले है... चाचू वह खाते है न...

इससे पहले इक़बाल कुछ बोलता, सुप्रिया बोल पड़ी - नहीं नहीं... बहार का खाना नहीं... घर चलकर खाएंगे...

हिना ने उदास होते हुए इक़बाल की और देखा - रोज़ रोज़ तोह नहीं आते न यहाँ... और फिर कल से तोह बस घर से कॉलेज और कॉलेज से घर hi होगा न... आप दोनों भी साथ है आज...

इक़बाल हस्ते हुए बोलै - चल... खिलता हूँ...

सुप्रिया ने बोलने की कोशिश करि - पर....

पर इक़बाल ने उसे छुप करा दिया - आप परेशान न हो... आइये न...

वह तीनो सामने की दूकान की चल दिए. इक़बाल ने जल्दी से 2 प्लेट समोसे और जलेबी का आर्डर दे दिया, और जल्द hi वह उन्हें मिल भी गया. हिना प्लेट उठा कर जल्दी से समोसा खाने लगी.

हिना - बोहोत गरम है... बिलकुल आपकी तरह चची...

सुप्रिया मुस्कुरायी, इसकी शरारत तोह ख़तम hi नहीं हो रही थी आज. इक़बाल ने दूसरी प्लेट सुप्रिया को पकड़ा तोह दी थी पर वह खा नहीं रही थी. इक़बाल ने उन दोनों के लिए तोह खाना ले लिया था पर अपने लिए नहीं.

इक़बाल ने हलके से कहा - खाइये न... रुकी हुई क्यों है...

सुप्रिया हिचकिचाते हुए बोली - आप भी खा लीजिये न... इसी प्लेट में...

इक़बाल ने हाथ से न का इशारा करते हुए कहा - नहीं नहीं... आप खाइये... मुझे भूक नहीं...

हिना - खा लीजिये न चाचू.... एक प्लेट में खाने से प्यार बढ़ता है...

सुप्रिया ने अपने उँगलियों से समोसे को दो हिस्से में तोडा और एक हिस्सा इक़बाल की और बड़ा दिया - लीजिये...

इक़बाल ने सुप्रिया की और देखते हुए समोसे को पकड़ लिया, और प्लेट में राखी चटनी से समोसे को लगते हुए खाने लगा. सुप्रिया भी उसी चटनी में अपना समोसा लगा रही थी. वैसे तोह कुछ भी नहीं था इसमें, पर कितना अजीब सा लग रहा था.

कुछ देर बाद तीनो ऐसे hi जलेबी भी खाने लगे. इक़बाल धीरे धीरे और भी सहज हो कर उनके साथ आराम से खा रहा था. न जाने क्यों सुप्रिया सोचने लगी की शायद कभी उसने इस तरह से अतुल के साथ बहार एक hi प्लेट में कभी नहीं खाया था. अतुल को इस तरह सड़क पर खड़े हो कर खाना भी ाचा नहीं लगता था. उसने तुरंत hi इन खयालो को अपने दिमाग से निकाला, पता नहीं वह क्या क्या सोचने लग जाती थी.

खाने के बाद, सुप्रिया प्लेट फैकने थोड़ा अंदर की और गयी, और तभी उसकी नज़र वहां दूकान के अंदर एक गुच्छे में तंग रही अखबार की कतराने पर पड़ी. शायद उनमे छोटा मोटा सामान परोसा जाता था. पर इस अखबार की कतरन पर उसकी फोटो क्यों नज़र आ रही थी?

सुप्रिया ने जल्दी से उस कागज़ के टुकड़े को गुच्छे से तोडा और अपने हाथ में दबा लिया. बहार आते हुए उसने जल्दी से कागज़ पर एक झलक मारी.

इस बेरंग अख़बार में किसी ने उसके गुमशुदा होने का अड़ डाला था. ये उसकी पासपोर्ट साइज फोटो थी, शायद जो उसने एक बार लखनऊ में खिचवाई थी. फोटो के नीचे लिखा था - संपर्क करे - अतुल शर्मा - और उसके नीचे लखनऊ, ग्वालियर और झाँसी तीनो घरो का पता था, साथ hi उसका फ़ोन नंबर भी था.

इक़बाल को पास आता देख, सुप्रिया ने फिर से कागज़ को अपनी मुट्ठी में दबा लिया. सुप्रिया का दिल तेज़ तेज़ धड़क रहा था. पता नहीं ये कितने पहले का अखबार था? क्या अतुल उसे सच में ढून्ढ रहा था???
 
अपडेट 90

पिछले एक डेड महीने से वह दिन अतुल के जेहन में घूमे जा रहा था. जो उसके लिए बस एक नार्मल सा दिन होना चाहिए था, जहाँ वह ऑफिस का काम करता, और अपने घर चला जाता, उस दिन उसकी जिंदगी पूरी उलट पुलट हो गयी थी.

वह बैठा हुआ काम hi कर रहा था की अचानक एक भारी सा हाथ आकर उसके कंधे पर लगा - अतुल शर्मा!!!

अतुल ने पीछे पलट कर देखा, चार पांच हट्टे काटते लोग ऑफिस में घुस आये थे और सिक्योरिटी गार्ड सेहमा हुआ सा उनके थोड़ा पीछे था.

अतुल ने उन्हें हैरानी से देखते हुए पुछा - यस, कहिये?

आदमी - इस वक़्त तुम्हारी बीवी कहाँ है?

अतुल को उनकी बातें बहुत hi अटपटी सी लग रही थी, वह उसकी बीवी के बारे में क्यों पूछ रहे थे. वह थे कौन? ऑफिस के बाकी लोग भी खड़े हो कर अतुल की तरफ आने लगे थे.

अतुल ने परेशान होते हुए इधर उधर देखा - सॉरी... आप कौन हो...

आदमी - तेरी बीवी के यार है हम...

अतुल ये सुनकर थोड़ा भड़क सा गया - ये क्या बकवास कर रहे हो... क्या गुंडा गर्दी है ये...

आदमी - गुंडा गुरदी तोह तूने अभी देखि नहीं है... तेरी बीवी कहाँ है ये पुछा है अभी तोह बस...

अतुल ने झुंझलाते हुए कहा - घर पर होगी और कहाँ...

आदमी ने सर हिलाते हुए कहा - वहां तोह नहीं है... चल अपनी बीवी को कॉल लगा और पूछ वह कहाँ है...

दिशा अपना डेस्क छोड़ कर अतुल के थोड़ा पास पहुंच गयी थी. पिछले 4-5 सालो से विक्रम के साथ काम करके वह इन्हे 2-3 बार तोह देख hi चुकी थी. पर उसे भी इन लोगो से काफी डर सा लगता था.

अतुल सुप्रिया को कॉल करने की कोशिश कर रहा था पर उसका फ़ोन बंद आ रहा था. उसने फिर से तरय किया, उसके मैं में एक घबराहट सी शुरू हो गयी थी. सुप्रिया ठीक तोह थी न?

अतुल ने परेशान होते हुए उस आदमी को देखा - उसका फ़ोन नहीं लग रहा है...

आदमी - ठीक है... चल तू फिर हमारे साथ...

उस आदमी ने अतुल का कालर पकड़ते हुए अपने साथ घसीटना शुरू किया. कुछ लोग अतुल की मदद के लिए आगे भी बड़े पर उन गुंडों ने उन्हें साइड कर दिया. दिशा और बाकी कुछ लोग उनके पीछे पीछे नीचे की और आ गए.

अतुल को तोह उस समय अंदाजा भी नहीं था की इस समय उसकी पूरी जिंदगी बदल रही थी.

दो लोग अतुल को पकडे हुए बिल्डिंग से बहार लेकर आये और एक गाडी की तरफ ले जाने लगे. अतुल बुरी तरह घबरा चूका था, उसे नहीं पता था ये लोग उसके साथ क्या करने वाले थे.

अचानक से कुछ शोर सा हुआ और उन लोगो ने कुछ दूर कड़ी एक गाडी की तरफ इशारा किया और कुछ लोगो ने उसकी तरफ भागना शुरू किया. पर अतुल को अभी भी दो लोगो ने पकड़ रखा था और वह उसे एक गाडी में डालते हुए अपने साथ ले चले.

एक आदमी अतुल के साथ गाडी की पिछली सीट पर था और दूसरा गाडी चला रहा था. इस समय अतुल की सोचने समझने की क्षमता ख़तम सी हो गयी थी. वह कुछ पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा था.

थोड़ी देर बाद गाडी एक जगह आकर रुकी और उन लोगो ने अतुल को नीचे उतरा. अतुल ने आस पास देखा. ये थोड़ी जानी पहचानी सी जगह लग रही थी. ये कोई फार्महाउस सा था जहाँ वह पहले आया था. हाँ, ये तोह वही फार्महाउस तहत जहाँ… जहाँ उस रात… उसकी बैंक की नौकरी चली गयी थी. ये तोह विक्रम सर का hi फार्महाउस था शायद.

वह लोग अतुल को धक्का देते हुए अंदर एक कमरे में ले आये.

अतुल ने हिम्मत करके पुछा - मुझे यहाँ क्यों लाये हो… मैंने कुछ नहीं किया है…

उस आदमी ने उसकी बात को अनसुना करते हुए उसे एक कागज़ पेन थमाया - इस पर वह सारे एड्रेस और नाम लिख जहाँ तेरी बीवी जा सकती है…

अतुल को समझ आने लगा था की वह लोग सुप्रिया को ढून्ढ रहे थे, पर वह उसे यहाँ क्यों लेकर आये थे. ये तोह विक्रम सर का hi फार्महाउस था. ऐसा क्या हो गया था?

अतुल - क्या हुआ है? तुम क्यों ढून्ढ रहे हो मेरी बीवी को… किसके कहने पर मुझे यहाँ लाये हो…

आदमी ने अतुल को कागज़ की तरफ इशारा किया - जल्दी से एड्रेस लिख… टाइम नहीं है ज्यादा… जल्दी से शुरू हो जा नहीं तोह हमें शुरू होना पड़ेगा…

वह दोनों लोग उसके आस पास hi मंडरा रहे थे. अब तक उन लोगो ने उसे मारा पीटा तोह नहीं था, पर अतुल ने उनकी शकल देख कर उन्हें और ज्यादा इंतज़ार करवाना ठीक नहीं समझा. उसने अपने ग्वालियर के घर का और सुप्रिया के घर का एड्रेस लिखना शुरू किया.

इस बीच उसे साथ वाले कमरे से एक आदमी और औरत की लड़ाई की आवाज़ आने लगी. वह दोनों एक दुसरे पर बुरी तरह चीख रहे थे. आदमी की आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी थी.

उसे सारे शब्द साफ़ तोह सुनाई नहीं दे रहे थे पर वह औरत काफी भड़की हुई थी और बार बार अंग्रेजी में गालियां दे रही थी. आदमी की आवाज़ कभी गायब हो जाती और कभी वह उस औरत पर चिल्लाने लगता.

अतुल ने एड्रेस लिख कर अपने साथ खड़े आदमी की और देखा.

आदमी - और कोई दोस्त यार तेरी बीवी का? सबके नाम पता लिख यहाँ…

अतुल - नहीं… और तोह कोई नहीं…

आदमी - सोच सोच… किसके साथ भाग सकती है तेरी बीवी?

अतुल भड़कते हुए बोलै - सुप्रिया क्यों भागेगी किसी के साथ…

आदमी हस्ते हुए बोलै - शायद तू खुश नहीं रख पाटा होगा न अपनी चिनार बीवी को.. इसलिए भाग गयी वह… चल अब हर वह नाम और फ़ोन नंबर लिख जिससे तेरी बीवी या तू बात करते हो…

अतुल को उसकी बातों पर बोहोत तेज़ गुस्सा आ रहा था पर वह इस समय इन लोगो के आगे बेबस था. उन लोगो ने उसे लगभग एक घंटा बिठाये रखा और उसे सुप्रिया के ऑफिस के जिन लोगो के नाम पता थे वह लिखता गया.

साथ वाले कमरे अभी भी चीखने चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी पर अब थोड़ी मंडी हो गयी थी. अतुल अपने दिमाग पर ज़ोर डालते डालते थक गया था. उन लोगो ने उसके फ़ोन के सारे कॉन्टेक्ट्स उससे कागज़ पर लिखवा लिए थे.

लगभग एक घंटे बाद एक आदमी कमरे में घुसा जिसे देख बाकी दोनों लोग भी तन का खड़े हो गए, जैसे वह उनका लीडर हो.

आदमी - असलम भाई… मिली क्या वह…

असलम - अभी तोह नहीं… पर मिल जाएगी… गाडी बस अड्डे के पास छोड़ी है तोह किसी बस में hi चढ़े होंगे. इसने दिया जो इससे माँगा था?

आदमी - हाँ… ये है सब…

असलम कागज़ को देखते हुए बोलै - हम्म्म… इसको जाने दो…

आदमी - जाने दे? अभी तोह इसकी कुटाई भी नहीं की है…

असलम ने उसे घूर कर देखा - मेमसाब ने बोलै है…

आदमी - ओह ाचा… चल भाई खड़ा हो… जा तू…

अतुल को यकीं नहीं हो रहा था वह उसे जाने दे रहे थे. वह धीरे धीरे खड़ा हुआ और बहार की और जाने दे.

पर पीछे से असलम ने उसे आवाज़ लगायी - सुन… मेरा नंबर ले ले… अगर तेरी बीवी का फ़ोन आये तोह सबसे पहले मुझे कॉल करके बताइयो… समझा…

अतुल ने मुड़ते हुए हाँ में सर हिलाया और असलम के आदमी ने उसके हाथ में असलम का नंबर थमा दिया. अतुल अब जल्दी से कमरे से बहार निकला. इससे पहले ये लोग अपना मैं बदल ले वह यहाँ से निकलना चाहता था.

वह बहार आया hi था की उसे हॉलवे में विक्रम सर खड़े दिखाई दिए. वह काफी ज्यादा सीरियस नज़र आ रहे थे. शायद वही तोह थे बराबर वाले कमरे में.

अतुल उनकी तरफ बड़ा - सर… ये सब क्या… ये लोग सुप्रिया को क्यों ढून्ढ रहे है… क्या हुआ है सर?

विक्रम - अतुल… ी don’t क्नोव हाउ तो से थिस बूत… सुप्रिया ने मेरी कंपनी से काफी बड़ा फ्रॉड किया है…

अतुल को अपने कानो पर यकीं नहीं हुआ - क्या???

विक्रम - ी didn’t वांट तो बिलीव आईटी ऐथेर… बूत एहि सच है… उसने मेरी कंपनी से लाखो रूपए की चोरी की है और अब वह अब्स्कोंडिंग है…

अतुल बुरी तरह शॉक में था - सर पर उसे तोह वह नौकरी छोड़े हुए कई हफ्ते हो चुके है…

विक्रम के माथे की त्योरियां चढ़ गयी थी - येह ी क्नोव… वे अरे स्टिल इंवेस्टिगेटिंग बूत उसने शायद ये कंपनी छोड़ने से पहले किया था… ी can’t शेयर आल थे डिटेल्स विथ यू राइट नाउ…

अतुल - सर…

विक्रम - लुक ी ऍम सॉरी यू हद तो जो थ्रू थिस टुडे… ये लोग सुप्रिया को ढून्ढ रहे थे… सुप्रिया के अगेंस्ट अभी एक फिर भी दर्ज़ हो रही है…

अतुल - सर… मैं मान hi नहीं सकता की सुप्रिया कुछ ऐसा कर सकती है… जरूर कोई गलत फेहमी हुई है…

विक्रम - लुक ी can’t… ी आल्सो हैवे तो इन्फॉर्म यू की तुम्हे इम्मेडिएटली टर्मिनेट किया जा रहा है… सो कल से काम पर मत आना…

विक्रम ये बोलकर मुद कर दूसरी और चला गया. अतुल वहां निशब्द खड़ा उसे जाते देख रहा था. आज hi आज में पता नहीं क्या क्या होता जा रहा था.

कुछ सेकंड बाद उसने अपने आप को संभाला और बहार की और निकला. उसके मैं में कई सवाल और ख्याल चल रहे थे. ये सब कोई बुरा सपना तोह नहीं था? सुप्रिया क्या सच में फ्रॉड करके गायब थी? या ये सब कोई मज़ाक था और उसे घर जाकर वह वहीँ मिलेगी. वह अभी सबसे पहले किस्से बात करे इस सब के बारे में?

वह बिल्डिंग से बहार आया hi था की किसी लड़की ने उसका नाम पुकारा - अतुल!!!

अतुल ने अपनी नज़रे उठा कर देखा तोह सामने दिशा थी - दिशा… तुम यहाँ…

दिशा - हाँ… मैंने विक्रम को कॉल किया था ऑफिस में जो हुआ वह बताने के लिए तोह पता चला की वह तुम्हे यहाँ लेकर गए है…

अतुल को काम से काम से वहां कोई तोह मिल गया था अपने मैं की बात शेयर करने के किये - दिशा… विक्रम सर कह रहे थे की… सुप्रिया फ्रॉड करके… मुझे तोह कुछ समझ नहीं आ रहा…

दिशा - अतुल हमें यहाँ से जल्दी से निकलना चाहिए… घर चल कर बात करते है…

अतुल बुरी तरह खोया हुआ सा था और दिशा उसका हाथ पकड़ते हुए उसने अपने साथ ले चली. उसने एक ऑटो वाले को रोका हुआ था और वह दोनों उस ऑटो में बैठ कर वहां से निकल गए.

अतुल अभी भी सब कुछ अपने दिमाग में प्रोसेस करने की कोशिश कर रहा था. जरूर कोई ग़लतफहमी hi हुई होगी. उसके और दिशा के बीच रास्ते भर कोई बात नहीं हुई और थोड़ी देर बाद ऑटो अतुल के घर की बिल्डिंग के आगे रुका.

दिशा ने ऑटो वाले को पैसे दिए और वह दोनों ऑटो से उतर गए. वह लोग बिल्डिंग की तरफ बड़े थे की सिक्योरिटी गार्ड अतुल को देखते हुए उसकी और आया.

गार्ड - साब जी… कुछ लोग आये थे… जबरदस्ती अंदर घुस गए और आपके घर का ताला तोड़ दिया… मैं आपको फ़ोन भी लगा रहा था…

अतुल - हाँ.. मैं देखता हूँ…

अतुल और दिशा ऊपर उसके फ्लैट तक पहुंचे. उसके घर का दरवाज़ा खुला हुआ था और एंड अंदर घुसते hi उन्होंने देखा की घर का फर्नीचर और सामान इधर उधर हो रखा था.

अतुल सारे कमरों में जाकर देखने लगा, शायद एक दबी हुई उम्मीद से की कहीं उसे सुप्रिया मिल जाये. पर वह कहीं नहीं थी. उसके बैडरूम की टेबल पर सुप्रिया का मंगलसूत्र रखा हुआ था. ये वहां क्यों था?

अतुल कमरे से बहार निकला, दिशा ड्राइंग रूम में कड़ी थी. अतुल ने सोचा की शायद उसे बैठने के लिए बोलना चाहिए पर उसका दिमाग hi काम नहीं कर रहा था.

अतुल - दिशा… सुप्रिया घर पर नहीं है.. उसका फ़ोन भी बंद पड़ा है… कल रात हमारी काफी बहस हुई थी…

दिशा - अतुल तुम बैठो.. मैं पानी लाती हु…

अतुल सोफे पर सहारा लेता हुआ उस पर बैठ गया. दिशा कुछ hi पल बाद उसके लिए पानी का एक गिलास ले आयी.

अतुल - कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करू… विक्रम सर बोल रहे थे वह फिर दर्ज़ करवा रहे है… सुप्रिया ऐसा कैसे कर सकती है…

दिशा - और कुछ बताया विक्रम ने?

अतुल - बस एहि की सुप्रिया पैसे चुरा के गायब है… और मुझे नौकरी से निकाल दिया…

दिशा - हम्म्म… नौकरी से ज्यादा पहले सुप्रिया का मिलना जरूरी है…

अतुल - हाँ… तुम सही कह रही हो… पर कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करू?

