Incest GHAR KI AAG (URDU) - SexBaba
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Incest GHAR KI AAG (URDU)





**घर की आग**

Episode 1 : गरम हवाओं का पहला झोंका

लाहौर, मॉडल टाउन एक्सटेंशन.

जून 2024, सुबह 7:15 ऍम.

गर्मी इतनी सख्त थी के पसीना कपड़ों से चिपक रहा था. बिजली सुबह से गायब थी, सिर्फ पंखों की तेज़ हवा चल रही थी जो गरम hi महसूस हो रही थी. पुराणी double-storey हवेली जैसा घर था – नीचे बारे हॉल जो drawing-cum-dining था, कोर्टयार्ड में पीपल का बारे पेड़ जिसकी छाओं में चारपाइयाँ पड़ी रहती थीं, और ऊपर चार कमरे जहाँ फॅमिली के लोग सोते थे.

रशीद अहमद (58 साल) वाइट शलवार क़मीज़ में चारपाई पे बैठा चाय पी रहा था. उसके बाल ज़्यादा सफ़ेद हो चुके थे, लेकिन आवाज़ अब भी गहरी और हुकूमत वाली थी.

“नसीम सुनो! चाय ठंडी हो रही है… और हमजा को उठाओ, आज उसका कॉलेज का टेस्ट है!”

किचन से नसीम (52 साल) की आवाज़ आयी. वह अब भी इतनी खूबसूरत थी के मोहल्ले वाले अक्सर कहते थे “रशीद की बीवी नहीं, बेटी लगती है”.

“जी… अभी गरम कर रही हूँ. हमजा ब्रश कर रहा है.”

हॉल में बाक़ी फॅमिली भी मौजूद थी.

सब से पहले सीमा (31 साल) – बड़ी बेटी, शादी को चार साल हुए थे. आज कल मायके आयी हुई थी क्यूंकि उसका शोहर बिलाल (34 साल) कराची बिज़नेस ट्रिप पे दो हफ़्तों के लिए गया हुआ था. वह पिंक निघ्त्य में बैठी थी, बाल खुले हुए, जिस्म अब मातुरे हो चूका था – बड़े भरे हुए मम्मी, गोल कमर और हिप्स जो निघ्त्य के अंदर से साफ़ नज़र आ रहे थे.

उसके बगल में उस्मान (29 साल) – बड़ा बीटा, गयम जाता था इसलिए बॉडी टाइट और मस्कुलर. अब्बू के साथ प्रॉपर्टी का काम सीख रहा था. उसने सीमा की तरफ देखा और हलकी सी स्माइल दी. सीमा ने नज़रें झुका ली, लेकिन उसके गाल लाल हो गए.

आयेशा (26 साल) – दूसरी बेटी, ब का लास्ट सेमेस्टर चल रहा था, ब्लू सूट पेहेन कर रेडी हो रही थी.

हिरा (23 साल) – तीसरी बेटी, B.Com फाइनल ईयर में, बोहोत सीढ़ी और शर्मीली लड़की.

हमजा (20 साल) – सब से छोटा, नीट का स्टूडेंट, स्लिम, फेयर रंग, अभी जवानी के पहले रंग में था.

नसीम चाय ले कर आयी. जब वह झुक कर पियाली रखती थी तो निघ्त्य का गाला थोड़ा खुल गया. हमजा ने एक झलक देखि और फ़ौरन नज़रें हटा ली, लेकिन दिल में एक अजीब सी हलचल सी हुई.

रशीद ने चाय सिप करते हुए पुछा:

“सीमा बीटा, बिलाल का फ़ोन आया था कल रात? वह ठीक तो है न?”

सीमा ने सर झुकाया:

“जी अब्बू जी… कहते थे 10 दिन में वापिस आ जाऊंगा. मैं अकेली बोहोत बोर हो रही थी इसलिए आ गयी.”

उस्मान ने मज़ाक में कहा:

“बोर? अम्मी के हाथ का खाना खाने आयी हो या कुछ और?”

सीमा ने उसे घूरा:

“चुप करो भाई… तुम्हारी हर बात में गन्दी सोच निकल आती है.”

सब हंस पड़े. नसीम ने महसूस किया के उस्मान की नज़र सीमा के चेस्ट पे थोड़ी देर रुक गयी थी. वह खुद भी कुछ सोच में पद गयी.

नाश्ता ख़तम होने के बाद हमजा बैग उठा कर कॉलेज निकल गया. आयेशा और हिरा भी अपने कॉलेजेस के लिए निकलने लगे.

नसीम ने सीमा से कहा:

“बीटा, गर्मी बोहोत ज़्यादा है. ऊपर जा कर आराम कर लो. मैं लंच बनाउंगी.”

सीमा ऊपर अपने पुराने कमरे में चली गयी. गर्मी इतनी थी के वह फ़ौरन निघ्त्य उतार कर सिर्फ ब्लैक ब्रा और पंतय में हो गयी और अपने बिस्तर पे लेट गयी. उसके जिस्म पे पसीना चमक रहा था, छाती ऊपर नीचे हो रही थी. कुछ देर बाद उसकी आँखें धीरे धीरे बंद होने लगी.

