**घर की आग**
Episode 5: खामोश राज़ और बंद कमरे की तपिश
लाहौर की तपिश अब सिर्फ मौसम तक महदूद नहीं थी, बल्कि घर की char-diwari के अंदर एक अलग hi गर्माहट जनम ले रही थी.
सुबह के 10:30 बज रहे थे. रशीद साहिब अपने काम पर निकल चुके थे और छोटे बच्चों का कॉलेज भी शुरू हो गया था. घर में सिर्फ नसीम, सीमा और उस्मान रह गए थे.
सीमा किचन में अम्मी की मदद कर रही थी, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे. उसने महसूस किया के नसीम की नज़रें उसकी गर्दन पर रुके हलके से निशाँ और उसकी बेचैनी का पीछा कर रही हैं.
"सीमा... तू आज कल बोहोत खामोश रहने लगी है," नसीम ने धनिया kaat-te हुए बड़े सुकून से कहा, लेकिन उसकी आँखों में एक सवालिया निशाँ था.
"नहीं तोह अम्मी, बस... गर्मी की वजह से थकन हो जाती है," सीमा ने नज़रें चुराते हुए जवाब दिया.
तभी उस्मान किचन में दाखिल हुआ. उसके चेहरे पर वही mutma'in मुस्कराहट थी जो सीमा को अंदर तक झंझोर देती थी.
"अम्मी, मुझे थोड़ा काम से बहार जाना है, लेकिन दोपहर तक वापस आ जाऊंगा. सीमा एपीआई, आप को कुछ मंगवाना तोह नहीं?" उस्मान ने बड़े सलीक़े से पुछा, लेकिन उसने 'एपीआई' लफ्ज़ पर जो हल्का सा ज़ोर दिया, वह सिर्फ सीमा hi समझ सकती थी.
"नहीं... मुझे कुछ नहीं चाहिए," सीमा ने जल्दी से कहा और किचन से बहार निकल गयी.
उस्मान ने अम्मी को देखा और हल्का सा मुस्कुरा कर बहार चला गया. नसीम वहीँ कड़ी सब देख रही थी. उसे याद आया के कैसे रात को उसने ऊपर से आती धीमी सरगोशियां सुनी थीं. उसका दिल काँप utha—kya उसकी तरबियत में कोई कमी रह गयी थी या यह जवानी का अँधा जूनून था?
रात का मंज़र (12:45 ऍम):
घर में मुकम्मल सन्नाटा था. सीमा अपने कमरे में लेती थी, लेकिन नींद उससे सदियों दूर थी. उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया tha—jaise वह किसी का इंतज़ार कर रही हो और साथ hi उस एहसास से डर भी रही हो.
धीरे से दरवाज़े की चरखट हुई. उस्मान अंदर दाखिल हुआ. इस बार उसने कोई बहाना नहीं किया.
"एपीआई... मैंने कहा था न, मैं वापस आऊंगा," उस्मान ने बिलकुल पास बैठते हुए कहा. उसके जिस्म से एक मरदाना खुशबु और पसीने की हलकी सी महक आ रही थी.
सीमा ने उठने की कोशिश की, "उस्मान, देखो... जो कल हुआ वह एक खता थी. हम यह बार बार नहीं कर सकते. अम्मी को शक हो रहा है."
उस्मान ने सीमा का हाथ थमा और उसकी हथेली पर अपनी उँगलियाँ फेरने लगा. "शक तोह तब होगा न जब हम कुछ बदलेंगे. हम वैसे hi रहेंगे जैसे सबके सामने हैं... लेकिन बंद कमरे में, हम सिर्फ हम होंगे."
उसने सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा का सर उस्मान के मज़बूत सीने पर टिका था. उसकी सांसें तेज़ हो गयी थीं.
"तुम्हे डर नहीं लगता?" सीमा ने सरगोशी में पुछा.
"डर लगता तोह यहाँ नहीं होता. मुझे सिर्फ तुम्हारी इस खामोश प्यास का डर है जो तुम्हे तड़पती है," उस्मान ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर उठाते हुए कहा.
दोनों की आँखें मिली. सीमा की आँखों में गिल्ट और हवस की एक अजीब सी जुंग चल रही थी.
"सीमा एपीआई..." उस्मान ने सरगोशी की.
सीमा उठ कर बैठ गयी, उसने हलके कपडे पहने हुए थे जो उसके जिस्म के उभारों को नुमाया कर रहे थे. "उस्मान... मत करो यह सब. कोई देख लेगा तोह क़यामत आ जाएगी."
"कोई नहीं देखेगा," उस्मान ने पास बैठते हुए कहा और सीमा का नरम हाथ अपने हाथ में ले लिया. "तुम्हे पता है तुम कितनी हसीं हो? कल से तुम्हारी वह खुशबु मेरे दिमाग से नहीं निकल रही."
उस्मान ने धीरे से सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा ने शुरू में हलकी सी मुज़हमत की, लेकिन जब उस्मान के गरम होंठ उसकी गर्दन से टकराये, तोह उसके जिस्म की ठंडक पिघलने लगी. सीमा के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली.
उस्मान ने सीमा की शर्ट के बटन खोलने शुरू किये. सीमा की सांसें तेज़ हो गयी थीं. "उस्मान... तुम पागल हो गए हो," उसने कहा, लेकिन उसके हाथ khud-ba-khud उस्मान के बालों में फँस गए थे.
जब उस्मान ने उसके जिस्म से कपडे अलग किये, तोह सीमा का गोरा बदन चांदनी में चमकने लगा. उस्मान की नज़रें उसकी भरी हुई छातियों और पतली कमर पर जमी थीं. उसने मज़ीद इंतज़ार नहीं किया और सीमा के होंतून को अपने होंतून में भर लिया. यह चुम्बन मामूली नहीं था, इसमें सदियों की भूक और हवस शामिल थी.
"ाः... उस्मान... धीरे," सीमा ने कराहते हुए कहा जब उस्मान ने उसकी एक छाती को अपने मुंह में भर कर ज़ोर से चूसा. सीमा का जिस्म कमान की तरह टर्र गया. वह अपने भाई के इस नए रूप को देख कर दांग थी, लेकिन उसकी मरदाना क़ुव्वत उसे पागल कर रही थी.
उस्मान ने अपने कपडे भी उतार फेंके. उसका जिस्म गर्माहट से तप रहा था. उसने सीमा की टांगों को फैलाया और उसके बीच की गीली जगह को महसूस किया. "एपीआई... तुम तोह पहले से hi तैयार हो," उस्मान ने शरारत से कहा और एक गन्दी गली बकते हुए उसकी फूडी पर हाथ फेरा.