दिशा - सुप्रिया वहां ऑफिस के बहार एक गाडी में आयी थी…

अतुल चौंकते हुए बोलै - क्या? कब?

दिशा - जब वह लोग तुम्हे पकडे हुए नीचे लाये थे…

अतुल - क्या कह रही थी सुप्रिया? किसके साथ थी वह?

दिशा - वह लोग एक डैम से सुप्रिया के पीछे भागने लगे तोह मेरी उससे बात नहीं हो पायी… पर हाँ उस गाडी को कोई आदमी चला रहा था…

अतुल - कौन था वह आदमी? कैसी गाडी थी वह?

दिशा - आदमी को तोह मैं सही से देख नहीं पायी पर गाडी एक पुराणी सी सफ़ेद मारुती 800 थी… जो काफी कॉमन सी गाडी है…

अतुल सोचने लगा, वैसे तोह ये कार काफी कॉमन थी, पर उसने एक सफ़ेद मारुती 800 यहाँ इस बिल्डिंग में कई बार नीचे कड़ी देखि थी. क्या यहाँ बिल्डिंग में hi किसी के साथ सुप्रिया का चक्कर चल रहा था?

दिशा - अतुल… तुम्हे सुप्रिया के घर इन्फॉर्म करना चाहिए.. और अपने घर भी…

दिशा जैसे अतुल - हाँ… पर मैं उनसे क्या कहूंगा? मुझे खुद नहीं पता अभी तक क्या हुआ है?

दिशा - बार बताना तोह पड़ेगा न… जितनी जल्दी तुम उन्हें बताओगे उतना बेहतर होगा…

दिशा अतुल को उसकी खोयी हुई अवस्था में गाइड सा कर रही थी. ये दो कॉल करना अतुल के लिए आसान नहीं था. सुप्रिया के घर पर कॉल करते हुए हज़ारो सवाल उस पर बरस पड़े थे, जिनका जवाब उसे भी नहीं पता था. वह लोग पहली गाडी से लखनऊ आ रहे थे.

अपने घर फ़ोन करके भी एहि हाल था, पर थोड़ा सा अलग. उसके घर वालो ने फ़ोन पर hi सुप्रिया को कोसना शुरू कर दिया था. वह लोग सुबह की गाडी से आने वाले थे.

दोनों कॉल करके अतुल सोफे पर थका हारा बैठ गया और उसने अपना सर पकड़ लिया. उसके फ़ोन पर कई सारे मैसेज और लोगो के कॉल आने शुरू हो गए थे, पर वह किसी से बात नहीं करना चाहता था. दिशा ने पास आकर उसके सर पर हलके से हाथ रखा.

अतुल की आवाज़ फैट सी रही थी - सब लोग… इतना परेशान थे… और मैं कुछ सही से समझा भी नहीं पाया… कहीं सुप्रिया के घरवाले या न सोचे की मैंने कुछ…

दिशा - तुम ऐसा क्यों सोच रहे हो… तुम जितना बता सकते थे तुमने बता दिया… मेरे ख्याल से हमें ठाणे चलना चाहिए और एक मिसिंग पर्सन की रिपोर्ट लिखवा देनी चाहिए…

अतुल - हम्म्म… पर विक्रम सर… वह भी तोह…

दिशा - उनके बारे में मत सोचो तुम अब… तुम बस सुप्रिया को ढूंढ़ने के बारे में सोचो…

इस मुसीबत की घडी में दिशा का क्लियर मंद उसे हौसला सा दे रहा था. अतुल ठाणे जाने के लिए अपने कपडे ठीक करने लगा और अपना मुँह धो कर आया.

जैसे hi वह दोनों दरवाज़े की और बड़े, उनके घर पर ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आयी. अतुल दरवाज़े की और जल्दी से बड़ा, उसके दिल में ज़रा सी आशा जगी की क्या पता बहार सुप्रिया hi हो.

पर बहार वर्दी पहने हुए दो अफसर थे. अतुल उन्हें देखते hi हैरान सा हो गया - अतुल शर्मा?

अतुल - जी…

अफसर - हम यहाँ सुप्रिया शर्मा के केस के सिलसिले मैं आये है…

अतुल - हांजी… हम लोग आपके पास hi आ रहे थे… सुप्रिया का कुछ पता चला?

अफसर ने अतुल के सवाल का जवाब नहीं दिया - हम्म्म… हमें अभी घर की तलाशी लेनी है…

दो कांस्टेबल घर में घुस गए और उन्होंने घर की तलाशी शुरू कर दी.

अतुल - आप यहाँ क्या ढून्ढ रहे है… यहाँ कुछ नहीं है… आप बहार सुप्रिया को ढूंढिए न…

अफसर - आप हमें न बताये की हमें क्या करना है… आप इक़बाल कुरैशी को तोह जानते होंगे… आपकी बिल्डिंग का वॉचमन…

अतुल - हाँ… मतलब मुझे पता वह कौन है.. पर इस सब का उससे क्या लेने देना…

अफसर - हमें शक है की आपकी बीवी उसके साथ फरार है…

अतुल बुरी तरह चौंकते हुए बोलै - क्या?!!

अफसर - आपको पता था उन दोनों के बारे में?

अतुल - उन दोनों के बारे में क्या?

अफसर - हमने दुसरे वॉचमन और बिल्डिंग के कुछ लोगो से पूछताछ की है तोह पता चला है की आपकी बीवी इक़बाल के काफी नज़दीक थी. दोनों साथ में कई बार बहार घूमने जाते थे… और वह आपके घर भी आता था…

अतुल - ये क्या बकवास है… ऐसा कुछ नहीं…

अफसर - मर अतुल.. या तोह आप इस नाटक में मिले हुए है या आप दुनिये के सबसे बेवक़ूफ़ पति है… जो अपनी जवान बीवी को काबू में नहीं रख सके…

अफसर के तीखे शब्द सुन कर दिशा अपने आप को रोक नहीं सकीय - आप कैसे बोल सकते है… आप अपना काम कीजिये… और सुप्रिया को ढूंढिए…

अफसर - वह तोह हम ढून्ढ hi लेंगे… आप दोनों अपना बयां दर्ज़ कराइये…

कांस्टेबल काफी देर तक घर में ढूंढ़ता रहा पर उसे कुछ नहीं मिला. इस बीच अफसर ने दिशा और अतुल का बयां ले लिया था.

अफसर - मर अतुल… आप अभी ये शहर छोड़ कर न जा सकते… आपको हर हफ्ते ठाणे में आकर हाज़री लगनी होगी…

कुछ देर बाद अफसर और कांस्टेबल वहां से चले गए थे. और अतुल का दिमाग पहले से भी ज्यादा घूम गया था. सुप्रिया के किस्सों की लिस्ट बढ़ती जा रही थी. सच में वह इतना बेवक़ूफ़ कैसे हो सकता था की उसे ये सब नहीं दिखा.

दिशा वहीँ उसके साथ बैठी थी. वह उसे अकेले छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी. शाम हो चली थी और लोगो की कॉल आणि बंद hi नहीं हो रही थी. अतुल सिर्फ सुप्रिया या अपने घर के फ़ोन उठता बाकी किसी के नहीं.

घरवालों से पता चला की कुछ लोग उनके हर रिश्तेदार को फ़ोन करके सुप्रिया के बारे में पूछ रहे थे. उन लोगो को भी वह कॉल आया था. फ़ोन पर वह लोग काफी गंदे से बोल रहे थे और उनको धमका रहे थे. अतुल समझ गया की ये लोग ज़रूर विक्रम सर के लोग होंगे, जो शायद खुद भी सुप्रिया को ढूंढ़ने में लगे थे.

दिशा ने इस बीच कुछ खाने को बना लिया था पर अतुल को ज़रा भी भूक नहीं थी. हर बात जैसे सुप्रिया को लेकर hi होती. अतुल सोचने लगा था की कैसे सुप्रिया आज कल इतने महंगे महंगे कपडे पेहेन्ने लगी थी, और ज्वेलरी और वॉचेस भी. कई बार उसने सोचा भी था की वह सुप्रिया से इस खर्चे के बारे में बात करे, पर उन दोनों के बीच तनाव उसे इस चीज़ का मौका hi नहीं देता.

तभी अतुल के फ़ोन पर राहुल का कॉल आने लगा. अतुल ये कॉल भी उठाना नहीं चाहता था, क्यूंकि उसे पता था राहुल किस बारे में कॉल कर रहा है, पर राहुल लखनऊ में उसके कुछ hi दोस्तों में से था जो सुप्रिया को भी अचे से जानता था. क्या पता उसे इस सब के बारे में कुछ पता हो.

फ़ोन उठाते hi राहुल की आवाज़ आयी - अतुल! कुछ गड़बड़ हुई है क्या?

अतुल - तेरे पास कुछ लोगो का कॉल आया था सुप्रिया के बारे में पूछने के लिए?

राहुल - हाँ... हुआ क्या है?

अतुल उसे थोड़ी देर सब समझाता रहा - राहुल, कल शाम को सुप्रिया कृति के घर गयी थी, तू वहां था क्या? वहां कुछ हुआ था क्या?

राहुल - हाँ... मैं थोड़ी देर के लिए वहां था... कृति की बर्थडे पार्टी... पर मैं जल्दी निकल गया था... बस कृति और सुप्रिया hi घर में रह गए थे...

अतुल - यार... पता नहीं ये सब क्या हो गया है... मुझे तोह कुछ समझ नहीं आ रहा...

राहुल - तू फ़िक्र मत कर... मैं उधर आता हूँ...

अतुल जानता था दिशा उसे अकेला छोड़ कर नहीं जाएगी, तोह राहुल के आने से काम से काम वह एक बार अपने घर तोह चली जाएगी - हाँ... तू आजा...

अतुल के फ़ोन रखते hi दिशा को समझाया की उसका दोस्त राहुल यहाँ आ रहा था और वह अब आराम करने के लिए घर जा सकती थी. दिशा सच में जाना तोह नहीं चाहती थी पर आखिर वह अतुल की रिक्वेस्ट मानते हुए वहां से निकल गयी.

उसके थोड़ी देर बाद राहुल भी वहां पहुंच गया था और अतुल अपनी नेगेटिव थॉट्स उसके साथ शेयर करने लगा.

राहुल को भी नहीं लगता था की सुप्रिया ने ऐसा कुछ किया होगा, पर उसे साफ़ साफ़ समझ नहीं आ रहा था की हुआ क्या होगा. क्या विक्रम ने सुप्रिया को गुठली की तरह चूस कर साइड कर दिया था? जो भी हो वह विक्रम के खिलाफ कुछ नहीं बोलना चाहता था क्यूंकि वह अपने आप को इस सबसे दूर hi रखना चाहता था. कहीं विक्रम ने उसका हाल अतुल जैसा कर दिया तोह?

अतुल - सुप्रिया सच में एक वॉचमन के साथ भाग गयी? पूरी दुनिया मुझ पर है रही होगी इस टाइम...

राहुल ने भी उसे भड़काने में कोई कमी नहीं छोड़ी - यार... मैं कुछ बोलना तोह नहीं चाहता... पर उसका करैक्टर थोड़ा अजीब तोह था...

अतुल ने चौंकते हुए पुछा - कैसे?

राहुल का सुप्रिया से बदला लेने का समय आ गया था - यार, मैं बताना नहीं चाहता था... पर उस वॉचमन के साथ तोह मैंने भी सुप्रिया को ek-do बार देखा था... कुछ तोह अजीब था उनके बीच. और याद है जब हम लोग ऑफिस के काम के लिए हम लोग थाईलैंड गए थे, तब वह वहां आये एक काले से कुछ ज्यादा hi चिपक रही थी...

अतुल ने शर्म से सर झुका लिया - तूने मुझे पहला क्यों नहीं बताया ये सब...

राहुल - तू मेरा दोस्त है... और मुझे लगा हो सकता है मेरी गलत फेहमी हो... मैं तुम लोगो की लाइफ डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था...

अतुल - पर बता देता तोह शायद आज ये दिन नहीं आता...

राहुल - कोई नहीं यार... मुझे लगता है वह लोग उसे ढून्ढ hi लेंगे... पर मिलने के बाद क्या होगा... ये नहीं पता...

अतुल का मुँह लटक गया, सच में अगर सुप्रिया मिल भी गयी तोह इस सबसे उबरना तोह बोहोत hi मुश्किल होगा.

देर रात तक वह और राहुल इस सब के बारे में बात करते रहे और दोनों सोफे पर hi सो गए. सुबह घर की घंटी बजने से अतुल की आँख खुली. अतुल ने जल्दी से जाकर दरवाज़ा खोला. बहार सुप्रिया के परिवार वाले पहुंचे थे, उसके माँ बाप और भाई भाभी...

घर के अंदर घुसते hi उन लोगो ने अतुल पर सवालो की बारिश कर दी - कुछ पता चला सुप्रिया का? पुलिस क्या बोल रही है? ये सब कैसे क्या हो गया था?

अतुल के पास इन सवालो का कोई जवाब नहीं था. उसके भी तोह वही सवाल थे. आवाज़ें सुनकर राहुल भी उठ गया था, और सब लोग बार बार एक दुसरे से वही सवाल कर रहे थे.

आरती भाभी की शकल तोह बुरी तरह उत्तरी हुई थी. उनके परिवार में वही तोह जो आखरी बार सुप्रिया से मिली थी, और उस समय उन दोनों के बीच इतनी कहा सुनी हो गयी थी. पर शायद आरती ने भी अब तक किसी को खुल कर कुछ नहीं बताया, खासकर विक्रम के बारे में. आखिर इस सब में उसके भी तोह राज़ थे.

दिन होते होते सुप्रिया के भैया और अतुल ठाणे का एक चक्कर काट आये थे, और वहां उन्हें कुछ नहीं पता चला था. सुप्रिया के भैया तोह खुद hi बिल्डिंग के नीचे लोगो से पूछताछ कर रहे थे, और जो कुछ वह सुन रहे थे, उन्हें अपने कानो पर यकीं नहीं हो रहा था. कुछ लोगो ने उन्हें सुप्रिया और इक़बाल की नज़दीकी के बारे में बताया, कैसे वह दोनों अक्सर साथ घूमा करते थे.

बराबर वाले फ्लैट की मेघा को भी सुप्रिया से बात किये हुए काफी समय हो गया था, और उसे भी कुछ नहीं पता था. बस ये की सुप्रिया पहले से काफी बदल गयी थी. जो सीढ़ी साधी सी लड़की लखनऊ आयी थी, सुप्रिया वह अब वैसी नहीं रह गयी थी.

जब अतुल वापस घर पंहुचा, तोह उसने देखा की उसके घर से उसके मम्मी पापा और जीजू भी वहां पहुंच गए थे. और दिशा भी वापस वहां आ गयी थी. सबके मुँह लटके हुए थे पर शायद अलग अलग कारन से. वह लोग बेसब्री से अतुल और सुप्रिया के भाई सुधीर का इंतज़ार कर रहे थे.

उनके घर में घुसते hi आरती जल्दी से उनकी तरफ आयी - कुछ पता चला...

सुधीर की आँखें बिलकुल खोयी हुई सी थी - नहीं... कुछ नहीं...

पूरे कमरे में फिर से सन्नाटा सा हो गया.

कुछ देर बाद अतुल के मम्मी सरिता बोली - पता नहीं कब से चल रहा था ये तमाशा... परेशान कर रखा था आपकी बेटी ने हमे और हमारे बेटे को...

आरती के मुँह से एकदम से निकल गया - मौसी जी आप क्या बोल रहे हो...

अतुल भी बीच में बोलै - मम्मी... ये टाइम नहीं है ये सब बोलने का...

सरिता और भी भड़क गयी - क्यों? इतने टाइम से चल रहा था ये सब ड्रामा... और तू चुप चाप सेह रहा था... भाग गयी न आखिर... और वह भी एक वॉचमन के साथ... और उस पर गबन करके भागी है... किसी चीज़ की कमी नहीं छोड़ी उसने...

आरती - हमें अभी सब सच नहीं पता... क्या पता उसके साथ कुछ और हुआ हो?

सरिता - क्या और हुआ हो? वह तोह शुरू से hi बदचलन सी थी... अब साड़ी बातें खुल के आ रही है...

आरती - शुरू से मतलब?

सरिता - क्यों सुहागरात के अगले दिन तुम्हे फ़ोन नहीं किया था उसने की उसे मज़ा नहीं आया अतुल के साथ? और फिर उसने अपने देवर ध्रुव को भी नहीं छोड़ा था, उसके भी पीछे पद गयी थी, वह तोह भगवान् का भला हो वह बच गया...

आरती - आप लोग कुछ भी बोल रहे हो... अतुल तुम बोलो न अपने मम्मी को कुछ...

अतुल परेशान होता हुआ छुप बैठ गया. उसकी सांसें भारी थी. सच में ऐसा लग रहा था की सुप्रिया का एक एक राज़ बहार आ रहा था. उसे भी अब तक ये ध्रुव वाली बात नहीं पता थी. और कल रात जो कुछ राहुल ने बोलै, उसके बाद उसे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

पर दिशा जरूर बीच में बोल पड़ी - आंटी मेरे ख्याल से... जो यहाँ अपना बचाव करने के लिए नहीं है... उसके बारे में हमें बात नहीं करनी चाहिए... हमें अपना सारा फोकस सुप्रिया को ढूंढ़ने में लगाना चाहिए...

सरिता - तुम कौन हो? सुप्रिया की दोस्त? तभी उसकी पैरवी कर रही हो?

दिशा - नहीं मैं सुप्रिया की दोस्त नहीं हु... बल्कि अतुल और मैं दोस्त है...

अतुल को थोड़ी हैरानी हुई पर ाचा भी लगा की इस दिशा आज उसे अपना दोस्त बुला रही थी. पर साथ hi ऐसा लग रहा था की वह सुप्रिया की साइड भी ले रही है.

सरिता - अगर तुम अतुल की दोस्त हो तोह ये बताया... कैसे ढूंढे उसे? उस लड़की के चक्कर में अतुल अब ठाणे और कचेरी के चक्कर काटता रहे? उसने तोह कहीं का नहीं छोड़ा इसे... इसकी नौकरी भी गयी और पूरी रिश्तेदारी में इज़्ज़त भी... वह लोग कल से सबको फ़ोन कर चुके है... हम लोग लोगो को समझते समझते थक चुके है...

अपनी मम्मी को इस तरह बोलते देख अतुल से रहा नहीं गया - आप थक गए हो तोह मैं कहूंगा की आप लोग वापस चले जायो...

सरिता - अतुल पर...

अतुल - नहीं... आप लोगो को मेरी या सुप्रिया की फ़िक्र नहीं है... बस फ़िक्र है तोह अपनी इज़्ज़त की... और रिश्तेदारों की...

सरिता कुछ पल के लिए चुप हो गयी. पर कुछ देर बाद फिर से वही सब बहस शुरू हो गयी थी. अतुल वहां से हट कर दुसरे कमरे में चला गया. कल दिन से उसने शायद एक पल भी चैन का नहीं लिया था.

सुप्रिया का परिवार भी अकेले में जाकर बात करने लगा. सुधीर ने जो उसे पता चला वह सब बताया जिससे उनके पैरो टेल भी ज़मीन निकल गयी थी. ऐसा hi लग रहा था की सुप्रिया ने कुछ गलत काम किया था. कुछ देर बाद वह लोग अतुल को बोल कर वहां से निकल गए, वह शायद अभी अपने घर तोह नहीं जा रहे थे, पर फिलहाल उस घर के माहौल में खड़े रहना मुश्किल था.

दिशा और राहुल भी थोड़ी देर बाद वहां से निकल गए थे. अतुल अपने hi घर में अपने घरवालों के साथ था, पर ये वह लोग थे जिन्होंने उसे कभी किसी लायक नहीं समझा था, और वह अपने hi घर में एक अजीब सी घुटन महसूस कर रहा था. शायद इन्ही लोगो की वजह से तोह उसने अब तक सुप्रिया ने नाता जोड़े रखा था, क्यूंकि वह समाज में अपनी और अपने परिवार वालो की बेज़्ज़ती नहीं करवाना चाहता था.

