**घर की आग**
Episode 4: दरवाज़े की चरखात और पहला जूनून
रात के 1:00 ऍम.
लाहौर, मॉडल टाउन एक्सटेंशन. गर्मी अपने उरूज पर थी. फैन तेज़ रफ्तारी से चल रहा था, लेकिन हवा में एक अजीब सी सुफ्फुसाशन थी जो जिस्म को बेचैन किये हुए थी. बिजली अभी तक मौजूद थी, जिसकी वजह से फैन की सरसराहट घर के सन्नाटे में और भी ज़्यादा गूँज रही थी. नीचे रशीद अहमद अपने कमरे में बेफिक्री से सो रहे थे, और नसीम भी किचन में सब काम निपटा कर अपने बिस्तर पर जा चुकी थी, लेकिन उसकी नींद अब भी कच्ची थी.
सीमा अपने कमरे में बिस्तर पर आधी लेती, आधी बैठी थी. उसकी आँखों में नींद नहीं, बेचैनी और खौफ था. मगर इस खौफ के साथ एक अजीब सी तालाब भी जिस्म में जाग उठी थी, जो उसे पिछली रात से घेरे हुए थी. उस्मान के हाथ का लम्स, उसकी सांस की गर्मी, माथे पर किया गया वह किश जो भाई का नहीं, कुछ और hi एहसास दे गया था – सब उसके ज़हन में बार बार घूम रहा था. उसने अपनी निघ्त्य उतार कर सिर्फ हलकी सी चादर ओढ़ राखी थी, पसीना उसके जिस्म पर चमक रहा था.
उस्मान की आखरी बात उसके कानो में गूँज रही थी: *"एपीआई… ठीक है. मैं जा रहा हूँ. लेकिन कल रात… अगर आप चाहो तो मैं फिर आऊंगा. आप बस दरवाज़ा खुला छोड़ देना."*
सीमा का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. उसके दिमाग़ में गिल्ट और हवस की जुंग चल रही थी. एक तरफ उसकी शादी, उसका शोहर बिलाल, उसकी अपनी तहज़ीब थी, और दूसरी तरफ जिस्म की अनजानी प्यास और उस्मान की चाहत. उसने धीरे से बिस्तर से उठा, उसके पेअर ज़मीन पर पड़ते hi ठंडी फर्श की चुभन महसूस हुई. हाथों में कंपकपी थी जब वह दरवाज़े की तरफ बढ़ी. दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था, जैसा उस्मान ने कहा था. सीमा ने एक लम्बी, गहरी सांस ली और धीरे से दरवाज़े को थोड़ा और खोल दिया, बस इतना के कोई अंदर आ सके. फिर वह वापस अपने बिस्तर पर चली गयी और चादर लपेट कर आँखें बंद कर ली. उसने अपने आप को सरेंडर कर दिया था.
कुछ hi लम्हों बाद, दरवाज़े पर एक हलकी सी *चरखात* हुई.
उस्मान अंदर आया. उसने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, और हलकी सी *खटक* की आवाज़ के साथ अंदर से लॉक कर दिया. इस बार वह सिर्फ लुंगी में था, उसका उभरा हुआ जिस्म, पसीने में भीगा हुआ, मूनलाइट में चमक रहा था. वह सीधा सीमा के बिस्तर के पास आया और बिना कुछ कहे बिस्तर के किनारे पे बैठ गया.
सीमा ने धीरे से आँखें खोली. उसने उस्मान को देखा, उसकी आँखों में अब दर काम, हवस ज़्यादा थी.
“उस्मान… तुम आ गए.” उसकी आवाज़ सरगोशी में थी, इतनी धीमी के मुश्किल से सुनाई दे रही थी.
उस्मान ने जवाब नहीं दिया, बस धीरे से स्माइल किया. उसने सीमा का हाथ अपने हाथ में लिया. इस बार हाथ पकड़ते hi सीमा का पूरा जिस्म सिहर गया. उस्मान ने उसके हाथ को अपने होंठो से छुआ, एक नरम किश दिया, और फिर उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों में फसा कर हलके से दबाया.
“एपीआई… मैं जानता था तुम चाहती हो.” उस्मान की आवाज़ में एक सुकून था, जैसे उसने अपनी मंज़िल प् ली हो.
सीमा ने सर झुका लिया. “यह… यह ठीक नहीं है उस्मान. हमारे रिश्ते…”
“रिश्ते?” उस्मान ने सीमा की चादर को धीरे से उसके जिस्म से नीचे किया, उसके नंगे कंधे अब साफ़ दिख रहे थे. “रिश्ते सिर्फ नाम के होते हैं, एपीआई. जिस्म की ज़रूरतें सच्ची होती हैं. तुम अकेली हो, मैं भी अकेला. तुम्हे सुकून चाहिए, मुझे भी.”