तभी दरवाज़ा धीरे से खुला.

उस्मान था.

“एपीआई… सॉरी, अब्बू जी ने कहा था के पुराणी फाइल इस कमरे में होगी.”

सीमा झट से उठी और चादर उठा कर अपने जिस्म पे लपेट ली.

“उस्मान भाई… नॉक तो कर लिया होता!”

उस्मान मुस्कुराया, उसकी आँखों में कुछ अलग सी चमक थी.

“एपीआई… अब भी इतनी शर्म? मैं तो भाई हूँ न.”

सीमा चादर टाइट पकडे बैठी रही. उस्मान ने फाइल ढूंढ ली लेकिन जाते वक़्त रुक गया.

“एपीआई… आप ठीक तो हो न? बिलाल भाई के जाने के बाद आप का चेहरा उदा हुआ सा लग रहा है.”

सीमा ने सिर्फ सर हिला दिया.

“ठीक हूँ…”

उस्मान बहार निकल गया लेकिन दरवाज़े के पीछे रुक कर एक बार फिर अंदर झांक लिया.

नसीम ने नीचे से आवाज़ दी:

“उस्मान! फाइल मिल गयी?”

“जी अम्मी… मिल गयी.”

लेकिन उस्मान के ज़हन में अब सिर्फ सीमा का bra-panty में चमकता जिस्म घूम रहा था.

शाम 6:30 पं.

बिजली वापिस आ गयी थी. घर में लाइट्स जल रही थीं. रशीद ऑफिस से वापस आया. सब फॅमिली हॉल में बैठे टीवी देख रहे थे.

आयेशा ने ख़ुशी से कहा:

“अब्बू जी, मेरा रिजल्ट आया है… 3.8 स्ग्प!”

सब ने तालियां बजायी. ख़ुशी का माहौल था.

लेकिन रात को जब सब सोने चले गए…

सीमा अपने कमरे में लेती थी. पंखे की हवा उसके जिस्म पे चल रही थी. उसने फ़ोन उठाया और बिलाल को कॉल किया.

“बिलाल… मुझे बोहोत याद आ रही है तुम्हारी.”

बिलाल हंस कर बोलै:

“बस 8 दिन और… फिर पूरी रात तुम्हारी हूँ.”

कॉल ख़तम हुई. सीमा ने आँखें बंद कर ली.

तभी उसे महसूस हुआ के कोई उसके कमरे के बहार खड़ा है.

दरवाज़ा धीरे से खुला.

उस्मान था… सिर्फ लुंगी पहने हुए.

“एपीआई… नींद नहीं आ रही. थोड़ा बात कर लू?”

सीमा उठ कर बैठी. उस वक़्त उसकी निघ्त्य का ऊपर का हिस्सा थोड़ा खिसक गया था. उस्मान की नज़र वहां रुक गयी.

सीमा ने धीरे से कहा:

“उस्मान… यह ठीक नहीं है. तुम मेरे भाई हो.”

उस्मान मुस्कुराया और अंदर आ गया. दरवाज़ा बंद कर दिया.

“एपीआई… सिर्फ बात करने आया हूँ. लेकिन… आज आप बोहोत ज़्यादा खूबसूरत लग रही हो.”

हवा में गर्माहट थी, और हवस का पहला हल्का सा झोंका महसूस होने लगा.

**Episode 1 ख़तम.**

क्लिफहैंगर: उस्मान अंदर आ चूका है, दरवाज़ा बंद. सीमा अकेली बिस्तर पे बैठी. अगले कुछ मिनट्स में क्या होगा? क्या नसीम ने ऊपर की तरफ कोई आवाज़ सुनी? क्या हमजा ने रात में कुछ महसूस किया?



 
**घर की आग**

Episode 2: अँधेरे में पहली छुअन

रात के 11:45 बज रहे थे.

गर्मी अब भी काम नहीं हुई थी. बिजली आ गयी थी लेकिन फैन की हवा अब भी गरम महसूस हो रही थी. घर में सन्नाटा था – सिर्फ नीचे से कभी कभी नसीम की आवाज़ आती थी जब वह किचन में रात का दूध गरम कर रही थी, और बहार गली में किसी कुत्ते की दूर की भौंक.

सीमा बिस्तर पे बैठी थी, पीठ तकिये से टिकाई हुई. उसकी निघ्त्य अभी भी थोड़ी सी खिसकी हुई थी – ऊपर का हिस्सा गले से नीचे खिसका हुआ था, ब्रा का स्ट्राप साफ़ दिख रहा था. उसने जल्दी से निघ्त्य ठीक की लेकिन दिल की धड़कन तेज़ थी.

उस्मान दरवाज़े के अंदर खड़ा था. दरवाज़ा बंद कर चूका था, अब सिर्फ हलकी सी चैन की आवाज़ आयी जब वह अंदर लॉक कर रहा था. लुंगी पहने था, ऊपर से T-shirt नहीं – चेस्ट पे पसीना चमक रहा था, गयम वाली बॉडी की वजह से मसल्स साफ़ नज़र आ रहे थे.