"हरामज़ादे... ज़बान संभाल के," सीमा ने सांस फूलते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों में नशा था.
उस्मान ने अपना सख्त और तना हुआ औज़ार सीमा की रनो के बीच रखा और एक झटके से अंदर दाखिल हो गया.
"ऊऊओह्ह्ह मारी गयी! उस्मान... निकालो... बोहोत बड़ा है!" सीमा ने दर्द और लुत्फ़ के मरे उस्मान के कंधे पर दांत गार दिए.

उस्मान ने रुकने के बजाये लम्बे और गहरे धक्के लगाना शुरू किये. कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की 'thap-thap' की आवाज़ गूँज रही थी. सीमा अब दर्द भूल चुकी थी, वह हर धक्के पर उछलती और उस्मान को और अंदर खींचती.
"हाँ... ऐसे hi... और ज़ोर से... मेरे भाई... और ज़ोर से छोड़ो मुझे!" सीमा अब hosh-o-hawaas खो चुकी थी. वह अपने छोटे भाई के नीचे एक रांड की तरह तड़प रही थी.

उस्मान ने उसकी टांगों को अपने कन्धों पर रखा और पूरी क़ुव्वत से धक्के मरने लगा. सीमा की फूडी से निकलने वाली गीलेपन ने काम और आसान कर दिया था. कुछ देर बाद, दोनों का जिस्म पसीने से शराबोर हो गया. उस्मान ने आखरी चाँद तेज़ झटके मारे और अपना सारा गरम मादा सीमा के अंदर खली कर दिया.
दोनों लम्बी लम्बी सांसें लेते हुए एक दुसरे से लिपट गए. सीमा का सर उस्मान के सीने पर था. "तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, उस्मान," उसने सरगोशी की.
उस्मान ने उसके माथे को चूमा. "मैंने तोह तुम्हे सिर्फ जीना सिखाया है, एपीआई."
सुबह का मंज़र:
नाश्ते की मेज़ पर सब बैठे थे. सीमा ने दुपट्टा अच्छे से सर पर लिया हुआ था, लेकिन उसकी आँखों की थकन और चेहरे की चमक कुछ और hi कह रही थी.
हमजा ने अचानक लुक़मा तोड़ते हुए पुछा, "भाई, कल रात मैं पानी पीने उठा था, आपके कमरे का दरवाज़ा खुला था और आप वहां नहीं थे. आप कहाँ थे इतनी रात को?"
नसीम ने अचानक अपनी नज़रें उठायीं और सीधा उस्मान और सीमा को देखा. सीमा का हाथ चाय के पियले पर थरथराया.
अगला Episode: क्या उस्मान पकड़ा जायेगा? या कोई नया बहाना बनाएगा?