उसने सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा ने इस बार मुखालिफत नहीं की. वह धीरे से उस्मान के सीने से लग गयी. उस्मान का सीना गरम था, पसीने से भीगा हुआ, और उसकी हार्टबीट तेज़ थी. सीमा ने महसूस किया के उसके अपने मम्मी उस्मान के सीने पर डाब रहे थे, और इस एहसास से उसके अंदर आग सी लग गयी.
उस्मान ने अपने हाथ सीमा की कमर पर रखे और उसे और ज़ोर से अपनी तरफ दबाया. फिर उसने अपना सर झुकाया और सीमा के कान पर अपने होंठ रखे.
“एपीआई… कितने दिन हो गए तुम्हे.” उसने सरगोशी में कहा, उसकी सांस सीमा के कान में गरम हवा भर रही थी. “कितनी प्यासी हो तुम, मैं जानता हूँ.”
सीमा ने आँखें बंद कर ली. उसके जिस्म में एक लहर सी दौड़ गयी. उस्मान ने धीरे से सीमा के कान की लौ को चूसा, और फिर उसकी गर्दन पर अपने होंठ रख दिए. सीमा के मुँह से एक हलकी सी *आह* निकल गयी.
“उस्मान… प्लीज…” वह कहना चाहती थी के रुक जाओ, मगर उसके दिल की गहराईयों से एक और आवाज़ आ रही थी – *और करो*.
उस्मान ने सीमा को बिस्तर पर धीरे से लेता दिया. वह उसके ऊपर झुका, उसके होंठ सीमा के होंठों पर आ लगे. पहले नरम, फिर गहरे. सीमा ने पहले झिझक दिखाई, लेकिन फिर उसने भी उस्मान का साथ दिया, अपने होंठों को उसके होंठों पर दबाया. उनके होंठ एक दुसरे को चूसने लगे, ज़बानें एक दुसरे से टकराने लगीं. सीमा की सांस तेज़ हो गयी, और उसका जिस्म कम्पनी लगा.
उस्मान ने अपने हाथ सीमा की कमर से नीचे ले जा कर उसके हिप्स पर रख दिए और उन्हें मसलने लगा. सीमा ने अपने हाथ उस्मान की गर्दन में दाल दिए और उसे और ज़ोर से अपनी तरफ खिंचा.
“उफ़… उस्मान… यह क्या कर रहे हो?” सीमा की आवाज़ बहक रही थी.
उस्मान ने अपने होंठ सीमा के होंठों से हटाए और उसकी गर्दन से होते हुए उसके मम्मों की तरफ बढ़ा. सीमा की चादर अब पूरी तरह से उसके जिस्म से हैट चुकी थी. उसका नंगा जिस्म उस्मान के सामने था – भरे हुए मम्मी, गोल कमर. उस्मान ने अपने होंठ सीमा के एक मम्मी पर रख दिए और उसे चूसने लगा. सीमा के मुँह से एक और तेज़ *आह* निकल गयी.
“ओह्ह… उस्मान… आह… धीरे…”
उस्मान ने एक मम्मी को छोड़ कर दुसरे पर अपने होंठ रख दिए. दोनों हाथों से वह सीमा के मम्मों को मसल रहा था, दबा रहा था, और उन्हें चूस रहा था. सीमा अपने आप को रोक नहीं प् रही थी. उसने अपनी आँखें बंद कर ली और अपने जिस्म को उस्मान के हवाले कर दिया.
“हाय… मेरी जान… आह… और चुसो… मेरे भाई मुझे पागल कर देगा तू… आह… ममम…” सीमा के मुँह से be-ikhtiyaar अलफ़ाज़ निकल रहे थे.
उस्मान ने मुस्कुराया. उसने अपना एक हाथ सीमा की रनों के बीच ले जा कर उसकी पंतय के ऊपर से उसकी फुद्दी को मसला. सीमा का जिस्म और तेज़ कम्पनी लगा.
“एपीआई… कितनी गरम हो तुम… यह देखो… तुम्हारी फुद्दी कितनी गीली हो गयी है.” उसने सरगोशी में कहा.
सीमा ने शर्म से आँखें बंद कर ली. “उस्मान… निकल दे… उसको… आह…”
उस्मान ने धीरे से सीमा की पंतय नीचे खिसकाई और उसे उतार दिया. अब सीमा का जिस्म पूरी तरह से नंगा उस्मान के सामने था. उस्मान ने उसकी फुद्दी को देखा – गुलाबी, उभरी हुई, और पसीने से चमकती हुई. उसने अपनी ऊँगली से उसके दाने को छुआ.
“आह! उस्मान! मार डाला तूने… और… और कर… आह… भाई मेरी जान निकल जाएगी” सीमा तड़प उठी.
उस्मान ने अपनी लुंगी भी उतार दी. उसका मोटा, गरम लुंड तन कर खड़ा था. सीमा ने एक झलक देखि, उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. उसने कभी इतना बड़ा लुंड नहीं देखा था, बिलाल का लुंड इसके सामने छोटा लग रहा था.