सीमा ने धीरे से कहा, आवाज़ में थोड़ा दर और थोड़ा गुस्सा मिला हुआ:

“उस्मान… यह क्या कर रहे हो? दरवाज़ा खोलो और बहार जाओ. अगर किसी ने देख लिया तोह?”

उस्मान धीरे से मुस्कुराया. वह बिस्तर के पास आया और बिस्तर के किनारे पे बैठ गया – इतना पास के सीमा की सांस उसके कंधे पे महसूस हो रही थी.

“एपीआई… कोई नहीं देख रहा. सब सो रहे हैं. अब्बू जी तो नीचे हॉल में टीवी देख रहे थे फिर सो गए. अम्मी किचन में हैं. और बाक़ी सब अपने कमरों में.”

सीमा ने चादर को और टाइट पकड़ा.

“फिर भी… यह गलत है. तुम मेरे छोटे भाई हो. बिलाल भाई के घर से आयी हूँ मैं… और तुम यहाँ ऐसे…”

उस्मान ने उसकी तरफ देखा. उसके चेहरे पे वही पुराणी चमक थी जो बचपन में भी होती थी जब वह सीमा को तैसे करता था – लेकिन अब यह तैसे नहीं था, कुछ गहरा था.

“एपीआई… मैं जानता हूँ बिलाल भाई कितने दिन से बहार हैं. आप अकेली हो. मैं भी अकेला हूँ. बस… बात करने आया हूँ. आप इतनी परेशां क्यों लग रही हो?”

सीमा ने नज़रें झुका ली. उसके दिल में एक तूफ़ान उठ रहा था. बिलाल के साथ शादी के बाद पहली बार इतनी लम्बी दूरी हुई थी. रातों को नींद नहीं आती थी. जिस्म में एक बेचैनी थी जो वह किसी से कह नहीं प् रही थी. और अब उस्मान का यह पास आना… उसे याद दिला रहा था के वह औरत है, और उसकी ज़रूरतें भी ज़िंदा हैं.

उसने धीरे से कहा:

“उस्मान… प्लीज. मुझे डर लग रहा है. अगर अम्मी ने सुन लिया तोह?”

उस्मान ने हाथ आगे बढ़ाया और सीमा के हाथ पे हल्का सा हाथ रखा. सीमा का जिस्म सिहर गया. उसने हाथ नहीं छुड़ाया – बस नज़रें उठा कर उस्मान को देखा.

उस्मान की आवाज़ धीमी हो गयी:

“एपीआई… मैं कुछ गलत नहीं कर रहा. बस… आप को देख कर दिल बेचैन हो रहा है. आप इतनी खूबसूरत हो. बिलाल भाई लकी हैं. लेकिन मैं भी तो आपका भाई हूँ… आपकी फ़िक्र करता हूँ.”

सीमा के गाल लाल हो गए. उसने हाथ धीरे से छुड़ाया लेकिन आवाज़ में थोड़ी कमज़ोरी थी.

“फ़िक्र? यह फ़िक्र नहीं है उस्मान… यह कुछ और है. और यह गलत है.”

उस्मान ने थोड़ा और पास आया. अब उनके बीच सिर्फ एक फुट का फासला था. उसने धीरे से सीमा के बालों को छुआ – सिर्फ उँगलियों से, जैसे बचपन में छूटा करता था.

“एपीआई… याद है जब हम छोटे थे? आप मुझे अपने साथ सुलाती थी. मैं आपके पास लेट कर सोता था. अब भी वही एहसास है… बस अब हम बड़े हो गए हैं.”

सीमा की सांस तेज़ हो गयी. उसने आँखें बंद कर ली.

“उस्मान… मत कहो ऐसे. प्लीज.”

लेकिन उस्मान रुका नहीं. उसने धीरे से सीमा के कंधे पे हाथ रखा. सीमा का जिस्म कम्प गया. वह उठना चाहती थी लेकिन पैरों में जान नहीं थी.

तभी नीचे से आवाज़ आयी – नसीम की.

“उस्मान? बीटा… ऊपर हो क्या? पानी ले लून?”

उस्मान झट से खड़ा हुआ. सीमा ने भी चादर से अपने आप को छुपाया.

उस्मान ने जल्दी से जवाब दिया:

“जी अम्मी… आ रहा हूँ. बस फाइल ढूंढ रहा था.”

नसीम ने कहा:

“ाचा… जल्दी आओ. रात हो गयी है.”

उस्मान ने सीमा की तरफ देखा. उसने हलकी सी स्माइल दी और धीरे से कहा:

“एपीआई… बात ख़तम नहीं हुई. कल रात फिर आता हूँ.”

वह दरवाज़ा खोल कर बहार निकल गया. सीमा बिस्तर पे लेट गयी, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने चादर सर तक खींच ली. जिस्म गरम था – न सिर्फ गर्मी की वजह से, बल्कि कुछ और की वजह से.

रात के 1:20 ऍम.