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अगला एक हफ्ता कुछ ऐसे hi बीते, हर दिन एक hi जैसा. अतुल और सुधीर और लोगो से बातें करके जानकारी लेने की कोशिश करते और जो कुछ उन्हें पता चल रहा था वह सब सुप्रिया के खिलाफ hi था. सुप्रिया की कामवाली करुणा तोह बोहोत hi भड़की थी सुप्रिया पर. कैसे वह इक़बाल से मिलने के बहाने ढूंढा करती थी, और कैसे और भी मर्द उसके फ्लैट पर आते थे उससे मिलने, और कैसे वह उसके सामने अतुल भैया को नपुंसक बताया करती थी.

अतुल तोह अब सुधीर भैया से भी नज़रे मिलाने लायक नहीं रहा था. उसकी बेज़्ज़ती पर बेज़्ज़ती होती जा रही थी.

अतुल उस होटल पंहुचा जहाँ सुप्रिया का परिवार रुका हुआ था. सुधीर hi सब कुछ बता रहा था और अतुल चुप चाप बैठा था.

सुप्रिया की मम्मी - आरती... तू तोह यहाँ आयी थी न इन लोगो के पास... तुझे कैसे नहीं पता चला ये सब...

आरती - मम्मी जी... ऐसा कुछ लगा hi नहीं... बस एहि लग रहा था की अतुल और सुप्रिया की आपस में बन नहीं रही है...

मम्मी - वह इतनी सीढ़ी सी लड़की थी... कभी ऐसा कुछ नहीं किया उसने...

आरती - मम्मी जी... थोड़ी तोह बदल गयी थी वह यहाँ बड़े शहर में रह कर...

सुधीर भड़कते हुए बोलै - थोड़ी!? मुझे उसका भाई होते हुए इतनी घटिया बातें सुनने को मिली है न... मैं कर रहा था उस हर इंसान का मुँह तोड़ दू... पर फिर किस किस का मुँह तोडूंगा...

आरती - आप ऐसे मत परेशान मत हो... वह मिल जाएगी...

सुधीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा - मैं तोह शायद चाहूंगा की अब वह कभी मिले hi न... या मिले तोह उसकी...

मम्मी - सुधीर... क्या बोल रहा है...

सुप्रिया के पापा एकदम से बोल पड़े - सही तोह कह रहा है... हम यहाँ आ रहे थे... सोचा था की अतुल ने कुछ गलत किया होगा... पर यहाँ आकर सब साफ़ हो रहा है... हमारी बेटी पैसे चोरी करके एक नीच इंसान के साथ भाग गयी है... अब वह वापस भी आ गयी तोह क्या अतुल को उसे स्वीकारना चाहिए?

सुप्रिया के पापा के मुँह से ये बात सुन कर पूरा कमरा छुप हो गया था. किसी को भी यकीं नहीं हो रहा था की इतना काम बोलने वाले पापा आज ये कह गए थे.

पापा - मेरे ख्याल से हम लोगो को वापस घर चलना चाहिए... सब लोग अपने काम में वापस लगे... अन्य बीटा को भी तोह रिश्तेदारों के पास छोड़ कर आये है...

आरती - पापा जी पर ऐसा कैसे उसकी खोज छोड़ कर वापस चले जाये?

पापा - मेरे लिए तोह वह अब नहीं मिलने वाली... यहाँ समय की बर्बादी करने का कोई फायदा नहीं है... अतुल बीटा, मेरा कहना तोह तुम्हे भी एहि होगा की तुम अपनी जिंदगी में आगे बड़ो... हमें माफ़ करना...

पापा कमरे से बहार चले गए थे, और मम्मी फुट फुट कर रो रही थी. अतुल को यकीं नहीं हो रहा था की सुप्रिया के खुद के परिवार को उस पर भरोसा नहीं रहा था. शायद सिर्फ एक आरती भाभी उसके लिए अभी भी बोल रही थी. पर उसे कहाँ पता था की आरती कुछ ऐसा जानती थी जो वह नहीं जानता था, पर उसे अपनी शादी भी तोह बचानी थी.

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दो हफ्ते बीत गए थे, अब सब लोग अतुल को उसके हाल पर छोड़ कर वापिस चले गए थे. कोई नहीं था उसके लिए, बस एक खाली घर... जहाँ वह ज़मीन पर बैठा पर दीवारों को देखते रहता. किसी को अब तक सुप्रिया की कोई खबर नहीं थी. और वह ये शहर भी तोह छोड़ कर नहीं जा सकता था.

हाँ एक और इंसान था जो रोज़ शाम अपने ऑफिस के बाद सीधे उसके घर पहुंच जाता था - दिशा. वह रोज़ शाम एक टिफ़िन लिए अतुल के लिए खाना ले आती. और फिर घर आकर उसके लिए अगले दिन का खाना बना जाती. अतुल उसे कई बार मन कर चूका था, पर वह उसकी एक नहीं सुन रही थी. कहीं न कहीं अतुल को भी उसका आना ाचा लगता.

आज भी शाम की घंटी बजते hi अतुल को पता था की दिशा आयी होगी. वह धीरे से खड़ा हो कर दरवाज़ा खोलने गया.

अतुल ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा - दिशा... मैंने कहा है न की मैं खाना बना लूंगा.

दिशा ने एक स्माइल के साथ कहा - गुड इवनिंग... कोई नहीं... इस बहाने किसी के साथ डिनर हो जाता है...

अतुल ने एक सांस छोड़ी - हम्म्म्म... तुम मेरे साथ क्यों डिनर करना चाहती हो... मैं तोह इतना बोरिंग इंसान हु...

दिशा - क्यूंकि मुझे पता है की तुम्हारे साथ मुझे ज्यादा बोलने की कोशिश नहीं करनी पड़ेगी...

दिशा घर के अंदर घुस गयी थी और वह कुछ देर बाद प्लेट में खाना लगा कर ले आयी. उसने अतुल को देखते हुए कहा - तुम शेव कर करोगे? 3 दिन से टोक रही हु...

अतुल - शेव करके कहाँ जायूँगा... ठाणे तोह मंडे जाना है अब...

दिशा - हम्म्म... शेव करके ाचा लगेगा... थोड़ा लाइट...

दिशा और अतुल ने खाना शुरू कर दिया था. कभी कभी अतुल के मैं में आता तोह वह उसके साथ सुप्रिया को लेकर अपने मैं की बात शेयर कर लेता. कोई पुराणी बात जो अब याद आयी हो... या कुछ अनकहा जो रह गया हो उनके बीच... दिशा सब कुछ आराम से सुन लेती...

अतुल - आज नीचे वॉचमन से पता चला की इक़बाल जिस गाँव को अपना गाँव बताता था... वहां तोह किसी से कभी उसका नाम भी नहीं सुना... बताया इतने साल वह लोगो को अपना गलत पता बता रहा था... न उसने कभी कोई चिट्ठी भेजी न वह कोई फ़ोन कॉल करता था... बस एक दिन हवा में गायब हो गया...

दिशा - हम्म्म.... पर कहाँ सुप्रिया और कहाँ वह... सुप्रिया उसके साथ क्यों भागेगी... मुझे तोह ये समझ hi नहीं आ रहा...

अतुल - उसकी भी थ्योरी है लोगो के पास...

दिशा - क्या थ्योरी?

अतुल हिचकिचाते हुए बोलै - सुना है उसका वह नीचे का part... काफी बड़ा था... और लड़कियों को काफी मज़ा देता था... पता नहीं बाकी सच क्या है..

दिशा - ओह गॉड... लोग भी न...

अतुल - पर अब याद करू तोह सुप्रिया कई बार उसका जिक्र करती थी... थोड़ा अजीब था तब भी...

दिशा - तुम ये बात पचास बार बोल चुके हो...

अतुल - क्या करू... और कुछ बोलने के लिए hi नहीं है... अब तोह मुझे लगता है कोई उसे ढून्ढ भी नहीं रहा सही से...

दिशा - विक्रम के वह लोग तोह अभी भी ढून्ढ रहे है उसे...

अतुल की आँखों में इस नयी जानकारी से एक जान सी आ गयी - तुम्हे कैसे पता? कुछ कहा विक्रम ने?

दिशा - नहीं... विक्रम ने तोह कभी मुझे कुछ नहीं कहा है... बस ऑब्सेर्वे कर लेती हु...

अतुल - तुम विक्रम से बात करके देखो न... तरय करो अगर कुछ पता चले तोह?

दिशा - हम्म्म... इतना इजी नहीं है... अब तोह वैसे भी एक नयी सेक्रेटरी आ गयी है उसकी... मुझे लगता है वह उसके ऊपर जासूसी कर रही है...

अतुल - विक्रम के ऊपर?

दिशा - हाँ... विक्रम के जाते hi वह उसके केबिन में घुस जाती है... मैं उसे नहीं रोकती क्यूंकि विक्रम ने कहा की उसको कोई रोक टोक नहीं करना है...

अतुल - काफी अजीब है...

दिशा - हम्म्म... तुम नेवसपपेर ऑफिस गए? मैंने कहा था न की वह सुप्रिया के लापता होने का इश्तेहार दाल दो नेवसपपेर में... या टीवी में?

अतुल - इतने पैसे नहीं है की टीवी में अड़ दालु... और वैसे भी नेवसपपेर कौन पड़ता है आजकल...

दिशा - पड़ते है लोग... किसी लोकल अखबार में डालना जिसकी अछि रीडरशिप हो... लोग वह वाले अखबार काफी पड़ते है अभी भी...

अतुल - हम्म्म... देखता हूँ...

दोनों खाना कहते हुए बातें करते रहे.

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2-3 हफ्ते और बीत गए थे. सुप्रिया का अब भी कोई अत पता नहीं था, और अब तोह अतुल ने भी साड़ी उम्मीद छोड़ सी दी थी. पर थानेदार उसे अभी भी हर हफ्ते वहां हाज़री लगाने के लिए बोलता था.

नौकरी के बिना अतुल के बैंक अकाउंट में पैसे काम हो रहे थे और शायद अब इस 2 बैडरूम फ्लैट की जरूरत भी नहीं थी. घर से भी कॉल आने काम हो गए थे, शायद सबने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया था.

बस उसे हर शाम अब दिशा का इंतज़ार होता. पहले लगता था की वह क्यों आती है, अब अगर वह एक दिन नहीं आती तोह ऐसा लगता की वह भी उसे छोड़ गयी है. पर वह उसे कुछ कह नहीं पाटा.

दरवाज़े की घंटी बजते hi उसने तुरंत hi दरवाज़ा खोला - Hello...

सामने दिशा hi थी, वह सुप्रिया जितनी सुन्दर तोह बिलकुल नहीं थी, पर जितना सहज वह उसके साथ महसूस करता था उसने कभी डेड दो साल में सुप्रिया के साथ नहीं किया. वह मेकअप के बिना उसके घर आती थी, उसका थोड़ा सावला रंग, पतले से होंठ. उसके नैन नक्श ठीक थे, पर सुप्रिया जैसे तीखे नहीं. शायद उम्र में वह सुप्रिया से थोड़ी बड़ी होगी, शायद उसकी hi उम्र की, या उससे ज़रा सी बड़ी?

पर वह उसे इतनी गौर से क्यों देख रहा था. वह बस उसकी दोस्त थी. सुप्रिया को भी तोह एहि धोका हुआ था.

दिशा - Hi... सॉरी कल नहीं आ सकीय... थोड़ा लेट हो गया था ऑफिस में...

अतुल को ऑफिस के नाम से थोड़ी छिड़ सी हुई - हम्म्म... विक्रम का कोई ज़रूरी काम था क्या?

दिशा - नहीं... वह तोह यहाँ है भी नहीं... बस कुछ प्रिंट्स निकाल कर बुकलेट्स बनानी थी...

अतुल के मैं में अजीब से ख्याल आने लगे, ये भी तोह वहीँ विक्रम के साथ hi काम करती थी. आजकल विक्रम पर उसका गुस्सा बाद गया था, ऐसा लगता था की विक्रम की वजह से उसके साथ ये सब हुआ था.

दिशा - क्या हुआ? क्या सोच रहे हो...

अतुल ने सीरियस आवाज़ में कहा - तुम अब यहाँ आना बंद कर दो... इतना दूर पड़ता है तुम्हारे लिए... वैसे भी मैं शायद कहीं और शिफ्ट हो रहा हूँ... किसी छोटे फ्लैट में...

दिशा - ठीक है वहां आ जयुंगी...

अतुल - नहीं... तुमने काफी हेल्प कर दी है... पर कब तक करोगी न...

दिशा - तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है... मेरे साथ सीधे सीधे बोल सकते हो न... या बस मैं में रख कर उसे घुट्टी बना लेना है...

अतुल - कुछ भी तोह नहीं ऐसा... मैं तोह बस ये कह रहा हूँ की तुम भी तोह बिजी हो...

दिशा - यू क्नोव... एहि तुम्हारी प्रॉब्लम है... मुझे पता है तुम्हारे मैं में क्या चल रहा है...

अतुल - क्या चल रहा है...

दिशा - एहि की मैं भी तुम्हे छोड़ कर चली जयुंगी न...

अतुल ने अपनी नज़रे दूसरी और कर ली - नहीं... ऐसा कुछ नहीं... और चली भी जायेगी तोह क्या फरक पड़ता है...

दिशा ने एक गहरी सांस ली - मुझे पता है तुम कितना उनकंफर्टबले फील करते हो मेरा विक्रम के यहाँ जॉब करने से...

अतुल - मैं क्यों उनकंफर्टबले फील करूँगा? तुम्हारी जॉब है..

दिशा - हर बात का सवाल से जवाब मत दो... वह तुम अपने आप से पूछो...

अतुल ने गहरी सांस ली - हाँ ठीक है... मैंने सोचा है इस बारे में... पर सिर्फ इसलिए क्यूंकि मैंने और भी लोगो से बात करि तोह मुझे विक्रम के बारे में कुछ चीज़ पता चली जो वह दुनिया को नहीं दिखता... तुम 4-5 सालो से उसकी असिस्टेंट हो... तुम्हे तोह पता hi होगा वह सब शायद...

दिशा ने कंधे ुचा कर कहा - हाँ... शायद... तोह?

अतुल - तोह... तुम मेरी दोस्त हो... और मैं नहीं चाहता की तुम उसके झमेलों में फासो... बस एहि कंसर्न है मेरा...

दिशा ने मुस्कुराते हुए कहा - बस एहि कंसर्न है?

अतुल - हाँ बस एहि...

दिशा कुछ सेकंड रुकी और फिर बोली - मैंने आज hi रिजाइन कर दिया है... मैं दूसरी नौकरी ढून्ढ लुंगी...

अतुल चौंकते हुए बोलै - क्या! पर क्यों? तुम तोह वहां अचे से सेटल्ड हो...

दिशा - अगर तुम्हे इसका जवाब नहीं पता तोह मैं नहीं बता सकती...

अतुल चुप हो गया था.

दिशा ने धीरे से कहा - तुम चाहो तोह मेरे साथ मूव इन कर सकते हो... हम रेंट और बाकी सब खर्चा आधा आधा बात लेंगे...

अतुल ने दिशा की आँखों में आँख दाल कर कहा - दिशा... मैं कुछ दिनों से... ये कहना चाहता था की...

दिशा ने मुस्कुराते हुए कहा - हे... रुको रुको... अभी बस रेंट शेयर की बात हुई... और कुछ नहीं...

अतुल अब नहीं रुकने वाला था - मुझे बोलने दो प्लीज... ी रियली लिखे यू... काश मुझे तुम पहले मिली होती... काश...

दिशा छुप हो गयी थी, शायद वह भी एहि चाहती थी - अतुल, ी लिखे यू तू... पर अगर कल को सुप्रिया तुम्हारी लाइफ में वापिस आ गयी तोह?

अतुल ने अपना सर उसके सर पर टिका दिया - सुप्रिया कभी मेरी लाइफ में आयी hi नहीं थी...

दोनों की आँखों से थोड़े से आंसू बहने शुरू हो गए थे. लिविंग रूम के एक कोने में अतुल का फ़ोन साइलेंट पर था और उस पर किसी अननोन नंबर से कॉल आ रही थी, जिसका शायद उसे अभी पता भी नहीं था.
 
अपडेट 91

सुप्रिया अपने कमरे में अकेली बैठी हुई गहरी सोच में थी. उसके हाथ में वही अखबार का परचा था जो उसे एक हफ्ते पहले अमरोह की हलवाई की दूकान पर मिला था. सुप्रिया उसे एक बार फिर खोल कर पड़ने लगी.

गुमशुदा तलाश… नाम: सुप्रिया शर्मा, रंग: गोरा, उम्र - 26 वर्ष, कद - 5’4 इंच… ये लड़की 25 अगस्त से लखनऊ से लापता है. यदि किसी व्यक्ति को इसकी जानकारी मिले तोह नीचे दिए गए नंबर पर सूचित करे. संपर्क करे - अतुल शर्मा.

पिछले एक हफ्ते में सुप्रिया इस इश्तेहार को छोरी छुपे कई बार पद चुकी थी और वह उसे उसकी पुराणी जिंदगी की तरफ खींच रहा था.

हिना के कॉलेज एडमिशन ने जाने उस पर कैसा भूत सवाल किया था की कुछ पालो के लिए वह सब कुछ hi भूल गयी थी. जैसे सच में हिना उसकी प्यारी भतीजी हो और वह उसके लिए डटी पड़ी थी.

पर वह गुमशुदा इश्तिहार उसे फिर से उसे हकीकत से रूबरू करा रहा था. और वैसे भी हिना का एडमिशन तोह हो गया था न. उसका खली दिमाग फिर से उन्ही सब खयालो को वापिस ले आया था, और वह पूरा दिन उन्हें छिपाये घूम रही थी.

विक्रम… अतुल… सब कुछ.

विक्रम ने बारे में सोच कर कभी तोह वह उसे बेहद याद करती और कभी अपने आप को कोसती. विक्रम के धोके ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था. उसने उस इंसान के लिए क्या नहीं किया था, और अब वह यहाँ एक अलग hi दुनिया में पहुंच गयी थी, जहाँ से वापस जाना नामुमकिन सा लग रहा था.

उसे कुछ मौके तोह मिले थे विक्रम के असली चेहरे को पहचानने के लिए, पर वह उस समय शायद उसके प्यार में इतनी अंधी हो गयी थी की वह उन्हें साफ़ साफ़ देख भी नहीं पायी.

आरती भाभी… साहिल सर… उन्होंने उसे सही सलाह तोह दी थी. वह इस सबके बारे में सोचते hi ालेके में बिलख बिलख के रोने लगती.

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दूसरी और अतुल था, जिसके साथ उसने फेरे तोह लिए थे, पर उन दोनों के बीच कभी वह प्यार नहीं हुआ जो उसे विक्रम से मिला था. पर फिर भी वह दोनों पति पत्नी तोह थे न, और उसने hi तोह अतुल को धोका hi तोह दिया था.

ये ख्याल मैं में आती hi उसके अंदर एक अजीब सी हलचल मच जाती. अब जाकर सोचती तोह यकीं hi नहीं होता था की वह उन पालो में क्या क्या नहीं कर गयी थी. किस रेखाएं लाँघि थी उसने जिनका उसे पता भी नहीं था. उसके मैं में एक तीस उठती जो उसे कहती रहती की काश उसने ऐसा कुछ नहीं किया होता, और बस अपनी पति की होकर रहती.

अब बस एक ये अख़बार का कागज़ hi तोह था जो उसे उसकी पुराणी जिंदगी से जोड़ रहा था. अगर अतुल ने ये गुमशुदा नोटिस अखबार में डाला था तोह इसका मतलब वह उसे ढून्ढ hi रहा था. ये कागज़ मिलने से पहले तोह उसने एहि सोचा था की अतुल को अब तक उसके बारे में सब पता चल गया होगा और वह उससे नफरत करने लगा होगा. पर शहद ऐसा न हो? शायद उसने उसे माफ़ कर दिया हो और सब उसके लिए परेशान उसे ढून्ढ रहे हो?

