Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 4 - SexBaba
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Incest GHAR KI AAG (URDU)

घर की आग



Episode 14: गुनाह की पहली लकीर

लाहौर की वह रात हद से ज़्यादा खामोश थी, मगर हमजा के कमरे के अंदर जज़्बात का एक ऐसा तूफ़ान उठा हुआ था जो बरसों की परहेज़गारी को बहा ले जाने के लिए काफी था. नसीम, जो अभी कुछ देर पहले तक सिर्फ एक माँ थी, अब हमजा के सामने एक तड़पती हुई औरत बन कर कड़ी थी. उसने हमजा का कालर इतनी सख्ती से पकड़ा हुआ था के उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पद रही थीं.

"क्यों खामोश हो हमजा? मेरी आँखों में देखो!" नसीम की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी. "क्या तुम्हे लगता है के तुम्हारी बहन हिरा मुझ से ज़्यादा जवान है? क्या उसके जिस्म की तपिश मेरी गर्माहट से ज़्यादा है?"

हमजा का दिल डूबा जा रहा था. उसने कभी नहीं सोचा था के उसकी परसा माँ इस हद तक गिर जाएगी के अपनी hi बेटी से मुक़ाबला करने लगेगी. मगर सच तोह यह था के नसीम की इस be-baaki ने हमजा के अंदर के उस जानवर को जगा दिया था जो महीनो से क़ैद था. उसने नसीम की लॉन की क़मीज़ के नीचे से उभरते हुए bhare-bhare मम्मों को देखा, जो हर सांस के साथ ऊपर निचे हो रहे थे.

"अम्मी... आप होश में नहीं हैं," हमजा ने लड़खड़ाती ज़बान से कहा, मगर उसने नसीम को अपने से दूर नहीं किया.

"होश में तोह मैं अब आयी हूँ हमजा," नसीम ने सरगोशी की और हमजा का हाथ पकड़ कर अपनी क़मीज़ के ऊपर hi अपने बाएं मम्मी पर रख दिया. "देखो... देखो यह कितना तड़प रहा है.





तुम्हारे बाप ने तोह इसे बरसों पहले भुला दिया था. क्या तुम भी मुझे ऐसे hi तड़पाओ गए?"

नसीम का नरम और गरम मां हमजा की हथेली में था.





उसका निप्पल कपडे के ऊपर से hi सख्त महसूस हो रहा था. हमजा से अब और सब्र नहीं हुआ. उसने एक झटके से नसीम को अपनी तरफ खिंचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए. यह बोसा (किश) कोई मामूली बोसा नहीं था; इसमें नफरत, मोहब्बत, और be-pannah हवस घुली हुई थी.





थे डिसेंट ईंटो लस्ट:

नसीम ने हमजा की गर्दन में बाहें दाल दें और पूरी शिद्दत से उसका साथ देने लगी. दोनों एक दूसरे के मुंह की राल (सलीवा) पी रहे थे.





हमजा का हाथ तेज़ी से नसीम की शलवार के नारे (स्ट्रिंग) तक पहुंचा और उसने एक झटके में उसे खोल दिया.

"ओह्ह्ह हमजा... मेरे बचे... छोड़ो मुझे... आज मुझे तबाह कर दो," नसीम ने सिसकियों के दरमियान कहा.

हमजा ने नसीम को बिस्तर पर पटक दिया. उसने अपनी बनयान उतारी और फिर अपनी शलवार भी फ़ेंक दी. जब वह नंगा हुआ, तोह नसीम की आँखें पहात गयीं.









उसने ज़िन्दगी में सिर्फ रशीद साहिब का लुंड देखा था, जो अब ढीला और be-jaan हो चूका था. मगर हमजा का लुंड... वह किसी काले सांप की तरह खड़ा था, नसें उभरी हुई थीं और वह इतना लम्बा और मोटा था के नसीम का जिस्म डर से thar-thara उठा.









"या अल्लाह... हमजा... यह... यह इतना बड़ा?" नसीम ने पहली बार अपने बेटे का लुंड देखा था और उसकी हालत देख कर उसकी छूट में एक अजीब सी खुजली और geela-pan महसूस होने लगा.

हमजा ने बिना कुछ कहे नसीम की क़मीज़ और ब्रा उतार दी. नसीम के भरे हुए, गोर मम्मी अब पूरी तरह नंगे थे. उन पर नीली नसें साफ़ दिख रही थीं और निप्पल्स बिलकुल सख्त हो कर खड़े थे. हमजा ने एक पल के लिए रुका और अपनी माँ के जिस्म को देखा. उसने कभी तसव्वुर भी नहीं किया था के उसकी माँ इतनी हसीं होगी.

"अम्मी... आप तोह किसी हूर से काम नहीं हैं," हमजा ने कहा और झुक कर उसके एक मम्मी को पूरे मुंह में भर लिया.





"आआह्ह्ह! हमज़ाआ... हैं... चूसो... मेरी जान... ज़ोर से दबाओ!" नसीम ने अपना सर तकिये में धसाये हुए चीखी.

हमजा ने नसीम की नंगी छूट को देखा. वहां बालों की एक हलकी सी तेह थी, और उसके बीच से पानी (लुब्रिकेशन) निकल कर बहार बह रहा था. उसने अपनी ऊँगली नसीम की छूट के सुराख़ पर राखी. नसीम का पूरा जिस्म एक झटके से ऊपर उठा.

"बहुत गीली हो गयी हैं आप अम्मी," हमजा ने शैतानी मुस्कराहट के साथ कहा.

"तुम्हारी माँ की छूट बरसों से प्यासी है बीटा... आज इस प्यास को बुझा दो... छोड़ो अपनी माँ को... ऐसी चुदाई करो के मैं चलने के क़ाबिल न रहूँ," नसीम अब पूरी तरह बेशरम हो चुकी थी.

हमजा ने नसीम की दोनों टांगें (लेग्स) हवा में उठा कर अपने क्षणों पर रखीं. उसने अपने लुंड की टोपी (हेड) नसीम की छूट के फट्टों पर राखी और एक ज़ोर दर झटका मारा.





"ननणायआईईईन्न्नण!!!!" नसीम की एक dard-naak और lutf-bhari चीख निकली. हमजा का मोटा लुंड उसकी तंग छूट को चीरता हुआ आधा अंदर दाखिल हो गया था. "ऊऊह्ह्ह माआ... मर गयी... हमजा... बहुत मोटा है... आह्हः... धीरे... धीरे बीटा..."

हमजा ने कोई रहम नहीं खाया. उसने एक और ज़ोर दर धक्का मारा और पूरा लुंड जड़ तक नसीम के अंदर उतार दिया. नसीम की आँखें उलट गयीं. उसने महसूस किया के हमजा का लुंड उसकी bacha-dani (उतेरुस) से टकरा रहा है.





"उफ्फफ्फ्फ़... कितनी तंग है आपकी छूट... लगता है अब्बू ने सदियों से यहाँ हाथ नहीं लगाया," हमजा ने हप्ते हुए कहा और तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए.





कमरे में thap-thap की आवाज़ गूंजने लगी. हमजा के लुंड और नसीम की छूट का मिलाप इतना शिद्दत वाला था के दोनों के जिस्मो से पसीना फूट रहा था. हमजा ने नसीम के होंठों को अपने दांतो से काटा, और नसीम ने दर्द के मरे हमजा की पीठ पर अपने नाख़ून गड दिए.

"हाँ हमजा... ऐसे hi... ज़ोर से छोड़ो अपनी इस रंडी माँ को... आह्हः... गाली दो मुझे... कहो के मैं एक गन्दी औरत हूँ!" नसीम ने जूनून में कहा.

"हाँ... तुम मेरी रंडी हो! इतनी उम्र में भी इतनी गरम छूट लेकर बैठी हो... आज तुम्हारी इस छूट को पहाड़ दूंगा," हमजा ने गुस्से और हवस के mile-jule जज़्बात के साथ कहा और नसीम की पोजीशन बदल दी.

उसने नसीम को घुटनो के बल किया (डोगग्य स्टाइल). नसीम की भरी हुई गांड अब हमजा के सामने थी. हमजा ने पीछे से अपना लुंड निकाला और फिर से एक ज़ोर दर धक्के के साथ नसीम की छूट में दाखिल कर दिया. हर धक्के पर नसीम के मम्मी आगे पीछे झूल रहे थे.





"आआह्ह्ह... हमजा... पीछे से तोह जान hi निकल रही है... उफ्फफ्फ्फ़... छोड़ो... और ज़ोर से छोड़ो!"

तक़रीबन आधे घंटे तक यह नंगा नाच चलता रहा. नसीम का जिस्म अब बिलकुल ढीला पद चूका था, मगर उसकी रूह को वह सुकून मिल रहा था जिसके लिए वह बरसों से तरप रही थी.

आखिर में, हमजा ने अपना लुंड निकाला और नसीम के चेहरे पर रख दिया. "अम्मी... लीजिये... अपना इनाम लीजिये."





नसीम ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने बेटे का लुंड मुंह में भर लिया और उसे ऐसे चूसने लगी जैसे कोई छोटा बचा लोल्लिपोप चूसता है. उसने लुंड की टोपी को अपनी ज़बान से सहलाया और पूरा लुंड हलक़ तक उतार लिया. कुछ hi देर में हमजा ने एक गहरी कराह (मोअन) ली और अपना सारा गरम माल (सीमेन) नसीम के मुंह में छोड़ दिया. नसीम ने एक क़तरा भी जाया नहीं होने दिया और सब जातक गयी.





Ahsaas-E-Gunah:

जब तूफ़ान थमा, तोह कमरे में वापस वही भरी ख़ामोशी छ गयी. नसीम बिस्तर के एक कोने में पड़ी हुई थी, उसकी आँखों से अब आंसू बह रहे थे. यह गुनाह का बोझ था जो अब उसके सीने पर पहर बन कर गिर रहा था.

हमजा ने अपने कपडे पहने और बिना नसीम की तरफ देखे खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. "आप अब जा सकती हैं... अब्बू उठ जायेंगे."

नसीम ने लरज़ते हाथों से अपने कपडे पहने. उसका जिस्म अभी भी दर्द कर रहा था, मगर उसके दिल में एक अजीब सी khali-pan की जगह डर ने ले ली थी. वह दबे पाऊँ कमरे से बहार निकली.

जैसे hi वह कॉरिडोर में पहुंची, उसके क़दम वहीँ जैम गए.

सिद्दीकी साहिब (रशीद साहिब के पुराने दोस्त और पडोसी) हॉल में बैठे थे और रशीद साहिब उनके सामने सर पकडे हुए थे.

"रशीद... यह बहुत बड़ा मसला है. अगर हैदराबाद वाले फार्महाउस की यह खबर सच है, तोह तुम्हारी इज़्ज़त मिटटी में मिल जाएगी," सिद्दीकी साहिब की आवाज़ में फ़िक्र थी.