हमजा अपने कमरे में उठा. नींद नहीं आ रही थी. वह फ़ोन पे रील्स देख रहा था लेकिन दिमाग़ में कुछ और था. उसने सुना था ऊपर से हलकी सी आवाज़ें – जैसे कोई बात कर रहा हो. वह उठा और धीरे से दरवाज़ा खोला. कॉरिडोर में देखा – उस्मान का कमरा बंद था, लेकिन सीमा के कमरे के बहार एक शैडो दिखी थी जो अंदर चली गयी थी.

हमजा का दिल धड़का. वह वापस अपने कमरे में चला गया लेकिन नींद नहीं आयी. उसके ज़हन में सीमा एपीआई का चेहरा आ रहा था – और उस्मान भाई का.

सुबह 6:30 ऍम.

घर फिर से जाग उठा. नसीम चाय बना रही थी. रशीद नेवसपपेर पढ़ रहा था.

सीमा नीचे आयी – चेहरा थोड़ा उदा हुआ, आँखों के नीचे हलके काले दायरे. उसने नार्मल मुस्कराहट दी लेकिन अंदर से बेचैन थी.

उस्मान नीचे आया – नार्मल, जैसे कुछ हुआ hi नहीं. उसने सीमा को देखा और हलकी सी स्माइल दी. सीमा ने नज़रें झुका ली.

नसीम ने महसूस किया के कुछ अलग है. उसने सीमा से पुछा:

“बीटा… रात को ठीक से सोई?”

सीमा ने जल्दी से कहा:

“जी अम्मी… ठीक था.”

लेकिन नसीम की आँखों में शक था.

Episode 2 ख़तम.

क्लिफहैंगर: हमजा ने कुछ देख लिया है. नसीम को शक हो रहा है. उस्मान रात को फिर आने का वादा कर चूका है. सीमा का दिल अब भी धड़क रहा है – क्या वह उस्मान को रोक पायेगी, या हवस की यह आग धीरे धीरे घर में फैलने वाली है?

कैसा लगा आप लोगो को ये Episode 2?

अगर ठीक लगे तो बस कह दो सपोर्ट और ेन्सॉरगे अगला episode लिखने के लिए

अगले episode में और गहराई आएगी – इमोशंस, गिल्ट, और थोड़ा और फिजिकल क्लोसनेस्स. 😊
 
**घर की आग**

Episode 3: रात की बेचैनी और पहली छोटी सी हरकत

रात के 12:10 बज रहे थे.

गर्मी अब भी वैसी hi थी, जैसे कोई ब्लैंकेट ओढ़ कर सो रहे हों. फैन तेज़ चल रहा था लेकिन पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था. घर में पूरा सन्नाटा था – सिर्फ कभी कभी नीचे से रशीद की खर्राटें आती थीं, और बहार गली में किसी स्कूटर की दूर की आवाज़.

सीमा बिस्तर पे लेती थी, लेकिन नींद कहीं दूर भाग चुकी थी. उसने चादर को सर तक खींचा हुआ था, लेकिन जिस्म गरम था. दिल अब भी ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उस्मान के हाथ का वह हल्का सा टच याद आ रहा था – कंधे पे, बालों में. उसने आँखें बंद की तो बिलकुल साफ़ महसूस हुआ के उस्मान अभी भी कमरे में है, उसके पास.

तभी दरवाज़ा धीरे से खुला.

उस्मान अंदर आया – इस बार लुंगी के साथ साथ एक पुराणी बनियान भी पहनी हुई थी, जो पसीने से चिपक रही थी. दरवाज़ा बंद किया, चैन लगायी, और बिना कुछ कहे सीधा बिस्तर के पास आ गया.

सीमा ने चादर से सर बहार निकला. उसकी आवाज़ में दर था लेकिन थोड़ा सा गुस्सा भी:

“उस्मान… मैंने कहा था न आज मत आना. कल रात जो हुआ वह गलती थी. अब जाओ.”

उस्मान बिस्तर के किनारे पे बैठ गया. इस बार थोड़ा और पास – उसका घुटना सीमा के पेअर से लग रहा था.

“एपीआई… मैं जानता हूँ आप गुस्सा हो. लेकिन रात भर सो नहीं पाया. आपका चेहरा, आपकी आवाज़… दिमाग़ से नहीं निकल रही.”

सीमा ने सर झुका लिया. उसके मम्मी ऊपर नीचे हो रहे थे तेज़ सांस के साथ. निघ्त्य का ऊपर का हिस्सा फिर से खिसक गया था – ब्रा का लास साफ़ दिख रहा था. उसने जल्दी से ठीक करने की कोशिश की लेकिन हाथ कम्प रहे थे.

उस्मान ने धीरे से कहा:

“एपीआई… आपको भी नींद नहीं आ रही न? बिलाल भाई के बिना… आप भी बेचैन हो.”

सीमा ने जवाब नहीं दिया. बस आँखें बंद कर ली. उस्मान ने हाथ आगे बढ़ाया – इस बार सीधा सीमा के हाथ को पकड़ा. इस बार सीमा ने हाथ नहीं छुड़ाया. उसने सिर्फ धीरे से कहा:

“उस्मान… यह गलत है. हम bhai-behen हैं.”