सुप्रिया को नीचे से इक़बाल के आने की आवाज़ आयी. उसने जल्दी से कागज़ को अलमारी में अपने कपड़ो के बीच छुपा दिया. और अपने आंसू पोछते हुए नीचे की और गयी.

इक़बाल हिना को कॉलेज से वापस ले आया था. हिना को कॉलेज से आते hi सुप्रिया को पूरे दिन के किस्से सुनती, जिससे सुप्रिया का थोड़ा ध्यान बात जाता. इक़बाल भी दिन का खाना खा कर वापिस कारखाने चला जाता.

वह हाथ मुँह धो कर खाने के लिए बैठी hi था. हिना भी उसके साथ hi बैठ गयी थी. सुप्रिया ऊपर से जल्दी से रसोई में घुसी और खाना परोसने लगी. रुबीना अभी अम्मी जी के कमरे में उसने बात कर रही थी.

सुप्रिया ने खाने की प्लेट इक़बाल और हिना के आगे राखी. इक़बाल ने सुप्रिया की और देखा, जैसे उससे पूछ रहा हो की उसने खाना खाया या नहीं. सुप्रिया ने इक़बाल से आँखें नहीं मिलायी. एक हफ्ते से उनके बीच बातचीत थोड़ी काम hi थी.

तभी रुबीना बहार आयी - इक़बाल सुनो...

इक़बाल - जी भाभी...

रुबीना - फुफु का फ़ोन आया था... उनकी भतीजी की शादी है...

इक़बाल - ाचा... आप और भाई जान जा रहे है?

रुबीना - सोचा तोह था... पर फिर एक ख्याल ये भी आया की तुम और सुप्रिया वहां हो आयो... आज कल थोड़ी उखड़ी उखड़ी सी लगती है... उसका मैं बहल जायेगा...

सुप्रिया रसोई से कान लगा कर सब कुछ सुन रही थी. वह नहीं जाना चाहती थी फुफु या किसी और के यहाँ. इसी घर में रहना मुश्किल था क्या जो वह कहीं और हो आये.

इक़बाल भी थोड़ा परेशान हो गया था - भाभी... आप लोग हो आयो न... वैसे भी सुप्रिया अकेले कैसे वहां संभालेगी अपने आप को...

रुबीना - सब कर लेगी... इतना तोह मैंने उसे सीखा hi दिया है... बाकी काम hi बोलना है वहां... ज्यादा कुछ नहीं...

इक़बाल - पर उसके खाने की भी दिक्कत है न...

रुबीना - वह मैं संभल लुंगी... मैं फुफु से बात कर लुंगी...

इक़बाल - पर... हिना... उसका भी तोह कॉलेज है अब...

हिना चहकते हुए बोली - मैं भी चलती हु आप लोगो के साथ!

रुबीना ने हिना की तरफ देखते हुए कहा - नहीं... तुम कहीं नहीं जायेगी... बस 3-4 दिनों की बात है... और उसमे से 2 दिन तोह कॉलेज की छुट्टी hi है... बाकी 2 दिन नाज़ के साथ चली जाना...

ऐसा लग रहा था भाभी ने सब कुछ सोचा हुआ था, और इक़बाल के पास बोलने के लिए कुछ नहीं रह गया था.

सुप्रिया भी रसोई से बहार निकल आयी थी - भाभी... पर... वह...

रुबीना ने उसकी तरफ नाखुश हो कर देखा - देखो तुम तोह बोलो मत... वैसे भी तुम्हारी शादी में किसी को बुला नहीं पाए थे तोह सब तुमसे मिलना चाहते है... और फिर इक़बाल को भी वहां गए इतने साल हो गए है...

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, पर वह उसकी और नहीं देख रहा था. सुप्रिया को समझ नहीं आ रहा था वह यहाँ जाने के लिए कैसे मन करे.

इक़बाल ने कुछ पल बाद कहा - कब जाना है?

रुबीना थोड़ी खुश होते हुए बोली - 4 दिन बाद... तब तक मैं सुप्रिया का सामान बांध दूंगी... फिक्र मत करना सुप्रिया...

इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया और फिर से खाना खाने लगा. और सुप्रिया चुप चाप परेशान कड़ी रह गयी थी. खाना खा कर वह तोह वापस चला गया था, पर सुप्रिया एक और टेंशन लिए बाकी का दिन काटने लगी.

रात को जब सुप्रिया अपने कमरे में पहुंची तोह इक़बाल ने भी एक पुराण सा बक्सा निकाल लिया था जिसमे वह अपना सामान डालने लगा था.

सुप्रिया ने कमरा बंद करते hi खीजते हुए कहा - इक़बाल जी... आपने मन क्यों नहीं किया भाभी को... हम लोग वहां जा कर क्या करेंगे...

इक़बाल ने सुप्रिया की तरफ देखा जो उसके सामने कड़ी थी - मैडमजी... आपने सुना तोह था... वह मान कहाँ रही थी... आपने भी तोह कोशिश की थी...

सुप्रिया - हाँ पर... वहां मैं किसी को नहीं जानती... और फुफु तोह बोहोत hi खतरनाक सी लगती है...

इक़बाल - ारी नहीं... आप परेशान मत हो... सब ठीक होगा वहां... मैं हु न...

सुप्रिया ने गहरी सांस ली और बिस्तर के सिरहाने पर बैठ गयी. उसका दिमाग पूरी तरह बता हुआ था. उसने अब तक इक़बाल से उस गुमशुदा विज्ञापन के बारे में बात नहीं की थी. पर शायद इस बात को ज्यादा दिन तक टालना ठीक नहीं था. पर वह कैसे छेड़े इस बात को.

कुछ देर बाद इक़बाल भी बक्से को बंद करके पलंग पर आ गया था. सुप्रिया से जितना दूर हो सके उतना दूर. वह अपने आप से ज्यादा बोलने की कोशिश नहीं करता था.

सुप्रिया ने कमरे के अँधेरे में खुद hi बात छेड़ी - इक़बाल जी... आपसे कुछ पूछना था...

इक़बाल - जी मैडमजी कहिये न... माफ़ कीजिये आज जो कुछ हुआ... पर बस 4 दिन की hi बात है...

सुप्रिया - नहीं नहीं किसी और बारे में...

इक़बाल - हाँ कहिये न...

सुप्रिया - आप कभी... अपनी लखनऊ के बारे में सोचते है?

इक़बाल - नहीं मैडमजी... ज्यादा तोह नहीं... वहां मेरा था hi कौन...

सुप्रिया - करुणा... वह और आप तोह साथ hi थे शायद...

सुप्रिया के मुँह से करुणा का नाम सुन्ना इक़बाल को थोड़ा अजीब सा लग रहा था, पता नहीं मैडमजी उसे क्यों याद कर रही थी - नहीं मैडमजी... उसके और मेरे बीच में ऐसा कुछ नहीं... बस एक दुसरे को जानते थे...

सुप्रिया को थोड़ी सी हसी आ गयी - बस जानते थे? और कुछ भी नहीं...

इक़बाल - आप क्यों शर्मिंदा कर रही है मुझे... आप तोह सब जानती hi नहीं... हाँ हमारे बीचे में थोड़ी बोहोत चुदाई हो जाती थी... पर उससे ज्यादा कुछ नहीं...

इक़बाल के मुँह से चुदाई शब्द सुनकर सुप्रिया छौंक सी गयी, पर जो वह करता उसे और क्या बोलता.

सुप्रिया झेपते हुए बोली - हाँ... वही सब... आप उसे याद नहीं करते?

इक़बाल सोचते हुए बोलै - नहीं मैडमजी... मेरा उससे रिश्ता बस जिस्मानी hi था... और कभी कभी वही जिस्मानी जरूरराते महसूस होती है पर अब तोह मैं बस आपके बारे में सोचता हूँ...

सुप्रिया ने जैसे hi ये सुना, उसने ोडने की चद्दर से अपने आप को अचे से ढकने की कोशिश करि, जैसे अँधेरे में भी ुकि नज़रों से बचने की कोशिश कर रही हो.

इक़बाल भी बोलते hi समझ गया था की शायद वह कुछ गलत कह गया है. वह तुरंत उठ बैठा और अपनी सफाई देने की कोशिश करने लगा - नहीं नहीं मैडमजी... आप गलत मत समझना मेरी बात को... मेरा मतलब था की मैं तोह बस सोचता हूँ की किसी तरह से आपको ख़ुशी मिल जाये...

सुप्रिया को पता था इक़बाल जब नर्वस होता था तोह उसके मुँह से कुछ भी निकल जाता था. शायद उसका मतलब कुछ ऐसा वैसा नहीं था. पर उसने अपनी चद्दर को कास के पकड़ा रखा, जो इक़बाल को भी अँधेरे में दिख गया था.

इक़बाल बिस्तर से नीचे उतारते हुए बोलै - मैं नीचे hi गद्दा बिछा के सो जाता हूँ मैडमजी... मुझे पलंग पर आना hi नहीं चाहिए था...

सुप्रिया भी उसे पलंग से नीचे जाते देख उठ बैठी - नहीं नहीं... आप परेशान मत हो... मुझे आप पर पूरा भरोसा है...

इक़बाल - मैडमजी... ये बस आप hi कह सकती है... मैं तोह उस दिन के लिए इतना शर्मिंदा हु, जो मैंने आपके सामने कमरे में किया था...

सुप्रिया को समझ आ गया की इक़बाल उस दिन जो हस्तमैथुन कर रहा था उसकी बात कर रहा था. उफ्फ्फ फिर से इक़बाल का लुंड उसकी आँखों के सामने घूम गया. उसने ये बात छेड़ी hi क्यों...

सुप्रिया - नहीं नहीं... ये आपका कमरा है... और आपकी भी जरूरराते हैं... मैं समझती हु...

इक़बाल - ये आपका भी कमरा है... मतलब जब तक आप यहाँ है... ये मुझसे ज्यादा आपका कमरा है...

सुप्रिया - जी.. शुक्रिया...

इक़बाल - मैडमजी... मैं सोच रहा था... आपको उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए... मुझे लगता है विक्रम सब्जी यहाँ आएंगे...

सुप्रिया इक़बाल की बात सुनकर हैरान सी थी - आप ये कह रहे है? आप भूल गए आप यहाँ गए थे तोह क्या हुआ था?

इक़बाल - मैडमजी... मुझे लगता है हमने थोड़ी जल्दी कर दी... हो सकता है अभी भी कोई उन पर नज़र रखे हो... और इसलिए उन्होंने मुझे पहचाना नहीं? मेरे लिए मन्ना मुश्किल है की वह आपको छोड़ सकते है... मैंने देखा था वह आपके लिए कुछ भी कर सकते है...

सुप्रिया की आँखें डाब दबा रही थी, इक़बाल उसे फिर से एक एक उम्मीद का ठगा क्यों थमा रहा था - और अगर आप गलत हुए तोह? मैं तोह कहीं की नहीं रही न...

इक़बाल - मैडमजी.... आप...

सुप्रिया ने कुछ सोचते हुए कहा - इक़बाल जी... मुझे आपको कुछ दिखाना था... आप एक बार कमरे की बत्ती जलाएंगे...

इतने इक़बाल ने कमरे की बत्ती जलाई.. और सुप्रिया ने अलमारी खोल कर अख़बार का वह टुकड़ा निकला. उसने वह कागज़ इक़बाल के आगे कर दिया.

सुप्रिया - ये.... मुझे मिला था... इसमें...

इक़बाल की आवाज़ थोड़ी सी काम हो गयी थी - आपके घरवाले... आपको ढून्ढ रहे है...

सुप्रिया - अतुल... मेरे पति... उन्होंने ये छपवाया है...

सुप्रिया के मुँह से ये सुनते hi इक़बाल की आँखें सुप्रिया पर गयी और फिर वापस कागज़ पर. उसने धीरे से कहा - फिर... आप क्या करना चाहती है...

सुप्रिया - मुझे समझ नहीं आ रहा... क्या करना चाहिए मुझे?

इक़बाल - आप मुझसे क्यों पूछ रही है मैडमजी... आप तोह मुझसे ज्यादा पड़ी लिखी और होशियार है...

इक़बाल की ये बात सुप्रिया को चुभती हुई सी लगी. सच में वह इतनी होशियार होती तोह शायद आज यहाँ नहीं होती.

इक़बाल ने सुप्रिया को छुप देख कहा - आप अगर फ़ोन करना का सोच रही है तोह आप कर लीजिये... आप जो भी करना चाहेंगी मैं आपका साथ दूंगा...

सुप्रिया अपने दुविधा भरे मैं से सोच नहीं पा रही थी. अतुल को कॉल करके वह यहाँ से निकल पायेगी... शायद अतुल उसे फिर से अपना ले... उसके मैं में अचानक से आशा की एक किरण सी जग गयी - अगर मैंने कॉल किया और अतुल मुझे लेने आ गए तोह... आपके घरवालों को कैसे समझायेंगे... जो कुछ भी हुआ एक पिछले एक डेड महीने से... रुबीना भाभी... हिना...

इक़बाल की आँखें कहीं खोयी हुई सी थी, उसने वह कागज़ वापस सुप्रिया को पकड़ाया - आप उनकी फिक्र मत करिये... मैं आपको सही सलामत आपके शौहर के पास पंहुचा दूंगा... और ek-do महीने में सब आपको और मुझे भूल hi जायेंगे...

सुप्रिया - आपको क्यों?

इक़बाल - मैं शायद उसके बाद घर वापस न आयु... पर आप परेशां मत हो... सब ठीक हो जायेगा... ये लीजिये मेरा फ़ोन... और कर लीजिये उनको कॉल...

सुप्रिया - हम्म्म.... अभी काफी रात हो गयी है... कल शाम को कॉल करे... आपके घर आने के बाद...

इक़बाल - जब आपकी मर्ज़ी हो...

कुछ देर बाद, इक़बाल ज़मीन पर गद्दे पर लेट गया था और सुप्रिया ऊपर बिस्तर पर. सुप्रिया के मैं में एक अजीब सी हलचल हो रही थी. वह कल की कॉल के बारे में सोच रही थी. वह क्या बोलेगी, कैसे बोलेगी, अतुल क्या कहेगा, और फिर इक़बाल अपने परिवार को क्या कहेगा. एहि सब सोचते सोचते वह सो गयी.

____________________________

अगले दिन की शाम हो चली थी, और सुप्रिया का सर बुरी तरह फट रहा था. कल रात से वह इसी पल के बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. इक़बाल बस आता hi होगा. उसने कई अलग अलग तरीको से इस कॉल पर बात करनी की तैयारी कर ली थी. पूरी रात और दिन बस एहि तोह घूम रहा था उसके दिमाग में. और जैसे जैसे वह पल पास आता जा रहा था उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

पता नहीं क्या हुआ था वहां उसके जाने के बाद... पर जरूरी ये था की अतुल उसे खोज रहा था. उसके घरवालों को पता चलेगा तोह वह कितने खुश हो जायेंगे... उन्हें उनकी खोयी हुई बेटी जो मिल जाएगी.

सुप्रिया टेंशन के मारे न कुछ और सोच पा रही थी न कर पा रही थी. वह ऊपर अपने कमरे में आ गयी और कमरे में यहाँ से वहां चल रही थी. आखिर उसे इक़बाल के घर आने की आवाज़ आ hi गयी. उसने कमरे से बहार आकर छत की मुंडेर के थोड़ा पीछे से झाँक कर देखा. इक़बाल ऊपर की और hi आ रहा था. वह जल्दी से वापस कमरे में घुस गयी.

कुछ पल बाद इक़बाल कमरे में दाखिल हुआ और अपना सामान टांगने लगा. सुप्रिया अलमारी से ुर पर्चे को निकाल रही थी.

इक़बाल ने कमरा बंद किया और अपना फ़ोन सुप्रिया की और की किया - मैडमजी... ये लीजिये...

सुप्रिया के हाथ काँप से रहे थे पर उसने किसी तरह से फ़ोन को पकड़ा. उसे अतुल का नंबर मुँह जबानी याद नहीं था, और वह अखबार में देख कर उसका नंबर फ़ोन में टाइप करने लगी. ऐसा लग रहा था जैसे फ़ोन बोहोत भारी सा हो गया हो और हर बटन पत्थर का बना हो.

इक़बाल ने सुप्रिया को टाइप करते देख कहा - मैं बहार जाता हु मैडमजी...

सुप्रिया ने तुरंत hi कहा - नहीं नहीं... आप यहीं रुको... प्लीज...

इक़बाल के कदम तुरंत hi रुक गए और सुप्रिया ने आखरी नंबर टाइप किया. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने एक पल बाद हरा बटन दबा कर फ़ोन डायल कर दिया और अपने कान पर लगा दिया.

इतने अचे मौसम में भी उसके माथे से पसीना बहना शुरू हो गया था. उसका दिल ज़ोर से हलचल रहा था. जो कुछ उसे बोलना था वह उसे भूलने सी लगी थी. फ़ोन की पहली घंटी बजी. सुप्रिया ने अपने मुँह का थूक अंदर गतका. "Hello" या "अतुल" क्या बोले वह सबसे पहले.

फ़ोन की दूसरी घंटी भी बजी... सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, और वह सुप्रिया की और hi एक तक देख रहा था. कितना अजीब hi लगेगा न अतुल को बाद में बताना की उसे ये इश्तिहार एक हलवाई की दूकान पर मिला था.

फ़ोन की तीसरी घंटी बजी... अभी तक उसने फ़ोन नहीं उठाया था. सुप्रिया इक़बाल की और देख रही थी, उसका मुँह उतरा हुआ सा था. जब वह वापिस अतुल के पास जाएगी, तोह उसे बताएगी की कैसे इस आदमी ने उसकी बोहोत मदद करि.

फ़ोन की छठ घंटी बजी... क्या वह अतुल को बता पायेगी की हालात कुछ ऐसे थे की उसे इक़बाल से झूठा निकाह करना पड़ा था. पर वह झूठा निकाह था क्या? अतुल क्या अभी भी उसका पति था? या फिर.... उफ्फ्फ... क्या सोच रही थी वह...

फ़ोन की पांचवी घंटी बजी... वह अतुल को ये सब नहीं समझा पायेगी... यहाँ तक पहुंचने की पूरी कहानी तोह बोहोत लम्बी थी... वह फ़ोन न hi उठाये तोह बेहतर है... काम से काम वह अपने आप रो कर तोह समझा लेगी की शायद किस्मत उसके साथ नहीं थी...

सुप्रिया बस आखरी घंटी बजने का इंतज़ार कर रही थी... वह दुबारा ये कोशिश नहीं करेगी... नहीं नहीं... कोई उसका यकीन नहीं करेगा... पर तभी फ़ोन उठा और दूसरी तरफ से एक आवाज़ आयी.

अतुल - Hello....

उसने फ़ोन उठा लिया था. अतुल की वही आवाज़ सुनकर सुप्रिया के शरीर में जैसे जान hi नहीं रही थी. उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी.

अतुल - Hello... कौन है...

उसे कुछ कहना चाहिए... उसे बोलना शुरू करना चाहिए...

अतुल की खीज भरी आवाज़ आयी - हेल्ल्लूऊओ... बोलो भी...

सुप्रिया कुछ कहने hi वाली थी की दूसरी तरफ से किसी लड़की की खिलखिलाती हुई सी आवाज़ आयी - हेहेहे... अभी बिलकुल इसी टाइम आना था ये कॉल... किसका है?

अतुल हस्ते हुए - ः... सॉरी... पता नहीं कौन है...

ये बेशक दिशा की hi आवाज़ थी - कोई ऐसा है जो हमें डिस्टर्ब करना चाहता है... या फिर किसी क्रेडिट कार्ड वाले का... हाहाहा...

अतुल ने हस्ते हुए फ़ोन काट दिया और सुप्रिया कुछ बोल नहीं पायी थी.

जैसे hi सुप्रिया ने फ़ोन अपने कान से नीचे किया, इक़बाल पूछ बैठा - क्या हुआ मैडमजी? कॉल नहीं लगा क्या? आप दुबारा कर लो...