नसीम दीवार की ओट में छुप गयी. उसका दिल zor-zor से धड़कने लगा. हैदराबाद? सीमा और उस्मान वहां थे.

"क्या हुआ है सिद्दीकी? Saaf-saaf कहो," रशीद साहिब ने गुस्से में पुछा.

"फार्महाउस के चौकीदार ने मुझे फ़ोन किया था. वह कह रहा था के सीमा और उस्मान... उन दोनों के बीच कुछ ऐसा चल रहा है जो bhai-bahen के दरमियान नहीं होना चाहिए. और बिलाल... बिलाल को शायद इस बात की भनक लग गयी है और वह वहां से गायब है. लोगों का कहना है के बिलाल ने किसी को क़तल करने की धमकी दी है!"

नसीम के पाऊँ टेल से ज़मीन निकल गयी. एक तरफ उसने अभी अपने बेटे के साथ जाना किया था, और दूसरी तरफ उसकी बेटी और बीटा भी उसी आग में जल रहे थे. घर का सुकून अब सिर्फ मुतासिर नहीं हुआ था, बल्कि राख होने वाला था.

मगर सब से बड़ा ट्विस्ट तोह अभी बाकी था.

नसीम ने महसूस किया के उसके पीछे कोई खड़ा है. उसने पलट कर देखा तोह हिरा कड़ी थी. हिरा की आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी नफरत और मुस्कराहट थी. उसने अपना मोबाइल दिखाया, जिसमें उसने हमजा के कमरे की थोड़ी देर पहले की साड़ी आवाज़ें रिकॉर्ड कर ली थीं.

"अम्मी... आपने तोह कहा था के हिरा कच्ची काली है," हिरा ने सरगोशी की. "लेकिन इस कच्ची काली ने आपका पूरा तमाशा देख लिया है. अब बताईये... पहले मैं अब्बू को हैदराबाद की खबर सुनौ, या आपकी और हमजा की यह रिकॉर्डिंग सुनौ?"

नसीम का डैम घुटने लगा. पूरा खंडन एक ऐसी दलदल में धस चूका था जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. एक माँ का गुनाह अब उसकी बेटी के हाथ में हथ्यार बन चूका था.

क्लिफहैंगर: हिरा और नसीम में अलग जंग छिड़ी हुई है, ये ब्लैकमेलिंग से क्या करना चाहती है हिरा? क्या नसीम अब डर जाएगी? रशीद साहब के दोस्त ने जो खबर दी है क्या वो सच है? क्या सच में ये घर अब बदनाम होगा?
 
आज संडे है तो नींद पूरी होगी जाये गई इसलिए एक अपडेट देकर hi सोने का इरादा होगया सो देदिया है.

एन्जॉय थे अपडेट......
 
अगला अपडेट शायद कलतक रेडी होजायेगा. साथ बने रहिएगा.
 
घर की आग

Episode 15: दीवारों के कान और जिस्म की आग.

मॉडल टाउन की वह रात अब ढलने को थी, मगर हवेली की फ़ज़ाओं में एक ऐसी bhari-pan आ चुकी थी जो सांस लेना मुश्किल कर रही थी. नसीम, कॉरिडोर की दीवार से तिकी, हिरा की आँखों में देख रही थी. हिरा के मोबाइल से आने वाली सरगोशियां उसके अपने hi जिस्म की गवाही दे रही थीं.

सन 1: माँ, बेटी और एक खामोश समझौता

नसीम का सांस फूल रहा था. उसने चाहा के हिरा से मोबाइल छीन ले, मगर उसके जिस्म में इतनी हिम्मत नहीं थी. हिरा ने मोबाइल स्क्रीन बंद की और अपनी माँ के बिलकुल क़रीब आयी. उसने नसीम के बिखरे हुए बाल सलीक़े से कान के पीछे किये.

"अम्मी... आप इतनी घबरा क्यों रही हैं?" हिरा ने बड़ी नरम आवाज़ में पुछा. "मैं कोई दुश्मन थोड़ी हूँ. मैं ने तोह बस वह सुना जो इस घर की ख़ामोशी में बरसों से दफ़न था."

नसीम ने लरज़ते हाथों से हिरा का बाज़ू पकड़ा. "हिरा... बीटा... यह... यह सब मिटा दो. मैं तबाह हो जाउंगी."

हिरा ने एक गहरी मुस्कराहट दी. उसका लहज़ा बिलकुल भी dhamki-amez नहीं था, बल्कि उसमे एक अजीब सी हमदर्दी और तजस्सुस (क्यूरोसिटी) थी. "अम्मी, मिटा दूंगी. मगर मुझे बस यह बताएं... क्या हमजा में वाक़ई इतना ज़्यादा मज़ा है? मैंने आपकी सिसकारियों में जो सुकून सुना, वह मैंने पहले कभी नहीं महसूस किया."

नसीम का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया. उसे समझ नहीं आ रहा था के अपनी बेटी को क्या कहे. एक माँ के लिए उसके बेटे के साथ की गयी हवस का ज़िक्र उसकी अपनी बेटी से करना, एक ऐसी नफ़्सियति जुंग थी जिसमे वह हारती जा रही थी.

सन 2: हॉल का तूफ़ान और रशीद का खौफ

नीचे हॉल में रशीद साहब अभी भी सिद्दीकी साहब के सामने सर पकडे बैठे थे. उनकी इज़्ज़त, उनका फख्र, सब मिटटी में मिल रहा था.

"सिद्दीकी... अगर यह खबर बहार निकल गयी तोह मैं मुंह दिखने के क़ाबिल नहीं रहूँगा," रशीद साहब की आवाज़ भरी थी. "सीमा और उस्मान... मेरे बचे... कैसे कर सकते हैं?"

सिद्दीकी साहब ने उनका सहना thap-thapaya. "रशीद, अभी सिर्फ अफवाहें हैं. तुम्हे फ़ौरन हैदराबाद निकलना चाहिए. बिलाल का कुछ पता नहीं, कहीं वह गुस्से में कुछ गलत न कर बैठे."

नसीम दबे पाऊँ नीचे उत्तरी. उसे अब अपने गुनाह से ज़्यादा अपने बचो की फ़िक्र हो रही थी, मगर उसके जिस्म में अभी भी वह गर्माहट बाकी थी जो हमजा ने छोड़ी थी. वह रशीद साहब के पास आयी.

"आप... आप हैदराबाद जायेंगे?" नसीम ने पूछा.

रशीद साहब ने सर उठाया. उनकी आँखों में ठक्कन और डर था. "हाँ नसीम. हमें आज hi निकलना होगा. बिलाल का फ़ोन बंद जा रहा है. मुझे डर है के वह सीमा या उस्मान को नुकसान न पहुंचा दे."

सन 3: किचन की तपिश और हिरा का वॉर

नसीम किचन में दोपहर का खाना तैयार कर रही थी. पसीने की बूँदें उसके गोर माथे से फिसल कर उसकी लॉन की क़मीज़ के गले में जज़्ब हो रही थीं. उसका dil-o-dimagh सालन पकने में बिलकुल भी नहीं था. उसका जिस्म अभी भी हमजा की रात वाली be-reham चुदाई की ठक्कन से चूर था. उसका 52 साल का भरा हुआ बदन, जो बरसों से रशीद साहिब की बेरुखी का शिकार था, अब एक अजीब सी जलन और लुत्फ़ के बीच झूल रहा था. जब भी वह चलती, उसकी छूट में हमजा के मोठे और सख्त लुंड की रगड़ का एहसास ताज़ा हो जाता. मगर इस जिस्मानी सुकून के ऊपर हिरा की ब्लैकमेलिंग का साया मंडला रहा था.

तभी हिरा दबे पाऊँ किचन में दाखिल हुई. उसने दरवाज़ा हल्का सा बंद किया और नसीम के बिलकुल पीछे कड़ी हो गयी.

"अम्मी... सालन जल रहा है, बिलकुल वैसे hi जैसे आप रात को हमजा के साथ जल रही थीं," हिरा ने सरगोशी की. उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था.

नसीम बुरी तरह चऊंक गयी. उसने पलट कर देखा, हिरा के चेहरे पर वही मख़सूस शैतानी मुस्कराहट थी. "हिरा... तू... तू क्या कह रही है? मैंने कहा न वह एअर्रिंग वहां गिर गयी होगी."

हिरा ने आगे बढ़ कर नसीम के कान के पास अपना चेहरा किया. "अम्मी, मुझसे झूट मत बोलिये. मैंने सिर्फ एअर्रिंग नहीं देखि... मैंने आप दोनों की सिसकारियां भी सुनी हैं. कितनी बेशर्म हैं आप? अपने hi जवान बेटे को अपनी छूट पर सवार कर लिया?"

नसीम का चेहरा शर्म से लाल हो गया. "हिरा, खुदा के लिए चुप कर जा... कोई सुन लेगा."

"कोई नहीं सुनेगा अम्मी. अब्बू अपने कमरे में हैदराबाद की डील के सिलसिले में फ़ोन पर मसरूफ हैं. आयेशा ऊपर अपने कमरे में पढ़ाई कर रही है. वह बेचारी तोह अभी तक इस घर की असलियत से be-khabar है," हिरा ने नसीम के सहने पर हाथ रखा और उसे ज़ोर से दबाया. "लेकिन मैं खामोश तभी रहूंगी जब मुझे मेरा हिस्सा मिलेगा."

"हिस्सा? कैसा हिस्सा?" नसीम ने घबरा कर पुछा.

"हमजा... मुझे पता है वह आपका दीवाना हो चुकी है. मुझे भी उसका साथ चाहिए. और आप... आप मुझे उस तक पहुंचने का रास्ता देंगी. अगर आपने रुकावट डाली, तोह यह एअर्रिंग, और रिकॉर्डिंग और जो कुछ मैंने देखा है, वह सब अब्बू के सामने होगा," हिरा ने धमकी दी और किचन से बहार निकल गयी.

सन 4: हमजा का कमरा और Yaad-e-Maazi

हमजा अपने बिस्तर पर लेता हुआ था. उसका जिस्म थका हुआ था, मगर दिमाग में एक अजीब सी हलचल थी. उसकी आँखें छत पर लगे पंखे को देख रही थीं जो हलकी सी आवाज़ के साथ घूम रहा था. कमरे में अभी भी नसीम अम्मी की महक बाकी thi—wahi संदल और चमेली का मिलाप जो उनके जिस्म से phoot-ta था.