उस्मान की आवाज़ और धीमी हो गयी, जैसे कोई राज़ बता रहा हो:

“एपीआई… हम bhai-behen हैं, लेकिन हम इंसान भी हैं. जिस्म की ज़रूरतें होती हैं. आपकी भी हैं… मेरी भी हैं. बिलाल भाई 10 दिन और नहीं आएंगे. इतने दिन आप अकेली कैसे रहेंगी?”

सीमा की आँखों में आंसू आ गए. वह रो नहीं रही थी – बस बेचैनी थी. उसने धीरे से कहा:

“मुझे डर लगता है… गिल्ट होगा बाद में.”

उस्मान ने उसके हाथ को अपने हाथों में दबाया. फिर धीरे से उसके हाथ को अपने सीने पे ले गया. सीमा ने महसूस किया के उस्मान का दिल भी तेज़ धड़क रहा था. उसने आँखें खोली और उस्मान को देखा – उसकी आँखों में सिर्फ हवस नहीं, प्यार भी था, फ़िक्र भी थी.

उस्मान ने धीरे से सीमा के गले के पास सर झुकाया. उसकी गरम सांस सीमा के कान पे लगी. सीमा का जिस्म सिहर उठा. उसने हाथ से उस्मान को धक्का देने की कोशिश की लेकिन ज़ोर नहीं था.

उस्मान ने धीरे से कहा:

“एपीआई… बस एक बार मुझे छूने दो. सिर्फ गले लग जाओ… कुछ नहीं करूँगा जब तक आप न कहो.”

सीमा ने कुछ नहीं कहा. उसने सिर्फ आँखें बंद कर ली. उस्मान ने धीरे से अपने हाथों से सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा ने थोड़ा सा विरोध किया लेकिन फिर उसने सर उस्मान के कंधे पे रख दिया. उस्मान ने दोनों हाथों से सीमा को गले लगा लिया – टाइट नहीं, हल्का सा, जैसे कोई भाई बेहेन को गले लगता है… लेकिन इस बार यह सिर्फ bhai-behen का एहसास नहीं था.

सीमा के मम्मी उस्मान के सीने से डाब गए. दोनों के जिस्म के बीच सिर्फ पतली सी निघ्त्य और बनियान थी. पसीना दोनों के जिस्मों को मिला रहा था. सीमा की सांस तेज़ हो गयी. उसने धीरे से कहा:

“उस्मान… बस इतना hi. अब जाओ.”

लेकिन उस्मान ने नहीं छोड़ा. उसने धीरे से सीमा के कान में कहा:

“एपीआई… आपकी सांस तेज़ है. आप भी चाहती हो न थोड़ा और?”

सीमा ने हाथ से उस्मान के सीने पे धक्का दिया – हल्का सा.

“नहीं… प्लीज. अभी नहीं.”

उस्मान ने फ़ौरन पीछे हटा. उसने सीमा के चेहरे को देखा – आँखें नाम थीं, गाल लाल. उसने धीरे से सीमा के माथे पे एक बोहोत हल्का सा किश किया – जैसे भाई करता है… लेकिन लिप्स थोड़े ज़्यादा देर तक रहे.

फिर वह उठा.

“एपीआई… ठीक है. मैं जा रहा हूँ. लेकिन कल रात… अगर आप चाहो तो मैं फिर आऊंगा. आप बस दरवाज़ा खुला छोड़ देना.”

सीमा ने कुछ नहीं कहा. उस्मान दरवाज़ा खोल कर बहार निकल गया.

सीमा बिस्तर पे लेट गयी. उसके हाथों में उस्मान का हाथ का गरम एहसास अब भी था. जिस्म में आग सी लग रही थी. उसने अपने हाथ को नीचे ले जा कर अपने जिस्म पे रखा – और धीरे से सांस ली. पहली बार उसने अपने आप को छुआ – बिलाल के बिना इतने दिन बाद. लेकिन ज़हन में उस्मान का चेहरा था.

सुबह 7:00 ऍम.

घर जाग रहा था. नसीम चाय बना रही थी. रशीद नेवसपपेर पढ़ रहा था.

सीमा नीचे आयी – चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखों में एक अलग सी चमक. उसने चाय ली और बैठी.

उस्मान नीचे आया – नार्मल स्माइल के साथ. उसने सीमा को देखा और सिर्फ आँखों से पुछा: “ठीक हो?”

सीमा ने नज़रें झुका ली लेकिन हलकी सी मुस्कराहट दी.

हमजा किचन के पास खड़ा था. उसने कल रात की आवाज़ें याद की. उसने सीमा और उस्मान को देखा – कुछ समझ नहीं आया लेकिन दिल में शक पैदा हो गया.

नसीम ने सीमा से पुछा:

“बीटा… आज चेहरा अलग लग रहा है. रात को ठीक से सोई?”

सीमा ने जल्दी से कहा:

“जी अम्मी… थोड़ा हेडाचे था. अब ठीक हूँ.”

लेकिन नसीम की नज़र सीमा के गाल पे थी – वहां हल्का सा लाल निशाँ था, जैसे किसी ने बोहोत हलके से छुआ हो.