सुप्रिया पलंग से सहारा लेते हुए नीचे फर्श पर बैठ गयी. उसकी पूरी एनर्जी निकल चुकी थी. इन 30 सेकंड में उसने पता नहीं नहीं क्या महसूस कर लिया था. वह दुबारा ये नहीं कर सकती थी, और करे भी क्यों?

वह गलत थी, अतुल उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था. वह शायद आगे बाद चूका था, या पहले से hi उसके और दिशा के बीच सब चल रहा था.... क्या पता वह खुश हुआ हो उसके जाने से... उसके रास्ते का काँटा जो निकल गया... ओह गॉड.... सिर्फ वही नहीं थी जिसके कुछ राज़ थे...

सुप्रिया का पूरा शरीर काँप सा रहा था.

इक़बाल भी फर्श पर उसके साथ बैठ गया - मैडमजी... क्या हुआ? फ़ोन नहीं उठाया उन्होंने? आवाज़ थी आयी थी कुछ...

सुप्रिया चीखना चाहती थी पर नहीं वह नहीं चीख सकती थी - आप थोड़ी देर नीचे जायेंगे... मैं बस थोड़ी देर अकेले बैठना चाहती हूँ...

इक़बाल - मैडमजी... मैं ऊपर पलंग पर बिठा दू...

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया, और इक़बाल ने सुप्रिया को सहारा देते हुए ऊपर पलंग पर बिठा दिया. सुप्रिया ने अपने आप को धक् लिया, एक अजीब सी ठण्ड ने उसे जकड लिया था.

इक़बाल - आप आराम कीजिये... मैं थोड़ी देर में आता हूँ... आप नीचे मत आना मैं भाभी को समझा दूंगा... और आप फिक्र मत कीजियेगा... सब ठीक हो जायेगा...

सुप्रिया ने उसे कोई जवाब नहीं दिया... पर अब बचा hi क्या था ठीक होने के लिए.

___________________________________

सुप्रिया और इक़बाल तैयार खड़े थे फुफु की भतीजी की शादी में जाने के लिए. सुप्रिया ने एक सिंपल सा काले रंग सलवार सूट पहना हुआ था, और इक़बाल ने पंत शर्ट. काले रंग के कपड़ो में सुप्रिया का गोरा रंग और भी निखार के बहार आ रहा था. पर उसकी आँखों के आस पास गड्ढे हो रहे थे, जैसे वह कई दिनों से सोई न हो.

चार दिन पहले उस रात सुप्रिया खूब रोई थी. एक बार पहले तोह वह अपने मैं को समझा hi चुकी थी, पर उस दिन शायद उसकी एक आखरी उम्मीद भी छिन्न गयी थी. इक़बाल को भी समझ नहीं आया था वह उसे कैसे दिलासा दे.

घर में अम्मी जी ने भी बड़ा कलेश किया था की नयी बहु ऊपर अपने कमरे में hi पड़ी रहती है, और काफी कामचोर भी है. पर रुबीना ने किसी तरह अम्मी जी को शांत किया और समझाया, आखिर सुप्रिया के मासिक दिन भी तोह चल रहे थे, उसे थोड़े आराम की जरूरत थी. पर उस पर तोह अम्मी जी और भी भड़क गयी थी की सुप्रिया अब तक पेट से क्यों नहीं हुई थी.

खैर रुबीना ने जितना हो सके सुप्रिया का साथ दिया और अब वह दोनों कुछ दिनों के लिए फुफु के घर जा रहे थे. इक़बाल बहार से रिक्क्षा लेने गया था. सुप्रिया चुप चाप गुमसुम सी कड़ी थी.

रुबीना उसका दुपट्टा ठीक करते हुए बोली - सुप्रिया... याद रखना वहां तुम्हारा नाम सफीना है... और थोड़ा मुस्कुराने की कोशिश करना...

सुप्रिया ने बिना किसी इमोशन के हाँ में सर हिला दिया.

रुबीना - देखो... अभी भी मुस्कुरा नहीं रही.... देखो अगर वहां ज्यादा परेशान दिखोगी न तोह औरते तुम्हे पूछ पूछ कर पागल कर देंगी... तोह मेरी मानो तोह चेहरे पर एक मुस्कान बनाये रखना... और अगर वह सच्ची हो तोह और भी अछि...

सुप्रिया - आपको क्यों लगता है झूठी होगी...

रुबीना - मैंने भी बेटियां पाली है... इतना तोह समझती हूँ... मुझे ये तोह नहीं पता तुम्हे क्या खाये जा रहा है... पर उसे जितना जल्दी अपने मैं से उतरेगी... उतना ाचा होगा... मैं चाहती हु जब तुम वापस आयो तोह ख़ुशी ख़ुशी आयो...

सुप्रिया ने इस बार हलकी सी मुस्कराहट से सर हिला दिया. इतने में इक़बाल रिक्क्षा लेकर आ गया था. रिक्षा थोड़ा ुचा था, तोह उसने सुप्रिया को हाथ का सहारा देकर ऊपर चड्ढा दिया. और फिर उनके बक्से को पीछे रखते हुए साथ आकर बैठ गया.

सुप्रिया ने रुबीना की और देख कर उन्हें bye करते हुए हाथ हिलाया. रुबीना ने भी वापस हाथ हिला दिया, उसकी आँखें थोड़ी गीली थी.

रिक्शा धीरे धीरे गाँव की उबड़ खाबड़ सड़क पर झोंके खाते हुए चल रहा था. इक़बाल ने पीछे एक हाथ से बक्सा पकड़ा हुआ था.... ृक्षो उन्हें मैं सड़क तक छोड़ने वाला था, और वहां से वह लोग बस पकड़ पर मोरादाबाद के पास के एक गाँव जा रहे थे. इक़बाल और सुप्रिया एक डैम सटे हुए बैठे थे, इक़बाल का पाँव सुप्रिया के पाँव को छू रहा था. पर सुप्रिया को जैसे सब कुछ महसूस होना hi बंद हो गया था.

रिक्शा कुछ ज्यादा hi हिल रहा था, सुप्रिया के एक हाथ से रिक्शा का साइड पकड़ लिया, और दूसरा हाथ पीछे बक्से की तरफ रख दिया. उसकी और इक़बाल की उंगलियां एक दुसरे को छूने लगी, सुप्रिया ने अपनी उंगलियां हलकी से पीछे कर ली.

कुछ देर बाद वह झटके खाते हुए बड़ी सड़क पर पहुंच गए थे और बस का इंतज़ार करने लगे. बस आते hi इक़बाल ने पहले सुप्रिया को ऊपर छदया और सामान ऊपर बस की छत पर रखवा कर अंदर आ गया. सुप्रिया बस में आगे hi किसी औरत के साथ बैठी थी, और उसे सीट थोड़ा पीछे मिली. पूरे रास्ते वह अपनी मैडमजी पर hi नज़रें गड़ाए बैठा था. पर सुप्रिया ने एक बार भी उसे पलट कर नहीं देखा.

बस का रास्ता बस एक घंटे का hi था, और इक़बाल को याद था की उनको बीच में कहाँ बस को रुकवाना था. इक़बाल ने खड़े होकर बस कंडक्टर को इशारा किया, और सुप्रिया के पास आकर खड़ा हो गया.

इक़बाल ने नीचे झुक कर धीमी आवाज़ में कहा - हमें बस यहीं उतरना है...

इक़बाल ने कंडक्टर की और देखा जो सुप्रिया को घूर रहा था. उसे ये देख कर गुस्सा आ रहा था, पर वह लोग अब बस उतरने hi वाले थे. बस रुकते hi इक़बाल ने पहले सुप्रिया को नीचे उतरा और फिर ऊपर से अपना सामान. और वह दोनों वहां पास खड़े एक इलेक्ट्रिक रिक्क्षा में बैठ कर फुफु के घर की और चल दिए.

सुप्रिया देख रही थी की यह गाँव इक़बाल के गाँव से थोड़ा बड़ा था, ज्यादा बड़े और पक्के घर, सड़के भी थोड़ा बेहतर, और यहाँ एक इलेक्ट्रिक रिक्क्षा भी था. सुप्रिया ने देखा की जहाँ से भी निकलते लोग उन्हें hi घूर रहे थे. उसने अपना सर दुपट्टे से अचे से धक् लिया और नीचे की और मुँह कर लिया. उसे थोड़ी बोहोत घबराहट होनी शुरू हो गयी थी, पर जितना डर और गब्रहत उसने चार दिन पहले झेली थी, उसके आगे ये कुछ नहीं थी.

रिक्क्षा एक घर के आगे रुका और वह दोनों वहीँ उतर गए. पता चल रहा था की ये शादी का घर है. वहां थोड़ी भीड़ सी थी, और घर भी अछि तरह से सजा हुआ था. लोग घर के अंदर बहार जा रहे थे.

इक़बाल सामान लिए घर में घुस गया और सुप्रिया उसके पीछे पीछे. यहाँ भी नीचे एक बड़ा सा खुला आँगन था जहाँ एक जगह हलवाई काम करे थे और दूसरी जगह कुछ औरतो का जमावड़ा था. सुप्रिया अपना मुँह नीचे करके hi चल रही थी पर उसे आगे का थोड़ा बोहोत दिख रहा था. उसे वहां सामने फुफु बैठी हुई दिख गयी थी.

इक़बाल ने उसके पास पहुंचते हुए - आदाब आप...

फुफु उन्हें देखते hi कड़ी हुई - इक़बाल... ारी आ गया तू... कैसे आये यहाँ तक... मुझे फ़ोन कर देता... मैं किसी को भेज देती... हमारी गुड़िया रानी को पैदल चलते तोह नहीं लाया न...

फुफु कड़ी हो कर सुप्रिया के पास पहुंच गयी थी और इससे पहले की सुप्रिया उन्हें आदाब करती, उन्होंने उसके माथे पर हलके से चूम लिया - सुबान,.'... देखो देखो... मेरा चाँद का टुकड़ा आ गया...

फुफु ने सुप्रिया को वहां एक खाट पर बिठाया और वहीँ अपने रिश्तेदारों को बुला कर सुप्रिया या उनके लिए सफीना से मिलवाने लगी. सुप्रिया सबको आदाब करते हुए हलके से मुस्कुरायी. उन्हें इस तरह देख कर सुप्रिया को यकीं hi नहीं हो रहा था की ये वही फुफु थी जो उसकी शादी पर इतनी तीखी बातें कर रही थी.

कुछ लोग सुप्रिया को मुँह दिखाई के नाम के पैसे दे रहे थे. और फुफु इतनी खुश नज़र आ रही थी. इस बीच इक़बाल सुप्रिया को वहां छोड़ कर अपना सामान रखने चला गया था.

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फुफु - सूफिना बीटा... तुम कुछ भी चाहिए हो तोह मुझसे कहना...

सुप्रिया - जी फुफु...

फुफु - अभी कुछ देर बैठ कर बात करो... फिर मैं तुम्हे भी कुछ कामो में लगयूंगी... नहीं तोह तुम सीखेगी कैसे...

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया और फिर से उनके घर में आये लोगो से धीरे धीरे बात करने लगी. घर की छोटी लडकियां तोह सुप्रिया की सुंदरता देख कर उसके आस पास hi मंडरा रही थी. और घर के लड़के और आदमी भी दूर से सुप्रिया को ताड़ रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे सुप्रिया के आने से उनके घर की रौनक और भी बाद गयी हो. घर की कुछ औरते सुप्रिया को देख कर मुँह बना रही थी.

लोगो ने मेल जॉल के बाद फुफु सुप्रिया को अपने कमरे में ले आयी. उनकी शकल पर एक बड़ी सी मुस्कान थी.

फुफु - बोहोत बढ़िया… बोहोत hi अचे से बात की तूने तोह…

सुप्रिया - जी… शुक्रिया फुफु…

फुफु - देखा तूने कैसे जल भूल के राख हो रही थी मेरी जेठानी और ननद… मजा आ गया… उन्हें लगा नहीं था मेरे घर में इतनी सुन्दर बहु आयी होगी…

ओह्ह.. तोह ये कारन था इनकी ख़ुशी का, अब समझ में आया सुप्रिया को.

फुफु थोड़ी सी कठोर आवाज़ में बोली - सुन लड़की… कुछ ऐसा मत करिया यहाँ जिससे मेरी बेइज़्ज़ती हो… अम्मी ने सब बता दिया है मुझे… और यहाँ रुबीना भी नहीं है तेरी तरफदारी करने के लिए…

ये थी न असली फुफु, सुप्रिया ने हलके से बोलै - जी फुफु…

फुफु - चल अब आजा… यहाँ क्यों बैठी है…

सुप्रिया तुरंत hi कड़ी होकर उनके पीछे पीछे चल ली. जिस लड़की की शादी हो रही थी फुफु उसे उसके पास ले गयी थी. लड़की उनकी जेठानी की छोटी बेटी थी, और वह देखने में मुश्किल से 18 साल की लग रही थी, हिना से भी छोटी. उसे देख कर तोह ऐसा लग रहा था की अभी उसमे काफी बचपना हो.

सुप्रिया को वहां और औरतो ने घेर लिया था.

जेठानी - शब्बो ये रुबीना की बेहेन है?

फुफु - जी… रुबीना की दूर की बेहेन है… रुबीना भाभी का भला हो इसकी शादी अपने hi देवर से करा दी…

जेठानी - पर पहले कभी इसके बारे में सुना तोह नहीं था… और ये देखने में भी… थोड़ी शहरी सी लगती है…

फुफु - हाँ… इसकी पड़े शहर में हुई न… इसलिए… अछि पड़ी लिखी है… अंग्रेजी भी बोल लेती है…

जेठानी हाथ नचा के - ह्म्मम्फह… क्या फायदा पद लिख कर… शादी तोह अपने ने इतने बड़े मरद से hi करनी पड़ी न… कुछ तोह खोट होगा इसमें… नहीं तोह कौन अपनी बेहेन की शादी इतने बड़े आदमी से करवा देता ऐसे…

दूसरी औरत - हाँ तोह ये कौनसा कच्ची काली लगे… काम से काम 23 की तोह होगी… और चांट भी बड़ी लग रही है…

फुफु - नहीं नहीं… बोहोत सीढ़ी है… और दोनों बहनो में बड़ा प्यार है… रुबीना इससे अलग न रह सके…

जेठानी - देखेंगे वह तोह… रुबीना ने कुछ सिखाया भी है या नहीं… रोटी बनानी आती है…

सुप्रिया ने धीरे से कहा - जी… आती है…

जेठानी - जा फिर… बाकी बहूयू के साथ मिल कर रोटी बना दे…

फुफु ने सुप्रिया को खड़े होने का इशारा किया और वह तुरंत hi बहार खुली जगह पर जहाँ रसोई का काम चल रहा था वहां चली गयी.

वहां पर औरतो ने उसे रोटी सेकने के काम पर लगा दिया. चूलह काफी गरम था और सुप्रिया को काफी गर्मी लग रही थी. ऐसा लग रहा था की जैसे उन औरतो ने उसके गोर रंग से चिढ़ कर उसे ये काम दिया हो. जबसे वह यहाँ आयी थी उसे इक़बाल तोह कहीं दिखाई भी नहीं दिया था.

सुप्रिया वहीँ ज़मीन पर नंगे पाँव बैठी काम में लगी हुई थी, पर उसे इतने काम की आदत नहीं थी.

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औरत - जल्दी जल्दी सेक ज़रा… हाथ धीरे चले तेरा…

दूसरी औरत - अभी नयी नयी शादी हुई है इसकी… लौड़ा सँभालने से फुर्सत मिले तोह चला चौका करेगी न… थक जाती होगी बेचारी…

औरते हसने लगी. सुप्रिया चुप चाप रोटी सेक रही थी.

औरत - गोरा रंग होने पर इतना क्या घमंड करना… जितनी ऊपर गोरी है… उतनी hi नीचे काली हो गयी होगी…

दूसरी औरत - नीचे तोह सबका hi काला पद जाता है… काळा घोड़े पर दौड़ते दौड़ते उसकी कालिख लग hi जाती hi…

उन औरतो की गन्दी बातें ख़तम hi नहीं हो रही थी. उन्हें हस्ता देख फुफु ने दूर से हाँक मारी - ोोू करमजलियो… मुँह काम और हाथ ज्यादा चलायो…

पर वह औरते कहाँ चुप होने वाली थी. सुप्रिया शाम के लिए रोटी सकते सकते थकने लगी थी. इससे ाचा तोह वह इक़बाल के घर पर थी, रुबीना तोह उससे नाम भर का काम कराती थी.

रात होते होते सुप्रिया बुरी तरह थक गयी थी. वैसे तोह घर काफी बड़ा था और काफी कमरे थे, पर औरते एक कमरे में सो रही थी और आदमी एक कमरे में. सुप्रिया को इक़बाल दूर से एक कमरे में जाते दिखा था.

सुप्रिया तोह फुफु के बराबर में बैठी उनके पेअर दबा रही थी. पूरे दिन बिजी रहने से उसके पास कुछ और सोचने का टाइम hi नहीं था, पर अब फिर वही सब ख्याल उसके मैं में आने लगे थे.

फुफु - आज तोह तूने बोहोत hi अचे से सारा काम किया… रुबीना ने तुझे सही से सीखा के भेजा है… सुन.. कल एक बीजी आएँगी… तुझे मैं उनसे दुआ दिलवायुंगी… समझी..

सुप्रिया अपने खयालो में खोयी थी - क्या फुफु….

फुफु - कुछ नहीं… चल तोह सो जा अब… थक गयी होगी…

सुप्रिया जमीन पर बिछे गद्दे पर लेट गयी. उसका बदन आज के काम से काफी दर्द कर रहा था, और उसे जल्दी hi नींद आ गयी.

सुबह सभी लोग जल्दी जग गए थे और नाहा धो कर तैयार हो गए थे. शादी में एक दिन और था पर आज भी काफी काम था. सुबह से hi सुप्रिया नाश्ते के काम में लग गयी थी.

रुबीना ने पहले hi फुफु से बात कर्ली थी डॉक्टर ने सफीना को मीट मॉस खाने से मन किया है. रुबीना ने कहानी बनाते हुए उन्हें बताया था की मीट मॉस खाने से उसके पेट में काफी दर्द हो जाता है और उसे बच्चा होने में दिक्कत हो सकती है. फुफु को पूरी तरह यकीन तोह नहीं हुआ पर फिर रुबीना ने एहि बात अम्मी जी से भी बुलवा दी थी.

सुप्रिया फिर से काम में में लग गयी थी. आज तोह वह कल से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी. सुप्रिया देख रही थी की काफी मर्दो की नज़रे छोरी छुपे उसे hi देख रही थी. बूढ़े मर्द, अधेड़ मर्द, जवान मर्द और नौजवान लड़के, सब उसके दीदार पाने को बेताब थे.

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पहली औरत - देख कैसे बेहया लड़की है... बेशर्मो की तरह टेंगे फैला के बैठी है... दुपट्टा भी दाल रखा...

दूसरी औरत - मैंने तोह सुना है ये अपने शौहर के लिए भी टाँगे नहीं खोलती... मड़ई मगरूर लगती है...

पहली औरत - ाचा... तभी सबकी लार टपक रही है इस पर... सूंघ लेते है ये लोग कुंवारी छूट को..

तीसरी औरत - ऐसा करो... इसे आज रात मर्दो के कमरे में सुला दो... सारे छेड़ अचे से खुल जायेंगे...

दूसरी औरत हस्ते हुए - मेरे वाला तोह रात को पूछ रहा था इसके बारे में… कौन है... कहाँ से है… वह तोह खुश हो जायेगा...

पहली औरत - संभल के रखियो उसे… कहीं इसके पीछे पीछे वहीँ न चला जाये… ऐसा क्या इसमें.. जो हम में नहीं है… थोड़ी सी जवान है… बस…

वह लोग सुप्रिया के बारे में बातें करते रहे और सुप्रिया चुप चाप सुनती रही. उसे समझ hi नहीं आ रहा था वह इन लोगो को क्या जवाब दे. और थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था की इन औरतो को उसके और इक़बाल के बीच जो हो रहा था उसके बारे में कैसे पता था? क्या इक़बाल ने किसी से कुछ कहा था?