उस्मान ने सीमा के ऊपर आ कर उसके होंठों को चूमा और फिर धीरे से अपना लुंड सीमा की फुद्दी के मुहाने पर रखा.
“एपीआई… तैयार हो?” उस्मान ने सांस लेते हुए पुछा.
सीमा ने सर हिलाया, उसकी आँखों में आंसू थे, शर्म के या ख़ुशी के, वह खुद नहीं जानती थी. “हाँ… हाँ उस्मान… दाल दे… फाड़ दे मुझे… आह…”
उस्मान ने एक ज़ोर का धक्का लगाया. सीमा की मुँह से एक दर्द भरी चीख निकली, जो उसने तकिये में दबाने की कोशिश की.
“आह! मा… अहह… अहह… धीरे… अहह…” सीमा ने अपने दांत भींच लिए.
उस्मान ने थोड़ी देर रोका, सीमा के होंठों को चूम कर उसे तसल्ली दी. फिर धीरे धीरे वह हरकत करने लगा. पहले हलके झटके, फिर तेज़. सीमा का दर्द धीरे धीरे मज़े में बदल गया. उसने भी उस्मान का साथ देना शुरू किया, अपनी कमर उछाल उछाल कर उस्मान के धक्कों का जवाब देने लगी.
“हाँ… हाँ उस्मान… आह… ऐसे hi… मेरी गांड मार दे… आह… तेरा लुंड… मेरे भाई… छोड़ मुझे… आह… तेज़… और तेज़.” सीमा के मुँह से गलियां निकलने लगीं, उसकी शर्म सब भूल चुकी थी.
दोनों के जिस्म पसीने में भीग चुके थे, उनकी सांसें तेज़ हो चुकी थीं, और उनके जिस्म एक दुसरे में समां चुके थे. उनके टकराने की आवाज़ें, उनकी सिसकारियां, और गर्मी की वजह से चमकता हुआ जिस्म – सब ने उस कमरे में एक जूनून का माहौल बना दिया था.
तक़रीबन आधे घंटे बाद, उस्मान ने एक आखरी तेज़ धक्का लगाया और सीमा के अंदर hi झाड़ गया. सीमा का जिस्म भी कम्प गया और वह भी उस्मान के नीचे शांत हो गयी. दोनों एक दुसरे पर लेते रहे, सांस लेते हुए, जिस्म ढीले पद चुके थे.

उस्मान ने धीरे से सीमा के माथे पर किश किया. “एपीआई… मज़ा आया?”
सीमा ने धीरे से सर हिलाया. उसकी आँखों में अब भी आंसू थे. “हाँ… बोहोत.” उसने मुँह फेर लिया. शर्म और गिल्ट ने उसे फिर से घेर लिया था.
उस्मान थोड़ी देर सीमा के पास लेता रहा, फिर वह उठा. उसने अपने कपडे पहने और सीमा को चादर ओढ़ा दी. दरवाज़ा खोल कर वह चुप चाप बहार निकल गया.
सीमा अकेली बिस्तर पर लेती रही. उसका जिस्म अब भी उस्मान के लम्स की गर्मी से तप रहा था. मगर दिल में एक खाली पैन और बोहोत ज़्यादा गिल्ट था. उसने क्या कर दिया? अपने भाई के साथ… अपने शोहर को धोका दिया. लेकिन जिस्म को सुकून मिल चूका था.
सुबह 6:00 ऍम.
हमजा अपने कमरे से निकला. रात भर उसे नींद नहीं आयी थी. ऊपर से आती हुई धीमी आवाज़ें, और फिर उस्मान भाई का कमरे से बहार निकलना… उसने कॉरिडोर में देखा. सीमा एपीआई के कमरे का दरवाज़ा अब भी हल्का सा खुला हुआ था. हमजा का दिल धक् से रह गया. उसने धीरे से दरवाज़े को बंद किया और वापस अपने कमरे में चला गया. उसके ज़हन में एक अजीब सा तूफ़ान उठ रहा था.
नीचे नसीम चाय बना रही थी. जब सीमा नीचे आयी, उसका चेहरा थका हुआ था, आँखें लाल थीं, और उसकी चाल में एक बेचैनी थी.
“सीमा बीटा, रात को ठीक से सोई? आज ज़्यादा थकी हुई लग रही हो.” नसीम ने उसकी तरफ गौर से देखते हुए कहा.
सीमा ने जल्दी से सर हिलाया. “जी अम्मी… बस गर्मी बोहोत थी इसलिए नींद नहीं आयी.”
लेकिन नसीम ने गौर किया के सीमा की गर्दन पर एक हल्का सा लाल निशाँ था, जैसा किसी ने चूमा हो. उसकी आँखों में शक और गहरा हो गया.
---
Episode 4 ख़तम.