**Episode 3 ख़तम.**

क्लिफहैंगर: सीमा का जिस्म अब उस्मान की यादों से भर गया है. उसने खुद को छुआ – लेकिन अब गिल्ट और हवस दोनों लड़ रहे हैं. हमजा को शक हो रहा है. नसीम को कुछ महसूस होने लगा है. कल रात दरवाज़ा खुला छोड़ना है या बंद? क्या सीमा उस्मान को रोक पायेगी, या यह आग अब कण्ट्रोल से बहार होने वाली है?

पसंद आया? अब थोड़ा ज़्यादा क्लोसनेस्स और टेंशन आ गया है.
 
**घर की आग**

Episode 4: दरवाज़े की चरखात और पहला जूनून

रात के 1:00 ऍम.

लाहौर, मॉडल टाउन एक्सटेंशन. गर्मी अपने उरूज पर थी. फैन तेज़ रफ्तारी से चल रहा था, लेकिन हवा में एक अजीब सी सुफ्फुसाशन थी जो जिस्म को बेचैन किये हुए थी. बिजली अभी तक मौजूद थी, जिसकी वजह से फैन की सरसराहट घर के सन्नाटे में और भी ज़्यादा गूँज रही थी. नीचे रशीद अहमद अपने कमरे में बेफिक्री से सो रहे थे, और नसीम भी किचन में सब काम निपटा कर अपने बिस्तर पर जा चुकी थी, लेकिन उसकी नींद अब भी कच्ची थी.

सीमा अपने कमरे में बिस्तर पर आधी लेती, आधी बैठी थी. उसकी आँखों में नींद नहीं, बेचैनी और खौफ था. मगर इस खौफ के साथ एक अजीब सी तालाब भी जिस्म में जाग उठी थी, जो उसे पिछली रात से घेरे हुए थी. उस्मान के हाथ का लम्स, उसकी सांस की गर्मी, माथे पर किया गया वह किश जो भाई का नहीं, कुछ और hi एहसास दे गया था – सब उसके ज़हन में बार बार घूम रहा था. उसने अपनी निघ्त्य उतार कर सिर्फ हलकी सी चादर ओढ़ राखी थी, पसीना उसके जिस्म पर चमक रहा था.

उस्मान की आखरी बात उसके कानो में गूँज रही थी: *"एपीआई… ठीक है. मैं जा रहा हूँ. लेकिन कल रात… अगर आप चाहो तो मैं फिर आऊंगा. आप बस दरवाज़ा खुला छोड़ देना."*

सीमा का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. उसके दिमाग़ में गिल्ट और हवस की जुंग चल रही थी. एक तरफ उसकी शादी, उसका शोहर बिलाल, उसकी अपनी तहज़ीब थी, और दूसरी तरफ जिस्म की अनजानी प्यास और उस्मान की चाहत. उसने धीरे से बिस्तर से उठा, उसके पेअर ज़मीन पर पड़ते hi ठंडी फर्श की चुभन महसूस हुई. हाथों में कंपकपी थी जब वह दरवाज़े की तरफ बढ़ी. दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था, जैसा उस्मान ने कहा था. सीमा ने एक लम्बी, गहरी सांस ली और धीरे से दरवाज़े को थोड़ा और खोल दिया, बस इतना के कोई अंदर आ सके. फिर वह वापस अपने बिस्तर पर चली गयी और चादर लपेट कर आँखें बंद कर ली. उसने अपने आप को सरेंडर कर दिया था.

कुछ hi लम्हों बाद, दरवाज़े पर एक हलकी सी *चरखात* हुई.

उस्मान अंदर आया. उसने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, और हलकी सी *खटक* की आवाज़ के साथ अंदर से लॉक कर दिया. इस बार वह सिर्फ लुंगी में था, उसका उभरा हुआ जिस्म, पसीने में भीगा हुआ, मूनलाइट में चमक रहा था. वह सीधा सीमा के बिस्तर के पास आया और बिना कुछ कहे बिस्तर के किनारे पे बैठ गया.

सीमा ने धीरे से आँखें खोली. उसने उस्मान को देखा, उसकी आँखों में अब दर काम, हवस ज़्यादा थी.

“उस्मान… तुम आ गए.” उसकी आवाज़ सरगोशी में थी, इतनी धीमी के मुश्किल से सुनाई दे रही थी.

उस्मान ने जवाब नहीं दिया, बस धीरे से स्माइल किया. उसने सीमा का हाथ अपने हाथ में लिया. इस बार हाथ पकड़ते hi सीमा का पूरा जिस्म सिहर गया. उस्मान ने उसके हाथ को अपने होंठो से छुआ, एक नरम किश दिया, और फिर उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों में फसा कर हलके से दबाया.

“एपीआई… मैं जानता था तुम चाहती हो.” उस्मान की आवाज़ में एक सुकून था, जैसे उसने अपनी मंज़िल प् ली हो.