दिन होते होते काम थोड़ा काम हो गया था और सुप्रिया अलग बैठी हुई थी. घर के बाकी रस्मो रिवाज़ चल रहे थे. तभी उसके पीछे से उसके कंधे पर फुफु का हाथ पड़ा.

फुफु - सफीना… एहि है बीजी जिनके बारे में कल रात बात कर रही थी…

सुप्रिया कड़ी हो कर पीछे मुड़ी और उस दूसरी औरत को देख कर उसकी आँखें फटी को फटी रह गयी. ये तोह वही बूढ़ी औरत थी जो उसे लखनऊ में 2-3 टकराई थी. दो बार मस्जिद के बहार, एक बार मॉल में… उफ्फ्फ ये कहाँ से आ गयी यहाँ!

अम्मा भी उसे देख कर चौंक गयी - ये लड़की!

फुफु ने हलके से सुप्रिया के सर पर हाथ फेरा - हाँ बीजी... एहि तोह है हमारी प्यारी सी दुल्हन...

बीजी के चेहरे पर परेशानी साफ़ थी - पर ये... ये कैसे? ये तोह....

फुफु - क्या हुआ? आप जानती है इसे?

बीजी - हाँ... जानती हु... अचे से जानती हु इसे तोह... लखनऊ की बड़ी दरगाह में... और भी जगह... इसकी तोह पहले से...

फुफु को परेशान होता देख, सुप्रिया बीच में बोल पड़ी - बीजी... आपको शायद कोई गलत फेहमी हुई है... मैं तोह कभी लखनऊ गयी hi नहीं...

बीजी - दिमाग तोह तेरा खराब था हमेशा से... और तू मुझे बोल रही है की मुझे ग़लतफहमी है... कहाँ है तेरा शौहर? और कौनसे वाला?

उनकी आवाज़ ुचि होने से आस पास के लोग उसकी और देखने लगे थे, की क्या तमाशा हो रहा है. फुफु को तोह अपनी इज़्ज़त बनाये रखनी थी - बीजी... आप मेरे साथ चलो... मेरे कमरे में आराम करते हैं...

बीजी बड़बड़ा सी रही थी - क्या बैठु... इसकी बात कर रही थी तुम??

सुप्रिया ने फुफु की तरफ देख कर अपने कंधे उचकाए, जैसे उसे पता hi नहीं हो की अम्मा क्या बात कर रही थी. फुफु अम्मा को लेकर अपने कमरे में चली गयी और सुप्रिया वहां परेशान कड़ी रह गयी थी. कहीं अब उसका और इक़बाल का झूठ सबके सामने तोह नहीं आने वाला था.

कुछ देर बाद, फुफु बीजी को लेकर वापस बहार आ गयी थी. पर वह अब भी काफी परेशान दिख रही थी. बीजी एक टेडी आँख से सुप्रिया की और hi देख रही थी.

फुफु सुप्रिया के पास आकर धीरे से बोली - पता नहीं क्या हो गया है बीजी के दिमाग को... वह कह रही है की उन्होंने तुम्हे वहां लखनऊ में कई मर्दो के साथ देखा था...

सुप्रिया ने अपने गले पर हाथ रखते हुए कहा - सच फुफु... मैं कहाँ से लखनऊ जयुंगी...

फुफु ने उसका हाथ नीचे झटकते हुए कहा - हाँ हाँ... वह सब मुझे पता है... उनकी उम्र हो गयी है थोड़ी... दिमाग भी सठिया सा गया है... बस अभी तोह किसी तरह से मैंने उन्हें चुप कराया है... ये सब बातें और लोग सुनेंगे तोह मेरी बोहोत बदनामी हो जाएगी... बस तुम जानो और रुबीना... मेरा कुछ वास्ता नहीं है इस सब से...

सुप्रिया - जी फुफु...

फुफु - अब सुनो मेरी बात... जैसे वह कहे... उनकी बात मानती जाना... ठीक है न...

सुप्रिया ने फिर से सर हिला कर कहा - जी फुफु...

फुफु सुप्रिया को बीजी के पास ले आयी और वह उनके पास hi बैठ गयी. कुछ देर में औरतो की मेहँदी की रसम शुरू हो गयी थी. घर के सारे मर्दो को वहां से जाने के लिए बोल दिया था, ताकि औरते आराम से बैठ कर मेहँदी लगवा पाए और थोड़ा नाच गाना भी कर ले.

सुप्रिया चुप चाप बैठ सब होता देख रही थी. कुछ औरतो ने गांव पर नाचना शुरू कर दिया था.

तभी बीजी ने सुप्रिया के कंधे पर ऊँगली करते हुए बोलै - जा तू भी नाच ले थोड़ा...

सुप्रिया ने धीमी आवाज़ में कहा - नहीं बीजी... मुझे नहीं आता...

बीजी - कमर hi तोह हिलनी है... हिला ले थोड़ी सी... जा...

बीजी ने सुप्रिया को धकेलते हुए खड़ा कर दिया. और सुप्रिया दो तीन लड़कियों के साथ हलके हलके ताली बजाते हुए हिलने लगी, पर उसे नाच तोह बिलकुल नहीं करेंगे.

पीछे से बीजी ने आवाज़ लगायी - अभी तोह जवान है... अचे से मटक... क्यों बूड़ियों की तरह हिल रही है...

सुप्रिया ने अपने हाथ ऊपर हवा में किये और थोड़ा सा और हिलने लगी. औरतो की आवाज़ उसके कानो में पद रही थी की इससे न हो पायेगा. ये सुन कर जैसे वह थोड़ी सी और जोश में आ गयी, और वह अपनी गांड और कूल्हे अचे से मटकने लगी.

अब तोह जैसे वह अपने डांस में खो hi गयी थी और उसका पूरा बदन थिरक सा रहा था. उसकी छाती और मम्मी आगे पीछे हो रहे थे, और उसकी आँखों में एक चमक सी आ गयी थी. उसके शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी, और वह अपने पूरे जिस्म के आगे हाथ मंडराते हुए बेधड़क हो कर नाच रही थी.

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जो औरते हु कल से उसके पीछे पड़ी थी, वह तोह और भी जल भून के राख हो गयी थी. पर बाकी औरतो को उसका नाच बड़ा hi ाचा लग रहा था और कुछ लडकियां सीटियां और ताली भी बजा रही थी.

जिस तरह से सुप्रिया अपनी पतली कमर, गांड और मम्मो को हिला रही थी, सब बस देखते hi रह गए थे. नाचते नाचते सुप्रिया की आँखें ऊपर छत की तरफ गयी और उसने देखा की पूरी मुंडेर मर्दो से भरी हुई थी थी और सब उसकी और घूर रहे थे. उसी भीड़ में उसकी निगाहें इक़बाल पर जाकर रुकी और सुप्रिया ने तुरंत hi नाचना बंद कर दिया.

उसने शर्म के मारे अपना मुँह अपने हाथों से धक् लिया और शर्माती हुई वापस जाकर खाट पर बीजी के साथ बैठ गयी. उसकी नज़र फुफु के चेहरे पर गयी और वह भी थोड़ा गुस्से में लाल हो रखा था.

पर तभी बीजी बोली - वहहह... मज़ा आ गया... पूरी शायद में रौनक लगा दी इस लड़की ने तोह... इसकी जवानी देख कर तोह मुझे अपने दिन याद आ गए...

फुफु का चेहरा ये सुन कर थोड़ा सा नार्मल हुआ और बाकी औरते भी है कर सुप्रिया की तारीफ करने लगी.

फुफु - हाँ हाँ... एहि तोह उम्र है ये सब नाच गाने की... और कौनसा फिर बुढ़ापे में जाकर करेगी...

नाच गाना चलता रहा, और सुप्रिया ने ऊपर की और देखा तोह भीड़ थोड़ी काम हो गयी थी, शायद अब वह जो नहीं नाच रही थी. इक़बाल अभी भी वहीँ खड़ा सुप्रिया की और देख रहा था. पर जैसी hi उसकी आँखें सुप्रिया से मिली वह जल्दी से पीछे की और हो गया.

शाम तक सुप्रिया के मेहडंई भी लग गयी थी और अब तोह बीजी की वजह से उसे किसी काम में लगने को नहीं बोलै जा रहा था. बीजी उसे अपने साथ बिठाये हुए थी.

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जैसे hi अँधेरा हुआ, फुफु बीजी को अपने कमरे की और लेकर गयी, और सुप्रिया को अभी अपने साथ आने के लिए कहा.

कमरे में पहुंचते hi बीजी बोली - लड़की... जैसी भी है... तू है बड़ी चटपटी... तेरे शौहर को तुझे चखने में बड़ा मज़ा आता होगा...

सुप्रिया शरमाते हुए नीचे की और देखने लगी.

फुफु - बीजी... पर चख hi तोह नहीं पा रहा वह... मैंने बताया तोह था आपको...

बीजी - ाचा... हाँ... तूने बोलै तोह था... इसी की बात की थी क्या?

फूफा - हाँ इसीलिए तोह आपको यहाँ ख़ास बुलाया है...

सुप्रिया को समझ नहीं आ रहा था वह किस बारे में बात कर रहे है, और बीजी को ख़ास क्यों बुलाया है.

बीजी ने सुप्रिया को कड़क आवाज़ में बोलै - ए लड़की... क्या दिक्कत है... खुल के बोल ज़रा...

सुप्रिया अनजान बनते हुए बोली - कैसी दिक्कत?

बीजी - शादी को अभी दो महीने भी नहीं हुए... अभी तोह रोज़ रात को खूब छद्दम चुदाई चलनी चाहिए... पर मैंने तोह सुना है तेरा बिस्तर hi सूखा पड़ा रहता है...

सुप्रिया उसकी बात सुनकर बुरी तरह झेप गयी, उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या बोले - बीजी वह....

बीजी - खुल के बोल ज़रा... तेरा आदमी तरसे बड़ी उम्र का है न... उसको दिक्कत है? खड़ा नहीं होता उसका?

सुप्रिया ने एकदम न में सर हिलाया - नहीं... नहीं...

बीजी - तोह फिर... तुझे पसंद नहीं करता? पर तुझे क्यों पसंद नहीं करेगा... तू तोह मलाई की तरह मुलायम है...

सुप्रिया कुछ सोच नहीं पा रही थी - जी... वह... बस... नहीं हो प् रहा...

बीजी - हम्म्म... तेरे खसम की तोह पहले भी शादी हुई थी मैंने सुना है... उससे नहीं हो रहा?

फुफु बीच में बोली - हो सकता है ये मन करती हो...

बीजी भड़कते हुए बोली - ारी इसके मन करने से क्या... इसका शौहर है... नंगा करके दाल दे अंदर...

सुप्रिया ये सुनते hi काँप सी उठी, जैसे ये लोग उसके सपने में जो हुआ था उसके बारे में बात कर रही हो.

बीजी - इतना सर पर नहीं चढ़ाना चाहिए औरत को... खैर... मैं आ गयी हु न...

फुफु - जी बीजी... आपकी hi दुआ लगेगी अब इनको...

बीजी - ठीक है... एक कमरे मिल जायेगा इन दोनों के लिए?

फुफु - जी बिलकुल...

बीजी - ठीक है... एक चारपाई दैवयो वहां... और बुलायो इसके शौहर हो...

फुफु कमरे से बहार की और निकली और सुप्रिया जल्दी से उनके पीछे बहार आ गयी और फुफु को रोका.

सुप्रिया - फुफु... ये क्या बोल रही है...

फुफु ने उसके चेहरे पर हाथ फेरा - ारी.. तू क्यों इतना परेशान हो रही है... सब ठीक करा देंगी बीजी...

सुप्रिया - पर क्या ठीक कराएंगी...

फुफु - रुबीना ने मुझे सब बता दिया था... तेरे और इक़बाल के बीच जो नहीं हो रहा... वही सब तोह करवाना है...

सुप्रिया की चिंता बढ़ती जा रही और वह उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था - वह तोह मेरे और इक़बाल जी की बीच की बात है... उसमे ये या आप क्या करेंगी...

फुफु थोड़ा गुस्सा हुई - सुन लड़की... अपनी कैंची जैसी जबान ज़रा अंदर hi रख... बीजी को बड़ा तज़ुर्बा है इस सब मामलो में... कई जोड़ो की दिक्कत दूर की है उन्होंने... एक बार की बात है बस... फिर तोह सब हो जाना है...

फुफु जल्दी से वहां से चली गयी और सुप्रिया परेशान कड़ी रह गयी थी. जाने क्या होने वाला था आगे.

कुछ देर बाद फुफु वापस आ गयी, उनके चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी. पर पिछले 15 मिनट से सुप्रिया वहीँ बहार परेशान कड़ी थी, और आगे का सोच सोच कर उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी.

फुफु - यहाँ क्यों कड़ी है... चल... आजा अंदर...

वह दोनों वापस कमरे में गए जहाँ बीजी बिस्तर पर लेती थी. अंदर जाते hi फुफु बोली - बीजी... हो गया कमरे का इंतज़ाम... बिलकुल अलग कोने का कमरा है...

बीजी - बढ़िया... और एक hi चारपाई डलवाई है न वहां...

फुफु - जी...

बीजी ने सुप्रिया की और देखा - तू क्यों परेशान कड़ी है... आ इधर बैठ...

फुफु ने सुप्रिया को हल्का सा धक्का दिया और सुप्रिया जाकर बीजी के पास बैठ गयी.

बीजी - सुन मेरी बात... घबराने की कोई बात नहीं है... कई बार बस थोड़ी मदद चाहिए होती है... मैं बस कमरे में तुम्हे हौसला देने के लिए हूँगी... समझी... ताकि तेरा डर दूर हो जाये...

सुप्रिया की आँखें डर के मारे और भी फ़ैल गयी - आप कमरे में होंगी?

बीजी - और क्या? तभी तोह होगा ये सब...

सुप्रिया जल्दी से बोली - नहीं नहीं... उसके बिना भी हो जायेगा... आपके सामने कैसे?

बीजी - ारी तोह मेरे होने से क्या हुआ... मेरी तोह उम्र हो चली है... मैं कौन सा कुछ करुँगी...

सुप्रिया गिड़गिड़ाते हुए बोली - आप समझिये न... आपके सामने हम कैसे अपने कपडे उतार कर ये सब करेंगे...

बीजी - तोह ठीक है मेरे बिना कर लो...

सुप्रिया को थोड़ी रहत मिली - जी.. हाँ... वह घर वापस जाते hi सब कर लेंगे...

बीजी - समझ बेवक़ूफ़ लड़की... ये सब नहीं करेगी तोह तेरा शौहर बहार मुँह मरेगा... इतनी जवान खूबसूरत होने का फायदा hi क्या जब ये सब नहीं किया...

सुप्रिया थोड़ी चिड़चिड़ी सी हो रही थी - पर मैं कह रही हूँ न, हम करेंगे...

बीजी ने अपने हाथ मटकाये - ठीक है... तुम लोग करना और मैं बहार बैठूंगी आज रात... और नहीं कर पाए तोह मैं अंदर आकर आज सब करवा के hi रहूंगी...

सुप्रिया के चेहरे पर घबराहट और टेंशन साफ़ झलक रही थी, पर बीजी शायद तस से मास नहीं होने वाली थी. कुछ देर बाद फुफु उन दोनों को ऊपर के माले पर एक कोने के कमरे की तरफ ले गयी. रास्ते में सुप्रिया को ऐसे लग रहा था की साड़ी निगाहें जैसे उस पर hi हो.

जैसे hi वह कमरे के पास पहुंचे, सुप्रिया को वहीँ बहार इक़बाल खड़ा दिखाई दिया. उसको भी शायद समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा था.

बीजी ने पास आते बोलै - ये है इसका शौहर... इसको भी शायद कहीं तोह देखा है... हम्म्म... देखने में तोह हत्ता कट्टा लग रहा है...

फुफु - जी बीजी... अभी तोह सारे पुर्जे बढ़िया है इसके...

बीजी - चल भाई... ले जा अपनी बीवी को अंदर और आज कर ले सब कुछ... जो कुछ है तेरे मैं में...

इक़बाल ने सुप्रिया की और देखा, उसे उसकी आँखों में घबराहट साफ़ दिख रही थी. बीजी ने सुप्रिया की कलाई पकड़ते हुए उसे इक़बाल की और धकेल दिया.

बीजी - और सुनो... जल्द hi मुझे सुनाई नहीं दिया कुछ तोह मैं दरवाज़ा तोड़ कर अंदर आ जयुंगी...

बीजी ने दोनों को कमरे के अंदर धकेला और सुप्रिया लड़खड़ाते हुए कमरे में अंदर हो गयी. इक़बाल भी उसे छूटा हुआ अंदर आ गया.

बीजी ने बहार से कमरे की कुण्डी लगते हुए आवाज़ - शुरू हो जायो जल्दी से...

सुप्रिया ने कमरे के अंदर देखा. कमरे में बस एक hi इंसान के सोने लायक चारपाई थी. बीजी ने आज पूरे इंतज़ाम से उसे इस कमरे में भेजा था. सुप्रिया ने पलट कर इक़बाल की और देखा, जैसे उससे पूछ रही हो अब क्या करे.

इक़बाल बोलने को हुआ - मैडम..

सुप्रिया ने तुरंत hi उसे चुप होने का इशारा किया और दरवाज़े से थोड़ा दूर खेचा - इक़बाल जी... वह बहार सुन लेगी... थोड़ा आहिस्ता बोलिये...

इक़बाल - जी... अब क्या करेंगे हम...

सुप्रिया - मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा...

इक़बाल - आप कहे तोह मैं बहार जाकर उनसे बात करू?

सुप्रिया - नहीं नहीं... वह आपकी नहीं सुनने वाले... आप पहले धीरे से कमरे की कुण्डी लगा दीजिये... मैं कुछ सोचती हूँ...

इक़बाल ने दरवाज़े के पास जाकर कुण्डी को हल्का सा सरका कर कमरा बंद कर दिया. सुप्रिया अपने गाल पर हाथ रख कर सोच रही थी, वह बेहद hi खूबसूरत लग रही थी इस वक़्त. पर इक़बाल ये सब नहीं सोच सकता था, मैडमजी बस उसके लिए एक अमानत की तरह थी.

सुप्रिया ने सोचते हुए धीरे से कहाँ - उन्हें आवाज़े सुन्नी है न... तोह थोड़ी आवाज़ें निकाल लेते है?

इक़बाल - मैं कुछ समझा नहीं...

सुप्रिया ने खीजते हुए कहा - ओफ्फो... आप कुछ समझते भी है... उन्होंने हमें अंदर क्यों भेजा है?

इक़बाल - जी वह....

बहार से आवाज़ है - ये खुसर फुसर क्या कर रहे हो... 5 मिनट का वक़्त देती हूँ... कपडे उतारो और शुरू हो जायो... लाहौल... क्या क्या करना पड़ता है मुझे...

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा - अब तोह समझ hi गए होंगे आप...

इक़बाल ने झिझकते हुए कहा - जी...

सुप्रिया ने अपना गाला हलके से साफ़ किया और अपने मुँह से आवाज़ निकाली - अह्ह्ह... मममम...

वह आवाज़ इतनी सच नहीं लग रही थी, पर इक़बाल सुप्रिया की और देखने लगा. ये आवाज़ hi उसका बुरा हाल करने के लिए काफी थी.

सुप्रिया ने अपनी आवाज़ को कामुक बनाते हुए फिर से आवाज़ निकाली - अह्ह्ह... मममम....

इक़बाल तोह अभी से अपनी पंत में हरकत होती हुई महसूस कर रहा था.

सुप्रिया ने इक़बाल को इशारा किया की वह भी आवाज़ निकले.

इक़बाल ने कोशिश करि - अह्ह्ह्ह....

पर वह तोह और भी बेकार थी. बहार से आवाज़ आयी - नाटक मत करना... मुझे सब पता चल जायेगा...

सुप्रिया ने अपना सर गुस्से में पकड़ लिया, क्या करे वह इस औरत का, और इक़बाल की सच्ची आवाज़ निकलवाना तोह बोहोत hi मुश्किल होने वाला था. उफ्फ्फ... वह खामखा hi घबरा रही थी इतने दिनों से, इक़बाल उसके साथ कुछ नहीं करने वाला था.