हमजा ने करवट ली तोह तकिये के नीचे से उसकी माँ के बाल का एक toot-ta हुआ गुच्छा मिला. उसने उसे देखा और उसके जिस्म में एक लहार सी दौड़ गयी. कल रात जो कुछ hua—apni hi माँ के साथ वह जिस्मानी talluq—woh एक ख्वाब लग रहा था. एक ऐसा ख्वाब जिसने उसे एक पल में बचा से मर्द बना दिया था. मगर इस मर्दानगी के साथ एक भरी बोझ भी था. "क्या मैं ने सही किया?" उसने खुद से सवाल किया. मगर उसके जिस्म की यादें, उसकी माँ की वह सिसकारियां और वह गरम सांसें, उसके हर सवाल का जवाब थीं.

उसे डर था के जब अम्मी वापस आएँगी, तोह क्या वह उनकी आँखों में देख पायेगा? क्या उनका "Maa-Bete" वाला लिहाज़ वैसा hi रहेगा या अब हर बार जब वह उसे "हमजा" कह कर पुकारेंगी, उनकी आवाज़ में वही पुराणी ममता होगी या फिर कल रात वाली हवस?

*हिरा एपीआई का वार और साइकोलॉजिकल जुंग*

तभी दरवाज़ा खुला और हिरा दबे पाऊँ अंदर दाखिल हुई. हिरा की उम्र ज़्यादा नहीं थी, मगर उसकी आँखों में एक ऐसी शैतानियत थी जो इस घर के हर राज़ को भांप लेती थी. उसने दरवाज़ा अंदर से बंद किया और हमजा के बीएड के पास आकर कड़ी हो गयी.

"सो गए क्या हमजा?" हिरा ने बड़े नरम लहजे में पूछा, मगर उसके लहजे में एक अजीब सी लचक थी.

हमजा हड़बड़ा कर उठ बैठा. "जी एपीआई, बस लेट गया था. आप यहाँ इस वक़्त?"

हिरा बीएड पर बैठ गयी. उसने एक बारीक़ सी लॉन की क़मीज़ पहनी हुई थी जिसके गले से उसके गोर कंधे साफ़ दिख रहे थे. "अम्मी और अब्बू शायद हैदराबाद जाने वाले हैं. मुझे लगता है तुम्हे बहोत khali-pan महसूस होगा."

हमजा ने नज़रें चुरायीं. "आप क्या कह रही हैं एपीआई?"

हिरा ने अपना मोबाइल निकला और वही रिकॉर्डिंग प्ले की जो उसने कल रात हमजा के दरवाज़े के बहार से की थी. Ammi(Naseem) की दबी हुई चीखें और हमजा की भरी हुई सांसें कमरे में गूंजने लगीं. हमजा का चेहरा सफ़ेद पद गया. उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा के उसे लगा के वह अभी पहात जायेगा.

"हिरा एपीआई... यह... यह आपने..." हमजा की आवाज़ निकलना मुश्किल हो गयी.

हिरा ने रिकॉर्डिंग बंद की और मुस्कुरायी. "डरो मत हमजा. मैं ने कहा न, मैं कोई दुश्मन नहीं हूँ. मगर तुमने तोह कमाल hi कर दिया. अम्मी को... मतलब मैं सोच भी नहीं सकती थी के तुम इतने हिम्मत वाले हो."

हिरा ने अपना हाथ हमजा के घुटने पर रखा. "हमजा, मुझे गुस्सा नहीं आ रहा. बल्कि मुझे तोह तुम पर ta'ajjub हो रहा है. इस घर में सब ऊपर से परसा बनते हैं, मगर अंदर से सब प्यासे हैं. सीमा एपीआई और उस्मान भाई हैदराबाद में जो कर रहे हैं, वह भी तोह यही है न? फिर हम क्यों पीछे रहे?"

हमजा ने हैरत से अपनी बहन को देखा. हिरा की आँखों में कोई मलामत (ब्लामे) नहीं थी. उसने महसूस किया के हिरा उस पर गुस्सा होने के बजाय उस की "sharik-e-jurm" बनना चाहती है.

"आप... आप क्या चाहती हैं हिरा एपीआई?" हमजा ने सरगोशी की.

हिरा थोड़ा और क़रीब आयी. उसके जिस्म की गर्माहट हमजा को महसूस हो रही थी. "मैं बस यह चाहती हूँ के इस घर में अब परदे ख़तम हो जाएं. हमजा, तू सब से छोटा है, मगर तू अब हमारी ज़रुरत बन गया है. अम्मी को शायद हैदराबाद जाना पढ़े... मगर मैं तोह यहाँ हूँ न? क्या तुझे नहीं लगता के मुझे भी वही सुकून चाहिए जो तूने अम्मी को दिया?"

हमजा के अंदर एक जुंग शुरू हो गयी. एक तरफ हिरा उसकी बहन थी, जिसे वह "एपीआई" कहता था, और दूसरी तरफ वह एक कमसिन लड़की थी जो उसे दावत दे रही थी. एक यह डर के "कोई देख लेगा" और यह "लज़्ज़त" के "यह मेरी बहन है", इन दोनों जज़्बातों ने हमजा के दिमाग को सुन्न कर दिया.

"हिरा एपीआई... हम यह नहीं कर सकते. अब्बू मार डालेंगे," हमजा ने कमज़ोर सी कोशिश की.

"अब्बू और अम्मी यहाँ नहीं होंगे हमजा, कुछ hi देर में वो हैदराबाद के लिए निकलने वाले हैं. और आयेशा बजी अपने कमरे में बंद हैं. आज से, इस घर में कोई किसी का भाई या बहन नहीं, सिर्फ जिस्म हैं. मगर हाँ, दुनिया के लिए हम वही रहेंगे जो हम हैं. तू मुझे एपीआई hi कहेगा, और मैं तुझे हमजा hi पुकारूंगी. मगर इन बंद कमरों में..." हिरा ने बात अधूरी छोड़ी और हमजा के गाल पर एक हल्का सा बोसा (किश) देकर बहार निकल गयी.

सन 5: आयेशा की मासूमियत और रशीद का इज़्तिराब

इधर हॉल में आयेशा अपनी किताबें लेकर बैठी थी. वह इस घर की सब से सुकून वाली शख्सियत लग रही थी. उसके लिए रिश्ते अभी भी वही पुराने और मुक़द्दस थे. वह अपनी पढ़ाई में इतनी मसरूफ थी के उसे एहसास hi नहीं था के उसकी माँ और bhai-bahen किस दलदल में धस चुके हैं.

रशीद साहिब हॉल में टहल रहे थे. उनके हाथ में मोबाइल था. वह हैदराबाद में मौजूद सीमा और उस्मान की कारकर्दगी से परेशां थे.

"हाँ बिलाल... तुम वहां पहुंच गए? डील का क्या हुआ?" रशीद साहिब ने फ़ोन पर पुछा.

बिलाल की आवाज़ दूसरी तरफ से थोड़ी अजीब थी. "जी अब्बू, मैं पहुंच गया हूँ. डील तोह चल रही है, मगर... सीमा और उस्मान थोड़े अजीब बेहवे कर रहे हैं. वह अक्सर होटल या फिर कभी किसी फार्महाउस में अकेले पाए जाते हैं. उनका बेहेवियर भी मुझे अजीब लगता है मुझे उन पर नज़र रखनी होगी." उसकी आवाज़ में शक और तजस्सुस भरा पड़ा था.

रशीद साहिब के मत्थे पर बल पद गए. "तुम फ़िक्र मत करो बिलाल, वह दोनों बचे हैं. तुम डील पर फोकस करो. हैदराबाद की यह ज़मीन हमारे लिए बहुत ज़रूरी है."

रशीद साहिब ने फ़ोन रखा और ठंडी सांस भरी. आयेशा ने उनकी तरफ देख कर मुस्कुराया. "अब्बू, आप ज़्यादा स्ट्रेस न लें. सीमा एपीआई और उस्मान भाई सब संभाल लेंगे."

रशीद साहिब ने आयेशा के सर पर हाथ रखा. "काश सब तुम्हारी तरह समझदार और paak-saaf होते बीटा." उन्हें क्या मालूम था के उनके पीछे उनकी बीवी और बीटा एक दूसरे के जिस्मो की आग बुझा रहे हैं.

*Episode 15 ख़तम*
 
घर की आग

Episode 16: खामोश साये और जिस्म की थरथराहट

लाहौर की उस हवेली में सुबह का मंज़र अजीब था. मॉडल टाउन की pur-sukoon गलियों में परिंदों की चहचहाट तोह थी, मगर रशीद अहमद के घर के अंदर एक ऐसी ख़ामोशी थी जो कानों में बज रही थी. दीवारों के भी कान होते हैं, मगर इस घर की दीवारों ने तोह अब वो राज़ अपने अंदर जज़्ब कर लिए थे जो अगर बहार निकलते तोह पूरा मोहल्ला राख हो जाता.

सन 1: रुखसती और अधूरे एहसास

रशीद साहिब ने अपना पुराण लाठर का बैग उठाया. उनके चेहरे पर फ़िक्र की गहरी लकीरें थीं. हैदराबाद में सीमा और उस्मान के चर्चे उनकी नींदें उदा चुके थे. उन्हें क्या मालूम था के उनके घर की असली आग तोह उनके अपने hi छत के नीचे सुलग रही है.

"नसीम! जल्दी करो, टैक्सी बहार कड़ी है," रशीद साहिब ने हॉल से आवाज़ दी.

नसीम कमरे से बहार निकली. उसने हलके नीले रंग का लॉन का जोड़ा पहना था. उसका 52 साल का बदन आज अजीब सी ठक्कन और जलन का शिकार था. रात भर हमजा के मोठे और be-reham लुंड ने उसके अंदर जो तूफ़ान उठाया था, उसकी तपिश अभी तक उसकी रनो (तइस) के बीच महसूस हो रही थी. जब वह चलती, तोह उसे अपनी छूट में एक अजीब सा geela-pan और दर्द महसूस होता, जो उसे bar-bar उस गुनाह की याद दिलाता जो उसने अपने बेटे के साथ किया था.

हमजा हॉल में खड़ा था. उसने अपनी माँ की तरफ देखा. नसीम की नज़रें जब हमजा से मिलीं, तोह उनमें एक पल के लिए वही पुराणी ममता आयी, मगर अगले hi पल वो हवस और शर्म की दलदल में धस गयीं.

"हमजा, अपना ख्याल रखना बीटा. और अपनी बहनो का भी," नसीम ने लरज़ते हुए लहज़े में कहा. उसने हमजा को "बीटा" तोह कहा, मगर उसके दिमाग में हमजा का वो नंगा बदन और वो काले सांप जैसा लुंड घूम रहा था जिसने रात भर उसे be-haal किया था.

"जी अम्मी... आप फ़िक्र न करें. मैं सब संभाल लूँगा," हमजा ने नज़रें नीचे करके जवाब दिया. उसके लिए अपनी माँ को "अम्मी" कहना अब पहले जैसा नहीं रहा था. उस ज़बान से जिसने रात भर अपनी माँ के मम्मों को चूसा था, "अम्मी" कहना उसे अंदर से काट रहा था.