सीमा ने सर झुका लिया. “यह… यह ठीक नहीं है उस्मान. हमारे रिश्ते…”

“रिश्ते?” उस्मान ने सीमा की चादर को धीरे से उसके जिस्म से नीचे किया, उसके नंगे कंधे अब साफ़ दिख रहे थे. “रिश्ते सिर्फ नाम के होते हैं, एपीआई. जिस्म की ज़रूरतें सच्ची होती हैं. तुम अकेली हो, मैं भी अकेला. तुम्हे सुकून चाहिए, मुझे भी.”

उसने सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा ने इस बार मुखालिफत नहीं की. वह धीरे से उस्मान के सीने से लग गयी. उस्मान का सीना गरम था, पसीने से भीगा हुआ, और उसकी हार्टबीट तेज़ थी. सीमा ने महसूस किया के उसके अपने मम्मी उस्मान के सीने पर डाब रहे थे, और इस एहसास से उसके अंदर आग सी लग गयी.

उस्मान ने अपने हाथ सीमा की कमर पर रखे और उसे और ज़ोर से अपनी तरफ दबाया. फिर उसने अपना सर झुकाया और सीमा के कान पर अपने होंठ रखे.

“एपीआई… कितने दिन हो गए तुम्हे.” उसने सरगोशी में कहा, उसकी सांस सीमा के कान में गरम हवा भर रही थी. “कितनी प्यासी हो तुम, मैं जानता हूँ.”

सीमा ने आँखें बंद कर ली. उसके जिस्म में एक लहर सी दौड़ गयी. उस्मान ने धीरे से सीमा के कान की लौ को चूसा, और फिर उसकी गर्दन पर अपने होंठ रख दिए. सीमा के मुँह से एक हलकी सी *आह* निकल गयी.

“उस्मान… प्लीज…” वह कहना चाहती थी के रुक जाओ, मगर उसके दिल की गहराईयों से एक और आवाज़ आ रही थी – *और करो*.

उस्मान ने सीमा को बिस्तर पर धीरे से लेता दिया. वह उसके ऊपर झुका, उसके होंठ सीमा के होंठों पर आ लगे. पहले नरम, फिर गहरे. सीमा ने पहले झिझक दिखाई, लेकिन फिर उसने भी उस्मान का साथ दिया, अपने होंठों को उसके होंठों पर दबाया. उनके होंठ एक दुसरे को चूसने लगे, ज़बानें एक दुसरे से टकराने लगीं. सीमा की सांस तेज़ हो गयी, और उसका जिस्म कम्पनी लगा.

उस्मान ने अपने हाथ सीमा की कमर से नीचे ले जा कर उसके हिप्स पर रख दिए और उन्हें मसलने लगा. सीमा ने अपने हाथ उस्मान की गर्दन में दाल दिए और उसे और ज़ोर से अपनी तरफ खिंचा.

“उफ़… उस्मान… यह क्या कर रहे हो?” सीमा की आवाज़ बहक रही थी.

उस्मान ने अपने होंठ सीमा के होंठों से हटाए और उसकी गर्दन से होते हुए उसके मम्मों की तरफ बढ़ा. सीमा की चादर अब पूरी तरह से उसके जिस्म से हैट चुकी थी. उसका नंगा जिस्म उस्मान के सामने था – भरे हुए मम्मी, गोल कमर. उस्मान ने अपने होंठ सीमा के एक मम्मी पर रख दिए और उसे चूसने लगा. सीमा के मुँह से एक और तेज़ *आह* निकल गयी.

“ओह्ह… उस्मान… आह… धीरे…”

उस्मान ने एक मम्मी को छोड़ कर दुसरे पर अपने होंठ रख दिए. दोनों हाथों से वह सीमा के मम्मों को मसल रहा था, दबा रहा था, और उन्हें चूस रहा था. सीमा अपने आप को रोक नहीं प् रही थी. उसने अपनी आँखें बंद कर ली और अपने जिस्म को उस्मान के हवाले कर दिया.

“हाय… मेरी जान… आह… और चुसो… मेरे भाई मुझे पागल कर देगा तू… आह… ममम…” सीमा के मुँह से be-ikhtiyaar अलफ़ाज़ निकल रहे थे.

उस्मान ने मुस्कुराया. उसने अपना एक हाथ सीमा की रनों के बीच ले जा कर उसकी पंतय के ऊपर से उसकी फुद्दी को मसला. सीमा का जिस्म और तेज़ कम्पनी लगा.

“एपीआई… कितनी गरम हो तुम… यह देखो… तुम्हारी फुद्दी कितनी गीली हो गयी है.” उसने सरगोशी में कहा.

सीमा ने शर्म से आँखें बंद कर ली. “उस्मान… निकल दे… उसको… आह…”

उस्मान ने धीरे से सीमा की पंतय नीचे खिसकाई और उसे उतार दिया. अब सीमा का जिस्म पूरी तरह से नंगा उस्मान के सामने था. उस्मान ने उसकी फुद्दी को देखा – गुलाबी, उभरी हुई, और पसीने से चमकती हुई. उसने अपनी ऊँगली से उसके दाने को छुआ.

“आह! उस्मान! मार डाला तूने… और… और कर… आह… भाई मेरी जान निकल जाएगी” सीमा तड़प उठी.