वह कुछ सोचते हुए इक़बाल की तरफ आयी और धीरे से फुसफुसाई - इक़बाल जी... आप मेरे हाथ को कास के दबाइये...

इक़बाल - जी मैडमजी...

सुप्रिया - करिये न...

सुप्रिया ने इक़बाल का हाथ पकड़ते हुए अपने कंधे से थोड़ा नीचे बढ़ाया, और अपने हाथ पर रख दिया. सुप्रिया का मुलायम सा जिस्म छूटे hi इक़बाल तोह पागल सा हो रहा था. उसने अपनी ऊँगली ऊँगली वहां हलके से फेरी.

इक़बाल - मममम....

सुप्रिया को ये आवाज़ थोड़ी सच्ची सी लगी, उसने इक़बाल को इशारा किया हाथ को दबाने के लिए.

इक़बाल ने हलके हाथ से सुप्रिया की ब्याह को दबाया, पर उससे सुप्रिया को कुछ नहीं हो रहा था.

सुप्रिया - और ज़ोर से....

इक़बाल ने सुप्रिया की और देखते हुए अपनी पकड़ थोड़ी और मज़बूत करि. सुप्रिया ने अपना दूसरा हाथ उसके हाथ पर रखते हुए और ज़ोर के दबाने का इशारा किया.

इस बार इक़बाल ने अपना थोड़ा सा आप खोते हुए सुप्रिया का हाथ कास के दबा दिया, सुप्रिया की हलकी सी चीख निकल गयी - अह्ह्ह्ह..... उफ्फ्फ.... आईईईई....

इक़बाल ने सुप्रिया का दर्द भरा चेहरा देखा और अपनी पकड़ ढीली करि, पर सुप्रिया ने अपने हाथ से फिर से दबाने का इशारा किया. इक़बाल ने एक बार फिर ज़ोर से दबाया, इस बार पहली बार से भी ज्यादा, उसकी काली खुरदुरी सी उंगलियां सुप्रिया के गोर जिस्म को अचे से अपनी पकड़ में ले रही थी.

सुप्रिया ने थोड़ा दर्द में थोड़ा नाटक में आवाज़ की - ुह्ह्हह्ह.... ायियीईइ.... नहीं नहीं.... अह्ह्ह्हह....

बहार से आवाज़ आयी - हाँ.... अब गया है लगता है अंदर... रुकना नहीं...

सुप्रिया ने इक़बाल का दूसरा हाथ पकड़ते हुए अपने दूसरी ब्याह पर रख दिया. इक़बाल के एक साथ सुप्रिया के दोनों गोर मसीली बाहों को दबाया. उसके चिकने जिस्म को छूने से hi उसे बोहोत मज़ा आ रहा था.

सुप्रिया फिर से चीखी - उम्म्म्म.... आअह्ह्ह्ह.. अह्ह्ह ... अहह..

दोनों एक दुसरे के बेहद पास खड़े थे, ऑलमोस्ट एक दुसरे से हुग करते हुए. इक़बाल की नज़र सुप्रिया की छाती की गोलियां पर थी, काश वह उन्हें दबा पाटा. उनके बारे में सोचते हुए hi उसकी उँगलियों की पकड़ और कास गयी, और उसने सुप्रिया को फिर से दबाया.

सुप्रिया - अहह हहह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह... ैय्यिययियी... आराम से... आठ...

बहार से आवाज़ - हो गया मेरा काम तोह... करो अब तुम लोग पूरी रात... कोई नहीं आएगा...

सुप्रिया ने चेहरे पर हलकी सी मुस्कान वापस आ गयी, और उसने सामने इक़बाल की और देखा. इक़बाल उसके सामने hi खड़ा था, उसका चेहरा इक़बाल की छाती तक आ रहा था, शर्ट के अंदर से उसके छाती के बाल साफ़ दिख रहे थे. पता नहीं क्यों सुप्रिया के चूचे सख्त हो रहे थे.

इक़बाल ने अपनी पकड़ हलकी सी ढीली करि, उसका मुँह सुप्रिया के बालों के नज़दीक था, उसकी मैडमजी में से बोहोत hi अछि सी खुशबू आ रही थी.

इक़बाल - मैडमजी... वह चली गयी शायद....

सुप्रिया ने धीरे से कहा - हाँ...

इक़बाल थोड़ा सा पीछे हटा.

सुप्रिया - पर अभी हमें इसी कमरे में रहना है पूरी रात...

इक़बाल - आप चारपाई पर सो जायो... मैं नीचे ज़मीन पर...

सुप्रिया - आप कब तक मेरे लिए ज़मीन पर सोते रहेंगे...

इक़बाल - जब तक आपके साथ हूँ तब तक...

सुप्रिया ने इक़बाल के चेहरे की और देखा, ये आदमी शायद उसे कोई परेशानी नहीं होने देना चाहता था. उसे कुछ समझ नहीं आया वह क्या कहे - आपको मेरा नाच कैसा लगा आज...

इक़बाल - वैसे बोहोत ाचा... पर बाकी लोग आपको देख रहे थे तोह मुझे ाचा नहीं लगा...

सुप्रिया ने भोलेपन से कहा - ऐसा क्यों? जैसे आप देख रहे थे... वैसे hi वह...

इक़बाल - हाँ... पर... उन में और मुझ में फ़र्क़ है न...

सुप्रिया - कैसा फ़र्क़?

इक़बाल - आप मेरी... आप मेरे लिए ख़ास है न... इसलिए...

सुप्रिया को हलकी सी हसी आ गयी - ाचा... ख़ास कैसे?

इक़बाल के गाल लाल हो गए थे - बस... मैं बता नहीं सकता... आप कितना कुछ सेह रही है... पर आप फिर किसी तरह से मुस्कुरा रही है...

सुप्रिया का मैं पता नहीं इस समय क्यों बेचैन सा हो रहा था, जैसे उसे अपने आप पर hi काबू न हो. इक़बाल का भोलापन उसे जाने क्यों इतना ाचा सा लग रहा था - आप जो हैं मेरे साथ इस सब में...

सुप्रिया ने आगे बाद कर इक़बाल को हलके से हुग करते हुए अपना सर उसके सीने पर रख दिया. शायद वह दूसरी बार उसके गले लग रही थी, पहली बार जब वह उसके सीने में सर छुपा कर रोई थी. इक़बाल को समझ hi नहीं आया की मैडमजी ये क्या कर रही थी.

इक़बाल हिचकिचाते हुए थोड़ा पीछे हुए - मैडमजी... ये क्या...

सुप्रिया ने हलके से अपना सर हटाया और ऊपर मुँह करते हुए इक़बाल की और देखा - क्या हुआ... आपको ाचा नहीं लगा?

इक़बाल - नहीं ऐसा कुछ नहीं... बस वह...

सुप्रिया ने अपना सर फिर से इक़बाल की छाती पर रख दिया, वह उसका दिल तेज़ धड़कता हुआ महसूस कर पा रही थी. उसने अपने हाथ इक़बाल के पेट पर लपेट लिए - ये छोटा सा पल मुझे हमेशा याद रहेगा...

इक़बाल ने भी धीरे से अपने दोनों हाथ सुप्रिया के कंधे पर रख दिए - जी... मुझे भी... हमेशा....

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शायद दोनों को hi समझ नहीं आ रहा था की अभी अभी में ये क्या हो रहा था और वह दोनों एक दुसरे को जकड़े क्यों खड़े थे.
 
सॉरी वह मेरे ऑफिस में लास्ट वीक कुछ टर्मिनेशन्स / क्लेओफस हुए है, जिससे फिलहाल मेरा वर्कलोड काफी बाद गया है और काफी मेन्टल स्ट्रेस भी. ओने ऑफ़ माय क्लोज फ्रेंड्स वास् आल्सो लेट जो. ी ऍम स्टिल वैरी कमिटेड तो थे स्टोरी एंड विल तरय तो व्रिठे अस सून अस पॉसिबल.
 
अपडेट 92

जाने क्यों, सुबह से सुप्रिया के चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कान थी और वह जाने का नाम hi नहीं ले रही थी. कल रात वह किसी तरह बीजी को चकमा देने में कामयाब हो गयी थी… क्या ये मुस्कान उस जीत की निशानी थी? पता नहीं… शायद…

उसके अचानक यूँ इक़बाल के गले लग जाना… उसके सीने से यूँ चिपक के कुछ देर खड़े होना… उसे भी नहीं पता था उसने ऐसा क्यों किया था. शर्म से उसके गाल लाल हो रहे थे, और वह किसी से आँखें नहीं मिला पा रही थी. शायद ये मुस्कान उस हाय का नतीजा थी, जो उसके दिल के कोने से उभर रही थी? पता नहीं… शायद…

वैसे भी ऐसे लग रहा था की उनकी चुदाई की खबर पूरे घर में फ़ैल गयी थी. काफी साड़ी औरते मजाक में उसकी चुटकी ले चुकी थी, और बाकी जो उसे शायद पसंद नहीं करती थी आज बिलकुल छुप अपने काम से काम रख रही थी.

आज वैसे भी निकाह का दिन था, और लड़के वाले कुछ देर में बस पहुंचने hi वाले थे. फुफु ने सुप्रिया को एक नया सलवार थमते हुए उसका माथा चूम लिया.

फुफु उसके गाल खींचते हुए बोली - ओह मेरी शहज़ादी… आज तोह चाल hi बदली नज़र आ रही है… लगता है रात भाई ने खूब प्यार बरसाया है इक़बाल ने…

सुप्रिया ने शरमाते हुए आँखें नीचे कर ली. बस उसे और इक़बाल को पता था उस कमरे में कल रात को क्या हुआ था. जब उन दोनों का आलिंगन टूटा था, उसके बाद सुप्रिया बुरी तरह झेपते हुए चारपाई पर लेट गयी थी. उसने सोचा तोह था की वह इक़बाल को भी उसी चारपाई पर लेटने को बोल दे, पर वह चारपाई इतनी सकरी थी की या तोह उसे इक़बाल के ऊपर लेटना पड़ता या इक़बाल को उसके ऊपर. जाने क्यों इस दृश्ये के बारे में सोचते hi उसके चूचे खड़े से होने लग गए.

इक़बाल बिना कुछ बोले नंगे फर्श पर लेट गया था, बिना किसी चद्दर या तकिये के. सुप्रिया को उस पर दया तोह आ रही थी पर वह करती क्या. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, और क्या पता इक़बाल ने उसकी आवाज़ सुन भी ली हो तोह? पर जब उसकी आँख खुली तोह सवेरा बस होने की वाला था और इक़बाल अभी भी बिना उफ्फ्फ किये ज़मीन पर सो रहा था.

फुफु - चल अब अम्मी और रुबीना भाभी की परेशानी ख़तम हो जाएगी… पर मैं उन्हें फ़ोन करके नहीं बतायूंगी… वह तोह तेरा ये गुलाबी चेहरा देखते hi समझ जाएँगी… ऐसा लग रहा है तू तोह उसकी दीवानी हो गयी है एक रात में hi… कहे तोह आज रात भी…

सुप्रिया ने अपने गुलाबी गालो को ज़ोर से न में घुमाया - नहीं नहीं फुफु… वैसे hi इतनी शर्म आ रही है… सब लोग ऐसे देख रहे है…

फुफु हस्ते हुए - तोह क्या हुआ… तू है ऐसा चाँद का टुकड़ा… सब देखेंगे hi… मुझसे लोग पूछ रहे थे की रुबीना की और बेहेन भी है क्या जो छुपा कर राखी है…

सुप्रिया ने शर्म से सर झुका लिया. सच में इस बार यहाँ फुफु का अलग hi रूप देखने को मिला था.

फुफु - जब मौका लगे तोह बीजी के पास जाकर उनका शुक्रिया कर दियो… उनकी वजह से सब हो पाया है.. ऐसे hi उन्होंने कितने मियाँ बीवी के बीच सब कुछ ठीक किया है…

सुप्रिया ने हलके से कहा - जी…

घर में चहल पहल काफी बाद गयी थी और लड़के वाले बस आने hi वाले थे. सुप्रिया तैयार हो कर बीजी के कमरे में पहुंची. वहां कुछ और लडकियां भी बैठी हुई थी.

बीजी ने उसे देखते hi अपने पास बुलाया - लड़की… इधर आए…

सुप्रिया चुप चाप उनके पास आ गयी - जी बीजी…

बीजी - तुम बाकी लोग देखि ज़रा बारात आयी या नहीं… तू इधर बैठ मेरे पास…

कमरा जल्द hi खाली हो गया और सुप्रिया और बीजी hi कमरे में रह गए थे. सुप्रिया को लगा वह कल रात के बारे में hi बात करना चाहेंगी. बीजी अपनी आवाज़ को थोड़ा कड़क करते हुए बोली - सुन लड़की… शब्बो को तोह लगता है मैं सठिया गयी हूँ… पर अभी मेरी उम्र hi क्या है... सच बता... तू hi थी न वहां लखनऊ में…

सुप्रिया को समझ नहीं आया वह क्या कहे. बीजी को सच बताना ठीक रहेगा क्या? अगर उन्होंने किसी को कह दिया तोह?

बीजी - तेरे शौहर को भी मैं देखते hi पहचान गयी थी, वही था न जिसके साथ तू मस्जिद आयी थी एक बार…

सुप्रिया ने उसकी तरफ नहीं देखा, उसकी आँखें हमेशा सच बोल hi देती थी.

बीजी - हम्म्म... और मैं ये भी दावे से कह सकती हु की तेरा असल नाम सफीना नहीं है न... क्यों?

सुप्रिया अपनी नर्वस उंगलियां बिस्तर पर घुमा रही थी.

बीजी ने प्यार ऐ उसकी थोड़ी पर अपना अंगूठा रखा और अपनी आवाज़ थोड़ी सॉफ्ट करि - देख.. उस सब से कोई फरक नहीं पड़ता… अब तू हमारी प्यारी दुल्हन रानी है… समझी...

सुप्रिया ने उन्हें ये कहते सुन एकदम से उनकी और देखा. उनकी आँखों में उसे अपने लिए प्यार hi नज़र आ रहा था.

सुप्रिया - बीजी.... आप मुझ पर गुस्सा नहीं हो?

बीजी - गुस्सा? इतनी प्यारी सी... मासूम सी लड़की है तू... तुझ पर मैं गुस्सा कैसे हो सकती हु... इधर आ...

बीजी ने उसे अपनी और खींचा और सुप्रिया ने अपना सर उनकी गोदी में रख दिया, और उन्होंने प्यार से उसके बाल सहलाये.

बीजी - बस थोड़ी पागल लड़की है तू... तब भी तुझे कहा था न मैंने...

सुप्रिया के आँखों से एक आंसू की लकीर उसके गालो से होती हुई नीचे बह रही थी.

बीजी - तेरे मैं में जो भी फालतू के ख्याल चल रहे है उन्हें जितना जल्दी हो सके निकाल दे…

सुप्रिया की सुबकती हुई आवाज़ निकली - आपको कैसे पता मेरे मैं में क्या चल रहा है…

बीजी - इतनी दुनिया देखि है न… पर वैसी तेरी जैसे बेवक़ूफ़ लड़की नहीं देखि कभी… और प्यारी भी…

सुप्रिया - पर कैसे निकालू? डर लग रहा है…. ये मेरी जिंदगी नहीं है… मेरे लोग नहीं है… मैं यहाँ की नहीं हु...

बीजी - जिसने तुझे खोया वह उसकी बदकिस्मती... जिसने तुझे पाया वह उसकी खुशकिस्मती... जो भी हुआ, जैसे भी हुआ... किसी को कुछ बताने या समझने की जरूरत नहीं है... बस अब तू यहाँ है... और यहीं की होकर रह जा...

सुप्रिया - पर.... इक़बाल जी... मेरे शौहर...

बीजी - पर वॉर कुछ नहीं... तेरा मर्द तुझसे थोड़ा बड़ा है उम्र में… पर वैसे ाचा है.. तुझे उससे सहारा मिलेगा… मर्द वैसे भी औरत से बड़ा hi होना चाहिए… उसे खुश कर… उसके साथ खुश रह… samjhi…aur जल्दी से मुझे खुशखबरी दे...

सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो रहे थे, बीजी तोह पता नहीं क्या क्या बोले जा रही थी.

बीजी - और सुन... मुझे अपनी तरह बेवक़ूफ़ मत समझियो... मुझे पता कल रात का ड्रामा... जो तूने और तेरे शौहर ने किया था... कमरे में नहीं थी तोह क्या, अभी भी कान तेज़ है मेरे... मैं तेरी इज़्ज़त रखना चाहती थी इसलिए कमरे में नहीं आयी...

सुप्रिया ये सुन कर हैरान हो गयी. उसे तोह लगा था उसने बीजी को चकमा दे दिया था, पर शायद वह गलत थी. उसने कुछ बोलना चाहा - बीजी वह... वह...

बीजी - वह वह क्या... अब तेरा शौहर है वह... और तुझे अपने रिश्ते का हक़ ऐडा करना hi होगा... चल अब... यहीं बैठी रहेगी या बहार भी चलेगी...

सुप्रिया अपने आंसू पोछते हुए कड़ी हुई और बीजी भी कड़ी हो गयी. सुप्रिया ने अपने बाल और कपडे ठीक किये. बहार लोगो का जमावड़ा सा लग गया था और लड़के वाले आ गए थे. लड़के वाले शहर से थे तोह उनके साथ काफी लोग थे, और फोटोग्राफर वैगेरा भी थे.

जल्द hi निकाह पड़े जाने लगा, और सुप्रिया लड़की के थोड़ा पीछे बैठे हुए थी. 1-2 महीने पहले वह भी इसी तरह से एक चद्दर के आगे मुँह करके बैठी थी. तब वह इतनी परेशान और खोयी हुई थी की उसे पता भी नहीं था वह क्या करने जा रही थी. तब उसके कानो में कोई शब्द भी नहीं जा रहे थे.

पर आज क़ाज़ी की साड़ी बातें साफ़ सुनाई दे रही थी - निकाह एक पाक और मुबारक रिश्ता है जो मर्द और औरत के दरमियान क़ायम किया गया है. यह एक ऐसा अहद है जो मोहब्बत, इज़्ज़त और ज़िम्मेदारी पर मब्नी है.

सुप्रिया अपने खयालो में सोचने लगी, क्या उसने भी इसी रिश्ते को क़बूल किया था? पर इक़बाल और उसके बीच ये सब कैसे हो सकता था... उनके बीच की उम्र का फासला, उनकी पड़े लिखे का फासला, उनकी परवरिश का फासला... कितना बड़ा फासला था उनके बीचे में.

जब तक सुप्रिया का ध्यान वापस आया नयी दुल्हन निकाह क़बूल कर चुकी थी.

क़ाज़ी - दुआ है के यह नया सफर आप दोनों के लिए खुशियोंṅ, सुकून और मोहब्बत से भरपूर हो.

लोग एक दुसरे को मुबारकबाद देने लगे, और सुप्रिया भी मुस्कुराती हुई दुल्हन के गले लग गयी. उसके बाद सब लोग खाने की दावत की तरफ बड़े, पर सुप्रिया को तोह उस और जाना नहीं था.

वह थोड़ा बहार की और आयी तोह इक़बाल वहीँ खड़ा था. जैसे hi उसने सुप्रिया को देखा उसके चेहरे पर एक मुस्कान सी आ गयी - कैसा लगा आपको सब कुछ....

सुप्रिया - बोहोत ाचा... आप खाना खाने नहीं गए?

इक़बाल - नहीं... कुछ ख़ास भूक नहीं है... वैसे भी आप भी तोह नहीं खाएंगी...

सुप्रिया - तोह क्या हुआ? आप तोह खा hi सकते है न...

वह दोनों बात hi कर रहे थे की एकदम से फोटोग्राफर ने उन्हें आवाज़ दी - भाई जान... मोहतरमा... ज़रा इधर देखिये... फोटो के लिए...

दोनों एकदम से चौंक से गए और कैमरा की और मुँह कर लिया. पर वह दोनों अभी भी एक दुसरे से थोड़ा दूर hi खड़े थे.