रशीद साहिब ने हमजा के सहने पर हाथ रखा. "तुम घर के ज़िम्मेदार हो अब मेरे पीछे. हिरा और आयेशा तुम्हारे भरोसे हैं. किसी चीज़ की ज़रुरत हो तोह फ़ौरन फ़ोन करना."

हमजा ने सर हिला दिया. उसे डर लग रहा था के कहीं उसकी आँखों से उसकी शहवत (लस्ट) का राज़ फाश न हो जाये. गाडी गेट से बहार निकली, तोह घर में जैसे एक अजीब सा khali-pan छ गया. मगर ये khali-pan सुकून वाला नहीं था, बल्कि ये उस तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी थी जो अब इस हवेली को अपनी लपेट में लेने वाला था.

सन 2: हिरा का खामोश हमला

रशीद और नसीम के जाते hi हिरा ने दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया. उसने मुद कर हमजा की तरफ देखा. हिरा की आँखों में इस वक़्त कोई जलन या दुश्मनी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी तालाब थी जो पिछले कई दिनों से पनप रहे हवस की प्यास को बयां कर रही रही थी.

"तोह... mard-e-khana..., अब बताईये क्या इरादा है हमजा भाई?" हिरा ने सरगोशी की. उसने हमजा को "हमजा" कहा, मगर उसके लहज़े में "भाई" वाला रिश्ता कहीं गम हो चूका था.

"हिरा एपीआई... मैं... मैं थोड़ा थका हुआ हूँ. मैं अपने कमरे में जा रहा हूँ," हमजा ने पीछे hat-te हुए कहा. उसे हिरा से डर लग रहा था, मगर उसकी बातों में जो कशिश थी, वो उसके जिस्म को गरमा रही थी.

हिरा मुस्कुरा कर उसके क़रीब आयी. "थक तोह तुम जाओगे hi न... अम्मी को जो तुमने रात भर सुकून दिया है, वो कोई मामूली बात तोह है नहीं. मगर हमजा, मुझे भूल गए? मैंने तुमसे कहा था न... मुझे मेरा हिस्सा चाहिए."

हिरा ने हमजा का बाज़ू पकड़ा और उसे धीरे से किचन की तरफ खिंचा. "आयेशा बजी ऊपर पढ़ रही हैं. वह बहुत मासूम हैं, उन्हे शायद कुछ नहीं पता. मगर हम दोनों..., हम तोह जानते हैं न के इस घर की गर्मी कितनी बढ़ गयी है."

किचन में दाखिल होते hi हिरा ने हमजा को दीवार से लगा दिया. हमजा का दिल dhak-dhak कर रहा था. उसने देखा के हिरा ने बारीक़ लॉन की क़मीज़ पहनी हुई थी जिसके निचे उसकी ब्रा की लास साफ़ नज़र आ रही थी. हिरा की कमसिन और जवान जिस्म की महक हमजा के होश उदा रही थी.





"हिरा एपीआई... यह ठीक नहीं है. आप मेरी बहन हैं," हमजा ने कमज़ोर सी कोशिश की.

हिरा ने अपना हाथ हमजा की जीन्स के ऊपर उसके उभरते हुए लुंड पर रख दिया.





"बहन हूँ न... तभी तोह इतना हक़ है. देखो, यह तोह कुछ और hi कह रहा है. हमजा, क्यों इतनी झिझक दिखा रहे हो? क्या तुम्हे मेरी जवानी अम्मी के भरे हुए बदन से काम लगती है?"

हमजा की सांस अटक गयी. हिरा की नरम हथेली जब उसके सख्त होते हुए लुंड पर गिरी, तोह उसके दिमाग के सारे परदे गिर गए. मगर उसके दिल में अभी भी एक डर tha—sharam का डर, रिश्तों के पामाल होने का डर.

"एपीआई... प्लीज... कोई देख लेगा," उसने सरगोशी की.

"कोई नहीं देखेगा," हिरा ने उसके कान के पास अपने होंठ किये. "और अगर देख भी लिया... तोह इस घर में अब सब को इसी राह पर चलना है. तुम देखना हमजा, धीरे धीरे हम सब एक दूसरे के जिस्मो से खेलेंगे. मगर पहले... मुझे दिखाओ के तुमने अम्मी को कैसे तड़पाया था."

हिरा ने अपनी क़मीज़ के ऊपर से hi हमजा का हाथ पकड़ कर अपने नरम और कमसिन मम्मी पर रख दिया. हमजा ने महसूस किया के हिरा का जिस्म thar-thara रहा था. यह थरथराहट गुस्से की नहीं, बल्कि उस खौफ और लज़्ज़त की थी जो एक बहन को अपने भाई के हाथ से मिल रही थी.

सन 3: आयेशा की ख़ामोशी और साइकोलॉजिकल ड्रामा

ऊपर कमरे में आयेशा बैठी अपनी किताबें देख रही थी. मगर उसका ध्यान पढ़ाई में बिलकुल नहीं था. वह इस घर की सब से बड़ी और सब से "परसा" बेटी मणि जाती थी. उसने नीचे से आने वाली सरगोशियों की हलकी सी आवाज़ सुनी थी. उसका दिल ज़ोर से धारक रहा था.

आयेशा ने अपनी डायरी खोली. उसमे उसने लिखा: "आज अम्मी और अब्बू गए हैं. घर में एक अजीब सी तपिश है. मैंने देखा के कैसे हिरा, हमजा को किचन में ले गयी. मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी है. क्या मुझे उन्हें रोकना चाहिए? या फिर... क्या मुझे भी वही चाहिए जो वह दोनों कर रहे हैं? रिश्तों का ये बोझ कितना भरी है."

आयेशा की शख्सियत में एक गहरा साइकोलॉजिकल कनफ्लिक्ट था. वह ऊपर से जितनी pur-sukoon दिखती थी, अंदर से उतनी hi प्यासी थी. उसने बचपन से hi देखा था के उसके बाप ने उसकी माँ को कैसे इग्नोर किया था. उसने सीमा और उस्मान के ताल्लुक़ात की भनक भी पा ली थी. मगर वह डर रही थी. वह "झिझक" खुद को रोके हुए थी.

वह कमरे से बहार निकली और कॉरिडोर की रेलिंग से नीचे देखने लगी. किचन का दरवाज़ा आधा खुला था. उसे हमजा की पीठ दिख रही थी और हिरा के नंगे बाज़ू जो हमजा की गर्दन में डेल हुए थे. आयेशा का जिस्म पसीने में शराबोर हो गया. उसने अपने होंठ दांतो टेल दबा लिए. उसे शर्म आ रही थी के वह अपनी बहन और भाई को इस हाल में देख रही है, मगर वह वहां से हिली नहीं. उसका अपना जिस्म भी उस आग की लपेट में आने लगा था.

सन 4: किचन की तन्हाई और जिस्म की आंच

किचन के अंदर, हमजा अब पूरी तरह हिरा के सहर में था. उसने हिरा की क़मीज़ के नीचे हाथ डाला और उसकी नरम कमर को सहलाने लगा. हिरा ने एक गहरी कराह (मोअन) ली.

"ओह्ह्ह... हमजा... तुम्हारे हाथ कितने बड़े हैं," हिरा ने सरगोशी की. "क्या तुमने अम्मी को भी ऐसे hi पकड़ा था?"

"हिरा एपीआई... वो... वो बस हो गया," हमजा ने सरगोशी की. "मुझे डर लग रहा है के मैं आपके साथ कुछ गलत न कर दूँ."

"गलत तोह हम कर hi रहे हैं हमजा. मगर इस गलत में जो लज़्ज़त है, वो हमें कहीं और नहीं मिलेगी," हिरा ने हमजा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

यह बोसा (किश) पहले तोह बहुत धीमा था, जिसमें सदियों की झिझक भरी हुई थी. दोनों को लग रहा था के वो कोई बहुत बड़ा गुनाह कर रहे हैं. मगर जैसे hi उनके होंठ मिले, हवस की आग ने शर्म को जला कर राख कर दिया. हमजा ने हिरा को अपनी तरफ ज़ोर से खिंचा. हिरा के कमसिन मम्मी हमजा के सख्त सीने से टकराये.

हमजा ने हिरा की क़मीज़ के बटन खोलना शुरू किये. उसका हाथ कैंप रहा था. एक बहन के जिस्म को नंगा करना उसके लिए एक अज़ाब भी था और एक ऐसी लज़्ज़त भी जिसका उसने कभी तसव्वुर नहीं किया था. जैसे hi क़मीज़ के बटन खुले, हिरा के गोर और नरम कंधे साफ़ नज़र आने लगे. उसकी ब्रा ने उसके उभरते हुए बदन को बड़ी मुश्किल से संभाला हुआ था.

"हिरा एपीआई... आप... आप बहुत खूबसूरत हैं," हमजा ने हप्ते हुए कहा.

"और तुम... तुम बहुत गरम हो हमजा," हिरा ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया. "डरो मत. आज इस घर में कोई किसी का रिश्तेदार नहीं. आज सिर्फ हम दोनों हैं."

हमजा ने हिरा की ब्रा के हुक को खोला. हिरा के गोर और गोल मम्मी एक झटके से आज़ाद हो गए. उनके निप्पल्स सख्त थे, जैसे वो हमजा की ज़बान का इंतज़ार कर रहे हों. हमजा ने एक पल के लिए रुका. उसने अपनी बहन के नंगे बदन को देखा. उसकी आँखों में शर्म थी, मगर जिस्म में शिद्दत. उसने झुक कर हिरा के एक निप्पल को अपने मुंह में भर लिया.

"आआह्ह्ह्हह! हमज़ाआ...!" हिरा की एक चीख निकलने hi वाली थी के उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिया. "धीरे... आयेशा ऊपर है... आह्हः... कितना मज़ा आ रहा है... चूसो मेरे भाई... अपनी बहन को पूरा निचोड़ लो."





हमजा ने पूरी शिद्दत से हिरा के मम्मों को चूसना शुरू किया. उसे महसूस हो रहा था के हिरा का जिस्म बिलकुल माँ की तरह पिघल रहा है. वो दोनों किचन के स्लैब पर hi एक दूसरे से लिपटे हुए थे.

**यह Episode अभी ख़त्म नहीं हुआ है**
 
घर की आग

Episode 16: खामोश साये और जिस्म की थरथराहट (दूसरा हिस्सा)
सन 5: बिलाल की बेचैनी और हमजा का ज़ब्त

उसी वक़्त हॉल में रखा हुआ लैंडलाइन फ़ोन बज उठा. दोनों बुरी तरह चऊंक गए. हमजा ने फ़ौरन हिरा को छोड़ा और हिरा ने जल्दी से अपनी क़मीज़ के परदे बराबर किये.