उस्मान ने अपनी लुंगी भी उतार दी. उसका मोटा, गरम लुंड तन कर खड़ा था. सीमा ने एक झलक देखि, उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. उसने कभी इतना बड़ा लुंड नहीं देखा था, बिलाल का लुंड इसके सामने छोटा लग रहा था.

उस्मान ने सीमा के ऊपर आ कर उसके होंठों को चूमा और फिर धीरे से अपना लुंड सीमा की फुद्दी के मुहाने पर रखा.

“एपीआई… तैयार हो?” उस्मान ने सांस लेते हुए पुछा.

सीमा ने सर हिलाया, उसकी आँखों में आंसू थे, शर्म के या ख़ुशी के, वह खुद नहीं जानती थी. “हाँ… हाँ उस्मान… दाल दे… फाड़ दे मुझे… आह…”

उस्मान ने एक ज़ोर का धक्का लगाया. सीमा की मुँह से एक दर्द भरी चीख निकली, जो उसने तकिये में दबाने की कोशिश की.

“आह! मा… अहह… अहह… धीरे… अहह…” सीमा ने अपने दांत भींच लिए.

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उस्मान ने थोड़ी देर रोका, सीमा के होंठों को चूम कर उसे तसल्ली दी. फिर धीरे धीरे वह हरकत करने लगा. पहले हलके झटके, फिर तेज़. सीमा का दर्द धीरे धीरे मज़े में बदल गया. उसने भी उस्मान का साथ देना शुरू किया, अपनी कमर उछाल उछाल कर उस्मान के धक्कों का जवाब देने लगी.

“हाँ… हाँ उस्मान… आह… ऐसे hi… मेरी गांड मार दे… आह… तेरा लुंड… मेरे भाई… छोड़ मुझे… आह… तेज़… और तेज़.” सीमा के मुँह से गलियां निकलने लगीं, उसकी शर्म सब भूल चुकी थी.

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दोनों के जिस्म पसीने में भीग चुके थे, उनकी सांसें तेज़ हो चुकी थीं, और उनके जिस्म एक दुसरे में समां चुके थे. उनके टकराने की आवाज़ें, उनकी सिसकारियां, और गर्मी की वजह से चमकता हुआ जिस्म – सब ने उस कमरे में एक जूनून का माहौल बना दिया था.

तक़रीबन आधे घंटे बाद, उस्मान ने एक आखरी तेज़ धक्का लगाया और सीमा के अंदर hi झाड़ गया. सीमा का जिस्म भी कम्प गया और वह भी उस्मान के नीचे शांत हो गयी. दोनों एक दुसरे पर लेते रहे, सांस लेते हुए, जिस्म ढीले पद चुके थे.





उस्मान ने धीरे से सीमा के माथे पर किश किया. “एपीआई… मज़ा आया?”

सीमा ने धीरे से सर हिलाया. उसकी आँखों में अब भी आंसू थे. “हाँ… बोहोत.” उसने मुँह फेर लिया. शर्म और गिल्ट ने उसे फिर से घेर लिया था.

उस्मान थोड़ी देर सीमा के पास लेता रहा, फिर वह उठा. उसने अपने कपडे पहने और सीमा को चादर ओढ़ा दी. दरवाज़ा खोल कर वह चुप चाप बहार निकल गया.

सीमा अकेली बिस्तर पर लेती रही. उसका जिस्म अब भी उस्मान के लम्स की गर्मी से तप रहा था. मगर दिल में एक खाली पैन और बोहोत ज़्यादा गिल्ट था. उसने क्या कर दिया? अपने भाई के साथ… अपने शोहर को धोका दिया. लेकिन जिस्म को सुकून मिल चूका था.

सुबह 6:00 ऍम.

हमजा अपने कमरे से निकला. रात भर उसे नींद नहीं आयी थी. ऊपर से आती हुई धीमी आवाज़ें, और फिर उस्मान भाई का कमरे से बहार निकलना… उसने कॉरिडोर में देखा. सीमा एपीआई के कमरे का दरवाज़ा अब भी हल्का सा खुला हुआ था. हमजा का दिल धक् से रह गया. उसने धीरे से दरवाज़े को बंद किया और वापस अपने कमरे में चला गया. उसके ज़हन में एक अजीब सा तूफ़ान उठ रहा था.

नीचे नसीम चाय बना रही थी. जब सीमा नीचे आयी, उसका चेहरा थका हुआ था, आँखें लाल थीं, और उसकी चाल में एक बेचैनी थी.

“सीमा बीटा, रात को ठीक से सोई? आज ज़्यादा थकी हुई लग रही हो.” नसीम ने उसकी तरफ गौर से देखते हुए कहा.

सीमा ने जल्दी से सर हिलाया. “जी अम्मी… बस गर्मी बोहोत थी इसलिए नींद नहीं आयी.”

लेकिन नसीम ने गौर किया के सीमा की गर्दन पर एक हल्का सा लाल निशाँ था, जैसा किसी ने चूमा हो. उसकी आँखों में शक और गहरा हो गया.

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Episode 4 ख़तम.
 
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