तभी सुप्रिया के कान में बीजी की आवाज़ पड़ी, जो शायद पास में hi बैठी थी - मियाँ बीवी हो... तोह ज़रा सात कर फोटो खिचवायो... ऐसे क्या दूर दूर खड़े हो...

फोटोग्राफर ने ये सुनते hi कहा - ारी.. आप दोनों मियां बीवी हो... हाँ हाँ तब तोह जोड़े वाली फोटो होनी चाहिए... पास हो जाइये....

सुप्रिया एक कदम इक़बाल की और हुई, पर अभी भी उनके बीच थोड़ा गैप था.

बीजी - इक़बाल... तेरी hi बीवी है... और हम कौनसा पुराने ख़यालात के है... हो जा और पास...

पर इक़बाल हिल नहीं रहा था. सुप्रिया ने हलके से इक़बाल की और अपना सर मोड़ कर देखा, जैसे उसे इशारे से कह रही हो की वह उसकी और हो सकता था. पर इक़बाल जैसे फिर भी नहीं हिला. तोह सुप्रिया hi थोड़ा सा और सरक कर उसकी और हो गयी.

सुप्रिया का बाय हाथ और कन्धा इक़बाल की छाती को हलके से छु रहा था.

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फोटोग्राफर ने फिर से कहा - इनके कंधे पर हाथ रखिये...

सुप्रिया ने इस बार सर झुकाते हुए बोहोत hi धीमी आवाज़ में कहा - वह इतनी बार बोल चूका... रख लीजिये न हाथ कंधे पर...

सुप्रिया को लगा नहीं था की इक़बाल अपना हाथ उसके कंधे पर रखेगा, पर अचानक से उसे उसका हाथ अपने कंधे पर आते हुए महसूस हुआ. सुप्रिया एक डैम काँप सी उठी और उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा. सुप्रिया ने किसी तरह से अपने आप को सँभालते हुए आगे कैमरा की और देखा.

फोटोग्राफर ने उन दोनों की फोटो खींची, और जैसे hi वह वहां से हटा, सुप्रिया जल्दी से इक़बाल से अलग होकर बीजी के पास आ गयी.

बीजी हस्ते हुए बोली - अछि लग रही थी तुम्हारी जोड़ी...

सुप्रिया शरमाते हुए - जी बीजी...

बीजी - या खुदा... जैसी तू शर्मीली वैसे hi तेरा दूल्हा भी शर्मीला... अभी ठीक करती हु उसे... इक़बाल... ओह इक़बाल... यहाँ आ ज़रा...

इक़बाल जल्दी से बीजी की और आया - जी बीजी... कुछ काम था...

बीजी - काम तोह भतेरे है... पर सबसे बड़ा एक काम है...

इक़बाल - जी कहिये न...

बीजी - अपनी बीवी को ज़रा गाँव घुमा ला... 3 दिन से बेचारी शादी ब्याह के काम सँभालते सँभालते थक गयी है...

इक़बाल - पर बीजी... यहाँ गाँव में घूमने लायक क्या है...

बीजी भड़कते हुए बोली - तेरे गाँव से तोह बड़ा hi है... दूकान ले जा... खेत दिखा दे... इतना लम्बा छौड़ा आदमी है... पर एक औरत न संभाली जाती तुझसे...

ये सुनते hi इक़बाल ने अपना सर झुका लिया. बीजी को यूँ इक़बाल को डांटे हुए सुनकर पता नहीं क्यों सुप्रिया के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान सी आ गयी थी. अब तक सिर्फ उसने hi जो दांत खायी थी बीजी से, चलो किसी और भी तोह ये झेलने का मौका मिले.

इक़बाल ने अपनी आँख के कोने से एक नज़र सुप्रिया की और देखा, और सुप्रिया ने एकदम से अपने चेहरे की मुस्कान गायब कर दी.

इक़बाल ने सीरियस होते हुए कहा - ठीक है बीजी... मैं ले जायूँगा...

बीजी - जायो फिर... अभी निकल जायो... शाम तक घर आ जाना...

इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया और उसने सुप्रिया की और एक नज़र देखा. वह बहार की और चलने लगा. सुप्रिया पीछे कड़ी रह गयी थी, उसे नहीं लगा था वह इस तरह इक़बाल के साथ बहार जाएगी. उसने बीजी की एक और नज़र देखा और उन्होंने उसे हाथ से जल्दी से उसके पीछे जाने का इशारा किया.

इक़बाल अपने तेज़ कदमो से घर के बहार निकल गया और सुप्रिया जल्दी से उसके पीछे पीछे हो ली. वह अपनी रफ़्तार तेज़ करके उस तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. पर इक़बाल तोह तेज़ hi चले जा रहा था. चलते चलते वह थोड़ा दूर आ गए थे और सुप्रिया अब इक़बाल की रफ़्तार को मैच नहीं कर पा रही थी. सड़क पर इधर उधर खड़े लोग भी उसे अजीब सी नज़रो से घूर रहे थे.

सुप्रिया ने अपना गाला साफ़ करते हुए आवाज़ लगायी - सुनिए... इक़बाल जी... रुकिए ज़रा...

इक़बाल रुका और उसने पीछे मुद कर सुप्रिया की और देखा. सुप्रिया जल्दी से चलते चलते उसके पास पहुंच गयी और नाराज़गी भरी आवाज़ में बोली - बीजी ने आपको मुझे साथ ले जाने ले लिए बोलै था... न की मुझे रस्सी से बाँध कर खींचने के लिए...

इक़बाल एकदम से बोलै - मैंने कब आपको रस्सी से बाँध कर खींचा...

सुप्रिया ने अपने हाथ से एक आदर्शय सी रस्सी को खींचना का इशारा किया - खींची तोह चली आ रही हु आपके पीछे पीछे... दिख नहीं रही आपको ये रस्सी...

इक़बाल ने इधर उधर देखा - मैडमजी... कहाँ... मुझे तोह कुछ नहीं दिख रहा...

सुप्रिया के चेहरे पर थोड़ी jh,.'at आ गयी थी - ओफ्फो.. रहने दीजिये... ये बताइये कहाँ ले जा रहे है मुझे?

इक़बाल - खेत की तरफ... बीजी ने बोलै तोह था खेत दिखा दू आपको...

खेत में इस तरह इक़बाल के साथ जाने के बारे में सोचते hi पता नहीं क्यों सुप्रिया के शरीर में एक संसानत सी दौड़ गयी. सुप्रिया ने शरमाते हुए नीचे देखा - खेत में क्या है देखने के लिए... वहां नहीं जाना मुझे...

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इक़बाल - तोह फिर कहाँ चलना है?

सुप्रिया - बाजार hi ले चलिए यहाँ के...

इक़बाल - ठीक है चलिए...

सुप्रिया - पर थोड़ा धीरे धीरे चलिए... मैं आप जितनी लम्बी नहीं हूँ न... तोह मेरे कदम थोड़े छोटे hi पड़ते है...

इक़बाल - जी मैडमजी....

दोनों फिर से चलने लगे और इस बार इक़बाल धीरे hi चल रहा था ताकि सुप्रिया उसके साथ चल सके. दोनों बिलकुल चुप चाप चल रहे थे, सुप्रिया को भी समझ नहीं आ रहा था वह क्या बोले. उसे महसूस हो रहा था की इक़बाल शायद अपनी आँख के कोने से उसकी और hi देख रहा था.

इक़बाल की नज़र तभी सुप्रिया के ब्याह पर पड़ी जहाँ एक काला नीला सा निशाँ पड़ा हुआ था. उसने रुकते हुए कहा - मैडमजी... ये क्या हुआ? ये चोट कैसे लगी आपको?

सुप्रिया ने धीरे से कहा - आपने hi तोह मारी थी ये चोट... और अब भूल भी गए?

इक़बाल एक डैम से हैरान परेशान होते हुए बोलै - मैंने? मैंने तोह कुछ नहीं किया ऐसा....

सुप्रिया अपनी आवाज़ बनाते हुए बोली - भूल गए आप... कल रात... आपने ज़ोर से मेरा हाथ दबा दिया था....

इक़बाल - ओह्ह्ह उससे ये निशाँ पद गया!! वह तोह आपने hi कहा था मुझे आपका हाथ पकड़ने के लिए...

सुप्रिया को इक़बाल को सतना ाचा सा लग रहा था - हाँ पर शायद आपने कुछ ज्यादा hi ज़ोर से दबा दिया, और ये निशाँ पद गया...

इक़बाल की शकल उतर गयी - माफ़ कीजियेगा मुझे मैडमजी... मुझे नहीं पता था ऐसा कुछ हो जायेगा... चलिए मैं आपको डॉक्टर के पास ले चलता हूँ....

सुप्रिया - ारी नहीं नहीं... डॉक्टर क्या करेगा इसमें... ठीक हो जायेगा... मैं तोह बस मजाक कर रही थी... मेरे शरीर पर निशाँ काफी जल्दी से पद जाते है... पर फिर चले भी जाते है...

इक़बाल - हाँ आपका शरीर इतना मुलायम सा जो है... आइंदा कभी ऐसा नहीं होगा...

सुप्रिया एकदम से बोल पड़ी - क्यों!? नहीं मेरा मतलब... आप क्यों परेशान हो रहे है... हो जायेगा ठीक.... चलिए अब इसकी भरपाई करने के लिए मुझे कुछ यहाँ की कोई ख़ास चीज़ खिलवा दीजिये... काफी भूक लग रही है... मैं तोह दिन का खाना भी नहीं खा पायी...

इक़बाल - ारी हाँ हाँ... चलिए न.... मैं आपको एक अछि सी जगह ले चलता हूँ....

दोनों साथ चलते चलते बाजार में पहुंच गए थे और जल्द hi वहां के सबसे बड़े हलवाई की दूकान के बहार. इक़बाल ने सुप्रिया के लिए छोले भठूरे खरीदे और वह उसे खाने लगी. सुप्रिया को ऐसा लग रहा था की जैसे वह कई महीनो बाद कुछ ाचा सा खाना खा रही हो. उसने इक़बाल को भी इशारा किया की वह उसके साथ hi खा ले, और वह दोनों साथ hi खाने लगे.

सुप्रिया को ऐसा लग रहा था की जैसे आस पास के लोगो की नज़रे उस पर hi तिकी थी, और इक़बाल भी उन्हें घूर कर दूर रख रहा था. कुछ देर बाद वह खाना खा कर बाजार में टहलने लगे. साथ चलते चलते बीच बीच में उनकी उंगलियां आपस में टकरा जाती और वह दोनों hi जल्दी से अपना हाथ पीछे कर लेते.

सुप्रिया बीच बीच में किसी दूकान पर रूकती, वहां सामान देखती और फिर आगे बाद जाती. वह कुछ खरीदना नहीं चाहती थी, पर उसे सब देखने का काफी मैं था. पूरे बाजार में शायद उसके आने से इतनी रौनक सी बाद गयी थी, और वह सबका ध्यान अपनी और खींच रही थी.

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सुप्रिया एक दूकान पर कड़ी चूड़ियाँ पेहेन कर देख रही थी, उसने पलट कर इक़बाल की और देखा - ये कैसी लग रही हैं?

इक़बाल हलके से मुस्कुराया, वह घुमते घुमते थोड़ा तोह थक गया था और मैडमजी की और खींचता हुआ ध्यान भी उसे ाचा नहीं लग रहा था, पर उसकी मैडमजी ने इतनी मासूमियत से उससे ये पुछा था की वह सब भूल सा गया था - आप ले लीजिये... आप पर बोहोत अछि लग रही है.

सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी और उसने चूड़ियां हाथ से निकाल कर वापस रख दी - नहीं नहीं... लेनी नहीं है... बस देख रही थी...

इक़बाल - ारी आपको पसंद है तोह ले लीजिये न...

सुप्रिया - नहीं... चलिए... वापिस चलते है... काफी देर हो गयी है...

इक़बाल - ाचा आप चलिए उस और... मैं आता हूँ...

सुप्रिया ने उसकी और शक से देखा, पर वह दो चार कदम आगे बढ़ाने लगी. इक़बाल ने जल्दी से दूकान वाले को चूड़ियां पैक करने को कहा, और वह उनकी पेमेंट करने लगा.

तभी ek-do लड़के सुप्रिया के आस पास मंडराने लगे थे. एक लड़का तोह सुप्रिया के पीछे आ कर उसके काफी करीब आ गया था, शायद वह सुप्रिया की गांड को छूने hi वाला था. इक़बाल जल्दी से चूड़ियां लेकर सुप्रिया की और लपका और उसने उस लड़के को थोड़ा पीछे धकेला.

लड़का लड़खड़ाता हुआ पीछे हुआ - चाचा... क्या हुआ... धक्का क्यों मारा... तेरी बेटी है क्या...

इक़बाल को ये सुन कर गुस्सा आने लगा और वह उस लड़के की और लपका और उसका कालर पकड़ लिया - बहनचोद... बेटी लगती है मेरी है वह...

लड़का हस्ते हुए बोलै - बेटी नहीं तोह क्या... बीवी है...

इक़बाल ने उसे पकडे हुए ज़ोर से हिला दिया और वह उसे मारने hi वाला था की सुप्रिया इतने में जल्दी से मुड़ी और उसने इक़बाल की कलाई पर अपना हाथ रख दिया - इक़बाल जी... छोडिया न इसे...

इक़बाल का चेहरा गुस्से में उबाल रहा था पर सुप्रिया का हाथ उस पर लगते hi उसने उस लड़के को छोड़ दिया.

सुप्रिया - कोई फायदा नहीं है... घर वापिस चलते है...

सुप्रिया किसी तरह से इक़बाल को खींच कर अपने साथ ले जाने लगी. पीछे से लड़के है रहे थे, और जाने क्या क्या बोल रहे थे.

लड़का - देखो तोह सही बुड्ढे की किस्मत... इतनी जवान लड़की के साथ घूम रहा है...

सुप्रिया ने इक़बाल की शकल की और देखा और वह अपने दांत किट किता रहा था, उसने अपनी उंगलियां एक मुट्ठी में कास ली थी.

सुप्रिया - प्लीज... आप शांत रहना... उनकी बातों पर ध्यान न दे...

इक़बाल ने कोई जवाब नहीं दिया पर उसके कानो से अभी भी धुंआ सा निकल रहा था. दोनों चलते चलते शायद खेतो की और hi आ गए थे. सुप्रिया ने इक़बाल का हाथ छोड़ा और वहां पड़े एक बड़े से पत्थर पर जाकर बैठ गयी थी. उसका भी मुँह उतर सा गया था.

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इक़बाल उसका सामने खड़ा गुस्से में इधर उधर घूम रहा था - मैडमजी... आपने मुझे रोका क्यों? आपको पता भी है... वह आपको गलत जगह छूने वाला था....

सुप्रिया गुस्सा होते हुए बोली - आपको मेरे लिए हर किसी से लड़ाई क्यों मोल लेनी होती है... वह तोह बेस लड़के थे...

इक़बाल और भी भड़क गया - और मैं बुद्धा हूँ... है न...

सुप्रिया - मैंने ये कब कहा...

इक़बाल - कहने की क्या ज़रुरत है... सच है ये तोह... और मुझे भी पता है...

सुप्रिया - मैंने ये नहीं कहा.... मैं तोह बेस ये कह रही हूँ की उससे मार पीट करने की क्या ज़रुरत थी...

इक़बाल - मैडमजी... पर...

सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... मैं भी अपना ख्याल रख सकती हु... आप कब तक मुझे बचते रहेंगे...

इक़बाल - जब तक मैं आपके साथ हु... तब तक...

सुप्रिया - पर क्यों? हमारे बीच रिश्ता hi क्या है...

इक़बाल एकदम से छुप हो गया और फिर धीरे से बोलै - हाँ... आप शायद सही कह रही हैं... रिश्ता hi क्या है हमारे बीच...

सुप्रिया - मेरा वह मतलब नहीं था... मैं तोह बस...

इक़बाल ने सुप्रिया को बीच में रोक दिया - आपको कुछ समझने की जरूरत नहीं है... कल हम लोग वापिस घर चले जायेंगे... सब फिर से वैसे hi हो जायेगा... पर मुझे बोहोत ाचा लगा आपने जिस तरह यहाँ सबके सामने मेरी इज़्ज़त राखी...

सुप्रिया का गाला भर सा आया था और वह कुछ सोचते हुए बोली - और सब कुछ पहले जैसे न रहे तोह...

इक़बाल - मतलब?!

सुप्रिया हस्ते हुए बोली और अपना हाथ आगे बढ़ाया - कुछ नहीं... आप नहीं समझेंगे... लाइए... मेरी वह चूड़ियाँ तोह दे दीजिये जिसकी वजह से ये सारा तमाशा हुआ...

इक़बाल ने जल्दी से - जी... ये लीजिये न...

सुप्रिया - अब मैं क्या लू इन्हे... आप hi पहना दीजिये न?

इक़बाल - मैं पहना दू?

सुप्रिया - हाँ... कभी किसी लड़की को चूड़ियाँ नहीं पहनाई क्या...

इक़बाल - जी.... बोहोत साल हो गए...

सुप्रिया ने फिर से अपने हाथ आगे करके इशारा किया - पहनाई न...

इक़बाल झुकते हुए नीचे बैठा, और चूड़ियों के डब्बे में से चूड़ियां निकली. उसने चूड़ियां का गुच्छा लेते हुए सुप्रिया की उँगलियों की और बढ़ाया. वह थोड़ी सी अंदर गयी पर फिर उसकी उँगलियों के जोड़ पर अटक गयी. उसने उन्हें अंदर धकेलने की कोशिश करि पर वह आगे नहीं जा रही थी. इक़बाल ने सुप्रिया की और एक नज़र डाली, सुप्रिया के चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कान थी.

सुप्रिया - ऐसे नहीं अंदर जाएगी... हाथ पकड़ना पड़ेगा...

इक़बाल ने एक बार फिर सुप्रिया की और देखा, उसकी आँखों में. आज उसे वहां एक अलग सा एहसास नज़र आ रहा था जो उसे अब तक नहीं आया था.

इक़बाल ने हलके से कहा - सोच लीजिये... एक बार हाथ पकड़ लिया तोह मैं छोडूंगा नहीं...

सुप्रिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कॉन्फिडेंटली उसका जवाब दिया - मैं छोड़ने के लिए कहूँगी भी नहीं...

इक़बाल ने धीरे से सुप्रिया की हाथ को थोड़ा पीछे से पकड़ा, और चूड़ियों को उसके हाथ पर फिर से चढ़ाने की कोशिश करने लगा. सुप्रिया के सॉफ्ट से हाथ को पकड़ते hi उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा था. थोड़ा सा और धकेलने के बाद चूड़ियां कलाई तक पहुंच hi गयी.

सुप्रिया ने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. कुछ देर इक़बाल चुप चाप सुप्रिया के सामने ज़मीन पर बैठा रहा, और सुप्रिया उससे नज़रे भी नहीं मिला पा रही.

सुप्रिया ने छुपी को तोड़ते हुए कहा - चले इक़बाल जी...

इक़बाल सुप्रिया को घूरे जा रहा था, उसने अपनी आँखें झुका ली - जी मैडमजी... चलिए...

सुप्रिया ने अपना हाथ इक़बाल की और बढ़ाया जैसे उससे सहारा ले रही हो खड़े होने का. पर दुसरे hi पल, सुप्रिया थोड़ा आगे की और झुकी और जल्दी से इक़बाल के गाल पर एक हलकी सी किश करते हुए बोली - चूड़ियों के लिए शुकिर्या.

इससे पहले की इक़बाल सोच पता वह जल्दी से खड़े होते हुए वहां से भाग पड़ी. पता नहीं इक़बाल उसकी स्वीकृति को समझा था या नहीं, पता नहीं उनका ये रिश्ता आगे कैसे बढ़ेगा... इतना कुछ तोह चल रहा था उसके दिमाग में, पर फिलहाल वह नहीं चाहती थी की इक़बाल उसे पकड़ पाए. उसे अपने पीछे से इक़बाल के भागते हुए कदमो की आवाज़ आ रही थी.
 
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