"कौन हो सकता है?" हमजा ने घबराई हुई आवाज़ में पूछा.

"पता नहीं... तुम जा कर देखो, मैं यहाँ ठीक करती हूँ," हिरा ने हप्ते हुए कहा.

हमजा हॉल में आया और फ़ोन उठाया.

दूसरी तरफ से बिलाल की सांसें तेज़ थीं, जैसे वो किसी गहरी अज़ीयत (पैन) से गुज़र रहा हो.

"हमजा? रशीद अब्बू पहुंच गए?" बिलाल ने पूछा.

"नहीं बिलाल भाई, वो तोह अभी रस्ते में होंगे. क्या हुआ? सब ठीक है?" हमजा ने अपने जज़्बात को काबू में करते हुए पूछा.

"कुछ ठीक नहीं है हमजा! सीमा और उस्मान... मैंने उन्हें आज फिर से एक साथ देखा है. वह दोनों फार्महाउस के बंद कमरे में थे. मैंने दरवाज़ा खटखटाया तोह उन्हों ने खोला hi नहीं. जब खोला तोह उनके कपडे बिखरे हुए थे.

"बिलाल भाई, आप हौसला रखें. अब्बू और अम्मी अभी टैक्सी में हैं, बस कुछ hi घंटों में हैदराबाद पहुंच जायेंगे," हमजा ने अपनी आवाज़ को सँभालते हुए कहा, हालांकि उसकी अपनी सांसें अभी तक किचन की उस तपिश से भरी हुई थीं.

"हमजा... मैं मज़ीद इंतज़ार नहीं कर सकता," बिलाल की आवाज़ शिकस्ता (ब्रोकन) थी. "यहाँ का माहोल hi मेरा डैम घुटने के लिए काफी है. सीमा और उस्मान की आँखों में अब मेरे लिए कोई लिहाज़ नहीं रहा. मैंने उन्हें एक साथ देख कर जब सवाल किया, तोह उनके चेहरों पर शर्म के बजाय एक अजीब सी dheet-pan थी. मेरा दिल कर रहा है के सब छोड़ कर लाहौर लौट आऊं."

हमजा ने हिरा की तरफ देखा जो किचन के दरवाज़े पर खरी अपने बिखरे बालों को संवर रही थी. "नहीं बिलाल भाई, आप ऐसा मत करें. अगर आप इस वक़्त वहां से निकल आये तोह अब्बू अकेले सब कैसे संभालेंगे? आप थोड़ा वक़्त और रुक जाएं. अम्मी के पहुंचते hi सब ठंडा हो जायेगा. वो सीमा एपीआई को समझा लेंगी."

हमजा ने जब "अम्मी" का नाम लिया, तोह उसके जिस्म में एक झुरझुरी सी दौर गयी. उसे याद आया के उसकी वही "समझदार" अम्मी कल रात उसके नीचे तड़प रही थीं.

"ठीक है हमजा... मैं सिर्फ रशीद अब्बू की वजह से रुका हूँ. मगर मेरा सब्र अब जवाब दे रहा है," बिलाल ने ठंडी सांस भरी और फ़ोन रख दिया.

सन 6: आयेशा का इंकिशाफ़ और कवि बातें

हमजा ने फ़ोन रखा hi था के कॉरिडोर में क़दमों की आवाज़ सुनी. दोनों ने पलट कर देखा तोह आयेशा बजी खरी थीं. उनका चेहरा गुस्से और नफरत से सुर्ख था. उन्हों ने दुपट्टा सर से हटा कर कंधे पर डाला हुआ था और उनकी आँखें सीधा हमजा और हिरा के बिखरे हुए हुलिए पर थीं.

"शर्म... क्या इस लफ्ज़ का कोई वजूद बचा है इस घर में?" आयेशा की आवाज़ काँप रही थी, मगर उसमें एक अजीब सी सख्ती थी.

हिरा ने अपनी क़मीज़ का गाला दरुस्त करते हुए dheet-pan से कहा, "आयेशा बजी, आप क्या कह रही हैं? हम तोह बस..."

"बस क्या? किचन में जो तुम दोनों nanga-naach कर रहे थे, क्या वो मैंने नहीं देखा?" आयेशा आगे बरही और हिरा के बिलकुल सामने खरी हो गयी. "वहां हैदराबाद में घर की इज़्ज़त नीलम हो रही है, और यहाँ तुम दोनों ने बेशर्मी की साड़ी हदें पर कर दी हैं. हमजा! तुम्हे तोह मैं सब से मासूम समझती थी, मगर तुम तोह इस घर के सब से बड़े गुनहगार निकले."





हमजा ने सर झुका लिया. "बजी... वो... हम से ग़लती हो गयी."

"ग़लती?" आयेशा ने केहक़हा लगाया, मगर उसमें दर्द था. "ग़लती एक बार होती है हमजा. कल रात जब तुम अम्मी के कमरे में थे, क्या वो भी ग़लती थी? मैंने सब देखा है. मैं खामोश थी क्यूंकि मुझे लगा के शायद ये बुरा ख्वाब है, मगर आज जो किचन में हुआ... उसने साबित कर दिया के इस घर की दीवारों में हवस भर चुकी है."

सन 7: धमकी और हिरा की सफाई

आयेशा ने दोनों की तरफ देख कर ऊँगली उठायी. "मैं ये सब मज़ीद बर्दाश्त नहीं कर सकती. इस घर का सुकून, इसकी hansi-khushi सब राख हो रही है. मैं अभी अम्मी को फ़ोन करुँगी और उन्हें बताउंगी के यहाँ क्या गुल खिलाये जा रहे हैं. और अब्बू... उन्हें पता चल गया तोह वो तुम दोनों को ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे."

हमजा के चेहरे पर खौफ छ गया, मगर हिरा के तेवर बदल गए. उसने आयेशा की धमकी से डरने के बजाय एक गहरी सांस ली और आयेशा के क़रीब आयी.

"आयेशा बजी... आप kis-kis का गुनाह गिनवाएंगी?" हिरा ने नरम मगर kaat-dar लहज़े में पूछा. "अम्मी का? मेरा? हमजा का? या फिर सीमा एपीआई और उस्मान भाई का?"





"हिरा, अपनी ज़बान को लगाम दो!" आयेशा चीखी.

"क्यों बजी? सच sun-na इतना मुश्किल है?" हिरा ने आयेशा के सहने पर हाथ रखा, जिसे आयेशा ने झटक दिया. "आप हमें khari-khoti सुना रही हैं, मगर क्या आपने कभी अपने अंदर की उस औरत को देखा है जो इस घर की तन्हाई में जलती है? आप जो ये 'परसा' बन कर घूम रही हैं, क्या आपका दिल नहीं चाहता के कोई आपको भी वैसे hi पकडे जैसे हमजा ने मुझे पकड़ा?"

आयेशा की आँखों में एक पल के लिए घबराहट आयी, मगर उसने खुद को संभाला. "बकवास मत करो हिरा!"

"ये बकवास नहीं है बजी, ये इस घर की हक़ीक़त है," हिरा ने हमजा की तरफ इशारा किया. "अम्मी को देखें, उन्हों ने अपनी ज़िन्दगी अब्बू की बेरुखी में गुज़ार दी. आज अगर उन्हें अपने बेटे के जिस्म में सुकून मिला है, तोह क्या वो गुनहगार हैं? सीमा एपीआई को देखें, बिलाल भाई से उन्हें वो तपिश नहीं मिली जो उस्मान भाई ने दी. हम सब सिर्फ अपनी ज़रुरत पूरी कर रहे हैं. अगर आप ने अम्मी या अब्बू को बताया, तोह याद रखें... ये घर बिखर जायेगा. इज़्ज़त तोह जाएगी hi, मगर हम सब एक दूसरे के दुश्मन बन जायेंगे."

आयेशा खामोश हो गयी. उसका सांस तेज़ हो गया था. हिरा की बातें उसके दिमाग में हथोड़े की तरह लग रही थीं.

"आयेशा बजी," हमजा ने धीरे से कहा, "हम आपको दुःख नहीं देना चाहते. मगर प्लीज... हमें इस वक़्त मत बिखरें. घर पहले hi मुश्किल में है."

आयेशा ने नफरत से हमजा की तरफ देखा. "तुम सब ने मिल कर मुझे अकेला और परेशां कर दिया है. मगर याद रखना... ये आग सब को जलायेगी."

आयेशा तेज़ी से ऊपर अपने कमरे की तरफ भागी और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया. हॉल में अब सिर्फ हमजा और हिरा रह गए थे.

सन 8: हैदराबाद की एंट्री और सियाह रात

उधर हैदराबाद में, टैक्सी एक पुराने फार्महाउस के सामने रुकी. रशीद साहिब और नसीम निचे उतरे. फार्महाउस की बत्तियां मद्धम थीं.

नसीम का दिल धारक रहा था. उसने अपने दुपट्टे को सही किया. उसके दिमाग में अभी भी लाहौर के वो मनाज़िर थे, मगर सामने जो आग लगने वाली थी, वो शायद इससे भी भयानक थी.

रशीद साहिब ने फार्महाउस का दरवाज़ा धाक्केला. अंदर से बिलाल निकला, उसका हुलिया बिगड़ा हुआ था.

"अब्बू... आप आ गए," बिलाल ने थकी हुई आवाज़ में कहा.

"कहाँ हैं वो दोनों?" रशीद साहिब ने गरज कर पूछा.

बिलाल ने एक बंद कमरे की तरफ इशारा किया. "अंदर हैं. सुबह से दरवाज़ा नहीं खोला."

रशीद साहिब कमरे की तरफ बढ़े, मगर नसीम ने उनका हाथ पकड़ लिया. "रशीद... हौसला रखें. बात बिगड़ सकती है."

"बात तोह कब की बिगड़ चुकी है नसीम!" रशीद ने दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाया. "उस्मान! सीमा! बहार निकलो!"

अंदर से थोड़ी देर तक कोई आवाज़ नहीं आयी. फिर धीरे से दरवाज़ा खुला. उस्मान बहार निकला, उसका शर्ट के बटन खुले थे और वो पसीने में शराबोर था. उसके पीछे सीमा खरी थी, उसकी आँखें रोने की वजह से सूजी हुई थीं, मगर उनमें शर्म से ज़्यादा एक अजीब सी बग़ावत (रिबेलियन) थी.





नसीम ने जब अपनी बेटी और बेटे को इस हाल में देखा, तोह उसे अपने और हमजा के वो लम्हात याद आ गए. उसने नज़रें चुरा लें. उसे महसूस हुआ के वो इन्हें सजा देने का हक़ खो चुकी है.

Episode खतम

क्लिफहैंगर: रशीद साहिब का गुस्सा अब किस हद तक जायेगा? क्या नसीम अपने बचो का साथ देगी या अपने गुनाह के खौफ में खामोश रहेगी? और लाहौर में, आयेशा की ख़ामोशी क्या किसी बड़े तूफ़ान का pesh-khima (प्रील्यूड) है?
 
घर की आग

Episode 17: गुनाह का कफ़्फ़ारा

हैदराबाद के उस पुराने फार्महाउस में सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था. बहार गर्मी का ज़ोर था, मगर कमरे के अंदर की तपिश जज़्बाती और नफ़्सियति (साइकोलॉजिकल) थी. रशीद साहिब एक कुर्सी पर बैठे थे, उनका चेहरा हथेलियों में छुपा हुआ था, जैसे वो अपनी इज़्ज़त के जनाज़े को देख रहे हों. नसीम एक कोने में खरी थी, उसका दिल धारक रहा tha—is डर से नहीं के क्या होगा, बल्कि इस खौफ से के वो खुद भी उसी रास्ते की मुसाफिर थी जिस पर आज उसकी बेटी खरी थी.

सन 1: शिकस्ता बाप और बाघी बचे

रशीद साहिब ने धीरे से सर उठाया. उनकी आँखें सुर्ख थीं. "उस्मान... सीमा... क्या एहि दिन देखने के लिए तुम्हें पला था? Bhai-bahen का रिश्ता मुक़द्दस होता है, तुमने उसे बाजार बना दिया?"

उस्मान ने अपने शर्ट के बटन बंद किये, मगर उसकी नज़रों में कोई पशिमानी (रिग्रेट) नहीं थी. उसने एक गहरी सांस ली और अपने बाप की आँखों में देखा.

"अब्बू, आप इज़्ज़त और मुक़द्दस रिश्तों की बात करते हैं?" उस्मान की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी. "क्या आपने कभी सोंचा के हम इस राह किस तरह पहुंचे? सीमा एपीआई की शादी को चार साल हो गए, मगर बिलाल भाई ने उन्हें कभी वो वक़्त, वो तवज्जो नहीं दी जिसकी वो हक़दार थीं. और मैं? मैं इस घर में हमेशा अकेला रहा. हम ने एक दूसरे में वो सकूं ढूंढा जो हमें कहीं और नहीं मिला. ये हवस नहीं थी अब्बू... ये तन्हाई का नतीजा था."

सीमा ने रट हुए अपने बाप के पाऊँ पकड़ लिए. "अब्बू, मुझे माफ़ कर दें. मगर सच तोह ये है के बिलाल के साथ रहते हुए भी मैं प्यासी थी. उस्मान ने मुझे वो एहसास दिया के मैं ज़िंदा हूँ. हमें डर लगता था, हम रट थे, मगर ये खिंचाव इतना सख्त था के हम रुक नहीं पाए."

रशीद साहिब ने नफरत से अपना पाऊँ पीछे खिंचा. "तन्हाई गुनाह का जवाज़ (एक्सक्यूज़) नहीं होती सीमा. तुमने इस घर की बुनियादें हिला दी हैं."

सन 2: बिलाल का फैसला और इज़्ज़त का सवाल

बिलाल, जो अब तक खामोश खरा ये सब देख रहा था, आगे बढ़ा. उसका चेहरा बिलकुल सपाट (फ्लैट) था, मगर उसकी आँखों में आग थी.

"अब्बू, मैंने आपका हमेशा एहतिराम किया है," बिलाल ने सख्ती से कहा. "मगर अब मज़ीद नहीं. सीमा ने जो किया है, उसके बाद मेरा इस घर से कोई ताल्लुक़ नहीं बनता. मैं कराची जा कर डाइवोर्स के पेपर्स तैयार करूँगा. मुझसे ये be-ghairati बर्दाश्त नहीं होती के मेरी बीवी अपने hi भाई की बाँहों में सोये."

"नहीं बिलाल! ऐसा मत करना!" नसीम चीखी. वो दबे पाऊँ बिलाल के पास आयी. "अगर तुमने डाइवोर्स दी, तोह पूरे लाहौर में हमारा तमाशा बन जायेगा. लोग थूकेंगे हम पर. मेरी बेटी की ज़िन्दगी तबाह हो जाएगी."

"तबाह तोह मेरी ज़िन्दगी हो गयी है अम्मी!" बिलाल ने गुस्से में कहा. "मैं अब इस रिश्ते को नहीं ढो सकता."

रशीद साहिब ने देखा के उनका घर बिखर रहा है. उनकी 'इज़्ज़त' जो उन्हें हर चीज़ से प्यारी थी, मिटटी में मिलने वाली थी. उन्हों ने नसीम की तरफ देखा. उनकी नज़रों में एक खामोश इल्तेजा थी, जैसे वो कह रहे हों के 'इस तबाही को रोको, चाहे जो भी क़ीमत ऐडा करनी परे'.

सन 3: नसीम की तन्हाई और गुनाह का एहसास

नसीम ने किचन का रुक किया चाय पानी के इंतेज़ाम के बहाने से. वो वहां खरी कैंप रही थी. उसे हमजा की याद आयी. उसने भी तोह वही किया था जो सीमा ने किया. वो कैसे सीमा को बुरा कह सकती थी? उसने महसूस किया के इस घर के हर मर्द और औरत के अंदर एक आग है.

उसे समझ आ गया था के रशीद साहिब अब इस उम्र में ये स्ट्रेस बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, बिलाल का गुस्सा ठंडा करना उनके लिए अब आसान नहीं होगा. बिलाल जवान है, और उसकी 'ग़ैरत' और 'गुस्सा' दोनों शिद्दत पर हैं. नसीम ने अपना हुलिया दरुस्त किया. उसने अपने दुपट्टे को हलके से सरकने दिया, जैसे उसने हमजा के सामने किया था. उसने फैसला कर लिया था के वो अपनी बेटी का घर बचने के लिए खुद को 'कफ़्फ़ारा' (एटोनमेंट) के तौर पर पेश करेगी.

सन 4: इज़्तिराब और हैरत की इन्तहा

रात का पिछले पहर था. हैदराबाद की खामोश फ़ज़ाओं में सिर्फ झींझारों की आवाज़ थी. बिलाल गेस्ट रूम में बैठा दीवार को तक रहा था. उसका दिमाग सुन्न था. सीमा और उस्मान का मंज़र उसकी आँखों के सामने किसी पुराणी फिल्म की तरह चल रहा था. उसका दिल कर रहा था के सब कुछ जला कर राख कर दे.

तभी दरवाज़ा धीरे से खुला. नसीम दाखिल हुई. उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था और आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी जो बिलाल ने पहले कभी नहीं देखि थी.

"बिलाल..." नसीम ने सरगोशी की.

बिलाल ने नफरत से सर उठाया. "अम्मी, प्लीज. मुझे अकेला छोड़ दें. मुझे इस घर के किसी भी किरदार से अब हमदर्दी नहीं रही. आपकी बेटी ने मेरी मर्दानगी का तमाशा बनाया है."

नसीम आहिस्तगी से उसके क़रीब आयी और उसके क़दमों में बैठ गयी. बिलाल बुरी तरह चऊंक गया. "अम्मी.....! ये क्या कर रही हैं आप? उठें यहाँ से!"

"नहीं बिलाल... आज मुझे यही रहने दो," नसीम ने बिलाल के घुटनो पर अपना सर रख दिया. उसका जिस्म लरज़ रहा था. "सीमा ने जो किया, वो एक माँ की मौत है. मगर बिलाल, मैं इस घर को बिखरते नहीं देख सकती. रशीद साहिब ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे."

"तोह मैं क्या करून?" बिलाल चिल्ला उठा, मगर उसकी आवाज़ कमरे की दीवारों तक hi रही. "मैं उस औरत के साथ कैसे रहूँ जो अपने hi भाई की बाँहों में रही हो? क्या मेरी कोई इज़्ज़त नहीं?"

नसीम ने सर उठाया. उसने बिलाल का हाथ पकड़ कर अपने चेहरे पर रखा. "तुम्हारी इज़्ज़त का कफ़्फ़ारा मैं ऐडा करुँगी बिलाल. सीमा बची है, वो भटक गयी... मगर मैं... मैं जानती हूँ के एक मर्द की ग़ैरत और उसका गुस्सा क्या होता है."

बिलाल की आँखें हैरत से पहात गयीं. "आप... आप ये क्या कह रही हैं? आप होश में तोह हैं?" उसका दिल इस बात को क़बूल करने से इंकार कर रहा था. वो औरत जो उसके लिए हमेशा 'माँ' के मर्तबे पर थी, आज ऐसी बातें कर रही थी?

सन 5: अजीज़ाना हवस और पिघलता लोहा

नसीम ने बिलाल का हाथ नहीं छोड़ा. वो धीरे धीरे खरी हुई और बिलाल के बिलकुल क़रीब बेथ गयी. उसके जिस्म से संदल और पसीने की एक mili-juli महक फूट रही थी जो बिलाल के होश उदा रही थी.

"बिलाल, मुझे देखो," नसीम ने बिलाल की थोड़ी (चीन) पकड़ कर अपनी तरफ किया. "क्या मैं तुम्हे एक 'माँ' लग रही हूँ या एक 'औरत'? रशीद ने मुझे बरसों पहले एक पुराणी किताब की तरह शेल्फ में रख दिया था. मैं मजबूर हूँ बिलाल... और तुम ज़ख़्मी हो. दो ज़ख़्मी जिस्म अगर एक दूसरे का सहारा बन जाएं, तोह इसमें गुनाह कैसा?"

नसीम ने अपने कपकपाते हाथों से अपने दुपट्टे को कंधे से गिराया. बिलाल ने फ़ौरन नज़रें फेर लें. "नहीं... ये ग़लत है... ये बहुत बड़ा गुनाह है!" बिलाल का दिमाग चीख रहा था, मगर उसके जिस्म ने बग़ावत शुरू कर दी थी.

नसीम ने हर मुमकिन कोशिश शुरू कर दी. उसने बिलाल के कान के पास झुक कर सरगोशी की, "मुझे तबाह कर दो बिलाल... जो गुस्सा सीमा पर है, वो मुझ पर निकाल दो. मुझे अपनी रंडी समझ लो, मगर इस घर का राज़ बहार मत निकलने देना. मैं तुम्हारे सामने भिकारी बन कर खरी हूँ... क्या तुम मेरी झोली खली रखोगे?"

नसीम ने बिलाल का हाथ अपनी क़मीज़ के नीचे दाखिल कर दिया. बिलाल ने महसूस किया के नसीम का जिस्म तप रहा था, जैसे कोई भट्टी सुलग रही हो. नसीम ने बिलाल की गर्दन पर अपने होंठ रख दिए और धीरे से काट लिया.

"आह... अम्मी... छोड़ें..." बिलाल की आवाज़ कमज़ोर पर गयी. उसका इंकार अब सिर्फ ज़बान तक था, उसके जज़्बात पिघलने लगे थे.

नसीम ने बिलाल के चेहरे को अपने हाथों में भरा और पूरी शिद्दत से उसके होंठों को चूम लिया. ये बोसा (किश) मामूली नहीं था; इसमें मिन्नत भी थी, इल्तेजा भी और वो 'अजीज़ाना हवस' भी जिसने बिलाल की साड़ी दीवारों को गिरा दिया. बिलाल ने महसूस किया के नसीम उसके लिए पूरी तरह बिछी जा रही थी, वो अपना सब कुछ हारने के लिए तैयार थी सिर्फ अपने घर की झूटी इज़्ज़त बचने के लिए.

बिलाल का गुस्सा, उसकी हैरत, और उसका इंकार... सब उस आग में पिघल गया. उसने एक गहरी कराह (मोअन) ली और नसीम को ज़ोर से अपनी बाँहों में भर लिया.

"अगर एहि कफ़्फ़ारा है... तोह एहि सही," बिलाल ने जूनून में कहा और नसीम की क़मीज़ को ऊपर की तरफ खिंच दिया.

नसीम ने सुकून की सांस ली. उसने महसूस किया के उसने बिलाल को जीत लिया है. उस रात हैदराबाद का वो कमरा एक ऐसे गुनाह का गवाह बना जो शर्म और मजबूरी के परदे में छुपा हुआ था, मगर जिसकी तपन पूरे खंडन को जला देने के लिए काफी थी.

Episode 17 ख़तम

क्लिफहैंगर: अगली सुबह जब रशीद साहिब नाश्ते की मेज़ पर बिलाल और नसीम को एक साथ देखेंगे, तोह क्या उन्हें उस 'खामोश समझौते' की बू आएगी? और लाहौर में आयेशा का अगला क़दम क्या होगा?
 
घर की आग

Episode 18: इज़्ज़त का जनाज़ा और जिस्म की होली

हैदराबाद के उस वीराने फार्महाउस में उस रात हवस और इन्तेक़ाम की ऐसी आग भर्की जिसने रिश्तों की रही सही धज्जियां भी उदा कर रख दें. बिलाल का गुस्सा शोले बन चूका था, और नसीम ने फैसला कर लिया था के वह खुद को इस आग में झोंक कर अपनी बेटी का घर बचाएगी.

सन 1: नसीम का नज़राना

गेस्ट रूम में अँधेरा था, सिर्फ खिड़की से आती चांदनी बिलाल के गुस्से से भरे चेहरे को रोशन कर रही थी. नसीम दबे पाऊँ उसके क़रीब आयी. उसका भरा हुआ 52 साल का बदन लॉन की क़मीज़ में क़ैद था, मगर उसकी सांसें बता रही थीं के वह क्या करने आयी है.

"बिलाल... मुझे पता है तुम भटक रहे हो," नसीम ने सरगोशी की और बिलाल के क़रीब घुटनो के बल बैठ गयी.

बिलाल ने नफरत से उसे देखना चाहा, मगर नसीम ने उसकी जीन्स की ज़िप खोली और उसके सख्त होते हुए लुंड को बहार निकाल लिया. बिलाल की सांस रुक गयी. नसीम ने उसकी आँखों में dekha—un आँखों में एक माँ की मिन्नत भी थी और एक औरत की तपिश भी. नसीम ने झुक कर बिलाल की मर्दानगी को अपने मुंह में भर लिया.

"आह्हः... अम्मी! ये क्या..." बिलाल ने उसके बाल मुट्ठी में जाकर लिए. नसीम ने अपनी पूरी tajurba-kaari (एक्सपीरियंस) लुंड चूसने में दाल दी.





वह उसे ऐसे चाट रही थी जैसे उसकी साड़ी नाराज़गी चूस लेना चाहती हो.





बिलाल की सिसकारियां कमरे में गूंजने लगीं. उसका गुस्सा अब धीरे धीरे एक दरिन्दे की हवस में बदल रहा था.

सन 2: Be-reham खेल और नसीम की सिसकियाँ

बिलाल ने नसीम को बालों से पकड़ कर उठाया और बिस्तर पर पटक दिया. "बोहोत शौक़ है न कफ़्फ़ारा ऐडा करने का? तोह फिर आज मैं सास नहीं, रंडी की तरह छोडूंगा तुम्हे!"

बिलाल ने नसीम की शलवार एक झटके से पाऊँ से निकाली और उसकी गोरी रनो (तइस) को फैला दिया. उसने अपना हाथ पीछे ले जा कर नसीम की गांड के सुराख़ में ऊँगली डालने की कोशिश की.

"नहीं... बिलाल! वहां नहीं... प्लीज... ये बोहोत गन्दा है," नसीम ने तड़प कर पीछे हटने की कोशिश की.

"चुप रहो!" बिलाल ने उसके नरम नितम्ब (बटक्स) पर एक ज़ोर दर थप्पड़ मारा, जिसकी गूँज कमरे में देर तक रही. "जब कफ़्फ़ारा पूरा देना है तोह नखरे कैसे? आज तुम्हारा हर सुराख़ मेरी ग़ुलामी करेगा."

बिलाल ने नसीम को घुटनो के बल खरा किया और पीछे से उसकी कमर पकड़ कर अपना सख्त लुंड उसकी गीली छूट में एक hi झटके में उतार दिया.





"ऊऊओह्ह्ह मायआ! बिलाल... मर गयी... आह्हः!" नसीम की चीख निकल गयी.





बिलाल ने उसे सँभालने का मौका नहीं दिया. वह किसी be-reham जानवर की तरह नसीम को छोड़ने लगा. हर धक्के के साथ नसीम के भरे हुए मम्मी झूल रहे थे.





"कैसा लग रहा है नसीम? रशीद अब्बू ने तोह बरसों से तुम्हे छुआ भी नहीं होगा. देखो तुम्हारा दामाद तुम्हे कैसे बेहाल कर रहा है," बिलाल ने उसके कान में ज़लील करते हुए कहा.

नसीम पहले तोह डर्टी रही, मगर बिलाल की मरदाना शिद्दत ने उसे पागल कर दिया. वह बिलाल के हर धक्के पर अपनी गांड पीछे मरती और मिन्नतें करती, "और ज़ोर से बिलाल... हाँ... मुझे निचोड़ लो... अपनी सास को पूरा ख़तम कर दो... आह्हः!"





सन 3: कफ़्फ़ारा का सफ़ेद निशान

गान्तो तक बिलाल ने नसीम के जिस्म की होली खेली.





कभी उसे दीवार से लगा कर, कभी बिस्तर के किनारे पर.





नसीम का बदन पसीने और लज़्ज़त से शराबोर था. वह बिलकुल be-haal हो चुकी थी, उसकी सांसें उखड रही थीं.





आखिर में बिलाल ने नसीम को सपाट (फ्लैट) लिटाया और उसके चेहरे के पास आ कर तेज़ी से झटके मारने लगा.





"मैं... मैं निकलने वाला हूँ नसीम... देखो तुम्हारी क़ुरबानी का रंग!"

बिलाल ने अपना लुंड बहार निकाला और नसीम के गोर चेहरे, उसके होंठों और उसके नंगे मम्मों पर अपना गरम गारा (सीमेन) छोड़ दिया.





नसीम ने आँखें बंद कर के उस गर्माहट को महसूस किया. सफ़ेद निशाँ उसके चेहरे पर बिखर गए थे.

सन 4: रशीद साहब की खामोश मौत

नसीम उसी हाल में उठी. उसने अपना चेहरा साफ़ नहीं किया. उसने सिर्फ अपनी क़मीज़ ठीक की और दबे पाऊँ रशीद साहब के कमरे में चली गयी. रशीद साहब कुर्सी पर बैठे तस्बीह पढ़ रहे थे, मगर उनका ध्यान दरवाज़े पर था.

नसीम उनके सामने खरी हो गयी. उसके चेहरे पर बिलाल की मर्दानगी के निशाँ साफ़ चमक रहे थे. रशीद साहब ने सर उठाया और अपनी बीवी का ये हुलिया देखा तोह उनके हाथ से तस्बीह गिर गयी.

"मैंने कफ़्फ़ारा ऐडा कर दिया रशीद... अब बिलाल सीमा को डाइवोर्स नहीं देगा," नसीम ने be-jaan आवाज़ में कहा.

रशीद साहब ने अपनी आँखें बंद कर लें. उन्हें महसूस हुआ के उनकी मर्दानगी आज उसी गेस्ट रूम में दफ़न हो गयी है. उन्हों ने कुछ नहीं कहा, बस रोने लगे.

सन 5: बिलाल का आखरी वॉर

सुबह जब सब निकलने की तयारी कर रहे थे, बिलाल ने गाडी के पास नसीम को अकेले पाया. उसने नसीम के पास जा कर उसके कान में सरगोशी की, जिसने नसीम की रूह तक कंपा दी.

"वैसे नसीम... मुझे सीमा का शुक्रिया ऐडा करना चाहिए. अगर वो उस्मान के साथ मुंह काला न करती, तोह मुझे आप जैसा 'गरम और रसीला माल' चखने को कभी न मिलता. मान गए... 52 साल की उम्र में भी आप किसी कमसिन छोकरी से ज़्यादा मज़ा देती हैं."

नसीम खामोश रही, मगर उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो अब कभी नहीं बुझेगी.

**Episode 18 ख़तम**

क्लिफहैंगर: लाहौर वापसी पर अब ये रिश्ते कौनसा नया मोड़ लेंगे? जब हमजा और हिरा को पता चलेगा के हैदराबाद में क्या हुआ, तोह क्या वो पीछे रहेंगे? और आयेशा... क्या वो इस नए "कफ़्फ़ारा" सिस्टम का अगला निशाना बनेगी?
 
घर की आग

Episode 19: गुनाह का इत्तेहाद और नए शिकंजे

लाहौर की उस pur-asrar हवेली में आज सूरज की रौशनी दाखिल तोह हुई थी, मगर घर के हर कोने में गुनाह की एक गहरी परछाई छायी हुई थी. हैदराबाद से वापसी का सफर खामोश था, मगर उस ख़ामोशी में चीखें दफ़न थीं. गाडी जब मॉडल टाउन की गलियों से गुज़रती हुई गेट के अंदर दाखिल हुई, तोह ऐसा लगा जैसे हर किरदार अपने साथ एक नया ज़हर लेकर लौटा है.

सन 1: निदामत और तल्ख़ सचाइयां

फार्महाउस के हंगामे के बाद सीमा और उस्मान के चेहरों पर वह पहले वाली बग़ावत नहीं रही थी. उनकी आँखों में अब एक गहरी निदामत (रएमोर्से) और खौफ था. सीमा ने अपना दुपट्टा अपने चेहरे पर इतना लपेट रखा था जैसे वह दुनिया की नज़रों से छुपना चाहती हो, जबकि उस्मान की नज़रें ज़मीन से नहीं उठ रही थीं.





लाहौर पहुंचते hi हमजा ने उस्मान को बाज़ू से पकड़ा और उसे टेरेस की तरफ ले गया. हमजा की आँखों में तजस्सुस और बेचैनी थी.

"भाई... हैदराबाद में क्या हुआ? बिलाल भाई का गुस्सा कैसे ठंडा हुआ? और अम्मी... अम्मी के चेहरे पर वह निशान कैसे थे?" हमजा ने दबी हुई आवाज़ में पूछा.

उस्मान ने एक गहरी सांस ली, उसकी आँखों में आंसू आ गए. "हमजा... मैंने और सीमा एपीआई ने जो किया, वह बर्दाश्त से बहार था. बिलाल ने हमें नंगा पकड़ लिया था. वह सीमा को जान से मार देना चाहता था... डाइवोर्स के पेपर्स तैयार थे. मगर..." उस्मान रुका, उसकी आवाज़ लरज़ रही थी. "मगर अम्मी ने जो किया, वह किसी ने नहीं सोचा था. उन्हों ने बिलाल के पेअर पकडे... और फिर... रात भर वह बिलाल के कमरे में थीं. हमजा, अम्मी ने अपनी इज़्ज़त का सौदा करके सीमा का घर बचाया है. बिलाल अब पहले जैसा बिलाल नहीं रहा... वह अब इस घर का मालिक बन गया है."





हमजा सुन्न रह गया. उसके दिमाग में वह मंज़र घूमने लगा जब उसने अम्मी को अपने नीचे तड़पाया था. आज उसे पता चला के उसकी माँ अब सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि उसके बहनोई (brother-in-law) की भी ज़रुरत बन चुकी है.

सन 2: आयेशा की बेचैनी और सीमा का रोना

नीचे कमरे में आयेशा ने सीमा को घेर लिया था. आयेशा की शख्सियत में जो साइकोलॉजिकल कनफ्लिक्ट था, वह अब शिद्दत इख़्तियार कर रहा था.

"सीमा एपीआई, सच बताईये... वहां क्या हुआ? आपने और उस्मान भाई ने... सच में वह सब किया?" आयेशा ने पूछा, उसकी आवाज़ में नफरत से ज़्यादा एक अजीब सा तजस्सुस (क्यूरोसिटी) था.

सीमा phat-phat कर रोने लगी. "हाँ आयेशा... हम भटक गए थे. तन्हाई ने हमें एक दूसरे के क़रीब कर दिया. मगर अब बिलाल... बिलाल मुझे इंसान नहीं समझता. वह मुझे देख कर हँसता है और कहता है के तुम्हारी माँ तुम से ज़्यादा गरम है. आयेशा, अम्मी ने बिलाल को खुश करने के लिए खुद को पेश कर दिया. मैंने अपनी आँखों से देखा... अम्मी के चेहरे पर बिलाल का पानी बिखरा हुआ था जब वह सुबह बहार निकली थीं. ये घर अब घर नहीं रहा आयेशा, ये जहन्नुम बन चूका है."





आयेशा खामोश हो गयी. उसका जिस्म पसीने में शराबोर था. वह तसव्वुर कर रही थी के कैसे उसकी माँ, उसकी 'परसा' माँ, अपने दामाद के सामने बिछी होगी. उसके अंदर एक आग बहकने lagi—ek ऐसी आग जो उसे डर भी दे रही थी और लज़्ज़त की तरफ खिंच भी रही रही थी.

सन 3: बिलाल का खुला वॉर और Be-sharam फरमाइश

दोपहर का वक़्त था. सब लोग हॉल में बैठे थे, मगर माहौल में एक अजीब सा दबाओ था. रशीद साहब अपने कमरे में बंद थे. बिलाल, जो पहले हमेशा नज़रें नीचे रखता था, आज सोफे पर टांग पर टांग रख कर बैठा था. उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कराहट थी.

नसीम किचन से पानी लेकर आयी और सब को देने लगी. जैसे hi वह बिलाल के पास पहुंची, बिलाल ने उसका हाथ पकड़ लिया. सब की नज़रें उन पर thin—Hira, उस्मान, सीमा और हमजा, सब ने ये मंज़र देखा.

"अम्मी... पानी तोह ठंडा है, मगर आपके हाथों में अभी भी वही गर्माहट है जो कल रात थी," बिलाल ने सब के सामने be-sharmi से कहा.

नसीम का चेहरा सुर्ख हो गया. "बिलाल... बचे बैठे हैं... छोड़ें मेरा हाथ."

"बचे? अब इस घर में बचा कोई नहीं रहा," बिलाल ने नसीम को अपनी तरफ खिंचा. "सीमा, सुनो... मैं आज रात फिर से अपने दिल का बोझ हल्का करवाना चाहता हूँ. अम्मी, आज रात आप मेरे कमरे में आएँगी. मुझे आपका वो लुंड चूसना (ब्लोजॉब) बोहोत याद आ रहा है. कल रात आपने जो म्हणत की थी, उसने मेरा दिल जीत लिया. अगर सीमा को मेरे साथ में रहना है, तोह आपको मेरी हर ख्वाहिश पूरी करनी होगी."

हॉल में सन्नाटा छ गया. सीमा ने नज़रें झुका लें, उस्मान का खून खौल रहा था मगर वह be-bas था. हमजा और हिरा ने एक दूसरे की तरफ dekha—unhe डर नहीं लग रहा था, बल्कि उन्हें एक नया रास्ता नज़र आ रहा था जहाँ हर रिश्ता नंगा था.

"बिलाल... प्लीज... रशीद साहब घर में हैं," नसीम ने मिन्नत की, मगर उसकी आँखों में भी एक दबी हुई लज़्ज़त चमक रही थी. उसने बिलाल की मरदाना शिद्दत को चख लिया था, और अब वह उसे पूरी तरह इंकार नहीं कर सकती थी.

"अब्बू से मैं बात कर लूंगा. आप बस तैयार रहिये गए," बिलाल ने नसीम के गांड (बटक्स) पर सब के सामने एक हल्का सा थप्पड़ मारा और हस्ते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया.

सन 4: रशीद साहब की मायूसी और नसीम का 'नया प्लान'

रशीद साहब अपने कमरे में बीएड पर लेते छत को तक रहे थे. उनका चेहरा ज़र्द पर चूका था. उन्हें लग रहा था के उनकी मर्दानगी मर चुकी है. उन्हों ने अपनी बीवी का सौदा किया था, और ये बोझ उन्हें अंदर से खा रहा था.

नसीम दरवाज़ा बंद करके उनके पास आयी. उसने रशीद साहब के सर पर हाथ रखा. "रशीद... आप क्यों इतने मायूस हैं? जो हुआ, वह घर की इज़्ज़त बचने के लिए हुआ."

"इज़्ज़त? नसीम, कौनसी इज़्ज़त?" रशीद साहब रोने लगे. "मैंने अपने दामाद को अपनी बीवी छोड़ने की इजाज़त दे दी. मैं मर्द नहीं रहा नसीम."

नसीम ने उनके आंसू पोंछे और उनके कान के पास झुकी. "आप मर्द हैं रशीद. बस थोड़े थक गए हैं. देखिये, बिलाल ने जो किया वह उसके गुस्से का इलाज था. मगर इससे हमारा फ़ायदा भी तोह है. सीमा का घर बच गया. और रही बात आपकी... तोह मेरे पास एक तरकीब है."

रशीद साहब ने हैरत से देखा. "कैसी तरकीब?"

"घर की आग अब भरक चुकी है रशीद. क्यों न हम इस आग को अपना दोस्त बना लें? आप मायूस मत हों. मैं देख रही हूँ के आयेशा और हिरा भी अब जवान हो रही हैं. हमजा भी मर्द बन चूका है. क्यों न हम इस घर में कोई पर्दा न रखें? जब सब नंगे होंगे, तोह किसी को किसी से शर्म नहीं होगी. मैं आपका मूड ठीक करने के लिए एक 'खास प्लान' का सोच रही हूँ... जहाँ आप देखेंगे के आपकी बीवी कैसे इस खंडन को जोरदे रखती है."

नसीम ने रशीद साहब का हाथ पकड़ कर अपने नंगे पेट पर रखा. "आप देखते जाइये रशीद... मैं बिलाल को भी सम्भालूंगी और आपकी मर्दानगी को भी वापस लाऊंगी. बस मुझे अपनी मर्ज़ी करने दें."

रशीद साहब की आँखों में एक अजीब सी चमक आयी. मायूसी की जगह अब एक तरीक (डार्क) तजस्सुस ने ले ली थी. उन्हों ने नसीम को खिंच कर अपने क़रीब कर लिया.

सन 5: रात का इंतज़ार और जिस्मों की तपिश

रात ढल रही थी. लाहौर की हवेली अब गुनाह का क़िला बन चुकी रही थी. बिलाल अपने कमरे में नंगा लेता नसीम का इंतज़ार कर रहा था. उसने दरवाज़ा आधा खुला छोड़ा था ताके सीमा को पता चले के उसकी माँ कहाँ है.

नसीम ने हलके रेशमी लिबास में खुद को संवारा. वह जानती थी के आज रात उसे न सिर्फ बिलाल को खुश करना है, बल्कि अपने बचो की नज़रों में अपना नया मुक़ाम भी बनाना है.

जब वह कॉरिडोर से गुज़र रही थी, हमजा ने उसे रोक लिया. "अम्मी... आप जा रही हैं?"

नसीम ने हमजा के होंठों पर ऊँगली राखी. "हाँ बीटा... आज दामाद जी की बारी है. मगर फ़िक्र मत करो... तुम्हारे लिए मैं हमेशा खुली हूँ."

हमजा ने नसीम की कमर पकड़ कर उसे एक गहरी बोसा (किश) दी. "जल्दी वापस आना अम्मी... बिलाल भाई के बाद मेरी बारी होगी."

नसीम मुस्कुरा कर बिलाल के कमरे में दाखिल हो गयी. पीछे कॉरिडोर में आयेशा खरी ये सब देख रही थी. उसकी सांसें तेज़ थीं. उसने फैसला कर लिया था के वह अब मज़ीद खामोश तमाशाई नहीं रहेगी.

**Episode ख़तम**

क्लिफहैंगर: बिलाल और नसीम की रात कैसी गुज़रेगी? क्या आयेशा दरवाज़ा खटखटाये गई? और रशीद साहब जिस 'खास महफ़िल' का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या वह इस घर की आखरी तबाही होगी?
 
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